एक सपने की मौत/अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षा संस्थानों में प्रतिभावान दलितों की आत्महत्या

सुधा अरोड़ा
सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई - 400 076 फोन - 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.
(समय बहुत बदला नहीं है. दलित विद्यार्थियों की सांस्थानिक ह्त्या अकादमिक जगत पर ह्रदयहीन क्रूर वर्चस्व के परिणाम हैं - द्रोणाचार्य की अमरता के परिणाम . इसका सिलसिला अकादमिक जगत में दलित -पिछड़े विद्यार्थियों की पहली पीढी के आने के साथ ही शुरू हो गया था , जब ऊंची जातियों और  उच्च वर्ग के लिए ' आरक्षित स्पेस' में उनकी इंट्री हुई थी . रोहित वेमुला की 'आत्महत्या' उसकी ही नवीनतम कड़ी है . यद्यपि सुधा अरोड़ा के 23 साल पुराने इस लेख में आई .आई टी की छात्रा की आत्महत्या की स्थितियां वही नहीं हैं, जो रोहित की आत्महत्या की हैं. लेकिन यह आलेख यह बताता जरूर है कि अकादमिक संस्थान अपने ठस्स पोजीशन से एक कदम आगे चलने के लिए तैयार नहीं . वंचित तबके से आने वाले विद्यार्थियों ने जब अपनी काबिलियत के बल पर द्रोणाचार्यों के 'अंगूठा -अभियान' से जूझते हुए,  विपरीत परिस्थितियों में भी अपने को सिद्ध करना शुरू किया तो यह ह्रदयहीन व्यवस्था उनके प्रति और क्रूर होती गई.  चंद्राणी हालदार  से लेकर रोहित वेमुला की आत्महत्या का निरंतर सिलसिला यही बयान करता है .)

यह पहली बार नहीं है और न आखिरी बार कि किसी अनुसूचित जाति के तबके की पहली पीढ़ी, अपनी मेहनत और लगन से, इन अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षा संस्थानों में, तकनीकी विज्ञान की स्नातक पढ़ाई तक प्रवेश पाने में सफल होने की ऊंचाई पर पहुंची, लेकिन सहपाठियों के एलीट वर्ग ने और व्यवस्था के तयशुदा हथकंडों ने उनकी विलक्षण प्रतिभा और कला का गला घोट कर उन्हें अपने सुनहरे भविष्य का अंत करने पर मजबूर किया.

इस तरह की आत्महत्या के मामले हर साल इस संस्थान में घटित होते हैं, पर न व्यवस्था का शिकंजा ढीला होता है, न आरक्षित सीट के तहत प्रवेश परीक्षा के नियम बदलते हैं, न सहपाठियों का उपेक्षा का नज़रिया बदलता है, न माता-पिता समय रहते चेतते हैं. हर साल एक नये दलित परिवार का होनहार, प्रतिभावान छात्र इस मकड़जाल में फंसकर अपने सपनों का मोहभंग होते देख अपनी ज़िन्दगी से हाथ घो बैठता है और शैक्षणिक संस्थान के आकाओं के कानों पर जूं नहीं रेंगती.


6 फरवरी 1993 को भारत के अग्रणी तकनीकी शिक्षा संस्थान आई. आई. टी. पवई, बम्बई के छात्रावास नं 10 में द्वितीय वर्ष की उन्नीस वर्षीय छात्रा चंद्राणी हालदार ने शाम साढ़े आठ बजे अपने कमरे में भीतर से सांकल चढ़ाकर आत्महत्या कर ली.


उस वक्त पहले माले के उस विंग में कोई अन्य लड़की उपस्थित नहीं थी. कुछ लड़कियां कैन्टीन में थी और अधिकांश छुट्टी का दिन होने के कारण अपने स्थानीय अभिभावकों के घर थीं. आग की लपटें और धुंआ देखकर छात्रावास में खलबली मची. बंद दरवाजे में से किसी के चिंघाड़ने की आवाज़ें आ रही थीं. दरवाज़ा तोड़कर आग बुझाई गई लेकिन तबतक चंद्राणी का शरीर बुरी तरह झुलस चुका था. घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल में उसे मृत घोषित किया गया.

चंद्राणी हालदार विशेष इंजीनियरिंग फ़िजिक्स की छात्रा थी. यह विषय अच्छे प्रतिशत से प्रवेश परीक्षा पास करनेवाले,सभी क्षेत्रों से आनेवाले मेधावी छात्रों में से भी, सिर्फ 2 या 3 प्रतिशत छात्रों को ही मिलता है.

आई. आई. टी. में प्रवेश का समान अवसर देने के लिये एस सी, एस टी की दो चार सीटों के आरक्षण में पिछले दो वर्षों से प्रादेशिक भाषा में भी प्रवेश परीक्षा देने का प्रावधान रखा गया है. चंद्राणी हालदार ने शुरु से बांग्ला माध्यम से अपनी पढ़ाई पूरी की थी, इसलिए आई. आई. टी. की प्रवेश परीक्षा भी बांग्ला माध्यम से लिखकर पास करना उसके लिए टेढ़ा काम नहीं था. बचपन से ही वह बहुत मेधावी और प्रतिभावान छात्रा थी. लेकिन अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना उसके लिये एक बड़ी बाधा थी जिसके कारण छात्रावास की अपनी दूसरी सहपाठिनों से वह बातचीत नहीं कर पाती थी. इसी के तहत पहले साल में उसके अच्छे अंक नहीं आये थे और दूसरे साल भी वह पिछले साल के कुछ पेपर दुबारा दे रही थी.

दो दिन पहले ही उसे पता चला था कि संभवत: इस बार भी उसके अंक अच्छे नहीं आये हैं. संस्थान के नियमों के मुताबिक दो वर्ष लगातार औसत अंक न आने से छात्र को संस्थान छोड़ना पड़ता है, चंद्राणी को इस आशय का 'चेतावनी पत्र' मिल चुका था.

शनिवार (6 फरवरी 1993) के दिन शाम को, चंद्राणी ने दूरदर्शन की फ़िल्म 'आसपास' शुरू से आखिर तक देखी. इस फ़िल्म में हेमामालिनी अंत में खुदकुशी कर लेती है. साढ़े आठ बजे फ़िल्म ख़त्म होने पर वह सीधी अपने कमरे में गयी और निराशा और कुंठा की चरम आत्महंता मन:स्थिति में अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय ले लिया.

चंद्राणी हालदार अपनी मातृभाषा बांग्ला में कविताएं लिखती थी, एक बहुत अच्छी चित्रकार भी थी और पेन्टिंग के ब्रश धोने के लिये अपने कमरे में डालडा के टिन में केरोसिन तेल रखती थी, जिसका इस्तेमाल उसने अपने जीवन का अन्त करने के लिये किया.

देश के नामी प्रतिष्ठित संस्थानों में आत्महत्या की यह घटना पहली नहीं है. अहमदाबाद के मैनेजमेंट के सुप्रतिष्ठित संस्थान इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट में भी इस तरह के मामले सुनने में आये है. आत्महत्या करनेवाले छात्रों के मानसिक असंतुलन या व्यक्तिगत समस्याओं (पारिवारिक कलह, तनाव, असुरक्षा या असफल प्रेमप्रकरण) को जिम्मेदार ठहराकर इन मामलों को खारिज कर दिया जाता है और इस तरह की ख़बरें अख़बार के तीसरे या पांचवे पन्ने के एक छोटे से कॉलम तक सीमित रहकर ख़त्म हो जाती हैं.

चंद्राणी हालदार निम्न मध्यवर्ग की अनुसूचित जाति से थी. उसके पिता, जो रेलवे स्टाफ में हैं, खडगपुर से सोमवार को बम्बई पहुंचे. चंद्राणी की मां, जो ट्रेन से आ रही थी और ट्रेन अठारह- बीस घंटे लेट थी, मंगलवार की रात को ही बम्बई पहुंच पाई. बुधवार की दुपहर को ही चंद्राणी का दाह - संस्कार किया जा सका. इलेक्ट्रिक क्रेमोटरियम में चंद्राणी की मां की चीखों और आख़िरी विनती ''आमी ऐकबार आमार मेयेर मुख देखबो'' से वहां एकत्र हुई छात्राओं के दिल दहल गये.

सोमवार 8 फरवरी को आई. आई. टी के लेक्चर थियेटर और मेन बिल्डिंग के सामने सभी छात्रों ने रजिस्ट्रार और डीन के सामने प्रदर्शन किया और अपनी कुछ मांगे रखीं जिनमें प्रमुख यह थी कि आई. आई. टी. परिसर के भीतर स्थित अस्पताल में कुछ आवश्यक उपकरण और प्राथमिक चिकित्सा की सुविधायें उपलब्ध करवायी जायें और अस्पताल को एमरजेंसी की हालत में उपयोग करने लायक स्थिति में रखा जाये.

तीन वर्ष पहले कानपुर के आई. आई. टी. में केमिकल इंजीनियरिंग के एक छात्र ने प्रयोगशाला में रासायनिक परीक्षण करते समय एक जहरीला रसायन गलती से भीतर खींच लिया था जिससे उसके फेफड़े और अंतड़ियों को गंभीर नुकसान पहुंचा. तुरन्त उसे अस्पताल की सहायता और डॉक्टरों की मुस्तैदी से बचाया जा सका. उसके इलाज में छह महीने से भी अधिक समय लगा पर इस तरह के मामले में डॉक्टर या अस्पताली सहायता की ज़रा सी असावधानी या ढील छात्र को मौत के मुंह में लें जा सकती थी.

यह सही है कि अस्पताल में प्राथमिक चिकित्सा के अनिवार्य उपकरणों और सुविधाओं का समय पड़ने पर तत्काल उपलब्ध करवाया जाना बहुत ज़रूरी है लेकिन यह आत्महत्या जैसी घटनाओं का हल नहीं है. इस तरह के हादसों के बाद की अनिवार्य चिकित्सा से अधिक आवश्यक है, ऐसे हादसों तक पहुंचाने की मन:स्थिति और माहौल के कारणों का निदान ढूंढना.

आई. आई. टी. जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षा संस्थान में प्रवेश पाना कितना मुश्किल और प्रतिस्पर्धात्मक है, यह सभी जानते हैं. यह एक ऐसी संस्था है जहां चुनाव सिर्फ योग्यता और प्रतिभा के बल पर होता है, जहां कोई पहुंच, साधन, रिश्वत या जोड़ - तोड़ नहीं चलती.

कई बार आई. आई. टी. के प्राध्यापकों के अपने बच्चे भी पूरी कोशिश के बावजूद प्रवेश परीक्षा में सफल नहीं होते. इन प्रवेश परीक्षाओं की विशेष ट्रेनिंग के लिये अग्रवाल क्लासेज़ और ब्रिलिएन्ट क्लासेज़ जैसे महंगे कोर्स हैं जिनमें प्रवेश लेने के लिये 85 प्रतिशत अंक आने आवश्यक है. इन पत्राचार पाठयक्रमों में प्रवेश लेकर, दो - तीन सालों की कड़ी मेहनत के बाद भारत के कोने -कोने से लाखों छात्र आई. आई. टी. की प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं और उनमें से कुल दो-ढ़ाई हजार के लगभग छात्रों का चुनाव हर वर्ष इस शिक्षण संस्थान के लिये किया जाता है. इसमें कुछ सीटें अनुसूचित जाति के लिये भी आरक्षित रहती हैं, जिसके तहत पिछले दो वर्षो से प्रादेशिक भाषाओं में भी प्रवेश - परीक्षा लिखने का प्रावधान किया गया है.

सवाल यह उठता है कि वर्षों की मेहनत और अपनी योग्यता के प्रति किंचित आश्वस्त छात्र की समस्या क्या इस संस्थान में प्रवेश पा लेने पर ही समाप्त हो जाती है ?

आई. आई. टी. (बम्बई, मद्रास, दिल्ली, कानपुर और खडगपुर) या आई. आई. एम (अहमदाबाद) जैसे संस्थानों में छात्रावास में रहना विद्यार्थियों के लिये अनिवार्य है. छोटे शहरों या कस्बों से आये छात्र - छात्राओं को भी कुछ अपनी सुविधा और कुछ प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों की गुणवत्ता के अनुसार शहर के चुनाव की सुविधा दी जाती है. प्रवेश के समय सलाहकार, प्राध्यापक इसके लिये मौजूद रहते हैं.

चंद्राणी हालदार जैसी मेधावी लड़की कुछ 'बनने' के सपने संजोये छात्रावास में आती हैं. कुछ महीनों बाद ही दूसरी छात्राओं के सम्पर्क में आते ही उसे अपनी प्रतिभा, अपनी ऊंचाई का दर्प धूल-धूसरित होता दिखाई देता है. यह 'ब्रिलियन्स शॉक' है. छात्रावास में आये अधिकांश छात्र ऐसे होते हैं जो पहली बार पढ़ाई के लिये अपने घर से दूर होते हैं. शुरु शुरु में सभी छात्र 'होमसिक' महसूस करते है पर धीरे धीरे वे हॉस्टल और इंस्टीटयूट के व्यस्त कार्यक्रमों और अनुशासन के ढांचे में रच-खप जाते हैं. छात्रावास के इस माहौल और शैक्षणिक पध्दति में जो अपने को सम्मिलित नहीं कर पाते, वह एक या दो प्रतिशत ही होते हैं.

क्या अपनी महत्वाकांक्षा को साकार करने की अपनी योग्यता के प्रति आश्वस्त छात्र अपना मोहभंग होते देख आत्महत्या पर मजबूर हो जाते हैं ? हो सकता है, एक या दो मामले असफल प्रेम या पारिवारिक उपेक्षा या दबाव के हो किन्तु अधिकांश आत्महत्याएं इस तरह के शैक्षणिक ढांचे के अभिजात्य और साथी छात्रों के सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक माहौल से अपना संतुलित तालमेल न बिठा पाने के कारण होती हैं. सवाल यह है कि इस तरह के तथाकथित ' मिसफिट ' छात्रों के लिये इंस्टीटयूट या छात्रावास के अन्य साथी अपनी ओर से उन्हें मुख्यधारा में मिलाने की कितनी कोशिश करते हैं ? और वे खप नहीं पाते तो क्यों ?

चंद्राणी हालदार का ही उदाहरण लें - एक औसत निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आयी एक मेधावी लड़की. उसके पिता बताते हैं कि उन्हें उस पर गर्व था, हर बार कक्षा में प्रथम आने की रिपोर्ट लाकर अपने माता पिता के पांव छूकर आशीर्वाद लेती थी, उसके स्कूल को उस पर नाज़ था- आई. आई. टी. की संयुक्त प्रवेश परीक्षा पास करनेवाली अपने स्कूल की वह एकमात्र छात्रा थी. बहुत अच्छी चित्रकार थी, गाने का भी उसे शौक था, बंगला में कुछ मौलिक रचनायें भी लिखा करती थी, अपनी भाषा पर उसका अच्छा अधिकार था. आख़िरी बार जब उसके पिता ने उससे बात की, उसने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था कि वह निराश या दुखी है.

चंद्राणी हालदार जैसी मेधावी लड़की अपनी आंखों में अपने परिवार, अपने बुज़ुर्गों की तमाम उम्मीदें और ज़िन्दगी में कुछ कर दिखाने, कुछ 'बनने' के सपने संजोये छात्रावास में आती हैं. कुछ महीनों बाद ही दूसरी छात्राओं के सम्पर्क में आते ही उसे अपनी प्रतिभा, अपनी ऊंचाई का दर्प धूल-धूसरित होता दिखाई देता है. यह ' ब्रिलियन्स शॉक ' है.

उसने पहली कक्षा से ही बंगला माध्यम से पढ़ाई की है. न वह हिन्दी जानती है, न अंग्रेजी. यहां फर्राटे से अंग्रेजी बोलनेवालों के बीच वह अपने आप को छोटा महसूस करती है. उसे लगता है उसका मखौल उड़ाया जा रहा है और वह, जो अपने आप को बहुत बुध्दिमान समझती आयी है, यहां के अंग्रेजी-दां छात्र-छात्राओं के बीच एक अव्वल दर्ज़े की मूर्ख साबित हो रही है. उसकी कस्बई योग्यता की अहमियत यहां कुछ नहीं है. अंग्रेजी की बाधा के कारण अपने जीवन में पहली बार इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में प्राप्त कम अंक उसे दहशत में डाल देते हैं.

संभवत: उसे लगा होगा कि द्वितीय वर्ष में भी यही स्थिति रहने पर उसे यदि संस्थान छोड़ना पड़ा तो वह कौन सा मुंह लेकर अपने अभिभावकों के पास जायेगी, जिनकी सारी उम्मीदों और सारे सपनों का अन्तिम छोर वह है. इसके अतिरिक्त उसका अपना वह आत्मीय, छोटा सा घरेलू माहौल यहां के पूरी तरह व्यावहारिक और प्रतियोगी, गला-काट प्रतिस्पर्धा के बीच खो जाता है.

यह ' कल्चर शॉक ' उसे और अकेला कर देता है. धीरे-धीरे वह अपनी सहपाठी छात्राओं से कटती चली जाती है. इस ' अकेलेपन ' के साथ पढ़ाई का भीषण दबाव उसे इस तरह के जानलेवा निर्णय के सामने खड़ा कर देता है. यूं भी अठारह से बाईस वर्ष तक के छात्र - छात्राएं इस संस्थान में आते हैं. यह उम्र वैसे भी बहुत नाज़ुक और अपरिपक्व होती है, जब किसी भी तरह का बाहरी झटका, छात्र के भीतर की दुनिया को ध्वस्त कर देता है. यह भी सही है कि इस तरह के निर्णय एक झटके से नहीं लिये जाते, इसके लिये मन में बहुत धीरे - धीरे ज़मीन तैयार होती रहती है.

द्वितीय वर्ष की इन्जीनियरिंग फ़िजिक्स की एक अन्य छात्रा ने बताया कि शुरु-शुरु में वह बिल्कुल बात नहीं करती थी क्योंकि उसका भाषाई माध्यम सिर्फ बांग्ला था. पर एक साल के बाद अपनी बात समझा पाना उसने सीख लिया था.फ़िजिक्स में उसे शुरु से दिलचस्पी थी और स्कूल के उसके अध्यापक ने उसे खडगपुर (जहां से वह आयी थी ) न ज्वायन कर बम्बई आई. आई. टी. चुनने की सलाह दी. उनका कहना था कि खडगपुर से मुंबई का स्टाफ बेहतर था. वह बहुत मजबूत व्यक्तित्व की लगती थी. जनवरी को हुए हॉस्टल के मेले में उसने खेल का एक स्टॉल संभाला था. शायद उस फ़िल्म 'आसपास' का उसके मन पर कुछ असर पड़ा हो और यह निर्णय तात्कालिक हो.

आई. आई. टी. कैम्पस के एक बंगाली संगीत शिक्षक के परिवार से पीयूल मुखर्जी ने कहा, '' हमें इस खबर से बहुत धक्का पहुंचा है, पिछले साल जब वह नयी-नयी बम्बई आयी थी, उसे अकेले देखते हुए और वह होमसिक महसूस न करे, हम उसे दादर दुर्गापूजा दिखाने ले गये, फिर घर का बंगाली खाना भी उसे खिलाया. दो-एक बार वह आयी भी, फिर उसने खुद ही आना बन्द कर दिया. हमने सोचा, शायद पढ़ाई के दबाव में वक्त नहीं मिलता होगा लेकिन इस दुर्घटना ने हमारे मन में बड़ा अपराध भाव पैदा कर दिया है. हम सब वक्त की रफ़्तार में भागे चले जा रहे हैं. बम्बई की मशीनी ज़िन्दगी तो आपको मालूम ही है. काश, हम उसकी खोज खबर लेते रहते.''

एक अन्य सीनियर छात्रा ने बताया, '' एक दिन तेज़ बारिश में हम एक छाते में दो लड़कियां भीगने से बचते हुए तेज़ चल रहे थे तो दूर से एक लड़की आराम से भीगती हुई धीरे धीरे आ रही थी. पास आयी तो देखा, चंद्राणी थी. हमने उससे कहा, जल्दी कपड़े बदलो वर्ना बीमार हो जाओगी, इस तरह बारिश में भीग क्यों रही हो तो उसने इत्मीनान से मुस्कराकर जवाब दिया, ' भालो लागछे ' (अच्छा लग रहा है.) हमें वह बहुत डिप्रेस्ड लगी लेकिन कुछ दिनों के बाद देखा, उसने बाल कटवा लिये हैं और स्कर्ट ब्लाउज़ भी पहनने लगी है तो हमें लगा कि वह हॉस्टल में एडजस्ट हो गयी है. ''

संभवत: अपने बाल काटकर या अपना पहरावा बदलने की सायास कोशिश के बावजूद वह दूसरे छात्रों और अपने बीच की गहरी खाई पाट नहीं सकी और अन्तत: किसी कमज़ोर क्षण में उसने अपना सब कुछ होम कर देना ही उचित समझा.  सवाल यह उठता है कि इस तरह के अकेलेपन, निराशा या अवसाद की स्थिति में पहुंचाने के लिये क्या स्वयं छात्र और अभिभावकों सहित पूरा माहौल जिम्मेदार नहीं है ? क्या इन प्रतिष्ठित संस्थानों के प्राध्यापक और छात्र - छात्राएं इस तरह के छात्रों के लिये अपनी कोई जिम्मेदारी महसूस करते हैं? क्या हर छात्रावास के तथाकथित वॉर्डन प्रोफ़ेसर को यह मालूम रहता है कि देर रात तक पढ़ाई में व्यस्त इन टीन - एजर्स छात्र छात्राओं की सख्त रूटीन में एक-दो छात्र ऐसे भी हैं जो लगातार धीरे - धीरे पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं और अकेले पड़ते जा रहे हैं ? क्या अपनी नियमित कक्षाओं से अलग इन संस्थानों के प्राध्यापक अपेक्षाकृत कमजोर छात्रों के लिये कुछ अतिरिक्त कक्षाओं का वक्त निकाल पाते हैं ?

और इससे भी ज़रूरी सवाल कि क्या इन उच्च मध्यवर्ग के अंग्रेजी-दां छात्रों के बीच निम्न मध्य वर्ग या निम्न वर्ग या अनुसूचित जातियों के एक-दो छात्रों के लिये (जो पूरी तरह अपने आप को इस नये अजनबी माहौल में मिसफिट पाते हैं) किसी तरह की काउन्सिलिंग की व्यवस्था है जो छात्र को अपने विश्वास में लेकर स्नेह का, अपनत्व का माहौल दे सकें ?

कानपुर के आई. आई. टी. में हिन्दी के प्रमुख वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर के नेतृत्व में एक रचनात्मक कक्ष -क्रिएटिव विंग शुरु किया गया था, जहां विज्ञान के छात्र भी रचनाओं के सृजन में, नये नये लेखकों से मिलने में बेहद दिलचस्पी लेते थे. इस क्रिएटिव विंग की सबसे बड़ी सफलता थी कि 1979 से 1993 के बीच उस संस्थान में आत्महत्या के इक्का दुक्का मामले ही सामने आए. इस तरह की ब्रीदिंग स्पेस तैयार की जानी चाहिए.

क्या इस तरह की व्यवस्था नहीं की जानी चाहिए जहां एक कच्ची उम्र का प्रतिभावान छात्र अपने संजोकर रखे हुए सपनों को बांट सके ? यदि ऐसा हो सकता है, तो उस मशीनरी को अधिक तत्परता से कारगर करने की आवश्यकता है, क्योकि पूरे देश में से चुने गये इन विलक्षण छात्रों में से एक को भी खोना न सिर्फ उसकी महत्वाकांक्षा और उसके माता-पिता के सपनों की मौत है बल्कि इन संस्थानों के सांस्कृतिक अभिजात्य के मुंह पर एक ज़बरदस्त तमाचा है.
Blogger द्वारा संचालित.