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रण में सामाजिक सक्रियता की मिसाल हैं पंक्ति जोग

गुजरात के रण में नमक बनाने वाले समुदाय अगरिया को संगठित करने वाली ‘पंक्ति जोग’ की कहानी संघर्ष और नेतृत्व कौशल की कहानी है. पंक्ति सूचना अधिकार के क्षेत्र में भी काम करती रही हैं. ‘स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत उनके काम और संघर्ष बता रहे हैं श्याम मारू. 





पंक्ति  जोग उत्तरी  गोवा के एक आदिवासी इलाके में बसे सोनल गाँव की रहने वाली हैं. बचपन और स्कूल के दिन काफी कठिनाईयों से गुजरे. गोवा के पहाड़ी क्षेत्र में बसे होने से स्कूल आने-जाने में काफी तकलीफ भी झेला, लेकिन पढाई जारी रखी.

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बचपन को याद करते हुए पंक्ति बताती हैं कि 8वें दशक में बिजली नहीं होती थी, रास्ते बड़े बेतरतीब होते. गोवा में 8 महीने तक बारिस का मौसम रहता था. पिता छोटे-छोटे व्यवसाय करते थे, जैसे मोटरसायकल के पायलेट का काम करने से लेकर परम्परागत व्यवसाय के तौर पर किसी और की खेती का काम तक, उससे ही परिवार का गुजारा होता था. पिता और घर की मदद के लिए पंक्ति मोमबत्ती बनाने का भी काम करती थी- काम के साथ पढाई जारी रखी उन्होंने.

आठ साल की उम्र में ही साने गुरूजी की पुस्तक ‘श्याम की माँ’ पढ़ी, जिसने उन्हें काफी प्रभावित किया. बाबा आम्टे के बारे में जानने के बाद बारह  साल की उम्र में ही उन्होंने बाबा आम्टेको पत्र लिखकर उनसे जुड़ने की इच्छा व्यक्त की.

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दसवीं तक शिक्षा छोटे शहरों से से पूरी हुई, आगे की पढाई पूरी करने के लिए बड़े शहर तक जाना हुआ और  फिजिक्स में  मास्टर डिग्री तक पढाई पूरी की.  कॉलेज की पढाई के साथ ‘साने गुरूजी’ के राष्ट्र सेवा दल के साथ जुडी,  और साथी विद्यार्थियों का एक ग्रुप बनाया. उस ग्रूप ने  स्लम इलाके के उन बच्चों को पढ़ना शुरू किया, जो पढाई नहीं कर पा रहे थे.

पंक्ति मास्टर्स इन सोशल वर्क की पढाई करना चाहती थी, दाखिला भी लिया, मगर कुछ कारणों से पढाई छोडनी पड़ी. हालांकि बताती हैं कि सामाजिक संस्था ‘जनपथ’ के साथ काम करते करते हुए कॉलेज और पाठ्यक्रम से बेहतर शिक्षा उन्हें मिल गई है.

फिजिक्स में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद पंक्ति ने  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओसियोनोग्राफी (NIO) में 1998 से 2001 तक रिसर्चर के तौर पर काम किया. यहीं से पीएच. डी  की आगे की पढाई पूरी करनी थी, मगर 2001 में आये गुजरात के भूकंप के बारे में सुनकर गुजरात जाने की इच्छा व्यक्त की,  संस्था के डायरेक्टर उन्हें मना कर दिया. भूकंप की विभीषिका को देखते हुए वे पीड़ा में थीं और जनवरी से लेकर सितंबर तक मनोमंथन में रहीं. फिर ‘जनपथ’ के उस वक्त के संचालक सुखदेव भाई से ईमेल पर संपर्क किया और गुजरात आने की और ‘जनपथ’ के साथ जुड़कर भूकंप की परिस्थितयों पर काम करने की इच्छा व्यक्त की. सुखदेव भाई के सकारात्मक जवाब से 15 दिनकी छुट्टी लेकर गुजरात आयी और फिर वहीं रह कर आगे काम करने का मन बना लिया. (NIO) से इस्तीफा दे दिया और परिवार में भी किसी को बताया नहीं, वे उसी वकत एनआईओ   से फ़्रांस जाने की स्कोलरशिप और पीएच.डी कर  कर वैज्ञानिक बनने की आशा छोड़कर  गुजरात चली आयीं और यही से गुजरात से नाता जुडा.

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जनपथ के साथ सामाजिक काम की शरुआत


2001 से गुजरात के भूकंप में जनपथ के साथ काम करने की शुरुआत हुई. पंक्ति बताती हैं कि “यहाँ मुझे शुरुआत से ही अपनी स्वतंत्रता से काम करने की आजादी रही है, साथ ही जनपथ के सभी वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं के अनुभव का भी लाभ मिलता रहा. पहले फेज में 4 साल तक चाइल्ड एंड प्रोग्राम में काम किया और कम्यूनिटी आधारित पुनर्वास का  काम किया, कच्छ में कुछ वक्त तक थेलेसेमिया ग्रस्त बच्चो के साथ भी काम किया और वहीं पर थेलेसेमिया ग्रस्त बच्चो के माता- पिता के साथ मिलकर संगठन बना कर उनको ही संचालक बना दिया.”

अगरियों (नमक उत्पादन में काम करने वाले मजदूर) के साथ काम की शुरुआत 

पंक्ति बताती हैं, ‘1998 से गुजरात में जनपथ का वैचारिक रूप  से काम चल रहा था और व्यक्तिगत रूप से मुझे 2 बातों में रूचि रही,  अगरियों के बारे में और सूचना अधिकार आंदोलन में. इसी वजह से अगरियों  के साथ मिलकर उन्हें संगठित करने का काम शुरू किया- उनके बीच काम करते हुए पहली बात जो जरूरी लगी वह यह कि रण में जो नमक पकाने वाले अगरिया हैं, उनके बीच सबसे पहले एकता और संगठन की जरूरत है.  उस वक्त उनके बीच एक-दो संस्थायें काम कर रही थीं और सबसे बड़ी चुनौती अगरियों के अंदर से ही नेतृत्व उभारने की, ताकि वे अपने बल पर अपने प्रश्नों को हल करें, यही सबसे बड़ी चुनोती थी.

अगरिया समुदाय रणमें नमक पकाने का काम 600 साल से कर रहा है, यह काम व्यावसायिक भी है, लेकिन  आज भी उनके काम की  पहचान गैररक़ानूनी ही है,  जो उनकी लड़ाई का प्रथम मुद्दा रहा है.  सन 1972 में रण को अभ्यारण्य में परिवर्तित करते ही उनको वहां से हटाया जाने लगा.  सरकार के द्वारा व्यवसायिक पहचान पत्र न होने के कारण और सरकार के द्वारा ऐसी किसी पहचान पत्र की व्यवस्था न होने के कारण फ़ॉरेस्ट विभाग के अधिकारियों को घूस देकर करते रहे. पहचानके साथ सामाजिक जीवन की व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं हो रही थी. आरोग्य, शिक्षा, पानी जैसी काफी मुश्किलें  आज भी उन्हें झेलनी पड़ती हैं.”

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दस साल की मेहनत के बदौलत अगरिया हित रक्षक मंच की रचना हुई, दस साल की कड़ी महेनत से पंक्ति ने अगरियों को खुद के बल पर अपने प्रश्नों को हल करने की स्थिति में खडा किया और उनमे से ही नेतृत्व भी खड़ा किया है. आज खुद अगरिया अपनी पहचान के लिये सरकार और व्यवस्था के सामने प्रश्न पूछता है. नेतृत्व के माध्यम से अपने ही संगठन के रूप में अगरिया काम करे यह ध्येय था. पंक्ति के द्वारा दस साल की महेनत में आज 400 से भी ज्यादा अगरिया संगठित स्वरुप में संघर्ष में शामिल हुए हैं. आज सभी अगरिया सूचना अधिकार,  नरेगा, फ़ॉरेस्ट राइट एक्ट और बाकि सब अपने हक़ के बारे में सक्रिय हैं. शैक्षणिक तालीम नहीं ली होने के बाद भी वे प्रक्रिया और कार्यवाही की समझ रखते है. समय के साथ वह सरकार के सामने आवाज भी उठाते  हैं और साथ ही सरकार की योजनाओं में मदद भी करते हैं.

पंक्ति का मानना है कि अगर सिर्फ उनकी सुविधाओ के लिये ही काम किया होता तो उनसे लंबी दूरी तक जाना मुश्किल होता- कुछ समय के लिये समाधान मिलता मगर वह स्थाई नहीं होता.  आज राज्य के चार जिलों में  कच्छ,पाटन,सुरेंद्र्नगर,मोरबी में अगरियों के लिये विकास समिति की स्थापना हुई है और सभी समिति में खुद अगरियाभी सदस्य के रूप में शामिल हैं.  संगठन के कार्य में महिलाओ की भूमिका के बारे में बताते हुए पंक्ति कहती हैं, ‘आज अगरियों के परिवार से महिलायें पूरी तरह भागीदार नहीं बन पाई हैं, इसकी वजह रण में परिवहन की कमी है. एक जगह से दूसरी जगह जाना और मदद के कामो में भागीदार बनना, परिवहन की असुविधा और खुद उसके लिए सक्षम न होने के कारण संभव नहीं हप पाता है, मगर धीरे – धीरे इसे भी ख़त्म करने की कोशिश की जा रही है.

घरेलू कामगार महिलाओं की दीदी: संगीता सुभाषिणी

पंक्ति कहती हैं, ‘व्यक्तिगत कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और न रहेगी. बस सूचना अधिकार के काम में ही आगे बढकर काम करना है और इसी काम को लगातार करते रहना है . सूचना अधिकार में मेरा अपना पूरा विश्वास है और गाँव के सबसे आख़िरी व्यक्ति को इसका लाभ हो यही लक्ष्य है.

श्याम मारू  सामाजिक कार्यकर्ता हैं और विकास पत्रकारिता से जुड़े हैं. संपर्क : 9512373724

बलात्कार के विरोध में आवाज बनी बेला भाटिया को मिली घर छोड़ने की धमकी

बस्तर के आदिवासियों के बीच काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया को कुछ अज्ञात लोगों ने बस्तर छोड़ देने की धमकी दी थी. भाटिया के अनुसार सोमवार सुबह लगभग 30 लोग कई गाड़ियों में उनके घर पहुंचे और उनसे तुरंत बस्तर छोड़ चले जाने के लिए कहा था और 24 घंटे में ऐसा नहीं करने पर अंजाम भुगतने की चेतावनी दी.छत्तीसगढ़ में काम कर रहे मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह के अनुसार बेला भाटिया के मकान मालिक को कुछ दिन पहले ही धमकी दी गई थी.बस्तर में फ़र्जी मुठभेड़ और आदिवासी महिलाओं के यौन उत्पीड़न को उजागर करने में बेला भाटिया की मुख्य भूमिका रही है. राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और दूसरे संगठनों ने बस्तर पुलिस पर लगे आरोपों को सही पाया

रेप पीड़िता की मदद करने पर मिली धमकी


इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक बस्तर जिला मुख्यालय से दस किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत पंडरीपानी में अक्टूबर 2015 से जनवरी 2016 के बीच एक स्थानीय महिला का कई बार रेप किया गया. इसी मामले में बेला भाटिया मानवाधिकार आयोग के साथ पीड़िता का बयान दर्ज कराने पहुंची थी. यही बात कुछ लोगों को नागंवार गुजरी और उनपर नक्सल गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगा दिया.

बेला की सुरक्षा में पुलिसबल तैनात


सहायक पुलिस महानिरीक्षक पीएचक्यू अभिषेक पाठक ने बताया कि कुछ लोग बेला भाटिया पर नक्सल गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगा रहे थे. इसी के विरोध में वे उनके घर के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे थे. मौके पर पुलिस बल के पहुंचते ही वे वहां से चले गए. बेला भाटिया की सुरक्षा में उपनिरीक्षक कृपाल सिंह गौतम के नेतृत्व में 4 महिला पुलिस कर्मचारियों सहित 15 पुलिस कर्मचारियों का बल तैनात किया गया है.
प्रदर्शन करने वाले लोगों का आरोप है कि बेला के पति जॉन द्रेज विदेशी मूल के हैं और वे देश विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं.

धमकियों पर बेला ने कहा ”मैं किसी धमकी से नहीं डरती हूं, मैं बस्तर में ही रहूंगी और बस्तर छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।” पूरे मामले पर पुलिस का कहना है कि धमकी मिलने के बाद बेला को सुरक्षा मुहैया कराई गई है। इधर इस घटना के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के छत्तीसगढ़ के राज्य सचिव संजय पराते ने कहा कि “बेला भाटिया पर यह हमला इसलिये किया गया है कि विगत दिनों बस्तर में आदिवासी महिलाओं के मानवाधिकारों और उनके साथ बलात्कार किये जाने की घटनाओं की जांच के लिये आये मानवाधिकार आयोग की टीम की उन्होंने मदद की थी. अब यह एक चलन ही बन गया है कि मानवाधिकार हनन की जांच में जो कोई भी मदद करेगा, उन पर ऐसे ही हमले किये जायेंगे. नंदिनी सुन्दर के प्रकरण में भी ऐसा ही देखने को मिला है. मानवाधिकार आयोग द्वारा सरकार और पुलिस की पेशी किये जाने का भी उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है.”
जा रहा था. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि वे बस्तर इलाके से बाहर नहीं जाएंगी.



बस्तर में सक्रिय रही हैं बेला 


बेला नक्सल प्रभावित इलाकों में लंबे समय से काम रही हैं। बीजापुर सहित अन्य इलाकों में वे कई बार फोर्स की ज्यादतियों की खबर उठाती रही हैं और लीगल एड की शालिनी गेरा के साथ भी काम कर चुकी हैं। कुछ ही समय पहले शालिनी गेरा और उसके साथियों ने भी बस्तर छोड़ दिया था और इसके लिए उन्होंने सुरक्षागत कारणों का हवाला देते हुए बस्तर पुलिस को जिम्मेदार ठहाराया था। बेला नक्सल प्रभावित इलाकों में लंबे समय से काम रही हैं। बीजापुर सहित अन्य इलाकों में वे कई बार फोर्स की ज्यादतियों की खबर उठाती रही हैं और लीगल एड की शालिनी गेरा के साथ भी काम कर चुकी हैं। कुछ ही समय पहले शालिनी गेरा और उसके साथियों ने भी बस्तर छोड़ दिया था और इसके लिए उन्होंने सुरक्षागत कारणों का हवाला देते हुए बस्तर पुलिस को जिम्मेदार ठहाराया था। हालांकि सोमवार को पंडरीपानी के ग्रामीणों ने ही बेला के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

उत्पलकान्त अनीस मीडिया शोधार्थी हैं और सूचना तकनीक का आदिवासी महिलाओं पर प्रभाव पर शोध कर रहे हैं।

बस्तर- आईजी ने महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं को दी गाली

 बेला भाटिया के घर पर सोमवार को क़रीब 30 अज्ञात लोगों ने हमला कर उन्हें बस्तर छोड़ देने की धमकी दी थी. इसके बाद बेला भाटिया की मदद की अपील में देश के विभिन्न भागों से सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने छत्तीसगढ़ में बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) एसआरपी कल्लूरी को मदद की अपील के संदेश भेजे थे. इसके जवाब में आईजी एसआरपी कल्लूरी ने सुप्रीम कोर्ट के वकील प्योली स्वातिजा सहित कई  सामाजिक कार्यकर्ताओं को भेजे गये संदेश में अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया .

प्योली ने आईजी एसआरपी कल्लूरी को संदेश भेजा कि “कृपया सुनिश्चित करें कि बेला भाटिया को अपने आवासीय परिसर छोड़ने के लिये मजबूर नहीं किया जाय. इस देश का कानून छत्तीसगढ़ पर भी लागू होता है. प्योली स्वातिजा के मुताबिक़ उनके इस संदेश के जवाब में आईजी कल्लूरी ने लिखा, “नक्सलियों को बस्तर से निकाल बाहर किया जाएगा.”

प्योली का कहना है कि इसके जवाब में जब उन्होंने पूछा, “आपके जवाब का मेरे सवाल से क्या लेना-देना है. कृपया आदिवासियों, एक्टिविस्ट्स, शिक्षाविदों और पत्रकारों का उत्पीड़न बंद कीजिए”, तो जवाब आया “एफ़ यू”.

बीबीसी हिन्दी  रिपोर्ट के अनुसार जब बीबीसी ने जब इस संबंध में आईजी कल्लूरी से बातचीत की  तो उनहोंने ये संदेश भेजने से साफ़ तौर पर इनकार तो नहीं किया पर कहा, “कोई अफ़सर ऐसा करता है क्या, और हमारे फ़ोन में भी कई संदेश हैं, हम भी रिपोर्ट कर रहे हैं, उन्हें भी रिपोर्ट करने दीजिए, हम साइबर एक्सपर्ट से पूरी जांच करवा रहे हैं.”

देखें : बलात्कार के खिलाफ लड़ने वाली बेला को मिली घर छोड़ने की धमकी 


बीबीसी से बातचीत में प्योली ने कहा, “मैं सुप्रीम कोर्ट में वकील हूं और दिल्ली में अपने सुरक्षित कमरे में बैठकर ये संदेश भेज रही थी, अगर वो मुझसे इतनी अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं तो ये बेहद ख़तरनाक है.” प्योली ने कहा कि वो फ़ोन से लिए स्क्रीन-ग्रैब के बल पर फ़ौजदारी मुक़दमा करेंगी और विभागीय जांच की भी मांग करेंगी.

गुनीत कौर और ईशा खंडेलवाल को अपने जवाबी संदेश में भी कल्लूरी ने अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया है.

 खबर स्रोत बीबीसी हिन्दी

रूपा सिंह की कविताएँ

रूपा सिंह

एसोसिएट प्रोफ़ेसर, अलवर, राजस्थान ‘ संपर्क : rupasinghanhadpreet@gmail.com.

1.

सबसे खतरनाक समय शुरू हो रहा है
जब मैं कर लूंगी खुलेआम प्यार।
निकल पडूँगी  अर्धरात्रि दरवाजे से
नदियों में औंटती, भीगती, अघाती
लौट आउंगी अदृश्य  दरवाजे से
घनघोर भीतर।
अब तक देखे थे जितने सपने
सबको बुहार कर करूंगी बाहर।
सीझने दूंगी चूल्हे पर सारे तकाजों को
पकड़ से छूट गये पलों को
सजा लूंगी नई हांडी मैं
और कह दूंगी अपनी
कौंधती इंद्रियों से
रहें वे हमेशा  तैयार मासूम आहटों के लिये।
आज दिग्विजय पर निकली हूं मैं
स्त्रीत्व के सारे हथियार साथ लिये
सबसे खतरनाक समय शुरू हो रहा है
जब  करने लगी हूं मैं खुद से ही प्यार।

2

तुम्हें मैं नहीं जानती-ऐसा नहीं।
खूब पहचानती हूं तुम्हे।
तुम्हारे सांसों की गमक, होंठों की तड़पन
छाती की धमक, सब खूब पहचानती हूं।
उतरी नहीं अभी तो मैं चमड़ी में
दौड़ी नहीं रगों में
खुबी नहीं तुम्हारे चेहरे के तिलों में
चुभन भरी दहकन साथ लिये
भटकी नहीं उबचुभी डाढ़ियों में।

सदियों  पहले आदम की चमड़ियों में
उतर गई थी ऐसे ही
दौड़ पड़ी थी रगों में
भटक गई थी दहकती गुफाओं में।
वहीं की वहीं हूं अब तलक।
मैं खूब पहचानती हूं, तुम्हारी हर चुभन को
गमक को …… धमक को …. एक-एक करतूतों को
तिलों की विरासत को
ऐसा कैसे है कि, तुम नहीं जानते मुझे?

3
रूको …… ठहरो ….।
इत्मीनान से बातें करना चाहती हूं तुमसे।
अपने अंदर जितने अंधेरे थे
सबको दरेर कर बना ली है एक मोमबत्ती।
धागा डाला जिसमें बचे-खुचे स्नेह का।
तुम्हारी मांगें  है मानो दियासलाई का झब्बा
या तो बन जाउं धीमी लौ
या हो जाऊं एकदम स्वाहा
मुझे तय करना है बहुत-कुछ।

रूको …… ठहरो ……।
बहुत चली हूं मैं।
जरा जांच लूं अपने सलामत बचे पैरों को
धन्यवाद करूं उन हाथों को, जिनके सामने फैले तुम।
चेहरे की लुनाई में छुपा होगा दुख का पीलापन
होंठों की खुश्की  ने ही किया होगा उन्हें रक्ताभ रक्तिम।

ठहरो….. रूको…….।
सोचने दो मुझे मेरे बारे में
मेरे अंग कैसे और कब हुए तुम्हारे?
टूटती पीड़ा आज फूटने को तैयार है
अपने फूल चुनने हैं मुझे
अपनी  ही लाश  से

ठहरो …… रूको …….
बातें करुंगी तुमसे
पहले जरा बतिया लूं
अपने आप से..
इत्मीनान  से।

पूनम सिंह की कविताएँ

पूनम सिंह

कथाकार , कवि और आलोचक पूनम सिंह की कहानी , कविता और आलोचाना की कई किताबें प्रकाशित हैं . सम्पर्क : मो॰ 9431281949



क्षमाप्रार्थी


उत्तराखण्ड में कालकलवित हुए
मृतकों के लिए
मेरी कविता ने नहीं रखा था
एक लम्हे का मौन
नहीं जताया था
मृत्यु की बेरूखी पर
कोई अफसोस

उस दिन भी जब
गंगासागर में नहाने गये लोग
नहीं लौटे अपने घर
मैं उदास हुई
मेरी कविता नहीं

ईश्वर की ओर पीठ किये
रतजगी करने वाली मेरी कविता
जिद्दी नासमझ है मित्रों
मैं हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ
उसके लिए

यह कैसा मौजीपन है तुम्हारा

आज जब हमारी सांसें
सलीब परईसा की तरह टंगी है
आँखें डरावने सपनों को देखती
पत्थर हो रही है
पपड़ाये होठों पर शब्द
मूर्छित पड़े  हैं
तुम मल्हार गाने को कह रहे हो ?

विचित्र जीव हो तुम भी
उस  दिन
पूस की ठिठुरती रात में कहने लगे
चलो दरिया में
एक डुबकी लगा आए
यह  रात भी क्या याद करेगी
किसी ने इसके अहंकार को
इस तरह पानी में डुबोया है
यह कैसा मौजीपन है तुम्हारा
कल ही
सियासत के सभागार में
’हुकुम‘ के दहकते अंगारे को तुम
पान की गिलौरी सा
चबाने लगेथे
मैंने नजर की आलपीन चुभोई
तो चिहुँक कर
पच्च से थूक दिया
एक कुल्ला पीक
उस दुधिया कालीन पर
जहाँ पैर रखते हुए
सबने उतार दिये थे
अपने जूते

तब से तुम्हारे हाथों में जूते हैं
पैरों में गाँधी टोपी
एक टाँग पर खड़े

श्वान की विशेष भंगिमा में
बापू के स्मारक पर
जल चढ़ाते हुए
तुम कह रहे हो मुझसे
‘गाँधीबाबा की टोपी आज
सियासत के सिर से उतरकर
पैरों से लिपट गई है
इससे क्या मैं समय शापित
युगपुरूष की
अभ्यर्थना ना करूँ ?
समय के परिवर्तित परिदृश्य पर
कोई प्रतिक्रिया न जताऊँ ?

गाने दो मुझे मौज में
रागमल्हार !
बजाने दो खंजरी की तरह
हाथों में उठाये जूते
मैं वक्त की सच्चाई को
उसके उत्कर्ष तक पहुँचाना चाहता हूँ
विश्व अहिंसा दिवस के उल्लास में
बापू की समाधि को आज
मनुष्येतर प्राणियों का
शिवालय घोषित करना चाहता हूँ
तुम मुझसे इस कदर नाराज क्यों हो प्रिये ?

सचमुच अजीब जीव हो तुम भी
अजूबाहैतुम्हारा यह मौजीपन!

औरतें- ( स्पैनिश कहानियां )



एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 

अनुवादक का नोट 


“Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।



रोना

अमेज़न के इक्वाडोर में पड़ने वाले इलाके की बात है. वहां के शुआर मूलवासी एक मरती हुई बुढिया दादी के सामने रो रहे थे. वे उसके चारों ओर घेरा बनाए बैठे रोए जा रहे थे. यह सब देख रहे दुसरी दुनिया से आए एक आदमी ने पूछा:-आप लोग अभी क्यूँ रो रहे हैं जबकि वह ज़िंदा हैं”
तब जो रो रहे थे उन्होंने जवाब दिया:-“ताकि ये यह जान लें कि हम इन्हें कितना चाहते हैं.


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प्लाज़ा दे मायो की माएं
1977: बूएनोस आइरेस (प्रचलित नाम: ब्यूनस आयर्स).

प्लाज़ा दे मायो की माएं जिन्हें उनके बच्चों ने पैदा किया है, इस पूरी त्रासदी का ग्रीक कोरस हैं.सरकार के गुलाबी महल के सामने वे उस चीज़ का चक्कर लगाया करती हैं, जो गायब हुए उनके अपनों की फोटो से भरकर पिरामिड जैसी ऊँची हो चुकी है. यह वे उसी जिद के साथ करती हैं जिसके साथ वे सेना की बैरकों, पुलिस थानों और चर्चों के भीतरी कमरे तक चढ़ आया करती हैं. रो-रोकर सूख चुकी हैं वे. और उनकी राह देख-देखकर बेहाल, जो कल तक थे और आज नहीं हैं, या जो शायद आज भी हैं. या फिर कौन जाने:-मैं उठती हूँ और यह महसूस करती हूँ की वह ज़िंदा है- एक कहती है, सभी कहती हैं.


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दिन जैसे-जैसे चढ़ता है मेरा दिल डूबता चला जाता है. आधा दिन होते-होते वह मर जाता है. शाम में वह फिर से जी उठता है. तब मुझे फिर से लगने लगता है कि वह आएगा और मैं उसके लिए खाना रखती हूँ. वह दुबारा मर जाता है और रात मैं नाउम्मीद होकर बिस्तर पर गिर पड़ती हूँ. उठती हूँ और महसूस करती हूँ कि वह ज़िंदा है…

सभी उन्हें पागल बुलाते हैं. आम तौर पर उनके बारे में कोई बात नहीं करता. इस आम तौर वाली ‘सामान्य’ स्थिति में दुःख की कीमत सस्ती है. और कुछ लोगों की भी. पागल कवि मौत की तरफ बढ़ते हैं और ‘सामान्य’ कवि सत्ता की तलवार चूमकर उसके कसीदे तथा अपनी चुप्पी गढ़ते हैं. इस बिल्कुल ‘सामान्य’ स्थिति में देश के वित्त मंत्री अफ्रीका के जंगलों में शेरों और जिराफों का तथा सेना के जनरल ब्यूनस आयर्स की बस्तियों में मजदूरों का शिकार खेलते हैं. भाषा के नए कायदे यह हुक्म सुनाते हैं कि सैनिक तानाशाही को अब राष्ट्र के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया कहा जाए!

जश्न दोस्ती का


ख्वान खेलमान ने यह बताया था कि कैसे एक बुजुर्ग महिला पेरिस की एक भीड़-भाड़ वाली सड़क पर मजदूरों की पूरी बटालियन से छाता लेकर भिड़ गई थीं. नगरपालिका के ये मजदूर कबूतरों को पकड़ने के काम में लगे हुए थे जब ये मोहतरमा वहाँ प्रकट हुई थीं. आगे से रोबीली मूछों वाले चेहरे जैसी दिखती उनकी शानदार मोटरकार वही वाली फोर्ड थी जिसे एक बाहरी हैंडल से स्टार्ट किया जाता था और जो अब संग्रहालयों में दिखा करती है. तो ये मोहतरमा उस मोटरकार से उतरीं और छाता चमकाते हुए अपने हमले में जुट गईं.


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वे दोनों हाथों से भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ी थीं. बिल्कुल वहीं के वहीं न्याय करने के अंदाज़ में चल रहे उनके छाते ने वे सारे जाल तोड़ दिए थे जिसमें कबूतरों को पकड़ा गया था. और जब सारे कबूतर हवा में सफ़ेद बवंडर बनाते हुए फुर्र हो रहे थे तब वे मजदूरों पर अपना छाता लेकर टूट पड़ी थीं.

हाथों से जैसे भी हो सका खुद को बचाने के अलावा मजदूरों ने कोई और विरोध नहीं किया था. वे अपना गुस्सा कुछ बड़बड़ाते हुए जाहिर कर रहे थे, जो वो सुन नहीं रही थीं: श्रीमती जी, थोड़ा आराम से, कृपा करें हम काम कर रहें हैं, ये ऊपर का हुक्म है देवी जी, आप मेयर साहब को क्यूँ नहीं पीटतीं, इन्हें ये क्या हो गया है, किस कीड़े ने काट लिया है, पागल हो गई है यह औरत…जब गुस्से से बेकाबू उनके हाथ दुखने लगे और वह थोड़ा सांस लेने एक दीवार का सहारा लेकर खड़ी हुईं तब मजदूरों ने उनसे इस पूरे हंगामे की वजह माँगी.
एक लंबी खामोशी के बाद उन्होंने कहा: – मेरा बेटा मर गया.
मजदूरों ने कहा कि उन्हें इसका बहुत अफ़सोस है लेकिन इसमें उनका कोई कसूर नहीं है. यह भी कि उस सुबह बहुत सारा काम बाकी पड़ा था, कि वो मेहरबानी करके ये समझें.
-मेरा बेटा मर गया-उन्होंने फिर कहा.



उन्होंने कहा कि हाँ, कि वे उनका दर्द बिलकुल समझते हैं लेकिन वे भी सिर्फ अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं, कि पूरे पेरिस में कितने ही लाख कबूतर मंडराते फिर रहे हैं, कि बेड़ा गर्क हो इन इन कबूतरों का जिन्होंने शहर का सत्यानाश कर रखा है.
–कमअक्लों!- वे उनपर गुस्से से फट पड़ी थीं
फिर मजदूरों से दूर, बाकी लोगो से दूर जाते हुए कहा:-मेरा बेटा मर गया और एक कबूतर बन गया.
सारे मजदूर चुप हो गए और एक पल के लिए कुछ सोचने लगे थे. फिर आखिरकार आसमान, छतों और गलियों में मंडरा रहे कबूतरों को दिखाते हुए कहा:-देवी जी, आप इन कबूतरों को क्यों नहीं ले जातीं और हमें शांति से काम करने देतीं?


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अपनी काली हैट ठीक करते हुए उन्होंने कहा:-ये! नहीं! ये बिलकुल नहीं!
फिर मजदूरों को कुछ ऐसे देखते हुए मानो वे उनके आर-पार देख रही हों, बड़ी ही तसल्ली से कहा:-मुझें नहीं पता इनमें से कौन सा कबूतर मेरा बेटा है. और अगर मैं जानती होती तब भी मैं उसे ले नहीं जाती. क्यूंकि मुझे क्या हक़ है कि मैं अपने बेटे को उसके दोस्तों से जुदा करूँ!

बिन बुलाए आ धमकी औरतें एक अनुष्ठान की शान्ति तोड़ती हैं
1979: माद्रीद. 


माद्रीद के बहुत बड़े गिरजाघर में, एक विशेष मास या प्रार्थना सभा में अर्जेंटीना की आज़ादी की वर्षगाँठ मनाई जा रही है. उद्योगपति, अलग-अलग दूतावासों तथा सेना के लोग जनरल लेआन्द्रो आनाया के बुलावे पर तशरीफ़ लाए हैं. जनरल साहब उस तानाशाह निज़ाम के राजदूत हैं, जो दूर वहाँ अर्जेंटीना में राष्ट्र की विरासत, धर्म और बाकी कीमती चीजों का ‘ख्याल’ रखने में जुटी हुई है. देवियों और सज्जनों के चेहरे और कपडे सुन्दर बल्बों की रोशनी में चमक रहे हैं.

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रविवार और इसमें भी इस तरह का रविवार चुप्पियों के बीच ईश्वर को अपने किए में शरीक कर लेने का दिन होता है. बहुत मुश्किल से सुनाई पड़ती खाँसी  की कोई छिटपुट आवाज इस सन्नाटे को सजा रही है. इस बीच मुख्य पुरोहित अनुष्ठान पूरा करवा रहे हैं. अब सब लोग मौन हैं, अनंतकाल की शांति. ‘ईश्वर के चुने हुए’ लोगों का अनंतकाल!

कंम्युनियन (communion) यानी ईश्वर का प्रसाद लेने का वक़्त हो गया है. अंगरक्षकों से घिरे राजदूत महोदय ऑल्टर (alter) या पूजा की वेदी की और बढ़ते हैं. वे घुटनों के बल बैठ, आँखें बंद कर अपना मुंह खोलते हैं. लेकिन तभी हवा में सफेद रुमाल लहराने लगते हैं. इन रूमालों को सभा-स्थल के बीच और दोनों किनारों से आगे बढ़ रही औरतों ने अपने माथे पर बाँध लिया है: अपने पैरों के हलके शोर के साथ आगे बढ़ते हुए प्लाज़ा दे मायो की माऐं राजदूत को घेरे हुए अंगरक्षकों को घेर रही हैं. अब वे सीधा राजदूत को देखती हैं. वे सिर्फ उनकी ओर सीधे देख रही हैं. राजदूत आँखें खोलते हैं, अपनी तरफ बिना पलक झुकाए देख रही इन सारी औरतों को देखते हैं और थूक गटकते हैं. इस बीच पुरोहित का आगे बढ़ा हाथ प्रसाद के गोल टुकड़े को अपनी उँगलियों में फँसाए हवा में ही ठहर कर रह गया है.

पूरा चर्च इन औरतों से भर गया है. अचानक यहां न तो संत दिखते है और न व्यापारी. यहां कुछ भी नहीं है सिवाय बिन बुलाए आ धमकी औरतों के इस झुण्ड के. काली पोशाकों और सफेद रूमालों वाली. सब चुप, सब खड़ी.


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लेखक के बारे में

एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।


अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  

क्रमशः

प्रत्यक्ष प्रमाण से आगे और सूक्ष्म संवेदना की कविताएं : अभी मैंने देखा

सुनीता गुप्ता


अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित ‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन है, जिसका प्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। फिल्म तथा प्रयोगात्मक आर्ट से जुड़ी शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएं उनके सर्जनात्मक स्पर्श से सम्पृक्त हैं। विमर्शों के मुहावरों में परिणत होने वाले समय में शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएँ अपनी ताजगी से आह्लादित करती हैं। ये कविताएं अपने समय के साथ खड़ी होकर उसका वक्तव्य बनती हैं। स्त्री गंध से सर्वथा अछूती होना इनका एक दुर्लभ पक्ष है। ये कविताएं बृहद मानवीय दृष्टि की उपज हैं जिन्हें किसी लैंगिक विभाजन में बांटकर नहीं देखा जा सका। ऐसा नहीं है कि यहां स्त्री नहीं है, पर उसकी उपस्थिति एक सम्पूर्ण मानवीय इकाई के रूप में है।

शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संसार देखे गए दृश्यों से निर्मित है, जैसे कोई किसी गाड़ी में बैठा हो और उसके सामने से एक एक कर दृश्य गुजर रहे हों। संग्रह की पहली कविता ‘क्या’ वह द्वार है जहाँ से हम कवयित्री के रचना संसार में प्रविष्ट होते हैं। इसे संग्रह की भूमिका के तौर पर भी देखा जा सकता है। इसके पात्र चौराहे पर दृष्टि के केन्द्र में एक-एक कर आते हैं और आगे चलकर संग्रह की कड़ी बनते हैं। चैराहे की भीड़ का भी अपना एक समाजशास्त्र होता है जिसके रेखाचित्र कवयित्री ने बड़ी बारीकी से उकेरे हैं। यह दुनिया फैब इंडिया की चमकदार पोशाक पहनकर कार में बैठे लोगों से अलग है। इस दुनिया में ‘हरे कनटोप में संभाले दुधमुंह बच्चा’ को लेकर ‘चैराहे पर सिरपिटायी हुई औरत है’, ‘मलिन दुपट्टे में’ तेल भरे कटोरे के साथ शनि का दान मांगती लड़की है’, सूर्या प्राॅपर्टिज की खाली पड़ी इमारत में शहर की सर्दी में एक दूसरे को जकड़कर मरे हुए लोग हैं, मॉल में टाइल पोंछने वाला लड़का है। कॉल सेंटर की सीढ़ियों पर ऑफिस कैब से उगल दिया जाता ‘वो हरी पट्टी पर स्वेटर का आदमी’ भी है। यहां शहर की दुनिया के सबके अपने दर्द और किस्से हैं। वे जो चैराहे के दृश्य पटल पर क्रम से आते हैं उनमें से हर एक की अपनी दुनिया, अपनी उलझनें और अपनी व्यथा है- पर अपनी विडम्बनाओं के साथ अन्ततः वे मनुष्य ही हैं- अपनी-अपनी पहचान लिये। इनमें एक वह औरत है जो एक दुध-मुंहे बच्चे को गोद में लिए लाल बत्ती के पास अ्रकबकायी खड़ी है। निराला की पत्थर तोड़ती औरत की तरह अलक्षित उस स्त्री की सिटपिटाहट अपने में एक एक लम्बी कथा समेटे है। कवयित्री दृश्य से परे उसके अंतर्मन में प्रवेश करती हैं और देख पाती हैं कि उसकी आंखों ने कई-कई सपने देखें होंगे, शहर की उस लाल-बत्ती वाले चैराहे पर पहुँचने तक जाने कितने विस्थापन से गुजरी होगी वह। आगे चलकर उन्हीं दृश्यों में एक लड़का आता है जो मॉल की टाइल्स पोंछने का काम करता हैं। भले ही वह अलक्षित सा हो भीड़ के लिए पर वह भी एक लड़की को पाने का सपना आँखों में संजोये हुए है।

कविता संग्रह को यदि हम उसकी समग्रता में देखें तो उसमें एक उपन्यास का विस्तार पा सकते हैं। इसमें पात्र अपनी दुनिया के साथ आते हैं और कथानक की कड़ी बन जाते हैं। इनमें कई पात्र ऐसे हैं जो फिर फिर उपस्थित होते हैं। चौराहे पर चालीस के पार की उम्र की एक औरत आती है जो अपने अंदर बीस वर्षों का आक्रोश समेटे है। उसके साथ ही उसका पुरुष साथी है। प्रौढ़ वय का वह व्यक्ति शहरी मशीनी दिनचर्या का पर्याय बन जाता है। प्रतिदिन की मशीनी दिनचर्या उसके जीवन का रस सोख लेती है। आगे चलकर एक कविता में इन दोनों का वार्तालाप उपस्थित किया गया है। यह वार्तालाप स्त्री पुरुष संबंधों की यांत्रिकता का पर्याय बन जाती है। रिश्तों की डोर में बंधा दो व्यक्तियों का संबंध कई बार बीच में कुछ इस कदर बिखरता है कि यह अहसास ही नहीं होता कि व्यक्ति कब एक दूसरे से छिटक कर दूर जा पड़े हैं। संबंधों की इस अजनबियत को इस संग्रह में जगह जगह महसूस किया जा सकता है। इसे शहरी सभ्यता का बाई प्रोडक्ट माना जा सकता है।
यह ठीक है कि शेफाली फ्रॉस्ट का कविता संसार गुजरते या देखे गये दृश्यों से निर्मित है। यहां अनुभूति की प्रामाणिकता का सवाल उठ सकता है। निश्चय ही इन कविताओं का संसार सहानुभूति से निर्मित है। किंतु यह निःसंकोच स्वीकार किया जा सकता है कि यहाँ जो बाहरी परिवेश है वह कवयित्री की संवेदनपूर्ण अंतर्दृष्टि से नम आौर उद्भासित है। कवयित्री इन दृश्यों पर त्वरित प्रतिक्रिया देकर नहीं हट जातीं बल्कि दोनों हाथों से बाहरी सतह की पारदर्शी परत को हटाकर उनकी दुनिया और अंतर्जगत में प्रवेश करती हैं। जब वे लिखती हैं कि ‘क्या तेल लगे बालों में कंघी घुमाता आदमी/उतार सकता है धूल भरा चेहरा जो शहर की गलियों ने उसे बिना पूछे पहनाया है’ तो शहर के गर्द भरे चेहरे के साथ शहरी जीवन की यंत्रणा, नियति और विवशता साकार हो उठती है। इन अलग-अलग देखे हुए दृश्यों को मिलाकर शहर का एक मुकम्मल कोलाज बनाया जा सकता है। यह शहर  है –‘भीड़ इतनी है लेकिन/ आदमी कुल्ला करे कि तकरार/प्यार करे कि मन भर सिंदूर डाल कर/ ताकता रहे आसमान/ निगल जाता है यह शहर/ खिड़की से आंख/दरवाजे से धड़’’।

जैसा कि कविता संग्रह के शीर्षक से अभिप्रेत है, संग्रह की कविताएं देखे गए दृश्यों को लेकर हैं पर इससे इंकार नही किया जा सकता कि ये दृश्य महज देखे हुए नहीं हैं बल्कि अज्ञेयजी के ‘आलोक छुआ अपनापन’ की तरह कवयित्री की संवेदना से उद्भासित है। ऐसा लगता है कि दृश्य की ऊपरी परतों को दोनों हाथों की अंजुरी से हटाकर कवयित्री उसमें डुबकी लेती हैं। इस अंदर की दुनिया को बिना उसमें डुबकी लगाये जाना ही नहीं जा सकता। कवयित्री के लिए ये चरित्र महज कविता का विषय नहीं रह जाते हैं अपितु वे उनकी और पात्र की अस्मिता से भी जुड़ जाते हैं जो ऊपर से अदृश्य प्रतीत होते हैं, अलक्षित रह जाते हैं हमारी निगाहों से, वस्तुतः उनकी भी अपनी एक पहचान, एक आइडेंटिटी होती है। वे भी मनुष्य होने की चेतना से समृद्ध हैं। इसके विलोम में वह दुनिया है जो अपनी चकाचौंध से हमारी निगाहों में आ तो जाती है पर उसके बनावटपन के नीचे जो कुछ है वह नितान्त खोखला है क्योंकि अपनी निजता के घेरे में आबद्ध वह मनुष्य होने की मूल शर्त – संवेदना और वह मानवीय सरोकार – से असम्पृक्त हैं। ऐसे ही लोगों पर व्यंग्य करती एक कविता है ‘जियो, तुम जियो’ -‘’ जुबान जिरह तो करती हैं तुम्हारी/लेकिन/रोक लो भिंचे हुए दातों के बीच उसे/तुम्हारे जागने का कोई संदर्भ नहीं/जियो, तुम जियो’’।

माइक लिए शेफाली

शेफाली फ्रॉस्टके रचना संसार में वंचित भी अपनी विडम्बनाओं के साथ प्रवेश पाते हैं। यथार्थ का एक रूप यह भी है जहां एक कोई औरत ‘साध रही है बर्तन सीलबंद चैक में/चिपके हैं बंद खिड़कियों के दरवाजे उस लेई से/जो उसने कल खुद को जोड़ने के लिए बनायी थी’’। यह सर्द हवाओं से बचने का प्रयास करती और रोटी की जद्दोजहद को झेलती स्त्री के जीवन का चित्र है जो मानो एक तरफ से छुपने का प्रयास करती तो दूसरी तरफ से उघड़ जाती है। इसके साथ ही शहर की सभ्यता का शिकार होता आदिवासी समुदाय है। प्रकृति के साथ इनका सीधा रिश्ता होता है, ये प्रकृति पर निर्भर होते हैं पर विकास की दौड़ में आज उसका दोहन किया जा रहा है। अपने भोलेपन में नादान ये आदिवासी मौन-भाव से अपने ही विरूद्ध हो रही साजिश के साझीदार बन रहे हैं –‘‘ वे हव्वा और आदम की औलादें/हार चुकी हैं जो/ लकड़ियों के व्यापार में/पत्ते चबाने का हक’’। सभ्य मनुष्य की न बुझने वाली पिपासा प्रकृति के सहयात्रियों को निवाला बना रही है – ‘‘वो देखो कुछ औलादें तुम्हारी/उतर रही हैं हवाई जहाज से दिक्कुओं के साथ/ सहेज रही है बाक्साइट की खादानें और तुम्हारा मौन।’’


बिरसा और मुण्डाओं के दर्द समेटती कवयित्री सभ्यता की सीमाओं को लांघती हुइ बिरसा के पास पहुंचती हैं -‘‘उत्तर रही हूँ मैं/सभ्यता की पंखुडी से/ गढ़ी जा रही है जंगलों में चलकाड़ के/ तुम्हारा व्यथा की लता।’
शेफाली फ्रॉस्टकी कविताएं वह कटोरी हैं जिसमें वे इन वंचितों के दर्द को समेटती हैं। ‘अश्रु चुनता दिवस उसका अश्रु चुनती रात’ की तर्ज पर वे अपने आस-पास के बिखरे दर्द को समेटती हैं, बल्कि समेटती  ही नहीं, उससे एकाकार हो जाती हैं – ‘‘मैं उतना ही रोना चाहती हूं जितना कि तुम’।

शेफाली की कविताओं का एक स्तर वह है जहां वे राजनीतिक मुद्दों से जूझती हैं। यह कवयित्री का कलात्मक कौशल है कि ये राजनीतिक मुद्दे नारों की शक्ल लिए बगैर हमारी चेतना में सरसराहट बनकर प्रवेश कर जाते हैं। एक कवि के रूप आजादी उनके लिए प्राणवायु की तरह है। आजादी और मानवीयता पर पड़ी हुई कोई भी चोट कवि की चेतना को आहत करने के लिए काफी होती है। राजनीति के लोक लुभावन चेहरों के पीछे जो उसका वर्चस्ववादी चेहरा और छद्म है, कवयित्री सीधे वहीं पर उंगली रखती हैं। आजादी, मकड़ी, अभी मैंने देखा आदि संग्रह में इस प्रकार की कई एक कविताएं शामिल हैं। इसके साथ ही दंगों की राजनीति भी उनकी संवेदना की जद में हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कवयित्री की संवेदना का प्रसार व्यक्ति, समाज, पर्यावरण से लेकर राजनीति तक है। यह स्त्री कविता को लेकर गढ़े गये उस मिथ का एक तरह से प्रतिवाद है जहां स्त्री द्वारा रची गयी कविता के संबंध में मान लिया जाता है कि इसकी सीमा घर, दहलीज और स्त्री विमर्श तक ही होगी। ये कविताएं इस बात का प्रमाण हैं कि स्त्री की चेतना के प्रसार के साथ ही उनकी कविताओं की परिधि भी विस्तृत हो रही है।

शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं में प्रकृति अपनी स्वायत्तता से परे मानवीय विडम्बना के साथ एकाकार हो गयी है। ये कविताएं प्रकृति के कोमल और रोमांटिक चित्रण का विलोम रचती हैं। मानवीय सरोकारों को समेटे प्रकृति यहां मानवीय अनुभूतियों में ढल गयी है। यह सूर्योदय है जिसके बारे में कवयित्री लिखती हैं-‘‘उतर रहा है कानों के पास/रात भर जागी चिड़िया का बड़-बड़़/रूके कमरे में फैल रहा है कोहरा/फूला हुआ/बरस रही है परछाईं वाली धूप/छत की झिर्रियों से’’। कोहरे भरी सुबह का यह चित्र है जिसे परछाईं वाली धूप के बिम्ब में बांधा गया है। संध्या के चित्र की विलक्षणता यहां देखी जा सकती है – ‘आसमान एक लकीर है पीली/चढ़ गयी है तलुवों से/घुटने की कगार तक/बचा नहीं उजाला/खिड़कियों के पास/ जो सुलगा दे बाकी की जांघ।’’ यह प्रकृति शहर की है जो कभी खिड़की की राह से झांकती है कभी छत की झिर्रियों से और आकर परिवेश से संयुक्त हो जाती है, प्रकृति की स्वतंत्र उपस्थिति वहां होती कहां है! परिवेश में घुली हुई यह प्रकृति शहरी परिदृश्य में रंग भरती है। यह प्रकृति अधिक आत्मीय प्रतीत होती है क्योंकि इसमें शहरी परिवेश की सच्चाई शामिल है। सूर्यास्त के भव्य बिम्बों से परे यह फुटपाथ है जिसकी संध्या कुछ अलग ही है – ‘‘फुटपाथ की शाम/समेट चुकी है मैल/जितना कि दिन के नाखून में’’। फुटपाथ की इस संध्या पर आमतौर पर किसी की नजर नहीं जाती। कवयित्री के बिम्ब की परिधि अत्यंत व्यापक है। ‘नाखूनो में समेटे हुए मैल’ का बिम्ब बचपन की स्मृतियों तक जाता है।

अपनी कविताओं में शेफाली नये तरह के प्रयोग भी करती चलती हैं। ये प्रयोग उनकी कविताओं को विशिष्ट बना देते हैं, यद्यपि कई बार ये जटिल पहेली की तरह भी हो गयी हैं। दृश्य इन कविताओं की इकाई हैं। ये कविताएं ऐसी रेखाचित्र हैं जिसकी गत्यात्मक्ता परिवेश के फिल्मांकन का आभास देती है – ‘गिर रही हैं ईंटों पर वह काली रात’, ‘पसर जाता रात का दंश/काले फुटपाथ पर अधीर’, ‘गुजरती जा रही है्/ ‘गठरी पकड़े महतारी की/ सुबकती हुई बड-बड़’। ‘लफाड़िया चांद’ संकलन की एक उल्लेखनीय कविता है। वह चांद जो आसमान में प्रतिदिन उगता है और जिसकी मोहकता को बिम्बों में बांधा जाता रहा है- उसका एक रूप यह भी है।  चकत्तेदार गड्ढों से भरा पड़ा चांद सूरज से रोशनी उधार लेता है और मानो आसमान से गिरकर हर तरफ से लतियाया जाता है, कभी जल की सतह उसे दुत्कारती है, कभी कीचड़ में पड़ता है पर डूबता उतराता यह चांद फिर निकलता है ‘‘लौट लौटकर आयेगा वो/पलट पलट के निकाला जायेगा/लफाड़िया लतियाया बेआबरू चांद/वो मरेगा नहीं कल /देखना’’।

शेफाली फ्रॉस्टकी कविताओं का बिम्ब अपने टटकेपन में ध्यान आकृष्ट करता हैं। इन बिम्बों में मूर्त और अमूर्त का एकीकरण अर्थ को विशिष्ट आभा से दीप्त करता है। ‘‘मेरे गले की झिल्लियों में/ फंसाकर अपना हाथ/वही पुरानी दास्तान/हकलाती है कितनी बार’’, ‘‘एक गीत का छिलका/उतर कर सब्जियों में लगा रहा है आवाज/फफोले वाले तवे पर दरकती है रोटी’’ जैसे प्रयोगों से इसे समझा जा सकता है।   कविता की ध्वन्यात्मकता इतनी प्रखर है कि उसमें दृश्यात्मकता भी आ जुड़ती है। कहीं-कहीं इन बिम्बों में स्वप्नलोक की आकृतियों का भी आभास मिलता है। इस प्रकार की कविताएं जटिल हो उठी हैं और इनका अर्थ धीरे-धीरे पंखुड़ी दर पंखुडी खुलता है और अपने साथ अर्थ की कई परतें लेकर आते हैं। कवयित्री के सर्जनात्मक स्पर्श से ये बिम्ब अपूर्व हो उठे हैं।

शेफाली फ्रॉस्टकी कविताओं का विन्यास इतना गठा हुआ है कि उसमें से एक शब्द को भी इधर उधर करना दीवाल की ईंट खिसकाने की तरह है। निश्चय ही ये कविताएं भावनात्मक उद्गार मात्र नहीं, एक गहन रचना-प्रक्रिया की उपज हैं। किसी चित्र की तरह इसकी एक-एक रेखा, एक-एक रंग बहुत बारीकी और कलात्मक से अंकित है। अपने कलात्मक संगुफन में ये कविताएं महादेवी के शिल्प गठन का स्मरण करा देती है।
शेफाली फ्रॉस्टका भविष्य की एक संभावना शील कवयित्री के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।

आलोचक सुनीता गुप्ता बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में हिन्दी पढाती हैं. संपर्क : मो0 09473242999

कभी सूख नहीं पायेंगे रोहित वेमुला की माँ के आंसू

मेधा 


ठीक एक साल पहले 17 जनवरी को रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या  हुई थी. रोहित की मां तब से अपने बेटे को न्याय दिलाने के लिए और शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव के खिलाफ सक्रिय हैं. मेधा एक मां के संघर्ष और दुःख को व्यक्त कर रही हैं, उनसे मिलने और उनके दुःख साझा करने के बाद.

 



पिछले दिनों रोहित वेमूला की माँ राधिका वेमुला से मिलना हुआ. उनके साथ  रोहित के मित्र रियाज भी थे. रोहित के जाने के बाद रियाज ने माँ का साथ हर मानिंद दिया है. रियाज मित्रता की अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं. राधिका जी और रोहित से मुलाकात मलकागंज के एक कार्यक्रम में हुई. मलकागंज में  एक स्वयंसेवी संस्था ने उन बीमार महिलाओं के लिए एक केंद्र खोला है, जिनका कोई नहीं है, जो सड़कों पर अपनी जिंदगी गुजारने को विवश हैं. साथ ही इस केंद्र में वे नवयुवतियां भी रहेंगी, जिन्हें बचपन में ही सड़कों से उठा कर अपने केंद्र में इस संस्था ने पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया है. अब यहां इन्हें कोई हुनर सीखा कर अपने पैरों पर खड़े होने का प्रशिक्षण दिया जाएगा.

 इसी केंद्र के उद्घाटन के लिए रोहित वेमुला की माँ राधिका वेमुला आई थीं. इस केंद्र का नाम रोहित वेमुला उन्नित केंद्र रखा गया है. 17 जनवरी 2017 को रोहित को इस दुनिया से गए साल भर हो जाएगा. राधिका जी के उन्नत चेहरे पर पसरा हुआ गहरा दुःख  साल भर में करुणा के रंग में तब्दील हो गया था. लेकिन उनकी पनीली आंखें अब भी एक माँ की व्यथा-कथा कह रही थीं. आंखों की तमाम चुगली के बावजूद व्यक्तिगत वेदना की नदी समष्टि के विराट दुख को अपना कर एक वेगवान झरने की मानिंद निरन्तर करुणा के महासागर में बदलती जा रही थी. और मैं उनके भीतर हो रहे इस रूपान्तरण को सहज ही अनुभूत कर पा रही थी.

 ‘दुःख हमें मांजता है’; (अज्ञेय को याद करते हुए) लेकिन किसी-किसी को वह इतना मांजता है कि निजी दुःख  के आंसू से करुणा का सागर बन जाता है.

राधिका जी से यूं तो पहली बार ही मिलना हो पा रहा था, लेकिन संवेदना के स्तर पर वह मुझे अपनी बहुत ही पुरानी सहेली जान पड़ी. शायद इसलिए भी कि अन्याय की जिस कथा को और उस कथा से उपजे भयावह दुख को मैं 17 जनवरी से अप्रत्यक्ष स्तर पर जी रही थी और जिसके मेरे भीतर इतने गहरे समा जाने का अहसास मुझे स्वयं भी नहीं था. वह दुख राधिका जी को देखते ही स्वतः फफक कर बाहर आ गया  और उससे ऐसे एकाकार हुई कि लगा कि मैं ही उस आखिरी चिट्ठी को लिख कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर देने वाली रोहित वेमुला हूं और मैं ही अपने जवान बेटे को खो देने का अथाह दुःख  झेलने वाली राधिका वेमुला

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उनके चेहरे पर दुख का गहरापन था, तो कहीं न कहीं गौरव की दीप्ती भी थी. लेकिन इस सब के पीछे वह माँ आज भी सीसक रही थी, जिसने अपने जवान बेटा खोया था. वह बेटा, जिसको पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाना, उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था. हर तरह की तकलीफों को सहते हुए, उसे पढ़ाया-लिखाया. वह बेटा -जिसे उन्होंने एक सपने के साथ हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय भेजा था. वह बेटा – जिसके आईएस बनकर लौटने का इंतजार आंखों में लिए वह जी रही थीं. एक माँ के बतौर अपने बेटे की उस तकलीफ, घुटन और अकेलेपन का गहरा अहसास है, जिसने उसकी जान ले ली. साथ ही, उन्हें उस राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में छुपे अन्याय का भी बोध है, जो रोहित की इस दशा के लिए जिम्मेदार है.

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राधिका जी बात करती हैं, तो कुछ ही मिनटों में उनके हिमालय जैसे दुःख  से करुणा की नदी बह निकलती है. और उस नदी से इरादों का एक सूरज उदित होता है जो व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने के उनके पराक्रम और साहस का प्रतीक बन जाता है. लेकिन इन सब के बीच एक मजबूर माँ अपने बेटे से गहरी शिकायत करती भी नजर आती है- कि वह कैसे अपनी माँ के सारे संघर्षों पर पानी फेरते हुए इस दुनिया से चला गया. उसने कैसे नहीं अपनी माँ की सुध ली.

राधिका जी ने कार्यक्रम में उपस्थित बच्चियों से कहा कि -‘‘ जिस तरह रोहित अपने हक के लिए लड़ा, अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ, वैसे ही तुम सब भी खड़े होना. लेकिन रोहित अकेला पड़ गया, इसलिए शायद उसे इतना भयंकर कदम उठाना पड़ा. लेकिन तुम साथ मिलकर अन्याय के खिलाफ लड़ना. अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए तुम्हारा हथियार शिक्षा होगी, इसलिए तुम सब खूब-खूब पढ़ना.’’ मैं देख रही थी, कि कैसे वहां बैठी सभी बच्चियां रोहित का रूप ले रही थीं और राधिका जी उन सबकी माँ.

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सारे कार्यक्रम के दौरान कुछ इधर भी गहरा उथल-पुथल चल रहा था. जब से रोहित गया और उसकी पहली और आखिरी चिट्ठी मैंने पढ़ी, तब से वह हमेशा के लिए मेरी चेतना में समा गया. ऐसी चिट्ठी लिखने की तो उसकी उमर नहीं थी. यह तो प्रेम पत्र लिखने की उमर थी उसकी. लेकिन यह पत्र भी तो उसने प्रेम के बारे में ही लिखा. हम भी तो मौत से कम पर उसकी बात को सुनने को राजी नहीं हुए. रोहित वह साहसी शख्स है, जिसने प्रेम के लिए मौत को गले लगाया. प्रेम किसी व्यक्ति के लिए नहीं, प्रेम प्रकृति के लिए, एक ऐसी दुनिया को साकार करने की जिद से प्यार के लिए जहां मनुष्य केवल मनुष्य हो अपने पूरेपन में; जिसके वजूद पर जाति, धर्म, वर्ग, लिंग, नस्ल का कोई धब्बा न लगा हो, जहां कोई भी पहचान मनुष्य होने की पहचान से बड़ी न हो. जहां पहचान राजनीति का माध्यम न बनकर विविधता के सौंदर्य का उत्सव बनें. एक ऐसी दुनिया-जहां बिना चोट खाए, बिना दर्द सहे – प्यार किया जा सके. इस निगाह से देखें तो, रोहित का आखिरी पत्र दुनिया का अकेला और सबसे अनूठा प्रेमपत्र. और उस पत्र को पढ़ने वाला हर बंदा उसका प्रेमी है, जिसकी जिम्मेदारी है कि, रोहित ने जिस दुनिया का सपना लिए इस संसार को अलविदा कहा, उस दुनिया को सच करने की ओर रोज एक कदम भरना.

लेखिका सत्यवती महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती है . संपर्क :medhaonline@gmail.com

घरेलू कामगार महिलाओं की दीदी: संगीता सुभाषिणी

नवल किशोर कुमार


‘स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत घरेलू कामगार महिलाओं को संगठित कर उनके संघर्ष की अगुआई कर रही संगीता सुभाषिणी से और उनके आंदोलन से परिचित करा रहे हैं नवल किशोर कुमार.

बिहार के मुजफ्फरपुर शहर की रहने वाली संगीता सुभाषिणी की खासियत यही है कि अपनी निजी जिंदगी में तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी है। अपनी निजी जिंदगी की परेशानियों के समानांतर उन्होंने समाज के उस तबके के विकास का अभियान शुरू किया, जिसकी उपयोगिता तो हर संभ्रांत परिवार में है, लेकिन कद्र कोई नहीं करता है। वह संगीता ही हैं, जिनके कारण मुजफ्फरपुर शहर में चूल्हा-चौका करने वाली करीब चार हजार महिलायें आज न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि  समाज में अपनी उपस्थिति भी पूरी मजबूती के साथ स्थापित कर रही हैं।

संगीता सुहासिनी घरेलू कामगार महिलाओं के साथ

संगीता बताती हैं कि पहले घरों में काम करने वाली महिलाओं को मुजफ्फरपुर शहर में हेय दृष्टि से देखा जाता था। इसके अलावा उन्हें नियमित रूप से मजदूरी का भुगतान भी नहीं किया जाता था। जबकि यह सभी जानते हैं कि कोई भी महिला किसी दूसरे के घर के में चूल्हा-चौका जैसा काम किस हालात में करती है। सामाजिक रूप से यह पेशा कभी सम्मानजनक पेशा नहीं माना गया। इस पेशे को अपनाने वाली महिलाओं में अधिकांश वंचित तबके की होती हैं जिनके पास रोजगार का कोई विकल्प नहीं होता है। संगीता बताती हैं कि वर्ष 2008 में उन्होंने ‘संबल’ संस्था की स्थापना की। तब मकसद यही था कि ऐसी महिलाओं को सशक्त बनाया जाय।

लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं था। जिन घरों में महिलायें दाई का काम करती थीं, उनके मालिकों का व्यवहार एकदम क्रूर था। यहां तक कि स्थानीय पुलिस प्रशासन भी ऐसी महिलाओं की शिकायत पर ध्यान नहीं देती थी। चुनौती यही थी कि ऐसी महिलाओं को उनका अधिकार सम्मान के साथ दिलाया जाय। संबल के बैनर तले महिलायें एकजुट होती गयीं और फिर अहिंसात्मक तरीके से अन्याय के खिलाफ आंदोलन छेड़ा गया।

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संगीता के मुताबिक आज उनके संगठन में चार हजार से अधिक महिलायें जुड़ी हैं। इसके अलावा आसपास के इलाकों में उन्होंने अपने प्रशिक्षित प्रतिनिधियों को जिम्मेवारी दे रखी है। ये प्रतिनिधि अपने-अपने इलाकों में घरेलू नौकरानियों एवं दाईयों, आदि का पूरा रिकार्ड रखती हैं। साथ ही उनके साथ होने वाले किसी भी प्रकार के अन्याय के खिलाफ सूचना मिलने पर पूरी जानकारी संगीता सुभाषिणी को देती हैं। इसके बाद सुभाषिणी महिलाओं को एकजुट कर आपस में रणनीति तय करती हैं। इसके बाद ही अहिंसात्मक तरीके से कार्रवाई की जाती है।

कारवां बढ़ता गया 

संगीता ने बताया कि वर्ष 2012 से पहले उन्होंने संबल नामक अपनी संस्था का पंजीकरण नहीं कराया था। इसके पीछे की वजह बताते हुए वे कहती हैं कि उनकी मंशा महिलाओं को एकजुट कर उन्हें जागरूक बनाना था। किसी तरह का लाभ कमाना उनका उद्देश्य नहीं था। लेकिन इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ कि स्थानीय प्रशासन द्वारा संबल के द्वारा उठाये गये सवालों को नजर अंदाज किया जाने लगा। अंत में सभी महिला सदस्यों ने आपस में मिलकर स्वयंसेवी संस्था के रूप में पंजीकृत कराने का निर्णय लिया।

अपने द्वारा किये गये प्रयासों के परिणाम के बारे में संगीता बताती हैं कि अब स्थिति पूरी तरह बदल गयी है। अब तो उनके पास वे महिलायें भी आती हैं, जो मालकिन कहलाती हैं और अपनों के द्वारा विभिन्न प्रकार की हिंसा की शिकार होती हैं। हमारी संस्था से जुड़ी महिलायें उनका उत्साह बढ़ाती हैं और अन्याय के खिलाफ  उनका साथ देती हैं। उन्होंने कहा कि सबसे अधिक सुकून देने वाली बात यह है कि अब दाई के रूप में काम करने वाली महिलायें ‘अप्प दीपो भव’ की तर्ज पर स्वयं जागरूक होती जा रही हैं। वे अब अपनी आय का अधिक हिस्सा अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में खर्च करती हैं।

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संबल में संगीता और अन्य महिलायें

दमिता नामकरण 

जून ,2011  में जेनेवा में हुए अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के  100 वें अधिवेशन में घरेलू कामगार स्त्रियों के संगठन का भी कन्वेंशन हुआ और दुनिया भर में  10 करोड़ के आसपास घरेलू कामगार महिलाओं को सम्मानजनक श्रममूल्य और वातावरण दिलाने का संकल्प लिया गया. इसके बाद भारत में भी इन महिलाओं  की सुध लेने की सरकारी कोशिशें तेज हुईं . तमिलनाडु , महाराष्ट्र , कर्नाटक, केरला आदि राज्यों में सीमित अर्थों में ही सही इन महिलाओं के लिए सरकारी प्रयास सुनिश्चित हुए, हालांकि सम्मानजनक भुगतान और दूसरी सुरक्षाओं की लड़ाई अभी जारी है. धीरे –धीरे केंद्र सरकार पर भी दवाब बन रहा है कि वह इन महिलाओं के लिए एक मुक्कमल बिल लेकर आये.

इन  सब के बीच मुजफ्फरपुर की ये महिलाएं, जिन्हें 200 से 500 रुपये तक एक घर से मिलता है चौका वर्तन के लिए , देश और दुनिया भर में चल रही अपने लिए लडाइयो को  नहीं जानती हैं. उन्हें भरोसा है तो अपनी सुभाषिणी दीदी पर , जिन्होंने इन महिलाओं के लिए एक नया नाम भी दिया है ,’ दमिता.’ यह नाम ‘दलित’ नाम के करीब इस मायने में है कि ये लगभग उतने ही हाशिये पर जीती है और अलग इस मायने में कि दलितों के साथ जुड़ा छुआ –छूत इनके साथ नहीं है . ‘चौका -बर्तन करे में कहीं 100 रूपया मिलअइछइ त कहीं 200, इतना में केना पेट भरतइ अ केना अपन बाल बच्चा के पढ़बइ. अब दीदी के सहयोग से हम सब भी अपन हक ला आवाज उठावे के चाहिछिअइ, शायद हामरो सब के परिवर्तन आ जतइ’ यह विश्वास सिर्फ राजवती देवी के साथ उन दर्जनों महिलाओं को हैं , जो संबल में सुभाषिणी जी के साथ सक्रिय हैं.

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अपनी कार्यकर्ताओं को सुभाषिणी न सिर्फ उनके हक के लिए लड़ना सिखा रही है, बल्कि सामजिक बुराइयों के खिलाफ भी खड़ा कर रही है, जिसका असर मुजफ्फरपुर के चर्चित शराब बंदी आन्दोलन में दिखा . जिला स्तर पर सरकारी सुविधाओं को हासिल करने में भी इन ने एकजुटता दिखाई है. अपने संसाधनों से संचालित यह संगठन एक लम्बी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं है लेकिन लम्बी लड़ाई के जज्बे से भरा है . सुभाषिणी जी हालांकि प्रदेश सरकार और खासकर बिहार के मुख्यमंत्री से अपील करती हैं कि दूसरे राज्यों की तरह बिहार में भी वे ‘दमिताओं’ के हक़ में कुछ कदम उठाएं . वे देश के दूसरे हिस्सों में चल रही इस लड़ाई से इन महिलाओं को जोड़ने की तैयारी में भी हैं.

जीवन और संघर्ष का निजी कोना 

बहरहाल संगीता सुभाषिणी का निजी जीवन भी अनगिनत चुनौतियों का पर्याय रहा है। हालांकि उनका जन्म मुजफ़्फ़रपुर के बड़े उद्यमियों में से एक स्व प्रह्लाद दास अग्रवाल के घर में हुआ था। उनके पिता उत्तर बिहार में
कंक्रीट के ह्यूम पाईप का उत्पादन करने वाले पहले उद्यमी थे। इसके अलावा वे मुजफ़्फ़रपुर नगर कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे थे। समाज के प्रति उनके समर्पण और जनता से उनका लगाव इस कदर था कि वे आजीवन मुजफ़्फ़रपुर नगर निगम की स्थायी समिति के सदस्य रहे। इसके अलावा वे मुजफ़्फ़रपुर नगर निगम के
अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए थे।इस तरह एक उच्च आयवर्गीय परिवार में जन्म लेने के बावजूद संगीता को समाज
सेवा अपने पिता से विरासत में मिली। मुजफ़्फ़रपुर शहर में ही प्राथमिक शिक्षा और इसी शहर के बिहार यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की। इकोनामिक्स उनका पसंदीदा विषय रहा। लेकिन उन दिनों ही समाज के साथ खड़ेहोने की भावना प्रबल हो उठी और संगीता ने कानून की पढाई की।

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संगीता बताती हैं कि उन दिनों ही उनके एकमात्र भाई की हत्या कर दी गयी। इस कारण परिवार
पर संकट का पहाड़ टूट पड़ा। विषमता के समानांतर संगीता ने अपने जीवन का एक नया रास्ता चुना। उन्होंने
मुजफ़्फ़रपुर से प्रकाशित दैनिक “प्रातः कमल” में पत्रकार के रुप में काम करना शुरु किया। यह वह समय था जब मुजफ़्फ़रपुर जैसे शहर में लड़कियों के लिए नौकरी करने की बात सोचना भी कल्पना के परे था। पत्रकारिता के अपने  जीवन में संगीता ने अपनी रिपोर्टों से पूरे शहर का ध्यान आकृष्ट किया। खासकर एक दबंग नेता के द्वारा एक महिला के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या को लेकर संगीता के द्वारा की गयी रिपोर्टिंग ने उन्हें एक मुकम्मिल पत्रकार के रुप में स्थापित किया।

उन दिनों ही उनकी मुलाकात अक्खड़ स्वभाव के पत्रकार अनिल गुप्ता से हुई। वे भी प्रातः कमल के लिए काम करते थे। फ़िर एक दिन ऐसा भी आया जब संगीता और अनिल ने शादी कर अपनी दुनिया बसा ली। संगीता बताती हैं कि यह एक नये जीवन की शुरुआत थी। अनिल गुप्ता के साथ देश के कई शहरों में उन्होंने पत्रकार के रुप में अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए काम किया। लेकिन उनका दिल मुजफ़्फ़रपुर में बसता था और अंततः वे मुजफ्फरपुर आ गईं। तबसे उनका संघर्ष जारी है। वे कहती हैं कि जबतक उनके शरीर में रक्त का एक कतरा भी शेष है, वे अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु प्रयत्नशील रहेंगी। हालांकि वे चाहती हैं कि सरकार और समाज सभी महिलाओं के अस्तित्व को पूर्णता में स्वीकार करें और उन्हें अपना जीवन जीने दे। इसी में समाज की बेहतरी है।

नवल किशोर कुमार अपना बिहार  वेब पोर्टल के संपादक हैं और हाशिये के संघर्ष के प्रति प्रतिबद्ध पत्रकार हैं. 

पुस्तक मेले की 'मानुषी' से गायब गैरद्विज स्त्री

दिल्ली में ‘वर्ल्ड बुक फेयर’ नाम से किताबों का सात दिनों का मेला आज यानी रविवार, 15 जनवरी, को समाप्त होगा- अपने अंतिम दो दिनों में उफान सर्दी और सीमित उफान वाली भीड़ के साथ. यह दिल्ली के ‘तख्त-ए-ताउस’ पर राष्ट्रवादी और देशभक्त सरकार के गठन के बाद शायद तीसरा मेला है, और जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय में आसीन महिला केन्द्रीय मंत्री की विदाई के बाद आयोजित पहला मेला है, ‘नारी-लेखन’ की थीम पर केन्द्रित है- ‘ मानुषी’ नाम से. मेले की निदेशक डा.रीता चौधरी इस थीम की व्याख्या करते हुए लिखती हैं,  नारी के द्वारा या नारी पर केन्द्रित लेखन को यह मेला मुख्यतः केन्द्रित है, जिसमें उनके लेखन, किताबों और उनके पोस्टर्स प्रदर्शित किये गये हैं.

राष्ट्रवादियों के द्वारा इतनी नायाब थीम तय हो और उसमें उनकी दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता विषय-चिन्तन न हो तो लक्ष्य अधूरा रह जायेगा. इसीलिए पूरे सप्ताह तक ‘नर’ की ‘नारी’ और उसकी चेतना पर आयोजकों की ओर से कई विमर्श सत्र तय किये गये थे. हालांकि आयोजकों की ओर से आधिकारिक तौर पर तो मनुस्मृति पर कोई कार्यक्रम तय नहीं था, लेकिन ‘नर’ की ‘नारी’ का चिंतन और उसकी चिंता राष्ट्रवादी करें और उसे मनुस्मृति का कवच न पहनायें तो फिर काहे का राष्ट्रवाद और उसका नारी चिन्तन. कमी पूरी हो जायेगी अंतिम दिन हाल न. 8 में अंतिम कार्यक्रम के तौर पर ‘आधुनिक युग में मनुस्मृति’ की भूमिका विषय पर विमर्श के साथ.

‘मानुषी थीम’ पर आधारित वर्ल्ड बुक फेयर में समग्रता में किस ‘स्त्री’ का स्वरुप बनता है उसे उसके आयोजनों, प्राथमिकताओं, विमर्शों और भागीदारों के माध्यम से समझें, इसके पहले यह स्पष्ट हो लें कि किन मायनों में इस ‘असहिष्णु राष्ट्रवादी सरकार’ का पुस्तक व्यापार ‘सहिष्णु(!) पिछली सरकारों’ के पुस्तक व्यापार से बेहतर बताया जा रहा है. प्रकाशक बताते हैं कि आज किताबों की सरकारी खरीद में छोटे-बड़े सभी प्रकाशकों की किताबें शामिल की जाती हैं, जबकि इसके पहले ‘नामवरों’ के घर की मरम्मत या सजावट करने वाले या ऐसे ही ‘साहित्य-विभूतियों’ को इस या उस प्रकार से उपकृत करने वाले बड़े प्रकाशक ही लाभान्वित होते थे. मेले के प्रकाशक तो यह भी बता रहे थे कि इस बार स्पेस आवंटन में भी बड़े प्रकाशकों की ‘च्वाइस’ को तबज्जों नहीं दिया गया- उनके अनुसार यह सरकार द्वारा पोषित पुस्तक व्यापार का लोकतांत्रीकरण है. पता नहीं क्या सच है, लेकिन सच यह जरूर है कि दिल्ली में वर्ल्ड बुक फेयर में स्टाल के आसमान छूता किराये और विमुद्रीकरण से व्याप्त आशंका के कारण कई प्रकाशक इस मेले से दूर रहे.

अब समझने की कोशिश करते हैं कि मानुषी थीम वाले इस मेले में ‘नारी-चेतना’ विमर्श के तौर पर किस स्त्री का स्वरुप उभरता है. मेले में किताबों के क्रय-विक्रय व्यापार के बीच होने वाले विमर्शों और अन्य परफार्मेंस आधारित आयोजनों के आधार पर, जिस स्त्री का स्वरुप बनता है, वह राष्ट्रवादी एजेंडे में फिट बैठती वह नारी है, जो मिथकों में जीवित है या मध्यकालीन भक्ति चेतना में पगी है- खबरदार, जो मीरा, ललद्यद या आंडाल में किसी विद्रोही तेवर की पड़ताल की तो. इस नारी का कोई सिरा थेरियों से नहीं जुड़ता, थेरीगाथा से नहीं जुड़ता.

संस्कृत साहित्य में नारी-चेतना थीम की एक वक्ता कौशल पंवार को छोड़ दें तो ‘राष्ट्रवादी मानुषी थीम’ में गैरद्विज स्त्री को ढूंढें नहीं ढूंढ पायेंगे आप- न आरक्षण, न सद्भावना, न समता का भाव और न आधुनिक होने की चाह- कुल मिलाकर यही छवि है ‘राष्ट्रवादी मानुषी’ की. वह तो भला हो ‘दलित –दस्तक’ का कि अपने स्पेस पर वे दलित लेखिकाओं को लेकर आये.

कुछ सेल्फियों या कुछ अकारण-सकारण ली गई और फिर सोशल मीडिया में जारी तस्वीरों से ज्यादा ‘मानुषी थीम’ इस मेले में खोजना एक श्रमसाध्य, थकाऊ और अंततः निराश करने वाला अनुभव होगा!