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उपासना झा की कवितायें

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प्रेम  में,

प्रेम  में,
देह की देहरी लांघ
आम्रपाली बन जाना
क्या कठिन था
कठिन था बुद्ध सा
सत्पात्र मिलना।

प्रेम में,
देह से उठती लपट को
शीश नत स्वीकार करना
क्या कठिन था
कठिन था नल सा
आह्लाद मिलना

प्रेम में,
आत्मा का लीन होना
प्रिय के चुंबनों में
क्या कठिन था
कठिन था पुरु सा
उन्माद मिलना

उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थी

उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थी
उनकी भौहें तनी रहती थी मान से
उनके होंठो पर तिरता नहीं था मंद हास्य
कोनों में नहीं दबी रहती थी मृदु भंगिमाएं
कंठ से खिल कर फूटता था अट्टहास
ग्रीवा में बाँध रखती थी लिप्सायें
उनके वसनों में घूमता रहता था बसंत
देखा नहीं कभी उन रक्तिम ऋतुओं का अंत
उनकी सभ्यता वक्षों को ढकने भर नहीं थी,
न था उनका सम्मान केवल उनकी जंघा भर
कमरधनी में हिलोरें लेती थी
उनतक उछली कई अतृप्त वासनाएं
वे कुटिल, पतित और श्रीहीन थीं
उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थीं..

उनको पा लेने की इच्छायें लिए पुरुष
जाति, धर्म, गति, वर्ग से च्युत होकर
सभी संकीर्ण बन्धनों से मुक्त होकर
सृष्टि से श्रेष्ठत्व के मोह में आत्ममुग्ध
आते थे सहज ही उधर होकर कामदग्ध
अपने नियमों पर धरा को भोगते थे
हवा को, दिशा को, मेघ को टोहते थे
अपने बनाये सिक्कों की खनखन में
स्त्री को, जीवन को, यौवन को तोलते थे।
उस नगर के वही थे पालक और दाता
स्त्रियाँ थीं पतित पुरुष थे त्राता
उस नगर की स्त्रियाँ प्रेम से विहीन थी
उस नगर की सब स्त्रियाँ चरित्रहीन थीं।

उदासी के दिनों में प्यार

जब तय था कि समझ लिया जाता
मोह और प्रेम कोई भावना नहीं होती
रात को नींद देर से आने की
हज़ार जायज वजहें हो सकती हैं
ज़रा सा रद्दोबदल होता है
बताते हैं साईन्सगो,
हार्मोन्स जाने कौन से बढ़ जाते हैं
इंसान वही करता है
जो उसे नहीं करना चाहिए
गोया कुफ़्र हो

जब दीवार पर लगे कैलेंडर पर
दूध और धोबी का हिसाब भर हो तारीखें
उन तारीखों का रुक जाना
क्या कहा जायेगा
साल के बारह महीने एक सा
रहनेवाला मौसम अचानक
बदल जायेगा तेज़ बारिश में,
जब ऐसी बरसातों में वो पहले
भीग कर जल चुकी थी,

जब मान लिया जाना चाहिए
कि ज्यादा पढ़ना दिमाग पर करता है
बुरा असर
ये तमाम किताबें और रिसाले
वक़्त की बर्बादी भर हैं
जो इस्तेमाल किया जा सकता था
पकाने-पिरोने-सजाने-संवारने में
और बने रहने में तयशुद

जब समझ लिया गया था
चाँद में महबूब की शक़्ल नहीं दिखती
न प्यार होने से हवाएं
सुरों में बहती हैं
न धूप बन जाती है चाँदनी
न आँसू ढल सकते हैं मोतियों में
न जागने से रातें छोटी होती है
उस उम्र में अब ऐसा नहीं होना था

उन उदासी से भरे दिन-दुपहरों में
हल्दी और लहसन की गंध
में डूबी हथेलियों वाली
औरत को उसदिन
महसूस हुआ कि उसके पाँव
हवा में उड़ते रहते हैं।
उसने कैलेंडर पर एक और
कॉलम डाला है-
रोने का हिसाब….


तितलियाँ फिर उड़ेंगी

तिनका-तिनका नीड़ की तलाश में
कतरा-कतरा चैन जोड़ती..
भूल जाती हैं तितलियाँ
की उनको उड़ना भी आता है..

जोड़ते रहने की ख्वाहिश में..
खुद को तोड़ती जाती हैं..
भूल जाती है दुनिया के रंगों को..
और उनसे भी ख़ूबसूरत अपने परो को.

कतर दिए जाते हैं पर उनके..
नोंच डाले जाते हैं रंग उनके..
फूलों की बस्ती से बेदखल की जाती है..
भूल जाती हैं की उनको लड़ना आता है

हर क्षण खंडित होती उनकी आत्मा में..
अब भी सपनें है आसमानों के
लाख पहरे हो..लाख दीवारें
कौन रोक पाया है उड़ानों को..

तितलियाँ ख़ोज लेंगी अपना रास्ता.
नोंचे हुए…मटमैले परों को..
समेटना और उठना भी उनको आता है..
तितलियाँ फिर उड़ेंगी..

 लड़कियों का घर 

कौन सा घर होता है लड़कियों का..
जहाँ चलना सीखा और ये भी की..
ठीक से चलो एक दिन अपने घर जाना है..
जहाँ बचपन के खिलौने भी..
गुड्डे-गुड़िया हुआ करते हैं..
उनकी शादी, डोली और विदाई..
और उनसे समय बचे तो..
उसकी अनकही तैयारियां..

क्यों बोये जाते हैं…अनगिन
लड़कियों के मन में सेमल के फ़ूल..
जो देखने में इतने सुन्दर…
और रस-गंध हीन होते हैं…
हर लड़की के जीवन की एकमात्र
उपलब्धि अपने घर जाना
क्यों बनाया जाता है..

हल्दी…मेहन्दी…और आलते
से रचे हाथों और पैरों से..
जब आती हैं लड़कियां दुल्हन बनके
‘अपने घर’ अपना असली घर छोड़ के..
वही अपना घर जो कभी अपना नहीं होता
जहाँ एक छोटी सी कमी काफी है
बाप के घर वापिस भेजने के लिए..

अब भी लडकियाँ जलाई जाती हैं..
अपने घरों में…और जो मरती नहीं
वो रोज़ जलती हैं अपनी ही आग में
और जो स्वीकार नहीं करती मरना..
वो बन जाती है.. किस्सा और तमाशा
उनका ऐसा कोई घर नहीं होता..

भागी हुई लड़की 

हर रोज़ रात को भाग जाती हूँ मैं घर से..डायरी लिखते-लिखते..
उन बहुत सी लड़कियों की तरह जो भागती हैं मन ही मन..
यकीन करो घर से भागने वाली लडकियाँ भी होती है….
वैसी ही जिनकी तुम घरों में कल्पना करते हो तुलसी को जल देते..
साहसी से एक कदम ज्यादा दुस्साहसी..
वही लडकियाँ जो प्रेमिका भी हो सकती हैं..पत्नी भी…वेश्या भी..
मैं इंतज़ार करती हूँ..तुम्हारा ख्यालों में तय की उसी जगह पर..
किसी रात तुम नहीं आते..तो मैं बेचैन होकर उस धुंधली रौशनी में बार-बार देखती हूँ राह..
और थक कर लौट आती हूँ…
निराश प्रेमिका की तरह..
तुम आ जाते हो कुछ रातों में..तो गले लगकर कहती हूँ की आज मत जाओ.. तुम्हारी मानिनी पत्नी की तरह..
जिस पुरुष ने कभी ये अनुभव किया हो…किसी स्त्री का पृथ्वी हो जाना..अपने लिए..उसने प्रेम को जाना है..
और कुछ रातें तुम होते हों मुझसे पहले..अपनी जरूरतो की राह मेरे दुपट्टे तक बनाते..
और मेरे होंठो पर होती है वही बाज़ारी मुस्कान..
मैं रोज़ रात को डायरी बंद करके होती हूँ ये तीन औरतों..
और सुबह वापिस सूरज के जागते ही..
मैं होती हूँ वही मस्तमौला लड़की..
राज़ छिपाती..बिना बात हँसती..
रात होने और फिर भागने का इन्तजार करती..
(आलोक धन्वा की भागी हुई लड़कियों को समर्पित)

डॉन्ट वरी डियर सोनम गुप्ता

प्रियंका


बदलते समय ने बहुत सारे लोगों को स्त्री और दलित सरीखी उत्पीड़ित-उपेक्षित अस्मिताओं के पक्ष में दिखावे के लिए ही सही खड़े होने के लिए विवश तो किया, लेकिन इसने उनके भीतर की कुंठाओं क्रूरताओं और घृणा को भी साफ कर दिया हो, यह भ्रम न ही रखा जाए तो अच्छा है . समय के साथ-साथ लोगों की चालाकियाँ भी अधिक बढ़ती जा रही हैं. शत्रुओं ने अपना अंदाज बदलना सीख लिया है. उन्हें पहचानना अधिक कठिन हो गया है. इसके बावजूद समय-समय पर उनकी चालाकियाँ ही ख़ुद को डिकोड करने के अवसर देती रहती हैं .



जब देश बिना उचित तैयारी के ‘मुद्रा परिवर्तन’ के अचानक ले लिये गये फैसले से जूझ रहा है : लोगों को ‘मज़ाक’ सूझ रहा है. सोशल मीडिया पर कुछ दिनों पहले दस रुपये के नोट पर किसी का यह लिखा कि ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’ खूब प्रसारित हुआ था . इसे लिखे जाने और वायरल होने के पीछे की असल कहानी क्या है,नहीं पता, लेकिन मेरा ख़याल है कि लोगों को इसमें किसी चोट खाए आशिक का दर्द नज़र आया होगा और उसके लिए अभिव्यक्ति की चुनी गयी जगह उन्हें आकर्षित कर रही होगी और सबसे बड़ा कारण यह रहा होगा कि इसमें मज़े लेने की भरपूर संभावना दिखी होगी. अब मुद्रा परिवर्तन के दौर में सोशल मीडिया पर चलाई जा रही ‘अघोषित हास्य प्रतियोगिताओं’ में अचानक से इसके और भी नये-नये ‘क्रिएटिव वर्सन’ सामने आने लगे हैं . लगभग हर कोई इसमें अपनी शिरकत करना चाह रहा है. कोई इससे जुड़ी किसी की ‘क्रिएटिविटी’ को शेयर कर रहा है तो कोई अपनी ‘क्रिएटिविटी’ दिखाने को आतुर है . यानी सोनम गुप्ता पर्याप्त मशहूर हो गयी है- नहीं यह गलत शब्द होगा, मशहूर होना औरतों के हिस्से का दुर्लभतम सुख है-सही शब्द यह होगा कि वह बुरी तरह बदनाम हो गयी है . यह दस रुपये के नोट पर उकेरी गयी पहली ‘क्रिएटिविटी’ की शानदार सफलता है . उसमें निहित भावना का फलिभूत होना है .

इसे लिखने वाले ने कुछ तो मानवता दिखाई कि सोनम गुप्ता का पता या पहचान जाहिर करने वाला कुछ नहीं लिखा. चूँकि इस नाम से पहचान जाहिर नहीं होती, कोई एक टारगेट तय नहीं होता इसलिए लोगों को यह अपने करतब दिखाने के लिए खुला मैदान लग रहा है . कोई ख़तरा नहीं और कुंठाओं के लिए आसानी से सोशल मीडिया  भी उपलब्ध हो रहा है. क्या इसे इस कोण से कोई नहीं सोचता कि यह सब एक साथ सोनम गुप्ता नाम की कई औरतों को असहज करता होगा ? कि किसी का नाम सोनम गुप्ता सुनकर, प्रकट-अप्रकट एक टेढ़ी मुस्कान खिंच जाती होगी? कभी ‘चिंटुआ के दीदी तनी प्यार करे द’, भोजपुरी गीत ने ऐसी ही कुंठा के लिए आश्रय उपलब्ध कराया था. चौक-चौराहों , बाजार , विवाह पार्टियों बरात आदि में यह गीत खूब बजता, तब चिंटू नाम पर आफत थी और उसकी दीदी के रूप में महिलायें इसका टार्गेट थीं, शिकार थीं.

विडम्बना से भरा है लेकिन सच है, कि जहाँ सदियों से चली आ रही व्यवस्था ऐसी है कि औरतों को कोई दो कौड़ी की इज्ज़त के लायक भी नहीं समझता, वहीं की औरतें अपनी इज्ज़त और चरित्र की परवाह में ही अपना पूरा जीवन खपा देती हैं . इसलिए औरतों से लड़ने का सबसे बड़ा प्रामाणिक हथियार उनके चरित्र, उनकी निष्ठा और उनकी इज्ज़त की धज्जियाँ उड़ाने वाले दुष्प्रचार हैं . आए दिन तकनीक के दुरूपयोग से अथवा धोखे से औरतों की निजी तस्वीरों, विडियो अथवा अपमानित करने वाली अन्य सामग्रियों को सार्वजनिक करने के काम धड़ल्ले से किये जा रहे हैं . प्रकट में इसे गलत कहने वाले अधिकांश लोग भी भावना के स्तर पर इसे मनोरंजन की सामग्री ही समझते हैं . इस तरह कि प्रवृत्ति ने न जाने कितने लोगों को अकथनीय प्रताड़ना दी है और आत्महत्या तक के लिए विवश किया है .


बेवफाई की दास्तान तो औरतों को केन्द्र में रख कर लिखे जाने की हमारे यहाँ परंपरा ही रही है, प्यार एकतरफा हो तब भी ! सिरफिरे आशिकों के क्रूरतम एसिड अटैक और उसके अपने मन ही मन तय कर ली की गयी प्रेमिका के विषय में तरह तरह के दुष्प्रचार आम बातें हैं . यदि किसी को ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’ : बीज वाक्य में सोनम गुप्ता का चुनौतियों और आशंकाओं से भरा भविष्य नहीं दिख रहा, बल्कि हास्य और मज़े लेने की संभावनाएँ दिख रही हैं, तो उसे अपनी संवेदनशीलता पर ठहर कर पुनर्विचार अवश्य करना चाहिए . यह वह पहला पड़ाव है, जिसके बाद के ख़तरनाक रास्ते कई बार किसी स्त्री पर एसिड अटैक या आत्महत्या पर जाकर ख़त्म होते हैं बल्कि कई बार यहाँ भी ख़त्म नहीं होते !

ऐसे अवसर लोगों की चालाकियों को डिकोड करने के अच्छे अवसर होते  हैं . ‘सोनम’ तुम भी इसे इसी तरह से देखो . धैर्य से इस तरह की टुच्ची मानसिकता का मुकाबला करना सीखो . उत्पीड़ित अस्मिताओं का शायद ही कोई मसीहा होता है . मसीहा होने का दावा करने वाले बहुत सारे लोग होते हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएँ होती हैं और अपना एजेंडा भी होता है और कई बार वे मसीहों के मुखौटे भर पहने हुए होते हैं . उत्पीड़ित अस्मिताओं को खुद ही अपनी जंग लड़नी होती है . इसलिए यह कोई नई बात नहीं है, कि तुम्हें घबराने की जरूरत हो . डॉन्ट वरी डियर, हो सके तो ऐसे लोगों पर हँसो या कम से कम हँसना सीखो उन पर, जो अपने क्रूर हास्यबोध के कारण इस दुनिया को मरघट में तब्दील कर देने में लगातार योगदान दे रहे हैं, और उनकी मासूमियत ऐसी कि इसका उन्हें पता तक नहीं !!



शोध छात्रा, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय

सुधार नहीं पूर्ण बदलाव चाहेंगी महिलायें

नूर जहीर

‘डिनायड बाय अल्लाह’ और ‘अपना खुदा एक औरत’ जैसी चर्चित कृतियों की रचनाकार
संपर्क : noorzaheer4@gmail.com.



कॉमन सिविल कोड के संघर्ष में तीन पक्ष हैं, एक प्रगतिशील मुसलमान-हिन्दू महिलाओं-पुरुषों का और उनके साथी अन्य प्रगतिशीलों का दूसरा दक्षिणपंथी हिन्दू जमातों का और तीसरा दक्षिणपंथी, परंपरावादी मुसलमानों का. इस त्रिकोण में मुस्लिम स्त्रियों की सामाजिक-कानूनी  स्थिति और उनका संघर्ष शोर –शराबे में दब जाता है – पढ़ें नूर ज़हीर का दृष्टिकोण, एक इनसाडर प्रगतिशील नजरिया. यह आलेख मासिक पत्रिका सबलोग के स्त्रीकाल कालम में नवंबर में प्रकाशित हुआ है. 
संपादक

एक मुसलमान  सज्जन से मैंने पूछा “क्या आप समझते हैं कि कोई भी महिला पति की दूसरी शादी को पसंद करेगी? या एकतरफा दिए गए एक झोक में तीन बार तलाक़ को ख़ुशी से क़ुबूल करेगी?’ वे  बोले “अगर वह एक अच्छी मुसलमान है तो ज़रूर करेगी।”  यही आकर इस गंभीर मुद्दे पर  बहस रुक जाती है।  मौलवियों  का कहना है कि उनके अनुसार चलना ही ‘अच्छे मुसलमान’ होने की कसौटी है भले ही उनका कहा क़ुरान के खिलाफ हो।  यह तो मौलवी भी मानते हैं कि कुरआन एक बार में तीन तलाक़ को ग़लत बतलाता है। पहली बार तलाक़ कहने के बाद एक माह दस दिन, दूसरी बार के बाद भी, और तीसरी बार के बाद 3 माह दस दिन की इद्दत के बाद ही तलाक़ माना जाना चाहिए।  लेकिन आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में बैठे मौलाना कहते हैं कि आज अगर इसे लागू किया गया और पुरुषों को दो महीने  बीस  दिन इंतज़ार करना पड़ा तो वे अपनी पत्नियों को ज़हर दे देंगे, खून कर देंगे.

यानी इतनी बेक़रारी है सुन्नी मुस्लिम पुरुषों में कि उनसे  80 दिन इंतज़ार नहीं होगा।  या आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में बैठे मौलाना आज सड़क पे उतरी हुई न्याय की मांग करती मुसलमान  महिलाओं को धमकी दे रहे हैं, ‘इस मांग पर आंदोलन करना बंद करो वरना मार दी जाओगी!’  अगर ऐसा है तो एक सर्वे करवाने की ज़रूरत है मुसलमानों के  शिया फ़िर्क़े में  जिनमे ट्रिपल तलाक़ एक साथ नहीं माना जाता, कितनो ने अपनी पत्नियों का खून कर दिया और  हिन्दू जिन्हें ‘तत्काल तलाक़’ में भी  3 महीने इंतज़ार करना पड़ता है, क्या पत्नियों का खून कर देते है? या सुन्नी मुस्लिम पुरुष किसी अलग तरह के मर्द हैं ?

“चकरघिन्नी” : तीन तलाक़ का दु:स्वप्न


लेकिन अपने आप में तीन तलाक़ पर रोक लगे यह मांग  अधूरी है। क्योंकि तीन तलाक़ एक वक़्त में मुस्लिम महिला नहीं दे सकती। यदि मुस्लिम महिला रिश्ता तोडना चाहे तो उसे कारण बताना पड़ता है, उस कारण पर मौलवी विचार करते हैं कि कारण जायज़ है या नहीं, महिला को अपना ‘महर’ यदि वह शादी के वक़्त न दिया हो तो छोड़ना पड़ता है, अगर दे दिया गया हो तो लौटाना पड़ता है और अक्सर कुछ और रकम देकर अपने लिए ‘तलाक़’ खरीदना पड़ता है।  इतना करने के बाद भी ‘तलाक़, तलाक़ ,तलाक़’ कहता पुरुष ही है, महिला नहीं। इसमें अक्सर कई साल लग जाते हैं।  पुरुष को क्योंकि इस्लाम 4 शादियों की एक वक़्त में इजाज़त देता है दूसरी शादी करके आराम से रहता है, और तलाक़ चाहने वाली महिला अकेली विधिशास्त्र के महकमों/संस्थानों के चक्कर काटती रह जाती है। यह पता लगाने की ज़रूरत है कि इस लंबी दुर्दशा से जूझते हुए  में कितनी मुस्लिम  महिलाओं ने अपने पतियों की हत्या करने की कोशिश की है।

बच्चों की लिए अनुरक्षण से भी पुरुष अक्सर छूट जाते हैं और पत्नी के लिए तो अनुरक्षण हो ऐसा मानते ही नहीं मुसलमान मौलवी। बस महर देना ही ज़रूरी है और अमूमन  यह भी नहीं पूरी मिलती क्योंकि अक्सर जो मौलवी तलाकनामा बनाते हैं वह कुछ पैसों की लालच में ‘महर अदा  की गई’ भी जोड़ देते हैं।  ऐसे ही एक केस में महिला ने दार उल उलूम तक की गुहार लगाई जहाँ से उसे कहा गया कि “अल्लाह ऐसे बेईमान मौलवी और पति को ज़रूर सजा देगा, उन्हें इसका बदला दूसरी दुनिया में चुकाना होगा।” लेकिन जीना  तो औरत को इस दुनिया में है और आज मुस्लिम महिला अल्लाह से नहीं उच्चतम न्यायालय से न्याय मांग रही है।


मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड


आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यह भी कहता है कि  लंबी चलने वाली न्यायिक गतिविधि महिला के पक्ष में नहीं क्योंकि पुरुष उसे बदनाम करके उसके पुनः विवाह के रास्ते बंद कर सकता है। तलाक़शुदा होना ही अपने आप में एक शाप  की तरह माना  जाता है इस देश में; मौलवी तो बुर्का पहने हुए आंदोलनकारी महिलाओं को बदतरीन गालियाँ दे रहे हैं; इससे ज़्यादा क्या और बदनाम होंगी।  दूसरे यह सोचना महिलाओं का काम है कि  वे इस बदनामी से कैसे जूझे , मौलवीगण महिलाओं के चरित्र पर लगे दाग़ की चिंता न करें।

वे कहते हैं कि बहुविवाह और तीन तलाक़ एक बार में, मुसलमानों का  संस्कृतिक और सामाजिक मामला है और उच्चत्तम न्यायालय को इससे दूर रहना चाहिए। किसी भी समाज में होने वाले अन्याय में उच्चतम न्यायालय  नहीं तो और कौन बोलेगा? वे जो अभी तक अन्याय करते रहे हैं?  ज़्यादातर पुरुष दूसरी शादी करके पहली वाली को तलाक़ नहीं देते क्योंकि वे महर नहीं देना चाहते। इस तरह से वे दोनों शादियों का मज़ा ले सकते हैं , पहली वाली घर संभाले और दूसरी पति संभाले। वे यह भी कहते हैं कि बहुविवाह इसलिए महिला के फायदे में है क्योंकि इससे बहुत सारी  महिलाओं की शादी हो पाती है वरना वे कुवारीं रह जाएँगी।  शायद यह इतनी बुरी बात भी न हो क्योंकि बुरे रिश्ते से रिश्ते का न होना बेहतर है। और लड़की पढ़ी लिखी, आत्मनिर्भर हो तो शायद वह अपनी मन मर्ज़ी का साथी मिलने तक अकेली जीवन व्यतीत करना पसंद करे?

इस्लाम में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट है यह बात सही है लेकिन मौलवी कहते हैं इस कॉन्ट्रैक्ट में दोनों पार्टियाँ बराबर नहीं हैं।  यह सरासर संविधान के जो हर नागरिक को बराबर मानता है,  विरुद्ध बात है।  यहाँ पर यह सवाल पूछने की भी ज़रूरत है कि  आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  की वैद्यता क्या है ? क्यों  ज़रूरी है उच्चतम न्यालय के लिए इस बोर्ड की राय लेना।  यह मुद्दा महिलाओं का है, उन्हें ही इसे भोगना पड़ता है, वही इसके खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं, पीआईएल दाखिल कर रही हैं और  सड़क पर उतरी हैं। फिर भी यह कैसी पैतृक मानसिकता है जिसके तहत उस संस्था से राय मांगी जा रही है जिस पर उलेमा हावी हैं जो न कोई बदलाव चाहते हैं न कोई बदलाव लाने की सलाहियत रखते हैं। मज़े की बात यह है कि कुछ महिलाये भी जुट जाती हैं पुरुषों के इस एक तरफ़ा तलाक़ देने की तरफदारी करने।  यह वे हैं जो बातें तो बड़ी बड़ी करती हैं लेकिन ज़मीनी हकीकत से नावाकिफ हैं।  या हो सकता है की उनके सिरों पर पतियों  ने ‘तीन तलाक़’ की तलवार लटका रखी हो। जी हाँ अक्सर महिलाओं से बात करके यह मालूम हुआ कि उनके पतियों ने उन्हें धमकाया “आंदोलन किया, जलूस में गईं  तो तुम्हे तलाक़ दे देंगे। ”


मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ


सिर्फ इतना ही नहीं है कि  तलाक़ एकतरफा है. मुसलमान महिला इसको मानने के लिए बाध्य है, वह न इसे नकार सकती है और न ही इसे किसी कोर्ट में चुनौती दे सकती है। 22 इस्लामी देशों ने तीन तलाक़ को रद्द कर दिया है लेकिन भारत एक जनतांत्रिक देश है , जिसके  संविधान की   प्रस्तावना   में ही हर नागरिक को बराबर माना गया है , ये लागू नहीं। खैर जो  मामला अभी गरमाया है कुछ देर में उसमें उबाल भी आएगा ये प्राकृतिक नियम है। उस उबाल के लिए भी तैयारी रहनी चाहिए मुस्लिम समाज की. रिफॉर्म्स से कुछ हासिल नहीं होता क्योंकि उसे बग़ैर आम बहस के रद्द किया जा सकता है।  कानून के साथ ऐसा नहीं है और इसीलिए मांग कानून में बदलाव की होनी चाहिए।  और इसके लिए ज़रूरी है कि  यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा शुरू हो।  अमूमन यह मान लिया जाता है कि  यूनिफॉर्म सिविल कोड, मुसलमानो से उनके हक़ छीन लेगा और हिंदुओं को कुछ भी गवाना नहीं होगा. . आज जिस तरह से यूनिफार्म सिविल कोड को मुसलमानो को धमकाते हुए डंडे की तरह नचाया जा रहा है,, उससे इस बात पर विशवास भी होता है। लेकिन इसका जवाब इस चुनौती से भाग जाना तो नहीं है।  एक ड्राफ्ट क्यों नहीं लाती उदार वादी संस्थाए और पार्टियां,  जो सभी पर्सनल लॉ पर विचार करके सबमे बदलाव के सुझाव रखे और सबसे प्रगतिशील सूत्रों को चाहे वे  किसी भी धर्म के हों, इस यूनिफॉर्म सिविल कोड की ड्राफ्ट में शामिल करे।  कमसे कम एक लिखित सूचि तो सामने आएगी, जिसकी बुनियाद पर आगे बहस चलाई जा सकेगी।

जो शरीयत मुसलमानो के लिए अटल मानी जा रही है वह तो कुरआन और हदीस को मिलकर बनाया गया एक व्याख्या है ; ऐसी किसी और व्याख्या पर पाबन्दी भला कैसे लगाई जा सकती है ?आख़िरी  बात ये है कि अगर ये संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा है भी तो क्या बस इसीलिए इसे बदला नहीं जा सकता? क्या संस्कृति और सभ्यता अटल और जड़ होती है कि  उसे हिलाया नहीं जा सकता? इस्लाम की ही बात ली जाये तो इस धर्म के माध्यम से ही बहुत सरे बदलाव हुए, जिनमे प्रमुख है ‘तलाक़’ जो कबाइली सभ्यता में मौजूद तो था लेकिन जिसमे कोई विधिवद तरीका नहीं था।  तलाक़ को बाक़ायदा दस्तावेज़ी शक्ल इस्लाम ने दी उस समय की संस्कृति के खिलाफ जाकर।

मैं भारतीय मुसलमान स्त्री हूं : तलाक से आगे भी जहां है मेरी

आज ज़रूरत है कि धर्म और क़ानून को अलग-अलग किया जाये। आखिर डर किस बात का है मुसलमानो को और खास करके महिलाओं को? इस्लाम के पांच स्तंभों को यानि : शहादा [ अल्लाह और उनके आखरी पैग़म्बर पर विशवास] , सलात [नमाज़ ] , ज़कात[दान], सावेम [रोज़ा ] हज [तीर्थ] ये बदलाव कहीं भी चुनौती नहीं देते। जो कुछ छोटे-छोटे बदलाव की मांग मुस्लिम महिलाये कर रही है उनपर अगर उलेमा और सर्कार दोनों ग़ौर नहीं करते हैं तो बहुत संभव है कुछ दिन बाद मुस्लिम महिलाये एक गणतांत्रिक देश में अपने हक़ समझ कर पूरी बराबरी की मांग लेकर सड़क पर उत्तर आएं  और बराबरी पाकर ही छोड़े. उस वक़्त न ये मौलवी उन्हें रोक पाएंगे न ही वो महिलाये जो आज इन न्यायिक मांग करती हुई महिलाओं के खिलाफ ज़हर उगल रही हैं.

सौ के नोट दिखाते लंपट और परेशान महिलायें

आइये समझते हैं नोटबंदी को लेखिकाओं और महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर से:


सरकारें फैसला लेती हैं, स्थितियाँ बदलती हैं या सुधरती हैं, फैसला जनहित में कहलाता है लेकिन औरत की दुनिया इन सबसे कैसे प्रभावित हो सकती है या होती है, इस पर कम ही विचार किया जाता है.  औरत की दुनिया वैसे भी राजनीति की दुनिया से बड़े फासले पर स्थित है, दोनों में न्यूनतम संबंध है. आज मेरी कामवाली हंसी -हंसी में नए नोट पर कई व्यवहारिक टिप्पणियाँ कर रही थी. इन टिप्पणियों में छिपे कड़वे सच को हम जैसे वेतनभोगी, व्यापारी, सफेदपोश वास्तव में नहीं समझ सकते क्योंकि हमने बैंक जाकर कम से कम दस हज़ार रूपए का इंतजाम लाईन में लगकर या रसूख़ के बल पर कर लिया है, कुछ को शायद अन्य वजहों से जाने की भी जरूरत न पड़ी हो.


हम सब इस फैसले का राजनीतिक आकलन कर रहे हैं, लेकिन ग़रीब आदमी इस फैसले की कड़वी परिणितियों को झेल रहा है. मैं कल बैंक से पैसे लेकर आई थी और मैंने उसमें से दस, सौ-सौ के नोट अपनी कामवाली को दे दिए ताकि उसका ख़र्च चल सके. लेकिन छह-सात लोगों के परिवार में हज़ार रूपए कितने दिन चलेंगे? उसे भी शहर से ही आटा-नमक ख़रीदना है.



इस राजनीतिक फैसले का औरत के जीवन के लिए जो काला पक्ष हो सकता है, उसे उसके मुंह से सुनकर मैं दंग रह गई, सपने में भी नहीं सोचा था कि एक नतीजा यह भी हो सकता है, जिस पर कोई सरकार कभी ध्यान नहीं देगी ! उसने बताया कि दो-तीन दिन से उसके मुहल्ले में शाम को शराब पीकर लोग गाड़ियाँ लेकर खड़े होते हैं और आती जाती, बातचीत करती परेशान कामवालियों से पूछते हैं कि दो -तीन सौ खुले रूपए हम देंगे, कितना खुला चाहिए?
भले मानुष! इस घटना का मतलब समझने में आपको परेशानी तो नहीं हो रही या समझ नहीं रहे ?
सुधा सिंह ,प्रोफ़ेसर दिल्ली विश्वविद्यालय 


“शासन का घूँसा किसी बड़ी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बड़ी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूँसा पड़ जाता है .”
परसाई यूँ ही परसाई नहीं हैं!
संज्ञा उपाध्याय, लेखिका  और असिटेंट प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय 

बलिदान ,संयम और त्याग की बात वो कर रहे है जिनके पास डेबिट क्रेडिट और तमाम तरह के कार्ड है और जिनके बच्चे विदेश में बैठे है और जिनके पास महीने भर का राशन है.
अनिता भारती, लेखिका 


स्त्रियों का मजाक बनाने के बजाय सोच कर देखिये उन्होंने किस तरह खुद की ख्वाहिशों में कतरब्योंत करके , इतना दिमाग लगा कर ये पैसे बचाये होंगे. जरुरत पड़ने पर अपने पिटारे से हमें ही निकाल कर देती हैं ….ये उन्हें स्वाभिमान और सुरक्षा देता है ..उनकी मदद करें …आपके लिए होगा काला धन उनका ये इमोशनल धन है. आज के नवभारत टाइम्स के इस लेख में इसी धन की बात है.
अनीता मिश्रा, लेखिका महिलाओं के पास बचत के धन का मजाक उडाये जाने पर 

आजकल हमारे कुछ अम्बेडकरवादी सरकार के नोटबदली को बाबासाहेब की उस बात से जोड़ रहे है कि उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए हर दस साल में नोट बदलने चाहिए . क्या ये सही वक्त है याद दिलाने का? जब पूरा देश एक मुस्किल से गुजर रहा है. क्या बाबा साहेब ने ये भी कहा था कि यह सब अचानक कर देना चाहिए ?मुझे लगता है किस इस मुश्किल समय बाबासाहेब को कोट नहीं करना चाहिये हमारा बडबोलापन ही हमे ले डूबता है . हमे अपनी तकलीफों को और बढ़ाना नहीं चाहिए .हमे धैर्य से शान्ति से मुस्किल समय से गुजरना है, मजे ले ले कर मजाक न करे .
रजनी तिलक ,लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता

कोइ बुलेट ट्रेन में सफर कर रहा है तो कोई दिन भर बैंको में लाइन लगा कर .लेकिन सफर दोनों कर रहे है …कोई मौज में है तो कोई घर चलाने की जद्दोजेहद में
ताहिरा हसन, सामाजिक कार्यकर्ता 

कुंडली-मिलान शादी के अमरत्व की गारंटी देता है क्या?

तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य. तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक और चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक रहे हैं. आपने अधिकार दर्पण का भी संपादन कार्य किया है. हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित.  आजकल स्वतंत्र लेखन में रत हैं.

शादी की कहानी कोई नई नहीं है. शादी ना ही कोई नया रास्ता है. चाहे-अनचाहे सभी इस रास्ते से गुजरते हैं. कुछ चाहकर और कुछ न चाहकर भी…..कुछ कम उम्र में तो कुछ चढ़ी उम्र में….किंतु कमाल का सच ये है कि इस रास्ते में आई बाधाओं के किस्से चुटकलों के जरिए तो सुनने/पढ़ने को खूब मिलते हैं, किंतु इन चुटकलों के सच को कोई भी पति अथवा पत्नी व्यक्तिश: स्वीकार नहीं करता. क्यों……? लोक-लज्जा का डर, पुरूष को पुरुषत्व का डर, पत्नी को स्त्रीत्व का डर…… डर दोनों के दिमाग में ही बना रहता है… इसलिए पति व पत्नी दोनों आपस में तो तमाम जिन्दगी झगड़ते रहते हैं,  किंतु इस सच को सार्वजनिक करने से हमेशा कतराते हैं.
एक समय था कि जब शादी के मामले में लड़के और लड़की की इसके अलावा कोई भूमिका नहीं होती थी कि वो दोनों आँख और नाक ही नहीं अपितु साँस बन्द करके माँ-बाप अथवा दूसरे सगे-संबन्धियों की इच्छा के अनुसार शादी के लिए तैयार हो जाएं. इसके पीछे समाज का अशिक्षित होना भी माना जा सकता है. किंतु जैसे-जैसे समाज में शिक्षा का व्यापक प्रचार और प्रसार हुआ तो नूतन समाज के विचार पुरातन विचारों से टकराने लगे, अब शादी के मामले में लड़के और लड़की की इच्छाएं भी पुरातन संस्कृति के आड़े आने लगी हैं. फलत: पिछले कुछ दशकों से यह देखने को मिल रहा है कि शादी के परम्परागत पहलुओं के इतर शादी से पहले लड़के और लड़की को देखने का प्रचलन जोरों पर है. पहले यह उपक्रम केवल शहरों-नगरों तक ही सीमित था किंतु आजकल तो यह उपक्रम दूरस्थ गाँवों तक पहुँच गया है.

यहाँ एक सवाल का उठना बड़ा ही जायज लगता है कि शादी के उद्देश्य से लड़के और लड़की की पंद्रह-बीस मिनट की मुलाकात में लड़का लड़की और लड़की लड़के के विषय में क्या और कितना जान पाते होंगे, कहना कठिन है. सिवाय इसके कि एक दूसरा, एक दूसरे की चमड़ी भर को ही देख-भर ले. दोनों एक दूसरे की नकली हंसी को किसी न किसी हिचकिचाहट के साथ दबे मन से स्वीकार कर लें. इस सबका कोई साक्षी तो होता नहीं है. अगर हो भी तो उनका इस प्रक्रिया में कुछ भी कहने का कोई अधिकार यदि होता है तो वह केवल लड़के और लड़की को केवल शादी के लिए तैयार करना होता है. इसके अलावा और कुछ नहीं. अमूनन देखा गया है कि शादी के बन्धन में बन्धने जा रहे जोड़े को दूसरी मुलाकात का मौका प्राय: दिया ही नहीं जाता. धार्मिक बाधाएं इस सबके सामने खड़ी कर दी जाती हैं. हमको इस धार्मिक उपक्रम ने इस हद तक कमजोर और कायल बना दिया है कि हम सारा समय लड़के और लड़की की कुंडलियाँ मिलाने में गवां देते हैं


व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो यह कतई सच है कि प्रथम दृष्टि में, आजकल लड़के और लड़की को शादी से पूर्व मिलने का मौका तो अवश्य दिया जाता है, किंतु उसके बाद उन्हें फोन पर भी बातचीत करने का मौका न दिए जाने तक की कवायद होती है. यह बात अलग है कि आज के संचार के विविध माध्यमों और नई-नई तकनीकी संचार युक्तियों के युग में लड़का–लड़की चोरी-छिपे फोन, वाटसेप, इंटरनेट या फिर फेसबुक के जरिए बराबर बात करते रहते हैं किंतु हम बच्चों को शादी से पूर्व एक से ज्यादा बार मिलने का मौका ही नहीं देते. और न ही  बच्चों के माता-पिता ही  दोबारा ऐसा कोई मौका लेने का प्रयास करते हैं.  बस! घड़ी-भर का मिलना पूरे जीवन का बन्धन बना दिया जाता है. यह कहाँ तक उचित है?

सच तो ये है कि शादी जीवन का एक अकेला ऐसा सौदा है जो एक-दो दिन की मुलाकात में ही तय मान लिया जाता है जबकि एक टी.वी. या फ्रिज जैसी दैनिक उपयोग की चीजें खरीदने की कवायद में सप्ताह, हफ्ता ही नहीं, यहाँ तक की कई-कई महीने तक लग जाते हैं…. कौन सी कम्पनी का लें? इसकी क्या और कितने दिनों की गारंटी है?……. इसका लुक औरों के मुकाबले कैसा है?… न जाने क्या-क्या…… न जाने कितने मित्रों से इसकी जानकारी हासिल की जाती हैं….. इतना ही नहीं, सब्जी तक दस दुकानों की खाक छानने के बाद  भाव-मोल करने के बाद ही खरीदी जाती हैं….किंतु लड़का-लड़की के बीच जीवन-भर का रिश्ता बनाने में जान-पहचान के बजाय बच्चों की शिक्षा के स्तर और उनकी आमदनी के विषय में ही ज्यादा सोचा जाता है……………और कुछ नहीं.
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जहाँ तक कुंडलियों के मिलान का सवाल है, यह एक ढोंग है,  अन्धविश्वास है, जो सदियों से होता आ रहा है और पता नहीं भविष्य इस परिपाटी को कब तक ढोने को बाध्य होगा.  यहाँ यह सवाल उठता है कि  क्या ये कुंडली-मिलान रिश्तों के अमरत्व की कोई गारंटी देता है. क्या कुंडली-मिलान वाले जोड़ों के बीच कभी कोई दरार नहीं पड़ती? क्या उनका जीवन-भर मधुर साथ बना रहता है? क्या उनके जीवन में कोई प्राक्टतिक बाधा नहीं आती?  जैसी कि  कुंडली मिलाते समय आशा की जाती है……व्यापक रूप से ये भामक मानसिकता है, ऐसा करने से कभी भी किसी दम्पति को आशातित शांति शायद कभी नही और कतई नहीं मिलती. यह उपक्रम अपने को स्वय धोखा देने के बराबार है. मुझे लगता है कि इसके इतर यह अच्छा होगा कि लड़के और लड़की की जन्मकुंडली के बदले उनकी चिकित्सीय कुंडलीयों  का मिलान भी किया जाना चाहिए. खुशवंत सिंह की पुस्तक ‘दिल्ली’ में उद्धृत  महात्मा शेख सादी के इस बयान से जाना जा सकता है – “यदि औरत बिस्तर से बेमजा उठेगी तो बिना किसी वजह के ही मर्द से बार-बार झग़ड़ेगी|”  किंतु ये एक ऐसा सत्य है जिसे कोई भी पुरुष अथवा औरत मानने वाला  नहीं है …… किंतु ऐसा होता है. रिश्तों की खटास में यह भी एक और सबसे बड़ा कारण है. इस कारण के बाद आता है…….दौलत का सवाल…. श्रंगारिक संसाधनों की उपलब्धता……. गहनों की अधिकाधिक रमक……..आदि…. आदि. पुरुषों के मामले में दहेज का लालच….और न जाने क्या-क्या. क्या लड़के और लड़्के के माता-पिता द्वाराइस ओर कुंडलियाँ मिलाते समय ध्यान दिया जाता है?  अमूनन नहीं…
नवभारत टाइम्स – 06.02.2015 में छपे एक सर्वे के जरिए यह तथ्य सामने आया है कि ज्यादातर दम्पत्तियों के बीच शादी वाला प्यार शादी होने के पहले दो सालों में ही फुर्र हो जाता है …. कुछ का तीन सालों बाद …… और जिनका बचा रहता है ……. इनके सामने  किसी न किसी प्रकार की सामाजिक मजबूरी ही होती है. …. ये पहले कभी होता होगा कि पति-पत्नी बुढ़ापे में एक दूसरे के मददगार बने रहते थे….. आज समय इतना बदल गया है कि बुढ़ापा आने से पहले ही सारा खेल बिगड़ जाता है……

अधिकाँश मामले में औरतों के पति पत्नी के जीवित रहते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं. फलत: पत्नियों को ऐसा पीड़ा भरा असहाय जीवन जीना पड़ता है जिसकी कल्पना करना भी दूभर होता है. एक उपेक्षित जीवन जीना…….और वहशी आँखों की किरकिरी बने रहना……. विधवाओं की  नियति हो जाती है.  कुछ लोग कह सकते हैं कि विधवा की देखभाल के लिए क्या उसके बच्चे नहीं होते. इस सवाल का उत्तर वो जीवित विधुर और विधवा अपने गिरेबान में झाँककर खोजें कि मृत्यु के बाद उनके स्वयं के बच्चे उनका कितना ध्यान रखते हैं? दान-दहेज की बात के इतर इस ओर कभी किसी का ध्यान शायद ही गया हो. लगता तो ये है कि इसके कारणों को खोजने का प्रयत्न भी शायद नहीं किया गया जो अत्यंत ही शोचनीय विषय है. मुझे तो लगता है कि समाज में ये जो प्रथा है कि लड़का उम्र के लिहाज से लड़की से प्रत्येक हालत में कम से कम पाँच वर्ष बड़ा होना ही चाहिए, इस प्रकार की सारी विपदाओं के लिए जिम्मेदार है. शायद आप भी इस मत से सहमत होंगे कि उम्र के इस अंतर को मिटाने की खास आवश्यकता है. लड़का-लड़की की उम्र यदि बराबर भी है तो इसमें हानि क्या है? या फिर शादी के एवज पारस्परिक रिश्तों को क्यूँ न स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए……… विछोह तो आगे….पीछे होना तय है ही……..भला धुट-घुटकर जीवन यापन करने की बाध्यता शादी ही क्यों हो?

इस सबसे इतर, नवभारत टाइम्स दिनांक 23.05.2015 के माध्यम से अनीता मिश्रा कहती हैं कि शादी सिर्फ आर्थिक और शारीरिक जरूरतों को पूरा करने भारत का माध्यम नहीं है. लड़कियों को ऐसे जीवन साथी की तलाश रहती है जो उन्हें समझे. उनकी भावनात्मक जरूरतें भी उनके साथी के महत्तवपूर्ण हों. वे  फिल्म ‘पीकू’ में एक संवाद का हवाला देती हैं…….   “ शादी बिना मकसद के नहीं होनी चाहिए. फिल्म की नायिका का पिता भी पारम्परिक पिताओं से हटकर है. वह कहता है, ‘ मेरी बेटी इकनामिकली, इमोशनली और सेक्सुअली इंडिपेंडेंट है, उसे शादी करने की क्या जरूरत?’ मैं समझता हूँ कि यह तर्क अपने आप में इमोशनल जरूर है. फिर भी यह आम-जन का ध्यान तो आकर्षित करता ही है.

अनीता जी आगे लिखती है कि यहाँ एक सवाल यह भी है कि विवाह संस्था को नकारने का कदम स्त्रियां ही क्यों उठाना चाहती है. शायद इसके लिए हमारा पितृसत्तात्मक समाज दोषी है. वर्तमान ढांचे में विवाह के बाद स्त्री की हैसियत एक शोषित और उपयोग की वस्तु की हो जाती है. आत्मनिर्भर स्त्री के भी सारे निर्णय उसका पति या पेशंट के परिवार वाले ही करते हैं. शादी होने के बाद (कुछ अपवादों को छोड़कर) उसका पति मालिक और निरंकुश शासक  की तरह ही व्यवहार करता है. ऐसे में स्त्री के लिए दफ्तर की जिन्दगी और घरेलू जिन्दगी में तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है. कहा जा सकता है कि ज्यादातर स्त्रियों को दफ्तर में काम करने के बाद भी घर में एक पारम्परिक स्त्री की तरह खुद को साबित करना होता है. किसी भी स्त्री को जब सफलता मिलती है तो यह भी जोड़ दिया जाता है कि उसने करियर के साथ सारे पारवारिक दायित्व कितनी खूबी से निभाए. जबकि पुरुषों की सफलता में सिर्फ उनकी उपलब्धियां गिनी जाती है.

यहाँ यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि शादी समाज की एक जरूरी व्यवस्था रही है किंतु आजादी चाहने वाली लड़कियां शादी को एक बन्धन की तरह देखती हैं. फिर मानव समाज की दृष्टि से एक सामाजिक व्यवस्था के तौर पर विवाह का विकल्प क्या है? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि बदलते परिवेश में स्त्री शादी का विकल्प खुद खोजे? जाहिर तौर पर अब तक पुरुषों की आर्थिक स्वनिर्भरता और सक्षमता ने केवल उन्हें ही निर्णय लेने का अधिकार दे रखा था. अब अगर महिलाएं भी इसी हैसियत में पहुँचने के बाद अपनी जिन्दगी की दिशा तय करने वाला फैसला खुद लेने लगी हैं तो इसमें गलत क्या है? फिर क्यों न आत्मनिर्भर, जागरूक और सक्षम महिला को शादी करने, न करने का फैसला खुद लेने दिया जाए?

समानता के लिए जरूरी है महिला आरक्षण: सीताराम येचुरी

एनएफआईडवल्यू  द्वारा 12 सितंबर  2016 को आयोजित सेमिनार में सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी ने महिला आरक्षण बिल को जल्द पास करवाये जाने पर जोड़ दिया. उन्होंने इसके मार्ग की बाधाओं पर विस्तार से बात की. सेमिनार का आयोजन सीपीआई की भूतपूर्व सांसद और एनएफआईडवल्यू की भूतपूर्व एक्जक्यूटिव काउंसिल सदस्य गीता मुखर्जी द्वारा महिला आरक्षण बिल के ड्राफ्ट कमिटी की अध्यक्ष के रूप में पेश किये गये बिल के 20 साल पूरे होने पर किया गया था. येचुरी ने कहा कि संविधान में मिले समानता के अधिकार को वास्तविकता में हासिल करने के लिए जरूरी है महिलाओं का आरक्षण. सुनें  पूरा भाषण:

सीताराम येचुरी का भाषण

अपराधी बादशाह जो बन बैठा

मधुलिका बेन पटेल 

केन्द्रीय विश्वविद्यालय तमिलनाडु में हिंदी विभाग में पढ़ाती हैं संपर्क :ben.madhulika@gmail.com

अपने जीवन के लगभग 29 वर्ष बिताने के बाद मैं इतना तो समझ गयी थी कि अपराधी बादशाह की भूमिका में होता है और सच अपराधी की तरह. मुक्तिबोध की कविता ‘‘भूल गलती’ की ये पंक्तियां याद आ रही थी –
भूल गलती/
आज बैठी है जिहरबख्तर पहन कर
 तख्त पर दिल के चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक 
आँखें चिलकती हैं
नुकीले तेज पत्थर-सी 
खड़ी हैं सिर झुकाए सब कतारें..’’.

जो अपराधी था उसी के जिम्मे न्याय की कलम पकड़ा दी गयी थी. जो सच था, उस से दलीलें माँगी जा रही थी. साँप, घड़ियाल एकजुट हो गए थे. व्यवस्था की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति गिरगिट से भी ज्यादा तेज गति से रंग बदल रहा था. अपनी सफेद शर्ट के नीचे लड़कियों की हड्डियाँ छुपाए फिरता था. यह एक ऐसा समय था जब ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा जोर पकड़ रहा था. ऐसे ही समय में बेटियाँ सरेआम जुल्मों से लहूलुहान थी. आखिर न्याय की कलम बादशाह बन बैठे अपराधी के हाथ में जो थी. जुल्मों का अध्याय दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था और मनुष्य सभ्य और शिक्षित हो रहा था. ऐसे में एक सवाल बार-बार मेरे मन में दस्तक दे रहा था कि यह कैसी सभ्यता है, जिसके हर पन्ने  पर खून के दाग लगे हुए हैं ?

उस दिन समाचार पत्र जनसत्ता (26.09.2016) मेरे  सामने था. तीन खबरें महिलाओं से संबंधित थी. एक-राजधानी और दिलवालों की दिल्ली में किशोरी बच्ची से बलात्कार के मामले में डाक्टरों ने अहम सबूत भ्रूण को कूड़े में फेंक दिया था. दो- चंड़ीगढ़ के रोहतक में सामूहिक बलात्कार  के बाद महिला ने खुदकुशी कर ली. तीन-तीन तलाक के मामले में महिलाओं ने की सुप्रीम कोर्ट से विरोध की अपील.यह वही समय था, जब पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत 21 मुस्लिम देशों में इसे समाप्त कर दिया गया था. मेरे हिंदुस्तान में महिलाओं और वंचितों के मामलों में धार्मिक न्याय प्रणाली अभी भी अपनाई जा रही थी. आजादी के बाद देश का संविधान लागू हो चुका था और संविधान की धज्जियाँ उड़ाने का सिलसिला भी.छोटी से बड़ी हर व्यवस्था में अपराधी बादशाह जो बन बैठा है’यही पंक्ति बार-बार मेरे दिमाग में घूम रही थी.छेड़ी गई, सताई गई, जिबह की गई औरतों का कोई हिसाब न था. पीढ़ियाँ की पीढ़ियाँ गुजर गई थीे. आदिमानव से जानवर तक का सफर सामने था. ताज्जुब की बात यह थी कि इसमें मानव कहीं न था. हिंसक जानवर और नरभक्षी मानव एक में गड्डमड्ड हो गए थे. एक रंग…एक सुर…जो अलग थे, वे नरभक्षी मानवों द्वारा भक्ष लिए गए.

नरभक्षियों ने नाखून काट लिए थे. गले में टाई, बदन पर सूट आ गया था. और सबसे अहम बात, उनके हाथों में संगीने, छुरे, चाकू और एसिड जैसी नवनिर्मित चीजें आ गई थी. जिसमें स्त्रियों का समाज गल- गल कर अपने खून के धब्बे इतिहास पर छोड़ रहा था. जुल्मों के पृष्ठ लम्बे हो रहे थे. द्रौपदी की साड़ी की तरह. और हरबार दरिन्दों का समाज साड़ी के भीतर कुछ खोजते हुए नन्हीं-मुन्नी बच्चियों के नन्हें फ्राॅक के नीचे भी कुछ खोजने लगा था. उनका वहशीपन पिताओं, जेठ, ससुर, देवर, भाइयों, पड़ोसियों, समेत हर रिश्तों में घुल कर बजबजाती नालियों की तरह बह रहा था.

आज से ठीक 4 वर्ष पूर्व 13 जून 2012 को बी.बी.सी. हिन्दी न्यूज के सर्वे के अनुसार- 19 देशों की सूची में हिन्दुस्तान सबसे नीचे पायदान पर था- औरतों की स्थिति के मामले में मेरे देश की तुलना सऊदी अरब जैसे देश से की गई थी….कहाँ मेरी शस्य श्यामला भूमि …कहाँ सऊदी अरब….मेरा देशभक्त मन आहत हो गया.‘यत्र नार्यस्तु पूज्न्ते, तत्र रमन्ते देवता’ और ‘माँ का स्थान सबसे ऊँचा’सरीखी पंक्तियाँ सूखती नदियों की तरह मुरझा गई थी. और आँखों के सामने नाचने लगा-‘माँ माने सिर्फ डेटाॅल का धुला’, ‘इनकी तरह करोड़ों माँ भरोसा करती हैं सिर्फ कोलगेट पर’, ‘टेस्ट में बेस्ट…मम्मी और एवरेस्ट’.

मैं भी न…क्या चार साल पहले के सर्वे की बात छेड़ दी. भाड़ में जाए बी.बी.सी. स्त्रियों के मामले में हमारा तो गौरवशाली इतिहास रहा है. जितना त्याग और समर्पण हमारे देश की स्त्रियों में है, उतना है किसी देश की स्त्रियों में ?जितना अत्याचार हमारे देश की स्त्रियाँ सहती हैं, उतना किसी अन्य देश की नहीं. इसलिए तो भारतीय नारी सहनशील मानी जाती है. किसी अन्य देश की नारी है क्या इस मामले में इतनी सहनशील ? मैत्रेयी, गार्गी, सती सीता, सावित्री…अरे इतना पीछे क्यूं ? आज ही साक्षी मलिक को ही देख लो, पहलवानी में ओलम्पिक में जीत कर आई है. पी टी उषा, कर्णममल्हेश्वरी, मैरी काॅम, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा समेत खिलाड़ियों को देख लो….इतिहास और वर्तमान का यह चेहरा सामने आते ही मन गदगद हो गया. अरे मारो गोली‘पंजाब केसरी’ की खबर को. इसी साल जनवरी में आस्ट्रेलिया में रह रहे भारतवंशी की बेटी यहाँ आना चाहती थी. सुनते ही उनके पिता का मुँह सूख गया. कहने लगे ‘हमारी मातृृभूमि में स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं’. छी!छी!!छी!!!लगता है राजा कृृष्णा मेनन की फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ नहीं देखी. अन्त में अपना देश ही काम आता है बच्चू.

अरे देखा न तसलीमा नसरीन का ...कर दी बगावत पुरुषों के अत्याचारों से. कैसे अपनी मातृभूमि से 1994 ई. में चुपचाप भागना पड़ा. और तो और बंगाल सरकार ने भी तो कर दी उसकी किताब बैन. राज्य से बाहर भी निकाल दिया. दिल्ली में नजरबन्द कर दिया गया था उसे. औरत चाहे कहीं की हो, अगर एक देश के पुरुषों को ललकार सकती है, तो दूसरे देश में भी तो वैसे ही पुरुष होते हैं. उनको भी ललकार सकती है. उसका देखा देखी दूसरी औरतें करने लगी तो ? वे भी बगावत पर उतर आई तो ? क्या होगा उस सभ्य समाज का, जो मुँह पर शहद लपेटे आँखों से हलाहल विष उगलता रहता है. हमारे यहाँ की तो यही रीत है औरतों के इनकार के बदले फेंक दो एसिड उसके चेहरे पर. जीवन भर कोसती रहेंगी खुद को. इसी सितम्बर की 27 तारीख कोमुआ ‘नव भारत टाइम्स’ ने बुलन्दशहर की खबर छाप दी-‘रेप पीड़िता पर चार दबंगों ने तेजाब फेंका’. धत् बुलन्दशहर का लगभग 1200 बरस के गौरव पर पानी फिर गया.वेस्ट यूपी की ‘छोटी काशी’ के नाम से मशहूर है यह शहर.राजा अहिबरन ने इसे दिल वालों की दिल्ली के आसपास ही बसा दिया था….लो अब, इसकी वजह से काशी भी बदनाम, दिल्ली भी बदनाम. छींटें तो आसपास पडेंगे ही न.फिर कहने सुनने वाली क्या बात है आज से तीन साल पहले ही एसिड अटैक कानूनन अपराध घोषित कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने तो इसकी बिक्री पर भी रोक लगा रखी है. उसी समय की बात है जब नई दिल्ली, नरेला की रहने वाली प्रीती राठी पर अंकुर नारायणलाल पंवार ने तेजाब फेंक कर उसकी हत्या कर डाली थी-राम! राम! बड़ा ऐतिहासिक फैसला हुआ था उस समय, अंकुर की फाँसी का. जुल्मों के इतिहास में अपराधी को फाँसी! ऐसा कभी-कभार ही देखने को मिलता है. ग्रह नक्षत्रों की दिशा बदल गई होगी शायद. वरना सरकार, घूसखोर आला अमला अपने काले चरित्र पर चूने का दाग कैसे लगने देता.

ये पेपर वाले भी न अक्सर चूहों की तरह जड़ खोदने का काम कर ही जाते है. अपने देश का तो छोड़ो विश्व भर के आँकड़े जुटा लिए.पूरे विश्व में हर साल 1500 एसिड अटैक के  मामले होते है. इनमें 1000 से अधिक मामले भारत में होते हैं. लगता है खबर छापने वाला और खबर लाने वाला दोनों देशभक्त की जात से बिलांग नहीं करते थे.खैर… एसिड अटैक के हर मामलों के पीछे प्रेम संबंध हो ऐसा नहीं. कुछ लोग बेटियाँ जनने पर भी तेजाब फेंक दिया करते हैं. 1994 ई. में मुंबई में जो दुर्घटना अनमोल और उनकी माँ के साथ घटी उसे आज भी भुलाया नहीं जा सकता. क्योंकि अनमोल उसका दंश आज भी भुगत रही हैं. कितने लोग हैं, जो शीरोज कैफे (आगरा) को जानते हैं ? जिसे एसिड अटैक की शिकार हुई लड़कियाँ चलाती हैं. ..और कितने लोग हैं, जो आगरा जाने पर इस कैफे को चुनते हैं ?

‘बढ़ रहा है इण्डिया, डिजिटल बन रहा है इण्डिया’ के बीच हैदराबाद में इसी 8 अक्टूबर को महज 13 साल  की बच्ची की 68 दिन के व्रत के बाद मृत्यु हो गई. सबसे ताज्जुब की बात यह है कि उस व्रत समारोह में सांसद की पत्नी भी गई थी और उस बच्ची  की मृत्यु यात्रा को ‘शोभा यात्रा’ का नाम दिया गया. उसमें 600 लोग शामिल हुए. किसी की भूख से हुई मृत्यु शोभा यात्रा कैसे बन सकती है ? मेरे समझ से बाहर है. फिर तो हमारे देश में भूख के कारण हो रही आत्महत्याओं पर अधिक से अधिक ‘शोभा यात्रा’ निकालने के अवसर मिलेंगे.


लोग जश्न का कोई मौका नहीं छोड़ते. हत्याओं पर जश्न. क्या करें इतिहास में ही खोट है. बार-बार वर्तमान में आ धमकता है.मार्च 2016 को गाजीपुर में एक स्त्री की हत्या हुई. 23 जुलाई ’16 की खबर के अनुसार महोबा में जुँड़वा बच्चियों की हत्या हुई, 26 अगस्त को हरियाणा (मेवात) में दो लड़कियों से गैंग रेप की घटना घटी. अक्टूबरकी दर्दनाक खबर थी दिल्ली के विकासपुरी इलाके की, जहाँ 11 महीने और तीन साल के मासूमों के साथ रेप की घटना घटी. अकेले उत्तर प्रदेश में 2014 और 2015 में रेप की कुल घटनाएँ 12,542 थी.अगस्त 2016 की विश्वरत्न श्रीवास्तव की रिपोर्ट के अनुसारमहिलाओं पर अत्याचार के मामलों में महाराष्ट्र में 26,693 घटनाएँ,दिल्ली में 15,265, असम में 19,139 घटनाएँ हुईं. पूरे भारत में तो निसन्देहऔर आहत करने वाले आँकड़े होंगे.नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (2015) के अनुसार आपराधिक मामलों में जोधपुरका प्रथम स्थान था. यहाँ रेप दर 13.4 थी. दूसरा स्थान दिल्ली का, रेप दर 11.6, तीसरे स्थान पर ग्वालियर, रेप दर 10.4, चौथे स्थान पर भोपाल, रेप दर 7.1, पाँचवा स्थान नागपुर, रेप दर 6.6 और छठाँ स्थान दुर्ग-भिलाई का.यहाँ रेप दर 7.9 रही.

10 मई 16 की ताारीख की खबर – बलिया में दहेज  के लिए एक स्त्री  को जला कर मार डाला गया. 1 सितम्बर 16 की खौफनाक खबर-रामपुर इलाके की 20 वर्ष की युवती की दहेज के लिए हत्या कर दी गई. 2013 में किए गए आकलन के हिसाब से भारत में 1 घंटे में 1 महिला की मौत होती है. 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक हर महीने दहेज के लिए 700 औरतों की हत्या होती है. पिछले 3 सालों में भारत में 24,771 हत्याएँ की गईं.राजनीतिक पार्टियों की बंदरनुमा उछल कूद के बीच अकेले उत्तर प्रदेश में 7048 मृत्यु, बिहार में 3830 और मध्य प्रदेश में 2252 मौतें, सिर्फ दहेज के लिए. घरेलू हिंसा के मामलों में नृत्य, संगीत एवं चलचित्रों की सुव्यवस्थित परंपरा वाले नगरपश्चिम बंगाल में 61,259 घटनाएँ, शौर्यपूर्ण गाथाओं के लिए प्रसिद्ध राजस्थान में 44,331 और ‘भारत का धान का कटोरा’ कहे जाने वाले आंध्र प्रदेश में 34,835 घटनाएँ सामने आईं.आँकड़े जुटाते-जुटाते थक जाएगें. ये घटनाएँ जैसे रोजमर्रा की चीजें हो गई हों. एक सिलसिला चल पड़ा है. जो बच गए उनकी किस्मत. जैसे सरपट दौड़ती गाड़ियों के बीच बिना किसी एक्सीडेंट के घर आ गए हों.

क्यों महिलाएँ रात में निकलने पर डरती हैं, सारी पुलिस व्यवस्था के बावजूद. मुझे बरसों पहले पढ़ी गई वह घटना याद आ रही है, जिसमें एक लड़की ने कहा था कि हिन्दुस्तान में उसे गुण्डों से ज्यादा पुलिस से डर लगता है.कोई नहीं जानता, कब क्या घटित हो जाए. जैसे दहशत के साये में जी रहे हो. आदमखोर के युग में. यहाँ आदमी ही आदमी का भक्षक है. आदमी ने सारी चीजें भक्ष ली हैं.दलित, स्त्री, आदिवासी, जानवर, कीड़े-मकोड़े, पेड़, पौधे,पत्थर, पहाड़ फूल, नदियाँ सब.आदमी की अपरिमित इच्छाओं के बीच हर चीज हजारों तरीके से नोची-खसोटी गई है.22 जुलाई 2014 को @topyapshindi पर सन्तोष शांडिल्य की रिपोर्ट के मुताबिक स्त्रियों की महिमामयी स्थिति पर गर्व करने वाले देश में उनकी खरीद फरोख्त के लिए अनेक कुख्यात स्थल हैं. संगम के लिए प्रसिद्ध नगरी प्रयागराज में मीरागंज, बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में शिवदासपुर, मुजफ्फरपुर(बिहार) में चतुर्भुजस्थान, कोलकाता में सोनागाछी, देश की वाणिज्यिक राजधानी मुम्बई में कमाठीपुरा, देश की राजधानी दिल्ली में जी. बी. रोड, नागपुर (महाराष्ट्र) में गंगा जमुना, गणपति के प्रसिद्ध मन्दिर स्थल बुधवार पेठ (पुणे)आदि जगहों पर बड़ी जिस्म मंडी लगती है. यहाँ बच्चियों को भी बड़ी बेदर्दी से बेचा जाता है. उस समय न बाबा भोले काम आते हैं न कालभैरव और न ही कोई गणपति बप्पा मोरया. आदमखोर की चालें सब पर भारी.मुझे तसलीमा नसरीन की पुस्तक ‘औरत के हक़’ में की रूलाने वाली पंक्ति याद आ रही, जिसे बगैर लिखे मैं आगे नहीं बढ़ सकती-‘‘बाजार में इतना सस्ता और कुछ नहीं मिलता जितनी सस्ती मिलती हैं लड़कियाँ’’जहाँ एशिया का सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया मौजूद हो वहाँ के लोगों को स्त्रियों की दशा का बखान करते समय नाले में डूब मरना चाहिए. और देश के नेताओं को मरने के लिए भी धरती का कोई हिस्सा देना मुनासिब न होगा. क्योंकि वे जल, जंगल, जमीन, और जिन्दगी के हंता है.‘कौशल भारत और कुशल भारत’ के नारे के बीच खून की नदियाँ बहती हैं, बच सको तो बचो.

पहली महिला राष्ट्रपति नहीं सेक्सिस्ट राष्ट्रपति: अमेरिकी जनादेश

दुनिया के सबसे ताकतवर माने जाने वाले मुल्क ने अपना राष्ट्रपति चुन लिया है और इस तरह विवादों में रहने वाला, महिलाओं को देह मात्र मानने वाला शख्स अमेरिकी लोकतंत्र का कर्ता-धर्ता बन गया है. डोनाल्ड ट्रंप का चुना जाना अमेरिकी समाज की पितृसत्तात्मक सोच की बेहद मजबूत बुनियाद का प्रतीक है, जिसकी जड़ें भारत में भी कम मजबूत नहीं है, ट्रंप के लिए भारत में हो रहे यज्ञों और उनके पक्ष में उठ रही आवाजें इसका प्रतीक हैं. भारत के सोशल मीडिया में सक्रिय अश्लील और आक्रामक स्त्री-दलित-वंचित और अल्पसंख्यक विरोधियों से ट्रंप के समर्थक भी कम नहीं हैं. एक खबर- विश्लेषण के अनुसार उनके समर्थकों ने इस साल की शुरुआत में ही पत्रकार मेगन केली को ट्वीट करते हुए गालियों की बौछार कर दी थी- बीच, व्होर, बिम्बो, कंट जैसी गालियों से उनपर हमला बो दिया था, ऐसा इसलिए कि ट्रंप ने केली के शो में जाने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि ‘वह ( ट्रंप) केली को पसंद नहीं करते.



अमेरिका की मोदी परिघटना

भारत की घटनाओं से साम्य रखती इन घटनाओं और हमलों के बीच रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप डेमोक्रैट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को हराकर अमेरिका के राष्ट्रपति बन गये हैं. इसके राजनीतिक मायने ठीक-ठीक वही हैं, जो 2014 की गर्मी में भारत में सत्ता परिवर्तन के राजनीतिक मायने थे, यानी मनमोहन सिंह की हार और नरेंद्र मोदी की जीत. इससे ज्यादा वाम-दक्षिण जैसी कोई बायनरी नहीं बनती. मई 2014 के मई में आये चुनाव परिणाम के साथ भारत की राजनीति ‘दक्षिण’ से और दक्षिण की ओर बढ़ी है- अमेरिका का चुनाव परिणाम उसकी आंतरिक राजनीति को वही खीच कर ले जा रहा है. लेकिन ट्रंप की जीत का विशेष मायने यह है कि अमेरिका के व्हाईट हाउस में पहली महिला नहीं जा सकी. नस्लवाद के खिलाफ एक सन्देश तो अमेरिकियों ने 2008 में दे दिया था- ब्लैक बराक ओबामा को राष्ट्रपति चुनकर, लेकिन वे इसे पुरुषवाद के खिलाफ जनादेश तक विस्तार नहीं दे सके. ऐसा मैं सिर्फ टोकन के तौर पर नहीं कह रहा हूँ- ओबामा से नस्लवादी नफरत करने वाले अमेरिकियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बहुमत नस्लावाद से ऊपर गया. ऐसा 2016 में नहीं हो सका, अमेरिकी जनता ने महिलाओं को गालियाँ देने वाले, उनका उत्पीडन करने वाले सेक्सिस्ट ट्रंप को अपना प्रतिनधि चुन लिया.


अमेरिकी प्रतिभा पाटिल

यदि हिलेरी क्लिंटन चुन ली गई होतीं तो जनादेश महिलाविरोधी आचरणों के खिलाफ एक सन्देश होता, और यह महत्वपूर्ण होता. देश की पहली महिला राष्ट्रपति होने का भी एक अर्थ सन्दर्भ है, हालांकि भारत ने देखा है कि उसकी पहली महिला राष्ट्रपति कहीं से भी स्त्रीवादी नहीं थी, बल्किन बाबाओं-माताओं और भूत-प्रेत में विश्वास करने वाली स्त्रीविरोधी सोच की पतिव्रता स्त्री भर थीं. अमेरिका में भी हिलेरी के होने से स्त्रीवाद की कोई जीत का जश्न नहीं होने वाला था. बल्कि हिलेरी भी प्रतिभा पाटिल की तरह ही आत्मा-संवाद (मरे हुए व्यक्ति से) करने में अपनी महारत की दावेदार रही हैं, उनका दावा राष्ट्रपति फ्रेंकलीन रूजवेल्ट की पत्नी एलेनार रूजवेल्ट से बात करने की रही है, जबकि प्रतिभा पाटिल का दावा ‘ब्रह्मकुमारी माता’ से बात करने की रही है.
व्हाईट हाउस की होड़ में पहली महिला स्त्रीवादी थीं

हिलेरी क्लिंटन निश्चित ही आधिकारिक तौर पर पहली महिला राष्ट्रपति जरूर होतीं, लेकिन व्हाईट हाउस की आंतरिक सत्ता संभालने की पत्नीवत भूमिका से आगे बढ़कर शासन-प्रशासन और राजनीतिक निर्णयों में अगुआई करने का एक श्रेय एडिथ विल्सन को जाता है, जो अपने राष्ट्रपति पति वुडरो विल्सन के बीमार होने के बाद 17 महीने तक देश की सत्ता की बागडोर संभाली. कुछ विश्लेषक उन्हें भी अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति मानते हैं. हालांकि ऐसा आधिकारिक तौर पर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह महज संयोग था, राष्ट्रपति की शारीरिक अक्षमता की स्थिति में अमेरिकी संविधान तब बहुत स्पष्ट प्रावधान नहीं रखता था. हालांकि अमेरिकी की पहली महिला राष्ट्रपति होने की होड़ में महिलायें पहले भी आगे आती रही हैं, लेकिन रिपब्लिकन और डेमोक्रैट जैसी बड़ी पार्टी से पहली अधिकारिक उम्मीदवार, हिलेरी क्लिंटन ही रही हैं, जो जीततीं तो कीर्तिमान रचतीं.

अमेरिकी इतिहास में पहली राष्ट्रपति पद की पहली महिला उम्मीदवार विक्टोरिया वुडहल रही हैं, जिन्होंने 1872 में चुनाव लड़ा था. विक्टोरिया वुडहल महिला अधिकार और श्रमिक अधिकार के लिए सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थीं. हिलेरी क्लिंटन की ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं है, लेकिन उनकी जीत जरूर एक स्त्री एक पक्ष में जनादेश होती, क्योंकि ट्रंप के महिलाविरोधी आचरण, उनके सेक्सिस्ट रिमार्क और उनके द्वारा महिलाओं का ‘तथाकथित उत्पीडन’ इस बार चुनाव में मुद्दा बन गया था.

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हिलेरी क्लिंटन बनाम डोनाल्ड ट्रंप: सामाजिक पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि एक और मामले में अमेरिकी चुनाव भारत के 2014 के चुनाव से साम्य रखता है, वह साम्य बनता है, दोनो उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर. एक ओर पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन थीं, जिनके पास सपष्ट राजनीतिक विरासत है और प्रशासनिक अनुभव भी, दूसरी ओर व्यवसायी और 19 सालों से सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के मालिक अराजनीतिक पृष्ठभूमि वाले ट्रंप- यहाँ राजनीतिक जुमले में चाय जैसा ही कोई संयोग था.

पति को संतुष्ट नहीं कर पाई, अमेरिकी जनता को क्या संतुष्ट करेगी: 

ट्रंप अपने पूरे करिअर में महिला विरोधी हलके रिमार्क के लिए कुख्यात रहे है. वे महिलाओं की देह, चेहरे और व्यक्तिव को लेकर सेकसिस्ट रिमार्क देते रहे हैं, अमेरिका की कई बड़ी महिला हस्तियों ने उनपर यौन शोषण के आरोप लगाये, जिसकी संख्या चुनाव प्रचार के दौरान बढ़ती ही गई. सीमा का उल्लंघन तो तब हुआ, जब उनके ट्वीटर हैंडल से हिलेरी के बारे में ट्वीट हुआ कि, ‘ जो पति को संतुष्ट नहीं कर पाई, वह अमेरिकी जनता को क्या संतुष्ट करेगी,’ हिलेरी के बारे में यह रिमार्क उनके पति और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लिवेन्स्की के प्रसंग में किया गया था, मोनिका लिवेन्स्की ने क्लिंटन पर यौन शोषण का आरोप लागाया था. अपने विरोधियों के खिलाफ अश्लील ट्वीटर पोस्ट को दुबारा शेयर करने वाले ट्रंप ( हालांकि वे शेयर करने के बाद अपनी ओर से उसे स्वीकारने या अस्वीकारने का कोई कमेन्ट नहीं देते) के खुद के ऐसे अश्लील और सेक्सिस्ट रिमार्क की लम्बी फेहरिश्त है, जो ऑडियो, वीडियो की शक्ल में भी सोशल मीडिया में वायरल हैं. वे एक वायरल ऑडियो में एक विवाहिता के साथ सेक्स करने की बात अश्लील तरीके से कहते हुए सुने जा सकते हैं.
स्त्रियों के शरीर और खासकर यौन अंगों के बारे में बात करना उनका पसंदीदा काम है, ऐसा आरोप अमेरिका की कई बड़ी हस्तियों ने लगाया है, और ऐसा करते हुए वे सार्जनिक टीवी शो और अपने साक्षात्कारों में भी देखे गये हैं.

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तो सवाल है कि क्या अमेरिकियों ने स्पष्ट सन्देश दिया है की वे पहली स्त्री को तो व्हाईट हाउस  भेजने के लिए तैयार नहीं ही हुए हैं, बल्कि उससे भी आगे बढ़कर एक स्त्रीविरोध शख्स को देश की बाग़डोर सौपने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है.

मीडिया से मजदूर गायब, सेक्सी माडल्स बिल्डिंग बना रहे हैं !

आदित्य कुमार गिरि

शोधार्थी,कलकत्ता विश्वविद्यालय,ईमेल आईडी-adityakumargiri@gmail.com

टीवी पर ‘अल्ट्राटेक सीमेंट’ का नया विज्ञापन आ रहा है.सुंदर और सेक्सी मॉडल्स बिल्डिंग  बना रहे हैं.मतलब विज्ञापन में वे मज़दूर की भूमिका में हैं.लड़के मज़दूर ‘सिक्स-पैक’ की बॉडी के साथ और लड़कियाँ मज़दूर ‘ज़ीरो फिगर’ वाली,छरहरी सुंदर.


मतलब बिल्डिंग भी यह सोचकर कभी न गिरे कि ‘क्या खूब हाथों ने हमें बनाया है.’
पूँजीपति वर्ग का आज के युग में मज़दूरों पर यह सबसे सुंदर(?) मज़ाक है.(अगर इसे ऐसे देखें तो.)


हालाँकि सौन्दर्यवादी दृष्टि से विज्ञापन खूबसूरत बन पड़ा है लेकिन जिन मज़दूरों को चित्रित किया गया है वे लोग ऐसे होते नहीं.उनकी स्थिति दर्दनाक होती है.
पूँजीवाद ने अब मज़दूरों को भी विज्ञापन में सौंदर्य के प्रतिमान की तरह चित्रित करना शुरू कर दिया है.यानी यह नई कला से मज़दूर को गायब करने की शुरुआत है.इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मज़दूरों और किसानों और आदिवासियों को लुप्त करने जा रहा है.

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यह मीडिया-क्रांति का युग है.मीडिया से मज़दूर गायब,किसान गायब,आदिवासी गायब यह अचानक नहीं है.यह एक सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है.
बहस के लिए उछाले जा रहे मुद्दे बुनियादी मुद्दों से अलग हैं.राहुल गाँधी की यात्रा की ‘कवरेज’ जरूरी है,किसानों की स्थिति नहीं.राहुल गाँधी की मिट्टी उठाती तस्वीर महत्त्वपूर्ण है,रोज-रोज वही काम कर रहे मज़दूर नहीं.उनकी तस्वीर नहीं.

‘चाय वाले’ लीडर पर कवरेज तो होगी लेकिन असली चाय वालों को बहस से बाहर रखा जाएगा.उनकी स्थिति,उनका दर्द मीडिया से गायब होगा.मज़दूरों पर मीडिया ‘बाईट्स’ तो होंगी लेकिन मज़दूर गायब होंगे.

आधुनिक मीडिया पूँजीवाद का पिट्ठू है.वह आमजन के बुनियादी मुद्दों से अलग फैशन और मनोरंजन को जगह देने वाला माध्यम है.मीडिया में जब से ‘बड़ी-पूँजी’ का प्रवेश हुआ है उसे आमजन या लोकतंत्र के हथियार के रूप में जानने और मानने वालों को निराशा हुई है.

आधुनिक मीडिया पूँजीपतियों के हित साधन के लिए खबरें निर्मित करता है.इसने कला के हर रूप को अपने अंदर समाहित कर लिया है.वे सारे रूप जो कल तक जन सरोकारों से जुडे थे मीडिया ने उन्हें अपने कब्जे में कर लिया है.कविताओं और कहानियों के बाद अब विज्ञापन और सीरियल्स और कला के सभी आधुनिक रूपों पर पूँजीपतियों का कब्जा है.आमजन के हित के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाइयों के सभी माध्यमों पर पूँजीपति नजर गड़ाए है.वह पिछली सदी वाली गलती नहीं करना चाहता.

लेकिन इन सबके बीच जो सबसे बड़ी समस्या है वह यह कि आमजन मञ्च विहीन हो गया है.उसके लिए लड़ी जाने वाली हर लड़ाई ‘फिक्स्ड’ है.उसका हर हीरो बिका हुआ है.वह किसी पर भरोसा नहीं कर सकता.
जन प्रतिनिधि उसे केवल मुददे के रूप में देख रहा है और पूँजीवाद उसे सौन्दर्य प्रसाधन या मनोरंजन के एक प्रकार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है.जहां उसकी चर्चा तो होगी लेकिन नॉनसेंस के लिए.मजदूर मीडिया में नॉनसेंस होगा.टीवी देख रहे मजदूर उजबक की तरह टुकुर टुकुर ताकेंगे.

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यह युग एंटी मजदूर,एंटी किसान,एंटी आदिवासी है.बड़ी पूँजी ने समूची सभ्यता को खेल बना दिया है.ऐसा खेल जिसके सारे नियम उसने खुद बनाए हैं.मजदूर सिर्फ एक वस्तु बनकर रह गया है.किसी भी मजदूर या किसान की आत्महत्या अब मनोरंजन की वस्तु है.मीडिया ने उसे एक रूटिन खबर बना दिया है.लोग जैसे फिल्में और सीरियल्स और गाने देखते हैं हिंसा या हत्या या मृत्यु की खबरें वैसे ही देख रहे हैं.लोगों की संवेदनहीनता असल में मीडिया निर्मित है.यह मीडिया निर्मित स्थिति है..यह एक खराब युग है.जहाँ विरोध के सारे साधन,सारे नियम जिसका विरोध हो रहा है उसके कब्जे में है.ऐसे में यह लड़ाई बहुत खतरनाक और गंभीर हो गई है.इसकी चुनौतियाँ दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं.



लोग अपने आस पास के मुद्दों को मीडिया में देखें, उसके ग्लैमर के रंग में रंग जायें यही उद्देश्य है.मुक्तिबोध ने शीतयुद्धीय समय में जिसे ‘कॉस्मेटिक सौन्दर्य’ कहा था असल में वह शुरुआती दौर था.अब हम उसे उसके विकसित रूप में देख रहे हैं.लोगों की बेबसी और लाचारी असल में पूँजीपतियों की ताकत के फलस्वरूप की स्थिति है.

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मीडिया भ्रम बनाए रखता है कि वह जन सरोकार के मुद्दों के प्रति गंभीर है जबकि एक मुहीम के तहत वह जन सरोकार के मुद्दों को हल्का कर रहा होता है.उसके खिलाफ पनप रहे स्वाभाविक गुस्से को खत्म करने की स्थिति पैदा करता है.मीडिया का यह भ्रम असल में पूँजीपतियों के लिए जन्म ले सकती किसी भी अप्रिय स्थिति का तोड़ है.आमजन मीडिया को विरोध के ज़रिए के रूप में देखे और इधर मीडिया पूँजीपतियों के हित में काम करे.



गंभीर से गंभीर मुद्दे को मनोरंजन बना देना,हल्का बना देना कोई अचानक हो रही चीज़ नहीं है.मीडिया सबसे पहले व्यक्ति की आलोचनात्मकता को नष्ट करने का काम कर रहा है.मतलब जो दिखाया जा रहा है उसे चुपचाप दर्शक भाव से देखिए और स्वीकारिए.मीडिया ने विराट जनमानस को पंगु करने का काम किया है.
मैं इस विज्ञापन के पीछे की विचारधारा के खतरे को साफ देख रहा हूँ.मीडिया ने हर एक बुनियादी सवाल को सौन्दर्य की वस्तु बना दिया है और आमजन को दर्शक.
फुकोयामा ने कहा था ‘हम जिस गाडी में बैठे हैं उसकी ड्राइविंग सीट पर राजनीति नहीं है.’

स्तन कैंसर/ब्रेस्ट कैंसर: कवितायें विभा रानी की

विभा रानी

लेखिका, रंगमंच में सशक्त उपस्थिति, संपर्क :मो- 09820619161 gonujha.jha@gmail.com

कैंसर का जश्न!

क्या फर्क पड़ता है!
सीना सपाट हो या उभरा
चेहरा सलोना हो या बिगड़ा
सर पर घने बाल हों या हो वह गंजा!
ज़िन्दगी से सुंदर,
गुदाज़
और यौवनमय नहीं है कुछ भी.
आओ, मनाएं,
जश्न – इस यौवन का
जश्न – इस जीवन का!


गाँठ

मन पर पड़े या तन पर
भुगतते हैं खामियाजे तन और मन दोनों ही
एक के उठने या दूसरे के बैठने से
नहीं हो जाती है हार या जीत किसी एक या दोनों की.
गाँठ पड़ती है कभी
पेड़ों के पत्तों पर भी
और नदी के छिलकों पर भी.
गाँठ जीवन से जितनी जल्दी निकले
उतना ही अच्छा.
पड़ गए शगुन के पीले चावल,
चलो, उठाओ गीत कोई.
गाँठ हल्दी तो है नहीं
जो पिघल ही जाएगी
कभी न कभी
बर्फ की तरह.


गांठ : मनके-सी!

एक दिन
मैंने उससे कहा
देखो न!
गले में पड़े मनके की तरह
उग आई हैं गांठें।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि
गले से उतारकर रखी गई माला की तरह ही
हौले से गांठ को भी निकालकर
रख दें किसी मखमली डब्बे में बंद
उसकी आंखों में दो मोती चमके
और उसने घुट घुट कर पी लिया अपनी आंखों से
मेरी आंखों का सारा पानी।
गांठ गाने लगी आंखों की नदी की लहरों की ताल पर
हैया हो… हैया हो…
माझी गहो पतवार, हैया हो..।



छोले, राजमा, चने सी गाँठ!

उपमा देते हैं गांठों की
अक्सर खाद्य पदार्थों से
चने दाल सी, मटर के साइज सी
भीगे छोले या राजमा के आकार सी
छोटे, मझोले, बड़े साइज के आलू सी.
फिर खाते भी रहते हैं इन सबको
बिना आए हूल
बगैर सोचे कि
अभी तो दिए थे गांठों को कई नाम-उपनाम
उपनाम तो आते हैं कई-कई
पर शायद संगत नहीं बैठ पाती
कि कहा जाए –
गाँठ –
क्रोसिन की टिकिया जैसी
बिकोसूल के कैप्सूल जैसी.
सभी को पता है
आलू से लेकर छोले, चने, राजमे का आकार-प्रकार
क्या सभी को पता होगा
क्रोसिन-बिकोसूल का रूप-रंग?
गाँठ को जोड़ना चाहते हैं –
जीवन की सार्वभौमिकता से
और तानते रहते हैं उपमाओं के
शामियाने-चंदोबे!



कैंसू डार्लिंग! किस्सू डियर!! 

मेरा ना…….म है – कैंसर!
प्यार से लोग मुझे कुछ भी नहीं कहते.
न कैंसू, न किस्सू, न कैन्स.
और तुम्हारा नाम क्या है –
सुषमा, सरोज, ममता या अम्बा.
रफ़ी, डिसूजा, इस्सर, जगदम्बा.
उस रोज
रात भर बजती रही थी
शहनाई, बांसुरी, ढोलक की बेसुरी धुन!
खुलते रहे थे दिल और दिमाग के
खिड़की – कपाट.
मन चीख रहा था गाने की शक्ल में
दे नहीं रहा था ध्यान सुर या ले पर.
हुहुआ रही थी एक ही आंधी
डुबा रही थी दिल को – एक ही धड़कन
कैसे? कैसे ये सब हुआ??
क्यों? और क्यों ये सब हुआ?
कैंसर!
मुझे पता है तेरा नाम
दी है अपने ही घर के तीन लोगों की आहुति
फिर भी नहीं भरा तुम्हारा पेट जो
आ गए मेरे पास?
और अब गा रहे हो बड़ा चमक-छमक के, कि
मेरा ना……म है कैंसर!
और कर भी रहे हो शिकायत कि
नहीं लोग पुकारते हैं तुम्हें प्यार से
किस्सू डियर या कैंसू डार्लिंग!
आओ,
अब, जब तुम आ ही गए हो मेरे सीने में
मेरे दिल के ठीक ऊपर
जमा ही लिया है डेरा
तो कह रही हूँ तुम्हें
कैंसू डार्लिंग, किस्सू डियर!
खुश!
लो, पूरी करो अपनी मियाद
और चलते बनो
अपने देस-नगर को,
जहां से मत देना आवाज किसी को
न पुकारना किसी का नाम
इठलाकर, बल खाकर
ओ माई कैंसू डियर!
ओ माई किस्सू डार्लिंग!!


ब्रेस्ट कैंसर.

अच्छी लगती है अंग्रेजी, कभी कभी
दे देती है भावों को भाषा का आवरण
भदेस क्या! शुद्ध सुसंस्कृत भाषा में भी,
नहीं उचार या बोल पाते.
स्तन – स्तन का कैंसर
जितने फर्राटे से हम बोलने लगे हैं –
ब्रेस्ट – ब्रेस्ट कैंसर!
नहीं आती है शर्म या होती है कोई झिझक
बॉस से लेकर बाउजी तक
डॉक्टर से लेकर डियर वन्स तक को बताने में
ब्रेस्ट कैंसर, यूट्रेस कैंसर.
यह भाषा का सरलीकरण है
या भाव का भावहीनता तक का विस्तार
या बोल बोल कर, बार बार
भ्रम – पाने का डर से निजात
ब्रेस्ट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, ब्रेस्ट
ब्रेस्ट, ब्रेस्ट, ब्रेस्ट कैंसर!



तुम और तुम्हारी वकत ओ स्तन!

याद नहीं,
पर आते ही धरती पर
मैंने तुम्हें महसूसा होगा
जब मेरी माँ ने मेरे मुंह में दिया होगा – तुम्हें.
यहीं से शुरू हो जाता है
हर शिशु का तुमसे नाता
जो बढ़कर उम्र के साथ
बन जाता है माँ से मादा तक का हाथ –
छूता, टटोलता, कसता
या घूम जाता तुम्हारी गोलाई में.
इधर-उधर के ताने-बाने के साथ.
तुम्हें ही मानकर पहेली
तुम्हीं के संग बनकर सहेली
खेली थी होली
की थी अठखेली
भाभी संग, संग ननद के भी
जब मुंह के बदले बोली थी
स्तन की बोली.
मेरी समझ में आया था
क्या है वकत तुम्हारी
तुमसे ही होती है पहचान हमारी
ओ मादा! ओ औरत ज़ात!
कितना बड़ा हिस्सा है देह के इस अंग का
तुम्हारे साथ!


जनाना चीज

बचपन में ही चल गया था पता
कि बड़ी जनाना चीज है ये.
मरे जाते हैं सभी इसके लिए
छोकरे- देखने के लिए
छोकरियाँ-दिखाने के लिए
बाज़ार- बेचने और भुनाने के लिए
सभी होते हैं निराश
गर नहीं है मन-मुआफिक इसका आकार!
बेचनेवाले कैसे बेचें उत्पाद
ब्रेसरी की मालिश की दवा
कॉस्मोटोलोजी या खाने की टिकिया
पहेलियां भी बन गईं- बूझ-अबूझ
‘कनक छड़ी सी कामिनी, काहे को कटि छीन?
कटि को कंचन काट विधि, कुचन मध्य धरि दीन!’
ये तो हुआ साहित्य विमर्श
बड़े-बड़े देते हैं इसके उद्धरण
साहित्य से नहीं चलता जीवन या समाज.
सो उसने बनाया अपना बुझौअल और बुझाई यह पहेली-
गोर बदन मुख सांवरे, बसे समंदर तीर
एक अचंभा हमने देखा, एक नाम दो बीर!
वीर डटे हुए हैं मैदान में
कवियों के राग में
ठुमरी की तान में
‘जब रे सिपाहिया, चोली के बन्द खोले,
जोबन दुनु डट गई रात मोरी अम्मा!’
खुल जाते हैं चोली के बंद
बार-बार, लगातार
सूख जाती है लाज-हया की गंगा
बैशाख-जेठ की गरमी सी
खत्म हो जाती है लोक-लाज की गठरी
आंखों में बैठ जाता है सूखे कांटे सा
कैंसर!
उघाड़ते-उघाड़ते
जांच कराते-कराते
संवेदनहीन हो जाता है डॉक्टर संग
मरीज भी!



पॉप कॉर्न सा ब्रेस्ट!

पॉप कॉर्न सा उछलता
बिखरता ब्रेस्ट कैंसर।
यहां-वहां, इधर-उधर
जब-तब, निरंतर।
प्रियजन,
नाते-रिश्तेदार
हित-मित्र, दोस्त-यार।
किसी की माँ
किसी की बहन
किसी की भाभी
किसी की बीबी
कोई नहीं तो अपनी पड़ोसन।
दादी-नानी भी नहीं है अछूती
न अछूता है रोग।
आने पर ब्रेस्ट कैंसर की सवारी
खोजते हैं आने की वजह?
लाइफ स्टाइल?
स्ट्रेस?
लेट मैरिज?
लेट संतान?
एक या दो ही बच्चे?
नहीं कराया स्तन-पान?
डॉक्टर और विशेषज्ञ हैं हैरान
नहीं पता कारण
नहीं निष्कर्ष इतना आसान
हर मरीज के अपने लक्षण
अपने-अपने कारण।
पूछते हैं सवाल एक से- कैसे हो गया?
जवाब जो होता मालूम
तो फेंक आते किसी गठरी में बांधकर
किसी पर्वत की ऊंचाई पर
या पाताल की गहराई में
पॉप कॉर्न से कैंसर के ये दाने।