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मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड

नासिरुद्दीन
एक बार फिर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुर्खियों में है. और इतिहास गवाह है कि पर्सनल लॉ बोर्ड के सुर्खियों में आने की ज्यादातर एक ही वजह होती है. वह है, मुस्लिम महिलाएं.एक बैठकी में तीन तलाक, भरण पोषण, मर्दों की एक साथ कई शादियां जैसी एकतरफा मर्दाना हकों के खिलाफ पिछले कुछ महीनों में महिलाओं की  तेज हुई आवाज . ये आवाजें सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गयी हैं. जैसी उम्मीद थी, बोर्ड इस आवाज को दबाने के लिए पूरी मुस्तैदी से आगे आ गया है. आवाज दबाने का सबसे आसान और आजमाया नुस्खा है- किसी बात को धर्म के खिलाफ कह दिया जाये.



पिछले दिनों बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में उन मुद्दों पर 68 पेज का एक जवाबी हलफनामा दायर किया. बोर्ड ने कहा कि एक साथ तीन तलाक, बहुविवाह या ऐसे ही अन्य मुद्दों पर किसी तरह का विचार करना शरीयत के खिलाफ है. इनकी वजह से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के हनन की बात बेमानी है. इसके उलट, इन सबकी वजह से मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और इज्जत की हिफाजत हो रही है. (कैसे हो रही है, यह बात तो वे महिलाएं ज्यादा बेहतर बता पायेंगी, जिनकी जिंदगी एकतरफा तीन तलाक, बहुविवाह से गुजरी हैं या गुजर रही हैं.) यही नहीं, बोर्ड ने कहा कि कोर्ट को यह हक नहीं बनता कि वह मुसलमानों के निजी मामलों में दखल दे. अभी इस पर बात नहीं करते हैं कि एक झटके में तलाक, एक साथ कई बीवियां रखना जैसे मुद्दे इस्लाम की रूह के कितने खिलाफ हैं. इस वक्त सवाल यह है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड किसके हक की हिफाजत कर रहा है?

भारत में इस्लाम की उम्र 13 सौ साल से ज्यादा है, जबकि पर्सनल लॉ बोर्ड महज साढ़े चार दशक पुरानी गैर-सरकारी संस्था है, जिसका कोई संवैधानिक दर्जा नहीं है. न ही यह भारतीय मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था ही है. इसके सदस्यों का चुनाव भी भारत के आम मुसलमान नहीं करते हैं. बोर्ड के विचार को मानना किसी पर लाजिमी नहीं है. हां, यह भारतीय उलमा की बड़ी संस्था है. इसमें शामिल उलमा, सुन्नी मुसलमानों के एक पंथ के बीच पैठ रखते हैं. ज्यादातर उलमा पारंपरिक ख्याल के हैं. वे जिस शरीयत को बचाने की बात करते हैं, वह पुरातन है. मुसलमानों में भी सुन्नियों के एक ही पंथ का विचार है. गौरतलब है, मुसलमानों में कई पंथ हैं.



यह बोर्ड पितृसत्तात्मक मूल्यों और मर्दाना सामाजिक ढांचे की हिफाजत करनेवाला एक संगठन है. इसलिए गाहे-बगाहे यह महिलाओं की बात जरूर करता है, लेकिन हिफाजत मर्दों के हकों की करता है. या यों कहना चाहिए कि बोर्ड मर्दों के निजाम की हिफाजत करने और महिलाओं की आवाज को काबू में करने के लिए ही है. इसमें शामिल ज्यादातर उलमा इस्लाम की रूह के दायरे में भी किसी तरह की नयी सोच के मुखालिफ हैं. इसलिए हफलनामे के जरिये बोर्ड ने जो विचार रखे, वह उसके मर्दाना नजरिये का ही आईना है. बोर्ड का हलफनामा कहता है, महिलाएं जज्बाती होती हैं, इसलिए सही फैसले नहीं ले सकतीं. इसलिए तलाक का हक मर्दों को है. वैसे, बोर्ड चाहे तो एक काम कर सकता है. कुछ दारुल इफ्ता के फतवों पर गौर कर ले और देख ले कि जज्बात में इसलाम की धज्जियां उड़ाते हुए एक वक्त में तीन तलाक मर्द देता है या औरत.

बोर्ड के हलफनामे के मुताबिक, फैसले लेने का काम मर्दों का है. इसलिए मर्दों को ज्यादा हक दिये गये हैं. फैसला लेने में औरतें कमजोर हैं. मर्दों को हक ज्यादा है, इसलिए जिम्मेवारियां भी ज्यादा हैं. इसलाम में महिलाओं को कम अधिकार दिये गये हैं, इसलिए उनकी जिम्मेवारियां भी कम हैं. और तो और बोर्ड के मुताबिक, अधिकारों की यह गैरबराबरी, सामंजस्य पैदा करता है! हम जरा सोचें, यह किस सदी में बात हो रही है? यह किस मुल्क में बात हो रही है? यह किसके लिए बात हो रही है? बतौर इंसान यह महिलाओं की बेइज्जती है और यह बेइज्जती मजहब के नाम पर है. यह बेइज्जती उन करोड़ों महिलाओं की है, जो मर्दों को पैदा करती हैं और उनकी पर‍वरिश करती हैं. घर चलाती हैं. वोट देती हैं. सरकारें चुनती हैं. चुन कर जाती हैं और समाज व देश के बारे में फैसला लेती हैं. लगे हाथ एक सवाल यह भी तो हो सकता है कि हजारों घरों, दफ्तरों की मुखिया महिलाएं हैं. उन पर जिम्मेवारियां हैं. वे अकेले फैसला लेती हैं. क्या ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऐसी सभी महिलाओं को मर्दों से ज्यादा हक देगा?

इस मुल्क में एक संविधान है, जो ‘भारत के लोग’ की बात करता है, हिंदू या मुसलमान की नहीं. वह मजहब मानने की आजादी देता है. सभी नागरिकों को बराबरी का हक देता है. बतौर नागरिक, बराबरी का हक देते वक्त वह यह नहीं कहता कि मुसलमान महिलाओं को, मर्दों के मुकाबले कम हक होंगे. किसी भी विचार या मजहब की कोई बात, अगर संविधान के मूल्यों से टकरायेगी, तो अंतत: बात संविधान की ही मानी जायेगी. अब कोई इससे सहमत हो या न हो. तो बोर्ड ने जो हलफनामा दिया है, वह संविधान के मुताबिक है या उसके खिलाफ? बतौर नागरिक, किसी भारतीय का हक ज्यादा है न कम. मर्द के वोट की कीमत, महिला से न ज्यादा हुई है न होगी. हां, अगर बोर्ड का बस चले, तो शायद यह दिन भी देखना पड़े!



पिछले साढ़े चार दशकों में भारत की मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी तय करने में लॉ बोर्ड की अहम भूमिका रही है. सरकारों, न्यायपालिकाओं, मीडिया और समाज के दूसरे अंगों ने इसे ही मुसलमानों का नुमाइंदा मान लिया है. नतीजतन मुसलमानों से जुड़े मसलों में इनकी राय अहम मान ली जाती है. बोर्ड ने अपनी इस हैसियत का मुस्लिम महिलाओं को क्या सिला दिया है? बोर्ड के हलफनामे में जाहिर विचार एक खास खांचे में खास तरह की मुस्लिम महिला की तसवीर गढ़ता है. इसके लिए महिलाएं अभी इंसान  के दर्जे में ही नहीं हैं. वह पुरुषों से न सिर्फ नीचे है, बल्कि वह उसके इस्तेमाल के लिए महज एक जिस्म है. अगर ऐसा न होता, तो बोर्ड को जीती-जागती महिलाओं की तकलीफ सुनाई-दिखाई देती. इस्लाम की रूह इंसाफ और बराबरी है. मुस्लिम महिलाएं तो यही मांग रही हैं न.
प्रभात खबर से साभार

बेडटाइम स्टोरीज : ‘ स्वीट ड्रीम्स’: सेक्स पोर्न और इरॉटिका का ‘साहित्य’ बाजार

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे इनके ई मेल आइ डी mamushu46@gmail.com पर भी संपर्क किया जा सकता है.

 सनी लियोनी अब कथाकार भी है. फ़िलहाल अंग्रेजी में.

प्रियदर्शन ने इस विषय पर संजाल-समाचार-पत्र ‘सत्याग्रह’ में अपनी टिप्पणी में ज़िक्र किया है कि  सोशल मीडिया पर सवाल उठाया जा रहा है कि क्या हम सनी लियोनी के लेखन को भी साहित्य मानेंगे? एक मई दो हजार सोलह  के जनसत्ता के साहित्यिक परिशिष्ट मेँ इसी लेखन के विषय में सुधीश पचौरी का एक आलेख छपा है – ‘’देहलीला से देहगान तक .”

ये कहानियाँ आपके जाने पहचाने पुस्तक-प्रारूप में नहीं आ रही हैँ. वे आपके ऐण्ड्रॉयड मोबाइल फ़ोन (अगर आपके पास है तो) पर, रोज़ाना एक के हिसाब से, ऐप्स के माध्यम से एक एक करके रात को दस बजे अवतरित होंगी. कुल मिलाकर बारह . शब्दशः बेडटाइम स्टोरीज़’ – “स्वीट ड्रीम्स”. यह ई-बुक विधान के एक प्रकारान्तर में जगरनॉट बुक्स का नया प्रकाशन-प्रयोग है. जगरनॉट बुक्स द्वारा यह प्रयोग ऐप्स के माध्यम से मोबाइल पर प्रकाशित होने वाली पुस्तकों के 101 शीर्षकों से आरंभ किया जा रहा है. ये विशेष रूप से भारतीय पाठक को ध्यान में रखते हुए चुनी गयी किताबेँ हैं. इनमें से एक किताब सनी लियोनी से आग्रहपूर्व लिखवाई गयी कहानियों का संकलन भी है.आग्रहपूर्वक लिखवाई गयी कहानियाँ . आग्रह करने वाला जब प्रकाशक हो, और जिससे आग्रह किया जा रहा हो उसका नाम सनी लियोनी हो तो यह समझने के लिये ज्यादा बुद्धि या कल्पना खर्च नहीं होती कि आकर्षण और आह्वान बाज़ार का है. बाज़ार भी कौन सा? सुधीश पचौरी का आलेख  ‘’देहलीला से  देहगान तक ’’ कहीं विश्लेषण तो कहीं विज्ञापन की मुद्रा में बताता है कि ‘इरॉटिका’ और ‘पोर्न’ का बाज़ार.

सनी लियोनी की ‘साइट’ पर देहलीला, सनी लियोनी की कहानियों में देहगान. सनी की साइट के सिलसिले में सुधीश पचौरी खजुराहो की मूर्तियों की मैथुन-मुद्राओं और सनी की स्टोरीज़ के सिलसिले में हिन्दी के रीति-काव्य की गवाही दिलाकर परम्परा के हवाले से उसकी वकालत भी करते नज़र आते हैँ. उन्होंने इन कहानियों को “अंग्रेजी में देसी इरॉटिक कथा की शुरुआत “ कहा है. परम्परागत ‘’लीला‘’ और ‘’गान’’ में परस्पर तो कोई विरोध नहीं; जैसे रीतिकाव्य की अनेक पंक्तियाँ तत्कालीन काँगड़ा  और राजस्थानी शैलियों मेँ चित्रांकित दिखाई देती हैं और खजुराहो की मैथुन-मूर्तियों मेँ भी काम-अध्यात्म के रचनात्मक मूल्य बोलते हैं; लेकिन शायद विश्लेषण और विज्ञापन में इसी घालमेल की वजह से आलेख की  तर्कपद्धति में पोर्न और इरॉटिका समानार्थी और पर्यायवाची ढंग से प्रयुक्त हो उठे हैँ. जबकि इन दोनो में परस्पर विरोध है. कामोद्दीपन के समान उद्देश्य के बावजूद उनमें स्तरों का विशाल  भेद है जो दो सर्वथा भिन्न तासीर वाली वस्तुओं में बदल जाता है. वैसे ही जैसे पानी की दो परिणतियाँ – भाप और बर्फ़ – तासीर में एक दूसरे के विपरीत हुआ करती है.


इस अन्तर को देखना और समझना ज़रूरी भी है. तो सनी के बहाने उठाया जाने वाला पहला नुक्ता यही है कि पोर्न और इरॉटिका में क्या कोई बुनियादी फ़र्क है? कह दूँ कि व्यक्तिगत रूप से मैं  सनी लियोनी की प्रशंसक हूँ. अन्य बहुत सारे लोगों के साथ मेरी भी यह प्रशंसा उन्होंने अपने व्यक्तित्व की योग्यता से स्वयं अर्जित की है. अंग्रेजी न्यूज़ चैनल सीएनएन-आईबीएन में एक के साप्ताहिक-साक्षात्कार-कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है. “हॉट सीट.” पन्द्रह जनवरी दो हजार सोलह के कार्यक्रम में “हॉट सीट” पर सनी लियोनी उपस्थित थी. साक्षात्कर्ता भूपेन्द्र चौबे. अगर साक्षात्कार आपने देखा है तो  महसूस किया होगा कि कार्यक्रम का नाम ‘’हॉट-सीट’’ बहुत ही सटीक साबित हुआ. एक बहुत ही आक्रामक और अपमानजक प्रश्न-सत्र का बहुत  ही संयत और शालीन गरिमा के साथ  सामना करके सनी ने प्रमाणित किया कि वे एक ‘’ वूमन ऑफ़ सब्स्टेन्स ’’ यानी कि सार-तत्व-सम्पन्न महिला हैं. तो दूसरा विचारणीय नुक्ता यह कि उनके ‘वुमन ऑफ़ सब्स्टेन्स’ होने का कोई अनिवार्य आन्तरिक सम्बन्ध क्या उनके ‘’पोर्न क्वीन” होने या फिर अपने शरीर के प्रति उनके दृष्टिकोण के साथ है? तीसरा नुक्ता भी यहीं दर्ज कर दिया जाय कि क्या उनके विगत व्यवसाय की वजह से लेखक होने का उनका अधिकार या उनके लेखन का स्वरूप सन्दिग्ध हो जाता है? लेकिन इन नुक्तों  को थोड़ा आगे के लिये स्थगित करके यहाँ पहले नुक्ते की तरफ़ लौटा जाय.

नुक्ता असल मेंअपने विस्तार में पूरा दायरा है, बल्कि एक दूसरे को काटते कतरते, उलझते उलझाते दायरों में फँसे हुए दायरे पूरा गुंझल बनाते हैं. कहावत की तरह दोहराई जा सकती है यह बात कि एक जने का “ इरॉटिक” दूसरे जने का “पोर्न” हुआ करता है. दिक्कत तब उठती है जब शहरीकरण, विस्थापन, रोज़गार वगैरह वगैरह वजहों से ये सारे एक दूसरे को काटते कतरते, परस्पर द्वेषग्रस्त दायरे एक साथ एक ही लोकवृत्त में मौजूद होते हैं और वास्तविक जीवन में एक के ‘इरॉटिक’ की भूमि पर दूसरा कोई ‘पोर्न’ की कहानी उत्कीर्ण करने लगता है और विकट दुर्घटनाएँ घटती हैं.स्पष्टतः यहाँ ‘’एक जने’’ का मतलब नितान्त वैयक्तिक विकृतियों या विशिष्टताओं के सन्दर्भ में  ही  “एक अकेले जने” को  समझा जा सकता है. बृहत्तर पैमाने पर ये परिभाषाएँ सामुदायिक हुआ करती हैं और समाज-सापेक्ष व संस्कृति-सापेक्ष भी. समाज के भीतर अनेक लघुतर समुदाय, उनके अनेकस्तरीय पूर्वग्रह, दुरग्रह, विधि-निषेध  के संस्कार, मर्यादाएँ वगैरह हुआ करते हैं. उनका शिकंजा उनके सदस्यों के / हमारे अपने आपे का अंश होता है और उसे खुद से  छील कर न हम अलग कर सकते हैँ और न ही उनसे जुड़े विवादों में प्रायः तर्क और विवेक  की कसौटियाँ कायम रख सकते हैं.

सेक्स, पोर्न और इरॉटिका की शब्दावली को अपने देसी साहित्यिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों में काम-रति-शृंगार और अश्लील मे अनूदित किया जा सकता है. ‘काम’ का कलात्मक कायाकल्प ‘रति’ है और उसका रस-परिपाक शृंगार. शृंगार रसराज है. हमारे देसी साहित्यशास्त्र में शृंगार की यह महत्ता जीवन में ‘कामशक्ति’ की प्रबलता और उसको उदात्त बनाने की ज़रूरत की स्वीकृति से निकली है. रसात्मक परिणति से विचलन परिपाक तक जाने की बजाय ‘अश्लील’ काव्य-दोष होकर रह जाता है. सुधीश पचौरी  के आलेख में रीतिकाव्य और खजुराहो के दृष्टान्त शायद इसी प्रकार के अनुवाद से निकले है. शृंगारिक’ और ‘अश्लील’ की व्यंजना अभिव्यक्ति में संवेदना और सुरुचि के होने या न होने से जुड़ी है. ‘ पोर्न ’ को शायद अश्लील का समकक्ष माना जा सकता है और इरॉटिका को शृंगार का; लेकिन समकालीन विश्व में ‘पोर्न’ के व्यवसाय और बाज़ार ने ख़तरनाक आयाम अख्तियार कर लिये है. इसलिये पोर्न के द्वारा जो  संप्रेषित होता है वह रति और शृंगार की कोमल, मानवीय, सहृदय व्यंजनाओं के सर्वथा बाहर रह जाता है.

हमारे जैसे समाज में तो खास तौर से; फिर भले ही अपनी परम्परा के नाम पर हम कामशास्त्र, कोणार्क, खजुराहो को याद करते या अपने खुले सांस्कृतिक मनोभाव के लिये उसकी गवाही देते दिलाते हों.हमारे जैसे समाज का मतलब, समकालीन सन्दर्भों में समाज के भीतर के अनेक लघुतर समुदाय, उनके अनेकस्तरीय पूर्वग्रह, दुरग्रह, विधि-निषेध के संस्कार, मर्यादाएँ जो  हमारे जीने और रहने की मौजूदा परिस्थितियाँ रचते हैं ; स्त्री की हैसियत से जीने के लिये बेशक विकट ! इन परिस्थितियों को ज़रा ‘पोर्न बाज़ार’ की संवेदनाओं से चालित मानसिकताओं वाले समुदायों के बीच से गुजरते होने की कल्पना के साथ देखिये. वे हमारे निजी तात्कालिक परिवेश का हिस्सा चाहे न हों; या कौन जाने शायद हों ही; उसको हर समय काटते, घेरते, सिकोड़ते, फैलाते दायरे दबाव की तरह मौजूद रहते हैं. और इधर “नैतिक” का हमारा ‘’परम्परागत“ बोध जो अपनी परम्परागत बद्धमूलता  की वजह से ही हमें एक अनैतिक और पाखण्डी समाज बनाता है. हमारा समाज  बड़े पैमाने पर एक अवदमित समाज है जिसे कोढ़ में खाज की तरह पोर्न का एक फलता फूलता सर्व-सुलभ अवैध बाजार मिल गया है.  इण्टरनेट के जरिये घर घर में इस बाजार की मौजूदगी के भी आगे बढ़कर मोबाइल के जरिये अब हर जेब तक में हर समय मौजूद. शब्दशः संसद से लेकर स़ड़क तक हर जगह.

यह एक अवैध बाजार है. यानी कि  यह एक अनियंत्रित बाजार है. वस्तु से लेकर शिल्प तक.  भोग और काम  का खुला खेल – बर्बर और हिंसक ! उपभोक्ता हर समय उत्तेजनाग्रस्त, हमला करने को तैयार मिलेगा. एक अदद स्त्री-देह चाहिये. और स्त्री हर जगह असुरक्षित मिलेगी, क्योंकि हमलावर कहीं भी, कोई भी हो सकता है. काम, रति, शृंगार, इरॉटिका, पोर्न या जो भी स्तर या नाम इस बाज़ार का हो, इसी सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश के भीतर ही सक्रिय होता है और उसे अपदस्थ कर स्वयं संस्कृति में बदल जाता है. साहित्यशास्त्र में रति और शृंगार के उद्दीपनों की महिमा बखानी गयी है. साहित्य में चित्रित उद्दीपनों के अलावा शृंगारिक साहित्य स्वयं भी एक उद्दीपन है. सनी लियोनी ने जब पोर्न को एक कला और खुद को एक कलाकार कहा तो शायद उनका इशारा उद्दीपन की रचना की तरफ़ रहा होगा. कामोद्दीपन की कला यदि इरॉटिका है, और कामोद्दीपन का वाणिज्य-व्यवसाय यदि पोर्न है और इस तर्क से यदि इरॉटिका ही पोर्न भी है और पोर्न भी एक कला है तो  इस वीभत्स और भयंकर विडम्बना पर नज़र डालिये. यहाँ, इस उदाहरण में ‘’कला’’ कैसे  जीवन और यथार्थ को तत्काल ‘’प्रभावित’’, कर्म के लिये ‘’प्रेरित’’ और ‘’अनुकूलित’’ करती है. और उस “कर्म” का नतीजा हमला, बलात्कार, हत्या तक कुछ भी हो सकता है.

अनायास ही देखा जा सकता है कि पोर्न जन-जीवन में घुला मिला है. नकटौरा और खोड़िया जैसे उत्सव होते थे. अब भी होते ही होंगे. बेटे के विवाह में बारात जाने के बाद घर की औरतें विवाह की रात को स्वच्छंद भाव से युगल-सम्बन्ध का उत्सव मनाती हैँ. हिन्दीभाषी प्रदेशों में उसे कहीं खोड़िया, कहीं नकटौरा कहा जाता है. मेरी सीमित जानकारी में  कहँरवा यानी कहारों का नाच, धोबी-नाच , थोड़ा अधिक प्रसिद्ध किस्म का जोगीड़ा कामोद्दीपन के उत्सव और मनोरंजन की वैसी अभिव्यक्तियाँ हैँ जिन्हें भदेस और अश्लील के तट पर रखा जा सकता है. लेकिन वैसी हमलावर, हिंसक और बर्बर परिणति देखी सुनी तो नहीं जैसी आज के बाजारू पोर्न के जरिये घर-बाहर, दफ़्तर-सड़क  हर स्त्री की असुरक्षा में दिखाई देती है. ये अपने समाज और सन्दर्भ-जगत के सामूहिक सामुदायिक उत्सव है. सामूहिक संवेदना और साझेदारी का हँसी ठट्ठा, चुटकुलेबाज़ी, छींटाकशी, छेड़खानी समन्वित विनोद और हास-परिहास उत्तेजना को धारण कर लेते हैँ. उस सन्दर्भजगत से बाहर के व्यक्ति को वे कुरुचिपूर्ण, अश्लील और जुगुप्साजनक तो महसूस हो सकते हैँ लेकिन हिंसक और ख़तरनाक शायद ही कभी . जेब के मोबाइल में पोर्न का एकाकी उपभोक्ता जो शायद तरह तरह के कारणों से विस्थापित, अकेला, अजनबी होने को विवश , और निरंकुश होने को स्वतंत्र है या फिर  शायद ऐसी किसी छूट का हकदार भी नहीं; केवल  मर्दानगी के गर्व में उन्मत्त, शायद असह्य तनाव में केवल यौनांग मेँ परिणत हो जाता है और यौनांग हमले के हथियार में. निस्संदेह कामोद्दीपन की कला के स्थूलतम स्तर पर भी पोर्न और इरॉटिका समानार्थी नहीं हो सकते.

चित्रकला में ‘न्यूड’ को एक कलारूप का दर्जा प्राप्त है. मूर्तिकला मे कोणार्क और खजुराहों की मूर्तियों की मैथुन-मुद्राओं को भी इसी कोटि मेँ जोड़ा जा सकता है और भाषिक अभिव्यक्ति में शृंगारिक साहित्य को भी जिसमे बड़े पैमाने पर भक्ति-साहित्य भी शामिल है. सनी लियोनी की “देहलीला“ और “देहगान”  की वकालत के लिये इनका दृष्टान्त अनावश्यक और अप्रासंगिक है, यह मान लेने के बाद दोनो के अन्तर को रेखांकित करने की कोशिश की जा सकती है.नग्नता सामान्यतः कुरूप और असहनीय होती है. नृतत्व बताता है कि मनुष्य ने जननांगों को ढँकने से अपने सांस्कृतिक जीवन की शुरुआत की, जिसका पहला लक्षण ही प्रकृति का संशोधन  और प्राकृतिकता में परिवर्तन है. कुरूपता को ढँकने के अलावा यह प्रयास काम की उद्दाम ऊर्जा को नाथने का भी रहा होगा. ‘न्यूड’ वस्तुतः कलाकार की आँख से देखी गयी नग्नता है. उसी की दृष्टि है जो ‘नेकेड’ को ‘न्यूड’ में; नग्नता को सौन्दर्य मेँ बदलती है. उसमेँ उपस्थित मानव-आकार सामान्यतः मानव शरीर का आदर्शीकरण होता है. रचनाकार की दृष्टि नग्नता या शृंगारिकता के क्षण को उसके लगभग अभिव्यक्ति के परे के सौन्दर्य को देखती और पकड़ने की कोशिश करती है. सौन्दर्य चेतना की कसौटियाँ बहुत गहराई में जाकर निजी होने के अलावा नैतिक भी हुआ करती हैं. जिसे हम सुन्दर कहते हैँ वह कामोद्दीपक हो सकता है परन्तु अनैतिक कभी नहीं.

 नैतिक का मतलब यहाँ निर्दिष्ट और परिभाषित विधि निषेध की जड़ीभूत मर्यादाओं से नहीं, देह और मन की एकान्वित अखण्डता से है जो नैतिक जड़ताओं को चुनौती देती, ‘सुन्दर’ से परिभाषित होती और नयी नैतिकता की रचना का द्वार खलती है. इसके विपरीत पोर्न का उद्देश्य मनुष्य-देह के उत्सव का या ऐन्द्रिय अन्तरंगता के सम्मान का ; अपने श्रोता, दर्शक या पाठक को उदात्त के स्तर तक उठाने में मदद का प्रतीत नहीं होता. पोर्न का ठेठ स्वभाव कल्पना के लिये कुछ भी बाकी न छोड़ते हुए दर्शक को उत्तेजना के हवाले कर देता है. बाज़ार इरॉटिका का भी होता है किन्तु वह बाज़ार से संचालित नहीं होता. पोर्न के लिये केवल बाज़ार है और बाज़ार के अलावा और कुछ भी नहीं, न मनुष्य, न आनन्द, न जीवन ! वही एक अनुभव है. कामोद्दीपन . वही एक कर्म है. लेकिन वह प्रेम की अभिव्यक्ति भी हो सकता है और वही बलात्कार भी. इरॉटिका अपने सौन्दर्य को जीवित अनुभव में खोजने की प्रेरणा देकर प्रेम की अभिव्यक्ति बनता है, पोर्न बलात्कार की हिंसा और बर्बरता की उत्तेजना देता है. वह देह का, प्रेम का, स्वयं काम का भी अपमान और जीवन का क्षय है.
अगले क़िस्त में जारी…
(सन)सनी लियोनी के बहाने एकाध नुक्ते की बातें -१ शीर्षक से कथादेश के अगस्त में प्रकाशित/ साभार

हिन्दी साहित्य में अस्मितामूलक विमर्श विशेष संदर्भःस्त्री अस्मिता

अजय कुमार यादव

अजय कुमार यादव, शोधर्थी , जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली . संपर्क :ajjujnu@gmail.com
Mobile no.8882273975

पिछले कुछ दशकों में विचारधारा और चिन्तन की दुनिया में आए वैचारिक और अवधारणात्मक बदलावों ने ‘अस्मिता’ के प्रश्न को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया. विचारधारा और चिन्तन के दुनिया में आए इन बदलावों ने कई प्रकार की अस्मिताओं को जन्म दिया, मसलन-राष्ट्रीय अस्मिता, सांस्कृतिक अस्मिता, स्त्री अस्मिता, दलित अस्मिता, आदिवासी अस्मिता और अल्पसंख्यक अस्मिता इत्यादि.‘अस्मिता’ पर हुए तमाम शोधों और अनुसंधानों के बावजूद ‘अस्मिता’ की परिभाषा विभिन्न सामाजिक संरचनाओं के द्वारा विभिन्न है. यद्यपि यह सभी जानते है कि इस शब्द का उपयोग वैचारिक विमर्शों और अकादमिक दुनिया में कैसे किया जाय? यह बताना सचमुच कठिन है कि ‘अस्मिता’ की ‘फलाँ’ परिभाषा इसे सम्पूर्णता में परिभाषित करती है लेकिन इस बारे में लोगों की सामान्य और स्पष्ट समझ है कि इस शब्द का प्रयोग कब किया जाए और क्यों किया जाए ? आश्चर्य जनक बात यह है कि किसी भी विद्वान ने इसे परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं महसूस की और हिन्दी में तो इस पर सामग्री न के बराबर है और इसीलिए सामान्यतः ‘अस्मिता’ के प्रति पाठक की जो अकादमिक समझ है वह भी अस्पष्ट  है. अकादमिक दुनिया में फैशन की तरह उभरा यह शब्द आज कुछ विशेष सामाजिक वर्गों की तरफ इंगित करता है और इन सामाजिक संरचनाओं की पहचान की निर्मिति के रूप में रूढ़ हो चुका है और अब यह शब्द संदर्भों के आधार पर अपने अर्थ खोज लेता है.

समकालीन अस्मिता विमर्शों की विचारधारा और मुद्दे अलग-अलग होने के बावजूद सभी आंदोलन अस्मिता आंदोलन का दावा जरूर करते हैं. हालांकि इस अस्मिता का स्वरूप सभी के लिए एक जैसा और सुपरिभाषित नहीं है. जब कोई समुदाय अपने अस्मिता तलाशने की कोशिश करता है तो उसके सामने ये सवाल सहज ही आ जाते है कि ‘हम कौन है?’ और दूसरे समुदायों के मुकाबले हमारी समाज में क्या हैसियत है? या हमारे बीच क्या सह संबंध है? इन सवालों से टकराकर ही व्यक्ति/समुदाय अपनी अस्मिता निर्माण की प्रक्रिया की शुरूआत करता है.
स्त्रियाँ अपने अस्मिता के लिए जिन सवालों से टकराती हैं और परस्पर वाद-विवाद करती हैं उसे ही स्त्री विमर्श के रूप में देखा जाता है. सामान्य शब्दों में कहें तो स्त्री के अस्तित्व को रसोई व बिस्तर के गणित से परे स्थापित करने की मुहिम ही स्त्री अस्मिता है. स्त्री अस्मिता का मतलब है:- स्त्री-पुरुष के बीच घटने वाले संबंधों को बिना नकारे, उसके पारस्परिक संबंध से मुक्ति. नारी तुम केवल श्रद्धा हो, देवी माँ, सहचरि प्राण जैसे ब्रह्म वाक्यों को सुनते हुए होश संभालने वाले इस सामाजिक मानस को परिवर्तित कर देना अकल्पनीय बात थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में उभरे सामाजिक अस्मिता के आन्दोलनों ने स्त्री की छवि, स्त्री की सामाजिक स्थिति और स्त्री के बारे में प्रचलित रूढ़िगत और मिथकीय अवधारणाओं को तोड़ा है.

सदियों से उसके जिस ‘स्व’ का अपहरण पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने किया था उसे अब वह वापस पाने के लिए प्रयासरत है.स्त्री मुक्ति की बात करते हुए ये जानना जरूरी है कि स्त्री को किससे मुक्ति चाहिए? किसने उसे अधीन बना कर रखा है? और स्त्री भी अधीन बनी रही, इसके क्या कारण हो सकते है? रमणिका गुप्ता लिखती है कि- “एक साझी व्याख्या तो स्त्री की समझ में आ ही गई है कि पुरुष ने उसके मन को गुलाम बनाने से पहले उसे परिवार, ब्याह, संतान और समाज की लक्ष्मण रेखाओं के बाड़े में कैद करके उसके शरीर को गुलाम बनाया और उसे सभी अधिकारों से वंचित किया. पुरुष को जब जरूरत हो तो प्यार, आलिंगन व चुंबन के हथियार का इस्तेमाल कर या उसके रूप का बखान कर उसे गौरवान्वित किया- सर्वोत्तम करार किया, लेकिन उसके सब अधिकार छीन लिए ताकि वह उसी के प्रति समर्पित रहे. किन्तु, आज समय बदल रहा है, वह इस छद्म को पहचान गई है. आज वह घर, परिवार, पुरुष का सुरक्षात्मक छाता, रिश्तों की भावनात्मक बेड़िया- सभी को नकार अपनी अस्मिता के निर्माण के लिए जूझने लगी है.”1



स्वत्व का बोध होना स्त्री मुक्ति की पहली सीढ़ी है क्योंकि स्वत्व का बोध होने पर ही स्वत्व की रक्षा का सवाल खड़ा होता है. यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था ऐसी है जो गोहत्या पर दंगे कर देती है लेकिन भ्रूण हत्या व वधू हत्या पर चूँ नहीं करता. दरअसल दुनिया की ओर पीठ कर बैठ जाने की प्रवृत्ति या सामाजिक सत्ता को अस्वीकार कर अपने ही संसार में मग्न रहने की स्थिति से यहाँ काम नहीं चलने वाला है. इधर के दिनों में तो स्त्री सौंदर्य की प्रशंसा करने का हथकंडा जो पुरुष जाति ने अपनाया, वह वास्तव में स्त्री को व्यक्ति से वस्तु की तरफ गतिशील करता है और स्त्री का ध्यान वास्तविक स्वतंत्रता से अलग हटाता है. दुःखद बात यह है कि पैसे, सत्ता और प्रतिष्ठा के समीकरण वाले इस समाज में स्त्री भी पुरुष की अनुगामिनी हो रही है और यह इन मुक्तिगामी आन्दोलन को सही दिशा में नहीं ले जा रहा है. इससे स्त्री मुक्ति की डोर स्त्री के हाथों से फिसलने का भी डर है. स्त्रियों को यह समझना होगा कि वे कितने विडम्बनापूर्ण समय में जी रही है, जहाँ एक तरफ शक्ति, ज्ञान और सम्पदा के रूप में स्त्रियों (क्रमशः दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी) की पूजा होती है और दूसरी तरफ स्त्रियों को इन्हीं तीन चीजों से हमेशा से वंचित रखा गया. शक्ति का काम तो हमेशा पुरुषों का ही माना गया.

दरअसल यह पूरा का पूरा मामला ‘जेण्डर’ और ‘सेक्स’ का है. सेक्स जो कि जैविक विभेद को इंगित करता है लेकिन जेंडर सांस्कृतिक अर्थ की अभिव्यक्ति है. निवेदिता मेनन ने लिखा है कि- “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी. इस पंक्ति का क्या अर्थ निकलता है? वास्तविकता में यह उस सूरत में भी जबकि एक औरत ऐसे अपरिमित शौर्य और वीरता का प्रदर्शन कर रही है, उसके इस गुण को ‘नारी सुलभ’ गुण नहीं माना जा रहा है यानि कुल मिलाकर बहादुरी का गुण पुरुषों की ही विशेषता कहलाती है, फिर भले ही कितनी भी औरतें बहादुरी का प्रदर्शन करती रहें और कितने ही पुरुष पीठ दिखाकर भाग खड़े होते रहें.”2 कुल मिलाकर इस संदर्भ में केवल इतना ही कि इस विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों का काम केवल रोना है.तैत्तिरीय संहिता के अनुसार उसे किसी प्रकार की शिक्षा पाने का कोई अधिकार नहीं, वरन् धन उपार्जन करने या अपने शरीर को अवाहित क्रियाओं तक से बचने का अधिकार उसे नहीं है. प्राचीन काल से ही गार्गी जैसे कुछ उदाहरणों को छोड़ दिया जाय तो शिक्षा स्त्रियों के लिए जरूरी नहीं समझा गया इसलिए उनको उससे वंचित रखा गया.

कुमकुम राय ने लिखा है कि- “एक तरफ हमें गार्गी जैसी महिला दार्शनिकों की चर्चा मिलती है वहीं इस बात के बहुत थोड़े प्रमाण मिलते है कि शिक्षा प्रसार के औपचारिक संस्थानों में बतौर छात्रा या शिक्षिका, महिलाएँ भी उपस्थित थीं. दूसरे शब्दों में, ऐसी महिलाएँ भी संभवतः नियमित बौद्धिक गतिविधियों में हिस्सेदारी करने के बजाय सिर्फ गाहे-बगाहे ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराती थीं.”3 इस स्थिति को और इस व्यवस्था को व्यवस्थित करने में मनु महाराज कैसे पीछे रहते, उन्होंने स्त्रियों को उपनयन संस्कार में शामिल होने से रोका. चूँकि उपनयन संस्कार पवित्र ज्ञान प्राप्ति का प्रारम्भिक बिंदु था. इसे और गहरे स्थापित करने के लिए उन्होंने कई विकल्प भी सुझाए, जैसे- ‘स्त्रियों के लिए विवाह करना पुरुषों के उपनयन के समकक्ष है, पति की सेवा करना छात्र होने के समान है और घर के कामों को संपन्न करना पवित्र अग्नि की पूजा अर्चना के समान है‘ ( मनुस्मृति प्रकरण 2-67) कुमकुम राय ने लिखा है कि- “ऐसे निर्देशों को स्वीकार कर लेने का मतलब होता है कि कोई भी गैर घरेलू काम को नारीत्वहीन और गैर पत्नी कार्य माना जाता.”4

और जहाँ तक स्त्रियों की सम्पदा पर अधिकार की बात है, आर्थिक स्वतंत्रता जरूर बढ़ी है स्त्रियों में, लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता का होना स्त्री के शोषित न होने की गारंटी नहीं है. आर्थिक स्वतंत्र होते हुए भी उसका शोषण हो रहा है, क्योंकि यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था उसे पचा नहीं पा रही है. आर्थिक स्तर पर आत्मनिर्भर स्त्री को भी दहेज के लिए मार दिया जाता है.
अनामिका ने पितृसत्ता के नजरों में स्त्री की जो छवि निर्मित है उसकी बानगी   प्रस्तुत किया है-
‘पढ़ा गया हमको /  जैसे पढ़ा जाता है कागज
बच्चों की फटी काॅपियों का / ‘चनाजोर गरम’ के लिफाफे के बनने से पहले
देखा गया हमको / जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी / अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद
सुना गया हमको / यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने सस्ते कैसेंटों पर / ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में
भोगा गया हमको / बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुःख की तरह.’
और आखिरकार इन स्थितियों से अफना कर लिखती हैं कि-
हे परमपिताओं / परमपुरुषों-
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!

लेखिकाएं सिर्फ अपने को एक इंसान का दर्जा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. अर्धांगिनी , देवी जैसे फुसलाने वाले शब्दों पर संदेह करने लगी हैं. वास्तव में मोहक शब्दों का यह माया जाल स्त्री को आत्ममुग्धता की ओर ले जाता है और वह इस शब्द खेल में उलझती हुई कठपुतली की तरह नाचती है. इन षड्यन्त्रों को समझते हुए स्त्री अपनी अस्मिता का निर्माण कर रही है. स्त्री अपनी पहचान के लिए बेचैन है, अपनी पहचान पर सिर्फ अपना हक समझती है. अस्मिता निर्माण में यह प्रथम सोपान है ‘स्व’ का बोध. स्त्री को अपने ‘स्व’ का पूर्ण बोध है. तरन्नुम रियाज ने लिखा है कि-“उसे अपनी पहचान पर/ इतना नाज है/ कि वह मुझे नहीं पहचानता है/ वह कहता है/ उसकी पहचान ही है मेरी पहचान / और इसके अलावा / मेरा कोइ वजूद नहीं है मुमकिन / कि/ उसकी माँ की पहचान भी / उसका बाप था / और सबकी माँओ की पहचान/ सबके बाप होते हैं/ मगर मैं अपने आप को पहचानती हूँ/ अपने माँ बनने और/ उसके बाप बनने के बहुत पहले से/ वह भले ही मुझ पर/ अपनी पहचान थोपता है/ मगर मैं उसे/ अपनी पहचान नहीं दूंगी!”  ‘सेवा समर्पण और सहनशीलता’ जैसे तीन ‘स’ वाले शब्दों के बीच कैद स्त्री को अपने अस्तित्व का भान है.
“तुम इन्द्रधनुष बनोगे आकाश का
मैं छत के चमगादड़ गिनूँगी
साथी ये नहीं होगा.” ; मेघना पेठे



आज स्त्री मजबूर नहीं है, वह अपना अस्तित्व समझने लगी है. उसे यह पता हो गया है कि उसकी गतिशीलता को बाधित करने के लिए ही पुरुष-सत्तात्मक समाज वर्जनाओं की बेड़ियाँ गढ़ता रहा है. स्त्री की ममता का उसकी कमजोरी मानकर पुरुष ने उसकी ममता ग्रन्थि को बेड़ी बनाकर स्त्री को गतिहीन कर दिया. उसकी कोख, उसकी देह और उसके सेक्स पर किसी एक पुरुष के आधिपत्य का सिद्धांत इसलिए गढ़ा गया कि उन्हें एक ‘वस्तु’ बना दिया जाय और वे खुद भी अपने को वस्तु ही समझें. इसके लिए पितृसत्तात्मक समाज ने रिश्तों का जंजाल बुना और इन रिश्तों की मर्यादा को त्याग और ममता से सींचने का ठेका पुरुषों ने स्त्रियों को दे दिया. पुरुष जब मन करे तो रिश्तों को तोड़ ले लेकिन स्त्री नहीं तोड़ सकती. अगर वह तोड़ देती है तो उसे वाचाल तथा हठधर्मी कहकर, उसे डायन कहकर सरेआम नंगे पूरे गाँव में घुमाए जाने का रिवाज पुरुष जाति ने बनाया. लेकिन स्त्री भी अब खुलकर बोलने लगी है, वह अब ताल ठोंक कर कह रही है कि हाँ मैं बुरी औरत हूँ. निरुपमा दत्त ने लिख है कि-“तुम मेरे शहर आओगे/ तो बुरी औरतों की फेहरिस्त में मेरा नाम भी दर्ज पाओगे/ मेरे पास है वह सब कुछ/ जो एक बुरी औरत के पास होना/ बेहद जरूरी है/ मुँह में जलती आग/ धड़कता दिल/ थिरकती रग-रग/ हाथ में छलकता जाम/ पाँव चले सड़क/ ऊपर खुला आसमान/ सहने का मेरा हौसला बेमिसाल है/
मेरे पास कहने को पूरा आसमान है.”

जब स्त्री के अन्दर इतना आत्मसम्मान आ जाता है तभी वह निर्णय ले पाती है. निर्णय लेने के अधिकार को ही पन्ना नायक ‘स्त्री मुक्ति’ कहती है-
“दो पैरो में से
कौन-सा एक पैर
खौलते पानी में रखूँ
और कौन-सा जमी हुई बर्फ पर
यह निर्णय लेने का अधिकार
यानि ‘स्त्री मुक्ति’.
कविताओं के कई अंदाज और तेवर मिलेंगे. कहीं पर वे पितृसत्ता को चुनौती देती हैं तो कहीं पर प्रेम से बतियाती भी है. अपनी बात को तर्कपूर्ण ढंग से रखकर वे बहस करती है. वाद-संवाद की शैली में कहीं पर मुक्ति का गणित पेश करती हैं तो कही पर घिसे-पिटे पुराने आदर्शों को तोड़कर उसे नए अंदाज में पेश करके पुरानी गं्रथि को तोड़कर ही अपनी अस्मिता की खोज करती हैं.

स्त्रीवादी चिंतकों और विचारकों ने स्त्रियों की मुक्ति में कुछ सार्थक कदम जो बताए हैं वे इस प्रकार हैं, जैसे- स्त्रियों को अपने अस्तित्व के प्रति बोध कराना, स्त्रियों की शिक्षा पर ध्यान देना, आर्थिक स्वतंत्रता और देह की स्वतंत्रता. यहाँ यह बात भी काबिलेगौर है कि देह की स्वतंत्रता केवल यौन से मुक्ति नहीं है. अनामिका ने कहा है कि- “पागल हैं लोग जो देह मुक्ति का अर्थ देह को ‘मुक्त चरागाह’ बना देना समझते हैं. हमेशा-हमेशा से औरत की देह ही उसके शोषण की प्राइमरी साइट रही है- मार-पीट, गाली-गलौज, बेगार, भावहीन, यांत्रिक सम्भोग, बलात्कार, डायन-दहन, पोर्नोग्राफी, पर्दा-प्रथा और सती, असुरक्षित प्रसव और तद्जन्य बीमारियाँ- सबके मूल में ‘देह’ ही तो है.”5 तो देह की मुक्ति को केवल यौन से मुक्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि स्त्री देह से जुड़ी वो सभी शोषक गतिविधियों से मुक्ति ही देह मुक्ति है. स्त्री की देह उसकी अपनी है और उससे जुड़े सभी निर्णय उसके अपने हो. चाहे वह विवाह का मामला हो या सन्तानोत्पत्ति उसके निर्णय का भी सम्मान किया जाय. दूसरी तरफ स्त्री की देह का बाजार द्वारा जो उपनिवेशीकरण किया गया उस पर भी रोक लगाने की जरूरत है. जो स्त्रियाँ खुद को बाजार को सौंपने के लिए उतावली हैं उन्हें भी यह समझना होगा कि बाजार उन्हें नहीं उनकी देह को खरीद रहा है जो कि कहीं से भी ठीक नहीं है. लीलाधर मंडलोई ने लिखा है कि- “स्त्री सोच के बदलते आयाम अपनी देह के उपयोग को लेकर सीमित अर्थों में कदाचित सही लगे किंतु नारी मुक्ति आंदोलन के परिपे्रक्ष्य में वे अनुकूल नहीं होंगे.”6

स्त्री विमर्श प्रमुख रूप से पितृसत्तात्मक समाज के विरूद्ध आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ. मुख्य मुद्दा था स्त्री को वे सभी अधिकार प्राप्त होने चाहिए जो अब तक पुरुष सत्ता के कारण नहीं प्राप्त हो सके. पश्चिम में स्त्री विमर्श लेखन का प्रारम्भ 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही शुरू हो गया था. परन्तु हिन्दी में स्त्री विमर्श आन्दोलन बहुत बाद में शुरू हुआ. किन्तु स्त्री-मुक्ति आंदोलन और स्त्रीवादी चेतना के फलस्वरूप नारी जीवन में एक नयी उर्जा दिखाई पड़ी, और एक नया उन्मेष आया. अब वे अपने अधिकारों के लिए पुरुष के समानान्तर अपनी दुनिया देखने लगीं. पुरुष के वर्चस्व को चुनौती देती हुई हिन्दी साहित्य में कई स्त्री-चिंतक देखी जा सकती है. जैसे- महाश्वेता देवी, कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, रमणिका गुप्ता, अनामिका आदि.
विशेषकर दलित स्त्री, जाति व पितृसत्ता रूपी दोहरे अभिशापों के तीखे दंशों को झेलने के लिए अभिशप्त है. भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री होने के साथ दलित होना स्त्री के संतापों को कई गुना बढ़ा देता है. भारतीय समाज जाति व धर्म पर आधारित है. पितृसत्तात्मक भी है. पितृसत्ता ने सारे नियम अपनी सुविधा के अनुसार बनाये हैं. दलित स्त्रियां जाति और पितृसत्ता दोनों का उत्पीड़न झेलती हैं. घर के बाहर गैर दलित उन्हें लहूलुहान करते हैं तो घर के अन्दर दलित पुरुषों की वर्चस्ववादी मनोवृत्ति व शारीरिक हिंसा उन्हें तोड़ती है.

आज दलित समाज से दलित महिलाओं को अलग करके देखने की आवश्यकता है आज का दलित समाज मनुवादियों के षड्यंत्रों के कारण हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है. किंतु दलित समाज की महिलाएं उससे भी अधिक पिछड़ी हुई हैं. इस मायने में दलित महिलाएं दोहरी दलित हैं. इसमें दो राय नहीं है कि हमारे समाज में औरत और उसमें भी दलित औरत की स्थिति काफी दयनीय है. दलित स्त्री के शोषण के मुख्य कारण हैं- अशिक्षा, निर्धनता, रूढ़िवादिता,  अतः कहना न होगा कि आत्मनिर्भरता और शिक्षा का सवाल दलित स्त्री का भी प्रमुख सवाल है. समाज में पवित्र और उत्कृष्ट समझी जाने वाली प्रचलित मिथकीय संरचनाओं पर कड़ा प्रहार करता हुआ स्त्री आन्दोलन वास्तविक अर्थों में विवेकशील परंपराओं  का समर्थन करता है. महान समझी जाने वाली उच्च एवं पितृसत्तात्मक केंद्रित परम्पराओं पर प्रहार करती हुई उनकी विवेकशीलता पर सवाल करत है. ज्ञान के परंपरागत मिथकीय स्थापनाओं को खारिज करती हुई कड़ा प्रतिरोध दर्ज करत है.जर्मेन ग्रीयर ने अपनी किताब ‘द फीमेल यूॅनक’ में इब्सन के डाल हाउस एक्ट के नोरा-हैल्मर संवाद के हवाले से स्त्री मुक्ति संबंधी अपनी मान्यता को प्रस्तावित करती है. “नोरा ने हैल्मर से पूछा- तुम क्या मानते हो मेरा सबसे पवित्र कर्तव्य क्या है? और जब उसने कहा कि- अपने पति और बच्चों के प्रति, तुम्हारा कर्तव्य तो वह असहमत होती है और कहती है कि- मेरा एक और कर्तव्य है, उतना ही पवित्र, अपने प्रति मेरा कर्तव्य…मैं मानती हूँ कि सबसे पहले मैं मनुष्य हूँ…उतनी ही जितने कि तुम हो या हर सूरत में मैं वह बनने की कोशिश करूँगी ही.”7

स्त्री मुक्ति आंदोलन का मुख्य लक्ष्य ही है कि स्त्री को भी एक इंसान के रूप में देखा जाए, उसमें एक इंसान की तरह अच्छाईयाँ व बुराईयाँ भी हो सकती है. स्त्री मुक्ति आन्दोलन पितृसत्तात्मक व्यवस्था के परम्परागत ढाँचे को तोड़कर एक स्त्री को असफल होने का भी अधिकार देता है और पुनः प्रयास करने का भी.अपने व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह आन्दोलन ‘सामाजिक न्याय’ का भी आंदोलन है. नाओमी वुल्फ ने अपनी किताब ‘फायर विद फायर’ में लिखा है कि- “वृहद स्तर पर नारीवाद को सामाजिक न्याय के लिए एक अनिवार्य आंदोलन समझना चाहिए. इस स्तर पर नारीवादी होने का अर्थ होगा कि- स्त्री होने के कारण कोई मेरे रास्ते में बाधा न बने और किसी की जाति या स्त्री पुरुष होने के आधार पर कोई मतभेद न हो तथा स्त्रियों के पक्ष में काम करने का अर्थ यह नहीं कि हम उन्हें देवी का दर्जा दे या उन्हें पुरुषों से बेहतर या अलग समझें.”8 अंततः ऐतिहासिक परिवर्तनों की प्रक्रिया में स्त्री इतिहास का साथ बखूबी निभा रही है. इस प्रयास की दिशा सही है या गलत, वादों के नारों के बीच स्त्री अपना स्वरूप खो रही है या तलाश रही है इसका निर्णय काल अपने क्रम में स्वयं कर देगा लेकिन स्त्री अस्मिता के आन्दोलन स्त्री मुक्ति की दिशा में सार्थक है इसमें कोई दो राय नहीं है.



संदर्भ –
संपादकीय ‘खरी-खरी बात’ से, ‘युद्धरत आम आदमी’ संपा. रमणिका गुप्ता पूर्णांक 108, 2011
पृ. 9 निवेदिता मेनन .‘नारीवादी राजनीतिः संघर्ष एवं मुद्दे’ संपादक: साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता,
पृ. 141 कुमकुम राय,वही
पृ. 141 कुमकुम राय,वही
पृ. 16, ‘सामायिक मीमांसा’ संपा. विजय कुमार मिश्र:अंक 1, वर्ष 4, जनवरी-जून-2011
पृ. 15, वही
पृ. 20, जर्मेन ग्रीयर: ‘द  फीमेल यूनक’
पृ. 13, नाओमी वुल्क, ‘फायर विद  फायर’

जेएनयू बलात्कार और वामपंथ का अवसरवाद

 मुकेश कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) अकादमिक लिहाज से ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक माहौल की दृष्टि से भी देश का सर्वोत्कृष्ट शिक्षण संस्थान है। देश-दुनिया के ज्वलंत प्रश्नों- घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया व प्रतिवाद करता है, जेएनयू। यह लंबे समय से वामपंथी-प्रगतिशील विचारों व राजनीतिक व्यवहार की अग्रिम चौकी बना हुआ है। सवाल चाहे जेंडर इक्वलिटी व जस्टिस का हो या फिर सोशल जस्टिस का, लोकतंत्र-धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो या मानवाधिकार का, जेएनयू कम्युनिटी संवेदनशीलता-प्रतिबद्धता और वैचारिक-राजनीतिक दृष्टि का मानदंड रचता है।

शायद जेएनयू ही ऐसी जगह है, जहां G S C A S H ( जेंडर सेंसेटाइजेशन एंड कमिटी अगेंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट ) सबसे प्रभावी व सक्रिय है। लेकिन पिछले दिनों (20 अगस्त) को एक शोध-छात्रा के साथ भाकपा-माले के छात्र संगठन ‘आइसा’ के एक लीडिंग फिगर अनमोल रतन ने छात्रावास में बलात्कार किया। इस घटना और इसके बाद जेएनयूएसयू, जेएनयू में मौजूद विभिन्न संगठनों, महिला संगठनों सहित वामपंथी पार्टियों के रवैये ने बहुत सारे सवालों को सामने लाया है।

वामपंथी  छात्र ताराशंकर के फेसबुक वाल से –
“स्त्री द्वेष और यौन कुंठा लोगों में इतने गहरे धँसी है कि लैंगिक शोषण इस समाज में सर्वाधिक व्यापक अपराध है। बलात्कार कोई अचानक घटित घटना नहीं, बल्कि एक बहुत गहरे स्त्री द्वेषी सोच का परिणाम होता है। बलात्कार हम सबकी, पूरे समाज की सामूहिक विफलता का सूचक है। इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि जेंडर इश्यू एक ऐसा लिट्मस टेस्ट है, जिस पर बड़े-बड़े ‘प्रगतिशीलों’ की कलई खुल जाती है। प्रगतिशील राजनीति करना और उसे जिंदगी में उतारना दो अलग-अलग बातें हैं! जेंडर जस्टिस या सामाजिक न्याय की कोई भी लड़ाई इस दोमुहेपन  के साथ कतई नहीं लड़ी जा सकती है! बहुत जरूरी है कि जिंदगी की बुनियादी बातों के साथ जेंडर-सेंसिटाईजेशन शिक्षा, एक्टिविज़्म अथवा राजनीति के हर स्टार पर ताउम्र चलने वाला अनिवार्य प्रयास हो। बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहा हूँ जेएनयू में घटित बलात्कार की कथित घटना पर! दुख, गुस्सा और शर्मिंदगी तीनों एक साथ सहन करना मुश्किल हो रहा है।”

पूरे देश को याद है, 16 दिसंबर, 2012 को मुनिरिका के पास एक छात्रा के साथ बर्बर गैंगरेप के बाद जेएनयू कम्यूनिटी की प्रेरणादायी लड़ाई! हाँ, इस लड़ाई ने महिलाओं के सम्मान, अधिकार, बराबरी व आजादी के प्रश्नों पर विमर्श को नई ऊंचाई भी दी। जेंडर इश्यू पर देश की संवेदनशीलता व समझ को आगे ले जाने का काम किया। इस लड़ाई में आइसा की भूमिका भी काबिले तारीफ (!) रही और जेएनयू और आइसा से रिश्ता रखने वाली वर्तमान में भाकपा-माले की पॉलिट ब्यूरो मेंबर कविता कृष्णन महिलाओं की ‘बेखौफ आजादी’ की आवाज बनकर सामने आईं। लेकिन जब जेएनयू में ही आइसा के लीडिंग फिगर के जरिये एक शोध छात्रा के साथ बलात्कार का मामला सामने आया, तब क्या हुआ। कविता कृष्णन ने शायद 120 घंटे गुजर जाने के बाद फेसबुक पर एक पोस्ट डाला, जब उनकी चुप्पी पर सवाल उठने लगा। इस बीच उन्होंने कम-से कम एक दर्जन पोस्ट लिखे। खैर कविता कृष्णन और उनका महिला संगठन ‘ऐपवा’, जिस संगठन की वे  राष्ट्रीय सचिव भी हैं, सड़कों पर उतारने की हिम्मत नहीं दिखा पाया। जबकि आइसा और ऐपवा के साथ कविता कृष्णन ऐसे गंभीर मामले पर तुरंत प्रतिक्रिया के लिए जानी  जाती हैं। गंभीर इसलिए भी कि मामला जेएनयू जैसे कैंपस के भीतर का था और वह भी आइसा के लीडर की संलिप्तता थी। यों भी कविता फेसबुक और ट्विटर पर 24 घंटे में कई एक पोस्ट और ट्विट के लिए जानी जाती हैं। भाकपा-माले के पूर्व महासचिव और कम्युनिस्ट सिद्धांतकार विनोद मिश्र के शब्दों में- “कम्युनिस्ट नारी संगठन का विशेष कर्त्तव्य है नारियों की अपनी भूमिका को बढ़ाना। कारण, अंततः नारी को अपनी मुक्ति खुद हासिल करनी होगी। यहां तक कि हमारी पार्टी में भी महिला कार्यकर्त्ताओं की मर्यादा- हानि की घटनाएं घटित होती हैं। कुछ-कुछ पुरुष कार्यकर्त्ताओं द्वारा आम महिलाओं के प्रति बहुत ही गलत आचरणों की रिपोर्ट आती हैं। हम पार्टी संस्थाओं की ओर से अवश्य ही इन मामलों में कदम उठाते हैं। फिर भी मुझे लगता है कि इन मामलों में कम्यूनिस्ट नारी संगठनों को पार्टी पर निगरानी रखने और दबाव पैदा करने की भूमिका का भी पालन करना चाहिए।”विनोद मिश्र के ही शब्दों में- “…नारी मुक्ति संघर्ष की अपनी विशेषताएं हैं, अपनी स्वायत्तता है।”

हाँ, आइसा ने 21 अगस्त को बयान जारी कर कहा कि, “…अनमोल रतन पर लैंगिक उत्पीड़न करने का अपराधिक आरोप है, इस मामले को पूरी गंभीरता से लेते हुए आइसा उन्हें तत्काल प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त करती है। आइसा इस पूरे मामले में दृढ़ता से लैंगिक बराबरी और न्याय के उसूल पर खड़ी है। जब यौन हिंसा का आरोपी हमारा ही एक कार्यकर्त्ता हो, तो यह बेहद जरूरी हो जाता है कि हम गंभीर आत्म आलोचना करें। साथ ही साथ यह बात हमसे संगठन के बाहर और भीतर, सभी जगहों पर महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बनाने की बेहद अनिवार्य लड़ाई को और तेज करने की मांग करती है। यौन हिंसा के खिलाफ लड़ाई दूर-दराज के अंजाने उत्पीड़कों तक नहीं रुकती है। जब आरोपी अपने ही बीच से हो- चाहे वह अपने परिवार वाले हों, अपने मित्र हों, या अपने संगठन के सदस्य हों, तब इसके खिलाफ एक निर्मम लड़ाई लड़ना हमारे समक्ष एक असली और बेहद महत्वपूर्ण चुनौती बन जाता है। अपने सदस्यों के मामले में भी आइसा जेंडर-न्याय के सवाल पर दृढ़ता से खड़ी है। हम शिकायतकर्ता के साथ मजबूती से खड़े हैं और न्याय की उनकी लड़ाई में उन्हें हर संभव सहयोग करेंगे। न्याय के लिए पुलिस तत्काल जरूरी कदम उठाए। आरोपी के खिलाफ विश्वविद्यालय तत्काल अनुशासनात्मक कदम उठाये और उत्पीड़ित को हर संभव मदद दे।”



लेकिन आइसा के बयान के स्पिरिट के साथ उसका एक्शन सामने नहीं आता है
। इस तरह के मामले पर तुरंत प्रतिक्रिया देने व प्रतिवाद में उतारने वाला संगठन 25 अगस्त को सड़कों पर उतरा। इस बीच संगठन के नेता उक्त बयान की कॉपी को दिखाकर काम चलाते रहे। जेएनयू के इस मसले पर बिहार में केवल तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में छात्रों के एक समूह ने प्रतिवाद किया। इस समूह के प्रमुख नेता व आइसा के पूर्व छात्र नेता  अंजनी का कहना है कि “क्या आरोपी किसी अन्य संगठन या फिर कोई और छात्र होता तो आइसा का यही रवैया रहता?  इस मामले में आइसा भी दिल्ली पुलिस और जेएनयू प्रशासन की तरह एक्शन में सुस्ती दिखाता है। साफ है इस मामले ने संगठन के भीतर पितृसत्ता की मजबूत जकड़न को सामने लाया है। जिसकी अभिव्यक्ति घटना और उसके बाद के रवैये में स्पष्ट रूप से दिखता है। आखिर क्यों इस तरह के तत्व संगठन में लीडिंग फिगर बन जाते हैं? मतलब साफ है संगठन अवसरवादी तौर-तरीके से बनाया-चलाया जा रहा है। इस तरह के संकट के साथ आप संघियों को रोक नहीं सकते हैं, बल्कि उसे आगे बढ्ने- हमला करने का मौका ही देते हैं।” अंजनी का कहना है कि “इस मामले पर अगर आइसा द्वारा तुरंत पहलकदमी ली जाती तो संगठन के भीतर और बाहर अच्छा संदेश जाता! यह कदम संगठन को जेंडर इश्यू पर संवेदनशील बनाने की लड़ाई की दिशा में ले जाता और व्यवहार में जेंडर-न्याय के सवाल पर दृढ़ता सामने लाता। लेकिन 25 अगस्त को प्रतिवाद में देर से आइसा के उतारने ने संगठन के संवेदनशीलता व प्रतिबद्धता से उपजे आवेग की  बजाय चौतरफा आलोचना के दबाव को ही सामने लाया।” अंजनी इस पूरे मामले पर नारीवादी व वामपंथी महिला संगठनों की चुप्पी को भी आश्चर्यजनक बताते हुए इन संगठनों को भी कहीं न कहीं अवसरवाद व पितृसत्ता के दलदल में फंसा हुआ मानते हैं।

बलात्कार की इस घटना और बाद की पूरी स्थिति पर भाकपा-माले के बिहार राज्य कमिटी से पूर्व में जुड़े रहे रिंकु कहते हैं कि ” खासतौर पर आइसा सवालों के घेरे में है। बलात्कार तो पितृसत्तात्मक प्रतिक्रिया की चरम अभिव्यक्ति है। लेकिन क्या संभव है कि किसी व्यक्ति के भीतर लीडिंग फिगर बनने की पूरी प्रक्रिया में पितृसत्ता की प्रवृत्तियाँ नहीं दिखाई पड़ रही हों? एकाएक उस प्रवृत्ति की चरम अभिव्यक्ति ही सामने आती है, यह संभव नहीं है! मतलब साफ है आप जेंडर इश्यू पर संवेदनशील व गंभीर नहीं हैं! हाँ, इस मामले में भी यह बात सामने आई है कि प्रगतिशील राजनीति करने और उसे जीने में फर्क होता है! और यह फर्क तब संगठन में गहराई से जड़ें जमाने लगता है, जब आप किसी मसले पर संघर्ष व राजनीति करते हुए संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और चेतना के निर्माण के कार्यभार को भीतर से बाहर तक पीछे छोड़ देते हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी मसला आपके लिए महज राजनीतिक हथकंडा होता है! आप अवसरवाद के दलदल में उतारने की ओर बढ़ चले हैं! घटना के बाद भी आइसा और कविता कृष्णन जैसी नेनतृ के रवैये ने इसे और भी साफ कर दिया है।”

इस मामले में आइसा पर सवाल दागने वालों को संघियों के पक्ष में खड़ा होने के  साथ ही जेएनयू छात्र संघ चुनाव में संघी ब्रिगेड को मदद पहुंचाने और जेएनयू पर संघी हमले को मजबूत बनाने का आरोप झेलना पड़ रहा है। वामपंथी-प्रगतिशील समुदाय के एक हिस्से से दबे स्वर में यह भी सुनाई पड़ रहा है कि इस मसले पर चुप्पी साध ली जाय। क्योंकि इसका फाइदा संघ ब्रिगेड ले लेगा। ऐसे लोग वर्तमान परिस्थिति, जेएनयू पर जारी संघी हमले और जेएनयू छात्र संघ चुनाव को ध्यान में रखने की बात कर रहे हैं। हाँ, इस मामले में वामपंथी-प्रगतिशील समुदाय के कमोबेश चुप्पी और जेएनयू कम्यूनिटी के रवैये से भी यह साफ है।

घटना के पांचवे दिन एपवा नेतृ कविता कृष्णन का पोस्ट

रिंकु कहते हैं कि ” सबसे पहले तो इस मसले से संघ ब्रिगेड का कोई लेना-देना नहीं है। वामपंथी-प्रगतिशील तबके पर उठने वाले किसी भी सवाल को दबाने के लिए सवाल खड़ा करने वाले को संघी ब्रिगेड के साथ खड़ा कर देना संघी औज़ार का इस्तेमाल ही है। यह कहीं से भी लोकतांत्रिक आंदोलन के हित में नहीं है। यह पुराना तर्क ही है  जो वामपंथी आंदोलन में बड़े भाई सीपीएम-सीपीआई सिंगूर-नंदीग्राम जैसे मामलों में वे -लोकतांत्रिक सर्किल से सवाल उठाने पर गढ़ते रहे हैं। जहां तक सवाल है कि जेएनयू छात्र संघ चुनाव है और बलात्कार मामले पर सवाल उठाने से जेएनयू में संघी ब्रिगेड को फायदा मिलेगा, इसलिए चुप रहा जाए! तो क्या यह अवसरवाद नहीं है? क्या संघी ब्रिगेड से लड़ाई में जेएनयू बलात्कार मामले को दबा देंगे? इस रास्ते से तो जेंडर संवेदनशीलता के निर्माण की लड़ाई आगे नहीं बढ़ेगी! जैसा कि पता चल रहा है लेफ्ट यूनिटी द्वारा जेएनयू चुनाव में इस मसले को दबा दिया गया है। चुनावी सफलता की जिद जेंडर संवेदनशीलता को आगे बढ़ाने, बलात्कार मामले पर सार्थक चर्चा और लोकतांत्रिक चेतना को आगे बढ़ाने की जरूरत की कुर्बानी ले रही है। केवल जेएनयू छात्र संघ पर किसी तरीके से कब्जा कर ही संघी ब्रिगेड के खिलाफ जेएनयू को बचाने की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है! पिछले दौर में जेएनयू पर संघी हमले का निर्णायक प्रतिरोध केवल छात्र संघ में लेफ्ट की मौजूदगी और कुछ करिश्माई नेताओं के जरिये नहीं हुआ है, निर्णायक प्रतिरोध महज कुछ संगठनों के बल पर नहीं खड़ा हुआ है। बल्कि निर्णायक प्रतिरोध जेएनयू कम्यूनिटी के लोकतांत्रिक चेतना के बल पर सामने आया है। सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक है- जेएनयू कम्युनिटी की लोकतांत्रिक चेतना! इस चेतना को विकसित करने के बजाय कमजोर कर संघी ब्रिगेड के खिलाफ न ही जेएनयू के भीतर और न ही बाहर निर्णायक लड़ाई हो सकती है। बेशक कुछ संगठनों के लिए चुनावी जीत ही केवल महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन जेएनयू में छात्र- छात्राएं संघी ब्रिगेड को भी चोट देना जारी रखेंगे और उन्हें सिंगूर-नंदीग्राम के साथ तापसी मलिक भी याद रहेंगी! वे शोध-छात्रा के साथ हुए बलात्कार को भी नहीं भूलेंगे और न ही जेंडर संवेदनशीलता को आगे ले जाने व पितृसत्ता को भी चोट देना छोड़ेंगे!”

मुकेश कुमार गांधी विचार में पीएचडी के बाद आजकल पोस्ट पीएचडी के लिए शोध कर रहे हैं.

एबीवीपी-सदस्य की आत्मग्लानि:पत्र से खोला राज, कहा रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या थी साजिश

शिवसाईं राम / अनुवादक :पूजा सिंह 


हैदराबाद  विश्वविद्यालय में एबीवीपी के सदस्य रहे शिवसाईं राम बता रहे है कैसे हुई थी रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या की साजिश.पत्र लिख कर  एबीवीपी की सदस्यत़ा पर जताया खेद. पढ़े  शिव साईं राम का पत्र 


अतीत की एक स्मृति अब भी मेरा पीछा करती है. वह याद गणेश चतुर्थी से जुड़ी हुई है. वर्ष 2013 की बात है, उस वक्त मैं एबीवीपी का सदस्य था. इसे वाकये से मैं, रोहित और उसकी संस्थानिक हत्या में शामिल एक अन्य व्यक्ति (सुशील कुमार) तीनों जुड़े हुए हैं. गणेश चतुर्थी के दिन फेसबुक पर हैदराबाद विश्वविद्यालय के समूहों में एक तीखी बहस छिड़ी. यह बहस इस उत्सव और दक्षिणपंथियों द्वारा इसके नाम पर छद्म विज्ञान को बढ़ावा देने पर केंद्रित थी. चूंकि मैं कट्टर धार्मिक था इसलिए मैंने इस समारोह के बचाव में पुरजोर तरीके से प्रयास किया. कई लोग ऐसे थे जो मेरा विरोध कर रहे थे और रोहित उनमें से एक था.

हमारा समूह (पढि़ए गणेश उत्सव समिति क्योंकि एबीवीपी की कार्यशैली रहस्यमय है) रोहित और अन्य लोगों की नास्तिकता से परिचित था. बहस में हम काफी पिछड़ चुके थे क्योंकि समारोह के खिलाफ बोलने वाले बहुत बड़ी तादाद में थे. यही वह समय था जब एबीवीपी ने वह किया जिसमें उसे महारत हासिल है. यानी किसी एक को निशाना बनाना. इसे अंग्रेजी में ‘विच हंटिंग’ कहते हैं.मुझे संगठन में आए दो महीने ही हुए थे और मैं अपेक्षाकृत नया था. मुझे पता नहीं था कि बंद दरवाजों के पीछे यह कैसे काम करता है. तय किया गया कि बहस में हम पर भारी पड़ रहे लोगों को निशाना बनाने के लिए उन पर ईश निंदा का मामला दर्ज कराय जाएगा.

मुझे कहा या कि मैं उनकी फेसबुक पोस्ट और कमेंट के स्क्रीनशॉट जुटाऊं और उन्हें कुछ  ऐसे लोगों को मेल कर दूं जो विश्वविद्यालय के छात्र नहीं थे. उनमें से एक सुशील का भाई था. मैंने ऐसा ही किया और सारे स्क्रीनशॉट मेल कर दिए. आपस में एक गोपनीय बैठक करने के बाद उन लोंगों ने तय किया कि वे केवल रोहित को निशाना बनाएंगे. उन्होंने तय किया कि रोहित की टाइमलाइन पर पोस्ट की गई एक कविता को शिकायत का आधार बनाया जाएगा. रोहित द्वारा पोस्ट की गई यह कविता क्रांतिकारी तेलुगू कवि श्री श्री ने हिंदू देवता गणेश पर लिखी थी. एक और ऐसी पोस्ट थी जिसमें रोहित ने चुटकी लेते हुए पूछा था कि गणेश चतुर्थी के तर्ज पर सुपरमैन और स्पाइडरमैन का जन्मदिन क्यों नहीं मनाया जाता है?

मामला दर्ज हुआ और रोहित को गिरफ्तार कर लिया गया. जहां तक मुझे याद है, उसे दो दिन तक एक स्थानीय पुलिस थाने में रखा गया. ‘रोहित को सबक सिखाने’ में मिली इस कामयाबी के बाद एबीवीपी के कार्यकर्ताओं में खुशी व्याप्त थी. बाद में रोहित को रिहा कर दिया गया (हालांकि मेरे पास मामले का पूरा ब्योरा नहीं) और उसने एक फेसबुक पोस्ट लिखकर बताया कि किस तरह उसकी आवाज को दबाने का प्रयास किया गया. ऐसी अनगिनत घटनाएं हैं, जिनमें बतौर एबीवीपी सदस्य शामिल होने को लेकर मैं शर्मिंदा हूं. परंतु यह घटना उनमें से सबसे अधिक परेशान करती है क्योंकि मैं रोहित का शिकार करने की उस कोशिश में सीधा हिस्सेदार था. यह इकलौती घटना नहीं है जहां रोहित को अलग करके निशाना बनाया गया हो.

संगठन के भीतर हमारे वरिष्ठ साथियों के मन में रोहित की राजनैतिक पक्षधरता तथा उसके निर्भीक और मुखर रुख को लेकर जबरदस्त नफरत व्याप्त थी. यही वजह थी कि उसे ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों ही जगहों पर लगातार किनारे लगाया गया. रोहित अब हमारे बीच नहीं है, इसलिए क्षमायाचना एक मुश्किल काम है लेकिन इस मौके पर उस पूरी नफरत को सार्वजनिक करके मुझे राहत मिल रही है. क्योंकि दक्षिणपंथी समूहों से जुड़ाव और उस दौरान अपनी गतिविधियों को लेकर मेरे भीतर गहन अपराधबोध है.

मैं अपने दावों के समर्थन में यहां तमाम स्क्रीनशॉट साथ दे रहा हूं. आज जो लोग इस बात से इनकार कर रहे हैं कि हिंदुत्ववादी ताकतों ने रोहित को आत्महत्या की कगार पर पहुंचाया, उनको शायद पता नहीं होगा कि उसे संघ परिवार की इस जातिवादी-सांप्रदायिक-फासीवादी राजनीति के विरुद्ध पेशकदमी के लिए किस यंत्रणा और पीड़ा से गुजरना पड़ा. ‘सांस्थानिक हत्या’ को ऐसे ही अंजाम दिया जाता है. राज्य, पुलिस और हिंदूवादी समूह दलितों, आदिवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों जैसे वंचित वर्गों को ऐसे ही निशाना बनाते हैं.  इन समूहों की हरकतों को सामने लाने और इनकी नफरत की राजनीति के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए अभी भी बहुत देर नहीं हुई है.

पितृसत्ता पर सबसे पहला मुक्का ऑप्रेस्ड कम्युनिटी की महिलाओं ने मारा है: सोनपिम्प्ले राहुल पुनाराम

जेएनयू छात्र संघ चुनाव में ‘बापसा’ (बिरसा-फूले-अम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन) सोनपिम्प्ले राहुल पुनाराम के नेतृत्व में लीड लेता दिख रहा है. समाज के हाशिये से  आने वाले प्रखर व्यक्तिव के साथ लोकप्रिय छात्र नेता के रूप में उभरे राहुल के एक भाषण पर आधारित चंद्रसेन की रपट 

जाति-जेंडर तथा वर्ग पर आधारित शोषण भारतीय या यूँ कहें कि पूरे दक्षिण-एशियाई मुल्कों की खास विशेषता रही है .मजेदार बात तो यह है कि ऐतिहासिक रूप से न तो बुद्धिजीवियों  ने और न ही किसी तथाकथित राष्ट्रीय नेता ने इसे चिन्हित किया.भारतीय समाज में पहली बार फूले दम्पति ने अपनी विचारधारा, आंदोलन और व्यक्तिगत जीवन में इन सवालों को सबके सामने लाए  आगे चलकर आंबेडकर के आंदालनों, लेखनी, और हिन्दू कोडबिल जैसे पालिसी लेवल के मसविदों ने इन मुद्दों  को और गंभीरता तथा मुखरता से आगे बढ़ाया. फूले-आंबेडकरकरवादी  विचारधारा से लैश होकर ‘दलित नारीवाद’ तक बहस आज पहुँच चुकी है .आज हम इस बात को आसानी से समझ सकतें हैं कि किस तरह से दलित स्त्रियां तीहरे शोषण-जातीय, वर्गीय, और मर्दवाद का शिकार हैं.

मतदान करती छात्राएं

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय हमेशा से ही आरएसएस और शासक वर्ग के आंख की किरकिरी रहा है .कुछ दिनों पहले राष्ट्रवाद और देशद्रोह के नाम से इस संस्था को ‘शट डाउन’ मुहिम का शिकार होना पड़ा. लेकिन समानता और जेंडर जस्टिस की राजनीति, उसके मूल्यों को जीने वाले इस कैंपस में रेप की घटना ने फिर से सबको इस संस्था की ओर उगली उठाने को मौका दे दिया है.और जब आरोपी खुद वामपंथ से जुड़ा हो तो मामला और भी पेचीदा हो जाता है .पूरा जेनयू आज पीड़िता के साथ है और यही इस संस्था की खूबी भी रही है .
इस पूरे माहौल में छात्र संघ चुनाव हो रहें हैं .९ सितंबर को दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ ही जेनयू का भी चुनाव है.एक तरफ जातिवादी-फासिस्ट ताकतें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के नेतृत्व में अपने एजेंडे के साथ हैं . वहीँ दूसरी तरफ लेफ्ट फ्रंट अपने आधी -अधूरी यूनिटी के साथ .चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है लेकिन ये दोनों पार्टियां लगभग एक दूसरे को सामने रख कर चुनाव लड़ रहीं हैं .

हमेशा की तरह इस बार भी  कैंपस में राईट-लेफ्ट की बाइनरी में चुनाव लड़ने की कोशिश की जा रही रही है .क्या हर मुद्दे को बाइनरी में देखा जाना सही है ? या यह कोई साजिश है. इस बाइनरी को ध्वस्त करने और ‘ऑप्रेस्ड  यूनिटी’ के नारे के साथ ‘बापसा’ (बिरसा-फूले-अम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन) संगठन सोनपिम्प्ले राहुल पुनाराम के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है. एक साल पुराने इस संगठन ने अपने शुभचिंतकों और आम छात्रों के साथ एक सभा की .उस सभा में उमड़ी भीड़ से उत्साहित ‘बापसा ‘के लोग अपनी बात लोगों के बीच ले जाने में सफल रहे .यदि हम राहुल के भाषण को ध्यान से सुनें  तो पाते हैं कि इस संगठन की राजनीति काफी व्यापक है .वह अपने भाषण में इस बात पर जोर देता है की दुनिया के सारे ऑप्रेस्ड  लोगों के अनुभव को हम सुनेगे क्योंकि उनके अनुभव हमेशा से शासक वर्ग से अलग रहें हैं.

इन्डियन एक्सप्रेस में राहुल



अध्यक्षयीय प्रत्याशी, राहुल इस अंदाज में खुद के अनुभवों को जनता के सामने बाटते नजर आए. उत्तर नागपुर के झोपड़पट्टी  में पले–बढ़े राहुल का जीवन संघर्षों का रहा है .माँ ईंट-भट्टे में दिहाड़ी मजदूर और पिता रिक्शा-पुलर रहे हैं.उनके अनुसार ‘जब से मैंने होश संभाला है पिता को बीमारी के कारण बिस्तर पर ही पाया है.उन्होंने  मुझे बताया कि  ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं होता है.तथा उन्होंने मेरा नाम गौतम बुद्ध के पुत्र ‘राहुल’ पर रखा’ पितृसत्तात्म समाज की सच्चाई को स्वीकार करते हुए राहुल कहतें है कि हमारा समाज हमें कितना मर्दवादी बनाता है. हमें महिलाओं के अनुभव को तरजीह देनी पड़ेगी.महिलाओं के हर तरह के शोषण को हमें स्वीकार करना होगा. जेंडर के सवाल को व्यापकता में समझाते हुए राहुल अपील करतें हैं कि हमें ‘मेल’ और ‘फीमेल’ की बाइनरी को भी तोड़ना है .ट्रांसजेंडर, गे-लेस्बियन के अधिकारों की लड़ाई को और तेज करना है. लेकिन साथ ही साथ यह भी जोड़ा कि ‘इस पितृसत्ता पर पहला ऑप्रेस्ड -कम्युनिटी की महिलाओं ने ही मारा है’


अपने संगठन के वैचारिक दायरे को दुनिया के सारे ऑप्रेस्ड -समुदाय के साथ जोड़ते हुए  नागपुर के इस नौजवान ने सभी दमित तबकों को, पहचानों को एक मंच पर आने का आह्वान दिया .‘जे एन यू  और देश में रोहित वेमुला के आंदोलन और ऊना  तक जो एकता दलितों, आदिवासियों,पिछड़ों, मुसलमानो और महिलाओं की बनी है उससे शासक-वर्ग डर गया है .इस एकता को इस संस्था में भी बनाना जरूरी है, जिससे राईट विंग के ब्राह्मणवादी फासिस्म और लेफ्ट की  अवसरवादिता को ख़तम किया जा सके’नार्थ-ईस्ट में हो रहे दमन, नस्लीय  भेदभाव की भी जोरदार भर्त्षणा की.हाल ही में जेनयू प्रसाशन द्वारा  एक डोसियर पास किया गया था. जिसमे कहा गया कि दलित-आदिवासी, मुसलमान, नार्थ-ईस्ट के लोग एंटी-नेशनल हैं.डोसियर में इन तबके की महिलाओं पर सेक्स रैकेट चलने का जो महिला-विरोधी और सेक्सिस्ट रिमार्क दिया गया उसकी खिलाफत की तथा ऐसे प्रोफेसरों को कड़ा दंड दिलाने का वादा भी किया. कश्मीर जैसे ज्वलंत मुद्दे पर भी अपना स्पष्ट मत रखने से राहुल नहीं चूके. राहुल के शब्दों में ‘हम बाबासाहब की उस बात पर यकीन रखते हैं कि जल्द से जल्द कश्मीर में प्लेबिसाइट होना चाहिए.’

राहुल ने विश्वविद्यालय में लंबे दौर से काबिज रहे मार्क्सवादी संगठनों की जोरदार खिंचाई भी की .‘आरक्षण से लेकर, हॉस्टल, स्वास्थ्य-सुविधाएँ, गैर-अंग्रेजी माध्यम से आए छात्रों के साथ भेदभाव, वाइवा में वंचित समुदाय के साथ भेदभाव पर लेफ्ट ने सिर्फ जुमले-बाजी की है.’ नारी-स्वतंत्रता और प्रतिनिधित्व के सवाल पर लेफ्ट एक्टिविस्ट कविता कृष्णन पर भी तंज कसा कि ‘ऐसी कौन सी बात है की उनकी पार्टी में झंडे ढ़ोने वाली, रणवीर सेना के हांथों शिकार होने वाली किसी मुसहर लड़की को वह स्थान नहीं मिला, जहाँ आज उनकी तथाकथित नेता है.’ऐसी वो कौन सी बात है जो कविता कृष्णन बोल सकती है तथा एक मुसहर लड़की नहीं बोल सकती ?’ सोनपिम्प्ले अपने वक्तव्य में कहते हैं कि ‘मैं  मार्क्स को इसलिए पसंद करता हूँ क्योंकि मार्क्स ने एक विश्लेषण दिया है कि कैसे दुनिया के शासक वचिंत समुदाय के संघर्षों को तोड़-तोड़ कर उनकी एकता को ख़तम कर दिया है .मैं ग्राम्सी को इसलिए पसंद करता हूँ क्योंकि ग्राम्सी ने बताया की ‘ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल’ कौन होते हैं.’

बापसा पैनल

गुलामी की दासता से पीड़ित रहे एफ्रो-अमेरिकन क्रांतिकारी मैल्कम एक्स को याद करते हुए इस समाजशास्त्र  के स्कालर ने कहा कि ‘जब तक पीड़ित अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ेंगे उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकती.’ डॉ आंबेडकर और ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ को उदृत करते हुए बापसा के इस अध्यक्षीय प्रत्याशी ने कहा की ‘ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद हमारे दो शत्रु हैं.’ देश में बढ़ते  कारपोरेटीकरण और नवउदारीकरण की नीतियों की ओर उनका स्पष्ट इशारा था.अंत में अपने तीन अन्य प्रत्याशियों-बंशीधर दीप (वाइस प्रेसीडेंट), पल्लिकोण्डा मनीकांता (जनरल सेक्रेटरी), आरती रानी प्रजापति (जॉइंट सेक्रेटरी) का समर्थन मांगते  हुए ओप्रेसड यूनिटी को बनाए रखने की अपील की.


 चंद्रसेन ( शोध छात्र, अंतररा ष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, जेनयू नई  दिल्ली, सम्पर्क : 9540749466 )

‘निजी’ आधार पर डा. आंबेडकर की ‘राजनीतिक छवि’ का स्त्रीवादी (?) नकार : दूसरी क़िस्त

शर्मिला रेगे की किताब  ‘अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की’की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था. 


राष्ट्रवादी कल्पना की वह ऐतिहासिक परम्परा अब भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है,  जिसने स्त्री अधिकारों तथा वंचित/अल्पसंख्यक तबकों के अधिकारों के बीच द्विधारा पैदा की थी. दलित-बहुजन पुरूष बुद्विजीवी, जैसे कांचा इलैया ने जहां दलित-बहुजन पितृसत्ता को पूर्ण लोकतांत्रिक मानकर उसका कद ऊंचा करने की कोशिश की, वहीं गैर दलित स्त्रीवादियों ने निजी व राजनीतिक व्यवहारों में दलित पितृसत्ता की सवर्ण पितृसत्ता से पूर्ण समानता को खोल कर दिखाने का प्रयास किया. दलित स्त्रियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और सवर्ण स्त्रियों की इसमें बढ़ती भागीदारी की कहानियां या तो वैश्विक स्तर पर मंचासीन हुई जैसे CEWAW (कन्वेशन आॅन द इलीमिनेशन आॅफ आॅल फार्मस आॅफ डिसक्रिमिनेशन अगेन्स्ट वीमेन) या फिर दलित स्त्रियों के स्थानीय मुद्दे तक सिमट कर रह गई. NFDW (नेशनल कैम्पेन आॅन दलित ह्यूमन राइट्स) की अपने नाम को सार्थक करती रिपोर्ट ‘दलित वीमने स्पीक आउट’ स्थापित करती है कि दलित स्त्रियों के लिये दैहिक उत्पीड़न को उन पर हो रहे अन्य उत्पीड़नों, जैसे आर्थिक, सिविल व सामाजिक, से अलग करके सिर्फ स्त्री-उत्पीड़न मान लेना असंभव है. जाति और जेण्डर के बीच गुटबंदी पर पर्याप्त चर्चा के अभाव में ही यह हो सका कि 2006 के खैरलांजी मामले में दलित स्त्रियों के खिलाफ हिंसा को या तो ‘दैहिक उत्पीड़न’ कहा गया या ‘जाति उत्पीड़न’. अर्थात हमारे सामने चुनौती यह है कि  आंबेडकर की सैद्वांतिक परम्परा को पुनर्जीवित  किया जाये जो जाति और जेण्डर को आपस में गुंथा  हुआ देखती है और समानता/भिन्नता के द्वैतों से आगे की बात करती है.


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डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर

 पितृसत्ता शब्द को बहुवचन में प्रयोग करने से काम नहीं बनेगा. असल लक्ष्य यह है कि उन तरीकों की पहचान की जाये, जिनके कारण श्रेणीगत जाति असमानताओं के बीच पितृसत्तात्मक सम्बन्धों के चलते एक वर्ग के रूप में स्त्री को किस तरह भिन्न-भिन्न शक्लों में देखा गया है. यहां आंबेडकर को स्त्रीवादी की तरह देखने से हम उनके इतिहास को समझने के भिन्न नजरिये से पुनः परिचय कर सकते हैं कि किस तरह ब्राह्मणी  पितृसत्ता बढ़ती प्रभुता और घटती अवमानना की श्रेणीबद्धता के पैमाने पर जातियों के बीच एक जैसे, एक दूसरे को काटने वाले, पृथक तथा एक दूसरे पर निर्भर अंतरों को गढ़ती और प्रचलित करती है. आंबेडकर को पहचानने के इस तरीके से एक मूल ढांचा तैयार किया जा सकता है,  जिसके द्वारा स्त्रीवादी तथा जाति विरोधी/दलित समुदााय में मुक्तिवादी राजनीति के लक्ष्य के लिये गठबंधन संभव हो सकता है- अकादमिया के भीतर और बाहर भी.1980 के दशक के आखिरी वर्षों में भारत में स्त्रीवादी सिद्वांतों और राजनीतिक आंदोलनों के बीच समन्वय की शुरूआत हुई. इसे बंटवारे के इतिहास के भिन्न पाठ्यान्तरों के सामने आने  से समझा जा सकता है और 1984 के सिख-विरोधी दंगों के बीच स्त्रीवादियों द्वारा प्रेरित राहत कार्यों, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उठी राष्ट्र/राष्ट्रवाद पर बहस से और 2002 के गुजरात दंगों से भी.

1990 के दशक में मण्डल और दलित स्त्रीवाद के उभार के बाद जाति व जेण्डर के इतिहास को स्त्रीवाद के उभार के बाद जाति व जेण्डर के इतिहास से आगे पुनर्लेखन की भी हम अपेक्षा रख सकते हैं. जैसा कि सामाजिक इतिहासविज्ञ जानकी नायर की स्त्रीवाद व इतिहास के बीच जटिल रिश्तों की पड़ताल में दिखाई देता है, जाति को राष्ट्र की धारणा को तोड़ने वाली चीज मानने वाला मुख्यधारा का ज्ञान भण्डार या तो जेण्डर को अब भी पूरी तरह नजरअंदाज कर रहा है,  या फिर उसकी और मात्र संकेत भर करता है.मण्डल मामले के बाद उमा चक्रवर्ती और वी. गीता जैसी स्त्रीवादी विद्वानों ने जाति-इतिहासों के जेण्डरीकरण और जेण्डर के जातिकरण किये जाने की अनिवार्यता को महसूस किया, जबकि दलित स्त्रीवादी विद्वान अभिनय रमेश ने ब्राह्मणी पुलिसिंग के ढांचे व तरीकों की जांच पड़ताल के जरिये परिस्थितियों को समझने की सीमाओं की ओर इशारा किया. स्त्रीवाद द्वारा अपनाई जाने वाली शोध की मुख्य प्रणाली और समालोचना के लिये इसमें कौन से सबक निहित है? दूसरे शब्दों में, जाति के प्रश्न पर ये स्त्रीवादी व्याख्यायें क्या हिंसा, रति या श्रम के स्त्री-अध्ययन में मान्य अर्थों को चुनौती दे पाने में सफल हो सकी? उत्तर हां और न दोनों है. साथ ही जाति, वर्ग और जेण्डर की इन परस्पर काटती अवधारणाओं को सामने लाना इस तरह मान्य हो गया,  जैसे यह स्वयं आगे बढ़ने के तरीकों को जानने के लिये मार्गदर्शक का कार्य करेगा.

सच यह है कि हम अब भी ब्राह्मणी पितृसत्ता के विभिन्न ऐतिहासिक व सांस्कृतिक पक्षों पर बहस में लगे रहना चाहते हैं. चर्चा सत्रों  में जहां कुछ स्त्रीवादी विद्वान इस धारणा को अतिशयोक्ति मान कर अस्वीकार कर देते हैं वहीं कुछ अन्य ‘ब्राह्मणी पितृसत्ता’ के रूप में इसकी गलत पहचान कर लेते हैं और प्रश्न उठाते हैं कि ‘फिर दलित पितृसत्ता का क्या?’ स्त्री अध्ययन में अवधारणाओं के बहुलतावाद का मतलब बहस का खत्म हो जाना तथा ‘शांतिपूर्ण सह अस्तित्व’ बन गया है. ‘जेण्डर कर्मियों’ के लिये जाति चयन का विषय बन गयी है-वे जो ‘जाति कर्मी’ हैं और वे जो नहीं है.जाति के मामले पर स्त्री अध्ययन में इस तरह गहरी दो-फाड़ की फांक  तथा ‘जाति, वर्ग व जेण्डर’ के मंत्र का सतही प्रयोग इन पाठ्यक्रमों में मूलभूत परिवर्तनों की मांग करते हैं. मेरा सुझाव है कि इन परिवर्तनों के लिये हमें नये स्रोतों की और ढूँढना चाहिए, आंबेडकर  को उनके अपने और हमारे वक्तों में समझने के तरीके ढूंढ़ने चाहिए और उनके ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर कुछ लेखों को स्त्रीवादी गौरव-लेखों की तरह पेश किया जाना चाहिए. हालांकि ये लेख बहस से परे नहीं माने जाने चाहिए. अम्बेडकर के लेखन को उत्तम स्त्रीवादी लेखन की तरह देखने का कारण न सिर्फ उनकी लेखकीय प्रतिभा है, बल्कि तत्कालीन व्याख्यागत समझौतों से उत्पन्न हुई संभवानायें भी हैं.

1990 की राजनीति, जिसने परिभाषित किया कि जाति पर दावा करना क्यों जातिवाद नहीं है, ने भारतीय लोकतंत्र की जड़े गहरी की है. अपने अधिक से अधिक नागरिकों की भागीदारी चाहने वाले लोकतंत्र की ओर बढ़ते कदम ये मांग करते हैं कि ज्ञान का भी लोकतंत्रीकरण हो, यानी  स्त्री अध्ययन पाठ्यक्रमों में वंचितों को ले आने मात्र से ज्यादा कुछ करना होगा. इसके लिये अब तक दुविधाजनक माने जाने वाले, विविध व सूचना के उन अपारम्परिक स्रोतों में से सच को बाहर खींच निकालना होगा जो समाज, संस्थाओं या ज्ञान-विज्ञान  के किसी भी क्षेत्र में हो सकते हैं. इस विषय में मेरी दलील यह है कि संकलित रचनायें जैसे गीत तथा वे पुस्तिकायें,  जो महाराष्ट्र में  आंबेडकरी  पचांग से प्रभावित चेतना बिरादरी में वितरित होते हैं., ये दर्शाते हैं कि आंबेडकर की स्त्रीवादी छवि अकादमिक बहसों-चर्चाओं से बाहर अपना एक लंबा और समृद्व इतिहास रखती है. यह लेख उन्हीं पुस्तिकाओं और गीतों द्वारा उत्पन्न एक समृद्व संवाद की रूपरेखा खींचने का एक प्रयास है.हालांकि इन स्रोतों की ओर मुड़ने से पहले  आंबेडकर के स्त्रीवाद को पढ़ने के लिये थोड़ा  आंबेडकर को भी खंगालना होगा. ‘निजी’ बनाम ‘राजनीतिक’ की उनकी दो अलग छवियों को.

‘निजी’ आधार पर ‘राजनीतिक छवि’ का स्त्रीवादी नकार

 उर्मिला पवार के कथ्य से बात शुरू करते हैं, जो एक सुपरिचित दलित स्त्रीवादी लेखिका हैं,  आत्मकथा ‘आयदान: द वीव आॅफ माई लाइफ’ को लेकर चर्चा में रही हैं. पवार मुंबई के एक प्रसिद्व शिक्षा संस्थान में दलित स्त्रियों के मुद्दों पर एक चर्चा सत्र को याद करते हुए बताती हैं कि एक स्त्री प्राध्यापक का यह दावा था कि डा. आंबेडकर ने स्त्रियों के लिये कुछ नहीं किया. उनका हिन्दू कोड बिल एक राजनीतिक हथकंडे से अधिक कुछ नहीं था. उन्होंने स्वयं अपनी पत्नी को सार्वजनिक क्षेत्र में कभी आगे नहीं आने दिया, बल्कि फुले के विपरीत उन्होंने उसे शिक्षित भी नहीं बनने दिया. इन दावों पर अन्य स्त्रीवादी विचारकों  की कोई प्रतिक्रिया न आने से पवार आश्चर्य में पड़ गई और गंभीर मुद्दे को इस तरह बौना कर दिये जाने की इस कोशिश से पवार को लगा कि विद्वानों का यह जमावड़ा यह समझने में ही असमर्थ था कि सामाजिक सांस्कृतिक माहौल व आर्थिक स्थिति जीवन को किस तरह प्रभावित करते हैं. पवार की यह बात इंगित करती है कि किस तरह आंबेडकर के स्त्रीवादी योगदान को स्त्रीवाद द्वारा नकार दिया जाता है. ऐसा करने के लिये अक्सर या तो उनके निजी जीवन के उद्वरणों का सहारा लिया जाता है अथवा उनके योगदान को वर्ग-विशेष के लिये ही मान लिया जाता है मात्र दलित स्त्रियों के सामाजिक विकास तक सीमित.

यह इस बात की तरफ इशारा भी करता है कि विभिन्न सामाजिक स्तरों में सार्वजनिक व निजी दायरों की परिभाषा किस तरह अलग-अलग हो जाती है. ‘निजी’ और ‘राजनीतिक’ पर चर्चा संक्षिप्त ही सही, पर दो कारणों से जरूरी हो जाती है. पहले तो  आंबेडकर के निजी जीवन को गलत रूप से केन्द्र में लाकर उनके स्त्रीवादी योगदान को नकारे जाने के विरोधाभास को समझना जरूरी है. दूसरे सार्वजनिक व निजी, इन दो शब्दों के विभिन्न निहितार्थ जानना भी जरूरी है- आंबेडकरी आंदोलन में से निसृत हुए घरेलू व सामुदायिक दायरों के अर्थ- भारत मेें ‘आधुनिकता’ के एक अधिक सशक्तीकारी बोध की ओर. आंबेडकर के राजनीतिक योगदानों को उनकी निजी जिंदगी के कुछ खास चुने हुए पहलुओं की गलत व्याख्या द्वारा नकार के विरोधाभास को कैसे समझा जाये? ऐतिहासिक रूप से भारत का उपनिवेशी सार्वजनिक क्षेत्र विभिन्न वर्गों द्वारा रचित समुदायों व प्रति समुदायों से बना था,  जो परस्पर एक दूसरे से खिंचे हुए रहते थे. प्रभुत्वशाली जातियां एक खास मध्यम वर्गीय सार्वजनिक दायरे की निर्मिति में लगी थीं, जिसके लिए उन्होंने शक्ति व विशेषाधिकारों के अपने पुराने संसाधनों तथा राजनीतिक व समाज के नये विचारों का घालमेल कर लिया-अर्थात मनु और मिल को एक ही धागे में पिरो दिया और इस तरह एक खंडित आधुनिकता की  चलन मेें आ गई.

यह आधुनिकता जहां एक ओर सार्वजनिक क्षेत्र में जाति से मुकर जाती थी, वहीं व्यक्तिवाद के नये सिद्वांतों को सजातीय विवाह से भी जोड़ लेती थी और सार्वभौमिक श्रमविभाजन की अवधारणा को अपने वर्णाश्रम धर्म से भी और इस तरह यह वैश्विक आधुनिकता पर दावा पेश करती थी. स्त्रीवादी अध्ययनों के इस निष्कर्ष पर सबकी सहमति है कि मध्यम वर्ग के इस निर्माण ने ‘निजी’ की पुनर्रचना में अहम प्रभाव छोड़ा है, खासकर सख्यभावी विवाह के माॅडल के अविष्कार में.महाराष्ट्र के बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में प्रचलित गृहस्थी व शिशु पालन संबंधी पुस्तकों में मध्यम वर्ग की अधिकार संपन्न जाति की महिलाओं के लिये कार्यों और उन्हें करने के तरीकों का विस्तृत वर्णन मिलता है. इन विवरणों में उन्हें अंग्रेज  महिलाओं और निम्न कार्यरत समुदायों की महिलाओं, इन दोनों ही वगों के विरोध में खड़ा कर दिया गाय है. 1933 में कुमारी कमला के नाम से लिखने वाली एक महिला एक सख्यभावी विवाह की रोजमर्रा की जिंदगी को कुछ इस तरह प्रस्तुत करती है.‘‘इन परिवारों में खाने-पीने के लिये काफी था, जीवन अच्छा था और इसलिए इन सुधारक परिवारों के बेटे वकील, चिकित्सक,  बैरिस्टर बने और भारतीय शासकीय व चिकित्सा सेवाओं में जाने लगे. बेटियां सुसंस्कृत महिलायें बनीं,  जो अपने घरों को स्वच्छ संवरा हुआ रखती थी, बेहतरीन खाना पकाती थीं और  जरूरत पड़ने पर वक्त के अनुसार बातचीत भी कर सकती थीं.’’ (कर्वे 2009-206)

मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

नासिरुद्दीन


तलाक के नाम पर मर्दानगी

एसएमएस से तलाक, इ-मेल से तलाक, स्काइप से तलाक, व्हॉट‍्सएप्प से तलाक, नशे की हालत में तलाक, गुस्से में तलाक, ख्वाब में बड़बड़ाते हुए तलाक, गर्भवती को तलाक, माहवारी के दौरान तलाक… ये तलाक बेजान लोगों के लिए नहीं हैं. ऐसे मुंहजबानी, एकतरफा, एक साथ तीन तलाक किसी शायरा बानो, किसी हमीदन, किसी रजिया, किसी नसरीन, किसी रहीमबी, किसी रूबीना, किसी शहाना की जिंदगी की हकीकत है. हिंसक सच्चाई है. यह मर्द के हाथ में मर्दानगी दिखाने और साबित करने का जरिया भी है. यकीन न हो तो तलाक के पांच केस देख लें. पता चल जायेगा, कैसी-‍कैसी बातों पर तलाक का लफ्ज मर्द के मुंह से निकलता है. असलियत में यह तलाक के हक के मार्फत मर्दिया ताकत की नुमाइश है. हम मर्दिया समाज के बाशिंदा हैं. मजहब, कानून, तहजीब, रवायत भी इसी समाज में वजूद में हैं. जाहिर है, इन सबको पढ़ने-पढ़ाने और समझने-समझाने का तरीका भी मर्दिया सोच से ही ज्यादतर निकलता है. क्यों, क्या, कैसे और कितना बताया जाये… यह भी यही सोच तय करती है. इसीलिए बेवक्त एक साथ तीन तलाक जैसी हिंसा, मुसलमान स्त्रियों पर चली आ रही है. महिलाओं को किसने, कैसे और क्या बताया कि शादी या तलाक के मामले में उनके हक क्या हैं?

सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला है, जिसे कानून की जबान में ‘शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ के रूप में जाना जाता है. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ कह देने भर से तलाक नहीं हो जायेगा. तलाक की प्रक्रिया पूरी करनी होगी. इसके अलावा कई हाइकोर्ट ने कई केसों में यह साफ किया कि मर्द की तरफ से एकतरफा, जबानी, इकट्ठा तीन तलाक नहीं दिया जा सकता. पहले सुलह-समझौते की कोशिश होनी चाहिए. तलाक की ठोस वजह होनी चाहिए. वरना, ऐसे ही दिया गया तलाक नहीं माना जायेगा. यानी देश के कोर्ट ने ऐसे तलाकों के बारे में अपनी राय साफ कर दी है. क्या ये फैसले इस मुल्क की महिलाओं और
खासकर मुस्लिम  महिलाओं को पता हैं? वैसे, इनके बारे में मर्दों को भी पता होना चाहिए. कई बार शौहर की हिंसा झेलने और खर्च न देने की हालत में मुसलमान महिला कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है. कोर्ट में शौहर बचने का सबसे आसान तरीका निकालता है. कह देता है, मैंने तो इसे तलाक दे दिया है. यानी उसकी जिम्मेवारी खत्म. अब कोर्ट में यह भी नहीं चलता. ऊपर जिन फैसलों के बारे में कहा गया है, वे ऐसे ही शौहरों के पैंतरों का नतीजा हैं.

एक और कानून है, जिसे मुस्लिम  महिला (तलाक के बाद अधिकारों का संरक्षण) कानून 1986 के नाम से जाना जाता है. इस कानून के तहत तलाक देने के बाद भी कोई शौहर, महिला या बच्चों का खर्च देने से नहीं बच सकता. कई हाइकोर्ट ने इस कानून की व्याख्या करते हुए इद्दत के दौरान का गुजारा देने के अलावा एकमुश्त रकम, स्त्रीधन, दहेज का सामान दिलाने का फैसला दिया है. यह एकमुश्त रकम शौहर की सामाजिक-आर्थिक हैसियत के मुताबिक तय होगी. ध्यान रहे, कानून का नाम तलाकशुदा महिलाओं के हकों की हिफाजत है. क्या कोर्ट से राहत की यह बात हर मुसलमान मर्द-स्त्री को पता है? एक और कानून है- घरेलू ‘हिंसा से महिलाओं का संरक्षण विधेयक 2005’. यह कानून घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को फौरी राहत देने की बात करता है. इस कानून में कोई मर्द, घर के दायरे में रह रही किसी स्त्री को बेघर नहीं कर सकता है. मुसलमान महिलाओं को इस कानून के जरिये भी इंसाफ मिल रहा है. इन महिलाओं में तलाकशुदा भी हैं. अब ऐसे मामलों में पति दलील दे रहे कि वे इस कानून के दायरे में नहीं आयेंगे. क्यों, क्योंकि उन्होंने तो तलाक दे दिया है. कोर्ट इसे नहीं मान रही है. वह इस कानून के दायरे में तलाकशुदा को भी शामिल मान रही है.

दिल्ली हाइकोर्ट का एक मामला है. तलाकशुदा बीवी को इस कानून के तहत अंतरिम गुजारा मिला. मामला सेशन से हाइकोर्ट पहुंचा. हाइकोर्ट में दलील दी गयी कि वे अब ‘घरेलू रिश्ते’ से नहीं बंधे हैं. इसलिए वे इस कानून के दायरे में नहीं आते हैं. कोर्ट का कहना था कि इस कानून के मुताबिक पीड़ित शख्स का मतलब वे सभी हैं, जो घरेलू रिश्ते में हैं, या रह रहे हैं, रहते हैं या रह चुके हैं या किसी भी दौरान साझे घर में साथ रह चुके हैं. कोर्ट के मुताबिक, इस दायरे में तलाकशुदा जोड़े भी आते हैं. तलाकशुदा महिलाओं को राहत दिलानेवाले ऐसे फैसले राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और मुंबई के कोर्ट से आ चुके हैं. वैसे इस कानून के तहत हर तरह की हिंसा यानी तशद्दुद जुर्म है. इसलिए तलाक की धमकी देना या बार-बार इसका डर दिखाना भी हिंसा के दायरे में आयेगा. क्या मुसलमान महिलाओं को इस कानून से राहत मिलने की बात पता है? यह पहला ऐसा कानून है, जो घरेलू रिश्तों में सभी मजहब की महिलाओं पर एक समान तरीके से लागू होता है.

अगर इस्लाम की रूह इंसाफ है और इसके मूल्य में बराबरी का समाज बनाना है, तो यह मुमकिन नहीं कि ऐसी चीजें मुसलमान स्त्रियों की जिंदगी की फांस बनी रहें. अगर कोई स्त्री नहीं है और उसके आपसी रिश्ते बराबरी के नहीं हैं, तो वह तीन तलाक की तलवार और उसके खौफ के साये में गुजरती जिंदगी का एहसास नहीं कर सकता. अगर हमारे घर में किसी बेटी, बहन, खाला, बुआ के साथ ऐसा नहीं हुआ, तो इसे समझना थोड़ा कठिन है. लेकिन हां, जो इंसाफ पसंद हैं, वे जरूर समझेंगे. हमारे समाज में तलाक के हक का कैसा इस्तेमाल होता है और आमतौर पर इसका किस पर सबसे ज्यादा असर होता है, यह शायद बताने की जरूरत नहीं है. एक ऐसे समाजी निजाम में जहां किसी स्त्री का ब्याहता होना सबसे बड़ा गुण माना जाता हो, वहां तलाकशुदा और अगर वह मां भी हुई तो, उसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. मगर जिंदगी सिर्फ इतनी ही नहीं है.
वैसे किसी शायर ने खूब कहा है-
तलाक दे तो रहे हो गरूर-ओ-कहर के साथ. / मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ.



 तीन बार तलाक कहना सही नहीं

दसियों साल से मुसलमान एक ऐसी बहस पर अटके हैं, जिसे बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था. यह काम भी मुसलमानों को खुद ही कर लेना चाहिए था. नतीजतन, बहस रह-रह कर सिर उठाती रहती है. बहस है, क्या एक साथ और एक वक्त में तलाक-तलाक-तलाक कह देने से मुसलमान जोड़ों के बीच का शादीशुदा रिश्ता खत्म हो जाता है?  उत्तराखंड की रहनेवाली शायरा बानो की शादी 2002 में हुई. शादी के लिए दहेज देना पड़ा. शादी के चंद रोज बाद ही और ज्यादा दहेज की मांग शुरू हो गयी. जब मांग पूरी न हुई तो उस पर जुल्मो-सितम‍ किये गये. खबरों के मुताबिक, उसे ऐसी दवाएं दी गयीं, जिससे उसके कई एबार्शन हो गये. वह हमेशा बीमार रहने लगी. पहले उसे जबरन मायके भेजा गया. फिर 2015 के अक्तूबर में इकट्ठी तीन बार तलाक-तलाक-तलाक देकर शौहर ने उससे मुक्ति पा ली. शायरा ने ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर तलाक के इस रूप यानी एक साथ इकतरफा तलाक को खत्म करने की मांग की है.

इसी तरह, लखनऊ की रजिया की कहानी है. शादी के कुछ महीनों बाद शौहर कमाने के लिए सऊदी अरब चला जाता है. इस बीच रजिया एक बच्चे की मां बन जाती है. अचानक एक दिन उसके ससुराल वाले बताते हैं कि शौहर ने उसे सऊदी से टेलीफोन पर तलाक दे दिया है. एक पल में रजिया की जिंदगी बदल दी जाती है. बवक्त एक साथ तीन तलाक की ऐसी घटनाएं, कई मुसलमान महिलाओं की जिंदगी का सच है.तलाक के इस रूप को इसलामी कानून की जबान में तलाक-ए-बिदत कहते हैं. यानी तलाक का ऐसा तरीका, जो कुरान और हदीस में नहीं मिलता है. तलाक की बुनियाद, जोड़ों के बीच मतभेद या लगाव न होने का नतीजा होती हैं.इसीलिए तलाक की इजाजत देने से पहले इसलाम इस बात की पैरवी करता है कि जोड़े सुलह की गुंजाइश तलाशें. मौलाना अबुल कलाम आजाद अपनी तफ्सीर ‘तर्जमानुल कुरान’ में एक आयत के हवाले से कहते हैं, ‘अगर ऐसी सूरत पैदा हो जाये, जिसमें इस बात का अंदेशा हो कि शौहर और बीवी में अलगाव पड़ जायेगा, तो फिर चाहिए कि खानदान की पंचायत बिठाई जाये. पंचायत की सूरत यह हो कि एक आदमी मर्द के घराने से चुन लिया जाये और एक औरत के. दोनों आदमी मिल कर सुलह कराने की कोशिश करें.’



अगर सुलह न हो पायी तब ? तलाक इस सुलह के नाकाम होने के बाद का अगला कदम है. पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल्ल.) की हदीस है, ‘खुदा को हलाल चीजों में सबसे नापसंदीदा चीज तलाक है.’फिर भी इसकी नौबत आ गयी है तो मौलाना आजाद ने इसी किताब में तलाक से जुड़ी आयत के हवाले से लिखा है, ‘तलाक देने का तरीका यह है कि वह तीन मर्तबा, तीन मजलिसों में, तीन महीनों में और एक के बाद एक लागू होती हैं. और वह हालत जो कतई तौर पर रिश्ता निकाह तोड़ देती है, तीसरी मजलिस, तीसरे महीने और तीसरी तलाक के बाद वजूद में आती है. उस वक्त तक जुदाई के इरादे से बाज आ जाने और मिलाप कर लेने का मौका बाकी रहता है. निकाह का रिश्ता कोई ऐसी चीज नहीं है कि जिस घड़ी चाहा, बात की बात में तोड़ कर रख दिया. इसके तोड़ने के लिए मुख्तलिफ मंजिलों से गुजरने, अच्छी तरह सोचने, समझने, एक के बाद दूसरी सलाह-मशविरा की मोहलत पाने और फिर सुधार की हालत से बिल्कुल मायूस होकर आखिरी फैसला करने की जरूरत है.’ (खंड दो, पेज 196-197) कुछ और चीजें भी देखते हैं. जैसे पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल्ल.) के वक्त में तलाक का क्या तरीका अपनाया गया होगा?

एक हदीस है, ‘महमूद बिन लबैद कहते हैं कि रसूल को बताया गया कि एक शख्स ने अपनी बीवी को एक साथ तीन तलाकें दे दी हैं. यह सुन कर पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल्ल.) बहुत दुखी हुए और फरमाया, क्या अल्लाह की किताब से खेला जा रहा है, वह भी तब, जब मैं तुम्हारे बीच मौजूद हूं.’ मौलाना उमर अहमद उस्मानी ‘फिक्हुल कुरान’ में बताते हैं कि पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल्ल.) के जमाने में अगर तीन तलाकें एक साथ दी जाती थीं, तो वह एक तलाक ही शुमार की जाती थी.अंदाजा लगाइए इसलाम, शादी न चल पाने की सूरत में अलग होने का यह तरीका सदियों पहले बता रहा था. कुरान ने जो तरीका बताया, उसे तलाक-ए-रजई या अहसन कहा गया है. इसे सबसे बेहतरीन तरीका भी माना गया है. अब अगर इस तरीके को छोड़ कर कुछ और अपनाया जाये, तो यह किस शरीअत की हिफाजत कही जायेगी? ऐसा नहीं है कि सभी भारतीय मुसलमान एक वक्त में दिये गये तीन तलाक को सही मानते हैं. लेकिन हां, मुसलमानों में कुछ ऐसे तबके अब भी हैं, जो इस तीन तलाक को बिल्कुल नहीं मानते. वह तीन चरणों की प्रक्रिया पूरी करने पर जोर देते हैं. सवाल है, अगर वे मान सकते हैं, तो बाकी लोग क्यों नहीं?



मिस्र ने ऐसे तलाक से 1929 में ही छुटकारा पा लिया था. इसके अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, कुवैत, इराक, इंडो‍नेशिया, मलेशिया, ईरान, श्रीलंका, लीबिया, सूडान, सीरिया ऐसे मुल्क हैं, जहां तलाक कानूनी प्रक्रियाओं से गुजर कर पूरा होता है. दुनिया में इसलाम पहला ऐसा मजहब था, जिसने शादी को दो लोगों के बीच बराबर का करार बनाया. अगर निकाह एक खास प्रक्रिया के बिना पूरी नहीं हो सकती, तो बिना किसी प्रक्रिया के एकबारगी सिर्फ तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कह देने से निकाह खत्म कैसे हो जाना चाहिए? यही नहीं, अगर निकाह बिना औरत की रजमांदी के पूरी नहीं हो सकती, तो उसे शामिल किये बिना तलाक की प्रक्रिया कैसे पूरी हो जाती है? यह कैसी विडंबना है कि शादी या तलाक की जो प्रक्रिया इसलाम ने तय की थी, उसकी झलक नये जमाने के कानूनों में तो दिखती है, लेकिन मुसलमानों ने ही उसे छोड़ दिया.
बेहतर हो कि एक साथ तीन तलाक देने के तरीके को मुसलमान खुद ही खत्म करें. यह सही तरीका नहीं है. वरना शायरा या रजिया जैसी अदालत की चौखट पर जायेंगी ही.

इंसाफ के लिए उठी सदाएं

ऐसा क्यों होता है कि रीति-रिवाज, परंपरा, संस्कृति या मजहबी रहनुमाओं से महिलाओं का ज्यादा टकराव होता है? ऐसा क्यों होता है कि जब भी मजहबी कायदे-कानून में बराबरी की आवाज उठती है, तो ऐसी सदा स्त्रियों के लिए या स्त्रियों की तरफ से ज्यादा आती है? जब महिलाएं आवाज उठाती हैं, तो उन्हें ही गलत ठहराने की मुहिम शुरू हो जाती है. उन पर धर्म से भटकने और मजहब को बदनाम करने के इलजाम लगने लगते हैं.
कुछ भी कहिये, मर्दिया ताकत है बड़ी जबरदस्त! उसका ताना-बाना, उसकी मजबूत सत्ता की नींव काफी गहरी है. अपनी ताकत और ताने-बाने से मर्दिया सत्ता हर विचार, दर्शन या मुहिम को अपने हिसाब से मोड़ लेती है. चाहे मजहब के उसूल हों या फिर देश का संविधान, सब ताक पर रखे रह जाते हैं. मर्दिया सत्ता अपने हिसाब से चीजों की व्याख्या करती है और उसी के मुताबिक नियम-कानून बनाती और चलाती है.

इंसाफ, बराबरी, रहम, मोहब्बत, इंसानी इज्जत- ये सब इसलाम के मूल्य हैं. मर्दों ने इंसाफ और बराबरी को भी अपने हिसाब से खुद ही तय कर लिया कि मुसलमानों के लिए क्या सही है. मसलन, बहुविवाह के बारे में कुरान के विचार को पढ़ें, तो पता चलता है कि वह एक से ज्यादा शादी की इजाजत नहीं देता है, बल्कि वह तो एक वक्त में एक से ज्यादा शादी करने पर अंकुश लगाने की बात करता है. कुरान के आदर्श का मतलब मर्दों ने अपने हक में निकाल लिया. इसके जरिये वे इस नतीजे पर पहुंच गये कि उन्हें एक साथ चार बीवियां रखने की इजाजत है. (हालांकि, आज के वक्त में कोई ऐसा करता दिखता नहीं है.) नतीजा, मुसलमान मर्दों ने इसे अपना मजहबी हक मान लिया. यही नहीं इन्हीं की वजह से मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल किये जानेवाले ढेर सारे अफवाहों में एक यह भी शामिल है. वैसे, मजहब और मजहब के नाम पर बोलने में काफी फर्क है. मजहब कहता है, खुदा की नजर में हर बंदा बराबर है. मजहब के माननेवाले सोचते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है? वे तर्क तलाशते हैं और साबित करने की कोशिश करते हैं कि मर्द नाम का जीव बरतर यानी श्रेष्ठ है.

मजहब क्या है, क्या बताता है, क्या कहता है, क्या चाहता है- इन सब बातों को बताने के काम पर भी मर्दिया सोच का कब्जा है. उनकी सोच ही मजहब हो गयी है. उनकी राय पत्थर की लकीर हो गयी है. उनके ख्याल जन्नत और दोजख का दरवाजा खोलने लगे हैं. जाहिर है, जब तक जेहन में इंसाफ और बराबरी की रूहानी सोच नहीं रहेगी, किसी की भी सोच इकतरफा ही होगी. ऐसा नहीं है कि मजहब जाननेवाले सभी मर्द ऐसा सोचते हैं. लेकिन ऐसे लोगों की तादाद कम है, जो सिर्फ मर्दिया नजरिये से धर्म को नहीं देखते हैं. अगर ये बातें अटपटी लग रही हों, तो जरा हम चंद चीजों पर गौर करें. ऐसा क्यों है कि मंदिरों में जाने के लिए महिलाओं को आंदोलन करना पड़ता है? क्या हमने कभी सवर्ण हिंदू मर्दों को मंदिर में खुद प्रवेश करने के लिए आवाज उठाते सुना है? ऐसा क्यों है कि महिलाओं को ही मजार में हर जगह जाने की इजाजत के लिए सड़क पर आना पड़ता है? ऐसा क्यों है कि कभी किसी मर्द के लिए यह सवाल नहीं पूछा गया कि वह नमाज पढ़ा सकता है या नहीं?

स्त्री-पुरुष की यकसां इमामत कर सकता है या नहीं? ऐसा क्यों है कि जायदाद में हक पाने के लिए पुरुषों की जमात ने कभी अपने लिए कानून की मांग नहीं की? ऐसा क्यों नहीं हुआ कि कोई शकील, कोई समी, कोई रिजवान, कोई रूमी तीन तलाक के अपने ‘जबरिया’ हक को खत्म करने के लिए कोर्ट की देहरी पर पहुंच गया हो? ऐसा क्यों है कि मर्दों ने कभी अपने साथ होनेवाली ‘हकतलफी’ खत्म करने के लिए घर-परिवार के दायरे में बराबरी का कानून बनाने की मांग नहीं की? मसलन, दहेज, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, बलात्कार, शादी-शुदा जिंदगी में उत्पीड़न, एक मजलिस में तीन तलाक, बहुविवाह, हलाला के खिलाफ, जायदाद में बराबरी के हक के लिए कानून, निकाहनामा में मर्दों के हकों की हिफाजत की गारंटी के वास्ते कोई आवाज तो नहीं उठती है. इन सबकी जरूरत तो स्त्रियों के वास्ते ही हुई. हां, मर्दों ने हर ऐसे कानूनी हिफाजत के ‘दुरुपयोग’ की बात जरूर उठायी. तनिक रुक कर यह भी सोचना चाहिए कि समाज सुधार आंदोलन या समाजी बेदारी की मुहिम का बड़ा हिस्सा महिलाओं की समाजी हालत सुधारना क्यों होता रहा है. इसका इतिहास है. सुधार आंदोलन, बेदारी मुहिम और हिफाजती कानून की जरूरत उनके लिए होती है.

जिन्हें समाज ने कमजोर बना कर या सदियों से दबा कर रखा है. हर धर्म और जाति की महिलाएं, मर्दों के मुकाबले वंचित समुदाय हैं. इसलिए मजबूत मर्दों को कभी अपने लिए खास मुहिम या कानूनों की जरूरत नहीं पड़ी. क्योंकि सामाजिक रीति-नीति से लेकर कायदे-कानून तक सब उनके ही तो हैं. उनके ही हितों की हिफाजत करते आ रहे हैं.एक मजलिस में तीन तलाक और बहुविवाह को खत्म करने, जायदाद में बराबर की हिस्सेदारी या धार्मिक स्थलों में इबादत की इजाजत की मांग, महिलाओं के हक की मांग हैं. ये हक उनकी इज्जत भरी जिंदगी के लिए जरूरी हैं. जरा फर्ज करें, सब उलट-पुलट हो गया है. वे सारे हक जो अब तक मर्दों के हाथों में थे, महिलाओं के पास आ गये हैं. अब महिलाएं जब चाहें, सोते-जागते, होश-बेहोश, बात-बेबात, बताये-बिना बताये, टेलीफोन-एसएमएस या व्हॉट‍‍्सएप्प पर इकट्ठे तीन बार तलाक, सोच कर-बोल कर-लिख कर दे सकती हैं. एक झटके में अपने शौहर को आदाब कह कर अपनी जिंदगी से विदा कर सकती हैं. कैसा होगा यह सूरतेहाल? क्या तब मर्द इसे इंसाफ मान कर चुपचाप बैठे रहेंगे? क्या वे कुछ नहीं बोलेंगे? क्या उनके साथ यह बराबरी का सुलूक होगा? क्या इसे इंसाफ और बराबरी का इंसानी उसूल कहा जायेगा? अगर ये सूरतेहाल ठीक नहीं कही जा सकती है. तो आज अगर स्त्रियां ऐसी सूरत को बदलने के लिए आवाज उठा रही हैं, तो ये गलत कैसे हो जायेगा?

यह आलेख स्त्रीवादी पत्रकार और चिंतक नासिरूदीन के प्रभात खबर में छपे तीन लेखों की पुनर्प्रस्तुति है

मुख्यमंत्री जी शराबबंदी से महिला उत्पीडन बंद नहीं होता: महिला छात्र नेता का पत्र नीतीश कुमार के नाम

रिंकी कुमारी
रिंकी कुमारी भागलपुर विश्वविद्यालय में छात्र नेता हैं. संपर्क: 7250174419

माननीय मुख्यमंत्री, बिहार

पिछले 5 अप्रैल 2016 से आपकी सरकार ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू किया है. लेकिन, सच यह है कि शराब ‘बंद’ नहीं हुआ है. शराबबंदी के मसले पर राजनीतिक शोर ज्यादा है. खास तौर पर सरकार और अन्य राजनेताओं के रोज-ब-रोज के बयानबाजियों में शराबबंदी की चर्चा हो रही है. मानो और कोई मसला ही नहीं है! नीतीश जी, आप कह रहे हैं कि “मैं जब 17 साल का था, तभी से शराब पीकर लोगों को लड़ते-झगड़ते देखता था. तभी से मेरे मन में यह बात थी कि शराब बुरी चीज है.” आप कहते हैं कि, “गांधी जी शराब को एक बीमारी मानते हैं. इस बीमारी का ईलाज करना होगा.” लेकिन आपकी किशोराव्यवस्था की अच्छी सोच और गांधी के विचारों के प्रति प्रेम पिछले 10 वर्षों में नहीं देखा गया. पिछले विधानसभा चुनाव में आपने पूर्ण शराबबंदी को घोषणापत्र में शामिल किया. नीतीश जी, सत्ता व शासकों को भूलने की आदत होती है, लेकिन जनता नहीं भूलती है, वह भी महिलाएं तो हरगिज नहीं! बिहार की महिलाओं – आम अवाम को अच्छी तरह याद है कि पिछले 10 वर्षों में शहर से गांव तक गली-मोहल्लों, स्कूल-कॉलेजों, मंदिर-मस्जिदों और अस्पतालों तक के नजदीक शराब की वैध-अवैध दुकानों-भट्ठियों को आपने फैलने की छूट दी. खुलकर शराब दुकान का लाईसेंस बांटा गया. तबाही-बर्बादी और जहरीली शराब से मौत व जनसंहारों का सिलसिला चलता रहा.

नीतीश जी, बिहार में शराब का दरिया बहाने की नीतियों के खिलाफ शहर से गांव तक महिलाओं ने जबर्दस्त लड़ाइयाँ लड़ी हैं और उनकी लड़ाइयों ने ही अंततः आपको पूर्ण शराबबंदी को लागू करने की ओर धकेला है. पिछले 10 वर्षों में अवैध शराब भट्ठियों को तोड़ने से लेकर स्कूल-कॉलेजों, मंदिर-मस्जिद से लेकर अस्पताल तक के निकट शराब की दुकानों के खुलने के खिलाफ महिलाओं ने जुझारू लड़ाइयाँ लड़ी हैं. सरकारी कार्यालयों से लेकर राजधानी पटना तक की सड़क पर लगातार आवाज बुलंद की है. महिलाओं की जुझारु लड़ाइयों और 2012 के अंतिम महीनों में जहरीली शराब से गरीबों के कई एक जनसंहारों ने पूर्ण शराबबंदी को बिहार के जनसंघर्षों और राजनीति के महत्वपूर्ण प्रश्न के रूप में सामने ला दिया. नीतीश जी, आपको यह भी याद होगा कि शराब का दरिया बहाने से भर रहे सरकारी खजाने से स्कूली लड़कियों ने साईकिल लेने से भी कई जगह मना किया था. आप शराब से हासिल राजस्व से साईकिल बांटने की बात करते थे. आपको याद ही होगा कि मुजफ्फरपुर में एक बुजुर्ग समाजवादी नेता हिंदकेशरी यादव सहित महिलाओं पर जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में शराब माफियाओं ने हमला किया था.

मुख्यमंत्री जी, महिलाओं के साथ समाज के बड़े हिस्से के विक्षोभ और पूर्ण शराबबंदी के राजनीति के केंद्र में आ जाने के बाद ही आपने चुनावी फायदा लेने की मानसा के साथ यू-टर्न लेते हुए पूर्ण शराबबंदी का वादा किया. लेकिन चुनाव बाद स्पष्ट हो गया कि आपकी मानसा साफ नहीं है. चुनाव जीतने के बाद आप चरणबद्ध तरीके से शराबबंदी लागू करने की बात करने लगे. देशी-विदेशी के लिए अलग-अलग नीति की घोषणा करने लगे. विदेशी को छूट और देशी पर प्रतिबंध की बात आपने की. विदेशी शराब की दुकानों को लाईसेंस देने व रिन्युअल की प्रक्रिया के बीच ही महिलाओं के प्रतिवाद और राजनीतिक आलोचनाओं ने आपको पूर्ण शराबबंदी के चुनावी वादे को लागू करने की घोषणा के लिए बाध्य किया. मुख्यमंत्री जी, आप कह रहे हैं कि पूर्ण शराबबंदी के लागू होने के बाद महिलाओं के चेहरे पर खुशी है. घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न में कमी आई है. लेकिन हकीकत क्या है? नीतीश जी, शराब महिलाओं के साथ घर से बाहर तक जारी हिंसा में निर्णायक पहलू नहीं है. महिलाओं के साथ जारी हिंसा में निर्णायक पहलू पितृसत्ता होती है. इसलिए शराबबंदी के लागू होने से महिलाओं के साथ जारी हिंसा में बड़ा फेरबदल नहीं हो सकता है. खैर, आपको तो आंकड़ों से खेलने में महारत हासिल है. नीतीश जी, आप तो शराबबंदी को ऐसे पेश कर रहे हैं, मानो सारे मर्ज की एकमात्र यही दवा है.

खैर, व्यवहार में शराबबंदी किस हद तक लागू हो रहा है, यह आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं है. आपके लिए अब यह एक राजनीतिक हथकंडा बन गया है. आप इसे जनता के अन्य सारे महत्वपूर्ण सवालों को दबाने का औज़ार और बिहार से बाहर यू.पी. और दिल्ली के लिए राजनीतिक सवारी बनाने की कोशिश कर रहे हैं. नीतीश जी, सच यही है कि नीतिगत तौर पर आपने पूर्ण शराबबंदी लागू कर दिया है, लेकिन शराब ‘बंद’ नहीं हुआ है, चालू है. हां, सड़कों पर शराबियों की जमात व शराब दुकानों के इर्द-गिर्द की अड्डेबाजी नहीं दिख रही है. हां, अब शराब सभी को सर्वसुलभ नहीं है. अब पूरे कारोबार ने अवैध स्वरूप ग्रहण कर लिया है. शराब माफिया की पैदावार बढ़ गई है. रोज-ब-रोज शराब के पकड़े जाने की खबरें आ रही है. अवैध भठ्ठियां चल रही है. हां, पहले भी डुप्लीकेट विदेशी शराब व भट्ठियों में निर्मित जानलेवा देशी शराब का कारोबार था, अब ज्यादा फल-फूल रहा है. झारखंड, उत्तरप्रदेश, पश्चिमबंगाल और नेपाल से तस्करी की खबरें आ रही है.

मुख्यमंत्री जी, गोपालगंज में जहरीली शराब से हुए जनसंहार ने पुराने दौर की यादें ही ताजा नहीं करायी है, बल्कि पूर्ण शराबबंदी की पोल भी खोल दी है. 18 गरीब-दलित-अति पिछड़े जहरीली शराब से मारे गये. गोपालगंज शहर के खजूरबानी में पुलिस-प्रशासन के नाक के नीचे शराब की भट्ठियां चल रही थी. जहरीली शराब से मौत का सिलसिला शुरू हुआ तो शुरुआती दौर में स्थानीय प्रशासन, सदर अस्पताल और उत्पाद विभाग ने जहरीली शराब से हो रही मौत के सच पर पर्दा डालने की कोशिश की. उत्पाद विभाग ने स्पष्ट तौर पर कहा कि जहरीली शराब से मौत नहीं हुई है. स्थानीय सदर अस्पताल की भूमिका बहुत ही शर्मनाक ढंग से सामने आई. जहरीली शराब के शिकार गरीबों के परिजनों को सिविल सर्जन ने फंसने व जेल जाने का भय दिखाया. ईलाज में गंभीरता नहीं दिखाई. शराबबंदी के कठोर कानून के भय से कई एक तो अस्पताल ही नहीं पहुंचे, जिससे मृतकों की संख्या बढ़ गई. कई एक का बिना पोस्टमार्टम किये दाह संस्कार कर दिया गया. खजूरबानी की महिलाओं ने पूर्ण शराबबंदी के लागू होने पर सवाल खड़ा किया है. बाद में सच्चाई को कबूल किया और नगर थाना प्रभारी के साथ पुलिसकर्मियों के निलंबन और भट्ठियों के संचालन व कारोबार से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी व सामूहिक जुर्माने की सजा की कार्रवाई आगे बढ़ी. लेकिन क्या दोषी केवल वही हैं जिसे आप सजा दे रहे हैं? जवाबदेही इसी दायरे तक सीमित है क्या?

कहा जा रहा है कि पूर्ण शराबबंदी के लागू होने के बाद 40 लोगों की मौत जहरीली शराब से हुई है.
मुख्यमंत्री जी, शराबबंदी केवल कठोर कानून बनाकर पुलिस के भरोसे लागू होने की दिशा में नहीं बढ़ेगा! कठोर क़ानूनों से कौन खेलते हैं और कौन कीमत चुकाते हैं, यह तो दिन के उजाले की तरह साफ है! केवल एक भागलपुर जिले में 5 अप्रैल के बाद 240 लोग जेल भेजे गये हैं, जिसमें से ज़्यादातर गरीब-दलित-आदिवासी व कमजोर समुदाय से आने वाले ही लोग हैं. गिरफ्तार लोगों में 90 प्रतिशत पीने वाले हैं. शराबबंदी कानून के तहत बिहार के 16 गांवों पर हाल तक सामूहिक जुर्माना लगाया गया है. ये सारे गांव दलितों-गरीबों के हैं. क्या मान लिया जाय कि पीने, कारोबार करने और बनाने वालों में केवल समाज के हाशिए का हिस्सा है? यह मज़ाक ही होगा! बड़े लोगों तक तो पुलिस व उत्पाद विभाग पहुँच भी नहीं पा रहा है. मुख्यमंत्री जी, जब आप बिहार में वाइन कल्चर को मजबूत कर रहे थे. शहर से गांव तक दरिया बहा रहे थे. तो आपको भी पता होगा कि इसके लाभुक कौन थे? यह किन ताकतों के हित में हो रहा था? हां, पीने वाले के विस्तृत दायरे में ‘खास’ के साथ ‘आम’ बढ़ रहे थे. यह तो स्पष्ट है कि वैध-अवैध निर्माण व कारोबार के लाभुकों की कैटेगरी में थैलीशाह, माफिया, राजनेता व पुलिस-प्रशासन शामिल था.

छोटे पैमाने पर भी चोरी-छिपे दारु चलाने व बेचने का धंधा भी तो पुलिस की सरपरस्ती में ही चलता था. क्या ‘बड़ों’ का गठजोड़ शराब के वैध-अवैध कारोबार से अलग-थलग हो गया है? अभी जो पड़ोसी राज्यों से तस्करी व अवैध निर्माण चल रहा है, इसमें वे सब शामिल नहीं हैं? क्या यह संभव है? यह स्पष्ट है कि किसी किस्म का अवैध कारोबार बिहार में कौन सब चलाते हैं?मुख्यमंत्री जी, आपके राज में पिछले दिनों उत्पाद राजस्व से लगभग 5 हजार करोड़ प्रतिवर्ष आते थे. माना जाता है कि 50 हजार करोड़ के लगभग का वैध कारोबार था, अवैध तो अलग से. क्या यह कारोबार खत्म हो गया है? नहीं, मुख्यमंत्री जी कारोबार प्रभावित जरूर हुआ है, लेकिन बंद नहीं हुआ है. पिछले दिनों शेखपुरा शहर में शराब बिक्री के एरिया बंटवारे के लिए दिनदहाड़े व्यस्त चौंक पर दो गुटों में गोलियां चली हैं. अभी कटिहार के फलका थाना प्रभारी शराब पीकर हंगामा और छेड़खानी कर रहे थे. बिहारशरीफ़ के हरनौट में जद-यू प्रखंड अध्यक्ष के घर से शराब बरामद हुआ है. सच यह है कि बड़े लाभुक, पीने वाले निशाने पर आ ही नहीं रहे हैं! माफिया की तादाद बढ़ गई है. इतना बड़ा कारोबार एकाएक खत्म हो ही नहीं सकता है. हां, यह कारोबार अब अवैध स्वरूप में राजनेता, पुलिस-प्रशासन व माफिया गठजोड़ के बगैर चल ही नहीं सकता है. आपके कठोर कानून की पहुँच भी उन लोगों तक नहीं हो सकती है. आखिर कौन लागू करता है कानून?

मुख्यमंत्री जी, शराब और शासक-सत्ता व शासकवर्गीय राजनीति का पुराना व गहरा रिश्ता है. बिहारी समाज में भी शासकों-अमीरों-राजनेताओं-नौकरशाहों के बीच तो शराब-शवाब-कवाब का नारा चलता आ रहा है. चुनावों में भी शासकवर्गीय पार्टियां वोट हासिल करने के लिए नोट और शराब का भरपूर इस्तेमाल करती रही हैं. शराब चुनाव में कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण खुराक होता है. थाना से लेकर अन्य सरकारी कार्यालयों में काम करवाने के बदले नोट व बोतल की संस्कृति स्थापित है. ‘खास’ के जिंदगी में शराब महत्वपूर्ण होता है. ऐसी स्थिति में क्या केवल कठोर कानून और पुलिस के जरिये पूर्ण शराबबंदी लागू होना संभव है? जरूर ‘आम’ कीमत चुकाएंगे और आप शराबबंदी को राजनीतिक हथकंडा बनाये रखने की कोशिश करेंगे.मुख्यमंत्री जी, पूर्ण शराबबंदी के लिए लंबी लड़ाई चलेगी. पूर्ण शराबबंदी की ओर सत्ता के भरोसे नहीं, बल्कि जनता की जागरूकता, पहलकदमी व आंदोलन के रास्ते ही आगे बढ़ा जा सकता है. निशाने पर समाज, सत्ता व शासकवर्गीय राजनीति को लेना ही पड़ेगा. बेशक महिलाएं लड़ाई के केंद्र में होंगी.
आपकी एक  मामूली जनता

यहाँ सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है: बदनाम नहीं, ये मर्दों की गलियाँ हैं

संजीव चंदन
यह समाज की पितृसत्तात्मक संरचना ही है, जो यह सुनिश्चित करता है कि सेक्स और सेक्स की संभावनाएं, दोनो ही बिकती हैं. यह महज संयोग नहीं है कि जब आम आदमी पार्टी के मंत्री संदीप कुमार के तथाकथित सेक्स स्कैंडल ने राजनीति में भूचाल ला दिया है, सोशल मीडिया में यह स्कैंडल तैर रहा है, तभी सोशल मीडिया में ही एक लेखिका और उनके बहाने कई लेखिकाओं की अनिवार्य ‘पुरुष-सम्बद्धता’ बताई जा रही है- एक से अधिक पुरुष मित्रों से दोस्ती का विवरण ‘संभावनाओं के गद्य’ के साथ पेश किया जा रहा है.

सवाल है कि आखिर संदीप कुमार की कहानी में ऐसा क्या है, जो एक राजनेता की ‘अलविदा-पटकथा’ लिखी जा रही है. किसी महिला ने कोई शिकायत नहीं की है, कोई उत्पीडन का प्रसंग नहीं है, कोई जांच भी नहीं कि उस सीडी में दिख रही महिला कौन है. इस पूरे प्रकरण में संदीप कुमार और वह महिला दोनो ही उत्पीडित हैं, न कि उत्पीड़क. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब फेसबुक पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की तस्वीरें किसी महिला के साथ घुमाई जा रही थी, जिसमें वे उसे चूमने की कोशिश कर रहे हैं, वह महिला कोई और नहीं बल्कि उनकी पत्नी थीं- लेकिन तस्वीर पर सनसनी बनाने वाले लोग भाजपा नेता की ऐसी–तैसी कर रहे थे.

संदीप कुमार के मामले की तुलना राजनीति के दूसरे सेक्स स्कैंडल के साथ की जा रही है. सवाल है कि क्या यह तुलना ठीक है, उन स्कैंडलों से जिसमें किसी उत्पीडित महिला ने शिकायत की थी-उत्पीडन या बलात्कार की. इस सीडी की तुलना कांग्रेस के वेटरन नेता नारायण दत्त तिवारी से भी नहीं की जा सकती, जो राजभवन में दो महिलाओं के साथ सेक्स करते हुए देखे गये थे- अभिषेक मनु सिंघवी से भी नहीं, जो एक सार्वजनिक स्थल- लायर्स चैंबर में सेक्स करते हुए देखे गये थे. संदीप के मामले में घटना है, लेकिन कोई पीड़ित पक्ष नहीं. इस घटना की तुलना सिर्फ और सिर्फ पूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम की घटना से की जा सकती है, जिनकी तस्वीरें एक महिला के साथ सार्वजनिक की गई थीं. यह महज संयोग नहीं है कि इन दोनो ही प्रसंगों में राजनेता दलित हैं.

भारत में दलित राजनीति के बडे नाम बाबू जगजीवन राम भारत के पहले दलित प्रधानमंत्री होते अगर उनके बेटे सुरेश राम का नाम सेक्स स्कैंडल में नहीं फंसता। 1977 में जनता पार्टी की लहर में जब इंदिरा गांधी की हार हुई तो जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद के लिए पहली पसंद थे। उसी समय एक पत्रिका में उनके बेटे के कुछ अश्लील तस्वीरें प्रकाशित हुई। जगजीवन राम के 46 साल के बेटे सुरेश राम के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में पढऩे वाली सुषमा चौधरी नाम की 21 साल की लडक़ी की कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें एक पत्रिका में छपी थीं। इस तस्वीर को सार्वजनिक करने में कहा जाता है कि उनकी पार्टी के बाहर-भीतर  के लोग शामिल थे, जो जगजीवन बाबू को प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते थे.

और जैसा कि होता आया है, इस मामले में भी वही हुआ, भारतीय समाज के ‘टॉम पीपिंग’ जमात को एक मसाला मिल गया. वैसा भारतीय समाज, जो अपने किसी क्वांरे प्रधानमंत्री (अटल बिहारी वाजपयी) की इस घोषणा पर संभावनाओं के आनंद से झूम उठता है कि ‘मैं क्वांरा हूँ ब्रह्मचारी नहीं.’ यह वही भारतीय समाज है, जिसके चौपालों पर इंदिरा गांधी का स्त्री होना अलग –अलग रूपों में कहानियों का सृजन करता था. हाँ, इस मर्दवादी समाज में सेक्स बिकता है. अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ, जब इस देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने क़तर की राजकुमारी की काल्पनिक सेक्स कथा (सात मर्दों के साथ सेक्स) का निर्लज्ज प्रकाशन किया. इस काल्पनिक कथा के साथ देश का हिन्दू मर्दवादी जमात अपनी फंतासियों और अपने एजेंडे का एक सुखद संयोग देख रहा था, एक मुस्लिम राजकुमारी की अनियंत्रित कामुकता  की फंतासी. खबर झूठी निकली, तो कुछ संपादकों ने माफी मांग ली और कुछ निर्लज्जता के साथ जमे हुए हैं. भारतीय मीडिया इस ‘टॉम पीपिंग’ समाज का प्रतिनिधि चरित्र है, उसे क़तर के बाद और उससे ज्यादा बिकने वाली सीडी मिल गई है. टीआरपी की तरह हिट्स की भूखी मीडिया घरानों के वेब संस्करणों में खबरों के शीर्षक से एक शोध किया जा सकता है कि इस मर्दवादी समाज में सेक्स कैसे बिकता है.

यह भी गौरतलब है कि आप सोशल मीडिया के ट्रेंड से ही एक सर्वे करें तो देखेंगे कि संदीप कुमार के मामले में नैतिकता की छाती कूटने वाले ज्यादातर मर्द हैं. स्त्रियों के लिए यह ठीक वैसा ही विषय नहीं है, जैसा मर्दों के लिए. सोशल मीडिया के ही एक व्यवहार को देखेंगे तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसी सीडी यदि किसी भाजपा नेता के प्रसंग में आई होती पक्ष –विपक्ष का स्वर पोजीशन के हिसाब से बदला हुआ होता. सच में राजनीति सहित यह पूरा समाज मर्दों की गलियाँ हैं, जहां सेक्स बिकता है, सेक्स क़त्ल करता है. रही बात केजरीवाल सरकार की, तो इसे अपने स्टिंग ऑपरेशनों की राजनीति के और भी परिणाम देखने बाकी हैं, वैसे क्या पता इस बार का स्टिंग किसने करवाया- भीतर से या बाहर से.