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अस्ति कश्चित् वाग्विशेषः रामटेक पर दलित युवक

डा .कौशल पंवार

  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709



अगर तुम जातियां खत्म न कर सको, तो अपनी जातियों पर इतना गर्व करना कि दूसरे जातियों के लिए लोग खुद जातियों को खत्म करने की आवाज उठाने लगे—डा. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर.


अभी पिछले दिनों नागपुर जाने का अवसर मिला तो नागपुर से रामटेक जाने की इच्छा भी पूरी हुई, एक संस्कृत की शोधार्थी होने के नाते कालिदास का वह स्थान देखने की इच्छा हुई, जहां पर उन्होंने अपनी सुप्रसिद्ध महाकाव्य मेघदूत लिखा, जिसमें  प्रेमी बादलों के माध्यम से अपनी प्रेयसी के लिए संदेश भेजता है. ऐसे कवि के बारे में जानने का समझने का अवसर खोना नहीं चाहा, जिसे भारत का शेक्सपीयर कहा जाता है. इस यात्रा के दौरान ऐसे एक अनजान शख्स  से मुलाकात हुई, जिसे आपको भी मिलवाने का मन है.

मैं, अर्चना गौतम और भदंत चन्द्रकीर्ति  सुबह ही राम टेक के लिए निकल गये थे, महाकालिदास संस्कृत विश्विद्यालय देखने और रामगिरी पर्वत पर जाने का मन था. हम सुबह जल्द ही महाकालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय पंहुच गये थे, तब तक विश्वविद्यालय खुलने का समय नहीं हुआ था और गेट-कीपर ने द्वार खोलने से मना कर दिया. हमने बहुत विनती की कि हम बाहर से ही एक बार देखना चाहते हैं, और दिल्ली से आये हैं, संस्कृत पढाते हैं, पर वे नहीं माने. हम बड़बड़ाते हुए वापस चौराहे की ओर बढ़ गये. वहां पर आकर पोहा और चाय पीने का इच्छा हुई. सुबह नाश्ता करके नहीं निकले थे तो अब भूख भी लगने लगी थी, देखा पास में ही गर्म- गर्म ब्रेड पकौड़ा, पोहा और चाय बन रही थी, उसकी तरफ बढ गये थे. यह देखकर भी अच्छा लगा कि वहां महिला काम कर रही थी.  हमने हल्के से मुस्कराकर उससे संपर्क बनाया, उससे चाय और पोहा मांगा, उसने भी उसी मुस्कराहट से स्वागत किया. खोके के पिछवाड़े ही एक मेज और दो चार प्लास्टिक  की चेयर रखी हुई थी, हम तीनों वहीं जम गये थे, महिला पोहा परोसने लगी तो मैने केवल पोहा मांगा, क्योंकि उसमे डाले जाने वाली ग्रेवी में मिर्ची थी. मैने दो प्लेट चाय के साथ पोहा लिया. स्वादिष्ट था, खाते- खाते उनके साथ हल्की- फ़ुलकी बातें भी होने लगी थी, दो चार आदमी भी वहीं आ गये थे, उनमे एक नौजवान लड़का और एक दस एक साल का लड़का और  था, एक और  आदमी शायद वह उस छोटे लड़के का बाप होगा, बैठ गये थे. हमने उनसे कालिदास के बारे में कुछ जानकारी लेने चाही, लेकिन उनको इस बारे में कुछ ज्यादा नहीं पता था. वह नौजवान राम नाम का गमछा कंधे पर डाले था, बातूनी भी था, आधी- अधूरी जानकारी उसे थी. भन्ते जी ने उससे पूछा की यहां पर क्या है देखने के लिए, उसने तपाक से कहा कि एक विद्वान आदमी की मूर्ति  लगी है.जो बहुत ही ज्यादा पढा – लिखा है, मैने पूछा कितना पढा है , उसने जवाब में कहा कि बहुत ही ज्यादा जो आंबेडकर  और गांधी से ज्यादा पढा हुआ है. हम उनके मुंह से ये शब्द सुनकर दंग रह गये.  अर्चना ने उसे थोड़ा सा टोका कि तुम ये गमछा  और इतनी अंगूठी क्यों पहने हो? ताबीज भी पहने हुए था तो उसने उससे इसका कारण जानना चाहा. नौजवान ने तपाक से कहा कि अपनी -अपनी श्रद्धा है, कोई सिख को मानता है, कोई ईसाई, कोई मुसलमान, और  भन्ते जी को देखते हुए-कोई बुद्ध को मानता है. मैने आगे बहस न हो और कुछ ओर जानकारियां उससे ली जाये , सोचकर बात को टालते हुए अर्चना की ओर चुप रहने का इशारा किया, मैने पूछा- “तुम कितना पढे हो”  तो बताया- हम तो कुछ नहीं पढे, पर पढे लिखों से कम भी नहीं (हंसकर कहा) हम अब उससे ओर भी बहुत कुछ जानना चाहते थे, उससे पूछा की आप बाबासाहेब आंबेडकर को कैसे जानते हो, तो उसने कहा सुना है कि वे पढे लिखे थे. कालिदास के बारे में उसने बताया कि एक राम का मन्दिर है पहाड़ी पर . वहीं पर कुछ है. तो हमने फ़िर से उसे उसी विद्वान व्यक्ति के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया की आप लोग जाकर देख लीजिए. हमने बहुत सारी बातें करते हुए अपना नाश्ता कर लिया था, पर मैं उस नौजवान में एक अलग तरह का स्वाभिमानी व्यक्तित्व देख रही थी. उसका अल्हड़पन से बात करना, बेहिचक बाते करना, मन को अच्छा लग रहा था, मैने उससे यूं ही पूछ लिया कि तुम करते क्या हो, और उसने बड़े अन्दाज से कहा-“साफ़ सफ़ाई का धन्धा करता हूं”, बस इतना सुनना था कि मैं आवाक रह गयी. इतना स्वाभिमान, अपने काम पर गर्व मैं पहली बार सुन और देख रही थी, ऐसा नहीं था कि वह यह काम करता है तो कोई महान काम कर रहा है, परन्तु उसके काम से उसे कितना सुकून  है वह यह दिखा रहा था. उसने कितने आसान शब्दों में कह दिया था. बस…… आगे कुछ और पूछने की हिम्मत नहीं हुई, मैं इधर-उधर देखने  लगी थी. पर उसके चेहरे को देखकर लगा ही नहीं कि वह बाते नहीं करना चाहता. उसने बताया कि वह इलाहबाद का रहने वाला है, वहां उनके साथ बहुत छुआछूत किया जाता है, इसलिए हम लात मारकर यहां नागपुर में आ बसे थे, उसके पिता जी आये थे, और उसका जन्म भी यहीं पर हुआ, इसलिए वह मराठी बहुत अच्छे से बोल रहा था, अर्चना और भन्ते जी ने कहा कि ‘अरे! ये तो अपना ही है, आप तो हमारे अपने हैं.’ यह सुनकर उसका वहां से उठकर जाने का मन नहीं हुआ. हमने भी उसे अपने साथ पहाड़ी पर जाने के लिए कहा तो पहले तो उसने नानुकर की पर उसका भी मन साथ में जाने का ही था, शायद हर रोज के काम से वह भी अपना समय इसमे निकालना चाह रहा था, और भी बहुत सी बातें हुई उसके साथ, पर उसके जातीय गर्व से एक सहानुभूति भी बनी कि जैसे किसी को भी अपनी जाति में पैदा होने का गर्व होता है, उसे भी वही था. उसने अपने आपको किसी से कम नहीं माना.



पढाई के बारे में बात की तो उसने कहा-‘नहीं पढ पाया फ़िर जब समझ बनी तो तब तक टाईम निकल चुका था, अब पढकर क्या करना, मतलब अब तो मस्ती के दिन हैं , शादी करके घर बसाने के दिन है, अब कैसे पढाई होगी !’ भन्ते जी ने अर्चना की ओर इशारा करके कहा कि ‘देखो ये तो अभी भी पढ रही है, तुम भी पढ सकते हो.’  पर उसने जैसे हैरानी से हम तीनों की ओर देखा और मानो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया था.  मैने उससे उसका नाम पूछा तो उसने ‘अमरूत’ बताया, मेरी हंसी छूट गयी उसका नाम सुनकर, मैने कहा खाने वाला अमरुद! वह मेरे चेहरे की ओर देखने  लगा था. भन्ते जी ने कहा, ‘ मराठी में बोला है , अमृत है.’ मुझे भला सा लगा था वह, कैसे एक नौजवान, जो दूसरा काम भी तो कर सकता है, पर यहीं धन्धा क्य़ूं, क्या इसलिए ही हरियाणा और लगभग उत्तरी भारत में सफ़ाई पेशे से जुडी जातियों की यही उनकी जजमानी होती है और विरासत जो वह पीढी दर पीढी ढोता चला जा रहा है. वह हमारे साथ जाना चाहता था. हमने भी उसे साथ ले लिया, उसने भी चौड़ा होकर कहा कि मैं आप सब को सब कुछ दिखाऊंगा. हम अब रामटेक के उस चौराहे को पार करके रामगिरी, जिसे आज रामगढ कहा जाता है चल पड़े. वहां वह सब रास्तों के बारे में बताता हुआ जा रहा था. एक स्थान पर जो उंचाई से नीचे की तरफ झांकने से दिखायी दिखाई दे रहा था, बताया की यहां पर अस्थियां प्रवाहित की जाती है यहां पिन्ड़ दान करने से स्वर्ग मिलता है, पुण्य मिलता है, इसलिए लोग अपने मृतक का यहां पर पिण्ड दान करते हैं.

तस्वीरों को लेते हुए हम ऊपर कालिदास संग्राहलय में पंहुच गये थे, पर वह गाड़ी के साथ ही रुक गया था, मानो संकेत दे रहा हो , ‘  बड़े बडे लोग अन्दर जाये मैं क्या करुंगा? ‘ हमने वहां कालिदास की आदमकद तस्वीर देखी. चारों तरफ़ हरियाली ही हरियाली. बीच में गुम्बद के अन्दर लगी कालिदास की आदमकद तस्वीर..उसी गुम्बंद में एक व्यक्ति योग कर रहा था, जैसे ही हम अन्दर जाने को हुए तो उसे देखते ही वापिस मुड़ गये. थोड़ी देर इन्तजार किया, लेकिन वह बाहर नहीं निकला. समय के अभाव में हम इन्तजार नहीं कर सकते थे इसलिए अंदर चले गये, बिना उसकी तरफ़ देखे ही मैने उससे कुछ जानकारी लेना चाही. तस्वीर की ओर इशारा करके जब उससे पूछा कि “ये कौन है”, उसने ना में सिर हिलाया, नहीं पता. उसके बारे में उन्हें कुछ नहीं पता था पर अपनी शेखी बघारते हुए अपने योग के गुर दिखाने के लिए तैयार हुआ तो मुझे थोडी झेंप सी हुई, क्योंकि उसने छोटा सा कच्छा पहना था,  मैने चलो कहा तो भन्ते जी मुझे देखकर समझ गये कि मैं यहां ओर उसे देखते हुए नहीं खड़ी रह सकती हांलाकि अर्चना योग दिखाने के लिए कह चुकी थी पर मुझे अच्छा नहीं लग रहा था तो हम लोग वहां से निकलकर उस ओर गये जहां पर कालिदास द्वारा रचित मेघदूत, अभिज्ञानशांकुतलम, विकर्मोवर्शीयम, रघुवंशम् आदि खुदे हुए थे- चारो तरफ़ गोलाकर दिवार पर. वहां पर हम सब ने कुछ फोटो ली. अर्चना ने बताया कि पूरी किताब ही अंकित है उस दिवार के पीछे. मैने सभी की तस्वीरें ली, ताकि अपने विद्यार्थोयों को सब दिखाई जा सके.

संग्राहलय देखने के पश्चात हम राममन्दिर की ओर बढ गये थे, देखने की उत्सुकता थी कि  जो रामायण में लिखा है, उन जगहों में कितनी सच्चाई है, बस इसी कारण हम सब- मैं, अर्चना और भदंत जी उस ओर आ गये थे. ऐसा माना जाता है कि यहां पर राम अयोध्या से निर्वासित होने के बाद वनवास काटने के लिए घूमते हुए अगस्त मुनि के आश्रम में रुके थे. वहां पर वराह अवतार की एक प्रतिमा भी देखी , पर वहां पर इसका औचित्य हम नहीं समझ पाये थे. और भी बहुत कुछ देखा. काफ़ी देर तक हमने चर्चा की कि बहुत सारे प्राचीन बौद्ध विहारों को बिगाड़कर मन्दिर की शक्ल दे दी गयी है. कुछ तस्वीर भी ली. जब मैने अमृत से फ़ोटो लेने के लिए अपना आईपैड़ पकड़ने के लिए कहा तो उसने झिझकते हुए अपना हाथ आगे बढाने की बजाय हमारे ड्राइवर भाई को बोल दिया, मैं उसकी मनोदशा समझ रही थी. इस सफ़र के दौरान दिमाग में चल रहा था मेरी अपनी बिताई जिन्दगी के वो पल जिनसे मैं गुजर चुकी थी, जिससे यह नौजवान गुजर रहा था. मैने अगली जगह पर फोटो लेने के लिए अपना आइपैड़ उसी को जानबूझकर दिया. उसने इसे लेने से पहले हाथों को अपनी मैली कुचैली पैंट से ऐसे रगड़े कि कहीं ये उसके हाथों से गन्दा न हो जाये. मेरे भीतर उसे देखकर कुछ टूट  सा रहा था, और इससे पहले मेरी आंखों की नमी को कोई भांपता, मैने चशमा लगा लिया था और पूरी यात्रा के दौरान वही मेरा सुरक्षा कवच बना रहा. बचपन की भोगी पीड़ा, अपमना, हर चीज का अभाव- कुछ पाने की लालसा सब आंखों के आगे छाता जा रहा था. कैसे मेरे समुदाय के लोग अपनी जिन्दगी को मल और गन्दगी को ढोते हुए बीता देते है, सदियां बीत गयी, आजादी के बाद भी कितना परिवर्तन आया अभी तक…………

 मैं बार-बार इन सब से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी. अपना ध्यान मैने मन्दिर को देखने में लगा लिया था. मुख्यधारा के साहित्य में कितनी सच्चाई है और क्या प्राचीनकाल में बने इन मन्दिर में बौद्ध विहारों के निशान  भी मिलते है, इन सब का विश्लेषण करने के लिए हमने देखने का मन बना लिया था, हालांकि मन्दिर बहुत उंचाई पर था, अर्चना और  अमृत और हमारा ड्राइवर नीचे ही रुक गये. मैं और भन्ते जी गये. राम मन्दिर कहे जाने वाले इसमें सीता की रसोई नाम से बने मन्दिर को हमने देखा, ऐसा माना गया है कि  जब सीता, राम और लक्षमण के साथ थी तो यहां पर भोजन तैयार करती थी. कौशल्या के मन्दिर को भी देखा, जब कौशल्या, सीता राम और लक्षमण को अयोध्या वापिस लौटने के लिए कहने आयी थी, लक्षमण के मन्दिर को देखा. राममन्दिर कहलाने वाले इस मन्दिर की स्थाप्य कला, मूर्ति कला को देखकर मन गदगद हो रहा था, भव्य था – इसमे कोई शक नहीं. चारों तरफ़ बन्दर ही बंदर थे, हरी-भरी हरियाली के बीचों बीच पहाड़ी पर बने इस मन्दिर को देखने के बाद बहुत से प्रश्नों ने जन्म ले लिया था. दुख हुआ यह देखकर की मन्दिर में विधवा और बूढी औरतें राम के नाम पर जाप करती हुई अपना वैधव्य और जीवन के अन्तिम क्षण काट रही थीं. मन्दिर में जगह -जगह पर अलग- अलग एंगल बनाकर बैठे आर्ट के विद्यार्थियों के द्वारा मन्दिर को अपनी ड्राइंग सीट पर उतारा जा रहा था, ये छात्र नागपुर विश्वविद्यालय के आर्ट विभाग के छात्र अपने शिक्षकों सहित वहां पर थे. यहां पर बड़ी मात्रा में बन्दर भी थे.

अब हम लोग वापिस लौट रहे थे तो हमने भूने हुए सिंघाड़े और बेर लिये, जो स्वादिष्ट थे. अपनी गाड़ी में बैठकर हम लोग वापिस रामटेक की ओर आ गये थे. हरिभरी हरियाली, शुद्ध हवा एक सुखद अहसास भर रही थी, अमृत ने जोर से चिल्ला कर कहा-“मैड़म यहां से फोटो लीजिए न एक बार”, गाड़ी रोक कर, मैने उसे हल्के से डांटा भी , ‘  भन्ते जी नाराज हो जायेंगे’.  पर वह नहीं माना और रुकने के लिए कहता रहा. लापरवाह था, अपना मन-मौजी भी तो था. थोड़ी सी खुशी अगर इसे मिल रही है तो क्यूं  न दी जाये, मैने उसकी बात मानकर गाड़ी रुकवाकर कुछ तस्वीरे वहीं पहाड़ी से ली. वह पूरे रास्ते वहां के बारे में बाते करता रहा, बातुनी बहुत था. हम लोग अब नीचे की ओर आ गये थे. रामटेक के उसी चौराहे पर, जहां से दायीं ओर मुड़कर चले तो कुछ फ़्लांग पर महाकवि कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय और दूसरी ओर बस्ती थी. मैने फ़िर से विश्वविद्यालय देखने की इच्छा जताई तो सब ने कहा- “चलो, एक बार ओर चल पड़ते है”, अब तो विश्वविद्यालय का द्वार खोल ही देंगे, हम लोग इस पर बात कर ही रहे थे कि वह नौजवान तपाक से बोला- “क्या मतलब, उन्होंने गेट नहीं खोला था? वह जानने को उत्सुक हुआ, तो हमने उसे सुबह के बारे मे सब बता दिया, कि कैसे उन्होने विश्वविद्यालय का गेट खोलने से मना कर दिया था. तैस मे आकर उसने कहा- ‘अरे……….!  ऐसे वह ….कैसे कर सकता है, मै अभी देखता हूं उसको. ‘ मैं मन ही मन हंस रही थी अपने लोगों की दबंगी पर, निडरता पर, बुलंद हौसलों पर कि कैसे हर वक्त लड़ने-भीड़ने के लिए तैयार रहते है हर समय, गलत चीज का विरोध करने के लिए तुरंत तैयार, भले ही सामने वाला चलाकी से उन्हें फ़सा ही रहा हो. मैं भी ऐसा ही करती थी. परन्तु जैसे- जैसे समझ आने लगा कि कैसे लोग धूर्तता  से हम लोगों को आगे करके मरवा देते है. ज्यादातर यहीं तो हो रहा है. हर जगह पर इनका इस्तेमाल किया जाता है और ये भी अपने छोटे छोटे स्वार्थों से अपना इस्तेमाल होने देते है. सब का सामना करने को तैयार. ये कभी नहीं होता कि दो अक्षर पढकर थोड़ा सी बुद्धि भी रखे. खैर हम लोग विश्वविद्यालय की ओर चले पड़े. वही हुआ जो नौजवान ने कहा था. वह नीचे उतरा और उनकी तरफ़ गया, पता नहीं उसने क्या कहा कि गेट कीपर ने झट से गेट खोल दिया विश्वविद्यालय का . भन्ते जी ने भी ,’ कहा आपकी तो बड़ी चलती है.’ मुझे पता नहीं खुशी हुई या दुख. हम लोग अन्दर चले गये. कालिदास का स्टैच्यू प्रांगण  में ही लगा था. बहुत उंच्चा, उस पर परिचय के साथ उनके ग्रंथों की चर्चा भी अंकित थी. अन्दर से कोई आया और उन्होने बिना  इजाजत के तस्वीरें  लेने से मना कर दिया, थोड़ा बुरा लगा और हम लोग बाहर आ गये.रामटेक के उसी चौराहे पर जहां पर हमने अमृत को लिया था, वहीं पर छोड़ दिया. उसे बाय- बाय कहा और हम लोग नागपुर की ओर बढ गये.



रास्ते भर बाबा साहेब के कहे शब्द याद आते रहे कि ‘अगर जातियां खत्म न हो तो अपनी जाति पर गर्व करो.’ क्या अमृत वही तो नहीं कर रहा था! जहां एक तरफ़ हमारी इसी कौम से निकले बड़े बड़े अधिकारी भी ये कहने का साहस नहीं जुटा पाते कि वह सफ़ाई कर्मी का बेटा या बेटी है, और ये हमारी जाति है. अपना नाम तक बदल कर रख देते हैं  और सरनेम भी बदलकर गुप्ता, शुक्ला, यादव और भी नाम अपने टाइटल बना कर रख लेते है ऐसे में इस नौजवान ने कितनी आसानी से अपना पेशा बता दिया था. उसे भी अपना काम और अपनी जात पर उतना ही गर्व था जितना किसी और  को होता है.

तुम्हें बदलना ही होगा: उपन्यास में विमर्श

विवेक कुमार यादव

शोधार्थी,हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविघालय,मो० 9599871810, ईमेलः—vivekk1906@gmail.com

सुशीला टाकभौरे का उपन्यास ‘तुम्हें बदलना ही होगा’ दलितों, स्त्रियों और दलित-स्त्रियों के संघर्ष की कहानी कहता है. शिक्षण संस्थाओं में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को उजागर करता यह उपन्यास दलित जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालता है. सुशीला टाकभौरे के बारे में अनिता भारती कहती हैं कि “सुशीला टाकभौरे दलित महिलाओं को संघर्ष की आदर्श स्थिति में दिखाती हैं. वे पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं है. वे स्वाभिमानी हैं. लड़ाकू हैं. किसी भी अत्याचार को खामोशी से न सहकर तर्क-वितर्क करती हुई, मुँह तोड़ जवाब देती हुई, डंडा उठाकर अपराधियों से भिड़ जाती हैं.”

उत्तर-आधुनिकता के शुरू होने के साथ ही नयी तकनीकों तथा मुक्ति आन्दोलनों-दलित, स्त्री एवं आदिवासी ने सत्ता, समाज और संस्कृति की मूलभूत संरचनाओं, प्रक्रियाओं और विचारधाराओं को जो चुनौती दी उससे सब कुछ विभेदित, विघटित एवं विकेन्द्रित हो गया. ब्राह्मणवादी सत्ता, पितृसत्ता और पूँजीवादी सत्ता के वर्चस्व को चुनौती मिलने लगी. एक के बाद एक मृत्यु की सूचना मिलने लगी. ईश्वर, इतिहास, पाठक, मनुष्य, आधुनिकता, कला, विचारधारा, लेखक और साहित्य सभी के मृत्यु की घोषणाएँ होने लगीं. कुछ भी निश्चित, परिपूर्ण, अंतिम, शाश्वत और सार्वभौमिक नहीं रह गया. जो हाशिये पर थे, बहस के केन्द्र में आ गये.

हाशिये के लोगों ने पहले से स्थापित सत्ताओं के खिलाफ संघर्ष किया. परिणाम स्वरूप नई प्रकार की सत्ताओं का उदय हुआ जो पहले से कम क्रूर है. उपन्यास में भी एक जगह सुशीला टाकभौरे ने यह बात कही है “पहले का प्रगतिवादी, प्रयोगवादी और जनवादी चर्चा पर केन्द्रित आधुनिक काल, अब अपने उत्तर-आधुनिक काल के रूप में महिला विमर्श और दलित विमर्श पर बोलने और बोलते रहने पर मजबूर हो गया है क्योंकि अब इनकी चर्चाएँ, अपने देश की सीमाओं को पार करके, विश्व स्तर पर हो रही हैं.”

तुम्हें  बदलना ही होगा’ उपन्यास में धीरज कुमार और महिमा भारती नाम के दो चरित्रों के माध्यम से दलितों और स्त्रियों के शोषण और उनके प्रतिरोध को दर्शाया गया है. पूरे कथानक में मनुवादी सवर्ण मानसिकता के लोगों का बोलबाला है. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग गरीबों और मजदूरों का शोषण करते दिखते हैं. दिल्ली जैसे बड़े शहर में भी जातिगत भेदभाव की उपस्थिति को दर्शाया गया है. “वे आमने-सामने तो इन लोगों के साथ सम्मान से बातें करते, मगर उनका यह व्यवहार दिखावटी है. वे उनसे छुआछूत मानते हैं.”  दलित जाति के लोगाें को किराए पर घर न मिलने की समस्या पर काफी जोर दिया गया है. दिल्ली में महिमा के चाचा हों या महाराष्ट्र में धीरज कुमार, दोनों ही जगहों पर इस भेदभाव को महसूस किया गया है.


देश में कानून और आरक्षण व्यवस्था होने के बावजूद दलितों, पिछड़ों को रोजगार से महरूम रहना पड़ता है. “उनका (ब्राह्मणवादी) यथाशक्ति प्रयत्न यही रहता है कि संस्था के टीचिंग और नॉनटीचिंग सभी लोग ब्राह्मण ही हों मगर सरकारी कानून के रहते वे ऐसा नहीं कर सकते. किसी तरह छोटी-बड़ी चालाकी के साथ वे अपना प्रयोजन सिद्ध करते रहते हैं…..हर वर्ष यह बहाना दिखा दिया जाता है कि उचित कैन्डीडेट नहीं मिला.”  संविदा पर अपने उम्मीदवार रख लिए जाते हैं. ओबीसी के पद कुछ समय तक खाली रहने पर सामान्य में तब्दील कर दिए जाते हैं. इस प्रकार पिछड़ों और दलितों को नौकरियों से दूर रखा जाता है.

तुम्हें बदलना ही होगा’ उपन्यास में ज्ञान की शक्ति को महत्वपूर्ण बताया गया है. पढ़े-लिखे होने की वजह से ही महिमा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है. तभी तो वह शांति निकेतन महाविघालय प्रबन्धन की कोशिशों के बावजूद भी प्रोफेसर की नौकरी लेती है. धीरज कुमार अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं साथ ही दलित बच्चों को शिक्षित और जागरूक करते हैं.



चमनलाल जैसे पैसे और रूतबे वाले पुरुष वातानुकूलित कमरों में बैठकर महिलाओं की समस्या पर चर्चा करते हैं. आश्चर्य और विडम्बना यह है कि इस चर्चा में कोई स्त्री भाग नहीं लेती या उसे भाग नहीं लेने दिया जाता. पुरुष स्त्रियों की समस्याओं पर बात करते दिखते हैं किन्तु वे समस्याओं को अपने कार्यक्षेत्र के आधार पर परिभाषित करते हैं. कोई इतिहास पढ़ने पर नारी सबलीकरण की सम्भावना जताता है, कोई स्त्रियों को जलने से बचने के उपाय बताकर, कोई उनकी स्थिति सुधारकर, कोई वृक्षारोपण करके, कोई पुरुषों द्वारा अपनी बहन बेटियों की रक्षा करके उनको सबल बनाने की बात करता है.  तमाम गैर सरकारी संगठन महिला सशक्तिकरण के नाम पर सरकारी पैसा लेकर ऐशो आराम में खर्च करते हैं. खानापूर्ति के लिए मीटिंग करते हैं. इन मीटिंगों में महिलाएँ केवल खाने और पीने का इन्तजाम करती हैं. “घर की महिलाएँ, रसोईं और दावत की व्यवस्था संभालने में लगी हैं.”


लैंगिक सत्ता का बोलबाला पूरे उपन्यास में दिखता है. “जिनका पुत्र होता है, वे माता-पिता स्वर्ग ही जाते हैं.”  “लड़की का क्या है, उसे अपनी ससुराल ही जाना है. बाद में लड़के ही साथ रहेंगे.”  “लड़कियाँ ही हों, पुत्र न हों, तब उनका पति अपनी बेटियों और पत्नी की जिम्मेदारी भूलकर, पुत्र पाने के लिए दूसरा विवाह कर लेता है.”  लड़कों को लड़कियों से बेहतर मानने की प्रवृत्ति आज भी समाज में देखने को मिलती है. उपन्यास जहाँ उत्तर-आधुनिकता की बात करता है तो आज के समय में स्थिति पहले से बेहतर हुई है. सुशीला टाकभौरे ने केवल धीरज कुमार को महिलाओं के मुद्दे पर संवेदनशील दिखाया है और उसकी वजह उनका दलित होना दिखाया है. उन्होंने दलितों में मानवेतर गुण दिखाया है. ऐसा वास्तव में नहीं होता कि दलित पुरुष स्त्रियों का शोषण नहीं करता या उसके भीतर कोई बुराई नहीं होती. कौशल्या बैसन्त्री ने अपनी आत्मकथा दोहरा अभिशाप’ में यह दिखाया है कि कैसे दलित-स्त्री समाज में दलित होने की वजह से और घर के अन्दर स्त्री होने की वजह से शोषित है.


उपन्यास में यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है कि सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में जो बदलाव आये हैं वे जागरूकता से कम डर की वजह से ज्यादा है.आंबेडकर लोगों की नजरें, उनके (ब्राह्मणवादी) आस-पास मौजूद है. वे अब अपनी पहले की गलती दोहराने में डरने लगे हैं.”  गैर दलितों द्वारा दलितों के अधिकारों की वकालत करने पर सुशीला टाकभौरे इसे षड्यन्त्र की तरह देखती हैं. “शोषित वंचितों के बढ़ते आन्दोलनों को शांतिपूर्ण ढंग से रोकने के लिए, हम स्वयं उनके आंदोलनों का नेतृत्व करें. उन्हें अपने ढंग से समझाने-बहलाने के लिए उनके हित सम्बन्धी कार्यों को अपने हाथों सम्पन्न करें. इससे समाज की पुरानी व्यवस्था भी बनी रहेगी और हमारी समाज सेवा से हमारा सम्मान भी बढ़ेगा.”  हजारों वर्षों तक इसी तरह की चालाकियों से ठगे जाने के बाद इतनी जल्दी विश्वास नहीं पनप सकता. दलितों का यह अविश्वास फिर से ठगे जाने के भय से उत्पन्न हुआ है.
स्त्रियों के आन्दोलन के विषय में भी उनका विश्लेषण यही रहता है. पुरुषों के बहकावे में आकर “वे (स्त्रियाँ) अपने शुभचिन्तक पुरुष वर्ग के प्रति अति कृतज्ञता के साथ अति विनम्र बनती जा रही हैं.”  जिस तरह औरत के औरतपन को पुरुष जैविक रूप में और इसी तरह मानसिक रूप में नहीं लांघ सकता उसी तरह गैरदलित दलित के अनुभव संसार में जैविक ढंग से प्रवेश नहीं पा सकता.  स्त्री और दलित विमर्श का एक वर्ग हमदर्दी को संदेह की नजर से देखता है. धीरज कुमार को जातिगत भेदभाव झेलना पड़ता है. महिमा भारती स्त्री होने की वजह से लैंगिक भेदभाव का सामना तो करती ही हैं साथ ही दलित होने की वजह से सवर्ण स्त्रियों द्वारा भी शोषित होती हैं. महिमा के कॉलेज की महिला सहकर्मी उसे कहती है. “यह मायावती बहनजी की बहन, हमारे बीच रहकर, हमारी ही नाक काट रही है.”  वर्ण व्यवस्था को ईश्वर द्वारा बनाई बताकर उसे न बदलने की सिफारिश ब्राह्मणवादी लोग करते हैं. “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को अलग बताने वाली वर्ण व्यवस्था हमारे हिन्दू धर्म की पहचान है. इसे बदलने की बात क्यों की जा रही है.”  धर्मपालन की आड़ में ही ब्राह्मणवादी सामंती ताकतों ने दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार किया, स्त्रियों को सती होने के लिए विवश किया.

तुम्हें बदलना ही होगा’ उपन्यास के शुरू में ही लेखिका ने दलितों की बदलती स्थिति का जिक्र किया है. उनके अनुसार “वर्णवादी पुराणपन्थी देश अब शिक्षा और वैज्ञानिक प्रगति से जुड़कर आधुनिक बनता जा रहा है. लोग पुराने रीति रिवाजों को बदलने और पुरानी रूढ़ियों, परम्पराओं को तोड़ने की बातें करने लगे हैं. वर्ण भेद और जाति भेद का विरोध करने के लिए दलित लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं.”  प्रतिरोध के स्वर पूरे उपन्यास में जगह-जगह दिखाई देते हैं. कॉलेज के पद पर अन्य किसी का अप्वाइंटमेंट होने पर महिमा अपने दो साथियों के साथ मिलकर इस भेदभाव और अन्याय का विरोध करती है और कॉलेज प्रशासन को अपना फैसला बदलने पर मजबूर करती है. जाति के आधार पर पहचान कराये जाने पर महिमा कहती है, “मैडम, मेरा परिचय सिर्फ जाति से नहीं, मेरे व्यक्तित्व और कृतित्व से है.”  छात्र नेता बसन्त तिवारी ने धीरज को आन्दोलन न चलाने की धमकी दी तो धीरज ने विरोध किया और कहा. “तुम्हारी आर्थिक समानता का आन्दोलन तुम्हारे लिए है, हमारे लिए नहीं है. हमारी लड़ाई हमें स्वयं लड़नी है.”

सेनेटरी इंस्पेक्टर द्वारा अपने माता-पिता को शोषित होता देख धीरज ने उनसे नौकरी छुड़वा दी और उन्हें लेकर आपने साथ चला गया. चमनलाल के बहुत कहने पर भी महिमा अपनी नौकरी नहीं छोड़ती और अपनी आर्थिक स्वतन्त्रता पर कोई आँच नहीं आने देती. चमनलाल की लाख कोशिशों के बावजूद महिमा कमेटी की मीटिंग में आती है और अब तक चले आ रहे घूँघट करने के संस्कार को ठुकराते हुए पुरुषों की बेतुकी दलीलों का विरोध करती है.

सुशीला टाकभौरे ने उपन्यास में चरित्रों का निर्माण किया है. महिमा गरीब दलित घर की लड़की है जो अपने चाचा—चाची के साथ रहकर, कष्ट झेलते हुए अपनी शिक्षा पूरी करती है. बाहर उसे जातीय भेदभाव भुगतना पड़ता है जबकि घर के भीतर उसके चाचा—चाची उसका शोषण करते हैं, उससे घर के सारे काम करवाते हैं.  धीरज कुमार के बारे में बहुत विस्तार से न बताकर उनके पढ़ाई के दौरान और नौकरी के लिए भटकते वक्त हुए कष्टों को दिखाया है. दोनों ही चरित्रों के माध्यम से लेखिका ने यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि अभावों में जीकर सफल होने वाले व्यक्ति के मन में अपने आस पास के अपने जैसे लोगों के प्रति सहानुभूति और कर्तव्य का भाव होता है. वे जिस जलालत से गुजरते हैं वे नहीं चाहते कि उनके जैसे और लोग भी वैसे ही कष्ट झेलें.


दोनों ही चरित्रों का कार्यक्षेत्र शिक्षा जगत रहा है. हालाँकि दोनों ने वापस अपने मूल निवास जाकर लोगों को अधिकारों और शिक्षा के प्रति जाग्रत किया. बड़े-बड़े शहरों में पढ़े लिखे लोगों द्वारा निचली जाति के गरीबों और स्त्रियों का शोषण होता दिखाया गया है. इन तमाम शोषण दमन एवं भेदभाव का दोनों ने प्रतिरोध किया और अपने अधिकारों को हासिल किया. उपन्यास के अन्त में लेखिका ने दोनों ही दलित पात्रों का विवाह सवर्ण से कराकर बाबा साहब अम्बेडकर के रोटी-बेटी के सम्बन्ध को साकार होता दिखाया है. अन्तर्जातीय विवाह को सामाजिक विषमता मिटाने के एक महत्वपूर्ण हथियार की तरह दिखाया गया है.

उपरोक्त सभी उत्तर-आधुनिक विशेषताओं के रहते हुए भी उपन्यास में समय का सहज प्रवाह नहीं दिखता. इसमें जीवन नहीं बल्कि विमर्श चलता है. बात—बात पर भाषणबाजी और नारेबाजी की गई है. घटनाओं को बेमतलब ही अतिनाटकीय बनाया गया है. जैसे “महिमा ने क्रोध से जलते हुए वाक्य-बाणों का निशाना साधते हुए हुंकार भरी. साथ ही अपने सिर को हल्का सा झटका दिया. एक ही झटके में उनका जूड़ा खुल गया और लम्बी बनी केश राशि उनके कन्धों और पीठ पर फैल गयी. महिमा के इस रौद्र रूप को देखकर उपस्थित लोग हर्षित हो गये. धीरज कुमार ने प्रसन्नता के साथ नारा लगाया नारी शक्ति जिन्दाबाद….नारी शक्ति आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है….नारी सबलता जिन्दाबाद…..”  धीरज कुमार के विषय में सारी जानकारी होने के बाद भी चमनलाल धीरज की जाति कैसे नहीं पता लगा पाये, जबकि वे महाविघालय में ट्रस्टी भी है? शादी से पहले ही महिमा एक सक्रिय महिला थी. वह अपने अधिकारों के प्रति सजग थी. तो चमनलाल के साथ विवाह होने के पश्चात, चमनलाल के घर में अधिकार और सम्मान के लिए प्रतिरोध करने में इतना अधिक समय क्यों लग गया? हनुमान नगर और रघुजी नगर जैसे नाम पॉप कल्चर वाले मेट्रोपोलिटन शहरों में फिट न बैठने वाले लगते हैं.

लेखिका ने पूरे उपन्यास में सभी विपरीत विचारधारा वालों के बड़ी सहजता से हृदय परिवर्तन कराये हैं. दलितों को, स्त्रियों को उनके अधिकारों के लिए समझाने में महिमा या धीरज को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. एक या दो बार के समझाने पर ही लोगों ने उनकी बात मान ली. धर्म को लेकर या संस्कृति को लेकर जो आस्था लोगों के मन में होती है उसे बदलने में दशकों लग जाते हैं. जितनी आसानी से दलित पात्रों ने पाण्डे जी, शर्मा जी आदि को मारा-पीटा है और उनकी बेइज्जती की है वह वास्तविक जीवन में निहायत ही अस्वाभाविक और बनावटी लगता है.
चमनलाल और उनके पूरे परिवार का हृदय परिवर्तन होने के लिए महिमा और धीरज का भाषण ही काफी हो गया. जो सत्ता हजारों सालों से शोषण करती रही है. जिसको बदलने के लिए फुले, आंबेडकर आदि व्यक्तियों ने लम्बी लड़ाई लड़ी और वो लड़ाई आज भी जारी है. उसको बदलने में लेखिका ने बहुत जल्दबाजी दिखा दी. यह सहज, स्वाभाविक और वास्तविक नहीं लगता. उपन्यास की भाषा सरल एवं प्रवाहमयी है. जगह-जगह अंग्रेेजी के शब्दों का प्रयोग है जैसे पोस्ट, फ्लैट, अपार्टमेंट, टीचिंग, नॉनटीचिंग, कैन्डीडेट, मैनेजमेंट, ऑफिस, कॉलेज, टेन्डर, कैन्टीन, सर्वेन्ट, क्वार्टर, परमानेन्ट आदि.

बेटी संज्ञा : बहू सर्वनाम

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

” हमारी बिट्टो तो बहुत बढि़या खाना बनाती है , आप उंगलियां चाटते रह जाओ.बिट्टो के ऑफिस में सब उसकी बड़ी तारीफ करते हैं , मज़ाल है कि काम आधा छोड़कर उठ जाये ! कभी कभी तो दस बज जाते हैं ….. अभी सो रही है , एक इतवार ही तो मिलता है ज़रा देर तक सो लेती है.बड़े लाड़-प्यार में पली है हमारी बिट्टो ……”

” इसे तो चाय तक ढंग की बनानी नहीं आती.कभी फीकी तो कभी मीठी चाशनी ! … पता नहीं , इसकी मां ने क्या सिखाया है इसे ! आजकल तो सभी काम करती हैं पर काम करने का ये मतलब थोड़ी है कि रसोई दूसरा संभाले …इसे घर गिरस्ती चलानी नहीं आती … महारानी सो रही है अब तक …..”

यह पहचानना कतई मुश्किल नहीं है कि कौन सा संवाद किसके लिये कहा जा रहा है ! किसी दकि़यानूसी मध्यवर्गीय भारतीय परिवार में कभी आप जायें जहां एक ही उम्र की दो लड़कियां हैं – एक घर की बेटी है , जिसका एक नाम है और वह अपने नाम से बुलायी जाती है.दूसरी बहू है – नाम उसका भी है पर नाम होते हुए भी वह ‘यह-वह’ , ‘इस-उस’ के सर्वनाम से जानी जाती है.

एक औसत सास की त्रासदी ही यह है कि वह स्वयं जि़ंदगी भर स्त्री बनी रहती है पर सास बनते ही अपना  स्त्री होना भूल जाती है| जिस बात के लिये वह अपनी बेटी की तारीफ करती है , उसी के लिये उसकी बहू उपहास और निंदा का पात्र् बनती है.एक ही स्त्री अपनी बेटी को आधुनिकता और नयेपन को स्वीकारने की छूट देती है और बहू के रवैये के लिए उसकी लानत मलामत करती है ! जिन्हें अपना समय याद रहता है और जो अपने समय में हुई भूलों को दोहराना नहीं चाहतीं , वे अपनी बहू के प्रति न कभी अतार्किक होती हैं , न दुराग्रह पालती हैं क्योंकि अन्तत: एक स्त्री ही स्त्री की तकलीफ़ को ज़्यादा गहराई से महसूस कर सकती है.


ऐसी ही एक समझदार महिला को मैं कभी भूल नहीं सकती जो अपनी बहू प्रीति को लेकर हमारे सलाहकार केंद्र में आई थी.देखने में बेहद खूबसूरत प्रीति गरीब परिवार से थी.बेटे ने अपनी पसंद से उससे शादी की , लेकिन कुछ सालों बाद अपने ऑफिस की एक विधवा सहकर्मी से उसके संबंध बन गये.ऑफिस से लौटते ही वह एक रिंगमास्टर की तरह घर में घुसता और किसी न किसी बात पर चिल्लाने लगता.बेटे का आतंक पूरे घर को नरक बना रहा था.बच्चे दहशत से कांपने लगते.

आम तौर पर होता यह है कि एक स्त्री अपने पति के विवाहेतर संबंध से जीवन भर जितनी भी त्रस्त  रही हो , अपने बेटे के ऐसे संबंधों को उचित ठहराती है या फिर उस संबंध का दोष भी अपनी बहू के मत्थे मढ़ देती है” इसे ही अपने पति को बांधकर रखना नहीं आया वर्ना वह इधर उधर क्यों भागता , पहले तो मेरा बेटा ऐसा नहीं था.”

…… और यहां हमारे सामने एक ऐसी सास बैठी थी जो पूरी तरह अपनी बहू का साथ दे रही थी.उन दोनों की दुनिया एक कमाऊ पुरुष के ईद गिर्द घूम रही थी.आखिर हमारी सलाह पर उस बुज़ुर्ग महिला ने घर और दोनों बच्चों को संभाला और प्रीति को छोटे बच्चों की ट्रयूशन का काम करने दिया.अब कुछ पैसे भी घर में आने लगे और अपने पांव पर खड़े होते ही प्रीति का आत्मविश्वास बढ़ा और उसने हिंसा में पति के उठते हाथ को रोकना सीखा.आज भी प्रीति अपनी सास की बहुत एहसानमंद है जिसने उसकी जि़ंदगी में आये तूफान को झेलने का हौसला दिया.

अगर एक मां होने के साथ साथ आप सास के ओहदे पर भी हैं तो अपने संबोधनों और अपने व्यवहार पर ग़ौर करें ! जैसा रवैया आपका अपनी बेटी के प्रति है, वही बहू के प्रति रखें तो बहू भी बेटी सा ही सुलूक करेगी.ग़ौरतलब है कि आपकी बहू का भी एक नाम है ! वह भी किसी घर की संज्ञा रही है ! उसे सर्वनाम न बनायें.

नरसंहारों का स्त्रीपक्ष

संजीव चंदन

बिहार के जहानाबाद कोर्ट ने सेनारी नरसंहार (जहां सवर्ण जाति के लोग मारे गये थे) के मामले में अपना निर्णय सुनाया है. कई लोग आरोपी सिद्ध हुए हैं, उन्हें सजा भी सुना दी जाएगी. इधर बारा हत्याकांड (जहां 1992 में सवर्ण जाति के लोग मारे गये थे) के दोषियों को फांसी दिए जाने की तैयारी हो रही है. 2012 में बथानी टोला (जहां दलित जाति के लोग मारे गये थे ) के दोषियों को हाई कोर्ट ने आरोपमुक्त कर दिया था और हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील आज भी लंबित है. न्याय के इसी समाज शास्त्र के बीच नरसंहारों के स्त्रीपक्ष को समझने की कोशिश की है. यह आलेख नरसंहार प्रभावित गांवों में लोगों से मिलकर लिखा गया .

उसने आत्म हत्या कर ली. पति रणवीर सेना का एरिया कमांडर था, मारा गया. पत्नी दो बार अपने गाँव की मुखिया रही. निस्संदेह जीत में उसके पति के प्रति जातीय सहानुभूति का अहम रोल था, गाँव की अधिकतम आबादी रणवीर सेना के समर्थकों की थी, इसलिए जीती. तीसरी बार वह जीत नहीं पाई -उसने मौत को गले लगा लिया. हवा में उसके चरित्र को लेकर फुसफुसाहटें तैरने लगीं .


तब बथानी टोला के अभियुक्तों को आरोप मुक्त कर दिये जाने के बाद मैं बथानी टोला सहित नरसंहार प्रभावित गांवों के दौरे पर था- कैसा है जातीय तनाव का ग्राफ, प्रभावित परिवारों की महिलाओं और बच्चों का जीवन और मनोविज्ञान घटनाओं के दो दशक बाद कितना अलिप्त हो पाया है उन खौफनाक मंजरों से?

बारा जाते हुए उसकी आत्महत्या का पता चला,  रणवीर सेना के एरिया कमांडर की पत्नी की आत्महत्या, उसके ही एरिया में मेरा गाँव भी था. किशोर अवस्था में ही उसका पति रणवीर सेना का एरिया कमांडर था, तूती बोलती थी उसकी, लेकिन वास्तव में वह अपनी जाति के भू सामंतों का एक हथियार भर था और अंततः मारा गया. उसकी पत्नी उसकी जातीय अस्मिता और ‘जाति शहीद’ के दर्जे के कारण ही मुखिया बनी थी अपने ग्राम पंचायत की.

बिहार के भू सामंतों ने जिस जातीय अस्मिता के सहारे अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए अंतिम प्रयास ‘निजी सेनाओं ‘ के सहारे किया था उसमें आर्थिक रूप से कमजोर जाति- युवा की आहुति दी गई थी,  भू सामंतों का बहुत थोड़ा दाँव पर था, संपत्ति का सबसे न्यूनतम हिस्सा. उसका पति भी एक वैसा ही युवक था, इन्हें न तो राजनीतिक दर्शन से संपन्न किया गया था और न कोई विशेष राजनीतिक लक्ष्य था उनके पास , लक्ष्य था तो सिर्फ जाति-भाइयों की हत्या का बदला.

बारा , जहाँ 1992 में यानी रणवीर सेना के गठन के चार साल पूर्व  ‘भूमिहार जाति ‘ के 33 लोग मारे गये थे, ने इस ‘जातीय अस्मिता’ को निजी सेना में बदलने का आधार बनाया. एम.सी.सी ने , जब इस गाँव में सामूहिक नरसंहार का निर्णय लिया होगा तो मुझे नहीं लगता कि वे सामन्तों के खिलाफ या जातिवाद के खिलाफ किसी कारवाई के तर्क से संचालित थे, अन्यथा एक वैसे गाँव में जहाँ एक भी बड़ी जोत का भू-सामंत नहीं था, हत्या की नृशंस कारवाई नहीं की गई होती या एक ही जाति (भूमिहार) के लोगों की हत्या नहीं की गई होती , गौरतलब है कि कुछ लोगों के प्राण सिर्फ इसलिए बख्श दिये गये थे कि वे ब्राहमण जाति के थे.

बथानी टोला के बाद बारा अगला गाँव था, जहाँ हम चिलचिलाती गर्मी की दोपहर में पहुंचे. 20 सालों बाद गांव उस खौफनाक मंजर को भूल चुका है, कुछ लोग अपने ‘दालानों’ में दोपहर की नींद ले रहे थे, कुछ लोग एक ‘दालान’ में ताश खेल रहे थे. उन लोंगों में एक ऐसा भी शख्स था, जिसके गले पर हथियार से हमले की निशानियाँ थीं, उसे मरा हुआ समझकर छोड़ दिया गया था, लेकिन वह बच निकला. पास में एक बुजुर्ग लेटे थे -‘ बुद्धन’ उनकी जान इस लिए बख्सी गई थी कि वे उन लोगों के साथ खड़े हो गए थे, जिनको मारने वालों ने ब्राहमण माना था, हालांकि वे भूमिहार थे. उनके दो जवान बेटे मार दिए गए थे. इस खेतिहर गाँव के हत्याकांड ने जाति आधारित गोलबंदी और रणवीर सेना के गठन  के लिए सामंत भूमिपतियों को तर्क दे दिए. बारा आज भी इस गोलबंदी का प्रतीक है. इस जाति के नेता इस हकीकत को समझाते हैं, इसीलिए इस गाँव को वे जाति -स्मृतियों में जिन्दा रखना चाहते हैं. कुछ माह पूर्व ही भाजपा नेता सी .पी.ठाकुर ने इस गाँव का दौरा किया था.

मारे गए लोगों के एक-एक आश्रितों को बिहार सरकार ने नौकरी दी थी. हालांकि 11 लोगों के उपर किसी को आश्रित नहीं माना गया. बदले में मिली नौकरी ही मारे गए लोगों की विधवाओं के लिए जीवन का आधार बना अन्यथा आमतौर पर सवर्ण विधवाओं की जिन्दगी आज भी उतना ही जटिल है, जितना 19 वीं शताब्दी में हुआ करती थी, जब ब्राह्मणवाद के प्रखर विरोधी चिन्तक महात्मा फुले ने ‘ब्राहमण विधवाओं’ के लिए पहला विधवा आश्रम खोला. यह अंतर साफ़ दिखता भी है कि बगल के ‘बरसिमहा’ नरसंहार ( बारा के पूर्व) में मारे गए दलित परिवार के व्यक्ति की विधवा ने अपनी ही जाति में दूसरी शादी कर ली, उसका भरा -पूरा घर है और पूर्व पति की हत्या के बाद मिली नौकरी से आर्थिक संबल भी. वही बारा की तीन विधवाओं में से, जिनसे मैं मिला या जिनके विषय में मैं जान सका, एक ने शादी कर ली थी, शेष दो अपने मरहूम पति के परिवार के साथ थीं. उनमें से दो हत्याकांड के दौरान तुरत व्याही गई थीं, कोई बच्चा नहीं था, एक को एक बेटा और एक बेटी थी. एक ने नौकरी के बाद बारा में ही रहना पसंद किया, अपने पति के छोटे भाई से अपनी छोटी बहन की शादी करवा दी और ससुराल के परिवार की देख-भाल करती है, दूसरी दूसरी शादी के बाद बारा से चली गई. बारा जाने के पूर्व टेकारी में जब मैं दो बच्चों की माँ यानी तीसरी महिला से मिला, तो उसके बच्चे, खासकर बेटी कुछ भी बात करने से मना करती रही. बेटी, जिसकी हाल में शादी हुई है, हमें अपनी माँ से बिना मिले चले जाने को कह रही थी. दरवाजे तक माँ के आ जाने से वह निरुत्तर हो गई. माँ की आँखे बात करते हुए भर आ रही थीं. माँ, जो पति की हत्या के बाद स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत हुई,  के लिए 20 साल पुराना मंजर उसके वजूद से जुड़ा है , जबकि बेटी ने तब ठीक से अपने पिता की उंगलियाँ भी नहीं थामी होगी.

बिहार के गांवों में उन नरसंहारों के जेंडर पक्ष यही हैं, पीड़ित महिलाएं अपनी जाति की पीड़ा की प्रतीक हो गईं, उनपर इन नरसंहारों के स्थाई प्रभाव हुए, उनका निजी छिन गया. इस निजता के खंड के ऊपर जो सामूहिक जातीय गोलबंदी हुई, वहां भी अपने पति के साथ उनका निजी कुछ नहीं रहा. एरिया कमांडर की पत्नी, उसकी हत्या के बाद जातीय अस्मिता की सामूहिक प्रतीक रही, और जिस दिन वह सार्वजनिक जीवन से छूटी उस दिन उसने इस दुनिया को छोड़ जाने का निर्णय ले लिया.

बथानी टोला के सन्दर्भ से मैंने पहले लिखा था कि किस प्रकार सवर्णों का वर्चस्व पुनः कायम हुआ है और यह भी कि बिहार में नरसंहारों के कई दशक के बाद शांति तो है, लेकिन जातीय तनाव में कोई कमी नहीं आई है- इस तनाव के रूप बदले हैं. सरकार जहाँ महादलित के नाम पर ‘दलित अस्मिता’ के टुकडे कर रही है वहीँ सवर्ण सामजिक आर्थिक राजनीतिक वर्चस्व की पुनर्वापसी कर रहे हैं. हालांकि ‘राज्य’ की भूमिका, और भागीदारी के सिद्धांत के अनुपालन से सवर्ण मानस ज्यादा आतंकित होता है, हथियारों की तुलना में . संवादों, तर्कों और प्रयासों में आरक्षण के माध्यम से दलित -पिछड़ा भागीदारी के खिलाफ सवर्ण झुंझलाहट स्पष्ट है, जबकि बरसिम्हा जैसे गांवों में रह रहे दलित जीने की जद्दो-जहद कर रहे हैं.

मेरी दिलचस्पी रणवीर सेना के कुछ ज्ञात -अज्ञात कमांडरों का वर्तमान जानने में भी थी . मेरे साथ भूमिहार जाति से ही एक युवा नेता और स्थानीय पत्रकार थे, दोनों ही राजीव रंजन. उनके कुछ रिश्तेदार सेना के दिनों में क्षेत्र में  ख्यात -कुख्यात भी रहे थे. उनमे से कोई स्वास्थ्य विभाग में अपने मारे गये किसी रिश्तेदार की अनुकम्पा पर नौकरी कर रहा है, कोई छोटा-मोटा लूट -मार करता हुआ फटेहाल है. एक की हत्या और उसकी पत्नी की दुखद आत्महत्या का जिक्र मैंने किया ही. इनकी  जाति के भू-सामंत वर्चस्व के नए समीकरणों के साथ वापस हुए हैं. एक बात और कि बारा में हमारी अगुआई करने वाला युवा नरसंहार के दिन 8-10 साल का छोटा लड़का था, उसके अनुसार उन्होंने बच्चों और महिलाओं को टार्गेट नहीं किया था, उसे जरूर दो-नाली (बन्दूक) दिखाकर उसके घर में होने या न होने की तफ्तीश की गई थी, जबकि बथानी टोला में तीन माह की बच्ची समेत कई बच्चे मारे गये थे.

जयभीम वाला दूल्हा चाहिए

शर्मिला रेगे की किताब  ‘अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की’की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर रहे हैं. मूल अंग्रेजी से अनुवाद डा. अनुपमा गुप्ता  ने  किया है.  इस किताब को स्त्रीकाल द्वारा  सावित्रीबाई  फुले  वैचारिकी  सम्मान, 2015 से  सम्मानित किया  गया  था. 





1990 के वर्षां में आंबेडकर तथा स्त्री मुक्ति पर विभिन्न विचारों को रखने वाली कई पुस्तिकायें, स्मारिकायें और पत्रिकायें प्रचलन में थी. उदाहरण के लिये, प्रतिमा परदेशी द्वारा लिखित ‘डा. आंबेडकर और स्त्रीमुक्ति’ (मराठी ) की बात करें, जो इस विषय पर विस्तार में लिखी छपी पहली पुस्तिकाओं में से थी. इसकी शुरूआत में आंबेडकर के इस विषय पर भाषणों व लेखों को  स्त्रीवादियों, संगठित वामपंथियों तथा दलित राजनीतिक दलों द्वारा नजरअंदाज किये जाने के कारणों के बारे में चर्चा की गयी.


जन्मशती (1990) वर्ष  में डा. आंबेडकर के कुछ अल्पज्ञात या अनदेखी किये गये कार्यो-विचारों पर कुछ चर्चा हुई अर्थव्यवस्था व मुस्लिम समुदाय पर उनका मत सामने लाया गया, लेकिन स्त्री मुक्ति पर उनके विचार फिर भी अंधेरे में ही रहे. आज जब हम नई शताब्दी के मुहाने पर खड़े हुए हैं और जब सामाजिक न्याय के लिये संघर्ष का स्वरूप अहम हो गया है तो इस वक्त उस व्यक्ति के विचार नजरअंदाज नहीं किये जा सकते, जो स्त्रियों के मुददों पर सबसे मुख्य रहा, यहां तक कि जिसने हिन्दू कोड बिल के मामले पर कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. सच  यह है  कि इस  विषय में मौन एक षडयंत्र जैसा लगता है और इसके कारणों की तह में जाना ही चाहिये.

(पढ़ें : डा. भीमराव आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर)

अरूण शौरी की पुस्तक ‘झूठे ईश्वर की उपासना ( Worshiping a false God) में प्रस्तुत तर्कों के विपक्ष में जाने माने इतिहासकार वाय.डी. फड़के ने अपने विचार रखे और गौतम शिन्दे की पुस्तिका ‘भारत में स्त्री क्रांति व मुक्ति’ में फड़के का समर्थन किया गया . फड़के ने यह भी कहा कि बुद्व के स्त्रियों के बारे में विचारों को भी अक्सर गलत समझा जाता है और बताया कि विद्वानों को आंबेडकर के लेख ‘हिन्दू स्त्रियों का उत्थान व पतन’ क्यों और किस तरह पढ़ना चाहिए. शिन्दे की पुस्तिका में इसका भी उल्लेख मिलता है. कुछ लेखकों ने उल्लेख किया है कि वाइसराय की कार्यकारिणी समिति (1942-46) के सदस्य के रूप में आंबेडकर ने खदान प्रभूति लाभ कानून जैसे विधेयक बनाने में काफी श्रम किया. समान मेहनताना, कोयला खदान कर्मचारी कल्याण कोष में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व , समान नागरिकता, स्त्री का आर्थिक विकास पर हक जैसे मुद्दों पर अम्बेडकर का जोर देना भारत में स्त्री आंदोलन के लिये काफी अहम माना जाना चाहिए. इस  नजरिये से देखें तो हिन्दू कोड बिल को स्त्री मुक्ति का घोषणापत्र माना जाना चाहिए और इस बिल को संशोधित करने के षडयंत्रकारी  प्रयासों के कारण उनका कानून मंत्री के पद से इस्तीफा इतिहास में अभूतपूर्व माना जाना चाहिए.



कुछ पुस्तिकाओं में आंबेडकर द्वारा बुद्व की विरासत को स्त्री मुक्ति के लिये पुनर्जीवित करने के कार्य को खास तौर पर प्रशंसनीय माना गया है. इसी तरह सती, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा के जरिये वेश्यावृत्ति को संस्थागत बनाने जैसी ब्राह्मण  प्रथाओें के खिलाफ उनकी आलोचना को भारत में स्त्रियों के खिलाफ हिंसा पर पहले वक्तव्यों  में से एक माना गया है. इनमें से ज्यादातर लेखकों ने इस बात पर जोर दिया है कि स्त्रीमुक्ति पर आंबेडकरका सैद्धान्तिक दृष्टिकोण किस तरह स्त्री आंदोलन के कई अभियानों की नीव बना. वे महाड़ सत्याग्रह (मार्च 1927) में स्त्रियों के लिये दिये गये आंबेडकर के सम्बोधन का हवाला देते हैं. इन्डिपेन्डेन्ट लेबर पार्टी की महिला सभाओं द्वारा दलित स्त्रियों के राजनीतिक जागरण का जिक्र करते हैं और 1942 में दलित महिला फेडरेशन की स्थापना का उल्लेख करते हैं. परदेशी की पुस्तिका में आंबेडकर के 1916 में लिखे ‘भारत में जातियां’ लेख का विस्तृत विवेचन किया गया है, जिसमें आंबेडकर तर्क देते हैं कि स्त्रियों की दोयम अवस्था  का प्रवेश द्वार थी जाति व्यवस्था,  जिसने स्त्रियों के शोषण का ढांचा तैयार किया. पुस्तिका यह भी स्पष्ट करती है कि हिन्दू केड बिल जाति-आधारित पितृसत्तात्मक  ढांचे के लिये चुनौती क्यों था? आंबेडकरी  समुदायों की यह पुस्तिका संस्कृति  आंबेडकर के मुख्यधारा से अलग लेखन और उद्बोधनों को प्रकाश में लाकर उनके स्त्रीवाद पर दावे को  पुन: स्थापित करती है.

(पढ़ें :पीड़ाजन्य अनुभव और डा. आंबेडकर का स्त्रीवाद)


ये पुस्तिकायें, जहां आंबेडकर के स्त्रीमुक्ति में योगदान के उपयुक्त आलोचानात्मक पहलुओं को लेकर जोश में आती हैं. वही गायन पार्टियां उनके सामाजिक स्वप्न का पक्ष सामने रखती हे. आंबेडकरी पचांग के उत्सवों में उनके बिक्री स्टाॅल संख्या में दूसरे स्थान पर होते हैं. इन पार्टियों का संगीत क्षेत्र या पीढ़ियों के भेदभाव से परे होता है, जब तक कि गीत में ही नाम उल्लेखित न हो या गीतकार की शैली बहुत पहचानी हुई न हो. 1920 में स्थानीय स्तर पर बने सस्ते कैसेट्स ने इन गीतों की पहुंच का दायरा काफी बढ़ा दिया और ज्यादा लोग ऐसी गायन पार्टियां बनाने के लिये प्रेरित हुए,  जिससे गीतों की संख्या व संगीत की विविधता में बहुत इजाफा हुआ. कई स्त्री गायिकायें और उनके संगीत दल, मंचीय प्रस्तुतियों की लोकप्रियता को कोई नुकसान पहुंचाये बिना अपना स्थान बना पाये. आधुनिक भारतीय इतिहास (खासकर 1932 का पूना समझौता) की घटनाओं को अपनी दृष्टि से देखना आंबेडकर के नित्यप्रति के जीवन का संघर्ष,  सामाजिक राजनीतिक आंदोलन इन रचनाओं के मुख्य विषय हुआ करते हैं.

वर्ष 2000 से नयी रचनायें जैसे ‘मनुस्मृति की होली’ भी अस्तित्व में आई. गीतकारों व गायकों में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व और बढ़ गया तथा 25 दिसंबर को महाराष्ट्र के विभिन्न भागों में स्त्री-मुक्ति दिवस के रूप में मनाने का प्रचलन भी बढ़ा. कुछ अन्य रचनाये हैं जैसे ‘जयभीम वाला दूल्हा चाहिए’ जिसमें स्त्रियां आंबेडकर से पूछती हैं कि पति को एक सच्चे आंबेडकरी पति के रूप में कैसे बदला जाये, बुद्ध महिला गीत, जिसमें सच्ची आंबेडकरी, यानि जयभीम वाली नारी का वर्णन किया गया है तथा ‘भीमवाड़ी’ का उल्लेख है जो आंबेडकरी स्त्रियों का स्वर्ग है यानि समता पर आधारित एक बस्ती.

कभी-कभी इन गीतों के अर्थ अलग-अलग और दुविधा भरे भी होते  हैं. उदाहरण के लिये कुछ में हिन्दू प्रतीकों जैसे कुमकुम का तिलक, जेण्डरीकृत संहितायें और आदर्श आंबेडकरी स्त्री की परिभाषा में नियंत्रण की भरमार. आंबेडकरी संगीत को ये पीढ़ियां एक जटिल अध्ययन का विषय हैं,  और इन्हें सिर्फ राजनीतिक या बाजारी हथकंडा मान कर खारिज नहीं किया जा सकता. इन कुछ सरलीकरण किये हुए द्वैतों जैसे भावुक/तर्कसंगत, हथकंडे/अभिव्यक्ति को दलित अभियानों पर शोध में बार-बार लाया गया है और मराठी मध्यम वर्ग में फैली उस सामान्य समझ में भी इन्हें देखा जा सकता है , जो इन पुस्तिकाओं व संगीत को रूढ़िवादी और अंध भक्ति का नाम देती है. ये समझ के साथ बदलते हुए स्रोत अकादमिया द्वारा अपेक्षाकृत अनदेखे ही किये जाते रहे हैं,  जैसा कि पहले कहा गया, ये स्रोत जाति-विरोधी  स्त्रीवाद को आंबेडकरी प्रति समुदायों में स्थापित करते हैं. दलित सामूहिक आंदोलनोें पर सच्चे शोध के लिये उन आसान निष्कर्षों से परे जाना होगा जो आंबेडकरी को मात्र भावात्क प्रतीक मान लेने पर ही खत्म हो जाते हैं. असल में इन भावनाओं को खंगालना होगा, व्यैक्तिक और सामूहिक भावनाओं को  अधिक गंभीरता से जांचना होगा. सामूहिक कल्पना चित्रों जैसे जय भीम वाली नारी (आंबेडकरी स्त्री) और भीमवाड़ी (आंबेडकरी यूरोपिया) के भावार्थों का अनुवाद और अधिक गहराई में जाकर करना होगा. फिलहाल यह याद रखना जरूरी है कि आंबेडकर का स्त्रीवाद पर दावा किन्हीं अकादमिक क्षेत्रों से नहीं बल्कि इन्हीं अपारम्परिक स्रोतों से शुरू हुआ था. अब इस प्रकाशित सामग्री व संगीत संस्कृति से दिशाज्ञान लेकर हम आंबेडकर के कुछ खास स्त्रीवादी लेखों से परिचित होंगे.

(पढ़ें : आंबेडकरी गीतों में रमाबाई और भीमराव आंबेडकर )

स्त्रीवादियों के लिये महत्वपूर्ण लेखन

स्त्रीवादी विद्वान उमा चक्रवर्ती के अनुसार मंडल आंदोलन के बाद दो भिन्न दिशाओं में छिटक गये सिद्वांतों से पहचान का मौका था-जात के मुद्दे पर समाजवादी अवधारणा तथा जेण्डर के मुद्दे पर स्त्रीवादी अवधारणा. उनके अनुसार शहरी भागों में जाति पर चर्चा ने बौद्विक रास्ता पकड़ा और जाति व्यवस्था को समझाने की बजाये उसे परदे मेें छुपा दिया. इस संदर्भ में चक्रवर्ती का साफ इरादा जाति के स्त्रीवादी विश्लेषण को आगे बढ़ाने का है और वे आंबेडकर के उस फाॅर्मूले को स्थापित करना चाहती है , जिसमें वे जाति को श्रेणीबद्व असमताओं का एक तंत्र मानते हैं. यह फार्मूला ब्राम्हणी पितृसत्ता की ऐतिहासिक संरचना की व्याख्या करने के लिये उनका आधार बनता है. साथ ही जाति व जेण्डर के बीच देशव्यापी गठजोड़ को भी वे साफ देख पाते हैं.

अब मैं जातिमुखी पितृसत्ता की संरचना और स्त्रीवादी अवधारणा के बारे में आंबेडकर के लेखन महत्व को और विस्तार देना चाहती हूं.आंबेडकर के  लेखन का विशाल भंडार और गहराई उसके भीतर दिखती निरन्तरता लेखों के चयन को मुश्किल बना देेते हैं. मेरा चयन कुछ पक्षपात वाला है क्योंकि इतने महती साहित्य के साथ जुड़ने में मेरी क्षमता सीमित है. साथ ही यह संचयन आय रूप से उन लेखों को प्रकाश में लाने के लिये है जो जाति जेण्डर गठजोड़ पर है और इसलिये ब्राम्हणी पितृसत्ता पर स्त्रीवादी आदर्श लेखों के रूप में लिये जा सकते हैं. इस दौरान मैने आंबेडकर के मराठी व अंगे्रजी में दिये गये भाषणों और लेखों का भी उल्लेख किया है,  जो ‘डा. बाबा साहेब अम्बेडकर लेख व भाषण, खण्ड 17 भाग तीन’ से लिये गये हैं.

ये लेख तीन भागों में व्यवस्थित किये गये हैं हर एक हिस्से में प्रासंगिक परिचय संक्षिप्त वितरण व विवेचन है, जो आंबेडकर  की पितृसत्ता के बारे में समझ के विभिन्न आयाम दिखते हैं. पहले भाग जाति यानि राजतीय विवाह, जाति और स्त्रियों पर हिंसा में अटूट संबंध’’ में दो लेख है-‘भारत में जातियां, उनका जन्म, विकास तथा कार्य तंत्र’ (BAWS
VOl 17, Part 2) तथा हिंदू स्त्री का उत्थान व पतन (BAWS VOl 17, Part 2) . पहले लेख में जाति को सजातीय विवाहों के संदर्भ में व्यास्थापित किया गया है, जिसमें जाति और स्त्रीदमन में गठजोड़ को समझा जा सके. दूसरे लेख में भारत के इतिहास के उपनिवेशी व राष्ट्रवादी पाठ्यान्तरों की पड़ताल की गई है और वैदिक युग को स्त्रियों के लिये स्वर्णिम काल माने जाने वाले मिथक को नकारा गया है.
दूसरे भाग ‘मनु का मतिभ्रंश स्त्रियों के खिलाफ श्रेणीबद्ध हिंसा की पहेली का खुलासा’ में दो ऐसे खुलासे पर चर्चा और कुछ संक्षिप्तीकरण है. ये है पहले नं. 18 मनु का मतिभ्रंश या संकर जातियों के माध्यम की ब्राह्मणवादी व्याख्या (BAWS
VOl 4, 215-25) तथा पहले नं. 19 पितृत्व से मातृत्व की ओर सक्रमण ब्राह्मण  इससे क्या पान चाहते थे? (BAWS
VOl 4, 226-32)  और और विवादित राम व ‘कंश व कृष्णा की पहेली’ के कुछ अंश (BAWS.VOL.4.appendisI,323-43) . इस भाग के लेख ‘स्त्री और प्रतिशील ’ (BAWS.VOL.3.429-37) मेें भी संदर्भित है तथा हिन्दू स्त्री का उत्थान व पतन लेख के आखिरी हिस्से के रूप् मेंभी छपे हैं.  आंबेडकर की पहेलियों को पढ़ना मैं समझती हूं, ब्राम्हणी पितृसत्ता की जेण्डरीकृत हिंसा के उस श्रेणीवद्व चरित्र को बेनकाब करताहै,  जिसके द्वारा जाति- व्यवस्था की संरचना की बरकरार रखा जा सका.

आखिरी भाग ‘हिन्दू कोड बिल पर संसदीय बहसों और आंबेडकर  के इस्तीफे के बारे में है. हिन्दू कोड बिल पर सभी चर्चाओं को एक साथ रखता है. ’ (BAWS.VOL.4.Part
16, 4-12, 267-81) तथा मंत्रिमण्डल से इस्तीफा देते हुए डा. अम्बेडकर के भाषण के अंश प्रस्तुत करता है. (BAWS.VOL.14 भाग दो , 137-27) . यह भाग विधेयक की तीन प्रकार से जांच पड़ताल करता है. पहले यह विधेयक को आंबेडकर  के निजी जीवन के लोकतंत्रीकरण के प्रस्ताव के रूप में देखता है. दूसरे यह विधेयक के पक्ष में आंबेडकर की सार्थक दलीलों को पेश करता है, जिसे बाद में ‘अबधित स्वतंत्रता’ के उनके लक्ष्य का नाम दिया गया. अंत में यह विधेयक के विरोध को रेखांकित करता है और इस  रूढ़िवादी विपक्ष को लोकतांत्रिक करार को रद्द करने वाले की तरह देखता है.

अंत में 1927 में दलित स्त्रियों के ऐतिहासिक सम्मेलन में अपने उद्बोधन में आंबेडकर ने पूछा था,
‘‘यहां सभा में बैठी’’ कायस्थ व अन्य सवर्ण महिलाओं के बच्चों और हममें क्या कोई फर्क है? आपको सोचना होगा और इस वास्तविकता को जानना होगा कि आप भी एक ब्राह्मण  स्त्री की पाकीजगी और चरित्र रखती हैं. बल्कि जो साहस और कुछ कर दिखाने की इच्छा आप में है, वह उनमें भी नहीं है. फिर आपके बच्चों का अपमान क्यों होना चाहिए? आपने इस बारे में कभी सोचाा ही नहीं वरना आप एक सत्याग्रह खड़ा कर चुकी होती….

(पढ़ें: आंबेडकर की राजनीतिक छवि का स्त्रीवादी नकार )

आंबेडकर के उस उद्बोधन के बाद काफी कुछ घटित हो चुका है. आंबेडकर के शब्दों पर  बहस खड़ी करने से आगे बढ़कर राजनीति-दीक्षित दलित स्त्रियों ने बहुत कुछ कर दिखाया है. बाबा साहेब की वफादार बेटियों के रूप में दलित स्त्री वादियों ने ब्रम्हण स्त्रीवाद के खिलाफ विद्रोह का लंबा सफर तय किया है और जाति-विरोधी राजनीति की दिशा का संकेत दिया है. ऐसा करते हुए, उन्होंने स्त्रीवाद तथा जाति विरोधी रानजीति के कई संभावित भविष्यों की राह खोली है. आंबेडकर की स्त्रीवादी विरासत का दलित पुरूषों व गैर दलित स्त्रीवादियों द्वारा संपूर्ण दोहन किया जाना अभी बाकी है. यह पुस्तक इसी  दिशा में एक गैर दलित स्त्रीवादी का विनम्र प्रयास है.

ताकि बलात्कार पीड़िताओं को बार –बार बलात्कार से न गुजरना पड़े

संजीव चंदन

बलात्कार पीडिताओं को लेकर भारतीय समाज अजीब मर्दवादी मानसिकता में जीता है. अभी कल ही खबर आई कि बलात्कार पीडिता को उसके बलात्कारी के साथ शादी करवा दी गई और वह शादी के 7 महीने के भीतर आत्महत्या को विवश हो गई- मर गई. यह उसके खिलाफ यौन हिंसा को गैरजिम्मेवार तरीके से डील करने से हुआ- उसकी ह्त्या का दोषी समाज और उसकी मानसिकता है, वह शादी के बाद रोज -रोज बलात्कृत होती होगी. इस समाज कि यह कैजुअल सोच बलात्कार की घटनाओं के बाद पीडिता को न्याय दिलाने वाली एजेंसियों के रवैये में भी दिखता है . चिकित्सा, जांच और न्याय एजेंसी के  इस रवैये के खिलाफ महाराष्ट्र के एक डाक्टर ने मुहीम छेड़ रखी थी और इस पर उन्हें बहुत हद तक सफलता भी मिली है . 

 महिलाओं के प्रति असंवेदनशील व्यवस्था को बदलने की मुहीम में महाराष्ट्र के वर्धा में महात्मा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल सायन्सेज ( एम जी आई एम एस ) के फोरेंसिक विभाग में कार्यरत डाक्टर इन्द्रजीत खांडेकर  ने कई बड़े बदलावों को अंजाम दिये, उनमें बलात्कार पीडिताओं के फिंगर टेस्ट को बंद करवाने से लेकर गैरकानूनी सवालों के दायरे में उसकी जांच को बंद करवाने जैसे बदलाव शामिल हैं. जेंडर जस्ट न्याय और चिकित्सा के लिए संघर्षरत इस डाक्टर की पहलों से आये बदलाव पर एक विशेष रिपोर्ट . 


अमानवीय फिंगर टेस्ट का खात्मा 


डाक्टर खांडेकर ने कई पन्नों में फैले अपने अध्ययन के आधार पर यह स्थापित किया कि यौन हमलों की शिकार महिलाओं को जांच के नाम पर काफी अमानवीय प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. बिना किसी फोरेंसिक फॉरमेट के उनकी जांच होती है . उन्होंने इसके लिए केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से पत्राचार किये , जो शुरू में बिना जवाब के पड़े रहे . 2010  में डा. खांडेकर के अध्ययन के आधार पर फ़ॉर्मेट बनाने के लिए एक जनहित याचिका बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर खंडपीठ  में डा. रंजना पारधी और एडवोकेट विजय पटाइत ने किये .

(पढ़ें : बलात्कार बलात्कार में फर्क होता है साहेब )

डा खांडेकर  की सबसे बड़ी आपत्ति यौन हमलों की शिकार महिलाओं के फिंगर टेस्ट पर थी , जो उनके अनुसार दोहरी यातना से गुजरने जैसा था. फिंगर टेस्ट पीडिता की योनी में दो ऊँगल डालकर की जाती है. इस पी आई एल में केंद्र सरकार का रवैया काफी टाल-मटोल वाला रहा . उसने कोर्ट में अपने एफीडेविट में कहा कि महाराष्ट्र सरकार जो भी फॉरमेट बनायेगी, वह केंद्र सरकार मान लेगी. इस एफीडेविट के पूर्व राज्य और केंद्र सरकार जो फॉरमेट लेकर कोर्ट में आई उसमें ‘ फिंगर टेस्ट’ शामिल था. डा खांडेकर और याचिकाकर्ताओं की आपत्ति के बाद महाराष्ट्र सरकार मई , 2013 में डा खांडेकर की सहमति से जांच का फॉरमेट लेकर आई, जिसमें फिंगर टेस्ट न सिर्फ ख़त्म किया गया था बल्कि कई स्त्री के पक्ष में कालम बनाये गये थे  , जिससे पीडिता को न्याय मिले. केन्द्रीय स्तर पर डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ रीसर्च  (DHR) ,  इन्डियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रीसर्च ने एक समिति बनाई , जिसमे डाक्टर खांडेकर को भी शामिल किया गया . निर्भया काण्ड (दिल्ली गैंग रेप) की पहली बरसी (2013) पर इस समिति का फ़ॉरमेट लागू किया गया, लेकिन जल्द ही केंद्र सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय मार्च, 2014 में अपने फोर्मेट लेकर आई . डा खांडेकर कहते हैं कि ‘दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस नये फॉरमेट में सैम्पलिंग की प्रक्रिया गायब है.’ दरअसल पीडिता के कपड़ों, खून आदि के साथ 15-20 चीजें सैम्पल के तौर पर ली जाती हैं , जिसकी अभियुक्तों को सजा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है .

आज भी पूछे जाते हैं अपमानजनक सवाल 
बलात्कार के बाद सबसे कठिन लड़ाई होती है, दोषियों को सजा दिलवाने की . पुलिस डाक्टरों से पीडिता की जांच के लिए तीन अपमानजनक और स्त्रीविरोधी सवाल पूछती है. 1.. क्या पीडिता यौन सम्बन्ध की आदि है ? 2. बलात्कार हुआ या नहीं?  3. पीडिता यौन संबंध में सक्षम है या नहीं? डा खांडेकर ने 2011 में पुलिस की यह पद्धति हटाने के लिए महाराष्ट्र और केंद्र, दोनो सरकारों को लिखा. सितम्बर 2013 में महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश के माध्यम से जांच के लिए नये सवाल डा खांडेकर की  सलाह पर बनाये. नये नियम के अनुसार पुलिस अब चार सवाल सम्बंधित डाक्टर से पूछती है : 1. क्या पीडिता के साथ हाल में कोई  बलपूर्वक यौन संबंध बनाया गया है ? 2. पीडिता के ऊपर कितने , कैसे और कहाँ जख्म हुए हैं ? 3. क्या कोई बाहरी वस्तु, जैसे, बाल, खून या वीर्य पीडिता के शरीर पर पाये गये हैं ? 4 . पीडिता से जरूरी सैम्पल जैसे, कपडे, खून आदि .

( पढ़ें: यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा )

हालांकि केंद्र सरकार ने इसपर आज भी चुप्पी बनाये रखी है और देश के दूसरे राज्यों में तथा केन्द्रीय जांच एजेंसियों के बीच सवालों का पुराना पैटर्न बदस्तूर जारी है. सुप्रीम कोर्ट के वकील अरविंद जैन कहते हैं, ‘ यह रवैया न सिर्फ केंद्र सरकार की पुरुषवादी प्रवृत्ति के कारण उस तक ही सीमित है बल्कि उच्चतम न्यायालय में भी यह कई मामलों में सामने आता रहता है . एविडेंस एक्ट 1944 से पीडिता की  यौन संबंध की आदत  वाले सवाल 1994 में ही ख़त्म कर दिये गये थे , लेकिन आज भी कई निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय पीडिता के यौन संबंधों के इतिहास को प्राथमिकता देते हुए पाया जाता है.’ खांडेकर कहते हैं ‘ जरूरत है कानूनों को प्रैक्टिकल सिलेबस में शामिल करने की.

गैर जरूरी वीर्य सैम्पल की परंपरा
डा. खांडेकर की ही पहल पर यौन हिंसा के अभियुक्तों का वीर्य सैम्पल लिए जाने की परम्परा को महाराष्ट्र सरकार ने ख़त्म कर दिया. खांडेकर कहते हैं, ‘ यह न सिर्फ गैरजरूरी समय खाता है बल्कि दोहरा स्त्रीविरोधी माहौल भी बनाता है.’ राज्य और केंद्र सरकार को लिखे अपने पत्र में उन्होंने तफसील के साथ बताया है कि कैसे इस सैम्पल के लिए बलात्कार के अभियुक्तों को पोर्न दिखाया जाता ह. यह सैम्पल सिर्फ ब्लड ग्रूप जानने के लिए लिया जाता है, जिसे अभियुक्त के ब्लड और पीडिता के कपड़ों पर प्राप्त सीमेन के जरिये जाना जा सकता है .
आश्चर्यजनक तौर पर केंद्र सरकार ने इसपर चुप्पी बना रखी है .

देश का पहला क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन यूनिट : 
डा खांडेकर ने 2011 में एक जनहित याचिका बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर बेंच में दायर की और मांग की कि देश भर में यौन हिंसा सहित दूसरी हिंसा की जांच के लिए एक क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन बनाया जाय और सिलेबस तथा करिकुलम में इसे शामिल किया जाय .  दरअसल अभी तक यौन हिंसा की पीड़िताओं की जांच स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल यौन हिंसा के पीड़ितों की जांच बाल रोग विशेषज्ञ आदि के द्वारा करवाने की परम्परा रही है , जिन्हें फोरेंसिक जानकारियाँ नहीं होती हैं. इस प्रकार उनकी रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया में ज्यादा प्रभावी नहीं होती . खांडेकर कहते हैं , ‘ इसका मूल जड़ है मेडिकल का सिलेबस . जो पढाता है ( यानी फोरेंसिक शिक्षक ) वह प्रैक्टिकल नहीं करता और जो प्रैक्टिकल करता है वह पढाता नहीं. खांडेकर ने अपने मेडिकल कालेज ( एम जी आई एम एस ) में देश का पहला क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन यूनिट बनाया , जो अस्पताल के  आपात विभाग ( इमरजेंसी) का हिस्सा है. इस यूनिट में सर्जरी , ओर्थोपेडिक, स्त्रीरोग , बालरोग और फोरेंसिक के डाक्टरों की टीम २४ घंटे काम करती है . नागपुर हाईकोर्ट के आदेश पर मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इण्डिया ने डा खांडेकर से ९ जून  २०१४ को बातचीत की ताकि इस मॉडल को पूरे देश में लागू किया जा सके .

अपराध की जांच की ट्रेनिंग देते डा. खांडेकर 

(पढ़ें : बलात्कार पर नजरिया और सलमान खान )

गैरजरूरी पोस्टमार्टम, अपठनीय हैण्डराइटिंग के खिलाफ मुहीम और अन्य बड़ी पहल 
डा . खांडेकर जेंडर जस्टिस आधारित  न्याय और चिकित्सा की अपनी पहलों के साथ लगातार सक्रिय हैं . उनकी पहल पर महाराष्ट्र सरकार गैरजरूरी पोस्टमार्टम ख़त्म करने पर विचार कर रही है. खांडेकर के अनुसार इससे ६०% पोस्टमार्टम कम हो जायेंगे और इनपर जाया होने वाले समय , ऊर्जा और धन की बचत होगी. एक जरूरी पहल के तौर पर डाक्टरों की हैण्डराइटिंग तथा हस्ताक्षर के कारण पीड़ितों को न्याय मिलने में होने वाली देरी को कम करने की मुहीम भी उल्लेखनीय है. अपने मेडिकल कालेज में इन्होने देश का पहला सॉफ्टवेयर विकसित करवाया है , जो मैन्युअल फोरेंसिक रिपोर्ट की प्रथा को ख़त्म करदेने वाला है . महाराष्ट्र सरकार इसे भी पूरे राज्य में लागू करने की तैयारी कर रही है.

(पढ़ें : दाम्पत्य में बलात्कार का लायसेंस)

डाक्टर की अगली मुहीम है देश के पाठ्य पुस्तकों में जरूरी जानकारियाँ शामिल करवाना , जिससे बच्चे यौन विचलन और हिंसा के शिकार न हों .

ताकि पीड़िताओं को बार –बार बलात्कार से न गुजरना पड़े

संजीव चंदन

बलात्कार पीडिताओं को लेकर भारतीय समाज अजीब मर्दवादी मानसिकता में जीता है. अभी कल ही खबर आई कि बलात्कार पीडिता को उसके बलात्कारी के साथ शादी करवा दी गई और वह शादी के 7 महीने के भीतर आत्महत्या को विवश हो गई- मर गई. यह उसके खिलाफ यौन हिंसा को गैरजिम्मेवार तरीके से डील करने से हुआ- उसकी ह्त्या का दोषी समाज और उसकी मानसिकता है, वह शादी के बाद रोज -रोज बलात्कृत होती होगी. इस समाज कि यह कैजुअल सोच बलात्कार की घटनाओं के बाद पीडिता को न्याय दिलाने वाली एजेंसियों के रवैये में भी दिखता है . चिकित्सा, जांच और न्याय एजेंसी के  इस रवैये के खिलाफ महाराष्ट्र के एक डाक्टर ने मुहीम छेड़ रखी थी और इस पर उन्हें बहुत हद तक सफलता भी मिली है . 

महिलाओं के प्रति असंवेदनशील व्यवस्था को बदलने की मुहीम में महाराष्ट्र के वर्धा में महात्मा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल सायन्सेज ( एम जी आई एम एस ) के फोरेंसिक विभाग में कार्यरत डाक्टर इन्द्रजीत खांडेकर  ने कई बड़े बदलावों को अंजाम दिये, उनमें बलात्कार पीडिताओं के फिंगर टेस्ट को बंद करवाने से लेकर गैरकानूनी सवालों के दायरे में उसकी जांच को बंद करवाने जैसे बदलाव शामिल हैं. जेंडर जस्ट न्याय और चिकित्सा के लिए संघर्षरत इस डाक्टर की पहलों से आये बदलाव पर एक विशेष रिपोर्ट . 



अमानवीय फिंगर टेस्ट का खात्मा 

डाक्टर खांडेकर ने कई पन्नों में फैले अपने अध्ययन के आधार पर यह स्थापित किया कि यौन हमलों की शिकार महिलाओं को जांच के नाम पर काफी अमानवीय प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. बिना किसी फोरेंसिक फॉरमेट के उनकी जांच होती है . उन्होंने इसके लिए केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से पत्राचार किये , जो शुरू में बिना जवाब के पड़े रहे . 2010  में डा. खांडेकर के अध्ययन के आधार पर फ़ॉर्मेट बनाने के लिए एक जनहित याचिका बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर खंडपीठ  में डा. रंजना पारधी और एडवोकेट विजय पटाइत ने किये .

(पढ़ें : बलात्कार बलात्कार में फर्क होता है साहेब )

डा खांडेकर  की सबसे बड़ी आपत्ति यौन हमलों की शिकार महिलाओं के फिंगर टेस्ट पर थी , जो उनके अनुसार दोहरी यातना से गुजरने जैसा था. फिंगर टेस्ट पीडिता की योनी में दो ऊँगल डालकर की जाती है. इस पी आई एल में केंद्र सरकार का रवैया काफी टाल-मटोल वाला रहा . उसने कोर्ट में अपने एफीडेविट में कहा कि महाराष्ट्र सरकार जो भी फॉरमेट बनायेगी, वह केंद्र सरकार मान लेगी. इस एफीडेविट के पूर्व राज्य और केंद्र सरकार जो फॉरमेट लेकर कोर्ट में आई उसमें ‘ फिंगर टेस्ट’ शामिल था. डा खांडेकर और याचिकाकर्ताओं की आपत्ति के बाद महाराष्ट्र सरकार मई , 2013 में डा खांडेकर की सहमति से जांच का फॉरमेट लेकर आई, जिसमें फिंगर टेस्ट न सिर्फ ख़त्म किया गया था बल्कि कई स्त्री के पक्ष में कालम बनाये गये थे  , जिससे पीडिता को न्याय मिले. केन्द्रीय स्तर पर डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ रीसर्च  (DHR) ,  इन्डियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रीसर्च ने एक समिति बनाई , जिसमे डाक्टर खांडेकर को भी शामिल किया गया . निर्भया काण्ड (दिल्ली गैंग रेप) की पहली बरसी (2013) पर इस समिति का फ़ॉरमेट लागू किया गया, लेकिन जल्द ही केंद्र सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय मार्च, 2014 में अपने फोर्मेट लेकर आई . डा खांडेकर कहते हैं कि ‘दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस नये फॉरमेट में सैम्पलिंग की प्रक्रिया गायब है.’ दरअसल पीडिता के कपड़ों, खून आदि के साथ 15-20 चीजें सैम्पल के तौर पर ली जाती हैं , जिसकी अभियुक्तों को सजा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है .

आज भी पूछे जाते हैं अपमानजनक सवाल 
बलात्कार के बाद सबसे कठिन लड़ाई होती है, दोषियों को सजा दिलवाने की . पुलिस डाक्टरों से पीडिता की जांच के लिए तीन अपमानजनक और स्त्रीविरोधी सवाल पूछती है. 1.. क्या पीडिता यौन सम्बन्ध की आदि है ? 2. बलात्कार हुआ या नहीं?  3. पीडिता यौन संबंध में सक्षम है या नहीं? डा खांडेकर ने 2011 में पुलिस की यह पद्धति हटाने के लिए महाराष्ट्र और केंद्र, दोनो सरकारों को लिखा. सितम्बर 2013 में महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश के माध्यम से जांच के लिए नये सवाल डा खांडेकर की  सलाह पर बनाये. नये नियम के अनुसार पुलिस अब चार सवाल सम्बंधित डाक्टर से पूछती है : 1. क्या पीडिता के साथ हाल में कोई  बलपूर्वक यौन संबंध बनाया गया है ? 2. पीडिता के ऊपर कितने , कैसे और कहाँ जख्म हुए हैं ? 3. क्या कोई बाहरी वस्तु, जैसे, बाल, खून या वीर्य पीडिता के शरीर पर पाये गये हैं ? 4 . पीडिता से जरूरी सैम्पल जैसे, कपडे, खून आदि .

पढ़ें: यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा )

हालांकि केंद्र सरकार ने इसपर आज भी चुप्पी बनाये रखी है और देश के दूसरे राज्यों में तथा केन्द्रीय जांच एजेंसियों के बीच सवालों का पुराना पैटर्न बदस्तूर जारी है. सुप्रीम कोर्ट के वकील अरविंद जैन कहते हैं, ‘ यह रवैया न सिर्फ केंद्र सरकार की पुरुषवादी प्रवृत्ति के कारण उस तक ही सीमित है बल्कि उच्चतम न्यायालय में भी यह कई मामलों में सामने आता रहता है . एविडेंस एक्ट 1944 से पीडिता की  यौन संबंध की आदत  वाले सवाल 1994 में ही ख़त्म कर दिये गये थे , लेकिन आज भी कई निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय पीडिता के यौन संबंधों के इतिहास को प्राथमिकता देते हुए पाया जाता है.’ खांडेकर कहते हैं ‘ जरूरत है कानूनों को प्रैक्टिकल सिलेबस में शामिल करने की.

गैर जरूरी वीर्य सैम्पल की परंपरा
डा. खांडेकर की ही पहल पर यौन हिंसा के अभियुक्तों का वीर्य सैम्पल लिए जाने की परम्परा को महाराष्ट्र सरकार ने ख़त्म कर दिया. खांडेकर कहते हैं, ‘ यह न सिर्फ गैरजरूरी समय खाता है बल्कि दोहरा स्त्रीविरोधी माहौल भी बनाता है.’ राज्य और केंद्र सरकार को लिखे अपने पत्र में उन्होंने तफसील के साथ बताया है कि कैसे इस सैम्पल के लिए बलात्कार के अभियुक्तों को पोर्न दिखाया जाता ह. यह सैम्पल सिर्फ ब्लड ग्रूप जानने के लिए लिया जाता है, जिसे अभियुक्त के ब्लड और पीडिता के कपड़ों पर प्राप्त सीमेन के जरिये जाना जा सकता है .
आश्चर्यजनक तौर पर केंद्र सरकार ने इसपर चुप्पी बना रखी है .

देश का पहला क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन यूनिट : 
डा खांडेकर ने 2011 में एक जनहित याचिका बॉम्बे उच्च न्यायालय के नागपुर बेंच में दायर की और मांग की कि देश भर में यौन हिंसा सहित दूसरी हिंसा की जांच के लिए एक क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन बनाया जाय और सिलेबस तथा करिकुलम में इसे शामिल किया जाय .  दरअसल अभी तक यौन हिंसा की पीड़िताओं की जांच स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल यौन हिंसा के पीड़ितों की जांच बाल रोग विशेषज्ञ आदि के द्वारा करवाने की परम्परा रही है , जिन्हें फोरेंसिक जानकारियाँ नहीं होती हैं. इस प्रकार उनकी रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया में ज्यादा प्रभावी नहीं होती . खांडेकर कहते हैं , ‘ इसका मूल जड़ है मेडिकल का सिलेबस . जो पढाता है ( यानी फोरेंसिक शिक्षक ) वह प्रैक्टिकल नहीं करता और जो प्रैक्टिकल करता है वह पढाता नहीं. खांडेकर ने अपने मेडिकल कालेज ( एम जी आई एम एस ) में देश का पहला क्लिनिकल फोरेंसिक मेडिसिन यूनिट बनाया , जो अस्पताल के  आपात विभाग ( इमरजेंसी) का हिस्सा है. इस यूनिट में सर्जरी , ओर्थोपेडिक, स्त्रीरोग , बालरोग और फोरेंसिक के डाक्टरों की टीम २४ घंटे काम करती है . नागपुर हाईकोर्ट के आदेश पर मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इण्डिया ने डा खांडेकर से ९ जून  २०१४ को बातचीत की ताकि इस मॉडल को पूरे देश में लागू किया जा सके .

अपराध की जांच की ट्रेनिंग देते डा. खांडेकर

(पढ़ें : बलात्कार पर नजरिया और सलमान खान )

गैरजरूरी पोस्टमार्टम, अपठनीय हैण्डराइटिंग के खिलाफ मुहीम और अन्य बड़ी पहल 
डा . खांडेकर जेंडर जस्टिस आधारित  न्याय और चिकित्सा की अपनी पहलों के साथ लगातार सक्रिय हैं . उनकी पहल पर महाराष्ट्र सरकार गैरजरूरी पोस्टमार्टम ख़त्म करने पर विचार कर रही है. खांडेकर के अनुसार इससे ६०% पोस्टमार्टम कम हो जायेंगे और इनपर जाया होने वाले समय , ऊर्जा और धन की बचत होगी. एक जरूरी पहल के तौर पर डाक्टरों की हैण्डराइटिंग तथा हस्ताक्षर के कारण पीड़ितों को न्याय मिलने में होने वाली देरी को कम करने की मुहीम भी उल्लेखनीय है. अपने मेडिकल कालेज में इन्होने देश का पहला सॉफ्टवेयर विकसित करवाया है , जो मैन्युअल फोरेंसिक रिपोर्ट की प्रथा को ख़त्म करदेने वाला है . महाराष्ट्र सरकार इसे भी पूरे राज्य में लागू करने की तैयारी कर रही है.

(पढ़ें : दाम्पत्य में बलात्कार का लायसेंस)

डाक्टर की अगली मुहीम है देश के पाठ्य पुस्तकों में जरूरी जानकारियाँ शामिल करवाना , जिससे बच्चे यौन विचलन और हिंसा के शिकार न हों .

साहस का सौंदर्यशास्त्र गढ़ती नायिकाएं

मेधा

 
आलोचक , सत्यवती महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती है . संपर्क :medhaonline@gmail.com



पुरानी कहावत है -‘भेस-वेश से भीख मिलती है’। वेश को लेकर एक कहावत और भी है- ‘जैसा देश वैसा वेश।’ दोनों ही कहावतों में वेश की बात तो है ही, वेश से जो साधा जाता है, उसका भी संकेत है। पहली कहावत कहती है कि आपका वेश देखकर लोग आपके बारे में धारणा ही नहीं बनाते उस धारणा के इर्द-गिर्द ही आपके साथ बरताव भी करते हैं। दूसरी कहावत इसी बात को आगे बढ़ाती है। वह कहती है कि वेश को लेकर हर देश में अलग धारणा होती है। सो जिस देश में पहुंचो वेश वैसा बना लो। मतलब साफ है वेश से आपकी सूरत और आपकी सीरत का गहरा नाता है। तो फिर बात इससे शुरू करें कि सुंदर देश और सुंदर वेश कौन सा है? जो कपड़े सबसे ज्यादा बिकते हैं या कह लें अगर पैसे कौड़ी हों तो जिन्हें लोग सबसे पहले खरीदें वह सबसे सुंदर कपड़ा है। इसी तर्क से सबसे महंगे कपड़े सबसे सुंदर कपड़े हैं। सबसे सुंदर और सबसे महंगा का एक देश है। इस देश को अब मॉडलिंग और व्यवसायिक सिनेमा के नाम से जाना जाता है। एश्वर्या राय और उन जैसी अन्य मॉडलों और सिने तारिकाएं इस देश की नायक हैं। इस देश में देह की एक धारणा है जहां स्त्री घुटने से ऊपर और गर्दन के नीचे तक ही होती है। इस देश में स्त्री के सौंदर्य का जो प्रतिमान है उसी के अनुकूल इसके नायकों का वेश बनता है। मॉडलिंग और सिनेमा के देश के इन नायकों ने अपने को अपने देश के वेश में ढाला।


इस दुनिया में कमनीयता और यौवन एक गुण है इसलिए अपनी उम्र को रोकना, देह पर पड़ती लकीरों को यथासंभव छुपाना और कदाचित सदा हरित दिखाना यहां एक धर्म बन जाता है। इस धर्म को निभाती हैं ये तारिकाएं और मध्यवर्गीय कामना का प्रतीक बन जाती हैं। और इस देश का बड़बोला मध्यवर्ग भला कब सोच सकता है कि स्त्री का जीवशास्त्र उसके समाजशास्त्र से अलग होता है। उसमें कोख है तो रोग भी है। मध्यवर्ग अपने मानस में स्त्री को लेकर सामंती है। वह पूछने के बहाने स्त्री में सब खोजता है- ‘कनक छरि सी कामिनी, काहे को कटि छिन’। तारिकाएं या मॉडल बनी औरत मध्यवर्ग की इस धारणा को जितना निभाती है, उतनी ही उसे अपने देश से भीख भी मिलती है। सारी दुनिया सर आंखों पर बिठाती है। यहां यह कहना जरूरी नहीं कि मध्यवर्ग की इस धारणा को कंपनियों ने बनाया है जो तारिकाओं के सहारे उसके मन-मानस में उतारा जाता है।

लेकिन विचित्र यह कि मेधा पाटकर और उन जैसी जनसंघर्ष की अन्य नायिकाओं को भी नैतिक धरातल पर इस देश का मध्यवर्ग स्वीकार करता है। स्त्री पात्रों में मध्यवर्ग का नायक एक नहीं अनेक है। इसके नायक एश्वर्या, विपाशा हैं तो मेधा पाटकर और अरूंधती राय भी हैं। लेकिन इनका देश अलग है। यह दुनिया वंचितों की दुनिया है और इसके नायकों की दुनिया वंचितों के संघर्ष की दुनिया है। इस देश के कई हित मध्यवर्गीय हितों से अलग और अक्सर विपरीत पड़ते हैं। यहां हारी-बीमारी और अभाव है। देह यहां दर्शन का कम, हाड़तोड़ मेहनत-मजदूरी का औजार ज्यादा है। इस देश तक आते-आते देह की धारणा बदल जाती है। यहां बुजुर्ग होना एक गुण है। यहां प्रखर होना और सामने वाले के दुख में हर तरह से शामिल होने का आभास देना, विश्वास पैदा करना गुण है। इसलिए उन्हें सिने तारिकाओं की मानिंद अपनी देह पर पड़ती उम्र और अनुभव की लकीरों और झुर्रियों को छुपाने की जरूरत नहीं। दुनिया दोनों को पहचानती है। लेकिन एक की पहचान सौंदर्य के रूप में होती है, तो दूसरे की वंचितों के संघर्ष के रूप में। एक मध्यवर्गीय कामना का प्रतीक है, तो दूसरा मध्यवर्ग की नैतिक दीप्ती का। तो क्या यह मान लिया जाए कि जो कमनीय नहीं वह सुंदर नहीं। क्या सुंदरता और संघर्ष में कोई छत्तीस का आंकड़ा है? मध्यवर्ग की आंखों को जो जंचता है, दिल के किसी कोने में वही क्यों खटकता है?

दरअसल मध्यवर्गीय सुंदरता को चुनौती देती जनसंघर्ष की ये नायिकाएं सौंदर्य की एक समानानंतर कसौटी गढ़ रही हैं। यह सच है कि सौंदर्य के प्रचलित मापदंड अपने समय के ताकतवर मुहावरों से निर्धारित होते हैं। मौजूदा वक्त का ताकतवर मुहावरा वैश्वीकरण और बाजारवाद है। इसलिए आज ‘पॉपुलर कल्चर’ और मध्यवर्गीय जीवन के सौंदर्य प्रतिमान इन मुहावरों से तय हो रहे हैं। मुकाबले की होड़ है और बाजार में कुलांचे भरती निजी पूंजी का तर्क समाज में अनूदित होता है- सबसे आगे, सबसे बढ़कर कौन के जुमले में। इस समाज में सौंदर्य से भी यही पूछा जाता है। सौंदर्य ऐसा जो कुछेक को प्राप्त हो मसलन ऐश्वर्या, प्रियंका चोपड़ा, कैटरीना कैफ। और मास मीडिया इस सौंदर्य की कामना को 14 साल से लेकर 80 साल के स्त्री-पुरुष में जगाता है और इसके आधार पर उसे एक उपभोक्ता में बदल अधिकतम मुनाफा कमाता है।

लेकिन सौंदर्य के प्रचलित मानक के बरक्स एक दूसरा मानक जनसंघर्ष की नायिकाएं गढ़ रही हैं। घोर असमानता और भयानक उपभोग की इस संस्कृति में जनसंघर्ष की ये नायिकाएं ठीक उसी तरह सौंदर्य के मानक गढ़ रही हैं जैसे कि आजादी के संघर्ष के दौरान गांधी नेहरू और जिन्ना जैसे नेताओं ने विक्टोरियाई अभिजात्य सौंदर्य के प्रतिमान के बरक्स नया सौंदर्य मानक गढ़ा था। यह अनायास नहीं कि बहुचर्चित पुस्तक फ्रीडम एट मीडनाइट’ के लेखकद्वय लापीयर और कॉलिन्स जब गांधी के चेहरे-मोहरे और हाव-भाव का वर्णन करते हैं तो उनकी कलम वर्णन के तनाव को ठीक से थाम नहीं पाती। दोनों ने अभिजात्य सौंदर्य से प्रेरित हो उनके रूप-रंग के बारे में लिखा है-‘‘प्रकृति ने गांधी के चेहरे को शायद जान-बूझकर कुरूप बनाया था। उनके दोनों कान उनके आवश्यकता से अधिक बड़े सिर के दोनों ओर शकरदान के हैंडिल की तरह निकले हुए थे। चपटे फैले हुए नथुनों वाली उनकी नाक उनकी सफेद छिदरी मूंछ पर भारी चोंच की तरह झुकी रहती थी…..।’’ लेकिन प्रचलित मानक पर गांधी को कुरूप कहते-कहते वे अचानक ही ठीठक जाते हैं और उन्हें लिखना पड़ता है-‘‘फिर भी गांधी के चेहरे पर एक विचित्र सौंदर्य की आभा थी क्योंकि वह निरन्तर बहुत चंचल रहते थे और उस पर मैजिक लैन्टर्न की जल्दी-जल्दी बदलती हुई आकृतियों की तरह उनकी बदलती मनोदशाओं और उनकी शरारत-भरी मुसकराहट का प्रतिबिंब झलकता है।’’ नैतिक बल से उपजे सौंदर्य के इस मानक को आजादी के दौर में देश की जनता ने भी अपनाया। विदेशी ताम-झाम और ग्लैमर को स्वदेशी के सौंदर्य ने आग लगा दिया। अपने देश में ही नहीं दुनिया भर में सौंदर्य के दमनकारी मानकों के बरक्स नया सौंदर्यशास्त्र गढ़ा जाता रहा है। अमेरिका को ही लें। चमड़ी के काले रंग को वहां बदसूरती का पर्याय माना जाता रहा है। सुंदर वही जो तन से गोरा है। इस विचार ने सदियों तक वहां अफ्रीकी अमेरिकियों का दमन ही नहीं किया स्वयं काले लोगों ने इस नस्लभेदी सौंदर्य प्रतिमान को आत्मसात कर लिया था। इसे चुनौती तब जाकर मिली जब वहां ‘ब्लैक इज ब्यूटीफूल’ आंदोलन चला।



गांधी ने कोट-पतलून के बदले लंगोटी पहनी। कोट-पतलून को उतार कर अधनंगे फकीर का वेश धारण किया तो नेहरू और जिन्ना ने भी साम्राज्यपरस्त सौंदर्य की दलील देते वेश को बदला और देशी रूप धरा। आजादी के नेताओं का सौंदर्य प्रतिमान एक समानानंतर सौंदर्य प्रतिमान था।

आज मेधा पाटकर, शर्मिला इरोम, सीके जानू, अरुणा राय, जैसी शख्सियतें सौंदर्य का समानानंतर संसार खड़ा कर रही हैं। एक ऐसा संसार जिसमें यह एलान तो है ही कि सुंदरता पर अधिकार महज समृद्धि का नहीं, साथ ही सौंदर्य का यह दर्शन जन- जन के करीब है। यह न्याय, समता और गरिमा की आभा से दीप्त है। सैकड़ों आदिवासियों के साथ तेजधार नर्मदा में कमर भर पानी में खड़ी मेधा पाटकर की तस्वीर भी आंखों को बांधती है। पूर्वोत्तर की छोटी गांधी शर्मिला इरोम मनुष्य विरोधी औपनिवेशिक आर्म्ड फोर्स स्पेशल पॉवर्स एक्ट के विरोध में सोलह साल तक सत्याग्रह किया।  यह नैतिक साहस ही है कि सोलह साल तक भूख हड़ताल पर बैठी इस साधारण स्त्री का सौंदर्य आज भी अग्निशिखा सा दीप्त है। घरेलू नौकरानी की नियति लेकर जन्मी आदया आदिवासी सी. के. जानू आज केरल के साढ़े तीन लाख भूमिहीन आदिवासियों की तकदीर बदलने के संघर्ष में लगी है। साहस के सौंदर्य को उसके पूरे व्यक्तित्व में महसूस किया जा सकता है। कहते हैं सुंदरता के पीछे दुनिया चलती है तो फिर एक दुनिया तो इनके पीछे भी चल रही है।



जनसंघर्ष की इन नायिकाओं ने मध्यवर्गीय कामना के प्रतीक के रूप में स्त्री-देह के प्रयोग को एक तरह से चुनौती दी है। इनकी आभा के सामने क्या ऐश्वर्या और उनकी समानधर्मा महिलाएं टिक सकेंगी? इन ‘निर्भीक विद्रोहिणियों’ ने जबरदस्ती ओढ़ायी गई भीरूता को जीत लिया है। ‘वे एक बड़ी लड़ाई को प्रतिश्रुत हैं।’ आजादी की दूसरी लड़ाई की इन नायिकाओं के सत्याग्रह, आत्मबल, निर्भीकता और नैतिक साहस की आभा एक रोज देखने वालों की आंखें भी बदल देंगी। दक्षिण अफ्रीका की कवयित्री ग्लोरिया म्तुंगवा ने ऐसी ही ‘निर्भीक विद्रोहिणियों’ के सौंदर्य को सलाम करते हुए लिखा है-
‘‘वह बहुत सुंदर लग रही है
उसके सौंदर्य को अब तक के प्रतिमानों से नहीं नापा जा सकता
उसका मानदंड मानवता के प्रति उसका समर्पण है।’’

सेलेब्रटिंग कैंसर

विभा रानी

लेखिका, रंगमंच में सशक्त उपस्थिति, संपर्क :मो- 09820619161 gonujha.jha@gmail.com



‘आपको क्यों लगता है कि आपको कैंसर है?’
‘मुझे नहीं लगता.‘
‘फिर क्यों आई मेरे पास?’
‘भेजा गया है.‘
‘किसने भेजा?’
‘आपकी गायकोनोलिज्स्ट ने.‘
और छ्ह साल पुरानी केस-हिस्ट्री– ‘बाएँ ब्रेस्ट के ऊपरी हिस्से में चने के दाल के आकार की एक गांठ. अब भीगे छोले के आकार की. ….कोई दर्द नहीं, ग्रोथ भी बहुत स्लो. मुंबई-चेन्नै में दिखाया- आपके हॉस्पिटल में भी. लेडी डॉक्टर्स से भी. हंसी आती है, साइज की इस घरेलू तुलना से. हंसी आती है अपनी बेवकूफी पर भी कि ब्रेस्ट-युट्रेश की बात आने पर सबसे पहले हम गायनोकॉलॉजिस्ट के पास ही दौड़ती हैं.‘


यह है हम आमजन का सामान्य मेडिकल ज्ञान- फिजीशियन, सर्जन, गायनोकॉलॉजिस्ट में अटके-भटके. छह साल मैं भी इस-उसको दिखाती रही. सखी-सहेलियों के संग गायनोकॉलॉजिस्ट भी बोलीं- ‘उम्र के साथ दो-चार ग्लैंड्स हो ही जाते हैं. डोंट वरी.‘ और मैं निश्चिंत अपनी नौकरी, लेखन, थिएटर, घर-परिवार में लगी रही.
धन्यवाद की पात्र रहीं गायनोकॉलॉजी विभाग की नर्स! डॉक्टर से मिलने की वजह जानकर बोली- ‘मैडम! आप सीधा ओंकोलोजी विभाग में जाइए. ये भी आपको वहीं भेजेंगी. आपका समय बचेगा’
दिल धड़का- “ओंकोलॉजी!” फिर खुद ही हंसी में उड़ा दिया- “विभा डार्लिंग! आज तक कभी तुझे कुछ हुआ है जो अब होगा.”

डॉक्टर मुझसे भी महान! बोला– ‘मुझे फायब्रोइड लगता है. डजंट मैटर. आप जिंदगी भर इसके साथ रह सकती हैं.” मेरा खुला या भौंचक चेहरा देखकर टालू अंदाज में कहा- “फिर भी, गो फॉर मैमोग्राफी, मैमो-सोनोग्राफी, बायप्सी एंड कम विथ रिपोर्ट.‘ मेरे लिए हर क्षेत्र अनुभव का नया जखीरा. इसके लुत्फ के लिए मैं हमेशा तैयार! मेरे शैड्यूल में एक महीने, यानि दीवाली तक मेरे पास समय नहीं. आज संयोग से कोई मीटिंग, रिहर्सल नहीं- सो काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब’. मैमोग्राफी विभाग ने कहा, ‘बिना एप्पोइंटमेंटवाले पेशेंट को वेट करना होता है. मैं तैयार, पर  अकेली, अजीब घबडाहट और बेफिक्री का भाव लिए. अपने किसी काम के लिए किसी को साथ ले जाना मुझे उस व्यक्ति के समय की बरबादी लगती.अस्पताल जाना भी उनमें से एक था. अजय (पति) को फोन कर दिया कि कुछ टेस्ट के लिए रुक गई हूँ. करवाकर आऊँगी. मैंने ही इसे गंभीरता से नहीं लिया था तो वे क्या लेते!

 मजाक में कहती रहती थी- “मेरा ब्रेस्ट! रोलर प्रेस्ड!!” इस रोलर प्रेस्ड ब्रेस्ट ने मैमोग्राफी की तकलीफ को चौगुना कर दिया. टेक्नीशियनों की भी उलझन चुनौती की तरह मुंह बाए थी-” करो इस सपाट छाती की मैमोग्राफी.“ चुनौती स्वीकारी गयी और मेरी तकलीफ कई गुना बढ़ा गई. मैंने लिखा-
यह स्तन है या नींबू या नारंगी!
यह मशीन है या किसी आतताई के हाथ,
जिसकी नजर में स्तन हैं
मांस का लोथड़ा भर!
चक्की के ये दो पाट!
आओ, और भर दो इन दो पाटों के बीच
अपने जीते-जागते बदन को-खुद ही!
भरो चीख भरी सिसकारियाँ,
कोई नहीं आएगा इन बड़े बड़े डैनेवाले गिद्धों से
तुम्हें बचाने!
स्त्रियॉं का यह अंग किस-किस रूप में छलता है
खुद को!

बायप्सी की तकलीफ का भी अंदाजा था नहीं. डॉक्टर ने कहा था- “एक इंजेक्शन देकर फ्लूइड का सैम्पल लेंगे. बस!” लेकिन जब सुई चारों कोनों से कट कट मांस काटती गई तब बायोप्सी के दर्द का पता चला. ट्रे में खून से लिथड़ी रुई ने नर्वसनेस को और बढ़ा दिया.  तन-मन से कमजोर अब मैं घर जाने के लिए अस्पताल से बाहर आई. गाड़ी लेकर गई नहीं थी. ऑटोवाले रुक नहीं रहे थे. एक रुका, पर जाने से मना कर दिया. मैंने कहा, ‘भैया, अस्पताल से आई हूँ. चक्कर आ रहा है, ले चलो.‘ उसने फटाक से कहा- “तो अस्पताल से लेना था न!” मैं बोली- “वहाँ कोई ऑटो रुक नहीं रहा था, इसलिए रोड तक आई हूँ. देख नहीं रहे, गाड़ी का सहारा लिए खड़ी हूँ.“ उसने फिर से एक पल देखा, बेमन से बिठाया, घर छोड़ा. लेकिन, जबतक मैं लिफ्ट में चली नहीं गई, रुका रहा. छोटे छोटे मानवीय संवेदना के पल मन को छूते हैं.



चेक-अप करवाकर मैं भोपाल चली गई- ऑफिस के काम से. ऑफिस और मेरी व्यस्तता का चोली दामन का साथ है. उसमें भी तब, जब आपके कार्यालय का निरीक्षण हो और सारी जिम्मेदारी आप पर हो. लिहाजा, व्यस्तता में भूल गई सब. चार दिन बाद अचानक याद आने पर अजय को फोन किया. वे बोले- ‘रिपोर्ट पोजिटिव है, तुम आ जाओ, फिर देखते हैं.‘ यह 18 अक्तूबर, 2013 की रात थी. ऑफिस के काम से चूर इस रिपोर्ट से दिल एकबारगी फिर ज़ोर से धड़का. रात थी. पार्टी चल रही थी. मैं भी पार्टी में शामिल हुई. मन न होते हुए भी खा रही थी, हंस-बोल रही थी. दिन रात कुछ न कुछ तकलीफ़ों के बावजूद आज तक मेरी सभी रिपोर्ट्स ठीक-ठाक आती थीं. मन हंसा- ‘कुछ तो निकला.‘ दूसरा मन कह रहा था, गलत होगी रिपोर्ट! फिर भी अजय से कहा, “मेरे पहुँचने तक फैमिली डॉक्टर से दिखा लो.” दूसरे दिन फ़ैमिली डॉक्टर ने भी कन्फ़र्म कर दिया. मतलब, “वेलकम टु द वर्ल्ड ऑफ कैंसर!”

डॉक्टर भी रिपोर्ट देख चकरा गया- ‘कभी-कभी गट फीलिंग्स भी धोखा दे देती है.‘ डॉक्टर ने बड़े साफ और संक्षिप्त शब्दों में बीमारी, इलाज और इलाज के पहले की जांच- प्रक्रिया बता दी. कैंसर के सेल बड़ी तेजी से बदन में फैलते हैं, इसलिए, शुभस्य शीघ्रम…..! इस बीच मुझे ऑफिस के महत्वपूर्ण काम निपटाने थे, एक दिन के लिए दिल्ली जाना था- ऑफिस के एक टेस्ट में भाग लेने. लौटकर विभागीय मीटिंग करनी थी, क्योंकि छुट्टी लंबी लेनी थी. डॉक्टर ने 30 अक्तूबर की डेट दी. ना! इस दिन कैसे करा सकती हूँ! चेन्नै-प्रवास के कारण तीन साल से अजय के जन्म दिन पर नहीं रह पा रही थी. इसबार तो रह लूँ. तो 1 नवंबर, 2013 तय हुआ- ऑपरेशन के लिए.

अभीतक केवल ऑफिसवालों को बताया था. रिशतेदारों की घबडाहट का अंदाजा हमें था. वर्षों पहले कैंसर से मामा जी को खोने के बाद दो साल पहले ही अपने बड़े भाई और बड़ी जिठानी को कैंसर से खो चुकी थी. घाव ताजा थे, दोनों ही पक्षों से. इसलिए दोनों ही ओर के लोगों को संभालना और उनके सवालों के जवाब देना…बड़ी कठिन स्थिति थी. हमने निर्णय लिया कि इलाज का प्रोटोकॉल तय होने के बाद ही घरवालों या हित-मित्रों को बताया जाए.


आशंका के अनुरूप छोटी जिठानी और दीदियों के हाल-बेहाल! मैं हंस रही थी, वे रो रही थीं. मैंने ही कहा- ‘मुझे हिम्मत देने के बजाय आपलोग ही हिम्मत हार बैठेंगी तो मेरा क्या होगा?” मैंने तय किया था, बीमारी की तकलीफ से भले आँसू आएँ, बीमारी के कारण नही रोऊंगी. जब भी हालात से विचलित होती, सोचती, मुझसे भी खराब स्थिति में लोग हैं. मन को  ताकत मिलती. यहाँ भी सोचा, ब्रेस्ट कैंसर से भी खतरनाक और आगे की स्टेज के रोगी हैं. वे भी तो जीते हैं. उनका भी तो इलाज होता है. पहली बार मैंने अपने बाबत सोचा- मुझे मजबूत बने रहना है. अपने लिए, पति के लिए, बेटियों के लिए.

‘शहर में जब चर्चा चली तो किस्से-आम होने लगे. हम कैंसर या किसी भी बीमारी पर बात करते डरते- कतराते हैं. इससे दूसरों को जानकारी नहीं मिल पाती. मुझे लगता है, हमें अपनी बीमारी पर जरूर बातचीत करनी चाहिए, ताकि हमारे अनुभवों से लोग सीख-समझ सकें और बीमारी से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें. याद रखिए, धन तो आप कहीं से भी जुटा लेंगे, लेकिन मन की ताकत सिर्फ आप अपने से ही जुटा सकते हैं. आपके हालात पर जेनुइनली रोनेवाले भी बहुत मिलेंगे, लेकिन आपको ही उन्हें बताना है कि ऐसे समय में आपको उनके आँसू नहीं, उनके मजबूत मन चाहिए.

निस्संदेह कैंसर भयावह रोग है. यह इंसान को तन-मन-धन तीनों से तोड़ता है और अंत में एक खालीपन छोड़ जाता है. लेकिन इसके साथ ही यह भी बड़ा सच है कि हम मेडिकल या अन्य क्षेत्रों के प्रति जागरूक नही होते. जबतक बात अपने पर नहीं आती, तबतक अपने काम के अलावा किसी भी विषय पर सोचते नहीं. इससे भ्रांतियाँ अधिक पैदा होती हैं. कैंसर के बारे में भी लोग बहुत कम जानते हैं. इसलिए इसके पता चलते ही रोगी सहित घर के लोग नर्वस हो जाते हैं. हम भी नर्वस थे. मेरा एक मन कर रहा था, हम सभी एक-दूसरे के गले लगकर खूब  रोएँ. लेकिन हम सभी- मैं, अजय, मेरी दोनों बेटियाँ- तोषी और कोशी – अपने-अपने स्तर पर मजबूत बने हुए थे.

मेरा कैंसर भी डॉक्टर से शायद आँख-मिचौनी खेल रहा था. ऑपरेशन के समय डॉक्टर ने मुझे केमो पोर्ट नहीं लगाया- ‘आपका केस बहुत फेयर है. सैंपल रिपोर्ट आने के बाद हो सकता है, आपको केमो की जरूरत ही न पड़े. केवल रेडिएशन देकर छुट्टी.‘ किसी भी मरीज के लिए इससे अच्छी खबर और क्या हो सकती है!

ऑपरेशन के बाद अलग अलग कोंप्लीकशंस के बाद आईसीयू की यात्रा करती एक्यूट यूरिन इन्फेक्शन से जूझने के अलावा हालत बहुत सुधर चुकी थी. मेरे मित्र रवि शेखर एक म्यूजिक बॉक्स छोड़ गए. सुबह से शाम तक धीमे स्वर में वह मुझे अपने से जोड़े रखता. नर्स ने एक्सरसाइज़ बता दिए. दस दिन बाद घर पहुंची, एक पूर्णकालिक मरीज बनकर. अजय और बच्चे मेरे कमरे, खाने, दवाई के प्रबंध में जुट गए. मुझे सख्त ताकीद, कोई काम न करने की, खासकर प्रत्यक्ष हीट से बचने के लिए किचन में न जाने की. पूरे जीवन जितना नहीं खाया-पिया, आराम नहीं किया, अब मैं कर रही थी. शायद आपकी अपने ऊपर की ज्यादती प्रकृति भी नहीं सहती. उससे उबरने के इंतज़ाम वह कर देती है. तो क्या मेरा कैंसर प्रकृति का दिया इलाज है? या जीवन और नौकरी में आए वे पल और झंझावात, जिन्हें समझनेवाला कोई नहीं और जो गहरे जाकर गाँठ बना गया? या मैंने ही किसी के साथ नहीं बांटा- “रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय. सुनि इठलैन्हि लोग सब, बाँटि न लैंहे कोय.”

सैंपल रिपोर्ट आ गई- पहला स्टेज, ग्रेड III! डॉक्टर ने समझाया- “चोरी होने पर पुलिस को बुलाते हैं, आतंकवादी के मामले में कमांडोज़. ग्रेड 3 यही आतंकवादी हैं, जो आपके ब्रेस्ट और आर्मपिट नोड्स में आ चुके हैं. इसलिए केमो अनिवार्य!” केमो स्पेशलिस्ट ने एक संभावित तारीख और निर्देश दे दिए- 23 नवम्बर- ‘सर्जरी के तीन से चार सप्ताह के भीतर केमो शुरू हो जाना चाहिए. चूंकि, केमो कैंसर सेल के साथ-साथ शरीर के स्वस्थ सेल को भी मारता है, इसलिए इसके साइड इफ़ेक्ट्स हैं- भूख न लगना, कमजोरी, चक्कर आना, बाल गिरना आदि.‘

तीसरा सप्ताह चढ़ा कि नहाने के समय हाथ में मुट्ठी-मुट्ठी बाल आने लगे. केमो की तैयारी के लिए पहले ही मैंने बाल एकदम छोटे करा लिए थे-पिक्सी कट. लंबे बालों के गिरने से बेहतर है छोटे बालों का गिरना. फिर भी बालों के प्रति एक अजीब से भावात्मक लगाव के कारण और बाल गिरेंगे, यह जानते हुए भी मैं अपने-आपको रोक ना सकी और फूट-फूटकर रोने लगी. अजय और कोशी भागे-भागे आए. कारण जानकर दिलासे देने लगे. कोशी ने अवांछित बाल हटाकर खोपड़ी को समरूप-सा कर दिया. लेकिन, आईना देख खुद को ही नहीं सह पाई. झट सर पर दुपट्टा लपेट लिया. रात में तोषी के आने पर मैंने कहा कि मेरा चेहरा बहुत भयावना लग रहा है. उसने मुझे अपने गले से लगाते हुए कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है, तुम अभी भी वैसी ही प्यारी लग रही हो.‘

एक-दो दिन बाद स्थिर होकर खुद को देखा- नाटक ‘मि. जिन्ना’ करते समय अक्सर गांधी की भूमिका की सोचती. तब हिम्मत नहीं थी. लेकिन अब मुझे अपनी टकली खोपड़ी से प्यार हो गया. उसे ढंकती नहीं, न घर में न बाहर में. यह अपना आत्म-विश्वास है. मुझे देखनेवाले कहते हैं- ‘यह ‘कट’ आप पर बहुत सूट कर रहा है.‘ किसी ने मौंक कहा, किसी ने कहा, “आप बिलकुल वाटरवाली शबाना आज़मी लग रही हैं.” शबाना से मेरी तुलना शुरू से की जाती रही है. लेकिन अब मैंने कहना शुरू कर दिया था, “मैं नहीं, वो मुझसे मिलती हैं.” (आखिरकार अब मेरी भी एक हैसियत है-लेखक, कवि, ट्रेनर, थिएटर एक्टर.)

केमो पोर्ट न लगाने के कारण इंट्रावेनस केमो दिया गया. लेकिन तीसरे केमो तक आते-आते सारी नसें फायर कर गईं. नसें काली पड़ गईँ और काफी दर्द रहने लगा. डॉक्टर बोले- ‘आपकी नसें काफी सेंसिटिव हैं. आमतौर पर ऐसा छह महीने बाद होता है, आपके साथ डेढ़ महीने में ही हो गया. अभी 13 केमो बाकी हैं, सो केमो पोर्ट लगाना होगा. इसके लिए और मार्जिन टेस्ट के लिए फिर से ऑपरेशन!

मेडिकल और शिक्षा- दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ आप डॉक्टर और शिक्षालयों के गुलाम हो जाते हैं. मार्जिन टेस्ट में ऑपरेशनवाली जगह से ही वहाँ का सैंपल लेकर टेस्ट के लिए भेजा गया, ताकि कैंसर –सेल्स की स्थिति का पता चल सके. रिपोर्ट आ गई. डॉक्टर ने बताया कि आप अब खतरे से बाहर हैं. लेकिन केमो, रेडिएशन, खाना-पीना, आराम- शिड्यूल के मुताबिक! पहले 4 केमो के एक सेट के बाद दूसरे सेट में 12 केमो- साप्ताहिक. केमो से भूख बहुत लगती और अस्पताल का खाना! केमो में दिन भर लगता. चुराकर घर से खाना ले जाती. हर केमो की अपनी दुश्वारियां. कभी सबकुछ सामान्य रहता. कभी एकदम कंप्लीकेटेड. एक साइकिल में ज़बान ऐंठ गई तो एक में शरीर में जर्क आने लगा.


इसी बीच इंफेक्शन हो गया और फिर 10 दिन अस्पताल में. जांच पर जांच और बिल पर बिल. मैं सोचती रहती, “क्या ये सभी जांच जरूरी भी थे?” फिर से वही बात आने लगी दिमाग में, “शिक्षा और चिकित्सा- ये दो क्षेत्र ऐसे हैं, जहां आप कुछ नहीं कर सकते.“ इंफेक्शन और इसके इलाज के कारण मेरा केमो 15 दिन आगे टल गया. मेरे साथ की दूसरी महिलाओं का आखिरी केमो आता. केमो से निकलने की ख़ुशी चहरे पर साफ़ नज़र आती. वे बाकियों को दिलासे देतीं. मुझे भी मिले और मैंने भी दिए.

16 केमो के बाद रेडिएशन. फिर से उसका पूरा प्रोटोकॉल. 35 सिटिंग. सोमवार से शुक्रवार. प्रतिदिन. उसके लिए अलग से काउन्सिलिंग. अलग से बचाव के उपाय! प्रभावित जगह पर पानी, साबुन, क्रीम का प्रयोग वर्जित. ब्रेस्ट के कारण गले पर भी असर पड़ा. आवाज़ फट से गई. धीरे धीरे रेडियेशन से जगह झुलसकर काली पड़ने लगी. साइकिल पूरा होने पर एक महीने का पूर्ण आराम.

ये सब तो शिड्यूल में था. जो नहीं था और जिसे मैंने अपने लिए तय किया था, वह था खुद को बिजी रखना. केमो के दो सप्ताह तक मैं उठने की हालत में नहीं रहती. उसके बाद एक सप्ताह “बेहतर” रहती. साप्ताहिक केमो मे तो और भी मुश्किल थी. जबतक तबीयत थोड़ी संभलती, फिर से नए केमो का दिन आ जाता. लेकिन अपने इन तथाकथित ‘बेहतर’ दिनों को मैंने तीन भागों में बाँट दिया- लिखना, पढ़ना और वीडियो बनाना. खूब किताबें पढ़ीं- हिन्दी, अँग्रेजी, मैथिली की. लिखा भी- कई कहानियाँ, कविताएँ और नाटक “मटन मसाला चिकन चिली.” उसे प्रोड्यूस किया. CAN शीर्षक से इस मौके पर लिखी कविताओं का संग्रह तैयार है-अँग्रेजी और हिन्दी में- द्विभाषी. “सेलेब्रेटिंग कैंसर” नाम से ही आत्मकथात्मक किताब लिख रही हूँ. यह एक प्रयास है रचनात्मक तरीके से लोगों को कैंसर के बारे में बताने का, कैंसर से न डरने का, इससे लड़ने का साहस और इसके प्रति सकारात्मकता तैयार करने का. इंस्टाग्राम पर 15 सेकेण्ड के वीडियो बनाने की सुविधा है. चुनौतियों में जीना स्वभाव में है. भोजपुरी गीतों और बच्चों की बातों को लेकर वीडियो बनाने और यूट्यूब पर पोस्ट करने लगी. फिर उन्हें एडिट करके कई फ़िल्में बनाकर पोस्ट कीं. हर रोज खूब फल खाना पड़ता. ‘सत्यमेव जयते’ प्रोग्राम में घर में खाद बनाने की विधि बताई गई. मैंने फलों के छिलके से खाद बनाना शुरू कर दिया. थोड़ी बहुत बागवानी भी कर लेती. पोए साग की पहली फसल मेरी खुशी कई गुना बढ़ा गई.

इसी समय शुरू किया- “अवितोको क्रिएटिव इवानिंग” कार्यक्रम! “रूम थिएटर” की अवधारणा पर आधारित! चूंकि इन्फेक्शन के डर से घर से निकलने की इजाज़त नहीं थी, इसलिए इसे घर पर ही शुरू किया. शनिवार को केमो लेती. केमो के बाद रात भर नींद नहीं आती. पर, इतवार को ‘रूम थिएटर’ के लिए तैयार हो जाती. अमूमन 36 घंटे के बाद मैं सो पाती. सभी ने मेरा बहुत साथ दिया और घर पर ही हमने ‘एक्सपेरिमेंटिंग थिएटर’ से लेकर ‘मंटो’ पर नाटक की कई प्रस्तुतियाँ कीं. 25-30 लोगों के बैठने की क्षमतावाले घर में 60-70 लोग आए.



अप्रैल, 2013 के गीताश्री के संपादकत्व में निकलनेवाली हिन्दी पत्रिका ‘बिंदिया’ में मेरा एक लेख छपा. दरअसल, उन्होने ही मुझे इस पर लिखने के लिए प्रेरित किया, जबकि मैं उसके छपने के बाद के परिणाम को लेकर थोड़ी परेशान थी. अंतत: वही हुआ. उसके छपते और उसे फेसबुक पर पोस्ट करते ही जैसे भूचाल आ गया. फोन, मेल, फेसबुक मेसेज! सभी मुझे इस तरह दिलासे देने और रोने लगे, जैसे मैं सचमुच मर गई होऊँ! उनके फोन दिलासे के बदले हतोत्साहित करते. अजय ने कड़े शब्दों में मुझे किसी का फोन लेने या किसी से बात करने से मना कर दिया. कुछ मेरे पास आना चाहते थे. मुझे पता था, वे मुझसे मिलने के बहाने मेरी  और भी कुरूप पड़ गई सूरत को देखना चाहते हैं. उन सबने कैंसर के बारे में सुन भर रखा था, उसे नजदीक से देखा नहीं था और मैं उनके लिए एक रेडीमेड उपकरण बनकर आ गई थी. वे सब आए. मैं उनसे मिली- अपनी गंजी खोपड़ी, सूनी पलकों और भौंहों, लेकिन जीवंत मुस्कान और जीवन की एक नई आस के साथ- उन्हें ही दिलासे देती और खूब मुसकुराती हुई.

आज इन सबसे निकल आई हूँ. केमो, रेडिएशन का प्रोटोकॉल पूरा करने और एक महीना आराम करने के बाद ऑफिस आना शुरू किया. मेरे साथ मेरा काम मेरा इंतज़ार करते रहते हैं या मैं काम के बगैर जी नहीं सकती, पता नहीं. दफ्तर के दौरे के साथ-साथ साहित्यिक और नाट्य दौरे शुरू हो चुके हैं. सितंबर, 2014 में एसआरएम, चेन्नै का पहला दौरा- विशिष्ट अतिथि के रूप में! दिसंबर, 2014 में आजमगढ़ में नाटक ‘भिखारिन’ का पहला शो. रायपुर साहित्य महोत्सव का संयोजन और इन सबसे ऊपर ऑफिस की तमाम जिम्मेदारियाँ. जीवन की दूसरी पारी का व्यस्ततम दौर शुरू हो चुका है. दवा और फॉलो- अप चल रहा है. खान-पान और आराम अभी भी बहुत ज़रूरी है. कमजोरी अभी भी है. लेकिन, खुद को व्यस्त रखना बहुत सी परेशानियों से निजात दिलाता है. अजय, तोषी, कोशी सभी मुझे समझाते रहते हैं. मैं थोड़ा उनको और थोड़ा खुद को समझाती-समझती रहती हूँ.


कुछ दिन लगते हैं, अपने-आपसे लड़ने में, खुद को तैयार करने में. लेकिन, अपना मानसिक संबल और घरवालों का संग-साथ कैंसर क्या, किसी भी दुश्वारियों से निजात की संजीवनी है. यह आपको कई रास्ते देता है- आत्म मंथन, आत्म-चिंतन, आराम, खाने-पीने और सबकी सहानुभूति भी बटोरने का (हाहाहा). यह ना सोचें कि आप डिसफिगर हो रही हैं. यह सोचें कि आपको जीवन जीने का एक और मौका मिला है, जो शत-प्रतिशत आपका है. इसे जिएँ- भरपूर ऊर्जा और आत्म-विश्वास से और बता दीजिये कैंसर को कि आपमें उससे लड़ने का माद्दा है. सो, कम एंड लेट्स सेलेब्रेट कैंसर!
क्या फर्क पड़ता है कि
सीना सपाट है या उभरा
चेहरा सुंदर है या बिगड़ा
सर पर बाल हैं या है यह टकला
जीवन इससे बढ़कर है
यौवनमय, स्फूर्त और ताज़ा,
आइये, मनाएँ इसे भरपूर,
जिएं इसे भरपूर !

स्त्रीविमर्श में जाति, वर्ग और धार्मिक पहचान की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए : नमिता सिंह

 वरिष्ठ रचनाकार और हिन्दी मासिक ‘वर्तमान साहित्य’ की पूर्व संपादक से स्त्रीविमर्श और स्त्री आन्दोलन पर बात कर रही हैं युवा लेखिका और ‘हमरंग’ के संपादन मंडल की सदस्य अनिता चौधरी की बातचीत : 


आज स्त्री आन्दोलन किस दिशा में चल रहा है ? या इसकी गति क्या है ?

आज हम अपने देश की बात करें तो स्त्री आन्दोलन एकांगी चल रहा है. उसके अपने कारण है. आज पूरे देश में रेप की घटनाएँ हो रही है. इस रूप में स्त्रियों के साथ जो व्यवहार पूरा समाज कर रहा है. अगर स्त्री आन्दोलन ऐसा ही चलता है तो वह जस्टिफाइड है क्योंकि समाज, स्त्रियों की एक सम्मानजनक स्थिति के लिए तैयार नहीं हो पा रहा है. इसके लिए बहुत बातचीत भी हो रही है. जब कभी कोई रेप की बड़ी घटना होती है. मोलीस्ट्रेशन की बात होती है, बड़ा  हल्ला-गुल्ला भी होता है. कैंडिल मार्च भी निकाले जाते है. लेकिन जब हम स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात करते है तो वह एक दिन की बात नहीं होती.  एक सुनियोजित रूप में वातावरण तैयार करने की बात होती है इसके लिए लम्बे प्रयास करने होते है. इसलिए हम स्त्री आन्दोलन की बात करें तो आज जो स्त्रियों के प्रति हिंसा की घटना है. उससे जुडा हुआ लग रहा है.

अक्सर यह सुनने में आता है कि दशकों से स्त्री-विमर्श हो रहा है क्या अब भी इसकी आवश्यकता है ? 

स्त्री विमर्श का मतलब है कि स्त्रियों की स्थितियों पर बातचीत और उनके लिए एक न्यायोचित माहौल बनाने की बातचीत. यह बातचीत भी पिछले ढेड़ सौ या पौने दो सौ सालों से शुरू हुई है. उससे पहले इस तरह की कोई बात नहीं होती थी. खासतौर से उन्नीसवी शताब्दी में जब सुधारवादी आन्दोलन शुरू हुए, उस वक्त जो सबसे पहला कार्यक्रम बना, समाज सुधार में स्त्रियों की स्थिति. स्त्रियों के बंदी जीवन में समानता का कहीं कोई अवसर नहीं था. शिक्षा उनके लिए निषेध थी. उनकी कोई आवाज ही नहीं थी. तब से तो बात शुरू हुई. धीरे-धीरे आज हम इस स्थिति पर पहुँचे है कि स्त्रियों को संविधान में बराबर के अधिकार है. स्त्रियों के लिए राज्य की ओर से भी शिक्षा के लिए प्रबंध किये गए है और एक बड़ा मध्य वर्ग बना है. जिसमें सामान्यत: स्त्री और पुरुष की समानता की बात होती है. यह समानता की बात शिक्षा के स्तर पर भी होती है. लेकिन पूरे समाज का एक रवैया जो एक स्त्री को भी अपने बराबर समझने की बात करे, वह तो आज भी नहीं है. आज भी स्त्रियां असम्मानजनक स्थितियों में जी रही है. स्त्रियों के लिए समाज में एक सामान वातावरण बनाने के लिए जमीनी कोशिशें करनी पड़ेंगी, इसके बाद भी कितना लंबा वक्त लगेगा.  जिससे हम कुछ अचीव कर पाये इसलिए स्त्री विमर्श को कम करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है.

दो पीढियां : नमिता सिंह, अनिता चौधरी

स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कानून बनाए गए है | उनका असर आप समाज में कितना देखती है ?

स्त्रियों के लिए क़ानून तो बहुत पहले से ही बनाए जा रहे थे  लेकिन उनमें बहुत लूप होल्स  थे | धीरे-धीरे बात होती गई. महिला संगठनों ने भी इस पर बात की . दिसंबर २०१२ में निर्भया कांड से लोगों में ज्यादा जागरूकता आई. तब जस्टिस वर्मा कमेटी के सभी बिन्दुओं पर व्यापक रूप से चर्चा की गई और क़ानूनों में भी बदलाब किये गए  लेकिन क़ानून बना देने से भी तो कुछ नहीं होता. उसमें जो कठोर प्रावधान बने तो उसका नतीजा यह हुआ कि अब गैंगरेप करने के बाद लड़की की ह्त्या कर दी जाती है. जिससे सबूत भी मिट जाते है और जुर्म साबित भी नहीं होता है. कहने का मतलब यह कि समाज की स्थिति भी ज्यों की त्यों है. उसकी सोच में  एक रत्ती भर का परिवर्तन नहीं आया है. अंतर सिर्फ यह है कि अगर सबूत है और जुर्म  साबित हो जाता है तो उसको सजा मिल जायेगी. वरना आज से दस या बारह साल पहले जो आंकड़े लिए जाते थे तो उसमें कन्वेंशन रेट बढ़ा है. आज वह न्याय माँगते-माँगते तंग आ जाती है. जिसका अंत फिर सुसाइड में होता है. कितने ऐसे केस हुए है जहाँ बलात्कार की पीडिता ने अंत में आत्महत्या ही कर ली. इसलिए बदलाव तो यह आया है कि अब रेप होते है और सुबह ह्त्या हो जाती है. जिससे सबूत ही न रहे.

ऑनर किलिंग या साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर कितनी महिला लेखक है जो इन्हें अपनी लेखनी में शामिल नहीं कर रही है | आपको इसके क्या कारण नजर आते है ?

अगर मैं साम्प्रदायिकता की बात करू तो यह जरुर है कि बहुत महिलायें इन मुद्दों पर नहीं लिख रही है. उसका एक कारण यह है कि सांप्रदायिकता के प्रति लोगों का दृष्टिकोण बहुत साफ़ नहीं है. लोगों ने साम्प्रदायिकता को खाली एक दंगा या लड़ाई-झगडे के रूप में देखा है. दूसरा कारण राजनैतिक है जो विशेष रूप से सत्ता या व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है. हमारे यहाँ पर लोग राजनीति से बहुत दूर रहते है और इसे बहुत बुरी चीज समझते और अक्सर कहते है कि    हमें राजनैतिक नहीं होना है. जब आप राजनैतिक ही नहीं होगें तभी तो आपको सम्मान और पुरूस्कार मिलेंगें. जब आप व्यवस्था पर चोट करोगे और उसे साम्प्रदायिकता का भागीदार बनाओगे तो वो आपको सम्मान देगा ?दूसरा यह है कि इस रूप में हमारी महिला लेखिकाएं सामाजिक आन्दोलनों से नहीं जुडी हैं. मैं अपने को बहुत सौभाग्यशाली समझती हूँ कि लेखन के साथ साथ मैं आन्दोलनों से भी जुड़ी रही. खासतौर यहाँ कुंवरपाल का भी योगदान रहा था. हमने साथ मिलकर साम्प्रदायिकता के माहौल में सद्भावना और एकता के लिए राजनैतिक स्तर पर काम करने और इन चीजों से रूबरू होने की वजह से हम पुरुस्कारों और सम्मानों से दूर रहे. इसलिए हमारी महिला लेखिकायें और बहुत से पुरुष भी इन मुद्दों पर नहीं आते है कि यह खतरे की चीज है |जहाँ तक ऑनर किलिंग की बात है. इसे समझाने की जरुरत है कि खुद लेखक भी इसी समाज का प्राणी है. उसने अपने आप को सामाजिक और राजनैतिक रूप से इतना शिक्षित नहीं किया है  कि वह इन सवालों पर आपके साथ आ सके. अभी हमारे समाज में बहुत से लेखक व लेखिकाएं हैं . जहाँ जातियों से अलग या इंटररिलिजन शादियाँ हो जाए तो उसे खुद भी अच्छा नहीं समझते हैं.  इसके लिए बहुत ही उदारवादी सोच व विचारधारा की जरुरत होती है. तब आप इस पर उतनी ही प्रखरता से बात कर पाओगे और उसे संवेदना के स्तर पर महसूस करोगे. इस विषय पर कुछ एक कहानियाँ है, बहुत ज्यादा तो नहीं है. हाँलाकि यह एक व्यापक रूप से विषय नहीं बना है. लेखक अपने आस-पास जो देखता है उसी पर लिख देता है लेकिन जब तक लेखक के पास पूरा वैचारिकता का आधार न हो तो वह मुश्किल होता है इन मुदद्दों पर अड़े रहना.


ऑनर किलिंग या साम्प्रदायिकता जैसी घटनाओं के पीछे आप धर्म या धार्मिक मान्यताओं को कितना जिम्मेदार मानती है ?

पहले धार्मिक मान्यतायें ऐसी थी जो आप को एक अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करती थी. आज धार्मिकता का स्वरुप वह नहीं रह गया है. आज यह सीधे-सीधे सत्ता और राजनीति के मंतव्यों से जुडी हुई है क्योंकि राजनीति ही धार्मिकता का माहौल बना रही है जिसका निश्चित ही अपना मकसद होता है. इसलिए ये जो धार्मिक मान्यताएं है, साम्प्रदायिकता में बदल गयी है क्योंकि वह व्यवस्था से जुड़ जाती है. जहाँ तक आपने ऑनर किलिंग की बात कही है. ये कमन्युनीटी खाप पंचायते हैं.जो जाटों की पंचायते है और मुस्लिम समुदाय की भी अपनी पंचायतें हैं जहाँ पर वे फतवे देते हैं. ये पंचायतें बहुत ही सामाजिक संकीर्णता की बात करती है. ये खाप पंचायतें वहां स्त्री विरोधी निर्णय लेकर जो पूरा माहौल बनाती हैं तो उसका विरोध कोई क्यों नहीं करता है. वे विरोध इसलिए नहीं करते हैं कि हमारे जो राजनेता हैं वे खाप पंचायतों के बीच में जाकर कहते हैं कि वे उनके बहुत बड़े हिमायती है. जबकि वे स्त्री विरोधी बातें कर रहे हैं | चूकिं राजनेताओं का खाप पंचायतों के रूप में एक बहुत बड़ा वोट बैंक हैं. ठीक यही स्थिति मुस्लिम समुदाय की भी है. उनके धार्मिक नेता भी फतवे जारी करते हैं. अगर विरोध किया तो उनके वोट चले जायेंगे इसलिए ये संस्थाएं वोट बैंक की राजनीति से जुड़ जाती हैं. एक प्रभावी रूप से उसका प्रतिवाद नहीं हो पाता.

वर्तमान समय में युवा पीढ़ी या ख़ास तौर से युवातियाँ, शादी जैसी संस्थाओं से विमुख हो रही हैं. आप इसके क्या कारण मानती हैं ?


खासतौर पर जब युवतियां शादी जैसी संस्था से दूरी बना रही है. उसका कारण है कि भारतीय पारम्परिक संस्कार में शादी के बाद, उस रुढीवादी पुरुष को पत्नी रूपी महिला पर डोमिनेंट होने का जो पारिवारिक वातावरण मिल जाता है.आज लड़की उस वातावरण से वैचारिक रूप से मुक्त होना चाहती है. उसने एजूकेशन के साथ जो विचारधारा पढी है उसी के अनुसार जीवन जीना चाहती है. लेकिन हमारे भारतीय परिवार और परम्परा की अवधारणा के अंतर्गत शादी के बाद पति को पत्नी पर कई सारे अधिकार मिल जाते है जो हर स्तर के होते है. चाहे वह सेक्स के रूप में हो या परिवार में डोमिनेंस के रूप में. आज की कोई भी पढी-लिखी लड़की किसी भी वर्ग की हो, उसकी भी अपनी मर्जी और इच्छा है. कोई जरुरी है, पति के चाहने पर बच्चे पैदा हो. वह नहीं चाहती तो यहीं पर क्लैश हो जाता है. यहाँ पर पति में अपने अधिकार की भावना जागृत हो जाती है. लड़कियों के पढ़ने-लिखने से उनमें एक स्वाभिमान, अपनेपन, अस्मिता और अपने व्यक्तित्व के प्रति सजगता की जो स्थिति आई है वहां पर इस तरह के क्लैशेज होना बहुत स्वाभिक है. इसलिए कई बार ठोस स्थूल कारण नहीं होने पर भी तलाक हो जाता है, इसीलिए वे कहती है कि हम इस तरह से बंधन में नहीं रह सकती. हम स्त्री सशक्तिकरण और  स्त्रियों के प्रति हिंसा बात करते है लेकिन जब तक हमारे पुरूष समाज की एजूकेशन नहीं होगी तब तक ये चीजें सही नहीं हो सकती है. इसीलिए तलाक हो रहे है, अलग-अलग रहने की बात हो रही है, लिव इन रिलेशनशिप हो रही है या फिर शादी ही न करो. इन जड़ परम्पराओं या संस्कारों की वजह से भी इस युवा पर दूसरा समाधान तो है नहीं और न ही कोई आइडियोलोजी है इसीलिए उसे लगा कि सात फेरे लेना जिन्दगी का इतना बड़ा जहर बन जाए, इससे अच्छा है हम इससे दूर हो जाए.  यह केवल ग्लोबल इफेक्ट ही नहीं है इसमें लड़कियां पढ़-लिखकर एक चेतना संपन्न हो गयी है. यह भी एक कारण है. यह बदलाव सिर्फ हाई क्लास की लड़कियों में ही नहीं हैं. पहले की अनपढ़ और पढी-लिखी लड़कियां भी इस तरह के निर्णय ले रही है ,क्योंकि वह इस तरह के वातावरण को देख रही है तो उनकी मानसिकता में बदलाव है लेकिन यह बदलाव लड़कियों के स्तर पर तो हो रहा है. पूरे समाज के स्तर पर नहीं हो रहा है इसीलिए कॉण्ट्राडिक्शन्स पैदा हो रहे है. मैं हमेशा कहती रही हूँ कि जब भी हम स्त्री सशक्तिकरण और स्त्री विमर्श की बात करें तो यह केवल स्त्री समूहों के लिए नहीं है. पूरे समाज को एडजस्ट करने वाली बात कहें.

 धार्मिक संवाहक महिलायें ही मानी जाती है | अगर आप इस बात से सहमत है | तो क्यों ? अगर नहीं तो क्यों ?

हाँ मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ कि हमारे समाज में महिलायें ही संवाहक हैं. हमारे यहाँ जब से मानव समाज बना है. समाज में वर्ण आश्रम हुआ है. यह परम्परा तब से चली आ रही है.जब हमारा पुरुषवादी समाज बना और इसकी सामन्ती स्तिथियाँ आई. ब्राह्मणों और राजसत्ता में एक संघर्ष हुआ. उसके बाद क्षत्रीयों ने कहा कि यह राजसत्ता हमारी है, इसे  हम चलाएंगे, तुम समाज को चलाओ. अब समाज को चलाने में जो सबसे कमजोर तबका था वे स्त्रियों थी, जिन्हें आसानी से हेंडिल किया सकता था इसलिए ब्राह्मणों का वर्चस्व परिवारों की स्त्रियों के बीच रहा है. अगर हम एक दो पीढ़ी पीछे पास्ट में देखें तो कुछ लोग बहुत पढ़े-लिखे होने के साथ-साथ, बड़े उच्च पदों में हुआ करते थे लेकिन घर की औरतें बहुत ही पारम्परिक तरीके से परदे के पीछे रहा करती थीं. जो बिलकुल साक्षर नहीं होती थीं और बहुत ही धार्मिक कर्मकांडों को करने वाली थीं क्योंकि हमारे समाज में इसी प्रकार का डिवीजन हुआ कि पुरुष बाहर का ही देखेंगे, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में कितना भी आगे बढे या उन्नति करे और स्त्रियाँ बिलकुल उन धार्मिक परम्पराओं को ही मानेंगी, जिन्हें हम भारतीय परम्परा कहते है. इन परम्पराएं को स्त्रियों ही शेप दे रही हैं. आज लड़कियां पढ़-लिखकर थोड़ा नौकरी कर रही है इस रूप में स्वतंत्र है लेकिन उनकी मानसिक स्थिति को बदलने की कोशिश नहीं की गई है. वे सारा कुछ उन्हीं परम्पराओं से ले रही हैं जो उनके तत्व कहे जा सकते हैं. आज, इन्हीं औरतों के बल पर धर्म आधारित आन्दोलन संचालित हो रहे हैं जो पूरी राजनैतिक व्यवस्था से जुड़े है. इस पर कभी किसी ने विचार करने की भी कोशिश नहीं की है और साथ ही इस बात पर भी महत्व नहीं दिया कि घर की औरतें की एजूकेशन और उनके लिए सही परिप्रेक्ष्य में देखना होना चाहिए.


आपको नहीं लगता है कि सम्पूर्ण स्त्री आन्दोलनों को इस दिशा में कोई सशक्त कदम उठाने चाहिए | और वो क्या कदम हो सकते है |   

आज से दस या बारह साल पहले स्त्री विमर्श पर बात करते थे (हांलाकि आज भी करते हैं) | तो हम कहते थे कि स्त्रियों की आपस में एकता होनी चाहिए. पूरी दुनिया की औरतों की एक सी कठिनाईयां, कष्ट और समस्याएं है | हमने देखा कि समाज में आज भी वर्णवादी व्यवस्था बहुत निर्मम है. दलितों की स्थितियां देखी या २००२ में गुजरात देखा उससे पहले भिमंडी देखा. यह सब देखकर हमारी स्त्री विमर्श की अवधारणा बिलकुल समाप्त हो गयी इसलिए स्त्रियों पर बात करते वक्त हमारा बयान वर्ग आधारित होना चाहिए. बिना वर्ग आधारित स्त्री विमर्श किये, हम सही नतीजों पर नहीं पहुंच सकते है. हमें दलित स्त्रियों की अलग तरह से बात करनी पड़ेगी और वहीँ हमें ग्रामीण स्त्रियों की बात दूसरी तरीके से करनी होगी, जहाँ ईशूज भी दूसरे हो जायेंगे. शायद जो पहले महत्वपूर्ण नहीं थे, लेकिन दूसरी जगह महत्वपूर्ण हो जायेंगे. इस तरह से जब हम धार्मिक पहलू पर बात करेंगे तो हमारी एप्रोच मिडिल क्लास औरतों के लिए दूसरी हो जायेगी जहाँ पर कि हमें कहना पड़ेगा कि धर्म के आधार पर एक समूह की औरतों पर अत्याचार होता है. उसके लिए कौन जिम्मेदार है ? कैसे हम उसका निराकरण कर सकते है ? यह हमारी क्लास बेस्ड एप्रोच होनी चाहिए. उसके बिना हम सही नतीजों पर नहीं पहुँच सकते और न ही सही तरीके से बात कर सकते है.


अधिकतर कहानियों में कहानी के बिंदु घरेलू होते है, राजनैतिक नहीं होते है | इसके क्या कारण है कि स्त्रियां राजनैतिक मुद्दों पर नहीं लिखती है जो लिखती है उनका प्रतिशत न के बराबर रहता है ? 

आज कुछ लेखिकाएं इन मुद्दों को ले रही है लेकिन अभी भी बहुत बड़ी संख्या में महिला लेखिकाएं ऐसी है जो घरेलू और आपसी मुद्दों को ही लेती हैं. उसका कारण यह कि औरतें अपने दुखों से ही इतनी परेशान होती है लेकिन कुछ लेखिकाएं है जिनकी नजर सभी जगहों पर नजर जा रही है. उन्होंने आदिवासियों पर, विस्थापन पर और जाति व्यवस्था की विद्रूपताओं पर लिखा है और उनमें राजनैतिक विषय भी है. लेकिन मैं इस बात को मानती हूँ कि राजनीति में लिखना जो है अपने आप को अग्निपथ से निकलना है और जितनी बड़ी लेखिकाएं हैं वो सब महिलायें बड़े-बड़े सम्मानों और पुरुस्कारों से विभूषित हो चुकी है. वे नहीं लिख सकती क्योंकि इन्हें व्यवस्था और पूरी सत्ता पर चोट करनी पड़ेगी. अगर आज हम गंभीर लेखन के जरिये  सांप्रदायिकता पर चोट कर रहे है तो कैसे सत्ता व्यवस्था को छोड़ देंगे. मेरा उपन्यास ‘लेडीज क्लब’ और बहुत सारी कहानियाँ है जैसे- राजा का चौक है उसमें हम कैसे इन मुद्दों को छोड़ सकते है. अगर इन सब बातों पर लिखते है तो सत्ता व्यवस्था से अलग नहीं हो सकते है. मेरा मतलब है कि जब आप इन सब मुद्दों पर लिखेंगे तो आपको रायपुर कैसे बुलाया जाएगा (हंसते हुए) ? दूसरी एक बात और है| जैसे मैत्रेयी है, उन्होंने अपनी इमेज एक नारीवादी लेखिका के तौर पर बनाई है.अब सवाल उस इमेज को बनाए रखने का भी है | अगर आप स्त्रीवादी है और आपके लेखन में इससे इतर कोई बात आ रही है जैसे हम यह दिखा रहे है कि स्त्रियों पर भी आजकल के माहौल, ग्लोबलाइजेशन या बाजारवादी संस्कृति का असर है.उससे भी कभी-कभी औरतें भी शोषक के रूप में व्यवहार करने लगती है.इससे उनकी जो इमेज बनी हुई है वह खराब होगी. कई बार ऐसा होता है कि आपको अपनी इमेज को बनाये रखने के लिए एक ख़ास तरह का लेखन करना पड़ता है  तो यह भी एक मजबूरी हो जाती है कि जो इमेज बन गयी है उसको भी सुरक्षित रखने की जरूरत होती है. इसीलिए एक लेखक के तौर पर हमारा दृष्टिकोण सारभौमिक हो.जिससे हम राजनीति और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर भी बात कर सके.