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.वो हरी घास की चादर

रजनीश आनंद


कॉपी राइटर, प्रभात खबर, रांची, झारखंड
संपर्क : 9835933669, 8083119988

रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़े -खड़े निहारिका लगातार बोल रही थी. तुम्हें मेरी सारी बात याद है ना… अच्छे से रहना. सेहत का ख्याल रखना. मैं जानती हूं तुम्हारे सपने क्या हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए तुम्हें अपनी सेहत का ध्यान रखना होगा. लेकिन वह एक बार भी रुद्र की ओर नहीं देख रही थी. वह लगातार उसे देख रहा था. रुद्र जानता था, निहारिका की उस वक्त क्या स्थिति थी.


उसने उसका हाथ जोर से पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचकर सीने से लगा लिया. रुद्र के सीने से लगते ही निहारिका के सब्र का बांध टूट गया, वह फफक पड़ी. रुद्र ने उसे अपनी बांहों के घेरे में समेट लिया. वह जानता था, रोकर ही निहारिका का मन कुछ हल्का हो सकता है.


उसने रोती निहारिका को दिलासा दिया, मैं जा रहा हूं, यह सच है लेकिन तुम्हें छोड़कर नहीं. अपने भविष्य को संवारने जा रहा हूं. तुम चाहती हो ना मेरे सपने सच हो जायें. मैं एक जाना-माना साइंटिस्ट बन जाऊं, तो अब मत रोना. तुम अच्छे से रहना, अपनी पढ़ाई करना और मेरा इंतजार करना. और हमारी बात तो फोन और फेसबुक पर होती रहेगी, हम अलग-अलग नहीं साथ हैं. तुम क्या कहती हो? रुद्र की इस बात पर निहारिका मुस्कुराई. वह उसकी इसी बात की तो दीवानी थी. वह निहायत ही समझदार और बातों का जादूगर था.

रुद्र से अलग होते हुए निहारिका ने उससे कहा, वहां जाकर मुझे भूल मत जाना. रुद्र ने उसका हाथ थाम कर कहा, मैं ऐसा क्यों करूंगा. मुझे जीवन में अकेला नहीं होना है. बस तुम अच्छे से रहना. रुद्र के यह कहते ही ट्रेन ने एकबार फिर सीटी बजाई. ट्रेन के खुलने का समय हो गया था. रुद्र ने निहारिका के माथे पर अपने होंठों के निशान छोड़े और ट्रेन की ओर भागा. उसने बोगी के दरवाजे पर खड़े होकर निहारिका को देखा, दोनों की आंखें नम थी, लेकिन दोनों आंखों में अपने-अपने सपने थे, जिन्हें उन्हें पूरा करना था. रुद्र चला गया, निहारिका उसकी छवि और बातों को सीने में समेटे हॉस्टल के लिए चल दी. उसने अपने भगवान से कहा, रुद्र की रक्षा करना, उसके सपने पूरे करना और यह जानती थी कि उसने अपने भगवान को जो ड्‌यूटी दी है उसे वह जरूर पूरा करेगा.


निहारिका उदास थी, उसे कुछ करने का मन नहीं कर रहा था, इसलिए वह डिनर के लिए जाना नहीं चाहती थी. लेकिन पूजा उसे जबरदस्ती लेकर जाना चाहती थी. उसने एक बार मना किया, लेकिन तभी उसे लगा जैसे रुद्र ने कहा हो, तुम्हें यूं ही कमजोरी रहती है. मेरे जाने के बाद खाना मत छोड़ देना, खाती रहना. वह हमेशा उसे छेड़ा करता था, खाना खाती रहना, वरना शादी के बाद दिक्कत तुम्हें ही होगी. उसकी आवाज गूंजते ही निहारिका के होंठों पर मुस्कान आ गयी और वह खाने के लिए पूजा के साथ चली गयी.


रात को उसे नींद नहीं आ रही थी. उसे वह दिन बार-बार याद आ रहा था, जब उसने पहली बार रुद्र को देखा था. उसने मास कम्यूनिकेशन की मास्टर्स डिग्री के लिए रांची के सेंट्रल यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था. क्लास शुरू होने से एक दिन पहले वह हॉस्टल आयी थी. उसे रैगिंग का भय था, लेकिन इंट्रोडक्शन से ज्यादा कुछ हुआ नहीं. वह आम लड़कियों की तरह ज्यादा स्टाइलिश भी नहीं थी, इसलिए लड़के उसके आगे-पीछे नहीं हुए. वह आसानी से अपने कमरे तक आ गयी. कमरा उसे अच्छा मिला था. सेकेंड फ्लोर पर था.एक बेड, आलमारी और एक टेबल कुर्सी. एक खिड़की भी थी.



उसका मन हुआ खिड़की से बाहर देखने का. उसने खिड़की खोल दी. सामने कॉलेज का लॉन था. लॉंन काफी सुंदर था हरी घास की चादर सी बिछी थी और करीने से फूल लगे थे. लाल, गुलाबी, नीले,पीले हर रंग के फूल.  निहारिका का मन उस दृश्य को देखने में रम गया. लड़के-लड़कियां आ जा रहे थे. कोई घास पर बैठा था, कोई मस्ती कर रहा था. अचानक उसकी नजर एक लड़के पर गयी. वह हरी घास पर लेटा कुछ पढ़ रहा था. निहारिका को उसकी शक्ल दिखायी नहीं पड़ी, लेकिन उसकी यह अदा उसे भा गयी. उसने मन में सोचा सब मस्ती में व्यस्त है और यह पढ़ रहा है. चूंकि उसे खुद भी पढ़ने का शौक था, इसलिए उस लड़के के प्रति उसे आकर्षण सा हो गया.


लेकिन उसका चेहरा वह देख नहीं पा रही थी, क्योंकि सामने किताब थी.  हालांकि उसने देखा कि वह स्टीफंस हॉकिंग की  किताब ‘ब्रीफ हिस्ट्री अॅाफ टाइम’ पढ़ रहा है. निहारिका ने मन में सोचा-‘बाप रे फिजिक्स’. निहारिका ने इतिहास और राजनीतिशास्त्र के साथ बीए किया था. उसका विज्ञान से कोई नाता नहीं था. अचानक उसका फोन बजा और वह खिड़की से हटकर फोन उठाने आ गयी.

 फोन पर मां थी. निहारिका ने मां से पांच मिनट बात की और उन्हें हॉस्टल की सारी जानकारी दी. फोन रख वह एकबार फिर खिड़की पर आ गयी. वो लड़का अबतक पढ़ रहा था. लॉन का नजारा उसे साफ दिख रहा था. अस्त होते सूर्य की रोशनी लड़के पर पड़ रही थी, सूरज की रोशनी में लड़का अद्‌भुत दिख रहा था. निहारिका उसे खड़ी-खड़ी देख रही थी. उसकी इच्छा हो रही थी कि वह उसका चेहरा देखे, लेकिन वह दिखा नहीं. तभी अचानक वह उठा. मध्यम कद. गठीला शरीर. आकर्षक लग रहा था. अचानक निहारिका को लगा वह क्यों उस लड़के को घूर रही है, वह खिड़की से हट गयी.

उसने अपने कपड़े और किताबों को अपने कमरे में करीने से लगा दिया. वह हाथ मुंह धुलकर आराम से बेड पर बैठी ही थी कि किसी ने दरवाजे पर जोर से दस्तक दी. निहारिका ने दरवाजा खोला-सामने एक लड़की थी. उसने हाथ बढ़ाकर कहा, ‘माय सेल्फ पूजा’. बगल वाले रूम में हूं. दो दिन पहले आयी हूं और तुम? निहारिका ने उसका हाथ पकड़कर कहा-मैं निहारिका हूं आज ही आयी हूं.


पूजा – चलो डिनर का समय हो गया है. पूजा की यह आत्मीयता निहारिका को अच्छी लगी. उसे भूख लग रही थी, उसने दरवाजे को बंद किया और अपना फोन उठाकर उसके साथ चल दी. पूजा काफी स्टाइलिश थी. कैटीन के रास्ते में जितने लड़के मिले सब उसे घूर रहे थे. कइयों ने तो उसे हाय-हलो भी कहा. पूजा भी अपनी इस खूबी से वाकिफ नजर आ रही थी. इसलिए वह अपनी अदाओं में और पैनापन लाती थी और लड़के आहें भरते नजर आते.

कैंटीन पहुंचकर दोनों एक टेबल पर बैठ गयीं. निहारिका को पूजा ने ऊपर से नीचे तक घूरा फिर कहा, डार्लिंग सूट पहनना छोड़ दो. निहारिका-क्यों? मैं तो यही पहनती हूं. पूजा-हां वो तो ठीक है, लेकिन अब मत पहनो. कुछ सेक्सी कपड़े डालो बदन में ऐसे कोई घास नहीं डालेगा यहां. मुझे देखो. फिर उसकी लंबी चोटी को पकड़कर बोली, अरे इसे खोलकर रखो शायद कोई उलझ जाये, इन जुल्फों में. जरूरत नहीं मुझे, निहारिका ने कहा. जिसे मुझे पसंद करना होगा, ऐसे ही करेगा, वरना नहीं करेगा. इस बार पूजा खिसिया गयी-तो पड़ी रहो ऐसे ही कोई नहीं आने वाला तुम्हारा श्रवण कुमार. उसकी इस बात पर निहारिका हंसी…..श्रवण कुमार. अरे यहां श्रवण कुमार कहां से आया…

पूजा-अरे मेरा मतलब सीधा-साधा लड़का है मैं उसे श्रवण कुमार ही बोलती हूं. अब चलो प्लेट लेने वरना भूखी रह जाओगी कोई श्रवण कुमार नहीं आयेगा प्लेट लेकर. निहारिका और पूजा ठहाके लगाती हुईं खाना लेने चलीं गयी. खाना खाते वक्त दोनों ने काफी बातें की और जल्दी ही दोनों में अच्छी ट्‌यूनिंग हो गयी.
पूजा ने कहा, जल्दी करो. कल इंट्रोडक्शन है जल्दी उठना होगा. दोनों वहां से उठ गयीं. कमरे में आकर निहारिका जल्दी सो गयी, वह थक गयी थी.



सुबह नींद खुली तो छह बज गये थे. वह जल्दी से फ्रेश हो गयी और रेडी होने लगी. निहारिका ने अपना पसंदीदा ब्लू सूर्ट पहना. व्हाइट दुपट्टे के साथ. तभी पूजा ने दरवाजा खटखटाया और उसे बालों को संवारने का मौका भी नहीं दिया. कहा सुंदर लग रही हो जल्दी करो. निहारिका के बाल खुले थे बस एक क्लिप लगा था. जल्दी-जल्दी दोनों ने नाश्ता ठूंसा और कॉलेज आडिटोरियम में पहुंच गयीं. सीट लगभग भर चुके थे. पूजा को एक लड़के ने अपने बगल में बैठा लिया. निहारिका खड़ी थी, तभी उसे किसी ने आवाज दी, यहां बैठ जाइए. निहारिका ने पीछे देखा. एक लड़का था, वह थोड़ा सहम गयी. लड़कों से बात करने में निहारिका थोड़ी संकोची थी, इसलिए उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे. तभी उस युवक ने फिर से कहा-बैठ जाइए. उसने अपनी बगल वाली सीट उसे अॅाफर की. निहारिका सहमते हुए बैठ गयी.

इंट्रोडक्शन में सभी अपना नाम और पूर्व शिक्षा के बारे में बता रहे थे. जैसे-जैसे निहारिका का नंबर आ रहा था, वह अंदर से डर रही थी. लेकिन आखिरकार उसका नंबर आ गया. वह बोलने के लिए खड़ी हुई, तो नर्वस सी हो गयी. तभी बगल वाले लड़के ने कहा-बोलिए घबरा क्यों रहीं हैं. आप तो कॉंन्फिडेंट दिख रहीं हैं. उसने इतने अपनेपन से यह बात कही कि निहारिका को लगा जैसे इस जगह को उसका कोई अपना हो, उसने अपना इंट्रो दिया और बैठ गयी. उसके बाद उस लड़के का ही नंबर था. वह उठा और उसने बहुत ही सहज तरीके से अपना अपना इंट्रोडक्शन दिया. मैं रुद्रप्रताप. संतजेवियर्स कॉलेज रांची से हूं. मैंने फिजिक्स अॅानर्स किया है.


जिस वक्त वो बोल रहा था निहारिका उसे देख रही थी. वह बहुत ही कॉन्फिडेंट था. बैठने के बाद उसने निहारिका से कहा, तो आप इतिहास की छात्रा हैं. मेरी रुचि है इतिहास में लेकिन मैं विज्ञान पढ़ना पसंद करता हूं, मुझे कुछ नया करने में रुचि है और आपकी?
निहारिका-मैं पढ़ना चाहती हूं. मुझे प्रोफेसर बनना है साथ ही मैं साहित्य में रुचि रखती हूं. मैं लिखना पसंद करती हूं.
इस बार रुद्र ने कहा-वाह. साहित्य. अच्छी बात है.

इंट्रोडक्शन खत्म होने के बाद सभी एक-दूसरे से बात करने में व्यस्त थे. निहारिका को समझ नहीं आया कि वह क्या करे. तभी उसे ध्यान आया, क्यों ना मैं लॉन में घूम आऊं, वह उस ओर चल पड़ी. उसकी इच्छा थी कि वह भी उस हरी घास पर  जाकर लेट जाये, जहां कल वह लड़का लेटा हुआ था. वह घूमती हुई उसी जगह पर पहुंची. वह हैरान थी, क्योंकि उस हरी घास पर अब भी कोई बैठा पढ़ रहा था. निहारिका के मन में सवाल उठे, क्या यह वही लड़का है? लेकिन कल तो यह लेटा हुआ था आज तो बैठा है. कैसे पता चलेगा यह वही है या नहीं? यह सोचते हुए वह आगे बढ़ रही थी. तभी किसी ने पीछे से आवाज दी-रुद्र तू फिर यहां आकर बैठ गया. अबे चल ना थोड़ा खाते हैं. निहारिका ने सुना रुद्र… क्या यह वही है जो इंट्रोडक्शन के वक्त मेरे साथ था. जिज्ञासावश निहारिका ने उसकी ओर गौर से देखा, वह पलटा, बोला तुम चलो मैं आता हूं. उसके दोस्त ने कहा, हां तो जल्दी करना.



निहारिका ने देखा, यह तो वही है रुद्रप्रताप. अच्छा तो यही है वह. निहारिका कुछ समझ पाती इससे पहले उसने कहा-अरे आप? यहां मैं समझा आप ग्रुप में बिजी होंगी. निहारिका मुस्कुराई नहीं मेरे कमरे से यह जगह दिखायी देती है. बहुत सुंदर है, तो सोचा एकबार देख आती हूं.
रुद्र-हां जगह तो सुंदर है. सुकून भी देती है. मैं तो एक सप्ताह से यहां हूं. निहारिका ने पूछा-कहां के रहने वाले हैं आप?
रुद्र- मैं बोकारो जिले से हूं, जारंगडीह मेरे गांव का नाम है. आप तो रांची से ही हैं ना?
निहारिका-जी.
रुद्र-बैठिए. निहारिका उसकी बगल में बैठ गयी. फिर दोनों ने बहुत सारी बातें की. निहारिका ने महसूस किया वह बहुत समझदार था. अपनी बातों को प्रभावशाली तरीके से रखता था. एक अच्छे वक्ता के गुण थे उसमें. दोनों काफी देर तक बात करते रहे. अचानक निहारिका को ध्यान आया शाम हो गयी है घर फोन करना है. उसने रुद्र से कहा-मैं कमरे में जाऊंगी.
रुद्र- हां जाइए. कल आयेंगी क्या? आपसे बात करके सुकून महसूस हुआ. हम बात करते हुए दूर तक जायेंगे. निहारिका मुस्कुराई. हां आऊंगी. लेकिन सहसा उसके मुंह से निकल गया. इरादा क्या है?
रुद्र- क्या होगा. आप साथ होंगी, तो थोड़ी बात होगी? दोस्ती का इरादा है और क्या?


निहारिका ने हां में सिर हिलाया और वहां से चली गयी. उसे ऐसा महसूस हुआ, जैसे रुद्र की निगाहें उसे घूर रहीं हों. लेकिन उसने पलटकर नहीं देखा. कमरे में आकर निहारिका ने अपने घर फोन किया. सारी बातें बतायीं. पता नहीं क्यों वह बहुत खुश थी. उसे ऐसा लग रहा था, जैसे कोई मन की चाह पूरी हो गयी हो. अगले दिन क्लास खत्म करके जैसे ही वह निकली उसे रुद्र का ध्यान आया. क्या करूं जाऊं या ना जाऊं? क्या सोचेगा वो? मेरे प्रति कैसी धारणा बनायेगा? यह सोचते-सोचते वह लॉन की तरह चल दी. काफी भीड़ थी  वहां. उसे रुद्र दिखा नहीं. उसे कुछ निराशा हुई. उसने सोचा क्या करूं, वापस चली जाऊं? फिर उसका जी चाहा थोड़ा बैठती हूं, शायद वो आ जाये. ऐसा सोचकर वह हरी घास पर बैठ गयी और एक किताब पढ़ने लगी. कुछ देर में रुद्र की आवाज आयी, आ गयीं आप? निहारिका का जी धक से कर गया. वह घबरा गयी. और खड़ी हो गयी.  अरे बैठिए… आप उठ क्यों गयीं.
निहारिका-नहीं वो मैं…


रुद्र -क्या वो. हम दोस्त हैं इतनी हिचक क्यों? रुद्र ने माहौल को काफी हल्का और अपनेपन से परिपूर्ण बना दिया और निहारिका कब उस अपनेपन में समाती गयी उसे पता नहीं चला. अबतो यह रोज की बात थी. दोनों क्लास के बात मिलते. खूब बातें करते. रुद्र अपने सपनों के बारे में कहता और निहारिका अपने. दोनों एक दूसरे को सुझाव भी देते. रुद्र को विज्ञान के क्षेत्र में अपना नाम स्थापित करना था, तो निहारिका को प्रोफेसर बनकर घर की जिम्मेदारी उठानी थी. दोनों के स्वभाव में काफी समानता थी और जहां नहीं थी, कोई विवाद भी नहीं था. क्योंकि दोनों परिपक्व थे. एक दूसरे को समझते थे. पता नहीं कब दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ गये. एक दिन बात करते हुए दोनों काफी देर तक वहां बैठे रह गये.
निहारिका ने कहा- मैं अब जाऊंगी रुद्र बहुत देर हो गयी है.
रुद्र ने कहा-अच्छा जायेंगी, लेकिन मैं अभी कुछ सोच रहा था. निहारिका ने हंसकर पूछा क्या? मैं यह सोच रहा था कि तुम साड़ी पहनकर मेरे सामने आयी हो और मैंने तुम्हें बांहों में भरकर एक जोरदार चुंबन तुम्हारे होंठों पर जड़ दिया है.


निहारिका- रुद्र क्या कह रहे हैं आप? वह बिलकुल घबरा गयी.
रुद्र ने आगे कहा-हम दोनों एक दूसरे में बिलकुल खो गये हैं और….
निहारिका -रुद्र जान लोगे क्या तुम मेरी. रुद्र उसके करीब आया और कहा अब हम इतने पास आ गये हैं कि आप का संबोधन जरूरी नहीं. क्या मैं यह दीवार हमदोनों के बीच से गिरा दूं. निहारिका को लगा जैसे उसके पूरे शरीर में सिहरन सी हो गयी है. उसकी सांसें तेज चल रही थी. उसने रुद्र की ओर देखा. रुद्र की नजरें उससे टकराई तो उसे लगा मानों कोई तीर छूटा उसकी नजरों से और धक से आकर उसे सीने में लगा हो. एक पल को लगा जैसे सांस रूक गयी.

पूरे शरीर में कंपकंपी सी हो गयी. उसके होंठ सूख रहे थे. तभी रुद्र ने उसे बांहों में ले लिया. अब तो निहारिका बेसुध सी हो गयी. उसने रुद्र से कहा, चुप हो जाओ. मर जाऊंगी मैं. रुद्र की पकड़ और मजबूत हुई और उसने निहारिका को चूम लिया. अब निहारिका खुद को रोक ना सकी और रुद्र की बांहों में सिमटती चली गयी. कब दोनों एक दूसरे के इतने पास आये कि कोई दूरी नहीं बची वे समझ नहीं पाये. अंधेरा घिर रहा था. तभी निहारिका के फोन की घंटी बजी. निहारिका घबराकर रुद्र के बांहों से निकली. मां का फोन था. उसने मां से बात की . तब तक रुद्र वहीं खड़ा था. फोन रखकर निहारिका ने कहा-बहुत देर हो गयी है, मैं जाती हूं.
रुद्र ने कहा- जाओगी?
निहारिका-हां जाना ही पड़ेगा.
रुद्र-कल जल्दी आना देर मत करना. निहारिका को पता नहीं क्या हुआ, वह रुद्र के करीब आयी और उसके माथे पर एक चुंबन देकर बोली. आती हूं… रुद्र ने मुस्कुरा कर कहा जल्दी आना….

रुद्र के अहसास को याद करते ही निहारिका सिहर उठी. उसकी तंद्रा भंग हुई. फिर उसने खुद से वादा किया. मैं अपने सपनों को पूरा करूंगी अपने रुद्र के लिए. वह दिन कितना हसीन होगा, जब वे दोनों मिलेंगे अपने-अपने सपनों को पूरा करके. वो यूनिर्वसिटी प्रोफेसर और रुद्र उसे तो साइंटिस्ट बनना है.

आज पूरे पांच साल हो गये हैं. निहारिका और रुद्र को मिल हुए. दोनों ने अपने सपने पूरे और आज आया है मिलन का दिन. रुद्र ने निहारिका के लिए प्लेन का टिकट भेजा है. उसे बैंगलोर जाना है. दोनों ने यह तय किया था कि जब तक सपना पूरा नहीं होगा दोनों नहीं मिलेंगे. ऐसा कोई दिन नहीं गया जब दोनों ने बात नहीं की. दोनों ने प्रेम की बातें भी कीं, तड़पे भी, लेकिन वादा निभाया. रुद्र ने पूरे पांच साल बाद उसे मिलने बुलाया है और यह भी कहा है कि बहुत जरूरी बात करनी है, तो निहारिका को लगा जैसे मिलन की घड़ी आ गयी है.


छुट्टी लेकर निहारिका ने घर में यह कहा कि लेक्चर के लिए बाहर जाना है और बंगलौर के लिए चल पड़ी. बंगलौर ज्यों-ज्यों नजदीक आ रहा था उसकी धड़कन बढ़ रही थी. सांसें तेज और चेहरे पर खुशी की दमक. चूंकि रुद्र को ब्राइट कलर पसंद था इसलिए निहारिका ने खुद को वैसे ही संवारा था. उसके दुपट्टे का हरा रंग चारों ओर खुशियाली का प्रतीक मालूम हो रहा था. एयरपोर्ट पर जब रुद्र ने उसे बांहों में यह कहते हुए लिया कि आ गयी तुम मेरी जान-तो एक पल को उसे लगा जैसे उसकी सांस थम गयी. फिर लगा जो जुदाई उसे रेलवे प्लेटफॉर्म पर मिली थी, आज उसका अंत हो गया और उसकी आंखें भर गयी.
रुद्र ने कहा- अब ये क्या है? आंसू पोंछते हुए निहारिका ने कहा-कुछ नहीं यूं ही.


रुद्र उसे लेकर अपने फ्लैट आया. उसका फ्लैट पांचवीं मंजिल पर था. वे दोनों लिफ्ट से ऊपर गये. रुद्र ने फ्लैट का दरवाजा खोला. बहुत ही सुंदर था फ्लैट. निहारिका ने खुश होकर कहा, बहुत सुंदर सजाया तुमने कमरा, यह बोलते हुए वह उसके बेडरूम तक चली गयी. एक आकर्षक कमरा बड़ा सा बेड उसने खुश होकर कहा-वाह. मैं तो खुश हो गयी. रुद्र ने उसे पकड़कर अपनी ओर खींच. एक पल को निहारिका का पूरा शरीर कांप गया, लेकिन उसने रुद्र को मना नहीं किया.



 उसने निहारिका के होंठों को धीरे से छूआ और कहा, कैसे रही इतने दिन मेरे बिना. निहारिका को लगा जैसे अब उसका प्रेम संपूर्ण हो जायेगा. उसने मुस्कुरा कर कहा, एक बार भी तुम्हें याद नहीं किया. ऐसा कहकर उसने रुद्र के शर्ट के एक बटन को खोल दिया.
इसपर रुद्र ने कहा-एक से तो बात नहीं बनेगी और वह उसे बिस्तर तक ले आया. तड़प तो दोनों ही रहे थे, सो एक दूसरे का साथ उन्हें काफी सुकून दे रहा था. रुद्र निहारिका के साथ बहुत खुश था, तो वहीं निहारिका को अपने प्रेम की संपूर्णता पर गर्व था. निहारिका ने उसके सीने पर अपना सिर रख दिया और उसे जकड़ते हुए कहा-अब कहो, क्या जरूरी बात कहनी थी तुम्हें.
रुद्र -मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं. तुम मेरी शारीरिक मानसिक सुकून का स्रोत हो, तुम्हारे बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकता. लेकिन मैं तुम्हें अपनी पत्नी नहीं बना सकता. मां-पापा चाहते हैं मैं उनकी पसंद से शादी करूं. मेरी सफलता मेरा पूरा जीवन उनकी देन है अब तुम बताओ मैं क्या करूं.

निहारिका की आंखें भर आयीं, लेकिन उसने अपने आंसुओं को थामा और रुद्र से पूछा-तुम मुझे प्यार करते हो ना? अभी हमारे बीच जो कुछ हुआ, वो क्यों हुआ?
रुद्र-क्योंकि मैं तुम्हें अपनी पत्नी मानता हूं, तुम्हें प्यार करता हूं. तो फिर मुझे और किसी चीज की जरूरत नहीं. बस तुम एक वादा कर दो मुझसे.
रुद्र- क्या?
तुम साल में एक बार मुझसे मिलने आओगे और तब सिर्फ हम-तुम होंगे और कोई नहीं. और किसी सार्वजनिक पहचान की जरूरत नहीं मुझे मैं तुम्हारे साथ ऐसे ही अपना जीवन बिता सकती हूं. तुम्हें जिससे शादी करनी हो, करो मुझे कोई आपत्ति नहीं. यह कहकर वह रुद्र से लिपट गयी और दोनों की आंखें भर आयीं. यह रुद्र-निहारिका का बेनाम रिश्ता था जो किसी सार्वजनिक पहचान का मोहताज नहीं था.

मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है

इला जोशी 


बेंगलुरु की शर्मनाक घटना के विडियो आये अभी कुछ घंटे ही बीते होंगे कि दिल्ली के मुखर्जीनगर में भी वैसा ही कुछ दोहराया गया और बेंगलुरु से ही आई एक सीसीटीवी फुटेज में देर रात स्कूटर पर सवार दो लड़के एक लड़की को मोलेस्ट करते नज़र आते हैं| इसी बीच यूट्यूब समेत सोशल साइट्स पर एक वीडियो वायरल होता है, जिसमें एक लड़का सार्वजनिक स्थानों पर लड़कियों को ज़बरदस्ती चूम कर भागता दिखाई देता है और इस पूरे प्रकरण को एक “मज़ाक” के नाम पर वो और उसका क्रू फ़िल्माता और साझा करता है| ये सब ऐसे वक्त होता है, जब नए साल के पहले हफ़्ते में अधिकतर लोग ये तय कर रहे होते हैं कि आने वाले साल में उनके जीवन की दिशा और दशा क्या होगी|



ऐसा नहीं है कि इस तरह के घटनाक्रम देश में पहली बार हो रहे हैं, या ये उपर्लिखित हादसों की तरह सिर्फ़ बड़े शहरों तक सीमित रह जाते हैं, दरअसल ये इस देश के हर शहर, हर कस्बे और हर गाँव की जीवनशैली का वो हिस्सा हैं; जो मौजूद सब जगह है लेकिन इस देश की आधी आबादी को उसकी मौजूदगी स्वीकारने में बहुत दिक्कत है| और जैसे ही इन घटनाओं के विरोध में औरतें आवाज़ उठाने लगती हैं, #NotAllMen जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगते हैं| ऐसे में मवाद भरी वो मानसिकता एक खुले ज़ख्म सी सामने आ जाती है, जो अभी तक प्रगतिशीलता और मानसिक खुलेपन जैसी कई परतों के नीचे ढकी हुई थी| लगभग हर साल मीडिया में ऐसी कई बड़ी ख़बरें आती हैं, तब हम अचानक से जागरूक हो जाते हैं। जबकि हम निजी जीवन में वैसे ही लिजलिजे, बिना रीढ़ की हड्डी के रहते हैं और इन बड़ी घटनाओं की प्रक्रिया की शुरूआती प्रक्रिया को नज़रंदाज़ करते हैं।


#NotAllMen जैसे हैशटैग ट्रेंड करवाने वाले ये कौन लोग हैं, जो औरतों/लड़कियों पर बढ़ती यौन हिंसा की घटनाओं के बीच पुरुषों के बचाव के स्वर बुलंद कर रहे हैं? आख़िर किस से बचा रहे हैं ये ख़ुद को? उन औरतों/लड़कियों से जिन पर यौन हमले होते हैं? या उन औरतों से जो इन हमलों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही हैं? 2014 में जब देश के 31 प्रतिशत वोटरों ने मौजूदा सरकार को चुना तो ज़्यादातर लोगों का तर्क था कि ये बहुमत की सरकार है, उस हिसाब से जब ज़्यादातर पुरुष महिला विरोधी होते हैं तो ये हैशटैग चला कर क्या साबित करना चाहते हैं?

इस बीच बहुत से सुझाव देने वाले भी आगे आ रहे हैं जिनके हिसाब से औरतों को अब सेल्फ़ डिफेंस सीखना चाहिए ताकि वो ऐसे मुश्किल भरे पलों में आत्मरक्षा कर सकें| इसी के साथ दिल्ली से ख़बर आती है कि लाइटर और माचिस को दिल्ली मेट्रो की निषिद्ध सूची से हटा दिया गया है और औरतें अब साथ में एक चाक़ू लेकर चल सकती हैं| इन सब सुझावों और ताज़ा घटनाक्रम से एक बात तो साफ़ है कि औरतें इस देश में सुरक्षित नहीं हैं और मुझे ये बताने की कोई ज़रूरत नहीं है कि किनसे| क्या अब भी उस हैशटैग को चलाने वाले कहेंगे कि नहीं सारे पुरुष नहीं बस कुछ ऐसे होते हैं, मतलब ये समाज और सरकार उन कुछ लोगों के सामने इतनी निरीह हैं कि उन्हें औरतों को ख़ुद को बचा सकने के तरह तरह के तरीके सोचने पड़ रहे हैं|



सेल्फ़ डिफेंस के इन हिमायतियों से मेरा एक सवाल है कि मास मोलेस्टेशन और गैंग रेप जैसे हादसों में आपका ये सुझाव किस तरह से कारगर है, या आप ये चाहते हैं कि औरतें/लड़कियां इसे अपनी किस्मत मान कर चुप बैठ जाएं? आंकड़ों की मानें तो 80 फ़ीसदी से ज़्यादा हादसों में अपराधी उस औरत/लड़की के जानने वाले होते हैं, उस हिसाब से देखें तो जिस घर को इन औरतों/लड़कियों के लिए सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता है वही उनके लिए सबसे असुरक्षित है| अमेरिका के एक ग़ैर लाभार्थी संगठन The Rape, Abuse & Incest National Network (RAINN)  के अनुसार वहां हुए सिर्फ़ 46 फ़ीसदी रेप केस दर्ज़ किए जाते हैं, इससे आप उस मानसिकता को समझिए जिसके दबाव की वजह से ये केस दर्ज़ नहीं किए जाते | दो साल पहले प्रजा फाउंडेशन के जुटाए आंकड़ों से सामने आया कि 2011 से 2015 के बीच रेप के मामलों में 390 फ़ीसदी और मोलेस्टेशन के मामलों में 347 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ और ज़्यादातर संगठनों के साथ साथ सरकार का भी ये मानना है कि अधिकतर केस रिपोर्ट ही नहीं होते हैं, तो आप बस अंदाज़ा लगाइए कि असल आंकड़े कितने डरावने होंगे|


लेकिन कहते हैं न कि आप एक तर्क देंगे तो सौ कुतर्क सुनने को तैयार रहें, उसी कड़ी में कुछ लोगों का ये कहना होता है कि जब लड़कियां सामने ही नहीं आती हैं तो कार्रवाई कैसे और किस पर हो| यहाँ मैं जुलाई 2012 में सीतापुर में घटे उस हादसे का ज़िक्र करना चाहूंगी जिसमें एक मामले की जांच कर रहे दरोगा और निगरानी करने वाला चौकीदार ही उस लड़की का बारी बारी से रेप करते रहे| ऐसे में आखिर शहरी इलाके तो जाने दीजिए, ग्रामीण या कस्बाई भारत में कोई महिला केस भी दर्ज कराने कैसे जाए? आंकड़े उठा कर जांचिए, पुलिस से लेकर अदालत तक स्त्री-पुरुष अनुपात क्या है?
मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है
क्या मेरे हक़ में फ़ैसला होगा

अगर किसी का ये मानना है कि पुलिस की ये प्रवृति सिर्फ़ गाँव-कस्बे तक सीमित हैं तो उनको बता दूं कि 2015 में दिल्ली के कनॉट प्लेस जैसे एक भीड़भाड़ वाले इलाके में भरी दोपहर एक सड़क चलती लड़की को ज़बरदस्ती चूमने वाली घटना को दर्ज़ कराने गई उस लड़की का पुलिस द्वारा भी उत्पीड़न किया गया| पुलिस ने उससे उसकी कंप्लेंट सिर्फ़ इसलिए दो बार लिखवाई क्यूंकि उनके हिसाब से उसकी कंप्लेंट “साफ़” नहीं थी क्यूंकि वो पुलिस अधिकारी मानता था कि ज़बरदस्ती चूमना किसी तरह का मोलेस्टेशन नहीं| दरअसल हमारे समाज में पुरुषवाद से जातिवाद, जातिवाद से साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिकता से भ्रष्टाचार तक का संस्थानीकरण हो चुका है।

इन परिस्थितियों में भी इस तरह के एक हैशटैग का ट्रेंड करना चोर की दाढ़ी में तिनका ही है, इस प्रकार के हैशटैग या मानस के समर्थकों में पहली श्रेणी उन लोगों की है जो ऐसे हैशटैग चला कर एक मुद्दे को अपने केंद्र से भटकाने की साज़िश रचते हैं| ये लोग अपने निजी जीवन में भयानक रूप से महिला-विरोधी मानसिकता से ग्रस्त होते हैं और इनकी गालियों से लेकर इनके द्वारा साझा की गई सामग्री, रिश्तों में इनके बर्ताव सबके केंद्र में औरतों के प्रति हिंसा और नीचता साफ़ दिखती है| दूसरी श्रेणी वाले इनके कुछ साथी वो हैं, जो शायद हिंसक नहीं लेकिन कंडीशनिंग के असर से पितृसत्ता इनके अन्दर इस कदर बैठी हुई है कि औरतों का आवाज़ उठाना इन्हें अपने आधिपत्य पर चुनौती सा लगता है और ये बचाव की मुद्रा से शुरू होकर अचानक आक्रमक मुद्रा में आ जाते हैं| औरतों के उठाए हुए सवाल इन्हें इनकी ईमानदारी पर निजी सवाल लगते हैं और अंततः ये पहली श्रेणी वालों के साथ जाकर खड़े हो जाते हैं| इनका साथ देने वाली कुछ औरतें भी होती हैं, जिन्हें अपने अधिकारों के बारे में कोई जानकारी नहीं और जागरूकता के अभाव में ये उसी पुरुषवादी सोच के साथ जाकर खड़ी हो जाती हैं जो कभी इन्हें जागरूक होने भी नहीं देना चाहती|

दरअसल ये दिक्कत किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष की न होकर एक पूरी मानसिकता और कंडीशनिंग की है जो हमें हमारे परिवार, समाज, धर्म और जाति से मिलती है| जब हम कहते हैं कि हमारी लड़ाई पुरुषवाद से है तो हम पुरुषों के ख़िलाफ़ नहीं उस मानसिकता, उस कंडीशनिंग के ख़िलाफ़ लड़ रहे होते हैं, जिसने उसे जन्म दिया| धर्म में अखंड आस्था रखने वालों को क्यूँ उन धार्मिक किताबों में लिखे औरतों पर हुए अत्याचार दिखाई नहीं देते? क्यों औरतों को पूजनीय कहकर उन्हीं के साथ मानसिक और शारीरिक हिंसा की जाती है? घर से लेकर दफ़्तर, सार्वजनिक स्थानों, मंच और लगभग सभी जगह कैसे लैंगिक इस कदर हावी हो गया कि हमें पता भी नहीं चलता और हम औरतों पर बेहूदी टिप्पणियां, चुटकुले, गालियां कहते, सुनते और नज़रंदाज़ करते जाते हैं?


जिन लोगों को औरतों का आवाज़ उठाना बेहद ख़ल रहा है वो बताएं कि घर से लेकर बाहर औरतें कहीं सुरक्षित नहीं तो ये किनकी वजह से है? किनसे उनकी सुरक्षा को ख़तरा है? क्यों साल दर साल रेप और मोलेस्टेशन की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं? क्यूं सिर्फ़ औरतों को सेल्फ़ डिफेंस सीखने की ज़रूरत है? क्यूँ पुरुषों में इस मसले को लेकर स्वीकारोक्ति नहीं है कि उन्हीं के बीच रहने वाले उनके पुरुष साथी ही औरतों की सुरक्षा के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है?

मैं नहीं जानती कि आप में से कितने लोग इमानदारी से ख़ुद से ये सवाल करेंगे और उनके जवाब खोजेंगे, अभी तो मुझे ये सोचना पड़ रहा है कि मैंने ये लिखा क्यूँ?
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती,
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

इला जोशी मूलतः उत्तराखंड से हैं, स्कूली पढ़ाई
अंबाला से
, एमबीए की डिग्री दिल्ली से ली और नौकरी मुंबई खींचकर ले गई। एक
प्रिंटिंग हाउस के अंतरराष्ट्रीय सेल्स विभाग में कार्यरत। संपर्क:
mailjoshiila@gmail.com

वक्रता का वाग्वैदग्ध्य : नागार्जुन की स्त्री केन्द्रित कवितायें

कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

नागार्जुन जन-मन के चितेरे कवि रहे हैं.सादगी, सरलता और खुलापन बाबा के व्यक्तित्व की मूलभूत विशेषताएँ थी। जीवन के कठोर संघर्षों में तपकर उनका व्यक्तित्व कुंदन की भाँति निखरा था। दुख किसी को माँजता हो या न माँजता हो, नागार्जुन के व्यक्तित्व को उसने पूरी तरह माँजकर चमकाया था। निजी जीवन में परिवार के भार को उन्होंने कभी उठाया नहीं था, बल्कि हमेशा एक आत्मसम्मान और स्वाभिमानी रचनाकार ही बने रहे। उनका परिवार उनके अपने औरस पुत्र-पुत्रियों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन मानव पुत्रों तक विस्तृत था, जिन्हें उन्होंने अपनी कृतियों में जन्म दिया था। हजारों पुत्र-पुत्रियों तथा परिवारों के मुखिया बाबा जीवन पर्यन्त सबसे जुड़े रहे तथा सभी पर अपना नेह-छोह बरसाते रहे। सरलता, सादगी और सौम्यता के साथ-साथ बाबा के व्यक्तित्व में वज्र- दृढ़ता भी थी, अन्यथा जीवन की कठोर वास्तविकताओं से टकराकर वह कब का चूर-चूर हो चुके होते। मेधावी, प्रत्युत्पन्नमति और सहज स्फूर्त प्रतिभा के धनी, बाबा की प्रत्येक बात उनकी अद्भुत पैनी बुद्धि का प्रमाण देती है।

नागार्जुन ने कई तरह के प्रयोग किए है। लोकछंदों की तर्ज पर कविताएँ लिखने के अलावा, मुक्तछंद तथा ग्रामीणों द्वारा प्रयुक्त ‘बुझौवल’ (बूझो तो जाने) शैली की कविताएँ लिखी हैं। गांवों में ओझा जिस शैली का उपचार करते और भूत उतारते हैं उसे शैली का एक अप्रतिम उदाहरण उनकी ‘मंत्र’ कविता है। ‘अकाल और उसके बाद’, ‘बाकी बच गया अंडा’, जैसी लघु, सूत्रवत् कविताओं से लेकर ‘बादल को घिरते देखा है’, ‘हरिजन-गाथा’, ‘अच्छा किया, उठ गए हो दुष्ट’ जैसी लंबी कविताएँ उन्होंने लिखी। छोटी रेखाचित्र-जैसी अर्थ गंभीर कविताओं के साथ दीर्घ वितानवाली स्फीत कविताएँ भी लिखी हैं। साधारण जन से लेकर बौद्धिक जनों को परिष्कृत रूचि तक की व्याप्ति वाली रचनाएँ नागार्जुन की काव्य-समृद्धि की द्योतक है। परम्परा से अर्जित भावबोध और काव्यबोध के साथ-साथ आधुनिकतम आशयों तक को स्पर्श करती है नागार्जुन की रचनाएँ।

नागार्जुन ने कई भाषाओं में कविताएँ रचीं, मैथिली (जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला), हिन्दी, संस्कृत और बांग्ला में उन्होंने उत्कृष्ट रचनाएँ लिखी। एक बातचीत में विश्वनाथ त्रिपाठी ने नागार्जुन की पंजाबी रचनाओं का भी जिक्र किया। नागार्जुन कई साल पंजाब में साहित्यिक पत्रकारिता करते रहे। कोई आश्चर्य नहीं कि उन्होंने कुछ पंजाबी कविताएँ भी लिखी हो। हो सकता है किन्हीं अन्य भाषाओं में उनके द्वारा रची कुछ रचनाएँ भविष्य में मिले। राहुल सांकृत्यायन के बाद वैसी बहुमुखी प्रतिभावाला अगर कोई रचनाकार है तो वह नागार्जुन ही है। उनकी स्त्री विषयक कविताओं की कहीं कोई कमी नहीं है. बाबा सौन्दर्य और प्रेम के जितने अद्भुत कवि हैं उतने बड़े रसिक भी.उनकी कविता की रूढ़ि वक्रता देखिये.

कविता स्वयं में एक सुन्दर वस्तु है। वस्तुतः कविता कवि की जीवनदृष्टि और उसके समग्र जीवनानुभव का एक अद्भुत संसार निर्मित करती है। कविता के संसार में सौन्दर्य की खोज वैसे ही है जैसे फूलों के भीतर खुशबू, हवा-पानी और कांटे भी साथ रहते है। कविता में सौन्दर्य कभी अकेले नहीं मिलता। कभी-कभी तो कविता बीहड़ इलाकों में ले जाती है यहाँ जीवन में कोमल-कठोर, नर्मी और रूखापन एक साथ मिलते है। काव्यलोक का ऐसा ही एक बीहड़ क्षेत्र रचते हैं कवि नागार्जुन। इस बीहड़ की विशेषता भी है नागार्जुन के यहाँ। वह यह कि ये इलाके कभी निर्जन नहीं होते। इनमें कलियों के चिटकने से लेकर पत्तियों के झरने तक की आवाजें है। हर्ष, करूणा, क्रोध, आवेग सब कुछ है अपनी गूँज छोड़ता हुआ। नागार्जुन की कविताओं से गुजरते हुए यह विश्वास होता है कि सौन्दर्य केवल वहीं नहीं है जो ऊपर से सुन्दर दिख रहा होता है। वे तो ऐसी जगहों में सुन्दरता को ढूँढ़ लेते हैं जहाँ कलाप्रेमियों की दृष्टि थमती भी नही। उनकी कविता की वक्रताएं सहजा और आहार्या दोनों रूपों में प्राप्त होती हैं.
आजादी मिलने से कुछ ही पहले, रामकथा के एक मार्मिक प्रसंग को आधार बनाकर नागार्जुन ने ‘पाषाणी’ कविता लिखी थी। सुरपति इंद्र गौतम ऋषि का रूप धारण करके अहल्या से जो छल करते हैं, उस पर कुपित होकर गौतम अपनी पत्नी को वेश्या से भी निकृष्ट बताते हैं और पत्थर बन जाने का शाप दे देते हैं। राम ‘पाषाणी’ का उद्धार करते हैं, उसे निष्कलुष-निष्पाप ही नहीं कहते, मॉं कहकर ‘घुटने टेक प्रणाम’ भी करते हैं।

अहल्या आशीष देते हुए कहती हैं
वत्स, राजकुल में पाया है जन्म /
कभी बनोगे तुम्हीं कोसलाधीश
फिर चरणों पर नाना दिग्देशीय
अर्पित होगे शत-शत सुंदर फूल /
(अनाघ्रात अस्पृश्य सहज कमनीय) !
अंतःपुर में षोडशियों के मध्य /
बिता सकोगे तुम भी तब दिन-रात
शरद शिशिर मधु ग्रीष्म और बरसात
नहीं अहल्या आयेगी फिर याद ! 1


अपना उद्धार करने वाले राम के प्रति भी अहल्या शंकाशील है, वह राम के आगे जो आशंका रखती है, वह सामंती सभ्यता पर प्रताड़ित नारी का सबसे बड़ा व्यंग्य है। उसका अविश्वास नागार्जुन के आलोचनात्मक विवेक का प्रतिबिंब है। राम अहल्या के दोनों पैर छूकर प्रतिज्ञाबद्ध होते हैं.

इसी तरह जो ‘जगततारिणी प्रकट हुई है नेहरू के परिवार में’, वह नागार्जुन के रुढ़ि का सर्वाधिक शिकार बनी है। उसने ढहते हुए कांग्रेसी शासन को नया जीवन दिया है। इस ‘जगतारिणी’ के छल-बल-कौशल से हाल यह हो गया कि कविता में देवी की रूढ़ि का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि –
संविधान की रूई रूपहली भद्रलोक धुनते हैं
देवि, तुम्हारे स्टेनगनों से तरूण-मुंड भुनते हैं2

डायन के गुर सीखकर आंत चबाने वाली इस ‘जगततारिणी’ के फरेब पर नागार्जुन कहते हैं-
मंहगाई की सूपनखा कौ कैसे पाल रही हो.
सत्ता का गोबर जनता के मत्थे डाल रही हो …………
पग-पग तुम लगा रही हो परिवर्तन के नारे
जन-युग की सतरंगी छलना, तुम जीतीं, हम हारे………..3.

यह देवी कंकालों से अपने नव-सामंतों और महाजनों की रखवाली करने में ऐसी व्यस्त है कि कवि रुढ़ि के आधार पर आगाह करता है-नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता है ‘बसंत की अगवानी’। प्रकृति पर हर तरफ बसंत का उल्लास छा गया है, दूर अमराई में कोयल बोलती है, वृद्ध वनस्पतियों की टूटी शाखाओं में पोर-पोर, टहनी-टहनी दहकने लगती है, अलसी के नीले फूलों पर आकाश मुस्काता है, पिचके गालों पर भी कुंकुम न्योछावर हो जाता है। रंगों के इस उल्लास में जब सारा संसार वसंत की अगवानी करने के लिए बाहर निकलता है, तो ठौर-ठौर पर सरस्वती माँ खड़ी दिखायी देती हैं। वे प्रज्ञा की देवी हैं। वे सहज उदार हैं। वे अपने अभिवादन में झुके आस्तिक-नास्तिक सभी को संबोधित करती हैं-
‘‘बेटे, लक्ष्मी का अपमान न करना/जैसी मैं हूँ, वैसी वह भी माँ है तेरी
धूर्तों ने झगड़े की बातें फैलायी हैं /हम दोनों ही मिल-जुलकर संसार चलातीं
बुद्धि और वैभव दोनों यदि साथ रहेंगे.जनजीवन का यान तभी आगे निकलेगा।’’

स्पष्ट है कि आज लक्ष्मी और सरस्वती में संतुलन नहीं है, धूर्तों ने उनमें झगड़े की बात फैला रखी है। प्रज्ञा की देवी अपनी प्रिय संतानों को यह ज्ञान देती है कि बुद्धि और वैभव का अलगाव मिटाकर, दोनों को जोड़कर ही जनजीवन की प्रगति संभव है। ऐसा तभी होगा जब धूर्तों की चाल नाकाम कर दी जायेगी। व्यक्ति नागार्जुन के सम्मुख सामाजिक हितों और विचारों के निमित्त है। उन्हें लक्ष्य करके वे सामाजिक या राजनीतिक परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हैं।
आओ रानी हम ढोएंगे पालकी / यही हुई है राय जवाहरलाल की
नागार्जुन व्यक्तिगत रूप से नेहरू की निंदा नहीं करते। रानी एलिजा़बेथ के स्वागत में खड़े भारतीय शासक वर्ग की समझौतावादी नीति को आक्रमण का लक्ष्य बनाते हैं। ‘रानी’ और ‘जवाहरलाल’ ब्रिटेन और भारत की राजसत्ता के प्रधान हैं। भारत स्वतंत्र हो गया है, लेकिन अभी भी ब्रिटेन की महारानी की ‘पालकी’ का बोझ भारतीय जनता के कंधे पर आयेगा। भारतीय जनता की कीमत पर साम्राज्यवाद का पोषण स्वतंत्रता के बाद भी नही रूका, बल्कि भारत के पूंजीवादी नेताओं ने खुद को ब्रिटिश साम्राज्य से सबंद्ध रखा। उनका सौन्दर्यबोध इस तरह से प्रकट होता है :
बहुत दिनों के बाद / अब की मैं जी भर सुन पाया
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान / बहुत दिनों के बाद 4


अपने अनुभव ज्ञान से सम्पन्न होकर उन्होंने ‘भिक्षुणी’ की कल्पना की है। वह मजबूरियों के कारण बचपन में ही बुद्ध की शरण में आ गयी। युवावस्था के साथ उसकी नारी-सुलभ आकांक्षायें जागने लगी। वह बुद्ध के प्रति आकृष्ट होती है। हीन यान-महायान समझ चुकने के बाद अब वह मानव-संबंधों का सहजयान जानना चाहती है-स्वभावतः बुद्ध के प्रति उसके आकर्षण का कारण है मातृत्व की भूख। यह उसकी मानवीय आकांक्षा है। संघों के नियम इस मानवीय आकांक्षा पर पाबंदियां लगाते हैं।
भगवान अमिताभ, सहचर मैं चाहती/ चाहती अवलंब, चाहती सहारा
देकर तिलांजलि मिथ्या संकोच को /
हृदय की बात लो, कहती हूँ आज मैं-
कोई एक होता / कि जिसको /अपना मैं समझती……….
भूख मातृत्व की मेरी मिटा देता; /
स्त्रीत्व का सुफल पाकर अनायास / धन्य मैं होती 5
नागार्जुन ने इन पाबंदियों के मुकाबले में मनुष्य की सहज अभिलाषाओं को रख दिया है और इसके लिए बुद्ध के जीवन में एक कल्पित स्थिति को माध्यम बनाया है। धर्म के प्रति, कम-से-कम बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धावान व्यक्ति धार्मिक विधान और मानवीय आकांक्षा की टक्कर दिखाकर संघबद्ध धर्म की निरर्थकता कभी उजागर न करता।नागार्जुन की यह कविता जिसकी मूल संवेदना प्रकृति में है लेकिन वास्तव में वहीं तक सीमित नहीं है। इसमें अन्य कई संवेदनायें आकर जुड़ती है और इस तरह एक जटिलता की रचना होती है। निजी जीवन का संताप, व्यवस्था के प्रति रोष, अन्याय का विरोध, आततायियों से घृणा, मुक्ति का अहसास-यह कविता पूरे जीवन पर एक टिप्पणी है।क्या नहीं है वह ? / माँ भी है, बेटी भी है, बहन भी है, / बहू भी है !
सहेली भी है, प्रेयसी भी है !/ साथिन है दुख-सुख की, सब कुछ है !
क्या नहीं है वह अपनी जनता के लेखे !6

‘कालीदास’ नागार्जुन की विश्व प्रसिद्ध कविता है जिसमें अमूर्त प्रेम को मूर्तता प्रदान की गई है। कवि ने अज के माध्यम से यह व्यक्त कर रहा है कि कालीदास तुम स्वयं ने इन्दुमती के प्रेम में आंसू बहाये थे कि वह अज ही था। नागार्जुन ने उस घटना को कविता के माध्यम से यहाँ इस रूप में चित्रित किया है जो कालवैचित्र्य वक्रता के रूप में व्यक्त हो रही है। यहाँ वर्तमान की कल्पना द्वारा कालवैचित्र्य वक्रता अनुपम सौन्दर्य को प्राप्त हो रहा है। वहीं दूसरे उदाहरण में आपसी वैमनस्य व्यक्ति को किस भांति स्पर्धा के लिए लालायित करता है किन्तु दुख के समय भविष्य में होने वाली दुर्घटना की ओर संकेत करती यह कविता कालवैचित्र्य वक्रता का अनुपम उदाहरण है। धूप में पसरकर लेटी है/मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सुअर……
जमना-किनारे, मखमली दूबों पर/
पूस की गुनगुनी धूप में,पसरकर लेटी है
यह भी तो मादरे-हिंद की बेटी है7

वर्णित उदाहरण में इन्दिरा गांधी पर कवि एक गहरा व्यंग्य आरोपित कर रहा है। नागार्जुन की व्यंग्य भरी रचनाओं में अन्य पुरुष का प्रयोग बहुतायत हुआ है। उपरोक्त उदाहरण में मध्यम पुरूष के स्थान पर जहाँ अन्य-पुरुष की वक्रता रोचकता पैदा कर रही है वहीं पर व्यंग्य भी सार्थक रूप में व्यक्त हो रहा है।
और, उस रोज
आपका, दुख का यह अभिनय / सचमुच अनोखा था !
वैसा अपूर्व मंचन / शायद ही कभी किसी ने देखा हो !
दुख की उस एकि्ंटग के क्या कहने ! / शाबाश, महान अभिनेत्री !8

नागार्जुन ‘बादल को घिरते देखा है’ कविता में जिस समस्त पदावली का प्रयोग करते हैं, वह उनकी अपनी रचना प्रणाली का हिस्सा है। ‘मदिरारूण आँखों वाले उन/उन्मद किन्नर-किन्नरियों की/मृदुल मनोरम अंगुलियों को/वंशी पर फिरते देखा है!’’ ‘मेघदूत’ पर लिखते हुए नागार्जुन प्रकृति की इस विविधता पर मुग्ध हैं। उन्हीं के शब्द हैं- ‘‘यों कहने को पूर्वमेघ प्रकृति की ही सुषमा के चित्रों से जगमगा रहा है परन्तु उन चित्रों का रंगीलापन कोई सामान्य रंगीलापन नहीं, वह तो मानव-मर्म की सहज संदेवनशीलता से अन्तर्दीप्त है’’। नामवर सिंह ने कहा था कि छायावाद में प्रकृति मानवीय होकर ही काव्यात्मक बनती है। यही कैलाश है, अलकापुरी है, स्फूर्तिप्रद मेघ सन्देश हैं।‘नाकहीन मुखड़ा’ माघ की ठिठुरन में ‘गठरी’ बन गया है। नागार्जुन उसे ‘अद्भुत सर्वांग आसन’ में बैठा देख रहे हैं। वह इनसे बेखबर हैं।

नागार्जुन हिन्दी के ऐसे कवि हैं जिनका कर्म परिवेश और व्यक्तित्व, उनकी कविता के सम्मिलित रूप की संज्ञा बन जाती है। उनके जीवन से गुजरती है देश, धरती, प्रकृति। सम्वेदना से जनमती है कविता, कविता से जनमता है, उनका व्यक्तित्व और व्यक्तित्व से चमकती है एक गर्भस्थ सुन्दर दुनिया, जहाँ मनुष्यता हंसती, मुस्कुराती, मानवता उछलती-कूदती, करुण रुदन करती है। वह एक ऐसी सुंदर दुनिया है जो अपनी किलकारियों का आभास देती है। नागार्जुन का काव्य इन्सानियत के लिए जूझता है, उसका रचनाकार, अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करता है। नागार्जुन की क्रांति-चेतना को रेखांकित करते हुए विश्वम्भर मानव ने लिखा है- ”उपेक्षित वर्ग के प्रति सहानुभूति तथा उसकी शक्ति को उभारने और अंतिम विजय में विश्वास प्रकट करने वाली बहुत सी कविताएँ है। जिनमें कवि ने अपनी प्रतिभा का पूर्ण उपयोग किया है।

नागार्जुन ने दाम्पत्य को उसके सामाजिक-चरित्र और पारम्परिक-गरिमा के साथ नितान्त मानवीय, धरातल पर अभिव्यक्त किया है। यह तुम थी कविता में कवि के वृद्धावस्था में पहुँचे दाम्पत्य-जीवन के गहन सम्बन्धों को अपनी जीवन शक्ति के रूप में अनुभव किया है। ‘यह तुम थीं’ कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
”झुका रहा डालें फैलाकर /कगार पर खड़ी कोढी गूलर
ऊपर उठ आयीं भादों की तलइया
जुड़ा गया बौने की छाल का रेशा-रेशा / यह तुम थी।“
इस कविता का ‘तुम’ सम्बोधन कवि की पत्नी के लिए है, तथा बुढापे की स्थिति के लिए प्रतीक रूप में गूलर और कचनार, उसी तरह ‘सिंदूर तिलकित भाल’ में प्रवास के दिनों में अपनी प्रिया पत्नी की याद है। जहाँ दाम्पत्य और रति का सात्विक भाव उसकी निष्ठा तथा मन की गहराइयों में छलकते प्यार की निर्मल अभिव्यक्ति है-
घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है भाल
याद आता तुम्हारा सिन्दूर तिलकित भाल,
याद आते स्वजन
याद आता मुझे अपना वह ‘तरउनी’ ग्राम
याद आती लीचियाँ वे आम
याद आते मुझे मिथिला के रूचिर-भू-भाग याद आते धान।

नागार्जुन की ‘सिन्दूर तिलकित भाल’ – जैसी अन्य कविताओं में प्रेम-प्रसंग का रागात्मक आवेग ने होकर, स्मृति के क्षण में मूल्य-बोध की गहराई है, वहाँ प्रेम मानवीय और मार्मिक है। धनंजय वर्मा ने महाकवि निराला के उदात्त, प्रेम संदर्भों से नागार्जुन की प्रेम-प्रणय कविताओं की तुलना करते हुए लिखा है- ”यह सौंदर्य और सरसता के सारे संदर्भों के व्यतीत हो जाने पर भी स्मृति क्षणों को रागात्मकता से सिक्त पाता है, इसलिए कि यह प्रेम सारी जिंदगी के सुख-दुःख की सहचरी के मीठे बोल और तरल स्पर्श से घुला है। उन्मुक्त अनासक्त और प्रशांत भाव से प्रणय-श्रृंगार को संवारने में नागार्जुन निराला की ही तरह उदात्त है।नागार्जुन की कविता का सम्यक् अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि उनके जीवनकाल में कविता ने बहुत लम्बी यात्रा की है। नारी-पुरुष की एक दूसरे के प्रति नारी और पुरुष वाली दृष्टि के आकर्षण को छोड़ या अपेक्षाकृत उसे कम महत्व देकर, इस का की कविता उस कारा से मुक्त होकर एक नवीन एवं विस्तृत जगत् में प्रवेश करती है। जिसमें आपसी सम्बन्धों की विविधता है, विभिन्न पारिवारिक सम्बन्धों की मिठास, कटुता है, उस दुनिया में मित्र हैं, दोस्त हैं और सहज मानवीय संवेदनाएँ है। नागार्जुन में स्त्री-सौन्दर्य हमेशा अपनी आह्लाददायी तीव्रता के साथ उपस्थित मिलता है। ‘एक फाँक आँख एक फाँख नाक’ में एक स्त्री मुखड़े के अर्द्धांश के बारे में नागार्जुन कहते हैं-
कितनी देर तक रही नाचती कपाल के भीतर के कटोरी में
धारण किए क्रमशः तकली का रूप
एक फाँक आँख….. एक फाँख नाक …..
सौन्दर्य चाहे जिस रूप में प्रकट हो, नागार्जुन की कविता की कटोरी में तकली की तरह नाचता रहता है। यह उनकी संवेदना का एक सर्वथा भिन्न पर महत्वपूर्ण धरातल है।गूँगी बहरी जया निम्नमध्यवर्गीय पिता की चार वर्षीया बेटी है। वह चित्रकार-नर्तकी बनकर स्वावलंबी जीवन बिता सकती है लेकिन पिता की आर्थिक विवशताएँ उसे कुछ न बनने देगी। नागार्जुन को वह खिलौना या गगनबिहारी समझती होगी।
क्योंकि मैं उसे छू सकता हूँ/
और गुदागुदा भी सकता हूँ/ कभी-कभी तो/
जी भर उसका मन बहलाकर/ स्नेह सुधा में कई-कई घंटे नहलाकर/
उसे तृप्त कर देता हूँ/ अपना रस्ता लेता हूँ मैं।9
तीन साल का ‘चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधि’ खुरपी लेकर ‘अपनी अम्मी का अनुसरण कर रहा है।’ उसकी माँ ‘गिट्टियाँ बिछाने वाली मजदूरिन’ है एक बजे आयेगी :
शिशु को चूमकर/पास बैठा लेगी
मकई के टिक्कड़ से तनिक-सा/तोड़कर बच्चे के मुँह में डालेगी…….
पूछेगी मुन्ना से-मेरी पुतलियों में देख तो, क्या है!
नागार्जुन की कविता का उद्गम भी, यही परिकल्पना नागार्जुन की तन गई रीढ़ कविता में भी है :
झुकी पीठ को मिला / किसी हथेली का स्पर्श / तन गई रीढ़ महसूस हुई कंधों को पीछे से, / किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें तन गई रीढ़ / कौंधी कहीं चितवन /रंग गए कहीं किसी के होंठ निगाहों के जरिए जादू घुसा अंदर / तन गई रीढ़ /गूँजी कहीं खिलखिलाहट टूक-टूक होकर छितराया सन्नाटा /भर गये कर्णकुहर / तन गई रीढ़ आगे से आया /अलकों के तैलाक्त परिमल का झोंका
रग-रग में दौड़ गई बिजली तन गई रीढ़
जितने तरह के सामाजिक दृश्य और चरित्र नागार्जुन की आत्मीयता का अंग बने हैं, वह जीवन को देखने-जानने का सफल प्रयास है। नागार्जुन बाजार को स्त्री की मुक्ति नहीं बल्कि दासता का नया क्षेत्र मानते हैं। मुश्किल यह है कि आज अनेक स्त्रीवादी यह समझते हैं कि बाजार में देह की ‘मुक्ति’ भी स्त्री की मुक्ति है। इन्ही रंगों से सराबोर नागार्जुन की एक कविता और है ‘न आये रात भर ट्रेन’ :
बैठा बैठा मेल ट्रेन की प्रतीक्षा में / बाहर निकल आए है आँखों के डोरे
घंटा भर लेट / आधा घंटा और लेट / पैंतालीस मिनट और लेट
आह रे विधाता, क्या हुआ तुझे ?
कई दफा चटखाई उँगलियाँ / कई बार आई जँभाई
चाट गया अनेकों मैगजीनें / सुड़क आया हूँ सात कप चाय
खींच गया हूँ दो पाकिट सिगरेट / आह रे विधाता, अब क्या करूँ ?
रंगी-रची पेटी से उँगठी / गौना कराई दुल्हन / सोई है या जगी
घूँघट की आड़ में ! / लेकिन दूल्हा भर रहा है खर्राटें
पास ही काले कम्बल पर / सिरहाने सेंतकर सामान
इनकी रखवाली कर रही है / सिक्कों की माला और पत्तीदार बाजूबंद पहने
दुल्हन की अर्द्धव्यस्क नौकरानी / लाल किनारी की पीली साड़ी में
बिल्कुल मांगुर मछली सी है उसकी देह की कान्ति
लगती है कितनी अच्छी / अब क्यों निकलेंगे आँखों के डोरे
न आए रातभर मेलट्रेन!
पति-पत्नी के स्वच्छंद एवं भावात्मक प्रेम की व्याख्या भष्मांकुर में हुई है। रति कामदेव को इस कार्य से विरत करना चाहती है, क्योंकि उसे शिव की अपूर्व शक्ति का ज्ञान है। वह काम के शुभ के लिए सतत् चिन्तित रहती है। इसी प्रसंग में काम रति से क्रुद्ध हो जाता है और बसंत नारी जाति की भावुकता का चित्र अंकित कर, दोनों का (काम-रति) पुनः मेल कराता है-
शिशु समान होती है नारी जाति
मृदुमति, तरल स्वभाव,/
रूप-रस-गंध-शब्द-स्पर्श के प्रति अर्पित आप्राण!
पी जाती यह हालाहल चुपचाप / कंठ नहीं होते हैं इनके नील
खण्डित होने देती अपना शील / चुकता करती भावुकता का मूल्य
तन-मन-धन सब कुछ देती है झोंक।

नागार्जुन के साहित्यिक व्यक्तित्व के मूल्यांकन की दृष्टि से समानांतर व्यक्तित्व की तलाश करने पर यह करना अप्रासंगिक न होगा कि परम्परा के कवि के रूप में कबीर, निराला, नागार्जुन का त्रिकोणीय आकार एक ही बिन्दु पर आकर ठहरता है। भक्तिकाल की युगीन विसंगतियों, विडम्बनाओं को जिस तरह कबीर ने समय की मांग के अनुकूल युग-युगीन सन्दर्भों में चित्रित कर उसका विरोध किया है, ठीक-ठीक उसी तरह नागार्जुन भी अपने युग के बृहत्तर मानवीय धरातल पर खड़े होकर युग-युगीन संदर्भों, के यथार्थ को चित्रित करते हैं, व्यावहारिक जीवन के क्रिया-कलापों की तरह उनका समूचा साहित्य उनके बहु आयामी व्यक्तित्व का परिचायक है। यह तो रही प्रकृति और बच्चों की सहज आकर्षण युक्त क्रियाएँ। इनमें तो बाहरी व्यापार फिर भी कुछ घटित होते दीखता है। समकालीन कवि की पैनी दृष्टि कुछ ऐसे सुन्दर मूल दृश्यों को भी शब्दों में उकेरने में अत्यंत सफल रही है जहाँ कि क्रिया-व्यापार उतना ‘बोलता हुआ’ नहीं है, जहाँ चुपचाप, निःशब्द, कुछ घटनाएँ घटित हो रही हैं, किन्तु हैं वे सारी घटनाएँ एक अपूर्व आकर्षण से युक्त हैं।
‘पैने दाँतों वाली’ / धूप में पसरकर लेटी है
मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सुअर……….
जमना-किनारे / मखमली दूबों पर / पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है / यह भी तो मादरे-हिंद की बेटी है
भूरे-भूरे बारह थनों वाली! / लेकिन अभी इस वक्त
छौनों को पिला रही है दूध/मन-मिजाज ठीक है/ कर रही है आराम
अखरती नहीं है भरे-पूरे थनों की खींच-तान /
दुधमुंहे छौनों की रग-रग में
मचल रही है आखिर माँ की ही तो जान! / जमना-किनारे
मखमली दूबों पर / पसर कर लेटी है/
यह भी तो मादरे-हिंद की बेटी है! / पैने दाँतो वाली………..

नागार्जुन की संवेदना इतनी व्यापक है कि यहाँ सब कुछ के लिए स्थान है, कुछ भी वर्जित या त्याज्य नहीं है।‘वसंत की अगवानी’ कविता में नागार्जुन दिखाते हैं कि सरस्वती उन लोगों को धूर्त कहते हैं जिन्होंने लक्ष्मी से उनकी झगड़े की बात फैला रखी है। इन धूर्तों ने लक्ष्मी को अपने वश में कर लिया है। लक्ष्मी इन धूर्तों की कैद से आजाद होकर ही सरस्वती से मिल सकती है। तब वसंत के अग्रदूत को काव्य-कला-प्रवीण होकर रिक्तहस्त रहने की नौबत नहीं झेलनी पड़ेगी।प्रकृति के असंख्य रूपों ने नागार्जुन को तीव्रता को संवेदित किया है। उनके पहले कविता-संग्रह ‘युगधारा’ में एक कविता ‘रजनीगंधा’ संग्रहीत है-
तुम खिलो रात की रानी / हो म्लान भले यह जीवन और जवानी
तुम खिलो रात की रानी।’ / प्रहरी-परिवेष्टित इस बंदीशाला में
मैं सडूं सही, पर ताजी रहे कहानी / तुम खिलो रात की रानी/
यह प्रहरी के बूटों की कर्कश टापें / रह-रह कर बहुधा नींद तोड़ जाती है
आँखे खुलती तो बस झुंझला उठता हूँ…../
यह हृदय-हीन! ये नर-पिशाच! ये कुत्ते! / इतने में अनुपम सुवास से सुरभित
शीतल समीर का हल्का झोंका आता / सारे अभाव-अभियोग भूल जाता हूँ
या आकुल मन इतना प्रमुदित हो जाता/
जय हो जय हो कल्याणी! / यह जेल और यह सेल-नियंत्रित प्राणी
इस आँगन में उस ओर तुम्हारा खिलना / यह भिनी-भिनी सारी रात महकना
दिन हुआ कि बस हो गई मौन तुम सजनी /रजनीगंधा बनकर भू पर उतरी हो?
आभिशापित देवसुता या कि परी हो! / पुलकित होते तन-मन, जगती है वाणी
जय जय जय जय कल्याणी!


कविता का स्रोत मुख्यतः रात की रानी की सुंगंध में है। रात की रानी की सुगंध ने ही कविता के वाचक को व्यग्र किया है। पहली पंक्ति ‘तुम खिलो रात की रानी’ से लेकर अंतिम बंद की ‘जय जय जय जय कल्याणी’ तक। लेकिन यह कविता रात की रानी का वर्णन मात्र नहीं है। इस प्रकार हम देखते हैं कि वक्रता का पुट लिए नागार्जुन की स्त्रियाँ हमेशा प्रतिरोध रचती रहती हैं.

संदर्भ सूची 

1.युगधारा, पृ. 41,42
2.हजार-हजार बाहों वाली,  पृ0152-153
3.तुमने कहा था,  पृ048-49
4.सतरंगे पंखोंवाली,  पृ025
 5.युगधारा, पृ019
 6.पुरानी जूतियों का कोरस, पृष्ठ ११७
 7.नागार्जुन की चुनी हुई कवितायेँ, पृष्ठ २१० 
  8.ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या! पृष्ठ १९ 
 9. युगधारा, पृष्ठ १०८ 

दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

नवल किशोर कुमार

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत आज मिलते हैं  सागरिका  चौधरी  से. दलित महिलाओं  की उद्यमिता को  संगठित करने में जुटी  सागरिका के बारे में बता रहे हैं  अपना  बिहार के संपादक नवल  किशोर  कुमार 

देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढी है। लेकिन बिहार जैसे पिछड़े राज्य की मुख्य धारा की राजनीति यानी सत्ता की राजनीति में महिलाओं की इंट्री अभी भी अनुकंपा के तर्ज पर ही होती है। महिला सशक्तिकरण के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले दलों में तरजीह उन महिलाओं को ही मिलती है, जिनके पति या पिता की उल्लेखनीय राजनीतिक पृष्ठभूमि रही हो।

बिहार में महिला नेताओं की सूची पर नजर डालें तो स्थिति की विषमता का सहज ही मूल्यांकन
किया जा सकता है। लेकिन इसी राजनीतिक विषमता के बीच हाल के वर्षों में स्थिति पूरी तरह बदली है। सागरिका चौधरी इसका आदर्श उदाहरण हैं। मूल रुप से महादलित समाज की सागरिका चौधरी वर्तमान में जदयू से जुड़ी हैं। वे पटना विश्वविद्यालय में सिंडिकेट की मेम्बर के अलावा दलित उद्यमियों के संगठन डिक्की के प्रदेश इकाई की उपाध्यक्षा भी हैं। उद्यमिता के जरिए बेहतर बिहार के अपने सपने को अंजाम देने में जुटी सागरिका बिहार उद्यमिता संघ से भी जुड़ी हैं। इन दिनों वे दलित महिला उद्यमियों को संगठित कर उनके बीच उद्यमिता को बढ़ावा दे रही हैं. सागरिका ने हाल ही में चीन के गुझाउ प्रांत में उद्यमियों के सम्मेलन में बिहार का प्रतिनिधित्व भी किया।

अपने बारे में सागरिका चौधरी बतलाती हैं कि उनका जन्म नवादा में मुन्द्रिका चौधरी के घर में हुआ था। पिता का मूल पेशा पारंपरिक यानी ताड़ के पेड़ से ताड़ी उतारना और उसे बेचना था। लेकिन वे शिक्षा को लेकर बहुत जागरुक थे। अपने जीवन की एक दुखद घटना के बारे में सागरिका ने बताया  कि वर्ष 1992 में उनके पिता ताड़ के पेड़ से गिर गये और उन्हें छह महीने तक अस्पताल में रहना पड़ा। उसी दौरान शेखपुरा में रहने वाले मामा जो कि अभियंता के पद पर कार्यरत थे, ने पूरे परिवार को संभाला और फ़िर हमारी पढाई-लिखाई पूरी हुई।

चीन के गुझाउ प्रांत में उद्यमियों के सम्मेलन में

उन्होंने अपनी इंटर तक की पढाई शेखपुरा में पूरी की और बाद में पटना वीमेंस कालेज से ग्रेजुएशन किया। शोध कार्य में दिलचस्पी थी, इसलिए आईएचडी ( इन्स्टीच्यूट फॉर ह्यूमैन डेवलपमेंट, नई दिल्ली) के साथ जुड़कर काम किया। सागरिका बताती हैं कि कालेज में ही उन्हें जेआरएफ़ मिला। उसी दौरान उन्होंने बालेन्दू शेखर मंगलमूर्ति के साथ अंतरजातीय शादी की। श्री मंगलमूर्ति स्वयं भी आईएचडी से जुड़े थे।

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सागरिका बताती हैं कि अंतरजातीय विवाह करने का खामियाजा उन्हें भी भुगतना पड़ा। उनके अपने पिता और भाईयों ने उन्हें भूला दिया है। एक छोटे भाई हैं जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में इकोनामिक्स के छात्र हैं, वहीं अब उनके साथ संपर्क में रहते हैं। हालांकि सागरिका बताती हैं कि उन्हें इस बात का मलाल नहीं है।  पति बालेन्दू शेखर मंगलमूर्ति और उनके पूरे परिवार ने उन्हें बहू से अधिक बेटी के रुप में स्वीकार किया। वे बताती हैं कि यदि मैंने अपनी जाति में शादी की होती तो संभवतः किसी डाक्टर या इंजीनियर के घर में उसके लिये खाना बना रही होती।

सागरिका बताती हैं कि राजनीति उन्हें प्रारंभ से प्रभावित करता था। लेकिन जब बात फ़ुलटाइम राजनीति करने की शुरु हुई तो वैचारिक रुप से नीतीश कुमार जी की राजनीति सबसे अधिक प्रभावकारी प्रतीत हुई, “हालांकि उन दिनों सभी यह कहते थे कि नीतीश कुमार डूबते हुए नाव हैं। लेकिन मैंने ठान लिया था।” सागरिका के अनुसार  जदयू के एक कार्यकर्ता के रुप में उन्हें काम करते हुए बहुत अधिक समय नहीं बीता है। लेकिन जिस तरीके से दल के अंदर महिला राजनीति मजबूत हुई है, वह उल्लेखनीय है।

बहरहाल, सागरिका की राजनीतिक कार्यशैली गैर पारंपरिक है। वे किसी पैरवी के बुते नहीं बल्कि अपनी कार्यक्षमता और दक्षता के बुते राजनीतिक मुकाम हासिल करना चाहती हैं और वे इसके लिए प्रयत्नशील भी हैं। वे बाबा साहब डा भीम राव आंबेडकर को अपना आदर्श मानती हैं। वे चाहती हैं कि बदलाव का असली बिगूल तो गांवों में फ़ूंका जाना चाहिए, जहां महिलायें आज भी मध्यकालीन परिस्थितियों के बीच जीने-मरने को विवश हैं। यही उनकी राजनीति का आधार भी है।

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नवल किशोर कुमार बिहार की पत्रकारिता में एक प्रमुख नाम हैं. वे अपना बिहार पोर्टल के संपादक भी हैं. 

उस देश में और अन्य कविताएं

निवेदिता झा

तीन किताबें और 10 साझा संग्रह प्रकाशित,
संपर्क :nivrditaart @ gmail com
.

वहाँ की बातें

उस फैक्टरी में
अच्छे लोग काम करते हैं

जूतों की नयी खेप अब तैयार हो चुकी है
मालिक का बेटा नहीं पहनता
अपने  दुकान का बनाया
नकली चिपके
विदेशी नाम के पैरों का आवरण
वह  समझदार है शायद
वह वहाँ के गंध से दूर रहता है
पिता नहीं चाहते वह  गंधो को पहचानना जाने
और माहौल को देखे ,परखे
गरीब बच्चों की चमडी
उफ्फ वो दमघोटू खाँसी
संक्रामक है माहौल वहाँ

वहां एक देश का
भविष्य भी तो बनता है
पलते है कुछ एक छोटे पौधे
और कुछ महिलाएँ
सहनशीलता की विदाई होते ही
जूते के फीते से गोल वृताकार फंदा
और सुलेशन से चिपकाकर अपनी मजबूरी
सलामत अस्तित्व की कामना करते
कुछ नींद से डुबे मजदूर
झपकी लेकर बार-बार
समय से पीछे चलती घडी
देखते हैं

अच्छे लोग बातें भी करते हैं अच्छी
पीढियों की बातें
कर्मो और प्रेम की बातें
नफा नुकसान से अलग रहने की
माँग और उपभोक्ता तो मालिक की बाते हैं

इस बार की बोनस तगडी मिले
और शायद अब बच्चे पढ़ पायें
अच्छे लोग ये भी सोचते हैं वहाँ ।

अनुभव

किसी ने कहा
जो देखो लिखो वही तुम

बिना गाँव देखे कैसे चित्रित कर दिया गहबर
सच कहा था उसे बडे से मनुष्य ने
जो मान ही बैठा था खुद को जाना माना नाम
मानकर उसकी वो बात

दंगा में उजडता देखा था एक गाँव
जो बाद में मौका देखते शहर बन गया था
एक मंदिर के दरवाजे पर बिलखता बच्चा
और अँधे से खाई में डूबता अजान का रूँधता स्वर

कविता तब नहीं लिख पाई थी
वहाँ भी ऐसे पैबन्दनुमा बीच के अलग से जले घर
और सहमें कुछ यात्री जो रवाना होनें को
अनन्त यात्रा थी अलग मुसाफिर थे
सहमा था कोने में बिना रंग का प्रेम
मानवता की चादर समेटे सहमा हुआ
नमक था सर्वत्र पसरा हुआ

विस्मित हूँ वो सागर की सोचकर आज भी
वो खारेपन को बदलने लगा
चखने लगे लोग और बोलने लगे थे मधुर
ओ पवित्र सागर तुम अपनी मधुरता कायम रखना
जब तक दुनिया की मीठी लीमडी हरी -भरी रहे
और दंगा फिर न हो किसी सदी में ।

नगर

वहाँ एक नगर था
सभ्यता थी विकसित
नदियाँ रही होगीं
तभी तो विकसित हुआ वह सब शायद

जो वर्तमान है
आज है कल भी होगा शायद
वहाँ एक पुरूष था
गढता था नृत्य करती नर्तकियों के छोटे आकार
वहाँ एक स्त्री थी
पुरूष सूर्य के समान देविप्यामान
और सिक्के पर उसकी आकृति
ये सब स्नातक की पाठ्यक्रम
पढकर जान लिया बडे होते ही
दजला-फरात का किनारा ,सिंधु
या शाम हो यमुना की
वही रक्त बहता है धीरे-धीरे
सभ्यताएँ खत्म होती है
और नगर अपने नाम का कलंक
ढोता जाता है ,
गाँव बनता तो शायद बच ही जाता

मन कचोटता रहता है
रहता है ताउम्र !

एच आई वी

तुम्हें पता है
रोग का हो जाना
अचानक घन्टों का युग में तब्दील होना
फिर जूझना
और मन में अटकी रहती है विवशता
ईश्वर के कई रूपों से सीधे वाली बातचीत

यही है
तुम्हें पता नहीं है
मनोदशा उनकी
कभी थोपना
कभी प्रायशिचत
और कभी बिना पाप किए का परिणाम
उछलती हिरणी
रुक कर गिरती है जब पैर में उसके रस्सी जकड़ती है
अँधेरा छाता होगा ,कहाँ जान पाई दर्द

ये तीसरी प्रजाति ,ये दूसरे लोग
तुम्हारे जैसे,मेरी तरह सोचने वाले
मगर मजबूरी की अंतिम दशा
नहीं इनके एकाधिकार से भी बाहर है

ये रोग
बिना जाति-घर्म ,ग़रीब -अमीर के भेद से बाहर है
मगर जी सकते हो
और जी रहे हैं
किताबी ज्ञान ,व उनको देखकर
विश्वास है ।

उस देश में

अब धीरे-धीरे
धट रहै हैं कुछ लोग
बडे ईमारत से ढहते कुछ लाल पत्थर
कुछ जडे रत्न नोचे गए हों गाहे-बेगाहे
जैसे कैलेंडर पर गोला लगाए
दिन उस देश में

रात को आकाश में छुपे बादलों के पीछे
बिना रोशनी के तारों का झुंड
गुम होते वो अवशेष
चाहे हडप्पा हो
या लाल पत्थरों वाली शहरी संस्कृति
धीमी पडती जाती वो आवाजें
जो कि आस्था के ईमारतों से
सुबहो शाम आती है
लोहे के लोग और पत्थर के नाखून
सहमी होती है जहाँ शाम
सूरज वहाँ बेखौफ नहीं निकलता है कभी

पुरानी बची कुछ झुर्रियों से
वहाँ के हों या यहाँ के
बिना बोले ही सुन सकते हो
अमन की बात और अमन की उम्मीद ।

दो  तरह की रात 
दो तरह की रात
जैसी ही होती है दो स्त्रियाँ
शहर की और गाँव की
मत कहना कि
पूनम की कौन और अँधरिया की कौन

सूरज से उम्मीद
दोपहर से उधार मांगी धैर्य
विरह से उदासी
और धरती से उठाकर धूल
दोनों एक हो जाती है कहीं कही
फिर पाटों में बंटती रूपहले सपने को गुनती बुनती
गांव से थोडा आगे रहती है शहर की

मगर घूमती धरती
स्याह और रोशनी में
एक झूठ को बताती नहीं कि
दोनों ही सिसकत हैं
पुरूष के असली चेहरे को देखकर ।

मिथक और स्त्री आंदोलन का अगला चरण

संजीव चंदन


‘रिडल्स इन हिन्दुइज्म’ में डा. बाबा साहेब अंबेडकर इतिहास लिखने से ज्यादा इतिहास की व्याख्या को महत्वपूर्ण मानते हैं. भारतीय इतिहास के बहुत से सूत्र साहित्यिक ग्रंथों और मिथकीय कथाओं में फैले पड़े हैं- जरूरत है, उनकी व्याख्या की. इस व्याख्या में दलित –बहुजन दृष्टि से काम करने वाले विद्वानों की गहरी रुचि रही है. वहीं ‘रिडल्स इन हिन्दुइज्म’ में डा अंबेडकर मिथकों के विषय में कहते हैं कि ‘ मिथक इतिहास हैं, यद्यपि वे अतिशयोक्ति पूर्ण इतिहास हैं.’  इस लेख का उद्देश्य इतिहास की व्याख्या नहीं है और न ही मैं इतिहासकार हूँ, सिवाय इसके कि स्नातक तक मैंने ‘ प्राचीन इतिहास’ की पढाई की है. लेख धार्मिक –सांस्कृतिक मिथकों के द्वारा शोषण के प्रति शोषित के अनुकूलन को एक हद तक समझने की प्रस्तावना है, जो मुक्ति के लिए आवश्यक भी है.



यह देश मिथकों में जीता है, मिथक दैनंदिन में धार्मिक कर्मकांड के साथ शामिल हैं. साल भर चलने वाले त्योहारों के साथ कोई न कोई धार्मिक मिथक सम्बद्ध कर दिये गये हैं- कृषि समाज के सामान्य उत्सवों में भी मिथकों ने जगह बनाई और फिर वही प्रमुख होते चले गये. मसलन होली जैसे विशुद्ध कृषक –समाज के पर्व में भी होलिका –प्रहलाद की मिथकीय कथा हावी हो गई और हम हर वर्ष एक स्त्री प्रतीक को जलाने लगे. सलाना उत्सवों में शामिल ये मिथक पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद के एजेंट हैं, जो अपने शोषितों (विक्टिम) को अनुकूलित करते रहते हैं. स्त्रियों को एक सांचे में ढालने का एक अनवरत सिलसिला इन मिथकों के माध्यम से चलता रहता है – पतिव्रता और सदैव पुरुष संरक्षित स्त्री के सांचे में. इनकी खासियत है पूरी व्यवस्था,समाज, संस्कृति , सोच आदि को द्वैध ( बायनरी) में बांटने की- अच्छाई और बुराई की बायनरी में. इससे एक तर्क भी पैदा होता है, अच्छाई के साथ जाने और बुराई के खिलाफ होने का, जो सामजिक –सांस्कृतिक अनुकूलन में अहम भूमिका निभाता है. अच्छाई की पावरफुल इमेजरी ( बिम्ब ) के साथ मिथकीय चरित्र बदलाव के आन्दोलनों को भी प्रभावित करते रहे हैं. यह अकारण नहीं है कि भारत का पहला स्त्रीवादी प्रकाशन माना जाने वाला समूह ‘ काली फॉर वीमेन’ ‘ काली’ नामक मिथकीय चरित्र से खुद को जोड़ता है, या फिर यह भी अकारण नहीं है कि ‘दुर्गा’ में दक्षिणपंथी समूह भी शक्ति का स्रोत देखता है और दक्षिणपंथ के खिलाफ खडा स्त्रीवाद भी.

मिथकीय कथाओं और चरित्रों के प्रभाव को महात्मा फुले बखूबी समझते थे. उन्होंने 1873 में प्रकाशित अपनी पुस्तक    ‘गुलामगिरी’ में इसीलिए मिथकीय चरित्रों को विषय बनाया. चूकी चार वर्णों की उत्पत्ति का सिद्धांत ब्रह्मा से जुड़ा था, इसलिए उन्होंने ब्रह्मा से जुडी मिथकीय कथाओं की व्याख्या करते हुए उसके देवत्व को खंडित किया. वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या करते हुए ब्राह्मण को ब्रह्मा के मुख से,क्षत्रिय को बाहु से, वैश्य को पेट से और शूद्र को पैर से पैदा हुआ बताया जाता रहा है. यह जाति व्यवस्था के प्रति शोषितों के मानसिक अनुकूलन पर फुले का प्रहार था. इसी किताब में उन्होंने हिरण्यकश्यप, विरोचन और बलिराजा से जुड़े मिथकों का पुनर्पाठ किया है, यह पुनर्पाठ ब्राह्मणवादी प्रभाव में इन पर आरोपित ‘खल- चरित्र’ से इन्हें मुक्त करता है. आज दलित–बहुजन आंदोलन फुले की इन व्याख्याओं के साथ अपने इतिहासबोध को जोड़ रहा है. इस प्रक्रम में एक ख़ास गुण है, किसी भी चरित्र पर आरोपित ‘देवत्व’ का ध्वस्त हो जाना. इन व्याख्याओं से विष्णु के अवतारों में ब्राह्मणवादी षड़यंत्र का गुंथा होना स्पष्ट होता है, और उसके अवतारों के साथ –साथ विष्णु का देवत्व भी खंडित होता है. महात्मा फुले के द्वारा मिथकीय इतिहास की व्याख्या से समाजिक –सांस्कृतिक तौर पर हाशिये पर धकेल दिये गये लोगों का अपना इतिहासबोध निर्मित हुआ और वे धार्मिक–सांस्कृतिक अनुकूलन से मुक्ति के तर्कों से संपन्न हो सके.

ब्राह्मणवादी मिथकों के प्रभाव से मुक्ति बहुत सहज भी नहीं है, ये आख्यान के रूप में जन- मानस पर हावी होते रहे हैं. इनसे मुक्ति का एक तरीका महात्मा फुले का था, तो दूसरा तरीका डा. अंबेडकर ने अपनाया- अपने अनुयाइयों को बौद्ध धर्म का रास्ता दिखाकर. इससे तत्काल असर यह हुआ कि उनके साथ बौद्ध होने वाली जनता ने हिन्दू देवी –देवताओं को देवता न मानने की शपथ ली और इसके साथ ही इनके देवत्व से मुक्ति के रास्ते पर चल निकली. इन ब्राह्मणवादी आख्यानों के बरक्स उनके पास अपना आख्यान था, जिसके सूत्र ज्ञात इतिहास में सीधे –सीधे फैले थे, बहुत हद तक मिथकीय इतिहास से मुक्त. आख्यान रहित जनसामान्य के लिए हिन्दू –धार्मिक मिथकों से मुक्त होना संभव नहीं था और न ही संभव था उनके द्वारा पुष्ट गुलामी के तर्कों से मुक्त होना- जिसे अनुकूलन कह सकते हैं.

डा. अंबेडकर के साथ बौद्ध धम्म में दीक्षित हुए लोग अपने अनुभवों से बताते हैं कि उस दौरान सबसे कठिन था महिलाओं के लिए अपनी आस्था, अपने विश्वास, अपने अनुकूलन से मुक्त होना. यद्यपि बड़ी संख्या में महिलायें डा. अंबेडकर के नेतृत्व में नागपुर में आयोजित दीक्षा में शामिल हुईं और रातो –रात बौद्ध हो गई, लेकिन कई लोगों के अनुभव इसके विपरीत भी थे, उन्हें अपनी माओं से देवी –देवताओं के अनिष्ट के लिए उन्हें गालियां खानी पड़ी थी. दरअसल कर्मकांड में शामिल ब्राह्मणवादी मिथकों का सबसे बड़ा वाहक है महिलाओं का समूह, जिसे अभी हाल में, 70 के दशक में भी ‘संतोषी माँ’ का आधुनिक सिनेमाई मिथक बहा ले गया था. आज भी दोपहर के सीरियल्स का सबसे बड़ा क्रेता -महिलाओं का वर्ग है, वहाँ संतोषी माँ से लेकर-करवाचौथ, वटसावित्री आदि धार्मिक मिथको का मायाजाल बन रहा है. स्त्रियों के लिए इन मिथकों से मुक्ति जरूरी है, तभी अपने शोषण के प्रति उनकी सहमति को वे समझ सकती हैं. कोई भी स्त्रीमुक्ति आन्दोलन अपनी सम्पूर्णता में समता, न्याय और भागिनीवाद तथा बंधुत्व के दर्शन को आत्मसात करने के साथ –साथ सांस्कृतिक गुलामी के इन प्रतीकों को अनिवार्य रूप से ध्वस्त करना चाहेगा. वह कैसे संभव है? सवाल यह भी है कि क्यों भारत में स्त्री-आन्दोलन ने राम आदि के मिथक पर चोट तो की, लेकिन दुर्गा-काली आदि देवियों से खुद को बहुत अलग नहीं कर सकी. दलित आन्दोलन ने शम्बूक, एकलव्य आदि उत्पीडित मिथकीय चरित्रों से खुद को जोड़ा और राम के देवत्व को खंडित किया. तो फिर सवाल यह भी है कि स्त्री आन्दोलन का अगला चरण ‘दलित स्त्रीवाद’ क्या इन मिथकीय चरित्रों को ध्वस्त करने में कोई दिलचस्पी रखता है?

दलित स्त्रीवाद अपनी विरासत को जिन सावित्रीबाई फुले और महात्मा फुले के साथ जोड़ता है, वे न सिर्फ ब्राह्मणवादी मिथकीय पात्रों के देवत्व को ध्वस्त करने में यकीन रखते हैं, बल्कि अपने मिथकीय पात्रों से रिश्ता भी बनाते हैं. इसीलिए फुले प्रेरित दलित –बहुजन आन्दोलन से जुड़े पुरुष और स्त्री ’इडा-पीड़ा टलो ( जाओ) बलि जे राज्य येओ( आये)’ की कामना करते हैं. सावित्री बाई फुले लिखती हैं :
बलुतों* का बलीराज्य। दानव दैत्य पावन।
दानशूर बली था। सुखी उसके प्रजाजन।।
पूर्वज यही हमारे। गुरू उनके शुक्रानन।
उन्हें पद-पद पर वंदन। वंशज उनके हम सब जन।।


डा. आंबेडकर महिलाओं सहित वंचित समुदायों को हिन्दू मिथकीय प्रभाव से पैदा अनुकूलन से मुक्ति के मार्ग ढूंढते रहे, और बौद्ध धम्म का विकल्प लेकर आये. दलित स्त्रीवाद डा. अंबेडकर के विचारों से भी खाद-पानी पाता है. पिछले कुछ सालों से देशभर में ‘ महिषासुर शहादत दिवस’ मनाया जा रहा है. इसके आयोजक कोई धार्मिक आयोजन नहीं करते हैं, बल्कि सामाजिक –सांस्कृतिक मुद्दों पर बातचीत करते हैं और सामाजिक –सांस्कृतिक –आर्थिक संसाधनों से अपने वंचन को कारणों की पड़ताल करते हैं. पिछले दिनों राष्ट्रपति से सम्मानित नवादा की सुमन सौरभ नवादा में बड़े पैमाने पर ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाती हैं. क्या कोई स्त्री आन्दोलन इन आयोजनों में शामिल स्त्रियों को अलग कर अपने आन्दोलन का कोई चरित्र विकसित कर सकता है?

इन आयोजनों से दुर्गा आदि देवियों तथा विष्णु अवतारों से जुड़े पितृसत्तात्मक प्रतीकों के देवत्व को चुनौती मिलती है –जनता उनके देवत्व के महाख्यान से मुक्त होकर पराजितों के खिलाफ विजेताओं के षड़यंत्र के आख्यान की पहचान करती है, उससे जुडती है. मिथकों के पुनर्पाठ के साथ ऐसे आयोजन वस्तुतः उत्पीडित अस्मिताओं के उत्पीडन के विभिन्न प्रसंगों से जुड़ते हैं. मसलन शम्बूक की बात करते हुए दलित –बहुजन आन्दोलन धार्मिक- सांस्कृतिक संसाधनों से अपने वंचन को चिह्नित करता है और उसका प्रतीकार करता है, वैसे ही एकलव्य शैक्षणिक संसाधनों से वंचन का प्रतीक है, ठीक वैसे ही जैसे स्त्रीविमर्श में गार्गी और याज्ञवल्क्य के संवाद को प्रतीक बनाया गया है, स्त्रियों की शिक्षा का अधिकार छिनने का. दरअसल ब्राह्मणवादी मिथकों ने सालों –साल तक जन-मानस को प्रभावित किया है- इतिहास में घालमेल किया है. उदाहरण के लिए अच्छे –भले मानवजाति ‘नाग’ को किसी पाताललोक से जोड़कर सांपों के मिथक से गूंथ दिया गया. अब कोई भी पुनर्पाठ उन मिथकों को भारत के मध्य में शासक रहे नागवंशी राजाओं से जरूर जोड़ेगा, जोड़ता है. ऐसा होते ही एक समूह पर दूसरे समूह के सांस्कृतिक वर्चस्व के सूत्र खुलने लगते हैं.

भारत में स्त्री-आन्दोलनों का एक दौर बीत चुका है, राजनीतिक पार्टियों से अलग अस्तित्व के महिला-संगठनों ने इस आन्दोलन को नेतृत्व दिया – व्यापक कानूनी सुधार भी करवाये. लेकिन अब उनका संस्थानीकरण हो चुका है-भारत में स्त्री आन्दोलन दुनिया के दूसरे हिस्सों की तुलना में देर की परिघटना रहा है, यही कारण है कि यहाँ उस दौर में स्त्रीवाद के सारे घटक एक साथ सक्रिय थे –उदारवादी, मार्क्सवादी, समाजवादी, रैडिकल आदि.  एक दूसरा दौर शेष है, जो जाति और लिंग दोनो के सवालों के साथ आकार ले रहा है, लेकिन उसके खतरे भी सांस्थानिक हो जाने के या विमर्श तक सीमित रह जाने के हैं,  यदि वह व्यापक स्त्री समुदाय के लिए विकल्प ले कर नहीं आता है. सांस्कृतिक–धार्मिक मिथकों से निर्लिप्तता की कोई नीति, यदि ऐसी कोई नीति है तो, व्यक्तिगत तौर पर या किसी छोटे से समूह के लिए मुक्ति का मार्ग तो हो सकता है, लेकिन व्यापक स्त्री –समुदाय के लिए नहीं. आख्यानों के साथ जीने वाला यह समूह अपने शोषण के प्रति सहमति देने के लिए काफी उर्वर है. देवत्व, महिमामंडन और माहाख्यानों से संपृक्त मिथक उनकी सहमति हासिल करने के सबसे बड़े घटक हैं. प्रतिक्रान्ति का दौर बार –बार आता है, इस वक्त भी हम जूझ रहे हैं. नारद को प्रथम-पत्रकार बताया जा रहा है, (ऐसा करने में वामपंथी विद्वानों की देख-रेख में तैयार किताबें भी पीछे नहीं हैं), शहरों को गुरु द्रोणाचार्य के नाम से जोड़ा जा रहा, गणेश पहले सर्जक हुए जा रहे हैं, हाडा रानी का बलिदान और सतीत्व का मिथ पाठ्यपुस्तकों में शामिल हो रहा है, तो दलित स्त्रीवाद ( जो अभी शैशव अवस्था में है ) सहित किसी भी स्त्री आन्दोलन को इन मिथकों में निहित माहाख्यान की ताकत को समझना होगा और आमजन को प्रति-आख्यान से जोड़ना होगा.



लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं.
संपर्क-8130284314

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत आज  इलाहाबाद  विश्वविद्यालय की  पहली महिला  छात्रसंघ  अध्यक्ष ऋचा सिंह  की कहानी उनके अपने शब्दों में . वे  इलाहाबाद  (पश्चिम) से  समाजवादी  पार्टी  के  लिए उत्तरप्रदेश  के  मुख्यमंत्री  अखिलेश  यादव  की  पसंद  भी  हैं . ऋचा  ने  इस  क्षेत्र  में  अपना  चुनाव  अभियान  शुरू  भी  कर  दिया  है. 

1 साल 2 महीने पहले जब इलाहबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ में अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने का ठानी तो कुछ बातें मन में थीं, पहली कि विश्वविद्यालय के इतिहास में 128 साल में कोई भी चुनी हुई महिला अध्यक्ष क्यों नहीं? क्या छात्रसंघ का स्वरुप ऐसा होना चाहिए,  जिससे हर आम छात्र अपने को जोड़ न पाता हो?  धनबल-बाहुबल, क्या ये राजीनीति की नर्सरी हो सकते हैं, क्या जीतने वाला छात्र एक आम छात्र न होकर बड़ी -बड़ी गाड़ियों में चलने वाला कोई बाहुबली होगा, जिससे आम स्टूडेंट मिल कर अपनी समस्यायों को साझा करना तो दूर उसको देखना भी मुश्किल होता है!  पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड, जो देश की राजनीति को दिशा देता था, उसकी दशा को तय करता था, आज क्यों वह राष्ट्रीय पटल से भी हटता जा रहा है, क्यों इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र राष्ट्रीय  हित के मुद्दों पर अपनी आवाज़ मिलते नहीं दिखते? इन्ही कुछ सवालों के साथ अपने साधारण से दिखने वाले दोस्तों की टीम, जिन्होंने मेरे सपनों पर बिना सवाल किये मेरा न सिर्फ साथ दिया,  बल्कि जब लगा की अब मुझसे नहीं होगा, हाथों में हाथ डाल ताकत भी दी।

हमने कहा था हमारे पास क्रांति का कोई मॉडल नहीं पर बदलाव लाएंगे माहौल में।  15 अगस्त,  26 जनवरी को छात्रसंघ के प्राचीर से किया गया झंडारोहण बहुत याद आता है, इसलिए नहीं की 128 साल में पहली बार किसी लड़की ने छात्रसंघ के प्राचीर से झंडा फहराया था, बल्कि इसलिए कि छात्रसंघ के प्राचीर पर न सिर्फ लड़के बल्कि बराबर की संख्या में लड़कियों ने भी भागीदारी की थी और हम सबने मिलकर स्वतंत्रता और गणतंत्र के पर्व को मनाया था, जहाँ किसी लड़के  को छात्रसंघ के भवन में लड़कियों को देखकर कोई असहजता नहीं थी , जहाँ लड़कियों को छेड़खानी या ‘छात्रसंघ में लड़कियां नहीं जाती’,  ऐसा कोई डर नहीं था। यही बदलाव करने तो निकले थे हम… किमाहौल बदले, आज बेख़ौफ़ लड़किया छात्रसंघ भवन के क्षेत्र में  जाती हैं,  जहाँ से वो गुजरने तक से पहले सोचती थी।

हम लड़े,  हमने आंदोलन किया,  कभी कैंपस में साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ़, घायल होकर भी हम और हमारे साथी डेट रहे , क्योंकि लड़ाई बड़ी थी हमारी संख्या छोटी. चोट खाकर भी टूटे नहीं,  बल्कि और मज़बूत हुए- हम लड़े कैंपस में जेंडर बराबरी के लिए, महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न में घिरे प्रशासनिक से लेकर शिक्षकों पदों पर बैठे हुए लोगो के खिलाफ। हम लड़े यू.जी.सी की फेलोशिप बंद करने के  खिलाफ़ और दिल्ली में अपने साथियों की न सिर्फ आवाज़ से आवाज मिलायी बल्कि उस लड़ाई में पूरब के ऑक्सफ़ोर्ड ने अहम भूमिका भी निभायी, हम लड़े अपने साथी रोहित वेमुला की लड़ाई, जो हम सबकी अपनी लड़ाई थी। एक दौर ऐसा भी आया जब लगा किअब तो पीएचडी  का एडमिशन भी नहीं बचा पायेंगे, तब देश खड़ा हुआ मेरे साथ. सड़क से संसद तक आवाज़ गूंजी , छात्रों से लेकर शिक्षक, बुद्धजीवी, मीडिया और देश की संसद ने मेरे सवाल को उठाया. हम फिर कामयाब हुए, जो मेरी नहीं हम सबकी कामयाबी थी। बिना घर पर बताये अपने साथियों की लड़ाई ऑनलाइन-ऑफलाइन  परीक्षा के मुद्दे पर 10 दिन तक बिना घर पर बताये अनशन भी किये, और विश्वविद्यालय प्रशासन को ही नहीं,  एमएचआरडी को भी  अपना फैसला वापस लेना पड़ा और छात्रहित में ऑनलाइन के साथ ऑफलाइन के विकल्प को अपने अधिकार को छीन कर लिए। यहाँ तक आते -आते तो समझ आ गया कि छात्रसंघ की ताकत क्या होती है, क्योंकि ये छात्रनेताओं नही बल्कि छात्रों का संघ, अर्थात शक्ति होता है।

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कई बार लोग यह भी कहते थे एक लड़की क्या कर पायेगी ?  इसलिए दोहरी ज़िम्मेदारी थी मुझपर, पहली एक अध्यक्ष के रूप में अपने को साबित करना और दूसरी महिला अध्यक्ष के रूप में  अपने को साबित करना ताकि अगली लड़की जब चुनावों में आये तो लोग ये न पूछे कि एक लड़की क्या कर पायेगी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ में। पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो संघर्ष का लंबा दौर रहा, एक लड़की, एक आम छात्र, जिसके पास धन बल बाहुबल के नामनपर कुछ नहीं , जिसकी जीत को लेकर  शहर के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन भी सोचता थी कि गलती से जीत कर आ गयी, अब दिमाग ठिकाने आ जायेगा, के लिए सबकुछ आसान और संघर्ष से हासिल किये जाने वाले आसान लक्ष्य मेंं तब्दील हो गया.  कई बार मनोबल टूटा भी,  क्योंकि इंसान थे- जब लोग कहते थे, ‘ऐसा सबक़ सिखएंगे की लड़की होने प्नर शर्म आयेगी’,  पर लड़ने का रास्ता ही अंततः चुना क्योंकि उसके सिवा कोई रास्ता न था.

अभी लम्बी लड़ाई बाकी है,  बदलाव की पर क़दम मज़बूत हैं और एक नयी शरुआत हो चुकी है , कोशिश है इसे नयी मंजिल की ओर ले जाने की। सोचा नहीं था कि कभी लंदन जाने और वहाँ विश्वविद्यालय या उत्तर प्रदेश या अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलेगा , पर मिला.  सोचती  हूँ कि कहाँ एक छोटे शहर की छोटे कद की यू.पी बोर्ड में पढ़ी एक सामान्य परिवार की लड़की को  ब्रिटेन में अपनी बात रखने,  वहाँ की बात समझने, पूरब से पश्चिम  ऑक्सफ़ोर्ड, ब्रिटेन की पार्लियामेंट में जाने का मौका मिलेगा. पूरब की इस बेटी ने वहां भी लोगों की उम्मीद पर अपने को परखा.

ब्रिटेन में ऋचा

और अब सीधे जनता के बीच, इलाहाबद (पश्चिम) से  विधानसभा उम्मीदवार के रूप में. उम्मीद है जनता मुझे यह नई जिम्मेवारी भी सौपेंगी. अपने प्रतिनिधित्व की जिम्मेवारी. लोकतंत्र में मेरी दूसरी पारी शुरू हो चुकी है. एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार ( पिता बिजली विभाग में इंजीनियर और माँ गृहिणी) में 4 बहनों और दो भाईयों के बीच सबसे छोटी संतान , मैं,  बिना किसी राजनीतिक विरासत के राजनीति की नई पारी की ओर जा रही हूँ, जहां राजनीति मेरे लिए सिर्फ सत्ता और सियासत का एक गठजोड़ भर नहीं होगी, बल्कि उसके मूल्य मेरे लिए  जनता के हित में निहित हैं. उम्मीद है छात्रसंघ की ही तरह इस नई चुनौती को भी मैं बखूबी जी सकूंगी.

क्रमशः जारी आप भी परिचय करा  सकते हैं  महिला नेतृत्व से. पूरी योजना के लिए क्लिक करें ( क्या महिला नेतृत्व की खोज में आप हमारे साथ शामिल होंगे  )

यौन हमलावारों से सख्ती से निपटें पीड़िताएं, तभी रुकेंगी बैंगलोर जैसी घटनाएं

तारा शंकर

Crime against women in Delhi विषय  पर जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से 2016 में पीएचडी
वर्तमान में कमला नेहरु कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर अध्यापन . संपर्क :tarashanker11@gmail.com

समाज में सेक्सिस्ट व्यवहार किस कदर हावी  है, इसका एक बड़ा उदाहरण है बैंगलोर की घटना. दुखद यह है कि पुलिस कह रही है कि इस मसले पर उससे किसी ने शिकायत नहीं की है. ऐसा इसलिए होता है कि पीडिताएं उलटा अपनी ही तथाकथित बदनामी के डर से अपने खिलाफ हुए यौन दुर्व्यवहार को छिपाती हैं. अपने खिलाफ हुए  दुर्व्यवहार को सार्वजनिक किये जाने को जरूरी बता रहे हैं ‘दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ’ अपराध विषय पर पी एचडी करने चुके  तारा शंकर 


अक्सर  ऐसा होता है कि बहुत सारी महिलायें छेड़खानी, लैंगिक शोषण अथवा बलात्कार के बारे में अपनी आपबीती घटना के बहुत समय बाद कह पाने की हिम्मत कर पाती हैं. कुछ महिलायें अपनी आपबीती दोस्तों से सालों बाद शेयर करती हैं. इसलिए नहीं कि उनके मन में बदला लेने का भाव है या अब वो उसपर कोई कानूनी एक्शन लेना चाहती हैं बल्कि शायद इसलिए कि उनके अंदर का बोझ, गुस्सा और उस घटना के समय तत्काल कुछ न कर पाने का मलाल कुछ कम हो सके. अधिकांश महिलायें अपराधबोध, शर्मिंदगी, बेइज्ज़ती, और इस मलाल के साथ महीनों, वर्षों चुप रहती हैं कि घटना के समय वो कुछ बोल क्यों नहीं सकीं, विरोध क्यों नहीं जता सकीं. उनमें से तमाम ये कहती हैं कि उनके साथ जब छेड़खानी हुई तो जब तक वे  कुछ समझ पातीं, तब तक प्रतिक्रिया का समय निकल गया और अपना विरोध नहीं जता सकीं या उसको दो थप्पड़ नहीं लगा सकीं. इसलिए आज भी कहीं न कहीं ऐसा न कर पाने का मलाल और अपराधबोध उनके मन के किसी कोने में रहता है. शायद ये आपबीती शेयर करके वे इसी मलाल व अपराधबोध वाले गुस्से और दुःख के मिश्रण को कुछ कम करना चाहती हैं. कुछ महिला दोस्त समझना चाहती हैं कि ऐसा क्या था जिसने उन्हें तुरंत प्रतिक्रिया देने से रोक दिया. और अगर ऐसा कुछ आइन्दा उनके साथ होता है तो क्या करना चाहिये. बचपन से लेकर अब तक ऐसी तमाम हरकतों-लैंगिक हिंसाओं के कारण मन में जब तब उठने वाले अपराधबोध और मलाल का क्या किया जाय.
ऐसी किसी घटना को समझने, उस परिस्थिति में होने और उस पर प्रतिक्रिया करने को लेकर कुछ बातें ध्यान में रखनी ज़रूरी हैं:

पहली  तो ये कि आपके साथ जो हो चुका है उसपे पछताने, अपराधबोध के बोझ से दबा हुआ महसूस करने, बेइज्ज़ती महसूस करने अथवा शर्मिंदा होने की कतई  ज़रुरत नहीं क्योंकि ग़लत आपने नहीं किया, बल्कि ग़लत आपके साथ हुआ है. इसलिए दूसरों द्वारा की गयी ग़लतियों की सज़ा ख़ुद को बिल्कुल न दें. ये सब उसके लिए छोड़ दो जिसने,  आपके साथ ऐसा किया है.

दूसरी , ये बात जितनी जल्दी समझ लें उतना ही बेहतर होगा कि कि समाज ने आपकी देह की कीमत तय कर रखी है, आपकी वैल्यू उन्होंने परिवार-जात-बिरादर-समाज की इज्ज़त से बाँध रखी है, आपकी स्वतंत्र पहचान को उन्होंने आपकी देह से अटैच कर रखा है. इसलिए ऐसी किसी घटना पर अगर आप शर्मिंदगी, अपराधबोध अथवा बेइज्ज़त महसूस कर रही हैं तो आप उन्हीं को सही साबित कर रही हैं. इसीलिए समाज ऐसी किसी घटना पर अक्सर ऐसे बकवास करता है कि ‘उसकी तो इज्ज़त ही लूट गयी’, ‘वो जिंदा लाश बन कर रह गयी है’, ‘अब वो जीकर क्या करेगी’, ‘कौन करेगा उससे शादी’, ‘कैसे मुँह उठाकर जी पायेगी वो बेचारी’… इत्यादि. और जब आप इसे अपने ऊपर अप्लाई भी कर लेती हैं. क्यों भला? तो पहले इन बेमतलब की बातों को अपने ऊपर लेना ही बंद कीजिये, इनको बेअसर कीजिये. और छेड़खानी, लैंगिक शोषण या बलात्कार के बाद पहले से अधिक ऊँचा सर करके चलें, लोगों से नज़रें मिलाकर चलें, सीना तान के चलें, सफ़ाई नहीं देनी है क्योंकि आप इसके लिए उत्तरदायी नहीं हैं, क्योंकि ग़लती आपने नहीं किसी और ने की है. बेचारी-बेचारा इस समाज की सोच है, तुम नहीं. इस फ़र्ज़ी ‘इज्ज़त’ के बोझ को उतार फेंकिये. अगर तुम जिंदा हो, ख़ुश हो, बेख़ौफ़ हो तो इज्ज़त-पिज्ज़त की किसे परवाह, वो आती रहेगी-जाती रहेगी.

तीसरी, आप छेड़खानी होते समय विरोध क्यों नहीं जता सकी इसका का भी उत्तर  सोशल कंडीशनिंग में छिपा है. उस वक़्त आप  शर्म, डर, ‘बेइज्ज़ती’, विरोध करने के बाद कोई साथ नहीं खड़ा हुआ  वाली सोच, मैं ख़ुद को सही साबित न कर पायी तो टाइप की कई सोच के एक साथ दिमाग़ में चलने के कारण विरोध नहीं कर सकीं. तो अब? कोई बात नहीं. आइंदा के लिए सतर्क हो जाओ. छेड़खानी अक्सर भीड़ में होती है, इसलिए वहीं कूट दो, हल्ला मचाना शुरू कर दो, आपकी तेज़ आवाज़ सामने वाली के लिए सबसे बड़ा चैलेंज होगा, पूरा बवाल काट दो वहीं लेकिन शर्मिंदगी, बेइज्ज़ती के डर से चुप मत रहना क्योंकि विरोध करोगी तो भीड़ में बहुत सारे अच्छे लोग भी होते हैं जो तुम्हारे साथ खड़े हो जायेंगे और कुछ तो अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए ही सही, तुम्हारे पक्ष में झट खड़े हो जायेंगे.

चौथी, छेड़खानी या बलात्कार जैसी किसी आपबीती के बाद आपको अगर कुछ महसूस ही करना है तो वो है गुस्सा. गुस्सा ऐसे लोगों को संबल देने वाली, पैदा करने वाली सामाजिक संरचना पर, मानसिकता पर. और फिर इस गुस्से को चैनलाइज़ करना है कि भविष्य में ऐसा कुछ होने पर चुप नहीं रहना है, किसी अन्य लड़की के साथ ऐसा न हो इसके लिए प्रयास करने की.

पाँचवी, कई बार होता है कि ऑफेंडर आपसे शारीरिक रूप से, सामाजिक अथवा पेशे की हैसियत से मजबूत है और आप तुरंत प्रतिक्रिया नहीं कर सकीं या सच कहो तो डर गयीं. तो भी कोई बात नहीं, बाद में ही सही हिम्मत जुटाओ और पुलिस में जाओ, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को लिख डालो, ट्वीट कर दो, सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी बात कहो, न्यूज़ मीडिया सब जगह बवाल मचा दो लेकिन छोड़ो मत. घर वाले साथ न दें तो अकेले ही भिड़ जाओ लेकिन जिंदा लाश, इज्ज़त लुटी, शर्मिंदगी की मारी बेबस लड़की बनकर अपराधबोध मत ढोना.

छठी, अक्सर ऐसे लोग जान-पहचान के होते हैं अथवा रिश्तेदार या फैमिली वाले होते हैं (जैसे नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो, इंडिया 2013 के मुताबिक़ बलात्कार के लगभग 86% ऐसे ममलों में जान-पहचान के लोग शामिल होते हैं). ऐसे में तो और भी ज़ोर से बोलो. क्योंकि ऐसे मामलों में मानसिक-मनोवैज्ञानिक शोषण सर्वाधिक होता है. ख़ुद के अंदर का एस्टीम, ख़ुद्दारी मरने मत दो. सिर्फ़ अपने बारे में नहीं बल्कि अपने जैसी लाखों लड़कियों के बारे में सोचो. बोलोगी तभी तुम्हारे साथ माँ-बाप अथवा कोई भी खड़ा होगा वरना सब तुम्हें ही चुप रहने की सलाह देते रहेंगे. ऐसे कई मामले सुनने में आते रहते हैं कि लैंगिक शोषण करने वाला सौतेला या सगा भाई होता है, बाप, मामा-चाचा इत्यादि नज़दीकी लोग होते हैं! अक्सर ऐसी चीजें बचपन से शुरू हो जाती हैं. और कई बार तो आपको पता तक नहीं होता कि आपके साथ क्या हो रहा है और जब एहसास होता है तब तक ये सब बंद हो चुका होता है लेकिन पिछली हरकतें याद करके आप अंदर ही अंदर गुस्से-अपमान-रिश्ते की आड़ में शोषित किये जाने से टूटती रहती हैं. ये बात आपको रह-रहकर परेशान करता रहता है. कुछ के साथ तो ये बहुत बाद तक होता रहता है. बोलने पर अक्सर घर वाले ही मामले को दबा देना चाहते हैं, आपको मुँह बंद रखने की सलाह देते हैं और कई बार आपकी बात पर किसी को यकीन ही नहीं होता. आप प्रायः ऐसे लोगों से उम्र में बहुत छोटे होते हो तो कई तरह का भय आपको चुप रहने पर मजबूर करता रहता है लेकिन ये बेबसी आपको खाये जाती है. ऐसे में सलाह ये है कि आप पुरज़ोर तरीक़े से इसका विरोध करें, अपना मुँह खोलें. वो रिश्ता ही क्यों बचाना जो शोषण कर रहा हो? उस घर को ही क्यों बचाना जो शोषण पर आपका साथ नहीं दे रहा है? बेइज़्ज़ती के डर से ख़ुद को अंदर से क्यों खत्म करना? मुँह खोलने पर ख़ुद सही साबित न कर पाने का डर हो तो सबूत इकठ्ठा करके मुँह खोलो. क़ानूनी सलाह का सहारा लें. किसी भरोसेमंद दोस्त को या जिस पर भी आपको पक्का यकीन हो ये बाते शेयर करें. और कोई भी साथ न दे तो अकेले लड़ो, सबसे लद जाओ. रिश्तों के नाम पर इमोशनली कमज़ोर नहीं होना है क्योंकि जब आप ही बचोगे तो रिश्ते-घर-परिवार इज्ज़त क्या बचेंगे. अपने शोषण की शर्त पर किसी रिश्ते को बचाना मूर्खता है. ख़ुद को बचाने के लिए अटूट हिम्मत से आवाज़ उठाओ. सोशल मीडिया का ज़माना है, बात बहुत जल्दी फैलती है, उसको हथियार बनाओ. बहुत लोग हैं जो तुम्हारे साथ खड़े मिलेंगे!

सातवीं, छेड़खानी, सेक्सुअल हरैस्मेंट, बलात्कार इत्यादि से सम्बंधित अद्यतन (लेटेस्ट) कानूनी प्रावधानों व प्रक्रियाओं की जानकारी रखें. मतलब ये कि क्या-क्या हरकतें सेक्सुअल हरैस्मेंट अथवा छेड़खानी की परिभाषा में आती हैं, किन-किन हरकतों के कितनी सज़ा-जेल (ज़मानती अथवा ग़ैर-ज़मानती) का प्रावधान है. पुलिस अथवा अन्य किसी सरकारी-ग़ैर सरकारी संस्था में शिकायत कैसे दर्ज़ करायी जा सकती है..इत्यादि. जैसे निर्भया गैंग रेप के बाद 2013 में बने एक्ट में छेड़खानी, सेक्सुअल हरैस्मेंट, बलात्कार से सम्बंधित बहुत सारे बदलाव लाये गए हैं. यकीन मानिये इससे आपको बहुत मानसिक हिम्मत मिलती है.

आठवीं, आपको अपनी दैहिक भाषा (बॉडी लैंग्वेज) एकदम निडर रखना चाहिए. छेड़खानी करने वाले, सेक्सुअल एडवांस दिखाने वालों की आधी हिम्मत आपकी बॉडी लैंग्वेज से ही परास्त हो जाती है. नज़रें झुकायें नहीं, शर्मायें और आपके शरीर में ऐसा कुछ नहीं जिसको आप हमेशा ढँकने की जुगत में चिंतित दिखें.
अंतिम बात, ये कि समाज हमेशा से तुम्हारे शरीर से ‘इज्ज़त’ या एक खास ‘पहचान’ जोड़कर उसकी ‘कीमत’ तय करता है! आपकी उम्र, आपकी लंबाई, किसी अंग विशेष के आकार-आकृति-स्वरुप, आपके रंग, आपकी वैवाहिक स्थिति, आपकी जाति-धर्म अथवा आर्थिक हैसियत के आधार पर आपकी कीमत तय करता है. और इसी ‘कीमत’ के आधार पर समाज आपकी सेक्सुअलिटी, कहीं आना-जाना (मोबिलिटी), शादी, प्रेम, आपके कार्यों इत्यादि को कण्ट्रोल करता है और मौका मिलते ही कैश भी करता है. इसी कीमत को ये समाज छेड़खानी हो जाने, लैंगिक शोषण या बलात्कार होने की स्थिति में ‘लुट’ जाना कहती है यानि कीमत को कोई और चुरा ले गया और आपकी वैल्यू थोड़ी कम हो गयी. और जब तब आप भी ऐसा मानती रहेंगी, तब तक आप इसी समाज को सही ठहरा रही होंगी. और तब तक आपको अपराधबोध भी होता रहेगा, शर्मिदगी भी होती रहेगी, आपको कभी-कभी आत्महंता सोच भी आएगी, पहचान का संकट आयेगा. इसी ‘कीमत’ को, फ़र्ज़ी ‘इज्ज़त’ को सबसे पहले दिमाग़ से निकालो. आपका स्वतंत्र अस्तित्व, आपकी आज़ादी इसका मोहताज़ नहीं. आपकी पहचान आपकी देह, आपकी जाति-धर्म, घर-परिवार-रिश्तों, उम्र, रंग से नहीं होनी चाहिए.आपका अस्तित्व इनमें से किसी के बदौलत नहीं है.

मैं भी हो सकती थी उस दिन यौन हमले की शिकार

मनीषा झालान

एक साल पहले मैं  जॉब ढूंढ रही थी मुझे साउथ इंडिया घूमना था और बैंगलोर मेरी पहली चॉइस थी बहुत कोशिश के बाद मुझे बैंगलोर में जॉब मिल गई। घूमने के अलावा बैंगलोर आने का सबसे बड़ा कारण सुरक्षा भी था। यहाँ पूरे देश से क्राउड आता है खासकर आई टी कंपनियों में तो बहुत डिसेंट क्राउड लगता है। ज्यादातर लोग अलग अलग राज्यों से है। मैं यहाँ  बहुत सुरक्षित महसूस कर रही थी शनिवार को इंदिरानगर  एम जी रोड जाना शॉपिंग करना मेट्रो में घूमना पार्क जाना मुझे कभी डर नहीं लगा।

मनीषा झालान

31 दिसंबर की रात मैं अपनी दोस्त के साथ फिनिक्स मॉल गई, हम दोनों ऑफिस से लेट फ्री हुए तो डिनर का प्लान बाहर ही बना। 12 बजे वापस पहुचे. सुबह मैंने न्यूज़ पढ़ा  कि बैंगलोर में इंदिरानगर ब्रिगेड रोड पर कई युवा अपनी घटिया सोच का प्रदर्शन कर रहे थे।  एक पल के लिए मेरी बॉडी सुन्न हो गई, फिर मुझे लगा अगर फीनिक्स मॉल की जगह हम इंदिरानगर गए होते तो हम भी इस सड़न का शिकार हो जातीं!

मंत्री जी लड़कियों को दोषी बता रहे हैं, जानते है क्यों? क्योंकि हमारी जड़ें सड़ रही है.  मंत्री जी जो कह
रहे हैं, उसी तरह का नरिशमेंट होता है हमारा।  फेसबुक पर कई लोगो ने लिखा. लेकिन मैं  इतनी असहाय महसूस कर रही थी लगा क्या लिखूं ? आज फिर विडियो देखा अकेली लड़की को एक बाइक सवार
अपनी मानसिकता का शिकार बना रहा है अभी भी बॉडी में कम्पन हो रही है रोना भी आ रहा है , मंत्रियों के बयान  बहुत ही हेल्पलेस महसूस होता है।  अभी की बोर्ड पर टाइप करते हुए हाथ काँप रहे है

मैं सोचती थी दिल्ली में कभी जॉब नहीं करुँगी इसलिए सेफ सिटीज में कोशिश करने लगी, इतना घूमने के बाद जब सब ठीक लग रहा था तो सब कुछ बिलकुल उल्टा लगने लगा। अब समझ आई  बात  किबात जगह की तो है ही नहीं बात हमारी सोच की है , हमारे नरिशमेंट की है। आज भी अच्छी लड़की बुरी लड़की वाले टैग से लड़कियों को सुसज्जित किया जाता है लड़की के साथ कुछ गलत हो तो सीधा उसके कपड़ों , घर से निकलने के टाइम या यूँ कहे सीधे करेक्टर से छानबीन की जाती है।

कितने पुलिस वाले थे या नहीं थे , क्यों रोक नहीं पाए , केस किया नहीं किया ये सब अपनी जगह है जो कुछ हुआ वो सुरक्षा की और नहीं हमारी सोच की और उंगली उठाता है , क्या हमारी जड़ें सड़ नहीं रही ?

क्या हमे अपने घरों में इन सबके बारे में बात नहीं करनी चाहिए ? घरों में बस तब बात होती है जब रेप होता है या ऐसे कोई केस और दोष कपड़ों , देर रात घूमने पर लगाया जाता है। एक लड़की के घर से देर से निकलने से आज हमारी समझ को उसे जो मर्जी आये कहने या करने का हक़ मिल जाता है ? दो इंसानों (लड़का- लड़की ) के लिए अलग- अलग कायदे जो हमारी सोच से उपजे है ये है हमारा कल्चर ?

सच तो यह  है कि हमारी सोच सिकुड़ती जा रही है ,आज भी  बैंगलोर जैसे घटना  होने पर हम घर की लड़कियों से बात करते है और उन्हें नसीहत देते है,  शायद ही कोई लड़कों को पूछता या बताता है कि ये घटियापन है जो हो रहा है तुम इसका शिकार तो नहीं। बीमार कोई और है इलाज़ किसी और का हो रहा है और इस तरह सब गड़बड़ हो रहा है। लड़कियों से कितने सेफ या अनसेफ के सवाल पूछे जा रहे हैं, और लड़को से कोई बात नहीं कर रहा इसलिए हम घूम फिरकर वही आकर फिर से गलत इंसान का ट्रीटमेंट कर रहे है।

हमारा समाज (जो की हम ही है ) हमे ऐसे इंसिडेंट्स में नार्मल महसूस करना सिखाता है ये कहकर कि सब ठीक हो जायेगा तुम बस घर से देर रात बाहर मत रहना , कपड़े जरा अच्छे से पहनना वगैरह -वगैरह  (क्योंकि लिस्ट लंबी है लड़की होने की वजह से) .

हाँ, अभी असहाय महसूस हो रहा है, लेकिन अपने सपनों को पूरा करने किए लिए घर की चारदीवारी में नहीं रह सकते। मेरे जैसी कई लड़कियां है बैंगलोरे में जो अभी सहमी है , डरी है लेकिन किसी ने हिम्मत नहीं हारी शायद हमारा सिस्टम हमे अपने ‘चलता है रैवये’ का आदि होना सीखा रहा है जो की हमारे राष्ट्र के लिए बहुत घातक है। कई लोग कह रहे है लिखने से क्या होगा बड़ा फेमिनिस्ट बन रहे है ये सुनके हंसी भी आती है तरस भी क्योंकि हम अपना आक्रोश जताने के लिए लिखेंगे भी , धरने में भी शामिल होंगे और जब ऐसा  कुछ हमारे साथ होगा तो घटिया मानसिकता वालों को सबक भी सिखाएंगे।

बस  सभी लड़कियों और माँ बाप से कि न तो लड़कियों घर से निकलना छोड़ो और न ही माँ बाप लड़कियों को सलाह दें कि ऐसे कपड़े पहनो जल्दी घर आ जाओ या फिर घर से इस समय के बाद बाहर न निकलो।

हमे मजबूत तो होना ही है और घटिया मानसिकता वालों को सबक भी सिखाना है, हाथ पैर हमारे भी हैं ।  शर्म,  हया , हम घर की इज़्ज़त जैसी बातों को दिमाग से निकालना होगा अब लड़ना होगा , लड़ना नहीं आता तो सीखना होगा,  बहुत ही  चौक्कना रहना होगा इस सड़न लगे समाज में रहने के लिए।  जी तो रहे है क्यों न फिर इस घटिया मानसिकता से लड़ते हुए जिएं और आने वाली पीढ़ी का नरिशमेंट अच्छे से करें ताकि हमारी बच्चियों को न लड़ना पड़े।  वो हमे छुएं तो हाथ- पैर तोड़ने की हिम्मत हम भी रखें।  चलो अब लड़ना सीखते हैं ।

शैलजा की कविताएं

शैलजा

विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताएं,
एक किताब भी प्रकाशित-
‘मैं एक देह हूँ फिर देहरी ‘ संपर्क : pndpinki2@gmail.com .

पोथी पढ़ने से जिनगी नही समझी जाती बबुनी

सरौता पे बादल नही कटता बबुनी
न पानी में फसल जमता है
मिट्टी बड़ी जरूरी है

भठ्ठी पर सपना जला कर खाना पकाने वाली
चाची सब जानती हैं
कौनो रस्ता सरग नरक नही जाता
सिनोहरा में भर के बन्द रहता है लड़की सब का मन
ऊपर से रीती नीति का डोरी से कसा हुआ

हसिया से रेत दी जाय गर्दन
जो सीवान तक घूम आये औरत
वही हसिया से खेत काटती
मुँह छुपाये
कितने जमीदारो के सामने उघाड़ दी जाती
मुँह तब भी ढकी रहे

लड़कियों के पालने में उप्पर घुमे वाला रंगीन छतरी नही लगाते
जमीन के कोने लकड़ी का लोला रखते है
ये रंग और भूख वही से चूस लेती हैं

हम आवाज के कसोरी में
दर्द का लेप बनाते हैं
छुटका को लोरी गाते हम सुलाते भर नही
रोते हैं भीतरे भीतर

हमरा रोने का टाइम नही रे
बल्कि हमरा तो टाईम ही नही

बक्सा में तहे में रखा है शादी का चुनर
पति के साथ गाँठ बंधा
पियरा गए समय की तारीख बन्धी है

औरत लोग
बक्सा सरियाती कम
चावल हल्दी से बतियाती है
बक्सा के अँधेरे में मुड़ी गाड़ के रोती रहती है
आकाश  पताल कुछ नै होता बबुनी

धर्म कर्म व्रत उपवास

चक्कू  की धार पर मिर्ची लहसुन नही
इच्छायें कुतरी जाती हैं
चौकी से चौखट तक की गोल गोल यात्रा

दुनियाँ गोल है न बबुनी ????

कोई पुरानी चोट पर मरहम लगा दो रे

एक झूला था

झूले में लटका पीढ़ा था
पीढ़े पर बैठी गुड़िया थी
जो आसमान से ड़रती थी
जो आँखें मूंदे रहती थी
तुम पिंग बढ़ाते थे जब जब
वो तुमसे लिपटी रहती थी
वो कहाँ गई ?

पूछो बरगद से पीपल से
पूछो आँगन की मिट्टी से
पूछो सखियों की कट्टी से
भैया से चाहो तो पूछो
अम्मा से पूछो पापा से
वो गई कहाँ ?

चाहो तो आँगन से पूछो
रूठे छाजन से पूछो
गूंगे पायल से भी पूछो
चूल्हे चौके से पूछो न
जो आग दहकती है उसमें
झुलसी उस चिड़िया से पूछो
वो कहाँ गई ?

दरवाजे की चौखट देखो
नन्हे निशान जो उभरे हैं
उस भूरी बिल्ली से पूछो
जो गुमसुम बैठी है छत पर
अलँगी पर उसकी चुनर है
वो राधा बनती थी अक्सर
फोटो के कान्हां से पूछो
वो कहाँ गई

एक झूला था
एक चूल्हा था
एक आँगन था
कुछ छमछम थी
एक गुड़िया थी
खो दी तुमनें

कोई रूठे
कोई छूटे
हम भूल उन्हें क्यों जाते हैं
क्यों वापस खोज नही लाते
क्यों मान मनौवल भूल गए

एक जंगल था
एक पीपल था
एक गुड़िया जो कबसे नही मिली…

ढूंढो उसको…

तुम चोटी करना भूलोगी
तुम रिबन चूड़ी भूलोगे
तुम काजल बिंदी भूलोगे
तुम भूलोगे लंहगा घाघर
तुम नदियां सागर भूलोगे

ये आधी दुनियाँ मुठ्ठी में
चुप चाप लिए खो जाएँगी….