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गुनिया की माई

सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com

विवाह के छः वर्षो के बाद गाँव जाना मेरे लिए रोमांचक था, पिताजी ने नौकरी मिलते ही शहर में मकान बनवा लिया, यही हम पाँचों भाई-बहनों का जन्म हुआ. गाँव में बिजली पानी के अभाव के कारण बड़ी बहन गाँव जाने में मुँह सिकोड़ती, छोटी मासूम और संकोची जिसके कारण माँ उसे साथ ले ही नही जाती, बचती मैं, माँ की हरफनमौला बेटी मैं गाँव जाने के नाम पर स्कूल तक छोड़ देती. गाँव मेरे लिए प्रकृति की सुन्दर झाँकी थी, बाग-बगीचे, खेत-खलिहान, लड़कियों की स्वच्छन्द हँसी, बड़े बुजुर्गों का हास-परिहास मुझे बहुत गहरे तक छूता, कहना न होगा कि यही मेरे अन्दर के साहित्यिक कीड़े को पोषण  मिला. माँ कहती है कि मैं झटपट बन्ना-बन्नी और सहाना (गीत) बना लेती थी और हमारी टोली के गीत आकर्षक हो जाते थे. यहाँ जीवन संगीत उद्दान बहता है वसन्त में आम के मौर, महुए की सुगंध के साथ-साथ कोयल की मधुर तान वातावरण में उल्लास और उमंग भरता दुवार पर मण्डली जमती फगुवा, चैता, बिरहा, का दौर आधी रात को अपने चरम पर पहुँचता. अम्मा बड़ी माँ के साथ खिड़की में बैठकर सुनती और कभी-कभी डायरी में लिखती थी. मीरा के पदों को फगुवा के धुन पर अम्मा बड़ी खूबसूरती से गाती-
‘‘मन मोहे मुरलिया वाला सखी……….-2
अधर सुधा रस मुरली राजत, उर वैजन्ती माला सखी…

अम्मा के गले में मृदंग बजता, खनकदार आवाज और गजब की क्षमता घंटो अकेले गाती. होली में औरतों की टोली आँगन में और पुरुष दरवाजे पर फगुवा गाते, औरतें कीचड़, मिट्टी, रंग,पानी,आदि लम्बा घूँघट तान कर दूर से फेंककर भाग जातीं, पुरुष और जोश में गाते. पुरोहित जी एक बहुत सुन्दर गीत गाते जो मुझे आज भी याद है. करि पूजन की तैयारी, विदेह कुमारी / सब सखियाँ मिल पूजन करती, पहनी गुलाबी साड़ी… विदेह…
मंगल यादव नहले पर दहला मारते / पिया कई गईलें कवल करार
फगुनवे मेें आये….फगुवा के बाद चैता की बारी आती…. माँ का गाया चैता…
‘‘बन गईलीं बन की जोगिनियाँ हो रामा. पिया के करनवा मैं अक्सर अपनी मण्डली में आज भी गाती हूँ. मैनें देखा है ग्राम्य जन-जीवन का सहज और सरल प्रवाह लोक-गीतों में देखने को मिलता हैं.रोपनी करते हुए एक लय में श्रमगीत गाती औरतों का कंठ और हाथ एक साथ चलता.

कहानी आगे बढ़ाती हूँ क्योंकि लोक-गीतों पर लिखते-लिखते कहानी उपन्यास हो जाएगी. बाबा के मृत्यु के बाद आँगन में दण्डवार पड़ा पुस्तैनी बड़ा आँगन सिमट गया. बाबूजी की नौकरी व्यवसाय और शिक्षक संघ की राजनीति के कारण गाँव की सारी जिम्मेदारी अम्मा पर आन पड़ी, अम्मा अब फसल के दिनों में गाँव जाती, चौखट लांघ खेतों के मेढ़ पर खड़े हो खाद-बीज, रोपनी सोहनी सब कराया, आलोचकों के दौर  चले, इन सब से बिना डरे माँ मोर्चे पर डटीं रहीं, पिताजी ने समर्थन किया.खूब पैदावार होती, विरोधी परास्त हो घर गए. गाजीपुर का परगना पचोत्तर सब्जी के बेल्ट के रुप में विख्यात है, उँगली से जमीन कुरेद के बीज बो दो लौकी, कोहंड़े, भतुवा, नेनुवा की बेलें पड़ोसी के छप्पर लांघकर दुश्मनों तक के छत पर विजय पताका फहरा आती. बाबा के मरने के पहले हम गाँव बहुत कम जाते, जिसके कारण लोगों से घुलना-मिलना नहीं हो पाता किन्तु उनके मरते ही गाँव जाने का जो क्रम शुरु हुआ वह विवाह तक अनवरत चलता रहा. मेरे सामने पहली बार लम्बे प्रवास पर जो समस्या उत्पन्न हुई वह टोले की लड़कियों से मित्रता  करना था, लड़कियाँ हमारे शहरी विशिष्टता से दूर भागती और मैं अन्दर-अन्दर दुखी रहती.

 माँ ने उपाय निकाला, मेरे तीन सलवार कुर्ते को मिलाकर तिरंगा झण्डा पहनाया लाल फीते से चोटी बाँधी मैंने शीशे में देखा, बिल्कुल उनके जैसी भर डाली चना देकर बड़े पिताजी के बेटी के साथ भरसाँय भेजा.भरसाँय गाँव के बाहर था, शाम होते ही पूरे गाँव की लड़कियों और औरतों का हुजूम उमड़ता, गोड़िन गुनिया की माई बारी-बारी से सबका भूजा भुनती, कई बार आपस में औरतें लड़कियाँ लड़ पड़तीं, गुनिया की माई कलछुल पटककर खेदती, ‘‘ई-हमार भरसाँय है तोहन लोगन क दुवार ना.’’ एक तरफ कुँवर बाबा की पिण्डी बड़े से चबुतरे पर जहाँ बच्चे उछल-कूद करते, दूसरी तरफ चार खल करीने से लगे जहाँ एक लय में तीन-तीन चार-चार औरतों के मूसल गिरते, औरतें हरे धान का चूड़ा कूट रहीं थी. मुझे देखते ही चहक उठी अरे गुनिया महरानी जी के बोड़ा बिछाव’’, शिकायत किया, ‘‘काहें छोटकी मलकिन तोहें भेजली धिया, संदेशा पठवती गुनिया जा केले आवत’’आज लेट अइसे ही होत रहल.’’ गुनिया मुझसे एक साल बड़ा था, उस वक्त चैदह वर्ष का रहा होगा, ब्याह हो गया था, पत्नी गौने थी. गुनिया हमारे घर बचपन से आता था, माँ उसे अनाज दे देती और वह शाम को भुजा कर दे जाता. कभी-कभी दिन में उसकी माँ भी आती, घर में झाड़ू लगाना लिपना पोतना आदि कर जाती, अम्मा हमारे कपड़े अपनी साड़ियाँ जब भी गाँव आती ले आतीं और गुनिया की माई को देतीं, त्योहारों में नये देती, तरज-त्योहारी देना कभी नहीं भूलती.

हम गुनिया की माई को काकी कहते और वो हमें अधिकतर महरानी कहती. गुनिया और उसकी छोटी बहन गुनिया को छोड़कर पिता जो परदेश कमाने गये दोबारा लौट कर नहीं आये, उसने हार नहीं माना अकेले अपने दम पर बच्चों को पाला और भर माँग पियर सिन्दूर भरे बाट जोहती रहीं कि कभी तो परदेसी लौटेगा. माँ का उपाय सार्थक सिद्ध हुआ मेरा तिरंगा परिधान विजय गीत गाता वापस लौटा, शीघ्र ही मुनिया, कनक और सीमा सखी बनीं, हमने कुँवर बाबा के थान पर शपथ लिया कि कभी मित्रता नहीं तोड़ेंगे. दोपहर में मेरा दलान गुलजार हुआ लड़कियां मेजपोश के कपड़े लेकर आतीं और हम सब अम्मा से कढ़ाई सीखते, कभी-कभी फिल्मी गीतों के धुन पर गीत बनाते. शाम को हमारी टोली बाग की ओर जाती जहाँ सगड़ा पर बने पुलिया पर बैठकर पंचायत होती, योजना बनती, टोले भर की बहुओं की नकल उतारी जाती. मनचले उधर से गुजरते तो कनक तमक कर कहती- का ताकत हवे रे,  माई-बहिन ना हई का.’’ लड़के फुर्र हो लेते.इनके साथ ही मैंने सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, कूटना, फटकना सीखा. पहली बार अम्मा की चोरी चूड़ा कूटा, हाथों में छाला पड़ा तब जाना हरे धान के मीठे चूड़े का रहस्य.गुनिया का गौना हुआ, कनिया (नयी दुल्हन) देखने का प्लान बना, लाख मनाहट के बाद भी दोपहर में हमारी शैतान मण्डली मुनिया के साथ घर पहुँचा.

खपरैल का टूटा-फूटा मकान जिसे छा-छोपकर किसी तरह रहने लायक बनाया गया था. दरवाजे पर देशी गाय बँधी थी जिसे गुनिया की माई ने इसी वर्ष खरीदा था ताकि बहू को गोरु की कमी न खले. हमारे आँगन में धमकते ही खुश हो गयी, बहू की कोठरी में जाकर बेटे से कहा- ‘‘पंडिताने की लड़कियाँ कनिया देखने आयी हैं.’’ गुनिया लजाते हुए बाहर निकला, लड़कियों का समवेत ठहाका गूँजा. गुनिया की पत्नी साँवली-सलोनी, तीखे नैन नक्स, उम्र कोई-पन्द्रह सोलह वर्ष, पियरी पहने बोरा पर गठरी बनी बैठी थी. मुनिया ने घूँघट उठाकर मुँह दिखाया, उसने दोनों आँखें बंद कर रखी थी. कुछ देर मुनिया भाभी के हाथ के बने कढ़ाई, सिलाई के सामान दिखाती रही. गुनिया की माँ ने बहू का घूँघट उठा कर कहा इनसे का लजात हऊ, इन्हने लोगन क सेवा- टहल बजावे के है, बहू का चेहरा स्याह हो गया.अगली छुट्टियों में बड़े पिताजी की हमउम्र बेटी का ब्याह पड़ा मैं ग्रेजुएशन अंतिम वर्ष की छात्रा थी, गुनिया दो बच्चों का बाप बन चुका था, काकी सुबह-सुबह ही आ धमकती बर्तन-चैका, झाड़ू- बहाड़ू लगा कर माँ का पैर दबाती कभी हमारे पैरों में भी तेल लगाकर मालिश करती.

 लावा वाले दिन हम सब गाते-बजाते भरसाँय पहुँचे, गुनिया की माँ लावा लिए पहले से बैठी थी, गुनिया भरसाँय झोंक रहा था, पत्नी दाना भूज रही थी. रस्म खत्म होने पर सबने नेग दिया, मैंने कहा-‘‘काकी अब आप को आराम मिला बहू ने काम सम्भाल लिया.’’काकी रुआँसी हो गयी- ‘‘अरे का धिया कपूत परदेस कमाये जो ए कहत हऊँ.’’ गुनिया तमतमा उठा, लाठी फेंककर उठते हुए चिल्लाया-‘‘त का जिनगी भर इ-बभनन क जूठ चाटी’’ गुनिया के बागी तेवर अप्रत्याशित थे, बड़ी माँ ने सबको चलने का इशारा किया गुनिया की माई रोती रही, एम0ए0 अन्तिम वर्ष में मेरी भी शादी हो गयी. गाँव सपना हो गया, मायके जब जाती गाँव का प्रोग्राम बनता और बिगड़ता, छः वर्ष बीत गए, मैं दो बच्चों की माँ हो गयी. अबकी माँ ने दृढ़ संकल्प किया दो बच्चें हो गए और अभी तक शादी की पूजा बाकी है. हम निश्चित समय पर गाँव पहुँचे, कनक और सीमा भी मायके आयी हुई थीं, मिलते ही समय पंख हुआ. अगले दिन दिनभर पूजा-पाठ चलता रहा, शाम को माँ से कहा- ‘‘काकी नहीं आयी मैं उनके लिए साड़ी लेकर आयी थीं, बड़ा कर्ज है उनका कितनी सेवा की है. माँ ने मुस्कुराते हुए
कहा-‘‘कहलवाया तो था, शायद बीमार हो, आजकल बहुत अस्वस्थ रहती हैं, तुम जाकर मिल आओ, इस समय भरसाँय में  मिल सकती हैं.

मैं सखियों संग भरसाँय चली. दूर से ही भरसाँय ठण्डी दिखाई दे रही थी. गुनिया की माई कुँवर बाबा के पास वाले टीले पर बैठी ना जाने देर शून्य में क्या निहार रही थी ? जो देखा वह स्तब्ध करने वाला था, अब गुनिया की माई बाट जोहती है कि लड़कियाँ भर-भर डाली अनाज लेकर आएंगी और उसकी मड़ई गुलजार होंगी. ओखल इधर-उधर लुढ़के पड़े थे. मुझे देखते ही बुढ़िया मैली साड़ी के कोर से आँसू पोछते हुए बोली. ‘‘इ का हो रहा है बहिनी, अब, न कोयी कलछुल में लिट्टी पकवाता है न आगी माँगता है, लोग चूड़ा बालेश्वर बाबा के मशीन पर कूटाते हैं, हित-नाथ को रस-दाना नहीं, चाय नमकीन देते हैं. लड़कियाँ अब एक -दूसरे के घर कम ही जाती हैं, काहें प्रेम मर रहा है और फफक पड़ी. मैंने चुप कराते हुए माथे पर साड़ी रख हथेलियों पर पैसा रखा अनायास ही सर पैरों की ओर झुक गया उनकी सेवा मातृत्व से तनिक कम नहीं थी,

बुढ़िया ने लपकर हाथ थाम लिया, ‘‘काहें जनम नाश कर रही हैं महरानी जो, मरद छोड़ गया, अब गुनिया भी परदेश कमाता है, मेहर बच्चों को भी ले गया. कहाँ भरुँगी. मेरा गला रुँध गया, आवाज कंठ में फँस गयी, सीमा खिंचते हुए लेकर चली. आते हुए मुझेे अपने ही बनाये गीत पर क्रोध आ रहा था-‘‘मोहें शहरी पिया दिलादो मेरी माँ/गंवार पिया ना आवेला.’’ कुँवर बाबा का चबुतरा टूट-फूट गया था सबके दुवार अब  चाहरदीवारी में कैद हो चुके थे, बच्चे कान्वेन्ट में शहर पढ़ने जाते हैं, आँगन में चार-चार दण्डवार पड़ चुके थे, बाग-बगीचे उजड़ रहे हैं, सगड़ा पाट कर परधान ने कब्जा जमा लिया था, मेरे बाबा का बनवाया हुआ बंगला जहाँ पंचायत लगती थी, चारो गाँव के बारात डेरा डालते थे अब उजड़ कर अपनी विवशता पर सुबक रहा था. आत्मा चित्कार उठी- ‘‘उफ्फ, महज आठ वर्षों में मेरा गाँव शहर बन गया.’’

*‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ : यथार्थवादी कॉमेडी

जावेद अनीस

एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com
javed4media@gmail.com

भारत में एक बार आप राजनीति और सरकार पर क्रिटिकल होकर बात तो कर सकते है लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक मसलों पर ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है. “मिस टनकपुर हाजिर हो” यह काम करती है, ऐसे विषय पर फिल्म बनाना दुर्लभ और जोखिम भरा काम है और इसका स्वागत होना चाहिए, अपने ट्रीटमेंट की वजह से भले ही यह फिल्म एक सोशियो-कल्चरर  सटायर बनते बनते रह गयी है,फिर भी इसे इग्नोर नहीं किया जा सकता है, यह फिल्म भारतीय समाज के सेक्सुअलिटी, पिछड़ेपन, दोहरेपन और सामंतवादी जैसी प्रवृत्तियों पर एक बेबाक बयान है, यह बताती है कि कैसे आज भी इस देश के कई हिस्सों में पालतू मवेशियों और औरतों में कोई ख़ास अंतर नहीं किया जाता है और वे भी किसी मूंछवाले के घर के किसी खूटे में बंधी होने को अभिशप्त हैं.जैसा की होना ही था अपने सब्जेक्ट के वजह से इस पर जबरदस्त हंगामा हुआ, रिलीज होने से पहले ही फिल्म का इस हद तक विरोध हुआ कि यूपी के मुजफ्फरनगर जिले के एक खाप ने इसे आपत्तिजनक और समाज को गलत दिशा देने वाली फिल्म बताते हुए फरमान सुनाया दिया कि जो भी व्यक्ति  निर्देशक विनोद कापड़ी का सिर कलम करके लाएगा उसे 51 भैंस इनाम में दी जाएगी और साथ में धमकी भी दी गयी कि जिस भी थियेटर में फिल्म चलाई जाएगी वहां आग लगा दी जाएगी. रिलीज होने से पहले ही यह फिल्म खाप के साथ–साथ सिने-प्रेमियों और फिल्म जगत के दिग्गजों का ध्यान भी खीचने में कामयाब रही थी, सबसे पहले तो इसके पोस्टर ने कौतुहल पैदा किया जिसमें एक भैंस अदालत में खड़ी होती है और उसके पीछे कटघरे में एक दूल्हा खड़ा नजर आता है साथ ही पोस्टर में लिखा होता है “’इट्स हैपेंस ओनली इन इंडिया’

इस फिल्म का ट्रेलर भी इतना दिलचस्प था कि अमिताभ बच्चन ने भी इसके बारे में ट्वीट करते हुए ट्रेलर का लिंक भी शेयर किया. राजकुमार हिरानी के तरफ से भी ट्रेलर की तारीफ देखने को मिली. “’मिस टनकपुर हाजिर’ हो” पूरी तरह से कॉमेडी फिल्म नहीं है, यह एक यथार्थवादी फिल्म है जो समाज के ट्रेजडी को व्यंग्य के साथ पेश करती है, फिल्म “नाच बसंती नाच कुत्तों के सामने नाच” जैसे आईटम सांग से शुरू होती है, हलके-फुल्के हास्य के साथ पहला एक घंटा जैसे ही पार होता है इस कहानी की कॉमेडी ट्रेजडी में तब्दील हो जाती है और एक दर्शक के तौर पर आप का सामना यथार्थ से होने लगता है. फिल्म की कहानी राजस्थान की एक सच्ची घटना से प्रेरित है जिसमें भैंस से कुकर्म के आरोप में एक युवक पर मुकदमा चलाया गया था. यह फिल्म बेमेल विवाह, जोखिम भरी प्रेम कहानी और गावं के  पंचायतों के मध्यकालीन बर्ताव की दास्तान है. फिल्म की पृष्ठभूमि में हरियाणा का एक गांव टनकपुर है. टनकपुर का प्रधान सुआलाल गंदास (अनु कपूर) है जो कि बूढ़ा और नपुंसक होता है लेकिन अपने दौलत और प्रभाव के बल पर उसने अपने से काफी छोटी उम्र की लड़की माया (ऋषिता भट्ट) से शादी की होती है, अपनी नपुंसकता को लेकर उसे अपनी युवा बीवी के ताने भी सुनने पड़ते हैं, इसी चक्कर में वह अपने “मर्दानगी ताकत” को बढ़ाने के लिए नीम–हकीमों का चक्कर काटता रहता है और अपनी बीवी पर शक भी करता है. उसका शक सही भी होता है, माया को गावं में बिजली ठीक करने वाले लड़के अर्जुन (राजीव बग्गा) से प्यार हो जाता है जोकि पुलिस में भरती होने की तैयारी भी करता है.



इनके रिश्ते में सहानुभूति का पुट भी होता है. लेकिन इन दोनों का प्रेम ज्यादा दिनों तक छुपा नहीं रह पाता है और एक दिन सुआलाल दोनों को रंगे हाथों पकड़ ही लेता है, सबसे पहले वह अर्जुन के हाथ-पैर तुड़वाकर उसे बैलगाड़ी में बांध कर हवा में लटका देता है. लेकिन बदनामी के डर से सुआलाल एक कहानी गढ़ता है जिससे लाठी भी ना टूटे और सांप भी मर जाए, वह बाहर सार्वजनिक रूप से सबको बताता है कि अर्जुन ने उसकी भैंस “मिस टनकपुर” के साथ दुष्कर्म किया है. टनकपुर का प्रधान अपने पैसे और रुतबे के बल से थानेदार (ओम पुरी) को अपने साथ मिला लेता हैं और अर्जुन पर भैंस के साथ बलात्कार का मामला दर्ज हो जाता है, बाद में गांव की पंचायत जो की अपने आपको सभी अदालतों व कानून से ऊपर मानती है, आरोपी युवक को भैंस से शादी करने का हुक्म सुना देती है. परदे पर सभी किरदार असल लगते हैं, अनु कपूर और ओम पुरी, संजय मिश्रा, रवि किशन जैसे अभिनेता निराश नहीं करते हैं. राहुल बग्गा अर्जुन के किरदार को बखूबी निभाते हैं अपनी खामोशी और भाव से प्रभाव छोड़ते हैं. ऋषिता भट्ट इस फिल्म की कमजोर कड़ी है, वे माया जैसी किरदार के कश्मकश और पीड़ा को उभार पाने में नाकामयाब रही हैं, भैंस के सामने उनका दुखड़ा रोने वाला दृश्य बहुत प्रभावी हो सकता था, हालाँकि स्क्रिप्ट में भी उनका किरदार उभर नहीं पाया है. भीड़ के दृश्यों में शायद हापुड़ जिले के ग्रामीणों का इस्तेमाल किया गया है जो की दृश्यों को वास्तविक बनाने में मदद करते हैं.

निर्देशक विनोद कापडी के पास पत्रकारिता का लम्बा अनुभव है, इसका असर उनके निर्देशकीय प्रस्तुतिकरण में भी साफ़ झलकता है, जो कहीं न कहीं उनकी सीमा भी बन जाती है, इससे पहले वे ‘अन्ना हजारे’ पर एक वृत्तचित्र और डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘शपथ’ भी बना चुके है, ‘शपथ’ को नेशनल अवॉर्ड भी मिल चूका है, इसमें देश में महिलाओं के लिए शौचालय की कमी का मुद्दा उठाया गया था. अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि फिल्म बनाने की प्रेरणा उन्हें राजकुमार हिरानी से मिली है. फिल्म में कई सामाजिक मुद्दों को छूने की कोशिश की गयी है, जिसमें अंधविश्वास, बेमेल-शादी और उससे होने वाली समस्याओं, प्रभावशाली समूहों की दबंगियत, कमजोर समूहों की हताशा और इससे उपजी मजबूरियां और दब्बू सोच, खाप और पंचायतों की जकड़न, औरतों के साथ गैर-बराबरी का बर्ताव, लोकल राजनीति और इन सब में स्थानीय सरकारी मशीनरी की संलिप्तता जैसे मसले शामिल हैं. लेकिन फिल्म का अंत अपने आपको देश में दर्ज होने वाले सिर्फ झूठे आरोपों और मुकदमों से जोड़ कर सीमित कर लेती है. निश्चित रूप से विनोद कापड़ी में मुद्दों की पकड़ और उसे समझने की दृष्टि है, बस उन्हें एक पत्रकार से आगे बढ़कर इसे सिनेमा की भाषा में ट्रांसलेट करने में अभ्यस्त होना पड़ेगा. इन सब के बावजूद यह पत्रकारिता से फिल्म में उतरे एक शख्स द्वारा ईमानदारी के साथ बनायी गयी फिल्म है जो अपने आपको हमारे समाज के यथार्थ के साथ जोड़ने का प्रयास करती है, जमीनी सच्चाईयों के साथ इसका जैसा ट्रीटमेंट उस पर आप विश्वास कर सकते हैं. विनोद कापड़ी के अगली फिल्म का इन्तेजार रहेगा.

एक कविता पाब्लो नेरुदा के लिए

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

12 जुलाई 1904 को पाब्लो नेरुदा का जन्म हुआ था. पाब्लो को समर्पित मंजरी श्रीवास्तव की कविता ‘पाब्लो नेरुदा के लिए’, आइये पढ़ते हैं पाब्लो को याद करते हुए 

पृथ्वी के एक छोर पर खड़े होकर
तुमने फैलाई
अपनी अपरिमित, असीमित बाँहें
और समेट लिया अपनी बाँहों में ‘इस्ला नेग्रा’, ‘मेम्यार’ के अंचल से लेकर
पूरा विश्व
पूरी पृथ्वी
पृथ्वी को अपनी बाँहों में समेटकर चूमते हुए
तुमने लिखीं
बीस प्रेम कविताएँ
और लिखा
निराशा का एक गीत
बीस वर्ष की अपनी बाली उमर में

आज की रात भी
उतनी ही प्रासंगिक हैं
तुम्हारी लिखी
सबसे उदास कविताएँ
जो तब की रातों की जान हुआ करती थीं
नेरुदा

शुरू हुईं तुम्हारी कविताएँ
एक तन में
किसी एकाकीपन में नहीं
किसी अन्य के तन में
चाँदनी की एक त्वरा में
पृथ्वी के प्रचुर चुम्बनों में
तुमने गाए गीत
वीर्य के रहस्यमय प्रथम स्खलन के निमित्त
उस मुक्त क्षण में
जो मौन था तब.
तुमने उकेरी रक्त और प्रणय से अपनी कविताएँ
प्यार किया जननेन्द्रियों के उलझाव से
और खिला दिया कठोर भूमि में एक गुलाब
जिसके लिए लड़ना पड़ा आग और ओस को
और इस तरह समर्थ हुए तुम गाते रहने में.

तुमने मुक्त कर डाला प्रेम को वर्जनाओं से
देह की वर्जनाओं को तोड़ते हुए
तुमने रचा काव्य सर्जना का वह रूप
जो काम- भावना का पर्याय था.

पाब्लो नेरुदा

तुम्हें नहीं पसंद आईं कभी
रूह की तरह पाक-साफ कविताएँ
तुमने तोड़ डालीं कविताओं की ‘वर्जीनिटी’
और लगा दिए साहित्य के पन्नों पर
खून के धब्बे
कविताओं का ‘हाइमेन’ विनष्ट कर
तुमने कर डाली सौंदर्यशास्त्र की व्याख्या
एक ऐसे नए रूप में
जिसे आज भी देख लेने भर से
तेज हो जाती है खून की रफ़्तार
रगों में
तुमने कविताओं पर लगा दिए दाग़
जूठन के
खर-पतवार के
धूल-धक्कड़ के
और कल-कारखाने की कालिख कलौंछ के
और इन ‘कुरूप’ कविताओं को
लोकल से ग्लोबल बनाकर
समेटा इस कुरूपता के सौंदर्यशास्त्र को
अपनी बाँहों में
पश्चिमी से पूर्वी गोलार्द्ध तक
और बन गए विश्वकवि

तुमने पैदा किये खून में शब्द
और शब्द से ही दिया खून को खून
और जिन्दगी को जिन्दगी
आज भी हमारे रगों के खून में जिन्दा है
तुम्हारे खून की गरमाहट
नेरुदा

अभी तक बचाकर रखी है तुमने
अपनी प्रेम कविताओं में
प्रेम के मुहाने पर
आँसुओं के लिए थोड़ी-सी जगह
और प्रेम की कब्र भरने के लिए
अपर्याप्त मिट्टी
प्रेम के स्याह गड्ढों को पाटने के काम आ रही है
आज भी
आँसुओं से गीली वह मिट्टी

किसी ने देखा और तुम्हें बतलाया
समय का खेल देखना
तुम्हारी जिन्दगीयों  के प्रहर
मौन के ताश के पत्ते
छाया और उसका उद्देश्य
और तुम्हें बतलाया
की क्या खेलो
ताकि हारते जाओ
और तुम हारते रहे अपनों से
जो नहीं जानते थे
कि
तुम लड़े रोशनी के बीच उनके अंधेरों से

तुमने पैदा किया शब्द को
रक्त में
पाला स्याह तन में
स्पंदन दिया अपनी थरथराती उँगलियों से
और उड़ाया अपने काँपते रसीले होंठों से
यही शब्द और सामान्य जन की वाणी
दोनों मिलकर बने तुम्हारी कविता
तुमने किया
अपनी उन अनजान कविताओं से रूखे स्नेह से प्यार
सिर्फ इसलिए
क्योंकि
तुम्हें लगता था
कि
तुम्हारा सारा दुर्भाग्य इस कारण था
कि एक बार उसने छितरा दिए थे तुम पर
अपने केश
और ढँका था तुम्हें
अपनी छाया में.
अपने इस रूखेपन को दूर करने के लिए
तुमने माँगा था
पृथ्वी से, अपनी नियति से
वह मौन
जो कम-से-कम तुम्हारा अपना तो था.

न सह सके तुम मौन का विशाल बोझ
धारण करते ही मौन
काँप उठे तुम
बेध गई तुम्हें तेज हवा
और उड़ गया फाख्ते के साथ तुम्हारा हृदय
ढह गया मौन का प्राचीर
पर
यकीन है मुझे
जीवित हो अब भी तुम कल की राख में
और अगर हो गए हो मृत
तो भी जन्म लोगे
कल की राख से.

स्त्रियों ने रंगमंच की भाषा और प्रस्तुति को बदला: त्रिपुरारी शर्मा

बहू और काठ की गाड़ी जैसे चर्चित नाटकों की लेखिका और नाट्य निदेशक त्रिपुरारी शर्मा से स्त्रीकाल के लिए रेणु अरोड़ा, हिन्दी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, राजेश चंद्रा, संपादक समकालीन रंगमंच और संजीव चंदन,संपादक स्त्रीकाल ने बातचीत की. अपनी विस्तृत बातचीत में उन्होंने भारतीय नाटक में जेंडर और जाति के विविध  पहलुओं पर बात की. अभिनेत्रियों और स्त्री -निदेशकों के प्रभाव और महिला आन्दोलन में नाटकों के इस्तेमाल को स्पष्ट किया. यह बातचीत थियेटर की एक ऑनलाइन क्लास की तरह है.
देखें पूरा वीडियो :

प्रकृति के लिए महिलाएं

उपासना बेहार

लेखिका  सामाजिक कार्यकर्ता हैं और महिला मुद्दों और बाल अधिकारों को लेकर मध्यप्रदेश में लम्बे समय से काम कर रही हैं संपर्क :’
upasana2006@gmail.com

महिलाओं का शुरू से ही प्रकृति से निकटतम का संबंध रहा है. एक तरफ वो प्रकृति की उत्पादनकर्ता, संग्रहकर्ता तो दूसरी तरफ प्रबंधक, संरक्षक की भूमिका निभाती रही हैं. महिलाओं ने इसकी रक्षा के लिए कई आदोंलन चलाये और अपने प्राण देने से भी नही हिचकचायी. महिलाओं के पर्यावरण-संरक्षण में अतुलनीय योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. ये आन्दोलनकारी महिलाएं एक बात अच्छे से जानती थी कि स्वच्छ पर्यावरण के बिना जीवन नहीं हैं और पर्यावरण को बचाकर ही जीवन को सुरक्षित रखा जा सकता है. अगर हम पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ करेगे तो उसका खामयाजा आने वाली कई पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ेगा. देश में हुए कई पर्यावरण-संरक्षण आंदोलनों खासकर वनों के संरक्षण में महिलाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इन आन्दोलनों पर अगर नजर डाले तो अमृता देवी के नेतृत्त्व में किये गए आन्दोलन की तस्वीर सबसे पहले आती है, वर्ष 1730 में जोधपुर के महाराजा को महल बनाने के लिए लकड़ी की जरूरत आई तो राजा के आदमी खिजड़ी गांव में पेड़ों को काटने पहुचें तब उस गांव की अमृता देवी के नेतृत्त्व में 84 गाँव के लोगों ने पेड़ों को काटने का विरोध किया, परंतु जब वे जबरदस्ती पेड़ों को काटने लगे तो अमृता देवी पेड़ से चिपक गयी और कहा कि पेड़ काटने से पहले उसे काटना होगा तब राजा के आदमियों ने अमृता देवी को पेड़ के साथ काट दिया, यहाँ से मूल रूप से चिपको आन्दोलन की शुरूआत हुई थी. अमृता देवी के इस बलिदान से प्रेरित हो कर गाँव के महिला और पुरुष पेड़ से चिपक गए. इस आन्दोलन ने बहुत विकराल रूप ले लिया और 363 लोग विरोध के दौरान मारे गए, तब राजा ने पेड़ों को काटने से मना किया.

इसी आंदोलन ने आजादी के बाद हुए चिपको आंदोलन को प्रेरित किया और दिशा दिखाई, सरकार को 26 मार्च 1974 को चमोली जिले के नीती घाटी के जंगलों  को काटने का कार्य शुरू करना था. इसका रैणी गांववासियों ने जोरदार विरोध किया जिससे डर कर ठेकेदारों ने रात में पेड़ काटने की योजना बनायी. लेकिन गौरा देवी ने गाँव की महिलाओं को एकत्रित किया और कहना कि, “जंगल हमारा मायका है हम इसे उजाड़ने नहीं देंगे.“ सभी महिलाएं जंगल में पेड़ों से चिपक गयी और कहा कुल्हाड़ी पहले हम पर चलानी पड़ेगी फिर इन पेड़ों पर,पूरी रात निर्भय होकर सभी पेड़ों से चिपकी रही,  ठेकेदारों को पुनः खाली हाथ जाना पड़ा, यह आन्दोलन पूरे उत्तराखंड में फैल गया. इसी प्रकार टिहरी जिले के हेंवल घाटी क्षेत्र के अदवाणी गांव की बचनी देवी भी ऐसी महिला हैं जिन्होंने चिपको आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी. 30 मई 1977 को अदवाणी गांव में वन निगम के ठेकेदार पेड़ों को काटने लगे तो बचनी देवी गांववासियों को साथ लेकर पेड़ बचाओ आंदोलन में कूद पड़ी और पेड़ों से चिपककर ठेकेदारों के हथियार छीन लिए और उन्हें वहां से भगा दिया. यह संघर्ष तकरीबन एक साल चला और आन्दोलन के कारण पेड़ों की कटान पर वन विभाग को रोक लगानी पड़ी.

दक्षिण में भी चिपको आन्दोलन की तर्ज पर ‘अप्पिको’ आंदोलन उभरा जो 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र से शुरू हुआ, सलकानी तथा निकट के गांवों के जंगलों को वन विभाग के आदेश से काटा जा रहा था तब इन गांवों की महिलाओं ने पेड़ों को गले से लगा लिया, यह आन्दोलन लगातार 38 दिनों तक चला, सरकार को मजबूर हो कर पेड़ों की कटाई रुकवाने का आदेश देना पड़ा.  इसी तरह से बेनगांव, हरसी गांव के हजारों महिलाओं और पुरुषों ने पेड़ों के काटे जाने का विरोध किया और पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले से लगा लिया. निदगोड में 300 लोगों ने इक्कठा होकर पेड़ों को गिराये जाने की प्रक्रिया को रोककर सफलता प्राप्त की. उत्तराखण्ड में महिलाओं ने ‘रक्षा सूत्र’ आंदोलन की शुरूआत की जिसमें उन्होंने पेड़ों पर ‘रक्षा धागा’ बांधते हुए उनकी रक्षा का संकल्प लिया. नर्मदा बचाओ आन्दोलन, साइलेंट घाटी आंदोलन में महिलाओं ने सक्रीय भागीदारी की. भारत में आजादी के पहले से वन नीति है, भारत की पहली राष्ट्रीय वन नीति वर्ष 1894 में बनी थी. स्वतंत्र भारत की पहली राष्ट्रीय वन नीति 1952 में, वन संरक्षण अधिनियम 1980 में बने  इन नीतियों में महिलाओं का कही जिक्र नहीं था, वनों को लेकर महिला एक उत्पादनकर्ता, संग्रहणकर्ता, संरक्षक और प्रबंधक की भूमिका निभाती हैं इस कारण प्रकृति से खिलवाड़ का दुष्प्रभाव सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ता है.

इन सब आन्दोलनों के दबाव के कारण 1988 में जो राष्ट्रीय वन नीति बनी उसमें लोगों को स्थान दिया गया. इसमें महिलाओं की सहभागिता को महत्व दिया गया और उनकी वनों पर निर्भरता, वनों को लेकर ज्ञान, वन प्रबंधन में उनकी सक्रीय भागीदारी को समझा गया और यह सोच बनी कि अगर वन प्रबंधन में महिलाओं की भी भागीदारी होगी तो वन नीति के गोल को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है इसी सोच के चलते संयुक्त वन प्रबंधन प्रोग्राम के अंतर्गत हर गावों में वन समिति बनायीं गयी और उस समिति में महिलाओं को भी शामिल किया गया. 1995 में राष्ट्रीय वन नीति में बदलाव करते हुए समितियों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण कर दिया गया. परंतु देखने में आया है कि ज्यादातर महिलाओं को संयुक्त वन प्रबंधन प्रोग्राम और वन समिति के बारे में जानकारी नहीं है, साथ ही पुरुषों के वर्चस्व वाले इस समाज में महिलाओं को कहने बोलने का स्पेस कम ही मिल पता है, लेकिन देखना ये है कि महिलाये इन चुनौतियों से कैसे पार पाती हैं और वनों के स्थायित्व विकास के लिए क्या और किस तरीके के कदम उठाती हैं.

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा:- आख़िरी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.

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महान भारतीय संस्कृति :आठवी  क़िस्त 



इस सन्दर्भ में सिर्फ इतना और कि प्राचीन भारत में समान जाति की स्त्री के साथ बलात्कार करने पर पुरुष की सम्पूर्ण सम्पत्ति छीनकर, उसके गुप्तांग काटकर उसे गधे पर चढ़ाकर घुमाया जाता था. मगर हीन-जाति की स्त्री के साथ बलात्कार में उपर्युक्त दंड का आधा दंड ही दिया जाता था. यदि स्त्री उच्च वर्ग की होती थी तो अपराधी के लिए मृत्युदंड था और सम्पत्ति छीन ली जाती थी. स्त्री के साथ धोखे से सम्भोग करने पर पुरुष को सम्पूर्ण सम्पत्ति से वंचित करके उसके मस्तक पर स्त्री का गुप्तांग चिह्नित करके नगर से निष्कासित कर दिया जाता था….बृहस्पति ने नीची जाति के पुरुष द्वारा उपभोग की गई उच्च जाति की निर्दाेष स्त्री को भी मृत्युदंड देने की व्यवस्था दी है. याज्ञवल्क्य और नारद के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी अविवाहित कन्या की इच्छा के विरुद्ध उससे सम्बन्ध रखता था तो उस व्यक्ति की दो अँगुलियाँ काट ली जाती थीं, किन्तु कन्या के उच्चवर्णी होने की स्थिति में उस व्यक्ति की सम्पत्ति छीनकर उसे मृत्युदंड दिया जाता था. कौटिल्य ने इस सन्दर्भ में कुछ भेद किए हैं. जो पुरुष स्वजाति की अरजस्वला कन्या को दूषित करे, उसका हाथ कटवा दिया जाए अथवा चार सौ पण दंड दिया जाए. यदि कन्या मर जाए तो पुरुष को प्राणदंड दिया जाए. रजस्वला हो चुकी कन्या की स्थिति में पुरुष की मध्यमा व तर्जनी अँगुलियाँ काट दी जाएँ अथवा दो सौ पण दंड दिया जाए और कन्या का पिता, जो भी क्षतिपूर्ति चाहे, उसे प्राप्त कराई जाए…वेश्या से बलात्कार का दंड बारह पण व दंड से सोलह गुना शुल्क गणिका को देने का नियम था. माता, मौसी, सास, भाभी, बुआ, चाची, ताई, मित्र-पत्नी, बहन, बहन-सी मित्र, पुत्रवधू, पुत्री, गुरु-पत्नी, सगोत्र, शरणागत, रानी, संन्यासिनी, धाय, ईमानदार स्त्री एवं उच्चवर्गी स्त्री के साथ सम्भोग करनेवाले पुरुष का गुप्तांग काट दिया जाता था.81


बलात्कारी को मृत्युदंड


कुछ माह पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी ‘हवाई घोषणा’ की थी कि उनकी सरकार बलात्कार के अपराधियों को मृत्युदंड देने का कानून बनाएगी. इस बयान की गम्भीरता, राजनीतिक भाषा और सम्भावना को समझने के लिए सिर्फ यह जान लेना काफी होगा कि सर्वोच्च न्यायालय कई बार यह कह चुका है कि मृत्युदंड सिर्फ हत्या के ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामलों में ही दिया जाना है. परिणामस्वरूप आज तक दहेज हत्या या वधूदहन के एक भी मामले में फाँसी नहीं दी गई है. ऐसे जिन मामलों में फाँसी की सजा सुनाई भी गई थी, उन्हें उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायमूर्तियों ने आजन्म कैद में बदल दिया. इसी प्रकार बच्चों से बलात्कार और हत्या के मामलों में भी (सिवा जुम्मन खान (1991) अपराधी को फाँसी की बजाय) उम्रकैद की सजा ही सुनाई गई है. ऐसी स्थिति में (सिर्फ) बलात्कार के अपराधी को मृत्युदंड कैसे दिया जा सकेगा ? अगर बलात्कारी के लिए मृत्युदंड का प्रावधान भी बन जाए, तो क्या वैधानिक और न्यायिक दृष्टिकोण भी बदला जाएगा ? संसद में बैठे पुरुष प्रतिनिधि क्या ऐसा कानून बनने देंगे ? ‘सहमति’ और ‘बदचलनी’ के कानूनी हथियारों का क्या होगा ? दहेज हत्याओं में मृत्युदंड का प्रावधान समाप्त करके, उम्रकैद का कानून (धारा 304-बी) बनाने वाली ‘पुरुष पंचायत’ बलात्कार के अपराधियों को सजा-ए-मौत देने का कानून बनाएगी  ? कैसे ? कब ? विशेषकर जब दुनिया भर में मृत्युदंड समाप्त करने की बहस और मानवाधिकारों का शोर हो.



जीने का मौलिक अधिकार

”बलात्कार एक ऐसा अनुभव है, जो पीडि़ता के जीवन की बुनियाद को हिला देता है. बहुत सी स्त्रियों के लिए इसका दुष्परिणाम लम्बे समय तक बना रहता है, व्यक्तिगत सम्बन्धों की क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित करता है, व्यवहार और मूल्यों को बदल आतंक पैदा करता है. (डब्ल्यू यंग, रेप स्टडी, 1983) सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री एस. सगीर अहमद और आर.पी. सेठी ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय (दिनांक 28 जनवरी, 2000) में कहा है कि किसी भी स्त्री के साथ बलात्कार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए दुष्कर्ष के लिए केन्द्र सरकार को भी जिम्मेवार ठहराया जा सकता है. विशेषकर हर्जाना अदा करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत भारतीय ही नहीं, विदेशी नागरिकों को भी जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है. सर्वोच्च न्यायालय के इस अभूतपूर्व निर्णय के निश्चित रूप से बहुत दूरगामी परिणाम होंगे. यौन हिंसा की शिकार स्त्रियों के मुकदमों में, अतीत के अनेक विवादास्पद फैसलों को देखते हुए, इसे सचमुच ‘न्यायिक प्रायश्चित्तÓ या ‘भूल सुधार’ भी कहा जा सकता है. पुलिस हिरासत में पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार के विचाराधीन मामलों में यह निर्णय अनेक नए आयाम जोडऩे की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. हालाँकि कुछ संविधान विशेषज्ञ अधिवक्ताओं का कहना है कि हर्जाने के आदेशों से पहले, अपराध प्रमाणित होना अनिवार्य है. यदि इस तर्क को सही मानें तो समस्या वहीं की वहीं अटकी रह जाएगी. अपराध प्रमाणित होने में तो लम्बा समय लगेगा और सम्भव है कानूनी तकनीकियों के जाल में उलझ जाए.

संक्षेप में उपरोक्त मुकदमे के तथ्यों के अनुसार बांग्लादेश की नागरिक हनुफा खातून के साथ हावड़ा रेलवे स्टेशन के यात्री निवास में कुछ रेलवे कर्मचारियों ने सामूहिक बलात्कार किया. हनुफा खातून को 26 फरवरी, 1998 को हावड़ा से अजमेर जाना था।.बलात्कार की दुर्घटना के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय की एक वकील चन्द्रिमा दास ने रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष से लेकर पुलिस अफसरों और केन्द्र सरकार तक के विरुद्ध एक याचिका उच्च न्यायालय में दायर की, जिसमें हर्जाने के अलावा कुछ आवश्यक दिशा-निर्देश देने की माँग भी की गई थी. सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को आदेश दिया कि पीडि़ता को दस लाख रुपया बतौर हर्जाना अदा करे. उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अध्यक्ष रेलवे बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की, जिसे बहस सुनने के बाद खारिज कर दिया गया. सर्वोच्च न्यायालय में सरकारी वकीलों द्वारा प्रस्तुत तर्कों में मुख्य तर्क यह था कि हनुफा खातून भारतीय नागरिक नहीं, बल्कि विदेशी है, इसलिए रेलवे हर्जाना देने के लिए जिम्मेवार नहीं है. यह भी कहा गया कि कर्मचारियों द्वारा किए गए अपराध के लिए रेलवे या केन्द्र सरकार को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता. बहस के दौरान सरकारी वकीलों ने दलील दी कि यह कुछ व्यक्तियों द्वारा किया गया अपराध है, जिसके लिए उन पर मुकदमा चलाया जाएगा और उन्हें दोषी पाए जाने पर दंडित भी किया जा सकता है और जुर्माना भी वसूला जा सकता है, लेकिन रेलवे या केन्द्र सरकार को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता. विद्वान वकीलों ने चन्द्रिमा दास द्वारा दायर याचिका की वैधता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वकील साहिबा को ऐसी याचिका दायर करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं, परन्तु सरकारी महाधिवक्ता के तमाम तर्कों को रद्द करते हुए माननीय न्यायमूर्तियों ने विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी.

विद्वान न्यायमूर्तियों ने सरकारी अफसरों और पुलिसकर्मियों द्वारा किए गए दुष्कर्मों के मामलों में पीडि़तों को हर्जाना देने सम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण नजीरों का हवाला दिया है. इनमें रुदुल शाह (1983), भीमसिंह (1985), सहेली (1980), इन्द्र सिंह (1995) डी.के. बसु (1997), कौशल्या (1998) से लेकर मंजू भाटिया (1998) तक शामिल हैं. जनहित याचिकाओं और उनमें प्रबुद्ध समाजसेवी वकीलों की भूमिका को रेखांकित करते हुए निर्णय में बहुत से उदाहरण दिए गए है. मौलिक अधिकार और विदेशी नागरिकता के सवाल पर न्यायमूर्तियों ने मानवाधिकारों से लेकर स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय प्रस्तावों तक का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायाधीशों और वकीलों को मानवाधिकरों के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायशास्त्र के प्रति जागरूक और सचेत रहना चाहिए, विशेषकर महिलाओं के सुरक्षा सम्बन्धी मानवाधिकारों से. न्यायमूर्तियों ने अपने निर्णय में अनवर बनाम जम्मू-कश्मीर (1971) का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20, 21 और 22 में प्रदत्त मौलिक अधिकार सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही उपलब्ध नहीं, बल्कि विदेशी नागरिकों को भी उपलब्ध हैं. बलात्कार को मौलिक अधिकार का उल्लंघन घोषित करनेवाले निर्णय (बौद्धिसत्व बनाम सुभद्रा चक्रवर्ती, 1996) को सही ठहराते हुए निर्णय में कहा गया है. ”बलात्कार सिर्फ एक स्त्री के विरुद्ध अपराध नहीं बल्कि समस्त समाज के विरुद्ध अपराध है. यह स्त्री की सम्पूर्ण मनोभावना को ध्वस्त कर देता है और उसे भयंकर भावनात्मक संकट में धकेलता है, इसलिए बलात्कार सबसे अधिक घृणित अपराध है. यह मूल मानवाधिकारों के विरुद्ध अपराध है और पीडि़ता के सबसे अधिक प्रिय अधिकार का उल्लंघन है, उदाहरण के लिए जीने का अधिकार जिसमें सम्मान से जीने का अधिकार शामिल है.

माननीय न्यायमूर्तियों ने अपने फैसले में लिखा कि हनुफा खातून इस देश की नागरिक नहीं है लेकिन फिर भी उसे संविधान द्वारा प्रदत्त जीने के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं. सम्मान से जीने का उसे भी उतना ही अधिकार है, जितना किसी भारतीय नागरिक को. विदेशी नागरिक होने के कारण उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जा सकता जो मानवीय गरिमा के नीचे हो और न ही उन सरकारी कर्मचारियों द्वारा शारीरिक हिंसा की जा सकती है, जिन्होंने उसके साथ बलात्कार किया. यह उसके मौलिक अधिकार का हनन है. परिणामस्वरूप यह राज्य की संवैधानिक जिम्मेवारी है कि उसे हर्जाना अदा करे. उच्च न्यायालय के निर्णय में कोई कानूनी खामी नजर नहीं आती. रेलवे बोर्ड और केन्द्र सरकार के बचाव में विद्वान महाधिवक्ता ने एक और दलील यह दी कि कर्मचारियों के कार्यों के लिए राज्य को केवल तभी जिम्मेवार माना जा सकता है, जब उन्होंने यह कार्य आधिकारिक उत्तरदायित्व निभाते हुए किया हो. चूँकि बलात्कार को उनका आधिकारिक दायित्व नहीं कहा जा सकता, इसलिए केन्द्रीय सरकार हर्जाना अदा करने के लिए जिम्मेवार नहीं, लेकिन न्यायमूर्तियों ने जवाब में लिखा, ”यह तर्क पूर्णतया गलत है और इस न्यायालय द्वारा सुनाए फैसलों के विपरीत. सरकारी वकीलों ने अपने पक्ष में जिस विवादास्पद नजीर (कस्तूरी लाल रुलिया राम जैन बनाम उत्तर प्रदेश, 1965) का हवाला दिया. उसके बारे में न्यायमूर्तियों ने कहा कि न्यायालय ने अपने बाद के फैसलों में उस निर्णय को कभी सही नहीं माना. हम भी उसे मानने के लिए बाध्य नहीं। वह एक अर्थहीन (व्यर्थ) नजीर सिद्ध हो चुकी है.

2000 एपैक्स डिसीजन (खंड एक) सुप्रीम कोर्ट, पृ. 401-21 में प्रकाशित, चेयरमैन रेलवे बोर्ड एंड अदर्स बनाम श्रीमती चन्द्रिमा दास के फैसले को पढ़ते हुए महसूस होता है कि राज्य (रेलवे बोर्ड या केन्द्र सरकार) के विद्वान वकील भी ठीक उसी तरह सरकार का बचाव कर रहे हैं, जैसे बचाव पक्ष का कोई वकील अपने किसी खूँखार अपराधी को बचाने के लिए करता है. सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सरकारी वकीलों के प्राय: सभी तर्क (कुतर्क) बेहद हास्यास्पद नजर आते हैं. वर्षों से स्पष्ट कानूनी प्रस्थापनाओं से बेखबर और ‘ओवर रूल्ड’ नजीरें पेश करते हुए इन या ऐसे सरकारी अधिवक्ताओं से मानवाधिकारों और लैंगिक न्याय की अवधारणाओं से सचेत होने की अपेक्षा करना व्यर्थ है. आश्चर्यजनक है कि राजसत्ता भी अदालत में पेशेवर अपराधी की तरह मुकदमेबाजी करती दिखाई पड़ती है. समझ नहीं आता कि आखिर केन्द्रीय सरकार किसे बचाना चाहती है/थी ? अपराधी कर्मचारियों को दस लाख रुपया हर्जाना ? बलात्कार के गम्भीर मामले में पीडि़त स्त्री (और वह भी विदेशी नागरिक) के साथ, केन्द्र सरकार का पूरा व्यवहार एकदम अवांछनीय प्रतीत होता है. महिला कल्याण के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च करने और स्त्री हितैषी बननेवाली सरकार अदालत में इतनी असंवेदनशील और अतार्कि क कैसे हो जाती है ?  क्यों ?  क्या यही है ‘राष्ट्रीय गरिमा’ और ‘नारी सम्मान’ का ढिंढोरा पीटनेवाले नायकों का असली चेहरा.

 इन प्रश्नों को सिर्फ अदालती, कानूनी या न्यायिक दृष्टि से पढऩा-समझना काफी नहीं. राज्य के स्तर पर एक व्यापक परिप्रेक्ष्य और सत्ता और आम नागरिक (विशेषत: स्त्री) के बीच अन्तर्सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए विचार करना होगा. ऐसे मामलों में सरकार की प्रतिष्ठा का कम, राष्ट्र की न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा का ध्यान अधिक है.
कहना न होगा कि सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय से न्यायिक संस्थाओं के प्रति शेष-अशेष जन आस्थाएँ खंडित होने से तो बची रहीं, साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के कानून और न्यायिक विवेक का भी प्रतिबिम्ब सामने आया। यह अलग बात है कि यौन हिंसा के अन्य मामलों में इससे स्त्रियों को कितना लाभ मिलता है। इतना अवश्य कहा जा सक ता है कि यह निर्णय लैंगिक न्याय की दिशा में एक प्रगतिशील कदम ही नहीं बल्कि मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। मानवाधिकार सिर्फ ‘मुठभेड़’ में मारे गए आतंकवादियों के लिए ही नहीं, यौन हिंसा का शिकार स्त्रियों के पक्ष में भी परिभाषित होना जरूरी ह.। अगर सरकारी संस्थाओं में भी जीवन सुरक्षा उपलब्ध नहीं, तो हजारों विदेशी पर्यटक ‘भारत भ्रमण’ पर क्यों आएँगे ?



और अन्त में…आत्मरक्षा

यशवन्त राव बनाम मध्य प्रदेश राज्य82 में अभियुक्त पर आरोप था कि उसने 5 अप्रैल, 1985 को लखन सिंह नाम के व्यक्ति की कुदाली से हत्या की है. सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को हत्या का अपराधी तो नहीं माना लेकिन गम्भीर चोट पहुँचाने के अपराध में एक साल कैद की सजा सुनाई. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपील में यह सजा अब तक भुगती जेल की सजा में बदल दी, जिसके विरुद्ध अभियुक्त ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री कुलदीप सिंह और योगेश्वर दयाल ने 4 मई, 1992 को अपने अभूतपूर्व ऐतिहासिक फैसले में लिखा है कि अभियुक्त को अपने बचाव का अधिकार है, जो इस मामले में भी लागू होता है, जब अभियुक्त की पन्द्रह वर्षीया बेटी के साथ मृतक बलात्कार कर रहा था. न्यायमूर्तियों ने कहा कि अभियुक्त के बचाव में सबसे पहले पुलिस में दर्ज रपट है, जिसमें अभियुक्त ने शिकायत की है कि उसकी नाबालिग बेटी छाया घर के पिछवाड़े शौच के लिए गई थी, जहाँ मृतक ने उसे पकड़ लिया और शोर सुनकर वह वहाँ पहुँचा तो मृतक अपने बचाव में भाग खड़ा हुआ था. इस तरह वह दीवार के टकराया और पथरीली जमीन पर गिरकर जख्मी हो गया. सत्र न्यायाधीश का विचार था कि नाबालिग लडक़ी, जिसकी उम्र पन्द्रह साल है, अपनी सहमति से जब लखन सिंह के साथ सम्भोग कर रही थी तब अभियुक्त ने उसे चोट पहुँचाई है. लडक़ी खुद लखन सिंह को घर से बुलाकर लाई थी. अभियुक्त ने अपनी बेटी को लखन सिंह के साथ सम्भोग करते देखा तो उसने उत्तेजना व गुस्से में मृतक पर हमला कर दिया.

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में उल्लेख किया है कि अभियुक्त ने अपने बचाव के अधिकार का तर्क सत्र न्यायाधीश के सामने भी रखा था. लेकिन सत्र न्यायाधीश ने सिर्फ इतना ही ध्यान दिया कि अभियुक्त ने चोट उत्तेजना और गुस्से में पहुँचाई है. इससे आगे मामले की जाँच नहीं की. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सम्भोग सहमति से हो रहा था या बिना सहमति के।. तथ्य यह है कि छाया की उम्र पन्द्रह साल थी और लखन सिंह द्वारा किया कृत्य भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 उपधारा 6 के अन्तर्गत बलात्कार ही माना जाएगा. पंचनामे से स्पष्ट है कि बलात्कार का प्रयास या सम्भोग पूरा नहीं हुआ था और इसी बीच अभियुक्त ने मृतक पर वार किया था. मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार भी मृत्यु कुदाली से चोट लगने की वजह से नहीं हुई है, बल्कि ‘लीवर’ फटने से हुई है. कारण कुछ भी हो, बचाव का अधिकार अभियुक्त को तब भी है जब कोई उसकी बेटी के साथ बलात्कार कर रहा हो. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि कानूनी अधिकारों के बारे में अनभिज्ञ माँ-बाप अक्सर ऐसे मौके पर बलात्कारी को खुद कुछ कहने-सुनने या मारने-पीटने की बजाय थाने में जाकर शिकायत करते हैं. शायद डर भी लगता है कि कहीं खुद ही कानून के जंजाल में न फँस जाएँ. परन्तु इस निर्णय से स्पष्ट है कि बेटी, बहू या बहन या किसी रिश्तेदार के साथ बलात्कार होता देखकर, बलात्कारी की हत्या तक कर देने में भी ‘बचाव का अधिकार’ (राइट ऑफ प्राइवेट डिफेंस) एक कानूनी अधिकार भी है और बलात्कारियों से निपटने का हथियार भी.

स्त्रियाँ स्वयं अपने बचाव में हथियार उठाने के कानूनी अधिकार का प्रयोग कर सकती हैं. दिल्ली में अभी कुछ दिन पहले एक चौदह वर्षीया लडक़ी ने बलात्कार का प्रयास करनेवाले व्यक्ति की हत्या कर दी थी. नि:सन्देह उसे अपने बचाव में हत्या करने का अधिकार मिलेगा. बलात्कारी कानूनी प्रक्रिया में सजा से बच सकता है. लेकिन जिस दिन औरतें खुद हथियार उठा लेंगी, उसे कोई नहीं बचा सकता. दरअसल भेडिय़ों के समाज में बच्चियों को असुरक्षित और निहत्था छोडऩे के बजाय उन्हें जूड़ों कर्राटे और गोली, गँड़ासा, दराँती चलाना सीखने या सिखाने की जरूरत है और यह भी बताने की जरूरत है कि अपनी सुरक्षा में, अपने बचाव में की गई हत्या भी कोई अपराध नहीं है.


सन्दर्भ

1. महावीर बनाम राज्य 55 (1994) दिल्ली लॉ टाइम्स 428
2. सिद्धेश्वर गांगुली बनाम पश्चिम बंगाल, ए. आई. आर. 1958 सुप्रीम कोर्ट, 143
3. ए. आई. आर. 1927 लाहौर 858
4. ए. आई. आर. 1928 पटना 326
5. ए. आई. आर. 1963 पंजाब 443
6. 1963 क्रिमिनल लॉ जर्नल 391
7. 4 ऑल इंडिया क्रिमिनल डिवीजन 469
8. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 939
9. वही, पृ. 942
10. रफीक बनाम उत्तर प्रदेश (1980) सुप्रीम कोर्ट केसस 262
11. ए. आई. आर. 1923 लाहौर 297
12. ए. आई. आर. 1980 सुप्रीम कोर्ट 559
13. 23 क्रिमिनल लॉ जर्नल 475
14. ए. आई. आर. 1924 लाहौर 669
15. ए. आई. आर. 1927 रंगून 67
16. ए. आई. आर. 1934 कलकत्ता 7
17. ए. आई. आर. 1935 लाहौर 8
18. ए. आई. आर. 1939 रंगून 128
19. ए. आई. आर. 1944 नागपुर 363
20. ए. आई. आर. 1947 इलाहाबाद 393
21. ए. आई. आर. 1949 कलकत्ता 613
22. ए. आई. आर. 1949 इलाहाबाद 710
23. ए. आई. आर. 1950 लाहौर 151
24. ए. आई. आर. 1950 नागपुर 9
25. ए. आई. आर. 1952 सुप्रीम कोर्ट 54
26. ए. आई. आर. 1955 पटना 3245
27. पडरिया बलात्कार कांड में न्यायाधीश ओ.पी. सिन्हा का फैसला
28. ए. आई. आर. 1977 सुप्रीम कोर्ट 1307
29. ए. आई. आर. 1970 सुप्रीम कोर्ट 1029
30. ए. आई. आर. 1973 सुप्रीम कोर्ट 343
31. तुकाराम बनाम महाराष्ट्र (ए. आई. आर. 1979 सुप्रीम कोर्ट 185)
32. फूलसिंह बनाम हरियाणा (ए. आई. आर. 1980 सुप्रीम कोर्ट 249)
33. भोगिन भाई हिरजी भाई बनाम गुजरात (ए. आई. आर. 1983 सुप्रीम कोर्ट 753)
34. ए. आई. आर. 1989 सुप्रीम कोर्ट 937
35. ए. आई. आर. 1990 सुप्रीम कोर्ट 538
36. ए. आई. आर. 1981 सुप्रीम कोर्ट 361
37. महाराष्ट्र बनाम चन्द्रप्रकाश केवलचन्द जैन ए.आई.आर. 1990 सुप्रीम कोर्ट 658
38. ए. आई. आर. 1927 लाहौर 772
39. छिद्दा राम बनाम दिल्ली प्रशासन, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 4073
40. ए. आई.आर. सुप्रीम कोर्ट 658
41. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 715
42. ए. आई. आर. 1962 मद्रास 31, ए. आई. आर. 1991 सुप्रीम कोर्ट 207
43. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1666
44. 1988 क्र्रिमिनल लॉ जर्नल 3044
45. 1988 (4) आर. सी. आर. (क्रिमिनल) 600
46. 1988 (4) आर. सी. आर. (क्रिमिनल) 207
47. 1988 (3) आर. सी. आर. (क्रिमिनल) 692
48. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2859
49. 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 248
50. 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1529
51. 1983 (2) ऑल क्रिमिनल लॉ रिपोर्ट 844
52. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 439
53. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 852
54. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2834
55. विनोद कुमार बनाम राज्य, 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2360,
55ए. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2919
55बी. जहरलाल दास बनाम उड़ीसा राज्य 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1809
55सी. कुमुदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1999) एस.एल.टी. 636
56. ए. आई. आर. 1929 लाहौर 584
57. 1977 क्रिमिनल लॉ जर्नल 556
58. 1987 क्रिमिनल लॉ जर्नल 557
59. रामरूपदास बनाम राज्य, 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1000
60. जगदीश प्रसाद बनाम राज्य, 58 (1995) दिल्ली लॉ टाइम्स 740
61. बलवान सिंह बनाम हरियाणा राज्य, 1994, क्रिमिनल लॉ जर्नल 2810
62. रामचित राजभर बनाम पश्चिम बंगाल, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 372
63. नाला रामबाबू बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 324
64. वी. लक्ष्मी नारायण बनाम पुलिस निरीक्षक, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 334
65. ओमी उर्फ ओमप्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 155
66. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 835
67. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 3786
68. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 977
68 ए. 63 (1996) दिल्ली लॉ टाइम्स 563
68 बी. 1994 क्रिमिनल केसस 56
69. फूलसिंह चंडीगढ़ क्रिमिनल केस 163
70. 1979 राजस्थान क्रिमिनल केस 234
71. 1979 राजस्थान क्रिमिनल केस 234
72. 1979 राजस्थान क्रिमिनल केस 56
73. 1978 राजस्थान क्रिमिनल केस 426
74. 1977 (2) राजस्थान क्रिमिनल केस 157
75. 1976 (1) राजस्थान क्रिमिनल केस 310
76. 1976 राजस्थान क्रिमिनल केस 258
77. काकू बनाम हिमाचल प्रदेश ए. आई. आर. 1976 सुप्रीम कोर्ट 1991
78. रीपिक रविन्द्र बनाम आन्ध्र प्रदेश, 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 595
79. इप्पिती श्रीनाथ राव बनाम आन्ध्र प्रदेश 1984 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1294
80. जगदीश बनाम दिल्ली राज्य 57 (1955) दिल्ली लॉ टाइम्स 761
81. प्राचीन भारत में न्याय व्यवस्था, नताशा अरोड़ा
82. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2779

औरतें

एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 


अनुवादक का नोट 


एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। 
लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।


 “Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।

 

शहरजाद

एक की बेवफाई का बदला लेने के लिए राजा सारी दुल्हनों  के गले उतार लिया करता था.रात होने से पहले वह ब्याह रचाता और सुबह होते-होते अपना ब्याह खुद खतम भी कर डालता था. इस तरह, एक के बाद एक लड़कियाँ आती गईं और अपना कौमार्य तथा जीवन गंवाती गईं. शहरजाद वह अकेली लड़की थी, जो पहली रात के बाद जिंदा बची रही और इसके बाद वह हर रात एक और नया दिन पाने की खातिर कहानियाँ बदलती रही. ये कहानियाँ जो शहरजाद ने कहीं से सुनी , पढी  या फिर यूँ ही बनाई थी, उसे सरकलमी से बचाती थी. वह इन्हें धीमी आवाज में, आधे अंधेरे कमरे में सिर्फ़  चांदनी की रोशनी में कहा करती थी।इन्हें कहते वक्त उसे एक रूहानी खुशी मिला करती थी, जिसे वह राजा तक पहुंचाया करती. वह, हाँलाकि , एहतियात भी बहुत रखती थी.कभी-कभी अच्छी-भली चल रही कहानी  के बीच उसे यह अहसास हुआ करता कि राजा उसकी  गर्दन देख रहा है.वहां राजा का मन ऊबा और यहाँ वह गई.और फिर मरने के डर से कहने की कला शुरू हुई.

आधुनिक नॉविल की पहली ईंट

आज से हज़ार साल पहले, दो जापानी औरतें ऐसा लिख रहीं थी  मानों वह आज की बात हो.खोर्खे लुईस बोरखेस (Jorge Luis Borges) और मार्गेरिते योरसेनार (Marguerite Yourcenar) कहते हैं कि आज तक मुरासाकी शिकिबु (Murasaki Shikibu) जैसा बेहतरीन उपन्यास किसी ने नहीं लिखा. शिकिबु की गेंजी की कहानी पुरुषों के रोमांचक कारनामों तथा औरतों के पीछे हटने या हार जाने की एक शानदार किस्सागोई है.
मुरासाकी के साथ एक और औरत अपने जाने के हजार साल बाद तारीफ के इतने शब्दों के साथ याद किए जाने का दुर्लभ सम्मान हासिल कर रही थी. सेई शोनागोन (Sei Shonagon) की Libro de la Almohada (लिब्रो दे ला आलमोआदा – शाब्दिक अर्थ “तकिए की किताब” यानी  बिस्तर पर या सोने से पहले आराम से, आनंद के साथ पढ़ी जाने वाली किताब) ने  zuihitsu (जुईहित्सु) नाम की एक पूरी विधा को ही जन्म दिया था. जुईहित्सु का शाब्दिक अर्थ “पेंट-ब्रुश या कूची की रौ के संग बहना” होता है. यह छोटी-छोटी कहानियों, नोट्स, विचारों, खबरों और कविताओं से गूंथे हुए एक बहुरंगी मोजैक या रंगीन पत्थरों और काँचों से बनी कलाकृतियों की तरह लिखा जाता था. देखने में इधर-उधर बिखरे मालूम पड़ने वाले इसके टुकड़े दरअसल कथ्य के विविध आयाम बुनते हैं और हमें अपने लोक तथा समय में दाखिल होने का न्यौता देते हैं.

कहने की धुन (1)

मार्सेला उत्तर के बर्फीले इलाकों में गई थी. वहाँ नार्वे  की राजधानी ओस्लो में एक रात उसकी मुलाकात एक औरत से हुई, जो गाती और कहती है. एक गाना खत्म और दूसरा शुरू होने के बीच वह मजेदार कहानियाँ सुनाया करती है. वह इन्हें कागज के छोटे-छोटे पर्चो पर नजर फिराते हुए कहती है, ऐसे जैसे कोई बड़ी बेफिक्री से किसी का भविष्य बाँच रहा हो.ओस्लो की वह औरत एक बहुत बड़े घेरे वाला स्कर्ट पहनती है, जिसमें कई-कई तो जेबें हैं. इन्हीं जेबों से वह एक-एक कर ये पर्चे निकालती है. हर पर्चे में कहने को एक मजेदार कहानी रहती है। वह कहानी जो एक शुरुआत और इस शुरुआत के बीज रोपे जाने के बारे में है. हर कहानी उन लोगों की है, जो कुछ जादुई रचने-गढ़ने की कला की खातिर दुबारा जीना चाहते हैं. और इस तरह वह भुला दिए और मर गए लोगों को फिर से जिलाया करती है; उसके स्कर्ट की तहों से इंसानों के सफर और उनके  इश्क की कई दास्तानें बाहर निकल सामने आ खड़ी होती हैं. वही इंसान जो जीते हुए, कुछ कहते हुए चलते जाते हैं.

अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  आजकल फ्रांस में हैं. 

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा :सातवीं क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.

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अदालती ‘आशा और विश्वास’    

मगर दिल्ली उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री जसपाल सिंह ने अपने निर्णय68ए में दुनिया-भर के सन्दर्भ, शोध और निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि लिंगच्छेदन बलात्कार के अपराध की अनिवार्य शर्त है. निर्णय के अन्त में दिशा-निर्देश देते हुए माननीय न्यायाधीश ने गम्भीरतापूर्वक लिखा, ”बाल यौन शोषण अत्यन्त गम्भीर और नुकसानदेह अपराधों में से एक है.  इसलिए सत्र न्यायाधीश को चाहिए कि वह इस केस को संवेदनशीलता से चलाएँ और यह भी सुनिश्चित करें कि मुकदमे की कार्यवाही न्यायसंगत हो. उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी ऐसा सवाल न पूछा जाए जो पेचीदा या उलझानेवाला हो…न्यायमूर्ति का यह निर्णय, सचमुच अनेक कारणों से पढऩे योग्य है. एक जगह तो न्यायमूर्ति आत्मनिरीक्षण करते हुए कहते हैं, ”इट इज आपलिंग टू वाच द डैथ एगनी ऑफ ए होप. मिस्टर जेटली वांटेड मी टू पुश फॉरवर्ड द ? टू द फ्यूचर्स फ्रंटलाइंस.  टू हिम, परहैप्स, आई रिमेन एन ओल्ड गार्ड हैंकरिंग डाउन इन द बंकर्स ऑफ टै्रडिशन. अखबारों में ‘बेटी से बलात्कार’ की खबरें प्राय: प्रकाशित होती ही रहती हैं. कभी प्राइवेट कम्पनी में मैनेजर (सुब्रतो राय) द्वारा अपनी अठारह वर्षीय बेटी से बलात्कार, कभी मध्यमवर्गीय (राजकुमार) द्वारा चौदह वर्षीय पुत्री के साथ बलात् सम्भोग, कभी स्कूटर ड्राइवर (अश्विनी सहगल) द्वारा आठ वर्षीय बेटी की ‘इज्जत बर्बाद  और कभी पिता व भाई दोनों ने मिलकर सोलह वर्षीय बहन-बेटी को अपनी हवस का शिकार बनाया. लड़कियाँ सम्बन्धों की किसी भी छत के नीचे सुरक्षित नहीं.

भारतीय समाज में भी अमानवीयकरण इस कदर बढ़ गया है कि ऐसी खौफनाक दुर्घटनाओं की लगातार पुनरावृत्ति रुकने की सम्भावनाएँ समाप्त या लगभग शून्य हो गई हैं. अधिकांश मामलों में इसका एक मुख्य कारण पति-पत्नी के बीच तनाव, लड़ाई-झगड़ा या अलगाव है, दूसरा कारण है, बेटा न होने का दुख. बेटियाँ अपने ही घर में, अपने ही पिता, भाई या सम्बन्धियों के बीच भयभीत, आतंकित और असुरक्षित हो जाएँ तो उसे न सम्मान से जीने का कोई रास्ता नजर आता है और न गुमनाम मरने का.  बलात्कार की संस्कृति के सहारे पितृसत्ता अजर, अमर नजर आती है. नारायण इराना पोतकंडी बनाम महाराष्ट्र68बी में सात वर्षीया बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में माननीय न्यायमूर्ति श्री एम.एस. वैद्य ने सजा के सवाल पर कहा है कि जब कानून में न्यूनतम सजा दस साल निर्धारित की गई है तो किसी भी आधार पर सजा कम करना न्यायोचित नहीं. मुकदमे के निर्णय में उल्लेख किया है, ”अन्त में, दोनों पक्षों के वकीलों ने कहा कि बालिका-बलात्कार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, विशेषकर इस क्षेत्र में. यह बताया गया कि जिला अदालतों द्वारा इस प्रकार के मामलों में बच्चों की गवाही और अन्य साक्ष्यों सम्बन्धी कानूनी प्रावधान या आदेशों का सही ढंग से अनुपालन नहीं किया जाता है कि भविष्य में अदालतें इस प्रकार के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय और गुजरात उच्च न्यायालय के फैसलों के अनुसार ही कानून और प्रक्रिया का प्रयोग करेंगे. हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि ‘आशा और विश्वास’ भरे ऐसे दिशा-निर्देश सर्वोच्च न्यायालय के सत्र न्यायालय वाया उच्च न्यायालय शीघ्र समय से पहुँच जाएँगे.

इतनी सख्त सजा न्यायोचित नहीं

उल्लेखनीय है कि कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार करनेवाले युवक की उम्र अगर पच्चीस साल से अधिक नहीं है तो अधिकांश मामलों में, इसी आधार पर न्यायमूर्तियों ने सजा कम की है. कुछ मामलों में तो इतनी कम कि पढ़-सुनकर आश्चर्य होता है. उदाहरण के लिए अभियुक्त की उम्र बाईस साल है और वह कोई पेशेवर अपराधी नहीं है. इसलिए चार साल कैद की सजा घटाकर दो साल की जाती है.69 अपराध के समय अभियुक्त की उम्र सोलह साल थी. इसलिए सजा घटाकर पच्चीस दिन कैद की जाती है, जो वह पहले ही भुगत चुका है.70 अभियुक्त इक्कीस वर्षीय नौजवान है, जिसे पाँच साल कैद की सजा दी गई है. सात साल मुकदमा चलता रहा और अभियुक्त आठ महीने कैद काट चुका है. ऐसी हालत में उसकी सजा आठ महीने की काफी है. हाँ, कम सजा के बदले में एक हजार रुपया जुर्माना देना पड़ेगा.71 अभियुक्त की उम्र सिर्फ सत्रह-अठारह साल है. बलात्कार के अपराध में तीन साल कैद और एक हजार रुपए जुर्माने की सजा घटाकर सात महीने कैद करना उचित है, जो वह पहले ही काट चुका है. जुर्माना देने की कोई जरूरत नहीं.72



अभियुक्त की उम्र सोलह से अठारह वर्ष के बीच है. सजा में उदारता का अधिकारी है. पाँच साल कैद की सजा घटाकर ढाई साल करना न्यायोचित है. ढाई साल कैद में वह पहले ही रह चुका है.73 अभियुक्त की उम्र सोलह साल और बारह साल की बच्ची से बलात्कार की सजा कैद. अपराधियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण को देखते हुए. एक साल कारावास और एक हजार रुपए जुर्माना74. उम्र बाईस साल और नौ वर्षीया बालिका से बलात्कार की सजा सात साल कैद. बहुत हिंसा की है मगर गुप्तागों पर कोई चोट नहीं. सजा कम करके पाँच साल जेल. ‘न्याय का उद्देश्य’ पूरा हो जाएगा.75 दस साल की लडक़ी के साथ बलात्कार के अपराध में सत्रह वर्षीय युवक की सजा पाँच साल से कम करके चार साल कैद करने से भी ‘न्याय का लक्ष्य’ पूर्ण हो जाएगा76. अभियुक्त की उम्र मुश्किल से तेरह साल है. दो वर्षीया बच्ची के साथ बलात्कार की सजा चार साल कैद से घटाकर, एक साल कैद और दो हजार रुपए जुर्माना किया जाता है. लम्बी कैद की सजा अभियुक्त को कठोर अपराधी बना देगी. जुर्माना वसूल हो जाए तो रकम हर्जाने के रूप में लडक़ी की माँ को दे दी जाए. बाल अपराधियों के मामलों में समसामयिक अपराधशास्त्र के अनुसार मानवीय दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य.77
किशोरों को जेल या सुधार-गृह

बच्चियों से बलात्कार के मामलों में किशोरों और ‘टीन एजर’ युवकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. पन्द्रह वर्षीय युवक द्वारा सात वर्षीया बच्ची के साथ बलात्कार के अपराध में सत्र न्यायाधीश ने दस साल कैद और पाँच सौ रुपए जुर्माने की सजा सुनाई. लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने 1990 में अपील स्वीकार करते हुए कहा, ”अभियुक्त को जेल भेजने का अर्थ, इसे खूँखार अपराधी बनाना होगा. किशोर न्याय अधिनियम, 1986 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 361 के अनुसार किशोर अपराधियों को जेल में नहीं, बल्कि सुधार-गृहों में रखा जाना चाहिए. अभियुक्त को तीन साल के लिए आन्ध्र प्रदेश ब्रोस्टल के स्कूल में भेजने के आदेश देते हुए न्यायमूर्ति ने जुर्माना वापस करने के भी आदेश दिए. अभियुक्त के वकील ने सजा कम करवाने का एक तर्क यह भी दिया था कि ”लडक़ा होटल में काम करता है और वयस्क यात्रियों को ‘ब्लू फिल्म’ व अन्य यौन क्रीड़ाएँ करते हुए देख-देखकर स्वयं भी अनुभव करने की इच्छा के फलस्वरूप ऐसा अपराध करने को उत्प्रेरित हुआ होगा. यह उसे छोड़ देने के लिए कोई उचित बहाना नहीं है, पर सजा के सवाल पर विचारणीय अवश्य है. बचाव पक्ष के वकील ने न्यायमूर्ति ओ. चिन्नप्पा रेड्डी द्वारा लिखी एक पुस्तक की भूमिका से दोहराया, ”आपराधिक कानून का उद्देश्य सिर्फ अपराधियों को पकडऩा, मुकदमा चलाना और सजा देना ही नहीं है, बल्कि अपराध के असली कारणों को भी जानना है. कानून का अन्तिम ध्येय अपराधियों को सिर्फ सजा देना ही नहीं है. जब भी, जहाँ सम्भव हो उन्हें सुधारना भी है.78

उपरोक्त निर्णय के विपरीत इसी उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने कुछ साल पूर्व 1984 में कहा था–
”सर्वज्ञात तथ्य है कि इधर कमजोर वर्ग, उदाहरण के लिए स्त्रियों पर अपराधों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही है और ऐसे अपराधों को रोकना एक समस्या बन गई है. अब यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा है कि औरतों पर बढ़ रहे हिंसक अपराधों को रोकने के लिए क्या उपाय किए जाएँ. अगर अपराधियों को ‘प्रोबेशन ऑफ अफेंडर्स एक्ट’ की लाभदायक धाराओं के अन्तर्गत ऐसे अपराधों में भी छोड़ दिया जाएगा तो यह निश्चित रूप से औरतों के विरुद्ध अपराधों को बढ़ावा देना ही होगा. यही नहीं, निर्दोष बच्चियों के विरुद्ध ऐसे अपराधों को रोकना एकदम असम्भव हो जाएगा. अगर ऐसे अपराधों को रोका नहीं गया तो सामाजिक सन्तुलन व औरतों के स्वतंत्रतापूर्वक आने-जाने के लिए ही धमकी बन जाएगा और समाज की सुरक्षा के लिए भयंकर खतरा.79 नि:सन्देह सामाजिक परिप्रेक्ष्य से परे हटते ही, न्यायमूर्ति की आँखों के सामने भ्रामक मिथ और मानसिक मकडज़ाल छाने लगता है. गवाहों, साक्ष्यों, रिपोर्टों, दस्तावेजों और स्थितियों के बीच तकनीकी विसंगतियाँ और अन्तर्विरोध अनेक प्रकार से दिशाभ्रमित करते हैं. डॉक्टरी रिपोर्ट, पुलिस जाँच में घपले, सालों बाद गवाही में स्वाभाविक भूल, बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा गढ़े तर्क (कुतर्क), नई-पुरानी हजारों नजीरें और वर्षों फैसला न होने (करने) का दबाव या
अपराधबोध, यानी सब अभियुक्त के पक्ष में ही होता रहता है. जब तक सन्देह से परे तक अपराध सिद्ध न हो, अभियुक्त को निर्दोष माना जाएगा और पूरी व्यवस्था उसे बचाने में लगी रहती है.

परिणामस्वरूप अधिकांश (96 प्रतिशत) अभियुक्त बाइज्जत रिहा हो जाते हैं या सन्देह का लाभ पाकर मुक्त. जिन्हें बचाव का कोई (चोर) रास्ता नहीं मिल पाता, वे अपराधी भी किसी-न-किसी आधार पर न्यायमूर्ति से रहम की अपील मंजूर करवा ही लेते हैं. सजा कम करने के अनेक ‘उदारवादी’ निर्णय उपलब्ध हैं. सजा बढ़ाने के फैसले अपवादस्वरूप ही मिल सकते हैं. कुछ मामलों में तो न्यायमूर्तियों द्वारा सजा कम करने का एकमात्र कारण है.सालों से अपील की सुनवाई या फैसला न होना. अब इतने साल बाद सजा देने से भी क्या लाभ ? संसद द्वारा बनाए सम्बन्धित कानूनों की भाषा और परिभाषा दोनों ही आमूल-चूल संशोधन माँगती है. मगर विधि आयोग द्वारा संशोधन की सिफारिशों पर राष्ट्रीय बहस बाकी है. कानूनी लूपहोल या गहरे गड्ढों के रहते यौन हिंसा की शिकार स्त्री के साथ न्याय असम्भव है. अक्सर यह कहा जाता है कि कानून तो बहुत बने/बनाए गए हैं लेकिन उनका पालन सही ढंग से नहीं हो रहा है. काफी दार्शनिक अन्दाज में यह भी बार-बार सुनने में आता है कि सिर्फ कानून बनाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता, नहीं होगा. समाधान के लिए समाज में जागरूकता, स्त्रियों में चेतना और पुरुष मानसिकता में बदलाव अनिवार्य है. बिना शिक्षा के यह सब कैसे होगा ? सभी को शिक्षित करने योग्य संसाधन ही नहीं हैं और ऊपर से देश की जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है. ऐसे में विधायिका या न्यायपालिका या कार्यपालिका भी क्या कर सकती है ?



विकल्प की तलाश


दिल्ली के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्री एम.एम. अग्रवाल ने 24 अगस्त, 1990 को जगदीश प्रसाद को साढ़े तीन वर्षीया ममता के साथ बलात्कार के अपराध में आजीवन कारावास की सजा सुनाई. 5 सितम्बर, 1990 को यह भी निर्देश दिया कि ”जब तक संसद ऐसे मामलों में अनिवार्य बन्ध्याकरण का कानून नहीं बनाती, मुझे लगता है कि जघन्य अपराध के अपराधियों को स्वैच्छिक रूप से बन्ध्याकरण के लिए प्रोत्साहित करने की कोई शुरुआत की जानी चाहिए, ताकि ऐसे लोगों को जेल में बन्दी रखने के बजाय उनका कुछ लाभ/उपयोग उनके परिवारवाले उठा सकें. इसलिए मैं ऐसा निर्णय ले रहा हूँ कि अपराधी जगदीश स्वेच्छा से बन्ध्याकरण का ऑपरेशन, सरकारी अस्पताल से करवा ले (उच्च न्यायालय दिल्ली की पूर्व-सहमति से) तो उसकी कैद की सजा माफ मानी जाएगी.
कानून और न्याय के ऐतिहासिक प्रथम ‘क्रान्तिकारी’ फैसले की बहुत दिनों तक राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा (बहस) होती रही। होनी ही थी. निर्णय के खिलाफ अपील में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री पी.के. बाहरी ने पाया कि इस मामले में पुलिस के जाँच अधिकारियों ने शैतानीपूर्वक गड़बडिय़ाँ (घपले) की हैं. हालाँकि सत्र न्यायाधीश ने इनकी खूब प्रशंसा की है. बच्ची के योनिद्वार की झिल्ली थोड़ी फटी हुई पाई गई लेकिन यह जरूरी नहीं है कि ऐसा अपीलार्थी द्वारा लिंगच्छेदन के कारण हुआ हो. सर्वज्ञात है कि इतनी छोटी बच्ची के गुप्तागों पर हलका-सा भी दबाव पडऩे से झिल्ली फट सकती है. ऐसा लगता है कि अभियुक्त अपनी हवस के कारण लडक़ी से बलात्कार करना चाहता था. मगर लडक़ी के माँ-बाप के मौके पर पहुँचने के कारण कर नहीं पाया. अभियुक्त बलात्कार करने का अपराधी नहीं, बल्कि बलात्कार का प्रयास करने का अपराधी है.

अपीलार्थी की सजा भारतीय दंड संहिता की धारा 376 की अपेक्षा, धारा 511 के तहत बदली जाती है. वह साढ़े सात साल कैद की सजा पहले ही काट चुका है। अब उसे रिहा कर दिया जाए.बन्ध्याकरण के विषय में न्यायमूर्तियों का विचार था, ”विद्वान सत्र न्यायाधीश ने स्वेच्छा से बन्ध्याकरण का आदेश देकर ठीक नहीं किया. ऐसा आदेश पूर्णतया गैर-कानूनी है, क्योंकि उच्च न्यायालय के नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. न्याय मौजूदा कानून के आधार पर ही किया जाना चाहिए. कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अगर बलात्कार का अपराधी स्वेच्छा से बन्ध्याकरण करवा ले तो कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम सजा अदालत द्वारा माफ की जा सकती है. वही सजा दी जानी चाहिए जो कानून निर्माताओं (संसद) ने निर्धारित की है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश को ऐसा प्रस्ताव, जो कानून के अनुसार नहीं है, देने से, अपने आपको रोकना चाहिए था.80

विद्वान सत्र न्यायाधीश द्वारा बन्ध्याकरण (कॉस्टे्रशन) के आदेश का असली उद्देश्य अभियुक्त के परिवार को लाभ पहुँचाना है या अपराधी का ‘पुरुष चिह्न’ (लिंग) नष्ट करके अपमानित करना ? ऐसा करके वे कोई ‘नई शुरुआत’कर रहे हैं या महान् भारतीय संस्कृति की न्याय व्यवस्था के अतीत में लौट रहे हैं ? कॉस्टे्रशन का अर्थ बन्ध्याकरण या बधिया करना है और बधिया सिर्फ बैल या बकरे जैसे जानवारों को ही किया जा सकता है. पुरुषों को बधिया नहीं किया जा सकता। हाँ, नसबन्दी हो सकती है लेकिन उससे सम्भोग क्षमता पर क्या असर पड़ेगा ? खैर…उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों द्वारा ऐसे आदेश को गैर-कानूनी ही ठहराया जाएगा. इसे कानून और न्याय-सम्मत कैसे ठहराया जा सकता है? अब तो न ऐसा कोई नियम है और न कानून। बलात्कार का अपराध भले ही ‘जघन्यतम और क्रूरतम’ माना जाता हो, लेकिन सजा सख्त या कठोर होने की बजाय ‘मानवीय’ और ‘न्यायोचित’ ही होनी चाहिए, होती है. अपराधी पितृसत्तात्मक समाज की गन्दगी या कूड़ा है, लेकिन आखिर है तो उसी का उत्तराधिकारी. स्वयं अपने पुत्रों को ‘नपुंसक’ या ‘पौरुषहीन’ होने की सजा कैसे दे? सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण के लिए ‘बलात्कार का भय’ या ‘आतंक’ भी तो बनाए रखना जरूरी है. वरना ‘पुरुष वर्चस्व’ ही समाप्त हो जाएगा. वैसे भी ‘सभ्य समाज’ में ऐसी सजा देना बर्बर और अमानवीय ही माना जाएगा. नहीं, ऐसे विकल्प समस्या का समाधान नहीं.
क्रमशः…

घर/कहानी

नीरा परमार

 कविता, कहानी और शोध -आलोचना के क्षेत्र में योगदान. एक कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित . संपर्क : parmarn08@gmail.com

नीरा परमार हाशिये के साहित्यिक स्त्री विमर्श में उल्लेखनीय हस्ताक्षर है. कहानीकार, कवयित्री और शोधकर्ता के तौर पर उनका जो लेखन रहा है उसमें दलित, आदिवासी व वंचित समुदायों और स्त्री के प्रश्नों का मुख्य स्थान रहा है. उनकी यह कहानी जाति, वर्ग और स्त्री विमर्श तीनों कोण से पढ़ी जा सकती है.
फारूक शाह
कवि / आलोचक

बरसात खत्म होते-होते बंगला तैयार हो जाना चाहिए था. ठेकेदार को बंगले के मालिक ने कहा दिया था कि बंगलौर से आ रहे बेटे-बहू के साथ इस बार की बरसात वे नए बंगले में बिताएंगे. पुराने बंगले में रहते-रहते वे तंग आ चुके थे. नया बंगला वे बनवा भी बड़े शौक से रहे थे. ऊपर-नीचे बड़े-बड़े हॉलनुमा कमरे, बड़े-बड़े बरामदे विशाल लॉन, खुली छत, पूजा घर, सर्वेन्ट्स क्वाटर्स सब-कुछ उनकी छोटी-छोटी रुचियों और हुक्म को ध्यान में रखकर बन रहा था. इस बंगले को बनाने वाले रेजा-कुलिऐं में परबतिया और उसका घरवाला भी था. परबतिया और उसके घरवाले को इस बरसात अपने झोपड़े के खपरैल बदलने की चिंता खाए जा रही थी. पिछले साल ही उन दोनों ने कई बरसात से चूते घर की मरम्मत करवाने की ठानी थी, लेकिन घर पर एक के बाद एक मुसीबतें आती चली गईं और वे कर्ज में डूबते चले गए. पहले छोटे लड़के को मलेरिया हो गया, फिर परबतिया को माँ के मर जाने पर मायके चला जाना पड़ा. वहाँ से लौटी तो बूढ़ा ससुर कै-दस्त की चपेट में आ गया, वह जब तक सम्हले, सास ने खाट पकड़ ली. पिछली बरसात में छोटे-मोटे बरतन इधर-उधर रखे गए लेकिन पाँच-पाँच लड़का-लड़की, बूढ़ा और वे दोनों प्राणी बरसात की झड़ी में भीगते बीमार होते रहे. इस बरस अगर बरसात के पहले मरम्मत नहीं करवाई तो पूरे परिवार को पेड़ के नीचे गुजारा करना होगा.

बंगले की ढलाई आज खत्म हो गई थी. अब तेजी से टाइल्स बिछाने, दरवाजे़-खिड़कियाँ आदि लगवाने का काम शुरू होने वाला था. परबतिया की बड़ी लड़की मुँह अंधेरे उठकर माँ के काम में हाथ बंटाती, घर-आँगन बुहारना, कुएं से पानी लाना, भात पकाना ये सारे छोटे-बड़े काम वह माँ के साथ तेजी से निबटाती. सुबह ही बंगले पर पहुँचती. कल तक जहाँ सीमेंट और ईंट के बिखरे ढेर थे, आज वहीं भव्य आलीशान बंगला खड़ा था. सब मजदूरों ने झुलसती गर्मी में तन-मन से मेहनत की थी. देखते-देखते बंगले में शीशे की तरह चमकते रंग-बिरंगे टाईल्स बिछ गए. बाथरूम में हरे रंग के अन्य जगह हल्के भूरे. बगल की दीवारें भी हल्के पीले रंग में रंग उठी. एक-एक फर्श, एक-एक दीवारे चमक लिए अपनी खूबसूरती में एक दूसरे से जैसे होड़ लेने लगी. बंगले का मैनेजर दूसरे मजदूरों के साथ पुराने बंगले का फर्नीचर सजाने लगा. ड्राइंगरूम में आदमी समा जाए ऐसे मखमली विशाल सोफे, दीवान, दीवार तक सटे कारपेट, धूप-छांह से खेलते रेशमी पर्दें, विशाल झाड़फानूस, एक से एक नायाब कला कृतियाँ सज गई. बंगले के शयन कक्ष, पूजा-घर, बाथरूम भी धीरे-धीरे सामान से एक नयी आभा पाने लगे. बरामदे में भी लगा झूला जरा-सा छू लेने पर नदी में उठती लहरों-सा तरंगित हो उठता. सेठानी और कॉलेज में पढ़ने वाली उनकी बेटी नौकरों से सारा फर्नीचर इधर से उधर खिसकवाते रहती. सब इकट्ठे होते तो पुराने बंगले के दोष गिनाते और नए बंगले की एक-एक खूबियों की प्रशंसा करते नहीं अघाते.

परबतिया और उसका घरवाला मैनेजर के कहने पर बंगले के अंदर छुटा हुआ साफ-सफाई का काम निबटाने में लग गए. आसपास कोई नहीं रहने पर घरवाले की धीमी डपट के बावजूद परबतिया अपने खुरदरे हाथों से कभी रेशमी परदे को, कभी मखमली गलीचे तो कभी सोफे को छू लेती. सेठ जी के परिवार में उनकी लड़की का स्वभाव बहुत कड़ा था. इसलिए मैनेजर कोई ऐसी स्थिति आने न देना चाहता था, जिससे सबके सामने उसे जलील होना पड़े. बंगले का काम एक दो दिन में पूरी तरह से निबट जाने वाला था. सब मजदूर-रेजाओं को छुट्टी दे दी गई थी. बंगले की मालकिन ने परबतिया और उसके घरवाले को गृह-प्रवेश तक रोक लिया था. इधर रात-दिन की झड़ी से परबतिया के घर का खपरैल जगह-जगह से चूने लगा था. पूरा परिवार इस कोने से उस कोने में सोते-सोते आँखों में रात काट देता. छोटे-छोटे बच्चों को पानी से बचाने में वह स्वयं भींग जाती. चूल्हे की आग से आखि़र कितनी बार कपड़े सुखाती. दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भीगे कपड़ों में ठिठुरती झपकी लेती, पानी का वेग आँखें खोल देता, फिर किसी तरह सोने की कोशिश करती. सपने में बंगले के झिलमिलाते परदे, मखमल कालीन, ऊँचे पलंग दीखते. हड्डी ठिठुराती मिट्टी की दीवार से सटी परबतिया इन सबका कोमल स्पर्श याद करती अंधेरे में उसका घर और बंगला सब गड्डमड्ड हो जाता.

नए बंगले को दुल्हन की तरह सजाया गया था. सारे मेहमान आ चुके थे. सब कमरे चहल-पहल लिए खचाखच भरे थे. पूरा बंगला गेंदे के फूल और आम के पत्तों की मालाओं से सजाया गया था. गेट के बाहर विशाल तोरण द्वार बना था. दरवाजे़ के दोनों तरफ सुंदर गमले और केले के पत्ते पेड़ों की तरह सजाए गए थे. सुंदर अल्पना से बंगले का द्वार और भव्य लग रहा था. बंगले के पीछे वाले विशाल आंगन में मीठे पकवान की सुगंध वातावरण में भर उठी थी. इस बार की बरसात में ठंड लग जाने के कारण परबतिया की कमर और घुटने में तेज दर्द हो रहा था. सुबह से मालकिन के बताए कामों को वह चुपचाप दर्द दबाए किए जा रही थी, सबसे छोटे लड़के को रात भर तेज बुखार था, जिसके चलते वह एक पल सो नहीं पाई थी. काम करते-करते उसे बार-बार चक्कर आ रहे थे.
शहर में औरों के लिए पेशाब-पाखाने की थोड़ी-बहुत व्यवस्था होती ही है, लेकिन गरीब मजदूर रेजाओं के लिए ऐसी कोई सुविधा नहीं होती. मजदूर तो कहीं चले जाते हैं, लेकिन रेजाओं के लिए आड़ खोजना मुसीबत बन जाती है. ऐसे तो शर्म-लाज छोड़कर वे खड़े-खड़े ही पशु कर तरह पेशाब कर लेती हैं, लेकिन माहवारी के समय घर बैठना तो होता नहीं, ऐसे में उनका जीना दूभर हो जाता है. पखाने के लिए भी उनको प्राणों पर संकट आ जाता है. ठेकेदार की गालियों से बचते हुए वे जैसे-जैसे ये सब काम भी निबटा लेती हैं.

परबतिया सुबह से चार-पाँच बार बंगले के पिछवाड़े आड़ में गई थी. उसे एक घंटे से पेशाब लगा हुआ था. मालकिन की लड़की के एक के बाद दूसरे छूटते हुक्म के कारण वह साँस भी नहीं ले पा रही थी. पूजा-घर, बड़ा आँगन, बरामदा धोने-पोछने के बाद लड़की सिर पर सवार थी कि जल्दी से जल्दी बाथरूम धो दे. सुबह नौ बजे रहे थे. घर की औरतें छत पर रात में लगाई गई मेंहदी एक-दूसरे को दिखा रही थी. मेहमानों का आना शुरू हो गया था. परबतिया को पेशाब के लिए आँगन पार करके जाना होता. लड़की छत से उसे गुजरते देखती और चिल्लाने लगती. पेशाब का दबाव बढ़ने से परबतिया के पेट में जोरो से दर्द होने लगा. तबियत ठीक न होने से चक्कर आ रहे थे. उसका घरवाला सब्जियों, फलों और मिठाइयों की टोकरी ढो रहा था, नहीं तो वह उससे कहकर चुपचाप चली जाती. आज मिठाई रुपए मिलने के लालच में उसका घरवाला भी क्यों सुनता. वह तो मन ही मन खुश था कि रेजा-कुलियों में सिर्फ़ वह और उसकी घरवाली ही रोक लिए गए हैं. घर के नौकरों के साथ उन्हें भी ईनाम मिलेगा. परबतिया दर्द से दाँत भींच झाड़ू लेकर लड़कों के बेडरूम में घुसी. बाथरूम में जिस दिन हरे रंग का टाइल लग रहा था, उसी रात को उसका बूढ़ा ससुर रात भर दमे के कारण आँगन में छटपटाता खाट पर करवट-बदलते रह गया था. परबतिया का सुख-दुख इस बंगले की एक-एक ईट से जुड़ा हुआ था.

वह कल यहाँ से चली जाएगी, लेकिन बंगला बनाते समय किस तरह आंधी-पानी में उसने मुसीबतों का पहाड़ उठाया है, ये सारी बातें इन दरवाजों-दीवारों में कैद रहेंगी. किस तरह पीड़ा से कराहते हुए उसने माथे पर तसला उठाए ईट-गारा ढोया है, क्या वह एक-एक घड़ी को भूल सकती है. लड़की बहुत ही शौकीन मिजाज थी. बाथरूम में गुलाबी रंग का बाथ-टब था. नए चमचमाते स्टील के नल, झरने, साबुन, शैम्पू की शीशियाँ और छोटे-बड़े नैपकिन-तौलिए करीने से रखे हुए थे. एक तरफ नक्काशीदार बड़ा-सा आईना लगा हुआ था. परबतिया थोड़ी देर के लिए सारा दर्द भूल इस साफ जगमगाती दूसरी दुनिया को देख भौंचक्की रह गई. अचानक उसे लगा कि वह पेशाब के दबाव को रोक नहीं पाएगी. दर्द पूरे शहर में जैसे लहरें लेने लगा. पीड़ा की तेज लहर उसको संज्ञा-शून्य किए दे रही थी. लग रहा था उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है. बाथरूम का दरवाज़ा उसने उढ़का दिया, हड़बड़ी में दरवाज़ा बंद करे इसके पहले ही वह राहत की लंबी साँस लेकर बैठ गई. कुछ देर के लिए उसका सारा तनाव ठहर गया. लड़की का क्रोध, मेहमानों की चहल-पहल, हवन की अग्नि का पवित्र धुआँ, वह मिल रही राहत में जैसे सब कुछ भूल गई.

अचानक धड़ाक से बाथरूम का दरवाज़ा खुला ‘ओ माई गॉड’ की आतंकमयी चीत्कार के साथ दरवाज़ा बंद हो गया. चीख लड़की की थी. परबतिया का इतनी देर से रुका हुआ पेशाब रुकने का नाम नहीं ले रहा था. उसने भय से आँखें बंद कर ली. बाथरूम के बाहर लड़की की चीख-पुकार से भीड़ जमा हो गई. मालकिन और उनकी लड़की बेतहाशा गालियाँ दिए जा रही थी. परबतिया ने बाथरूम में बड़ी बाल्टी से दो-तीन बाल्टी पानी डाल दरवाज़ा खोल दिया. लड़की के कमरे में भीड़ जमा हो गई थी. बंगले के मालिक, बंगलौर वाले बेटे-बहू, मैनेजर और कपड़े-जेवर से लदी औरतें कमरे में जमा थी. लड़की की आँखें गुस्से, घृणा और जुगुप्सा से बाहर निकली जा रही थी. रोष से जबान लड़खड़ा रही थी. उसका घरवाला भय और अचरज से उसको घूरे जा रहा था. लड़की का तमतमाया, लाल हुआ गोरा मुँह विकृत हो उठा था, ‘‘जरा इस कमीनी की हिम्मत तो देखो. आज गृह-प्रवेश के दिन पूजा-पाठ के समय महारानी यहाँ घुसी हुई है.’’ उसने क्रोध से फूट पड़ते हुए उँची एड़ी का सैंडल हाथ में ले लिए, ‘‘ठहर अभी मजा चखाती हूँ. हरामज़ादी, तेरी यह मजाल!’’ चारों तरफ ‘मारो साली को’ की आवाज़ें आ रही थी. ‘‘माफी दे दो छोटी मालकिन, जी अच्छा नहीं था, इसलिए ऐसी ग़लती हो गई,’’ परबतिया ने आँसुओं से तर चेहरा लिए हाथ जोड़ दिए.

क्रोध तो बंगले के मालिक-मालकिन को भी आ रहा था. लेकिन आज के दिन वे कोई हंगामा नहीं चाह रहे थे. मालिक ने मालकिन को हुक्म सुना दिया कि इन कमीनों को अभी घरसे बाहर करो. मालिक पत्नी पर बरस रहे थे कि इतने नौकर-चाकर के रहते हुए इन रेजा-कुली को रोकने की क्या जरूरत थी. परबतिया का घरवाला अपना गुस्सा काबू में रख नहीं पाया. कहाँ तो उसने सोचा था कि दो शाम का खाना और ईनाम लेकर घर जाएगा और कहाँ मेहनत-मजदूरी के रुपए भी गंवाने पड़ रहे थे. उसने बरामदे में पड़ा मोटा डंडा उठा लिया और परबतिया की कमर पर एक लात जमाते हुए उसे डंडे से धुनने लगा. दाँत पीसते हुए परबतिया का झोटा पकड़ घसीटते हुए घर ले जाने लगा, ‘‘साली मेमसाब की चाल सीखती है. चल कुतिया घर चल, आज शाम को हाँडी नहीं चढे़गी न तो सब शौख निकलता हूँ तेरा…’’ परबतिया के घरवाले पर जैसे भूत सवार था. रोती चिल्लाती घरवाली को माँ-बहन की गंदी-गंदी गालियाँ देता घसीटता वह उसे घर ले रहा था.

यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : छठी क़िस्त

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि ‘आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.’ उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.’जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ‘ जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?’ यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.

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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा : पहली क़िस्त 

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यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा: चौथी  क़िस्त
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आरोप झूठा है : गवाह ‘खतरनाक’ छठी क़िस्त 


एक अन्य मामले में छह वर्षीया मंजू के साथ मई, 1988 में बलात्कार का प्रयास किया गया. सत्र न्यायाधीश ने मई, 1990 में तीन साल कैद और 500 रुपए जुर्माना किया. लेकिन पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति ने जनवरी, 1994 में गवाहों के बयान में विसंगतियों के आधार पर केस को झूठा मानते हुए, अभियुक्त को सन्देह का लाभ देकर बरी कर दिया. न्यायमूर्ति ने कहा, ”मंजू स्वयं बच्ची है और वह गवाहों की उस ‘खतरनाक श्रेणी’ में आती है, जिन्हें आसानी से उनके माता-पिता या बुजुर्ग, अपने निजी स्वार्थों के लिए, बेबुनियाद आरोप लगाने के लिए बहका सकते हैं. रिपोर्ट में मात्र पाँच घण्टे की देरी को अस्वाभाविक मानते हुए न्यायमूर्ति ने लिखा, ”यह तथ्य स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि अपीलार्थी को फँसाने के लिए काफी समय उपलब्ध था.61 बच्चे गवाह नहीं हो सकते, उनकी गवाही ‘खतरनाक’ है. उन्हें बहकाना आसान है और ‘निजी स्वार्थों’ के लिए, माँ-बाप ‘बेटी से बलात्कार’ का ‘झूठा आरोप’ भी लगा सकते हैं. बदलते भारतीय समाज की संरचना को समझने के लिए, ऐसे निर्णय वास्तव में ही ‘उल्लेखनीय हैं। विशेषकर समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए.इसके विपरीत नौ वर्षीया रेखा के साथ बलात्कार के मामले में अभियुक्त ने अपने बचाव में तर्क दिया कि आपसी रंजिश की वजह से उसे सबक सिखाने के लिए झूठे मुकदमे में फँसाया गया है. कलकत्ता उच्च न्यायालय के
न्यायमूर्ति श्री जे.एन. होरे और ए. राजखोवा ने कहा, ”आपसी रंजिश का तर्क एक दुधारी तलवार की तरह है जो दोनों तरफ से काटती है…हमें लगता है कि इस बात की बहुत कम सम्भावना है कि अभियुक्त को ऐसे अपराध के झूठे इल्जाम में फँसाया गया हो, जिससे लडक़ी की प्रतिष्ठा और भविष्य प्रभावित होते हों और छोटे से आपसी झगड़े की वजह से सामाजिक दाग लगता हो.62 ऐसे घृणित अपराध में झूठे अपराध लगाना सम्भव है या नहीं, इसका सही जवाब बेटी के माँ-बाप ही दे सकते हैं.

एक और मामले में चौबीस साल के नवयुवक ने दस साल की स्कूल जाती लडक़ी के साथ, गन्ने के खेत में बलात्कार किया. अभियुक्त के वकीलों ने अपील में कहा, ”अभियुक्त की सही पहचान नहीं हुई है. रिपोर्ट देरी से दर्ज कराई गई है और अभियुक्त चौबीस वर्षीय नौजवान है, जिसके पास ‘उज्ज्वल भविष्य’है. इसलिए सजा कम करने में नरम रुख अपनाया जाए. लेकिन उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री राधाकृष्ण राव ने कहा, ”यह एक भयंकर अपराध है जो सुबह आठ बजे, दिन-दहाड़े दस साल की मासूम बच्ची के साथ किया गया। यह उस लडक़ी का जीवन भर पीछा करता रहेगा। रहम का कोई कारण नहीं है. रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी के तर्कों को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति ने लिखा है, ”विशेषकर बलात्कार और छेड़छाड़ के मामलों में औरतें या उनके सम्बन्धी स्वाभाविक रूप से थाने में रपट दर्ज कराने से पहले दो बार सोचते हैं. गाँवों में यह और अधिक होता है, क्योंकि इससे पीडि़ता के परिवार की प्रतिष्ठा और इज्जत जुड़ी हुई है.63 गाँव के खेत में बेरहमी से बलात्कार के एक और केस में दस वर्षीया लडक़ी के साथ बलात्कार करनेवाले बीस वर्षीय युवक के वकीलों ने बहस में कहा, ”गाँव में पार्टीबाजी की वजह से लडक़ी के बाप ने अभियुक्त को गलत मुकदमे में फँसाया है. लेकिन उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा, ”कोई भी आदमी इस हद तक नीचे नहीं गिरेगा कि वह पार्टीबाजी की वजह से अपनी नाबालिग बेटी के भविष्य को, बलात्कार के आरोप लगाकर दाँव पर लगा दे. न्यायमूर्ति श्री डी.जे. जगन्नाथ राजू की यह टिप्पणी भी महत्त्वपूर्ण है, ”खेत की रखवाली के लिए भेजी गई लडक़ी के साथ बहुत ही अमानवीय ढंग से बलात्कार किया गया है. इस तरह के अभियुक्त के साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति नहीं दिखाई जा सकती। याद रखना चाहिए कि ग्रामीण इलाकों में अकेली औरतें खेतों में कृषि-कार्य करती हैं. अगर इस प्रकार के अभियुक्तों के साथ ढंग से व्यवहार नहीं किया गया तो खेतों में अकेली काम करनेवाली औरतों की कोई सुरक्षा या संरक्षा ही नहीं रह जाएगी.64

छोटी उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में कुछ न्यायमूर्तियों की भाषा अपेक्षाकृत संयमित और संवेदनात्मक है। परन्तु कुछ निर्णय पढ़ते हुए, अभी भी लगता है कि न्यायमूर्ति सिर्फ कानून और न्याय की भाषा ही जानते हैं. दस-बारह साल की बच्ची के अपहरण और बलात्कार के एक मामले में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री जी.एस.एन. त्रिपाठी डॉक्टरी रिपोर्ट का पोस्टमार्टम करते हुए कहते हैं, ”तो मैं कह सकता हूँ कि लडक़ी काफी लम्बे समय से सम्भोग की आदी थी और ”मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि यह एक भ्रष्ट चरित्र की लडक़ी थी और बिना अन्य प्रमाणों के, सिर्फ उसका बयान सजा सुनाने के लिए पर्याप्त नहीं है.65 ऐसी भ्रष्ट चरित्र की लडक़ी के आरोपों को ‘विश्वसनीय’, कैसे माना जा सकता है? ‘विद्वान सत्र न्यायाधीश को फौजदारी कानून का बिलकुल कुछ ज्ञान ही नहीं था. वरना…ऐसे बेबुनियाद मुकदमे में सजा सुनाता. सजा देने का अधिकार नहीं उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्तियों द्वारा लिखी कानून और न्याय की ऐसी ‘मानवीय’, ‘संवेदनशील’ और नैतिक संस्कारों में बँधी भाषा के बीच, मुझे दिल्ली की जिला अदालत के एक युवा मजिस्टे्रट श्री राजकुमार चौहान द्वारा सुनाया एक फैसला अक्सर याद आ जाता है. आठ वर्षीया चन्दा के साथ, उसके अपने पिता द्वारा अप्राकृतिक मैथुन के मामले की वर्ष भर में सुनवाई समाप्त करने के बाद, मजिस्टे्रट चौहान ने अपने अविस्मरणीय निर्णय में लिखा कि ”इस मुकदमे की सुनवाई के दौरान मुझे हमेशा अहसास होता रहा कि मैं स्वयं कटघरे में खड़ा हूँ. चन्दा द्वारा अपने पिता के विरुद्ध लगाए गम्भीर (पवित्र) आरोप, सचमुच आश्चर्यचकित करनेवाले थे और पिता का अपराध बेहद घृणित. लडक़ी की माँ सरस्वती की आँसू-भरी चीखों और इस आत्मलाप को सुनने के बाद मेरा हृदय और आत्मा तक आहत ही नहीं, बल्कि लहूलुहान हो गए कि अगर मुझे सपने में भी खयाल आ जाता कि मेरा पति ऐसा दुष्कर्म करेगा तो मैं उसके बच्चों की माँ ही नहीं बनती.



मजिस्टे्रट चौहान ने अपने निर्णय में संयुक्त परिवारों के विघटन, औद्योगिकीकरण से लेकर एकल परिवारों में पुरुष वर्चस्व की ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए लिखा है कि न्यायाधीश की भूमिका तो शुरू ही तब होती है, जब खेत की मेड़ ही घास खा चुकी होती है. खैर अभियुक्त को पूर्ण रूप से दोषी मानते हुए श्री चौहान ने अपना फैसला मुख्य दंडाधिकारी को भेजा, जिन्होंने अभियुक्त को छह वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई. इसके विरुद्ध अभियुक्त ने सत्र न्यायाधीश के यहाँ अपील दायर की और फिर जमानत पर छूट गया. कोई नहीं जानता कि ऐसी अपीलों का अन्तिम फैसला कब होगा. क्या होगा ?  यहाँ यह बताना जरूरी है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक मैथुन) की सुनवाई का तो अधिकार मजिस्टे्रट को है लेकिन उसे तीन साल कैद से अधिक सजा सुनाने का अधिकार नहीं है. जबकि इस अपराध के लिए अधिकतम सजा आजीवन कारावास या दस साल कारावास और जुर्माना निर्धारित की गई है या तो ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार सत्र न्यायाधीश को होना चाहिए या फिर मजिस्टे्रट को सुनवाई का ही नहीं, सजा देने का भी अधिकार हो। वरना…उचित न्याय कठिन है.


बहस दोबारा होऽऽ

नन्दकिशोर रथ बनाम नन्दा उर्फ अनन्त सोहरा वह अन्य66 में 30 जनवरी, 1985, रात आठ बजे, गाँव रंभा, जिला कटक में आठ साल की लडक़ी चम्पीना गाँव में कथक देखने जा रही थी कि रास्ते में अभियुक्त उसे पकडक़र घर ले गया और बलात्कार किया. खून से भीगी पैंट पहने लडक़ी घर पहुँची  तो जाकर माँ को बताया. रात करीब नौ बजे पिता घर लौटे तो माँ-बेटी दोनों बैठी रो रही थी. डॉक्टरी रिपार्ट के अनुसार भी बलात्कार प्रमाणित हुआ लेकिन सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को बाइज्जत बरी कर दिया और कहा कि ”सिर्फ लडक़ी के बयान के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती और बयान की पुष्टि अन्य प्रमाणों से नहीं हो रही है. 1986 में सत्र न्यायाधीश के निर्णय के विरुद्ध लडक़ी के पिता ने उड़ीसा उच्च न्यायालय में पुनर्समीक्षा याचिका दायर की. सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री बी. गोपालास्वामी ने मुकदमे के तथ्यों, गवाहों और प्रमाणों के साथ सर्वोच्च न्यायालय के अनेक फैसलों के आधार पर निर्णय दिया कि सहायक सत्र न्यायाधीश का निर्णय गलत तर्क और न्यायिक दृष्टिकोण की कमी का परिणाम है जो कानून की निगाह में उचित नहीं ठहराया जा सकता. सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को छोडक़र गम्भीर गलती की है और यह मानना भी गलत है कि पीडि़त लडक़ी की गवाही की पुष्टि के लिए अन्य प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. चार साल बाद 14 अगस्त, 1990 को न्यायमूर्ति गोपालास्वामी ने मुकदमा, सत्र न्यायाधीश को दोबारा बहस सुनने तथा कानून के अनुसार शीघ्र-अति-शीघ्र निर्णय करने लिए वापस भेज दिया. इसके बाद क्या (न्याय) हुआ कहना कठिन है.

कर्नाटक राज्य बनाम महाबलेश्वर जी नामक67 मामले में अभियुक्त की उम्र अठारह साल और बलात्कार की शिकार लडक़ी पलाक्षी की उम्र पन्द्रह साल थी. लडक़ी नवीं कक्षा की छात्रा थी. 3 अक्टूबर, 1977 को दोपहर दो बजे के करीब लडक़ी स्कूल से लौट रही थी तो अभियुक्त उसे पकडक़र पास के जंगल में ले गया, जहाँ उसने जबर्दस्ती बलात्कार किया. लडक़ी ने अपनी माँ और भाई को बताया कि अभियुक्त ने जंगल में ले जाकर जबर्दस्ती उसे ‘बरबाद’ किया है. गिरफ्तारी के बाद मुकदमे की शुरुआत होने से पहले ही पलाक्षी ने आत्महत्या कर ली और इसका लाभ मिला अभियुक्त को क्योंकि सत्र न्यायाधीश और उच्च न्यायालय ने पीडि़ता (लडक़ी) की गवाही न होने की स्थिति में सन्देह का लाभ देते हुए अभियुक्त को बलात्कार के अपराध से बरी कर दिया. हालाँकि चोट पहुँचाने के अपराध में सिर्फ चार महीने कैद की सजा सुनाई. राज्य सरकार द्वारा 1979 में दायर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति श्री एस. रतनेवल पांडियन और एम.एम. पंछी ने कहा कि ”सिर्फ इस कारण से कि पीडि़ता की मृत्यु हो गई है और वह गवाही के लिए उपलब्ध नहीं है. अभियुक्त को बरी नहीं किया जा सकता अगर अभियुक्त के अपराध को प्रमाणित करनेवाले अन्य साक्ष्य उपलब्ध है. सर्वोच्च न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्त को बलात्कार के अपराध का दोषी पाते हुए पाँच साल कैद की सजा सुनाई. यह दूसरी बात है कि राज्य सरकार द्वारा दायर 1979 की याचिका का फैसला 15 मई, 1992 तक सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन पड़ा रहा.



बेटी से बलात्कार : ‘क्षणिक उत्तेजना

अब्दुल वहीद बहादुर अली शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य68 वह मुकदमा है जिसमें एक बाप ने खुद अपनी ही सात साल की बेटी प्रवीण के साथ 21 दिसम्बर, 1985 की रात बलात्कार किया. अदालत में बाप के बचाव के लिए वकीलों ने बार-बार सात साल की बेटी से ही पूछा कि वह चीखी क्यों नहीं ? चिल्लाई क्यों नहीं? शोर क्यों नहीं मचाया? वही ‘बलात्कार’ का अनिवार्य कर्मकांड. वही फिल्मी सीन और वह नहीं तो बलात्कार हुआ कहाँ ? हर सम्भव कोशिश यह प्रमाणित करने की कि उसने अपराध नहीं किया, जबकि सारे सबूतों और गवाहों के चेहरों पर अपराध साफ दिखाई दे रहा था. 1988 में सत्र न्यायाधीश ने बलात्कार के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनाई लेकिन अपील में बम्बई उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री एस.एम. दाऊद और एम.एफ. सलदाना ने 16 जनवरी, 1992 को आजीवन कारावास की सजा घटाकर 10 साल कैद कर दी. हालाँकि उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने लिखा है, ”इस मुकदमे में सत्र न्यायाधीश ने काफी सख्त, गम्भीर दृष्टिकोण अपनाया है और हमारे विचार से ऐसा ठीक ही किया है. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि यौन अपराध अपीलार्थी द्वारा अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ किया गया है. यह कारण काफी हद तक अपराध की संगीनता को बढ़ाता है और हमारे विचार से सख्त सजा की ही नहीं, बल्कि कड़ी सजा की माँग करता है…

अपीलार्थी के वकील ने सजा कम करने के लिए एक तर्क यह भी दिया कि ”इस केस को उन केसों के बराबर नहीं समझना चाहिए, जिसमें बेबस औरतों व बच्चों पर हवस पूरी करने के लिए क्रूर  ताकत का इस्तेमाल किया गया हो. तथ्यों के आधार पर ज्यादा-से-ज्यादा इसे क्षणिक उत्तेजना का अपराध माना जा सकता है. दूसरी तरफ सरकारी वकील का कहना था कि बाप द्वारा अपनी ही नाबालिग सात साल की बेटी के साथ बलात्कार से ज्यादा घृणित और जघन्य अपराध और क्या होगा? इसलिए अपराधी को अधिकतम सजा दी जानी चाहिए. न्यायमूर्तियों ने लिखा है, ”हम स्वीकार करते हैं, जैसा कि विद्वान सरकारी वकील ने दर्शाया है कि यह अपराध जघन्य भी है और क्रूरतापूर्ण  भी लेकिन यह भी आवश्यक है कि स्थितियों का सम्पूर्ण जायजा लेकर ही निर्णय करना चाहिए. अपीलार्थी झुग्गी में रहता है, उसकी गरीबी ने उसे ऐसे कठिन हालात में डाल दिया है कि वह छोटी-सी जगह में रहने को विवश है. इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. रिकॉर्ड बताता है कि उसकी पत्नी उसे तीन साल पहले ही छोडक़र चली गई थी. अपीलार्थी समाज के सबसे निर्धन वर्ग का व्यक्ति है. शिक्षा से पूर्ण रूप से वंचित होने के कारण संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए, उसे सामान्य बोध तक का अवसर नहीं मिल पाया… रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है कि अपीलार्थी की यौन अपराध करने की कोई पृष्ठभूमि हो. यहाँ तक कि दुव्र्यवहार तक नहीं. दूसरी तरफ हम देखते हैं कि हालाँकि उसकी पत्नी उसे छोड़ गई है या फिर भी वह नाबालिग बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजता है, खाना बनाता है या होटल से लाता है, सारा दिन काम करता है. कभी-कभी उनके लिए खिलौने लाता, जेबखर्च देता और रात को आकर खाना बनाता था. यह वे परिस्थितियाँ हैं जो हमें यह मानने के लिए कहती हैं कि अपीलार्थी की दयनीय स्थिति के कारण, उससे हुई ये क्षणिक भूल थी.

 एक तरफ अपराध सख्त से सख्त सजा की माँग करता है दूसरी तरफ ऐसे कारण हैं जो हमें ‘उचित सीमा’ में रहने को विवश कर रहे हैं. काफी ध्यान से विचार करने के बाद, हमारे विचार से दस साल कैद की सजा उचित और काफी रहेगी. क्या यहाँ ‘इनसैस्ट की ‘थियरी’ नहीं दी जा रही ? परिस्थितियों का विवरण बलात्कार की वैधता बताने के लिए दिया जाता है. यह अक्सर होता है, होता रहा है. पिछले कुछ सालों में पिता द्वारा अपनी ही बेटी (या सौतेली बेटी) के साथ बलात्कार या यौन शोषण और उत्पीडऩ के अनेक मामलों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है. इन मामलों में पिता किसी झुग्गी-झोंपड़ी में रहनेवाला अनपढ़ या निर्धन व्यक्ति नहीं. 1994 में गृह मंत्रालय के ‘अंडर सेके्रटरी’ के. सी. जाखू एंड पार्टी के विरुद्ध बलात्कार, अप्राकृतिक मैथुन, यौन शोषण और उत्पीडऩ और अपहरण का केस दर्ज हुआ था. इसमें जाखू की छह वर्षीय बेटी का आरोप था कि उसके पिता उसे दफ्तर ले जाते. दफ्तर से अपने दोस्तों व महिला मित्रों के साथ होटल। वहाँ वे शराब पीते, ब्लू फिल्म देखते और सामूहिक सम्भोग करते. उसके पिता उसे भी शराब पिलाते, कपड़े उतारते और अँगुली योनि व गुदा में डाल देते. घर में भी रात को माँ व बहनों को बेहोश करने के बाद मुख मैथुन करते-करवाते. सत्र न्यायाधीश ने सब अप्राकृतिक मैथुन और मर्यादा भंग करने सम्बन्धी आरोप तो लगाए लेकिन बलात्कार का मुकदमा चलाने से इनकार कर दिया. इस निर्णय के विरुद्ध लडक़ी की माँ सुदेश जाखू ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की.