Home Blog Page 118

प्रेम का मर्सिया

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

एक अज्ञेय और रहस्यमय फ़रिश्ते-सा
नीली आँखों वाला वह ख़ूबसूरत अजनबी
मिल गया मुझे सरेराह किसी समंदर किनारे.
समंदर की लहरों और वाल्टर रूमेल के पियानो की धुनों के साथ
अपनी उँगलियों के स्पर्श से निकलते नैसर्गिक संगीत से झंकृत कर दिया उसने मुझे और
तरंगित कर दिए मेरी मन-वीणा के तार और
उतर गया एक मधुर संगीत-लहरी के साथ मेरे जिस्म में…मेरी रूह में.
हमारी आत्माएं जुड़ गईं एक-दूसरे से किसी रहस्यमयी शक्ति के माध्यम से
हमारी युवा भुजाएं प्रेम के पंखों में तब्दील होने लगीं धीरे-धीरे और
अस्त होते सूर्य की समुद्र पर पड़ती सुनहरी-नारंगी किरणों की पृष्ठभूमि में नाच उठे हम.
मेरे जीने की उमंगों को एक बार फिर भर दिया उसने
पूरे उत्साह और पूरी तन्मयता से
और मेरी भावनाओं को दिए नए आयाम
मेरी कविताओं में रंग भरने लगे
नाच उठी मैं अपने गीतों में अपनी उन मुद्राओं के साथ
जो आकर्षित करती प्रतीत होती हैं
अंतरिक्ष से ऐसी काल्पनिक चीज़ों को
जो हमें जीती-जागती लगने लगती हैं.
दुनियावी चीज़ों की तरह
खेलने लगी मैं
छायाओं और बिम्बों का चमत्कारी खेल
न जाने कितनी ही बार घुली-ढली मैं
अपनी ही देह में.
मैं हवाओं से वे बातें करने लगी थी
जिन्हें सुनने के लिए तड़पता था वह
और मेरे आने से पहले तक शायद सपने में भी नहीं सोचा था उसने इन बातों के बारे में.
ज्यों-ज्यों वह बतलाता जा रहा था जीवन का रहस्य
अपनी अधमुंदी-अधखुली पलकों को झपकते हुए
मेरी भी चिरंतन, उसकी आँखों में झांकती आँखें
टपका रही थीं
एक बिलकुल नए रचे हुए जिस्म की आँखों में झांकते रूह का प्रेम.
मेरी देह में बज उठी बीथोवन की नौवीं सिम्फ़नी और नाच उठी मेरी कविताओं में भविष्य की नर्तकी
लेकिन वह दिन धीरे-धीरे आने लगा था जब मेरे पुकारते रहने पर भी



वह विलीन हो जाता था समंदर की लहरों में
मेरे ही सामने से गुज़र जाता था अक्सर
किसी का हाथ पकडे दौड़ते हुए.
मेरा जिस्म अब ताबूत में तब्दील होने लगा था
जिसमें वही ठोंक रहा था कीलें
मेरे दिल पर पड़नेवाली हर एक चोट
बज रही थी प्रलाप के आख़िरी वाद्य-सी.
कोंते रॉबर्त द मान्तेस (सौंदर्य की महिमा का रसीला बखान करनेवाला कवि) की कविताओं-सरीखी मैं
अब उधेड़ी जा रही थी.
होने लगी थी शिथिल और असहाय
मेरी आँखें आंसुओं की जगह ख़ून बरसाने लगी थीं और मैं तब्दील होती जा रही थी धीरे-धीरे
शहादत की मज़ार में
पल-पल मृत्यु को अपनी आगोश में समेटे
रिसते घावों की एक अंतहीन श्रृंखला लिए
बदलने लगा था मेरा अलौकिक संगीत पीड़ा के प्रलाप में
पीड़ा और कराहों के मरघट में खड़ी मैं
गाने लगी थी मौत का कारुणिक गीत
पढने लगी थी मर्सिया.
उसके सुलगते आलिंगनों और दहकते प्रेम को तृप्त करती रही मैं अपनी आहत आत्मा और देह की पूरी ताकत से.
देती रही उसे
प्यार…प्यार…प्यार…और…और ज़्यादा प्यार.
पर इस क्रम में चलना पड़ा मुझे बर्फ़ की-सी आंच पर
किसी साज़ के तार की तरह बार-बार टूटती रही मैं प्रेम के संगीत-पद के बींचोंबीच.
अपनी इस पीड़ा भरी मनोदशा के दौरान भी
मैं तलाशती रही नई अभिव्यक्तियाँ
ख़ुद को परिभाषित करने के लिए.
प्रेम को लेकर एक बार फिर मैं धोखे में थी.
जिस फ़रिश्ते को मैं जानती थी
वह आकंठ डूबा था…भरा था विनम्रता और मिठास से
पर उसके पास एक गहरी दृष्टि भी थी चाहत और उन्माद से भरी.
वह शब्दों के पार देख सकता था.
संगीत में उन्माद के अर्थ को व्याख्यायित कर सकता था.
एक सनक भरे पागलपन के साथ जब वह बजाता था एक वाद्यंत्र की तरह मुझे

तो मेरी मसें भींगने लगती थीं
रगें निचुड़ने लगती थीं
आत्मा विद्रोह करने लगती थी.
मेरी आँखों की पुतलियाँ कामनाओं से भर जाया करती थीं लबालब
पर ज्योंही छलकने को होती थीं ये कामनाएं
होने लगती थी एक वितृष्णा-सी मुझे उससे.
मुझे पता था कि
उसके प्रेम में मैं जलते हुए कोयलों पर थिरक रही थी
लेकिन उसी एक लम्हे में
चल भी रही थी समुद्र पर
उड़ रही थी हवाओं के पार…आसमान से परे भी
अपनी पूरी पीड़ा और पूरे उल्लास के साथ.
मेरे भीतर अब एक प्रेमिका मरने लगी थी और जन्म ले रहा था एक हत्यारा शैतान
जो रोज़ क़त्ल करता रहता था ख़ुद का ही लम्हा-लम्हा
जैतून के फूलों-से हल्के सफ़ेद प्रेम-पंख
अब सफ़ेद बर्फ़ में तब्दील होने लगे थे
आहिस्ता-आहिस्ता.

‘राष्ट्रहित और आरक्षण’

मुन्नी भारती


मुन्नी भारती, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों में भी सक्रिय हैं . संपर्क :munnibharti@gmail.com

आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक न्याय की धारणा के  तहत ही की गई. सदियों से दलित, पिछड़ों और आदिवासियों को वंचित रखने के  लिए तरह–तरह के  हथकंडे अपनाए गए, जिसमें सबसे बड़ा और कारगर हथकंडा ईश्वरीय शक्ति का भय था . इस भय के  कारण इस देश का एक बड़ा हिस्सा दिन–प्रतिदिन बद–से–बदतर जीवन यापन करने को मजबूर होता चला गया. इसी पीड़ादायी जीवन से मुक्ति के  लिए सामाजिक न्याय की अवधारणा सामने आई या यूं कहें कि देश की देश की वो जनता, जिसको हर तरह के  हक अधिकारों  से वंचित किया गया, उन्हीं अधिकारों की प्राप्ति के  लिए सामाजिक व्यवस्था है, जो वंचितों को सामाजिक न्याय दिलाने का सबसे बड़ा हथियार है .आरक्षण का प्रावधान  समता, स्वतंत्रता और बंधुता के  निर्माण के लिए किया गया . संविधान  की धारा 14 के  अनुसार कानून के  समक्ष सब बराबर हैं . डॉ.बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने कहा है किequality is coming in the way of equality इसलिए इस देश के  दलित, पिछड़ों और आदिवासियों को गैर बराबरी का दर्जा देना संविधान तथा आरक्षण विरोधी तो है ही, राष्ट्र विरोधी भी है. यह साबित हो चुका है कि सदियों से विसमतामूलक सामाजिक एवं धार्मिक  दंड विधान ने जिन शूद्र–अतिशूद्र एवं स्त्रियों को सभी प्रकार की गारन्टी देने वाली धाराओं की उद्देश्यपूर्ति के  लिए ही आरक्षण की व्यवस्था की गई थी .

भारतीय इतिहास में ज्योतिबा राव फुले सयाजी राव गायकवाड़, चर्मराज वाडयाल, शाहूजी महाराज जैसे अनेक महापुरुष वंचितों के  हक व लड़ाई लड़े हैं. उन्हीं महापुरुषों में से एक उत्तर प्रदेश के  स्वामी अछूतानंद हरीहर थे . 1922 में जब ‘प्रिंस ऑपफ वेल्स’ भारत भ्रमण के  लिए आया तो कांग्रेसियों  ने देशव्यापी स्तर पर प्रोटेस्ट करके  उसका विरोध किया, क्योंकि स्वामी अछूतानंद के  नेतृत्व में दिल्ली के  लालकिला में ‘विराट अछूत सम्मेलन’ का आयोजन किया गया था जिसका चीफ गेस्ट प्रिंस ऑफ वेल्स था. उस सम्मेलन में लगभग पच्चीस हजार दलित भाग लिए थे. प्रिंस ऑफ वेल्स का दलितों ने भव्य स्वागत किया और उसके  सामने अछूतानंद ने ‘मुल्की हक’  का मांग पत्र रखा कि अछूतों को हर क्षेत्र में अधिकार दिये जाएं, जिससे उन्हें शोषण से मुक्ति मिलें. उस समय कई मांगें मान ली गई थीं और अनेक राज्यों में लागू भी हुई थीं. 1931–32 में बाबा साहब डॉ. आंबेडकर  ने व्यापक स्तर पर संवैधानिक रूप से आरक्षण के  लिए जो संघर्ष किया वह अद्वितीय है. निश्चित रूप से आरक्षण लागू करवाने में बाबा साहब का रोल सबसे बड़ा है .विश्व में जहां कहीं भी सामाजिक असमानता या रंगभेद है, वहां आरक्षण है. भारतीय समाज–व्यवस्था तो जातिगत भेदभाव का पिटारा है.

जापान में ऊँच–नीच की भावना के  तहत बराकुमीन, योरोप में अफरमेटिव एक्शन, चीन में आदिवासियों और अमेरिका में रंगभेद, नस्लभेद पर आधारित ‘रिवर्स डिस्क्रीमीनेशन’ तथा डाईवर्सिटी नामक आरक्षण प्रणाली लागू है. वहां उनकी जनसंख्या के आधार पर सभी प्रकार के  ठेकों, सप्लाई आदि में आनुपातिक हिस्सेदारी दी जाती है. अश्वेत अफ्रोअमेरिकनों  को कम ब्याज पर ऋण  तथा उनके  बच्चों को शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दिया जाता है. यदि आरक्षण से योग्यता या दक्षता में कमी आती और उसके  कारण देश का विकास रुक जाता, तो आजतक वे देश गर्त में जा चुके  होते, लेकिन नहीं आज वो विकसित देश हैं और उल्टे योग्यता का डंका पीटने वाला भारत आज भी अविकसित की श्रेणी में खड़ा है. बाबा साहब ने इजराइल के  यहूदियों के  बारे में बहुत ही रोचक तथ्य बताया है. यहूदियों के  साथ इसलिए अत्याचार होता है कि वहां के  बाकी क्रिस्चन  यहूदी लोगों को अपने में मिलाना चाहते हैं. लेकिन भारत में बिलकुल उल्टा है. यहां वंचित समाज मिलना चाहता है इसलिए अत्याचार का शिकार होता है. अभी तक तो जिन्होंने देश को बांटकर रखा है वही राष्ट्र निर्माता के  प्रभु बने बैठे हैं .अब सवाल यह है कि राष्ट्र है क्या ? क्या राष्ट्र में रहने वाले सब लोग हैं या राष्ट्र की मिट्टी है, या राष्ट्र वन, पर्वत, नदी, पशु–पक्षी है, या कुछ लोग हैं जिनसे राष्ट्र का निर्माण होता है ?

यदि सभी लोग राष्ट्र के  लोग हैं, तो दो बिन्दुओं पर विचार करना होगा . एक-राष्ट्रहित का मतलब सबका हित या कुछ लोगों का हित . यदि सबका हित है, तो सबमें दलित आदिवासी भी शामिल है . यदि मुख्य मुद्दा यह है कि दलित राष्ट्र के  भीतर है या राष्ट्र के  बाहर ? यदि राष्ट्र के  भीतर मानते हैं तो यह भी मानना पड़ेगा कि उनका हित राष्ट्र का हित है . यदि दलितों को राष्ट्र से बाहर माना जाता है तो अप्रत्यक्ष रूप से इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि भारत को दो राष्ट्र की जरूरत है . एक हिदू राष्ट्र तथा दूसरा हिन्दू शासक . यदि दलितों को राष्ट्र का अभिन्न अंग मानकर समान नागरिकता की बात हो रही है, तो सबके  साथ समानता का व्यवहार होना चाहिए . समान नागरिक से ही समान नागरिकता का निर्माण होता है जब हम राष्ट्रहित की बात करते हैं, तो इसका मतलब होता है सभी नागरिकों का हित . राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए देश के  सभी नागरिकों को उनकी संख्या के  अनुपात में देश की सम्पत्ति आवंटित होनी चाहिए . यदि एक को सौ प्रतिशत दे दिया गया और दूसरे को कुछ भी नहीं, ऐसा करना तो सरासर अन्यायपूर्ण और बेईमानी है . जहां संख्याआधारित भागीदारी सुनिश्चित हो वहीं न्यायपूर्ण आवंटन है .इस आधार पर क्या दलितों को देश की सम्पत्ति का न्यायपूर्ण वितरण किया गया है ? उनकी संख्या के  आधार पर आरक्षण के  अंतर्गत क्या उन्हें बराबरी का अधिकार मिला है ? यदि नहीं, तो देश का नागरिक होने के  कारण उनका पूरा अधिकार  है कि उन्हें बराबरी का हिस्से मिले .

 यदि राष्ट्र सब नागरिकों से मिलकर बनता है तो उसकी भागीदारी भी बराबर की होनी चाहिए, कम या ज्यादा नहीं . कम करेंगे तो एक के  प्रति अन्याय है और ज्यादाा करेंगे तो दूसरे के  प्रति अन्याय होगा . इसलिए कम और ज्यादा वाला अन्यायपूर्ण व्यवस्था को हटाकर सही अनुपात के  हिसाब से आवंटन होना चाहिए . देश का 15 प्रतिशत आबादी यह दावा करता है कि आरक्षण से समाज में खाई बन रही है . हमारा हक मारा जा रहा है . देश की एकता अखंडता बाधित हो रही है . जहां तक समाज में खाई बनने का सवाल है, तो वे लोग आंकड़े उठाकर देख लें जहां–जहां जिस अनुपात में आरक्षण बढ़ा वहां दक्षता एवं प्रशासनिक क्षमता के  साथ–साथ सामाजिक स्तर में भी वृद्धि  हुई . किसी भी राष्ट्र की सम्पूर्ण उन्नति और विकास तक संभव होता है जब उस राष्ट्र से रहने वाले व्यक्तियों द्वारा सामूहिक तथा बराबरी का भागीदारी हो . अन्यथा कुछ मुट्ठी भर लोगों की योग्यता, दिमाग, क्षमता और प्रशान से राष्ट्रहित नहीं साधा  जा सकता . मिसाल के  तौर पर आजादी के  बाद सबसे पहले दक्षिणी राज्यों आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडू में आरक्षण लागू हुआ . वहां का शैक्षणिक स्तर प्रशासनिक क्षमता एवं ईमानदारी उन राज्यों से कई गुना अच्छा है जिन राज्यों में आरक्षण ठीक से लागू नहीं हुआ . जहां भी जिस क्षेत्र में किसी एक जातिविशेष का वर्चस्व रहा है वहां भ्रष्टाचार, जातिवादी भेदभाव,धांधली बड़े पैमाने पर हुई है .

जब पुलिस, वकील, जज, जेलर, जल्लाद एक ही बिरादरी का होगा, शोषित को कैसे न्याय मिलेगा भारत में जब तक जाति आधारित डाईवर्सिटी नहीं होगी तब तक न तो समतामूल समाज बन सकता है और न ही राष्ट्र उन्नति कर सकता है . सभी को उनके  जीवन के  हर क्षेत्र में हिस्सेदारी दे दी जाए तो आरक्षण विरोधी  और आरक्षण समर्थक झमेला ही खत्म हो जायेगा . देश में जितने भी अस्मितामूलक आंदोलन चल रहे हैं सबके  मूल में मनुवादी बदनियति है . जिस दिन इनकी नियत साफ  हो जाए उस दिन सही मायने में राष्ट्र निर्माण होगा . अभी तो बहुजनों को खुद का हिस्सा नहीं मिल पा रहा हे जिसके  लिए वे संघर्षरत हैं तो दूसरों का हक कैसे मार रहे हैं और यदि हक नहीं मारा गया है .आरक्षण का सवाल सीधे देश की एकता और अखण्डता से जुड़ा है.  आरक्षण मिलने से इस देश के बिखरे लोगों को यह लगने लगा कि हम भी इस देश के वासी हैं.  जिस देश में मानव-मानव में भेद हो, एक को उच्च स्थान प्राप्त हो और दूसरे को न खाना अच्छा मिलता हो, न रहने की जगह हो, न कपड़े पहनने की आजादी हो, न अभिव्यक्ति की आजादी हो, न शिक्षण संस्थाओं में जाने दिया जाता हो और न ही नौकरियों में भागीदारी हो.  वह दूसरा व्यक्ति कैसे  महसूस करेगा कि यह देश मेरा भी उतना ही है जितना अन्यों का ?इसी भेदभाव के आधार पर बाबा साहब ने कहा था कि हमारा कोई देश नहीं.  यह आरक्षण का ही कमाल है कि इस देश के  एक बहुत बड़े वंचित समाज को राष्ट्रहित में जोड़ा.

इतिहास गवाह है कि इस देश का सबसे मेहनतकश और मेरिट वाला बहुजन समाज रहा है.  खेत में अन्न उपजाना हो, भट्टे पर ईट बनानी हो, अच्छे फैशनेबल ड्रेस तैयार करना हो, खाद्य सामग्री को निर्यात योग्य बनाना हो,सब तो बहुजन समाज के  स्त्राी-पुरुष ही अपने खून-पसीने से पैदा करते हैं और राष्ट्र के उत्पादन में अपनी महती भूमिका निभाते हैं, लेकिन इसका फायदा तो मलाईदार ही उठा रहा हे.  एक पिता के चार बेटों में से एक ने तीन का हिस्सा हड़प लिया.  घर में समान बंटवारे के  लिए कलह तो होगा ही होगा.  भाई-भाई के बीच खाई बनाने का काम तो उस बेईमान भाई ने किया जिससे सबमें वैमनस्य पैदा हुआ.  ठीक ऐसे ही इस देश की एक छोटी जनसंख्या ने बड़े जनसमूह का हिस्स हड़प लिया और उस समूह को गरीब, लाचार, भूखा, दुरवा, नंगा रहने को मजबूर किया.आज भी अधिकांश आदिवासियों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती है.  प्राकृतिक संसाधनों से जैसे-तैसे अपना पेट भरते हैं, अपने तन को ढंकते हैं, कन्दराओं में जीवन यापन करते हैं.  आखिर उनका हिस्सा गया कहाँ? क्या उन्हें देश का नागरिक समझा गया है? कुछ सवालों पर हमें गहराई से सोचने की जरूरत है.  दरअसल आरक्षण की वजह से एस.सी., एस.टी. और ओबीसी में सामूहिक भावना का विकास हुआ है.  वे एक जुट हुए हैं.  इसलिए गैर दलितों की असली पीड़ा आरक्षण से कम दलित-पिछड़ों का एकजुट होना और जातिवाद घटने से ज्यादा है.



भारत के गाँव खण्ड-खण्ड में बँटे हुए हैं.  जिस गाँव में जितनी जातियाँ हैं उतने ही जाति आधारित टोले हैं.  एक गाँव को अखण्ड बना नहीं सकते तो क्या अखण्ड भारत को संकल्पना शेष बचती है ‘अनेकता में एकता भारत की विशेषता’ कोरी जुमलेबाजी है.  सच्चाई तो ‘अनेकता में भी विविधता’ है.  अखंड राष्ट्र निर्माण की भावना को व्यक्त करते हुए काशीराम ने कहा था- हमारे  शासन में लोग पूजाघरों या घर के देहरी के अन्दर हिन्दू, मुसलमान आदि रह पायेंगे लेकिन देहरी के बाहर उनको भारतीय होकर निकलना पड़ेगा. एक दलील यह भी दी जा रही है कि आरक्षण से अयोग्य लोग आते हैं. आरक्षित सीटों पर नौकरी करने वाले सारे के  सारे तो अयोग्य नहीं होते, वैसे ही जैसे सभी नौकरी करने वाले सवर्ण योग्य नहीं होते.  आज यदि एक दलित की बेटी टीना डाॅबी सामान्य सीट से देश की सर्वोच्च परीक्षा टाॅप करती है तो वह अयोग्य कैसे हुई? क्या सिर्फ उसकी जाति के  नाम पर उसे अयोग्य घोषित करना राष्ट्रीयता है? यदि नहीं, तो निश्चित रूप से उसने अयोग्यता का राग अलापने वालों की
मानसिकता को धवस्त किया और देश का नाम विश्व स्तरपर ऐतिहासिक रूप से गौरवान्वित किया है.  उसने हरियाणा जैसे राज्य में स्त्री समस्या पर कार्य करने का साहस दिखाया है.  इससे बड़ी योग्यता और राष्ट्रहित दूसरा क्या हो सकता है ? इस देश में जातीय शोषण बड़े पैमाने पर होता है लेकिन जैसे ही आरक्षण आया, आरक्षण से शिक्षा मिली, फिर नौकरी मिली, व्यक्ति का जीवन स्तर बदला और थोड़ा-सा बदलाव सामाजिक परिस्थितियों में भी हुआ.  जिन दलितों की सामाजिक हैसियत और आर्थिक पक्ष मजबूत है उनका शोषण अपेक्षाकृत गरीब दलितों से कम होता है.

आरक्षण आने से समाज पर गुणात्मक प्रभाव पड़ा जिससे जातिआधारित शोषण और अपराधों में कमी आई.  इससे भारत की छवि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सुधरी या बिगड़ी ? जाहिर-सी बात है सुधरी.जब छवि सुधरी तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बेहतरीन संदेश पहुंचा.  यह भी एक तरह से राष्ट्रहित है. फिर आरक्षण से देश का नुकसान कहाँ हो रहा है ? कुछ लोगों का आरोप है कि आरक्षण का लाभ ऊँचे  पदों पर पहुँचे हुए सम्पन्न दलितों को ही मिल रहा है, जो गरीब दलित हैं वे लाभ लेने से वंचित रह जा रहे हैं.  ऐसा आरोप जातिवादी सोच की उपज है.  यह तर्क तब लागू होता है जब आरक्षित सीटें पूरी तरह भरी जातीं.  बहुजन समाज से आने वाले असंख्य लड़के -लड़कियां, स्त्री -पुरुष उच्च शिक्षा प्राप्त करने के  बावजूद नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटक रहे हैं.  उच्च शिक्षण संस्थाओं में तथा अन्य जगहों पर लाखों बैकलाॅक की सीटें ‘नाट फाउंड सूटेबल’ घोषित कर खाली रखी गयी हैं.  जो लोग उपर्युक्त आरोप लगा रहे हैं क्या उन्होंने इसके  लिए हाय-तौबा मचाई कि आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है इसे हर हाल में लागू किया जाना चाहिए? दूसरी महत्त्वपूर्ण बात कि क्या ऊँचे  पदों पर पहुँचने मात्रा से जाति खत्म हो जाती है? जब कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ, बनिया ऊँचे पदों पर आसीन होता है तो उसे जातिवाचक सम्बोधन न देकर पूरे देश का कर्णधार कहा जाता है. लेकिन जब कोई बहुजन समाज में विभूति पैदा होती है, राष्ट्रनिर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान देता है, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करता है पिफर भी उसे दलित मसीहा, दलित राष्ट्रपति, दलित मुख्यमन्त्राी, दलित चिन्तक, दलितसमाजशास्त्री आदि जातिवादी सम्बोधनों सेप्रचारित किया जाता है.

जब तक इस जातिवादी सोच में परिवर्तन नहीं होगा तब तक दलित आरक्षण में कोई बदलाव सम्भव नहीं हो सकता. आरक्षण का सवाल आर्थिक सम्पन्नता- विपन्नता या अमीरी-गरीबी नहीं है. इसका मूलाधार सामाजिक और धार्मिक भेदभाव है. ऊँचे पदों पर आसीन बाबू जगजीवन राम, पीपल.पुनिया, जीतनराम मांझी आदि के साथ जो सामाजिक और धार्मिक दुर्व्यवहार हुआ वह सर्वविदित है. ऐसी शर्मनाम और मूर्खतापूर्ण अनेक घटनाएँ रोज घटती हैं. इसलिए आरक्षणका सम्बन्ध सामाजिक न्याय और धार्मिक न्याय से है न कि आर्थिक.एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य जिस पर विचार करने की जरूरत है. कुछ लोग यह भी तर्क देते  हैं कि गैर-दलितों में भी गरीबी है. इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन यह अंशतः सही है पूर्णरूपेण नहीं. गैर दलित जो ऊँचे पदों परबैठा हुआ है, हजारों बिघे जमीन का मालिक है, देश-विदेश में अरबों की सम्पत्ति बनाया है.क्या वो सवर्ण अपने उन गरीब भाइयों कोअपनी अर्जित सम्पत्ति में हिस्सेदार बनाया है? जो गाँवों में पूजा कराकर कथा बाँचकर तथा यजमानी प्रथा से अपना घर चला रहा है.इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है नेपाल का पशुपति मन्दिर.उस मन्दिर में सिर्फ महाराष्ट्र का नम्बूदरीपाद ब्राह्मण ही मठाधीश बनता है,किसी अन्य गोत्र का ब्राह्मण नहीं. जो उनके अन्दर की खाई है उस पर भी सवाला उठने चाहिए. अभी मुट्ठीभर बहुजन आगे आये हैंउसी में भ्रम फैलाया जा रहा है जिनकेअधिकार का एक प्रतिशत भाग भी उन्हें मिला नहीं है. बहुजन आरक्षण के  कारण देश खंडित नहीं हुआ है, बल्कि शैक्षणिक अनुपात बढ़ा है, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ हुई है, बहुजन समाज के  स्त्री-पुरुष ने हर क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देकर देश को विश्व पटल पर गौरवान्वित किया है.

लोहिया का स्त्री विमर्श

मेधा


आलोचक , सत्यवती महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती है . संपर्क :medhaonline@gmail.com

राम मनोहर लोहिया की ख्याति एक राजनेता के साथ-साथ एक मौलिक चिंतक के रूप में है. कोई शक नहीं कि लोहिया का समाज-विवेक बराबरी के न्यायबोध से गहरे भीगा हुआ है. बराबरी का मूल्य ही स्त्री और पुरुष के बीच मौजूद असमानता खोजने के लिए लोहिया को उकसाता है और लोहिया बिना शक इस मामले में अपने समय के चिंतन से कोसों आगे निकल जाते हैं. लेकिन उनके स्त्री विषयक चिंतन पर विचार करने से पहले कुछ ताजा-तरीन आंकड़ों पर गौर करें. विडंबना है कि भारत में जैसे-जैसे समृद्धि बढ़ी है वैसे-वैसे औरतों पर अत्याचार भी बढ़े हैं. नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ें कहतें हैं कि साल 2014 में 36,735 महिलाओं के बलात्कार के मामले दर्ज हुए जो कि 2013 में दर्ज बलात्कार के मामलों से नौ फीसदी अधिक है. लगभग साठ हजार महिलाओं का अपहरण किया गया. साढे आठ हजार महिलाएं दहेज हत्या का शिकार हुईं. और लगभग सवा लाख महिलाएं पति की क्रूरता का शिकार हुईं. आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि हम हमारे देश की आर्थिक समृद्धि के आंकड़े भले ही तेजी से न बढ़ रहे हों लेकिन महिलाओं के प्रति हर तरह की हिंसा के आंकड़े साल दर साल बढ़ते ही जा रहे हैं. आज देश भर में प्रतिदिन लगभग 848 महिलाएं बलात्कार का शिकार हो रही हैं.


ये आंकड़े आजादी के सात दशक बाद भी स्त्री के शोषण की कथा कहते हैं. शोषण की इस कथा का रूप बदल-बदल कर जारी रहना हमारी सामाजिक संरचना और राजनीतिक व्यवस्था में अंतर्निहित पितृसत्तात्मक मूल्यों को दर्शाता है. लोहिया ऐसे राजनीतिक चिंतक हैं, जो स्त्री के शोषण के कारणों की जड़ पर चोट करते हैं और इसका समाधान स्त्री की राजनीतिक भूमिका में तलाशते हैं. आज से कई दशक पहले जब देश की राजनीति की चिंता में स्त्री विमर्श परिवार नियोजन, स्त्री-शिक्षा, बराबर वेतन आदि के मुद्दों तक सीमित था और स्वयं भारतीय स्त्रीवाद भी अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति सचेत नहीं था, तब ही लोहिया ने भारतीय राजनीति के स्त्री विरोधी स्वर को पहचान कर उस पर प्रहार किया -‘‘देश की सारी राजनीति में, कांग्रेसी, कम्यूनिस्ट अथवा समाजवादी, चाहे जानबूझकर कर या परंपरा के द्वारा, राष्ट्रीय सहमति का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है और वह यह है कि शूद्र और औरत को, जो पूरी आबादी के तीन-चौथाई है, दबा कर और राजनीति से दूर रखो.’’ सालों पहले लोहिया का कहा वाक्य आज भी स्त्रियों के संदर्भ में उतना ही सच है, जितना उस समय था. महिला आरक्षण विधेयक का सालों से संसद में अटके रहना इसका प्रमाण है.

औरत और मर्द की गैरबराबरी को लोहिया सभी किस्म की गैरबराबरी का आधार मानते हैं. उनका कहना है-‘‘नर-नारी की गैर-बराबरी शायद आधार है, और सब गैर-बराबरी के लिए, या अगर आधार नहीं है, तो जितने भी आधार हैं, बुनियाद की चट्टानें हैं, समाज में गैरबराबरी की और नाइंसाफी की, उनमें यह चट्टान सबसे बड़ी चट्टान है. मर्द-औरत के बीच की गैर-बराबरी, नर-नारी की गैर-बराबरी.’’ लोहिया के इस कथन में यह बात अंतर्निहित है कि गैरबराबरी का पहला पाठ कोई भी व्यक्ति अपने बालपन के लैंगिक संदर्भ में सीखता है. यह गैरबराबरी या तो भाई-बहन के बीच की होती है या माता-पिता के बीच की या परिवार में किसी अन्य रिश्ते में प्रदर्शित होती है. गैरबराबरी का बीज व्यक्ति के भीतर यहीं से जन्म लेता है और बाद में वह हर तरह की गैरबराबरी में तब्दील होता है. इसीलिए लोहिया को समतामूलक समाज के निर्माण के लिए लैंगिक विषमता को मिटाना अनिवार्य और पहला राजनीतिक कर्म लगता है. तभी उन्होंने कहा है-‘‘कई सौ या हजार बरस से हिंदू नर का दिमाग अपने हित को लेकर गैर-बराबरी के आधार पर बहुत ज्यादा गठित हो चुका है. उस दिमाग को ठोकर मार-मार के बदलना है. नर-नारी के बीच में बराबरी कायम रखना है.’’

लोहिया के स्त्री संबंधी विचार की खासियत यह है कि वह स्त्री को एक अलग इकाई के रूप में नहीं, वरन समाज के अभिन्न हिस्से के रूप में देखते हैं, जैसा कि आमतौर पर स्त्रीवादी चिंतक नहीं देख पाते. शायद इसीलिए उनके समाधान में वह व्यापकता और स्थायीत्व बहुत नहीं होता जो लोहिया के समाधन में दिखाई पड़ता है. इसका एक प्रबल नमूना है घरेलू हिंसा का. पिछले दो दशकों में घरेलू हिंसा को लेकर नारीवादियों ने काफी आंदोलन किया. संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप के कारण सरकार ने भी घरेलू हिंसा संबंधी कानून बनाए. आज घरेलू हिंसा को सामाजिक चौकीदारी से रोकने के लिए ‘बेल बजाओ’ अभियान जोरो पर रहा है. पर लोहिया ने 70 के दशक मंे ही घरेलू हिंसा पर गंभीर चिंता प्रकट की और इस समस्या को केवल स्त्री की समस्या न मानकर उसके मूल कारण तक पहुंचने का प्रयास किया है. भारत में घरेलू हिंसा जितनी मर्दवादी मानसिकता का परिणाम है, उससे कहीं-कहीं ज्यादा घोर विषमता को तरजीह देने वाली सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में  है. जिस व्यवस्था में किसी भी तरह से कमजोर व्यक्ति को मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार नहीं मिलता, उस व्यवस्था में वह अपने से कमजोर के ऊपर अपनी लाचारी की हिंसा बरसाता है.


 लोहिया के अनुसार ‘‘भारतीय मर्द इतना पाजी है कि अपनी औरतों को वह पीटता है. सारी दुनिया में शायद औरतें पिटती हैं, लेकिन जितनी हिंदुस्तान में पिटती हैं इतनी और कहीं नहीं. हिंदुस्तान का मर्द इतना ज्यादा सड़क पर, खेत पर, दुकान पर, जिल्लत उठाता है और तू-तड़ाक सुनता है, जिसकी सीमा नहीं. जिसका नतीजा होता है कि वह पलटा जवाब तो दे नहीं पाता, दिल में भरे रहता है और शाम को जब घर लौटता है, तो घर की औरतों पर सारा गुस्सा उतारता है.’’ ऐसे में केवल कानून बना देने भर से स्त्री अपने घर में सुरक्षित हो जाएगी या हमें उस व्यवस्था को बदलने के बारे में सोचना होगा जो गैरबराबरी के सारे आयामों को समाप्त कर मनुष्य के भीतर गरिमा, शांति और समरसता की संभावना को पैदा होने दे? यकीनन काननू इस बुराई से लड़ने में तात्कालिक तौर पर मददगार जरूर होगी.लोहिया का स्त्री- विमर्श कई मायनों में अपने समय के नारीवादी विमर्श से कहीं आगे था. लोहिया के नर-नारी संबंधी विचार अपने आप में क्रांतिकारी विचार थे. आज तक समाज की पितृसत्तात्मक संरचना जिस औजार के सहारे स्त्री को अपने अधीन रखती आई है, लोहिया उसी पर चोट करते हैं. देह मानकर उसकी शुचिता में स्त्री को कैद करने का काम किया गया.

प्रकृति ने स्त्री को जो अनुपम या अद्भुत और अद्वितीय सृजन क्षमता दी है, संभवतः उससे ईर्ष्या कर पुरुष ने उसे ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनाकर उसे सदियों तक शोषित किया. लोहिया यौन-व्यवहार के दोहरे मापदंडों का कड़ा विरोध करते हैं- ‘‘यौन-पवित्रता की लम्बी-चौड़ी बातों के बावजूद आमतौर पर विवाह और यौन के संबंध में लोगों के विचार सड़े हुए हैं. सारे संसार में कभी न कभी मर्द व औरत के संबंध शुचिता, शुद्धता, पवित्रता के बड़े लम्बे-चैड़े आदर्श बनाए गए हैं. घूम-फिर कर इन आदर्शों का संबंध शरीर तक सिमट जाता है और शरीर के भी छोटे से हिस्से पर.’’लोहिया आधुनिक भारतीय पुरुष के असमंजस को पहचानते हैं, जिसकी नींव अंग्रेजों की औपनिवेशिक मौजूदगी में नवजागरण के समय पड़ी थी. उसे एक ओर तो उसकी संतान को पढ़ा-लिखाकर आधुनिक  बनाने वाली मां चाहिए यानी एक ऐसी औरत जो बुद्धिमान, शिक्षित और चतुर हो. दूसरी ओर वह भारतीय संस्कृति का वाहक भी बने यानी संस्कृति में औरत की जो भूमिका तय की गई है, वह उसका निर्वहन करें. वह सीता और सावित्री की भांति पतिव्रता एवं आज्ञाकारिणी हो.

कहने का आशय यह कि वह उनके कब्जे में हो. नवजागरण के मनीषियों ने आधुनिक भारत की स्त्री के लिए यही कसौटी तय की थी और यही कसौटी कमोबेश आज तक चल रही है. इसका अच्छा नमूना ‘नारि नर सम होहिं’ का नारा देनेवाले और हिन्दी-नवजागरण के अगुआ भारतेन्दु हरिश्चंद्र के इस कथन में मिलता है-‘‘जिस भांति अंग्रेज स्त्रियां सावधान होती हैं, पढ़ी लिखी होती हैं, घर का काम-काज सम्हालती हैं, अपने संतानगण को शिक्षा देती हैं, अपना सत्व पहचानती हैं, अपनी जाति और देश की संपत्ति-विपत्ति को समझती हैं, उसमें सहायता देती हैं….. उसी भांति आर्यकुल ललना भी करें…….इससे यह शंका किसी को न हो कि मैं स्वप्न में भी यह इच्छा करता हूं कि इन गौरांगी युवती समूह की भांति हमारी कुललक्ष्मीगण लज्जा को तिलांजलि देकर अपने पति के साथ घूमें.’’ लोहिया भारतीय पुरुष की इस फांक को समझते हैं और उस पर चोट करते हैं- ‘‘नर चाहता है कि नारी अच्छी भी हो, बुद्धिमान भी हो, और उसकी हो, उसके कब्जे में हो. ये दोनों भावनाएं परस्पर विरोधी हैं. अपनी किसको बना सकते हो? उस मानी में अपनी, जो हमारे कब्जे में रहे. मेज को अपनी बना सकते हो, कमरे को बना सकते हो, शायद कुत्ते को भी बना सकते हो किसी हद तक. यानी निर्जीव या अगर सजीव भी है, तो किसी ऐसे को ही बना सकते हो, जिसकी सजीवता संपूर्ण नहीं. जिसकी सजीवता संपूर्ण है, उसको अगर अपने अधीनस्थ बना देना चाहते हो, तो फिर वह चपल, चतुर, सचेत, सजीव – सजीव उस अर्थ में  जीव वाले अर्थ में नहीं- जिंदादिल जिन्दा शरीर, तेज बुद्धिमान नहीं हो सकती.’’

लोहिया का स्त्री विषयक चिंतन स्त्री मात्र पर विचार नहीं करता. स्त्री और पुरुष के बीच कोई जीव विज्ञान आधारित अंतर उनकी समस्या नहीं है. एक राजनीतिक व्यक्ति की तरह लोहिया की चिंता एक राजनीतिक स्त्री की खोज करना है. लोहिया यह खोज देशकाल के बोध से विहीन सिद्धांत-चिंता से नहीं करते. उनकी यह खोज एक राष्ट्रवादी राजनेता की चिंता से उपजी है. जाहिर है स्त्री के आदर्श को खोजते समय वह भारतीय राष्ट्रवाद का पुनर्पाठ करते हैं. इसी पुनर्पाठ का एक उदाहरण है – सावित्री के बरक्स द्रोपदी की एक नई व्याख्या प्रस्तुत करना. यह व्याख्या लोहिया को नवजागरण के दौर के भारत-चेता मनीषियों की परंपरा में रखती है, यानी स्त्री का आदर्श लोहिया भी नवजागरणकालीन चिंतकों की तरह भारत की संस्कृति-कथा के भीतर से ही ढूंढते हैं. लेकिन अनिवार्य रूप से यह परंपरा लोहिया से जुड़कर ‘दूसरी परंपरा’ बन जाती है, यानी लोहिया संस्कृति कथा के भीतर से नवजागरण के दौर के चिंतकों से कहीं अलग अपना आदर्श चरित्र खोजते हैं. एक बानगी देखें- ‘‘द्रौपदी महाभारत की सबसे बड़ी औरत है, इसमें कोई शक नहीं है.महाभारत के नायक का नाम कृष्ण है, उसी तरह  से महाभारत की नायिका का नाम कृष्णा है. कृष्ण-कृष्णा.

आज के हिन्दुस्तान में द्रौपदी की उसी विशिष्टता को मर्द और औरत ज्यादा याद रखे हुए हैं कि उसके पांच पति थे. द्रौपदी की जो खास बातें हैं, उनकी तरफ ध्यान नहीं जाता.दुनिया की कोई औरत, किसी भी देश की, किसी भी काल की ज्ञान, हाजिर-जवाबी, समझ, हिम्मत की प्रतीक उतनी नहीं बन पायी जितनी कि द्रौपदी.’’ लोहिया द्रौपदी के हतप्रभ कर देने वाले व्यक्तित्व को ही भारतीय स्त्री का प्रतीक मानते हैं और भारतीय मानस में बसे सावित्री के प्रतीक के संदर्भ में सवाल उठाते हैं कि क्या कोई पुरुष भी सावित्री की तरह पत्नीव्रता हुआ है? यदि नहीं तो ‘‘फिर इतना साबित हो जाता है कि जब कभी ये किस्से बने या हुए भी हों, तब से लेकर अब तक हिन्दुस्तानी दिमाग में उस औरत की कितनी जबर्दस्त कदर है जो अपने पति के साथ शरीर, मन, आत्मा से जुड़ी हुई है और वह पतिव्रता या पातिव्रत धर्म का प्रतीक बन सकती है. इसके विपरीत मर्द का औरत के प्रति उसी तरह का कोई श्रद्धा या भक्ति या प्रेम या अटूट प्रेम का कोई किस्सा नहीं है.’’लेकिन लोहिया के स्त्री-चिंतन की सीमा भी यही है कि द्रौपदी को भारतीय स्त्री का प्रतीक मानते हुए वह भी अन्य संस्कृतिचिंतकों की भांति स्त्री को राष्ट्रवादी मुखौटे के भीतर रख कर ही देखते हैं, उससे बाहर नहीं .

बलात्कारी के खिलाफ छात्र

मुकेश कुमार  


जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्रा के साथ भाकपा-माले के छात्र संगठन आइसा के नेता अनमोल रतन द्वारा बलात्कार मामले के खिलाफ तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के छात्रों ने  भागलपुर स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर प्रतिमा स्थल–स्टेशन चौंक पर प्रतिवाद-प्रदर्शन किया एवं दिल्ली पुलिस, जेएनयू के कुलपति और भाकपा माले के महासचिव का पुतला फूंका. इस मौके पर प्रदर्शनकारी छात्र बलात्कार के आरोपी छात्र नेता को जेएनयू से निलंबित करने एवं विवि परिसर में प्रवेश पर रोक लगाने की मांग कर रहे थे. छात्रों के समूह ने दिल्ली पुलिस द्वारा आरोपी की गिरफ्तारी में ढिलाई बरतने और पीड़ित छात्रा की पहचान को सार्वजनिक करने पर भी तीखा आक्रोश व्यक्त किया. छात्र बलात्कारी को स्पीडी ट्रायल चलाकर सख्त सजा देने की मांग बुलंद कर रहे थे. ज्ञात हो कि 20 अगस्त को अपने कमरे पर ले जाकर शोध छात्रा को नशीला पदार्थ खिलाकर उक्त आइसा नेता ने इस शर्मनाक घटना को अंजाम दिया था.


प्रदर्शनकारी छात्र नेता अंजनी ने भागलपुर स्टेशन चौंक पर आयोजित प्रतिरोध सभा को संबोधित करते हुए कहा कि देश के बौद्धिक केंद्र कहे जाने वाले जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में एक शोधछात्रा का छात्र नेता बलात्कार करता है और उसकी गिरफ्तारी और कठोरतम सजा दिलाने के लिए तत्काल कोई आंदोलन नहीं होता है. गंभीर सवाल तो यह है कि इस घिनौनी हरकत को कोई और नहीं स्त्रियों की ‘बेखौफ आजादी’ और ‘दिल्ली गैंग रेप’ के खिलाफ हुए आंदोलन की अगुवाई करने वाले संगठन से जुड़ा प्रमुख नेता करता है. उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि ऐसी घृणित व्यक्ति ऐसे संगठन का नेता कैसे बना दिया गया. और उस पर जब यह मामला सामने आया तो बलात्कारी छात्र नेता को महज संगठन से निकालने और पीड़िता के पक्ष में एकजुटता का बयान जारी कर चुप्पी साध ली जाती है. ऐसे मामले सामने आने पर तो बुर्जआ पार्टियां भी इतना करती हैं, तब उनमें और इनमें क्या फर्क रह गया. भाकपा-माले का कोई बड़ा नेता अन्य मामलों की भांति इस मामले पर बोलना तक जरूरी नहीं समझते ! उन्होंने कहा कि इससे माले नेताओं की पितृसत्तात्मक सोच खुलकर उजागर होती है.



जेएनयू जैसे कैंपस के पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई लड़ने और स्त्री-पुरुष समानता की बात करने वाले ज़्यादातर वामपंथी संगठनों ने भी आइसा द्वारा जारी बयान को ही पर्याप्त कार्रवाई मान लिया और अपनी ओर से भी इसी किस्म का बयान जारी कर मामले को चलता करने की कोशिश की. सोशल साइट से लेकर पूरे देश में जब उनकी थू-थू होने लगी तब जाकर घटना के पाँच दिन बाद पुलिस मुख्यालय के समक्ष जैसे-तैसे प्रदर्शन की खानापूर्ति की है.  वहीं छात्र नेता सुमन कुमार और संजीव कुमार ने कहा कि इस पूरे मामले पर जेएनयू के कुलपति ने अब तक जिस किस्म की निष्क्रियता दिखाई है, वह अत्यंत ही शर्मनाक है. विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बलात्कारी छात्रनेता को न तो जेएनयू से निलंबित किया गया और न ही विवि परिसर में उसके घुसने पर ही कोई प्रतिबंध लगाया गया. ऐसे गंभीर मसले पर कोई कार्रवाई नहीं करना कुलपति की स्त्रीविरोधी मानसिकता को ही उजागर करता है. ऐसे व्यक्ति को कुलपति के पद पर बने रहना पूरे छात्र समुदाय और स्त्रियों के लिए अपमानजनक है. दोनों छात्र नेताओं ने ऐसे व्यक्ति को कुलपति पद से अविलंब हटाने की मांग की.

जबकि छात्र नेता दीपक कुमार एवं राजेश यादव ने कहा कि जिस तरह दिल्ली पुलिस ने पीड़िता की पहचान सार्वजनिक कर आपराधिक काम किया है, ऐसे पुलिस पदाधिकारी को अविलंब बर्खास्त करते हुए उनपर मुकदमा दर्ज कर स्पीडी ट्रायल चलाकर सजा की गारंटी की जाय. दोनों छात्र नेताओं ने कहा कि जिस प्रकार दिल्ली पुलिस आरोपी की गिरफ्तारी में सुस्ती बारात रही थी, ठीक वैसे ही जेएनयू छात्र संघ, आइसा और भाकपा-माले भी सड़क पर उतारने में सुस्त दिखे. इस मामले में दिल्ली पुलिस, जेएनयू विवि प्रशासन के साथ ही आइसा और भाकपा-माले की सक्रियता व संवेदनशीलता सवालों के घेरे में है. ऐसी मानसिकता के साथ ये फ़ासिज़्म से लड़ने के बजाय उसे मजबूत ही करेंगे.  इस मौके पर अंजनी, डॉ. अजीत कुमार सोनू, विकास, राजेश, विकास, जितेंद्र, कृष्ण बिहारी गर्ग, प्रियतम, सचिन, इमरान, पुष्पेश, असीम, अभिषेक सहित दर्जनों छात्र मौजूद थे.

सुशीला टाकभौरे की कविताओं में दलित और स्त्री प्रश्न

रेखा सेठी

  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित

विमर्शों की दुनिया में सुशीला टाकभौरे की कविता दोराहे पर खड़ी प्रतीत होती है.दलित व स्त्री अस्मिता की स्वतंत्र राहें जैसे एक-दूसरे से होकर गुजरें…हिंदी  के दलित साहित्य में जिन महिला रचनाकारों ने दलित और स्त्री अस्मिता के लिए ज़मीन तैयार की उनमें सुशीला टाकभौरे का सक्रिय हस्तक्षेप रहा.वे लंबे समय से कविता, कहानी, उपन्यास, विचारात्मक लेख, आत्मकथा जैसी विधाओं में अपनी रचनात्मकता का परिचय दे रही हैं.1970 में अम्बेडकरवादी चेतना के प्रभाव से दलित साहित्य की जो अलग पहचान बनी उसमें स्त्री स्वर को बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया.(ऐसा तब है जब सावित्री बाई फुले जैसी रचनाकार पहले से ही दलित साहित्य की ऊर्जा-स्रोत रही हैं ) नब्बे के दशक में यह स्थिति बदली और पत्र-पत्रिकाओं में दलित स्त्री रचनाकारों ने अपनी उपस्थिति के महत्व का एहसास कराया.अब उसे अनदेखा करना नामुमकिन था.स्त्री-साहित्य के इस उन्मेष में सुशीला टाकभौरे, साहित्य की सभी विधाओं में, एक महत्वपूर्ण नाम बनकर उभरीं किन्तु जितनी चर्चा उनकी आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ तथा उनके कहानी संग्रहों की हुई है, उतनी कविताओं की नहीं हुई.अब तक उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं – ‘स्वाति बूँद  और खारे मोती’  (1992 ), ‘यह तुम भी जानो’ (1994), ‘तुमने उसे कब पहचाना’ (1995), ‘हमारे हिस्से का सूरज’ (2005).दलित और स्त्री प्रश्नों पर केन्द्रित ये रचनाएँ सामाजिक न्याय की गुहार हैं.


भारतीय सामाजिक संरचनाओं का इतिहास आज़ादी के बाद (भी) और कहें तो आज़ादी के बावजूद (भी) नहीं बदला.दलित-जीवन के अंधकारमय पृष्ठों से यातना और संघर्ष की इबारत मिटाई नहीं जा सकी.इस स्थिति का विवरण देते हुए सुशीला जी लिखती हैं. “दलित शोषण आज भी जारी है.प्रतिदिन ऐसी घटनाएँ घट रही हैं.सवर्ण जातियाँ आज भी दलितों को भयभीत रखने के लिए अमानवीय अत्याचार करती हैं कहीं उन्हें ज़िन्दा जलाया जाता है तो कहीं उनकी बस्तियों में आग लगा दी जाती हैं. कानून और पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था सवर्णों की मदद करती है.दलितों को कहीं न्याय नहीं मिलता.ऐसा कब तक चलेगा ? इस प्रश्न का उत्तर कहीं नहीं मिलता, कोई नहीं दे सकता |” (स्वाति बूँद  और खारे मोती पृ .17) यह अनुभव सुशीला टाकभौरे के समस्त साहित्य की पृष्ठभूमि है और सिर्फ सुशीला जी के ही नहीं समस्त दलित साहित्य की पृष्ठभूमि है.यह साहित्य अवहेलना और अपमान के कष्टकारी अनुभव की पीड़ा से रचा गया है जिसकी सामाजिक अंतर्ध्वनियाँ बेहद त्रासद हैं. ‘दुख हमें, सुख उन्हें / कैसी यह विडंबना’—यही विचार, भिन्न शब्दों में पंक्ति-दर-पंक्ति उतर आया है.असमानता के ब्यौरे, यातना की स्मृति, प्रत्यालोचना का रूप धरने लगती है.यह नए किस्म का सांस्कृतिक उपनिवेशवाद है जिसमें सवर्ण जातियाँ सत्ता और साधनों पर कब्ज़ा किये बैठी हैं.जिस अभिशाप को दलितों ने जीवन-भर भोगा वह उनकी नियति नहीं बल्कि कुछ लोगों की धोखाधड़ी है जो बहुजन समाज को हाशिए पर धकेले हुए है.लगातार उन्हें शिक्षा और सुविधाओं के अभाव में, शहरों से बाहर, उतरन व जूठन पर जीने को विवश किया जाता है.बरसों से ठहरा समाज ऊँच-नीच के सामंती ढाँचे से स्वयं को मुक्त करने में अक्षम रहा.

स्वाधीनता और राजनीतिक अधिकारों के बावजूद जड़ मानसिकता को कोई मिटा नहीं पाया.सुशीला जी की अनेक कविताओं में दलित जीवन का यह दर्द उभरता है.उनके यहाँ स्मृति अपमान का पर्याय बन गई है.पूर्वजों की पीड़ा का संताप तथा वर्तमान में बार-बार जाति के नाम पर भोगा गया अपमान स्थायी सत्य है.‘यातना के स्वर’ कविता में उन्होंने साफ लिखा कि वर्तमान स्थिति में अन्याय के प्रतिकार की चेतना सबल न होने के कारण ही पी एच. डी तक शिक्षा प्राप्त प्राध्यापिका भी झाड़ूवाली कही जाती है.शोषण के ये सन्दर्भ अपमान की पीड़ा को जीवित रखते हैं.ऐसी सभी स्थितियाँ घोर अपमानजनक एवं अस्वीकार्य हैं.पीड़ा के इन अनगणित चिन्हों को झेलते हुए, अब सीधे सामने की लड़ाई का संकल्प है.दया और सहानुभूति के पर्दे गिराकर, पूरे वर्ग पर किए अत्याचारों का हिसाब माँगा जा रहा है.कुछ व्यक्ति या जातियाँ ही कटघरे में हैं, पूरे समाज को जवाब देना होगा कि कैसे उसने अपने जनसमूह के एक बड़े भाग को शताब्दियों तक असंख्य यंत्रणाओं की अग्नि में जलने को विवश किया.
हम दलित
आदम रूप होकर / आदम भाषा में पूछना चाहते हैं सवाल
मानव सभ्यता-संस्कृति का इतिहास क्या है ? / भारतीय संस्कृति का आधार क्या है
क्यों किया अब तक / हम पर  अत्याचार ?
(हम दलित, यह तुम भी जानो पृ.87 )

दलित साहित्य जिस नए सौन्दर्यशास्त्र की पैरवी करता है उसमें साहित्य का संबंध संघर्ष और जागृति से है.कविता का लक्ष्य न्याय की पुकार है.सुशीला टाकभौरे की इन कविताओं की सृजन भूमि यही है.जातीय उत्पीड़न तथा स्त्री जीवन का दोहरा अभिशाप— अधिकांश कविताओं का विषय-बोध बार-बार इसी घेरे में घूमता है.शायद अनेकश: कहने पर भी पीड़ा पूरी तरह चुकती नहीं.वे बार-बार अपनी कविताओं में उपेक्षित दलित समुदाय की जड़ मानसिकता पर चोट कर, उन्हें स्वयं  को पहचानने का संदेश देती हैं.उनके अनुसार कविता की सार्थकता इसी बात में हैं कि सोये हृदयों को आंदोलित किया जा सके.जागृति एवं संघर्ष के बिना, समता-पूर्ण सामाजिक संरचना की आकांक्षा स्वप्न ही रहेगी.‘हमारे हिस्से का सूरज’ काव्य-संकलन के मनोगत में सुशीला टाकभौरे अपनी कविताओं के उद्देश्य व दलित-कविता की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करती हैं––“इनका आधार अम्बेडकरवादी विचारधारा है इनमें शोषण, अन्याय के विरुद्ध विद्रोह और दुश्मनों को ललकारने की चेतना है, इसमें कहीं यातना के स्वर हैं, कहीं चेतना के स्वर हैं.कहीं शोषकों को धिक्कार है तो कहीं अन्याय के विरुद्ध अत्याचारियों से बदला लेने की हुंकार है.दलित कविता के विषय, भाव एक जैसे होने के बाद भी, वे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग दलित वर्ग की भोगी हुई पीड़ा की अभिव्यक्ति हैं |” (स्वाति बूँद और खारे पानी पृ.17 )
सामाजिक स्थितियों की जड़ता के पीछे, धर्म व संस्कार के नाम पर होने वाले अनुकूलन की विशेष भूमिका है.रामायण-महाभारत जैसे आदि ग्रन्थ ऐसे असुविधाजनक प्रसंगों के साक्षी हैं. रामायण में बालि-वध, राम द्वारा शम्बूक की हत्या, केवट, निषाद, शबरी की समर्पणशील भक्ति—ऐसे प्रसंग हैं जिनका पाठ-पुन:पाठ नए विमर्शों की गुंजाइश पैदा करता है.

महाकाव्यात्मक अन्विति में ये प्रसंग कथानायक राम के महिमा-मंडन के लिए रचे गए.इनके रचयिता वाल्मीकि आज दलितों के आइकॉन भी हैं.इससे उस साहित्य के पुन:पाठ की और भी सम्भावना बनती है.सुशीला टाकभौरे की निगाह इस ओर भी गयी. वाल्मीकि को ‘बाल्या’ कहकर, उन्होंने अपना बहुत क़रीबी बना लिया लेकिन सवालों के घेरे से वे भी बाहर नहीं हैं.अपने इस ‘बाल्या’ से वे पूछती हैं कि क्यों उनकी दृष्टि राम पर ही रही, वे शबरी और शम्बूक के सम्मान और प्रगति का नया रचना-विधान क्यों नहीं रच सके? दलित मुक्ति के लिए इन प्रश्नों से जूझना ज़रूरी है.इतिहास को धर्म-ध्वजा के रूप में उठाये चलना जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जन्म देता है, दलित कविता उस वितंडा के प्रति सावधान करती हैं.सुशीला जी की शैली अपनी सरलता में सामाजिक अंतर्विरोधों को प्रश्नांकित करने की रही है. रामायण ही नहीं, महाभारत में भी भील एकलव्य की कथा सवर्ण जातियों के षड्यंत्र-रूप में दोहराई जाती है.कवयित्री के मन की फाँस कहीं और है.वह पूछती है —
भील एकलव्य / तुम्हारा तो सिर्फ
एक अँगूठा कटा था, / पर क्या
पूरे समाज के हाथ भी / काट दिये गये थे ?
(भील एकलव्य, यह तुम भी जानो पृ. 35 )

यह कविता अत्यंत महत्वपूर्ण है.एकलव्य ने विरोध नहीं किया लेकिन क्यों नहीं किया, यह सवाल विमर्श का हिस्सा होना चाहिए.यहाँ कवयित्री बड़ी बारीकी से उस सामाजिक प्रक्रिया का अनावरण करती है जहाँ अन्याय और अपमान के विरुद्ध पूरे वर्ग की सहिष्णुता, विरोधी स्वर का अभाव उस समाज के भयंकर अनुकूलन का बोध कराता है.एकलव्य की गुरु-भक्ति, मन ही मन जिसे गुरु माना हो उसके प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक है या उसके कारण कुछ और रहे.किन्हीं अर्थों में यह पूरी जाति की नपुंसक वीरता का प्रमाण भी है.क्यों ये जातियाँ अपने अधिकार या सम्मान के लिए खड़ी नहीं हो सकीं.न्याय के लिए  धर्म-युद्ध करने वाले समाज में इतिहास क्यों इन घटनाओं को इस रूप में दर्ज नहीं कर पाया यह आज भी पूरे युग की बड़ी चुनौती है.यातना की स्मृति जिस पृष्ठभूमि का निर्माण करती है उसका अगला स्तर सामाजिक विमर्श की शुरुआत करना है.समाज के स्थापित ढाँचे का अस्वीकार, उसे प्रश्नांकित कर उससे टकराने की कोशिश, दलित साहित्य का नया सौंदर्यशास्त्र रच रही है.ऐसे स्थलों पर कवयित्री का स्वर काफी उत्तेजित और चुनौतीपूर्ण हो जाता है –
नहीं रहेंगे अब नत मस्तिष्क / विद्रोह की भावनाएँ
उठने लगी हैं / तूफान बनकर
बढ़ने लगा है आक्रोश / संघर्ष की दिशा में
अब तक वे ही / करते रहे विषपान
सागर मंथन फिर से होगा / अब तुम्हें करना होगा विषपान
(व्यंग्य आघात और विषपान, हमारे हिस्से का सूरज, पृ 142)

इस कवितांश की अन्तिम पंक्तियाँ साभिप्राय हैं.संघर्ष का रास्ता सिर्फ उनके प्रति आक्रोश की अभिव्यक्ति नहीं है.आमूल परिवर्तन की राह जातिगत समीकरण में प्रत्यावर्तन चाहती है.ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ‘बस्स बहुत हो चुका’ की जो गुहार लगाई थी वह इन कविताओं में भी प्रतिध्वनित होती है.पीड़ा जितनी अधिक है विरोध उतना ही आक्रामक.यातना के स्वर हुँकार में बदल जाते हैं. सुशीला एक ओर दलितों को अपने आत्मसम्मान के लिए अपनी अस्मिता के प्रति सचेत होने का आह्वान करती हैं तो दूसरी ओर सवर्णों को शर्मसार भी करती हैं.वे जताती हैं कि जिन सवर्णों ने दलितों को अछूत माना, जिनकी छाया से भी परहेज़ किया वे जब तुम्हारी बराबरी में कुर्सी पर आ बैठे तो तुम्हारा हृदय क्यों फटता है.ऐसे छोटे-छोटे विवरण सामाजिक ताने-बाने पर एक बहस खड़ी करने के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया की पहल भी बनते हैं. इस दृष्टि से ‘सुनो विक्रम’ महत्वपूर्ण कविता है. विक्रम और बेताल के कथासफ़र की तर्ज पर प्रचलित न्याय, प्रेम की कहानियों की दिशा को अपनी नज़र से देखने को प्रेरित करती यह कविता, विक्रम को ललकारती है —
अब तुम सुनाओ कथा बेताल को / सवार होकर उसके ही कंधों पर
और पूछो सवाल / अधिकतम कितना मूल्य है
एक निरीह महिला को /  सरेआम नंगा करने का ?
एक इन्सान को बेबसी की / अन्तिम सीमा तक
पहुँचा देने का ?

कब बदलेगें कर्मकाण्ड /  कब मिलेगा सामाजिक न्याय !
पूछो उससे,/ अन्यथा / कर दो उसके टुकड़े टुकड़े !
(सुनो विक्रम, यह तुम भी जानो, पृ 38-39)

आहत मन और आक्रोश की चिंगारी के साथ-साथ कवयित्री बार-बार याद दिलाती है कि दलितों को स्वयं रूढ़ियो को तोड़ने का साहस दिखाना होगा.यह पूरी प्रक्रिया दोरुखी है, एक ओर उच्च वर्ग की श्रेष्ठता को चुनौती, उनके विरोध में संघर्ष का शंखनाद तथा दूसरी ओर दलितों का उद्बोधन, मुक्ति की आकांक्षा.जिस विचारधारा के प्रति निष्ठा एवं प्रतिबद्धता सुशीला की कविताओं को ऊर्जा देती है वह प्राय: उसे दृष्टि के विस्तार का अवसर नहीं देती.हाँ, कुछ कविताएँ अपवाद स्वरूप ही सही ऐसी अवश्य हैं जिनमें कवयित्री का विज़न विस्तृत होता दीख जाता है जैसे दलित संघर्ष को वे बिरसा मुंडा के संघर्ष से जोड़ लेती हैं.बुद्ध, कबीर, फुले, अम्बेडकर दलित चेतना के युगपुरूष हैं.अनेक कविताओं में उनका आवाहन किया गया है.उगते अंकुर की तरह जीने, ज्योति दूत बनने की प्रेरणा इनके माध्यम से दी गई है.यातना से विद्रोह तक और विद्रोह से भविष्य के स्वर्णिम स्वप्न तक—ये कविताएँ एक वृत्त पूरा करती हैं.
फिर चाँद मुस्करायेगा / हवा गुन गुनायेगी
अश्रु फूल बनकर /  राहों में बिछ जायेंगे
टूटे हुए सपने / फिर से सज जायेंगे !
(सपने सज जायेंगे, हमारे हिस्से का सूरज, पृ 154)
इस दृष्टिबोध के सुखद अहसास के साथ दलित चेतना का ग्राफ पूरा होता है.दलित साहित्य के सभी प्रमुख रचनाकारों की भांति ‘यातना, संघर्ष और दृष्टिबोध’ के तीन सोपान सुशीला टाकभौरे की कविता में भी बड़ा इलाका घेरते हैं.

दलित अभिव्यक्ति यथार्थ के जिस खुरदरेपन को सतह पर लाती है, सुशीला जी की कविता उसी राह का अनुगमन कर रही है.अनेक स्थलों पर ऐसा हुआ कि कविता वर्तुलाकार स्थितियों में लगभग फँस कर रह गयी.ऐसा इसलिए भी होता है कि यह कविता सामाजिक बदलाव की दिशा में क्रांतदर्शी भूमिका निबाहना चाहती है.अपने इस उद्देश्य में, अनेक दिक्कतों का सामना करते हुए भी कवयित्री ने निभाया है.दलित आन्दोलन के सभी मुद्दे यहाँ अभिव्यक्ति पाते हैं.जाति का सवाल हमारे यहाँ देश-काल की दिशा को परिभाषित करने वाला है.इसीलिए समतापूर्ण समाज की संकल्पना में जातिगत-उत्पीड़न से मुक्ति का प्रश्न सबसे अहं है.सुशीला टाकभौरे की कविता पीड़ा और प्रतिरोध के विकल्प को सामाजिक प्रत्यावर्तन के अस्त्र रूप में प्रस्तावित करती है.इस देश में यह व्यापक क्रांति का आह्वान है, लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बराबर की हिस्सेदारी का प्रश्न.सार्थकता की दृष्टि से ये कविताएँ स्त्री-प्रश्नों की अपेक्षा दलित अस्मिता के सवालों को अधिक शिद्दत से उठाती हैं.जाति और लिंग-परक अस्मिताओं के बीच द्वंद्व की स्थिति नहीं है बल्कि जाति, लिंग की असमानताओं को और भी तीव्र कर देती है.
स्त्री-पक्ष दलितों में दलित, पिछड़ों में पिछड़ी, समाज में सबसे संवेदनशील स्थिति स्त्री की ही है.स्त्री रचनाकार, स्त्री जीवन की विंडबनात्मक स्थितियों, उसकी पीड़ा व संघर्ष से विमुख रहे ऐसा संभव नहीं.सुशीला टाकभौरे भी अपनी कविताओं में स्त्री-जीवन की द्वन्द्वपूर्ण, मारक स्थितियों की धारदार अभिव्यक्ति करती हैं.ऐसी कविताएँ स्वयं को पहचानने की कोशिश भी हैं और अपनी स्थिति से ऊपर उठने का संकल्प भी.वे मानती हैं कि मनुप्रणीत नारी-धर्म, स्त्री को पुरूष पर निर्भर बनाए रखने का उपक्रम है.उनकी कविताओं का उद्देश्य स्त्री को प्रोत्साहित करना है.उन्होंने दलित वर्ग के भीतर भी लिंग आधारित अंतर्विरोधों को गहराई से महूसस किया और बेझिझक होकर बयान किया.

दलित जीवन में जाति और लिंग के अंतर पर रजनी तिलक लिखती हैं – “दलित स्त्रियों की दो दुनिया हैं.एक दुनिया में वह अपने भाई, पति, पिता, साथी, मित्र के साथ जाति-व्यवस्था के खिलाफ साथ खड़ी है, दूसरी दुनिया में अपने ही घर में, समाज में, आन्दोलन में हाशिये से फिसल गयी है, फिर भी वह इसी क्रम में दलित चेतना की सावित्री फुले, अम्बेडकर और बोधिसत्व की विचारधारा से प्रभावित हैं.वह ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता, पूंजीवाद, सामन्तवाद व फासीवाद के विरुद्ध संघर्षरत है, अत: समूचे दलित वर्ग में स्त्री स्वर ने अपनी अलग प्रखर अभिव्यक्ति की दस्तक दी है.दलित कवियत्रियों ने न केवल दलित कविता में बल्कि हिंदी कविता में अनेक ऐसे बिंदुओं को छुआ है जिसमें वर्ण, वर्ग, जाति, लिंग, रूप, के भेदभाव को नकारकर नये समतामूलक समाज की कल्पना को साकार करने का आह्वान है |” (समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन-2 (कविता खंड) पृ. 91-92 ) इस स्त्री की व्यथा-कथा के बिम्ब सुशीला टाकभौरे की कविता में मिल जाते हैं.साथ ही स्त्री-प्रश्न को भाषा, धर्म, जाति, लिंग सम्बन्धी भेदभाव से जोड़कर देखा और उनकी जड़ों को पहचानकर उन पर प्रहार किया यानी जैसी लड़ाई जाति और वर्ग को लेकर है वही लिंग को लेकर भी है, सुशीला टाकभौरे की कविता इस संघर्ष में शामिल है.यह संघर्ष हर स्तर पर समतामूलक समाज की माँग को लेकर आगे बढ़ रहा है. दलित लेखन के शुरूआती दौर में स्त्री साहित्य को लेकर कुछ असमंजस की स्थिति  रही.समस्त स्त्री-वर्ग को दलित मानने की पैरवी करने वालों के बरक्स यह चिंता बनी हुई थी कि स्त्री-पीड़ा की अभिव्यक्ति पर अतिरिक्त बल, दलित आग्रहों को कमज़ोर कर सकता है. एक तर्क यह भी था कि सभी स्त्रियाँ दलित नहीं हैं, क्योंकि दलित-स्त्री, जाति के नाम पर जो मान-अपमान झेलती है वह स्वर्ण स्त्रियों को नहीं झेलना पड़ता.



दलित स्त्री का एक अपना वर्ग है जो उसे समस्त स्त्री समाज में सबसे अशक्त बनाता है.सवर्ण स्त्रियों का व्यवहार भी दलित स्त्रियों के प्रति कम क्रूर नहीं है.इसलिए लैंगिक समानता उन्हें एक वर्ग में नहीं बाँधती.उनकी लड़ाई अलग-अलग है.दलित साहित्य का मुख्य मुद्दा जातिगत असमानता के दंश का प्रतिकार का था.कुछ विचारकों को लगता रहा कि इसमें लैंगिक अस्मिता के सवालों को जोड़ देने से यह संघर्ष बिखर सकता है.उनका आग्रह स्त्री-पुरुष विवाद के परे सबको जातिगत संघर्ष में शामिल रखने का रहा.दलित वर्ग में लैंगिक असमानता को वे अंदरूनी मसला मानते हैं.  विमल थोरात तथा अनीता भारती ने तो लगातार इस सरलीकरण का विरोध किया और दलित स्त्री के दोहरे, तीहरे शोषण की तरफ ध्यान दिलाया.ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भी अपने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि ‘स्त्री, दलितों में भी दलित है |’ स्त्री जीवन के दोहरे संताप के लिए उन्होंने पूरे समाज में फैली लैंगिक असमानता की पारंपरिक सोच को उत्तरदायी बताया––‘इसके लिए व्यवस्था जनित परंपरावादी सोच उत्तरदायी है, जो स्त्री को दूसरे दर्जे का नागरिक ही नहीं, पाँव की जूती समझती है’ इसे स्वीकारते हुए उन्होनें कहा––“दलित वर्ग में भी इस व्यवस्था की घुसपैठ है.” (दलित दखल पृ. 26-29). इस सारे विवाद को सुशीला टाकभौरे किस तरह देखती हैं, इसकी समीक्षा महत्वपूर्ण है.उनका काव्य–संकलन ‘तुमने उसे कब पहचाना’ मूलतः स्त्री-स्वतंत्रता के विचार को केंद्र में लाता है.यहाँ ‘दलित’, ‘स्त्री’, या फिर ‘दलित-स्त्री’ जैसे वर्गीकरण का कोई ज़िक्र नहीं है.हाँ, प्रस्तावना सरीखी ‘मन की बात’ की पहली पंक्ति में ‘दलित पीड़ित अबला’ का संकेत अवश्य है जो स्त्री की सामान्य स्थिति के लिए प्रयुक्त हुआ है.यहाँ वे बार-बार संपूर्ण समाज में स्त्री की परतंत्र स्थिति पर चिंता व्यक्त करती हैं.

इस परतंत्रता का कारण ‘पितृसत्ता’ तथा ‘मनुप्रणीत नारी धर्म’ है.वे जिरह करती हैं कि स्वाधीनता आन्दोलन में भाषण-जलसों, विरोध–प्रदर्शनों में शामिल स्त्री ‘देश के गुलामों की गुलाम’ थी और आज जबकि अंग्रेज़ों से देश स्वतंत्र है तब भी स्त्री स्वतंत्र नहीं हो पाई है. पारिवारिक संबंधो में पुरुष के समक्ष वह अब भी गुलाम है.“उसकी यह स्थिति तब तक यथावत है, जब तक कि समाज में पुरुष प्रधानता को निर्बाध्य मान्यता प्राप्त है.” उनकी कविताएँ स्त्री में आत्मविश्वास व आंतरिक प्रेरणा जगाने की आकांक्षी हैं और ऐसा करने में वे जाति के आधार पर कोई भेद नहीं करती.‘जानकी जान गयी है’ में वे पुरुष के वर्चस्ववादी व्यवहार को झेलती स्त्री का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करती हैं.सीता की पीड़ा समस्त स्त्री-जाति की पीड़ा है.
ओ शबरी के राम ! / आँखे चुराकर / संवेदना न दिखाओ / तुम्हीं ने सीता को / धरती में समाया था.
(जानकी जान गयी है, यह तुम भी जानो, पृ.65) स्त्री की जीवन-स्थितियों का यथार्थ तथा मुक्ति का उद्बोधन उनकी सभी स्त्री सम्बन्धी कविताओं का मुख्य स्वर है.‘मासूम भोली लड़की’, ‘औरत नहीं मजबूर’, ‘आज की खुद्दार औरत’—-सभी कविताएँ स्त्री चेतना की रचनाएँ हैं जिनमें यह स्वर उभरता है कि स्त्री किसी पर निर्भर नहीं, उसे आगे बढ़कर स्वयं को पहचानना है, अपना अधिकार प्राप्त करना है, और नई भोर के सपने को सच करना है.वह ‘नवनीत की पुतली’ नहीं ‘विद्रोहिणी’ है जो स्वयं शक्ति है, पूर्ण महायज्ञ है.स्त्री की विवशता व आकांक्षा की दूरी को पार कर वे स्त्री जीवन का नया ताना-बाना बुनती हैं.
मुझे अनंत असीम दिगंत चाहिए, / छत का खुला आसमान नहीं,
आसमान की खुली छत चाहिए / मुझे अनंत आसमान चाहिए |
(विद्रोहिणी, यह तुम भी जानो पृ.86)
स्त्री की स्थिति का कंट्रास्ट भी कई कविताओं में है.समाज के रूढ़ ढाँचे में परंपरा-प्रदस्त जीवन की जकड़नें, स्त्री को तयशुदा रास्तों पर ले जाती हैं—
वह सोचती है / लिखते समय कलम को झुका ले
बोलते समय बात को संभाल ले / और समझने के लिए
सबके दृष्टिकोण से देखे, / क्योंकि वह एक स्त्री है |
(स्त्री, यह तुम भी जानो पृ.31)

बहुत-सी कविताओं में ऐसा हुआ है कि एक ही कविता में अनेक भाव एक-साथ चले आते हैं.स्त्री-जीवन की सीमाएँ और उनसे मुक्ति की आकंक्षा, प्रतिकार के लिए उद्बोधन, शक्ति का अहसास सबके संश्लेषण से सुशीला टाकभौरे विषम-भावों का समकोण रचती हैं.उनके यहाँ केवल स्त्री का ही उद्बोधन नहीं है, पुरुष का भी आह्वान है.सावित्री बाई फुले और ज्योतिबा फुले ने जैसे साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन की नींव रखी, वह आदर्श अनुकरणीय है.सभी पुरुषों को ज्योतिबा फुले के समान समाज का अग्रदूत बनने की प्रेरणा दी जा रही है.यह उदाहरण विशेष महत्व रखता है चूँकि पितृसत्ता को चुनौती, पुरुष–विरोध नहीं है.स्त्री सम्बन्धी अधिकांश कविताओं का ग्राफ आगे-पीछे होता हुआ उसी दायरे में चलता रहता है.‘स्त्री’ व ‘कितने करीब’ जैसी कुछेक कविताओं में संवेदना का घनत्व विशेष महसूस होता है. इस सबके बीच, ‘वह मर्द की तरह जी सकेगी’, ऐसी कविता है जो समस्या उत्पन्न करती है.यद्यपि कविता निश्छल भाव से लिखी गयी है और उस स्थिति को सामने लाती है जहाँ यह पैरवी की जा रही है कि औरत यदि स्वयं को सजी-सँवरी मानना छोड़ दे, आत्म-निर्भर बने तभी वह पुरुष के समान स्वावलंबन एवं सम्मान के साथ जी सकेगी.इस स्थिति को उन्होंने लिखा ‘मर्द की तरह’ जीना.क्या स्त्री-मुक्ति, स्त्री का पुरुष हो जाना है ? ऐसा मानने से अनेक समस्याएँ खड़ी हो जायेंगी.जिस स्वामित्व के बड़प्पन से स्त्री संघर्ष कर रही है वह स्वयं उस वर्चस्ववादी ढाँचे में कैद हो जायेगी.मर्द होना मर्दवाद के अहं से भी जुड़ा है.स्त्री आन्दोलन की सार्थकता इसी में है कि वह स्वयं को इस अहं से बचाए रख सके. इस सारे चित्रण में हैरानी की बात यह है कि शोषण के इतने चित्रों के बावजूद, इनमें दलित-स्त्री के शोषण का अलग से कोई चित्र नहीं हैं. राष्ट्रीय महिला आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार दलित महिलाएँ अमानवीय व्यवहार के कई रूप झेलती हैं. अपहरण, दैहिक-शोषण, नंगा करके घुमाना, अभद्र भाषा जैसी अनेक स्थितियाँ उनके जीवन को और भी विकट कर देती हैं.

दलित स्त्रियों के शोषण का बहुत बड़ा कारण यह भी है कि अपनी सत्ता या ताकत का आभास देने के लिए सवर्ण जातियों के पुरुष इन स्त्रियों को हथियार बनाते हैं.पूरे वर्ग को दंडित करने हेतु  दलित स्त्रियों का दैहिक शोषण आम बात है.इस पर घरेलू हिंसा और पारिवारिक दमन की स्थितियाँ दलित-स्त्री के लिए अस्मिता व अस्तित्व का संकट बन जाते हैं.सुशीला टाकभौरे अपने एक वैचारिक निबंध में लिखती हैं “स्त्री सर्वप्रथम स्त्री होने के कारण शोषित होती है.इसके साथ दलित स्त्री होने के कारण दोहरे रूप में शोषण-पीड़ा का संताप भोगती है.” (दलित साहित्य, स्त्री-विमर्श और दलित स्त्री, सामाजिक न्याय और दलित साहित्य सं डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन पृ. 132) आर्थिक दृष्टि से भी दलित स्त्रियों का संघर्ष कई गुना अधिक है.वे सदा से कठोर श्रम में संलग्न रहीं.यहाँ तक की मैला ढोने का अमानवीय कार्य भी उनके हिस्से रहा.दलितों में पुरुष-वर्ग जब भी पारिवारिक दायित्वों से विमुख हुआ, इन स्त्रियों ने कड़ी मेहनत से सब ज़िम्मेदारी संभाली लेकिन आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र नहीं हो पाईं.
वैचारिक स्तर पर दलित स्त्री की इस पीड़ा का अनुभव होने पर भी अपनी कविता में सुशीला टाकभौरे दोहरा संताप झेलती इस स्त्री की अलग से कोई छवि प्रस्तुत नहीं करती.अधूरे स्वावलंबन तथा सशर्त स्वतंत्रता ने दलित स्त्री को जिस वंचित स्थिति की ओर धकेला  ये कविताएँ उस स्वर को उजागर नहीं करतीं.प्रतिरोध का स्वर ‘दलित स्त्रीवाद’ की अलग कोटि को प्रस्तावित या संपुष्ट नहीं करता.‘यह तुम भी जानो’ संकलन में, ‘आस्था’ शीर्षक से एक कविता है जिसमें अपने पिछड़े होने की स्थिति का स्वीकार है.‘मैं अनभिज्ञ थी / पिछड़े होने के कटु अपमान से’.इसी में कली मौसी द्वारा किसी को चप्पलों का उपहार देने और उस घटना पर समाज में हंगामा मचने का ज़िक्र भी आता है.ये छोटी-छोटी घटनाएँ संघर्ष के लिए प्रेरित करती हैं, आस्था को जन्म देती हैं, ऐसा कवयित्री ने स्वीकार किया है.


इसी तरह ‘मील का पत्थर’ कविता में अपनी हीनता का बोध और एक नया आत्मविश्वास एक साथ स्वर पाते हैं. अब मैं शर्मिंदा नहीं होती / क्योंकि मुझे लगने लगा है,
मैं भी मील का एक पत्थर हूँ / जो टेकरी ही नहीं.
पहाड़ों से भी / अधिक महत्त्व रखता है ! (मील का पत्थर, यह तुम भी जानो, पृ 24). इन पंक्तियों जैसे कुछ सन्दर्भ स्त्री और दलित होने की पीड़ा को एकमेक कर देते हैं लेकिन सांकेतिक रूप में ही.संभवत: इसका एक कारण तो यह है कि कविता में जीवन सन्दर्भों के लिए अवकाश कम है.कथा साहित्य के पात्र अपनी दलित पहचान तथा जीवन सन्दर्भ जोड़कर रचे जाते हैं.उनकी पीड़ा की लकीरें ज्यादा भास्वर हैं जो सुशीला जी के कथा-साहित्य में दिखता भी है.कविताओं में यह पीड़ा व्यापक स्त्री-सन्दर्भ में जज़्ब हो जाती है.
पुरुष-प्रधान समाज में / चाहे समर्पण हो
या विद्रोह, / दुर्गुण का दोष नारी पर है !
पुरुष के दुर्गुणों पर हमेशा / मनु नाम की चादर डाली जाती है. (गाली, यह तुम भी जानो, पृ 30) मनु की व्यवस्था दलित स्त्री पर क्यों कायम होनी चाहिए ? संभवत: स्त्री-पुरुष सन्दर्भ में दलित पुरुष भी उसी व्यवस्था के शिकंजे से बाहर नहीं.यही संकट दलित स्त्री के संघर्ष को तीव्रतर करता है.जिस पुरुष ने दलित जीवन का अपमान झेला है वह क्या स्वयं अपने वर्ग में लैंगिक सन्दर्भों में स्त्री-पुरुष के पदानुक्रम को निरस्त कर पाया है ? दलित स्त्रीवाद इस प्रश्न से लोहा लेता है और अधिक मानवीय समाज की संकल्पना में अस्मिताओं की टकराहट की बीच मानवीयता का वरण करता है.

अपनी कविताओं में सुशीला टाकभौरे की कविता सीधे इन सवालों से भले ही न टकराती हो, उनकी सार्थकता इस बात में है कि वे उन रचनाकारों की पंक्ति में हैं जिन्होंने इस सारे चिंतन की पृष्ठभूमि तैयार की है .दलित और स्त्री दोनों ही सुशीला टाकभौरे की कविता और चिंतन के केंद्र में हैं.समाज में दोनों की हाशियाकृत स्थिति उनकी प्रतिबद्धता को दृढ़ करते हैं.दोनों की लड़ाई अपने ‘बाहर और भीतर’ समान रूप से चल रही है.सामाजिक न्याय के लिए जितना बाहरी ताकतों से लड़ना ज़रूरी है, उतना ही अपने भीतर पड़ी सांकल को खोलना भी.कवयित्री दोनों अस्मिताओं को अलग-अलग रखते हुए, दोनों के शोषण और उद्बोधन का सटीक बिम्ब प्रस्तुत करती हैं.इस कविता में उद्बोधन का स्वर भीतरी गाँठें खोलने को सन्नद्ध है.सुशीला टाकभौरे के यहाँ, यही चेतना सक्रिय हस्तक्षेप की प्रस्तावना बनती है.अस्मिता की लड़ाई सामाजिक न्याय की उद्भावना से बंधी है.यह कविता प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संघर्ष से आँख नहीं चुराती लेकिन अपना असली पारितोषक इस बात में मानती हैं कि कविता ‘स्वयंपूर्ण’ होने में मदद कर सके. सामाजिक स्थितियाँ आर्थिक अवस्था पर निर्भर है.सुशीला टाकभौरे की कविता में दलित और स्त्री की दारुण स्थितियों का बहुत बड़ा कारण आर्थिक है.भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण की नीतियों ने स्थिति को और विकट कर दिया.यह विकास का ऐसा मॉडल था जिसमें समाज का एक तबका पूंजी के बाज़ार में खरबपतियों की सूची में शामिल हो रहा था जबकि व्यापक जन-समाज, महंगाई की मार झेलते हुए भूख, गरीबी और लाचारी की ज़िन्दगी जीने को विवश था.दलित और स्त्रियाँ इसी वंचित जन-समाज का हिस्सा हैं.



सुशीला टाकभौरे एकाध कविता में ही सही इस स्थिति की ओर संकेत करती हैं और मानती हैं कि उदारीकरण की नीतियाँ अस्मिता के संकट को अस्तित्व के संकट में बदल रही हैं.
उदारीकरण / निजीकरण
भूमंडलीकरण के दौर में / श्रम का अवमूल्यन
शिक्षा बहुमूल्य / रोज़गार में स्पर्धा
पहचान मिटने का खतरा
(महंगाई, स्वाति बूँद और खारे मोती, पृ.75-76) सुशीला टाकभौरे के यहाँ इन मुद्दों को उठाने वाली बहुत-सी कविताएँ नहीं हैं लेकिन जो हैं वे इस दृष्टि से आश्वस्त करती हैं कि कवयित्री की साझेदारी परिस्थितियों से हारते मनुष्य की पीड़ा से है.सामाजिक जीवन व सामाजिक विडंबना के और भी पक्ष हो सकते हैं लेकिन उतने विस्तार या विविधता में जाने का अवकाश कवयित्री के पास नहीं है.उनका सारा ध्यान असमानता की पीड़ा झेलते व्यक्ति पर है, फिर वह विषमता चाहें जाति की हो, लिंग की या अर्थ की, उनका चित्रण एवं उनके प्रतिकार की राजनीति, अपने प्रेरक सक्रिय रूप में यहाँ मौजूद है. इन कविताओं की असली ताक़त अभिव्यक्ति की साफ़गोई में छिपी है.सुशीला टाकभौरे जिस भावातिरेक के साथ अपनी बात रखती हैं उसमें एक सच्चाई झलकती है.यह सच्चाई दलित साहित्य की सार्थकता का सबसे बड़ा प्रतिमान है.अस्मितामूलक विमर्श से उसकी शुरुआत अवश्य होती है किन्तु सार्थकता उन मानवाधिकारों को प्राप्त करने में है जो मानवीय जीवन के लिए आधारभूत हैं.यह कवितायें उस आन्दोलन को दिशा देने का काम करती हैं जो व्यापक जन-समुदाय के स्वाभिमान और सुरक्षा के लिए आगे बढ़ता है.आज देश के अलग-अलग हिस्सों से समता की मांग करने वाले आन्दोलनों के तीव्र होने की सूचनाएँ आ रही हैं, सुशीला टाकभौरे की कविताओं का मूल्य यही है कि इनके माध्यम से उस सामाजिक विमर्श की बुनियाद रखी गई जो अब परवान चढ़ता दिखाई दे रहा है |

डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर: पहली क़िस्त

शर्मिला रेगे की किताब  ‘अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की’की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था.


भारतीय विश्वविद्यालयों के सामाजिक विज्ञान और मानव शास्त्र के मौजूदा पाठ्यक्रमों में डा. बी.आर. आंबेडकर से हमारा परिचय अक्सर नहीं हो पाता. यह हैरतअंगेज है कि आंबेडकर के लेखन और व्याख्यानों को कभी पढ़े बिना ही विद्यार्थी और मेरे जैसे शिक्षक स्नातकोत्तर और शोध उपाधियों को हासिल कर लेते हैं और अकादमिक हलकों मेें स्त्री उपाधियों को हासिल कर लेते हैं और अकादमिक हलकों में स्त्री-अध्ययन पर कर्य करते रहते हैं. हालांकि 1990 के बाद वाले वर्षों में यह तस्वीर कुछ बदली है क्योंकि अकादमिक क्षेत्र में आये दलित विद्वान समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र, संस्कृति व साहित्य पाठ्यक्रमों में आंबेडकर के लेखन को अब शामिल कर रहे हैं. आत्म निरीक्षण की इस शुरूआत में ही मैं यह स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि किस तरह हमारी उच्च शिक्षा संस्थाओं में अज्ञान गढ़ा जा रहा है और जहां हमसब जाति और शिक्षा में विशेषाधिकार बनाये रखने के गुनाह में भागीदार बने रहते हैं. मेरा यह काम फुले-अम्बेडकरी आंदोलन में मेरे उन गुरूओं के कर्ज को रेखांकित करने के लिए भी है,  जिनका कार्य मुझे व कई अन्य लोगों को आंबेडकर के कार्य तथा लेखन से परिचित कराता है और व्याख्या के अलग ही अंदाज से भी पहचान करवाता है. इन गुरूओं में शामिल है. आंबेडकरी कार्यकर्ता, लेखक शाहिर और नायक दल.

आंबेडकर के ‘ ब्राह्मणवादी श्रेणीगत पितृसत्ता’ पर लेखन को पढ़ते हुए इसी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा जाना चाहिये. यह शब्द स्त्रीवादी विदुषी उमा  चक्रवर्ती ने 1993 में पहली बार प्रयोग किया था. मेरा लक्ष्य यही है कि आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों पर जल्द से जल्द ध्यान दिया जाना चाहिए और इसके लिए मैं देश के राजनीतिक अतीत व वर्तमान की  तीन ऐसी घटनाओं को माध्यम बनाऊंगी, जो ऊपर से देखने पर बिल्कुल भिन्न प्रतीत होती है. इसमें से हर एक घटना समय व स्थान की दृष्टि से बिल्कुल अलग पड़ाव पर है और जाति व जेण्डर के बीच भिन्न-भिन्न रिश्तों को दर्शाती है.पहला वाक्या ब्राह्मण परिषदों से जुड़ा है, जिसमें वास्तविक और काल्पनिक दोनों परिषदें शामिल हैं. दूसरे में गैर दलित और दलित स्त्रीवादियों के बीच एक संवाद को लिया गया है. तीसरी घटना दलित स्त्रियों पर बलात्कार और उस पर मुकाबले के बारे में तत्कालीन राजनीति में हुए आडम्बर को दिखाती  है.पहले 1950 की ब्राह्मण परिषद के तीसरे व चौथे संकल्पों की बात करते हैं. यह एक ऐसा प्रपंच है, जिसमें एक काल्पनिक भविष्य का दृश्य निर्मित किया गया है और जिसे 1920 के दशक के महाराष्ट्र के गैर ब्राम्हण आंदोलन के जाने-माने नेता दिनकर राव जवलकर ने रचा था.

ब्राह्मण परिषद में पेश किये जाने वाले काल्पनिक प्रस्तावों का खाका कुछ इस तरह खींचा गया है: ” ब्राह्मण स्त्रियों द्वारा अपने पतियों को पीटे जाने के कई मामले अदालत मेें पेश किये गये हैं. अतः ब्राह्मण पति वर्ग की रक्षा के लिए तुरंत एक कानून बनाया जाना चाहिए. मुझे यह कहते हुए लज्जा अनुभव होती है कि यूरोपीय सभ्यता के अनुसरण के कारण ब्राम्हण स्त्रियाॅ धूम्रपान करती है, नाट्य मंचों पर अभिनय प्रदर्शन करती हैं और सैलूनों में जा कर देह पर उस्तरा फिरवाती हैं. हालात ऐसे हैं कि समूची बावनखानी (पेशवाकाल में वेश्याओं का इलाका) में ब्राह्मण स्त्रियों का ही वर्चस्व है. एक ब्राह्मण वेश्या ने तो सूचनापट्ट लगाकर घोषित कर दिया है कि वह पेशवा के वंश से हैं.”  (फड़के 1984:149) विस्टल भाई पटेल ने 1918 में अंतरजातीय विवाहों को मान्यता देने संबंधी जो विधेयक प्रस्तुत किया था, बी.जी. तिलक ने उसका कड़ा विरोध किया. इसी विरोध के जवाब में जवलकर ने उपर्युक्त प्रस्ताव पेश किया,  जिसमें 1950 में ब्राह्मण  स्त्रियों को  पतियों को पीटने वाली, धूम्रपान करे वाली और गैर ब्राह्मण पुरूषों के साथ संकर विवाह करने वाली वेश्याओं की तरह चित्रित किया गया. ब्राह्मण पुरूष,  जो अब अपनी स्त्रियों को नियंत्रित करने में अक्षम थे, ‘मूछ वाली औरतों’ की तरह चित्रित किये गये. (वहीं 148)

इस  परिषद में वर्णित काल्पनिक भविष्य  के लगभग 50 वर्ष बाद 2009 में पुणें में हुई ब्राह्मण महासभा मेें सचमुच ही प्रस्ताव रखा गया कि ‘ब्राह्मण समाज की पवित्रता को अक्षुण्ण  रखने के लिये तथा देशहित के वृहद लय के लिये समाज के सभी भाई-बहन समाज के भीतर ही विवाहों को प्राथमिकता देंगे.’ इस महासभा में छपी ‘बदलते वक्त में ब्राह्मणों  के लिए आचार संहिता’ में स्त्रियों के लिये खास पोशाक तथा परिवार-समाज के प्रति उनके कर्तव्यों पर जोर दिया गया है. यह न केवल जाति-आधारित समाज में अंतरजातीय विवाहों के खिलाफ पल रही दलील की ओर इशारा करता है बल्कि आज के प्रभुवर्ग और बीसवी सदी के पूर्वार्ध में रचित उन गैर ब्राह्मण कल्पनाओं में अनोखी समानता दिखाता है जो ब्राह्मण स्त्रियों को भोग-विलास में लिप्त मानता है.हालांकि ब्राह्मण  स्त्रियों का यह उपहास गैर-ब्राह्मण समुदाय की ओर से उभरा जिसका मानना था कि समाज में मुख्य मतभेद अविवेकी ब्राह्मणों और विवेकी हिन्दुओं के बीच है. यहां गैर ब्राह्मण ज्योतिबा फुले (1827-90) की विचारधारा से अलग जाते दिखाई देते हैं. फुले के अनुसार यह मतभेद शूद्र-अतिशूद्र-महिला वर्ग तथा शेठ जी-भटजी वर्ग के बीच था. जाति अवधारणा की  क्रांतिकारी आलोचना में जेण्डर मुद्दे जाति के इशारे में ही स्थापित हुए दिखाई देते हैं.वर्तमान में ब्राह्मण महासभा जहां ‘राष्ट्रीय हितों’ के लिये जाति के भीतर विवाहों पर बल देती है, ब्राह्मण स्त्रियों पर नये-नये प्रतिबंध थोपती हैं. वहीं 20वीं सदी के पूर्वार्ध  में गैर ब्राह्मण बुद्धिजीवियों ने ब्राह्मण स्त्रियों की पाश्चात्य आधुनिका को भोग विलास से जोड़ दिया और स्वयं की पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की ओर एक नजर तक नहीं डाली.

अब दूसरे वाक्ये पर आते हैं. 2009 में मुंबई में दलित व गैर दलित स्त्रीवादियों के बीच एक संवाद सत्र आयोजित किया गया. इसमें गैर दलित स्त्रीवादियों ने 2006 के खेरलांजी बलात्कारों व हत्याकांड पर अपनी खामोशी की सफाई देते हुए कहा कि मीडिया ने सही वक्त पर सबको सूचित नहीं किया और इस तरह दलित स्त्रीवादियों के साथ एकत्व व सहयोग की डोर बांधने का यह अवसर उनके हाथ से निकल गया. दलित-स्त्रीवादियों ने इस बात की आलोचना की कि दलित स्त्रियों के खिलाफ हिंसा के विरोध में उन्हें अन्य स्त्रीवादियों का कोई सहयोग नहीं मिलता. उन्होंने सेक्स-वर्कस तथा बार-बालाओं पर गैर दलित स्त्रीवादियों के नजरिये की भी निंदा की,  क्योंकि इस नजरिये में श्रम व रति कर्म के जाति से संबंधों तथा शक्तिशाली वर्गों द्वारा निर्मित हिंसा के औजारों के बारे में इन स्त्रीवादियों की नासमझी झलकती है. कुछ दलित स्त्रीवादियों ने दलित पुरूष कार्यकर्ताओं की पत्नियों की ‘गृहस्थिन’ वाली छवि के गढ़ने को भी इस आलोचना के दायरे में समेटा और चेताया क ऐसे दलित पुरूष स्त्री मुक्ति कोे दलित स्त्रियों के लिए नकली/आवास्तविक बताते हैं. यह संवाद सत्र दलित व गैर दलित स्त्रीवादियों के मध्य शक्ति संबंधों की बजाय दोनों समुदायों में पितृसत्ता की सादृश्यता पर ज्यादा केंद्रित रहा. गैर दलित स्त्रीवादियों ने फिर एक बार दलित स्त्रियों के सन्मुख स्त्रीवाद और समुदाय के बीच चुनाव करने को मुख्य मुद्दा बनाया. ऐसे संवादों को दलित स्त्रीवादियों, दलित पुरूष कार्यकर्ताओं व गैर दलित स्त्रीवादियों के बीच समन्वय का एक महत्वपूर्ण जरिया बनाने के लिए दलित स्त्रीवादियों द्वारा अभिव्यक्त आलोचना व मतभेद पर लगातार ऐतिहासिक पुनदृष्टि की जरूरत होगी.

जाति व जेण्डर के आमने-सामने आ जाने की तीसरी घटना हाल में ही दलित स्त्रियों को बलात्कार के बाद हर्जाना देने की राजनीति पर मीडिया तथा सिविल सोसाइटी की प्रतिक्रिया से संबंधित है. 2009 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने राज्य सरकार द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बलात्कार की शिकार को उत्पीड़न कानून के अंतर्गत उल्लिखित  अनिवार्य हर्जाना वितरित किया. उत्तर प्रदेश की कांग्रेस  अध्यक्षा रीता बहुगुणा ने इसे हर्जाने द्वारा बलात्कार के अपराध की अनदेखी कर लेने की नीति बताया और तंज किया कि क्यों न दलित मुख्यमंत्री का बलात्कार हो और फिर उन्हें हर्जाने की पेशकश की जाये? इसके बाद मीडिया ने एक तरफ तो इस बात पर शोक जताया कि स्त्री होते हुए भी दोनो राजनीतिज्ञों ने बलात्कार के मामले पर जनता को बरगलाया है, वहीं दूसरी तरफ इशारा किया कि दोनो महिलायें जाति मुद्दों पर आमने-सामने आ गई है. मायावती (दलित) तथा रीता बहुगुणा (ब्राह्मण) के बीच जेण्डर की समानता या जाति की भिन्नता को उभारना उन असल राजनीतिक हथकंडों को सफाई से छुपा ले जाता है,  जिनके द्वारा राज्य व राजनीतिक दल ऐसे मुद्दों के इर्द-गिर्द अपने लाभ के लिए एकत्र हो जाते हैं और दलित स्त्रियों के खिलाफ वैदिक हिंसा को छोटा/स्वीकार्य अपराध बना देते हैं.
ये तीन अलग-अलग वाकये स्त्रीवादी राजनीति के कई द्वद्वों,  जैसे ब्राह्मण/अब्राह्मण, स्त्री आंदोलन/समुदाय और जाति/स्त्री की संकुचित सीमाओं को सामने ले आते हैं.

महिला आरक्षण विधेयक पर जारी लगातार बहस ने बखूबी दिखा दिया है कि स्त्री और जाति के बीच ये झूठा  द्वैत दरअसल पिछड़ी जातियों तथा अन्य जातियों की स्त्रियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को राजनीतिक दलों के भीतर ही बांध कर रखने की जुगत है. हमारे राजनीतिक अतीत व वर्तमान से लिये गये ये वाकये स्त्री अधिकारों और वंचित जातियों के बीच जानबूझ कर पैदा किये गये अंतर्द्वंद्व  की पृष्ठभूमि का जायजा देते हैं. वे भारत में जाति और जेण्डर के षड्यंत्र से निपटने की जरूरत को रेखांकित करते हैं और इसीलिये अम्बेडकर के स्त्रीवादी लेखन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है.  वर्तमान में स्त्रीवादी बहस व स्त्री अध्ययन पाठयक्रम अम्बेडकर के लेखन व राजनीति से लगभग पूरी तरह कटे हुए हैं. वहीं यदि तुलना करें तो गांधी, नेहरू व लोहिया अब भी चर्चा में बने हुए हैं. जाने-माने दलित लेखक व बुद्विजीवी बाबूराव बगुल आंबेडकर के लेखन की इस अकादमिक उपेक्षा के पीछे मुख्यधारा की उस प्रवृत्ति को देखते हैं, जिसमें राष्ट्रीय आंदोलन को पुरखों की स्तुति वाली एक ऐतिहासिक किंवदंती बढ़ना दिया गया है, जबकि फुले आंबेडकर विचारधारा को गैर राष्ट्रीय व व्यक्तिवादी फलसफे का नाम दे दिया गया है.

लेखिका शर्मिला रेगे

 1970 के वर्षों में दलित पैंथर  विचारधारा व गतिविधियां तथा दलित साहित्य कम से कम महाराष्ट्र में तो अकादमिया के लिये चुनौती बन कर उभरे और उनके बीच चयन करने की नौबत आ गई. इसके चलते समाज शास्त्र व साहित्य विभागों ने दलित लेखन को अपने शोध व पाठ्यक्रमों में जगह दी जबकि दलित पैंथर द्वारा खड़े किये गये अक्ल को चुनौती देते सवालों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया. हालांकि 1990 के दशक से देशभर में ‘जाति के धर्म निरपेक्ष उभार’ से आकार ग्रहण करता हुआ तथा संयुक्त राष्ट्र के जातिवाद पर अंतरराष्ट्रीय  सम्मेलन जैसे मंचों पर बढ़ावा पाकर दलित अध्ययन अब सामने आ रहा है. स्थानीय दलित आंदोलन तथा दलित स्त्रीवाद के साथ जुड़ने से भारत के विभिन्न भागों में दलित अध्ययन के कई नये रास्ते निकल रहे हैं. इस संयोजन से आंबेडकरके स्त्रीवाद को पढ़ पाने के रास्ते निकलते हैं और इससे फुले-आंबेडकरी, दलित स्त्रीवादी व गैर-दलित स्त्रीवादियों के बीच नये संवादों की संभावनाये खुलती हैं.
क्रमशः

देश के मर्दों एक होओ

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

संसद और विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण. संविधान संशोधन विधेयक ‘पेश’ तो कर दिया गया है लेकिन हम ‘पास’ कभी नहीं होने देंगे. हम (मर्द) जो हजारों सालों से हुकूमत करते रहे हैं, क्या इतना भी नहीं जानते-समझते कि सत्ता में 33 प्रतिशत आरक्षण का अर्थ (अनर्थ) क्या है ? जब हमने अपने प्रधानमन्त्री को ही एक शब्द तक बोलने नहीं दिया तो कानून मन्त्री हैं क्या चीज ? अपने आपको समझते क्या हैं ? ऐसे ही बिल पास करवा लेंगे और चाँदी की तश्तरी में  रखकर देश का राजपाट ‘बालकटी’ या ‘परकटी’ औरतों को सौंपे देंगे ?’1 हम अच्छी तरह जानते हैं कि बिल पास हो गया तो सैकड़ों साल तक देश में ‘पेटीकोट’ सरकार राज करेगी…हाँ ! पेटीकोट सरकार. सत्ता के लिए कांग्रेस, भाजपा, जनता दल, सीपीएम, सीपीआई, समता वगैरह की ममता छोड़-छाड़ अपनी ‘महिला पार्टी’ बना लेंगी तो ? आज के दिन, है किसी भी ‘मर्द’ पार्टी के पास 33 प्रतिशत संसद सदस्य ? ‘महिला पार्टी’ नहीं बनाएँगी या बना पाएँगी तो अपनी-अपनी पार्टी के ‘मर्द’ नेताओं की नाक में दम तो कर ही देंगी ना. आप नहीं जानते इन्हें. महिलाओं के मुद्दे पर फौरन एकजुट हो जाएँगी. तब कौन भुगतेगा इन (अ) बलाओं से ? बिना सोचे-समझे कह दिया, ‘‘महिलाओं सम्बन्धी विधेयक पास हो या न हो, उसकी मुझे रत्ती-भर भी चिन्ता नहीं है.’’2 बिल पास होने के बाद तो ‘तेरह दिन’ क्या एक मिनट के लिए भी आपको कोई प्रधानमन्त्री नहीं बनने देगी. ‘रत्ती भर भी चिन्ता नहीं है’ तो क्यों छपवाए थे ‘घोषणा-पत्र’ ? क्यों दिए थे ‘आरक्षण के आश्वासन’ ? क्यों ?

हमें मत बताओ कि ‘इस बारे में हर व्यक्ति के दो चेहरे हैं’3, पहला- वोट बटोरने के लिए झूठे घोषणा-पत्र छपवानेवाला, औरतों को बराबरी का अधिकार देने के आदर्श बघारनेवाला, समता-समानता- सामाजिक न्याय की नौटंकी करनेवाला और दूसरा औरतों को सिर्फ अपने पाँव की जूती समझनेवाला. अब यह कहने का कोई फायदा नहीं ‘हमें देखना है कि आरक्षण में कितना प्रतिशत दिया जाना चाहिए.’4 पहले क्यों नहीं सोचा-समझा कि इसके कितने ‘भयंकर परिणाम’ होंगे ? अब समझ में आ रहा है ‘सामाजिक बदलाव के लिए सब्र और सबकी सहमति अनिवार्य है.’ क्या आसमान टूट रहा था जो बिल पेश करते समय एक बार पूछा तक नहीं और चल दिए देश का राज सिंहासन सँभलवाने. पहले सलाह की होती तो शायद ये ‘सिंहवाहिनियाँ’ 10-15 प्रतिशत पर मान भी जातीं लेकिन…अब कैसे मनाओगे ? यह तो शुक्र करो कि उस दिन हमने संसद में शोर-शराबा कर-करवा के टाल दिया वरना आपने तो कर दिया था ‘सत्ता का श्राद्ध’. कटवा दी होतीं गर्दनें सरेआम समाज में. पता नहीं कैसे इन ‘देवियों’ के चक्कर में भूल गए कि भाई-भतीजे, बेटे-पोते बालिग हो चुके हैं ! आपको घर-परिवार-देश का मुखिया इसलिए थोड़े ही बनाया-बनवाया था कि आप हमारे ही भविष्य में आग लगा-लगवा देंगे. मत भूलो कि हम मुखिया को जब चाहे हटा भी सकते हैं. अगर आप सचमुच इतने ही ‘उदार सहृदय और प्रगतिशील, हैं या होना चाहते हैं तो ‘‘ऐसे सुधारवादी (स्त्री या दलित पक्षधर) पितृसत्तात्मक को गोली मार दी जाएगी.’’5

क्या आपको नहीं पता कि महिला आरक्षण बिल या विधेयक यदि पास होता है तो संसद में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ जाएगा और महिलाएँ उल्टे-सीधे बिल संसद में पुरुषों के विरुद्ध पास करवाने मे सफल हो जाएँगी…और न जाने कितने ‘पुरुषों को इन विधेयकों के माध्यम से जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी.’6 भ्रूण हत्या से लेकर सती तक के सारे कानूनी हथियार, जिनके बलबूते पर हम आज तक न्याय (का नाटक) करते रहे हैं- रद्दी की टोकरी में फेंक दिए जाएँगे. ‘‘सत्ता में आते ही उन्होंने दहेज की बड़ी-बड़ी राशियों की सुविधा और उनके लिए घरेलू हत्याओं और बलात्कारों का सुख छीन लिया, वैसे कानून बना दिए या उनके सख्ती से पालन पर जोर दिया, तो हम न घर के रहेंगे, न घाट के…’’7 यह सिर्फ मेरे जैसे सिरिफरे दिमाग में उपजी बेबुनियाद आशंका या डर नहीं है, बल्कि सामान्य नागरिक से लेकर देश के महान बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, सम्पादकों और नेताओं तक की मूल्यवान राय है. हम चाहते हैं कि ‘‘स्त्रियों को आरक्षण दीजिए लेकिन संसद में नहीं, नौकरियों में’’8 हम तो यहाँ तक कह रहे हैं कि ‘‘यह प्रतिनिधित्व एक-तिहाई क्यों, 50 प्रतिशत तक मिलना चाहिए, क्योंकि स्त्रियों की जनसंख्या कुल जनसंख्या का लगभग 50 प्रतिशत है. ‘किन्तु’ संविधान संशोधन इसका बहुत अच्छा तरीका नहीं है. इसका ‘सही रास्ता’ है स्त्रियों को विभिन्न कार्यक्षेत्रों में सेवाओं और पदों में समुचित प्रतिनिधित्व देकर ‘इतना सक्षम’ बनाया जाए कि स्त्रियाँ प्राचीन समाज-व्यवस्था की गुलामी को छोड़कर स्वयं आगे बढ़ें और राजनीति में ‘खुलकर’ हिस्सा लेने लगें.’’9

हमें मालूम है कि बिल पेश करना आपकी राजनीतिक मजबूरी है/थी. आपने बिल पेश नहीं किया होता, तो अगले चुनाव में दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ (महिला विरोधी, सती समर्थक) इसे आगामी चुनाव का मुख्य मुद्दा बनातीं और सब कालिख आपके चेहरे पर पोतते. (प्रफुल्ल बिडवई, टाइम्स आॅफ इंडिया, 6 जून, 1997) बिल पेश करना अगर आपकी मजबूरी थी/है तो इसे पास न होने देना भी हमारी मजबूरी है. किसके कितने चेहरे हैं- हम-आप सब सदियों से जानते-पहचानते हैं. आप कहते रहिए कि पिछड़ी औरतों के लिए हमारी माँग ‘इस समय सिर्फ फूट डालने की नीयत से उठाई जा रही है’. हम भी दरअसल कहाँ चाहते हैं कि हमारे घरों की सती-सावित्रियाँ चूल्हा-चैका छोड़कर राजधानी आ पहुँचें. हमने कभी ऐसी माँग की भी नहीं लेकिन अगर आप राजपाट उ (माँओं) या सुष (माँओं) को सँभलवाना ही चाहते हो, तो फिर हमारी बहनें, बहू-बेटियाँ (अनपढ़, गँवार मूर्ख) भी ‘बालकटियों’ के बराबर में आकर बैठेंगी- और देखते हैं कि कौन रोकता है ? सत्ता सँभालने का ठेका क्या सिर्फ पढ़े-लिखों ने ही ले रखा है ? सच पूछो तो इस ‘राष्ट्रीय बहस’ में हम ये सारे तर्क (कुतर्क) दे भी इसीलिए रहे हैं कि औरतों के साथ सदियों से किए ‘पाप का प्रायश्चित’ ही करना है और राजनीति से संन्यास लेकर घर बैठना है तो फिर लगे हाथ हम भी कर ही लें गंगा स्नान. आपको अकेले सारा पुण्य और आपकी औरतों को सत्ता-सुख थोड़े ही कमाने देंगे. सत्ता की शतरंज खेलना हम भी सीख गए हैं.

हाँ ! यह सच है कि हमें ‘औरतों के राजनीतिक वर्चस्व से अपनी जमीन खिसकती नजर आ रही है’ और ‘राजनीति में अचानक इतना बड़ा बदलाव बर्दाश्त करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पाए हैं.’10 पर हमें यह भी मालूम है कि ‘यह उत्तर आधुनिक स्त्रीलिंगी विमर्श विदेशी षड्यन्त्र (नहीं) है’ न ही ‘विकास का एक ऐतिहासिक चरण.’11 हमें लगता है कि यह सिर्फ ‘उच्च वर्ग का सत्ता पर नियन्त्रण बनाए रखने का खेल है’12 जो हम कभी जीतने नहीं देंगे. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद हमने तो शाहबानो को गुजारा भत्ता तक लेने नहीं दिया. रातों-रात नया कानून बनवा दिया कि नहीं ? सत्ता में तिहाई हिस्सा देने के सवाल पर तो हम पता नहीं क्या कुछ कर देंगे. अगर अब भी ‘अधिकांश भारतीय महिलाओं को महसूस होता है कि राजनीतिक शक्ति पाने के सपने साकार होने का सही समय आ गया है’13 तो वे देखती रहें सपने और देती रहें ‘सड़कों पर निकलने’ की धमकियाँ. हमारी सेहत पर क्या फर्क पड़ता है ? हमारे ‘केन्द्र को देर-सबेर तोड़ना’14 इतना आसान नहीं है. ये सब योद्धा ‘जो समर्थन दिखा रहे हैं उनका पुरुषत्व भी इस ‘क्रान्तिकारी’ साबित हो सकनेवाले फैसले को असानी से नहीं पचा पा रहा है.’15 पचाएगा भी कैसे ? समर्थन करनेवाले दलों में औरतों की स्थिति क्या है ? हम सब अच्छी तरह जानते हैं. हर एक के दलदल मंे धधकते ‘तन्दूर’ तैयार हैं. जिन्होंने अब तक एक भी स्त्री या दलित को अपने दल की निर्णायक समिति (वर्किंग कमेटी, पोलित ब्यूरो) के योग्य नहीं समझा वही सबसे ज्यादा शोर मचा रहे हैं. चिल्लाते रहो कि ‘कल औरतों का होगा’16 लेकिन यह मत भूलो कि ‘आज सिर्फ हमारा रहेगा.’. कल की कल देखेंगे.

क्या कहा आपने कि ‘विरोध करनेवालों के असली चेहरे सामने आ गए हैं.’ जी ! विरोध ही हमारा असली चेहरा है. आपकी तरह नहीं कि कहें कुछ और करें कुछ और ही. समर्थन के लिए ‘अटल’ रहनेवाले नेताओं के असली चेहरे देखने हैं तो उनकी युवा साध्वियों के चेहरे देखो, ‘राजपूतों’ के चेहरे देखो और ‘मातृशक्ति’ का पाठ पढ़ो. मत उठाओ यह सवाल कि ‘‘पिछड़े वर्ग की, मुस्लिम समाज की या अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाएँ क्या महिलाओं में नहीं आतीं ? इनके लिए अलग से आरक्षण क्यों ? पिछड़ी महिलाओं की वकालत करनेवाले क्या आरक्षण में भी आरक्षण चाहते हैं ? जो लोग शहरी महिलाओं की बजाए पिछड़ी महिलाओं के इतने ही हिमायती हैं, उन्होंने अब तक उनके लिए क्यों नहीं सोचा ? क्या इससे पहले उन्हें पिछड़ी महिलाओं की उन्नति का ख्याल नहीं आया ?’’17 खैर…सुनना ही चाहते हो तो हमारे सवाल भी सुनो. महिलाओं के लिए आरक्षण क्यों ? क्या वे भारतीय नागरिक नहीं हैं ? संविधान में  स्त्री-पुरुष को बराबर के अधिकार हैं जो आरक्षण ही क्यों, धन, हिम्मत, हौसला, बाहुबल, बुद्धि अनुभव और राजयोग हो तो लड़ो और आ जाओ संसद में. बन जाओ प्रधानमन्त्री (इन्दिरा गाँधी) कौन रोकता है ? हमें अगर ‘उन्नति का ख्याल’ पहले नहीं आया था तो आपको भी कहाँ इन ‘शोषित स्त्रियों की चिन्ता सता रही थी.’ हम तो दलित, उत्पीड़ित, अनपढ़, गँवार, बेवकूफ थे अब तक, परन्तु आप तो सदियों से सुशिक्षित, सुसंस्कृत, महाज्ञानी, विद्वान और राजा-महाराजा थे मान्यवर ! आपने क्यों नहीं सोचा ‘अर्धांगिनी’ के बारे में ? नजर उठा कर देखो तो पता लगेगा कि अब तक अधिकांश महिला राजनेता विधवा, तलाकशुदा या चिरकुंआरियाँ क्यों हैं ?

आप भी तो अब तक ‘सेक्सी संन्यासिनों’, स्वतन्त्र, शिक्षित और स्वावलम्बी मुक्त स्त्रियों या समाज सेविकाओं के सहारे सिंहासन पर कब्जा जमाए बैठे रहे हो. इससे पहले आपने भी कब सोचा था कि औरतें- वस्तु, भोग्या, गूँगी गुड़िया या खेती नहीं हैं ?पूरी ईमानदारी से सच पूछना चाहते हो तो आप आज भी ऐसा कुछ नहीं मानते ! सिर्फ राजनीति कर रहे हो- वोटों की राजनीति, सवर्णों की राजनीति, शिक्षित शहरियों की राजनीति. सत्ता पर दुबारा कब्जे की यह नई चाल है आपकी और कुछ नहीं. मंडल के बाद सवर्णों के हाथों से राज सिंहासन खिसकता जा रहा है. आपको डर लग रहा है हमारी मायावतियों और फूलन देवियों से. वे आपकी किसी आरक्षण स्कीम के अन्तर्गत यहाँ तक नहीं आईं. हम और हमारी बहू-बेटियाँ तो बिना आरक्षण के भी यहाँ तक आ गई हैं. आप ही और आपकी राजदुलारियाँ हमें आगे बढ़ने से अब रोक नहीं सकते. हम फिर कहते हैं कि धर्म, जाति, वर्ग वगैरह-वगैरह के झगड़ों को और मत बढ़ाओ. औरतें फिर औरतें हैं- हमारी हों या आपकी. हम सब मर्द हैं तो मर्दों की तरह बात करें- औरतों को बीच में न लाएँ तो बेहतर होगा. सत्ता में तिहाई हिस्सा इन्हें दे देंगे तो सारी सम्पत्ति, शिक्षा, समाज, संविधान और संसद से लेकर स्वर्ग तक हमें सब कुछ छोड़ना पड़ेगा. छोड़कर कहाँ जाएँगे? सोचो, वरना बेमौत मार दिए जाओगे. समझो स्त्रियों का सत्ता-विमर्श वरना…ये ‘दुर्गाएँ’ हम सबका सत्यानाश कर देंगी.

हम मानते हैं- स्वीकारते हैं कि ‘‘पंचायती राज के प्रयोग के बाद हमें वास्तव में यह खतरा है कि औरतों को एक बार सत्ता-शक्ति मिल गई तो वे लम्बे समय तक हमारे हाथों में खेलती कठपुतलियाँ नहीं रहेंगी.’’18 संसद में आने के बाद ये सारी की सारी ‘लक्ष्मीबाइयाँ’ पार्टी की राजनीति छोड़, महिलाओं की राजनीति करेंगी. संसद, विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, प्रेस, समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग में सब जगह एक-आध औरत को प्रतीकात्मक रूप से कुर्सी देकर देश स्वतन्त्रता की स्वर्ण जयन्ती मना ही रहा है ना ! 45 साल तक सुप्रीम कोर्ट में  एक भी महिला न्यायाधीश नहीं आई तो क्या ‘न्याय’ नहीं हो रहा था और फातिमा बीवी को ले आने से कौन सा लम्बा-चैड़ा फर्क पड़ गया ? सरोजिनी नायडू, इन्दिरा गाँधी, जयललिता से लेकर मायावती तक के राज में महिलाओं के कल्याण की कितनी क्रान्तिकारी परियोजनाएँ बनीं ? अब तक संसद (सत्ता) में आई महिलाओं ने महिलाओं के हित में क्या इतिहास रचा- कुछ बताओ तो ? एक तरफ आम भारतीय औरतों की हालत दिन-प्रति-दिन बदतर होती जा रही है और दूसरी तरफ जयललिताओं के घर में लूट का माल भरा पड़ा है. इसलिए हम बार-बार कह रहे हैं कि सामाजिक न्याय, महिला, मुक्ति अधिकार और बराबरी की बात मत करो. सारा चक्कर कुर्सी का है हुजूर ! कुर्सी का. इनके आने के बाद क्या हवाले, घोटाले, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी खत्म हो जाएगी ? और ज्यादा होगी. आप नहीं जानते ये रिजर्व बैंक में जमा सारे सोने के गहने बनवा कर घर ले जाएँगी- देश को पता भी नहीं चलेगा. आप आरोप लगा-लगवा रहे हैं कि हम ‘‘अपने मृत्युदंड के वारंट पर दस्तखत नहीं करना चाहते हैं.’’19 कैसे और क्यों कर दें ब्लैक वारंट पर दस्तखत ?



आप जानते/जानती हैं कि हमने प्रधानमन्त्री से मिलकर ‘‘इस विधेयक का टालने का अनुरोध ही नहीं किया, दबाव भी डाला !’’20 तो क्या हुआ ? अनुरोध और दबाव ही नहीं हम इससे आगे जा सकते हैं और जाएँगे. ‘‘पिछड़े वर्ग के लिए संविधान में आरक्षण की कोई व्यवस्था (ही) नहीं है.’’21 कहने से काम नहीं चलेगा. पहले यह व्यवस्था कीजिए…करिए संविधान में संशोधन. फिर महिला आरक्षण पर बात करेंगे. गाँव में हमारी औरतों को पीने का पानी नहीं है, खाने को रोटी नहीं है, तन ढँकने को कपड़ा नहीं है और आप बिना किसी सलाह या बहस के राजपाट लुटाने पर तुले हैं. असुरक्षा की राजनीति में ‘जैंडर जस्टिस’ की बातें उछालने का कोई लाभ नहीं.22 मन्त्रीमंडल में ‘चार और भिक्षुणियाँ’ छोड़ भले ही चालीस शामिल कर लो, लेकिन याद रखना बुद्ध ने कहा था कि ‘‘स्त्रियों को संघ में स्थान दिया गया तो वह ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा.’’23 आप वरिष्ठ और सम्माननीय हैं श्रीमन ! लेकिन आपका यह सुझाव कि ‘‘पिछड़े वर्ग की औरतों को प्रतिनिधित्व देना चाहते हो तो सभी राजनीतिक दल स्वेच्छा से उन्हें चुनावी टिकट दे दें, कानूनी आरक्षण देने से देश एक सदी पीछे चला जाएगा,’’24 विवेकसम्मत, न्यायसंगत नहीं है. अगर ऐसा ही है तो यह सुझाव सिर्फ पिछड़ी औरतों के लिए ही क्यों हो ? सबके लिए कर-करवा दो- हमें कोई एतराज नहीं. असहमति के लिए क्षमा चाहते हैं. लगता है कि काफी कुछ उल्टा-सीधा कह दिया हमने. लेकिन संक्षेप में, अन्त में इतना और बता दें कि अगर अगले सत्र में बिल पास करवाने के लिए ह्निप जारी किया-करवाया तो हमें सारे देश को सच बताना पड़ेगा कि यह सब हंगामा, शोर-शराबा, विरोध, प्रदर्शन, गाली-गलौच और नारी विरोधी रुख आपके ही कहने पर करना पड़ रहा है. अभी बस इतना ही काफी है. जोर से बोलो, ‘देश के मर्दो एक होओ.’ जय हिन्द.

सन्दर्भ सूची


1. 16 मई, 1997 को संसद में विधेयक पर बहस के दौरान जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष शरद यादव का बयान.
2. उपरोक्त बहस के दौरान भारतीय जनता पार्टी के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी की टिप्पणी.
3. प्रधानमन्त्री श्री इन्द्रकुमार गुजराल का दूरदर्शन पर साक्षात्कार और टाइम्स आॅफ इंडिया में रिपोर्ट.
4. टाइम्स आॅफ इंडिया में रिपोर्ट.
5. हंस, फरवरी, 1997 में ‘स्त्री-विमर्श: सत्ता और समर्पण’ लेख, अरविन्द जैन, पृ. 71
6. दैनिक हिन्दुस्तान, 17 जून, 1997 में रमेश डौरिया की पाठकीय प्रतिक्रिया.
7. हंस, अप्रैल, 1997 में सुप्रसिद्ध लेखक-सम्पादक श्री राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादकीय ‘सिंहासन खाली करो कि…’ पृ. 7
8. दूसरा शनिवार, 8 मार्च, 1997 में प्रसिद्ध लोहियावादी विचारक श्री मस्तराम कपूर का लेख, पृ. 10-11
9. वही.
10. ‘नारी संवाद’ मार्च, 1997, सम्पादकीय, पृ. 3
11. ‘कोड़े में बदलती करुणा’, सुधीश पचैरी, हंस, जून, 1997, पृ. 41
12. ‘विमेन बिल: इलीट प्लाय टू परपिचुयेट कंट्रोल’, सैयद शहाबुद्दीन, पाॅयनियर, 22 अक्टूबर, 1996
13. ‘पोलिटिकल पैट्रीआर्की: रिजर्वेशन अबाऊट पावर फाॅर विमेन’, ललिता पाणिकर, टाइम्स आॅफ इंडिया, 25 मई, 1997
14. ‘नई स्त्री और बिफरा हुआ मर्दवाद’ सुधीश पचैरी, जनसत्ता, 29 मई, 1997
15. ‘महिला आरक्षण के बहाने नए यथार्थ पर एक नजर’, विष्णु नागर, हिन्दुस्तान, 27 मई, 1997
16. ‘मूव ओवर, मिस्टर यादव यू आर इन माई सीट’, विद्या सुब्रामनियम, टाइम्स आॅफ इंडिया, 27 मई, 1997
17. सम्पादकीय, हिन्दुस्तान, 19 मई, 1997
18. ‘द सेकेंड क्लास सेक्स’, टाइम्स आॅफ इंडिया, सम्पादकीय, 19 मई, 1997
19. माया, 15 जून, 1997, पृ. 84
20. वही, श्रीमती मधु दंडवते की टिप्पणी, पृ. 84
21. वही, गीता मुखर्जी का बयान, पृ. 86
22. फ्रंट लाइन, जैंडर इश्यू, पृ. 113-115, 13 जून, 1997
23. दूसरा शनिवार, जून, 1997, सम्पादकीय ‘चार और भिक्षुणियाँ’, पृ. 3
24. फ्रंड लाइन में ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद का लेख, 27 जून, 1997, पृ. 94-95.

शिनाख्त के दायरे

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com

आधुनिक गद्य साहित्य की शुरुआत के साथ ही हिंदी उपन्यास लेखन में स्त्री रचनाकारों का प्रवृत्त होना एक सामान्य घटना नहीं है. स्त्रियों के लिए उपन्यास पुरुष रचनाकारों की तरह युगीन परिदृश्य को आलोचनात्मक दृष्टि से चित्रित करने की विधा मात्र नहीं है, वरन् पुरुष, परिवार और समाज के संदर्भ में अपने को देखने और अभिव्यक्त करने की विकलता है. अपनी नैसर्गिक वृत्ति और सोशल कंडीशनिंग के कारण स्त्रियां अधिक भावुक, संवेदनशील और परिवार से बंधी होती हैं. संवेगों की तीव्रता और प्रजनन की क्षमता के कारण उनकी मूल प्रकृति संबंध और मनुष्य को बचाने की प्रक्रिया में तल्लीनता, जिजीविषा और संघर्ष को उनकी रचनात्मकता का केंद्रीय बिंदु बना देती है. इसी कारण उनके उपन्यास गहरी मार्मिकता के साथ प्रगाढ़ आत्मीय संबंधों को बुनते हुए जहां पाठक की अनुभूतियों को अपने साथ बहा ले जाते हैं, वहीं पुरुष रचनाकारों के उपन्यासों में अपने से छिटक कर समय के साथ रू-ब-रू होने का वस्तुगत प्रभाव पाठक की बौद्धिकता को आंदोलित करता है. स्त्रियों के लिए उपन्यास अपने रुद्ध मनोवेगों और दमित भावोच्छ्वासों को अभिव्यक्त कर देने का माध्यम अवश्य है, लेकिन अपवनी मूल प्रकृति में यह घर केे आंगन में एकत्रित स्त्री-समूह के पीड़ा और आकांक्षा के सामूहिक गान के रूप में अधिक उभरता है. परंपरा से स्त्रियों के हिस्से बहुत थोड़ी सी जमीन और आसमान आए हैं, इसलिए उनकी उड़ान भी छोटी सी है. खुले व्योम में तैर कर दूर निकल जाना और फिर गुम हो गई वापसी की राहों को तलाशने की बजाय नई राहों को अपनी मंजिल बना लेना – स्त्रियों की प्रकृति में नहीं. इसलिए उनकी रचनाओं में सीमाओं के अतिक्रमण का हौसला नहीं है, भीतर तक बींध देने वाली जड़ताओं और बेड़ियों की खुर्दबीनी जांच का आग्रह है. वे एक ऐसे लोक का दिग्दर्शन कराने वाली कृतियां बन जाती हैं जहां एक ही देशकाल में साथ-साथ रहते दो इंसान निरंतर गहराते अपरिचय और दूरी के कारण न आपसी समझबूझ और तालमेल विकसित कर पाते हैं, न समय और समाज के सृजन में अपनी रचनात्मक भूमिका निभा पाते हैं. स्त्री-उपन्यास के केंद्र में बेशक स्त्री है, लेकिन ये कृतियां अनिवार्यतः पुरुष को संबोधित हैं ताकि वर्तमान समाज व्यास्था द्वारा स्त्री-पुरुष-संबंध को जड़ और रूढ़ बनाए जाने के कारणों को विश्लेषित कर वह साझी लड़ाई में उसका साथ दे. स्त्री-उपन्यास-लेखन सतही तौर पर स्त्री द्वारा अपनी मांगों और अधिकारों का घोषणा-पत्र दिखाई पड़ता है, लेकिन दरअसल वह स्त्री को पुरुष का पूरक पक्ष (यानी पुरुष सापेक्ष इयत्ता) न मान कर एक स्वायत्त मानव-इकाई समझने की संवेदनशीलता के प्रसार का आग्रह है.

कृष्णा सोबती

स्त्रियों का उपन्यास-लेखन तमाम तरह के महिमामंडन और तिरस्कार से परे एक ऐसी स्त्री को प्रत्यक्ष करता है जो अब तब रचित पुरुष-साहित्य में प्रायः अनुपलब्ध है. इस प्रकार यह न केवल साहित्य में पुरुष-वर्चस्व को तोड़ कर इसे अधिक लोकतांत्रिक और बहुआयामी बनाता है, बल्कि यशपाल, महादेवी वर्मा, वर्जीनिया वुल्फ और सिमोन द बउवा की इस मान्यता को पुष्ट करता है कि अनुमान के सहारे ’दूसरे’ के चरित्र चित्रण का अहं दरअसल अपने ही भय और हीनता को छुपाने की बेचारगी है. डाॅ0 गोपाल राय की पुस्तक ’हिंदी उपन्यास का इतिहास’ में 1890 से प्रेमचंद युग तक प्रकाशित स्त्री उपन्यासकारों के उपन्यासों का उल्लेख है, किंतु उनके ठोस रचनात्मक अवदान को लेकर वे स्वयं आश्वस्त नहीं हैं. उनके शब्दों में ’’ये उपन्यास लेखिकाएं हिंदू समाज में स्त्री की विषम और दयनीय स्थिति का प्रामाणिक चित्रण करने में सफल हैं, पर उनका दृष्टिकोण रूढ़ ही है. वे परंपरागत नारी संहिता के विरोध में जाने का साहस नहीं कर सकी हैं, यद्यपि स्त्री शिक्षा का वे खुल कर समर्थन करती हैं. इन लेखिकाओं का नारी संबंधी दृष्टिकोण पुरुष लेखकों से भिन्न नहीं है.’’ उल्लेखनीय है कि इसके बाद भी 1960 तक स्त्री-उपन्यास-लेखन में कोई उल्लेखनीय हस्ताक्षर अथवा प्रवृत्ति दृष्टिगत नहीं होती. 1961 में उषा प्रियवंदा के उपन्यास ’पचपन खंभे लाल दीवारें’ के प्रकाशन के साथ हठात् स्त्री-उपन्यास-लेखन का पाट चैड़ा और गहरा होने लगता है. फलतः 1961 से अब तक के पचपन वर्ष के उपन्यास का विश्लेषण तीन वर्गों में किया जाना समीचीन है जहां एक स्त्री-उपन्यासकार युगप्रवर्तक की भूमिका निभाते हुए न केवल स्त्री-पुरुष संबंधों की पड़ताल के जरिए स्त्री और पुरुष को निर्धारित छवियों/भूमिकाओं में बांधने वाली पितृसत्तात्मक व्यवस्था को कठघरे में खींच लाती है, वरन् अपने सरोकारों का विस्तार करते हुए उपन्यास की विषयवस्तु को घर की चैहद्दी से निकाल समाज, राजनीति और धार्मिक प्रपंचों तक ले आती है. ये वर्ग हैंः 1961 से 1974 तक रचित उपन्यास, 1975 से 1993 तक रचित उपन्यास, और 1994 से  अब तक के उपन्यास.

1
1961 से 1974 तक का कालखंड मुख्य रूप से चार उपन्यासकारों की कृतियों के इर्द-गिर्द घूमता है. ये हैंः उषा प्रियंवदा, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और ममता कालिया. पहली बार इन रचनाकारों ने पुरुष की छाया से मुक्त कर अपने को देखने का जतन किया है. पुरुष की पसंद और परंपरा के दबाव के बाहर उनके भीतर भी एक दिल धड़कता है, एक मस्तिष्क है जो बहुत सी वर्जनाओं को अस्वीकार कर स्वयं जीवन का कर्ता बन जाना चाहता है. यह स्थिति अनिवार्यतः दो स्तरीय टकराहट का प्रस्थान बिदु बनती है. पहली टकराहट स्वयं अपने आप से है. स्त्री जानती है उसके अंतस के निर्माता घटक हैं – भीतर बैठी हीनता ग्रंथि, असुरक्षा और भय का भाव, प्रतिकूल परिस्थितियों में निर्णय को मुल्तवी करते चले जाने और किसी अन्य द्वारा निर्णय लेकर उसे उबार लेने का भाव. यह स्त्री विचारशील अवश्य हुई है, लेकिन भावुकता के सीलेपन से उबर कर तार्किक चिंतन की चटकीली धूप को अपने मन-आंगन में फैलने नहीं देती. उषा प्रियंवदा का उपन्यास ’पचपन खंभे लाल दीवारें’ और ’रुकोगी नहीं राधिका’, मन्नू भंडारी का ’आपका बंटी’, कृष्णा सोबती के ’मित्रो मरजानी’ और ’सूरजमुखी अंधेरे के’ उसकी इस मनोवृत्ति के उदाहरण हैं. ’पचपन खंभे लाल दीवारें’ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर एक ऐसी आधुनिका स्त्री की कथा है जिसके बीज ’गोदान’ की मालती में हैं. आर्थिक रूप से अक्षम पिता और परिवार के भरण-पौषण के लिए नौकरी करती यह स्त्री (सुषमा) जीवन को बदरंग कर डालने वाले दो तथ्यों से खूब परिति है. एक, आय का स्रोत बनाए रखने के लिए उसका अपना परिवार उसके विवाह और भविष्य से बेपरवाह हो गया है. दूसरा, अपनी अन्य चिरकंुवारी सहकर्मियों की कुंठा और सनक से परिचित होकर वह स्वयं ईष्र्याविदग्ध चिरकुंवारी के रूप में जीना नहीं चाहती. नील प्रेमी से अधिक मुक्तिदाता के रूप में उस तक आता है, लेकिन ऐन निर्णय के क्षण में परिवार लिजलिजी भावुकता बन उसके पैरों में बेड़ियां डाल देता है. प्रेमविवाह की आकांक्षा और प्रेमविवाह का निर्णय न ले पाने के असमंजस में सुषमा जिस स्त्री छवि को रचती है, वह विलंबित गति से आगे बढ़े पैर को दु्रत गति से पीछे लौटा लेने वाले यथास्थितिवाद को उकेरती है. द्वंद्वग्रस्तता उषा प्रियंवदा की नहीं, उनकी समकालीन सभी स्त्री रचनाकारों की विशेषता है. ’रुकोगी नहीं राधिका’ (1967) में यह रिवर्स कल्चरल शाॅक और इलेक्ट्रा कांप्लेक्स के रूप में अभिव्यक्त होती दीखती है, लेकिन दरअसल यह पति/पिता के रूप में एक सुरक्षादायक खूंटे को आजीवन पकड़े रहने की जिद का परिणाम है. प्रेम करके प्रेम का निर्वाह न कर पाना उषा प्रियंवदा की स्त्री के उन भारतीय संस्कारों की ओर संकेत करता है जहां पति एवं अन्य पारिवारिक रिश्तों के अतिरिक्त प्रेम का कोई भी रूप स्त्री के लिए निषिद्ध है.

मन्नू  भंडारी

द्वंद्व और पराजय की इसी जमीन से विकसित हुई हैं कृष्णा सोबती की बोल्ड नायिकाएं. ये नायिकाएं बोल्ड इसलिए हैं कि परंपरा के विरुद्ध जाकर अपनी दैहिक भूख का स्वीकार करती हैं और सेक्स पार्टनर के रूप में मनवांछित पुरुष को चुनना चाहती हैं. इस प्रक्रिया में वह पुरुष विवाह-संस्था के बाहर खड़ा पर-पुरुष हो तो भी. मित्रो (’मित्रो मरजानी’, 1967) द्वारा पति सरदारीलाल को बगलोल (काठ का उल्लू) कह कर कसबन मां बालो के प्रेमी डिप्टी साहब के संग देह का खेल खेलने की अभिलाषा कृष्णा सोबती की नायिका को सीधे-सीधे ’अनैतिक’ करार देने के लिए पर्याप्त है. लेकिन सत्य यह है कि ’नद नदिया सी खुली’ यह नार जितना कहती-जताती है, उतना करने का साहस (नैतिक?) अपने भीतर नहीं पाती. दरअसल मित्रो के जरिए लेखिका परिवार संस्था के ढांचे को तोड़ना नहीं चाहतीं, नैतिकता के दोहरे मानदंडों पर करारी चोट करना चाहती हैं जो स्त्री की यौन-आकांक्षाओं को दमित कर पुरुष की निरंकुशता को उसकी मर्दानगी का मूल्य बना देते हैं. डिप्टी की मिलनाभिलाषी मित्रो चैबारे की सीढ़ियां चढ़ते हुए दो बिंबों से साक्षात्कार करती है. ससुराल के आंगन में बचपन, जवानी और बुढ़ापे के रूप में जीवन की चहचहाहट; और मां के सूने आंगन में उम्र के हाथों तिल-तिल छीजती बूढ़ी बीमार कराहटें; मानो परिवार संस्था की ’नैतिकता’ की चैखट उलांघते ही अपने खंडहर होते भविष्य का सामना कर लिया हो उसने. मित्रो के अभिज्ञान का यह बिंदु  कृष्णा सोबती की नायिकाओं को पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा नहीं करता, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के वर्चस्ववादी स्वरूप से स्त्री-अस्मिता के स्वीकार का अनुरोध भी करता है. 1972 में प्रकाशित उपन्यास ’सूरजमुखी अंधेरे के’ भी सतही तौर पर नैतिकता को चुनौती देती स्त्री की साहस-गाथा के रूप में दिखाई पड़ता है, लेकिन असल में यह बचपन में बलात्कार की शिकार स्त्री की यौन फ्रिजिडिटी से मुक्ति पाने की एक-पक्षीय लड़ाई का आख्यान है. बलात्कार स्त्री की देह पर आघात नहीं, उसकी आत्मा और आस्था को लहूलुहान कर दिए जाने का घिनौना कृत्य है जिसमें अपराधी की धरपकड़ नहीं होती, अपराध की शिकार स्त्री को मृत्युदंड अथवा आत्मनिर्वासन की पीड़ा दी जाती है. कृष्णा सोबती का यह उपन्यास इस मायने में बेजोड़ है कि पुरुष की पाशविकता का शिकार होकर भी उनकी स्त्री पात्र रत्ती पुरुष-द्वेष से ग्रस्त नहीं होती, बल्कि पुरुष की संवेदनशीलता और सहयोग से अपने भीतर की पथरीली जमीन में खोई आस्था और स्त्रीत्व को ढूंढ निकालना चाहती है. पुरुष-प्रताड़ना के बावजूद पुरुष के प्रति द्रोह या द्वेष जैसे किसी भाव को पनपने न देना कृष्णा सोबती की प्रमुख विशेषता है जो उन्हें अंत तक परिवार और संबंध की हार्दिकता से जोड़े रहती है. हिंदी उपन्यास को व्यंजनाधर्मी सृजनात्मकता और काव्यात्मक भाषा देने के लिए कृष्णा सोबती का योगदान विशेष उल्लेखनीय है. ’मित्रो मरजानी’ में बाढ़ के आवेग में उफनती नदी का अनियंत्रित बहाव है तो ’सूरजमुखी अंधेरे के’ में कविता की लय और आंतरिक सौन्दर्य का उन्मेष. देह संबंध का विशद चित्रण आरोपित, अमर्यादित अथवा अश्लील नहीं, कविता के सान्निध्य में अपने भीतर पसरी अभिशाप की शिला को तोड़ कर नीचे दबी कलियों के पूर्ण विकसित होने की प्रक्रिया बन जाता है. रूप, रंग, गंध, स्पर्श और स्वाद – मानो पांचो इंद्रियां एक नई उमगती संवेदना के अभिषेक के लिए तत्पर खड़ी हैं.

परिवार इस दौर की स्त्री की भावनात्मक आवश्यकता के रूप में उभर कर आता है. ’आपका बंटी’ (1971) की तलाकशुदा शकुन इस मान्यता की पुष्टि करती है, लेकिन साथ ही पूर्ववर्ती रचनाकारों से एक कदम आगे जाकर विघटनशील दांपत्य संबंध को परे फेंकने का जोखिम भी उठाती है. इन तीनों लेखिकाओं से भिन्न तेवर लेकर आती हैं ममता कालिया. स्त्री की यौन शुचिता के आग्रह के विरोध में रचे गए उपन्यास ’बेघर’ (1971) के माध्यम से वे अपने समय के दकियानूसी समाज को करारी चोट पहुंचाती हैं. ममता कालिया कृष्णा सोबती की संवेदना और परंपरा की वाहक हैं, और उनसे कहीं अधिक एकाग्र, निर्भीक और गंभीर. विवाहपूर्व प्रेम और शरीर संबंध यदि अनैतिक हैं तो यौन शुचिता गंवाने का अपराध कहर बन कर स्त्री पर क्यों टूटता है? पुरुष क्यों हर अवस्था में न्यायाधीश बना रह कर स्त्री की नियति और आकांक्षाओं को नियंत्रित करे? ममता कालिया सिर्फ सवाल नहीं उठातीं, स्त्री (संजीवनी) को संबंध तोड़ कर बेघर किए जाने वाले पुरुष (परमजीत) को यौन शुचिता के मानदंड पर खरा उतरी फूहड़ पत्नी रमा के हाथों बेघर होता दिखाती हैं. यह मानो उनका ’अपराधी’ पुरुष के प्रति प्रतिशोध है और संबंधों को पुनर्परिभाषित करने का जतन भी जहां तमाम रूढ़ियों और अर्हताओं को तोड़ कर एक-दूसरे के प्रति अपेक्षाहीन अनन्य प्रेम ही संबंध की रीढ़ बनता है. ममता कालिया ऐसी रचनाकार हैं जो लिजलिजी भावुकता को छोड़ कर बौद्धिकता और व्यंग्य को लेखन के औजार बनाती हैं. पूर्ववर्ती लेखिकाओं के द्वंद्व की अंतर्लीन लहरों में डूब-उतरा कर परंपरा में अपना वजूद खो देने वाला शिल्प यहां आकर न केवल खुरदरा आकार लेता है, बल्कि अपनी दिशा भी बदलता दिखाई देता है.

ममता कालिया

2
1975 से 1994 तक के कालखंड में अनेक लेखिकाएं दृश्यपटल पर उभरती हैं, लेकिन ममता कालिया के बेलौसपन और सधी दृष्टि को मृदुला गर्ग और एक सीमा तक नासिरा शर्मा के अतिरिक्त और कोई रचनाकार आगे नहीं ले जा सकीं. ’उसके हिस्से की धूप’ (1975) के प्रकाशन के साथ मृदुला गर्ग की उपन्यास यात्रा शुरु होती है जो ’मिलजुल मन’ (2009) तक विकास के अनेक पड़ाव पार करते हुए स्त्री की जातीय अस्मिता और संघर्ष को राजनीतिक-सांस्कृतिक संदर्भों के साथ अभिव्यक्त करती है. सतही तौर पर ’उसके हिस्से की धूप’ मन्नू भंडारी की कहानी ’यही सच है’ की याद दिलाता है, लेकिन दरअसल उपन्यास की कहानी स्त्री की वरण की स्वतंत्रता है ही नहीं, प्रेम के नाम पर इस या उस पुरुष के बीच झूलती स्त्री की अकर्मण्यता और व्यक्तित्वहीनता के दंश की ईमानदार अभिव्यक्ति है. ’’प्रेम में इतना घनत्व नहीं होता कि वह जीवन के खोखलेपन को भर दे’’ – मनीषा के संज्ञान का यह बिंदु स्त्री के भीतर रीतिकालीन नायिका देखने की अभ्यस्त पुरुष-मानसिकता पर करारी चोट करता है. साथ ही स्त्री को भी रूढ़ एवं आरोपित छवियों से मुक्त कर अपने को मनुष्य के रूप में देखने का विवेक देता है कि किसी की पत्नी या प्रेमिका मात्र बन कर क्या कोई इंसान जीवन में सार्थक और सकारात्मक करने का संतोष पा सकता है? अपनी इसी भावभूमि का विस्तार करते हुए जब वे ’चितकोबरा’ (1979) जैसा उपन्यास लिखती हैं तो अश्लील लेखन का आरोप लगाकर उन पर मुकदमा भी चलाया जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि किसी भी कुशल डाॅक्टर की तरह वे पर्दे में दबे-घुटे बदबूदार नासूर को उघाड़ कर एकदम सामने ले आती हैं. वैवाहिक बलात्कार की विभीषिका झेलती स्त्री (मनु) जिस यांत्रिक ढंग से देह संबंध को अपॅरेशन टेबल पर पड़े मुर्दे की चीरफाड़ की प्रक्रिया या वेश्यालय में हो रहे व्यभिचार में तब्दील करती है, वह रागात्मकता और हार्दिकता से छूंछे दांपत्य संबंध को कठघरे में खींच लाता है. दांपत्य संबंध पत्नी के नसीब में आजीवन गुलामी लिखने की पट्टेदारी नहीं है. वह देह से ज्यादा मन के संवाद का संबंध है. जाहिर है इसके लिए पुरुष से अपेक्षा की जाती है कि स्त्री को सबसे पहले इंसान के रूप में समझे जाने की संवेदना विकसित कर सके. ’कठगुलाब’ हालांकि कालानुक्रम की दृष्टि से बाद (1996) की रचना है, लेकिन मृदुला गर्ग की स्त्रीविषयक अवधारणाओं को केंद्रीभूत रूप में इस उपन्यास में देखा जा सकता है. मृदुला गर्ग मानती हैं स्त्री-पुरुष संबंध के साथ-साथ सृष्टि की अनवरतता बनाए रखने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों को एक-दूसरे के प्रति न केवल उदार और संवेदनशील होना होगा, बल्कि आगत की रक्षा के लिए हर तरह के वैचारिक-मानसिक-भावनात्मक बंजर को उर्वर बनाना होगा. मृदुला गर्ग का यह उपन्यास इस मायने मे बेजोड़ है कि यह पहली बार हीनता ग्रंथि और अपराध बोध से मुक्त स्त्री की रचना करता है जो अंतःशक्तियों को संजो कर ही अपने अधिकारों और समाज के निर्माण की लड़ाई लड़ती हैं. उनकी स्त्री कोख को अपनी कमजोरी नहीं, ताकत मानती है और इस प्रकार परिवार संस्था के प्रति अपनी आस्था को निबद्ध करती है. कृष्णा सोबती की भांति मृदुला गर्ग उत्पीड़क पुरुष को क्षमा नहीं कर पातीं, लेकिन इतनी आकांक्षा अवश्य पालती हैं कि स्त्रीहृदय पाकर पुरुष अर्धनारीश्वर की अवधारणा को एक बार फिर साकार कर दे.

एक ही उपन्यास के बावजूद हिंदी उपन्यास परंपरा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने वाली राजी सेठ ’तत्सम’ (1983) में जाहिरा तौर पर स्त्री मुक्ति की बात नहीं करतीं. परिवार/पुरुष द्वारा उत्पीड़न या हीनता ग्रंथि उनकी स्त्री का परिचय नहीं. उपन्यास की नायिका वसुधा वस्तुतः समाज से मुखातिब है ही नहीं. वैधव्य ने उसके सामाजिक जीवन को आंदोलित नहीं किया है, पुनर्विवाह के विकल्प ने उसे भीतर तक उद्वेलित कर दिया है. क्या कानूनी अधिकार और सुविधा के नाम पर व्यक्ति को प्रतिस्थापित करते चले जाने से संबंध की हार्दिकता को अ-क्षरित भाव से नए संबंध में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है? क्या एक व्यक्ति के चले जाने पर उसकी स्मृतियों की रीती परिक्रमा करके भविष्य की ओर उन्मुख जीवन के साथ न्याय किया जा सकता है? जीवन में व्यक्ति महत्वपूर्ण है या संबंध? यदि संबंधहीनता वयक्ति को सामाजिकता से काट कर अहम्मन्यता की खोखली अनुगूंज बना देती है तो क्यों गलत व्यक्ति के चयन पर संबंध दमघोंटू बन जाते हैं? राजी सेठ सूक्ष्म मनोभावों और दार्शनिक चिंतन की लेखिका हैं. वे जानती हैं वसुधा की तरह अनिर्णय के कुहासे में घिर जाने के बाद हर व्यक्ति अपनी मनोवृत्तियों, प्राथमिकताओं और अपेक्षाओं के अनुरूप ही चयन का विकल्प अपने पास रखता है. मौन में निबद्ध सघन उच्छ्वास, सांकेतिकता, बिंब, कविता, प्रतीकात्मकता और पल-पल रंग बदलती भीतर की प्रकृति से परिचित होने के क्रम में आंखों की कोरों में घुल आई संकोचशील उत्सुकता – ’तत्सम’ को उपन्यास नहीं, गद्य में निबद्ध एक भावगीत बना देती है. यह स्त्री द्वारा अपने को पहचाने जाने का आह्वान है – रणभेरी बजाने से कहीं ज्यादा कठिन साधना. जाहिर है यह पहला उपन्यास है जो सामाजिक विश्लेषण को नहीं, संश्लेषण की अंतःशक्ति को अपनी ताकत बनाता है.

मैत्रेयी पुष्पा

वर्ष 1975 को अंततराष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में तथा 70 के दशक को महिला दशक के रूप में मनाया जाना इस कालखंड की रचनाशीलता को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण घटक रहा है. यह वह दौर था जब वैश्विक स्तर पर बाहरी चिन्हों तथा प्रतीकों के जरिए स्त्री-मुक्ति की घोषणा की जा रही थी. अमेरिका-फ्रांस आदि में स्त्री के अंतर्वस्त्रों के साथ ऊँची एड़ी की सैंडिल और प्रसाधन सामग्री को भी आग की लपटों के हवाले किया जा रहा था जो स्त्री की कमनीयता और सुकुमारता को पोषित करने वाले घटक चिन्हित किए गए. भारतीय संदर्भ में मंचों और सार्वजनिक स्थलों पर बिंदीविहीन सिगरेट पीती स्त्री लिबरेटेड स्त्री के प्रतीक रूप मेें चिन्हित की जाने लगी. इस स्त्री की कुछ विशेषताएं बताईं गईं जैसे सुशिक्षिता, बुद्धिजीवी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, विवाह संस्था की विरोधी तथा मातृत्व के प्रति उपहासात्मक भाव. यह देखना काफी दिलचस्प है कि आठवें दशक न केवल साहित्य में लेखिकाओं की बाढ़ आई, बल्कि कुछ-कुछ फार्मूलाबद्ध लेखन भी किया जाने लगा. बानगी के ता्रैर इस लेखन की ये विशेषताएं हैं: स्त्री-पुरुष पात्रों का सहज विकास करने की बजाय उन्हें प्रारंभ से ही उत्पीड़िता और उत्पीड़क की कोटियों में विभाजित किया जाना; प्रेम-प्रवंचिता/पति-प्रताड़िता स्त्री द्वारा दांपत्येतर संबंध की स्वीकृति; समाज की प्रतिकूल टिप्पणियों से अधिक अपनी ही अंतरात्मा द्वारा प्रतारणा जो अंततः अपराध-बोध में अभिव्यक्त होकर स्वस्थ पारिवारिक-सामाजिक संबंधों के आड़े आती है; विवाह संस्था के प्रति अनास्था के बावजूद विवाह संबंध में बंधने की आतुरता; निर्णयदुर्बलता; और अपने विद्रोही तेवरों को आत्मपीड़न के ’सुख’ में घुला देने की कातरता; या फिर स्वतंत्र होने  के नाम पर दैहिक उच्छृंखलता की वकालत करना. रोमान की हदों को छूती भावुकता, बचकाने हठ में विघटित होती तार्किकता और आत्मनिर्भर व्यक्तित्व की भास्वरता को दरकाती द्वंद्वग्रस्तता – इस कालखंड की अधिकांश औपन्यासिक कृतियों की प्रवृत्तिगत विशिष्टताएं हैं जो अपने युग की स्त्री के ढुलमुलपन को व्यंजित करने के अतिरिक्त अन्य कोई कलात्मक वैशिष्ट्य हिंदी साहित्य को नहीं देतीं. इन लेखिकाओं में शशिप्रभा शास्त्री, कुसुम अंसल, दीप्ति खंडेलवाल, सूर्यबाला, मेहरुन्निसा परवेज, कृष्णा अग्निहोत्री आदि को लिया जा सकता है. नासिरा शर्मा इन लेखिकाओं में अपनी अलग पांत बनाती हैं. उसका कारण यह है कि अपने स्त्री पात्रों में समकालीन नायिकाओं का अक्स पिरोते हुए भी वे एक वस्तुगत दूरी के साथ उनके आचरण की निर्मम जांच करती हैं. पहले ’शाल्मली’ (1987) और फिर ’ठीकरे की मंगनी’ (1989) में उन्होने स्त्री को लेकर स्त्री और पुरुष की सोच में पाए जाने वाले बुनियादी अंतर को स्पष्ट किया है. ’शाल्मली’ पचास के दशक के उत्तरार्ध में पैदा हुई उस पीढ़ी की कथा है जिसने अपने उदारमना पिता के प्रभावस्वरूप पुत्रवत् लालन-पालन और लैंगिक समानता की अवधारणा को संस्कार में पाया है. लेकिन जैसे-जैसे बड़ी होकर अपनी आंख और बुद्धि के साथ दुनिया को देखने और तरैलने लगती है, पाती है पिता के उदार चेहरे के पीचे कहीं एक सामंत बैठा है जो उसके निर्देशों को अस्वीकार कर अपना रास्ता बनाती बेटी के प्रति संवेदनहीन हो उठता है. लेखिका इस सवाल को लेकर खासी परेशान हैं कि आखिर स्त्री-मुक्ति है क्या? स्त्री की लड़ाई आखिरकार है किससे? दरअसल लेखिका उन्मुक्त स्त्री को गृहभंजक की छवि में रिड्यूस कर दिए जाने के सामाजिक षड्यंत्र से उद्वेलित हैं. इसलिए ’शाल्मली’ में कैरियर और स्वतंत्रता के नाम पर परले दर्जे की स्वार्थी, सुविधाभोगी और सामंती मानसिकता से ग्रस्त आधुनिका स्त्रियों और तथाकथित बुद्धिजीवी स्त्रीचिंतकों पर चोट करने में वे कोई कोर कसर नहीं छोड़तीं. ’ठीकरे की मंगनी’ उपन्यास के जरिए वे ऐसी संघर्षशील स्त्री की छवि को आधुनिका स्त्री का पर्याय बना देना चाहती हैं जो प्रेम और संबंधों में मात खाकर टूटती नहीं, अपनी शिक्षा, स्वाभिमान और संकल्पदृढ़ता के बल पर अपना मुकाम बनाते हुए हाशिए के अन्य तबकों को भी साथ लिए चलती है. ’ठीकरे कह मंगनी’ की नायिका महरूख हिंदी उपन्यास के जीवट वाले पात्रों में एक है. नासिरा शर्मा की विशेषता है कि वे भावनाओं के उफान में अपने स्त्री-पात्रों को विचलित नहीं होने देतीं, बल्कि संघर्ष के घटाटोप में निःसंग चिंतन को थाती के रूप में उन्हें सौंपती हैं. इस कारण उनकी भाषा न केवल विश्लेषणपरक हुई है, बल्कि ऐसे अनेक सूत्रवाक्यों की रचना कर जाती है जिनका संबल लेकर पितृसत्तात्मक समाज व्यस्था की अनेकायामी पड़ताल की जा सकती है. उल्लेखनीय है कि स्त्री-उपन्यास लेखन के स्वरूप को सुस्थिर और उन्नत करने के लिए उत्तरदायी तीनों लेखिकाएं – उषा प्रियंवदा, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी इस कालखंड में भी रचनारत रही हैं. विशेष रूप से मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती ने अपने सरोकारों का विस्तार करते हुए स्त्री-प्रश्नों से इतर राजनीतिक-सांस्कृतिक सवालों से टकराने की कोशिश भी की है. आश्चर्य नहीं कि परवर्ती रचनाकारों के लिए वे एक नया ट्रेंड भी सेट कर जाती हैं. ’महाभोज’ (1979) उपन्यास लिख कर मन्नू भंडारी भारतीय राजनीति के भ्रष्ट एवं संवेदनहीन चेहरे को बेनकाब करती हैं. इसी परंपरा की अगली कड़ी के रूप में ठीक एक साल बाद मृदुला गर्ग ’अनित्य’ (1980) उपन्यास लेकर आती हैं जो 1930 से 1960 के बीच के राजनीतिक आंदोलनों का अपनी दृष्टि से विश्लेषण करता है. केंद्रीय पात्र अविजित के अंतर्विरोधों और द्वंद्वग्रस्तता के माध्यम से लेखिका ने गांधीवादी राजनीति की असफलता और हिंसात्मक आंदोलनों के प्रति अपनी पक्षधरता को स्पष्ट किया है. राजनीति को विषय बना कर उपन्यास लेखन करने वाली अधिक स्त्री रचनाकार नहीं हुई हैं लेकिन चंद्रकांता ने ’कथा सतीसर’ (2001) में कश्मीर समस्या का सांगोपांग विश्लेषण कर राजनीतिक उपन्यास-लेखन को उत्कर्ष पर पहंुचाया है.

इस कालखंड में दूसरी रचनाधारा भी वर्ष 1979 में ’जिंदगीनामा’ (कृष्णा सोबती) के रूप में प्रकाश में आई. ’जिंदगीनामा’ अविभाजित पंजाब की जातीय परंपरा का उपन्यास है जिसमें कृषि संस्कृति की सोंधी महक, पंजाबी किसान का जीवट और पंजाबी फौजी का हौसला, राग-द्वेष के बावजूद सहयोग औस सद्भाव की वृत्ति, प्रथम विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियां, रियाआ के प्रति शाहजी के उमड़ते प्रेम और सहानुभूति के भाव सर्वत्र बिखरे पड़े हैं. उपन्यास नास्टेल्जिया का उत्पाद है, इसलिए न मोहक दृश्यावलियंा लेखिका की अंतर्दृष्टि से जुड़ कर कथा का कोई रूप ले पाई हैं, न पात्रों की भीड़ किसी यादगार चरित्र को उकेर पई है. लोकगीतों-किस्से कहानियों और पंजाबी शब्दों के अतिरंजित प्रयोग से लेखिका ने पंजाब की सांस्कृतिक समृद्धि को उकेरने की कोशिश की है, लेकिन किसी सरोकार से न जुड़े होने के कारण वह निष्प्रभ रह जाती है. इसी परंपरा को आगे बढ़ते हुए मृणाल पांडे ’पटरंगपुर पुराण’, जया जादवानी ’मिठो पाणी खारो पाणी’ तथा शीला रोहेकर ’मिस सेमुअल’ में क्रमशः कुमांउं, सिंधी और यहूदी समाज के जातीय संघर्ष को बड़े फलक पर प्रामाणिक अभिव्यक्ति दी है.

3
1994 में ’इदन्नमम’ उपन्यास के प्रकाशन के साथ मैत्रेयी पुष्पा हिंदी उपन्यास को एक नया आस्वाद, नया तेवर और नया लोकेल देती हैं. इसलिए नहीं कि राजनीतिक पैंतरेबाजी को मूल्य बना कर वे अपनी स्त्रियों को जंग लड़ने भेजती हैं, बल्कि इसलिए कि आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में जहां पूरी दुनिया के एक गांव में सिमट कर रह जाने की घोषणाएं हो रही थीं, वहीं अपनी-अपनी जातीय अस्मिता और संघर्ष के साथ मुख्यधारा से कट कर दृश्यपटल से लगभग ओझल हो गए गांवों और जनजातियों को कथा का केंद्रीय विषय बनाती हैं. यह वह दौर है जब उपभोक्ता संस्कृति के प्रसार ने इंसान को मनुष्य बनाने की अपेक्षा उत्पाद बनाने के दायित्व को धर्म बना लिया हे और धर्म मनुष्य मात्र के कलयाण की ऊध्र्वगामी राहों के अन्वेषण का नाम न होकर अकूत मुनाफा देने वाली इंडस्ट्री बन गया है. बिकने के लिए बाजार में सब कुछ दांव पर लगा है – मूल्य से लेकर मनुष्य, राजनीति से लेकर धर्म, संस्कृति से लेकर निजी/जातिगत आस्थाएं. इसलिए हाशियाग्रस्त अस्मिताओं के उभार का जितना शोर है, उतना ही उग्र है उनके विरोध और दमन का भीषण तांडव. गरीबी और बदहाली बढ़ी है तो शिक्षित मध्यवर्ग की तादाद भी जिसके पास सपनों की पोटली है और इरादों की मजबूती भी. लेकिन यह चैंका देने वाला तथ्य है कि इसी शिक्षित मध्यवर्ग में हिंदुत्व का उभार तेजी से हो रहा है जिसे न केवल राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है बल्कि कारपोरेट जगत भी इस हिंदुत्ववादी हुंकार से समाज में सांप्रदायिक विद्वेष को हवा देकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है. स्त्रियों की स्थिति में शिक्षा एवं आर्थिक स्वावलंबन के कारण सुधार होक रहा है, लेकिन साथ ही बलात्कार, यौन हिंसा, कन्या भ्रूण हत्या और खाप पंचायतों की अनुचित दखलंदाजी से उनकी स्थिति विकटतर होती जा रही है. ऐसे परिदृश्य में उपन्यास-लेखिकाएं परंपरागत दृष्टि से स्त्री-प्रश्नों पर भी विचार कर रही हैं और स्त्री-पुरुष संबंध के दायरे से बाहर पड़ने वाले बृहत्तर मुद्दों को भी उपन्यास का विषय बना रही हैं.

चित्रा मुद्गल

स्त्री, विशेषकर ग्रामीण स्त्री को लेकर मैत्रेयी पुष्पा ने प्रचुर उपन्यास साहित्य रचा है. ’इदन्नमम’ और तत्पश्चात् ’चाक’ (1997) उपन्यासों के माध्यम से वे इस तथ्य को प्रतिपादित करती हैं कि स्त्री मुक्ति एवं स्त्री सशक्तीकरण की कोई भी मुहिम तब तक अपूर्ण है जब तक राजनीति में स्त्री की सक्रिय भागीदारी नहीं हो जाती क्योंकि नीति-निर्धारण की ताकत ही समाज को नई दिशा दे सकती है. हालांकि स्त्री विमर्श को देह विमर्श का पर्याय साबित कर और देह विमर्श के साथ मैत्रेयी पुष्पा का नाम नत्थी कर हिंदी आलोचना स्त्री विमर्श की सकारात्मक व्यंजनाओं और मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में उभरती नई स्त्री चेतना की ओर से आंख मूंदने का बौद्धिक अभियान चला रही है, लेकिन इतना तय है कि ग्रामीण समाज व्यवस्था और राजनीति में स्त्री जिस खामोश मजबूती के साथ अपने पांव धीरे-धीरे जमा रही है, मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास उसे ही एक अतिरंजित मुखरता के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं. मैत्रेयी पुष्पा जिस स्त्री को अपना प्रवक्ता बनाती हैं, वह मध्यवर्गीय शहरी समाज की वर्जनाओं से नितांत अनभिज्ञ है. परंपरा उसे घेरे में बांध लेना चाहती है, लेकिन लोककथाओं और लोगीतों के जरिए दिनरात वह जिस लोक-परंपरा के संपर्क में रहती है, वह उसे निर्भीक और उन्मुक्त कर नैतिकता के दोहरे मानदंडों से टक्क्र लेना सिखाती है. यह खेतिहर स्त्री अपने श्रम के मूल्य को जानती है और अपनी देह में छुपी उस रति-गंध को भी जो पुरुषों को दीवाना कर उन्हें ’भोग’ का माल बना देती है. शहरी समाज की इस विडंबना को वह अपने समाज में नहीं आने देना चाहती, इसलिए अपनी देह के स्वामित्व का दायित्व किसी और को न सौंप कर वह स्वयं उसका ’उपयोग’ करना चाहती है. मैत्रेयी पुष्पा स्त्री की इस शातिर मनोवृत्ति को ’कुट्टनी धर्म’ की संज्ञा देकर बेशक सतीत्व के विलोमस्वरूप ’स्त्री धर्म’ के रूप में महिमामंडित करने का प्रयास करती दीखती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि व्यक्तिगत सुख-लाभ के लिए अपनी या दूसरों की मानवीय गरिमा की बोली लगाना बेहद गर्हित कार्य है. शीलो (झूला नट, 1999) द्वारा देह को हथियार बना कर देवर बालकिशन की आड़ में पति सुमेर को पटकनी देने की कोशिश के मूल में बेशक पुरुष/पति की ज्यादतियों, पारिवारिक सम्पत्ति में स्त्री के हिस्से को हड़पने, और बिछुवा पहना कर स्त्री को गाय-बकरी की तरह हांक ले जाने वाली सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति बगावत है, लेकिन देह सम्बन्ध का मकड़-जाल बुन कर वह पाठक के हृदय में जुगुप्सा उत्पन्न करने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाती. प्रेम और श्रृंगार जैसी अति सूक्ष्म और अलौकिक अनुभूतियां जब रीतिकालीन साहित्य में मांसलता के तलछट में दम तोड़ने लगती हैें, और स्त्राी विलासी वर्चस्वशाली वर्ग के सस्ते मनोरंजन के लिए उपलब्ध ’माल’ बन जाती है, तब संवेदनशील मनुष्य द्वारा इस साहित्य और मनोवृत्ति का तिरस्कार किया जाना जरा भी अनुचित नहीं लगता. मुक्ति की लड़ाई पुरुष-सा बन कर चित-पट के खेल में रम जाने की शातिर बिसात नहीं है, गरिमा के साथ अपनी अस्मिता केा पुनः पाने की लड़ाई है जिसका लक्ष्य है प्राणिमात्र के हृदय में स्त्री के प्रति सम्मान एवं संवेदना का प्रसार. यह ठीक वही मांग है जो ’इदन्नमम’ में मंदा अपने आचरण द्वारा करती रही है. लवलीन का उपन्यास ’स्वप्न ही रास्ता है’ घोषित तौर पर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का लेखाजोखा न होकर भी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की रूढ़ आंतरिक संरचना की पड़ताल है. विवाह के विकल्प रूप में उभरी ’लिविंग टुगैदर रिलेशनशिप’ जैसी पश्चिमी अवधारणा उन्मुक्त और लचीले स्वरूप के बावजूद भीतर से उतनी ही अनुदार और सामंती है- इसका विश्वसनीय चित्रण लेखिका ने अपरा-बिजोन सम्बन्ध के जरिए किया है जो एक-दूसरे को मानसिक-भावनात्मक-बौद्धिक स्तर पर समृद्धतर करने के विश्वास के बावजूद दस महीने में ही अलग हो जाते हैं. लवलीन सिर्फ कथाकार या एक्टिविस्ट नहीं, चिंतक भी हैं. घटनाओं के सारे सूत्र अपनी मुट्ठी में भींच कर वक्त पर छितराना उन्हें खूब आता है. इसलिए अपरा-बिजोन सम्बन्ध नई पीढ़ी की प्रयोगधर्मी मानसिकता या नारीवादी उच्छ्रंखलता का प्रतीक बन कर सिमटने की बजाय स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को जड़ कर देने की हमारी यांत्रिक सोच को कुरेदने की सतत प्रक्रिया बन जाता है जिसकी ओर मृदुला गर्ग ’उसके हिस्से की धूप’ तथा ’चितकोबरा में पहले ही ध्यान आकृष्ट कर चुकी हैं. उपन्यास में लवलीन की क्षीण होती सर्जनात्मकता को पुष्ट वैचारिक विश्लेषण ने संभाले रखा है. वे तथ्यों और घटनाओं के संजाल में खबरों को उभारती हैं, खबरों के नीचे हाथ-पैर पटकती जिजीविषा या चैराहे पर किंकत्र्तव्यविमूढ़ खड़ी विभ्रम-मति को जीवंत अभिव्यक्ति नहीं दे पातीं. नैरेटर की तरह वे सुगनी (भंवरीबाई) की व्यथा-कथा को पुरुषवादी अदालत और व्यवस्था के सामंती दंभ के परिप्रेक्ष्य में विस्तारपूर्वक कहती हैं, स्वयं सुगनी बन कर उसे झेलती नहीं और न ही अहसास के बिंदु को विचार और चेतना की मशाल बन कर दहकते देखती हैं. पूर्वाग्रही न होते हुए भी यहाँ अपरा के लिए उसकी मित्र-मंडली में प्रचलित उक्ति ’’अपरा इज़ विक्टिम आॅफ हर ओन बिलीफ’’ कहीं उन पर भी लागू हो जाता है जिसकी झलक ’सुरंग पार की रोशनी’ जैसी चर्चित कहानी में भी मिलती है.

स्त्री-प्रश्नों को लेकर लिखे गए उपन्यासें में अनामिका के उपन्यास ’दस द्वारे का पींजरा’ तथा ’तिनका तिनके पास’ का उल्लेख इस लिए भी जरूरी है कि ’कठगुलाब’ की परंपरा में वे स्त्री के उत्पीड़न के लिए पुरुष की स्त्रीद्वेषी मानसिकता को दोषी ठहराते हुए भी पुरुष के सहचर के रूप में स्त्री-मन के पुरुष की परिकल्पना करती हैं जो स्त्री-पुरुष संबंध को नई दिशा और गति देने में समर्थ है. अल्पना मिश्र का ’अन्हियारे तलछट पर चमका’, कविता का ’ये दीये रात की जरूरत थे’, मनीषा कुलश्रेष्ठ के ’गंधर्व गाथा’ तथा ’पंचकन्या’, निर्मला भुराड़िया का ’गुलाम मंडी’ और रजनी गुप्त के ’कहीं कुछ और’, ’किशोरी का आसमां’, ’एक न एक दिन’, ’कुल जमा बीस’ और ’ये आम रास्ता नहीं है’ इस कालखंड के महत्वपूर्ण उपन्यास हैं. अन्य उपन्यासकारों में शरद सिंह, जयश्री राय, नीरजा माधव, उषा यादव, लता शर्मा, वंदना शुक्ल और स्वाति तिवारी का नाम लिया जा सकता है.

इस कालखंड के स्त्री लेखन की खासियत है कि यह स्त्री से इतर अन्य सामाजिक सरोकारों पर भी शिद्दत से बात करता है. यहां तक कि कश्मीर समस्या पर ही चंद्रकांता के कालजयी उपन्यास ’कथा सतीसर’ के अतिरिक्त  संजना कौल का ’पाषाण युग’, क्षमा कौल का ’दर्दपुर’, मनीषा कुलश्रेष्ठ का ’शिगाफ’ और मधु कांकरिया का ’सूखते चिनार’ आए हैं. चंद्रकांता का ’कथा सतीसर’ कश्मीर समस्या के अंतरराष्ट्रीय पहलुओं के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीतिक-सांस्कृतिक-धार्मिक-भौगोलिक पहलुओं पर भी विचार करने वाली महत्वपूर्ण दस्तावेजी रचना है. कश्मीर विशेषज्ञ के रूप मे जानी जाने वाली लेखिका चंद्रकांता ने ’कथा सतीसर’ में 1931 से 2000 तक की समयावधि में औपन्यासिक कथा को विन्यस्त करते हुए बेशक एक अनुरागभरी दृष्टि से कश्मीर के इतिहास,  भूगोल, पुराण और लोकाख्यानों को कहा है, लेकिन हर आख्यान अपनी अंतिम टेक
में उस कसैली अनुभूति से जुड़ कर यक्ष-प्रश्न बन जाता है कि आधा मुसलमान कहे
जाने वाले कश्मीरी पंडित और आधा हिंदू कहे जाने वाले कश्मीरी मुसलमान के
बीच ऐसा क्या हुआ कि ज्यादा से ज्यादा एक-दूसरे पर कांगड़ी उछाल देने वाला
क्रोध ’कलिशनिकोव और ए ़के ़सैंतालीस से अपने ही हमवतनों के खून से हाथ
रंगने लगा?’’ ’कथा सतीसर’ चंद्रकांता के समूचे कृतित्व का निचोड़ है – उसकी
सारी अनुगूंजों और अंतध्र्वनियों को पुनः निनादित करता हुआ. इसलिए अकारण
नहीं कि ’कथा सतीसर’ के भीमकाय कलेवर से गुजरते हुए हमें बार-बार उन
भाव-गझिन कहानियों की याद आती रहे जिनका होना न केवल कश्मीर की नैरेटर के
रूप में चंद्रकांता की पहचान पुख्ता करता है, बल्कि मानवीय त्रासदी को
संवेदना के धरातल पर यकसां महसूस करने का विलक्षण सामर्थ्य  भी देता है.

अनामिका

हमारा शहर उस बरस’ में गीतांजलि श्री साम्प्रदायिकता जैसी बीहड़ समस्या से टकरा कर धर्म की अंधी जुनून भरी ताकतों द्वारा बुद्धिजीवियों और शिक्षण-संस्थाओं को परिचालित करने की क्षमता के भीतरी कारणों की पड़ताल करने का आह्नान करती हैं. उपन्यास पारम्परिक ढांचे से पूर्णतया अलग चित्रकला की कोलाज शैली में रचा गया है – जीवन को खंड-खंड करते हादसों और त्रासदियों के टुकड़े जिनके बीच कहीं छिपी है मनुष्यता और आशा. जरूरत उन्हें देखने और जोड़ने की है लेकिन इसके लिए ’तीसरी आंख’ और धीरज किसके पास है? चूंकि गीतांजलि श्री इतिहास की छात्रा रही हैं, अतः साम्प्रदायिक द्वेष की निस्सारता को उद्घाटित करने के क्रम में इतिहास में घटी घटनाओं को संगति एवं तारतम्य देना बेहद जरूरी मानती हैं. साथ ही इतिहास-अध्ययन हेतु आवश्यक ’दृष्टि’ अपनाने पर भी विशेष बल देती हैं जो अपने आप में और कुछ नहीं, ’साझी संस्कृति की जीवित मिसाल’ भर है. वे इतिहास को सामान्यीकृत करने की संकीर्ण कोशिशों का विरोध करती हैं कि ’’स्याह और सफेद में नहीं बंटी हैं कौमें, न सच, न समाज.’’ इसलिए यदि इतिहास का पुनर्लेखन करना ही है तो क्यों इस झूठ को बढ़ावा दें कि एक कौम ने मंदिर तोडे और दूसरी सहनशील बनी रही? अलगाव के प्रतीकों को ढूँढने की अपेक्षा क्यों नज़रूल इस्लाम और अमीर खुसरो के कृतित्व को महिमामंडित न किया जाए? क्यों नहीं दोनों ही कौमों के भीतर छिपे साम्प्रदायिकता के बीजों को देखते हुए खुलासा किया जाए कि एक कौम में साम्प्रदायिकता यदि डर और असुरक्षा से पैदा होती है तो दूसरी कौम में ताकत और अहंकार से. हनीफ और शरद सरीखे सेकुलर बुद्धिजीवियों का कट्टर धार्मिक अस्मिताओं में रिड्यूस होना और हाशिए पर पड़े दद्दू और बाबू पेंटर का क्रमशः केंद्र में आते चलना इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि लोकतंत्र के ध्र्मनिरपेक्ष रूप को बचाने के लिए आम आदमी को अपनी ओर से सकारात्मक पहल करनी होगी.

साहित्य को शोध और बीहड़ यथार्थ के साथ सम्बद्ध कर मानवीय त्रासदी के अनेकविध पहलुओं की बारीक जांच समकालीन स्त्री लेखन की विशिष्ट पहचान है जिसे मैत्रेयी पुष्पा के ’अल्मा कबूतरी’ उपन्यास के बाद शरद सिंह में परिलक्षित किया जा सकता है. शरद सिंह प्रथम दृष्ट्या बेड़नियों के अंतरंग जीवन पर केन्द्रित उपन्यास ’पिछले पन्ने की औरतें’ में सामाजिक दायरों का विस्तार करते हुए एक संवेदनशील-बुद्धिजीवी महिला रचनाकार के रूप में नजर आती हैं. लेकिन रचना इधर-उधर फैल-बिखर कर जिस मंथर गति से आगे बढ़ती है, वहां बेड़िया समाज का अपरिचित समाजशास्त्र/मनोविज्ञान नए आयामों के साथ नहीं खुलता बल्कि पुरुष की चिरपरिचित सामंती मानसिकता ही उभरती चलती है और साथ ही स्त्री की करुण विवशता. बेड़नियों की कथा भी एक सी है – वही राई नर्तकी के रूप में प्रशिक्षण … साथ-साथ चैर्य कला में भी महारत …सिर ढकना जैसी प्रथा़ … सरपरस्त पुरुष और उसके परिचितों-वारिसों के दैहिक शोषण को सहने की सतत पीड़ा …अर्थाभाव और देह-व्यापार की मजबूरियां. कहने को अलग-अलग नामों के जरिए इन बेड़नियों को निजी पहचान और व्यक्ति-वैशिष्ट्य देने की कोशिश की गई है, लेकिन श्यामा, नचनारी, फुलवा, रसूबाई आदि आदि को धकिया कर उनके स्थान पर जातिसूचक एक ही पहचान हावी रहती है – बेड़नी. लेखिका ने स्वयं बीहड़ एवं तिरस्कृत क्षेत्रों में भ्रमण करने के जोखिमों का हवाला देकर अपनी शोध को प्रामाणिक एवं गहन बनाने की कोशिश की है, लेकिन शोध-प्रक्रिया के दौरान तथ्यों-आंकड़ों-जानकारियों को विश्लेषित एवं संश्लेषित करने के उपरांत अभिव्यक्त करने की क्रिस्पनैस/कलात्मकता वे अंत तक नहीं जान पाईं. इसलिए न केवल संदर्भ नकार कर बार-बार तथ्यों की आवृत्ति होती रही है, बल्कि उनकी प्रस्तुति के पीछे सर्जनात्मक दृष्टि एवं अनुशासन का अभाव भी नजर आता है. तथ्य को कथा और पात्र को व्यक्ति एवं चरित्र बनाने के लिए जिस घनीभूत संवेदना, कल्पना और कलात्मकता की जरूरत होती है, वह शरद सिंह अपने भीतर संजो नहीं पाईं.

शरद सिंह का विलोम रचती हैं मधु कांकरिया. ’खुले गगन के लाल सितारे’ में नक्सलवादी आंदोलन के चित्रण के जरिए अपनी सुस्पष्ट राजनीतिक समझ का परिचय देने के बाद जब वे वेश्या समस्या पर केन्द्रित ’सलाम आखिरी’ उपन्यास की रचना करती हैं तो अपनी समवेदना और सहानुभूति केा आंसू भरी करुणा में ढाल कर विलीन नहीं होने देतीं, वरन बौद्धिक विश्लेषण की चैहद्दियों में प्रविष्ट होकर सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक व्यवस्थाओं की अंतर्निहित विद्रूपताओं पर जता-जता कर घन की तरह चोट करती हैं – निरंतर और अविराम.
’सलाम आखिरी’ में वे ज़िंदगी की रवानगी की तस्वीरें नहीं देतीं, बल्कि ज़िंदगी को ठहराव और सड़ांध का कोलाज बना कर प्रस्तुत करती हैं – शोध से सिरजा, तथ्यों से पुख्ता, तीखे बुनियादी सवालों से बिंधा कोलाज!संवेदना और व्यंग्य, आक्रोश और खौफ के रंग-कूची से रचा है लेखिका ने वेश्याओं की जिंदगी का एकरस समरूपी इतिहास जहाँ हर गली और मोड़ मंजिल के नाम पर सिर्फ डैड एंड्स तक पहुँचने का जरिया है. मधु कांकरिया उपन्यास के जरिए एक बेहद ज्वलंत विवादास्पद मुद्दे को प्रश्न के रूप में उठाती हैं कि स्त्री संगठनों द्वारा वेश्यावृत्ति को ’उद्योग’ और वेश्या को यौनकर्मी और श्रमिक का दर्जा दिए जाने की मांग क्या न्यायसंगत है? यह ठीक है कि ’श्रमिक’ का दर्जा पाते ही नागरिक के रूप में उनके मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए मानवाधिकार आयोग स्वयमेव प्रतिबद्ध हो जाएगा, खासतौर पर उनके शारीरिक स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य को लेकर. लेकिन क्या यह शास्त्रानुमोदित यौन शुचिता और नैतिकता के दोहरे मानदंडों का प्रकारांतर से पोषण नहीं? क्या इस मांग के पीछे विश्वमंडी के अपने तर्क और मुनाफे नहीं जो स्त्री देह के व्यापर के जरिए अरबों डाॅलर कमाते हैं? क्या उद्योग का दर्जा देकर वेश्यावृत्ति उन्मूलन के सारे रास्ते स्वयमेव बंद नहीं हो जाएंगे?
’कलिकथा वाया बाइपास’ की लेखिका के रूप में जानी जाने वाली अलका सरावगी ने इसके बाद चार उपन्यास और लिखे हैं  – शेष कादंबरी, कोई बात नहीं, एक ब्रेक के बाद और जानकीदास तेजपाल मेंशन. उपभोक्ता संस्कृत के प्रसार के विरोध में जन-चेतना के प्रसार का आह्वान करता उपन्यास ’एक ब्रेक के बाद’, एक मायने में, ’कलिकथा’ के अंत में झटपट की गई फैंटेसी को कथा के ताने-बाने में ढालने का प्रयास है. यह उपन्यास इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि उपभोक्ता संस्कृति पूंजी और ग्लैमर को केन्द्र में रख कर मनुष्य को उपभोक्ता (चेतना हीन भूख) ही नहीं बना रही, उसे मूल्यहंता प्रतिद्वंद्वी, निष्क्रिय शेखचिल्ली या शातिर अपराधी/उठाईगीर भी बना रही है. महुआ माजी ’मैं बारिशाइल्ला’ के बाद ’मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ उपन्यास में यूरेनियम के प्रदूषण और रेडिएशन की समस्या को लेकर आती हैं, लेकिन शोध, रिपोर्ताज और अखबार के मिले जुले रूप से अलग इसे उपन्यास का दर्जा नहीं दे पातीं.

स्पष्ट है कि स्त्री रचनाकारों के स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यास ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पड़ताल के मिशन के साथ-साथ अपने सरोकारों का दायरा भी विस्तृत कर लिया है.

जाति पर डाका : हिंदी साहित्य में जातिविमर्श

नीरा परमार

 कविता, कहानी और शोध -आलोचना के क्षेत्र में योगदान. एक कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित . संपर्क : parmarn08@gmail.com

पढें और समझें कि कैसे साहित्यिक-सांस्कृतिक हस्तियों को सवर्ण बनाया जाता रहा है, उनके गैर सवर्ण होने के बावजूद

प्राचीन काल से भारतीय चिंतन परंपरा और साधना में समाज के हर वर्ग में क्रांतिकारी व्यक्तित्व जन्म लेते रहे हैं. समाज के अभिजात वर्ग से ज्ञान-साधक, युग-प्रवर्तक आते रहे हैं, तो, निम्न कही जाने वाली जातियों में भी ज्ञानमार्गी चिंतक और धर्म-साधक तथा प्रेम-भक्ति का प्रसार करने वाले जन-चेतना के संवाहक विचारक भी होते रहे हैं. इस परम्परा में होने वाले सिद्धों में कंकालीपा शूद्र थे, मीनपा मछुआ थे, चमारिपा चमार थे तथा शालिपा शूद्र जाति में जन्मे थे. नाथों की परंपरा में मत्स्येन्द्रनाथ मछली मारने वाली कैवर्त जाति में उत्पन्न हुए थे, तांतिपा तांती थे, कमारो लुहार थे. संतों की निर्गुण धारा में रैदास चमार, धर्मदास बनिया, सेन नाई, दादू मोची या धुनिया थे. इसी प्रकार रामभक्ति शाखा में नाभाजी डोम कही जानेवाली शूद्र जाति में उत्पन्न हुए थे. कुछ लोगों ने भ्रम फैलाया कि वे क्षत्रिय जाति में जन्मे थे.

आरम्भ से ही अनेक संतों और भक्तों ने भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है, लेकिन ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोषकों ने इस सत्य को नकार देना चाहा है. जब-जब निम्न जाति में किसी असाधारण प्रतिभा ने जन्म लिया है, उनके साथ अनेक प्रकार की झूठी, मनगढ़ंत, अंधविश्वास से भरी कपोलकल्पित अलौकिक घटनाओं को जोड़कर बड़ी ही चालाकी के साथ एक सोची-समझी गई साजिश के तहत येन-केन-प्रकारेण
इन्हें उच्च जाति का प्रमाणित किया गया है. तथाकथित सवर्ण वर्गों में यह भ्रम है कि निम्न कही जाने वाली जातियों में साधक, भक्त या संत जन्म ले ही नहीं सकते, अतिविशिष्ट और प्रतिभा संपन्न मात्र उच्च जाति की ही धरोहर हो सकते हैं. इस तर्कहीन विचारधारा को पुष्ट करने में बड़े-बड़े आचार्यों का भी हाथ रहा है. गोरखनाथ का आविर्भाव नाथ परंपरा में हुआ था. शंकराचार्य के बाद भारतवर्ष में इतना प्रभावशाली और महिमावान व्यक्तित्व गोरखनाथ का ही हुआ. स्वयं हज़ारी प्रसाद द्विवेदी यह मानते हैं कि भक्ति आंदोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का योगमार्ग ही था.(1) ‘नाथ संप्रदाय’ में उन्होंने एक विचित्र कल्पना की है, जो इस प्रकार है: ‘‘मेरा अनुमान है कि गोरखनाथ निश्चित रूप से ब्राह्मण जाति में उत्पन्न हुए थे और ब्राह्मण वातावरण में बड़े हुए थे.’’(2) इस अनुभव का क्या आधार अथवा तर्क है? वे शंकराचार्य के समान गोरखनाथ जैसे असाधारण युग-पुरुष को निःसंकोच ब्राह्मणों की बिरादरी में शामिल करने का प्रयत्न करते हैं.

राहुल सांकृत्यायन ने सिद्धों के सिद्ध तांतिया(3) को तांती माना है, लेकिन ‘गंगा’ के पुरातत्वांक(4) में उन्होंने ही इन्हें मगध देशवासी ब्राह्मण बतलाया है. प्रश्न है कि एक ही व्यक्ति की दो जातियां कैसे हो सकती हैं? संत परंपरा की निर्गुणधारा में रैदास रविदास चमार जाति में उत्पन्न बतलाए जाते हैं, पर उन्हें भी ब्राह्मण प्रमाणित करने के लिए विचित्र कल्पना की गई है. संत अनंतदास ने ‘भक्त चरित्र और रैदास की परिचै’ में रैदास के पूर्व जन्म में ब्राह्मण होने की कल्पना की है.(5) प्रियादास लिखी ‘भक्तमाल की टीका’, ‘भक्तिरस बोधिनी’ में भी इसका उल्लेख है कि संभवतः पूर्वजन्म में ब्राह्मण रह चुकने के कारण ही उन्होंने चमार के घर जन्म लेकर भी अपनी मां का दूध नहीं पिया था. स्वामी रामानंद ने आकर जब उन्हें उपदेश दिया और अपना शिष्य बनाया तभी उन्होंने माता का स्तन-पान आरंभ किया.(6) इसी प्रकार ‘रैदास रामायण’ में भी उन्हें पिपलार गोत्र अरु सूर्य रासी ‘कहकर द्विज प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है.’ भविष्य पुराण में एकक्षेपक जोड़कर यह कल्पित कहानी दी गई है कि रैदास सूर्यवंश के थे. उन्हें भगवान भास्कर का दूसरा पुत्र बतलाया गया है. इस संबंध में कथा इस प्रकार दी गई है: ‘एक बार शनि, राहु और केतु के प्रकोप को रोकने के लिए सूर्य ने अपने दो पुत्रों को धरती पर भेजा. बड़ा पुत्र इड़ापति (छागन्ह) कसाई के घर सघन नाम से अवतरित हुआ और दूसरा पिंगलापति मानसदास चमार के यहां रैदास के नाम से अवतरित हुआ.(7) इस कपोल कल्पित कथानक की उपयोगिता यही प्रतीत होती है कि यदि रैदास पूर्वजन्म में ब्राह्मण न होते तो इस जन्म में इतने बड़े संत न हो पाते. इस प्रकार की कथाएं इन जातिवादी संकीर्ण मनोवृत्ति को प्रकट करती हैं, जो बिल्कुल तर्कहीन एवं तथ्यहीन हैं. अपनी जाति को लेकर रैदास के मन में केाई कुंठा नहीं है. रविदास की जाति चमार थी, इस तथ्य को लेकर वे अपनी रचनाओं में पर्याप्त मुखर हैं:


(क) नागर जना मेरी जाति विख्यात चमार (ख) कहि रविदास खलास चमारा

जिस रूप में उन्होंने जाति का उल्लेख किया है, उससे यह ध्वनि निकलती है कि संभवतः इसके कारण उन्हें कई तरह की पीड़ाएं झेलनी पड़ी होंगी. अपनी रचनाओं में रविदास ने खुलकर अपने पेशे का वर्णन किया है
जाके कुटुंब के ढेढसभ ढोर ढोवंत.
आभिजात्य वर्ग के लोग, जिन्होंने उन्हें ब्राह्मण सिद्ध करने का प्रयास किया था, इस स्वीकारोक्ति की व्याख्या अजीबोगरीब ढंग से करते हैं कि उनके पिता पशुओं का व्यापार करते थे और समृद्ध व्यापारी थे. इस संबंध में अंतः साक्ष्य सिद्ध तथ्य यह है कि रैदास जूता बनाकर या जूता गांठकर अपनी जीविका चलाते थे. रैदास जात-पांत के घोर विरोधी थे. यदि वे उच्च कुलोद्भव होते तो जाति का झूठा अहंकार पालने के बदले उसका विरोध नहीं करते. रविदास जन्म के कारने होत न कोउ नीच / नर कू नीच करि डारिहै ओछे करम की कीच.
इसके विपरीत तुलसीदास का ब्राह्मणत्व का अहंकार यत्र-तत्र दिखलाई पड़ जाना स्वाभाविक है
पूजिय विप्र गयान गुन हीना. / नहि न सूद्र गुन ग्यान प्रबीना..

इस दंभपूर्ण विचारधारा का प्रतिकार करते हुए रैदास का कथन है कि जन्म से मनुष्य शूद्र नहीं पैदा होता है. उसकी पूजा गुणों के कारण होनी चाहिए, जाति अथवा जन्म के कारण नहीं. तुलसी की विचारधारा के विरुद्ध वे एक सहज मानवीय दृष्टि की प्रस्तावना करते हैं
रविदास ब्राह्मण मत पूजिए जउ होवे गुन हीन / पूजहि चरन चंडाल के जउ होवे गुन परवीन.
उनके लिए ब्राह्मण होकर गुणहीन होना गर्व की बात नहीं है, शूद्र होकर चरित्रवान और गुणवान होना ही उनके लिए गौरव की बात है, जबकि तुलसी के लिए जन्म से उच्च जाति का होना अधिक महत्व रखता है. संतों की जाति बताकर फिर उनका मूल्यांकन करना उनकी महत्ता को कम करके आंकना है. वस्तुतः संत की कोई जाति नहीं होती है, संत सिर्फ संत होते हैं. निर्गुणधारा के संत दादु मोची या धुनिया थे. संत कबीर की तरह इनके संबंध में भी तरह-तरह की भ्रांतिपूर्ण कथाएं फैली हुई हैं. संत दादु भी कबीर के समान ही साबरमती नदी में बहते हुए पाए गए थे. यानी वे जन्म से परित्यक्त कोई कलंकित बालक रहे होंगे और उनकी जाति का किसी को पता नहीं होगा. ऐसे लोगों को समाज निःसंदेह शूद्र मान लेता है.

ब्राह्मणवादी दृष्टि से हिंदी साहित्य के विश्लेषण में रामचंद्र शुक्ल अग्रणी नायक रहे हैं. उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में विधेयवादी दृष्टि की प्रतिष्ठापना की है. यह एक श्रेय की बात है, पर कुछ कवि और लेखकों की जाति-निर्धारण के विश्लेषण के क्रम में उन्होंने जाति बताने का भी गैर जरूरी काम किया है. यह काम करते समय कई निम्न जाति में उत्पन्न कवियों और लेखकों में अधिकांश को ब्राह्मण और कुछ को सवर्ण घोषित किया है. कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं. कृष्ण भक्ति शाखा के वल्लभाचार्य के शिष्य परमानंद दास कन्नौज निवासी थे. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के समान वे भी अनुमान लगा लेते हैं कि ‘‘इनका निवास-स्थान कन्नौज था. इसी से ये कान्यकुज्ज ब्राह्मण अनुमान किए जाते हैं.’’(8) उन्होंने तर्कहीन ढंग से यह अनुमान किया और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि परमानंद दास कन्नौज निवासी होने के कारण ब्राह्मण थे. प्रश्न है कि क्या किसी व्यक्ति के कन्नौज में निवास करने से ही वह ब्राह्मण हो जाता है? यदि ऐसा है तो किसी टिप्पणी की जरूरत नहीं है.



इसी प्रकार रामभक्ति शाखा में नाभाजी जाति से डोम थे. कुछ लोगों ने उन्हें क्षत्रिय प्रमाणित करना चाहा है. रामचंद्र शुक्ल तुलसीदास के सवर्णवाद और मर्यादाबोध के प्रबल समर्थक हैं. उनकी वर्ण श्रेष्ठता को कभी भी कालजयी संत कबीर बर्दाश्त नहीं हुए. कबीर के मानवीय दृष्टि से संपन्न ज्ञान-बोध को उन्होंने अक्खड़ और फक्कड़ कहकर अस्वीकार कर दिया. आचार्य शुक्ल ने नाभादास और तुलसी-मिलन प्रसंग को जिस रूप में प्रस्तुत किया है, वह नितांत अविश्वसनीय है. संदेह नहीं कि उसे सिर्फ तुलसी को महिमामंडित करने के लिए ही उस रूप में प्रस्तुत किया गया है. शुक्ल जी द्वारा उद्धृत प्रसंग इस प्रकार है, ‘‘ऐसा प्रसिद्ध है कि एक बार गोस्वामी तुलसीदास से मिलने वे (नाभादास) काशी गए. पर उस समय गोस्वामी जी ध्यान में थे. इसलिए न मिल सके. नाभाजी उसी दिन वृंदावन चले गए. ध्यान-भंग होने पर गोस्वामी जी को बड़ा खेद हुआ. और वे तुरंत नाभाजी से मिलने वृंदावन चले गए. नाभाजी के यहां वैष्णवों का भंडारा था, जिसमें गोस्वामी जी बिना बुलाए जा पहुंचे. गोस्वामीजी यह समझकर कि नाभाजी ने मुझे अभिमानी न समझा हो सबसे दूर एक किनारे बुरी जगह बैठ गए. नाभाजी ने जान-बूझकर उनकी और ध्यान न दिया. परसने के समय कोई पात्र नही मिल रहा था जिसमें गोस्वामीजी को खीर दी जाती. यह देखकर गोस्वामी जी एक साधु का जूता उठा लाए और बोले इससे सुंदर पात्र मेरे लिए क्या होगा? इस पर नाभाजी ने उठकर उन्हें गले लगा लिया और गद्गद् हो गए.’’(9)

 इस प्रसंग की तर्कहीनता और कपोलकल्पना से स्वयं शुक्ल जी भी अपरिचित नहीं थे. वे स्वयं यह मानते हैं कि ‘‘यह वृत्तांत कहां तक ठीक है, नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गोस्वामी जी खान-पान का विचार करने वाले स्मार्त वैष्णव थे.(10) इतना ही नहीं तुलसी की वर्ण श्रेष्ठता और अहंकारजन्य हठधर्मिता उनके रामचरित मानस के कई स्थलों पर झलकती है. अतः नाभादास के प्रसंग में तुलसी के संदर्भ में उपर्युक्त प्रसंग की योजना तुलसी की श्रेष्ठता के प्रति शुक्लजी का अतिरिक्त आग्रह ही माना जाएगा. हिंदी साहित्य के संत और कवि जो स्वयं अत्यंत संवेदनशील और जात-पांत की छोटी-छोटी भावनाओं से ऊपर हैं, इनके लेखन और साहित्य पर विचार करते समय उनकी जाति के संकीर्ण दायरों में घूमना, उनकी वर्ण और जाति श्रेष्ठता को इतर प्रकार से महत्व देना निश्चय ही एक विकृत सोच का परिणाम है. किसी का संत अथवा कवि होना ही क्या उसके व्यक्तित्व और साहित्य पर विचार करने के लिए काफी नहीं हैं, जाति के धरातल पर उसे गौरवान्वित करने का प्रयत्न कर हम क्या सिद्ध करना चाहते हैं? अथवा सवर्णवाद की गर्व-स्फीत घोषणा करना चाहते हैं? रामचंद्र शुक्ल के इतिहास ग्रंथ को यदि ध्यान से देखा जाए तो उसमें आरंभ से अंत तक द्विज दृष्टि की प्रधानता है. इतना ही नहीं उन्होंने बड़ी फुहड़ता से ब्राह्मण लेखकों के नाम के पूर्व पंडित और गैर-ब्राह्मण लेखकों के नाम के पूर्व ‘बाबू’ अथवा ‘श्री’ शब्द का प्रयोग किया है. यह सुखद है कि आज का लेखक अपनी प्रतिबद्धताओं, पक्षधरताओं के बावजूद स्पष्टतः ऐसी उद्घोषणाएं नहीं करता.

संदर्भ :


1. नाथ संप्रदाय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृ. 106
2. वही, पृ. 107
3. पुरातत्व निबंधावली, राहुल सांकृत्यायन, पृ. 191
4. नाथ संप्रदाय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृ. 168 से उद्धृत
5. संत रविदास, इंद्रराज सिंह, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, पृ. 44 से उद्धृत
6. वही, पृ. 45
7. वही, पृ. 45
8. हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, पृ. 172
9. वही, पृ. 142
10. वही, पृ. 142

महिला आरक्षण विधेयक पारित करना स्त्रीत्व का सम्मान है: मनमोहन सिंह

महिला आरक्षण को लेकर संसद के दोनो सदनों में कई बार प्रस्ताव लाये गये. 1996 से 2016 तक, 20 सालों में महिला आरक्षण बिल पास होना संभव नहीं हो पाया है. एक बार तो यह राज्यसभा में पास भी हो गया, लेकिन लोकसभा में नहीं हो सका. सदन के पटल पर बिल की प्रतियां फाड़ी गई, इस या उस प्रकार  से बिल रोका गया. संसद के दोनो सदनों में इस बिल को लेकर हुई बहसों को हम स्त्रीकाल के पाठकों के लिए क्रमशः प्रकाशित करेंगे. पहली क़िस्त  में  संयुक्त  मोर्चा सरकार  के  द्वारा  1996 में   पहली बार प्रस्तुत  विधेयक  के  दौरान  हुई  बहस . पहली ही  बहस  से  संसद  में  विधेयक  की  प्रतियां  छीने  जाने  , फाड़े  जाने  की  शुरुआत  हो  गई थी . इसके  तुरत  बाद  1997 में  शरद  यादव  ने  ‘कोटा  विद  इन  कोटा’  की   सबसे  खराब  पैरवी  की . उन्होंने  कहा  कि ‘ क्या  आपको  लगता  है  कि ये  पर -कटी , बाल -कटी  महिलायें  हमारी  महिलाओं  की  बात  कर  सकेंगी ! ‘ हालांकि  पहली   ही  बार  उमा भारती  ने  इस  स्टैंड  की  बेहतरीन  पैरवी  की  थी.  अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पूजा सिंह और श्रीप्रकाश ने किया है. 
संपादक

आख़िरी क़िस्त

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सौंवी वर्षगांठ ( 8 मार्च 2010) 

प्रधानमंत्री (डॉ. मनमोहन सिंह.): श्रीमान सभापति महोदय, सबसे पहले मैं पिछले दो दिनों में इस सदन में हुई कुछ असामान्य घटनाओं पर अपना गहरा खेद व्यक्त करता हूं. सभापति महोदय, अपनी सरकार की ओर से मैं आपके और पदाधिकारियों के प्रति दर्शाये गये अनादर पर गहराई से माफी मांगता हूं. ऐसी बातें कभी नहीं होना चाहिए. पर वे घटित हो चुकी हैं और हमें इस पर विचार करना है कि कैसे हम भविष्य में अपने कामकाज को कारगर बनायें कि ऐसी घटनाएं नहीं हों. सभापति महोदय, इन असामान्य घटनाक्रम के बावजूद इस ऐतिहासिक कानून पर विचार करते वक्त जो सर्व-सम्मति या लगभग सर्व-सम्मति बनी है वह भारतीय लोकतंत्र के स्वस्थ होने और सही जगह पर होने का जिंदा प्रमाण है.

मनमोहन सिंह (जारी): इसलिए मैं विपक्ष के माननीय नेता, अन्य सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को बधाई देता हूं , जिनके सहयोग से हमारे लिए वास्तव में एक ऐतिहासिक कानून को अधिनियमित करना संभव हो पाया है. हमारी महिलाओं को सशक्त बनाने की लंबी यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है. श्रीमान सभापति महोदय, जब यह यात्रा शुरू हुई थी, उसी समय सभी व्यक्तियों 21 वर्ष के सभी पुरुषों और महिलाओं को मतदान का अधिकार देने की समझ हमारे नेताओं को रही है. इसके बाद श्री राजीव जी, मतदान की उम्र को घटाकर 18 वर्ष कर दिया. लेकिन, हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए स्वतंत्र भारत में किये गये विभिन्न प्रयासों के बावजूद, हमारी महिलाओं ने, सामाजिक और आर्थिक विकास की प्रक्रिया के लाभों के संदर्भ में बात करें तो भी, भारी कठिनाइयों का सामना किया है. हमारी महिलाएं घर पर भी भेदभाव का सामना करती हैं. वहाँ घरेलू हिंसा है. वे शिक्षा, स्वास्थ्य आदि तक अपनी असमान पहुंच में भेदभाव का सामना करती हैं. यदि भारत अपने सामाजिक और आर्थिक विकास की पूरी क्सभावना को साकार करना है तो इन सब बातों को समाप्त होना होगा. आज पारित होने जा रहा विधेयक आगे बढ़ता हुआ एक ऐतिहासिक कदम है, भारत के स्त्रीत्व की मुक्ति की प्रक्रिया को मजबूत बनाने में आगे बढ़ा हुआ एक बड़ा कदम है. यह हमारे स्त्रीत्व का उत्सव है. यह हमारी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता में हमारी महिलाओं के लिए भारत के आदर और सम्मान का एक उत्सव है. यह उन सभी बहादुर महिलाओं का महान स्मरण है, जिन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी है. इस अवसर पर मेरे खयाल में कस्तूरबा माता, डॉ. एनी बेसेंट, श्रीमती कमला नेहरू, श्रीमती सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित, श्रीमती इंदिरा गांधी शामिल हैं. भारत की इन सभी बहादुर बेटियों ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम की सफलता के लिए लड़ाई लड़ी है और काफी योगदान दिया है. जो हम आज अधिनियमित करने के लिए जा रहे हैं वह राष्ट्र निर्माण, स्वतंत्रता संग्राम और अन्य सभी राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों की प्रक्रियाओं में हमारी महिलाओं के बलिदान के प्रति हमारी श्रद्धांजलि का एक छोटा सा टोकन है. मैं दिवंगत श्रीमती गीता मुखर्जी के भी योगदान को याद कर रहा हूं. वह उस स्थायी समिति की अध्यक्ष रहीं जिसने संसद के समक्ष आये पहले विधेयक पर रिपोर्ट थी. इस महत्वपूर्ण विधेयक को प्रक्रिया में लाने वाली स्थायी समिति की अध्यक्ष श्रीमती जयंती नटराजन को भी धन्यवाद देता हूं.

 वृंदा करात: महोदय, श्री नचियप्पन के नाम का उल्लेख नहीं करें. वह एक अकेले थे जिन्होंने विधेयक का विरोध किया था.

पहली क़िस्त के लिए क्लिक करें: 
महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :पहली   क़िस्त

दूसरी क़िस्त के लिए क्लिक करें: 
महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस: दूसरी क़िस्त 

तीसरी क़िस्त के लिए क्लिक करें: 
महिला आरक्षण को लेकर संसद में बहस :तीसरी   क़िस्त

चौथी क़िस्त के लिए क्लिक करे :
 वह इतिहास, जो बन न सका : राज्यसभा में महिला आरक्षण

पांचवी क़िस्त के लिए क्लिक करें : 
महिला संगठनों, आंदोलनों ने महिला आरक्षण बिल को ज़िंदा रखा है : वृंदा कारत: पांचवी  क़िस्त

छठी  क़िस्त के लिए क्लिक करें :
आरक्षण के भीतर आरक्षण : क्यों नहीं सुनी गई आवाजें : छठी क़िस्त 

सातवीं  क़िस्त के लिए क्लिक करें : 
सारे दल साथ -साथ फिर भी महिला आरक्षण बिल औंधे मुंह : क़िस्त सात

आठवीं  क़िस्त के लिए क्लिक करें
महिलाओं द्वारा हासिल प्रगति ही समुदाय की प्रगति: डा. आंबेडकर: महिला आरक्षण बिल, आठवी क़िस्त

नौवीं क़िस्त के लिए क्लिक करें:
आरक्षण के भीतर आरक्षण के पक्ष में बसपा का वाक् आउट : नौवीं क़िस्त

डॉ. मनमोहन सिंह: लेकिन,  मुझे उनके भी नाम  का उल्लेख करना चाहिए …


सीताराम येचुरी: पुरुषों ने भी योगदान दिया है

डॉ. मनमोहन सिंह: महोदय, कुछ माननीय सदस्यों ने कुछ आपत्तियां जताई हैं कि अगर अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्ग, और अनुसूचित जाति/जनजाति की अक्षमताओं को भी कुछ मान्यता दी जाती तो उन्हें अच्छा लगता. मुझे याद है और मैं स्वीकार भी करता हूं कि पहचानते हैं कि हमारे अल्पसंख्यकों कों हमारे विकास के फल का पर्याप्त हिस्सा नहीं मिला है.


डॉ. मनमोहन सिंह (जारी): हमारी सरकार हमारे अल्पसंख्यक समुदाय के सशक्तिकरण के लिए ईमानदारी से काम करने के लिए प्रतिबद्ध है. इसके कई अन्य तरीके हैं. प्रक्रिया पहले से ही शुरू हो चुकी है. हम सब पूरी ईमानदारी के साथ इस कार्य को करने में हिस्सेदारी करेंगे. यह विधेयक कोई अल्पसंख्यक विरोधी विधेयक नहीं है; यह एक अनुसूचित जाति विरोधी विधेयक नहीं है; यह एक अनुसूचित जनजाति विरोधी विधेयक नहीं है. यह एक ऐसा विधेयक है जो हमारी महिलाओं की मुक्ति की प्रक्रिया को आगे ले जाता है. यह एक प्रमुख और आगे बढ़ा हुआ  संयुक्त कदम है. यह एक ऐतिहासिक अवसर है जो उत्सव की मांग करता है. मैं इस सम्मानित सदन के हर सदस्य को धन्यवाद देता हूं. मैं श्रीमान सभापति महोदय, और श्रीमान उपसभापति महोदय को उनके भारी योगदान के लिए धन्यवाद देता हूं. उग्र घटनाओं के बाद, यह अंत ही है जो मायने रखता है. जैसा किसी ने कहा है, “आवाज को कोई पूछता नहीं, अंजाम अच्छा हो आदमी का.” तो, इन शब्दों के साथ एक बार फिर से, मैं अपनी खुशी जाहिर करता हूं कि हम इस बहुत ही ऐतिहासिक पथप्रदर्शक कानून को अधिनियमित करने जा रहे हैं.

विधि एवं न्याय मंत्री (श्री एम. वीरप्पा मोइली): श्रीमान सभापति महोदय,  अरुण जेटली जी से शुरू होकर और अंत में,  हमारे प्रिय प्रधानमंत्री के समापन वक्तव्य तक 27 वक्ताओं सुनने के बाद, मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता हूं. लेकिन, आज एक ऐतिहासिक दिन है क्योंकि हम सभी अपनी मां का अपना कर्ज चुका रहे है. यह सबसे बड़ा दिन है. आज जब इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं का प्रतिशत 11.25 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ा है, इस तरह के एक कानून की आवश्यकता और अधिक है. वास्तव में, दुनिया का औसत ही 19 प्रतिशत है, यहां तक ​​कि एशियाई औसत 18.7 प्रतिशत है. यही कारण है कि आज निर्भीकता और एक दृष्टिकोण के साथ कार्य करने का समय आ गया है. महत्वपूर्ण दिन और कृत्य के एक सामान्य समय में उतनी आसानी से नहीं आते. जैसा कि कहा जाता है,  हिंसा एवं क्रोध के लिए समझ के रूप में उठाया गया एक कदम अंततः रचनात्मक विनाश की समझ होती है. कल और आज जो भी हुआ, मुझे, अंत में, अपने उदात्त सभापति की सहिष्णुता, लचीलेपन और अभूतपूर्व अशांति को संभालने के दौरान प्रदर्शित की गई उनकी सतर्क इच्छाशक्ति की सराहना करनी चाहिए. और, हाँ, आज वे विविधता में एकता वाले ऐसे मिलन के भी साक्षी बन रहे हैं.  मैं यह भी कहूंगा कि हमारी सभ्यता, हमारा इतिहास, हमारा दर्शन, हमारा धर्म लोगों को प्रेरणा देता रहेगा. अहिंसा के सिद्धांत के प्रति हमारी प्रतिबद्धता ने पूरी दुनिया के लिए अग्रदूत का काम किया है. आज, हमारे पास दुनिया को दिखाने के लिए एक अवसर है कि जब प्रगतिशील कदम उठाने की बात आती है तो हमारा देश पीछे नहीं हटता या देखता है, और आज उठाया गया कदम, एक महान कदम है.

 एम वीरप्पा मोइली (जारी): मैं उन सभी माननीय सदस्यों को, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों, बधाई देना चाहूंगा जिन्होंने अपना हार्दिक समर्थन दिया है, जो एक यांत्रिक समर्थन नहीं है. कुछ गलतफहमियां है, जो दोनों सदन के अंदर और बाहर भी दोनों जगह व्यक्त की गई हैं. मैं कुछ को स्पष्ट करना चाहूंगा. इस संवैधानिक संशोधन को पारित करने के बाद,  एक कानून बनेगा  जो संसद द्वारा पारित किया जाएगा, जो सीटों के निर्धारण और कोटा से संबंधित निर्णय पर भी गौर करेगा, ताकि आज व्यक्त की गईं चिंताओं में से, निश्चित रूप से, कुछ को संबोधित किया जा सके. सीटों के निर्धारण और आरक्षण को भी सिर्फ परिसीमन अधिनियम की तरह एक अलग कानून के द्वारा संबोधित किया जाएगा. तो,  उसे संबोधित किया जाएगा. हमें उन मामलों पर गौर करने की जरूरत है और हम एक कानून लायेंगे.

 एस. एस. अहलूवालिया: महोदय, आपने कहा कि यह ‘ कोटा’ है.

एम. वीरप्पा मोइली: वह गलती से कहा गया था…जुबान फिसल गई थी…वह गलती से कहा गया था.

रवि शंकर प्रसाद: उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए.

एम. वीरप्पा मोइली: मुझे लगता है कि यह स्पष्ट है. अंतिम बात जो मैं स्पष्ट करना चाहता हूं, वह ओबीसी, अल्पसंख्यकों और बाकी के आरक्षण के बारे में है. आप सभी जानते हैं कि आज तक, हमने केवल अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की है. हमारे पास पूरे देश के आंकड़े नहीं हैं, क्योंकि 1931 के बाद, कोई राष्ट्रीय जनगणना नहीं की गई है. एक राज्य में मौजूद कोई पिछड़ा वर्ग हो सकता है कि दूसरे राज्य में पिछड़े वर्ग नहीं हो. हम अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के लिए वास्तविक आरक्षण चाहते हैं,  तो हमें कई अन्य मुद्दों का समाधान करने की जरूरत है. मैं इसे लम्बा नहीं करना चाहता. मैं इस सदन से विचार करने और पारित करने के लिए इस विधेयक की अनुशंसा करता हूं. धन्यवाद.
समाप्त