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दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप

दलित पितृसत्ता को भी जिसने चुनौती दी

आज सावित्रीबाई फुले की जयंती (3 जनवरी) से हम एक मुहीम शुरू कर रहे हैं-स्त्रीकाल में ‘स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व की भूमिका में काम कर रही स्त्रियों से एक परिचय की मुहीम. आइये इस श्रृंखला में शुरुआत गुजरात की प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता मंजुला प्रदीप के व्यक्तिव और उनके कार्यों के परिचय से करते हैं. दलित आंदोलन को समर्पित संस्था ‘नवसर्जन’ में सालो तक शीर्ष नेतृत्व की भूमिका में रही मंजुला से हमारा परिचय करा रहे हैं उत्पलकांत अनीस और मेहुल.  

मंजुला प्रदीप पहली महिला थीं, जिन्होंने ‘नवसर्जन’ में काम करना शुरू किया था. गुजरात में नवसर्जन पहली ऐसी संस्था है, जो दलितों के द्वारा, दलितों के लिये दलित अत्याचारों का डॉक्यूमेंटेशन का काम करना शुरू किया था, जिसने गुजरात में दलित संघर्ष और दलित चेतना की एक मुकम्मल बुनियाद रखी और उसे एक नया आयाम दिया. मंजूलाबेन ने अपने परिवार से संघर्ष और विद्रोह की शुरूआत करके नवसर्जन से लेकर सार्वजनिक जीवन में भी न सिर्फ दलित महिलाओं के मुद्दे को लेकर बल्कि आदिवासी, अल्पसंख्यक ओर ओबीसी महिलाओं के लिए भी संघर्ष और विद्रोह किया. बारह साल तक नवसर्जन के निदेशक का कार्यभार सँभालने के बाद 14 नवम्बर 2016 को अपना त्यागपत्र दिया. 22 साल की उम्र में वे 1992 में एक आम कार्यकर्ता की तरह नवसर्जन से जुडीं, जिन्हें बाद में अपने माता-पिता का घर भी छोड़ना पड़ा.

बचपन:
एक दलित परिवार में पैदा हुई मंजूलाबेन प्रदीप का बचपन काफी तनाव भरा रहा है. एक सरकारी अधिकारी और गृहिणी बाप-मां की वे तीसरी संतान हैं. इनकी मां, पिता की दूसरी पत्नी थीं. दोनों के उम्र में फांसले बहुत ज्यादा थे, जिससे इनके माता-पिता के बीच में ताउम्र तनाव रहा. बताया जाता है कि बेटे की आस के कारण इनके माता-पिता के बीच में तनाव और बढ़ गया जब मंजूला प्रदीप का जन्म हुआ. इनका जन्म गुजरात के बड़ौदा शहर में हुआ और प्राथमिक से लेकर एम. ए. (सोशल वर्क) की इनकी पढाई भी वहीं हुई. चार साल की उम्र में इनका यौन शोषण हुआ, जिसे उस समय वे किसी को बता भी नहीं पाई. उन्हें ये बताने की हिम्मत करने में काफी साल लगे कि मेरे साथ कुछ हुआ था, जब उनका दुबारा किशोरावस्था में भी यौन शोषण हुआ.

मंजूला बेन बताती हैं कि जब वे बचपन में स्कूल जातीं तो इनके नाम में कोई जातिसूचक शब्द न होने के कारण, उनसे दुबारा इनका सरनेम पूछा जाता था. मंजूलाबेन  प्रदीप को ये बात बहुत बुरी लगती थी कि उनके नाम के आगे सरनेम क्यूँ नहीं है, जबकि दूसरे बच्चों के नाम में उनका सरनेम है. मंजूलाबेन को उनकी जाति का पता पहली बार बारह साल की उम्र में चला, जब वे अलीगढ़, उत्तरप्रदेश, के पास अपने गाँव गई और जब उनके एक चचेरे भाई एक मरी हुई भैस लेकर अपने मोहल्ले में आये. मरी हुई भैस को देखकर जब उन्होंने अपने चचेरे भाई से पूछा कि उसे क्यों लाये, तब उनका जवाब था, ‘तुम्हे पता नहीं है कि हम चमार हैं.’ मंजूलाबेन बताती हैं कि तब उन्हें बहुत बुरा लगा कि उनके  पापा ने उनसे जाति छुपाई. वे बताती हैं कि जाति का अहसास उससे पहले उन्हें नहीं हुआ था.

“क्योंकि हमलोग बड़ौदा में जहां रहते थे,  वह मोहल्ला मिश्रित लोगों की बस्ती था,  तो हमे कभी लगा ही नहीं कि हम अछूत हैं. हम निम्न जाति के हैं. मुझे बाद में यह पता चला कि मेरे पिता ने मेरे नाम में कोई जातिसूचक शब्द इसलिए नहीं लगाये कि हमारी जाति का पता दूसरे को न लगे,’ वे बताती हैं. बतौर मंजूलाबेन वे पढ़ने में तेज थी, क्लास में टॉप करती थी, स्कूल के अतिरिक्त पाठयक्रम प्रोग्राम में शामिल होती थीं, संगीत और खेलकूद में हमेशा अव्वल रहती थीं- सुन्दर दिखतीं और साफ-सुथरे कपड़े पहनतीं. बचपन के एक शिक्षक उन्हें मंजूलाबेन शर्मा बुलाते थे,  यह संबोधन उन्हें अच्छा नहीं लगता था.

मंजूलाबेन को बचपन से ही पितृसत्ता से सामना करना पड़ा. वे दो बाते बताती हैं. पहला, कि जब वे बड़ी हो रही थीं तो उनके पिता ताने देते थे यह मछली वाले की लड़की है. यानि उनके पिता का कहना था कि अस्पताल (जिस अस्पताल में उनका जन्म हुआ था) में उन्हें बेटा पैदा हुआ था, जिसे बदल दिया गया था, फिर कहते कि हम मजाक कर रहे हैं. दूसरा उनके घर में हमेशा तनाव रहता और उनके पिता हमेशा उनकी माता के साथ मार-पीट करते थे. चार भाई बहनों में मंजूलाबेन, उस छोटी से उम्र में भी उनका विरोध करती, जिससे उनके पिता उन्हें भी काफी पीटते.

कॉलेज जीवन:

बी. कॉम करने के बाद उनके पिता चाहते थे कि वे एम. कॉम. या मैनेजमेंट का कोर्स करें, लेकिन उन्होंने मास्टर इन सोशल वर्क चुना. बड़ौदा यूनिवर्सिटी के इन्ट्रेस टेस्ट में जनरल मेरिट लिस्ट में क्वालीफाई करके उन्होंने एम.ए. में नामांकन लिया. वहां भी वे  पढाई में टॉप रहीं. लेकिन उनका वहां का अनुभव भी स्कूल से इतर नहीं रहा. यूनिवर्सिटी के दोस्त नाम में सरनेम न देखकर जाति जानने को इच्छुक तो रहते थे लेकिन उनकी हिम्मत ही नहीं होती कि सामने से उनकी जाति उनसे पूछें. एक दिन उनके क्लास का एक दोस्त बोला कि मुझे सब पता चल गया है कि तुम रिजर्व केटेगरी से संबंधित हो. बताती हैं, ‘वहां कुछ दलित टीचर भी थे, जो मुझपर गर्व करते थे कि एक दलित लडकी जो पढ़ने में तेज है और यहाँ तक पहुची.’

नवसर्जन से जुडीं
“अबतक जो घटनाएं मेरे साथ घटी थीं, ने मुझे काफी संवेदनशील बना दिया. मुझे लगा कि मेरे समाज के लोगों, खासकर महिलाओं के लिए कुछ करना होगा. नवसर्जन से जुड़ने से पहले मैं गुजरात स्टेट फ़र्टिलाइज़र कंपनी में चयन हुआ था और . वहां अच्छा वेतन और रूतबा मिलने वाला था , जिसे छोड़कर नवसर्जन से 1992 में जुडीं. जब मैं नवसर्जन से जुड़ी तो मेरी संवेदनशीलता ने लोगों की, खासकर महिलाओं की, समस्याओं को समझने में मदद की. नवसर्जन में आने के बाद दो साल तो मुझे अपनी पीड़ा से बाहर निकलने में लगा. हमारी संस्था में जो वर्कशॉप होता था, उसमे मैं खूब रोती थी.” नवसर्जन से जुड़ने के बाद मंजूलाबेन  को जातिव्यवस्था और जाति उत्पीडन के बारे में सही समझ मिली. इसके बाद उन्होंने  बाबा साहेब अंबेडकर की किताबों का अध्ययन किया. जल्द ही उन्होंने दलित महिलाओं के लिए काम करना शुरू किया. मंजूलाबेन ने बड़ौदा के पादरा में अपना ऑफिस खोला. उस इलाके में उन्होंने खेत मजदूरी का और न्यूनतम मजदूरी का मुद्दा उठाया और दलित महिलाओं को अपने आन्दोलन से जोड़ना शुरू किया. महिला नेतृत्व को स्थानीय स्तर पर खड़ा किया. 1995 में पादरा तालुका के गांवों में काम शुरू किया, जहां उन्हें कोई किराये का कमरा भी देने को तैयार नहीं हुआ. उन्हें ऑफिस के लिए कमरे मिलते भी तो हर छः महीने में उसे बदलन पड़ता. आसपास के गाँव में दलित महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू किया. 1999 में उनके ऊपर विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ताओं ने हमले भी किये..
2000 के दौरान वे नवसर्जन में प्रोग्राम डायरेक्टर बनीं, जहां उन्होंने जेंडर को फोकस करना शुरू किया- दलित समाज में जेंडर समानता को लेकर काम करना शुरू किया. इसकी शुरुआत उन्होंने नवसर्जन संस्था से ही की -जहां पुरूषों की काफी संख्यां थी, लेकिन महिलाएं कम होती थीं. उनहोंने नवसर्जन से महिलाओं को जोड़ना शुरू किया. फिर उन्होंने एक फैसला लिया कि नवसर्जन में जो भी कार्यकर्त्ता नये सिरे से आये, वह महिला होगी. फिर उन महिलाओं को प्रशिक्षण देने का काम शुरू किया. खुद मंजूलाबेन  बताती हैं कि उनके बारे में भी लोगों ने काफी अफवाहें बनाई, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह कभी नहीं की. यहाँ तक कि हमले भी हुए. वे बताती हैं कि जब उनके बारे में (दलित पुरुष भी) अफवाह उड़ाते तो वे सावित्रीबाई फुले को याद करतीं कि कैसे सावित्रीबाई फुले ने भी तमाम कष्ट सहते हुए महिलाओं के लिए एक स्कूल खोला. वे अपना अनुभव बताती हैं कि जब वे रात में किसी गाँव में रूकती तो उनसे पूछा जाता कि आपकी शादी हुई है. जब वे बतातीं कि मेरी शादी नहीं हुई है, तो गाँव के दलित महिला और पुरुष दोनों कहते कि ‘आपकी तो गाँव-गाँव में ससुराल है, आपको शादी करने की जरूरत क्या है?’ वे बताती हैं कि वे किसी दलित महिला को पहली बार लीडरशीप के स्तर पर काम करते हुए देखते तो उन्हें लगता कि महिला भटक रही है. वे संस्थान की दूसरी महिला कार्यकर्ताओं के द्वारा भी ऐसे ही अपमानजनक अफवाहें उडाये जाने के बारे में बताते हुए आक्रोशित होती हैं. उन्होंने स्विस डेवलपमेंट एंड कोओपोरेशन में 2003 में एक साल के लिए काम किया. वहां से आने के बाद नव सर्जन की निदशक बनी.

नवसर्जन की निदेशक और महिलाओं के लिए संघर्ष
जब वे वापस संस्था में आयीं तो वहां एक फैसला लिया गया कि संस्था में बड़े स्तर पर बदलाव होंगे. लेकिन मंजूलाबेन ने सोचा भी नहीं था कि निदेशक बनने के लिए चुनाव होगा. संस्था के इतिहास में पहली बार निदेशक के लिया चुनाव हुआ और पुरुषों को पछाड़ते हुए मंजूलाबेन ने निदेशक का काम संभाला. संस्था के पुरुष कार्यकर्ताओं को सबसे बड़ा झटका लगा कि वे एक औरत के सामने हार गये. लेकिन उनके लिए ये राह इतनी आसान नहीं थी. और अब दलित पितृसता से संघर्ष आमने-सामने की होने लगी. वे बताती हैं कि इस संस्था में जितने आरोप लग सकते थे, सारे आरोप मुझ पर लगे. वह चाहे व्यक्तिगत जिन्दगी से जुड़ा हो या संस्थान से जुड़ा. लेकिन वे इन आरोपों से डिगी नहीं और अपने काम में लगीं रहीं. उन्होंने महिला कार्यकर्ताओं को स्वनिर्भर बनाने के लिए करीब 40 स्कूटी खरीदे. इससे पहले इन महिला कार्यकर्ताओं को क्षेत्र में कहीं जाना होता था तो वे पुरुष कार्यकर्ताओं के ऊपर निर्भर होती थीं. संस्था के भीतर भी वे पितृसत्तात्मक नियमों और ढांचे को चुनौती देने लगीं. इससे पहले संस्था में जो भी महिला कार्यकर्ता काम करती थी, उसे पति या किसी रिश्तेदार पुरुष से एक पेपर पर साइन करवाना पडता था कि अगर वह महिला किसी पुरुष के साथ बाइक पर आयेगी जायेगी तो उन्हें कोई परेशानी नहीं है. जब वे महिलायें अपने पुरुष सहकर्मियों के साथ बाइक पर पीछे बैठकर जाती तो मोहल्ले और गाँव में उनके बारे तरह तरह की बातें कही जाती.  इससे उन महिला कार्यकर्ताओं के हौसले पस्त होते थे. लेकिन मंजूलाबेन ने उनकों ट्रेनिंग दी. उनको मजबूत बनाया. संस्था की तरफ से स्कूटी दिलवाया, उन्हें उन महिलाओं को ड्राइविंग की ट्रेनिंग भी दिलवाई. जिससे उन्हें काम करने का हौसला भी मिला. इसके बाद प्रत्येक जिले और तालुका स्तर पर संस्थान के अन्दर, जो लीडरशीप थी उसमें महिलाओं को आगे किया तो फिर इन महिलाओं ने दूसरी महिलाओं के लिए जगह बनाई. वे गुजरात की दलित महिलाओं के बारे में बताती हैं कि दलित महिलायें बहुत हिम्मती होती हैं, लेकिन हम उन्हें पहचान नहीं पाते है. गुजरात में आज जो दलित आन्दोलन हुआ है, वह पूरे देश को एक नई दिशा दिखा रहा है, नवसर्जन उस आन्दोलन का एक भाग है.

दलित पितृसत्ता से संबंधित एक सवाल के जवाब में मंजूलाबेन कहती हैं कि गुजरात में दलित महिला के ऊपर घरेलू हिंसा ज्यादा है. गुजरात में दलित जाति पंचायत हरियाणा की  खाप पंचायत की तरह ही है. दलित महिलाओं की अप्राकृतिक मौत बहुत ज्यादा होती है. वे बताती हैं कि दलित महिलाओं में हिम्मत, ताकत और समझ बहुत ज्यादा है.

मंजूलाबेन ने गुजरात के पाटण में पीटीसी (प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिंग सर्टिफिकेट) कॉलेज में गैंग रेप पीडिता के लिए लड़ाई लड़ीं. इस कसे में 6 शिक्षक कई सालों से लड़कियों से बलात्कार करते थे. सबसे पहले एक दलित लडकी ने आवाज उठाई. उसके साथ 14 बार गैंगरेप हुआ था, उसे एक महीने अपने साथ रखीं और 6 दोषियों को आजीवन जेल की सजा हुई. उन 6 दोषियों में 2 दलित शिक्षक भी थे. इस कारण से उनके ऊपर काफी दबाव आया. यहाँ तक कि नवसर्जन के ही कई पुरुष कार्यकर्ताओं ने कहा की मंजूलाबेन तुम पागल हो गयी हो. आरोपियों में बीजेपी के एक एमपी का भतीजा भी शामिल था, जो दलित था. कई दलित पुरुषों ने इस केस को ख़तम करने की बात की थी वहीं कई दलित पुरुषों ने मंजूलाबेन की सहायता भी की.  इस केस के बाद गुजरात में एक बड़ा बदलाव यह आया कि इस तरह के मामले,जो पहले पुलिस के पास कम पहुँचते थे, वे पहुँचने लगे. उस केस के बाद पुलिस में रिपोर्टिंग करने की संख्या बढ़ गयी. मंजूलाबेन कहती हैं, ‘जब गैर दलित पुरुष हमारी महिला के खिलाफ अपराध करता है तो दलित पुरुष कहेंगे कि लड़ो-लड़ो. लेकिन अपराध में जब कोई दलित शामिल होता है, तो जाति पंचायत से लेकर राजनितिक नेताओं का दबाव समझौता करने के लिए बढ़ने लगता है.’ बतौर मंजूलाबेन, उन्हें सबसे ज्यादा चुनौती अपने समाज से ही मिली है. उन्हें अपने ही आन्दोलन और संस्था के लोगों ने बदनाम करने की कोशिश की, चरित्रहीन तक कहा गया.

लेकिन इस केस के तुरंत बाद नवसर्जन ने करीब और 50 रेप मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ा. फिर मंजूलाबेन  ने ये नहीं देखा कि ये रेप पीडिता दलित महिला है या अल्पसंख्यक या ओबीसी, आदिवासी या सवर्ण महिला है. इसके बाद उनहोंने नवसर्जन, जो सिर्फ जाति के मुद्दे पर काम करता था , को महिलाओं के मुद्दे और संघर्ष तक ले कर गयी. 2002 में दंगे के दौरान उन्होंने मुस्लिम  महिलाओं के लिए भी काम किया. आदिवासी महिलाओं और दलित महिलाओं की ट्रैफिकिंग से संबंधित केस को भी मंजूलाबेन कानूनी सहायता देती है. 2008 में उन्होंने गुजरात महिला अधिकार पंच  बनाया, जिसमें सभी जाति की महिलाएं शामिल हैं. इसके कार्यकर्ता गांव स्तर  पर हैं. 2010 में 8 राज्यों  में जाकर उनहोंने कांफ्रेंस किया और 2011-12 में 26 महिलाओं को चुनकर उन्हें ट्रेनिंग दी, जिन्होंने आज अपने क्षेत्रों में अच्छा काम किया है. उनकी कोशिश यह रही कि उनका ये आन्दोलन सिर्फ गुजरात में न सिमटा रहे, बल्कि पूरे देश में भी फैले. आगे की उनकी योजना इस संगठन को मजबूत करने की है और युवाओं और महिलाओं के लिए एक बड़े स्तर पर लीडरशीप खड़ा करने की है. उनकी कोशिश यह भी है कि अभी गुजरात में जितने दलित संगठन है, उन संगठनो को एक मंच पर लाया जाये.  इस मंच का कोई नाम न देकर एक कॉमन  प्लेटफोर्म बनाने की और गुजरात के दलित आन्दोलन को आगे बढ़ने की एक रणनीति पर भी काम कर रहीं हैं.

मंजूलाबेन  कहती हैं शादी और इस तरह की व्यवस्था को नहीं मानती हूँ। उन्होंने इस साल बौद्ध धर्म ग्रहण किया, जबकि इससे पहले वे नास्तिक थी। बतौर मंजूलाबेन, मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे एक इंसान के रूप में देखें। राजनीतिक रूप से मैं अपनी एक अस्मिता बनाती हूँ कि मैं एक दलित औरत हूँ या एक दलित हूँ, जब मैं आंदोलन करती हूँ।

उत्पलकान्त अनीस मीडिया शोधार्थी हैं और सूचना तकनीक का आदिवासी महिलाओं पर प्रभाव पर शोध कर रहे हैं.

मेहुल केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात में शोधार्थी हैं.

बोलिए न पापा कुछ तो बोलिए

पूनम सिंह

कथाकार , कवि और आलोचक पूनम सिंह की कहानी , कविता और आलोचाना की कई किताबें प्रकाशित हैं . सम्पर्क : मो॰ 9431281949

विकास ने जितना कहा था उससे कहीं अधिक अनकहा अपने भीतर लेकर चला गया था और उसके जाने के बाद से उसके शब्दों के बुटधारी पाँव मेरे कलेजे को रौंद रहे थे ।
‘वह क्या था’ उसकी आँखों में जो नश्तर की तरह मुझे चीरता मेरे कलेजे तक उतर गया था । कैसा था उस वक्त उसका चेहरा – आग की भट्टी में दहकते लोहे की तरह।
और मैं ? मैं किस तरह ओदी लकड़ी सी धुआँने लगी थी उसके सामने । मुझे रिएक्ट करना चाहिए था और मैं उसका मनुहार करने लगी थी – ‘प्लीज विकास —– प्लीज —- माँ बगल के कमरे में है  – अच्छा नहीं लगेगा तुम्हारा ऐसा विहेव । वह नहीं आना चाहती थी यहाँ – मैंने ही उसे आग्रह करके बुलाया था क्योंकि तुम बाहर टूर पर गये हुए थे और मैं माँ के साथ दो दिन बिताना चाहती थी । यह घर मेरा भी है विकास – क्या इतना भी हक नहीं बनता मुझे — ?’

वह पराठे का तोड़ा हुआ कौर मसल कर उठ गया था – ‘हक है तुम्हारा तो सराय बना दो ना घर को – माँ के साथ अपने सौतेले बाप को भी बुला लो  – मैं ही चला जाता हूँ इस घर से ।’
घूसे की तरह लगा था यह शब्द मुझे । सौतेला बाप ? छिः ।
माँ और सोम अंकल के रिश्ते को कितना घिनौना रूप दे गया था विकास । इतनी घृणित बात कह गया था और मैं चुप होकर सह गई । क्यों ? आखिर क्यों ?
भीतर से इतनी तेज रूलाई फूटी कि मैं दौड़ती हुई बाथरूम में घुस गई और नल खोलकर दहाड़ मार कर रो पड़ी । खूब रोई – जी भर कर रोई और शांत होकर जब बाहर निकली तो माँ अटैची थामे बाहर खड़ी थी ।
माँ ? अनकहे प्रश्न के आगे सबकुछ निरूत्तर था ।
माँ ने एक शब्द नहीं कहा । बस मेरे सिर पर अपना हाथ रखा और माथे पर एक भींगा चुम्बन  अंकित करके तेजी से बाहर निकल गई ।
मेरे पाँव पत्थर के हो गये थे । खिड़की के शीशे से दिखाई दिया – माँ गेट के बाहर सड़क पर  टैक्सी को हाथ देकर रोक रही थी । पल भर में वह अंदर समा गई और मेरी आँखों से ओझल हो गई । मेरे कलेजे में एक मरोड़ सी उठी और मैं फूट-फूट कर रो पड़ी ।

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साठ साल की माँ की जिंदगी आज सबके लिए एक कहानी बन गई है । अपने पराये सब की जुबान पर निंदा रस का एक स्वाद बनकर माँ जिस रूप में परिभाषित हो रही है वह मुझे भीतर तक हिला कर रख देता है । जितनी मुँह उतनी बातें —
कुछ दिन पहले छोटी बुआ ने भी फोन पर कहा था – ‘यह सब क्या सुन रही हूँ सुरभि ? सरला भाभी को हो क्या गया है ? इस बुढ़ापे में गैर मर्द के पीछे अपना सबकुछ होम कर रही हैं ।’
गैर मर्द ?
मुझे तमाचे की तरह लगा था वह शब्द और मैं रिएक्ट कर गई थी – ‘सोमनाथ अंकल गैर मर्द नहीं हैं बुआ । वे पापा के सबसे कठिन और गाढ़े वक्त के साथी हैं । हमारे परिवार के लिए उन्होंने जितना किया – कोई सगा सोच भी नहीं सकता । उन्होंने भरी जवानी में पापा के लिए अपनी किडनी तक दान दिया  – इतना बड़ा एहसान क्या कोई गैर करता है बुआ ?’

वह सब तो ठीक है लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आकर सरला भाभी का उनके साथ इस तरह खुलेआम रहना , कलकत्ता , भोपाल और न जाने कहाँ-कहाँ चित्रों की प्रदर्शनी लगाने जाना – यह सब देखने वालों को अच्छा नहीं लगता सुरभि – लोग बहुत कुछ कहते हैं ।
‘कहने वालों को कोई नहीं रोक सकता बुआ । लोग तो आकाश के चाँद में भी धब्बा देखते हैं । कहने दीजिए उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता इससे ।’
‘लेकिन सुरभि !इससे परिवार की प्रतिष्ठा पर आँच तो आती है न !  भैया के काल कलवित होते ही  भाभी जिस तरह का जीवन जीने लगी हैं वह डूब मरने जैसा है हम सब के लिए । तुम्हें क्या कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा सुरभि ?

उनकी आवाज की तिक्तता ने मुझे दहला दिया था । कुछ पल मैं सकते में रही लेकिन फिर चुप नहीं रह सकी – ‘माँ की कला अगर उसे अपनी एक अलग पहचान दे रही है तो यह हम सब के लिए डूब मरने की बात क्यों है बुआ ? इससे परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ने की जगह ध्वस्त कैसे हो रही है ?’
‘लगता है तेरी भी मति माँ की तरह मारी गई है । कुछ भी कहना व्यर्थ है तुझसे ।’
उन्होंने गुस्से में फोन काट दिया था ।

मुझे याद नहीं उस दिन कितनी देर तक मैं सवालों के जंगल में भटकती रही । माँ के चेहरे पर लांछना की काली स्याही पोतने पर क्यों तुले हैं सब लोग । माँ ने ऐसा क्या कर दिया है ? क्या पापा के बाद उसे रंग रोशनी से विमुख हो जाना था ? उस कला का गला घोंट देना था जहाँ से जिन्दगी जीने की शक्ति और उर्जा हासिल की है उसने ।माँ अगर घुट-घुट कर जीती तो शायद सबकी सहानुभूति उसके साथ होती । लेकिन माँ ने जिन्दगी की बेरहमी के सामने कभी घुटने नहीं टेके । शूलबिद्ध पंजरों से भी हमेशा तन कर ही खड़ी हुई – उसका इस कदर तन कर चलना ही आज सबकी आँखों में शोले भड़काता है । कहने वालों के कहन में माँ वर्जना की सारी दीवारों को लांघ गई है । वह उम्र के अंतिम पड़ाव पर एक गैर मर्द के साथ रह रही है – वह दुराचारिणी है – वह पतिता  है –कुलटा है — ? उफ ! —

प्रश्नाकुल उद्विग्नता और छटपटाहट लिए मैं पूरे घर में घूम रही हूँ । बार बार विकास का कहा ‘सौतेला बाप’ और बुआ का कहा ‘गैर मर्द’ मेरे कलेजे में बरछी की तरह चुभ रहा था । भीतर बहुत कुछ दरक गया था । आँखों के अश्क में रिश्तों के चेहरे बदल गये थे – संबंधों का ताप कहीं चुक गया था ।
अपने से दस साल बड़ी जिस बुआ से मेरा बहनपा सा रिश्ता रहा – सबकुछ शेयर करती रही जिससे – वही बुआ माँ के लिए कैसी ओछी सोच रखती हैं ? माँ के किए सारे एहसानों को भूलकर आज उन्हें पतिता और कुलटा कह रही हैं ।
आप कैसे सब भूल गईं बुआ ? ब्याह के बाद पतिगृह में रहते हुए आप जिस तरह हर रात रखेलिन सौत की सेज सजाती घुट-घुट कर जी रही थीं – मुँह पर ताला जड़ कर दो कुलों की लाज निभा रही थीं – उस ताले को खोलने का काम माँ ने ही तो किया था न बुआ । माँ का संबल पा कर ही आप आत्मदाह के नरक कुंड से निकल कर मुखर हुई थीं अपने अधिकार , अपने सम्मान के लिए ।
आज सबकुछ है आपके पास लेकिन जिसकी बदौलत , उसी को बिना पुतलियों की आँख से देखती हुई कुलनाशिनी कह रही हैं आप ? क्यों बुआ क्यों ?
और विकास ! आज उसने भी मर्यादा की सारी हदें लांघ कर माँ को इसी रूप में परिभाषित किया है । लेकिन क्या दृश्यमान यथार्थ के भीतर की सच्चाई यही है ?  माँ क्या सचमुच दुराचारिणी है – पतिता  है कुलटा है ?

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डबडब आँखें दीवार पर टंगी पापा की तस्वीर से चिपक जाती है – हमेशा हँसता हुआ वही नुरानी चेहरा । कैनवाॅस पर तैल रंग में उकेरी गई यह तस्वीर माँ की बनाई हुई है । कैनवास पर मोटे तैल रंगों का लेप लगाकर झीनी पारदर्शी छोटे-छोटे स्ट्रोक्स से माँ ने कितनी एकाग्रता से बनाई होगी यह तस्वीर , तभी तो उसकी आत्मा की गहराई से निकली राग भरी रोशनी से दीपित पापा का चेहरा आज भी जगमग कर रहा है इसमें —
‘वाऊ! ग्रेट सरप्राइज , आई एम प्राउड आॅफ माई लव’ अपनी चालीसवीं सालगिरह पर माँ के द्वारा दिये गये इस प्रेम उपहार को देखकर पापा ने किस तरह भावविभोर होकर अपनी बाँहों में माँ को भर लिया था ।
माँ पापा के बीच प्रेम के इस अटूट बंधन को मैंने बचपन से देखा – आज कैसे मान लूँ कि माँ उस
बंधन से सर्वथा मुक्त होकर उन्मुक्त जीवन जी रही है —– ?
माँ पापा के जीवन में प्रेम और संघर्ष के इतने गाढ़े रंग मैंने देखे हैं कि मेरा दाम्पत्य मुझे हमेशा फीका और बेरंग दिखता है । एक हठी और दंभी पुरूष के साथ ग्यारह वर्षों से संतुलन साध कर चल रही हूँ मैं । ऐसा नहीं कि मन में कभी विद्रोह आता ही नहीं – खूब आता है – लेकिन माँ पापा के दाम्पत्य का वही गाढ़ा रंग मेरे मन पर ऐसा काबिज है कि कोई क्रांति मन में घटित ही नहीं होती । वह प्रेम जो मुझे विपरीत समय में पतवार की तरह थामता है , उसे मैं मिथ्या कैसे मान लूँ ?

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पापा ! आप तो आर पार सबकुछ देख रहे हैं – कुछ तो बोलिए । माँ की खुद्दारी उसकी आवारगी कही जा रही है  और कहने वाले सभी अपने ही लोग हैं , जिनके बारे में आपने बहुत दुःख के साथ अपनी बीमारी के कठिन दिनों में मुझसे कहा था – ‘संबंधों की अर्थहीनता को कैसे झेला सहा और साधा जाता है , तुम्हारी माँ उसकी मिसाल है सुरभि । खुदगर्ज रिश्तों से भी वह कभी आहत नहीं होती , न उनके प्रति कभी आँखें फेरती है । मैं यहाँ इस बिछावन पर ही पड़े पड़े देखता हूँ – अपने लोगों ने कितनी बार कितने तरह से छला है उसे । मेरी बीमारी में पानी की तरह पैसा बह गया । तुम्हारे ताऊजी ने कुछ रूपयों की मदद के बदले गाँव में मेरे हिस्से की सारी जमीन अपने नाम करवा ली । सरला ने मुझे बताया तक नहीं । शूलबिद्ध पंजरों से भी वह हमेशा तन कर ही खड़ी रही ।’

पापा का कंठ अवरूद्ध हो गया था – आँखों के कोर में ओस की बूँदें झलमलाने लगी थीं । उन्होंने लंबी सांस खींचकर फिर कहा – बस एक ही दुःख मुझे भीतर तक साल रहा है बेटा कि मैं तेरी माँ के लिए कुछ नहीं कर सका । भाई भतीजा घर परिवार नाते रिश्ते सब के लिए सबकुछ किया पर जिसने तिल तिल कर मेरे लिए अपनी जिन्दगी होम की , उसके लिए कुछ नहीं किया । उसकी कला को कोई पहचान नहीं दिला सका । लखनऊ आर्ट काॅलेज से लैंडस्केप में पोस्ट डिप्लोमा और वाटर कलर में विशेषज्ञता हासिल करने वाली तेरी माँ जीवन भर नारायणी प्रेस की किताबों का कवर पृष्ठ बनाकर अपने स्वत्व की खोज करती रही और मैं उसकी कला से बेखबर , अपनी अकादमी सफलता का जश्न मनाता देश विदेश की सैर करता रहा ।  रूढ़की विश्वविद्यालय के वास्तु कला विभाग का हेड एवं मुंबई के जहांगीर आर्ट गैलरी का चेयरमैन होकर भी उसकी पेंटिंग्स की एक भी प्रदर्शनी नहीं लगवा सका । आज जब मैं असक्त होकर बिछावन पर पड़ा हूँ तब अपने चारो ओर रंगों के कोलाॅज को क्षत बिक्षत देखकर छटपटा रहा हूँ । मैंने तेरी माँ की अकूत संभावनाओं को किस तरह नष्ट कर दिया सुरभि —- ।’
पापा फफक कर रो पड़े थे ।
माँ को कितनी दूर तक समझते थे पापा — । पापा के सिवा किसने समझा माँ को ?
पापा ! अगर आज आप इस तस्वीर से बाहर आकर खड़े हो जाते तो मुझे कितना बल मिलता । मैं माँ और सोमनाथ अंकल के रिश्ते को इस रूप में परिभाषित होते नहीं देख सकती पापा । सोम अंकल ने आपकी जान बचाने के लिए खुशी खुशी अपनी किडनी डोनेट की और माँ को बचाने के लिए उसकी कला को संरक्षण दिया । यह कोई गुनाह नहीं – यह तो उदात्त प्रेम की प्रकाष्ठा है ।

आपने ही बताया था सोम अंकल माँ के साथ लखनऊ आर्ट काॅलेज में ही पढ़ते थे । आपकी पहली नियुक्ति लेक्चरर के रूप में उसी काॅलेज में हुई थी । फिर माँ के अप्रतिम सौंदर्य से बंधकर आपने उससे ब्याह रचाया और रूढ़की विश्वविद्यालय में वास्तु कला के हेड होकर चले गये । आपके जीवन का यह पारदर्शी वृतांत माँ के विडम्बनाग्रस्त जीवन के उन सभी सवालों का सहज उत्तर है लेकिन इसे समझेगा कौन ? अपने लोग तो इन सवालों  की ओर पीठ करके खड़े हैं पापा ।

लेकिन मेरी चेतना उस सत्य की अनदेखी नहीं कर सकती – वह दारूण क्षण अब भी मेरी स्मृति में वैसा ही जड़ा है । पर्दे के पीछे खड़ी आपकी उस आवाज को मैं अब भी सुन रही हूँ पापा – ‘जिन्दगी बहुत छोटी होती है सोम लेकिन कला बहुत बड़ी । उसे साधने में कई जिन्दगियाँ चुक जाती हैं । सरला से मैंने प्रेम किया लेकिन उसकी कला को अपना जीवन नहीं दे सका । उसे पा लेने के बाद बहुत कुछ पा लेने की आकांक्षा बलवती होती गई और वह छूटती गई । उसने जीवन भर मेरे साथ कठिन दायित्वभार का निर्वाह किया –  अपनी क्षमताओं और संभावनाओं से सर्वथा विरत होकर सिर्फ मेरे लिए सोचा – लेकिन मैंने उसके लिए क्या किया ? जिसकी पेंटिंग को आर्ट काॅलेज में ‘गोल्ड मेडल’ मिला – उसकी कलात्मक हसरत मेरे एक भरोसे के लिए तरसती रह गई —-।’ सोम अंकल की हथेलियों को अपनी मुट्ठी में कस कर आप फूट फूट कर रो पड़े थे ।
‘सोम !तुम ही मेरी सरला के लिए भरोसे का वह संबल बन सकते हो । मुझे वचन दो – तुम उसकी कला को मरने नहीं दोगे ।’
शब्दों की लय टूट कर फिजाओं में बिखर गई थी ।
पापा !आपने अपनी टूटती हुुई सांसों की डोर से सोम अंकल और माँ की कला का गठबंधन किया था – मैं गवाह हूँ उस पल की लेकिन किससे कहूँ यह सब ?

आपके लिए माँ के अथाह प्रेम और समर्पण को मैंने बचपन से देखा है । आज भी माँ आपकी पथराई आँखों में टंगे उस सपने को ही पूरा करने के लिए सबकी आलोचना की पात्र बनी हुई है । लेकिन नम आँखों से भी वह उजली हँसी हँसती हुई कभी आहत नहीं दिखती । आपके जाने के वर्ष भर बाद पहली बार जब शिमला फाईन आर्ट सोसाईटी द्वारा आयोजित प्रदर्शनी में माँ की पेंटिंग्स को सर्वश्रेष्ठ सम्मान से नवाजा गया और उसकी पेंटिंग्स के लिए कई कला प्रेमी आगे बढ़ कर लाखों की बोली लगाये थे तो माँ ने सोम अंकल को साफ मना करते हुए कहा था – ‘अनूप की बीमारी में उसके सिरहाने बैठ कर असंख्य जागती रातों का दर्द पिरोया है इसमें – उस दर्द का सौदा मैं कैसे कर सकती हूँ सोम ?’ और माँ ने मेरे सामने ही फोन काट दिया था ।

आपके जाने के बाद ही यह बात भी मैंने जानी कि माँ आपकी बीमारी में अपने घर को बैंक से माॅरगेज करा कर उन पैसों से आपका ईलाज करा रही थी । इतने बड़े दुःसाहसी फैसले के बारे में उसने किसी से नहीं बताया था । जिन दिनों आप डायलेसिस पर थे और अस्पताल में पैसा पानी की तरह बह रहा था – मैंने माँ से विह्वल होकर पूछा था – ‘कैसे कर रही हो यह सब ? भैया की पढ़ाई और मेरी शादी में तो पापा ने पी॰ एफ॰ तक से सारा पैसा निकाल लिया था । घर परिवार और हमारे निर्माण में जीवन भर की कमाई लुटा दी उन्होंने और अब उनकी बीमारी में इतना खर्च ? माँ मैं विकास से कुछ मदद के लिए कहूँ ?’

मेरी नम आँखों को देख कर माँ ने मुझे कलेजे से लगा कर कहा था – ‘पगली , दामाद के सामने माँ बाप को याचक बनायेगी ? तू चिंता न कर , ऊपर वाला है न —- ’
नहीं माँ ! मैं शिवम भैया से  आज ही बात करूँगी ं।
माँ ने मुझे बहुत मजबूत आवाज में मना किया था – ‘नहीं सुरभि ऐसा हरगिज मत करना । तू जानती है विदेश में पीएच॰ डी॰ की पढ़ाई करने में कितना खर्च होता है । इन दिनों उसे जूली सपोर्ट कर रही है । नौकरी छोड़ कर पढ़ाई करते हुए बेटे के ऊपर इतना बड़ा बोझ देना मुनासिब  नहीं । रूपयों का बंदोबस्त हो जायेगा बेटा – बस डोनर मिल जाये – ईश्वर से यही प्रार्थना कर ।
होंठों पर हँसी और आँखों में पानी – माँ का चेहरा उस क्षण ओस में नहाये गुलाब की तरह आपके के सिरहाने जड़ा था ।

और फिर डोनर के रूप में अप्रत्याशित रूप से देवदूत की तरह अवतरित हुए थे सोमनाथ अंकल । माँ के सुहाग को बचाने की खातिर उन्होंने खुशी खशी अपना अंग डोनेट किया । लेकिन हमारा दुर्भाग्य था आप फिर भी हमारे बीच नहीं रहे । आप चले गये – बहुत बड़ा कवच टूट गया माँ का । सर से पाँव तक बिंध चुकी है वह फिर भी उफ नहीं करती ।

अभी हाल में ही शिवम भैया ने यह जानने की कोशिश की थी कि क्या आपके बनाये  घर को माँ ने सचमुच किसी ‘सम्बल’ नाम के एन॰ जी॰ ओ॰ को रजिस्टर्ड कर दिया है और अब सोम अंकल के साथ यायावरी की जिन्दगी जीने लगी हैं — ?
मैंने पूछा – किसने बताया आपको ?
भैया के स्वर में नाराजगी थी – क्यूँ ? मैं विदेश में हूँ तो क्या देश की खबर मुझे नहीं मिलती ? ताऊजी और बुआ ने सबकुछ बताया है मुझे ।
भैया ! अपनी माँ का हाल दूसरों से पूछते हैं आप ? माँ से खुद क्यों नहीं जानना चाहा यह सब ?
सुरभि तुम्हें पता है पापा के बाद माँ ने मुझसे अनजाने एक दूरी बना ली है । मैं नहीं जानता इस दूरी का कारण क्या है । अपनी तरफ से मैंने भरसक कोशिश की कि माँ को अपने साथ रहने के लिए राजी करूँ लेकिन वे विदेश में मेरे और जूली के साथ रहने को तैयार नहीं । यहाँ रहती तो ‘नाइटिंइगिल’ के साथ उनका मन भी बहला रहता और हमें बेबी सीटर में बेटी को डालने की जरूरत भी नहीं होती । लेकिन उन्हें तो अपने बच्चों से अधिक अपनी आड़ी तिरछी रेखाओं से लगाव है —।’
भैया ! उन्हीं रेखाओं ने उन्हें जीवित रहने का एक मकसद दिया है  – आप क्यों कहते हैं ऐसा ?
देखो सुरभि मेरी बात को समझने की कोशिश करो । आड़ी तिरछी रेखा खींच लेने से कोई बड़ा आर्टिस्ट नहीं बन जाता । इसके लिए समय के अनुसार ताम झाम और पब्लिसिटी जरूरी है । मैंने सोचा था माँ यहाँ रहती तो कैलिर्फोनिया के इंडियन फेमिली के बीच बच्चों को चित्रकारी  सिखलाने का काम उनके लिए आसानी से मैनेज किया जा सकता था । अपनी कला से वे कुछ अर्थोपार्जन भी कर लेतीं और आगे उनके लिए न्यूआर्क , वाशिंगटन जैसी बड़ी जगहों पर चित्रों की प्रदर्शनी के लिए कई संस्थानों से बात भी की जा सकती थी । परन्तु वे यहाँ रहने को पहले तैयार हों तब तो ? सच तो यह है सुरभि कि वे मुझे अपने से बिलकुल अलग कर चुकी हैं । मेरी इत्ती सी भी परवाह नहीं है उन्हें — वे भूल चुकी हैं कि उनका कोई बेटा भी है ।
ऐसा हरगिज नहीं सोचिए भैया – वे बहुत प्यार करतीं हैं आपको । हाँ उनका प्रेम एक्सपोज नहीं होता – वह उन्हीं की तरह अंतर्मुखी है – उसे समझने की जरूरत होती है – जैसे पापा समझते थे । मेरी आवाज की आद्रता ने भैया को चुप कर दिया था । लेकिन माँ के साथ उनकी संवादहीनता वैसी ही बनी रही ।

तिरस्कार और उपेक्षा की ऐसी पीड़ा हर क्षण सह रही है माँ । क्यों पापा – क्यों —–
सोम अंकल और माँ के रिश्ते में जो संयम , धैर्य और पारदर्शिता है , उसे आपकी तरह कोई और क्यों नहीं देख पाता ? क्यों नहीं सोच पाता कि जिस रिश्ते में मन निर्भय हो और मस्तक ऊँचा , वह रिश्ता ईश्वरीय होता है – उसे कलुषित कैसे कहा जा सकता है पापा ?
रौशनी और अंधेरे बहुत पास-पास होते हैं लेकिन दोनों में  बहुत फर्क होता है – आपने ही कहा था कभी । रौशनी में सब कुछ दिखता है लेकिन वह खुद नहीं दिखती । अंधेरे में केवल अंधेरा दिखता है । माँ क्या वही रौशनी नहीं -जिसमें देखने वाले को सब कुछ दिख रहा है – केवल वह नहीं दिख रही है । बोलिए न पापा कुछ तो बोलिए ।

दो चोटी वाली लड़की और अन्य कविताएं

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सुलोचना वर्मा

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित. छायाचित्रण और चित्रकारी में रुचि संपर्क :verma.sulochana@gmail.com

जरूरतें

सम्मान और सामान
श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द थे
स्त्री के लिए पुरुष के शब्दकोष में
जिनका अर्थ तय करती थीं जरूरतें

वक्त बेरहम अक्सर पलट जाता था

शून्य के जनसमुद्र में

हो उठा है कुत्सित ये मनहूस शहर
किसी स्तनविहीन नग्न नारी की देह के समान
और रात है एक पेड़ जिसपर लटक रहा है लालच
बनकर चमगादड़ों का कोई झुण्ड

खो गयी है इक रात उसके जीवन की
जिसे वह जी सकती थी सोकर या जागते हुए
जिसे पी गया है अंधकार स्वाद की ओट में
और अवाक रह गयी अभिसार को निकली युवती

कहाँ से ढूँढे सांत्वना का कोई भी शब्द ऐसे में
जहाँ ले चुकी हैं समाधि हमारी भावनाएँ
गूँजती हो जहाँ साज़िश शून्य के जनसमुद्र में
जहाँ भोर होते ही पूजी जायेगी फिर एक कन्या

आकार

सब जानते हैं
कि वह नही बेल पाती
चाँदसी गोल रोटियाँ
और ना ही बेल पाती है
समभुज त्रिकोण वाले पराठे
पर वह भरती है पेट कुछ लोगों का
लाकर चावल, आंटे, नमकऔरघी
साथ ही लाती और भी कई ज़रूरी सामान
जो होने चाहिए किसी रसोईमें

है शुद्ध कलात्मक क्रिया
पेट भर पाना, अपना और औरों का
कि जहाँ पेट हों भरे,
लोग निहार सकते हैं चाँद को घंटों
और कर सकते हैं चर्चा उसकी गोलाई की

भरा पेट देता है दृष्टिकोण
कि आप देख पाएँ
बराबर है त्रिभुज का हर कोण

सामान्य है ना बेल पाना
रोटियों और पराठों का
कमाकर लाना भी सामान्य ही है

असामान्य है समाज का स्वीकार लेना
एक ऐसी स्त्री को, जो सभी का पेट भरते हुए
नही बेल पाती है सही आकार की रोटी और पराठे

रसोई के बाहर अमीबा नज़र आती है स्त्री

स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं

इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं
कि शोध करे कण भौतिकी पर
और ठीक स्वर्ण पदक पा लेने के बाद
घर बैठे बन बेरोजगार बिना किसी ग्लानी के

वो कर सकती हैं प्रेम टूटकर किसी से
और जा सकती हैं किसी अजनबी के साथ बिताने उम्र
ऐसे में कुल की मर्यादा की रक्षा करने के लिए
इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं

इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं
कि जन सकें आठवीं बेटी बेटे की आस में
और जीतीं रहें यंत्रवत जीवन साल दर साल
किसी अनजाने भय में होकर लिप्त

वो हो सकती हैं अनुकूलित जरुरत के हिसाब से
कि उनकी अपनी कोई इच्छा ही नहीं होती
किसी भी प्रकार की ग्लानी, दुःख और पीड़ा से
इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं

मेरी आँखों में अक्सर खटकती है ऐसी स्वतंत्रता
कि पनपे आधी आबादी को भी करोड़ों साल बीते
पूछती है अपनी निजता की पराधीन मेरी आत्मा
इस देश की स्त्रियाँ इतनी स्वतंत्र क्यूँ हैं!!!

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
बस सोती रही देर तक
घण्टों नहाया झरने में
धूप में सुखाये बाल
और गाती रही पुरे दिन कोई पुराना गीत

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
बिंदी को कहा “ना”
कहा चूड़ियों से “आज नहीं”
काजल से बोली “फिर कभी”
और लगा लिया तन पर आराम का लेप

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
न तोड़े फूल बगीचे से
न किया कोई पूजा पाठ
न पढ़ा कोई श्लोक ही
और सुनती रही मन का प्रलाप तन्मयता से

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
तवे को दिखाया पीठ
खूब चिढ़ाया कड़ाही को
फेर लिया मुँह चाकू से
और मिलाकर घी खाया गीला भात

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
न साफ़ की रसोई
न साफ़ किया घर
नहीं माँजा पड़ा हुआ जूठा बर्तन
और अंजुरी में भरकर पिया पानी

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
रहने दिया जूतों को बिन पॉलिश के
झाड़न को दूर से घूरा
झाड़ू को भी अनदेखा कर दिया
और हटाती रही धूल सुन्दर स्मृतियों से

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
न ही उठाया खिड़की से पर्दा
न ही घूमने गयी कहीं बाहर
न मुलाक़ात की किसी से
और बस करती रही बात अपने आप से

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
जो उसे करना था रखने को खुश औरों को
कि उसे नहीं था मन कुछ भी करने का
जीना था उसे भी एक दिन बेतरतीबी से
और मिटाना था ऊब अभिनय करते रहने का

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
दरअसल वह गयी थी जान
कि नहीं था अधिक ज़रूरी
कुछ भी जिंदगी में
जिंदगी से अधिक

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी
बस मनाया ज़श्न
अपने जिंदा होने का

दो चोटी वाली लड़की

ना इतराना दो चोटी वाली लड़की
जो कह दे तुम्हें कोई गुलाब का फूल
कि जो ऐसा हुआ
ताक पर रख दी जायेगी तुम्हारी बौद्धिकता
फिर तुम्हें दिखना होगा सुन्दर
तुम्हें महकना भी होगा
फिर ………
चर्म इन्द्रि से देखना चाहेंगे लोग तुम्हारा सौन्दर्य
और लगभग भूल जायेंगे विलोचन की उपस्थिति
उमड़ पड़ेंगे लोग लेने तुम्हारा सुवास
कुछ लोग महानता का ढोंग भी रचेंगे
और तुम्हारा कर देंगे उत्सर्ग किसी देवता के चरणों में
इन सभी परिस्थितियों में
बिखर जायेंगी तुम्हारी पंखुडियाँ
और तुम्हे मुरझा जाना होगा

क्या जानती हो दो चोटी वाली लड़की
नहीं ख़त्म होगी बात तुम्हारे मुरझा जाने पर
और समाज सोचेगा भी नहीं
कि वह कर देगा व्यक्त अपनी मानसिक अस्वमस्थपता को
जब जब करेगा प्रश्न तुम्हारे यौन शुचिता की
और तुम बनी रह जाओगी केवल और केवल
एक शर्मनाक विषय,
एक नीरस चर्चा,
जिसे समाज स्त्री कहता है

सुनो दो चोटी वाली लड़की
तुम्हें बनना है बछेंद्री पाल
और नाप लेना है माउंट एवरेस्ट
गाड़ देना है झंडा अपने वजूद का
और अपने नाम का परचम लहराना है
विश्व के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर पर …….

तुम्हे मैरीकॉम भी बनना है दो चोटी वाली लड़की
कि तुम जड़ सको जोरदार घूँसा
हर उस मनहूस चेहरे पर
जिसकी भंगिमाएँ बदलती हों
तुम्हारे शरीर की बदलती ज्यामिति पर ……

दो चोटी वाली लड़की, बन सकती हो तुम मैरी अंडरसन
जो करे इजाद एक ऐसा विंडशील्ड वाइपर
जिसे लोग करे इस्तेमाल
अपने दिमाग पर पड़े धुल को धोने के लिए
और फिर एक हो जाए उनका रवैया लड़का और लड़की के लिए …..

बन सकती हो तुम ग्रेस हूपर दो चोटी वाली लड़की
और लिख सकती है कोबोल जैसी कोई नयी भाषा
जिसे पढ़ें उभय लिंग के प्राणी बिना भेदभाव के
और डिस्प्ले लिखकर कहे “हेल्लो वर्ल्ड ”
बड़े ही जिंदादिली और बेबाकी के साथ …….

जो ऐसा कुछ नहीं बन पायी दो चोटी वाली लड़की
तो कर लेना अनुसरण अपने पिता का…खेतों… खलिहानों  तक
लगा लेना झूला आम के किसी पेड़ पर और बौरा जाना
जैसे बौराती है अमिया की डाली फागुन में
खूब गाना कजरी सखियों के संग मिलकर
ऐसे में कहीं जो कोई धर दे तुम्हारी जुबां पर हाथ
मंथर होने लगे तुम्हारी आवाज़
उठा लेना हाथ में हंसुआ
और काट देना गन्दी फसल को……… जड़ से….
फिर खोल लेना अपनी चोटियाँ मुक्तिबोध में
बना लेना गजरा खेत के मेड़ पर उग आये वनफूलों से
खोंस लेना बालों में आत्मविश्वास के साथ
चल पड़ना हवा के बहाव की दिशा में
कि तुम हो प्रकृति
तुम्हे रहना है हरा भरा…हर हाल में |

बताओ न, दो चोटी वाली लड़की,
तुम्हें क्या बनना है ?

सभी चित्र: वाजदा खान

छोरा होकै छोरियों से पिट गया?

नवीन रमण

सोशल एक्टिविस्ट, हरियाणा की सामाजिक विसंगतियों पर निरंतर लिखते हैं. संपर्क :9215181490

दंगल फिल्म को लेकर भावुक और क्रांतिकारी दोनो तरह की समीक्षाओं को पढ़ने के बाद यह तो कहा जा सकता है कि दोनों तरफ से उठने वाले सवालों से मुंह नहीं फेरा जा सकता. भले ही सवालों का चरित्र आक्रामक और बचाव की मुद्रा में  ढल गया हो. सभी ने फिल्म के पहले दृश्य की तरह एंटिना को अपने नज़रिए से एक दिशा दी है. वैसे भी विमर्शों की दुनिया कभी एकांगी या एकमार्गी नहीं होती. हर विमर्श ने संवादों की दिशा को खुले स्पेस में बहस का केंद्र बनाया है. विमर्श के लिहाज से यह फिल्म की सफलता है.

दरअसल यह फिल्म एक पिता की नहीं सफलता के महिमामंडन की कहानी है. जिसे आमिर खान ने भी बखूबी कैश किया है. आजकल सरकार भले ही रूक्के कैशलैश के मार रही हो, पर फिल्म ने खूब कैश किया है. इन आर्थिक सफलताओं के बीच उत्पन्न कुछ सवालों के जरिए मैं भी अपना पक्ष रखना चाहता हूं. इसे पक्ष की तरह ही पढ़ा जाए. किसी अधिकारिक सत्ता की तरह नहीं. क्योंकि फिल्म भी कई तरह की सत्ताओं पर सवाल उठाती है. पर इन सवालों से क्या ये सिस्टम बदल जाएंगे?

क्या भारतीय खेल सिस्टम इस फिल्म से बदल पाएगा?  जबकि आज ही खबर आई है कि कॉमनवेल्थ खेल घोटाले के सरताज बादशाह सुरेश कलमाड़ी को भारतीय ओलंपिक संघ का मानद आजीवन अध्यक्ष बनाए जाने की खबर आ रही है. दूसरी तरफ सेल्फीमैन खेल मंत्री विजय गोयल ने बयान देकर खानापूर्ति कर ली है.

क्या भारतीय समाज में लड़के की चाह बदल जाएगी? खासकर हरयाणा जैसे राज्य में. जो लिंग अनुपात में कमतर  रहा है. पिता के सपनों के समक्ष बेटियों के सपनों को भी क्या तरजीह दी जाने लगेगी? या बेटियां दूसरों के सपने पूरे करने का औजार भर बनती रहेंगी. क्या फिल्म हरियाणा को पैकेज छवि से बाहर निकाल पाएगी?
यह सबसे गूढ़ और जरूरी सवाल है. क्योंकि अक्सर हरयाणा को एक खास छवि से देखने की लत पड़ गयी है. उम्मीद करता हूं कि यह फिल्म उस गढ़ी गई छवि को तोड़ने नहीं तो दरकाने का काम जरूर करेगी.

क्या फिल्म इस धारणा को बदल पाएगी कि छोरा होकै छोरियों से पिट गया? यह काम सबसे मुश्किल लगता है. अगर ऐसा हो जाए तो फिल्म असल अर्थों में सफल मानी जाएगी. कितने मां-बाप छोरियों को अब चूल्हा-चौका से बाहर निकाल पाएंगे? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है.अक्सर विकल्पहीनता की स्थिति में लड़कियों पर फोकस किया जाता है। जबकि उन्हें भी सभी क्षेत्रों में समान अवसर मिलने चाहिए. पहले की तुलना में इस पक्ष को सकारात्मक ढंग से देखा जाना चाहिए.

इन सब सवालों से इतर फिल्म को अगर विश्लेषित किया जाए तो हानिकारक पिता नहीं हैं, वो तमाम व्यवस्थाएं हैं, जो पुरुष-स्त्री -दोनों को महीन रूप से पिसती हैं. मनुष्य तो जन्म से सामान्य ही होता है, जबकि ये व्यवस्थाएं उसकी सरंचना को भेदभाव, हिसंक और जातिवादी आदि बनाने में लग जाती हैं. क्या फिल्म  इन व्यवस्थाओ को किसी तरह तोड़ने में सहायक होंगी? या मखौलिया लहजे में इनका मजाक भर बनाकर रह जाएंगी!  या इस फिल्म ने इन व्यवस्थाओं की क्लास भर लगाई है, जबकि जरूरत इनका सिलेबस  बदलने की है!! क्या यह सिलेबस  बदल पाएगा? जो स्त्री-पुरुष भेदभाव पर टिके  होने के साथ-साथ जातिवाद को साथ में पालपोस रहा है.

एक नज़र प्रतिनिधित्व के सवाल पर
महाबीर  पहलवान हरियाणा का प्रतिनिधित्व नहीं करता. प्रतिनिधित्व करते हैं फब्तियां कसने वाले लोग और समाज. लड़का होने के नुस्खे  बताता समाज. कुछ अति विद्वानों की राय तो यहां तक चली गयी है कि यह जाट परिवारों की कहानी है. इस पक्ष का तर्क है कि जाटों को फालतू में बदनाम किया जाता है.  जैसे मीडिया जाति को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ता, ठीक इसके उलट एक गुट महिमामंडन करने का मौका नहीं छोड़ता. जबकि दोनों की राजनीति एक-दूसरे को हष्टपुष्ट करने का काम करती है. भला दोनों में से कोई नहीं कर रहा समाज का. मीडिया के लिए सब कुछ कच्चे माल की तरह है और इस गुट के लिए अपनी जातिवादी राजनीति को चमकाने का मौका.  इन दोनों का अतिवादी रवैया ज्यादा खतरनाक है, उस बापू से जो एक गुरु की भूमिका में ज्यादा दिखता है, बाप की भूमिका में कम.

गीता-बबीता के जीवन का टर्निंग पहलू
जब दोनों अपनी किसी दोस्त की शादी में गई होती है और पापा आकर उनकी पिटाई इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्होंने एक दिन की प्रैक्टिस नहीं की थी. एक गुरु के रूप में आमिर ने बिल्कुल सही पहलू पकड़े हैं. गुरु खेल को लेकर थोड़ा आक्रामक होता ही है–“थारा बाप थारे बारे में सोचता तो है,… पीछा तो नहीं छुड़वा रहा, औलाद का दर्जा तो दे रहा है. इसमें गलत के करया है वो.”

सत्ता का विरोध करते-करते खुद सत्ता बन जाना 
कई लेख पढ़कर यह विचार आया कि सत्ताओं-व्यवस्थाओं का विरोध करते-करते हम खुद में एक सत्ता-व्यवस्था का रूप लेने लगते हैं. जो ठीक उसी तरह बिहेव करती है जैसे बाकी की सत्ताएं एवं व्यवस्थाएं. जबकि जरूरत एक संतुलन की होती है. जिसे अक्सर इग्नोर कर  दिया जाता है.

प्राथमिक टिप्पणी
दंगल फिल्म एक शानदार फिल्म है अगर आप पहलवान महाबीर फोगाट के जूनून के नजरिये से देखेंगे तो. पूरी फिल्म का तानाबाना महाबीर के जूनून के इर्द-गिर्द बुना गया है. उनके जूनून के सामने बाकि के किरदार और खुद महाबीर हल्के पड़ते हैं. जिन्होंने खेल को जिया है और जूनून के स्तर पर जाकर जिया है. उस भावना को वो सभी बेहतर ढंग से फील कर पाएंगे. पिता और गुरु, दोनों किरदार निभाना ,जितना आसान दिखते हैं. दरअसल होते नहीं है. गुरु को पिता से और पिता को गुरु से हर रोज भिड़ना पड़ता है. इस किरदार को आमिर ने बखूबी निभाया है और बाकी के सभी किरदार अपनी पूरी रंगत-मेहनत के साथ परदे पर उकेरे गए हैं.

खेल जूनून के अलावा कुछ नहीं होता
एक खिलाड़ी का जुनून उसे अनाड़ी बना देता है और अनाड़ी हुए बिना मिसाल कायम करना सम्भव ही नहीं है. महाबीर फोगाट और उनके पूरे परिवार के जूनून को सलाम बनता है. गीता-बबीता और बाकी लड़कियों को सबसे ज्यादा बधाई और शुभकामनाएं. क्योंकि वे आज एक आदर्श की तरह बहुत-सी लड़कियों को प्रेरित कर रही हैं.

बाकी आप सभी को एक चौकाने वाला तथ्य और बता देता हूं कि महाबीर फोगाट को एक 16-17 साल का लड़का भी है.

वंचित तबकों की लड़कियों के भी खिलाफ है यह साजिश: जेएनयू प्रकरण

आरती रानी प्रजापति 


रोहित वेमुला, जीशा, डेल्टा और न जाने कितने एकलव्य इस ब्राह्मणवादी भारत में मारे जा चुके हैं| इनका दोष इतना ही होता है कि ये सभी छात्र अपनी सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक परिस्तिथियों को धकेलते हुए पढ़ाई में आगे आते हैं| मनुवाद इसकी अनुमति नहीं देता|यह ऐसा नियम है जिसमें यदि समाज का चौथा वर्ण पढ़-लिख जाएगा तो वह जान जाएगा कि जिस व्यवस्था को इस ब्राह्मणवदियों ने फैलाया है वह कितनी खोखली है| JNU ऐसा ही विश्वविद्यालय है जहाँ गरीब, दलित, स्त्री, आदिवासी तथा मुस्लिम का छात्र-छात्रा अपनी मेहनत और लगन से दाखिला लेते हैं| हैरानी कीबात यह है कि जो छात्र प्रवेश-परीक्षा में 70 में से अच्छे नंबर लाता है उसे वाइवा में 30 में से 3, 2 4, 1, कभी-कभी 0 तक दिया जाता है| इसे JNU प्रशासन द्वारा गठित अब्दुल नाफे कमेटी भी साबित करती है| यह कवायद कई सालों से चल रही है|

जेएनयू के तथाकथित क्रांतिकारी जो ‘साथी हम आपके लिए लड़ेंगे’ कहकर वोट मांगते हैं, इन मुद्दों पर  इसपर चुप्पी साध लेते हैं| उनकी ऐसी ही अवस्था फैकल्टी में ओबीसी रिजर्वेशन, अल्पसंखकों के लिए डीप्रवेशन पॉइंट्स को बढ़ाने पर होती है| एकेडमिक काउंसिल मीटिंग में छात्र मीटिंग एरिया के बाहर अपनी उन मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हैं, जिन्हें वे मनवाना चाहते हैं| इस बार की जेएनयू  की अकादमिक काउन्सिल मीटिंग में भी ऐसा ही किया जा रहा था| छात्र वाइवा के 30 नंबर को घटाकर 10 करवाना चाहते थे | ताकि वाइवा में होने वाले शोषण को कम किया जा सके| जबकि प्रगतिशील /संघी  अकादमिक काउन्सिल  मेंबर चाहते हैं कि यूजीसी  के नियम के अनुसार प्रवेश परीक्षा सिर्फ औपचारिकता मात्र रहे और वाइवा के नंबर ही प्रमुख हों| यदि ऐसा नियम बनाया जाता है तो वंचित समाज का छात्र कभी उच्च शिक्षा में प्रवेश नहीं पा सकेगा|

लड़कियाँ, जो घर व पढ़ाई दोनों को संभाल बड़ी मुश्किल से आगे आ रही हैं उन्हें भी जानबूझ कर वाइवा में फेल कर दिया जाएगा| आज वंचित समुदाय, खासकर ओबीसी के लिए उच्च शिक्षा में दखल का एक चरण पूरा हुआ दिख रहा है. अगले चरण में इन समुदायों की लड़कियां बड़ी संख्या में  उच्च शिक्षण संस्थानों में आने वाली हैं, जेएनयू सहित उच्च शिक्षण संस्थानों में इन लड़कियों के लिए दरवाजे बंद करने की साजिश शुरू हो गई है,  जिससे शिक्षित हो वह अपनी पारंपरिक भूमिका से अलग कोई कार्य न कर सके|

छात्र हितों की बात करने वाला छात्र संघ अकादमिक काउंसिल की पहली मीटिंग में आता है तो उनके कुछ क्रांतिकारी अन्य विरोध कर रहे छात्रों से धक्का-मुक्की करते हैं| दूसरी अकादमिक काउन्सिल   मीटिंग के समय क्रांतिकारी गायब हो जाते हैं| अकादमिक काउन्सिल  मीटिंग के विरोध प्रदर्शन के लिए कई छात्रों, जिनमे सभी दलित, ओबीसी, अन्य वंचित तबकों के हैं, को  जेएनयू कैंपस से निलंबित किया गया है| उनके अकादमिक कार्य और होस्टल, लाइबेरी जैसी सुविधाएं छीन ली गई हैं| ध्यान रहे ऐसा ही फरमान रोहित वेमुला को सुनाया गया था| चयनित छात्र संघ की नेता निष्कासन की कड़े शब्दों में निंदा तो करती हैं पर अपने संघी रवैये से अलग कोई काम नहीं करती| 24  घंटे के अन्दर 12 छात्रों का निष्कासन करने वाले वीसी ने 15 अक्टूबर से गायब नजीब की कोई सुध लेने की कोशिश नहीं की है| आज भी उसको मारने-पीटने वाले एबीवीपी के छात्र कैंपस में खुले घूम रहे हैं| उनके खिलाफ कोई नोटिस अभी तक जेएनयू प्रशासन नहीं जारी कर पाया है|

वंचित तबकों की यह लड़ाई जारी है| हमारी यह लड़ाई सिर्फ वीसी से नहीं  जेएनयू के उन तमाम तथाकथित प्रगतिशील क्रांतिकारियों से है जो क्रान्ति के नाम पर झूठ बोलते हैं| सत्ता में आए  छात्र संघ से एक सवाल ‘जब दलित, आदिवासी, मुस्लिम , ओबीसी, महिला, अपने अधिकारों के लिए अकादमिक काउन्सिल मीटिंग में लड़ रहा था , आप कहाँ थे साथी?

छात्र राजनीति में सक्रिय आरती रानी प्रजापति जेएनयू से हिन्दी में पीएचडी कर रही हैं.

सुनो आवारा लड़कियों और अन्य कविताएं

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सीमा संगसार

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित. सम्प्रति: शिक्षिका, बेगुसाराय, बिहार. संपर्क:sangsar.seema777@gmail.com

1. सुनो आवारा लड़कियों

एफ एम रेडियो की
तेज धुन पर
मटकते हुए
मुँह में कलम दबाए
अखबारों के पन्ने पलटते हुए
आइडियाज समेट सकती हैं
अगले संपादकीय के लिए
एक आवारा लड़की —

नीली जींस की जेब में
अपने हाथ छुपाए
चम सकती हैं
थियेटरों में
नए नाटक के मंचन तक
बारिश में भींगती हुई
लौट सकती हैं अपने घर
बिना किसी छतरी के

‘ क’ से कविता के
क्या हो सकते हैं मायने
अच्छी तरह जानती हैं
ये आवारा लड़कियाँ —

सुनो आवारा लड़कियों
मोबाइल , अखबार
रेडियो और कविता
ये लक्षण सभ्य हैं या नहीं
यह अब तुम्हें तय करना है
{लड़के आवारा नहीं होते}

2. स्त्री देह

उनके पास भोगने के लिए
बस पीड़ा है !
जो उन्हें मिलती हैं
मास दर मास
प्रवाहित होने से
अथवा उसके स्थगन से

एक औरत जिन्दा रहती है
अपने गर्भाशय के साथ
वह जकड़ी जाती है
मासिक चक्र के बंधन में

वाजदा खान की पेंटिंग

सुनो !
तुम्हारी सारी काव्यात्मक गाथाएं
निरस्त हो जाती हैं
इस गहन पीड़ा में
नग्न देह पर
सभी रंग फीके पड़ जाते हैं
उनके इस लाल रंग से —–

3. जल में जीवन तलाशती मछलियाँ

जल में जीवन तलाशती मछलियाँ
जब दूर फेंक दी जाती हैं
किनारे पर
छटपटाते हैं प्राण उसके
जल के बिना

कुछ चीजें आदत होती हैं
जैसे की
साँसों को भरना
और बुलबुले की तरह छोड़ना

स्त्रियाँ भी बैचेन होती हैं
जब उन्हें बंद कर दिया जाता है
किसी एक्वेरियम में
रंग बिरंगी मछलियों के साथ

ड्राइंग रूम में
अतिथियों के स्वागत में
प्रतीक्षारत स्त्रियाँ
कैद हैं डिनके नसीब
सुरक्षित आवरण में

मछलियों को गर छोड़ दिया जाए
पुनः बहते नीर में
जीवित हो उठेंगी उनके सपने
खुली आंखों से
खुले आसमान के नीचे
साँस लेने की —

आदतें जो बचपन से है संस्कार में
उसे तोड़ कर जी लेने की —-

4.  कठपुतली

मेरी जिन्दगी की
सिराओं को पकड़ कर
खींच रहा है कोई
और / मैं बेवश
खिंची चली जाती हूँ

लोग ताली बजाते हैं
हँसते हैं
मेरी इन कलाबाजियों को देखकर
उन्हें मैं एक
तमाशा से अधिक
कुछ नहीं दिखती

मेरे हिलते डुलते शरीर
और/ चेहरे की भाव भंगिमाएँ
सब कुछ उस पर निर्भर है
जो नियंत्रित कर रहा है मुझे

मैं तो जिन्दा हूँ
मेरी रूह मर गई है
लोग कहते हैं
मैं कठपुतली हूँ

{रात ख्वाब में देखा था कठपुतली की रूह को कहीं दूर जाते हुए)

 वाजदा खान की पेंटिंग

5.   वो चार दिन

बचपन की जमीन पर
अट्ठा गोटी खेलती लड़कियाँ
अनजान होती  हैं
उन चार दिनों की
मानसिक यंत्रणाओं से

जब उसे अछूत मान लिया जाएगा
सच है
सवर्ण होते हैं पुरुष
और / नारी
सदियों से दलित हैं —–

6.  बंद दरवाजे खुली खिड़कियाँ

कुंडियां लगा दी जाती हैं
बंद दरवाजों में
उनके बाहर निकलने के
सारे रास्ते
बंद हो जाते हैं
फिर आहिस्ते से
खोलती हैं वह
अपने दिमाग की खिड़कियाँ
जब वह भोग रही होती हैं
एकांत को —

विचारों की कई लड़ियां
मछलियों की तरह
फिसलती जाती हैं
और / वह लगा रही होती हैं
गोता उनके साथ
बहते पानी में

दरवाजे बंद हों तो क्या?
खुली खिड़कियों से
ताजी हवा के झोंके
अंदर आ ही जाते हैं

महिलाओं , महान बनने के सपने देखो: डा.आंबेडकर

प्रो.परिमळा अंबेकर

विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और. परिमला आंबेकर मूलतः आलोचक हैं.  हिन्दी में कहानियाँ  अभी हाल से ही लिखना शुरू किया है. संपर्क:09480226677

मैं किसी भी समाज की उन्नति को उस समाज में रह रहे महिलाओं की प्रगति के   मापदंड के आधार पर मापता हूं ।                     – डा. बी आर आंबेडकर

बायोपिक में प्रयोग होने वाली फ्लैशबैक शैली एक अजीब और बहुत ही कारगर टेकनीक है,जहां बडी सहजता से फिल्मकार, उस चरित्र से जुडे वर्तमान को उसके भूतकाल की घटनाओं से जोडते जाता है , बहुत ही कलात्मक तरीके से सन्दर्भित व्यक्तित्व के समकालीन वाकयात और स्थितियों को उसके मूल समय के बुनियादी जडों से मिलाते जाता है । बायोपिक के कैरेक्टर द्वारा संभवित समकालीन समाज की प्रगति या विकास के कारणीभूत तत्वों को खोजते खोजते, फिल्मकार इतिहास के अंधकार के परतों में छिपे मूल बीजों के उन जीवन तत्वों को ढूंढ निकालता है, जिन बीजों को बोने की सारी मेहनत सारी जिम्मेदारी उस कैरक्टर की होती है, जिसपर सिनेमा बनी हुई है या बनने जा रही है। इसीलिए बायोपिक् में प्रयोग में लाये जाने वाली फ्लैशबैक की शैली किसी प्रासंगिक जीवनी के चहुं ओर बुने कथानक के तानेबाने के प्रस्तुतीकरण का टेकनिक ही नहीं अपितु वह वर्तमान जीवन की परिघटनाओं के लिये , समकालीन समाज और संस्कृति के वास्तविक स्वरूप के लिए कारणीभूत इतिहास के गर्त में छिपे उस जीवनी के संघर्षों को, उन घटनाओं को खोज निकालने की अभूतपूर्व कथा प्रक्रिया भी है ।

सोचे कि अगर डा. बाबा साहेब अंबेडकर की जीवनी पर नये सिरे से गर बायोपिक हमें बनानी है, तो,आज के भारतीय समाज में ,समाजिक स्तर से दलित  और आर्थिक रूप से निचले पायदान के वर्ग समुदाय में मानी जानेवाली महिलाओं की, उनकी आज की वास्तविक विकासमान और उन्नतिउन्मुख स्थिति के कारणों की खोज में इतिहास की उन घटनाओं के फ्लैशबैक में जाना पडता है, जिसका सीधा संबंध आंबेबेडकर की जीवनी से है। या उनकी जीवनी के इतिहास के उन घटनाओं से है ,जो सीधे हमें 75 वर्ष पूर्व के पराधीन, वर्ण और वर्गाधारित भारतीय समाज से जोडती है। आज की भारतीय समाज की महिलाओं की प्रगति और उन्नति के अभ्यास के लिये हमें भूत की उन तमाम स्थितियों को ढूंढ निकालना पडता है या नये सिरे से उनपर चर्चा करनी पडती है, जो केवल और केवल बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा लिये गये कानूनी और संवैधानिक निर्णयों पर निर्भर है, उनके द्वारा सभा सम्मेलनों में दिये गये उद्बोधनपूर्ण वक्तव्यों से है, संघटन-संघर्ष-सम्मान के  उनके  कारगर त्रिमंत्र से है, जिसे उन्होंने भारतीय दलित  निर्धन महिलाओं के लिये दिया था। इसीलिए महिलाओं के संबंध में , अंबेडकर द्वारा प्रस्तुत मान्यताएं , विचार, उनके द्वारा लिखे गये संविधानीय अधिनियम, पुरूष के समकक्ष महिला के लिये उनके द्वारा प्रदत्त समान समाजिक स्तर और मान रूपी  पर्यायों को जानने के लिए हमें 75 वर्ष पूर्व के इतिहास को देखना जरूरी है । 18- 19 जुलाई 1942 के रोज नागपूर में , ‘‘डिप्रेस्ड क्लास महिला सम्मेलन‘‘ का समावेश हुआ। इस प्रथम महिला सम्मेलन को संबोधित करके अंबेडकर द्वारा दिये गया भाषण अपने आप में मील का वह पत्थर है, या कहें कि भारतीय दलित  महिला की प्रगति और समानता के दौड का वह पहला पडाव है जो आज की खुशहाली के अंतिम लक्ष्य की ओर जाने के लिए हाथ उठाकर, उस मार्ग को सूचित करता है ।

वह ऐतिहासिक घटना, जिस बडे से विस्तृत पंडाल में ‘‘आल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास कान्फरन्स‘‘ का दिनांक 19-20 जुलाई 1942 के रोज नागपूर में आयोजन हुआ था । लगभग सत्तर हजार से भी अधिक लोगों के उस जमावडे को अंबेडकर ने संबोधित किया। एन्.शिवराज उस समावेश के अध्यक्ष रहे थे। उसी पंडाल में अंबेडकर को और दो समावेशों को संबोधित करके बोलना था, उसमें एक रहा था ‘‘डिप्रेस्डक्लास महिला सम्मेलन‘‘ और दूसरा ‘‘समता सैनिक दल‘‘ का। इस महिला समावेश की अध्यक्षता ‘सुलोचनाबाई डोंगरे‘ ने किया जो अमरावती की थी। यह महिला समावेश और उसमें डा. बाबा साहेब द्वारा दिया गया वक्तव्य दलित महिलाओं में एक नई चेतना जगाने का काम किया। इस अधिवेशन में अनेक निर्णय पारित किये गये और महिलाओं के पक्ष में मांगें भी प्रस्तुत की गईं। बाबा साहेब का महिलाओं को लेकर संबोधित बातों में उनकी सहानुभूति और चिंता दोनों जाहिर है। महिला संरक्षण और सामजिक समानता और आर्थिक प्रगति संबंधी उनके विचार जो इस सभा में कहे गये, वे ही आगे उनके द्वारा गढे गये महिला संबंधी अनेक संवैधानिक नियमों के रूप लेते गये। हिन्दू कोड बिल, 1948 भले ही संसदीय सभा में घोर विरोध के कारण पारित न हुआ हो लेकिन भारतीय समाज की परंपरागत महिला संबंधी सनातनी विचार वातावरण और व्यवस्था में उन्हें समाज के दूसरे हिस्से के पुरूष के समान अधिकार दिलाने के सपने एवं लिंगीय समानता के तमाम कानूनी प्रवधानों को भारतीय महिला को दिलाने का उनका दृढ निर्णय तत्पश्चात में , संवैधानिक अधिनियमों के रूप लेते गये, जो महिलाओं के संबंधी उनकी संवेदना और चिंता दोनों को जाहिर करती हैं ।

75 वर्ष पूर्व के उस दलित  महिला अधिवेशन में आंबेडकर ने महिलाओं को संबोधित कर जिन विचारों सामने रक्खा, वे एक तरह से भारतीय दलित  जाति समुदाय की महिला को, नये सिरे से अपने स्वतंत्र अस्तित्व और चरित्र बनाने की ओर इंगित कर रहे थे। साथ ही भावी भारत के निर्माण में समतामूलक समाज की संरचना के लिए महिला अस्मिता को केन्द्र में रखकर सोचने वाली बातों की ओर भी इशारा कर रहे थे। ‘कीर्तिबाई पाटील‘ , ‘इंदिराबाई पाटील‘, ‘जाईबाई चैधरी‘, ‘विरेंद्रा बाई तीर्थंकर‘ , ‘कुमारी गजभिये, ‘मंजुला कानफाडे‘, ‘कौशल्या बैसंत्री‘ आदि महिलाओं की संलग्नता और परिश्रम से यह पहला महिला अधिवेशन उस रोज संपन्न हुआ। ये सारी महिलाएं प्रतिबद्धता और प्रामाणिकता से अंबेडकर द्वारा दिये गये ऐलान और उपदेश को कारगर करने के लिए परिश्रम कर रही थीं। ‘‘अखिलभारतीय दलित  अधिवेशन‘‘ के उस साठ सत्तर हजार लोगों के जमावडे के बृहत्त समावेश में लगभग पच्चीस हजार से भी अधिक महिलाओं का होना अपने में एक इतिहास ही रच डालता है । ‘‘अखिल भारतीय डिप्रेस्ड  फेडरेशन‘‘ के उस महासभा के एक और पंडाल में ‘‘दलित महिलाओं  का अधिवेशन‘‘ के कार्यक्रम का आयोजन अंबेडकर द्वारा उठाये गये उन कदमों को दर्शाता है, जो भारतीय महिला को उनका अधिकार और हक् दिलाने के पक्ष में उठाये गये थे। उस रोज नागपूर में,  सामान्य महासभा को संबोधित  करके बोलने के बाद उसी पंडाल में एक और समावेश में पच्चीस हजार से भी अधिक महिलाओं को अंबेडकर द्वारा दिया गया भाषण , उस भाषण के अंश, बडी सूक्षमता से महिलाओ के प्रति के इस संविधानी शिल्पी के चिंतन मनन और विज़न को दर्शाते हंै । उस भाषण के प्रमुख मुद्धे कुछ इस प्रकार हैं ।

1 हीनता की ग्रंथी से बाहर आयें ।
2 सारे दुर्गुणों से दूर रहें ।
3 बेटियों को अधिक से अधिक शिक्षा दें ।
4 बेटियो की ब्याह के लिये जल्दी ना करें ।
5 साफ सुथरा और शिष्ट रहन-सहन अपनायें ।
6 महान बनने के सपने देखें ।
7 बेटियों को पढायें उन्हें शिक्षित करें ।
8 महिलाएं शिक्षत होकर अपने परिवार के विकास और प्रगति के लिए
कटिबद्ध रहें ।

जुलाई 1942 के नागपूर के ‘दलित  महिला सम्मेलन‘ में कार्यकारिणी महिला सदस्यों द्वारा प्रस्तुत की गयी मांगों को, आगे महिलाओं के अधिकार और हकों के प्रति अंबेडकर द्वारा लिये गये निर्णयों का बीजवपन का काल माना जा सकता है। उस सभा में महिलाओं के पक्ष में प्रस्तुत मांग कुछ इस प्राकर के रहे ।

1 बहुपत्नीत्व पद्धति को रद्ध किया जाय, उसे कानूनी तौर पर जुर्म माना जाय
2 महिलाओं के लिये वेतनसहित छुट्टियों को उनके कामकाजी व्यवस्था में लागू किया जाय
3 महिलाओं के लिए पेन्शन यानी वृद्धा वेतन पारित किया जाय ।

सन् 1942 में उठायी गयी ये मांगे , कुछ हद तक, आगे अंबेडकर द्वारा खींची गयी महिला अधिकारों की संवैधानिक प्रवधानताओं का नीलनक्ष साबित हुये। या हम इन ऐतिहासिक घटनाओं के फ्लैशबैक में, आगे चलकर बाबासाहेब द्वारा सोचे गये ‘समान आचार संहिता‘ और ‘हिन्दू कोड बिल‘ की रूपरेखा को बनते रचते देख सकते हैं, जिसके लिए लगभग सत्तर हजार लोगों का वह सन् 42 का जमावडा साक्षी रहा। आज की भारतीय महिला के स्वतंत्र एवं समान अधिकार और संभावनाओं से लैस व्यक्तित्व के ताने -बाने की बुनने की प्रक्रिया, इसी पंडाल के नीचे आरंभ हुआ, जिसके लिए प्रगतिपर सोच के सारे भारतीय पुरूष एवं महिलाएं , चाहे सवर्ण हो या अवर्ण अपने हिस्से का सूत कातने के श्रम में लग गये। जिसके बुनियाद में कहीं दूर , गांधीजी के सामाजिक एवं राजनयिक स्वतंत्रता के मिशन् के तत्व कार्य करते नजर आते जरूर हैं ।

आंबेडकर चाहते थे कि दलित   महिलाएं अपने पहने-ओढने के सलीके में बदलाव लाए। चांदी के मोटे -मोटे आभूषणों के स्थान पर बारीक सलीकेदार आभूषण पहने। उनका यह सोचना रहा था कि, दलित महिलाओं  द्वारा अपनाये गये परंपरागत पहनावे और आभूषण गुलामी और हीनता भावना के प्रतीक  हैं। उस समय तक गठित दलित महिलाओं  के संगठन के सक्रिय कार्यक्रमों में अंबेडकर ने इन निचले जाति के महिलाओं में पहनने-ओढने की सलीका बरतने के लिए आग्रह किया। महाड सत्याग्रह और सन् 1927 के मंदिर प्रवेश के आंदोलनों से ही आंबेडकर ने दलित महिलाओं  के सामाजिक स्थान मान में बदलाव लाने की सोच को रखते आ रहे थे। और संगठन के सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर उन्हें इस संबंध में सीख देने का उपदेश भी देते रहे । हीनता की ग्रंथी से बाहर आने के लिये आंबेडकर ने महिलाओं के मानसिक सोच के साथ साथ उनके ड्रेस कोड पर भी ज्यादा ध्यान दिया था।  वे चाहते थे , निचले स्तर की मजदूर महिलाएं भी शिक्षित हों और अपने परिवार को भी ऊंचा उठायें। जल्द शादी करने का विरोध कर वे बेटियों को पढाने पर जोर दें। शिक्षा के मंत्र को अपनाकर आंबेडकर जाति आधारित सामाजिक असमानता की अव्यवस्था को मिटाना के पक्ष में सोचा था ।

कानूनी चौखट में महिलाओं को समान अधिकार का प्रावधान 1948 में हिन्दूकोड बिल का संसद में मंडन और विरोधी चर्चाओं के पश्चात् 27 सितंबर 1951 में आंबेडकर का कानूनी मंत्रीपद से इस्तीफा देना, आदि अंबेडकर के जीवन की इतिहास की घटनाएं आगे चलकर महिला संरक्षण और सामाजिक लोकतंत्र के बहाल के लिये पुरूष के समक्ष महिला के समान अधिकार की मांग इत्यादि के न्यायिक अधिकार के नियमों का रूप लेते गये । आंबेडकर चाहते थे कि दलित और दलित  महिलाएं , शिष्ट और पढी लिखी महिलाओं की तरह खान-पान में भी सलीका अपनाए। मांस का सेवन छोडे, सडा गला मांस या मरे प्राणियों का मांस न खाये। अपने खुद के परिवार में, पास-पडोस में बचपन से ही महिलाओं की दुस्थिति को देखकर व्यथित आंबेडकर के सम्मुख विकसित ऊंची जाति की महिलाओं के सुखभोग और साथ ही पाश्चात् देशों की महिलाओं के स्वछंद और स्वतंत्र जीवन शैली पर्याय के रूप में रहे थे। उन्होंने अपने देश दलित महिलाओं को सामाजिक स्थान मान दिलाने हेतु , लोकतांत्रिक समाज की  बहाली के लिए, न्यायिक अधिकारों को जितना जरूरी मानते थे, उतनी ही आवश्यकता वे उनके सजने- संवरने रहन सहन भोजन प्रकार आदि को नये सिरे से अपनाने को भी मानते रहे थे।

इस, नागपूर दलित महिला अधिवेशन के 75 वर्ष में, पिछले सालों के महिला अधिकार और विकास के कदमों को हम लगभग गिना सकते हैं, जिसके पीछे बाबा साहेब अंबेडकर द्वार प्रदत्त संवैधानिक अधिकार और उनकी महिला विकास और महिला समानता संबंधी विचारों के बीजों को भी देख सकते हैं। स्वतंत्र भारत में विज्ञान,शिक्षा और समाज की प्रगति के साथ साथ महिलाओं के स्थानमान और विकास की परियोजना बनती गयीं, और उसकी एक अलग और स्वतंत्र छवि उभरकर सामने आयी। उन अंशों का लगभग आकलन हम यूंकर सकते हैं ।
1 महिलावादी संगठन और आंदोलनों का सूत्रपात
2 महिलावादी संवेदना और महिला विमर्श का विकास
3 महिला शिक्षण की चेतना का प्रचार प्रसार
4 हाशियाकृत समाज का हिस्सा, महिला वर्ग को मुख्यधारा में लाना
5 महिलाओं के लिये रोजगार और कामकाजी डोमेन में समान अवकाश
6 भारतीय समाज में हर क्षेत्र मे महिला को समान अवसर और समान स्पेस का प्रदान करना । आदि
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि उस बृहत्त पंडाल में दलित महिलाओं  के संगठन को अलग से संबोधित कर महिला सामाजिक और राजकीय समानता और स्वतंत्रता के आंबेडकर द्वारा अभिव्यक्त विचार , क्या आज भी पूर्णरूप से हाशिये से बाहर आकर मुख्यधारा में अपना वजूद पहचान पाये हैं ? महिला का हाशिया से मुख्यधारा में आने के पीछे सामाजिक और समुदायी मानसिकता मे परिवर्तन की आवश्यकता है, क्या उसे इन 75 वर्षों में स्वतंत्र भारतीय समाज साध पाया है ? आंबेडकर ने कहा था ‘‘ कच की तरह विद्यार्थिनियों को भी प्रयत्नशील होना चाहिए। जिस प्रयत्न और परिश्रम से कच ने शुकाचार्य से विद्या हासिल की थी, उसी संघर्ष और लगाव से महिलाओं को भी शिक्षित होना है, ज्ञान हासिल करना है और मुख्यधारा में आना है । ‘‘

अगर हम महिलाएं हाशिये से हटकर मुख्यधारा आंदोलन में आ जायेंगी तभी आंबेडकर की समतामूलक भारत की संकल्पना साकार हो सकती है अन्यथा नहीं। यह तभी संभव हो सकेगा जब राजनयिक व्यवस्था सामाजिक मुद्धों को भुनाना छोड देगी। और हर महिला असमानता या उनके लिए विशेष प्रावधान का मुद्धा ,बडी सहजता से राजनयिक हलकों में उठाया जाय और उन्हें कानूनी अंजाम दिया जाय। 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का बिल भी अपने अवरोधों से से बाहर आ सकेगा। समान धरातल पर , देश के हर हलकों में, महिलाएं अपने हिस्से का अधिकार और जगह, कानूनी तौर पर लागू होता देख सकेगी।
संदर्भ:
1 www.streekaal.com : Report of Savitribai Phule Award.
2 Dr.B.R.Ambedkar Role In Women Empowerment:Kavitakait
3 Dohara Abhishap:Kaoushalya Baisayantri.
4 Vasant Moon: Dr Babasaheb Ambedkar Writings and Speeches

देह दोहन का अधिकार! उर्फ ‘दास्ताने लापता’ : ( दूसरी क़िस्त कालाजल )

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अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

रशीदा की तरह ही ‘दास्तान ए लापता’ ( मंजूर एहतेशाम, प्रथम संस्करण 1995) की अनीसा अपने मामू की वासना, यौन लिप्सा और यौन विकृतियां शान्त करने का साधन बनने को मजबूर है। दस साल की उम्र में (1953 में) अनीसा को मामूं के यहां रहना पड़ता है क्योंकि मां-बाप की अचानक मृत्यु हो जाती है। मामूं प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं। ‘मुमानी मामूं को यौन सुख देने में समर्थ नहीं थी’ और ‘उन्हें सेक्स शब्द से ही घृणा हो गई थी’ इसलिए ‘मामूं का छूना तक गवारा नहीं रहा था।’ मामूं अपनी ‘उत्तेजना शांत करने के लिए’ जहां भी पहुंच सकते थे, अपना ‘मुंह मारते फिरते थे।’ समय और अनुभव ने मुमानी को बहुत कड़वा बना दिया था और मामू के पापों को गिनाते हुए अनीसा को ‘सावधान रहने की सलाह’ और मामूं के ‘भयानक प्लानों की चेतावनी’ देती रहती थी। उधर सचमुच मामूं अपने मनसूबे के तहत अनीसा को ‘धीरे-धीरे कल्टिवेट करते रहे’ और एक दिन मौका पाकर उन्होंने अपने ‘मन की मुराद’ भी पूरी कर ली। इसे उचित ठहराने के लिए या अनीसा को आत्महत्या की ओर जाने से रोकने के लिए या फिर  यौन हिंसा के बारे में बदली मानसिकता दर्शाने के लिए लेखक अनीसा ( सिगरेट और शराब पीती) का बयान यूं दर्ज करता है- ‘‘क्या कह कर याद करूं मैं अपने इस अनुभव को? घिन, नफरत, पाप यह सब तो शब्द हैं, कभी मजबूर होकर तो कभी मजबूर करने को दिमाग में आते हैं। ..उस पल का अपना रोमांच था और जो कुछ हुआ वह तय किया हुआ बहरहाल, मेरा नहीं था। नैतिक-अनैतिक जैसा कोई विभाजन मेरे दिमाग में होता भी तो मैं कर क्या सकती थी उस सूरतेहाल में?’’ मतलब ‘उस पल का रोमांच’ अनीसा की विवशता थी। थोड़ा आगे, बयान स्पष्ट करता है ‘‘मैं मामूं के टुकड़ों पर पल रही थी, मेरी पढ़ाई-लिखाई, कपड़े-लत्ते का खर्चा वह उठा रहा था, तो मेरा इतना दोहन करने का अधिकार भी उसका बनता था। ऐसा नहीं कि ऐसा बस, एक बार हुआ… जी नहीं। पूरे तेरह साल मैं मामूंके साथ रही और उनका एहसान उतारने को उन्होंने जब भी बुलाया, मैं बिना चूं-चरा किए उनके पास गई।’’ ( पृष्ठ-151)

पढ़ें: स्त्री  के सम्मान में  पढ़ा गया फातिहा:‘काला जल’ (पहली क़िस्त)

 अगर इस तर्क से देखा जाए जो अनीसा के माध्यम से रचा-गढ़ा गया है, तो दुनिया के हर पिता या सौतेले पिता या संरक्षक को ‘इतना दोहन करने का अधिकार’ है या होना चाहिए। एक बार लेखक (नायक) को लगता है अनीसा से ‘हमदर्दी जताए या जिन्दगी को इस बहादुरी के साथ जीने के उसके हौसले की तारीफ और ताईद करे।’ मगर दूसरे ही क्षण सोचता है… ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सारी कहानी अनीसा की मनगढ़ंत और झूठी हो?’ ( पृष्ठ-151) और फिर  इसी नतीजे पर पहुंचता है कि ‘अनीसा एक छलावा और झूठ थी जिसे समझने में उससे बड़ी गलती हुई थी… सचमुच वह लड़की बहुत बड़ा धोखा थी।’’ ( पृष्ठ-154) क्या अनीसा का बयान लिख-लिखवा लिया गया है – किसी पुलिस अफसर की तरह? इसीलिए सब कुछ झूठ है झूठ।

सल्लो: कब्र में कितना अंधेरा है!
राजेन्द्र यादव के शब्दों में ‘सल्लो आपा हिन्दी उपन्यास के कुछ अविस्मरणीय चरित्रों में से एक है? या ‘मैं’ के किशोर-सेक्स की अभिव्यक्तियां… मगर ‘मैं’ यानी कथावाचक यानी बब्बन कमजोर चरित्र है, पहले वह मोहसिन के प्रभाव से आतंकित, आच्छन्न रहते हैं, फिर  सल्लो आपा के मुग्ध प्यार में…’’ ( पृष्ठ-घ) इस प्रश्न का कोई जवाब दिए बिना ही यादव जी आगे की यात्रा पर किसी दूसरी टेªन में सवार हो जाते हैं। कुछ दूर जाने के बाद उन्हें ‘अविस्मरणीय चरित्र’ यानी सल्लो आपा के बारे में लगता है. .. ‘‘सल्लो घर की चारदीवारियों से बाहर आना चाहती है – निषिद्ध  को अपना कर, यानी अश्लील पुस्तकें देखकर, लड़कों के कपड़े पहनकर, उनकी आदतें और अदाएं अपनाकर… और उसकी इस मासूम, स्वाभाविक छटपटाहट को जिसका अगला रूप रशीदा में है, ( संभवतः) गर्भपात के प्रयास में समाप्त कर दिया जाता है…’’ ( पृष्ठ-घ) न जाने क्यों, उन्हें सल्लो का अगला रूप रशीदा में नजर आता है और किस रूप में नजर आता है? खैर… ‘‘घर भर में सल्लो आपा का व्यक्तित्व सबसे अलग और अनूठा था। लंबा-छरहरा शरीर, सांवला रंग और हंसने से उस पर खिलते हुए कतार से जमे और छोटे-छोटे दांत तथा खूब तीखी नाक।’’ ( पृष्ठ-156) उसके ‘‘शरीर से एक महक उठकर धीरे-धीरे घेरने लगती, जिसका भरपूर एहसास तब होता जबकि वह उठती या हवा को काटती हुई एक झटके के साथ अचानक पास आ बैठती।’’ ( पृष्ठ-166) जिस्म… ‘‘मांसल और भरा हुआ।’’ ( पृष्ठ-25) और ‘सुपुष्ट कंधे, उभरे मांस वाली जवान पीठ।’’ (पृष्ठ-257) उसके कमरे की दीवारों पर ‘‘दो-तीन फिल्मी तस्वीरें एकाध भड़कीले कैलेंडर’’ टंगे रहते। ( पृष्ठ-257-58) ‘खराब ( गंदी) किताब’ की ‘वाहियात तस्वीरें’ देखते समय सल्लो का ‘सारा चेहरा लाल-गुलाल हो गया है, सीना जोर-जोर से उठ-बैठ रहा है, लेकिन ‘तोबा’ कहने के बावजूद, नजर है कि जैसे किताब के पन्नों में चस्पां होकर रह गयी है।’’ ( पृष्ठ-173) मगर कहती है, ‘‘जब तुम देख सकते हो तो मैं क्यों नहीं देख सकती?’’ (पृष्ठ-171) मरदानी पोशाक पहनने पर जब बब्बन प्रश्न करता है, तो सल्लो का जवाब है ‘‘तुम लोग रोज पहनते हो, मैंने सोचा कि लाओ, आज हम भी पहनकर देखते हैं।’’ ( पृष्ठ-250) सल्लो द्वारा सिगरेट पीने पर बब्बन स्वीकारता है ‘‘सच कहूं, मुझे भीतर धक्का लगा। अंग्रेज या विदेशी औरतों के विषय में सुन रखा था कि मरदों की तरह सिगरेट पीती हैं, लेकिन हिन्दुस्तानी और वह भी अपने की लड़की को इस तरह सिगरेट पीते देखूं, यह सपने से भी दूर की बात थी।’’ ( पृष्ठ-251) क्योंकि वह सपनों में ‘विवस्त्रा’ सल्लो का ‘जल भीगा शरीर’ तो देख सकता है, देख सकता है चोरी-छिपे गुसलखाने में नहाती सल्लो को, मगर उसे ‘सिगरेट पीते’ नहीं देख सकता। इन रूपों में देखते-सोचते-स्वीकारने पर ‘भीतर धक्का’ लगता है और सारे सवालों का एक ही जवाब मिलता है ‘‘ आपा के इस साहस (दुस्साहस) के पीछे क्या सस्ती फिल्मों का प्रभाव नहीं है?’’ ( पृष्ठ-253)

‘सस्ती फिल्मों’ और ‘गन्दी किताबों’ का प्रभाव सिर्फ सल्लो पर ही नहीं पड़ा है – बब्बन के अब्बा से अब तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस प्रभाव में रही है। पर्दे पर स्त्री को लगातार ‘बेपर्दा’ किया जाता रहा है क्योंकि पुरुषों के यौन मनोरंजन के लिए नग्न स्त्री की उत्तेजक देह छवियां सबसे अधिक मुनाफे का व्यापार है। अरबों-खरबों रुपये-डालर-पौंड का बाजार, जो मुख्यतया मर्दों के हाथ में है। सौंदर्य व्यवसाय की सबसे अधिक उपभोक्ता स्त्रियां है और यौन व्यवसाय के उपभोक्ता पुरुष। इस षड्यंत्र के दुष्चक्र में अधिकांश स्त्रियां शोषित हैं या जाने-अनजाने हुई शिकार। सल्लो इस षड्यंत्र की ही एक और शिकार है। चारों तरफ से बंद खंडहर में कैद सल्लो सांस लेने के लिए एक खिड़की खोलना चाहती है, परन्तु किले की दीवार तोड़ने की कोशिश में ही मारी जाती है। खंडहर भी तो ऐसा है जहां ‘न नयी इमारत बनती है और न पुरानी टूटती है।’’ ( पृष्ठ-10) सल्लो सचमुच बब्बन से बेहद प्यार करती है और इस दिशा में पहल भी, लेकिन बब्बन सल्लो के प्यार में मुग्ध होने के बावजूद ‘कमजोर, भीरू, संकोची और साहसहीन’ ही नहीं, बल्कि संस्कारों की सीलन और गहरे अपराध बोध से भी ग्रस्त रहता है। हीनभावना से उभर ही नहीं पाता। उम्र के सवाल पर मन ही मन विश्वासपूर्वक कहता है ‘‘मैं किस मानी में छोटा हूं और पुरुष नहीं हूं?’’ ( पृष्ठ-258) सल्लो के हर एक स्पर्श में ‘झनझनाती हुई सिरहन’- नशे सी लगती है। एक दिन…’’ अचानक अपनी ठोड़ी पर नरम हथेली की पकड़ महसूस हुई और कान पर दो गर्म-गर्म
होठ एक क्षण के लिए आ टिके। ऐसा करने से उनके (सल्लो के होठों तथा गालों के स्पर्श ने मेरे कानों को भी लमहे-भर के लिए तपा दिया था। सारे शरीर की रगों में एक झनझनाती हुई सिरहन उतर गई और जैसे नशे के बोझ से दोनों आंखें अपने-आप मूंद गयीं।’’ ( पृष्ठ-169) पुरुष ‘थोड़ी देर के लिए सब भूल गया’ मगर…
फिर  कुछ रोज बाद बब्बन ने देखा कि सल्लो के ‘‘चेहरे का रंग फूल-जासनी हो गया है, आंखें नहीं खुलती और मेरी पकड़ का विरोध करता हुआ हाथ निश्चल पड़ गया है। उसके क्षण-भर बाद उन्होंने दोनों हाथों से अपना चेहरा मूंद लिया और सामने झुक गयीं। कुछ क्षण वैसे भी निकल गए, फिर  धीरे-धीरे झुकता हुआ उनका धनुषाकार शरीर मेरे घुटनों के इतने निकट आया कि पहले मैंने हरारत महसूस की और फिर  एक अपरिचित, नरम-नरम तथा मांसल स्पर्श ने रोशनी की-सी तेजी से एकबारगी झकझोरकर, मुझे बिल्कुल अवश कर दिया।’’ ( पृष्ठ-272)

सल्लो के आत्मीय स्नेह, सम्मान और कुछ ‘स्पर्शों’ या ‘मांसल स्पर्शों’ के परिणामस्वरूप ही बब्बन ‘बेचैनी के मारे करवट बदलता’ रहता है और ‘चैबीसों घंटे, सल्लो आपा की तस्वीर आंखों के आगे’ तैरती रहती है – ‘कोई घड़ी खाली नहीं जाती जब उनकी निकटता की चाह न होती हो।’ ( पृष्ठ-273) बब्बन को गहरे लगता है ‘‘जैसे उनके बिना मेरी कोई सार्थकता ही न हो’’ …मन करता है ‘‘सब छोड़-छाड़ कर उनके निकट जा बैठूं, वह बोलती जाएं, मैं सुनता रहूं, वह हंसी के मारे दोहरी हो-हो जाएं और मैं बिना बाधा दिए चुपचाप देखता रहूं।’’ ( पृष्ठ-273-274) बब्बन सोचता-समझता और महसूस करता है, परन्तु अपने को बाहर अभिव्यक्त नहीं कर पाता है। पारिवारिक तनाव, क्लेश और स्वभाव भी तो उसकी सीमाएं हैं। सब कुछ होने-जानने के बाद भी, बब्बन के दिल में सल्लो की अमिट स्नेह स्मृतियां बनी रहती है। इसकी अचानक और अप्रत्याशित मौत का विश्वास ही नहीं कर पाता। उसे लगातार यही लगता है कि ‘‘जरूर कोई साजिश करके लोगों ने उन्हें कहीं छिपा या भेज दिया है।’’ ( पृष्ठ-293) दूसरी तरफ सालों बाद भी वही अपराधबोध और प्रश्न ‘‘आपा को सोचते हुए मन लज्जा से क्यों भर जाता है? क्या मैं कहीं अपराधी हूं? यह क्या है कि उनकी स्मृति तक से मुंह छिपाया जाए या झटक-झटककर अपने को दूर-दूर रखने की कोशिश की जाए? और उसके मूल में क्या है? ईर्ष्या संजीदगी की कमी, हल्कापन या किसी ऐसे गुनाह का एहसास जो मेरे मस्तिष्क की परतों में पैबस्त है और मुझे बरसों से हाट करता रहा है?’’ ( पृष्ठ-269) …‘‘क्या मेरे भीतर कहीं कोई अपराधी बैठा है जो आपा के बारे में फू पफी से रूबरू कुछ भी पूछने नहीं देता।’’ ( पृष्ठ-294) बब्बन की तकलीफ का कुछ अनुमान इन शब्दों से लगाया जा सकता है। ‘‘या अल्लाह, यह पीड़ा भी मुझे ही झेलनी थी कि उनके (सल्लो के) नाम से शबेबरात की फातिहा एक दिन मैं ही दूं और वह भी उसी घर में आकर जहां की दीवारों में उनकी पाजेब की आवाज मुंहबंद सोयी है।’’ ( पृष्ठ-268) बब्बन की पीड़ा में सल्लो की रूह बसी है और स्मृतियों में सारे कथासूत्र। बब्बन और सल्लो आपा के बीच सन्नाटे में संवाद की संभावनाएं और घरेलू सूनेपन में स्नेह और सहानुभूति के अंकुर पनपते हैं। दोनों एक-दूसरे के स्पर्श सुख के सपने भी देखते हैं और मनोकामना भी करते हैं। सल्लो के स्पर्शों के पीछे छिपी सांकेतिक भाषा को बब्बन, संपूर्णता में सही-सही नहीं समझ पाता। नहीं पहचान पाता देह और कामना के ‘रहस्यमय’ अर्थ। उसके लिए सब कुछ ‘रहस्यमय’ और ‘अस्पष्ट’ है – ‘पुरुष’ होने-समझने के बावजूद।

सल्लो न जीने से डरती है और न मरने से, जबकि बब्बन दोनों से डरता है। सल्लो को बब्बन से अपेक्षित ‘रिस्पोंस’ नहीं मिलता है तो शायद वह दूसरी दिशा में मुड़ (भटक) जाती है। धीरे-धीरे बब्बन को ( जगदल पुर छोड़ने से पहले) महसूस होता है ‘सभी मुझसे निर्लिप्त हैं, अपने-आपमें मस्त और व्यस्त, किसी का दुःख किसी को नहीं… मुझे पता नहीं था कि इसी घर में एक ऐसी वितृष्णा…’’ ( पृष्ठ-280) क्योंकि शहर छोड़ने के समाचार को सल्लो ने ‘तटस्थ भाव से परायों की तरह’ सुना और बिना किसी अफसोस या दुख के अनसुना कर दिया। दूसरी घटना यह हुई कि सल्लो के कमरे में बैठे हुए बब्बन को तकिये के गिलाफ में से (गिरा) एक पुर्जा मिल जाता है। उस समय बब्बन को लगता है ‘‘यह बहुत ही अच्छा हुआ कि मेरी आंखों के सामने से पट्टी हट गई और उस एक जरा-से पुर्जे में आपा को मैंने बिल्कुल साफ-साफ और सही-सही देख लिया, वरना शायद जगदलपुर
इतनी आसानी से नहीं छूटता।’’ ( पृष्ठ-280-281) सल्लो की मृत्यु का समाचार मिलता है तो स्मृतियां सामने आ खड़ी होती हैं. .. मरदाना लिबास, ‘‘सिगरेट, चाकलेटी पतलून और तकिये के गिलाफ से गिरी हुई चिट्ठी जो इतनी गिरी हुई थी कि शायद किसी दूसरे के सामने कभी पढ़ी नहीं जाती। आपा की अनायास मृत्यु क्या उसी की चरम परिणति थी?’’ ( पृष्ठ-284) सल्लो की मृत्यु के पीछे क्या कारण रहे-कोई नहीं जानता। अनुमान लगाया जा सकता है कि गर्भ गिराने के प्रयास में ही मौत हुई होगी। गर्भ किससे ठहरा? इस सवाल का भी स्पष्ट कोई जवाब नहीं मिलता। सिर्फ दो सूत्र या संकेत हैं। पहला सूत्र है चिट्ठी और दूसरा चाकलेटी पतलून। सल्लो के कमरे में टंगी चाकलेटी पतलून को देखते ही बब्बन का सिर घूमने लगता है। ‘‘एकाएक चिनगारी फूटने-जैसी एक पिछली स्मृति सहसा आ छिटकी और वैसी ही जलन के मारे मैं तिलमिला गया.. गत मुहर्रम की पांच और दस तारीखों को जिस युवक को सिगरेट पीते हुए बारहा आपा के इर्द-गिर्द देखा था, उसके शरीर पर भी ऐसी ही पतलून थी। यही चाकलेटी रंग और संभवतः यही कपड़ा… गए दिनों जिस मरदाना लिबास में सल्लो आपा मेरे घर आयी थी, वह कैसा था?’’( पृष्ठ-278) जाहिर है उस दिन सल्लो ने यही चाकलेटी पतलून पहनी हुई थी।

‘चाकलेटी रंग की पतलून वाले युवक’ के बारे में विस्तार से ( पृष्ठ-207 पर) पहले ही बताया जा चुका है। यहां भी शानी जी पतलून और चिट्ठी के आधार पर वैसे ही जांच-पड़ताल करते हैं जैसे पेटीकोट और बेलमोगरा के आधार पर मालती कांड की करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां ये सूत्र (सबूत) बब्बन को बाइज्जत बरी करने के लिए हैं- वरना ‘संदेह की सूई’ उसी के आस-पास घूमती रहती। बब्बन यानी कथावाचक यानी स्वयं लेखक। सल्लो का झूठ फूफी उसी दिन पकड़ लेती है, जिस दिन वह मरदाने लिबास में बब्बन के यहां से लौटती है और इसीलिए गुस्से में चिल्लाती हैं ‘‘हरामखोर, बदजात, कमीनी… कहां मरने गई थी? किसके साथ गई थी? कहां?’’ ( पृष्ठ-260) बब्बन के यहां इतनी देर नहीं रह सकती-फूफी जानती है। फूफी फिर कहती है ‘‘देख सल्लो, तू मुझको सच-सच बता, नहीं तो फिर आने दे तेरे अब्बा को, उनसे कहकर मैं तेरी खाल खिंचवाती हूं।’’ बब्बन की अम्मा का कहना है ‘‘मुझे पहले ही शक था कि सल्लो यही दिन दिखाएगी। एक-दो बार मैंने छोटी को इशारा भी
किया था कि वह उसे संभाले, पर उसने ध्यान नहीं दिया। मैं अब साफ-साफ क्या कहती?… ऐसी-वैसी खबरें तो मैंने जगदलपुर रहने के दौरान ही सुनी थी। जानती थी कि उस लड़की के रंग-ढंग ठीक नहीं, इसलिए मैंने कभी पसंद नहीं किया कि बब्बन वहां ज्यादा आए-जाए, लेकिन वह था कि रात-दिन वहीं घुसा रहता था। मैंने अपनी आंखों से देखा कि…’’ ( पृष्ठ-283) कथा का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि ‘‘अफशां तो ब्याहता लड़कियां लगाती हैं’’ मगर गवाही के दौरान फूफी ने स्वीकार किया है ‘‘हां, जानती हूं, सल्लो कुंआरी ही मरी है, लेकिन… मेरे लाख मना करने, गालियां बकने और कई बार मारने-पीटने पर भी उसने मांग में अफशां भरना कभी नहीं छोड़ा था।’’ ( पृष्ठ-269) इसका साफ-साफ मतलब यह है कि सल्लो कुंआरी नहीं ब्याहता थी। किसकी ब्याहता थी – यह शायद सिर्फ सल्लो ही जानती थी। कुंआरी होती तो (मना करने, गालियां सुनने या मार-पीट के बावजूद) मांग में अफशां क्यों भरती? हो सकता है उसने चोरी छिपे ब्याह कर लिया हो और शायद उसी से गर्भवती (?) भी हुई हो। अगर नहीं, तो क्या सल्लो अपनी मांग में बब्बन के नाम का अफशां भरती थी? नहीं,… हां,… ऐसा भी तो हो सकता है वरना बब्बन बार-बार क्यों कहता है ‘‘क्या मेरे भीतर कहीं कोई अपराधी बैठा है…?’’ या ‘क्या मैं कहीं अपराधी हूं?’ या फिर  वो कौन से ‘गुनाह का एहसास’ है जो बब्बन को ‘बरसों से हाण्ट करता रहा है?’ मांसल स्पर्शों के संदर्भ में हुई ‘ग्लानि तो दो-एक दिन में कपूर की तरह गायब’ हो गई थी। ‘फिर वैसी कोई ( अपराध) भावना आती भी तो कच्चे मटके पर पड़ी बूंद की तरह फिसल कर निकल जाती’ थी। ( पृष्ठ-273)

सबूतों के अभाव में बब्बन को ‘संदेह का लाभ’ भले ही मिल जाए, मगर पूर्णतया निर्दोष तो नहीं ही ठहराया जा सकता। संभव है कथावाचक उपर्फ बब्बन ने अपने विरुद्ध सारे सबूत नष्ट कर दिये हों या जानबूझ कर सारा दोष (संदेह) चाकलेटी पतलून वाले युवक के मत्थे मढ़ने की कोशिश की हो – ताकि सारा मामला रहस्यमय बना रहे बब्बन की अम्मी की गवाही कि ‘उस लड़की के रंग-ढंग ठीक नहीं’ – विश्वसनीय नहीं कही-मानी जा सकती। फू फी भी इतनी नासमझ तो नहीं कि कुंआरी बेटी द्वारा रोज मांग में अफशां भरने के अर्थ-अनर्थ न जानती हो – ‘लाख मना करने, गालियां बकने और मारने-पीटने’  के बावजूद। फिर यह कौन है और क्यों कहे जा रहा है – हरामखोर, बदजात, कमीनी, कुतिया, रण्डी, बाजारू, हरामजादी, छिनाल, कुलटा और चरित्राहीन। सल्लो ने एक दिन बब्बन से कहा था कि ‘‘मरने से नहीं डरती, डर तो मुझे कब्र से बहुत लगता है।’’ बब्बन ने पूछा ‘कब्र से कैसे?’ तो सल्लो ने बताया ‘‘तुमने खुदी हुई कब्र नहीं देखी? कितनी छोटी और जरा-सी जगह में लोग मुरदे को अकेले डाल जाते हैं। सोचती हूं, तख्ते-मिट्टी के पटाव के बाद भीतर कितना अंधेरा हो जाता होगा, फिर  कीड़े, सांप और बिच्छू… हाय अल्लाह, मैं तो कभी दफन होना नहीं चाहती… इससे अच्छा तो यह कि मरने के बाद आदमी के शरीर को जला दिया जाये या दूर, किसी खुले मैदान में रख दिया जाए ताकि गिद्ध चील नोच खायें…’’ ( पृष्ठ-284) स्मृति में सहेज कर रखी सल्लो की वसीयत पढ़ने के बाद, बब्बन ने ‘सारी घृणा, क्रोध या ईर्ष्या भूल कर मन ही मन दुआ की थी कि खुदा सल्लो को बख्शे, उनकी रूह को सुकून दे और फूफी को मां होने के नाते सब्र…’’ ( पृष्ठ-284) कब्र से बंद घर ( परिवारों) में भी स्त्रिायां सचमुच कितनी ‘अकेली’ ( असुरक्षित और आतंकित) होती हैं – चारों तरफ सुरक्षा प्रहरी। ‘भीतर कितना अंधेरा’ और बाहर संबंधों के ‘सांप, कीड़े और बिच्छू’ हैं। रोज जिन्दा औरतें जल (जला दी) जाती हैं – बदनामी के डर या परिवार की प्रतिष्ठा के लिए। सरेआम स्त्री देह को ‘गिद्ध-चील’ नोचते-खसोटते रहते हैं। घरेलू हिंसा हत्या, दहेज हत्या, आत्महत्या, बलात्कार, यौन शोषण, मानसिक-शारीरिक उत्पीड़न और अन्याय या अत्याचार झेलती आधी दुनिया के लिए मौजूदा विवाह संस्था (घर-परिवार-संबंध) किसी कब्र या चिता से कम खौफनाक नहीं। मुझे लगता है कि ‘कालाजल’ में इस संवाद के बाद एक भी और शब्द की गुंजाइश शेष नहीं रह जाती। अंतिम अध्याय (सोलह) की सल्लो आपा संबंधी सामग्री को, इसी अध्याय में शामिल कर लिया जाता तो बेहतर होता। मोहसिन संबंधी सामग्री को किसी अन्य अध्याय में भी रखा जा सकता था। अगर सल्लो आपा की अलिखित वसीयत के साथ ‘कालाजल’ का समापन हो(ता) तो वास्तव में यह उपन्यास ‘युगों से चली आ रही आस्था और विश्वास’ की प्रार्थना छोड़ने और ‘पूर्वजों की अस्थियों से मुक्ति’ का घोषणा पत्र बन पाता। अपने समय की स्त्री संवेदना और उसके अस्तित्व तथा अस्मिता के सवालों को अतीत से भविष्य तक में देखते-समझते-परखते हुए शानी जिस विलक्षणता और सूक्ष्मता से स्पर्श करते हैं, वो अपने-आप में अभिव्यक्ति का अनोखा अनुभव है। ‘कालाजल’ पढ़ते हुए मुझे एक भी ऐसा कथाशिल्पी याद नहीं आ रहा, जिसने स्त्री को इस अन्तर बोध से जानने-समझने का प्रयास भी किया हो। इतने स्नेह, सम्मान और समानभाव से। अपने समय की तमाम सीमाओं का अतिक्रमण है – ‘कालाजल’।

‘डरता कौन है शानी से?’
छह फरवरी 1995 को जब ‘कालाजल’ का अमर कथाशिल्पी नहीं रहा तो मार्च 1995 के ‘हंस’ के संपादकीय (‘डरता कौन है शानी से?’) में राजेन्द्र यादव ने लिखा था- ‘‘शानी की यह यात्रा (बस्तर से दिल्ली वाया भोपाल) गुलशेर खां से शानी और फिर गुलशेर खां शानी बन जाने की यात्रा है यानी पहले वह मुसलमान था, फिर इस सांचे को तोड़कर लेखक बना, मगर धीरे-धीरे मुसलमान हिन्दी लेखक बन कर रह गया… ‘‘तुम अल्पसंख्यक होने की तकलीफ कभी नहीं समझ पाओगे?’’ दर्द से उसने न जानी कितनी बार कहा होगा, ‘उनका डर, उनकी असुरक्षा-भावना, दहशत से उनका एक-दूसरे से चिपका रहना, हमेशा शक और संदेह की तेज रोशनियों के बीच घिरे होने का अहसास…’’ और दूसरे ही पल गुस्से में तड़पकर ‘‘तीन पीढ़ियों से मैं मुसलमान हूं और वही बने रहना चाहता हूं। यह मुल्क, यह जबान, यह राष्ट्र सिर्फ उनके बाप का नहीं, मेरा भी उतना ही है जितना उन हरामजादों का। मैं उनकी शर्तों और कृपा पर यहां का नागरिक नहीं हूं। यों खत्म कर दूं मैं अपनी आइडेंटिटी…? सिर्फ इसलिए कि मैं अल्पसंख्यक हूं… मुझसे क्यों मांग की जाती है कि मैं हर बार अपने को वो साबित करूं जो वे चाहते हैं?’’ फिर  अगले ही क्षण भावुक होकर विगलित हो जाता, ‘‘कुछ कहो राजेन्द्र, आदमी साला न हिन्दू होता है, न मुसलमान। वह सिर्फ आदमी होता है।’’ शानी और गुलशेर खां के भयानक अंतर्विरोधों के बीच टक्करें मारते व्यक्ति की भीतरी यातना का नाम था ( है) शानी… एक सुलगता, सुरसुराता बम जो कभी भी साहित्य की दुनिया में विस्पफोट कर सकता था।’’ उन्होंने आगे लिखा है ‘‘…उसमें जगदलपुर के आदिवासी की जिजीविषा और पठान होने की आक्रामकता थी… अद्भुत भाषा का धनी था शानी… इतना जानदार और शानदार गद्य लिखने वाले हिन्दी में दो-चार से अधिक नहीं हैं… बहुत सख्त पसंदों और नापसंदों का व्यक्ति था शानी… गुस्सा और आवेश उसके स्थायी भाव। उद्दाम-संवेग संचारी भाव थे… अगर शानी न होता तो हम, आत्ममुग्धों, संस्कृति-धर्म की स्व-घोषित इकहरी महानताओं के शंखों-घोंघों में कैद जगद्गुरुओं को झकझोर कर कौन दिखाता कि बहुसंख्यकों के बीच अकेले और असुरक्षित होना क्या होता है। क्या हेाता है पाकिस्तान, बांग्लादेश और कुवैत में हिन्दू होकर रहना।’’ . ..अगर शानी न होता तो…!!!???!!!

‘अगर शानी न होता तो…?’
प्रख्यात आलोचक गोपाल राय के अनुसार ‘‘शानी से पहले प्रेमचन्द, यशपाल, वृन्दावन लाल वर्मा आदि ने अपने उपन्यासों में सीमित अनुभव के आधार पर मुस्लिम जीवन का अंकन किया था, पर यह विषय किसी ऐसे संवेदनशील और प्रतिभाशाली उपन्यासकार की प्रतीक्षा कर रहा था, जो खुद उस जीवन का अभिन्न अंग हो। शानी इस बात को बहुत शिद्दत के साथ महसूस करते थे कि हिन्दी उपन्यास में मुस्लिम जीवन का चित्रण बहुत कम हुआ है। कहा जा सकता है कि शानी ने इस अभाव को दूर करने की गौरवपूर्ण शुरूआत की।’’ ( हिन्दी उपन्यास का इतिहास, 2002, पृष्ठ-290) इसके बाद के उपन्यासकारों ने शानी की परम्परा को ही आगे बढ़ाया है। राही मासूम रजा, बदी उज्जमां, मंजूर एहतेशाम, नासिराशर्मा, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मेहरून्निसा परवेज से लेकर असगर वजाहत तक ने ‘आधा गांव’ से लेकर ‘सात आसमान’ तक की लम्बी यात्रा तय की है। अगर शानी न होता तो ‘यहां तक का सफर कैसे हो पाता? शानी ने पिछड़े मुस्लिम समाज की परंपरा, जीवन दृष्टि और दर्शन तथा समसामयिक कटु यथार्थ और चिंताओं को ही अभिव्यक्ति नही दी, बल्कि उसकी विकृतियों और विसंगतियों को रेखांकित करके, भविष्य का पूर्वाभास और दिशा संकेत भी निर्धारित किये हैं। शानी सिपर्फ मील का पत्थर ही नहीं, बल्कि इस साहित्य यात्रा में ‘लाइट हाउस’ भी है, और रहेगा। मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैंने भी शानी को देखा है। हालांकि सिर्फ दो-तीन बार, दूर से ही देखा है।

काला जल की कथाभूमि
‘कालाजल’ प्रख्यात कथाकार गुलशेर खान शानी का अद्वितीय और कालजयी उपन्यास है और एक प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज भी। शानी जी के शब्दों में ‘इस उपन्यास ने मुझे वह सब कुछ दिया जिसकी मुझ जैसे लेखक को कल्पना भी नहीं थी। यश, मान, सम्मान, पैसा, असंख्य पाठकों का स्नेह और टेलीविजन पर प्रसारण के चलते अपार लोकप्रियता भी।’’ राजेन्द्र यादव के अनुसार ‘‘अपनी भाषा, विवरणों और वर्णनों की बारीकियों और सब मिलाकर क्लासिकीय औपन्यासिक तेवर के लिए ‘कालाजल’ हिन्दी के कुछ सर्वश्रेष्ठ स्वातंत्रयोतर उपन्यासों में से एक है।’’ प्रथम संस्करण की भूमिका में शानी ने लिखा था- ‘‘इस रचना की भूमिका के रूप में मुझे कुछ नहीं कहना है, सिवाय इसके कि जिस जीवन की विडम्बना या विभीषिका इसमें चित्रित है वह सायास, साग्रह या केवल वैशिष्ट्य के लिए नहीं- मेरी अपनी विवशता ही इसका कारण है। और किसी की निरूपायता या आंतरिक विवशता के लिए आपके मन में यदि थोड़ी सी भी संवेदना है, तो मैं विश्वास दिला सकता हूं कि इसे पढ़ते हुए यापढ़कर आपको कोफ़्त  नहीं होगी। अपनी ओर से मुझे इतना ही कहना चाहिए कि इसे  मैंने गंभीरतापूर्वक, पूरी निष्ठा, सच्चाई और ईमानदारी से लिखा है और इसकी सृजन प्रक्रिया के बीच मेरी मनःस्थिति उस प्रार्थनारत व्यक्ति की तरह रही है, जो अत्यन्त निश्छलतापूर्वक सिजदे में पड़ा हो – सभी से कटा हुआ, एकाग्र और तल्लीन!’’

 ‘नये संस्करण पर एक संवाद’ में हैरानी और अविश्वास से शानी को ‘‘यह सोचकर ताज्जुब-सा होता है कि आज से लगभग बत्तीस साल पहले जब यह उपन्यास लिखा तो मेरी उम्र सिर्फ अट्ठाईस बरस थी।’’ उन्होंने आगे लिखा है ‘‘शबेबरात की फातिहा की एक रात इस उपन्यास का बीज पड़ा था-बिल्कुल अनजाने में। उस रात फिर  मैं सो नहीं पाया था। फिर  वही क्या आने वाली कई रातें मेरे लिए हराम हो गई थीं। आज भी अपने पास सुरक्षित काला जल की हस्तलिखित पाण्डुलिपि पर नजर डालता हूं तो विश्वास नहीं होता। 27 अगस्त 1960 शनिवार की रात मैंने इसकी शुरूआत की थी और जब यह खत्म हुआ तो वह 3 नवम्बर 1961 की आधी से गुजरी हुई रात थी।’’ दुर्भाग्य कि ‘‘सन् 1962 से लेकर लगभग 1965 तक यह राजकमल प्रकाशन के पास स्वीकृत पड़ा रहा’’ और ‘‘सन् 1965 में अक्षर प्रकाशन के पहले सेट की धूम के साथ कालाजल बिल आखिर प्रकाशित हुआ।’’ तब तक ‘कथा-भूमि जगदलपुर कभी का छोड़ चुका था।’ रचनात्मक अनुभव के बारे में शानी जी बताते हैं ‘‘छोटी फूफी के पास बैठते ही न सिर्फ उनके आसपास की जिन्दगी बल्कि उनके पहले और बाद की दो पीढ़ियों का समाज अपने आप खिंच आया – मखनातीस की तरह। यह वह समाज था जिसे हिन्दी में इससे पहले अनदेखा किया जाता रहा था और जिसके बाद ही राही मासूम रजा का ‘आधा गांव’ जैसा उपन्यास आया। फिर तो मुस्लिम लेखक भी आए और मुस्लिम-अनुभव भी – उस झूठ को खोलते हुए कि हिन्दी साहित्य सिर्फ हिन्दू साहित्य नहीं है और यह कि केवल हिन्दू अनुभव भारतीय अनुभव की सीमा नहीं है। अगर ऐसा होता तो अमेरिकी साहित्य में हेमिंग्वे के साथ-साथ रिचर्ड राइट, राल्फ एलिसन, या जेम्स बाल्डविन और एलिस वाकर अपने अश्वेत-अनुभव के आक्रोश भरे लेखन के लिए और नोबेल पुरस्कार विजेता इसाक बाशेविस सिंगर अपने कोरम को यहूदी-अनुभव के लिए समाज में समादृत न होते।’’

कालाजल: ‘दुर्भाग्य की काली छाया’

‘आलोचना’ के संपादक परमानन्द श्रीवास्तव का विचार ( विश्लेषण) यह है कि ‘‘कालाजल आंचलिक उपन्यास के रूप में ऐसे अंचल का उदास वृतान्त है जिसमें जीवन एक निरंतर क्षय की ओर उन्मुख है। चीजें खत्म हो रही हैं और नया जैसा कुछ बनने नहीं जा रहा है। एक सीमित सिकुड़ा हुआ परिवार-वृत्त जो एक पूरे समाज का आख्यान न भी हो, एक खास दौर की पस्ती और हताशा को प्रत्यक्ष करता है। यहां न ‘गणदेवता’ – जैसा कोई देबू है, न ‘मैला आंचल’ – जैसा कमला-प्रशांत संबंध की स्वीकृति से जन्म लेनेवाला कोई भविष्य स्वप्न इस उपन्यास में जीवन का नकार तो नहीं है, पर जीवन के प्रति कोई आशावादी रूख भी नहीं है। यह मानवीय विफलताओं की ही महागाथा है, यदि इसे महागाथा कहने का आग्रह प्रबल हो। कभी-कभी ऐसी विफलताओं का इतिहास भी
हमें अवरूद्ध यथास्थिति से मुक्ति के लिए बेचैन करता है।’’ ( उपन्यास का पुनर्जन्म, पृष्ठ-136-37) दरअसल परमानन्द जी ‘कालाजल’ को ‘अभिशप्त पिछड़े अंचल के दो मुस्लिम परिवारों की कहानी’ मानते हैं, जिन पर ‘दुर्भाग्य की काली छाया’ पड़ी है और जिसमें ‘जीवन का निरन्तर क्षय’ हो रहा है। ‘कालाजल’ की समीक्षा करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘‘जिस दृष्टि से जिस अनुभूति को, जिस जीवनानुभव को, जिस जीवन-तथ्य को,
कवि ( लेखक) उपस्थित कर रहा है, उसके समस्त समाजशास्त्राीय, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक संदर्भ और
अर्थ आपके ध्यान में रहने चाहिए… लेखक के संवेदनात्मक उद्देश्यों को पहचान कर उसकी कलाकृति का विवेचन किया जाना चाहिए, तथा उसके संवेदनात्मक उद्देश्यों और अन्तरानुभवों को व्यापकतर मानवसत्ता के तथ्यों से  जोड़ना चाहिए।’’ ( मुक्तिबोध रचनावली, पांच, पृष्ठ-73)  क्या यह पिछड़ा अंचल सचमुच ‘अभिशप्त’ है? क्यों अभिशप्त है? क्या सिर्फ इसलिए कि इस पर, ‘दुर्भाग्य की काली छाया’ पड़ी है? ‘दुर्भाग्य से अभिशप्त’ है या सामाजिक-आर्थिक- राजनीतिक और धार्मिक कारणों से? क्या ‘कालाजल’ सिर्फ ‘दो मुस्लिम परिवारों की कहानी’ है? ‘पूरे समाज का आख्यान’ क्यों नहीं, कहा-माना जा सकता? ‘पूरे समाज का आख्यान’ और क्या हेाता है या होना चाहिए।

कालाजल: ‘विवाहेत्तर संबंधों की भरमार
डाॅ. हरदयाल की नजर में ‘कालाजल’ में केवल ‘बंधा-सड़ा जीवन’ है। उन्होंने लिखा है ‘‘इस उपन्यास में आंचलिक उपन्यासों की एक और प्रवृति हमें देखने को मिलती है-वह है विवाहेत्तर यौन-संबंधों की भरमार। मिर्जा करामतबेग पुलिस दरोगा बनकर बस्तर आये थे और तीस वर्ष की आयु तक अविवाहित थे। उनका विवाहेत्तर यौन-संबंध स्थापित हुआ बिट्टी रौताइन से। बाद में उन्होंने भेद खुल जाने पर नौकरी छोड़ दी, उससे निकाह कर
लिया। मिर्जा करामत बेग के देहावसान के बाद बिट्टी उर्फ बीदारोगन का यौन संबंध रज्जू मियां से स्थापित हुआ और बाद में उन्होंने निकाह कर लिया। रज्जू मियां ने अपनी सौतेली पूत्रवधु को भी अपनी वासना का शिकार बनाने की पूरी-पूरी कोशिश की, यद्यपि वे अपनी इस कोशिश में सफल नहीं हुए। रज्जू मियां एक अनाथ बच्ची मालती को ले आये, जब वह युवती हुई तो उन्होंने इसके साथ यौन संबंध स्थापित किया, वह गर्भवती हुई और उसे घर से निकालना पड़ा। रशीदा का चाचा उसके साथ बलात्कार करता रहता है और इससे मुक्त होने के लिए उसे आत्महत्या करनी पड़ती है।

सल्लो का यौन-संबंध भी सामाजिक दृष्टि से वैध नहीं है। सुनार की बीवी अतृप्त यौन-संबंधों के कारण से जल रही है। बब्बन के पिता के किसी स्त्री  के साथ विवाहेत्तर यौन-संबंधों के कारण उनका घर बरबाद हो जाता। इसमें कोई संदेह नहीं कि यौन-संबंधों का चित्रण शानी ने शालीनता की सीमा पार किये बिना किया है। उन्होंने इनमें से कुछ संबंधों की भावनात्मक कोमलता और कुछ संबंधों की क्रूरता को बड़ी संवेदनशीलता के साथ अंकित किया है, किन्तु प्रश्न उठता है कि आंचलिक उपन्यासकार विवाहेतर यौन-संबंधों से इतना अभिभूत क्यों है? क्या यह इस जीवन का यथार्थ है जिसका चित्रण आंचलिक उपन्यासों में हुआ है? मुझे लगता है कि हिन्दी के मध्यवर्गीय आंचलिक उपन्यासकार ने तिल जैसे यथार्थ को अपनी कुंठाओं के कारण ताड़ बना दिया है। ‘कालाजल’ के विवाहेतर यौन संबंधों के संबंध में यही सच प्रतीत होता है।’’ ( हिन्दी उपन्यास 1950 के बाद, 1987, नेशनल पब्लिशिंग हाउफस, पृष्ठ-51-52)

डाॅ. हरदयाल स्वीकारते हैं कि शानी ने यौन संबंधों का चित्रण ‘शालीनता’, ‘भावनात्मक कोमलता’ और ‘संवेदनशीलता’ के साथ अंकित किया है मगर ‘तिल जैसे यथार्थ को अपनी कुंठाओं के कारण ताड़ बना दिया है।’ क्या सिर्फ ‘आंचलिक उपन्यासकार ( ही) विवाहेतर यौन संबंधों से इतना अभिभूत हैं? अगर हां तो क्यों हैं? इस बेबुनियादी आरोप को सिद्ध  करने के लिए डा. हरदयाल के पास कोई प्रमाण, आधार या आंकड़ा नहीं। हिन्दी उपन्यासों का पूरा इतिहास वो जानबूझ कर भूल जाते हैं या सचमुच अनभिज्ञ हैं? भारतीय सभ्यता-संस्कृति के ऐतिहासिक अतीत से लेकर वर्तमान तक में, विवाहेतर ( प्रेम) संबंधों की ‘महागाथाओं’ की कैसे और
क्यों याद नहीं आ रही? शानी की शालीनता, भावनात्मक कोमलता और संवेदनशीलता को रेखांकित करने के बावजूद वे यौन संबंधों के चित्रण का कारण शानी की ‘अपनी कुंठाओं’ को मानते हैं। क्यों? क्या हैं शानी की ( यौन) कुंठाएं? कुछ तो बताएं डाक्टर साहब! चुप रहने से कैसे काम ( धंधा) चलेगा।’

कालाजल: आलोचक का दुराग्रह
आश्चर्यजनक है कि ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में बच्चन सिंह ‘कालाजल’ का उल्लेख तक नहीं करते। मात्र एक पंक्ति में जाने-अनजाने शानी भी शामिल हो जाते हैं। ‘‘यादव, शानी और कमलेश्वर भी श्रेणीबद्ध नहीं हैं।’’ ( पृष्ठ-523) इससे पहले ( पृष्ठ-522) ‘आधा गांव’ और ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ के बारे में एक-एक पैराग्राफ ( 18 पंक्तियां) लिखना नहीं भूलते। इसे हिन्दी साहित्य का ‘दुर्भाग्य’ कहें या विद्वान आलोचक का दुराग्रह? अनभिज्ञ तो नहीं ही कहाµ माना जा सकता, क्योंकि शानी के नाम से इतिहासकार अच्छी तरह परिचित हैं। खैर… जो विद्वान आलोचक-इतिहासकार ‘बेघर’ को ‘संभोगवादी उपन्यास’ और ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ को ‘संभोग का पारदर्शी शीशा’ समझता हो, उनसे और क्या अपेक्षा की जा सकती है।

कालाजल: विभाजन, मुस्लिम और…
इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि ‘विभाजन, इस्लामी राष्ट्रवाद और भारतीय मुसलमान’ ( तद्भव 5) नामक लम्बे लेख में वीरेन्द्र यादव के संदर्भ ‘आधा गांव’, ‘उदास नस्लें’, ‘आग का दरिया’ व ‘धाको की वापसी’ तक ही सीमित रहते हैं और वे ( भी) ‘कालाजल’ का जिक्र तक नहीं करते। ‘भारतीय मुसलमान’ की उलझन व ‘भारत विभाजन की गुत्थी’ को समझने-समझाने के महत्वाकांक्षी प्रयास में वीरेन्द्र यादव ‘झूठा सच’ ( यशपाल), ट्रेन  टू पाकिस्तान ( खुशवंत सिंह), ‘तमस’ ( भीष्म साहनी), ‘आजादी’ ( चमन नाहल) व ‘दि आइस कैंडी मैन’ ( बप्सी सिधवा) तक की खोज-बीन तो करते हैं, मगर ( कालाजल) शानी कहीं नजर ही नहीं आते। हालांकि मैं खुद भी मानता हूं कि ‘कालाजल’ मूलतः भारत विभाजन को लेकर लिखा उपन्यास नहीं है। भारत विभाजन और भारतीय मुसलमान के अंतर्द्वन्द्व  संबंधी अध्याय को मैं ‘कालाजल’ का अनावश्यक अध्याय ही मानता हूं, परन्तु मेरा मानना
है कि इस संदर्भ में भी ‘भारतीय मुसलमान की उलझन और भारत की विभाजन की गुत्थी’ का मूल बीज ‘कालाजल’ में ही दबा है, जो बाद के उपन्यासों में विस्तार पाता है। इस विषय पर तमाम चिंताओं और चिंतन या उलझन और अन्तद्र्वंद की आधारभूमि ‘कालाजल’ ही है। ‘कालाजल’ में मोहसिन बब्बन से कहता है ‘‘तुम ताज्जुब न करना, अगर कहूं कि मुझे इस देश प्रेम में बिल्कुल विश्वास नहीं रहा। वह तो अम्मी की वजह से बंधा बैठा हूं। मेरा वश चले तो इसी पल यहां से भाग निकलूं…’’ ( पाकिस्तान, पृष्ठ-290) बब्बन को समझाता है ‘‘बल्कि मेरी मानो तो तुम्हें भी यही सलाह दूंगा। बब्बन तुम तो यहां बेकार पड़े हो। यहां जिन्दगी भर बीच के आदमी
बने रहोगे, न इधर के, न उधर के। तुम्हारे-जैसा आदमी वहां पता नहीं कहां-से-कहां पहुंच जाए…’’ मोहसिन बोलता रहता है ‘‘मैं जानता हूं तुम्हें लगता होगा कि मैं बक रहा हूं या यह कि मेरी बातों से साम्प्रदायिकता की बू आती है… पर अपने को अच्छी तरह टटोलकर देखो तो तुम खुद स्वीकार करोगे। क्या हम सब लोग यहां
लादे हुए मुगालते में नहीं जी रहे? और जिसे तुम राष्ट्रीयता और ईमानदारी समझ रहे हो, क्या वह सिर्फ मजबूरी नहीं है?’’ ( पृष्ठ-290) बब्बन हंसते हुए कहता है ‘‘…ऐसे ही ख्याल पूरी कौम को बदनाम करते हैं। छिः छिः, तुम तो यूं कह रहे हो, जैसे वहां कोई जादू का करिश्मा होता है।’’ बब्बन याद करता है ‘‘कुछ हमदर्दों ने दबी जबान में ( अब्बा को) समझाया तो बोले कि मरना-कटना होगा तो यहीं मर-कट जाएंगे, बुढ़ापे में मिट्टी खराब करने कहां जाएं? और उसी के साथ वाला वह दौर, जब हम सब शक की नजर से देखे जाते थे। स्कूल में लड़के हम लोगों को देखकर ताने कसते कि ‘भेजो सालों को पाकिस्तान, बांधों सालों को जिन्ना साहब की दुम से…’ और मुझे तब यह सोचकर रोना आता था कि लोग हमें  बेईमान क्यों समझते हैं। हमारा दोष क्या सिर्फ यही है कि हमने मुस्लिम परिवार में जन्म लिया है?’’ ( पृष्ठ-291) काफी बहस के बाद अन्ततः बब्बन ने कहा ‘‘चलो, अच्छा है, जाना ही चाहते हो तो, अभी न सही, फू फी को दफन करके चले जाना। लेकिन पाकिस्तान पहुंचने के बाद भी अगर तुम्हें लगा कि ठग गए, तो फिर  कहां जाओगे-अरब या ईरान ( पृष्ठ-291)

स्त्री  के सम्मान में पढ़ा गया फातिहा 

कालाजल’ निम्नमध्यमवर्गीय मुस्लिम समाज का पहला प्रामाणिक दस्तावेज है जिसमें उनकी त्रासदी, मानसिकता, संस्कृति और संकट अपनी संपूर्णता और गहनता में उद्घाटित होते हैं। यह अपने समय के समाज और संस्कृति में निरंकुशतावादी परिवार संरचना को देखने-समझने-परखने का दुःसाध्य रचनाकर्म है। अपने समाज में स्त्रियों की ( यौनार्थिक) स्थिति को रेखांकित करने की सृजनशीलता का ही परिणाम है- ‘कालाजल’। लिंग पूर्वाग्रहों ( दुराग्रहों) से मुक्त और मानवीय संवेदनाओं से भरा-पूरा हुए बिना, ‘कालाजल’ की कल्पना तक असंभव है। स्त्री पात्रों की आत्मा में गहरे उतरने और उनकी पीड़ा को अपनी ही पीड़ा मानने-स्वीकारने की सहजानुभूति, दुर्लभ ही नहीं बल्कि अकल्पनीय सी लगती है। उपन्यास में चारों तरफ से बंद परिवार-परंपरा और संस्कारों में कैद स्त्री  द्वारा सांस लेने की भयावह छटपटाहट है। अदृश्य हत्यारे आसपास ही चक्कर काट रहे हैं और दूर-दूर तक पितृसत्ता के हिंसक प्रेतों का आतंक, भीतर-बाहर उनका पीछा करता ( घूमता) रहता है। ( यौन) हिंसा की शिकार स्त्रियों की आत्मा की शांति ही नहीं, बल्कि गरिमा और
सम्मान में पढ़ा गया फातिहा है – ‘कालाजल’।

समाप्त 

स्त्री के सम्मान में पढ़ा गया फातिहा:‘काला जल’ (पहली क़िस्त)

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अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

औरत की खेत-खलिहान और मवेशियों की तरह हिफाजत होती
थी (है)। मालिक और मल्कियत के लिए अलग-अलग उसूले-जिन्दगी बन गए। मर्द पालनहार पति
और ख़ुदाए-मज़ाजी। औरत के फरायज़ मर्द की ख़िदमत कि रोज़ी-रोटी की खातिर बराहे-रास्त
हवादिसे-ज़माना का मुकाबला नहीं करना पड़ता था जब तक मर्द को खुश करती। ज्यादा से
ज्यादा सिपाही पैदा करती। महफूज चैन की ज़िन्दगी गुज़ारती। उसके बाद वही अंजाम होता
जो बूढ़े नाकारा मवेशियों का होता है। इसीलिए औरत बुढ़ापे से डरती है। उम्र छियाती
है कि आज भी वह शौहर और बेटो के रहम की मोहताज है।’’ (काग़ज़ी है पैरहन,
इस्मत चुगताई, पृष्ठ-258-59)

भारतीय पुरुष जैसे अपने मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे
पक्षी पाल लेता है(  उपयोग के लिए गाय-घोड़े पाल लेता है, उसी प्रकार वह एक स्त्री को भी पालता है तथा अपने पालित पशु-पक्षियों
के समान ही उसके शरीर और मन पर अपना अधिकार समझता है।’’ (शृंखला की कड़ियां,
महादेवी वर्मा, पृष्ठ-
83)

‘‘…शरीयत के नाम पर कैसे-कैसे जुल्म ढाकर औरतों को
उनके अधिकारों से वंचित किया जाता है। इस्लाम ने यदि औरतों को बराबरी का अधिकार दे
रखा है तो फिर वह अपने समाज,
परिवार में इस तरह कैद
क्यों रखी जाती है? एक तरफ कयामत के दिन मुरदों की पहचान मां के नाम
से होगी बाप के वंशवृक्ष से नहीं,
फिर उसी औरत को आखिर
प्रताड़ित कौन कर रहा है – सियासत, समाज, अज्ञानता।’’ ( ‘खुदा की
वापसी’, नासिरा शर्मा ( 1998) में ‘निवेदन’ पृष्ठ-7-8)
‘‘मुस्लिम औरत का हिन्दुस्तान में नहीं पढ़ने का मूल
कारण गरीबी है। उनकी स्थिति
अनुसूचित जाति की तरह है
जिस वजह से अनुसूचित जाति की औरत नहीं पढ़ पाती है, उसी वजह से मुस्लिम औरत भी
नहीं पढ़ पाती। धर्म और पर्दा उतना बड़ा कारण नहीं है। सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को
नजरअंदाज कर मुस्लिम औरत की स्थिति को ठीक से नहीं समझा जा सकता।’’ ( जोया हसन, हंस भारतीय मुसलमान अंक, अगस्त-2003, पृष्ठ-
15)
‘औरत होने की सजा
‘काला जल’ देखने-समझने से पहले घर-घर
के आंगन में पड़ी (सड़ी) नंगी,
अधनंगी, और जली हुई कुछ जिन्दा-मुर्दा लाशों के भयावह शब्द चित्रों का एक
कोलाज दिमाग में छाया है…’’ दालान के कच्चे फर्श पर
सुनारिन बिल्कुल नंगी पड़ी हुई थी और बलपूर्वक उसे दबाये हुए उसका पति छाती पर बैठा
हुआ था। अपने हाथ में सोने के जेवर बनाने वाली छोटी हथौड़ी लिए वह युवती की नाभि के
नीचे की नंगी हड्डी पर रह-रह कर चोट देता, दांत पीसता और जैसे सबक
सिखाने के ढंग पर गंदी गालियां बकता हुआ कहता, ‘‘अब, बोल बोल…’’ नेपथ्य से… ‘‘भले मुंहबोली हो, जिसे बेटी की तरह पाला हो, उसे ही जवान होने पर पत्नी
बना ले और ब्याहता बीवी को रास्ता बता दे, ऐसे आदमी के लिए पाप शब्द
भी क्या हल्का नहीं पड़ जाता?…’’
( पृष्ठ 13-14) ‘‘कट्…कट्.
.. नीचे’’ बी के निकल? आने के बाद फूफी चोरी से भीतर गई। देखा, मालती लगभग अधनंगी-सी फर्श पर पड़ी है। बाल और चेहरा बुरी तरह नुचे
हुए हैं, ब्लाउज फटकर शरीर को काफी उघाड़े हुए है और उसके
तमाम जिस्म के साफ-सुथरे मांस पर बेंत के कई आड़े-तिरछे रोल उभर आए
हैं।’’ पृष्ठभूमि में ‘‘मैं तेरा गला घोंट दूंगी, हरामजादी! रंडी,
बाजारू, किससे पेट भराया है,
बोल. .. बोल…।’’ ( पृष्ठ-126-127) ‘‘…कट्… 

ग्रामीण 

बाई ओर…’’ घुटनों से लेकर गले तक
जगह-जगह
उसने अपने शरीर को आग से भून डाला था। इस तरह जला-भूनकर शायद वह समझ रही
थी कि खुदा उसके गुनाहों को माफ कर देगा। कहने लगी- मैं चाहती हूं कि मेरा जिस्म
बदसूरत हो जाए – इतना बदसूरत कि उसमें हाथ तक न लगाया जा सके। मैंने रोकर कहा कि
रशीदा यह तूने क्या कर लिया?
बोली- जीते जी दोज़ख भोग रही
हूं। खुदा जाने उसके बाद उसने क्या सोचा-समझा, हफ्रतेभर बाद सुना कि एक रात जब सब सो रहे थे तो अपने शरीर पर
किरासिन तेल छिड़ककर वह
जल मरी…।’’ पृष्ठ-130 ‘‘इंसान होकर ऐसी क्या नियत कि सगी बेटी का रिश्ता
भुला दिया जाए? आदमी और जानवर में आखिर फर्क क्या हुआ?’’ ( पृष्ठ-110) और दाहिने… ‘‘सुना है कि लड़की ( शल्लो
आपा) रात-भर चिल्ला-चिल्ला कर रोती रही कि डाक्टर बुलाओ, नहीं तो मैं मर जाऊँगी, पर किसी ने ध्यान नहीं
दिया। दुनिया को दिखाने के लिए सुबह-सुबह डाक्टर बुलाया गया, लेकिन उससे क्या,
कहने वाले तो आज भी कहते
हैं कि कुछ दाल में काला था। …जिन्होंने
देखा है, वे बताती हैं कि उल्टियों में लड़की की अंतड़ियां
कट-कट कर गिरी थीं…।’’

( पृष्ठ-293-294) सुनारिन
के संदर्भ में एक जगह लिखा है
‘उसकी जलभीगी छातियों पर सरदार की भूखी और नोचती
आंखें तीर की तरह अटकी हुई थी।’
( पृष्ठ-12) ऐसी ही ‘भूखी और नोचती आंखें’ हैं-रशीदा के चाचा और फूफी के ससुर रज्जू मियां की। तभी तो ‘जैसे ही वह ( फूफी) अपने ससुर की ओर ताकती है, उनका चेहरा रशीदा के चाचा की शक्ल में बदला जाता है।’ सल्लो आपा भी बार-बार शिकायत करती है ‘‘देखते हो माटी मिलों को? किस कदर घूर-घूर कर देखते हैं!’’ मालती भी तो रज्जू मियां की
ही ‘भूखी और नोचती’ आंखों का शिकार बनती है।
कभी भूखी और नोचती आंखें सपना बुनती हैं। ‘‘देखता हूं कि उस नीले पानी
से जल भीगा शरीर लेकर सल्लो आपा निकलती हैं। पतला और इकहरा लिपटा कपड़ा भीगकर उनके
शरीर के हर अवयव से ऐसे चिपक गया है कि वह बिल्कुल विवस्त्र लगती हैं।’’ ( पृष्ठ-185)

सुनारिन से लेकर सल्लो आपा
तक ‘
जल भीगा शरीर’ हैं और उनका पीछा करती ‘भूखी और नोचती आंखें’ सपनों तक में चैकन्नी हैं।
सिर्फ जिस्म है ‘मांसल और भरा हुआ’। वही ‘भूखी और नोचती आंखें’ कैलेंडर में भी देखती रहती
हैं ‘‘एक सुंदर स्त्री
अपनी साड़ी के सामने वाले
पल्लू के एक कोने को दांतों से दबाये, परदा करने का अभिनय करती
हुई, ब्लाउज उतार रही है, लेकिन लगभग अर्धनग्न है…’’ ( पृष्ठ-149) यही नहीं, पेटी में अलग से भरी हैं ‘पोर्नोग्रापिफक’
किताबें, जिनमें स्त्राी को सिपर्फ ‘शरीर’, ‘मांसल देह’, ‘सेक्स सिम्बल’, ‘सेक्स बम’, ‘सेक्सी डाल’ और ‘गर्म गोश्त’ के रूप में ही दर्शाया जाता है। ऐसी ‘उत्तेजक’, ‘कामोद्दीपक’, ‘अश्लील’ और नग्नतम मुद्राओं में, जो व्यक्ति को ‘भूखी और नोचती’ आंखों में बदल दे और
स्त्री-देह को भोग्य वस्तु में। यौन विकृतियों के विषैले बीज, ऐसे ही फलते-फूलते रहे हैं- पीढ़ी-दर-पीढ़ी।
बाहर ‘भूखी और नोचती’
आंखों से बचाने के लिए ही
स्त्रियों को बुर्के या घूंघट में (ताला) बंद किया जाता रहा है और अनेक प्रतिबंध
लगाए गये हैं। लेकिन घर में कैद स्त्री भी कहां सुरक्षित हैं। पिता, चाचा, मामा या ससुर की ‘भूखी और नोचती’ निगाहों का कोई क्या करे! घरेलू हिंसा या यौन हिंसा और यौनशोषण से
बचाव के लिए ‘सुनारिन’, ‘मालती’, ‘रशीदा’, ‘सल्लो’, ‘फूफी’ और ‘बब्बन की मां’ आखिर कहां जाएं? क्या करें? चुपचाप सहती रहें, खटती रहें और गुमनाम मरती
रहें या मारी जाती रहें। नहीं तो फूफी की तरह रूंधे कंठ से बड़बड़ाती रहे ‘‘अल्लाह, मुझे उठा ले तो इस रोज-रोज की दांता किट किट से
राहत मिले… या ऐसा करो, यह हर बार नोंचने के बदले, तुम सब मुझे जहर दे दो…’’ (पृष्ठ-261) या फिर  बब्बन की अम्मी की तरह कड़वाहट भरे शब्दों में कहती रहे ‘‘अब मेरा गोश्त रह गया है खाने के लिए, तुम सब लोग बैठकर उसे भी
चीथ डालो…’’ ( पृष्ठ-178) यह सब
नहीं तो बिट्टी उपर्फ बी-दारोगिन की भांति आत्मसमर्पण करते हुए स्वीकार कर ले ‘‘एक मुट्ठी भात और गज भर कपड़ा… बस मेरे जीने के लिए इतना काफी है।’’ ( पृष्ठ-28) 

काला जल’ में बब्बन अपने पिता की
पेटी
से निकाल कर ‘गंदी तस्वीरों वाली किताब’ सल्लो आपा तक पहुंचाता है। ऐसे ही ‘सूखा बरगद’ ( मंजूर एहतेशाम) में शोबिया एक किताब शाहिदा आपा के यहां देखती है ‘‘सूपड़े के नीचे से एक किताब हाथ में आ गई। मैं नहीं सोचती कि उस सबकी
जो मुझे नजर आया मैंने कभी किसी किताब के साथ कल्पना भी की हो। लिखा क्या था, पढ़वाना तो संभव था ही नहीं, जो चित्रकारी थी- आदमी-औरत
अलग-अलग तरह से एक-दूसरे के साथ-वही मेरे होश उड़ा देने के लिए काफी थी। …शाहिदा
आपा? वह आदमी?? अकेले घर में? मेरा दिमाग लपक कर किताब के उन पन्नों पर चला गया। छी!! कैसी बेहूदा
किताब थी! वह सब फोटो-क्या और क्यों हो रहा था उन पन्नों पर? कहीं ऐसा भी कोई करता होगा? क्या शाहिदा आपा और वह आदमी इस समय वही
सब… छी! …छी! …और न जाने कितने समय के लिए किताब के वह गंदे पन्ने, वही गंदी हरकतें,
गंदी शाहिदा आपा मेरे दिमाग
में जाले बुनते रहे।’’ ( पृष्ठ-28-29)

कालाजल’ ( 1965) से लेकर ‘सूखा बरगद’ ( 1986) तक ‘सेक्स इज सिन’ की मानसिकता और यौन नैतिकता संबंधी सामाजिक वातावरण और व्यक्तिगत
व्यवहार को देखें तो लगभग कोई महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई नहीं देता। यौन
शिक्षा-दीक्षा का एक मात्रा विकल्प ‘पोर्नोग्रापफी’ ही रह गया है, जो वास्तव में युवा पीढ़ी को सजग-सचेत करने की बजाए
यौन विकृतियों की ओर धकेलता है। पुरुषों की ‘भूखी और नोचती’ आंखों को पढ़ने-समझने और यौन हिंसा की शिकार स्त्रियों की पृष्ठभूमि
जानने के लिए ‘पोर्नोग्राफी’ के प्रभाव से परिणाम तक को
भी सूक्ष्मता से पढ़ना जरूरी है। ‘काला जल’ में शानी ‘पोर्नोग्रापफी’,
‘सेक्स एंड वायलेंस’ के तमाम अंतर्संबंधों को भी
समझने-समझाने की प्रक्रिया में पात्रों के चेतन-अवचेतन में जमी काई खुरच-खुरच कर
परखते हैं। इसके साथ-साथ सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक तनाव, दबाव और दमन के बीच,
बनते-बिगड़ते व्यक्तित्वों
और संबंधों के आपसी सूत्रों को भी पकड़ते हैं। आर्थिक रूप से पिछड़े बन्द समाजों (
रूढ़िग्रस्त, अंधविश्वासी और मर्यादित) में दमित और कुंठित
पुरुषों की हिंसा ( यौन हिंसा) का सबसे अधिक शिकार उनके अपने घर-परिवार की ही
स्त्रिायां (विशेषकर पत्नी या पुत्री) होती हैं, क्योंकि उनकी स्थिति ‘घरेलू गुलाम’ जैसी ही है। विकसित समाजों में स्त्री, घर में ही नहीं बाहर भी पुरुष हिंसा की संभावित शिकार बनी रहती है। ‘काला जल’ की तमाम स्त्रियां अपने ही घरों में असुरक्षित और
आतंकित रहती हैं। ‘फांसी घर’ में कैद सजायाफ्रता कैदी की
तरह भाग निकलने या बचने का कोई रास्ता नहीं।
‘आधा गांव’: ताजा-ताजा ( गर्म) गुड़ सी औरतें 
‘काला जल’ के कुछ ही समय बाद प्रकाशित ‘आधा गांव’ ( राही मासूम रजा) में स्त्री की तुलना ‘ताजा गुड़’, ‘लंगड़ा आम’ और ‘दहकती अंगीठी’ या ‘कच्चा अमरूद’ से की गई है, जो मूलतः सामंती शब्दावली है। स्त्री को दास, वस्तु या भोग्य समझने वाली मानसिकता के ही परिणाम है कि ‘दुलरिया बाईस-तेईस साल की कसी कसाई लड़की थी… वह जिधर से टोकरा लेकर
गुजर जाती, उधर रास्तों की शाखों में आंखों की हजार कलियां
खिल जाती, दरवाजे बांहें बन जाते और बंसखटो में नब्जें धड़कने
लगती।’ ( पृष्ठ-112) झंगटिया
बो की देह ‘काली मगर बला की खूबसूरत, सौंधी और मीठी थी। बिल्कुल
ताजा-ताजा गुड़ की तरह, जिसमें अभी भाप निकल रही हो।’ ( पृष्ठ-42) सैफुनिया नाइन की ‘लंगड़े आमों की तरह तैयार
छातियां बारीक कुरते के अंदर चोली से निकल पड़ रही थीं और सब्ज चूड़ीदार पाजामें का
सुर्ख नेफा और नेफे से उपर का सारा धड़ नजर आ रहा था’ ( पृष्ठ-135) इसके विपरीत जुलाहिन ‘कुलसुम में क्या रखा है? उसकी कसी कसाई कच्चे अमरूद जैसी छातियां लटक चुकी थी’ ( पृष्ठ-225) दुलरिया ( भंगन) है, तो झंगटिया बो ( चमारिन)।
कुलसुम ( जुलाहिन) है और सैफुनिया नाइन। मतलब
चारों निम्न जातियों की स्त्रियां हैं, जो अभिजात्य वर्ग के
पुरुषों के उपभोग के लिए उपलब्ध ही नहीं, बल्कि उनकी ही प्रतीक्षा
में ( ‘तैयार’) खड़ी हैं। एक ‘ताजा-ताजा
गुड़’ की तरह ‘अछूती’ और ‘गर्म’ है, तो दूसरी ‘लंगड़े आम की तरह तैयार’- भोगे जाने के लिए प्रस्तुत। तीसरी तो ‘दहकती अंगीठी से कम नहीं?
‘कच्चे अमरूद’ जैसी ( लटकी) छातियों में अब क्या रखा है? यह एक बड़ा अन्तर है ‘काला जल’ और ‘आधा गांव’ की भाषा, दृष्टि और मानसिकता में। ‘काला जल’ में ‘जल भीगी छातियां’ हैं, मगर स्त्री की ही हैं और छातियां हैं। आधा गांव’ की भाषा में तो वे ‘ताजा-ताजा ( गर्म) गुड़’ समझी जा रही हैं या ‘लंगड़े आम की तरह तैयार’ ( उपभोग के लिए आतुर) छातियां और ‘दहकती अंगीठी’ सी कामातुर औरत मानी जा रही है।

घर-परिवार और समाज में किसी भी विवाहित स्त्री का ‘बांझ’ होना सबसे
बड़ा ‘अभिशाप’ ( अपराध) है, भले ही पति नपुंसक हो। स्त्री जीवन की एकमात्र सार्थकता उसका मातृत्व ही माना-समझा जाता है। वह अगर पति को उत्तराधिकारी नहीं दे सकती या दे पाती, तो प्रायः सबके लिए अवांछित और बेकार का बोझ बन जाती है। अपमानजनक उपेक्षाओं और
अकल्पनीय सदमों से भीतर तक आहत और व्यथित, ऐसी स्त्री की मानसिक उथल-पुथल का अनुमान लगाना भी मुश्किल है।

 ‘काला जल’ की स्त्री ‘आधा गांव’ पहुंचते ही, एक यौन रूपक में बदल दी जाती है। स्त्री और देह के प्रति ऐसी रीतिकालीन, अपमानजनक भाषा-परिभाषा सचमुच शर्मनाक है। साहित्य के आधुनिक युग में भी नारी के उपभोग्या रूप का रस
ले-लेकर, कब तक चित्रण-वर्णन करते
रहेंगे? कब तक दोहराते रहेंगे आखिर ‘गोपी-पीन-पयोधर-मर्दन-चंचल
कर युगशाली’। क्या उन्हे अभी भी ‘पर्वत पृथ्वी के उरोजों-से दिखाई देते हैं? खैर… मुंह बोली बेटी को जवान होने पर अपनी पत्नी बना लिया है सुनार-बैद्य ने और पत्नी को घर से निकाल
दिया है लेकिन चरित्र पर हरदम संदेह करता रहता है। अपनी यौन
अक्षमता का गुस्सा, पत्नी पर निकालता है। पत्नी
जब कहती है ‘‘ऐसा ही है तो मुझे परदा में बैठा दे…
ताले में बंद रख। मेरा उठना-बैठना, चलना-फिरना, कहीं आना-जाना पाप हो गया। न मरने दे, न जीने’’ तो सुनार गाली-गलौच और मारपीट पर उतरता हुआ कहता है ‘‘जैसे तू तो सती सावित्री है। दिनभर दरवाजे के पास खड़ा होकर लौंडों को तो मैं ही ताकता हूं। छिनाल बना बहाने, दस बार
निकल-निकल कर देख अपने
यारों को और झोंक मेरी आंखों में धूल! जवानी एक तुझी पर ही
आई है! जब देखो, छाती उछालती, चटकती-मटकती चली जा रही है।
साली, किसी दिन तेरे ये दूध के काटकर न फेक दूं तो
कहना। न रहे बांस न बजे बांसुरी…’( पृष्ठ-12)

पति ( सुनार) को पत्नी ‘सती सावित्री’ जैसी चाहिए। ‘छिनाल’ का घर-परिवार में क्या काम! खुद जो मर्जी करे-कोई
कहने-सुनने वाला नहीं। पति है इसलिए मारना-पीटना या ‘दूध के काट कर’ फेंकने की धमकी देना, उसका ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ है। पत्नी
प्रतिवाद करती है, तो हथौड़ी (या डंडे) से मार-मार कर हड्डियां तोड़ दी जाती है। अंततः बीच
बचाव में अड़ोसी-पड़ोसी आते हैं, तो पति ‘जलती हुई आंखों’
से घूर कर चिल्लाता है-  ‘‘अरे, यहां क्या (‘तमाशा’) देखते हो। जाओ, अपनी-अपनी मां-बहनों की देखो…!’’ सब चुप। ‘किसी ने भी एक शब्द नहीं कहा’ – पीठ पीछे जितनी मर्जी ‘थुक्का-फज़ीहत’ होती रहे या औरतें कोसती
रहें ‘नासपीटा बुड्ढा आखिर बुरी मौत मरेगा। देह से
कोढ़-रोग न फू टे तो कहना…’ ( पृष्ठ-14) पति के पास सदियों से एक
तर्क यह भी तो रहा है कि मेरी पत्नी ( बीवी, घरवाली, संपत्ति) है… मैं मारूं. .. पीटूं या प्यार करूं, तुम बीच में बोलने-रोकने-टोकने वाले कौन ( क्या) होते हो? शेष समाज के लिए यह सब उनका
‘आपसी घरेलू मामला’ है या ये तो लड़-झगड़ कर फिर एक
हो जाएंगे, हम क्यूं बेकार ‘बुरे’ बने! भारतीय गांव-देहात से लेकर नगरों-महानगरों तक में, आज भी क्या ऐसी ही स्थिति नहीं बनी हुई है? पति के हाथों अधिकांश पत्नियां प्रायः रोज पिटती
या पीटी जाती हैं। कारण एक नहीं अनेक हैं। व्यक्तिगत कुंठाओं, असमर्थताओं, विवशताओं और असफलताओं से
लेकर पुरुष ( मर्द, मालिक, स्वामी, पति परमेश्वर) अहं तक। पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था में मर्द-औरत को अपने ‘पांव की जूती’ समझता ( रहा) है। जो नहीं समझता वो ‘साला, जोरू का गुलाम’ है ‘नामर्द’, ‘हिजड़ा’…।’ इस संदर्भ में शानी,
कलम का इस्तेमाल जूते की
तरह करते हैं।
औरत की मुट्ठी में भरी गीली मिट्टी 
चरित्र पर संदेह के कारण
आपसी झगड़े
में सुनारिन शारीरिक उत्पीड़न झेलती है, तो ज़हीरा भाभी मानसिक प्रताड़ना।
शायद इसी वजह से ‘स्वास्थ्य, चेहरा-मोहरा, पहनाव-उढ़ाव सब कहीं आश्चर्यजनक बदलाहट आ गई है। बात-बात में खिली रहने
वाली आंखों के नीचे स्याही पड़ गई है। और जो गाल हमेशा प्रसन्नता के मारे दहकते रहते थे, वे मुरझाये पत्ते की तरह अल्लर लगते हैं। न वे होंठ हैं, न होंठ में जमे रहने वाले पान…’’ ( पृष्ठ-129-130)
जहीरा भाभी के शब्दों में ‘‘शादी के दस बरस गुजार दिए, कभी कोई बात नहीं हुई, पर अब बीसियों तरह के नुक्स
निकालते हैं कि मोटी हूं,
बांझ हूं, बिला वजह चर्बी चढ़ाए जा रही हूं… पर मैं इनमें से किसी बात का
बुरा नहीं मानती, क्योंकि यह सच है कि मैंने उन्हें कुछ नहीं
दिया। जिसका सबसे अधिक सदमा मुझे है, वह यह कि जिन दिनों करना था, तब तो किया नहीं,
अब शक के मारे अंधे हो रहे हैं।
बाहर निकल जाने का बहाना करते हैं और कहीं पास-पड़ोस में छिप कर देखते रहते हैं कि मैं
क्या करती हूं। दौरे की बात कह कर चले जाएंगे और अचानक आधी रात को आकर धीरे-धीरे दरवाजा
खटखटाएंगे या इशारा करने के ढंग पर सीटियां बजाएंगे… ऐसे में क्या मन होता है, बताउ? यह कि बिना किए ही इल्जाम पाने से तो करके बदनाम होना ज्यादा
अच्छा है। एक बेचारी रशीदा थी।’’ ( पृष्ठ-132)

घर-परिवार और समाज में किसी
भी विवाहित
स्त्री का ‘बांझ’ होना सबसे बड़ा ‘अभिशाप’ ( अपराध) है, भले ही पति नपुंसक हो। स्त्री जीवन की एकमात्र सार्थकता उसका
मातृत्व ही माना-समझा जाता है। वह अगर पति को उत्तराधिकारी या पुत्राधिकारी नहीं दे सकती या दे पाती, तो प्रायः सबके लिए अवांछित और बेकार का बोझ बन जाती है।
अपमानजनक उपेक्षाओं और अकल्पनीय सदमों से भीतर तक आहत और व्यथित, ऐसी स्त्राी की मानसिक उथल-पुथल का अनुमान लगाना भी मुश्किल है। जहीरा
भाभी का यह कहना कि ‘बिना किये ही इल्जाम पाने से तो करके बदनाम होना ज्यादा अच्छा है।’ दरअसल एक निर्दोष – दंडित व्यक्ति की प्रतिक्रिया है, जो अंततः प्रतिशोध स्वरूप आत्मघाती भी हो सकती है और हिंसक भी।

जब जहीरा भाभी को घूरते हुए
रूखाई से
बी. दरोगिन कहती है ‘‘तुम्हें भी क्या घर में
काम-धंधा नहीं है? बैठ गई तो घंटों बैठ गई।’’ तब जहीरा भाभी का चेहरा ‘अपमान और क्रोध के मारे’ तमतमा जाता है। लेकिन ‘हंसकर’ कोई ‘मीठा सा’ जवाब देते हुए
 ‘गर्दन झुकाकर’ बाहर चली जाती है। मगर जाहिरा ‘अपमान और क्रोध’ को कब तक झूठी हंसी से
दबाती रहेगी? एक न एक दिन ‘अपमान और क्रोध’ का ऐसा विस्पफोट होगा कि सब
देखते रह जाएंगे। कब, कहां और कैसे होगा – कहना कठिन है। जहीरा भाभी के अतिसंवेदनशील
मन और दमित व्यक्तित्व को सहानुभूतिपूर्वक समझते हुए ही, उसकी व्यथा-कथा और वेदना को सही परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जा सकता है। शानी अपने
पात्रों के दुःख-दर्द को जितनी हमदर्दी से पढ़ते-समझते हैं, उतनी ही बेचैनी और पीड़ा से अभिव्यक्त भी करते हैं। कभी शब्दों में, कभी संकेतों में और कभी अलिखित मौन में। उदास-निराश-हताश चेहरों का
इतिहास जानने-पहचानने की तकलीफदेह प्रक्रिया से गुजरते हुए लेखक, स्वयं अपने को और अपने समय और समाज को
तलाशने-तराशने का बीड़ा उठाता है। स्त्री
पात्रों के प्रति सहानुभूति ही नहीं बल्कि गहरा स्नेह और सम्मान भी साफ झलकता है।
पुरुष मानसिकता में रची-बसी
मांसलता
से मुक्त हुए बिना ‘कालाजल’ का सृजन असंभव है। गहरे सरोकार
और संस्कार के बिना,
स्त्री संसार का सन्नाटा और सूनापन महसूस ही
नहीं किया जा सकता। नारी जीवन की विडम्बना और सामाजिक संरचना के पूरे
ताने-बाने को उधेड़ते हुए जहीरा भाभी एक जगह कहती हैं, ‘‘कभी-कभी मैं सोचती हूं कि हम लोगों की जिन्दगी
का कितना हिस्सा धोखे-धोखे में ही निकल जाता है! शायद इतना ही
देखकर हम लोग संतोषपूर्वक आंखें मूंद लेती हैं कि हथेलियां खाली नहीं हैं, जबकि कई बार उनमें गीली मिट्टी भरी होती है। ऐसी
गीली मिट्टी जिसे मुट्ठी में बंद करके रखना कभी संभव नहीं होता। पकड़ने के लिए उसे जितना ही
दबाओ, उतनी ही वह पकड़ के बाहर होती जाती है।’’ ( पृष्ठ-131) पारिवारिक ही नहीं बल्कि अन्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में भी देखें तो यह बात एकदम सही लगती है कि
स्त्रियों की मुट्ठी में सिर्फ गीली मिट्टी की तरह भरे हैं – तमाम मौलिक अधिकार, जीने की आजादी और मुक्ति के सपने। जहीरा भाभी के समानान्तर ही
याद आती है ‘चारों ओर से निपट अकेली और अभागिन
बिलासपुर वाली’ जिसे मिर्जा करामतबेग के लिए बी दारोगिन स्वयं ही
बिलासपुर से किसी मुस्लिम खानदान से ब्याह लायी थी। लेकिन ‘बिलासपुर वाली दो बार मां बनी, पर ऐसे नसीब कि दोनों बार गोद
सूनी हो गई और सारे आंगन में बीदारोगिन का बेटा रोशन ही अंत तक खेलता रहा।’’ ( पृष्ठ-38) मिर्जा साहब की मृत्यु के
बाद ‘बी. दारोगिन ने अपनी सौत को इतना परेशान किया कि वह घर
छोड़कर चली गई।’ ( पृष्ठ-43) 

यह जानते-समझते हुए कि ‘किसके मां-बाप आज के जमाने
में जवान बेटी को जिन्दगी-भर
पालते हैं।’ ( पृष्ठ-43) पूछो तो बी दारोगिन हंसती है ‘‘जवान औरत है, कब तक मिर्जा के नाम की माला जपती बैठी रहेगी?’’ ( पृष्ठ-45) निसंतान विधवा का ससुराल
में क्या हक? यहां तो पुत्रवती सौत भी मौजूद है। मायके में
‘जिन्दगी भर’ पालेगा कौन? सच यह भी तो है कि ‘बेटी के मां-बाप तो उसी दिन
मर जाते हैं, जिस दिन डोले में बैठकर निकल आती है…’ ( पृष्ठ-103) हिन्दू हो या मुस्लिम क्या फर्क पड़ता है!
हिन्दू समाज में तो विधवा (विशेषकर निःसंतान) के लिए ‘सती’ से लेकर वृंदावन के विधवा आश्रमों तक का पुख्ता प्रबंध किया ही गया
है। ऐसे में जहीरा भाभी या बिलासपुर वाली का भविष्य बताने के लिए किसी ‘ज्योतिषाचार्य’ की जरूरत नहीं। हर कोई जानता है कि निःसंतान (विधवा) स्त्री की नांव कब, कहां, कैसे ‘डूब’ जाएगी! और लाश तक बरामद नहीं होगी – गिद्ध-चील नोच
खायेंगे।

बेटियों से बलात्कारसुनारिन मुंहबोली बेटी है, जिसे सुनार पत्नी बना लेता है और मालती भी रज्जू मियां के यहां
बेटी की तरह ही पली-बढ़ी है। लेकिन जवान होने पर मालती रज्जू मियां की
हवस का शिकार बनती है। गर्भवती होने का भेद खुलता है तो बी. दारोगिन उसकी जम कर पिटाई
करती है और उसी शाम मालती घर से निकल (निकाल दी) जाती है। बचपन में ही मालती की मां
किसी के साथ भाग गई थी और बच्ची को रज्जू मियां अपने घर ले आए थे। बी.
दारोगिन ने भी खुश होकर कहा था ‘अच्छा किया, जो ले आए। जाने बेचारी
किसके हाथ पड़ जाती और उसकी क्या दुर्गति होती!’ ( पृष्ठ-118) रज्जू मियां के हाथों पड़कर भी क्या ‘दुर्गति’ नहीं हुई। मालती जैसी ‘रूपवती, स्वस्थ-साफ और धुली दूब-सी
निखरी-निखरी और हंसमुख’ जवान लड़की पर रज्जू मियां की ‘लार टपकी पड़ रही थी’ – न जाने कब से। उपर से ‘बेचारी सीधी-सादी अनाथ सी लड़की’ एक दिन दोपहर में फूफी ने देखा था ‘रज्जू मियां के कमरे की चौखट पर भीतर से निकलकर
मालती हांफती सी खड़ी है। नहीं, वह खड़े होना न था, या तो एक पल के लिए ठहरकर इसे साहित्य सृजन की ‘शालीनता’ कहें या ‘बोल्डनेस’ का अभाव? पूरे उपन्यास में लेखक ( तमाम गुंजाइशों
के बावजूद) शब्द संयम बनाए-बचाए रहते हैं। लगता है जैसे किसी मामले की गहरी जांच-पड़ताल के दौरान, तमाम गवाहों के बयान दर्ज करते चले गए
हों और ‘चार्जशीट’ तैयार (या दायर) करने की जिम्मेदारी पाठकों पर
छोड़ दी हो। हर तथ्य-सत्य को दर्ज करते हैं – सूत्र-दर-सूत्र मिला कर
पढ़ने-समझने का उत्तरदायित्व आप पर है। सुस्ताहट की सांस भरना या गलत जगह देखे और पकड़े
जाने की अचकचाहट थी।’ ( पृष्ठ-124) 

एक दिन
फिर रज्जू मियां के कमरे
में सफाई करते समय फूफी ने देखा था ‘ट्रंक के किनारे एक उतरा हुआ पेटीकोट ऐसे गोल पड़ा है
जैसे कमर के नीचे सरकाकर किसी ने अपने पांव हटा लिए हों… बी. पेटीकोट
पहनती नहीं… कुछ दिन पहले जिस पेटीकोट को उन्होंने मालती को पहनते हुए देखा था वह हू-ब-हू ऐसा ही
था – यही सफेद रंग, रेशमी धागे से कढ़े हुए, अनसधे हाथों के फूल-पांख और क्रोशिये के काम वाला निचला बार्डर…’ ( पृष्ठ-123) फूफी को ‘एकाएक रशीदा की याद आ गई’ और ‘बिल्कुल न सोचने के लिए अपने सिर को झटककर बिस्तर की ओर बढ़ गई।’ ( पृष्ठ-123-124) रज्जू मियां और मालती के
बीच देह संबंधों को शानी ऐसी ही सांकेतिक भाषा में उजागर करते हैं।

जब मालती का ‘जूड़ा टेढ़ा होकर बेलमोगरा की सजधज को खोल देता और फूलों की एक भीनी-सी गंध फूफी तक सरक
जाती’ तो उन्हें याद आता कि ‘ससुर ( रज्जू मियां) के बिस्तर समेटने-धरने के
दौरान, सिरहाने से जो कुछ चीजें गिरी थीं, उनमें अधजली बीड़ियों, दियासलाई की तीलियों और खपरैल से गिरे
कचरे के साथ बेलमोगरा के कुछ बासी और सूखे फूल भी थे।’ ( पृष्ठ-125) मालती के जूड़े में ‘बेलमोगरा के कुछ बासी और सूखे फूलों’ के बीच ही कथा के महत्वपूर्ण सूत्र, कड़ियां और अर्थ मौजूद हैं।
फूफी की पारिवारिक स्थिति ऐसी है कि वह इस बारे में कुछ भी सोचना तक नहीं चाहती। 

जब मालती ‘नाली के पास बैठकर कै करने लगी’ तो फूफी ‘फटी-फटी आंखों से खिड़की के बाहर ताकने लगी’, रज्जू मियां ‘उल्टी की आवाज से बुरी तरह चौके और सफेद होते चेहरे से उन्होंने मालती की ओर देखा’ और बी ‘जहां की तहां ऐसे रूक गई जैसे काठ मार गया हो’। ( पृष्ठ-125) मालती ‘असहाय-सी ताकती हुई हांफती रही’। चेहरा घुटनों में धंसाकर छिपा लिया। फूफी ने फंसे गले से सिर्फ
इतना कहा ‘यह क्या कर लिया तूने, हरामजादी?’ और उसके पास बैठ गई। दोपहर
में बी. दारोगिन मालती को मारते-पीटते हुए चीखती चिल्लाती रही ‘मैं तेरा गला घोंट दूंगी, हरामजादी! रण्डी, बाजारू, किससे पेट भराया है…’ मालती बंद कमरे में घंटों पिटती रही, कराहती रही लेकिन जबान नहीं खोली। बी ने अंततः टूटे स्वर में कहा ‘‘हम तो तेरे भले के लिए कह रहे थे, नहीं समझती तो भाड़ में जा
लेकिन रोशन के आने से पहले यहां से अपनी मनहूस सूरत जरूर हटा लेना। वह कहीं देख-सुन ले तो तेरी
जान ले लेगा…’’ ( पृष्ठ-126) उसी शाम मालती घर से चली गई।
बिलासपुर वाली की तरह मालती भी न जाने कहां गई ? क्या हुआ?? किसे पडी थी पता करने की! ‘रतिनाथ की चाची’
( नागार्जुन, 1949) में विधवा गौरी अपने विधुर देवर जयनाथ की कामवासना का शिकार होकर
गर्भवती हो जाती है और गांव का सारा समाज उसका बहिष्कार करता है। बेटा उमानाथ उसे पीटता है, परन्तु गौरी मरने तक जयनाथ का नाम नहीं बताती।

भले ही घंटों पिटने पर भी
मालती ने
कोई नाम न लिया- बताया हो मगर बी. दारोगिन भी सच जानती समझती है।
बाद में एक दिन बायें हाथ को हंसिया चलाने की तरह चमकाकर कहती हैं (रज्जू मियां से) ‘‘अब तुम मेरी जबान न खुलवाओ, वरना तुम्हारी सारी शराफत यहीं
खोलकर रख दूंगी और कोई भी आए-जाए, तुम्हें तांक-झांक करने की
क्या जरूरत? यही है शराफत! कहे देती हूं, मुझसे तुम्हारा कुछ भी छिपा नहीं, राई-रत्ती हाल जानती हूं। अरे, शराफत होती तो उसी दिन चुल्लूभर पानी में डूब मरे होते जिस दिन…’’ ( पृष्ठ-133) शानी जी नहीं बताते किस दिन (?) मगर अगले ही क्षण दर्ज करते हैं ‘‘उस रात एक क्षण के लिए भी रशीदा का
चेहरा फू फी की आंखों से नहीं हटा. .. मालती का फर्श पर लोटता शरीर… जिसके पास बेलमोगरा के सूखे फू ल पड़े हैं।’’ ( पृष्ठ-133) और साफ है कि अकेले रज्जू मियां कटघरे में खड़े हैं।
तमाम गवाह और सबूत उनके खिलाफ हैं। सचमुच शानी एक बेजोड़ कथा शिल्पी हैं और शिल्प एकदम अनूठा। रज्जू मियां का बयान
‘‘माफी मांग सकूं, ऐसा मुंह भी अब मेरे पास नहीं है।’’ ( पृष्ठ-134) संदेह के सारे पर्दे हटा देता है। 


जीते-जी कब्र में पड़ी रशीदा
सुनारिन और मालती की ही तरह
रशीदा अपने चाचा की यौन कुंठाओं और विकृतियों की संतुष्टि का ‘सुख साधन’ बनने को विवश होती है। मगर एक रात अपने शरीर पर किरासिन
तेल छिड़ककर जल मरती है। ‘‘रशीदा बेचारी का बाप नहीं
रह गया, चाचा के पास रहती है। लेकिन
चाचा खुद दोजख का कीड़ा है। उसकी शादी-ब्याह करता नहीं, बेचारी कुंआरी ही बूढ़ी हो रही है। जो भी पैगाम लेकर पहुंचता
है, उसे गाली-गलौच करके निकाल देता है। सारी बिरादरी में
मशहूर कर रखा है कि मुनासिब लड़के मिलते नहीं, लेकिन हकीकत कुछ और है –
ऐसी कि मुंह पर आते ही जबान कट कर गिर जानी चाहिए… इन्सान होकर ऐसी
क्या नियत कि सगी बेटी का रिश्ता भुला दिया जाए? आदमी और जानवर में आखिर फर्क क्या हुआ?’’ ( पृष्ठ-109-110) रशीदा रो-रोकर बताती है ‘‘जीते-जी कब्र में पड़ी हूं’’ और सुनने वाले खीझते हुए सलाह देते हैं ‘‘कब तक ऐसी गुनाह की जिन्दगी को ढोती फिरेगी, नदी-तालाब तो नहीं सूखे, जहर तो दुनिया से उठ नहीं गया?’’… रशीदा देखने में लंबी और दुबली। ‘‘आंखें बड़ी-बड़ी और सुन्दर थी लेकिन उनमें आकर्षण का सिरे से अभाव था। बाल
छोटे-छोटे, सीना मर्दों की तरह सपाट और
चेहरे की बनावट में बीमारियत… सचमुच उसे कुंआरी कौन कहेगा?… बिल्कुल निर्विकार और भावहीन चेहरा, जैसे झाड़ की छाया में पड़ा, मरा हुआ पत्ता…’’
( पृष्ठ-108) 

जहीरा भाभी का फूफी के सामने बयान है ‘उस हादसे से एक हफता पहले मेरे पास आई
थी… उस दिन भी बड़ी देर तक रोती रही कि उसे मौत नहीं आती। घंटों बैठकर मुझे रोज-ब-रोज
का हाल सुनाती रही और अपना सारा जिस्म खोलकर दिखाया। …घुटनों से लेकर गले तक, जगह-जगह उसने अपने शरीर को आग से भून डाला था। ( इस तरह जल-भुनकर शायद वह समझ रही थी कि खुदा उसके गुनाहों को माफ कर देगा)
कहने लगी- मैं चाहती हूं कि मेरा जिस्म बदसूरत हो जाए – इतना
बदसूरत कि उसमें हाथ तक न लगाया जा सके। मैंने रोकर कहा कि रशीदा, यह तूने क्या कर लिया? बोली – जीते जी दोजख भोग रही हूं।’’ ( पृष्ठ-130) जब से रशीदा मरी है जहीरा
भाभी को बिल्कुल चैन नहीं। ‘‘रात को ठीक से नींद नहीं आती। अंधेरा होते
ही अजीब बेचैनी और घबराहट शुरू हो जाती है। कहीं थोड़ी देर के लिए आंख
लगती है, तो रशीदा को ही सपने में देखती है।’’ ( पृष्ठ-131) फूफी के बयान में लिखा है ‘‘भाभी ने रशीदा के जीवन-काल में उसे आत्महत्या करके गुनाही की जिन्दगी खत्म
करने की सैकड़ों बार सलाह दी थी। वह चाहे भावावेश में हो अथवा क्रोध में आकर संवेदना के कारण और (मगर)
आज जब रशीदा सचमुच वह सब कर गई, तो भाभी भीतर से भीरू और
अपराधी बन गई हैं।’’ ( पृष्ठ-131) ऐसे में
जहीरा भाभी का अपराधबोध स्वाभाविक ही लगता है। 

सुनारिन, मालती और रशीदा के यौन-शोषण
की
व्यथा कथा का कोई अन्त नहीं। चालीस-पचास साल बाद के तथाकथित आजाद देश और सभ्य समाज में
भी यौन हिंसा के आंकड़े लगातार बढ़ते ही गये हैं। अधिकांश मामलों में युवतियों से
बलात्कार उनके अपने ही पिता, भाई, चाचा, ताउफ, मामा, जीजा या निकट संबंधी और पड़ोसी द्वारा किये जाते
(रहे) हैं। तब अपराधों को घर के आंगन में ही गड्ढा खोद कर दबा दिया जाता था, अब कुछ मामले ( 20-25 प्रतिशत) पुलिस स्टेशन से कोर्ट-कचहरी तक भी पहुंच जाते हैं और लगभग 96 प्रतिशत बलात्कारी और हत्यारे बाइज्जत बरी हो जाते हैं या ‘संदेह का लाभ’ पाकर छूट जाते हैं। स्त्रियां न घर में सुरक्षित हैं और न
बाहर। सबसे अधिक हिंसक और असुरक्षित है – देश की
राजधानी दिल्ली – नई दिल्ली।

इसके बावजूद एक सिद्ध-प्रसिद्ध-वयोवृद्ध ( कथाकार-
सम्पादक-विचारक) का कहना-मानना है ‘‘दुनिया की हर खूबसूरत लड़की चाहती है कि
उसके साथ ‘रेप’ हो… ‘रेप’ का आधा मजा तो वह लोगों की भूखी निगाहों और तारीफ के फिकरों में लेती
ही है। डरती वह उस घटना से नहीं है बल्कि उसके तो सपने देखती है। वह
डरती है उस घटना को दूर खड़े होकर देखने वालों की आंखों से, तमाशबीनों से।’’ रशीदा के चाचा-ताउफ अभी भी ‘जिन्दा’ हैं। तसलीमा नसरीन ने ‘मेरे बचपन के दिन’ में लिखा है कि बचपन में उसका यौन शोषण उसके शराफ
मामा और अमान चाचा ने ही किया था।
क्रमशः 

झाँकती है देह आँखों के पार और अन्य कविताएं

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सुजाता

लेखिका, आलोचक.चोखेरवाली ब्लॉग की संचालक, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर,श्यामलाल कॉलेज,दिल्ली वि वि. संपर्क : ई-मेल : sujatatewatia@gmail.com

झाँकती है देह आँखों के पार

और इस दूसरे जाम के बाद मुझे कहना है
कि दुनिया एकदम हसीन नहीं है तुम्हारे बिना
हम तितलियों वाले बाग में खाए हुए फलों का हिसाब
तीसरे जाम के बाद कर ज़रूर कर लेंगे…

हलकी हो गई हूँ सम्भालना …
मौत का कुँआ है दिमाग,बातें सरकस
बच्चे झांक रहे हैं खिलखिलाते
एक आदमी लगाता है चक्कर लगातार
धम्म से गिरती है फर्श पे मीना कुमारी
‘न जाओ सैंया…कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूंगी…’
और सुनो –
जाना, तो बंद मत करना दरवाज़ा।
आना , तो खटखटा लेना ।

मौत के कुएँ पे लटके ,हंसते हुए
बच्चे ने उछाल दिया है कंकड़
आँखें मधुमक्खियाँ हो गई हैं
आँखें कंकड़ हो गई हैं
आँखें हो गई हैं बच्चा
आँखें हंसने लगी हैं
झाँक रही हैं आँखें
अपने भीतर !

बच्चे काट रहे हैं कागज़ कैसे आकारों में
कि औरतों की लड़ी बन जाती है मानो
दुख के हाथों से बंधी एक-से चेहरों वाली
एक- सी देह से बनी
झाँकती है देह आँखों के पार !

अरे …देखो ! उड़ गई मधुक्खियाँ शहद छोड़
जीने की लड़ाई में मौत का हथियार लेकर

आँसू कुँआ हैं, भर जाता है तो
डूब जाती है आवाज़ तुम्हारी
सूखता है तो पाताल तक गहरा अंधेरा !

बहुत हुआ !
तुम फेंकते हो झटके-से बालटी डोरी से बंधी
भर लेते हो लबलबाता हुआ ,उलीचते हो
रह जाती हूँ भीतर फिर भी उससे ज़्यादा

उफ़ ! दिमाग है कि रात की सड़क सुनसान
जिन्हें कुफ्र है दिन में निकलना
वे दौड़ रहे हैं खयाल बेखटके

इंतज़ार रात का
इंतज़ार सुबह का

बहती है नींद अंतरिक्ष में, आवारा होकर
भटकती है शहरज़ाद प्यार के लिए
अनंत अंधेरों में करोड़ों सूर्यों के बीच
ठण्डे निर्वात में होगी एक धरती
हज़ारों कहानियों के पार !

एक अबबील उड़ी
दो अबाबील उड़ीं
तीन अबाबील उड़ीं
चार…
पाँच…
सारी
फुर्र !

पुर ते निकसीं रघुवीर वधू

बेमतलब -सी बात की तरह होती है सुबह
नीम के पेड़ पर कमबख्त कोयल बोलती ही जाती है
उसे कोई उम्मीद बची होगी

सारी दोपहरें आसमान पर जा चिपकी हैं आज, उनकी अकड़ !
एक शाम उतरती है पहाड़ से और बैठ जाती है पाँव लटका कर, ज़िद्दी बच्ची !
ढलने से पहले झाँकना चाहता है नदी में कहीं कोई सूरज
सिंदूरी रेखा खिंचती है
जैसे छठ पूजती स्त्रियों की भरी हुई मांग
पूरा डूबा है मन आज
आधी डूबी हैं मछलियाँ
मल्लाह पुकारता है – हे हो !
आज और गहरे जाएंगे पानी में …

यह लौटने का समय है
समय…प्रतीक्षाओं की लय …

झूठ बोलकर खेलने चले गए बच्चे पहाड़ी के पीछे
तितलियाँ साक्षी हैं उनके झूठ की
अभी साथ में करेंगे धप्पा और चांद को आना पड़ेगा बाहर मुँह लटकाये
ये देखो आज शिकारी छिपा है आसमान में , एक योगी भी है
छिप-छिप के रह-रह टिमकते तारे …चोर हैं चालीस
कहानियों की सिम-सिम …नींद का खज़ाना…लो…सो गए…

अब सब काम निबट गए
पाँव नंगे हैं मेरे
बच्चों ने छिपा दी होगी…
या रख दी होगी मैंने ही कहीं
मेरे नाप की कोई चप्पल नहीं है भैया ?
– आपको कुछ पसंद ही नहीं आता
ह्म्म…

सपनों के लिए बुलाया गया है आज मुझे कोर्ट…
अचानक लगता है खो गई हूँ
यहाँ वह पेड़ भी नहीं है बरगद का चबूतरे वाला
किसी हत्या के भी निशान नहीं हैं मिट्टी पर
चौकीदार कहता है –
पूजा करनी होगी आपको , गलत गेट से आ गई हैं आप, दूसरी तरफ है बरगद , सही-सलामत ।

एक प्रेम को भर देना चाहती थी आश्वासनों से ,मीलॉर्ड !
फुसफुसाता है कोई- झूठ !

शब्दकोश से मेरे गायब हो रहे हैं शब्द जजसाहब –
गड्ढे बन गए हैं जहाँ से उखड़े हैं वे…मैं गिरती हूँ रोज़ किसी गड्ढे में
फुसफुसाता है कोई- झूठ !

मैं धरती से बहिष्कृत थी…
कोई बोला- झूठ !

मैं कविता लिखती थी …मैंने लिखा था सब …ये देखिए
मेरी ही हस्तलिपि है…मेरी..
वह छीनते काग़ज़ उठ खड़ा हुआ है- झूठ !

मैं तब भी थी …अनाम…मैं भटक रही थी अँधेरी गुफाओं में
चलती रही हूँ रात-रात भर …दिन भर स्थिर …
बड़बड़ाती रही हूँ नींदों में …दिन भर  मौन …

मीलॉर्ड ! मुझे सुना नहीं गया मेरे क़ातिलों को सुनने से पहले
वह चिल्ला पड़ा है – चुप्प् प !!

आप पर अनुशासनहीनता का आरोप है
अदालत की तौहीन है …

होती हूँ नज़रबंद आज से …अपने शब्दों में …कानो में गूंजता है – झूठ है !
होती हूँ मिट्टी …हवा…आँसू …

मुझे उनके जागने से पहले पहुँचना है
चीखता है ऑटो वाला- हे हो !
मरने का इरादा है क्या !

डरती हूँ , डरता है मुझसे डर भी

सामने खाई है और मैं
खड़ी हूँ पहाड़ के सिरे पर
किसी ने कहा था
-‘शापित है रास्ता

पीछे मुड़ कर न देखना
अनसुनी करना पीपल की सरसराहट
किस दिशा को हैं
देखना पाँव उसके   जो रोती है अकेली इतना महीन
कि पिछली सदियों तक जाती है आवाज़
दर्द यह माइग्रेन नहीं है
उठा लाई हूँ इसे अंधेरे की पोटली में बाँध
वहीं से
बच्चों के चुभलाए टुकड़े  टूटे हुए वाक्य गीले बिछौने
सारे टोटके बांध लाई हूँ

सम्बोधन तलाशती हूँ
मुँह खोलते अँट जाती है खुरचन पात्र में
मेरे स्वामी
प्रभु मेरे !
मुट्ठी में फंसे मोर पंखों की झपाझप सर पर…

नहीं,खाई में कूदना ही होगा
तो मुड़ ही लूँ एक बार ?
नहीं दिखते दूर- दूर भी
पिता
माँ
बहन
साथी

देखती हूँ अपने ही पाँव उलटे !