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नागपुर महिला सम्मेलन के 75 वे साल पर हुआ आयोजन, सम्मानित की गई लेखिका अनिता भारती, महिला आरक्षण पर जोर

दूसरे -तीसरे सत्र में बातचीत



स्त्रीवादी पत्रिका स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच ने डा. आंबेडकर के नेतृत्व में नागपुर में 20 जुलाई 1942 को हुए महिला सम्मेलन के 75वें साल पर एक आयोजन जेएनयू में किया. उक्त सम्मेलन में 25 हजार दलित महिलाओं ने भागीदारी की थी और कई मह्त्वपूर्ण निर्णय लिये थे. जेएनयू में 29 जुलाई की देर शाम को खत्म हुए इस आयोजन में तीन सत्रों में विभिन्न विषयों पर विमर्श और महिला अधिकार विषय पर प्रसिद्ध नृत्यांगना रचना यादव का कत्थक नृत्य आयोजित हुआ तथा चर्चित दलित लेखिका और विचारक अनिता भारती को उनकी किताब ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ को स्त्रीकाल के द्वारा सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान (2016) दिया गया. इसके पूर्व 2015 में यह सम्मान शर्मिला रेगे को उनकी किताब ‘मैडनेस ऑफ़ मनु: बी आर आंबेडकरस राइटिंग ऑन ब्रैह्मनिकल पैट्रिआर्की’ को दिया गया था. इस सम्मान की शुरुआत 2015 में स्त्रीकाल ने स्त्रीवादी न्यायविद अरविंद जैन के आर्थिक सहयोग से शुरू किया था. कार्यक्रम का आयोजन स्त्रीकाल, आदिवासी साहित्य और यूनाइटेड ओबीसी फोरम’ के संयुक्त तत्वावधान में हुआ.

सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान, 2016 के साथ अनिता भारती, साथ में लेखिका नूर जहीर, अर्चना वर्मा, लेखक और हंस के सम्पादक संजय सहाय

इस अवसर पर पहले सत्र में ‘नागपुर महिला सम्मलेन: मील का पत्थर’ विषय पर बोलते हुए अमरावती विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन की प्राध्यापक निशा शेंडे ने कहा कि ‘ हमें मूल्यांकन करना चाहिए कि इतनी लम्बी यात्रा करके हम कहां तक पहुंचे. तब हम 25 हजार महिलाओं के साथ नागपुर में इकट्ठे हुए थे और आज हम 25 महिलाओं के साथ भी किसी बड़े संघर्ष की रूपरेखा नहीं बना पा रहे हैं, जबकि उन 25 हजार महिलाओं ने महिला मुक्ति का घोषणा पत्र तब लिख दिया था.’  यह सम्मलेन आल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज के बैनर तले हुआ था, जिसमें राजनीतिक, शैक्षणिक अधिकारों के प्रस्ताव पारित किये गये थे, साथ ही श्रमिकों के अधिकार के प्रस्ताव भी. ‘अपने अध्यक्षीय वकतव्य में आलोचक/ लेखिका हेमलता माहिश्वर ने नागपुर सम्मलेन के प्रस्तावों को और उस दौरान डा. आंबेडकर के द्वारा दिये गये भाषण के अंश बताये.

सावित्री फुले वैचारिकी सम्मान के दौरान लेखिका/ विचारक विमल थोराट अनिता भारती को शाल ओढाकर  सम्मानित करते हुए

उन्होंने कहा कि ‘इस अवसर पर डा. आंबेडकर ने उपस्थित महिलाओं से कहा कि वे अपने बच्चों में महान बनने के सपने का बीज डालें और उन्हें किसी भी तरह की हीनता से मुक्त करें.’ उन्होंने बताया कि इस सम्मलेन में बहुपत्नीत्व के खिलाफ पारित प्रस्ताव बाद में हिन्दू कोड बिल का अंश बना.’ इस सत्र में डा. एस.एन गौतम ने भी संबोधित किया.

पहले सत्र में नागपुर महिला सम्मलेन पर बोलते हुए  प्रोफ़ेसर निशा शेंडे और हेमलता माहिश्वर

स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने बताया कि ‘नागपुर सम्मलेन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि महिलाओं ने तब राजनीतिक आरक्षण की मांग की थी, और इसलिए भी कि उनके प्रस्ताव काफी क्रांतिकारी और स्पष्ट थे, जबकि 1975 में जारी ‘ टुवर्ड्स इक्वलिटी रिपोर्ट’, जो सातवें-आठवें दशक में महिला आन्दोलन का संदर्भ बना, राजनीतिक अधिकारों को लेकर उतना स्पष्ट नहीं था. इसलिए आज हमने महिला आरक्षण पर भी बातचीत रखी है.’ महिला आरक्षण पर सत्र में दलित अधिकार आन्दोलन की संयोजकों में से एक और लेखिका रजनीतिलक ने कहा कि ‘महिलाओं के लिए सारे अधिकार समानुपातिक प्रतिनिधित्व के साथ होने चाहिए.’ राष्ट्रीय महिला महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहू ने कहा कि ‘महिला आरक्षण के लिए हम बाहर की महिलाओं से ज्यादा संसद में बैठी महिलाओं को पहल लेनी चाहिए. उन्होंने महिलाओं को महिलाओं के शोषण में न शामिल होने का भी आह्वान किया.’ स्त्रीवादी न्यायविद और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन ने कहा कि ‘जबतक 25 लाख महिलायें संसद को घेरकर बैठ नहीं जायेंगी, तब तक महिला आरक्षण संभव नहीं है. जो हालात है उससे लगता है कि महिला आरक्षण और समान आचार संहिता पास होने में 100 साल लग जायेंगे.’ दलित और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली लेखिका कौशल पंवार ने कहा कि ‘हमें स्वाती सिंह जैसी महिलाओं से भी समस्या है, जो बेटी की सम्मान में अभियान चलाती है और अपनी ही भाभी, जो किसी की बेटी है की प्रताड़ना में शामिल पाई जाती है.’  सत्र की अध्यक्षता करते हुए नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इन्डियन वीमेन की महासचिव एनी राजा ने कहा कि ‘ महिला आयोग जैसी संस्थाओं को यह स्पष्ट करना चाहिए कि महिला आरक्षण पर उनकी क्या पोजीशन है. उन्होने कहा कि महिला आरक्षण के पिछले दो दशकों से संसद में पेंडिंग होने की वजह संसद का पितृसत्ताक नियन्त्रण में होना है.’

नृत्यांगना रचना यादव के साथ

सावित्रीबाई फुले सम्मान की अध्यक्ष विमल थोराट ने अपने सत्र ‘समकालीन महिला आंदोलन और हाशिये के प्रश्न’ में अपनी बात रखते हुए कहा कि महिला आंदोलन में जबतक हाशिये की महिलाओं की चिंताओं और मुद्दों को शामिल नहीं किया जायेगा तबतक महिला आंदोलन का स्वरुप समग्र नहीं हो पायेगा. इसी सत्र में हंस के संपादक संजय सहाय ने कहा कि ‘ महिलायें जबतक धर्म के जकड़न से मुक्त नहीं होंगी तबतक वे नारे भले लगाते रहें मुक्त नहीं हो सकतीं. उन्होंने शादी आदि संस्थाओं में धार्मिक प्रभावों के कारण उससे मुक्ति की भी बात की.’

रचना यादव महिला अधिकार विषय पर कत्थक नृत्य करती हुई नृत्यांगना रचना यादव

लेखिका और महिला अधिकार एक्टिविस्ट नूर जहीर ने मुसलमान महिलाओं, खासकर पसमांदा मुसलमान महिलाओं पर मौलवियों के प्रभाव पर चिंता जताई तथा कॉमन सिविल कोड के बनने में महिलाओं की भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया.’ दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापिका मेधा ने सवाल किया कि क्या कारण है कि हम ‘मीराबाई के लेखन पर तो बात करते हैं, लेकिन गैर द्विज कवयित्री सहजोबाई की चर्चा नहीं होती.’ आदिवासी अधिकारों के कार्यकर्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक गणेश मांझी ने महिलाओं के आर्थिक शोषण के विभिन्न पहलुओं को चिह्नित किया. यूनाइटेड ओबीसी फोरम से जुडी जेएनयू की शोधछात्रा सरिता माली ने भी अपनी बात रखी. सत्र के प्रारम्भ में लेखिका अनिता भारती को उनकी किताब के लिए सम्मानित किया गया. सम्मान वरिष्ठ लेखिका और विचारक विमल थोराट ने शाल ओढाकर और स्मृति चिह्न देकर किया. सम्मान के लिए मानपत्र और 12 हजार रुपये की राशि का चेक हंस के सम्पादक और कथाकार संजय सहाय ने अपने हाथों से अनिता भारती को सौपा. लेखिका अनिता भारती ने कहा कि ‘ स्त्री अधिकारों के लिए और खासकर दलित तथा हाशिये की स्त्री के अधिकारों के लिए समर्पित हम स्त्रियों की अपनी पत्रिका स्त्रीकाल के द्वारा सावित्रीबाई फुले सम्मान पाकर मैं गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ, खासकर इसलिए की इस सम्मान से हमसब की प्रेरक ‘सावित्रीबाई फुले’ का नाम जुड़ा है. निर्णायक मंडल की और से अपनी बात कहते हुए अर्चना वर्मा ने कहा कि ‘ अनिता भारती ने अपनी किताब में जाति-शोषण से पीड़ित दलित लेखकों के द्वारा दलित स्त्रियों के खिलाफ लेखन की निंदा की है तथा स्त्रीवाद के भीतर एक अलग धारा दलितस्त्रीवाद को व्याख्यायित करने की कोशिश की है.’ इस सम्मान के निर्णयाक मंडल में अर्चना वर्मा, सुधा अरोड़ा, अरविंद जैन, सुजाता पारमिता, हेमलता माहिश्वर और परिमला आंबेकर शामिल थे.

द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन से प्रकाशित फॉरवर्ड प्रेस सीरीज की तीन किताबों का लोकार्पण

इस अवसर पर ‘द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन’ द्वारा फॉरवर्ड प्रेस बुक्स सीरीज में छापी गई तीन किताबों ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘महिषासुर’ और ‘चिंतन के जनसरोकार’ का लोकार्पण भी किया गया. अंतिम सत्र में प्रसिद्ध नृत्यांगना रचनायादव ने महिला अधिकार पर कत्थक नृत्य की प्रस्तुति की. उन्हें स्त्रीकल की ओर से एनी राजा और विमलथोराट ने सम्मानित किया.

कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन यूनाइटेड ओबीसी फोरम की ओर से मुलायम सिंह यादव तथा आदिवासी साहित्य के संपादक गंगा सहाय ने किया. मंच संचालन धर्मवीर सिंह ने किया.

कश्मीरी सेब

प्रेमचंद


कल शाम को चौक में दो-चार जरूरी चीजें खरीदने गया था. पंजाबी मेवाफरोशों की दूकानें रास्ते ही में पड़ती हैं. एक दूकान पर बहुत अच्छे रंगदार,गुलाबी सेब सजे हुए नजर आये. जी ललचा उठा. आजकल शिक्षित समाज में विटामिन और प्रोटीन के शब्दों में विचार करने की प्रवृत्ति हो गई है. टमाटो को पहले कोई सेंत में भी न पूछता था. अब टमाटो भोजन का आवश्यक अंग बन गया है. गाजर भी पहले ग़रीबों के पेट भरने की चीज थी. अमीर लोग तो उसका हलवा ही खाते थे; मगर अब पता चला है कि गाजर में भी बहुत विटामिन हैं, इसलिए गाजर को भी मेजों पर स्थान मिलने लगा है और सेब के विषय में तो यह कहा जाने लगा है कि एक सेब रोज खाइए तो आपको डाक्टरों की जरूरत न रहेगी. डाक्टर से बचने के लिए हम निमकौड़ी तक खाने को तैयार हो सकते हैं. सेब तो रस और स्वाद में अगर आम से बढक़र नहीं है तो घटकर भी नहीं. हाँ, बनारस के लंगड़े और लखनऊ के दसहरी और बम्बई के अल्फाँसो की बात दूसरी है. उनके टक्कर का फल तो संसार में दूसरा नहीं है मगर; मगर उनमें विटामिन और प्रोटीन है या नहीं, है तो काफी है या नहीं, इन विषयों पर अभी किसी पश्चिमी डाक्टर की व्यवस्था देखने में नहीं आयी. सेब को यह व्यवस्था मिल चुकी है. अब वह केवल स्वाद की चीज नहीं है, उसमें गुण भी है. हमने दूकानदार से मोल-भाव किया और आध सेर सेब माँगे.

दुकानदार ने कहा-बाबूजी बड़े मजेदार सेब आये हैं, खास कश्मीर के. आप ले जाएँ, खाकर तबीयत खुश हो जाएगी. मैंने रूमाल निकालकर उसे देते हुए कहा-चुन-चुनकर रखना. दूकानदार ने तराजू उठाई और अपने नौकर से बोला-लौंडे आध सेर कश्मीरी सेब निकाल ला.  चुनकर लाना.लौंडा चार सेब लाया. दूकानदार ने तौला, एक लिफाफे में उन्हें रखा और रूमाल में बाँधकर मुझे दे दिया. मैंने चार आने उसके हाथ में रखे. घर आकर लिफ़ाफा ज्यों-का-त्यों रख दिया. रात को सेब या कोई दूसरा फल खाने का कायदा नहीं है. फल खाने का समय तो प्रात:काल है. आज सुबह मुँह-हाथ धोकर जो नाश्ता करने के लिए एक सेब निकाला, तो सड़ा हुआ था.
एक रुपये के आकार का छिलका गल गया था. समझा, रात को दूकानदार ने देखा न होगा. दूसरा निकाला. मगर यह आधा सड़ा हुआ था. अब सन्देह हुआ, दुकानदार ने मुझे धोखा तो नहीं दिया है. तीसरा सेब निकाला. यह सड़ा तो न था; मगर एक तरफ दबकर बिल्कुल पिचक गया. चौथा देखा. वह यों तो बेदाग था; मगर उसमें एक काला सूराख था जैसा अक्सर बेरों में होता है. काटा तो भीतर वैसे ही धब्बे, जैसे किड़हे बेर में होते हैं. एक सेब भी खाने लायक नहीं. चार आने पैसों का इतना गम न हुआ . जितना समाज के इस चारित्रिक पतन का. दूकानदार ने जान-बूझकर मेरे साथ धोखेबाजी का व्यवहार किया.  एक सेब सड़ा हुआ होता, तो मैं उसको क्षमा के योग्य समझता. सोचता, उसकी निगाह न पड़ी होगी. मगर चार-के-चारों खराब निकल जाएँ, यह तो साफ धोखा है.

मगर इस धोखे में मेरा भी सहयोग था. मेरा उसके हाथ में रूमाल रख देना मानो उसे धोखा देने की प्रेरणा थी. उसने भाँप लिया कि महाशय अपनी आँखों से काम लेने वाले जीव नहीं हैं और न इतने चौकस हैं कि घर से लौटाने आएँ. आदमी बेइमानी तभी करता जब उसे अवसर मिलता है. बेइमानी का अवसर देना, चाहे वह अपने ढीलेपन से हो या सहज विश्वास से, बेइमानी में सहयोग देना है. पढ़े-लिखे बाबुओं और कर्मचारियों पर तो अब कोई विश्वास नहीं करता. किसी थाने या कचहरी या म्यूनिसिपिलटी में चले जाइए, आपकी ऐसी दुर्गति होगी कि आप बड़ी-से-बड़ी हानि उठाकर भी उधर न जाएँगे. व्यापारियों की साख अभी तक बनी हुई थी. यों तौल में चाहे छटाँक-आध-छटाँक कस लें; लेकिन आप उन्हें पाँच की जगह भूल से दस के नोट दे आते थे तो आपको घबड़ाने की कोई जरूरत न थी. आपके रुपये सुरक्षित थे. मुझे याद है, एक बार मैंने मुहर्रम के मेले में एक खोंचे वाले से एक पैसे की रेवडिय़ाँ ली थीं और पैसे की जगह अठन्नी दे आया था. घर आकर जब अपनी भूल मालूम हुई तो खोंचे वाले के पास दौड़ा गये. आशा नहीं थी कि वह अठन्नी लौटाएगा, लेकिन उसने प्रसन्नचित्त से अठन्नी लौटा दी और उलटे मुझसे क्षमा माँगी. और यहाँ कश्मीरी सेब के नाम से सड़े हुए सेब बेचे जाते हैं ? मुझे आशा है, पाठक बाज़ार में जाकर मेरी तरह आँखे न बन्द कर लिया करेंगे. नहीं उन्हें भी कश्मीरी सेब ही मिलेंगे ?

क्यों चुनी गई अनिता भारती की किताब ‘समकालीन नारीवाद : दलित स्त्री का प्रतिरोध” ‘सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान’, 2016 के लिए

निर्णायक मंडल की ओर से अर्चना वर्मा 

निर्णायक मंडल ( 2016)  के सदस्य : 
अर्चना वर्मा, सुधा अरोड़ा, अरविंद जैन, सुजाता पारमिता, हेमलता माहिश्वर, परिमला आंबेकर

यह सम्मान हर वर्ष स्त्रीवादी वैचारिकी की किताब को स्त्रीकाल के द्वारा, स्त्रीवादी न्यायविद अरविंद जैन के आर्थिक सहयोग से दिया जाता है. 

वरिष्ठ लेखिका और विचारक विमल थोराट अनिता भारती को शाल ओढाकर सम्मानित करते हुए

‘सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान’ के लिये अनिता भारती की किताब ‘समकालीन नारीवाद : दलित स्त्री का प्रतिरोध” का चुनाव करते समय हमे यह अहसास था कि हिन्दी का स्त्री-विमर्श रचनात्मक तौर पर जितना समृद्ध है, सैद्धान्तिकी के लिहाज से उतना नहीं। स्त्री-काल हाशियागत समुदाय के रूप में समूचे स्त्री-विमर्श को अपने भीतर समेटता है लेकिन हाशिये के उस तरफ़ भी अति-हाशियागत समूह के प्रतिनिधि के रूप में लेखिका का दलित-विमर्श का अभ्यन्तर-अंग होना भी इस चुनाव में विशेष महत्त्व रखता था। तो चुनाव में हमारी एक प्राथमिकता तो वैचारिकी से जुड़ी थी और दूसरी प्राथमिकता यह थी कि उसे अपने समाज की अन्तरंग उपज होना चाहिये। अनीता भारती की यह किताब दोनो कसौटियों पर खरी उतरी.

अनिता भारती का मानना है कि “समाज परिवर्तन में साहित्य की अपनी अमिट भूमिका है। साहित्य समाज में व्याप्त कुरीतियों, पुरातन मान्यताओं से लड़ना सिखाता है। यदि साहित्य की भूमिका समाज की सकारात्मक सोच बनाने की न होकर नकारात्मक होने लगे तो उसका दहन कर दिया जाना चाहिए।…आज दलित लेखकों और दलित साहित्य को चिंतन मनन करके फैसला करना है कि मूल्य, सिद्धांतों के साथ समझौता किसी भी हद पर नहीं किया जा सकता। दलित साहित्य को दलित आंदोलन को तोड़ने वाले जातिवादी असमानता मूलक, लिंगभेद पर आधारित पितृसत्तात्मक और ब्राह्मणवादी तत्वों से संघर्ष कर अपनी स्वतंत्र और प्रगतिशील राह बनानी होगी।”

मानपत्र और चेक देते हुए  हंस के संपादक संजय सहाय, लेखिका नूर जहीर

कफ़न और गोदान पर विचार करते हुए वे साहित्यिक मूल्यांकन में केवल प्रतिक्रयामूलक रूख से ऊपर उठकर एक तटस्थ दृष्टि और सम्यक् सन्तुलन का परिचय देती हैं। थेरी-गाथा में वे नारी-मुक्ति के स्वर के इतिहास की निशानदेही करती हैं, ‘कफ़न’ और ‘गोदान’ के सन्दर्भ में दलित आलोचना द्वारा उठाये गये विवादों की भी समीक्षा करती हैँ व रचना को समग्रतापूर्वक देखने की वकालत करती हैं। थेरी गाथा और कफ़न पर विचार करते हुए वे इसको कोरा साहित्यिक विवाद नहीं रहने देतीं बल्कि वस्तुतः धर्मवीर और दलित-विमर्श के अन्य सिद्ध-प्रसिद्ध और स्थापित नामों की स्त्री-विरोधी अवधारणाओं के साथ लोहा लेती हैँ। डॉ. धर्मवीर की स्त्री विरोधी, अम्बेडकर बुद्ध विरोधी वैचारिकी के खिलाफ अपनी टिप्पणी करते हुए वे दलित पत्र-पत्रिकाओं के इस रुख पर चिन्ता प्रकट करती हैँ कि वे दलित समाज का मुख-पत्र होने के दावे के बावजूद धर्मवीर की ऐसी सोच पर कोई हस्तक्षेप या कोई टिप्पणी नहीं करती हैं।

सम्मान के बाद

अपने संकल्प को व्यावहारिक जामा पहनाने के लिये एक तरफ़ उचित आक्रोश, धारदार तर्क और प्रखर प्रतिवाद के साथ दलित-विमर्श के मैदान में स्त्री-पक्ष से मोर्चा खोलती हैँ, “ वे कहती हैँ ” हमारे दलित साथियों की राय है कि दलित समाज में दलित महिला पुरुष दोनों की एक सी स्थिति है अर्थात दोनों ही गुलाम है इसलिए पहले हमें सामूहिक होकर जाति मुक्ति की लडाई लडनी है जब हमें जाति से मुक्ति मिल जाएंगे तब हम दलित महिलाओं के लिए लड लेगे। परन्तु एक दलित एक्टिविस्ट होने के नाते मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि हमें एक साथ सामूहिक लडाई के साथ दलित स्त्री अधिकारों की लडाई भी साथ-साथ ही लडनी पडेगी। लेकिन हमारे पुरुष साथियों को यह बात बिल्कुल गले नही उतर रही है। ” … “ जैसे ही स्त्री अपनी अस्मिता की बात करती है धर्मवीर जैसे ब्राह्मणवादी सकीर्ण विचारधारा वाले लोगों के पैरो तले जमीन खिसकने लगती है। उन्हें अपने अधिकार छीनने का भय सताने लगता है। उन्हे लगता है कि अगर नारी हमारे बराबर आ गई तो हमारा हुक्म कौन मानेगा? वे अपना गुलाम किसको बनायेंगे। इसलिए वे मनु की तरह ही स्त्री को घर में रखने की हामी है और वे बिल्कुल मनु महाराज की तरह औरतों का गठन चाहते है।” दूसरी तरफ़ वे स्त्री-विमर्श के मोर्चे पर सवर्ण स्त्री के साथ और साझेदारी की विडम्बनाओं पर दृढ़तापूर्वक सोदाहरण उँगली उठाती है। छिनाल-प्रकरण में अपनी भागीदारी की बात करते हुए वे याद करती हैं, – “पर मेरे मन के अंदर कुछ सवाल मुझे व्यथित कर रहे थे। सवाल यही थे कि क्या दलित स्त्रियों की अस्मिता किसी गैर-दलित स्त्री की अस्मिता से कम होती है? जब एक सवर्ण लेखिका पर हमला हुआ तो सारी लेखक बिरादरी इकट्ठी हो गई , पर जब दलित लेखिकाओं पर हमले हो रहे है तो सब चुप्पी मार कर बैठे रहे? दलित महिलाएं हमेशा समाज में अन्य महिलाओं के साथ जुडकर उनके मुद्दों के साथ सहानुभूति व बहनापा दिखाती रही है परन्तु दलित महिलाओं अपने मुद्दों के साथ हमेशा अकेली खडी दिखाई और लडती नजर आती है।

दलित स्त्री लेखन की दो पीढियां

अनिता भारती के व्यक्तित्व का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका ऐक्टिविज़्म है। यह उनके चिन्तक व्यक्तित्व के लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उसकी वजह से उनके चिन्तन को एक निजी अनुभव की धार मलती है, एक ठोस आधार मिलता है और वह हमारे अपने जमीनी यथार्थ से जुड़ता है। उनका ऐक्टिविज़्म छात्र-जीवन के साथ शुरू हुआ जिसके विषय में वे बताती हैँ कि – ” लडकियां इन छात्र संगठनों में अपने अस्तित्व के होने के अहसास की एक मृग मरीचिका में जी रही होती है,…हर साल नयी-नयी लडकियों के तरह-तरह के छात्र-संगठनों में जुडने के बाबजूद बाद में उनकी किसी भी तरह के आंदोलनों में चाहे वे महिला आंदोलन हो, अथवा जनआंदोलन या फिर सामाजिक व दलित आंदोलन, इन सबमें उनकी संख्या के हिसाब से हिस्सेदारी नही दिखती।”

सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान के लिए स्मृतिचिह्न अशोक स्तम्भ के साथ लेखिका

तबका उनका यह अनुभव बाद के जीवन तक भी उनके साथ आता है और अपनी भूमिका तय करने में उनकी मदद करता है – ” मेरे अपने जीवन में लिए गए मेरे फैसले ही मेरे जीवन की पोलिटिक्स को स्पष्ट करते है… हमारे जैसे लोग जो सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन जीते हुए समाज बदलाव का कार्य करना चाहते है उनके फैसले अपने साथ-साथ बाकी समाज को भी कही ना कही गहराई से प्रभावित और प्रेरित करते हैं।
स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श के बीच की खाली जगह को भरने वाली अनुभवसम्मत एवं प्रामाणिक वैचारिकी के सृजन के लिये उनकी किताब पुरस्कार के लिये चुनी गयी। मैं निर्णायक मण्डल की ओर से उनको बधाई देती हूँ।

वे ‘हजार चौरासी की मां’ थीं !

अनुवाद : अरुण माहेश्वरी



महाश्वेता देवी की लिखने की टेबुल कभी भी बदली नहीं. बालीगंज स्टेशन रोड में ज्योतिर्मय बसु के मकान में लोहे की घुमावदार सीढ़ी वाली छत के घर, गोल्फ ग्रीन या राजाडांगा कहीं भी क्यों न रहे, टेबुल हमेशा एक ही. ढेर सारे लिफाफे, निवेदन पत्र, सरकारी लिफाफे, संपादित ‘वर्तिका’ पत्रिका की प्रूफकापियां बिखरी हुई. एक कोने में किसी तरह से उनके अपने राइटिंग पैड और कलम की बाकायदा मौजूदगी. सादा बड़े से उस चौकोर पैड पर डाट पेन से एकदम पूरे-पूरे अक्षरों में लिखने का अभ्यास था उनका. लिखना, साहित्य बहुत बाद में आता है. कौन से शबरों के गांव में ट्यूबवेल नहीं बैठा है, बैंक ने कौन से लोधा नौजवान को कर्ज देने से मना कर दिया है.सरकारी कार्यालयों में लगातार चिट्ठियां लिखना ही जैसे उनका पहला काम था. ज्ञानपीठ से लेकर मैगसेसे पुरस्कार से विभूषित महाश्वेता जितनी लेखक थी, उतनी ही एक्टिविस्ट भी थी. 88 साल की उम्र में अपने हाथ में इंसुलिन की सूईं लगाते-लगाते वे कहती थी, ‘‘तुम लोग जिसे काम कहते हो, उनकी तुलना में ये तमाम बेकाम मुझे ज्यादा उत्साहित करते हैं.’’

इसीलिये महाश्वेता को सिर्फ एक रूप में देखना असंभव है. वे ‘हजार चौरासी की मां’ है. वे ‘अरण्य के अधिकार’ की उस प्रसिद्ध पंक्ति, ‘नंगों-भूखों की मृत्यु नहीं है’  की जननी है. दूसरी ओर वे सिंगुर-नंदीग्राम आंदोलन का एक चेहरा थी. एक ओर उनके लेखन से बिहार-मध्यप्रदेश के कुर्मी, भंगी, दुसाध बंगाली पाठकों के दरवाजे पर जोरदार प्रहार करते हैं. और एक महाश्वेता आक्साफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से दिल्ली बोर्ड के विद्यार्थियों के लिये ‘आनन्दपाठ’ शीर्षक संकलन तैयार करती है, जिम कार्बेट से लू शुन, वेरियर एल्विन का अनुवाद करके उन्हें बांग्ला में लाती है. उनके घर पर गांव से आए दरिद्रजनों का हमेशा आना-जाना लगा रहता है. दो साल पहले की बात है. किसी काम के लिये कोलकाता आया एक शबर नौजवान महाश्वेता के घर पर टिका हुआ था. नहाने के बाद आले में रखी महाश्वेता की कंघी से ही अपने बाल संवार लिये. इस शहर में अनेक वामपंथी जात-पातहीन, वर्ग-विहीन, शोषणहीन समाज के सपने देखते हैं. लेकिन अपने खुद के तेल-साबुन, कघी को कितने लोग बेहिचक दूसरे को इस्तेमाल करने के लिये दे सकते हैं ? कैसे उन्होंने यह स्वभाव पाया ?


सन् 2001 में गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक को महाश्वेता ने कहा था, ‘जब शबरों के पास गई, मेरे सारे सवालों के जवाब मिल गये. आदिवासियों पर जो भी लिखा है, उनके अंदर से ही पाया है.’सबाल्टर्न इतिहास लेखन की प्रसिद्धी के बहुत पहले ही तो महाश्वेता के लेखन में वे सब अनसुने सुने जा सकते थे. 1966 में प्रकाशित हुई थी ‘कवि बंध्यघटी गात्री का जीवन और मृत्यु’. उसमें उपन्यासकार ने माना था, ‘बहुत दिनों से इतिहास का रोमांस मुझे आकर्षित नहीं कर रहा था. एक ऐसे नौजवान की कहानी लिखना चाहती थी जो अपने जन्म और जीवन का अतिक्रमण करके अपने लिये एक संसार बनाना चाहता था, उसका खुद का रचा हुआ संसार.’ ‘चोट्टी मुण्डा और उसका तीर’ वही अनश्वर स्पिरिट है. ‘चोट्टी खड़ा रहा. निर्वस्त्र। खड़े-खड़े ही वह हमेशा के लिये नदी में विलीन हो जाता है, यह किंवदंती है. जो सिर्फ मनुष्य ही हो सकता है.’ सारी दुनिया के सुधीजनों के बीच महाश्वेता इस वंचित जीवन की कथाकार के रूप में ही जानी जायेगी. गायत्री स्पिवाक महाश्वेता के लेखन का अंग्रेजी अनुवाद करेगी. इसीलिये महाश्वेता को बांग्ला से अलग भारतीय और अन्तरराष्ट्रीय साहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा.

विश्व चिंतन से महाश्वेता का परिचय उनके जन्म से था. पिता कल्लोल युग के प्रसिद्ध लेखक युवनाश्व या मनीश घटक. काका ऋत्विक घटक. बड़े मामा अर्थशास्त्री, ‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ के संस्थापक सचिन चौधुरी. मां के ममेरे भाई कवि अमिय चक्रवर्ती. कक्षा पांच से ही शांतिनिकेतन में पढ़ाई.वहां बांग्ला पढ़ाते थे रवीन्द्रनाथ.  नंदलाल बोस, रामकिंकर बेज जैसे शिक्षक मिलें.  देखने लायक काल था. 14 जनवरी 1926 के दिन बांग्लादेश के पाबना (आज के राजशाही) जिले के नोतुन भारेंगा गांव में महाश्वेता का जन्म. इसके साल भर बाद ही ‘आग का दरिया’ की लेखिका कुर्रतुलैन हैदर जन्मी थी. दोनों के लेखन में ही जात-पात, पितृसत्ता का महाकाव्य-रूपी विस्तार दिखाई दिया. इसी चेतना की ही तो उपज थी – ‘स्तनदायिनी’ का नाम यशोदा. थाने में बलात्कृत  द्रौपदी मेझेन द्रौपदी का ही आधुनिक संस्करण है. भारतीय निम्नवर्ग एक समान पड़ा हुआ पत्थर नहीं, उसमें भी दरारे हैं, वह क्या ‘श्री श्री गणेश महिमा’ में दिखाई नहीं देता है : ‘‘भंगियों की होली खत्म होती है दो सुअरों को मार कर, रात भर मद-मांस पर  हल्ला करते हैं. दुसाध यहां अलग-थलग थ.। फिर दो साल हुए वे भी भंगियों के साथ होली में शामिल है.’’

अपनी साहित्य यात्रा के इस मोड़ पर आकर महाश्वेता एक दिन रुक नहीं गई. उसके पीछे उनकी लंबी परिक्रमा थी. ‘46 में विश्वभारती से अंग्रेजी में स्नातक हुई. एमए पास करने के बाद विजयगढ़ के ज्योतिष राय कालेज में अध्यापन. उसके पहले 1948 से ‘रंगमशाल’ अखबार में बच्चों के लिये लिखना शुरू किया. आजादी के बाद ‘नवान्नो’ के लेखक विजन भट्टाचार्य से विवाह. तब कभी ट्यूशन करके, कभी साबुन का पाउडर बेच कर परिवार चलाया. बीच में एक बार अमेरिका में बंदरों के निर्यात की योजना भी बनाई, लेकिन सफल नहीं हुई. 1962 में तलाक, फिर असित गुप्त के साथ दूसरी शादी. 1976 में उस वैवाहिक जीवन का भी अंत. इसी बीच, पचास के दशक के मध्य एकमात्र बेटे नवारुण को उसके पिता के पास छोड़ कर एक कैमरा उठाया और आगरा की ट्रेन में बैठ गई. रानी के किले, महलक्ष्म मंदिर का कोना-कोना छान मारा. शाम के अंधेरे में आग ताप रही किसान औरतों से तांगेवाले के साथ यह सुना कि ‘रानी मरी नहीं. बुंदेलखंड की धरती और पहाड़ ने उसे आज भी छिपा रखा है.’

इसके बाद ही ‘देश’ पत्रिका में ‘झांसी की रानी’ उपन्यास धारावाहिक प्रकाशित हुआ. और इस प्रकार, अकेले घूम-घूम कर उपन्यास की सामग्री जुटाने वाली क्रांतिकारी महाश्वेता अपनी पूर्ववर्ती लीला मजुमदार, आशापूर्णा देवी से काफी अलग हो गई. उनका दबंग राजनीतिक स्वर भी अलग हो गया. ‘अग्निगर्भ’ उपन्यास की वह अविस्मरणीय पंक्ति, ‘‘जातिभेद की समस्या खत्म नहीं हुई है. प्यास का पानी और भूख का अन्न रूपकथा बने हुए है. फिर भी कितनी पार्टियां, कितने आदर्श, सब सबको कामरेड कहते हैं.’’ कामरेडों ने तो कभी भी ‘रूदाली’, ‘मर्डरर की मां’ की समस्या को देखा नहीं है. ‘चोली के पीछे’ की स्तनहीन नायिका जिसप्रकार ‘लॉकअप में गैंगरेप…ठेकेदार ग्राहक, बजाओ गाना’ कहती हुई चिल्लाती रहती है, पाठक के कान भी बंद हो जाते हैं. कुल मिला कर महाश्वेता जैसे कोई प्रिज्म है. कभी बिल्कुल उदासीन तो कभी बिना गप्प किये जाने नहीं देगी. अंत में, बुढ़ापे की बीमारियों, पुत्रशोक ने उन्हें काफी ध्वस्त कर दिया था. फिर भी क्या महाश्वेता ही राजनीति-जीवी बहुमुखी बंगालियों की अंतिम विरासत होगी ? ममता बंदोपाध्याय की सभा के मंच पर उनकी उपस्थिति को लेकर बहुतों ने बहुत बातें कही थी. महाश्वेता ने परवाह नहीं की. लोगों की बातों की परवाह करना कभी भी उनकी प्रकृति नहीं रही.

(आनंदबाजार पत्रिका’ दैनिक के 29 जुलाई 2016 के अंक से साभार)

महिला आरक्षण, स्त्रीवाद पर बातचीत और सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान समारोह

1942 के 20 जुलाई को हुए नागपुर महिला सम्मलेन के 75 वें साल के अवसर पर 29 जुलाई को जेएनयू के ‘ट्रिपल एस ऑडिटोरियम’ में महिला आरक्षण पर बात करेंगे सीताराम येचुरी ( महासचिव सीपीएम), एनी राजा ( महासचिव एन एफ आई डव्ल्यू), राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सुषमा साहु, रंजीत रंजन ( सांसद, कांग्रेस) अरविंद जैन (अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट),  रजनी तिलक (दलित अधिकार आंदोलन),  रतन लाल (दलित अधिकार एक्टिविस्ट) और कौशल पंवार (दलित और महिला अधिकार कार्यकर्ता) तथा सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान से साम्मानित होंगी अनिता भारती  अपनी किताब ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ ( स्वराज प्राकाशन) के लिए.  ‘साथ ही स्त्रीवाद और हाशिये की आवाज’, ‘नागपुर महिला सम्मलेन: मील का पत्थर’ आदि विषयों पर बातचीत करेंगे विमल थोराट ( आंबेडकरवादी स्त्रीवादी चिंतक), संजय सहाय (लेखक,संपादक
हंस), नूर जहीर (लेखिका स्त्रीअधिकार एक्टिविस्ट), गणेश मांझी (असिस्टेंट
प्रोफ़ेसर, डी यू), मेधा पुष्कर (असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डीयू) सरिता माली (यूनाइटेड ओबीसी फोरम, जे एन यू) तथा हेमलता माहिश्वर (प्रोफ़ेसर जामिया मीलिया इस्लामिया) डा. एस. एन. गौतम(
आंबेडकरवादी एक्टिविस्ट), निशा शेंडे( प्रोफ़ेसर अमरावती विश्वविद्यालय).  साथ ही महिला अधिकार विषय पर नृत्यांगना रचना यादव की कत्थक प्रस्तुति भी.



आइये शिरकत करें 

सन 1942 के 20 जुलाई को डा. आंबेडकर के नेतृत्व में महिलाओं का एक सम्मलेन, नागपुर महाराष्ट्र में हुआ था. इस सम्मेलन में महिलाओं ने सामाजिक समानता के कई प्रस्ताव पारित किये थे. यह भारत में स्त्रीवादी आंदोलन और विमर्श में मील का पत्थर है, जबकि भारतीय महिला आंदोलन के भीतर यह अलक्षित घटना है. महिला अधिकार के उक्त सम्मलेन का यह 75वां साल है. इस अवसर पर स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच (स्त्रीवादी पत्रिका) आदिवासी साहित्य और यूनाइटेड ओबीसी फोरम के संयुक्त तत्वावधान में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में महिला आरक्षण सहित अलग –अलग विषयों पर बातचीत आयोजित कर रही है. इस अवसर पर पत्रिका अनिता भारती की किताब ‘समकालीन नारीवाद: दलित स्त्री के प्रश्न’ को सावित्री बाई फुले साम्मान भी देगी. कार्यक्रम के अंत में महिला अधिकार विषय पर प्रसिद्द्ध कत्थक नृत्यांगना रचना यादव की नृत्य प्रस्तुति होगी.
दिनांक : 29 July 2016
समय : 2 बजे से
स्थान: एसएसएस1,जे एन यू

पहला सत्र : 2.00pm- 2.45pm

नागपुर महिला सम्मलेन: स्त्रीवादी आंदोलन में मील का पत्थर

पैनल :  हेमलता माहिश्वर (प्रोफ़ेसर जामिया मीलिया इस्लामिया) डा. एस. एन. गौतम( आंबेडकरवादी एक्टिविस्ट), निशा शेंडे( प्रोफ़ेसर अमरावती विश्वविद्यालय) ,

दूसरा सत्र : 2.45pm– 4.00 PM 



सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान

निर्णायक मंडल की ओर से:  अर्चना वर्मा (वरिष्ठ लेखिका और आलोचक)
लेखिका का वक्तव्य : अनिता भारती (दलित स्त्रीवादी लेखिका)
विषय: समकालीन स्त्रीवाद और हाशिये की आवाज 
पैनल : विमल थोराट ( आंबेडकरवादी स्त्रीवादी चिंतक), संजय सहाय (लेखक,संपादक हंस), नूर जहीर (लेखिका स्त्रीअधिकार एक्टिविस्ट), गणेश मांझी (असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, डी यू), मेधा पुष्कर (असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डीयू)
हस्तक्षेप: सरिता माली (यूनाइटेड ओबीसी फोरम, जे एन यू)


तीसरा सत्र : 4.00pm-5.30pm

विषय: महिला आरक्षण की रुकावटें

पैनल : एनी राजा( महासचिव, एनएफआईडव्ल्यू), सीताराम येचुरी( महासचिव, सीपीएम), रंजीत रंजन ( सांसद, कांग्रेस) अरविंद जैन (अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट), सुषमा साहू ( सदस्य महिला आयोग), रजनी तिलक (दलित अधिकार आंदोलन),
हस्तक्षेप: रतन लाल (दलित अधिकार एक्टिविस्ट), कौशल पंवार (दलित और महिला अधिकार कार्यकर्ता)
धन्यवाद ज्ञापन: मुलायम सिंह यादव (यूनाइटेड ओबीसी फोरम)



5.30pm-5.45pm (हाई टी)



सांस्कृतिक कार्यक्रम : 5.45pm-6.30 PM:- कत्थक नृत्य: नृत्यांगना रचना यादव (विषय महिला अधिकार)

धन्यवाद ज्ञापन : गंगा सहाय मीणा (संपादक, आदिवासी साहित्य)

आयोजक : स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच, आदिवासी साहित्य, यूनाइटेड ओबीसी फोरम

स्त्री मुक्ति आंदोलन : कहाँ पहुँचे

कुसुम त्रिपाठी

स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें
प्रकाशित हैं , जिनमें ‘ औरत इतिहास रचा है तुमने’,’  स्त्री संघर्ष  के सौ
वर्ष ‘ आदि चर्चित हैं. संपर्क: kusumtripathi@ymail.com

भारतीय स्त्री मुक्ति आन्दोलन अपने विकास के दौरान जहाँ बहुत सारे सामाजिक, धार्मिक रूढ़ियों, जड़ताओं कुप्रथाओं और पाखण्डों से मुक्त हुई है, वही उसके सामने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई है . जो परम्परागत कुरीतियों से अधिक घातक सिद्ध हो रही हैं. भारतमें भूमण्डलीकरण के कारण भी बहुत-सी नई समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं. नए रूप में स्त्री देह व्यापार, भ्रूण-हत्या, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, घरेलू हिंसा, कुपोषण, हिंसा-अपराध, हत्या-आत्महत्या, विस्थापन, निरक्षरता, साम्प्रदायिकता, महिलाओं का वस्तुकरण, परिवार का बिखरना जैसी अनेक भयावह स्थितियाँ सामने खड़ी हैं. साथ ही बहुत-सी पुरानी परम्पराएँ कुप्रथाएँ भी आज तक कायम हैं जो स्त्री सशक्तिकरण में अवरोधक हैं. साथ ही गरीबी, जातिवाद, कुपोषण, सम्प्रदायवाद, पारिवारिक विघटन, हिंसा, कुपोषण, स्वास्थ्य की असुविधाओं का अभाव आदि है जो जेंडर विभेद के कारण समाज में मौजूद है. यह एक चिंताजनक बात है कि जब एक ओर तमाम महिला संगठनों, महिला स्वयंसेवी संस्थाओं की संख्या बढ़ रही है, तब हम देख रहे हैं उसी के साथ-साथ महिलाओं के साथ शोषण व अत्याचार भी बढ़ रहा है. चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रोज प्रचार माध्यमों में स्त्रियों पर हिंसा की कोई-न-कोई ताजी खबर जरूर रहती है. महिला आन्दोलनों से जुड़ी कार्यकर्ताओं के बीच, महिला बुद्धिजीवियों के सामने यह एक जटिल प्रश्न है कि स्त्री मुक्ति आन्दोलन की दिशा कौन-सी होनी चाहिए? क्या करने से महिलाओं की पीड़ा और समस्याएँ कम हो जायेंगी ? आज स्त्री मुक्ति आन्दोलन के सामने कई चुनौतियाँ हैं. लेकिन इस पर सोचने के पहले हमें अपना इतिहास परखकर देखना जरूरी है.


महिला आन्दोलन की चुनौतियाँ

१९४७  के बाद का दशक महिलाओं के लिए विशेष महत्त्व का रहा. नए-नए महिला प्रश्न उभरे, योजनाएँ बनी, संघर्ष व मुद्दे निकले. कई कल्याणकारी योजनाएँ बनाई गई. 70 और 80 के दशक में वामपंथी आन्दोलन चले. इसी समय  स्वायत्त स्त्री मुक्ति आन्दोलन उभरा, इस आन्दोलन ने हर प्रकार के धर्मतंत्र (हेरार्की) का विरोध किया. पितृसत्ता की चुनौती दी. जहाँ भी पितृसत्तात्मक मूल्य नजर आए, स्वायत्त महिला आन्दोलन ने उसका विरोध किया. स्वायत्त स्त्री आन्दोलन ने एक प्रकार की चुप्पी को तोड़ा. साथ ही साथ विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं की महिलाएँ-महिला प्रश्न पर एक साथ आई. चाहे वे गांधीवादी हों, वामपंथी हों, समाजवादी हों या माओवादी हों. सभी महिला मुक्ति से जुड़े सवालों पर एक साथ दिखाई दिए. इस आन्दोलन ने बलात्कार के खिलाफ, कानून बदलवाए, दहेज का कानून बदलवाया, तथा स्त्री धन की परिभाषा बदली, पारिवारिक हिंसा का (४९८ ए) कानून पास करवाया, गर्भजल परीक्षण व लिंग परीक्षण पर रोक लगवाई, परित्यक्ता आन्दोलन, बार गर्ल्स पर पाबन्दी, घरेलू हिंसा 2005 का कानून बनवाया . विश्वस्तर पर नेटवर्किंग स्थापित की. न्यूजलेटर, पत्रिकाएँ निकाली गई. समाज में महिलाएँ जागरूक होने लगी. अपने हक के प्रति महिलाएँ एकजुट होने लगी. हर अखबार व पत्रिकाओं में महिला कॉलम लिखे जा रहे थे.  शहरों से गांवों तक स्त्री मुक्ति आन्दोलन फैलने लगा, सत्ताधारी वर्ग ने इस आन्दोलन पर ठण्डा पानी फेरने की चाल चली. अब राजनैतिक दलों ने महिला आन्दोलनों के नेतृत्व को जीतने का प्रचलन शुरू किया. स्वयंसेवी संस्थाओं (एन. जी. ओ.) चाहे सरकारी हो या विदेश पूँजीवादी, उन्होंने महिला संगठनों को आंशिक मदद देना शुरू किया.

विश्वविद्यालयों में स्त्री अध्ययन केन्द्र शुरू किये गये. लड़ाकू महिला कार्यकर्ता आलीशान दफ्तरों में बैठकर सिर्फ संशोधन, रिसर्च व मार्गदर्शन का कार्य करने लगीं, वह भी सुबह ग्यारह से पाँच बजे तक ऑफिस के बंधे-बँधाए समय के अनुसार.इसका नतीजा यह निकला कि शहरी स्त्री आन्दोलन के पास ‘सिद्धान्त’ तो है लेकिन जनता नहीं. आज स्वायत्त स्त्री आन्दोलन आदिवासी मेहनतकश महिलाओं को न संगठित कर पा रही है न दिशा दे पा रही लेकिन देश की परिस्थिति आज दिन प्रति दिन ऐसी होती जा रही है कि वे स्वायत्त नारीवादी आन्दोलन से बाहर निकलकर संघर्ष कर रही हैं. चाहे उत्तर-पूर्व की महिलाएँ हों या कश्मीर की, खैरलांजी की हो सिंगूर की हो या नन्दीग्राम की पूँजीपतियों के खिलाफ आन्दोलन हो या टाटा व एस्सार के खिलाफ वामपंथी महिलाओं का संगठन हो, वे सभी जन-आन्दोलन खड़ा कर नेतृत्वकारी भूमिका निभा रही हैं. ‘महिला’ यह एक सजातीय (होमोजनस) गट नहीं है. इसमें भी किसान महिला, मध्यमवर्गीय कामकाजी महिला, दलित आदिवासी अल्पसंख्यक, हर जाति, धर्म, समुदाय वगैरह से आती है. शोषक वर्ग की महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न भी होता है, लेकिन आम तौर पर वे अपने हालात को बदलने के लिए मेहनतकश महिलाओं के साथ नहीं आती. विभिन्न तबके की महिलाओं के विशेष समस्याओं पर ध्यान देने से महिला आन्दोलन और व्यापक बन सकता है. आज महिला किसानों  की आत्महत्या तथा पुरुष किसानों की आत्महत्या का सवाल, विस्थापना, बेरोजगारी महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण सवाल है. पितृसत्तात्मक पहलुओं पर ही हमें अल्पवर्गीय, जातीय प्रश्नों पर ध्यान देना जरूरी है. महिलाओं को अलग से संगठित करते हुए हमें अन्य स्त्री-पुरुष को मिलकर एक साथ आन्दोलन करना होगा.पर जैसा कि उमा चक्रवर्ती का कहना है, “भारत में स्वतंत्र महिला प्रश्नों पर आधारित आन्दोलनों का न होना वामपंथ की असफलता के कारण है.



वामपंथ सामाजिक संबंधों की समझ विकसित नहीं कर पाया, उन्हें जोड़ नहीं पाया.” आप माओ का उद्धरण ले लो.  माओ ने कहा था, “जेंडर अंतर्विरोध आपस में एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं.” आप सिर्फ वर्ग संघर्ष को ही पूरी तरह से वैध संघर्ष मानते हो. पितृसत्तात्मक संबंधों पर तभी प्रश्न उठाये जा सकते हैं, जब आपके पास एक ऐसा आन्दोलन हो जिसमें जाति, वर्ग और जेंडर को एक साथ समझा जाए. आज स्थिति यह है कि जातिवाले एक आन्दोलन करते हैं, वर्गवाले दूसरा और जेंडरवाले कोई और आन्दोलन करते हैं. कोई एक दूसरे का साथ नहीं देता. स्त्रीवादी आन्दोलन स्वयं में आगे नहीं बढ़ सकता, यह अकेले कभी-भी पितृसत्ता पर जीत हासिल नहीं कर सकता. स्त्रीवादियों की रुचि पितृसत्ता को सिर्फ सहयोग देने में नहीं है…. हमारा विश्वास समानता में है, समाज में कोई भी हाशिए पर नहीं होना चाहिए. प्रत्येक को केन्द्र में होना चाहिए प्रत्येक को समान नागरिक होना चाहिए. भारत में महिलाएँ हर तरह के आन्दोलन में हैं .नर्मदा आन्दोलन में, पर्यावरण आन्दोलन में, पोस्को में हैं, हर जगह हैं, पर उनको मुख्य महिला प्रश्नों के प्रति संवेदनशील नहीं बताया गया है. उन्हें इस बारे में बताया ही नहीं गया. (उमा चक्रवर्ती, समयांतर फरवरी, २०१४ वर्ष ४५ अंक -५ पृ. ८३) .स्वतंत्रता के बाद यह जरूर हुआ है कि आर्थिक मंत्रों पर महिलाओं को स्थान मिला है. पर वास्तव में यह बढ़ती महँगाई का परिणाम है. एक के खर्च से अब घर नहीं चलता इसलिए स्त्रियों को भी नौकरी करनी पड़ी. एक जमाने में लड़कियों को पढ़ने के लिए बाहर नहीं भेजा जाता था, पर अब उन्हें भी भेजा जाता है. ताकि जिस घर में शादी करके जाय, उस घर में दहेज के साथ-साथ हर महीने उनकी आय भी परिवार के काम आ सके.

आर्थिक परिदृश्य  में महिलाओं के श्रम और दक्षता की मौजूदगी लैंगिक सम्बन्धों में परिवर्तन के कारण नहीं, बल्कि आर्थिक कारणों से जुड़ी हुई है.आज औरतें अपनी स्वायत्तता की लड़ाई लड़ रही है.जाति और समुदाय की सीमाओं में अपने पिता और परिवार के नियंत्रण में है, अपने समाज की सीमाओं में हैं, तब तक तो ठीक है, लेकिन जैसे ही वे इन सीमाओं को तोड़कर इससे बाहर आना चाहती हैं अक्सर दमन और हिंसा की शिकार होने लगती हैं.जब महिलाओं में व्यक्ति होने का भाव उत्पन्न होता है, तो समझने लगती हैं कि इस नाते उनके भी कुछ अधिकार भी हैं, जिन पर वे दावेदारी कर सकती हैं.आज बहस इस बात पर नहीं कि लड़की इंजीनियर बनना चाहती है या डॉक्टर, पर जैसे ही वह अपनी शादी का निर्णय अपनी जाति या समुदाय से बाहर करने का स्वयं निर्णय करती है तो हिंसा की शिकार होती है. खासकर जब विवाह अपने से निचली जाति में हो, तो समस्या और भी विकट हो जाती है. खाप  पंचायतें ऐसे युगल प्रेमियों को आये दिन मृत्युदण्ड से लेकर हुक्का-पानी बन्द कर जाति से निष्कासित करते हैं. कभी गांव छोड़कर जाने का फरमान जारी करते हैं. इन खाप  पंचायतों को राजनेता का समर्थन मिलता है.हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री खुलेआम कहते हैं, ‘खाप पंचायतें भारतीय संस्कृति की रक्षा कर रही हैं ।’ उमा चक्रवर्ती का कहना है, ‘दुखद बात है कि वामपंथ जाति और जेंडर के वर्ग के साथ संबंध को कभी समझा ही नहीं. उनके लिए वर्ग ही एक मुद्दा है. हमारे देश में जाति और वर्ग मिलकर ही वर्ग बनाते हैं. हमारे सामाजिक ढाँचे में श्रम कुछ जातियों के हिस्से में आता जब कि साधन कुछ जातियों में. महज वर्ग की सोच जाति और वर्ग को अलग-अलग बनाए रखती हैं और जेंडर इस  संरचना को बनाये रखने में मदद करता है.

जब तक महिलाएं स्वयं की और अपनी सेक्सुअलिटी को परिवार, समाज और समुदाय के नियंत्रण में रखेंगी तब तक यह व्यवस्था ऐसे ही चलती रहेगी.‘ (उमा चक्रवर्ती, स्त्रियों की स्वायत्तता का सवाल लेख, समयांतर, फरवरी, २०१४ वर्ष ४५, अंक ८५). धार्मिक कट्टरपंथियों का विरोध करना आज जरूरी हो गया है. आज दक्षिण पंथी संगठन धर्म के नाम पर अपने समुदाय को संगठित करके अल्पसंख्यकों पर हमले कर रहे हैं. राज्य यंत्रणा में भी जातिवादी व सम्प्रदायवादी धब्बा लग गया है. खैरलांजी हत्याकाण्ड के बाद जिस प्रकार दलित समाज के लोग खौल उठे थे और जिस प्रकार दलित महिलाएँ न केवल रास्ते पर आई बल्कि आन्दोलन का नेतृत्व भी किया, इससे दिखता है कि महिला की जागरूकता व संवेदना किस दिशा में है, जरूरत है सही नेतृत्व की.
भूमण्डलीकरण को पूरी तरह ठुकराने की जरूरत है.आज विश्व का एक खेमा ऐसा है जो भूमण्डलीकरण को एक मानवीय चेहरा का नारा लगा रहा है, लेकिन भूमण्डलीकरण को हमें पूरी तरह चुनौती देकर एक वैकल्पिक विकास प्रणाली को खड़े करने की जरूरत है. जहाँ मेहनतकश किसान-मजदूर और देश के साधारण लोगों के हित में विकास हो. भूमण्डलीकरण से महिलाओं की बेरोजगारी, यौन शोषण, अश्लील संस्कृति, वेश्यावृत्ति इत्यादि बढ़ रहे हैं. भूमण्डलीकरण से विस्थापना होने के कारण महिलाओं का पारिवारिक जीवन और सुरक्षा मुश्किल में पड़ गयी है. इसलिए स्त्रीमुक्ति आन्दोलन को इसका विश्लेषण करना होगा, इस पर फोकस करना पड़ेगा.  90 के दशक में सोवियत रूस के खात्मे के बाद तथा धीरे-धीरे पूर्वी यूरोप में समाजवाद के अन्त के साथ ही, विश्व पटल पर अमेरिका का एकमात्र साम्राज्य स्थापित हो गया. इन देशों में लिंग के आधार पर औरतों के साथ कभी भेदभाव नहीं किया गया.

यहाँ महिलाओं को पुरुषों के बराबर स्वतंत्रता, समानता और बौद्धिकता के अवसर मिले. ऐसे अवसर आज तक किसी पूँजीवादी व्यवस्था में नहीं मिले हैं. इन समाजवादी देशों ने स्त्री के श्रम का इस्तेमाल कभी भी मुनाफा कमाने के लिए नहीं किया. पर आज भूमण्डलीकरण के बाद, औरतें साम्राज्यवाद के शिकंजे में बुरी तरह फँसी हुई हैं और साम्राज्यवादी देशों का चरित्र भयानक है. यह ‘लेट कैपिटलिज्म’ (वृद्धि पूंजीवाद) का जमाना है. यहाँ पूंजीवाद सर्वव्यापी है क्योंकि वैश्विक बाजारों, बहुराष्ट्रीय निगमों, विश्व बैंकों और अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष संस्थाओं के जरिये  उसने अखिल मण्डल पर अपना प्रभुत्व और वर्चस्व कायम कर लिया है. पूँजीवाद सर्वशक्तिमान है क्योंकि उसके पास संपूर्ण विश्व को वश में करनेवाली पूँजी की शक्ति के साथ-साथ समूची दुनिया को नष्ट कर डालने में समर्थ शस्त्रास्त्रों से युक्त सैनिक भी हैं. इस (उत्तर आधुनिक युग  के पिछले २० वर्षों में अर्थव्यवस्था ही बदल दी. आज उदारवाद, निजीकरण और बाजारवाद ने सारे रिश्ते ही बदल दिये हैं. नैतिकता, विवेक, सामाजिक मूल्य जैसी बातें बकवास हो गई. आज पैसा कमाने की होड़ लगी हुई है. पूँजीवाद ने मुक्त बाजार, खुली प्रतियोगिता, माँग और पूर्ति के नियम को बढ़ावा दिया, उन्होंने औरत को भी बाजार के हवाले कर दिया. इसका कारण सुधीश पचौरी के शब्दों में  ‘७० के बाद औरत का सबलीकरण बढ़ा. आन्दोलन बढ़े. इससे खतरा था. जब औरत अपने बारे में राजनीतिक विमर्श करने लगी  तब इस संस्कृति ने उसका रूप बदलना शुरू किया.अगर औरतें यौन-स्वतंत्रता करने जा रही हैं और दुनिया की सत्ता लेने जा रही हैं तो उन्हें मर्दों की तरह देह की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. डिस्को ऐसी ही कला-विधा बना. आदर्श स्त्री-देह को नंगा कर दिया गया… स्त्री संस्कृति में दो प्रकार की चीजें एक हुई. एक स्त्री देह को वस्तु की तरह देखती थी, दूसरी उस पर हिंसा की थी. सारे अश्लीलता कानून इस बिना पर चलते हैं कि आप उस अश्लीलता की उपेक्षा करे.

समाज में नग्नता या अश्लीलता की बहसें विज्ञापनों में, सुन्दरता के पार्न में शामिल होने से स्त्री होते हुए भी नुकसान के बारे में नहीं बताती. नाओमी वुल्फ कहती हैं कि ब्युटी मिथ ने औरत की आजादी को मोड़कर उसके चेहरे और देह में बदल कर औरत को ब्युटी मिथक शुरू होता है. कॉस्मेटिक आते हैं, कपड़े-लत्ते, फैशन उसकी पहचान के नाम से आती हैं. ब्युटी मिथ ने औरत को झूठे चयनशीलता दी है. मैं कैसे लगाती हूँ ? का भाव दिया है. (सुधीश पचौरी, हंस, मार्च २००१, वर्ष १५ अंक -८, एक अधखुला लक्षण पृ. १०५) आज स्त्री मुक्ति आन्दोलन से आई स्त्री स्वतंत्रता को पूँजीवाद ने स्त्री के स्वतंत्र निर्णय लेने के विश्वास को स्वतंत्र उपभोक्ता में बदल दिया है. उपभोक्तावादी संस्कृति ने औरत को महज एक प्रोडक्ट (वस्तु) के रूप में पेश कर रहा है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण आपको विज्ञापनों में नजर आएगा. ट्रक हो या टायर, कार हो या पेट्रोल, हर एक विज्ञापन में आपको अर्धनग्न कपड़ों में औरतों के जिस्म का प्रयोग बेहद सेक्सी तरीके से किया जाता है. यानी सामान बेचने के लिए उत्पादक ग्राहकों को लुभाने के लिए औरत के शरीर को समाज के रूप में प्रस्तुत करते हैं.भूमण्डलीकरण ने पूरे विश्व की महिलाओं का वस्तुकरण कर दिया है. बोल्ड और ब्युटिफूल के नाम पर पेज थ्री से रौनक बनती औरतें शायद यह समझ ही नहीं पाती कि उनके कम पोशाक भारी-भरकम मेकअप, हाथ में महँगी शराब की बोतलों का अर्थ स्वतंत्रता, समानता नहीं है. आज मीडिया द्वारा औरतों का सबसे ज्यादा वस्तुकरण कर बेइज्जत किया जा रहा है.आज बड़ी फिल्म अभिनेत्रियाँ  मॉडल, ऊँचे ओहदों पर आसीन औरतें जो पढ़ी-लिखी हैं वे भी अंग-प्रदर्शन कर रही हैं और उसी को अपनी पहचान बना ली है. सौंदर्य प्रसाधनों, ड्रेस डिजाइनरों, हेयर स्टाइलों की गूथ-गूँ में फँसी आज की औरत जो ऊपर से तो स्वतंत्र दिखती है, पर उसके जीवन में झांककर देखा जाये तो वह पितृसत्तात्मक ढाँचे में फँसी नजर आएगी.

आज का बाजारवाद स्त्री-पुरुष दोनों के उपभोक्ता के रूप में देख रहा है.आज दोनों ही बिकाऊ समझे जा रहे हैं. स्त्रीवाद ने पुरुषों को कभी भी ‘भोग’ की वस्तु नहीं माना पर अब चूँकि औरतें भी पढ़-लिख गई है, उनके पास भी सामान खरीदने की ताकत आ गई है, इसलिए औरतों को लुभाने के लिए विज्ञापनों में पुरुषों के कपड़े उतरवाये जा रहे हैं, वह भी फेयर एण्ड लवली लगा रहा है. आज पुरुषों को भी उपभोक्तावाद के हवाले किया जा रहा है. साम्राज्यवादी ताकतों ने हमारे देश में सामंतवादी ताकतों के साथ गठजोड़ कर लिया है, जिसका परिणाम यह निकला कि एक ओर औरत को उपभोग की वस्तु बनाया जा रहा है, जिससे औरत मात्र शरीर के रूप में भोग की वस्तु बन गई है, तो दूसरी ओर सामंती ताकतों को मजबूत करके खाफ पंचायतों द्वारा तो कभी अन्य कट्टरपंथी धार्मिक संगठनों द्वारा महिलाओं को मोबाइल फोन न रखने, जीन्स पैंट न पहनने, स्कार्फ द्वारा मुँह ढँकने, बुरखा  पहनने का फरमान जारी किया जा रहा है. आज कितनी ही लड़कियाँ स्कूटर पर मुँह ढँककर बैठी रहती हैं, ताकि उन्हें कोई पहचान ना ले. इससे लड़कों को ही फायदा होगा. पहचान छुपाकर उनके साथ अवैध संबंध बनाते हैं और किसी को पता भी नहीं चलता. स्त्रीवाद को ‘फ्री सेक्स’ के रूप में प्रतिष्ठित किया जा रहा है. स्त्रीवाद ने जेंडर विभेद के खिलाफ संघर्ष किया है. जिसे राजसत्ता भी स्वीकार करती है, पर समाज इसे तोड़ रहा है, पिछले वर्ष ‘बेशर्म मोर्चा’ एन. जी. ओ. ने निकाला. छोटे-छोटे अर्धनग्न कपड़ों में लड़कियाँ छोटे कपड़े पहनने की इजाजत समाज से माँग रही थी. जब कि भारत में आज भी दहेज, बलात्कार, यौनिक हिंसा, घरेलू हिंसा, शिक्षा जैसे अनेक सवाल खड़े हैं.



समाज में उपभोक्तावादी संस्कृति ने महिलाओं पर हिंसा को और बढ़ावा दिया. मैगी संस्कृति जो आई – दो मिनट में तैयार, उस संस्कृति ने इन्स्टेंट रातो-रात अमीर बनने के सपने दहेज के भयानक रूप में सामने आए. गाड़ी, बंगला, फ्रीज, टी. वी., महँगे फर्नीचर, गहने सभी उपभोग की वस्तुएँ दहेज में माँगे जाने लगी.. दहेज न मिलने पर औरतों को जलाकर मार डालना. नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार २०१२ में ८,२३३ दहेज हत्याएँ हुई. हर एक घण्टे में दहेज के कारण एक महिला की मौत होती है. दहेज के कारण लोग बेटियाँ नहीं पैदा करना चाहते. इसलिए भ्रूण हत्या जैसी बर्बरता समाज में दिन-दहाड़े अपनाई जा रही है.आज १००० प्रति पुरुष पर ९४० स्त्रियों का अनुपात है. पितृसत्ता पर के अन्तर्गत औरत पर नियंत्रण रखने के लिए अनेक प्रकार की हिंसा का इस्तेमाल किया जा रहा है और इन्हें प्रायः जायज ठहराया जाता है. बेटे को कुलदीपक कहना.पति को स्वामी, पत्नी को दासी, घर के अन्दर ही पति-पत्नी के बीच मालिकाना रिश्तों को बदलना होगा. सत्ता के साथ हिंसा जुड़ी हुई है. परिवार में प्रेम की जगह हिंसा है, बराबरी की जगह मालकियत है.औरतों को समाज में तुच्छ समझा जाता है, उसकी औकात न के बराबर है. औरत का समाज में कोई मूल्य नहीं है. आये दिन एकल औरतों के साथ समाज में हिंसा की जाती है, उन्हें डायन कहकर नंगा घुमाने से लेकर पत्थर से मार डालने तक की घटनाएँ होती हैं. सर्वेक्षण करने पर पता चला कि वे औरतें जो एकल हैं, आत्मसम्मान से अपने बल पर समाज में जीना चाहती हैं, किसी वर्चस्वशाली पुरुष या ओझाओं के सामने नहीं झुकती. उन्हें ही ‘डायन’ घोषित कर मार दिया जाता है.

तेजाब फेंकने की घटना में लगातार वृद्धि हो रही है. अधिकतर तेजाब फेंकने की घटना में एकतरफा प्यार शामिल है. लड़के ने लड़की के सामने प्यार या विवाह का प्रस्ताव रखा. लड़की ने ‘ना’ कहा तो लड़के ने तेजाब फेंका. पुरुष का अहंकार आहत होता है. एक ‘तुच्छ’ सी लड़की भला लड़के  को ‘ना’ कैसे कह सकती है क्योंकि समाज में लड़की को स्वतंत्र निर्णय लेने का हक नहीं दिया है और यदि कोई लड़की स्वतंत्र निर्णय ले लेती है तो पुरुष उसे सह नहीं पाता. तू मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं हो सकती. क्योंकि लड़की तो एक ‘सामान’ है. लड़की उपभोग की वस्तु है. घरेलू हिंसा के अनेक रूप हैं. नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर वर्ष एक लाख केस घरेलू हिंसा के दर्ज होते है. हर नौ मिनट एक औरत घरेलू हिंसा की शिकार होती है. इस संदर्भ में सुधा अरोड़ा का कहना है, ‘घरेलू हिंसा पर खूब बात की जाती रही है. हर देश में हिंसा के सालाना आँकड़े मौजूद हैं पर मारपीटवाली हिंसा से कहीं ज्यादा लगभग शत-प्रतिशत स्त्रियाँ जिस भावनात्मक हिंसा या अनचिङ्घी मानसिक प्रताड़ना का शिकार होती हैं, इसके आँकड़ें कहाँ मिलेंगे, जब पीड़िता खुद इसे पहचान नहीं पा रही है. आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, नौकरीपेशा लड़कियाँ इस तरह आत्महत्या नहीं करती. भावनात्मक शोषण से निपटने के लिए पहले लैंगिक वर्चस्व और लैंगिक शोषण की पहचान करनी होगी जिसकी नींव पर यह समाज बाहर से दिखती खुशहाली पर टिका हुआ है जब कि स्त्री संबंधी सही समस्याओं की जड़ लैंगिक वर्चस्व है.’ (सुधा अरोड़ा, कथादेश, वर्ष ३३, अंक-१ मार्च २०१४ विमर्श से परे : स्त्री और पुरुष पृ. ५६) गरीबी के कारण औरतें व बच्चियाँ देह-व्यापार में घसीटी जा रही है.

एन. सी. आर. की रिपोर्ट के अनुसार ४० हजार करोड़ रुपये का वेश्या व्यापार है, एक करोड़ वेश्याएँ भारत में हैं जिसमें पाँच लाख बच्चियाँ हैं. आज भारत बच्चियों के देह व्यापार का विश्व बाजार में सबसे बड़ा अड्डा है. एन. सी. आर. के अनुसार बच्चियों पर हिंसा के २०१२ में ३८,१७२ केस दर्ज हुए हैं. उपभोक्तावादी संस्कृति ने बलात्कार को बढ़ावा दिया. यूज एण्ड थ्रो की संस्कृति ने बलात्कार करो और मार दो को जन्म दिया.  सड़कों पर जा रही लड़कियों पर ब्लैड मैन द्वारा उनके मुँह पर हमला, सड़कों पर औरतों पर हमला, काम के स्थान पर छेड़छाड़, सेक्स दुरिज्य को बढ़ावा, बाल-वेश्या में वृद्धि, बच्चियों के सौंदर्य प्रतियोगिताएँ करवाकर उनका बचपन खत्म करना, बच्चियाँ चमक-दमक की दुनिया में बड़ों जैसा व्यवहार करने लगती हैं. मनोवैज्ञानिकों ने इसे इतना ही खतरनाक माना है जितना कम उम्र में माँ बनना.  इंटरनेट पर साइबर क्राइम में सबसे ज्यादा बच्चे हैं. बच्चों का सेक्स गेम के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. अश्लीलता बढ़ रही है. आज जज से लेकर धार्मिक गुरु से पत्रकार तक सभी जेल में हैं कारण बलात्कार का केस. उपभोक्तावादी संस्कृति कितनी भयानक है कि एन. सी. आर. की रिपोर्ट के अनुसार ९७% बलात्कारी परिवार के सदस्य या रिश्तेदार होते हैं. मात्र ३% बाहरी. आए दिन सगे नाना, दादा, मामा, चाचा, सगे भाई द्वारा बलात्कार की घटनाएँ घटती रहती है. समाज के सभ्य संस्कृति के इतिहास में हमने कभी भी समाज में औरतों के साथ इतना जुल्म नहीं देखा जितना आज. आज औरत मात्र शरीर बनकर रह गई है. माँ-बहनों के आँचल में प्यार या स्वर्ग नहीं दिखाई देता. छह महीने की बच्ची से लेकर पचहत्तर वर्ष की बुढ़ियाँ तक से बलात्कार की घटनाओं के केस पुलिस स्टेशन पर दर्ज होते हैं. कहीं-न-कहीं माताएँ पितृसत्ता की जंजीर तोड़ने में असमर्थ रही.

उत्तर-आधुनिक युग की औरतों को उपकरणों के कारण कुछ आजाद क्षण अमाप मिले. जैसे वाशिंग मशीन आने से औरत गृहणी के ढाँचे से मुक्त न हो पाई पर वाशिंग मशीन उसे एक आजादी की जगह खाली समय देती है. इसी तरह मिक्सी है जो उसे खटने से बचाती है. आज बीस साल की लड़की ज्यादा व्यक्तिवादी है, वह आसानी से संबंधों में नहीं बँधती, कैरियर का मतलब स्वाधीनता है. एक कैरियर अनेक रास्ते खोलता है.  परिवार के बाहर भी आप कुछ सोच सकते हैं. यह सिर्फ आर्थिक आजादी नहीं है. आज साइबर स्पेस में एक और छवि बन रही है जो इंटरनेट चतुर और कुशल औरत की है. आज बहुत से वीमेन्स वेबसाइट्स हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि औरतों को थोड़ा जगह और आर्थिक सत्ता मिली है. साइबर स्पेस की आदी बेरोक है. इतिहास में पहली बार औरत अपने विचारों को बिना किसी बंधन या भय से कह सकती है.यह एक प्रकार का १९२८ में कल्पित वर्जीनिया वुल्फ का अपना कमरा है. साइबर स्पेस ऐसा ही नितांत निजी स्पेस है. विकासशील देश में इंटरनेट की सुविधा से औरतों को लाभ हो रहा है. ऑनलाईन औरत का चेहरा नया चेहरा है जिसे नई अर्थव्यवस्था से बनाया है. इंटरनेट पर लिंगभेद खत्म हो जाता है. इसने जाति-धर्म, सम्प्रदाय, पिता-पति सबसे मुक्ति दिलाई.ऑनलाईन औरत को हर वक्त उसकी ‘जगह’ नहीं बताई जाती.अंततः वह अपनी सास, माता-पिता की जासूसी से परे हैं. जब तक औरत न बताना चाहे कोई उसकी लिंग स्थिति और अवस्था के बारे में नहीं जान सकता.आज स्त्री मुक्ति आन्दोलन के सामने आनेवाली चुनौतियाँ हैं. हमें राज्य व्यवस्था को समझना होगा,

महिला आन्दोलन की राजनैतिक दिशा की जरूरत है.  आज समूचे देश में तमाम एन. जी. ओ. व स्वयंसेवी संस्थाएँ महिलाओं को अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में सलाह देने के लिए दफ्तर खोलकर बैठी हैं लेकिन जब तक परिवार में स्त्री-पुरुष का बराबरी का समीकरण  नहीं बदलेगा, पितृसत्ता व वर्गीय शोषण को हम उठाकर नहीं फेकेंगे, तब तक हम पेन किलर जैसे तत्कालीन राहत ही औरत को देते रहेंगे. आज आम महिला का दुश्मन कौन है – क्या उसका मजदूर पति ही पितृसत्ता का प्रतीक है ? पितृसत्ता को कायम रखने के लिए राज्यव्यवस्था, पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, सामंतवाद की क्या भूमिरा रही है ? क्या इस राज्यव्यवस्था के साथ समझौता करके, इसी का हिस्सा बनकर इसी सूत्र की आर्थिक सहायता लेकर क्या साधारण मेहनतकश महिलाओं का जीवन बेहतर बन सकेगा ? क्या पुलिस, जज, मंत्री इत्यादि इस शोषणकारी व्यवस्था के अंग नहीं हैं ? २१ वीं सदी को न केवल यूनेस्को ने बल्कि भारत की सरकार, चिंतकों, बुद्धिजीवियों ने भी महिलाओं का शताब्दी बताया है.पर जैसा कि कलॉडिया वॉन वर्कर्हीफ कहती है, ‘गृहिणी चौबीस घंटे, जीवनभर की, मुफ्त की नौकर है जिसकी नकेल पति के हाथों में है बल्कि उसका सब कुछ पति के हाथों में उसकी यौनिकता, प्रजनन शक्ति, उसकी मानसिकता भावनाएँ. यह एक ही समय में घरेलू दासी और बंधुआ मजदूर दोनों हैं जो अपने पति और बच्चों की हर जरूरत पूरी करने के लिए मजबूर है, जिसने उसके प्रति प्यार दिखाना भी शामिल है. चाहे उसे महसूस हो या न हो. यहाँ औरत प्यार की खातिर काम करती है और प्यार करना भी एक काम बन गया है.

परिस्थितिवश हमेशा असहनीय नहीं होती है लेकिन यह बताना मुश्किल होता है कि कब असहनीय हो जाएँगी. औरत जो कुछ भी श्रम करती है उससे फायदा मिलना चाहिए और वह मुफ्त भी होना चाहिए जैसे कि हवा, जिस पर जीते हैं. यह सिर्फ बच्चा पैदा करने और पालने के संदर्भ में नहीं है बल्कि छोटे छोटे घरेलू काम और मजदूरी के काम पर भी लागू होती है. सहयोगियों को भावनात्मक सहयोग व देखभाल देना, दोस्ती, झुक जाना, दूसरों के आदेश पर रहना, उसके घावों पर मरहम लगाना, यौन रूप से इस्तेमाल होना, हर बिखरी चीज को संवारना, जिम्मेदारी का अहसास तथा त्यागी, किफायती होना, महत्वाकांक्षी न होना, दूसरों की खातिर आत्मत्याग करना, सभी बातों को सहन कर लेना और मददगार होना, अपने आपको पीछे हटा लेना, सक्रिय रूप से हर संकट का हल निकालना, एक सैनिक की तरह सहनशक्ति और अनुशासन रखना ये सब मिलकर औरत की कार्यक्षमता बनाते हैं.” (क्लॉडिया वॉन वर्कहॉफ, द पोलेटेरियन इज डैड लाँग लिव द हाउस वाइफ, १९८८, द लॉस्ट कॉ पृ. १०४) इस तरह औरतों के श्रम का मोल नहीं है. सीलिंग आधारित श्रम विभाजन की जरूरत है. श्रम विभाजन को संपूर्ण समाज की एक ढाँचागत समस्या के रूप में देखना चाहिए. जो अब तक ठीक से नहीं हुआ है. स्त्रीवाद की तथा महिला आन्दोलन के राजनीतिक कार्य की चुनौती यही है कि जैविकता के अन्तर पर आधारित असमानता के अन्त की दिशा में काम करें.



स्त्रीमुक्ति आन्दोलन से औरतों में जागरूकता आई. कानून बदलें. आज की स्त्री अपने अधिकार जानती है.आज स्त्रीवाद सिद्धान्तों में अटका है. दर्शन नहीं बन पाया. स्त्री-पुरुष आचारसंहिता बनी पर उसे घर-घर में कैसे लाना, कैसे लागू करना, यह नहीं हुआ.  थेरेपी, उपचार पद्धति की गई जिसमें बीमार ठीक हो जाता है. उसी तरह स्त्रीवाद ने काम किया. पितृसत्ता की जड़ें नहीं हिली. स्त्रीवाद ने काउन्सलिंग पर ध्यान दिया पर हिंसा के प्रति स्त्री-पुरुष संवाद नहीं लिया गया. जन-गण-मन अधिनायक जय हो, में जन की बातें हुई, गण में स्त्रियों को पंचायतों में लाया गया पर ‘मन’ रह गया.  स्त्रीवाद ‘मन’ से जुड़ा है.  स्त्रीवाद’ मात्र स्त्री का नहीं है. मानसिक क्रांति की जरूरत है. पुरुषों में भी स्त्रियों में भी. स्त्रीवाद, मानववाद है. . वह आगे मानववाद है. सिन्दूर, मंगलसूत्र हो या न हो, दोनों बलात्कार से डरती है. औरत रात में अकेली जा सके यह निर्भीकता उसमें नहीं आ पा रही है. औरत भीड़ से नहीं डरती पर उस भीड़ में से कब एकान्त से निकलकर पुरुष बलात्कार कर दे, इसका डर रहता है. बलात्कार से लड़ने के लिए आज भी जूडो कराटे सिखा रहे हैं, स्प्रे बाँटा जा रहा है, पर हम नैतिकता को नहीं बढ़ा रहे है.  मानसिक उत्थान को लेकर स्त्रियों का आन्दोलन कम पड़ गया.

महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :तीसरी क़िस्त

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में  संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक  के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की  प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत  बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  ‘कोटा  विद  इन  कोटा’  की   सबसे  खराब  पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ‘ क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी , बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ‘ हालांकि  पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.  अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 
संपादक
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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस: दूसरी क़िस्त   



श्रीमती सुमित्रा महाजन : हम अपने देश में तो आरक्षण की बात करते हैं … (व्यवधान)

श्रीमती भावना कर्दम दवे : क्या हम दूसरे देशों का अनुकरण ही करते रहेंगे या फिर अपनी प्रतिभा को सम्पन्न करेंगे ?

श्री मोतीलाल वोरा (राजनांदगांव): उपाध्यक्ष महोदय, आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मैं अपनी बहनों को मुबारकबाद देता हूं. दुनिया में सारी महिलाएं संगठित होकर रहें, आज इस अवसर पर मैं कहूंगा कि महिलाओं को सुविधाएं मिलनी चाहिए. जो महिलाएं अत्याचार से पीड़ित हैं, उनके ऊपर जिस प्रकार के अत्याचार होते हैं, उसके लिए हमें देश के अंदर इस प्रकार का कानून बनाना चाहिए कि महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए.  माननीय मंत्री जी और आडवाणी जी ने हाल ही में इस बात को कहा है कि जो महिलाओं के साथ दुर्व्यवाहर  करते हैं या बलात्कार की घटनाएं होती हैं, उन्हें फांसी की सजा दी जानी चाहिए. उन्होंने जो कुछ कहा है मैं समझता हूं कि जब तक वह कानून के रूप में नहीं आएगा तब तक इस प्रकार की घटनाएं बढ़ती जाएंगी और सब लोग कहते ही रहेंगे. धन्यवाद.



श्री बूटा सिंह (जालोर): महोदय, सरकार को यह पक्ष भी सुनने दीजिए … (बाधा)। हमें भी सुना जाए. हमें कुछ समय दीजिए … (बाधा)। बस आधा मिनट का वक्त दीजिए. हमें भी सुनिए महोदय … (बाधा)  सर महिलाओं की आजादी के मसले पर पूरा सदन सर्वसम्मत है. महिलाएं हमारी राष्ट्रीय राजनीति में बहुत अहम भूमिका निभा सकती हैं. हम माननीय महिला सदस्यों की मांग का खुले दिल से स्वागत करते हैं, लेकिन साथ ही मैं माननीय सदन को यह भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं एवं अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं को एक खास सम्मान से नवाजा जाना चाहिए. राजधानी दिल्ली में गुरुतेगबहादुर मेडिकल कॉलेज में पढऩे वाले अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों को पीटा गया. बच्चे भूख हड़ताल पर बैठे हैं. उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है न तो पुलिस, न ही दिल्ली प्रशासन और न यह सरकार. उनकी रक्षा की जानी चाहिए. ये बच्चे-बच्चियां भूख हड़ताल पर हैं. उनको केवल इसलिए पीटा गया क्योंकि वे अनुसूचित जाति-जनजाति से आते हैं. यह राजधानी दिल्ली का सबसे घृणित अपराध है. उनकी बात सुनी जानी चाहिए और सरकार को उनकी दिक्कत दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए.

श्री शिवराज वी.पाटील (लाटूर) : उपाध्यक्ष महोदय, आज हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हम संसार की आधी मानव संख्या के प्रति अपना आदर व्यकत करने के लिए यह दिन मना रहे हैं. हमारे देश में और संसार में भी महिलाओं का आदर किया जाता है, महिलाओं के प्रति प्रेम की भावनाएं व्यकत की जाती हैं. इसमें कोई दो राय नहीं हैं. मगर हमारे देश में और संसार में भी जब महिलाओं को अधिकार देने की बात की जाती है तो सब के सब पीछे हट जाते हैं. यहां तक कि कुछ महिलाओं का भी उनको समर्थन नहीं मिलता है. कुछ पुरुष आगे जरूर आते हैं लेकिन बहुत सारे ऐसे कारण दे देते हैं जिनका एक ही उद्देश्य होता है कि आदर मिले, प्रेम मिले लेकिन उनको अधिकार न मिलें – इस बात को भी हमें इस दिन ध्यान में रखना पड़ेगा. यह शताब्दी अधिकार देने वाली शताब्दी है. जो सर्वसाधारण लोग हैं, समाज के अंदर कमजोर लोग हैं, उनको अधिकार देने वाली यह शताब्दी है. यह शताब्दी हमारी माताओं, बहनों और बेटियों को अधिकार देने वाली शताब्दी है. इसलिए हमारे भाई लोग कुछ ऐसे कारण बताकर पीछे न हटें जिसकी वजह से लोग यह न कहें कि दिल में बात एक है और दूसरी तरह से यहां पर रखने की यह कोशिश कर रहे हैं. मैं बड़े आदर से यहां पर कहना चाहता हूं कि बहुत ही सोच-समझकर कहने वाले, दूरदृष्टि  रखने वाले नेता हैं, उनकी बातों को काटना बड़ा मुश्किल है . उनकी बात काटते समय या उनके खिलाफ कहते समय मन में दुख होता है. इसलिए पहले ही हम क्षमा-याचना करना चाहते हैं. मगर यहां पर कहा गया कि संसार में ऐसी कोई चीज नहीं हुई है, इसलिए यहां पर क्यों  होना चाहिए ? क्या  हम दूसरों के पीछे ही चलते रहेंगे ? क्या  हम दूसरों को कोई रास्ता नहीं बताएंगे ? अगर संसार में कहीं नहीं हुआ है  तो क्या  हमारे देश में वह बात नहीं होनी चाहिए ? हमारे देश की कोई बात हो और दूसरे लोगों ने अगर उसे अपनाया तो उसमें कौन सी बुरी बात है ? दक्षिण एशिया ने बताया कि सबसे पहले हिन्दुस्तान में महिला प्राइम मिनिस्टर  हुई और वह श्रीलंका, पाकिस्तान और बंगलादेश में भी हुई. यहां महिला पार्टी अध्यक्ष और प्राइम मिनिस्टर हुई हैं. यहां महिला प्रधान मंत्री और अध्यक्ष दूसरी जगहों के मुकाबले कहीं ज्यादा संख्या में हुई है. क्या  हमें यह चीज नहीं अपनानी चाहिए ? हम जानते हैं कि मुख्यमंत्री भी महिलाएं हैं, महिला मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री ने अपने-अपने तरीके से यहां काम किया. एक सवाल यह पूछा और उठाया जा रहा है कि क्या ऐसा होने पर पिछड़ी जाति की महिलाओं को हिस्सा मिलने वाला है? मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जो पिछड़ी सो-कॉल्ड बैकवर्ड क्लासेज की महिलाओं की बात की जा रही है तो सो-कॉल्ड मैन के बारे में भी कहा जाए. कितने फारवर्ड क्लास के लोग और जैंटलमैन यहां चुन कर आते हैं ? फारवर्ड क्लास की महिला हो या जैंटलमैन हो, वे टिकट मांग सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन फारवर्ड क्लास के वोट देने वाले लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है. वोट देने वालों में बैकवर्ड क्लास के लोगों की ज्यादा संख्या है। वोट देने वालों में बैकवर्ड क्लास के लोगों की संख्या ज्यादा होने से बैकवर्ड क्लास के लोग ही चुन कर आ जाएंगे और फारवर्ड क्लास के चुन कर नहीं आएंगे. हमें यह बात ध्यान में रखनी पड़ेगी. श्री रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): इसका बंटवारा हो जाए। (व्यवधान)इसका हिसाब होना चाहिए। हम यह बात बर्दाश्त नहीं करेंगे … (व्यवधान)

श्री शिवराज वी. पाटील : पूछा जाता है कि इसके पीछे क्या लॉजिक है? लॉजिक यह है कि जो सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं, वे अपनी बहनों, बेटियों, मां और अर्दधांगिनी को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं. ऐसे में वे किस सामाजिक न्याय की बात करते हैं. वे अपने घर वालों को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं और बाहर के लोगों को सामाजिक न्याय देने की बात करते हैं. ऐसी चीजों पर कौन भरोसा करने वाला है? अगर आपको नहीं करना है तो मत करिए लेकिन समाज और देश को बांटने की कोशिश मत कीजिए. अगर आपने महिलाओं को बांट कर इस प्रकार से टिकट दिए तो जैंटलमैन को किस आधार पर नहीं कहने वाले हैं. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद किस आधार पर नहीं देने वाले हैं। कया आपका संविधान सैकुलर रहने वाला है ? आप कह दें कि हमें यह नहीं करना है. यहां आप कह दीजिए कि आपको यही डर है कि महिलाओं को अधिक संख्या में सीटें देने के बाद हमारी सीटें चली जाएंगी. अगर ऐसा डर है तो वह डर खत्म करने की दवा लोगों और सोचने वालों के पास है. वे उसे देंगे और इसे करेंगे. आप इस डर को छुपाने के लिए सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं तो मेरी दृष्टि  से ऐसा करके आप खुद को धोखा दे रहे हैं और दूसरों को धोखा दे रहे हैं. अंत में इतना ही कहना चाहता हूं कि अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर समाज के आधे हिस्से के लोगों को अगर न्याय देने के लिए आगे नहीं आए तो दूसरों को न्याय देने की बात पर लोग बहुत कम भरोसा करेंगे, ऐसा मुझे लगता है. … (व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : उपाध्यक्ष महोदय, हम लोगों को भी यह मामला उठाने की इजाजत दी जाए.

श्री अजित कुमार पांजा: अब तक इस सदन में जो बहस हो रही है वह विश्व महिला दिवस और उससे संबंधित बातों पर ही आधारित है. इस मामले में एक या दो वक्ताओं को छोड़कर मैं अधिकांश की बातों से सहमत हूं. मेरी असहमति उन इक्का-दुक्का वक्ताओं से है, जिन्होंने कहा कि दुनिया में किसी अन्य देश में ऐसा आरक्षण नहीं दिया गया है. मैं अपने ठीक पहले वाले वक्ता की बातों का समर्थन करता हूं कि भारत को दूसरों को रास्ता दिखाना चाहिए. क्या हम अपने भारत देश को ‘मां’ कहकर नहीं पुकारते ? क्या दुनिया में कोई और देश है जहां के लोग उसे ‘मां’ कहते हैं ? क्या हम वंदे मातरम नहीं गाते ? हम वंदे मातरम कह कर अपनी मां की सराहना और उपासना करते हैं. इसलिए महोदय यह आवश्यक है और लंबित विधेयक को इसी सत्र में पारित किया जाए।.इसका लंबित रहना न केवल महिलाओं का, हमारी मांओं का बल्कि सभी भारतीयों का अपमान है.
इन परिस्थितियों में श्रीमान, मैं आपसे अपील करता हूंकि इसे सदन में पेश किया जाए तथा आगे बिना किसी बहस के इसे पारित किया जाए. क्योंकि पहले ही काफी बहस हो चुकी है. मैं मुक्त हृदय से शिवराज पाटिल की एक एक बात का समर्थन करता हूं. भारत इसी तरह के मूल्यों में यकीन करता है. इस मोड़ पर मैं उस शत्रुतापूर्ण  भेदभाव का भी जिक्र करूंगा जो बंगाल में महिला वर्ग के साथ हुआ. बंगाल में हजारों शिक्षित महिलाएं हैं,  लेकिन आपको यह जानकर अचरज होगा कि कब एक महिला  को कलकत्ता विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया .. (बाधा)


डा असीम बाला, (एनएबीएडीडब्ल्यूआईपी) : क्या यह मंच इस तरह की बातों के लिये है?

श्री अजित कुमार पांजा: जब बंगाल में इतनी बड़ी संख्या में शिक्षित महिलाएं हैं तो वहां इस प्रकार का भेदभाव क्यों ?   (बाधा) यह खबर अखबारों में आई है. बंगाल में बड़ी संख्या में शिक्षित महिलाएं हैं .. (बाधा) बंगाल में महिलाओं के साथ शत्रुतापूर्ण भेदभाव के मामले निपटाए जाने चाहिए और इस अवैध गतिविधि पर अंकुश लगाया जाना चाहिए .. (बाधा)

श्री हन्नन मुल्ला (उलूबेरिया): यह क्या है?


श्री वासुदेव आचार्य (बांकुड़ा): वह ऐसी टिप्पणी कैसे कर सकते हैं? .. (बाधा)

पीठासीन साभापति : यह इतना संवेदनशील विषय है कि इस पर पहले ही एक घंटे 25 मिनट से अधिक वक्त खर्च हो चुके. माननीय मंत्री महोदय को इस पर प्रतिक्रिया देनी होगी.


श्री अजित कुमार पांजा: बंगाल में महिलाओं के साथ शत्रुतापूर्ण भेदभाव है. यह कोई कचरा नहीं है.

पीठासीन साभापति श्री हन्नान मुल्ला मुझे टोकिए मत.


पीठासीन साभापति: कृपया अपने सदस्य से कहें कि ऐसे व्यवहार न करें. मैंने श्री फातमी को बोलने का अवसर दिया है.


पीठासीन साभापति: श्री वासुदेव आचार्य, मैंने श्री फातमी का नाम पुकारा है.

श्री वासुदेव आचार्य: महोदय मैंने भी नोटिस दिया है.


पीठासीन साभापति: मैंने आपसे कहा कि मैं आपको पुकारूंगा. श्री वासुदेव आचार्य, मैंने श्री फातमी को पुकारा है.
श्री वरकाला राधाकृष्णन: मैंने भी नोटिस दिया है.

पीठासीन साभापति मैं आप सबको एक साथ नहीं बुला सकता।

श्री वलकारा राधाकृष्णन: आप मुझे नहीं बुला रहे .. (बाधा)।


पीठासीन साभापति: यहां हो क्या रहा है? मैंने उन्हें बोलने का अवसर दिया है, मैं आपके पास वापस आऊंगा.
अध्यक्ष के आदेश से हटाया गया.


पीठासीन साभापति: मैंने किसी से कोई वादा नहीं किया है।

श्री वी सत्यमूर्ति (रामनाथपुरम): महोदय, आप हमें कोई मौका क्यों नहीं दे रहे? एआईडीएमके भी सदन का एक दल है.


पीठासीन साभापति: आपको अवसर मिलेगा लेकिन यह कोई तरीका नहीं है व्यवहार करने का. आपको खड़े होकर चिल्लाना नहीं चाहिए. अब मैं मंत्री को बुलाऊंगा.


श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी (दरभंगा): उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने के लिये समय दिया, उसके लिये धन्यवाद।


पीठासीन साभापति: आपको जल्दी समाप्त करना है कयोंक I will call the Minister now.>


श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी : उपाध्यक्ष जी, मैं दो मिनट में खत्म कर दूंगा. आज इंटरनैशनल वुमैन डे पर महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिये जो कदम उठाये जायेंगे, उसमें हम और हमारी पार्टी पूरा पूरा समर्थन देने का काम करेंगी. आज इंटरनैशनल वुमैन डे की अलग बात है और हिन्दुस्तान की महिलाओं का चैप्टर अलग है. जब इस सदन के अंदर महिलाओं के लिये रिजर्वेशन की बात होती है, उस समय बहुत सारी सामाजिक चीजों को पीछे छोड़ दिया जाता है. हमारा और हमारी पार्टी के लोगों का सीधा मानना है कि जब भी इस पर विचार हो तो इसमें शैडयूल्ड कास्टस एंड शैडयूल्ड ट्राइब्स और अदर बैकवर्ड कलासेज का प्रावधान हो. उस वक़्त निश्चित  रूप से जो हिन्दुस्तान के अंदर २० प्रतिशत अल्पसंख्यक लोग बसते हैं, पहले उनके बारे में सोचा जाना चाहिए. इसलिए कि आज अगर आप नक्शा  उठाइए लोक सभा का और आज़ादी के बाद से आज तक के आंकड़े उठाकर देखें तो जो मुसलमानों की १२ परसेंट आबादी है, उस हिसाब से आप देखिये कि कम से कम ६५ सांसद चुनकर इस लोक सभा में आने चाहिए लेकिन आज इस सदन के अंदर सिर्फ २७-२८ मेम्बर हैं. न जाने कितने राज्य ऐसे हैं जहां पर एक भी विधायक नहीं है. आप अगर रिज़र्वेशन विमेन्स का करते हैं तो हमारी मांग है कि उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण किया जाए, ५० परसेंट रिज़र्वेशन किया जाए. हम पाटिल जी से ऐग्री करते हैं कि उनको ५० परसेंट आरक्षण मिलना चाहिए जितनी उनकी आबादी है, लेकिन उसके अंदर जो ४३ प्रतिशत बैकवर्ड क्लासेज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए, जो २५ प्रतिशत शेडयूल्ड कास्टस और ट्राइब्ज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए और जो अल्पसंख्यक और खास तौर से १२ प्रतिशत मुसलमान हैं, उस ५० प्रतिशत में उनकी महिलाओं को उतना हिस्सा मिलना चाहिए. तभी इस मुल्क के अंदर समान न्याय मुमकिन होगा और समाज के हर तबके के लोग इस सदन के अंदर पहुंच पाएंगे.

पीठासीन साभापति: श्री रावले, कृपया मंत्री की बात सुनिए. अगर कोई प्रश्न हो तो आप बाद में पूछ सकते हैं. उनको अपनी बात पूरी करने दीजिए.


श्री पी आर कुमारमंगलम: महोदय, तय है कि मेरी बात नहीं सुनी गई होगी। मैं दोहराऊंगा।


पीठासीन साभापति: हां, मेरा धैर्य भी समाप्त हो रहा है.



श्री पी आर कुमारमंगलम: सर, आज का दिन बहुत अहम है. यह वह दिन है जिसे पूरी दुनिया महिला दिवस के रूप में मनाती है. यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है. न केवल अब बल्कि ऐतिहासिक रूप से महिलाओं का सम्मान करना हमारा मूल्य रहा है. चाहे वे मां हों, बहन हों या पत्नी, हम हर रूप में उनका सम्मान करते हैं, उन्हें बराबरी का नहीं बल्कि उससे कहीं श्रेष्ठ का दर्जा देते हैं. महिला सशक्तीकरण का मूल्य हमारी संस्कृति का, हमारे इतिहास का हिस्सा है. हम इस बात में यकीन करते हैं कि महिलाओं का न केवल हमारे समाज में उचित स्थान होना चाहिए बल्कि हर तरह की व्यवस्था में उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए और उनका अधिकार नजर आना चाहिए. हमारी सरकार यह विधेयक लाई है. सदन के सदस्यों के विचार सुनने के बाद मुझे यह कहना ही होगा कि मैं और मेरी सरकार यह मानती है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा एक मूलभूत विषय है जिसपर सबकी सहमति बननी ही चाहिए. मैं श्रीमती गीता मुखर्जी की बातों से सहमत हूं. विधेयक सदन में लंबित है. मेरी कामना है कि हमारी सरकार इस बात को लेकर गंभीर है कि सदन विधेयक को अंगीकृत करे. लेकिन चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है और अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है इसलिए हमें इस पर सहमति बनानी होगी. इसे लड़ाई-झगड़े या कटुता के बीच नहीं पारित किया जा सकता. हमें सहमति बनानी होगी. हम उन महिलाओं के बारे में बात कर रहे हैं जिनको हमारा समाज देवी मानता है. इसे ऐसे नहीं किया जा सकता. हम इस मसले को मतभेद और कटुता के स्तर पर नहीं ला सकते.
क्रमशः

जिज्ञासा

अभिनव मल्लिक


सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय अभिनव मल्लिक फारवर्ड प्रेस के संवाददाता है संपर्क :abiotdrugs@gmail.com

उस दिन मैं अपने क्लिनिक,त्रिलोकनाथ स्मृति स्वास्थ्य केंद्र  में मरीज़ देखने में व्यस्त था. बाहर बहुत सारे मरीज़ और मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव प्रतीक्षारत थे. दिन के करीब साढ़े एग्यारह बजे थे …बाहर से जोर की आवाज़ आयी – हम डाकटर बाबू के बड़का भाई तिरलोक मल्लिक को जानते हैं…बीरपुर के उनके स्कूल से …हमको अन्दर  जाने दीजिये …हमारी घरवाली को पेट मे बहुते दरद है …सीधे टीसन से आ रहें हैं. लगा जैसे मुकेश की आवाज़ में रामायण का चोपाई सुन रहें हैं….इतने में एक बूढ़े बाबा जबरदस्ती अन्दर आये और दीन  भाव से कहने लगे – ‘डॉक्टर बाबू, मेरी दासिन के पेट में बहुत दर्द है, दर्द से छटपटा रही हैं. कम्पोडरबाबू अन्दर नहीं आने देता. आप बुढ़िया को पहले देख लीजिए बाबू … ’मेरा ध्यान भंग हुआ. बाहर मैंने किसी महिला के कराहने की आवाज़ सुनी.मैंने कहा – ‘अन्दर ले आइये बाबा.’  वह कराहती हुई अन्दर आ गई.
मैंने पूछा – ‘आपका नाम ?’
‘सितिया दासिन.’
मैंने लिखा श्रीमती सीता देवी.
‘घर?’
‘जी ,हमलोग गोबर गरहा के रहने वाले हैं.’ बूढ़े ने जवाब दिया.
मैंने लिखा – गौरव गढ़..

शहर से एक-दो किलोमीटर पर यह गाँव हैं. पुराने लोग अभी भी इसे गोबर -गरहा ही कहते है. पर गाँव का नाम गौरव गढ़ ही है. महिला कोई पचास -पचपन की रही होगी. पके बाल, सामान्य वेश-भूषा, माथे पर रमानंदी तिलक और गले में कंठी.. वो सकुचाई – सी मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गई.उसके चेहरे पर दर्द की लकीरें साफ़ दिख रही थी. उसके साथ पैसठ – सतर साल का एक बूढ़ा था. साधुओ सा वेश, माथे पर वही रमानंदी तिलक, गले में कंठी. एक हाथ में कमंडल, एक हाथ में लाठी. मैंने बाबा का नाम पूछा और उन्हें बैठ जाने को कहा.
‘मेरा नाम सीता राम दास है.’  बाबा ने बताया और बूढी की बगल वाली कुर्सी पर बैठ गए. ‘यह मेरी दासिन है. इसे पेट में बहुत दरद हो रहा हैं. पेट में सुल्फा भोकता है.’ दासिन यानी उनकी पत्नी. कम्पाउण्डर ने बूढी को टेबुल पर लिटाया …मैंने पूछा – ‘कहाँ दर्द है ? कब से है ?’ ‘रास्ते से ही सरकार. दर्द रास्ते में ही उठा आज सबेरे से’. बाबा कह रहे थे – हमलोग चारों धाम करके अभी अयोध्याजी से आ रहे हैं.बाट-घाट में खाने-पीने का कोई ठीक तो रहता नहीं. बुढिया चटोर है, अंट-शंट खाती आई हैं.अभी ट्रेन से उतर कर सीधे आपके पास आ रहें हैं. आपका नाम बहुत सुना हैं. आप पुराने डाकटर हैं. गाँव में डाकटर थोरे ही रहता है, ठगते हैं सब….. मैंने दासिन को देखा. ब्लड प्रेशर भी मापा… 120/80..नार्मल. बाबा ने कहा –‘डाकटर बाबू, जरा जनतर लगा कर पेट देख लीजिए. रह – रह कर टीस मारता हैं…टिसियाता हैं.जनतर अर्थात आला … एसथेटसकोप.  हाजमे की गड़बड़, खाने – पीने की अनियमितता के कारण पेट में कुछ गैस बगैरह बन रहा था.मैंने कहा – ‘बाबा, घबराने की बात नहीं हैं, आप चिंता नहीं करें.

एक सूई लगा देता हूँ . इन्हे बाहर ले जाकर लिटा दे. अभी दर्द कम जायेगा. दर्द कम होने पर गाँव चले जाये.’ मैंने नर्स …चंचल को सूई दे देने को कहा. वे दोनोंबाहर चले गए. मैं फिर मरीज़ देखने में व्यस्त हो गया.
करीब …एक बजे …मरीजों की भीड़ छंट जाने के बाद बाबा अन्दर आये और बोले – ‘बाबू, दर्द तो कम हो गया है,क्या हमलोग गाँव जा सकते हैं ?’ फिर उन्होंने टेंट से कुछ रुपए निकल टेबुल पर रखा  – ‘डाकटर, बैध, राजा, बाभन को बिना दक्षिणा दिए काम नहीं लेना चाहिए. बाबु, अपनी फ़ीस ले लीजिए ….बाहर कम्पोडर…फ़ीस नहीं ले रहा है ..कहता है की यहाँ बाबा, साधु, भगत… से फ़ीस नहीं लिया जाता है.’ डाकटर साहेब …आप अपना फ़ीस के लीजिए और सूईया का भी दामकाट लीजिए.’ मैंने हाथ जोड़े – ‘बाबा, आपलोग चारो धाम से पुण्य कमाकर आ रहें हैं. आपलोगों का आशीर्वाद ही मेरी फ़ीस है. आप त्रिलोक भैया को भी जानते है … आप निश्चिन्त होकर इन्हे गाँव ले जाएँ …मैं एक गैस की दवा …आपको दे देता हू, यदि जरुरत पड़े तो फिर इन्हे लेकर आ जाएँ.’ बाबा बोले – ‘ अब तो कहीं भी पुण्य – धरम नहीं हैं बाबु, सुब तमाशा है. अयोध्या का पुण्य तो उसी दिन चला गया, जिस दिन रामलला के नयन से ढब – ढब लोरचुने लगा …..’मैं कुछ समझ नहीं सका. बाबा रामानन्दी साधु होकर भी कैसी बातें कर रहें हैं – ‘बाबा, आप क्या कह रहें हैं? जरा बैठ कर समझाइए.’  हाँ बाबू , घोर कलयुग आ गया – बाबा बैठ गए – दुनिया में अब कहीं भी धरम नहीं रहा. जब करम ही ख़राब हो गया तो धरम कहाँ से बचेगा ? सब ख़तम हो गया बाबू, सब ख़तम हो गया …सब ख़तम. हम दोनों बहुत जगह घूमे. मंदिर गया, मसजिद गया, बहुत घूमा, बहुत तीरथ गया. सब जगह अच्छा करम था, धरम था,प्रेम था,परमेश्वर था. लेकिन अब जगहे जगह दंगा हैं, फसाद है, फौज करफू है, व्यभिचार – हिंसा है। दिन – दहाड़े लूट लेता है.

भगवान को बाँस – बल्ला – लोहा से घेर – घार कर जेल में डाल दिया है. इस देश से सत्य, अहिंसा, प्रेम सब गायब हो गया है, बाबू !’ कहते – कहते बाबा बिलखने लगे. इसी बीच दासिन भी आकर खड़ी हो गई. उनके पेट का दर्द शायद कम हो गया था. बाबा का विलाप जारी था – ‘गाँधी बाबा … कहते थे अल्लाह – ईश्वर सब एक हैं. जो राम है, वही रहीम है। यही कबीर दास भी कहते थे. पर अब तो बाबू , सब धरमके भगवान  भिन्न हो गए , जैसे हम दोनों को हमारे बेटों ने भिन्न कर दिया ……’ बच्चे की तरह पुचकारते दासिन बाबा को संभाले बाहर चली गई.
उनलोगों के चले जाने के बाद मैं फिर अपने काम में व्यस्त हो गया. बात आयी – गयी …हो गई. दस – बारह दिनों बाद बाबा फिर दासिन के साथ आए. उनकी दासिन पूर्णतः स्वस्थ हो चुकी थी. अपने साथ वो कददू, कोहड़े और कमंडल में तक़रीबन एक – डेढ़ किलो दूध लेकर आए थे. उन्होंने कहा – ‘डाकटर बाबू, दासिन तो बिलकुल ठीके हो गई है. अपनी ही कुटी पर कददू है, कोहरा है , गाय भी है. यह सब आपके लिए है.’  मैंने सभी चीजें घर भिजवा दीं और बाबा से बैठने का आग्रह किया. उन्होंने मेरे चैम्बर में लगे महर्षि मेंही दास के तस्वीर को प्रणाम किया… फिर वे बैठे. मैं बाबा से यह जानना चाह रहा था की उस दिन जब वे दासिन को दिखाने आये थे तो उन्होंने बताया था की रामलला के नयन से ढब – ढब लोर चूने लगा था, इस प्रसंग में मैंउसी दिन से जिज्ञासु था. मैंने बाबा से पूछा तो वे कहने लगे – ‘सच बाबू , अब ईमान – धरम नहीं रहा. साधु, पंडित, मुल्ला, मोलबी तरह – तरह के भेस बना कर परवचन करता है. पर कुछो बूझता – सूझता भी है. अरे, अपने धरम पर रहो, अपने को सुधारो, गाँव -घर – समाज सुधारो. नाहक क्यों जात – धरम के नाम पर मारकाट , दंगा – फसाद करातेहो ?’

बाबा ने कहा – ‘बाबू , आपलोग तो पढ़े – लिखे विद्वान आदमी हैं. हम आपके बाप – दादा, गंगा बाबू और बाबू रघुनन्दन मल्लिक को भी जानते हैं ….बहुत खानदानी हैं आपलोग ….फिर आप मेंही बाबा के शिष्य भी हैं …नेता – मंतरी तो हरदमे आपके पास आते रहते हैं …पिछला इलेक्शन में आप वोटो माँगने हमारे गाँवआये थे और नेत्रदान शिविर करवाने का परोगराम भी बताये थे …कब, .कहिया नेत्रदान शिविर होगा बाबू? एक साँस में कह गए बाबा.
पर बाबा मेरा यह प्रश्न टाल गए की रामलला के नयन में ढब – ढब लोर क्यों था ? बाबा ने फुसफुसा कर कहा – ‘बाबू, आजकल तो ढेर नेता हो गए हैं. लगता हैं की वोट की खातिर फुट डालकर मंतरी – संतरी बनने का षड़यन्त्र चल रहा है. क्या यहसच है बाबू ? फिर मेरा प्रश्न – ‘ बाबा राम लला के नयन में ढब – ढब लोर क्यों था. मेरे बहुत कुरेदने पर बाबा ने दासिन की ओर देखा. आँखों ही आँखों में शायद कुछ बात हुई.मुझे लगा दासिन अपनी असहमति प्रकट कर रही है. फिर भी बाबा बताने लगे – ‘ हाँ बाबू , हमलोगों ने देखा, रामलला के नयन से ढब – ढब लोर चू रहा था. आज से चार-पाँच बरस पहिले, हमलोग भी अयोध्या में उस धरम – धक्का के हिलोर में फंस गए थे. जबकि एक जगह में लोहा के पोल – बल्ला से घेरा हुआ था …बंदहिस्सा ..वहाँ अन्दर जाने पर पुलिसिया पहरा लगा था. उसको बाबरी मसजिद कहते हैं ..वहाँ पूजा – पाठ – जल नहीं चढ़ता … मोटा – मोटा सिकरी चारों तरफ लगाकर बंद था. देखते – देखते लोग बन्दरों की तरह मसजिद की  गुम्बद पर चढ़ गये। कह रहे थे की कोनो सेना के लोग हैं …सनिमा की नगरी से आए हैं. बड़का – बड़का लोडीस्पीकर से एक जनानी का परवचन हो रहा था …एक धक्का और दो …. एक – एक ईट पलक झपकते जमीन पर गिरा दिया.

यह देखते ही बुढ़िया छाती पीट -पीट कर रोने लगी – हे भगवान, हे देव, यह विधर्मी सब अल्लाह मियां के घर को गिरा रहा है. हे भगवान ! अब क्या होगा ? सच कहते हैं बाबू, यह दृश्य देख कर रामलला भी रोने लगे हमलोगों ने देखा बाबू, रामलला लोगों की दुर्बुधि पर बिलख रहे थे. नयन में ढब – ढब लोर ! बुढिया लगातार रोती जा रही थी और भीड़ में घुसती भी जा रही थी.’ बाबा ने फिर धीरे – से कहा – ‘बाबू बुढिया भीड़ में घुसकर एक ईट आँचल तले चुरा कर ले आई. हम कितना भी समझाते रहे, मत रोओ. अल्लाह मियां और भगवान का घर तो सारे संसार में है. एक घर तोड़ देने से क्या वे भाग जाएँगे. लोगों की तो बुधि ही खो गई है, आँखों में धुंध छा गया है। तुम मर रोओ. पर औरतजात, अपनी जिद पर अड़ी रही, की  अल्लाह मियां के घर का यह पवितर ईंटा गाँव ले ही जाऊँगी. आखिर बुढ़िया की जिद पर लुकते – छिपाते वह ईंटा हमलोग गाँव ले ही आए …. उसके बाद अबकी ही हमलोग अयोध्याजी गये थे, बाबू.’ बाबा उठ खड़े हुए. दासिन भी उठ खड़ी हुई. तब तक उनका कमंडल घर से वापस आ गया था.मैंने खड़े हो कर उनका कमंडल उन्हें वापस किया. जाते – जाते बाबा छण भर को ठमके और पूछा – ‘बाबु, यह देश तो गताल खाते में जा ही रहा है. पर क्यों और किसकी वजह से ? बुढ़िया ने बाबा का हाथ पकड़ कर खींचना शुरू किया – ‘अहाँ त सठिया गेल छी …बिना मतलब बक – बक करैय छी. एतेक किरिया – सप्पथ के बादो डाकटर बाबू के ईंटा वाला बात बतैये देलियेय.   सप्पथ तोड़वय त नीक नैय हेतय।‘(‘तुम तो सठिया गए हो. बिना मतलब बक-बक करते हो। इतना किरिया सप्पथ के बाद भी तुमने डाकटर बाबु को ईंटा वाली बात बता ही दी. सप्पथ तोड़ेंगे तो बुरा होगा ही ना !’)

एक अनजाने, रहस्यमय भाव से बूढ़ी अपने पति को खींच कर बाहर ले जाने लगी. बाबा का प्रतिवाद था की डाकटर बाबु समझदार…खानदानी लोग हैं, कहने से.मन हल्का हो गया. बाबा दासिन के साथ चले गए. उनका मन तो हल्का हो गया, पर मेरा मन भारी हो गया. बहुत सारे सवाल मुझे कुरेदने लगे. एक अनपढ़ -गवाँर मुझे क्या कह गया ?  क्या सचमुच देश की इस हालत के लिए हम सब दोषी हैं ?  क्या सचमुच हम सबों ने संविधान को अपने जीवन की राष्ट्रीयता में उतारने की शपथ लेकर उसे भंग किया है ? आजादी के पचास सालों बाद भी क्या हम एक समतामूलक राष्ट्र का निर्वाण कर सके ? डॉक्टर न जाने कितने मरीजों से रूबरू होते हैं, क्या वो सबको याद रख पाते हैं ? पर कभी – कभी ऐसे भी मरीज़ आते हैं, जिन्हें भूलना संभव नहीं होता. मैं भी बाबासीताराम दास और सितिया दासिन को भूल नहीं पाया. मेरी यह जिज्ञाशा बनी ही रह गई की आखिर अल्लाह के घर की वह पाक ईंट का उन्होंने क्या किया. महीनों बीत गए, सालों बीते. पर बाबा लौट कर नहीं आए. बाबा के ऊपर मेरा ध्यान लगा था. मैंने अपने बड़े भाई ..मुक्ति भैया से भी पूछा.  भैया ..आप त्रिलोक भैया के बीरपुर स्कूल में रहने वाले किसी आदमी को जानते हैं ?..जो सुपौल के आस पास के गाँव का हैं ? ‘हाँ , त्रिलोक एक बार बताया था की उसके स्कूल मे गोबर गरहा का कोई भगत ..खेती – बाड़ी करता है …राम का भक्त है …और उसका नाम भी शायद भगवान  के नाम पर है …भगत टाइप आदमी है.’ ‘हाँ ..सीताराम ..’मुझे लगा की बाबा का अस्तित्व है. कहाँ मैं उनके रहस्यमय होने की कल्पना करने लगा था. जो भी हो .. मेरी जिज्ञाशा अनुत्तरित ही रह गई. हुआ ऐसा की उसी गाँव में नेत्रदान शिविर का आयोजन हुआ.

मैं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष के नाते चिकित्सकों के दल के साथ उस गाँव पहुँचा.बाबा सीताराम दास और सितिया दासिन अभी भी मेरी स्मृति में बने थे. शिविरोपरांत पूछने पर पता चला की बाबा गाँव के दक्षिणी भाग में एक कुटिया बना कर रहते हैं. अपने दोनों पुत्रों से अलग. उनकी पत्नी की मृत्यु हाल – फ़िलहालमें ही हुई है. मैं मुखियाजी के साथ उनकी कुटिया पर पहुँचा. बाबा कुटिया के बाहर ही मचान पर बैठे मिल गए. मैंने उन्हें प्रणाम किया, पर उन्होंने मुझे पहचाना नहीं. मुखियाजी ने बताया कि उनकी आँखों की रोशनी कमजोर हो गई है. आँखों में मोतियाबिन्द है. गाँव में ही नेत्रदान शिविर लगने के बावजूद, बहुत कहने पर भी बाबा ऑपरेशन कराने को तैयार नहीं हुए. बाबा लगातार अपनी जिद पर अड़े रहे. उनका कहना था की जब लोग आँखें होते भी अंधे है तो मैं ऑपरेशन क्यों करवाऊ,अंधा ही भला हूँ . मुखिया जी ने उन्हें बताया की सुपौल से डॉक्टर मल्लिक साहेब उनसे मिलने आये हैं. तब तक बाबा मचान से उतर चुके थे. उन्होंने एकदम नजदीक आकर मुझे देखा और पहचान लिया – ‘हाँ, चीन्ह गये डाकटर बाबू, हमारे दासिन को जब पेट में दरद हुआ था तो आप ही ने ठीक किया था. आपसे बहुत बातचीत भी हुई थी.दासिन हमको डाँटी भी थी. बाबू, हमारी दासिन ने तो हाल ही में समाधि ले ली, हमेशा आपकी चर्चा किया करती थी ….’बाबा ने नजदीक आकर कहा – ‘बाबू, अब हमें भी जीने का मन नहीं है …..’ अपार करुणा और दुख से भींगी बाबा की यह बात मुझे कहीं गहरे छू गई.उन्होंने स्नेह से मुझे मचान पर बिठाया. किसी को एक लोटा पानी लाने कहा. पानी आने पर उन्होंने मुझे पैर धोने कहा. मैंने यन्त्रवत पैर धोये. बाबा मुझे अपने अपनी कुटिया मेंले गये. कुटिया एकदम साफ -… सुथरी, चिकनी मिट्टी से लिपी – पुती, झक्क.



एक तरफ एक खाट  बिछी थी, जिस पर साधारण – सा बिस्तर था. एक कोने में अलगनी पर रखे कुछ कपड़े, एक जगह कमंडल, लाठी और कुछ बर्तन थे .कुटिया के एक कोने में एक सिंहासन रखा था. सिंहासन पर बाबा के रामलला विराज रहे थे. मैंने उन्हें प्रणाम किया. अकस्मात नज़र टिठक गई. मैं टकटकी बाँधे उधर ही देखता रह गया.  रामलला के ठीक बगल में एक ईट रखी थी, जिस पर एक माला रखा था, कुछ अरहूल फूल रखे थे, तुलसीदल रखे थे. सिंहासन के नीचे जल रही अगरबत्ती की सुगंध चारो दिशाओ में फैल रही थी. मेरे सामने एक चमत्कार घटित हो रहा था. ऐसा चमत्कार रोजमर्रे की जिन्दगी में देखने को नहीं मिलता. मुझे लगा रामलला मुस्कुरा रहें हैं. मैंने दुबारा सिंहासन के सामने अपना माथा टेका और उठ कर खड़ा हुआ. पलट कर देखता हूँ तो बाबा निर्विकार – भावसे खड़े हैं. बिलकुल शांत, स्थिर, आँखे बन्द. उनकी आँखों में मोतियाबिन्द है, पर आन्तरिक दृष्टि की अनुपम आभा उनके मुखमंडल पर फैल रही है. सालों – साल से अन्दर दबी जिज्ञासा आज उत्तरित हो रही थी – एक अनन्त अनुत्तरित जिज्ञासा.

महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :दूसरी क़िस्त

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में  संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक  के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की  प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत  बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  ‘कोटा  विद  इन  कोटा’  की   सबसे  खराब  पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ‘ क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी , बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ‘ हालांकि  पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.  अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 
संपादक
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महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली   क़िस्त



शीर्षक: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला आरक्षण से संबंधित 84वां संविधान संशोधन विधेयक पारित करने का मुद्दा ( 8 मार्च 1999)

श्रीमती गीता मुखर्जी (पनसुकरा): महोदय, आज 8 मार्च है, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस. इसलिए मैं यह मानकर चल रही हूं कि सबसे पहले हमारी संसद दुनिया भर में सही मुद्दों के लिए संघर्ष कर रही महिलाओं के साथ एकजुटता दिखाएगी. दूसरी बात, आज देश भर में कई सेमिनार, रैलियां और तमाम अन्य आयोजन किए जा रहे हैं, जहां महिलाएं कई चीजों की मांग कर रही हैं. इनमें हाल में की गई अनिवार्य जिंसो की कीमत कम करने की मांग से लेकर, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार रोकने, सांप्रदायिकता के विविध रूपों से लड़कर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने आदि जैसी मांगें शामिल हैं.  इन रैलियों और सेमीनारों में भी 84वें संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने की मांग की जा रही है ताकि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिल सके. महोदय, मैं आपका ध्यान और आपके जरिऐ सरकार और तमाम राजनीतिक दलों के सदस्यों का ध्यान देश भर की महिलाओं की मांग की ओर दिलाना चाहती हूं और कहना चाहती हूं कि विधेयक को इसी सत्र में पारित कर दिया जाए.

श्री इंदर कुमार गुजराल (जालंधर): महोदय, माननीय महिला सदस्य ने उचित ही यह ध्यान दिलाया है कि 8 मार्च हमारे राष्ट्रीय जीवन में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तिथि है. मैं इसमें एक सकारात्मक बात यह जोडऩा चाहता हूं कि यह मांग केवल भारतीय महिलाओं की नहीं है. यह मांग देश के तमाम लोकतांत्रिक नागरिको की है कि महिलाओं को संसद और विधानसभा में उनका दाय मिलना चाहिए यानी 33 प्रतिशत आरक्षण. जो मुद्दा मेरी मित्र ने उठाया है,  मैं उसमें अपना स्वर मिलाना चाहता हूं. मैं उम्मीद करता हूं कि यह आवाज इस सदन में सर्वसम्मति से उठेगी। महिला सशक्तीकरण के लिहाज से देखा जाए तो यह मसला अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हमारे जीवन में महिलाओं की अत्यंत अहम भूमिका है. ऐसे में हम सब उनके साथ हैं. हमारे राष्ट्रीय और राजनीतिक जीवन में महिलाओं की भूमिका और सशक्त होनी चाहिए.

श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल) : हम भी इस पर बोलेंगे. यह हमारा मामला है … (व्यवधान) उपाध्यक्ष महोदय : आपको मैं चान्स दूंगा पर ऐसे नहीं बोलिये. (व्यवधान)


श्री मुलायम सिंह यादव : आप मुझे नहीं बोलने देते तो मुझे निकाल दीजिए. … (व्यवधान)


पीठासीन  अध्यक्ष  : मुलायम जी, मैं आपको कह रहा हूं कि श्रीमती कृष्णा बोस ने नोटिस दिया है और उनका नाम लिस्ट में है इसलिए वह पहले बोलेंगी….(व्यवधान)

 श्री मुलायम सिंह यादव : हमारी लड़ाई है इस पर….(व्यवधान) ये प्रधान मंत्री रह चुके हैं इसलिए इन्हें बुलाया, हमें नहीं बुलाएंगे? … (व्यवधान)

 पीठासीन अध्यक्ष : आप सीनियर लीडर हैं. क्या मैंने आपको कभी चान्स नहीं दिया ? (व्यवधान)

पीठासीन अध्यक्ष  : श्री मुलायम सिंह जी, यह आप कया कर रहे हैं क्या  मैंने कहा कि आपको बोलने का चान्स नहीं देंगे. आप कम्पैल नहीं कर सकते हैं. आपको बिहेव करना आना चाहिए, आप एक सीनियर लीडर हैं. क्या मैंने आपको चान्स नहीं दिया, मैं आपको भी चान्स दूंगा. आप इस तरह से मत करिये … (व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : यह राबड़ी देवी की गरदन काटने वाले लोग हैं. यह महिलाओं को क्या  प्रधानता देंगे. बैकवर्ड क्लासेज  और माइनोरिटीज सोसाइटीज को जब तक प्रधानता नहीं मिलेगी, इस पर हमारी सहमति नहीं है.
श्री बूटा सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, इस पर सदन को ऑब्जेकशन है … (व्यवधान)


श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, आप इनकी कया सुनेंगे, यह गला काटने वाले लोग हैं … (व्यवधान

श्री मुलायम सिंह यादव : हम बहुत सुन चुके हैं … (व्यवधान) उपाध्यक्ष महोदय : आपकी बात भी सुनी जायेगी, पहले उनकी बात खत्म होने दीजिए.. (व्यवधान)

पीठासीन अध्यक्ष : आप इतने सीनियर लीडर हैं, आप बीच में कयों खड़े होते हैं, यह कोई तरीका नहीं है। श्री लालू प्रसाद : सर, जब आप खड़े होते हैं तो हम लोग डर जाते हैं … (व्यवधान) यह दंगाई खड़े हैं … (व्यवधान)यह एंटी दलित हैं, एंटी माइनोरिटीज हैं … (व्यवधान)

पीठासीन अध्यक्ष : ऑर्डर प्लीज.

श्रीमती कृष्णा बोस: उपाध्यक्ष महोदय, सबसे पहले मैं चाहती हूं कि कम से कम मेरे पुरुष सहयोगी मेरी बात सुनें. श्री गुजराल ने कहा कि यह संसद और तमाम अन्य लोकतांत्रिक लोग हमारा समर्थन कर रहे हैं लेकिन मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि मेरी नजर में यह संसद पुरुषों का क्लब है और मैं इस क्लब में एक अवांछित घुसपैठिए सा महसूस करती हूं. मुझे अभी यहां खड़े होकर भी यही महसूस हो रहा है. मैं यहां ठीक से बोल भी नहीं सकती. क्या मैं बोल सकती हूं महोदय ? अच्छा ऐसा मुझे लगता है …(बाधा)


पीठासीन अध्यक्ष : श्री रावले उनको बोलने दीजिए.

श्रीमती कृष्णा बोस: मैं सदन का ध्यान एक या दो अहम मुद्दों की ओर आकर्षित करना चाहती हूं. आज महिला दिवस है. जैसा कि श्रीमत गीता मुखर्जी पहले ही कह चुकी हैं. मुझे पता है कि सरकार महिलाओं के लिए एक राष्ट्रीय नीति लाने पर विचार कर रही है जो कुछ समय से कैबिनेट के समक्ष विचाराधीन है. आज मैं यह जानना चाहती हूं कि वे इसका क्या करना चाहते हैं. यह मेरा पहला बिंदु है.  दूसरी बात, तीन साल पहले मैंने यहीं इसी जगह खड़े होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री देवेगौड़ा से पूछा था कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला विधेयक कब आएगा और कब पारित किया जाएगा. प्रधानमंत्री ने वादा किया था कि सन 1996 के आरंभ में उसी सत्र में यह पारित हो जाएगा. अब तीन वर्ष बीत चुके हैं. गंगा में जाने कितना पानी बह चुका है. हमने कई प्रधानमंत्री बदलते देखे. लोगों ने नई लोकसभा चुन ली. मैं जानना चाहती हूं कि यह संशोधन कब पेश किया जा रहा है और क्या हमारे नीति निर्माण क्षेत्र में इसके लिए समुचित जगह है. मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं क्योंकि हम बहुत उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. मैंने अपनी भावनाएं मजबूती से जाहिर कर दी हैं. लेकिन लोग जिस तरह व्यवहार कर रहे हैं,मुझे कहना पड़ा रहा है कि मैंने पूरी तरह अवांछित महसूस किया.  (बाधा) मैं इन दो मसलों पर सरकार की प्रतिक्रिया जानना चाहती हूं. राष्ट्रीय महिला नीति पर क्या हो रहा है और उस संशोधन की क्या स्थिति है जो पहले से पारित होने के लिए लंबित है ?

श्रीमती भावना देवराजभाई चिखलिया (जूनागढ़) : माननीय उपाध्यक्ष जी, आज ८ मार्च, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है और जिस तरीके से हाउस में, खासतौर से लालू जी और मुलायम सिंह जी ने व्यवहार किया है, वह बिलकुल सराहनीय नहीं है. आप कहते हैं कि श्रीमती राबड़ी देवी जी भी महिला हैं, हम इस बात को मानते हैं और अगर कोई महिला अच्छा शासन करती है, तो सारा देश उसकी सराहना करता है और उसे स्वीकार करता है, लेकिन जिस महिला के राज में अच्छा शासन नहीं हुआ, उसकी हम सराहना नहीं कर सकते और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. उपाध्यक्ष महोदय, आज के दिन महिला अन्तर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर मैं सभी महिलाओं की तरफ से देश के प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का अभिनन्दन करती हूं क्योंकि महिलाओं के लिए अटल जी ने अपने नेतृत्व में बहुत सारे ऐसे निर्णय किए हैं और करने जा रहे हैं जिनके कारण सम्मान जनक रूप से इस देश में महिलाएं जी सकती हैं. मैं आपके माध्यम से स्पष्ट कहना चाहती हूं कि आज के दिन महिलाओं को आर्थिक दृष्टी से समर्थ बनाने के लिए महिला विकास बैंक की स्थापना, महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन की योजना और महिलाओं के लिए पार्ट-टाइम जॉब के लिए सकारात्मक रूप से विचार करने की बात अटल जी ने कही है. इसके लिए मैं उनकी सराहना करती हूं. उपाध्यक्ष महोदय, इस सदन में महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण का बिल पूर्व में ही प्रस्तुत किया जा चुका है, लेकिन अभी तक पास नहीं किया गया है. इसलिए मैं आज महिला अन्तर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर अपने सभी सांसद भाइयों से अपील करती हूं कि उसे सर्वसम्मति से पारित किया जाए. धन्यवाद…


श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, मेरी आपसे एक प्रार्थना है कि आप कभी गुस्सा न करें. कभी टैंशन मत रखिये.(व्यवधान)


पीठासीन अध्यक्ष  : जीरो ऑवर में थोड़ी टैंशन तो होनी चाहिए.

श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल): पीठासीन महोदय, जहां तक महिला दिवस का सवाल है तो मैं सारे हिन्दुस्तान और सारी दुनिया की महिलाओं को इसकी शुभकामनायें देता हूं. वे तर्रकी  करें, आगे बढ़ें और उनको उनका हक मिले. जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो मेरी राय यह है कि आज हमें इस विवाद में नहीं पड़ना चाहिए. जब महिला दिवस मनाया जा रहा है तो हमारी भी उनको शुभकामनायें हैं. इसको विवाद में नहीं डालना चाहिए. जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो शुरू से लेकर आज तक हम प्रधानमंत्री जी से दो बार मिले और उनको चिट्ठी भी लिखी. हमारी स्पष्ट राय है कि इस विधेयक का जो वर्तमान स्वरूप है, उसको उसी तरह से पास करने से हमारे देश के अंदर जो अल्पसंख्यक हैं विशेषकर मुसलमान हैं, दलित हैं, पिछड़े हैं, उनके साथ गैरबराबरी होगी. उनका और अधिक शोषण व अपमानजनक जीवन होगा इसलिए हमारी शुरू से यही राय है कि वर्तमान विधेयक तब तक नहीं आना चाहिए जब तक अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े विशेषकर मुसलमानों की जनसंख्या के अनुसार उनकी महिलाओं को आरक्षण मिले. दूसरा हमारा यह कहना है कि जहां से लोकतंत्र आया है, हम महिलाओं के आगे बढ़ने के विशेष अवसर की नीति को इस सदन में कहना चाहते हैं कि हमारी समाजवादी पार्टी ने आज से नहीं बल्कि  १९५४ से ही अमेरिका और इंग्लैंड की महिला आरक्षण की नीति का अनुसरण किया है. अमेरिका और इंग्लैंड की पार्लियामेंट  में अभी तक नौ फीसदी से ज्यादा निरक्षर महिलायें नहीं आ सकी हैं. हमारे यहां जो निरक्षर महिलायें हैं, दलित हैं, गरीब हैं, दबी-कुचली हैं, वे इस सदन में वर्तमान विधेयक के चलते नहीं आ सकती हैं. मैं महिलाओं के ३३ फीसदी आरक्षण के पक्ष में नहीं हूं. इसे कम किया जाये. इसे ज्यादा से ज्यादा १० फीसदी किया जाये. श्री गुजराल साहब अभी खड़े हुए थे. जब वे प्रधान मंत्री थे तब भी हमने इसका डटकर विरोध किया था. (व्यवधान)आप जानते हैं क्योंकि आप उस समय यहां थे. हमारी संयुक्त मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री श्री देवेगौड़ा थे तब भी हमने इस हाउस के अंदर अपने साथियों को खड़ा करके जो नहीं करना चाहिए था, उस वक़्त  भी कराने की कोशिश  करवाई थी. इसलिए हम चाहते हैं कि इस विधेयक को तब तक नहीं आना चाहिए जब तक मुसलमान, पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों चाहे ईसाई ही क्यों  न हो , उनका आरक्षण न हो. अभी तक जो अध्ययन किया गया है कि बाद में संशोधन किया जायेगा, वह संशोधन नहीं हो सकता है. वह धोखा है, चतुराई है. पिछड़े और अल्पसंख्यकों के बारे में संविधान के अंदर कोई प्रवाधान नहीं है. हम संशोधन दे भी देंगे तो वह  संशोधन अमल होगा,  आप बताइये क्योंकि  आप खुद भुक्तभोगी हैं. आज आधे हिन्दुस्तान में से कोई भी मुसलमान लोक सभा का सदस्य नहीं है. आज गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश आदि आधे हिन्दुस्तान में से एक भी मुसलमान लोक सभा में नहीं है … (व्यवधान) हमारी राय है कि इस विधेयक को पेश नहीं किया जाना चाहिए.

… (व्यवधान)वर्तमान नौकरशाही के चलते दूसरे दल की सरकार बनने पर, एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए सीट आरक्षित कर दी जाएगी. हमारी राय है कि इसका अधिकार पार्टी को मिलना चाहिए, चुनाव आयोग को अधिकार नहीं देना चाहिए. पार्टी को अधिकार देना चाहिए कि कितना आरक्षण है और महिलाओं को कहां आरक्षण देना है. यदि कोई पार्टी उसका पालन न करे तो उस पार्टी की मान्यता खत्म कर दी जाए, इसमें ऐसा प्रावधान कीजिए. इलेक्श न  कमीशन को आरक्षण का अधिकार नहीं मिलना चाहिए, यह हमारी राय है. जब तक इस विधेयक में संशोधन नहीं होता तब तक हम इसका हर तरह से विरोध करेंगे.

श्री सोमनाथ चटर्जी: श्रीमती गीता मुखर्जी ने सदन में जो कुछ कहा है मैं उसका पूरा समर्थन करता हूं. यह एक महत्त्वपूर्ण दिन है. महिलाओं से जुड़े अनेक मुद्दे हैं. इन्हें पूरे देश का समर्थन चाहिए. जाहिर सी बात है कि देश का प्रतिनिधित्व करने वाले सदन को अपना नजरिया एकदम स्पष्ट ढंग से और गंभीरता से उजागर करना चाहिए. संबंधित कदम भी उठाए जाने चाहिए. जहां तक आरक्षण विधेयक की बात है, हम जानते हैं कि इसे लेकर अलग-अलग दलों का नजरिया अलग-अलग है. मेरा विचार यही है कि इसे मौजूदा स्वरूप में पारित किया जाना चाहिए. अब अन्य दलों को उनका विचार प्रकट करने का अवसर दिया जाए. सदन को सही समय पर इस संबंध में निर्णय लेना होगा. फिलहाल इसका वक्त नहीं आया है. मैं यहां यह कहने की कोशिश नहीं कर रहा हूं कि इसे मौजूदा स्वरूप में क्यों पारित किया जाए ? आज सबसे अहम मसला यह है कि देश में महिलाओं का प्रश्न और संसदीय लोकतंत्र का प्रश्न, दोनों ही अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं. बिहार में क्या हुआ ? इस सरकार ने क्या कदम उठाया ? इस बात का प्रचार यहां बहुत जोर-शोर और अतिरेक के साथ किया गया वह पारित भी हुआ. किसी चीज का प्रतिनिधित्व नहीं हुआ ? इसमें देश के लोगों का विचार कुछ इस तरह शामिल है मानो संविधान के अधीन राज्यसभा की कोई प्रासांगिकता ही नहीं. इसलिए आज, यह जानते हुए कि राज्यसभा में उनका बहुमत नहीं है, वहां इसे पारित नहीं कर सकता, लेकिन फिर भी उन्होंने तमाम बातें कीं और जरूरी कदम उठाने के लिए अदालत जा रहे हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री तक को जाकर कांग्रेस पार्टी के नेता को आमंत्रित करना पड़ा… (बाधा)। मुझे ऐसा कहने का अधिकार है.

श्रीमती सुमित्रा महाजन : माननीय उपाध्यक्ष जी, मुझे थोड़ा दुख हो रहा है. सोमनाथ दादा जैसे जिन लोगों से हम रूल सीखते हैं, मुझे ऐसा लगा था कि वे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर गीता दीदी की बात का और समर्थन करने के लिए खड़े हैं, लेकिन बीच में जिस तरीके से बात हुई, उससे मुझे थोड़ा सा दुख हुआ, क्योंकि हम इन्हीं लोगों से सीखते हैं। (व्यवधान)उन्होंने एक प्रकार से मंत्री की बात पर आज जो चर्चा छेड़ी, वह नहीं छेड़नी चाहिए थी, ऐसा मुझे लगता है. आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है, मेरा यह मानना है कि ऐसा नहीं है आज महिला दिवस है, इसलिए महिलाओं के सम्मान की कुछ बात कहें. वास्तव में अच्छी तरह से इस पर चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन उसमें भी जिस प्रकार से खलल डाला जा रहा है, वह एक दुखदायक बात है. उपाध्यक्ष महोदय, मैं आज इस महिला दिवस के उपलक्ष्य  में प्रधान मंत्री जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगी कि उनके मन में महिलाओं के लिए सम्मान है. जिस दिन उन्होंने प्रधान मंत्री पद की शपथ ली थी, उसके तुरंत बाद उन्होंने सम्पूर्ण देश की महिलाएं शिक्षित बनें, समझदार बनें, इस बात को दृष्टी  में रखते हुए महिलाओं को सभी प्रकार की शिक्षा फ्री देने का, उच्च शिक्षा तक फ्री दिए जाने का ऐलान किया था. इतना ही नहीं उनको व्यावसायिक शिक्षा देने के बारे में भी सोचने की बात जो कही थी, मैं चाहूंगी कि सरकार इस बारे में जल्द ही कुछ योजना लाए. इसी प्रकार महिलाओं के आत्मसम्मान और सुरक्षा की दृष्टि से जो भाव हमारे प्रधान मंत्री जी के मन में है, इस सदन में भी कई बार इस बात की चर्चा हो चुकी है. जब-जब भी दो जातियों में या कहीं भी झगड़े होते हैं तो वास्तव में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है, अत्याचार होता है तो उस जाति की महिलाओं पर ही होता है, मातृत्व पर आघात होता है, इस बात को दृष्टि  में रखना चाहिए. इसीलिए प्रधान मंत्री जी ने और गृहमंत्री जी ने जो यह बात बार-बार कही है कि बलात्कारियों को फांसी तक की सजा दी जानी चाहिए, मैं उनका इस बात के लिए अभिनन्दन करना चाहती हूं. मैं चाहूंगी कि महिलाओं के हित में जो कानून हैं, उनके बारे में सोचा जाए और आवश्यक संशोधन किए जाएं तथा महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण वाला जो बिल है उसके बारे में भी सोचा जाए … (व्यवधान)


श्रीमती सुमित्रा महाजन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं केवल इतना ही निवेदन करना चाहूंगी कि ३३ प्रतिशत आरक्षण देकर हम इतना ही चाहते हैं कि निर्णय की प्रक़िया में महिलाओं का भी ज्यादा से ज्यादा सहभाग हो. हो सकता है इस पर किसी के विचार अलग हों, लेकिन बिल पर चर्चा के समय वे उसमें संशोधन दे सकते हैं. अगर मित्रता के नाते, सर्वानुमति से यह बात हो जाती है तो महिलाओं का सम्मान रखने के लिए जो हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं, उसको मनाने में ज्यादा खुशी होगी. मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि महिलाओं को कृप्या जाति में न बांटे. स्त्री की एक ही जाति होती है और वह मातृत्व की जाति होती है. वैसे भी स्त्री देश में पिछड़ी हुई है, उस पर अत्याचार हो रहे हैं, वह आगे नहीं बढ़ पा रही है. इसलिए निर्णय की प्रक़िया में अधिकार दिलाने की दृष्टि  से अगर कोई महिला बात करती है तो वह पूरे महिला समाज की बात करेगी. इस सदन में भी अगर वह बोलने के लिए खड़ी होगी तो मुस्लिम , दलित या अगड़े-पिछड़े की बात न करके पूरे स्त्री समाज की बात करेगी. इसलिए जब वह प्रतिनधित्व करेगी तो पूरे महिला समाज का करेगी. मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि इस दृष्टि  से इस पर सोचें और महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण वाले बिल पर भी सर्वानुमति होनी चाहिए.

श्री चन्द्रशेखर (बलिया) (उ.प्र.): उपाध्यक्ष जी, आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है. महिलाओं के लिए जितना भी किया जाए, वह कम है. मैं बधाई दूंगा सरकार को कि इन्होंने बहुत अच्छी इच्छा व्यक्त  की है महिलाओं को शिक्षा देने के लिए और उनके उत्थान के लिए. मैं उस पर नहीं जाऊंगा कि यह कितनी क्रियान्वित  होगी, यह तो अगले एक साल में देखा जाएगा. उसके लिए जो श्रीमती महाजन ने बधाई दी है प्रधान मंत्री जी को, मैं भी देता हूं. लेकिन दो बातें मैं और कहना चाहता हूं. अभी मुलायम सिंह जी ने जो बातें कहीं, उनका अपना महत्व है. उनकी भावनाओं को भी समझना चाहिए. यह भी समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन हम लोग एक राष्ट्रीय कार्यक़म, जो अपने में अनोखा है, लागू करना चाहते हैं. मैं अपने मित्र गुजराल जी से पूछ रहा था कि जिस दिन आप यह बिल यहां लाए थे, उस दिन आपने क्या  सोचकर ऐसा किया था, कयोंकि थोड़ा बहुत दुनिया के बारे में मुझे भी ज्ञान है, मैं दुनिया के देशों में ज्यादा नहीं गया हूं, लेकिन भारत निराला देश होगा. जहां इस तरह का बिल पार्लियामेंट  में लाया जाएगा और क्यों लाया जा रहा है, इसका कारण हमारे मित्र गुजराल साहब को भी नहीं मालूम है। उन्हें सिर्फ यह मालूम है कि उस समय कोई कोर कमेटी थी, उसने कहा कि यह बिल ले आओ और उसी दिन उसको सर्वसम्मति से पास कर दो। उमा भारती जी आज यहां हैं या नहीं, उन्होंने भी उस दिन यही सवाल उठाया था जो आज मुलायम सिंह जी उठा रहे हैं .. (व्यवधान)मैं कहना चाहता हूं लोगों के मन में आशंका है. जो गरीब, पिछड़े, दलित और अल्पमत के लोग हैं, उनकी महिलाएं ज्यादा पिछड़ी हुई हैं. चुनाव आज जिस तरह से हो रहे हैं, उनका भी हमें रूप मालूम है, इसलिए हम समझते हैं कि उनका इतना प्रतिनिधित्व इस सदन में कम हो जाएगा, इसलिए यह भेद मत पैदा करें. यह सही है कि पिछड़े और अगड़ों में इस सदन में अंतर नहीं करना चाहिए. मैं सुमित्रा महाजन जी से यह कहूंगा कि पुरुषों और औरतों में अंतर करना भी उतना ही बुरा है जितना इस तरह की बातें करना बुरा है. इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि यह जो बिल लाया गया, बिना सोचे-समझे, बिना जाने-बूझे और केवल भावनाओं, ज्जबातों में बहकर लाया गया. इसके क्या परिणाम होंगे, उसके बारे में कभी नहीं सोचा गया. अगर कोई माननीय सदस्य यह बता दे कि दुनिया के किसी देश  में क्या  एक तिहाई रिजर्वेशन महिलाओं के लिए किया गया है?

मायावती का चरित्रहनन और राजनीतिक पतन का मर्सिया

निखिल आनंद

एक ओबीसी-सबल्टर्न पत्रकार एवं सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ता. संपर्क: nikhil.anand20@gmail.com, 09939822007मायावती

हाशिये से आगे बढ़कर ताकतवर राजनीतिक शख्सियत के रूप में स्थापित मायावती के खिलाफ जातिवादी-मर्दवादी भावनाओं की विश्लेष्णात्मक खबर ले रहे हैं पत्रकार निखिल आनंद. ‘ बहन जी ‘  के खिलाफ भाजपा  नेता की अश्लील,अभद्र टिप्पणी को  निखिल  सिर्फ महिला के खिलाफ टिप्पणी नहीं  मानते,बल्कि उनके  अनुसार  यह  टिप्पणी जातिवादी मानस  से प्रेरित है,जिससे संसद में फूलन देवी भागवती देवी जैसी  महिला सांसद भी  पीड़ित  रही  हैं .

भारत के 20 करोड़ की आबादी वाले सूबे उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती को भारतीय जनता पार्टी का एक वरिष्ठ नेता सार्वजनिक तौर पर ‘वेश्या’ से भी ‘बदतर’ घोषित करता है. आखिर इस बयान की जद में क्या है यह जानने की गुंजाइश इसलिये बनती है कि मायावती इस आजाद भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में बिना किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि के, इतना बड़ा राजनीतिक मुकाम बनाने वाली दलित ही नहीं, समूचे सबल्टर्न समाज की शायद अकेली कद्दावर महिला शख्सियत हैं. वैसे भारत की राजनीति में अभी तक की सबसे बड़ी हैसियत बनाने वाली एकमात्र महिला जो प्रधानमंत्री के ओहदे तक पहुँची वो इंदिरा गाँधी थीं. इंदिराजी को महात्मा गाँधी की गोद में खेलने का अवसर मिला था और उनके पिता जवाहरलाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे. 1971 में बांग्लादेश युद्ध जीतने के बाद तो इंदिरा गाँधी की नेतृत्व क्षमता से प्रभावित होकर बीजेपी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें ‘दुर्गा या दुर्गावतार’ घोषित किया था.  ‘इंदिरा’ कभी ‘दुर्गा’ थी तो बहुजन नायक महिषासुर के लोकप्रसंग में ‘दुर्गा’ भी एक ‘वेश्या’ बताई जाती है पर आज जब मायावती को ‘वेश्या’ से भी ‘बदतर’ बताया जा रहा है वो भारतीय लोकतंत्र में बहुजन जमात की एक प्रतिनिधि राजनीतिक नायिका हैं. इस बयान का मनोविज्ञान यह बतलाता है कि ऐसा बोलने वाला शख्स पुरूषवादी मानसिकता से ग्रस्त तो है ही,  जातिवादी भी है और एक औरत को भोग की वस्तु समझता है.

हालांकि यह भी सच है कि वेश्यावृति के लोकप्रचलित पेशे को सत्ता- व्यवस्था से जुड़े सफेदपोश लोगों ने संरक्षण देकर स्थापित किया और जिन लोगों ने समाज में नैतिकता की ठेकेदारी की उन्होंने अपनी अय्याशी के लिये देवों के नाम पर यौन कुंठा को तृप्त करने के लिये ‘देवदासी प्रथा’ को भी स्थापित किया. यही नहीं वर्ण व्यवस्था में उपर के लोगों ने समाज में अपने वर्चस्ववादी- यथास्थितिवादी रूतबे को कायम करने के लिये कालांतर में जाति ही नहीं धर्म तक देखे बिना हर तरह के गठजोड़ बनाने से लेकर राजघरानों में बेटी- रोटी के संबंध स्थापित कर सत्ता में भागीदारी भी सुनिश्चित की. फिलहाल इस पूरे बयान में दलित विरोधी मानसिकता से मायावती को अपमानित करने की नीति है और चरित्रहनन की खतरनाक गंदी साजिश भी है. इस पूरे विमर्श में महिला है, राजनीतिक महिला का चरित्र है, जाति- समाज है, राजनीति है और यौन कुंठायुक्त सेक्स आधारित विमर्श भी शामिल है जिसे समझना बहुत जरूरी है इसी संदर्भ में भारत की राजनीति में कई अदभुत प्रयोग के सफल- असफल होने उदाहरण मिलते हैं. तमिलनाडू में जनता है कि एमoजीoरामचंद्रन की पत्नी जानकी रामचंद्रन के विस्मृत होते जाने के बीच उनकी ऑन-स्क्रीन प्रेमिका जयललिता पाँचवी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाती है. लेकिन वही जनता एनoटीoरामाराव की पत्नी व बेटे को खारिज कर देती है और बगावती दामाद चंद्रबाबू नायडू को मुख्यमंत्री पद पर दुबारा बिठाती है.

पश्चिम बंगाल के भद्रलोक में सामाजिक संरचना पर भारी बौद्धिक- वैचारिक द्वंद्व के बीच पार्टियों से परे सवर्ण नेताओं का राजनीतिक शीर्ष पर पक्ष- विपक्ष में छाये रहने की कलाबाजी गजब दिलचस्प है. विधान चंद्र राय, सिद्धार्थ शंकर रे जैसे कांग्रेसी के बाद घोर वामपंथी ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य और अब तृणमूल पार्टी की दूसरी बार मुख्यमंत्री बनी ममता बनर्जी का फर्क दलों के दलदल व विचार से परे कॉमन सवर्ण सामाजिक पृष्ठभूमि की बुनियाद पर समझना कोई बड़ी बात नहीं है. आनंदी बेन पटेल और वसुंधरा राजे सिंधिया की कौन सी बड़ी खासियत उन्हें अपने राज्य व पार्टी में कद्दावर बनाकर मुख्यमंत्री के ओहदे पर शुमार करती है. शीला दीक्षित दिल्ली की राजनीति में पुराने विरासत के बूते ही टपककर एक कद्दावर मुख्यमंत्री के रूप में शुमार हुई. लेकिन इन तमाम सर्वगुणसम्पन्न एवं सर्वमान्य नामों के बीच मंडलवादी लालू यादव के राजनीतिक संक्रमण काल में उनकी पत्नी राबड़ी देवी का मुख्यमंत्री बनने की घटना पर चुटकुले पेश कर आज भी सवर्ण समाज अपनी कुंठा तृप्त करता है. इस कुंठा की हद तो ये है कि एक दौर में टेलीविजन के एक प्रोमों में लालू- राबड़ी का नाम क्रमश: पुरूष- स्त्री शौचालय के दरवाजे पर लिखकर दिखाया जाता था. सवाल उठता है कि इस तरह के प्रतिबिंबन के पीछे क्या सिर्फ सवर्ण समाज के भाषा- ज्ञान- बुद्धि की श्रेष्ठता ही है या वर्ण व्यवस्था में श्रेष्ठता पर आधारित जातिवाद की मानसिकता है ?

नवभारत अखबार की हेडिंग ‘माया का चरित्र वेश्या से बदतर’ भारतीय मिडिया के
घोर सवर्णवादी सामाजिक चरित्र को बेहतरीन तरीके से उजागर करता दिखता है.



मीरा कुमार कांग्रेस की सुर्खियों में हमेशा इसलिए बनी रहती हैं कि वे एक वक्त में कांग्रेस के लिये गले की हड्डी बने स्व0 जगजीवन राम की बेटी हैं और उनकी पार्टी नाम, विरासत, चेहरे को भंजाना बखूबी जानती है. लेकिन कांग्रेस यह भी जानती है कि ओबीसी सीताराम केसरी को क्यों और कैसे निपटाया जाता है. जाहिर है ये दोनों अगर दलित- पिछड़े नहीं होते तो शायद देश के प्रधानमंत्री भी हो सकते थे. वैसे ही बीजेपी जानती है कि गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे को कैसे निपटाना है और तेलगी मामले से बच गये छगन भुजबल को महाराष्ट्र सदन में बहुजन नेताओं की मूर्ति स्थापित करने की सजा कैसे देनी है? इन सबके पीछे जाति है, जो तमाम सवालों के बीच जाती नहीं बल्कि सभी बातों के मूल रूप से समाई हुई है. एक दौर रहा है जब राजनीति में ट्रेनिंग और ग्रूमिंग का एक कल्चर हुआ करता था. इसके तहत लोहिया, जेपी, कर्पूरी जैसे तमाम नेताओं के सानिध्य में रहकर स्त्री- पुरूष नेताओं की एक बड़ी फौज राजनीति का ककहारा सीखकर लोकसभा- विधानसभा की शोभा बढ़ाते रहे हैं. मायावती के खिलाफ दिये गये बयान के नजरिये से महिला राजनीतिकों की बात करें तो सुषमा स्वराज 70 के दशक में हरियाणा में सबसे कम उम्र की कैबिनेट मिनिस्टर बनीं, जिन्हें प्रारंभिक तौर पर देवीलाल, चंद्रशेखर जैसे लोगों ने आगे बढ़ाया. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की संरक्षण प्राप्त अनेकों महिलाओं ने राजनीति में काफी अच्छा नाम कमाया है,  जिनमें लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन जैसी कद्दावर नेता शामिल हैं.

बीजेपी में आज की वरिष्ठ महिला नेता स्मृति इरानी को आगे बढ़ाने में प्रमोद महाजन और नरेन्द्र भाई मोदी का नाम लिया जाता है. कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू, नारायण दत्त तिवारी, राजीव गाँधी ने भी अनगिनत महिलाओं को सहयोग देकर राजनीति में आगे बढ़ाया, जिसकी एक लम्बी फेहरिश्त है. जाहिर है कि इन महिलाओं की अपनी क्षमता ही इनकी राजनीतिक सफलता में शामिल रही है, लेकिन ग्रूमिंग की पृष्ठभूमि भी इनके साथ काम कर रही थी. अब इस सूची में जितना चाहें नाम जोर सकते हैं कि किसने किस महिला को संरक्षण देकर राजनीति में आगे बढ़ाया लेकिन कभी भी किसी के चरित्र पर किसी पार्टी संगठन के नेता ने सार्वजनिक तौर पर सवाल नहीं उठाया है. यही नहीं मिडिया भी इस मामले में अबतक काफी संवेदनशील रूख अपनाती रही है. लेकिन हाल के दिनों में पक्ष-विपक्ष की राजनीति में एक- दूसरे का सम्मान करना तो दूर छीछालेदर और चरित्रहनन करने को हथियार समझा जाने लगा है. इंदिरा गाँधी की हत्या जिस साल हुई थी उसी साल कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की नींव रखी थी. बहुजनवादी विचार, सशक्त संगठन व सामाजिक संघर्ष की बुनियाद पर राजनीति की नींव कांशीराम जी ने रखी. उस संघर्ष में उन्होंने मायावती को तब से जोड़ रखा था जब किसी के लिये ऐसा सोचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था कि बहुजन समाज पार्टी राष्ट्रीय पार्टी तो दूर कभी राज्य स्तर की पार्टी भी बनेगी. इस लिहाज से कांशीराम जी की दूरदर्शिता का अंदाजा लगाना मुश्किल है, जिसने मायावती को पार्टी का चेहरा बनाया जो इस मुकाम तक पहुँची.

 इस संघर्ष से निकली राजनीति के दौर में कांशीराम लम्बे समय तक सक्रिय नहीं रहे, तो मायावती भी बहुत बदल चुकी थी. बीएसपी की राजनीति को सफल बनाने के लिये मायावती ने सवर्णों से समझौते का रास्ता अपनाया जो कांशीराम की नीति और रणनीति कभी नहीं रही थी. ये मंडल के बाद की राजनीति का दौर था, जब एक पत्रकार आशुतोष ने मायावती- कांशीराम पर अभद्र, अमर्यादित, अश्लील टिप्पणी की जिसके लिये आशुतोष को कांशीराम ने जोड़दार थप्पड़ जड़ा था. उस थप्पड़ की गूँज अब मद्धिम पर गई है लेकिन सवर्णों की अकड़ आज भी कायम है. उधर थप्पड़ खाने वाला पत्रकार खुद नेता बनने चल पड़ा है. आशुतोष जेएनयू में मंडल के उतरार्ध काल में शरद यादव की धोती खींचने, उनकी गाड़ी पर पत्थर मारने की घटनाओं में भी लिप्त रहे है, अब यूथ फॉर इक्वालिटी के आरक्षण विरोधी नायक अरविंद केजरीवाल के साथ उनका राजनीतिक गठजोड़ करना ये सारी बातें यही साबित करती हैं की पत्रकार के ज्ञान और वैचारिक मुखौटे से परे उसकी जाति देखना भी अब उतना ही महत्वपूर्ण है. यही नहीं आशुतोष चांदनी चौक से चुनाव लड़ने जाते हैं तो अपनी जाति के टाइटल वाले पोस्टर चिपकवाते हैं.

मायावती को लेकर किसी दयाशंकर की टिप्पणी को सिर्फ पुरूषवादी होने की बात कहकर मामले को खत्म कर देना भी ठीक नहीं. उत्तर प्रदेश कांग्रेस की महिला नेता रीता बहुगुणा जोशी ने एक बलात्कार की घटना के बाद टिप्पणी करते हुये एक बार मायावती के बलात्कार होने पर ही एक पीड़ित की पीड़ा को महसूस करने की बात कही थी. यही नहीं रीता जोशी ने मायावती की स्थापित मूर्तियों को लेकर कह डाला था कि- मायावती पाँच करोड़ में अपनी एक मूर्ति बनवाती हैं और वह भी काली. उसमें भी पता नहीं चलता कि नाक कहाँ है, और कान कहाँ ? ये सब बातें जाहिर करती हैं कि मायावती के महिला या राजनीतिक होने से ज्यादा ये बयान जाति संदर्भ में थे. फूलन देवी (उत्तर प्रदेश) और भगवतिया देवी (बिहार) ने लोकसभा में अपने अनुभव के बारे में एकबार निजी संवाद के दौरान कमोबेश एक ही तरह की बातें शेयर की थी- “पुरूषों को कौन पूछे कई महिला सांसद नाक- भौं सिकोड़ते हुये, मुँह बिचका कर बचते हुये निकलती हैं जैसे उन्हें बदबू या घिन आ रही हो. बगल में बैठना हो तो कन्नी काट जाती हैं, दूर से निकल जाती हैं. संसद में भी महिला लोग पार्टी से भी ज्यादा जाति- समाज देखकर खुलती हैं और भेंट- बात करती हैं.’’ एक ओबीसी महिला सांसद का हाल ही में कहना है कि- “स्पीकर चेयर पर जब वो (एक महिला) होती हैं तो दलित- ओबीसी के सवाल उठाने पर बहुत इंटरप्शन करती है और जानबूझकर मुद्दा देखकर बोलने ही नहीं देना चाहती हैं.

कई बार तो भ्रम होता है कि मेरे चेहरे से इसको चिड़ या मुझसे कोई नफरत तो नहीं.“ जाहिर है कि सभी औरते एक नहीं हैं और वे भी दलित- आदिवासी- ओबीसी- पसमांदा समाज और उनकी जातियों में बँटी हुई है. सवर्ण महिलाओं और पुरूषों के राजनीतिक एजेंडे एक होते हैं जो उनके अपने सामाजिक- राजनीतिक हित से जुड़ी होती हैं. जहाँ तक आधी आबादी का सवाल है तो सभी सामाजिक वर्ग- समूहों के भीतर उनके हक- हकूक- सम्मान के सवाल हल होते ज्यादा आसानी से दिखते हैं और उन्हें पहली सामाजिक- राजनीतिक स्वीकृति अपने समाज के समूहों के भीतर ही मिलती दिखती है. 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार आने के बाद दलितों को मनोवैज्ञानिक तौर पर लुभाने के लिये संविधान दिवस और आंबेडकर शताब्दी जैसे कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया जा रहा है. लेकिन इन प्रतीकात्मक  हवाबाजी के बीच रोहित वेमुला की घटना, बीजेपी शासित राज्यों में दलित उत्पीड़न, गाय के नाम पर पहले मुसलमान और अब दलितों को निशाना बनाना, दलित- पिछड़ों के आरक्षण को खत्म व खारिज किये जाने की कोशिशे भी तेज हैं. बीजेपी- संघ के नेताओं के हिन्दूवादी- जातिवादी बयान सिर्फ मुसलमानों को ही नहीं दलित- पिछड़ों के आरक्षण को निशाना बनाये जाने का सबूत पेश करता है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार चुनाव के वक्त लालू यादव की बेटी मीसा भारती का उपहास किया था तो उसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा था. इस बार उत्तर प्रदेश के चुनाव की पृष्ठभूमि जब तैयार हो रही है बीजेपी की एक वरिष्ठ महिला नेता मधु मिश्रा ने संविधान- दलितों- आरक्षण के खिलाफ बयान देते हुये कहा कि- “संविधान के कारण ब्राह्मणों की यह स्थिति हो गई है जो कभी जूते सीलते थे वो राज चलाने लगे हैं.“ गुजरात में हार्दिक पटेल से किसी तरह छुटकारा पाने की जुगत में लगी बीजेपी का गाय और दलितों को लेकर बवाल में फँसना – इनसे मुक्ति का मार्ग तलाशने के लिये इसबार दयाशंकर ही मोहरा बना है. जैसे रोहित वेमुला और एचसीयू से मुक्ति के लिये कन्हैया और जेएनयू बीजेपी के लिये एक मुक्ति का मार्ग बना था. अब यूपी बीजेपी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष दयाशंकर का बयान साबित करता है कि ये अकारण नहीं है बीजेपी की रणनीति का ही अंग है. उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग में मायावती पर अश्लील टिप्पणी के बाद दयाशंकर से पहले पल्ला झाड़,  लेना लेकिन फिर उसके परिवार के सम्मान का मुद्दा बनाकर बीजेपी अब यूपी की राजनीति को अपने पाले में करने की कोशिश कर रही है. देशभर की सवर्ण मिडिया भी बीजेपी के मुहिम में मायावती के खिलाफ ज्यादा सक्रिय और दयाशंकर के परिवार के प्रति सहानुभूति का माहौल तैयार करती दिखाई देती है. लेकिन इसी बीच लोकतंत्र के सभी स्तंभ तथ्यपरक विश्लेषण से दूर होते जा रहे हैं और हर सत्ताकेन्द्र सामाजिक संरचना के हिसाब से अपना पक्ष- विपक्ष- रूख तय कर रहे हैं.

 इसी कड़ी में रायपुर का नवभारत अखबार की हेडिंग ‘माया का चरित्र वेश्या से बदतर’ भारतीय मिडिया के घोर सवर्णवादी सामाजिक चरित्र को बेहतरीन तरीके से उजागर करता दिखता है. मायावती दलित है और बहुजनवादी लोग मिडिया में नहीं हैं तो उसके लोग सड़कों पर उतर कर विरोध दर्ज करा रहे हैं. वहीं बीजेपी – संघ और सवर्ण मिडिया मिलकर देश की राजनीति को दोजख बनाने पर तुले है. दलित, आदिवासी, मुसलमान इनके नंबर एक निशाने पर है फिर ओबीसी को भी ये व्यवस्था के बाहर हाशिये पर ढकेलने में लगे है. बहुजन समाज पार्टी के लोग जो अपनी नेता के सम्मान मे कर रहे हैं उस पर नैतिकता का प्रवचन बाँच रहे लोगों को याद कर लेना चाहिये कि ये सब स्वाभाविक प्रतिक्रिया के ही तौर पर है, जिसकी दुहाई नरेंद्र मोदी, संघ-बीजेपी के लोग गुजरात दंगों के समर्थन में आजतक देते है. देशभर में जो भी इस वक्त हो रहा है इन सबका सूत्रधार संघ- बीजेपी है. अगर दयाशंकर की बहन- बेटी की इज्जत है, तो बहन मायावती की भी इज्जत है और सम्मान तो सभी महिलाओं का बराबर होना चाहिये. लेकिन सवाल महिलाओं का नहीं जाति का है. अगर महिला का सवाल जाति से बड़ा होता तो वह दयाशंकर की पत्नी मायावती को ‘वेश्या से बदतर’ घोषित किये जाने पर अपने पति के समर्थन में चुप्पी साधकर और अपनी बेटी को आगे करके उसके सम्मान का सवाल उठाते हुए मामले को इमोशनल टर्न दिलाने की कोशिश नहीं कर रही होती. फिर एक माँ- पत्नी- बेटी को सामने खड़ा करके दयाशंकर के बहाने उच्च जाति को गोलबंद करने की मिडिया इवेंट पर आधारित रणनीति बीजेपी-संघ और सवर्ण मिडिया नहीं करती.

मायावती और बीएसपी कार्यकर्ताओं के आक्रामक  तेवर से सवर्ण समाज काफी बेचैन दिखाई दे रहा है, लेकिन काश देशभर में दलितों के रेप पर देश का पूरा सवर्ण समाज अपने बलात्कारी भाइयों के खिलाफ ऐसे ही खड़ा हो पाता. इतिहास में जाकर भले ही लोग बता रहे हो कि मायावती फलां-फलां घटना में चुप थी तो हमारे बहुजनों के दुख-पीड़ा पर उनके नेताओं की चुप्पी या मजबूरी को उदाहरण बनाने का हक कम से कम सवर्ण समाज को नहीं है. सत्ता, संसाधनों, तंत्रों, व्यवस्था पर ठेकेदारी अबतक सिर्फ उच्च जाति की रही है और वर्ण-जाति व्यवस्था पर आधारित समाज में सारी कुव्यवस्था का  जनक-  पोषक सिर्फ देश का मनुवादी- ब्राह्मणवादी तबका रहा है जिसमें बहुजन सिर्फ भुक्तभोगी है. फिलहाल राजनीति में विचार- चरित्र- नैतिकता को तार- तार कर देने वाले इन बयानों के बीच दलित बीएसपी के पक्ष में गोलबंद हो रहा है तो शीला दीक्षित को आगे करने की रणनीति से ब्राह्मणों को कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद होता देख, बीजेपी सवर्णों को येन- केन- प्रकारेण एकजुट करने में लगी है. वहीं अखिलेश अपने परिवार के दुर्गम- दुरूह राजनीतिक किले को बचाने की जुगत में लगे हैं.