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पूनम सिंह की कविताएँ

पूनम सिंह

कथाकार , कवि और आलोचक पूनम सिंह की कहानी , कविता और आलोचाना की कई किताबें प्रकाशित हैं . सम्पर्क : मो॰ 9431281949



क्षमाप्रार्थी


उत्तराखण्ड में कालकलवित हुए
मृतकों के लिए
मेरी कविता ने नहीं रखा था
एक लम्हे का मौन
नहीं जताया था
मृत्यु की बेरूखी पर
कोई अफसोस

उस दिन भी जब
गंगासागर में नहाने गये लोग
नहीं लौटे अपने घर
मैं उदास हुई
मेरी कविता नहीं

ईश्वर की ओर पीठ किये
रतजगी करने वाली मेरी कविता
जिद्दी नासमझ है मित्रों
मैं हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ
उसके लिए

यह कैसा मौजीपन है तुम्हारा

आज जब हमारी सांसें
सलीब परईसा की तरह टंगी है
आँखें डरावने सपनों को देखती
पत्थर हो रही है
पपड़ाये होठों पर शब्द
मूर्छित पड़े  हैं
तुम मल्हार गाने को कह रहे हो ?

विचित्र जीव हो तुम भी
उस  दिन
पूस की ठिठुरती रात में कहने लगे
चलो दरिया में
एक डुबकी लगा आए
यह  रात भी क्या याद करेगी
किसी ने इसके अहंकार को
इस तरह पानी में डुबोया है
यह कैसा मौजीपन है तुम्हारा
कल ही
सियासत के सभागार में
’हुकुम‘ के दहकते अंगारे को तुम
पान की गिलौरी सा
चबाने लगेथे
मैंने नजर की आलपीन चुभोई
तो चिहुँक कर
पच्च से थूक दिया
एक कुल्ला पीक
उस दुधिया कालीन पर
जहाँ पैर रखते हुए
सबने उतार दिये थे
अपने जूते

तब से तुम्हारे हाथों में जूते हैं
पैरों में गाँधी टोपी
एक टाँग पर खड़े

श्वान की विशेष भंगिमा में
बापू के स्मारक पर
जल चढ़ाते हुए
तुम कह रहे हो मुझसे
‘गाँधीबाबा की टोपी आज
सियासत के सिर से उतरकर
पैरों से लिपट गई है
इससे क्या मैं समय शापित
युगपुरूष की
अभ्यर्थना ना करूँ ?
समय के परिवर्तित परिदृश्य पर
कोई प्रतिक्रिया न जताऊँ ?

गाने दो मुझे मौज में
रागमल्हार !
बजाने दो खंजरी की तरह
हाथों में उठाये जूते
मैं वक्त की सच्चाई को
उसके उत्कर्ष तक पहुँचाना चाहता हूँ
विश्व अहिंसा दिवस के उल्लास में
बापू की समाधि को आज
मनुष्येतर प्राणियों का
शिवालय घोषित करना चाहता हूँ
तुम मुझसे इस कदर नाराज क्यों हो प्रिये ?

सचमुच अजीब जीव हो तुम भी
अजूबाहैतुम्हारा यह मौजीपन!

औरतें- ( स्पैनिश कहानियां )



एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 

अनुवादक का नोट 


“Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।



रोना

अमेज़न के इक्वाडोर में पड़ने वाले इलाके की बात है. वहां के शुआर मूलवासी एक मरती हुई बुढिया दादी के सामने रो रहे थे. वे उसके चारों ओर घेरा बनाए बैठे रोए जा रहे थे. यह सब देख रहे दुसरी दुनिया से आए एक आदमी ने पूछा:-आप लोग अभी क्यूँ रो रहे हैं जबकि वह ज़िंदा हैं”
तब जो रो रहे थे उन्होंने जवाब दिया:-“ताकि ये यह जान लें कि हम इन्हें कितना चाहते हैं.


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प्लाज़ा दे मायो की माएं
1977: बूएनोस आइरेस (प्रचलित नाम: ब्यूनस आयर्स).

प्लाज़ा दे मायो की माएं जिन्हें उनके बच्चों ने पैदा किया है, इस पूरी त्रासदी का ग्रीक कोरस हैं.सरकार के गुलाबी महल के सामने वे उस चीज़ का चक्कर लगाया करती हैं, जो गायब हुए उनके अपनों की फोटो से भरकर पिरामिड जैसी ऊँची हो चुकी है. यह वे उसी जिद के साथ करती हैं जिसके साथ वे सेना की बैरकों, पुलिस थानों और चर्चों के भीतरी कमरे तक चढ़ आया करती हैं. रो-रोकर सूख चुकी हैं वे. और उनकी राह देख-देखकर बेहाल, जो कल तक थे और आज नहीं हैं, या जो शायद आज भी हैं. या फिर कौन जाने:-मैं उठती हूँ और यह महसूस करती हूँ की वह ज़िंदा है- एक कहती है, सभी कहती हैं.


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दिन जैसे-जैसे चढ़ता है मेरा दिल डूबता चला जाता है. आधा दिन होते-होते वह मर जाता है. शाम में वह फिर से जी उठता है. तब मुझे फिर से लगने लगता है कि वह आएगा और मैं उसके लिए खाना रखती हूँ. वह दुबारा मर जाता है और रात मैं नाउम्मीद होकर बिस्तर पर गिर पड़ती हूँ. उठती हूँ और महसूस करती हूँ कि वह ज़िंदा है…

सभी उन्हें पागल बुलाते हैं. आम तौर पर उनके बारे में कोई बात नहीं करता. इस आम तौर वाली ‘सामान्य’ स्थिति में दुःख की कीमत सस्ती है. और कुछ लोगों की भी. पागल कवि मौत की तरफ बढ़ते हैं और ‘सामान्य’ कवि सत्ता की तलवार चूमकर उसके कसीदे तथा अपनी चुप्पी गढ़ते हैं. इस बिल्कुल ‘सामान्य’ स्थिति में देश के वित्त मंत्री अफ्रीका के जंगलों में शेरों और जिराफों का तथा सेना के जनरल ब्यूनस आयर्स की बस्तियों में मजदूरों का शिकार खेलते हैं. भाषा के नए कायदे यह हुक्म सुनाते हैं कि सैनिक तानाशाही को अब राष्ट्र के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया कहा जाए!

जश्न दोस्ती का


ख्वान खेलमान ने यह बताया था कि कैसे एक बुजुर्ग महिला पेरिस की एक भीड़-भाड़ वाली सड़क पर मजदूरों की पूरी बटालियन से छाता लेकर भिड़ गई थीं. नगरपालिका के ये मजदूर कबूतरों को पकड़ने के काम में लगे हुए थे जब ये मोहतरमा वहाँ प्रकट हुई थीं. आगे से रोबीली मूछों वाले चेहरे जैसी दिखती उनकी शानदार मोटरकार वही वाली फोर्ड थी जिसे एक बाहरी हैंडल से स्टार्ट किया जाता था और जो अब संग्रहालयों में दिखा करती है. तो ये मोहतरमा उस मोटरकार से उतरीं और छाता चमकाते हुए अपने हमले में जुट गईं.


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वे दोनों हाथों से भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ी थीं. बिल्कुल वहीं के वहीं न्याय करने के अंदाज़ में चल रहे उनके छाते ने वे सारे जाल तोड़ दिए थे जिसमें कबूतरों को पकड़ा गया था. और जब सारे कबूतर हवा में सफ़ेद बवंडर बनाते हुए फुर्र हो रहे थे तब वे मजदूरों पर अपना छाता लेकर टूट पड़ी थीं.

हाथों से जैसे भी हो सका खुद को बचाने के अलावा मजदूरों ने कोई और विरोध नहीं किया था. वे अपना गुस्सा कुछ बड़बड़ाते हुए जाहिर कर रहे थे, जो वो सुन नहीं रही थीं: श्रीमती जी, थोड़ा आराम से, कृपा करें हम काम कर रहें हैं, ये ऊपर का हुक्म है देवी जी, आप मेयर साहब को क्यूँ नहीं पीटतीं, इन्हें ये क्या हो गया है, किस कीड़े ने काट लिया है, पागल हो गई है यह औरत…जब गुस्से से बेकाबू उनके हाथ दुखने लगे और वह थोड़ा सांस लेने एक दीवार का सहारा लेकर खड़ी हुईं तब मजदूरों ने उनसे इस पूरे हंगामे की वजह माँगी.
एक लंबी खामोशी के बाद उन्होंने कहा: – मेरा बेटा मर गया.
मजदूरों ने कहा कि उन्हें इसका बहुत अफ़सोस है लेकिन इसमें उनका कोई कसूर नहीं है. यह भी कि उस सुबह बहुत सारा काम बाकी पड़ा था, कि वो मेहरबानी करके ये समझें.
-मेरा बेटा मर गया-उन्होंने फिर कहा.



उन्होंने कहा कि हाँ, कि वे उनका दर्द बिलकुल समझते हैं लेकिन वे भी सिर्फ अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं, कि पूरे पेरिस में कितने ही लाख कबूतर मंडराते फिर रहे हैं, कि बेड़ा गर्क हो इन इन कबूतरों का जिन्होंने शहर का सत्यानाश कर रखा है.
–कमअक्लों!- वे उनपर गुस्से से फट पड़ी थीं
फिर मजदूरों से दूर, बाकी लोगो से दूर जाते हुए कहा:-मेरा बेटा मर गया और एक कबूतर बन गया.
सारे मजदूर चुप हो गए और एक पल के लिए कुछ सोचने लगे थे. फिर आखिरकार आसमान, छतों और गलियों में मंडरा रहे कबूतरों को दिखाते हुए कहा:-देवी जी, आप इन कबूतरों को क्यों नहीं ले जातीं और हमें शांति से काम करने देतीं?


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अपनी काली हैट ठीक करते हुए उन्होंने कहा:-ये! नहीं! ये बिलकुल नहीं!
फिर मजदूरों को कुछ ऐसे देखते हुए मानो वे उनके आर-पार देख रही हों, बड़ी ही तसल्ली से कहा:-मुझें नहीं पता इनमें से कौन सा कबूतर मेरा बेटा है. और अगर मैं जानती होती तब भी मैं उसे ले नहीं जाती. क्यूंकि मुझे क्या हक़ है कि मैं अपने बेटे को उसके दोस्तों से जुदा करूँ!

बिन बुलाए आ धमकी औरतें एक अनुष्ठान की शान्ति तोड़ती हैं
1979: माद्रीद. 


माद्रीद के बहुत बड़े गिरजाघर में, एक विशेष मास या प्रार्थना सभा में अर्जेंटीना की आज़ादी की वर्षगाँठ मनाई जा रही है. उद्योगपति, अलग-अलग दूतावासों तथा सेना के लोग जनरल लेआन्द्रो आनाया के बुलावे पर तशरीफ़ लाए हैं. जनरल साहब उस तानाशाह निज़ाम के राजदूत हैं, जो दूर वहाँ अर्जेंटीना में राष्ट्र की विरासत, धर्म और बाकी कीमती चीजों का ‘ख्याल’ रखने में जुटी हुई है. देवियों और सज्जनों के चेहरे और कपडे सुन्दर बल्बों की रोशनी में चमक रहे हैं.

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रविवार और इसमें भी इस तरह का रविवार चुप्पियों के बीच ईश्वर को अपने किए में शरीक कर लेने का दिन होता है. बहुत मुश्किल से सुनाई पड़ती खाँसी  की कोई छिटपुट आवाज इस सन्नाटे को सजा रही है. इस बीच मुख्य पुरोहित अनुष्ठान पूरा करवा रहे हैं. अब सब लोग मौन हैं, अनंतकाल की शांति. ‘ईश्वर के चुने हुए’ लोगों का अनंतकाल!

कंम्युनियन (communion) यानी ईश्वर का प्रसाद लेने का वक़्त हो गया है. अंगरक्षकों से घिरे राजदूत महोदय ऑल्टर (alter) या पूजा की वेदी की और बढ़ते हैं. वे घुटनों के बल बैठ, आँखें बंद कर अपना मुंह खोलते हैं. लेकिन तभी हवा में सफेद रुमाल लहराने लगते हैं. इन रूमालों को सभा-स्थल के बीच और दोनों किनारों से आगे बढ़ रही औरतों ने अपने माथे पर बाँध लिया है: अपने पैरों के हलके शोर के साथ आगे बढ़ते हुए प्लाज़ा दे मायो की माऐं राजदूत को घेरे हुए अंगरक्षकों को घेर रही हैं. अब वे सीधा राजदूत को देखती हैं. वे सिर्फ उनकी ओर सीधे देख रही हैं. राजदूत आँखें खोलते हैं, अपनी तरफ बिना पलक झुकाए देख रही इन सारी औरतों को देखते हैं और थूक गटकते हैं. इस बीच पुरोहित का आगे बढ़ा हाथ प्रसाद के गोल टुकड़े को अपनी उँगलियों में फँसाए हवा में ही ठहर कर रह गया है.

पूरा चर्च इन औरतों से भर गया है. अचानक यहां न तो संत दिखते है और न व्यापारी. यहां कुछ भी नहीं है सिवाय बिन बुलाए आ धमकी औरतों के इस झुण्ड के. काली पोशाकों और सफेद रूमालों वाली. सब चुप, सब खड़ी.


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लेखक के बारे में

एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।


अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  

क्रमशः

प्रत्यक्ष प्रमाण से आगे और सूक्ष्म संवेदना की कविताएं : अभी मैंने देखा

सुनीता गुप्ता


अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित ‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन है, जिसका प्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। फिल्म तथा प्रयोगात्मक आर्ट से जुड़ी शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएं उनके सर्जनात्मक स्पर्श से सम्पृक्त हैं। विमर्शों के मुहावरों में परिणत होने वाले समय में शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएँ अपनी ताजगी से आह्लादित करती हैं। ये कविताएं अपने समय के साथ खड़ी होकर उसका वक्तव्य बनती हैं। स्त्री गंध से सर्वथा अछूती होना इनका एक दुर्लभ पक्ष है। ये कविताएं बृहद मानवीय दृष्टि की उपज हैं जिन्हें किसी लैंगिक विभाजन में बांटकर नहीं देखा जा सका। ऐसा नहीं है कि यहां स्त्री नहीं है, पर उसकी उपस्थिति एक सम्पूर्ण मानवीय इकाई के रूप में है।

शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संसार देखे गए दृश्यों से निर्मित है, जैसे कोई किसी गाड़ी में बैठा हो और उसके सामने से एक एक कर दृश्य गुजर रहे हों। संग्रह की पहली कविता ‘क्या’ वह द्वार है जहाँ से हम कवयित्री के रचना संसार में प्रविष्ट होते हैं। इसे संग्रह की भूमिका के तौर पर भी देखा जा सकता है। इसके पात्र चौराहे पर दृष्टि के केन्द्र में एक-एक कर आते हैं और आगे चलकर संग्रह की कड़ी बनते हैं। चैराहे की भीड़ का भी अपना एक समाजशास्त्र होता है जिसके रेखाचित्र कवयित्री ने बड़ी बारीकी से उकेरे हैं। यह दुनिया फैब इंडिया की चमकदार पोशाक पहनकर कार में बैठे लोगों से अलग है। इस दुनिया में ‘हरे कनटोप में संभाले दुधमुंह बच्चा’ को लेकर ‘चैराहे पर सिरपिटायी हुई औरत है’, ‘मलिन दुपट्टे में’ तेल भरे कटोरे के साथ शनि का दान मांगती लड़की है’, सूर्या प्राॅपर्टिज की खाली पड़ी इमारत में शहर की सर्दी में एक दूसरे को जकड़कर मरे हुए लोग हैं, मॉल में टाइल पोंछने वाला लड़का है। कॉल सेंटर की सीढ़ियों पर ऑफिस कैब से उगल दिया जाता ‘वो हरी पट्टी पर स्वेटर का आदमी’ भी है। यहां शहर की दुनिया के सबके अपने दर्द और किस्से हैं। वे जो चैराहे के दृश्य पटल पर क्रम से आते हैं उनमें से हर एक की अपनी दुनिया, अपनी उलझनें और अपनी व्यथा है- पर अपनी विडम्बनाओं के साथ अन्ततः वे मनुष्य ही हैं- अपनी-अपनी पहचान लिये। इनमें एक वह औरत है जो एक दुध-मुंहे बच्चे को गोद में लिए लाल बत्ती के पास अ्रकबकायी खड़ी है। निराला की पत्थर तोड़ती औरत की तरह अलक्षित उस स्त्री की सिटपिटाहट अपने में एक एक लम्बी कथा समेटे है। कवयित्री दृश्य से परे उसके अंतर्मन में प्रवेश करती हैं और देख पाती हैं कि उसकी आंखों ने कई-कई सपने देखें होंगे, शहर की उस लाल-बत्ती वाले चैराहे पर पहुँचने तक जाने कितने विस्थापन से गुजरी होगी वह। आगे चलकर उन्हीं दृश्यों में एक लड़का आता है जो मॉल की टाइल्स पोंछने का काम करता हैं। भले ही वह अलक्षित सा हो भीड़ के लिए पर वह भी एक लड़की को पाने का सपना आँखों में संजोये हुए है।

कविता संग्रह को यदि हम उसकी समग्रता में देखें तो उसमें एक उपन्यास का विस्तार पा सकते हैं। इसमें पात्र अपनी दुनिया के साथ आते हैं और कथानक की कड़ी बन जाते हैं। इनमें कई पात्र ऐसे हैं जो फिर फिर उपस्थित होते हैं। चौराहे पर चालीस के पार की उम्र की एक औरत आती है जो अपने अंदर बीस वर्षों का आक्रोश समेटे है। उसके साथ ही उसका पुरुष साथी है। प्रौढ़ वय का वह व्यक्ति शहरी मशीनी दिनचर्या का पर्याय बन जाता है। प्रतिदिन की मशीनी दिनचर्या उसके जीवन का रस सोख लेती है। आगे चलकर एक कविता में इन दोनों का वार्तालाप उपस्थित किया गया है। यह वार्तालाप स्त्री पुरुष संबंधों की यांत्रिकता का पर्याय बन जाती है। रिश्तों की डोर में बंधा दो व्यक्तियों का संबंध कई बार बीच में कुछ इस कदर बिखरता है कि यह अहसास ही नहीं होता कि व्यक्ति कब एक दूसरे से छिटक कर दूर जा पड़े हैं। संबंधों की इस अजनबियत को इस संग्रह में जगह जगह महसूस किया जा सकता है। इसे शहरी सभ्यता का बाई प्रोडक्ट माना जा सकता है।
यह ठीक है कि शेफाली फ्रॉस्ट का कविता संसार गुजरते या देखे गये दृश्यों से निर्मित है। यहां अनुभूति की प्रामाणिकता का सवाल उठ सकता है। निश्चय ही इन कविताओं का संसार सहानुभूति से निर्मित है। किंतु यह निःसंकोच स्वीकार किया जा सकता है कि यहाँ जो बाहरी परिवेश है वह कवयित्री की संवेदनपूर्ण अंतर्दृष्टि से नम आौर उद्भासित है। कवयित्री इन दृश्यों पर त्वरित प्रतिक्रिया देकर नहीं हट जातीं बल्कि दोनों हाथों से बाहरी सतह की पारदर्शी परत को हटाकर उनकी दुनिया और अंतर्जगत में प्रवेश करती हैं। जब वे लिखती हैं कि ‘क्या तेल लगे बालों में कंघी घुमाता आदमी/उतार सकता है धूल भरा चेहरा जो शहर की गलियों ने उसे बिना पूछे पहनाया है’ तो शहर के गर्द भरे चेहरे के साथ शहरी जीवन की यंत्रणा, नियति और विवशता साकार हो उठती है। इन अलग-अलग देखे हुए दृश्यों को मिलाकर शहर का एक मुकम्मल कोलाज बनाया जा सकता है। यह शहर  है –‘भीड़ इतनी है लेकिन/ आदमी कुल्ला करे कि तकरार/प्यार करे कि मन भर सिंदूर डाल कर/ ताकता रहे आसमान/ निगल जाता है यह शहर/ खिड़की से आंख/दरवाजे से धड़’’।

जैसा कि कविता संग्रह के शीर्षक से अभिप्रेत है, संग्रह की कविताएं देखे गए दृश्यों को लेकर हैं पर इससे इंकार नही किया जा सकता कि ये दृश्य महज देखे हुए नहीं हैं बल्कि अज्ञेयजी के ‘आलोक छुआ अपनापन’ की तरह कवयित्री की संवेदना से उद्भासित है। ऐसा लगता है कि दृश्य की ऊपरी परतों को दोनों हाथों की अंजुरी से हटाकर कवयित्री उसमें डुबकी लेती हैं। इस अंदर की दुनिया को बिना उसमें डुबकी लगाये जाना ही नहीं जा सकता। कवयित्री के लिए ये चरित्र महज कविता का विषय नहीं रह जाते हैं अपितु वे उनकी और पात्र की अस्मिता से भी जुड़ जाते हैं जो ऊपर से अदृश्य प्रतीत होते हैं, अलक्षित रह जाते हैं हमारी निगाहों से, वस्तुतः उनकी भी अपनी एक पहचान, एक आइडेंटिटी होती है। वे भी मनुष्य होने की चेतना से समृद्ध हैं। इसके विलोम में वह दुनिया है जो अपनी चकाचौंध से हमारी निगाहों में आ तो जाती है पर उसके बनावटपन के नीचे जो कुछ है वह नितान्त खोखला है क्योंकि अपनी निजता के घेरे में आबद्ध वह मनुष्य होने की मूल शर्त – संवेदना और वह मानवीय सरोकार – से असम्पृक्त हैं। ऐसे ही लोगों पर व्यंग्य करती एक कविता है ‘जियो, तुम जियो’ -‘’ जुबान जिरह तो करती हैं तुम्हारी/लेकिन/रोक लो भिंचे हुए दातों के बीच उसे/तुम्हारे जागने का कोई संदर्भ नहीं/जियो, तुम जियो’’।

माइक लिए शेफाली

शेफाली फ्रॉस्टके रचना संसार में वंचित भी अपनी विडम्बनाओं के साथ प्रवेश पाते हैं। यथार्थ का एक रूप यह भी है जहां एक कोई औरत ‘साध रही है बर्तन सीलबंद चैक में/चिपके हैं बंद खिड़कियों के दरवाजे उस लेई से/जो उसने कल खुद को जोड़ने के लिए बनायी थी’’। यह सर्द हवाओं से बचने का प्रयास करती और रोटी की जद्दोजहद को झेलती स्त्री के जीवन का चित्र है जो मानो एक तरफ से छुपने का प्रयास करती तो दूसरी तरफ से उघड़ जाती है। इसके साथ ही शहर की सभ्यता का शिकार होता आदिवासी समुदाय है। प्रकृति के साथ इनका सीधा रिश्ता होता है, ये प्रकृति पर निर्भर होते हैं पर विकास की दौड़ में आज उसका दोहन किया जा रहा है। अपने भोलेपन में नादान ये आदिवासी मौन-भाव से अपने ही विरूद्ध हो रही साजिश के साझीदार बन रहे हैं –‘‘ वे हव्वा और आदम की औलादें/हार चुकी हैं जो/ लकड़ियों के व्यापार में/पत्ते चबाने का हक’’। सभ्य मनुष्य की न बुझने वाली पिपासा प्रकृति के सहयात्रियों को निवाला बना रही है – ‘‘वो देखो कुछ औलादें तुम्हारी/उतर रही हैं हवाई जहाज से दिक्कुओं के साथ/ सहेज रही है बाक्साइट की खादानें और तुम्हारा मौन।’’


बिरसा और मुण्डाओं के दर्द समेटती कवयित्री सभ्यता की सीमाओं को लांघती हुइ बिरसा के पास पहुंचती हैं -‘‘उत्तर रही हूँ मैं/सभ्यता की पंखुडी से/ गढ़ी जा रही है जंगलों में चलकाड़ के/ तुम्हारा व्यथा की लता।’
शेफाली फ्रॉस्टकी कविताएं वह कटोरी हैं जिसमें वे इन वंचितों के दर्द को समेटती हैं। ‘अश्रु चुनता दिवस उसका अश्रु चुनती रात’ की तर्ज पर वे अपने आस-पास के बिखरे दर्द को समेटती हैं, बल्कि समेटती  ही नहीं, उससे एकाकार हो जाती हैं – ‘‘मैं उतना ही रोना चाहती हूं जितना कि तुम’।

शेफाली की कविताओं का एक स्तर वह है जहां वे राजनीतिक मुद्दों से जूझती हैं। यह कवयित्री का कलात्मक कौशल है कि ये राजनीतिक मुद्दे नारों की शक्ल लिए बगैर हमारी चेतना में सरसराहट बनकर प्रवेश कर जाते हैं। एक कवि के रूप आजादी उनके लिए प्राणवायु की तरह है। आजादी और मानवीयता पर पड़ी हुई कोई भी चोट कवि की चेतना को आहत करने के लिए काफी होती है। राजनीति के लोक लुभावन चेहरों के पीछे जो उसका वर्चस्ववादी चेहरा और छद्म है, कवयित्री सीधे वहीं पर उंगली रखती हैं। आजादी, मकड़ी, अभी मैंने देखा आदि संग्रह में इस प्रकार की कई एक कविताएं शामिल हैं। इसके साथ ही दंगों की राजनीति भी उनकी संवेदना की जद में हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कवयित्री की संवेदना का प्रसार व्यक्ति, समाज, पर्यावरण से लेकर राजनीति तक है। यह स्त्री कविता को लेकर गढ़े गये उस मिथ का एक तरह से प्रतिवाद है जहां स्त्री द्वारा रची गयी कविता के संबंध में मान लिया जाता है कि इसकी सीमा घर, दहलीज और स्त्री विमर्श तक ही होगी। ये कविताएं इस बात का प्रमाण हैं कि स्त्री की चेतना के प्रसार के साथ ही उनकी कविताओं की परिधि भी विस्तृत हो रही है।

शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं में प्रकृति अपनी स्वायत्तता से परे मानवीय विडम्बना के साथ एकाकार हो गयी है। ये कविताएं प्रकृति के कोमल और रोमांटिक चित्रण का विलोम रचती हैं। मानवीय सरोकारों को समेटे प्रकृति यहां मानवीय अनुभूतियों में ढल गयी है। यह सूर्योदय है जिसके बारे में कवयित्री लिखती हैं-‘‘उतर रहा है कानों के पास/रात भर जागी चिड़िया का बड़-बड़़/रूके कमरे में फैल रहा है कोहरा/फूला हुआ/बरस रही है परछाईं वाली धूप/छत की झिर्रियों से’’। कोहरे भरी सुबह का यह चित्र है जिसे परछाईं वाली धूप के बिम्ब में बांधा गया है। संध्या के चित्र की विलक्षणता यहां देखी जा सकती है – ‘आसमान एक लकीर है पीली/चढ़ गयी है तलुवों से/घुटने की कगार तक/बचा नहीं उजाला/खिड़कियों के पास/ जो सुलगा दे बाकी की जांघ।’’ यह प्रकृति शहर की है जो कभी खिड़की की राह से झांकती है कभी छत की झिर्रियों से और आकर परिवेश से संयुक्त हो जाती है, प्रकृति की स्वतंत्र उपस्थिति वहां होती कहां है! परिवेश में घुली हुई यह प्रकृति शहरी परिदृश्य में रंग भरती है। यह प्रकृति अधिक आत्मीय प्रतीत होती है क्योंकि इसमें शहरी परिवेश की सच्चाई शामिल है। सूर्यास्त के भव्य बिम्बों से परे यह फुटपाथ है जिसकी संध्या कुछ अलग ही है – ‘‘फुटपाथ की शाम/समेट चुकी है मैल/जितना कि दिन के नाखून में’’। फुटपाथ की इस संध्या पर आमतौर पर किसी की नजर नहीं जाती। कवयित्री के बिम्ब की परिधि अत्यंत व्यापक है। ‘नाखूनो में समेटे हुए मैल’ का बिम्ब बचपन की स्मृतियों तक जाता है।

अपनी कविताओं में शेफाली नये तरह के प्रयोग भी करती चलती हैं। ये प्रयोग उनकी कविताओं को विशिष्ट बना देते हैं, यद्यपि कई बार ये जटिल पहेली की तरह भी हो गयी हैं। दृश्य इन कविताओं की इकाई हैं। ये कविताएं ऐसी रेखाचित्र हैं जिसकी गत्यात्मक्ता परिवेश के फिल्मांकन का आभास देती है – ‘गिर रही हैं ईंटों पर वह काली रात’, ‘पसर जाता रात का दंश/काले फुटपाथ पर अधीर’, ‘गुजरती जा रही है्/ ‘गठरी पकड़े महतारी की/ सुबकती हुई बड-बड़’। ‘लफाड़िया चांद’ संकलन की एक उल्लेखनीय कविता है। वह चांद जो आसमान में प्रतिदिन उगता है और जिसकी मोहकता को बिम्बों में बांधा जाता रहा है- उसका एक रूप यह भी है।  चकत्तेदार गड्ढों से भरा पड़ा चांद सूरज से रोशनी उधार लेता है और मानो आसमान से गिरकर हर तरफ से लतियाया जाता है, कभी जल की सतह उसे दुत्कारती है, कभी कीचड़ में पड़ता है पर डूबता उतराता यह चांद फिर निकलता है ‘‘लौट लौटकर आयेगा वो/पलट पलट के निकाला जायेगा/लफाड़िया लतियाया बेआबरू चांद/वो मरेगा नहीं कल /देखना’’।

शेफाली फ्रॉस्टकी कविताओं का बिम्ब अपने टटकेपन में ध्यान आकृष्ट करता हैं। इन बिम्बों में मूर्त और अमूर्त का एकीकरण अर्थ को विशिष्ट आभा से दीप्त करता है। ‘‘मेरे गले की झिल्लियों में/ फंसाकर अपना हाथ/वही पुरानी दास्तान/हकलाती है कितनी बार’’, ‘‘एक गीत का छिलका/उतर कर सब्जियों में लगा रहा है आवाज/फफोले वाले तवे पर दरकती है रोटी’’ जैसे प्रयोगों से इसे समझा जा सकता है।   कविता की ध्वन्यात्मकता इतनी प्रखर है कि उसमें दृश्यात्मकता भी आ जुड़ती है। कहीं-कहीं इन बिम्बों में स्वप्नलोक की आकृतियों का भी आभास मिलता है। इस प्रकार की कविताएं जटिल हो उठी हैं और इनका अर्थ धीरे-धीरे पंखुड़ी दर पंखुडी खुलता है और अपने साथ अर्थ की कई परतें लेकर आते हैं। कवयित्री के सर्जनात्मक स्पर्श से ये बिम्ब अपूर्व हो उठे हैं।

शेफाली फ्रॉस्टकी कविताओं का विन्यास इतना गठा हुआ है कि उसमें से एक शब्द को भी इधर उधर करना दीवाल की ईंट खिसकाने की तरह है। निश्चय ही ये कविताएं भावनात्मक उद्गार मात्र नहीं, एक गहन रचना-प्रक्रिया की उपज हैं। किसी चित्र की तरह इसकी एक-एक रेखा, एक-एक रंग बहुत बारीकी और कलात्मक से अंकित है। अपने कलात्मक संगुफन में ये कविताएं महादेवी के शिल्प गठन का स्मरण करा देती है।
शेफाली फ्रॉस्टका भविष्य की एक संभावना शील कवयित्री के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।

आलोचक सुनीता गुप्ता बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में हिन्दी पढाती हैं. संपर्क : मो0 09473242999

कभी सूख नहीं पायेंगे रोहित वेमुला की माँ के आंसू

मेधा 


ठीक एक साल पहले 17 जनवरी को रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या  हुई थी. रोहित की मां तब से अपने बेटे को न्याय दिलाने के लिए और शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव के खिलाफ सक्रिय हैं. मेधा एक मां के संघर्ष और दुःख को व्यक्त कर रही हैं, उनसे मिलने और उनके दुःख साझा करने के बाद.

 



पिछले दिनों रोहित वेमूला की माँ राधिका वेमुला से मिलना हुआ. उनके साथ  रोहित के मित्र रियाज भी थे. रोहित के जाने के बाद रियाज ने माँ का साथ हर मानिंद दिया है. रियाज मित्रता की अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं. राधिका जी और रोहित से मुलाकात मलकागंज के एक कार्यक्रम में हुई. मलकागंज में  एक स्वयंसेवी संस्था ने उन बीमार महिलाओं के लिए एक केंद्र खोला है, जिनका कोई नहीं है, जो सड़कों पर अपनी जिंदगी गुजारने को विवश हैं. साथ ही इस केंद्र में वे नवयुवतियां भी रहेंगी, जिन्हें बचपन में ही सड़कों से उठा कर अपने केंद्र में इस संस्था ने पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया है. अब यहां इन्हें कोई हुनर सीखा कर अपने पैरों पर खड़े होने का प्रशिक्षण दिया जाएगा.

 इसी केंद्र के उद्घाटन के लिए रोहित वेमुला की माँ राधिका वेमुला आई थीं. इस केंद्र का नाम रोहित वेमुला उन्नित केंद्र रखा गया है. 17 जनवरी 2017 को रोहित को इस दुनिया से गए साल भर हो जाएगा. राधिका जी के उन्नत चेहरे पर पसरा हुआ गहरा दुःख  साल भर में करुणा के रंग में तब्दील हो गया था. लेकिन उनकी पनीली आंखें अब भी एक माँ की व्यथा-कथा कह रही थीं. आंखों की तमाम चुगली के बावजूद व्यक्तिगत वेदना की नदी समष्टि के विराट दुख को अपना कर एक वेगवान झरने की मानिंद निरन्तर करुणा के महासागर में बदलती जा रही थी. और मैं उनके भीतर हो रहे इस रूपान्तरण को सहज ही अनुभूत कर पा रही थी.

 ‘दुःख हमें मांजता है’; (अज्ञेय को याद करते हुए) लेकिन किसी-किसी को वह इतना मांजता है कि निजी दुःख  के आंसू से करुणा का सागर बन जाता है.

राधिका जी से यूं तो पहली बार ही मिलना हो पा रहा था, लेकिन संवेदना के स्तर पर वह मुझे अपनी बहुत ही पुरानी सहेली जान पड़ी. शायद इसलिए भी कि अन्याय की जिस कथा को और उस कथा से उपजे भयावह दुख को मैं 17 जनवरी से अप्रत्यक्ष स्तर पर जी रही थी और जिसके मेरे भीतर इतने गहरे समा जाने का अहसास मुझे स्वयं भी नहीं था. वह दुख राधिका जी को देखते ही स्वतः फफक कर बाहर आ गया  और उससे ऐसे एकाकार हुई कि लगा कि मैं ही उस आखिरी चिट्ठी को लिख कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर देने वाली रोहित वेमुला हूं और मैं ही अपने जवान बेटे को खो देने का अथाह दुःख  झेलने वाली राधिका वेमुला

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उनके चेहरे पर दुख का गहरापन था, तो कहीं न कहीं गौरव की दीप्ती भी थी. लेकिन इस सब के पीछे वह माँ आज भी सीसक रही थी, जिसने अपने जवान बेटा खोया था. वह बेटा, जिसको पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाना, उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था. हर तरह की तकलीफों को सहते हुए, उसे पढ़ाया-लिखाया. वह बेटा -जिसे उन्होंने एक सपने के साथ हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय भेजा था. वह बेटा – जिसके आईएस बनकर लौटने का इंतजार आंखों में लिए वह जी रही थीं. एक माँ के बतौर अपने बेटे की उस तकलीफ, घुटन और अकेलेपन का गहरा अहसास है, जिसने उसकी जान ले ली. साथ ही, उन्हें उस राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में छुपे अन्याय का भी बोध है, जो रोहित की इस दशा के लिए जिम्मेदार है.

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राधिका जी बात करती हैं, तो कुछ ही मिनटों में उनके हिमालय जैसे दुःख  से करुणा की नदी बह निकलती है. और उस नदी से इरादों का एक सूरज उदित होता है जो व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने के उनके पराक्रम और साहस का प्रतीक बन जाता है. लेकिन इन सब के बीच एक मजबूर माँ अपने बेटे से गहरी शिकायत करती भी नजर आती है- कि वह कैसे अपनी माँ के सारे संघर्षों पर पानी फेरते हुए इस दुनिया से चला गया. उसने कैसे नहीं अपनी माँ की सुध ली.

राधिका जी ने कार्यक्रम में उपस्थित बच्चियों से कहा कि -‘‘ जिस तरह रोहित अपने हक के लिए लड़ा, अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ, वैसे ही तुम सब भी खड़े होना. लेकिन रोहित अकेला पड़ गया, इसलिए शायद उसे इतना भयंकर कदम उठाना पड़ा. लेकिन तुम साथ मिलकर अन्याय के खिलाफ लड़ना. अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए तुम्हारा हथियार शिक्षा होगी, इसलिए तुम सब खूब-खूब पढ़ना.’’ मैं देख रही थी, कि कैसे वहां बैठी सभी बच्चियां रोहित का रूप ले रही थीं और राधिका जी उन सबकी माँ.

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सारे कार्यक्रम के दौरान कुछ इधर भी गहरा उथल-पुथल चल रहा था. जब से रोहित गया और उसकी पहली और आखिरी चिट्ठी मैंने पढ़ी, तब से वह हमेशा के लिए मेरी चेतना में समा गया. ऐसी चिट्ठी लिखने की तो उसकी उमर नहीं थी. यह तो प्रेम पत्र लिखने की उमर थी उसकी. लेकिन यह पत्र भी तो उसने प्रेम के बारे में ही लिखा. हम भी तो मौत से कम पर उसकी बात को सुनने को राजी नहीं हुए. रोहित वह साहसी शख्स है, जिसने प्रेम के लिए मौत को गले लगाया. प्रेम किसी व्यक्ति के लिए नहीं, प्रेम प्रकृति के लिए, एक ऐसी दुनिया को साकार करने की जिद से प्यार के लिए जहां मनुष्य केवल मनुष्य हो अपने पूरेपन में; जिसके वजूद पर जाति, धर्म, वर्ग, लिंग, नस्ल का कोई धब्बा न लगा हो, जहां कोई भी पहचान मनुष्य होने की पहचान से बड़ी न हो. जहां पहचान राजनीति का माध्यम न बनकर विविधता के सौंदर्य का उत्सव बनें. एक ऐसी दुनिया-जहां बिना चोट खाए, बिना दर्द सहे – प्यार किया जा सके. इस निगाह से देखें तो, रोहित का आखिरी पत्र दुनिया का अकेला और सबसे अनूठा प्रेमपत्र. और उस पत्र को पढ़ने वाला हर बंदा उसका प्रेमी है, जिसकी जिम्मेदारी है कि, रोहित ने जिस दुनिया का सपना लिए इस संसार को अलविदा कहा, उस दुनिया को सच करने की ओर रोज एक कदम भरना.

लेखिका सत्यवती महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती है . संपर्क :medhaonline@gmail.com

घरेलू कामगार महिलाओं की दीदी: संगीता सुभाषिणी

नवल किशोर कुमार


‘स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत घरेलू कामगार महिलाओं को संगठित कर उनके संघर्ष की अगुआई कर रही संगीता सुभाषिणी से और उनके आंदोलन से परिचित करा रहे हैं नवल किशोर कुमार.

बिहार के मुजफ्फरपुर शहर की रहने वाली संगीता सुभाषिणी की खासियत यही है कि अपनी निजी जिंदगी में तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी है। अपनी निजी जिंदगी की परेशानियों के समानांतर उन्होंने समाज के उस तबके के विकास का अभियान शुरू किया, जिसकी उपयोगिता तो हर संभ्रांत परिवार में है, लेकिन कद्र कोई नहीं करता है। वह संगीता ही हैं, जिनके कारण मुजफ्फरपुर शहर में चूल्हा-चौका करने वाली करीब चार हजार महिलायें आज न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि  समाज में अपनी उपस्थिति भी पूरी मजबूती के साथ स्थापित कर रही हैं।

संगीता सुहासिनी घरेलू कामगार महिलाओं के साथ

संगीता बताती हैं कि पहले घरों में काम करने वाली महिलाओं को मुजफ्फरपुर शहर में हेय दृष्टि से देखा जाता था। इसके अलावा उन्हें नियमित रूप से मजदूरी का भुगतान भी नहीं किया जाता था। जबकि यह सभी जानते हैं कि कोई भी महिला किसी दूसरे के घर के में चूल्हा-चौका जैसा काम किस हालात में करती है। सामाजिक रूप से यह पेशा कभी सम्मानजनक पेशा नहीं माना गया। इस पेशे को अपनाने वाली महिलाओं में अधिकांश वंचित तबके की होती हैं जिनके पास रोजगार का कोई विकल्प नहीं होता है। संगीता बताती हैं कि वर्ष 2008 में उन्होंने ‘संबल’ संस्था की स्थापना की। तब मकसद यही था कि ऐसी महिलाओं को सशक्त बनाया जाय।

लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं था। जिन घरों में महिलायें दाई का काम करती थीं, उनके मालिकों का व्यवहार एकदम क्रूर था। यहां तक कि स्थानीय पुलिस प्रशासन भी ऐसी महिलाओं की शिकायत पर ध्यान नहीं देती थी। चुनौती यही थी कि ऐसी महिलाओं को उनका अधिकार सम्मान के साथ दिलाया जाय। संबल के बैनर तले महिलायें एकजुट होती गयीं और फिर अहिंसात्मक तरीके से अन्याय के खिलाफ आंदोलन छेड़ा गया।

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संगीता के मुताबिक आज उनके संगठन में चार हजार से अधिक महिलायें जुड़ी हैं। इसके अलावा आसपास के इलाकों में उन्होंने अपने प्रशिक्षित प्रतिनिधियों को जिम्मेवारी दे रखी है। ये प्रतिनिधि अपने-अपने इलाकों में घरेलू नौकरानियों एवं दाईयों, आदि का पूरा रिकार्ड रखती हैं। साथ ही उनके साथ होने वाले किसी भी प्रकार के अन्याय के खिलाफ सूचना मिलने पर पूरी जानकारी संगीता सुभाषिणी को देती हैं। इसके बाद सुभाषिणी महिलाओं को एकजुट कर आपस में रणनीति तय करती हैं। इसके बाद ही अहिंसात्मक तरीके से कार्रवाई की जाती है।

कारवां बढ़ता गया 

संगीता ने बताया कि वर्ष 2012 से पहले उन्होंने संबल नामक अपनी संस्था का पंजीकरण नहीं कराया था। इसके पीछे की वजह बताते हुए वे कहती हैं कि उनकी मंशा महिलाओं को एकजुट कर उन्हें जागरूक बनाना था। किसी तरह का लाभ कमाना उनका उद्देश्य नहीं था। लेकिन इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ कि स्थानीय प्रशासन द्वारा संबल के द्वारा उठाये गये सवालों को नजर अंदाज किया जाने लगा। अंत में सभी महिला सदस्यों ने आपस में मिलकर स्वयंसेवी संस्था के रूप में पंजीकृत कराने का निर्णय लिया।

अपने द्वारा किये गये प्रयासों के परिणाम के बारे में संगीता बताती हैं कि अब स्थिति पूरी तरह बदल गयी है। अब तो उनके पास वे महिलायें भी आती हैं, जो मालकिन कहलाती हैं और अपनों के द्वारा विभिन्न प्रकार की हिंसा की शिकार होती हैं। हमारी संस्था से जुड़ी महिलायें उनका उत्साह बढ़ाती हैं और अन्याय के खिलाफ  उनका साथ देती हैं। उन्होंने कहा कि सबसे अधिक सुकून देने वाली बात यह है कि अब दाई के रूप में काम करने वाली महिलायें ‘अप्प दीपो भव’ की तर्ज पर स्वयं जागरूक होती जा रही हैं। वे अब अपनी आय का अधिक हिस्सा अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में खर्च करती हैं।

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संबल में संगीता और अन्य महिलायें

दमिता नामकरण 

जून ,2011  में जेनेवा में हुए अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के  100 वें अधिवेशन में घरेलू कामगार स्त्रियों के संगठन का भी कन्वेंशन हुआ और दुनिया भर में  10 करोड़ के आसपास घरेलू कामगार महिलाओं को सम्मानजनक श्रममूल्य और वातावरण दिलाने का संकल्प लिया गया. इसके बाद भारत में भी इन महिलाओं  की सुध लेने की सरकारी कोशिशें तेज हुईं . तमिलनाडु , महाराष्ट्र , कर्नाटक, केरला आदि राज्यों में सीमित अर्थों में ही सही इन महिलाओं के लिए सरकारी प्रयास सुनिश्चित हुए, हालांकि सम्मानजनक भुगतान और दूसरी सुरक्षाओं की लड़ाई अभी जारी है. धीरे –धीरे केंद्र सरकार पर भी दवाब बन रहा है कि वह इन महिलाओं के लिए एक मुक्कमल बिल लेकर आये.

इन  सब के बीच मुजफ्फरपुर की ये महिलाएं, जिन्हें 200 से 500 रुपये तक एक घर से मिलता है चौका वर्तन के लिए , देश और दुनिया भर में चल रही अपने लिए लडाइयो को  नहीं जानती हैं. उन्हें भरोसा है तो अपनी सुभाषिणी दीदी पर , जिन्होंने इन महिलाओं के लिए एक नया नाम भी दिया है ,’ दमिता.’ यह नाम ‘दलित’ नाम के करीब इस मायने में है कि ये लगभग उतने ही हाशिये पर जीती है और अलग इस मायने में कि दलितों के साथ जुड़ा छुआ –छूत इनके साथ नहीं है . ‘चौका -बर्तन करे में कहीं 100 रूपया मिलअइछइ त कहीं 200, इतना में केना पेट भरतइ अ केना अपन बाल बच्चा के पढ़बइ. अब दीदी के सहयोग से हम सब भी अपन हक ला आवाज उठावे के चाहिछिअइ, शायद हामरो सब के परिवर्तन आ जतइ’ यह विश्वास सिर्फ राजवती देवी के साथ उन दर्जनों महिलाओं को हैं , जो संबल में सुभाषिणी जी के साथ सक्रिय हैं.

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अपनी कार्यकर्ताओं को सुभाषिणी न सिर्फ उनके हक के लिए लड़ना सिखा रही है, बल्कि सामजिक बुराइयों के खिलाफ भी खड़ा कर रही है, जिसका असर मुजफ्फरपुर के चर्चित शराब बंदी आन्दोलन में दिखा . जिला स्तर पर सरकारी सुविधाओं को हासिल करने में भी इन ने एकजुटता दिखाई है. अपने संसाधनों से संचालित यह संगठन एक लम्बी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं है लेकिन लम्बी लड़ाई के जज्बे से भरा है . सुभाषिणी जी हालांकि प्रदेश सरकार और खासकर बिहार के मुख्यमंत्री से अपील करती हैं कि दूसरे राज्यों की तरह बिहार में भी वे ‘दमिताओं’ के हक़ में कुछ कदम उठाएं . वे देश के दूसरे हिस्सों में चल रही इस लड़ाई से इन महिलाओं को जोड़ने की तैयारी में भी हैं.

जीवन और संघर्ष का निजी कोना 

बहरहाल संगीता सुभाषिणी का निजी जीवन भी अनगिनत चुनौतियों का पर्याय रहा है। हालांकि उनका जन्म मुजफ़्फ़रपुर के बड़े उद्यमियों में से एक स्व प्रह्लाद दास अग्रवाल के घर में हुआ था। उनके पिता उत्तर बिहार में
कंक्रीट के ह्यूम पाईप का उत्पादन करने वाले पहले उद्यमी थे। इसके अलावा वे मुजफ़्फ़रपुर नगर कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे थे। समाज के प्रति उनके समर्पण और जनता से उनका लगाव इस कदर था कि वे आजीवन मुजफ़्फ़रपुर नगर निगम की स्थायी समिति के सदस्य रहे। इसके अलावा वे मुजफ़्फ़रपुर नगर निगम के
अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए थे।इस तरह एक उच्च आयवर्गीय परिवार में जन्म लेने के बावजूद संगीता को समाज
सेवा अपने पिता से विरासत में मिली। मुजफ़्फ़रपुर शहर में ही प्राथमिक शिक्षा और इसी शहर के बिहार यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की। इकोनामिक्स उनका पसंदीदा विषय रहा। लेकिन उन दिनों ही समाज के साथ खड़ेहोने की भावना प्रबल हो उठी और संगीता ने कानून की पढाई की।

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संगीता बताती हैं कि उन दिनों ही उनके एकमात्र भाई की हत्या कर दी गयी। इस कारण परिवार
पर संकट का पहाड़ टूट पड़ा। विषमता के समानांतर संगीता ने अपने जीवन का एक नया रास्ता चुना। उन्होंने
मुजफ़्फ़रपुर से प्रकाशित दैनिक “प्रातः कमल” में पत्रकार के रुप में काम करना शुरु किया। यह वह समय था जब मुजफ़्फ़रपुर जैसे शहर में लड़कियों के लिए नौकरी करने की बात सोचना भी कल्पना के परे था। पत्रकारिता के अपने  जीवन में संगीता ने अपनी रिपोर्टों से पूरे शहर का ध्यान आकृष्ट किया। खासकर एक दबंग नेता के द्वारा एक महिला के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या को लेकर संगीता के द्वारा की गयी रिपोर्टिंग ने उन्हें एक मुकम्मिल पत्रकार के रुप में स्थापित किया।

उन दिनों ही उनकी मुलाकात अक्खड़ स्वभाव के पत्रकार अनिल गुप्ता से हुई। वे भी प्रातः कमल के लिए काम करते थे। फ़िर एक दिन ऐसा भी आया जब संगीता और अनिल ने शादी कर अपनी दुनिया बसा ली। संगीता बताती हैं कि यह एक नये जीवन की शुरुआत थी। अनिल गुप्ता के साथ देश के कई शहरों में उन्होंने पत्रकार के रुप में अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए काम किया। लेकिन उनका दिल मुजफ़्फ़रपुर में बसता था और अंततः वे मुजफ्फरपुर आ गईं। तबसे उनका संघर्ष जारी है। वे कहती हैं कि जबतक उनके शरीर में रक्त का एक कतरा भी शेष है, वे अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु प्रयत्नशील रहेंगी। हालांकि वे चाहती हैं कि सरकार और समाज सभी महिलाओं के अस्तित्व को पूर्णता में स्वीकार करें और उन्हें अपना जीवन जीने दे। इसी में समाज की बेहतरी है।

नवल किशोर कुमार अपना बिहार  वेब पोर्टल के संपादक हैं और हाशिये के संघर्ष के प्रति प्रतिबद्ध पत्रकार हैं. 

पुस्तक मेले की 'मानुषी' से गायब गैरद्विज स्त्री

दिल्ली में ‘वर्ल्ड बुक फेयर’ नाम से किताबों का सात दिनों का मेला आज यानी रविवार, 15 जनवरी, को समाप्त होगा- अपने अंतिम दो दिनों में उफान सर्दी और सीमित उफान वाली भीड़ के साथ. यह दिल्ली के ‘तख्त-ए-ताउस’ पर राष्ट्रवादी और देशभक्त सरकार के गठन के बाद शायद तीसरा मेला है, और जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय में आसीन महिला केन्द्रीय मंत्री की विदाई के बाद आयोजित पहला मेला है, ‘नारी-लेखन’ की थीम पर केन्द्रित है- ‘ मानुषी’ नाम से. मेले की निदेशक डा.रीता चौधरी इस थीम की व्याख्या करते हुए लिखती हैं,  नारी के द्वारा या नारी पर केन्द्रित लेखन को यह मेला मुख्यतः केन्द्रित है, जिसमें उनके लेखन, किताबों और उनके पोस्टर्स प्रदर्शित किये गये हैं.

राष्ट्रवादियों के द्वारा इतनी नायाब थीम तय हो और उसमें उनकी दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता विषय-चिन्तन न हो तो लक्ष्य अधूरा रह जायेगा. इसीलिए पूरे सप्ताह तक ‘नर’ की ‘नारी’ और उसकी चेतना पर आयोजकों की ओर से कई विमर्श सत्र तय किये गये थे. हालांकि आयोजकों की ओर से आधिकारिक तौर पर तो मनुस्मृति पर कोई कार्यक्रम तय नहीं था, लेकिन ‘नर’ की ‘नारी’ का चिंतन और उसकी चिंता राष्ट्रवादी करें और उसे मनुस्मृति का कवच न पहनायें तो फिर काहे का राष्ट्रवाद और उसका नारी चिन्तन. कमी पूरी हो जायेगी अंतिम दिन हाल न. 8 में अंतिम कार्यक्रम के तौर पर ‘आधुनिक युग में मनुस्मृति’ की भूमिका विषय पर विमर्श के साथ.

‘मानुषी थीम’ पर आधारित वर्ल्ड बुक फेयर में समग्रता में किस ‘स्त्री’ का स्वरुप बनता है उसे उसके आयोजनों, प्राथमिकताओं, विमर्शों और भागीदारों के माध्यम से समझें, इसके पहले यह स्पष्ट हो लें कि किन मायनों में इस ‘असहिष्णु राष्ट्रवादी सरकार’ का पुस्तक व्यापार ‘सहिष्णु(!) पिछली सरकारों’ के पुस्तक व्यापार से बेहतर बताया जा रहा है. प्रकाशक बताते हैं कि आज किताबों की सरकारी खरीद में छोटे-बड़े सभी प्रकाशकों की किताबें शामिल की जाती हैं, जबकि इसके पहले ‘नामवरों’ के घर की मरम्मत या सजावट करने वाले या ऐसे ही ‘साहित्य-विभूतियों’ को इस या उस प्रकार से उपकृत करने वाले बड़े प्रकाशक ही लाभान्वित होते थे. मेले के प्रकाशक तो यह भी बता रहे थे कि इस बार स्पेस आवंटन में भी बड़े प्रकाशकों की ‘च्वाइस’ को तबज्जों नहीं दिया गया- उनके अनुसार यह सरकार द्वारा पोषित पुस्तक व्यापार का लोकतांत्रीकरण है. पता नहीं क्या सच है, लेकिन सच यह जरूर है कि दिल्ली में वर्ल्ड बुक फेयर में स्टाल के आसमान छूता किराये और विमुद्रीकरण से व्याप्त आशंका के कारण कई प्रकाशक इस मेले से दूर रहे.

अब समझने की कोशिश करते हैं कि मानुषी थीम वाले इस मेले में ‘नारी-चेतना’ विमर्श के तौर पर किस स्त्री का स्वरुप उभरता है. मेले में किताबों के क्रय-विक्रय व्यापार के बीच होने वाले विमर्शों और अन्य परफार्मेंस आधारित आयोजनों के आधार पर, जिस स्त्री का स्वरुप बनता है, वह राष्ट्रवादी एजेंडे में फिट बैठती वह नारी है, जो मिथकों में जीवित है या मध्यकालीन भक्ति चेतना में पगी है- खबरदार, जो मीरा, ललद्यद या आंडाल में किसी विद्रोही तेवर की पड़ताल की तो. इस नारी का कोई सिरा थेरियों से नहीं जुड़ता, थेरीगाथा से नहीं जुड़ता.

संस्कृत साहित्य में नारी-चेतना थीम की एक वक्ता कौशल पंवार को छोड़ दें तो ‘राष्ट्रवादी मानुषी थीम’ में गैरद्विज स्त्री को ढूंढें नहीं ढूंढ पायेंगे आप- न आरक्षण, न सद्भावना, न समता का भाव और न आधुनिक होने की चाह- कुल मिलाकर यही छवि है ‘राष्ट्रवादी मानुषी’ की. वह तो भला हो ‘दलित –दस्तक’ का कि अपने स्पेस पर वे दलित लेखिकाओं को लेकर आये.

कुछ सेल्फियों या कुछ अकारण-सकारण ली गई और फिर सोशल मीडिया में जारी तस्वीरों से ज्यादा ‘मानुषी थीम’ इस मेले में खोजना एक श्रमसाध्य, थकाऊ और अंततः निराश करने वाला अनुभव होगा!

रुचि भल्ला की कविताएं

रुचि भल्ला

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
संपर्क : 09560180202, Email:Ruchibhalla72@gmail.com



राजपथ को गई लड़की

पीपल का पेड़
रहता होगा उदास
तेरे घर की खिड़की को रहती होगी
तेरे आने की आस
छत पर टूट -टूट कर बिखरती होगी
धूप की कनी
जहाँ तुम खेला करती थी नंगे पाँव
चाँद को आती होगी तुम्हारी याद
घर का कोना होगा खाली
तुम्हारे होने के लिए

एक रात मेरी नींद में उतर कर
मेरे राष्ट्राध्यक्ष ने बतलाया
तारकोल का काला – कलूटा राजपथ
रोता रहा कई दिन कई रात
तुम्हें निगलने के बाद

धर्म – अधर्म

जब कोई भूखा दे तुम्हें
दो रोटियों के लिए दस्तक
सुनो , तुम दरवाज़ा न खोलना
कोई फायदा नहीं इसमें
वह क्या लौटाएगा तुम्हें
इस जीवन बाज़ार में ।

लेकिन याद करके
हर पूर्णिमा , अमावस्या
अपने देव-पुजारी को न्योतना
जी भर देना पकवानों से
फिर बंधवा देना उसकी अंगोछी
तन पर छाता की तरह उभरे
पेट के लिए ।

वस्त्र देना
ताकि ढँक ले
अपने अंदर का कालापन
नकद देना
वह बाज़ार लाएगा
अपने घर
अपनी ओर खींचने के लिए
हमारी बेटियां

न्यूटन ……सेब और प्यार का फ़लसफ़ा 

जब तुम याद करते हो
स्तालिन लेनिन रूसो गाँधी
सुकरात टैगोर सिकंदर को

मैं उस वक्त याद करती हूँ न्यूटन को
देखती हूँ सपने न्यूटन के
सपने में धरती मुझे सेब का बगीचा दिखती है

न्यूटन बैठा होता है एक पेड़ के नीचे
और मैं उस पेड़ के पीछे
दुनिया वालों ! जब तुम खरीद रहे थे सेब
उलट-पुलट कर उसे खा रहे थे
ले रहे थे स्वाद कश्मीरी डैलिशियस
वाशिंगटन गोल्डन एप्पल का

ठीक उसी वक्त न्यूटन के हाथ भी एक सेब लगा था
सेब के ग्लोब को उंगली से घुमाते हुए
उसे मुट्ठी में मंत्र मिला था ‘ग्रैविटी फोर्स’
जब तुम सो रहे थे मीठा स्वाद लेकर गहरी नींद

न्यूटन ने सेब की आँख से
आसमान को धरती पर झुकते हुए देखा
धरती का आसमान की ओर खिंचाव देखा था
तुम नहीं समझोगे इस प्यार को
एडम ईव की संतानो !

माफ़ीनामा

मैं क्षमाप्रार्थी हूँ
दुनिया के सारे बच्चों के प्रति
कि उन्हें मारा गया छोटी -छोटी बातों पर
हाथ उठाया उनकी छोटी गल्तियों पर
उन्हें चोट देते रहे

जबकि बड़ी मामूली सी बातें थीं
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टूटने की तरह नहीं था
उनके हाथ से काँच के गिलास का टूट जाना

और बच्चों ! जब तुमने स्कूल का काम
नहीं पूरा किया
लाख सिखाने पर पहाड़े नहीं याद किए
बाबू जी की छड़ी छुपा दी
टीचर के बैठने से पहले उनकी कुर्सी हटा दी
ताजा खिला गुलाब तोड़ डाला
स्पैंलिग मिस्टेक पर नंबर गंवा दिए
खो दिए ढेर पेंसिल रबर
कॉपी के पन्नों से हवाई जहाज उड़ा डाले
इतनी बड़ी तो नहीं थीं तुम्हारी गल्तियां
कि हमने तुम्हें जी भर मारा

मेरे बच्चों आओ ! मेरे पास आओ !
मैं पोंछना चाहती हूँ तुम्हारे भीगे हुए चेहरे
रखना चाहती हूँ तुम्हारी चोटों पर मरहम
मेरे बच्चों आकर मुझे माफ करो

हमने अब तक सिर्फ मासूमियत को मारा
हमने उन्हें नहीं मारा जहाँ उठाने थे अपने हाथ
वहाँ ताकत नहीं दिखलाई
जहाँ दिखलाना था अपने बाजुओं में दम
वहाँ हम खड़े अवाक रह गए …

बच्चे ….बचपन और दुनिया

अच्छे लगते हैं बच्चे
कि बच्चों के पास होते हैं
गुब्बारे पतंगें कंचे
नहीं होती हैं उनके पास बड़ी -बड़ी बातें
उन्हें चाहिए फूल तितली चाँद
खिलौने बादल चिड़िया
उन्हें अच्छे लगते हैं उड़ते कबूतर
उन्होंने जाना है ‘ क ‘ से होता है ‘कबूतर ‘
अभी छोटे हैं बड़े होकर जानेंगे
‘क ‘से ‘क्रांति ‘
‘क’ से होता है क्या -क्या
बच्चे छोटे हैैं और बड़े हो जाना चाहते हैं
जबकि जानते नहीं बड़े होकर खो देंगे
अपना बचपन और बड़प्पन
काश! छोटी ही रह जाती दुनिया
छोटे बच्चों की छोटी दुनिया
बड़े होकर हमने हासिल भी क्या कर डाला
दुनिया को बहुत बड़ा बना डाला
छोटी होती तो बची रहती
बचे रहते बच्चे
बचा रहता दुनिया का बचपना …..

सुनो प्रज्ञा !

जब भगत सिंह को तेईस साल में
फांसी दी जा रही थी
पाश को सैंतीस साल में
गोली मारी जा रही थी
हम-तुम दोनों उस वक्त धरती के गर्भ में पड़े रहे
मिट्टी की पर्त को खुरचते रहे अपने नाखूनों से
ज़ुबान पर गीली मिट्टी का स्वाद फिराते रहे
ये मिट्टी तो शहादत की मिट्टी थी
हम दोनों को हजम कैसे हो गई
इसे खाने के बाद भी
हम दोनों जी रहे हैं चालीस के पार
जी रहे हैं और बूढ़े होते जा रहे हैं
जबकि मृत्यु का उत्सव तो जवानियाँ
कब का मना चुकीं

सुनो प्रज्ञा !

यह वक्त कविता लिखने का नहीं
पाश हो जाने का है
कलम के तलवार होने का है
पाश की आत्मा से रिसते लहू की स्याही में तुम
अपनी तलवार भिगो दो
दुनिया के हर पुर्जे पर तुम पाश लिख दो
लिख दो इस तरह से कि धरती पर बिखर जाए
रंग लाल पाश का
आसमान में बिखर जाए
कविताओं के लाल गुलाल का
लिखो कि इससे पहले तुम्हारी तलवार
कहीं धार न खो दे
इससे पहले तुम विशुद्ध कवि न रह जाओ
तुम्हें लिखना होगा प से पाश
उदास मौसम के खिलाफ

बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति की कविताएं

बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति

रिसर्च डायरेक्टर,सेंटर फॉर इंक्लूसिव सोसाइटी,ताजपुर,समस्तीपुर, बिहार
संपर्क : 7633022074,bsmangalmurty@gmail.com

बलात्कार हिंसा है !!

बलात्कार  सेक्स नहीं,
प्यार  नहीं,
प्यार  नहीं कहा मैंने,
क्योंकि मैरिटल रेप होते हैं,
कितनी महिलाएं घर की सुरक्षित चहारदीवारी में,
एकदम सुरक्षित माहौल में,
अपनों  के बीच,
रौंदी जाति हैं,
अपने पतियों के द्वारा,
हमसफ़र कहे जाते हैं,
पीड़क बन जाते हैं,
हर रात, लगातार.
पर हम पाखंडी हैं,
ढोंगी हैं,
कड़वा सच हमें चुभता है,
कांटे की तरह,

इसलिए
हमारा कानून  इसे नहीं  मानता,
हमारा  समाज इसे अनदेखा करना चाहता है,
पर आंख मूंदने  से दिन रात में  नहीं बदलते.

सच ये  है  कि
बलात्कार  हिंसा  है,
जब एक  महिला अपने वजूद  के लिए जोड़  लगा रही  हो,
उस समय तुम वहिशायाने अंदाज़ में उस  पर  टूट पड़ते हो,
ये प्यार नहीं, सेक्स नहीं.
ये मानसिक विकृति  है,
ये परपीड़न-रति की पराकाष्ठा  है,
ये महिला पर सत्ता स्थापित करने की जद्दोजहद है,
जब तुम बातों से, व्यक्तित्व से,
प्रभाव नहीं छोड़ पाते,
उस समय तुम्हें अपने शारीरिक बल का ख्याल आता है,
और तुम टूट पड़ते हो उस पर ,
उसे पीड़ा देने के लिए,
उसकी चीख सुनने के लिए,

बलात्कार में कोई आनंद नहीं,
ये प्यार नहीं, ये सेक्स नहीं
बलात्कार हिंसा है !!

मैं एक नदी होती, गर स्त्री न होती !!


मैं एक नदी होती, गर स्त्री न होती,
कि मैं तब भी अपनी पहचान से संतुष्ट होती,
एक स्त्रीलिंग के रूप में.
हां, तब ये जरुर होता, कि
मैं कैद न रहती सीमाओं में,
एक स्त्री की मानिंद,

मैं बहती हिमालय की ऊंचाइयों से
सागर तक.
एक किशोरी की तरह बिंदास होकर,
एक युवती की तरह रमणीय,
एक प्रौढ़ा की तरह गंभीर,
और एक वृद्धा की तरह शांत
मिल जाती अपने सागर से,
और पूरी करती अपनी यात्रा,
पर मिलकर भी अपने सागर से,
अपना वजूद न खोती,
सब मुझे जानते मेरी यात्रा के लिए,
मेरी पहचान होती, एक स्वतंत्र पहचान.
जो न मिटती सागर से मिल जाने पर भी,
हां, मै एक नदी होती, गर स्त्री न होती !!

हलाला !!

बहुत गुस्से में था वो उस दिन,
बाज़ार में उसकी लड़ाई हो गयी थी,
सब्जी का भाव बढ़ा कर उसने बोल दिया था,
तू तू मैं मैं, फिर हाथापाई,
घर आया,
कंठ सूखा था,
लगातार गालियां देने से,
प्यास लगी थी उसे,
पर सलमा का कहीं पता नहीं,
कुछ पुरसुकून शब्द सुनने थे उसे अपनी बीवी से,
बीवी अपने बच्चों को लेकर पड़ोस में गयी थी,
आयी तो उसका चेहरा क्रोध से लाल,
कुछ न सूझा गुस्से में,
बस एक झटके में,
तलाक, तलाक, तलाक.

मुंह से शब्द निकले तो बेचैन हो गया,
हलक सूख गया,
बीवी से करता था बेहद प्यार,
अब क्या हो?
दौड़ा- दौड़ा गया मौलवी के पास,
हाथ फेरते हुए दाढ़ी में मौलवी ने कहा,
हलाला और क्या?
मरता क्या न करता, हो गया राज़ी,
बस एक रात, फिर सलमा मेरी.

सलमा बांध दी गयी, मौलवी के साथ,
रात आई और सलमा मौलवी के बिस्तर पर,
पसीने -पसीने हो गया आधे घंटे में,
और लेकर एक लंबी अंगड़ाई, मौलवी मुस्काया,
सवेरे लथपथ कपड़ों में सलमा गिर पड़ी,
अब तो कर दो आज़ाद,
दौड़ा दौड़ा वो भी आया,
अब तो मेरी बीवी मेरी हो गयी,
मौलवी मुस्काया,
अभी रुको कुछ दिन,
कुछ दिक्कत है.

फिर तो दिन हफ्ते में बदले,
हफ्ते महीने में,
वो दौड़ता रहा और खुद को कोसता रहा,
सलमा भी कोस रही थी अपनी किस्मत को,
और उस दिन को,
जब उसके क्षण भर के गुस्से ने उसे झोंक दिया था,
दोजख की आग में,

एक वो दिन था और आज का दिन,
हर दिन वो बिस्तर में मसली जा रही थी,
और एक दिन जब वो बन गयी हड्डियों का ढांचा,
मौलवी का जी भर आया,
एक झटके में कह डाला, तलाक, तलाक, तलाक,
सलमा आज़ाद हो गयी थी !!

सर्द रात में चाँद का सफ़र !!


सर्द रात में चाँद
तय करता रहा सफ़र.
अकेला आकाश में.
देखा मैंने,कुछ देर रुका,
जब बदली की आगोश में था वो,
हां, कुछ देर रुका,
फिर चल पड़ा.

मैं देखता रहा उसे,
फिर पूछ बैठा चांद से,
तुम क्यों नही रुके,
जब बदली ने
लिया तुम्हें अपनी आगोश में
कहा चांद ने,
रुक नहीं सकता मैं,
कि चलना ही जीवन का नियम है.
कहा है बदली से मैंने,
तुम भी रुको नहीं,
करो न मेरा इंतजार,
अगर साथ आ सकती हो,
तो आओ,
मिलकर नापें सारा आकाश !!

पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार



नितिन राउत 


स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत नितिन राउत परिचित करा रहे हैं संगीता पवार से. घूमंतू जनजाति वड़ार समुदाय से आने वाली संगीता महाराष्ट्र में पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध हैं. 




संगीता पवार पूरे महाराष्ट्र को शराब मुक्त कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उन्हें यह भी पता है कि यह आसान जंग नहीं है, लेकिन जिस दौर से वे गुजरी हैं, उसने इसके लिए उन्हें प्रतिबद्ध किया है, और उनके प्रयास शायद रंग भी लेकर आयें, असर पैदा कर भी रहे हैं.

संगीता का जन्म यवतमाल के पिछड़े  इलाके में 1981 में हुआ. वड़ार समुदाय ( नोमैडिक ट्राइव) से आने वाले उनके पिता फौज में नौकरी करते थे. फौज से सेवानिवृत्ति के बाद उनके पिता ने ठेकेदारी शुरू की. इसी दौरान उनको शराब की लत लगी. शराब पीकर घर आना और छोटी-छोटी बात पर परिवार को मारना पीटना- रोज का रूटीन बन गया. उन जख्मों  को कुरदते हुए संगीता बताती हैं, ‘पापा घर आते तो दहशत का माहौल छा जाता था. कभी खाने की थाली दीवारें सजाती थी तो कभी मम्मी का शरीर. पापा जब घर से निकलते तब हम सभी एक दूसरे के आगोश में रात भर रोया करते’. संगीता ने  मेडिकल लेबोरेट्री एंड टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा किया है.

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पिता का शराब से देहांत

शराब कि बढती लत ने पिता की जान ले ली .इस सदमे में  माता का मानसिक संतुलन बिगड गया. छोटा भाई शराबी हुआ. पूरे मोहल्ले का यही हाल था. इसलिये बाकी जिंदगी शराब मुक्ति के जंग को ही समर्पित करने की ठान ली संगीता ने. प्रयास मोहल्ले से शुरु हुआ. उन्होंने शराब से पीडित महिलाओं को संगठित किया- उनमें आंदोलन की चेतना जगाई .

सरकारी देसी- विदेशी दुकानों से जंग

सरकारी देसी दुकान और विदेशी शराब दुकान के चलते शराबबंदी संभव नही थी. इस समस्या को जड से हटाना जरुरी था. इसके लिए उन्होने ग्रामीण क्षेत्र की  महिलाओ को संगठित किया. गाँव  परिसर में अवैध तरीके से चलने वाले हाथ भट्टी पर धावा बोला . सैकड़ो  महिलाओ को लेकर यवतमाल जिले के रुई गाँव की पहली हाथ भट्टी उन्होने बंद कराई . बहुजन शोषित समाज संघर्ष समिति स्थापित की गई. अब एक गाँव से दूसरे गाँव में अवैध तरीके से शुरू शराब को बंद करने का सिलसिला शुरू हुआ .

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ठेकेदारों का संगीता पर हमला

कई गावों की महिलायें संगीता के कार्य में उनका साथ देने लगीं. संगीता जिस हाथ भट्टी पर धावा बोलती,  वहां के  शराब ठेकेदार अपना बोरिया-बिस्तर लेकर रफा- दफा हो जाते. संगीता का दारू अड्डों पर खौफ बढते जा रहा था. परिणामतः उनके दुश्मनों की तादाद भी बढ रही थी. एक गाँव में शराब बंद करने के बाद संगीता और उनके साथी घर लौट रहे थे,  तब उनपर हमला भी हुआ. हाथ में तलवार लेकर लोगों से लैस एक ‘सुमो गाडी’ ने उनका पीछा किया. संगीता बताती हैं कि बचने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी. लेकिन हिम्मत जुटाते हुए उन्होंने चुनौती दी, ‘आज अगर तुम हमे मारोगे तो कल मेरी बहनें  तुम्हारे साथ तुम्हारे परिवार को जिंदा जला देंगी’. इनका क्रोध और हिम्मत देखकर गुंडे वहाँ से गायब हो गये . ऐसे हमलों और धमकी के फोन की उन्हें आदत पड चुकी है. खोखले धमकियों से वे नही डरती हैं

व्यसन मुक्ति आंदोलन की शुरुआत 

यवतमाल जिले के पास का अर्जुन नगर शाराबियों का अड्डा बन चुका था. मोहल्ले में 50 साल पुराना सरकारी देसी शराब अड्डा था. संगीता अर्जुन नगर की महिलाओं से मिलने उनके घर पहुँची. शराब के चलते बेहद दुखी महिलाओं ने अपना  दुखडा संगीता को सुनाया. अर्जुन नगर में शराब बंदी को लेकर जिलाधिकारी को उन्होंने ज्ञापन सौपा. शराब दुकान हटाने के लिये वहां मतदान करवाया गया. ‘उभी बाटली आडवी बाटली’ (खड़ी बोतल की पड़ी बोतल) बैनर के अंतर्गत यह चुनाव हुआ.  इसमें  50 फीसदी मतदान ‘आडवी बाटली’ के पक्ष में गया. 50 साल पुरानी  सरकारी शराब की दुकान बंद हो गई. अब लोकशाही मार्ग से शराब की दुकाने बंद कराई गई. शुरू में उनके द्वारा स्थापित ‘बहुजन शोषित समाज संघर्ष’ अब ‘व्यसन मुक्ति आंदोलन’ मे परवर्तित हो चुका था. लाखो  महिलायें मोर्चा मे संगीता का साथ देती दिखाई देती.

20 अप्रैल 2015 का यवतमाल जिला शराब बंदी का मोर्चा आज भी उनके रोंगटे खडे कर देता है. यवतमाळ शराब बंद मोर्चे की संगीता ने गुहार लगाई. मोर्चे की तारीख तय हुई . सुबह का समय था,  जब 50 महिलायें मोर्चे में  दिखाई दे रही थीं. उनका विश्वास टूट रहा था. जैसे -जैसे समय बीतता गया, वैसे -वैसे यवतमाल की  सडकों पर जनसैलाब उमड रहा था . 50 हजार महिलायें  मोर्चा में  सहभागी हुई. चार दिन मे मुख्यमंत्री के साथ बैठक और दारूबंदी पर विचार किया जायेगा, ऐसा आश्वासन प्रशासन ने उसे दिया .

पूर्व मंत्री एकनाथ खडसे के मतदारसंघ की शराबबंदी

आंदोलन अब शहर तक सीमित नही रहा. विभिन्न जिले में  शराबबंदी कि चिनगारी भडकणे लगी थी. पूर्व रेवेन्यू मंत्री एकनाथ खडसे के मतदार संघ में कुऱ्हा काकोडा गाँव में शराब की नदिया बहती थीं. तीन देसी शराब के और 1 देसी- विदेशी शराब की दुकान, वहां  सराकर के आशीर्वाद से चलाई जा रही थी . मंत्री के मतदार संघ में शराबबंदी का जंग आसान नहीं था.  शराब दुकानों के पक्ष में  खुद एकनाथ खडसे सामने आये . लेकिन विरोध मे पूरी  जनता ने संगीता का साथ दिया  ‘उभी बाटली आडवी बाटली’  बैनर  के अंतर्गत चुनाव हुआ,  ज्यादातर वोट ‘आडवी बाटली’ के पक्ष में  पडे . हाय कोर्ट के निर्देश से चारो दुकानो को सील लगाया गया . ‘व्यसन मुक्ति आंदोलन समिति;  ने अबतक सैकड़ो  शराब दुकानो को बंद कराया है.

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आंदोलन के चलते हायवे पर शराबबंदी

शराब मुक्त महाराष्ट्र की  मांग को लेकर 15 हजार महिलाओं के  साथ चक्का जाम आंदोलन किया गया . इस मार्ग से गुजर रहे केंद्रीय विधी विभाग के सचिव को घेरा गया . महाराष्ट्र शराब बंदी और हायवे पर हो रही दुर्घटना के चलते हायवे पर ‘वाईन शॉप’ दुकानें  बंद कराने का ज्ञापन सौपा गया था. पत्र व्यवहार किया गया. और हायवे पर शराब की  दुकानें हटाये जाने का निर्णय हुआ.

महिला मुद्दों की पहचान 


अब पूरे महाराष्ट्र में शराबबंदी के लिए संकल्पबद्ध संगीता कहती हैं कि ‘पूर्ण दारूबंदी, आर्थिक सबलता, उद्यमिता आदि महिला आंदोलनों का मुख्य मुद्दा होना चाहिए. महिलाओं की समाज, परिवार ,अर्थ और शासन में 50% भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए.’ संगीता के अनुसार यह सब हासिल करने के लिए पुरुषों का साथ जरूरी है.

नितिन राउत महाराष्ट्र में पत्रकारिता करते हैं. विभिन पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नियमित काम के बाद आजकल फ्रीलांस पत्रकारिता कर रहे हैं. संपर्क: 9767777917

बच्चन के पत्रों के बहाने उनकी स्त्रियों की याद

रविता कुमारी

हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय
हरिद्वार, उत्तराखण्ड
ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in

स्त्री की जैविक अवधारणा को उसकी पहचान के साथ जोड़ दिया गया.भौतिक रूप में स्त्री को भले ही कोई ठोस सम्मान न प्राप्त हो पर उसे भारत में देवी बनाकर पूजा जरुर गया. वह परम्परावादी भारतीय समाज में सम्मान के बोझ तले लदी हुई कराहती रही और अप्निमुक्ति कीआकांक्षा से ग्रसित रही. पर जिस पुरुष समाज में सारे भौतिक संसाधन पुरुष के हाथ में हों वहां पर स्त्रियों के लिए समता और स्वतंत्रता की बात करना बेमानी ही होगी.मधुशाला के कवि हरिवंश राय बच्चन ने भी स्त्रियों को ध्यान में रखकर विपुल मात्रामें साहित्यिक रचनायें की हैं. अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपने जीवन में आने वाली स्त्रियों के चित्र बहुत बेबाकी से रगें हैं. स्त्री अस्मिता का गवाह उनका पूरा साहित्य है. कवितायें तो प्रभूत मात्रा में स्त्री चेतना, ममत्व, प्रेम और औदार्य को लेकर लिखी हैं उन्होंने. बच्चन के साहित्य में भी स्त्री आदर्श भारतीय नारी है जो पुरुष के संरक्षण में ढलकर खुद को मुक्त पाती है.हिंदी कविता के आकाश में बच्चन ऐसे समर्थ कवि हैं जिसने बहुत मुखर होकर स्त्रियों के सम्बन्ध में अपनी रचनायें लिखी हैं. अपने जीवन में आने वाली स्त्रियों के बारे में बहुत बेबाकी से लिखा है उन्होंने. उनका जीवन खुली किताब रहा. उन्होंने कुछ छिपाया नहीं अपितु जस का तस लिख दिया है . यहाँ हम उनके पत्रों के माध्यम से उनके जीवन आयामों को देखने का उपक्रम करते हैं.

पत्रों की दुनिया में बच्चन :


पत्रों की दुनिया एकांत और अकेलेपन की दुनिया है. इसलिए पत्र जीवन की नितांत वैक्तिक विधा है.हर व्यक्ति के पास एक धुंधले पत्र की याद है. हर आदमी के मन में एक पीला लिफाफा रखा हुआ होता है.जब तक शब्द लिफाफे में कैद है तब तक उसकी दुनिया बंधी हुई है परन्तु जैसे ही पाठक उससे मुखातिब होता है पत्र मुंह जोड़कर पाठक से बात करने लगते हैं.आज जब अभिव्यक्ति के सैकड़ो माध्यम मौजूद हैं तब शायद पत्रों की वही अहमियत नहीं रह गई है पर पत्रों का अतीत बहुत उज्ज्वल रहा है.पत्रों ने प्रेम को ही परवान नहीं चढ़ाया है उन्होंने दुनिया के बहुत सारे मसलों को भी हल कराया है. दुनिया की रीत नीत को समझने की सफल कोशिश भी की है.

पत्र किसी भी साहित्यकार की समकालीन घटनाओं,उसके विचारों, धारणाओं और मान्यताओं को जानने का प्रत्यक्ष और प्रमाणिक दस्तावेज होते हैं. बच्चन ने अपने जीवन में अपने परिचितों, पाठकों, शुभेच्छुओं,मित्रों आदि को सहस्रों असंख्य पत्र लिखे जिनमें इतना विषय वैविध्य है कि कोई भी विषय उनके पत्रों की चर्चा हुए बिना नही रह सका है. आत्मकथा,डायरी, भूमिका लेखन, लेख,कविता, लोक गीत,संस्मरण, कहानी, देश-विदेश यात्रा, पुरुस्कार,हिन्दी आन्दोलन,दर्शन, सामाजिक, राजनीतिक,पारिवारिक, फिल्म सम्बन्धी आदि ऐसे अनेक विषयों को अपने में समेटे हुए हैं. स्त्री विमर्श भी उनके पत्रों की चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. बच्चन अपने पत्रों में स्त्री सम्बन्धी अपनी मान्यताओं,धारणाओं आदि की चर्चा ही नही करते वरन् स्त्री के प्रति अपने दृष्टिकोण और विचारों को बडे़ ही स्पष्ट ढंग से व्यक्त करते हैं.

बच्चन आरम्भ से ही स्त्री के रूप-सौन्दर्य के उपासक रहे हैं. किसी भी स्त्री में बाहरी रूप से सुन्दर होने को वे सबसे अधिक महत्व देते हैं. स्त्री का शारीरिक रुप से सुन्दर होना उन्हें इस कदर भाता है कि स्त्री के अन्दर छुपी भावना ,योग्यता, क्षमता भी उसके शारीरिक रुप-सौन्दर्य से कही पीछे छूट जाती है. इन्दु जैन को 27-12-1979को लिखे पत्र में उन्होंने स्त्री  सम्बन्धी अपने दृष्टिकोण को व्याख्यायित करते हुए लिखा है-
“मैं नारी में सबसे पहली चीज सुन्दरता देखता हूँ फिर भावना-फिर योग्यता वगैरह-यानी पहले शरीर,फिर हृदय, फिर मस्तिष्क.”3

आकर्षण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. अपने से विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित हो उसके विषय में सब कुछ जान लेने की जिज्ञासा मनुष्य में परस्पर बनी रहती है. आकर्षण के केन्द्र में रहकर काम अपनी मुख्य भूमिका निभाता है जो मनोविज्ञान का विषय होने के साथ फ्रायड और युंग के मनोविश्लेषणवादीसिद्धान्त से सम्बन्ध रखता है.

प्राचीनकाल से ही पुरूष स्त्रियों के रूप-सौन्दर्य से आकर्षित होते रहे हैं. स्त्री रूप के साधक होने के कारण बच्चन भी अपने यौवनकाल में ही कई स्त्रियों ( चम्पा ,श्यामा,प्रकाशो,तेजी) के सम्पर्क में आ गये थे. जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमें उनकी आत्मकथा में मिलता है. स्त्रियों द्वारा स्वयं बच्चन को नचाये जाने के सम्बन्ध में डॉ. कमलकिशोर गोयनका की जिज्ञासा को शांत करते हुए उन्हें प्रेषित पत्र में वे अपने विचारों को वाणी देते हुए लिखते हैं-” स्त्रियों ने केवल मुझे ही नहीं नचाया गोयनका जी बहुत से लोगों को बचाया है,आपको भी नचाया होगा या नचाती होगी. सूर भी नचाया है-‘ अब मैं नाच्यों बहुत गोपाल ‘- और नचाने वालों में पहला स्थान ‘काम’ को दिया. तुलसीदास कहते हैं-‘ उमा दारू योषित की नाई,  सबहिं नचाबत राम गोसाई.’ राम गोसाई खुद नचाने कहां आते हैं,वे पुरुषों को नचाने के लिए स्त्रियों को भेज देते हैं. पुराण भरे पडे़ हैं इन्द्र की भेजी स्त्रियों से जिन्होंने ऋषि- मुनियों को नचा दिया है,राजाओं, देवताओं को भी-
‘ हम लघु मानव को क्या लाज
गए मुनि – देवों के मन डोल.'”4

संसार की प्रत्येक स्त्री अपने जीवन में जन्म से ही रिश्तों में बन्ध एक साथ अनेक रूपों का निर्वाह करती है जो उसके द्वारा जिये प्रत्येक रिश्ते को एक नई पहचान एक नई परिभाषा देकर उसके व्यक्तित्व को सम्पूर्णता प्रदान करता है. बच्चन किसी भी स्त्री में माँ, प्रेयसी, स्वामिनी और साथ ही सेविका इन चारों रूपों के विद्यमान होने पर ही उसे पूर्ण नारी होना मानते हैं. किसी भी स्त्री के व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करने वाले इन चारों रूपों के सम्बन्ध में डॉ. कमलकिशोर गोयनका को प्रेषित पत्र में अपने विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए लिखते हैं-“जीवन में परिपूर्ण नारी अपने चारों रूपों के प्रति सचेत और सन्तुलित रहेगी.मेरी दृष्टि में वे चार रूप हैं-p-10माँ के/प्रेयसी के(प्रमदा के)/स्वामिनी के/सेविका के/, पुरुष इन चारों रूपों में नारी को पाकर ही धन्य होता है,चौथाई रूप में कभी नहीं.”5 आगे वे लिखते हैं :स्त्री और पुरूष एक दूसरे के सहयोग के बिना अधूरे होते है. दोनों के परस्पर सहयोग से ही सृष्टि का निर्माण होता है. शायद अर्द्धनारीश्वर  की कल्पना भी स्त्री और पुरूष में विद्यमान इसी बराबर शक्ति,सार्मथ्य के आधर पर ही की गई है. हिन्दू धर्म के इसी अर्द्धनारीश्व्र के समान जोडे़ं की कल्पना बच्चन दाम्पत्य जीवन में करते हैं. इस सन्दर्भ में डॉ. कमलकिशोर गोयनका को प्रेषित पत्र में p-11. आदर्श जोड़ें की कल्पना करते हुए लिखते हैं-“पराशक्ति ठीक आधा पुरूष हैं,/ठीक आधा नारी है-/’त्वमेव माता च पिता त्वमेव’/समत्व का मिलन पराशक्ति में न होगा तो कहां होगा?दाम्पत्य में अगर नर-नारी ऐसे मिल सकें तो वैसा आदर्श जोड़ा कहां मिलेगा.”6

पुरूष जीवन को सन्तुलन और संतुष्टि प्रदान करने में स्त्री की मुख्य भूमिका होने को कोई नकार नही सकता. जीवन की दु:ख,वेदना, ईर्ष्या तथा विषमताओं आदि की अग्नि से त्रस्त पुरूष के लिए स्त्री एक शीतल छाया के समान होती है जहां उसे विश्राम मिलता है. स्त्री के सम्मुख सम्पूर्ण समर्पित होने से पुरूष की बडे़ से p-12  वे लिखते हैं-“उन्होंने कभी अपने अहं को मेरे अहं के समक्ष बड़ा या ऊँचा सिद्ध करने की कोशिश नहीं की. ऐसे अवसर कम नहीं है जब गलती या भूल मेरी तरफ से हुई है और कसूर उन्होंने अपना मान लिया है. वे मेरी नजर में उठ गई है और मैं स्वयं अपनी नजर में गिर गया हूँ.”9

प्रत्येक स्त्री में उसके स्वभाव, गुण, रुचियाँ,योग्यता, क्षमता आदि सभी कुछ एक दूसरे से भिन्न होती हैं. यही भिन्नता उसके व्यक्तित्व को एक अलग दिशा और पहचान देती है. बच्चन के जीवनकाल में कई स्त्रियाँ आई जो प्रत्येक अपने व्यक्तिक गुणों के कारण एक दूसरे से भिन्न थी. अपने जीवनकाल में आई बडे़ अभावों की पूर्ति भी आसानी से हो जाती है. उमाकांत मालवीय को 30-8-1960को प्रेषितपत्र में बच्चन इस तथ्य का समर्थन करते हुए लिखते हैं-“नारी के आगे सम्पूर्ण समर्पित होने से मनुष्य के किस अभाव की पूर्ति नही होती?”7बच्चन का मानना है कि-“नारी का सबसे बड़ा आकर्षण है समर्पण-और समर्पण का सबसे बड़ा गुण है कि वह समर्पित करा लेता है.”8स्त्री के इसी समर्पण भाव के आगे वे स्वयं को असहाय पाते हैं. बच्चन अपनी दूसरी पत्नी तेजी के सम्पूर्ण समर्पण भाव से अविभूत दिखाई पडते हैं. डॉ.  कमलकिशोर गोयनका को प्रेषित पत्र में तेजी के इस गुण के सन्दर्भ मेंp-13

स्त्रियों को वे उनके व्यक्तित्व में विद्यमान गुणों के कारण अलग-अलग रूप में देखते हैं. डॉ. कमलकिशोर गोयनका को प्रेषित पत्र में वे चम्पा,श्यामा और तेजी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन इस प्रकार करते हैं-“चम्पा परी थी,/श्यामा देवी थी,/तेजी आदर्श पत्नी-सेविका,स्वामिनी,संगनी हैं (‘सेवक, स्वामी, सखा, प्रियसी के’).”10बच्चन के शोध कवि रहे डब्लू बी ईट्स का त्याग एक स्त्री का पुरूष को उसके जीवन में सफल बनाने व उसकी उन्नति-प्रगति में सहायक होने की धारणा को और अधिक दृढ़ता से विश्वास करने को बाध्य करता है. p-15माडगान ईट्स की प्रेमिका थी. ईट्स उनसे विवाह करना चाहते थे. परन्तु माडगान ने ईट्स से विवाह करने से मना कर दिया था क्योंकि वह जानती थी कि ईट्स एक प्रतिभाशाली व्यक्तित्व है और उससे विवाह करना उसके हित में नही होगा. ईट्स माडगान को कभी भुला नही पाए. माडगान की स्मृति की प्रतिक्रिया बराबर ईट्स की कविताओं में प्रतिबिम्बित होती रही.

रामनिरंजन परिमलेन्दु को 18-3-1958को प्रेषित पत्र में बच्चन इस सन्दर्भ में अपने विचार प्रकट करते हैं-“माडगान का विचार यह था कि ईट्स से विवाह न करके उसने ईट्स के हित में अच्छा किया. बच्चन लिखते हैं’देखकर पाया न कोई/स्वप्न वे सुकुमार सुन्दर/जो पलक पर कर बिछाकर/थी वही मधुयामिनी वह ‘”11बच्चन को वह स्त्री अपनी और आकर्षित करती है जो किसी न किसी रूप में स्वयं में सक्षम हो. चम्पा की और वे उसकी सुन्दरता के कारण आकर्षित होते हैं,श्यामा का भोलापन उन्हें उसकी और आकर्षित करता है, वही तेजी का सम्पूर्ण रूप से समर्पित हो जाने पर उनका हृदय तेजी के लिए श्रद्धा व सम्मान से भर जाता है. इसी प्रकार देश की प्रथम प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की कार्य कुशलता के वे प्रशंसक हैं. डॉ.  कमलकिशोर गोयनका को प्रेषित पत्र में वे श्रीमती इन्दिरा गांधी का एक कुशल राजनीतिज्ञ होने की प्रशंसा करते हुए अपने विचारों को इस प्रकार अभिव्यक्ति देते हुए लिखते हैं-“उनसे कम योग्यता, क्षमता, राजनैतिक सूझ-बूझ, चरित्र बल, इच्छा शक्ति वाला इस देश को शायद ही सम्भाल सकता.”12अतः बच्चन के पत्र आइने की तरह साफ है. जिनमें वे अपनी स्त्री सम्बन्धी मान्यताओं,विचारों,स्त्री के प्रति आकर्षण आदि को बड़ी ही निशचलता व स्पष्टता के साथ प्रकट होते हैं. वे स्त्री के श्रृंगार को उसकी स्थूलता में लाकर रख देते हैं और उनके विचारों को प्रकट करने के साधन होते हैं उनके पत्र.

सन्दर्भ ग्रन्थ –
1.  कामायनी -जयशंकर प्रसाद, पृ.-34
2.  नारी विमर्श के अर्थ का निहितार्थ-2-नेट.प्रज्ञान- विज्ञान, अप्रैल-7-2013
3.  बच्चन रचनावली भाग-9-अजित कुमार, पृ.-388
4. जिज्ञासाएं मेरीःसमाधान बच्चन के-डॉ. कमलकिशोर गोयनका, पृ.-34
5.-वही,-पृ.-42
6.-वही, पृ.-43   p-19: 7.- बच्चन के चुने हुए पत्र-अजित कुमार,पृ.-39
8.-जिज्ञासाएं मेरीः समाधान बच्चन के-डॉ. कमलकिशोर गोयनका पृ.-39
9.-वही, पृ.-36-37
10.-वही, पृ.-38
11.-बच्चनः पत्रों के दर्पण में-रामनिरंजन परिमलेन्दु ,पृ.-46
12.-जिज्ञासाएं मेरीःसमाधान बच्चन के-डॉ.कमलकिशोर गोयनका, पृ.-144  p-20