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नागार्जुन के उपन्यासों की दलित पक्षधरता

श्याम लाल गौड़


प्राध्यापक,श्री जगदेव सिंह संस्कृत महाविद्यालय,सप्त ऋषि आश्रम हरिद्वार.



नागार्जुन ने अपने समाज में निरन्तर गिरते मानव मूल्यों को देखा है। वे बचपन से निम्न वर्गीय अभावों से ग्रसित रहे। वे ऊँच-नीच, छुआ-छूत, अस्पृश्यता, ब्राह्मण-शूद्र के भेद-भावों को देखते हुए आ रहे थे। इन विषम परिस्थितियों ने नागार्जुन को सोचने के लिए बहुत कुछ दिया है। इन समस्याओं पर लिखा जाना स्वाभाविक था क्योंकि वे समस्याएॅं आज भी जीवन्त हैं। वे  खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं।


नागार्जुन व्यक्गित दुःख पर न रुककर व्यापक दुःख पर प्रकाश डालते हैं। नागार्जुन सामाजिक चेतना सम्पन्न रचनाकार थे, अतः इन रूढ़ियों के विरुद्ध वे विद्रोह करते दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने ‘इमरतिया’ उपन्यास में हरिजन वर्ग के साथ पूर्ण सहानुभूति व्यक्त की है। उनकी दृष्टि में सब समान हैं। इस उपन्यास में उपन्यासकार ऐसेे ही विचारों को अभिव्यक्ति देता हुआ कहता है कि ”इसी तरह मेहतर भी सफाई का काम कर चुकने के बाद नहा-धो ले, कपड़ा पहन ले फिर हमारे साथ बैठकर वह पूजा पाठ में क्यों नहीं शामिल होगा, आत्मा तो एक ही है, शरीर का चोला अलग-अलग हो सकता है।“


नागार्जुन जाति-पाॅंति की भावना को समाज के लिए अभिशाप मानते हैं। वरुण के बेटे उपन्यास का मोहनमाॅंझी कहता है- ”मैथिली महासभा, राजपूत सभा, दुसाध महासभा आदि जो भी साम्प्रदायिक संगठन हैं, सभी का वायकाट होना चाहिए। इन महासभाओं के नेता आम लोगों की एकता में दरार ड़ालने का ही एक मात्र काम करते हैं।“

नागार्जुन ने अपने आंचलिक उपन्यास ‘बलचनमा’ में भी सर्वहारा वर्ग के जीवन्त उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। वे इतने सजीव और वास्तविक हैं कि शब्दचित्र की भाॅंति हमारे समक्ष घटित हो रहा हो ऐसा प्रतीत होता है।
एक निम्नवर्गीय किसान परिवार जो सदियों से शोषण और दमन का शिकार होता चला आ रहा है। बंधुआ मजदूर होकर गाॅंव के जमींदारों के यहाॅं काम करना और बदले में मुश्किल से दो वक्त की रोटी कमा पाना। आकस्मिक घटनाओं जैसे बीमारी, शादी-व्याह आदि के लिए जमींदारों से कर्जा लेना। यदि एक बार कर्ज की चपेट में आये तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसी कर्ज भॅंवर में फॅंसकर रह जाते हैं। कभी भी उससे उऋण नहीं हो पाते। इस तरह जमींदारों के शिकजें में उन गरीबों के घर, खेत, बैल, भैंस, सब आ जाते हंै। और इस तरह वे उनके इशारों के गुलाम बने घूमते हैं। जरा सी भूल-चूक उनके लिए मौत का बुलावा हो जाता। ऐसा ही एक उदाहरण जब ‘बलचनमा’ का बाप जमींदार के बाग से एक आम चुरा लेता है। मालिक को पता चलने पर उसके साथ जो सलूक किया जाता है वह दृश्य अत्यन्त मार्मिक बन पड़ा है।
‘‘मेरी दादी कांपते हाथों मालिक के पैर छुए है। उसके मुॅंह से बेचैनी में यही एक बात निकलती रही है कि दुहाई सरकार की मर जाएगा ललुआ। छोड़ दीजिए सरकार। अब कभी ऐसा ना करेगा। दुहाई मालिक की। दुहाई माॅं-बाप की और माॅं रास्ते पर बैठी हाय-हाय करके रो रही है और में भी रो रहा हूँ। मेरी छोटी बहन की तो डर के मारे हिचकी बॅंध गयी है।’’

बाल्यावस्था से ही जीवन संघर्ष जीवन को और अधिक तपाते हैं। इसी तपन में तपता बलचनमा पेट की आग की खातिर वह सब कुछ उस उम्र में करता है, जो उम्र उसकी खाने खेलने की है। पिता के मृत्यु के पश्चात बलचनमा अल्पायु से ही काम में जुट जाता है। यही नियति बन चुकी है उन परिवारों की जहाॅं अभावों ही अभावों का जाल फैला है। सुबह की फिक्र में शाम गुजरती है। और शाम की फिक्र में सुबह ऐसा ही एक दृश्य बलचनमा की जिन्दगी का-”दादी ने मना किया था, अभी खाने-खेलने के दिन है, इसी समय जोत देगी जो कलेजा सूख जायेगा, इस पर माॅं बोली थी कि अभी से पेट की फिक्र नहीं करेगा तो बेहतरा हो जाएगा।“

परवशता को भाग्य मान लेना और जीवन यापन के लिए जमादारा­ पर पूरी तरह निर्भर रहना तथा उनकी ही दया दयालुता पर जिंदा रहना ही सम्भव है, ऐसा विश्वास इस वर्ग के दिमाग म­ घर कर गया है। ऐसा ही एक उदाहरण जब बलचनमा 14 वर्ष की आयु म­ अपने मालिकों के यहाॅं काम पर जाता है, इसके बदले में उनकी मालिकाइन क्या देना चाहती है। और उसकी दादी किस प्रकार अपनी हीनता का प्रदर्शन कर काम के बदले म­ रोटी-कपड़ा माॅंगती है।

मेरी कमर म­ फटी-सी मैली-सी बिस्ठी झूल रही थी। बिस्ठी न तो लंगोटी है न कच्छा, कपड़े के लीरे अगर तुम कोपीन की भाॅंति पहन लो वही हमारे यहाॅं बिस्ठी कहलाएगी। मालिकाइन ने बिस्ठी की ओर इशारा करके कहा कपड़ा हमसे पार नहीं लगेगा। यह सुनकर दादी ने दाॅंत निपोड़ दिये चेहरे पर झुर्रिया­ और लकीरा­ में ­ बल पड़ गया। दोना­ हाथ जोड़कर वह गिड़-गिड़ाई ‘‘क्या कमी है मालिकाइन आप लोगा­ के यहाॅं? आप ही का तो आसरा है, नह° तो हम गरीब जनमते ही बच्चा­ को नमक न चटा द­। अरे, अपना जूठन खिलाकर अपना फेरन-फारन पहनाकर ही तो हमारा पर्तपाल करतीं हैं।“2


बलचनमा जब जमादार के यहाॅं काम करने लगता है, और काम करने म­ उससे भूल-चूक या देर सबेर होती, तो उसे डाॅंट-डपट तथा मार-पीट का तो सामना करना पड़ता था इतना ही नही कभी-कभी उसे भूखे पेट भी रहना पड़ता था। गाली गलाॅज का सामना तो उसे बात-बात पर करना पड़ता था। उसने यह सब पेट की खातिर सहने-सुनने की आदत सी डाल ली थी अन्यथा थोड़ा बहुत मिलता था वह भी नहीं मिलता। इस प्रकार कितना लाचार और असहाय होकर जबरन यह सब सहना पड़ता है, जोकि नहीं सहना चाहिए।


”गालियाॅं सुनकर दो-चार दिन तो मुझे थोड़ी बहुत तकलीफ हुई, पर बाद में कान खूब पक्के हो गये। गद्धा, सूअर, कुत्ता, उल्लू…. क्या नहीं कहती थी वह मुझे? उनका गुस्सा चुपचाप सह जाना मुझे सीखना पड़ा। एक बार दोपहर को घास लाने में जरा देर हो गयी, बैशाख-जैठ की जलती धरती, तो घास छीलने म­ बड़ी कठिनाई होती है। पच्चीसा­ जगह खुरपी चला चलाकर तंग आ जाओगे फिर भी टोकरी भर घास नहीं होगी, लेकिन जो देवी कई-कई देवड़िया­ वाली हवेली के भीतर छाॅंह म­ आराम से बैठी हुई हो। उन्ह­ अपनी यह दिक्कत तुम समझा पाओगे भइया, उनके लिए सारी धरती रही नरम-नरम दूबा­ से भरी। सो उस रोज घास लेकर जब मैं  जरा देर से पहुॅंचा, तो मालिकाइन हु-हुआ उठी, मर क्यों न गया? बड़े नवाब के नाती हुए हो। कहीं बैठकर बाप के साथ कोड़ी खेल रहा होगा, और देर हो गयी घास नहींमिलती है। खुरपी भोथी है, बेंट ढीला पड़ गया था।……………… पचास बहाने बनाता है। मुॅंहझौसा इतना कहकर जब उन्ह­ संतोष न हुआ तो झाडू उठा लाई और मेरी पीठ पर सात बार झटाझट बरसा दिए। मैं ए­चकर वहीं बैठ गया ईह-ईह कर उठा।“

जब जमादारा­ के यहाॅं कोई नौकर होकर था, तो उसे वह जानवरा­ से भी बदतर निगाहा­ से देखते थे। घर का जो भी गन्दा खराब और बेकार खाना होता था, उसे वह नौकरा­ को दे देते थे। ऐसा ही एक दृश्य बलचनमा का जब उसे इसी प्रकार बचा झूठा बेकार खाना मालिकाइन देती, वह भी बड़े एहसान के साथ। वह जब बहुत खुश होती तो सूखा या बासी पकवान, सड़ा-आम, फटे दूध का बदबूदार छैना या जूठन की बची हुई कड़वी तरकारी देती हुई मुझे कहती- बलचनमा ऐसी अच्छी चीज तेरे बाप-दादा ने भी नहीं खाई होगी। दही जब बहुत खट्टा हो जाता था, उससे बदबू आने लगती थी और वह उनके अपने या किसी पड़ोसी के खाने लायक न रह जाता तब मुझे मिलता। मैं  उस दही को कुत्ते की भाॅंति खा लेता। याद आता है कि एक बार जास्ती खट्टा और दुर्गन्ध रहने से उस दही को नहीं खा पाया तो मालिकाइन ने सजा दी थी- अगले दिन खाना नहीं मिला था।’’


बेबस और निस्सहाय बचलनमा की जमींदारा­ के व्यवहार और नीयत के प्रति एक अजीब सी आह भरी टीस निकलती है। उस भाग्य निर्माता के लिए जो भाग्य के नाम पर कितना कुछ इन्सान को सहने पर मजबूर और लाचार कर देता है। बेबसी म­ वह सब कुछ सहता अवश्य है, किन्तु उसम­ इतनी चेतना जागृत अवश्य होती है कि भाग्य का खेल एक वर्ग विशेष को ही क्या­ नचाता है। क्या अर्थहीनता के कारण या शक्ति सामथ्र्य साम, दाम, दण्ड, भेद आदि नीतिया­ के कुचक्र से परे होने के कारण? आखिर विभेद क्या­?

”अच्छा तो भगवान करते ही हैं। चार परानी का परिवार छोड़कर मेरा बाप मर गया, यह भी भगवान नेे ठीक ही किया। भूख के मारे दादी और माॅं आम की गुठलिया­ का गूदा चूर-चूर कर फाॅंकती  हैं, यह भी भगवान ठीक ही करते हैं। और सरकार आप कनकजीर और तुलसीफूल के खुशबूदार भात, अरहर की दाल, परवल की तरकारी, घी, दही, चटनी खाते है , सो यह भी भगवान की ही लीला है। चौकोर कलम बाग के लिए आपको हमारा दो कट्टा खेत चाहिए और हम­ चाहिए अपने चैकोर पेट के लिए मुट्ठी भर दाना।“

बलचनमा के इस कथन म­ नागार्जुन ने भेदभाव की कशक को उभारा है और यह दर्शाया है, भगवान के नाम पर अन्धी श्रद्धा को। बलचनमा उपन्यास म­ अनेक ऐसे स्थल हैं, जहाॅं सर्वहारा का सजीव प्रतिबिम्ब झलकता है।
‘कुम्भीपाक’ उपन्यास भी नागार्जुन का ‘आम वर्ग’ का प्रतिनिधित्व करने वाला उपन्यास है। इसम­ भी एक ऐसा स्थल है जहाॅं इस वर्ग का यथार्थ चित्र मिलता है। जहाँ  इस वर्ग के प्रतिनिधि रिक्शा चालक की भावनाआ­ और मजबूरी से खिलवाड़ होता हुआ दर्शाया है। अपनी मेहनत की भी मजदूरी न मिलने पर आक्रोश व्यक्त करता हुआ सफेद पोश डाकू रिक्शावाले ने थूककर कहा- ”कसाई कहीं का किस सफाई से गरीबा­ का गला काटता है! और अन्दर कुर्सी पर बैठकर नानी को फोन कर रहा होगा……..।“

सम्पादक महोदय जो पहनावे से सम्पन्न नजर आते हैं  और एक रिक्शा चालक से दुअन्नी के लिए झगड़ा करते हैं। वह भी एक मिनिस्टर के बंगले पर। रिक्शा चालक पहले तो बड़ा तैंस म­ आता है और सम्पादक के पीछे-पीछे कमरे तक चला जाता है, किन्तु चपरासी के कहे शब्दा­ म­ धनाढ्य वर्ग और आज की व्यवस्था पर जो व्यंग्य और कसिस थी, वह आज का वास्तविक यथार्थ है



”चपरासी मुस्कराया अरे इन्हीं कोठिया­ के अन्दर तो अन्याय पनाह लेता है आकर। सरकार अभी इन्ह° कोठिया­ और बंगला­ म­ कैद है, उसे तुम तक पहुॅंचने म­ दस-बीस वर्ष लग जाएॅंगे अभी।“
यही सर्वहारा वर्ग का यथार्थ चित्र है। वह अपने हक के लिए आवाज भी नहीं उठा सकता। उसकी आवाज दबा दी जाती है।

‘गरीबदास’ उपन्यास का प्रमुख पात्र गरीबदास नामक एक नाटे कद का सांवली सूरत का एक अधेड़ साधु वेश वाला व्यक्ति है। जिसम­ हरिजन वर्ग के प्रति विशेष लगाव और हमदर्दी है। वास्तव म­ तो गरीबदास के स्वर म­ स्वयं नागार्जुन का ही प्रतिरूप झलकता है। उन्हा­ने अपने स्वर को गरीबदास का स्वर और कार्य बनाकर उपन्यास म­ अवतरित किया है। यह सब नागार्जुन का सर्वहारा वर्ग के प्रति असीम सहानुभूति का प्रतिफलन है। अपने बच्चा­ को बाराखड़ी का अभ्यास करवाने के लिए हरिजना­ ने अपनी उस छोटी बस्ती के अन्दर ही एक ‘शाला’ खोली थी। इस शाला की निगरानी का भार भगत लछमनदास ने अपने ऊपर खुशी-खुशी ले लिया था। गरीबदास इस शाला के लिए हर महीना तीस रुपए का इंतजाम करते थे। बीस रुपए शिक्षिका को मिलते थे, दस रुपए और कामा­ के लिए रखे रहते थे। लेकिन यहाॅं तो गरीबदास ने मजदूरी करते हुए ही इस शाला का इंतजाम किया था।


क्या मजबूरी थी? मजबूरी यह थी कि गाॅंव के प्राइमरी स्कूल म­ हरिजन बच्चा­ के प्रति सवर्ण परिवारा­ के बच्चा­ का सलूक तिरस्कारपूर्ण तो था ही, आतंकजनक भी था। पिटाई के डर से हरिजन बच्चे अक्सर वहाॅं से भाग जाते थे। बार-बार की शिकायता­ के बाद भी जब स्थिति म­ सुधार नह° हुआ तो गरीबदास ने इधर के बच्चा­ की पढ़ाई के लिए अलग इंतजाम किया। चार्टा­ के ऊपर एक फोटो दीवार म­ चिपका दिया गया था।“


गरीबदास की निम्न वर्ग के प्रति निष्ठा और कार्यशैली का अनूठा उदाहरण है कि किस प्रकार उनमें गरीब बच्चा­ के भविष्य के प्रति जागरुकता है। और इसी कारण वे सवर्णों के दुव्र्यवहार वश निम्न शोषित वर्ग के बच्चा­ के लिए उनकी ही बस्ती म­ एक पाठशाला खोलते हैं। जिसका भार वे स्वयं उठाते हैं। खुद मजदूरी कर पाठशाला चलाना और पूरी व्यवस्था करना गरीबदास का ही कार्य था। स्कूल की अध्यापिका भी उन्हा­ने अपनी ही बस्ती की एक विधवा स्त्री को बनाया। जिससे उनको तो सहायता मिलती थी, साथ ही एक बेसहारा स्त्री को इज्जत का काम कर जीविका  चलाने का अवसर मिलता है।

उनकी पाठशाला की यह खास बात थी कि उसम­ आम छुट्टी रविवार को भी उनका स्कूल बन्द  नह° रहता था, बल्कि उनकी पाठशाला म­ छुट्टी उन दिना­ रखी जाती थी। जब उसकी खास जरूरत होती। जैसे जिन दिना­ खेता­ म­ अधिक काम रहता तब पाठशाला बन्द रहती, या फिर तीज त्यौहारा­ पर, जिससे सामाजिक उत्तदायित्व भी पूरा होता रहता। गरीबदास बच्चा­ के मनोविज्ञान को बखूबी समझते हैं , कि बच्चा­ को यदि कोई अच्छी बात मनवाना हो तो किस तरह उन्ह­ आकर्षित करना चाहिए, इसीलिए उन्हा­ने अपने बच्चा­ की पाठशाला म­ राष्ट्रीय त्योहारा­ पर बच्चा­ को भरपेट जलेबी पूड़ी खिलाने का काम शुरू किया था। इससे बच्चे खुश तो होते ही थे, साथ ही यह उनम­ पढ़ाई के प्रति आकर्षण पैदा करने का जरिया भी था।


इतना ही नहीं वे समूचे गाॅंव बस्ती के शुभ चिंतक थे, गाॅंव म­ कहाॅं क्या हो रहा है, और क्या करना है? कौन सी बात लोगा­ के लिए हितकर रहेगी कौन सी नह° आदि बाता­ का भी गरीबदास ध्यान रखते थे। वे अपने वर्ग के लोगा­ की भावनाआ­ और समस्याआ­ के प्रति सचेत होकर उस ओर अग्रसर रहते थे। एक बार भजन-कीर्तन के लिए एकत्रित मण्डली के कुछ लोगा­ म­ से भगत को गरीबदास गाॅंव का हाल समाचार सुनाने को कहते ह®। और भगत द्वारा गाॅंव के प्रत्येक निम्न वर्ग के व्यक्तिया­ म­ डर और दहशत समाज की बात जानकर गरीबदास मन ही मन बहुत व्याकुल होते हैं। और आई हुई समस्या के समाधान के लिए रात-रात भर जाग कर घूम-घूम कर उपाय निदान सोचते रहते हैं । वे दूसरा­ के लिए इतने व्याकुल हो जाते हैं , कि अपना खाना-पीना तक भूल जाते और चिन्तन कर कोई न कोई हल निकालने म­ जब सफल हो जाते तब ही कुछ अन्न जल ग्रहण करते। इस तरह की बैचेनी वाले पात्र गरीबदास पर ‘‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिंअधमाई’ वाली पंक्ति चरितार्थ होती है। उनके स्वयं से ही चल रहे द्वन्द्वात्मक युद्ध का एक उदाहरण ‘‘बाबा गरीबदास की चहल-पहल थमी नहीं  थी अपनी परछाई से ही बातें करने का जी कर रहा था।’’



गरीबदास ठमककर खड़े रह गये हाथ उठाकर अपनी परछाई से बोले, ‘तू उसका क्या कर लेगा?’ मालिक लोग चमारा­ की बस्ती को फूंक द­गे सौ पचास इन्साना­ को जलाकर खाक कर द­गे, तो भी मालिक लोगा­ का तू क्या बिगाड़ लेगा? थाने का दरोगा उन्हीं  की बिरादरी का है, यह खुले आम उनकी तरफदारी करता चलेगा। एस0पी0 कमजोर दिलवाला हरिजन है, उसके ऊपर-नीचे ज्यादातर बड़े अधिकारी ऊँची जातिया­ के ही लोग जमे हुए हैं । यह बेचारा तेरे लिए क्या हलाक होगा! तू ठहरा बापू जी का प्यारा हरिजन बालक, तेरे लिए स्वर्ग का फाटक खुला हुआ है। नियम-निष्ठा से रहेगा तो तेरे को इसी जनम म­ संत रैदास की तरह लोग पूज­गे, तब यही मालिक लोग तेरी तारीफ अखबारा­ म­ छपवाया कर­गे। तब तेरी कुटिया छता­ वाली, कई मंजिला­ की विल्डिंग की तरह अंधेरी रात म­ भी दूर से दमका करेगी। तेरे महर्षि की यह प्रतिमा तब संगमरमर वाले चबूतरे को बाॅंस के छोटे बाड़े म­ घेर-घारकर महर्षि को नह° रखा जाएगा, तब हरिजन मन्त्री कारा­ पर लद कर तुमसे परामर्श करने आय­गे बेटा।“


जब गरीबदास परहित के ध्यान समुद्र म­ गोते लगाते तो उन्ह­ स्वयं के मन का होश नह° रहता। यदि  बैठे हुए सोच रहे ह®, तो घण्टा­ बैठे ही रहते। यहाॅं तक सोच म­ डूब जाते कि अपने को भी दूसरा­ के लिए न्योछावर कर देते। ऐसे ही सोच का एक उत्कृष्ट उदाहरण, ”गरीबदास पालथी मारकर दीवार के सहारे बैठ गये। तटस्थ भाव से मन के पंछी की उड़ान देखने लगे, अपने आपको सम्बोधित करके गरीबदास ने बोलना शुरू किया- बेटा, हिम्मत से काम लो। बेधड़क आगे की तरफ कदम बढ़ा। ऐसा नहीं करेगा तो दुनिया तेरा कचमूर निकाल देगी। धनिये की तरह पीसकर लोग तुझे चट कर जायेंगे।

सौ पचास जीवा­ का भला करने से तुझे थोड़े बहुत उल्टे सीधे काम करने पड़­गे सिर्फ फासला तय करना, सिर्फ चलते जाना काफी नहीं होगा, नये सिरे से तुझे पगडंडियाॅं बनानी हा­गी, नई राहा­ के निर्माण की कोशिश म­ हो सकता है, तेरे पंख बार-बार झुलस जाय­ तू बुरी तरह घायल हो जाय, नई राह­ बनाने के सिलसिले म­ यह सब झेलना होगा तुझे।“

अन्ततः नागार्जुन का चिन्तन गरीबदास के समाज की उस व्यवस्था पर किया गया है, जहाॅं समाज का प्रतिष्ठित धनाढ्य वर्ग, आम जनता के लिए यदि कुछ करता है, तो उसका अंकुश उसको उस लाभ के प्रतिरूप म­ झेलना पड़ता है। संस्था, समिति तथा आश्रम के रूप म­ चलने वाली सामाजिक व्यवस्थाएॅं जो आप शोषित या सामाजिक विक्षिप्तता प्राप्त लोगा­ के लिए कार्य करती है। इन्हीं  वर्ग की मुहताज होकर उनके इशारे पर चलती है। वहाॅं भी उन्ह­ स्वतन्त्रता प्राप्ति नहीं ऐसा ही एक चिन्तन गरीबदास के माध्यम से आम जनता के हितार्थ किया गया।


‘‘नये सिरे से दस-बीस बालका­-बालिकाआ­ की भर्ती करके एक आश्रम भी चालू किया जा सकता है, बाबा ने सोचा लेकिन, आश्रम चलाने के लिए शुरू म­ ही दस-बीस हजार रुपये चाहिए, दस-बीस एकड़ जमीन चाहिए, आश्रम की बुनियाद तभी पक्की होगी जब मालिक लोगा­ म­ से दो एक प्रभुआ­ का जमकर सहारा लिया जायेगा। गरीबदास तू जिस मालिक का सहारा लेगा, उसी  के हुक्म चल­गे न तेरे आश्रम म­। जो मिनिस्टर, जो बड़ा हाकिम तेरे आश्रम को दस-बीस हजार की सरकारी मदद दिवायेगा, वह क्या या­ ही तेरे को खुला छोड़ देगा? फिर एक दूसरा झंझट भी तो लगा रहेगा, वह झंझट वह झमेला ऐसा होता है कि बड़े-बड़े आश्रमा­ का मटियामेट हो जाता है, जिन बालका­ और बालिकाआ­ को तू उनके बचपन म­ ही अपने आश्रम म­ घेर-घारकर रखना शुरु करेगा। उनके माँ-बाप, उनके रिश्तेदार, उनके पुराने मालिक बीच-बीच म­ उन्ह­ आश्रम से खिसकाते रह­गे, तब तू क्या करेगा? तेरे आश्रम का भट्टा नहीं बैठ जाएगा? धीरे-धीरे सिखाया-पढ़ाया हुआ तोता जब पिंजड़े से उड़ जाता है, तो दिल को भारी कचोट नह° पहुॅंचेगी? गाॅंधी जी को जिन्दगी म­ चार बार अपने आश्रमा­ का अन्त देखना पड़ा था। अंग्रेज सरकार भी बापू के पीछे पड़ी रहती थी। कभी जेला­ ठुका लेती थी, कभी बड़े लाट की कोठी म­ उनके फलाहार का इन्तजाम करती थी। अपने समाज के दकियानूस लोग बापू जी को पसन्द नहीं करते थे- सेठा­ म­ से कुछ तो जरूर ऐसे थे जो कि आश्रम को नये सिरे से स्थापित करने म­ उनकी मदद के लिए हमेशा आगे-आगे रहे……………।“



अन्ततः यही कहा जा सकता है कि गरीबदास आम जनता के हितैषी और शुभचिंतक के रूप म­ उपन्यास के अन्दर अवतरित हुए हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन परहित के लिए समर्पित रहा। उन्हा­ने तन, मन तथा धन से असहाय जनता के दर्द को समझा और दूर किया, उनके साथ ही साथ उपन्यास के अन्य पात्र कपिल बाबू, माया, भगत-आदि भी स्वयं म­ एक अनूठा व्यक्तित्व लिए उभरे हैं, किन्तु नागार्जुन ने सबसे अधिक गरीबदास पात्र को ही दलित चेतना के हित के लिए कार्यरत दिखाया है।

नागार्जुन के उपन्यासों में स्त्री

श्याम लाल गौड़


प्राध्यापक,श्री जगदेव सिंह संस्कृत महाविद्यालय,सप्त ऋषि आश्रम हरिद्वार.

उपन्यासकार नागार्जुन बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन साहित्य सर्जन में लगाया। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रा वृत्त, निबंध साहित्य आदि साहित्यिक विधाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया। हिन्दी, मैथिली और संस्कृत तीनों ही भाषाओं में उन्होंने साहित्य रचना की। उनके जीवन काल में ही उनकी काफी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थी।


नागार्जुन की सर्वप्रथम प्रकाशित रचना 1929 ई0 की है। यह रचना एक मैथिली कविता ‘मिथिला’, (लहेरिया सराय दरभंगा) नामक पत्रिका में छपी थी। उनकी पहली हिन्दी कविता जो 1934 ई0 में लाहौर से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका ‘विश्वबन्धु’ में छपी। इसके बाद बुकलेट ‘बूढ़वर’ और ‘विलाप’ 1942 ई0 में छपी वह भी मैथिली में महात्मा गांधी की हत्या पर हिन्दी कविताओं का एक बुकलेट ‘शपथ’ नाम से प्रकाशित हुआ और कुछ समय पश्चात् 1948 ई0 में उनका पहला उपन्यास ‘पारो’ ‘मैथिली’ में प्रकाशित हुआ तथा दो वर्षपश्चात् सन् 1948 में उनका पहला हिन्दी उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ प्रकाशित हुआ। सन् 1949 ई0 में अट्ठाईस मैथिली कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ जो ‘चित्रा’ नाम से है। ‘युगधारा’ जो सैंतीस हिन्दी कविताओं का पहला व्यवस्थित संग्रह है जो 1953 में छपकर प्रकाशित हुआ। इसके बाद उपन्यासेत्तर गद्य की पहली पुस्तक निराला पर आधारित ‘एक व्यक्ति एक युग’ सन् 1963 की कृति है। स्फुट गद्य तो नागार्जुन रचना काल के शुरुआती दौर से ही लिखते आ रहे थे।

सन् 1936 ई0 में ‘असमर्थदाता’ नामक कहानी छपी थी। उसी समय से कथेत्तर भी लिखते रहे और साथ ही बाल साहित्य लेखन का कार्य भी करते रहे। बच्चों के लिए पहली पुस्तक ‘वीर विक्रम’ सन् 1956 में प्रकाशित हुई इसके साथ-साथ 1944 से 1954 ई0 के बीच नागार्जुन ने अनुवाद का काम भी किया। बंगला उपन्यासकार ‘शरत चन्द्र’ के कई उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद कर प्रकाशित किया। ‘कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी’ के उपन्यास ‘पृथ्वी वल्लभ’ का गुजराती से हिन्दी में सन् 1945 ई0 में अनुवाद किया था। ‘मेघदूत’ का मुक्त छन्द से अनुवाद 1953 ई0 का है। ‘अपने खेत में’ हिन्दी कविता 1947 के अन्त में प्रकाशित हुई।


नागार्जुन द्वारा रचित उपन्यास जिनकी कुल संख्या ग्यारह है। नौ उपन्यास हिन्दी में और दो मैथिली में हैं। जिनका प्रकाशन काल इस प्रकार हैः
उपन्यास रचना काल प्रकाशक
1. रतिनाथ की चाची 1948 किताब महल, इलाहाबाद
2. बलचनमा  1952 किताब महल, इलाहाबाद
3. नई पौध    1953 किताब महल, इलाहाबाद
4. बाबा बटेसरनाथ 1954 राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
5. वरुण के बेटे 1957 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
6. दुःखमोचन 1957 राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
7. कुंभीपाक 1960 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
8. हीरक जयंती 1962 आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली।
9. उग्रतारा 1963 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
10. जमनिया का बाबा 1968 राजपाल एण्ड संस, दिल्ली।
12 पारो 1968 किताब महल, इलाहबाद।
13. गरीबदास        1975 संभावना प्रकाशन, हापुड़।


इस प्रकार अध्ययन से प्राप्त ज्ञान के आधार पर नागार्जुन के उपन्यासों का यहाँ पर क्रमिक परिचय दिया हुआ है। इसके अलावा नागार्जुन के दो खण्ड काव्य भी प्रकाशित हैं। उपन्यासेत्तर गद्य और बाल साहित्य की रचना भी उन्होंने की। विद्यापति की कृति ‘पुरुष परीक्षा’ की कुछ कहानियों का भाव रूपान्तर विद्यापति की कहानियां नामक शीर्षक से प्रकाशित है।

नागार्जुन ऐसे पहले कथाकार थे, जिन्होंने ने साहित्यिक कृतियोंको सामाजिक सोद्देश्यता से जोड़ा है, और कथा साहित्य की सामाजिक परम्परा का सूत्रपात किया। उनमेंसामाजिक दायित्व की भावना सर्वोपरि थी। यह सही है कि हिन्दी मेंकथा साहित्य की जनवादी परम्परा की शुरुआत भारतेन्दु युग से हुई थी, परन्तु उसे वास्तविक रूप से नागार्जुन ने ही अपने कथा साहित्य द्वारा पुष्ट और संवर्धित किया था। जिसका विकास बाद मेंप्रगतिशील कथाकारा­यशपाल, भैरव प्रसाद गुप्त, राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव, आदि मेंस्पष्ट दिखायी देता है।

वस्तुतः नागार्जुन ने प्रेमचन्द की ही यथार्थवादी-जनवादी कथा परम्परा को आत्मसात करके उसके विकास मेंमहत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। यह कहा जा सकता है कि नागार्जुन के साहित्य मेंविचारधारात्मक विसंगतियों और अन्तर्विरोध है। यह भी कहा जा सकता है कि उनके साहित्य मेंअनेक वैचारिक राजनैतिक भटकाव आये हैं। वे सभी 1962 के चीनी आक्रमण तथा प्रखर रूप मेंसन् 1968 के राजनीतिक सामाजिक बदलाव के बाद आये हैं। इसके विपरीत उनका कथा-साहित्य इन वैचारिक राजनीतिक भटकावोंसे अछूता है। कारण स्पष्ट है कि वे कविता क्षेत्र मेंराजनीतिक, सामाजिक आंदोलनोंके तात्कालिक प्रभावोंसे अपने आपको सर्वथा मुक्त नहींरख पाते हैं, और उनसे शीघ्र प्रभावित होकर कवि-कर्म मेंप्रवृत्त होते हैं। जबकि कविता मेंतात्कालिकता का अतिक्रमण अत्यन्त जरूरी है, इसके विपरीत कथा-साहित्य मेंतात्कालिकता का अतिक्रमण उनके यहाँ आसानी से देखा जा सकता है। उनके कथा साहित्य मेंवैचारिक भटकावनहींके बराबर है।

नागार्जुन के उपन्यासों का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि वे अपने युग के प्रति अत्यधिक जागरूक रहे हैं। उन्होंने तत्कालीन युग की प्रत्येक समस्याओं सामाजिक,धार्मिकआर्थिक एवं राजनीतिक आदि की गहराई से अनुभूत कर अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया है। उन्होंने उच्च वर्ग के प्रति निम्न वर्ग के विद्रोह को जगाकर एक नयी अलख जगायी है। साथ ही अत्याचारउत्पीड़न और शोषण का यथार्थ स्वरूप भी प्रस्तुत किया है। उनकी स्त्री समाज से गहरी सहानुभूति रही है। वे नारी को हर क्षेत्र में आगे लाना चाहते हैं। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों एवं धार्मिक अंधविश्वासों का खण्डन किया है। इस प्रकार उन्होंने निम्न वर्ग की दयनीय स्थिति एवं इसके कारणों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।



नागार्जुन रूस की समाजवादी आर्थिक विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित रहे हैं। उनके पात्र कर्म को ही अपना धर्म मानने वाले हैं। वे मुंशी पे्रमचन्द के पात्रों की तरह परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेकते अपितु इसके विपरीत परिस्थितियों से जूझने एवं संघर्ष के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। स्त्री समस्त मानवीय सौंदर्य एवं चेतना की सर्वोंत्तम अभिव्यक्ति है। साथ ही सृष्टि सृजन का मूल कारण भीसाहित्य की प्रत्येक विधा के सृजन में नारी-हृदय की पुलक एवं उसकी अनुरक्ति जीवन-प्रदायिनी शक्ति की मुख्य भूमिका रही है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सृष्टि एवं सर्जन में नारी की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा है-
‘’पुरुष स्वभावतः निःसंग व तटस्थ रहा हैनारी ही उसमें आसक्ति की भावना उत्पन्न कर उसे निर्माण की ओर उन्मुख करती है। पुरुष अपनी पुरुष प्रकृति के कारण द्वन्द्व-रहित हो सकता हैलेकिन नारी अतिशय भावुकता के कारण हमेशा द्वंद्वोन्मुखी रहती है। इसीलिए पुरुष मुक्त है और नारी बद्ध है.’’

 ऐसा ही उदात्त दृष्टिकोण जयशंकरप्रसाद की ‘कामायनी’ में ‘नारी केवल तुम श्रद्धा हो’का स्वरूप हैंतो गुप्त जी उसे ‘आंचल में दूध और आंखों में पानी’ को त्याग की मूर्ति के समान स्वीकार करते हैं. जबकि महोदवी वर्मा का कथन है कि ‘नारी का मानसिक विकास पुरुष के मानसिक विकास से अधिक द्रुत गति से विकसित होता है। उसका स्वभाव कोमल और प्रेम,घृणा आदि भाव अधिक तीव्र और स्थाई होते हैं। इन दोनों प्रकृतियों में उतना ही अन्तर हैजितना विद्युत और झड़ी में एक से शक्ति उत्पन्न की जा सकती हैपरन्तु दूसरी से शान्ति मिलती है।
नागार्जुन का उपन्यास-लेखन भारत की आजादी के बाद आरम्भ हुआ है। प्रेमचन्द के बाद भारतीय ग्राम्य जीवन के भाष्यकार के रूप में नागार्जुन का नाम पहले आता है। उनके उपन्यासों का परिवेश मिथिलांचल से सम्बन्धित है। नागार्जुन के नारी-पात्र समाज द्वारा त्रस्त होने पर भी सदैव कर्तव्यरत रहते हैं। पुरुष द्वारा प्रताड़ित ये नारी पात्र अपने हृदय की उदात्तता के कारण भविष्य में स्वयं के उद्धार का मार्ग प्रशस्त कर लेती हैं। ये सभी अपने कर्तव्य निर्वाह करते हुए क्षण भर के लिए भी विचलित नहीं होतींऐसे पात्रों के अन्तर्गत गौरी (रतिनाथ की चाची) शशीकला की मामी (दुःखमोचन) मधुरी (वरुण के बेटे) निर्मला (कुम्भीपाक) और नर्मदेश्वर की भाभी (उग्रतारा) प्रमुख हैं।

‘रतिनाथ की चाची’नागार्जुन का प्रतिष्ठित उपन्यास है. गौरी रतिनाथ की चाची है। गौरी इस उपन्यास की नायिका है। रूप सुन्दरी गौरी दरिद्र और रोगी बैद्यनाथ झा से व्याही गई है। बेटे उमानाथ और बेटी प्रतिभामा को जन्म देकर गौरी विधवा हो गई। विदुर जयनाथ गौरी का देवर है। रतिनाथ जयनाथ का बेटा है। गौरी की इच्छा के विरुद्ध गौरी को देवर से गर्भ रह जाता है। उसकी सहासी माँ गर्भपात से गौरी को मुक्त कराती है। उमानाथ को माँ के पापी कृत्य का पता चलता है। और वह माँ का तिरस्कार करने लगता है। चाची के लिए रतिनाथ ही जीने का सहारा बना। व्रतीसयंमीआत्मनिर्भर चाची ने अपना जीवन तापसी की तरह बिताया। बेटे उमानाथ से तो इतना तिरस्कार पाया कि वह माँ के अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं आता।


‘रतिनाथ की चाची’की गौरी का चरित्र भावुकतापूर्ण होते हुए भी संजीदगी से भरा हुआ है। उपन्यास के अंत तक आते-आते चाची के सारे दोषों एवं कलंक का परिमार्जन हो जाता हैअंततः वह दयाकरुणा और पे्रम की मूर्ति ही परिलक्षित होती हैजयनाथरतिनाथ और उमानाथ के प्रति उसका व्यवहार उसकी इन चारित्रिक विशेषताओं का परिचायक है। गौरी के चरित्र में मातृत्व सहिष्णुता का चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक रूप में हुआ है। उसकी आखों में छलकते वात्सल्य के तरल रूप को देखकर रतिनाथ का चेहरा खिल उठता है। रतिनाथ द्वारा चाची के प्रति कहे गये ये शब्द- ‘ऐसा लगता है कि दिन व दिन तुम देवता होती चली जा रही हो’ चाची के चरित्र में निहित उदात्तता की ही अभिव्यक्ति है।

‘दुःखमोचन’की शशिकला की मामी की सेवा भावना और त्याग प्रत्येक भारतीय नारी के लिए अनुकरणीय है। वह परिवार के सदस्यों की छोटी सी छोटी आवश्यकताओं का ध्यान रखती है। एवं दुःखमोचन को एक आदर्श माँ का प्यार देती है। गाँव की कन्या-पाठशाला के लिए उसके द्वारा दो हजार रुपये दान देना उसके चरित्र की गरिमा प्रदान करता हैतथा यह उसके चरित्र की उदारता का ही परिचायक है। वरुण के बेटे की माधुरी एक समाज-सेवी नारी के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होती है। जब ग्रामांचल में बाढ़ आती हैतो उस समय उस बाढ़ के कारण वहां का जन-जीवन त्रस्त हो जाता है। इस बाढ़ के कारण जो व्यथित लोग थेउनके लिए वहां शिविर लगाया गया। जिसमें वह मोहन माझी की सहायता कर शिविर का संचालन करती हैइस सम्पूर्ण परिवेश में माधुरी सेवात्याग और परोपकार की साकार प्रतिमा ही दृष्टिगत होती है|

‘नई पौध’की वाचस्पति की माँ की उदात्त भावनाओं को भी नहीं भुलाया जा सकता क्योंकि उसके हृदय में न केवल अपने पुत्र के लिए वरन् उसके सभी मित्रों के लिए अजस्र वात्सल्य का स्रोत बहता रहता है। इसलिए उसका उल्लेख भी यहाँ पर अत्यन्त आवश्यक हो जाता है।

‘उग्रतारा’की नर्मदेश्वर की भाभी तेज ओज की प्रतिमा है। इस नारी के अन्तरंग हृदय में सामाजिक व्यभिचार की शिकार हुई उगनी के प्रति उनका कितना सद्भाव है। यह उसके इस कथन से स्पष्ट हो जाता है- ‘लुच्चे-लफंगे अपना ही मुंह काला करते हैं। हमारा-तुम्हारा मुंह तो शीशे से भी ज्यादा साफ रहेगा। नागार्जुन के ये नारी पात्र उदात्त एवं एक उच्च भावनाओं से ओत-प्रोत हैं। और नागार्जुन की इन नारी पात्रों के प्रति असीम करुणा दिखाई देती है।

 संदर्भ सूची

 1.नागार्जुन: रतिनाथ की चाची, पृष्ठ 150
 2.नागार्जुन: रतिनाथ की चाची, पृष्ठ 96
 3.नागार्जुन: उग्रतारा, पृष्ठ42

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हिंदी साहित्य में आदिवासी स्त्री का सवाल

अ‍जय कुमार यादव

पीएच.डी. हिंदी (शोधरत )
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय
दिल्ली
संपर्कःajjujnu@gmail.com

जब आदिवासी समाज में स्त्रियों की बात होती है तो ऐसा माना जाता है कि आदिवासी स्त्रियाँ अन्य समाज की तुलना में अधिक स्वतंत्र होती हैं लेकिन बिटिया मुर्मू ने लिखा है कि- “भारत की संस्कृति में महिलाओं की जो स्थिति है, आदिवासी संस्कृति में महिलाओं की स्थिति उससे बहुत भिन्न नहीं है। आम धारणा है कि आदिवासी महिलाएँ अधिकार संपन्न तथा बराबर की हकदार हैं, किन्तु ऐसी बात नहीं है।”1 अर्थात् वस्तु स्थिति कुछ और ही है। दरअसल आदिवासी समाज सामूहिकता और समानता में विश्वास रखता है। अंग्रेजों  के आगमन से पूर्व आदिवासी समाज में स्त्रियाँ सभ्य और सुसंस्कृत कहे जाने वाले समाज से ज्यादा स्वतंत्र होती थीं । लेकिन अंग्रेजों के आने के पश्चात् धीरे-धीरे उस सामूहिकता का टूटन हुआ। उस सामूहिकता के टूटन में पितृसत्तात्मक व्यवस्था मजबूत हुई। पितृसत्तात्मक व्यवस्था को और भी मजबूत करने का वैधानीकरण अंग्रेजों  ने राजस्व की नीति लागू कर के कर दिया। अंग्रेजों के पहले आदिवासी समाज में सम्पत्ति नाम की कोई अवधारणा नहीं थी। लेकिन “कालान्तर में जब अंग्रेजों  ने राजस्व की नई नीति बनाई और जमीन के पट्टे जमींदारों के नाम लिखे, समस्या तब पैदा हुई। अब चूँकि जमीन पुरुषों के नाम से लिखी गई,  तो उसमें किसी भी आदिवासी मुखिया या मांझी-हाड़ाम या प्रधान ने औरतों के नाम खाते में यह कहकर नहीं चढ़ने दिए कि ये तो दूसरे के घर चली जाएगी।”2 पितृसत्तात्मक व्यवस्था के ठेकेदारों ने अपने इस तर्क को मजबूत बनाने के लिए इसका मिथकीकरण किया और अब संताल आदिवासी समाज की मान्यता है कि “उनके पूर्वजों की प्रेतात्माओं को अपने उत्तराधिकारियों से अन्न जल मिलता है, लड़की पराया धन है, वह जब शादी के बाद चली जाएगी तो उन्हें अन्न-जल कौन देगा? इसलिए पुरुषों को ही उत्तराधिकारी बनाया गया ताकि उन प्रेतात्माओं को हमेशा अन्न-जल मिलता रहे।”3

रमणिका गुप्ता ने लिखा है कि- “जब गैर आदिवासी समाज आदिवासी क्षेत्र में जमीनों के पट्टे लिखाकर और सूदखोर बनकर प्रवेश करने लगा तब से जमीनें और जंगल गैर आदिवासियों के पास हस्तांतरित होने शुरू हुए, विशेषतया झारखंड, छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में। तब से दूसरे समाज की सारी विकृतियाँ इस समाज में प्रवेश करने लगीं और सामूहिक प्रवृत्ति की जगह वर्चस्ववादी प्रवृत्ति की शुरूआत।”4

भूमंडलीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति से गहरे स्तर पर प्रभावित होते आदिवासी समाज में भी उन विकृतियों को जगह मिली और अन्य समाजों की तरह वहाँ भी स्त्री एक ‘वस्तु’ के रूप में परिवर्तित होने लगी। पितृसत्ता ने वहाँ भी अपनी कद काठी मजबूत कर ली। कुछ जगहों पर आज भी मातृसत्तात्मक व्यवस्थाएँ हैं लेकिन वह भी ‘रबर स्टाम्प’ की ही तरह काम करती हैं। “ऐसे में कई जनजातियों में आज भी मातृसत्ता जारी है लेकिन अधिकांशतः जनजातियाँ पितृप्रधान समाज को ही मानती हैं,  जहाँ मातृप्रधान सत्ता है, वहाँ भी गोत्र भले माँ के नाम से चलता है और कहीं कहीं सम्पत्ति की अधिकारी भी पुत्री होती है, इसके बावजूद उस समाज में भी पिता या मामा ही अधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। बात पुरुष की ही चलती है।”5 इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए संविधान ने भी अपनी संतुष्टि दे दी है। अंग्रेजों  ने संथाली प्रधागत कानून को वैध ठहराते हुए संताली औरतों को जमीन पर अधिकार से वंचित कर दिया, आज जबकि आजादी के इतने साल बाद भी भारतीय संविधान में कितने संशोधन हुए, संथाली प्रथागत कानून में कोई बदलाव नहीं हुआ। इस वैज्ञानिक और तर्कसंगत समय में जब कई समुदाय विकास की नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं, संथाली समाज पूरी तरह से इस प्रथागत कानून में बँधा हुआ है जिसका सर्वाधिक नुकसान आदिवासी औरतों को हो रहा है।

आदिवासी समाज में भी स्त्रियों का शोषण करने के लिए विभिन्न तरह के तर्क पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने बनाए हैं । समाज ने स्त्रियों को कुछ काम करने से मना किया, उसके लिए पुरुष समाज ने यह तर्क दिया है कि शारीरिक बनावट के आधार पर यह विभाजन किया गया है। लेकिन ऐसा नहीं की आदिवासी समाज में पितृसत्ता को बनाए रखने के लिए यह तर्क दिया गया है। यह एक तरह से स्त्रियों के ऊपर अधिकार जताने जैसा ही है। आदिवासी समाज में स्त्रियों को हल चलाना, घर का छप्पर छाना और धनुष चलाना वर्जित है। इन चीजों पर अगर हम गौर करेंगे तो पाएँगे कि यह चीजें जमीन और सम्पत्ति की प्रतीक है और यह वर्जनाएँ इस बात का द्योतक हैं कि सम्पत्ति पर पुरुषों का ही अधिकार रहे। निर्मला पुतुल ने ‘सजोनी किस्कू’ नामक एक आदिवासी महिला को लेकर एक कविता लिखा है-
“बस! बस!! रहने दो।
कुछ मत कहो सजोनी किस्कू
मैं जानती हूँ सब
जानती हूँ कि अपने गाँव बागजोरी की धरती पर
जब तुमने चलाया था हल
तब डोल उठा था
बस्ती के माँझी-थान में बैठ देवता का सिंहासन
गिर गई थी पुश्तैनी प्रधानी कुर्सी पर बैठ
मगजहीन माँझी ‘हाड़ाम’ की पगड़ी
पता है बस्ती की नाक बचाने खातिर
तब बैल बनाकर हल में जोता था
जालिमों ने तुम्हें
खूँटे में बाँधकर खिलाया था भूसा।”6

निर्मला पुतुल की इस कविता में एक आदिवासी स्त्री की नियति का अंदाजा हमें आसानी से लग जाता है। संताली समाज ने सजोनी किस्कू को हल चलाने की सजा उसे खूँटे में बाँधकर भूसा खाने की दी थी, लेकिन वहीं संताली पुरुष यह भूल गए कि संताली विद्रोह के समय स्त्रियों ने ही हल जोतने से लेकर फसल काटने तक के सारे काम किए थे। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि पितृसत्तात्मक समाज ने सारे नियम अपने हितों के लिए बनाए हैं, जब मन करता है तो तोड़ देता है, जब मन करता है तो उसे लागू कर देता है। बिटिया मुर्मू इस प्रथागत कानून के विरूद्ध आवाज उठाती हैं
“आदिवासी समाज की स्त्रियों को उनके प्रथागत कानूनों के आधार पर संपत्ति के अधिकार से वंचित रहने देना सरासर अन्याय है। हो सकता है कि कानून परिवर्तन से सम्बन्धों में कुछ खटास पैदा हो या विरोध हो लेकिन यह भी सत्य है कि जब भी बुनियादी ढाँचे में परिवर्तन हुआ या दबे कुचले लोगों को अधिकार मिला तो समकालीन जड़ समाज अपना आतंक फैलाता है पर सकारात्मक परिवर्तन के लिए समाज व कल्याणकारी सरकार को डटकर मुकाबला करना ही होगा।”7

संपत्ति के अधिकार से वंचित रखने का एक और तर्क जो आदिवासी पुरुष सत्ता द्वारा दिया गया कि स्त्रियों का विवाह गैर-आदिवासी से हो जाएगा तो वह जमीन गैर-आदिवासी की हो जाएगी। लेकिन यह तर्क मजबूत तर्क नहीं है। रमणिका गुप्ता ने इस तर्क के बारे में लिखा है कि- “आदिवासियों की जमीन दारू के बदले पुरुष समाज ही गैर आदिवासियों को हस्तान्तरित कर देते आया है। इसलिए उनका यह तर्क कि स्त्री को सम्पत्ति में हक मिल जाने से स्त्रियों द्वारा गैर-आदिवासियों के साथ विवाह करने पर जमीन का हस्तांतरण हो जाएगा गलत है। इस तर्क की काट तो कानून में छोटा सा संशोधन- कि स्त्री द्वारा गैर-आदिवासी से शादी करने के बाद जमीन की हकदार आदिवासी स्त्री और उसके बच्चे ही होंगे उसका पति नहीं, ला कर की जा सकती है।”30 रमणिका गुप्ता का यह सुझाव सही लगता है, पर पितृसत्तात्मक व्यवस्था को यह हजम नहीं होगा, इसलिए यह बात पूर्णतया सिद्ध हो जाती है कि आदिवासी समाज में भी पितृसत्ता का बोलबाला है।

आदिवासी समाज ने स्त्रियों को उतने ही अधिकार दिए हैं जितने से उसके हितों का हनन न हो। पूर्वोत्तर राज्यों में आदिवासी समुदाय की स्त्री की हालत थोड़ी ठीक है। मेघालय का राज्य मातृ प्रधान सत्ता को मानता है। वहाँ खासी समाज में सम्पत्ति पर बेटियों का अधिकार होता है। बोडो  समाज में बेटियों को अधिकार मिले हुए हैं। इसी तरह से मिजो समाज में भी वंश माँ के गोत्र से ही चलता है, इतना ही नहीं “मिजोरम में स्त्री भी हल चलाती है।”8“असम के कार्बी समाज में स्त्रियों के श्राद्ध का रस्म का पूरा संचालन औरतों के हाथ में ही होता है।”9
झारखंड में आदिवासी समाज में ‘पौन प्रथा’ प्रचलन में है जिसमें पुरुष को ही वधू के लिए कन्या शुल्क देना पड़ता है, तभी उसकी शादी हो सकती है। उपरोक्त तथ्यों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आदिवासियों ने अपनी स्त्रियों को कुछ अधिकार तो दिए हैं जो सामान्यतः तथाकथित मुख्यधारा वाले समाज ने अपनी स्त्रियों को नहीं दिए हैं लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि आदिवासी समाज में स्त्रियों का शोषण नहीं होता। यहाँ शोषण के स्तर भिन्न हो सकते हैं।

आदिवासी महिलाएँ बहुत मेहनती और संघर्षशील होती हैं जिसका फायदा अन्य समाज के लोग उठाते हैं। आदिवासी समाज एनजीओ संस्थाओं के लिए वरदान की तरह है। आदिवासी इलाकों में एनजीओ सामाजिक विकास के नाम पर कुकुरमुत्ते की तरह फैले हैं। वहाँ उन केंद्रों पर आदिवासी महिलाओं को काम पर रखते हैं और उनका शोषण करते हैं। “आदिवासी बहुल इलाकों में फील्डवर्कर के रूप में लगभग 70 प्रतिशत कार्यकर्ता आदिवासी महिलाओं को बनाते हैं, बाकी 30 प्रतिशत गैर-आदिवासी स्त्री-पुरुष कार्यकर्ता है।”10 जो एनजीओ समाज को शोषण से मुक्ति दिलाने की बात करते हैं,  वहीं दूसरी तरफ खुद अपने कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं और यह शोषण केवल मानसिक स्तर पर नहीं होता बल्कि शारीरिक स्तर पर भी होता है। विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि उन महिलाओं की कहीं सुनवाई भी नहीं होती। आदिवासी स्त्रियों को उनके पति ग्राम-प्रधानों से पैसे लेकर बेच देते हैं और ग्राम प्रधान इन्हें शहरों में भेज देता है। निर्मला पुतुल ने इस प्रकार की एक स्त्री की नियति पर एक कविता लिखी है-
“कैसा बिकाऊ है तुम्हारी बस्ती का प्रधान
जो सिर्फ एक बोतल विदेशी दारू में रख देता है
पूरे गाँव को गिरवी
और ले जाता है कोई लकड़ियों का गट्ठर की तरह
लादकर अपनी गाड़ियों में तुम्हारी बेटियों को
हजार पाँच सौ हथेलियों पर रखकर
पिछले साल
धनकटनी में खाली पेट बंगाल गयी पड़ोस की बुधनी
किसका पेट सजाकर लौटी है गाँव?”10
इसी तरह गैर-आदिवासी पुरुष भी भोली-भाली आदिवासी स्त्रियों को शादी का झाँसा देकर देह शोषण करते हैं। फिर भाग जाते हैं।  आदिवासी स्त्रियों की यह हालत उनके अशिक्षित होने के नाते भी होता है। 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की साक्षरता दर लगभग 22% से कम है, जो अत्यन्त निराशाजनक है। आदिवासी स्त्रियों की इस हालत को शिक्षा के माध्यम से उनके अन्दर चेतना जगा कर सुधारा जा सकता है। हालाँकि आदिवासी स्त्री अन्याय के प्रति सदियों से जूझती आ रही है और आज भी लड़ रही है। आदिवासी स्त्रियाँ अपनी व्यथा अब खुद बयान करने लगी हैं। अब तक जो अनकहा था वह अब कहा जा रहा है। जरूरत है एक संगठित आवाज की जो समाज में क्रान्तिकारी बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार करे और इसमें सरकार और विकास कार्यों की भूमिका भी महती होगी।

सन्दर्भ
1     पृ. 90, संपा. रमणिका गुप्ता: ‘युद्धरत आम आदमी’, पूर्णांक 80, दिसम्बर-2005
2. पृ. 94, वही
3. पृ. 57, सपा. सुधीर सुमन: ‘समकालीन जनमत’, अंक 2-3, वर्ष 22, सितंबर-2003
4 पृ. 64, श्याम चरण दुबे: ‘समय और संस्कृति’
5 पृ. 94, सपा. रमणिका गुप्ता- ‘युद्धरत आम आदमी’, पूर्णांक 80, दिसंबर-2005
6 पृ. 72, सपा. रमणिका गुप्ता- ‘युद्धरत आम आदमी’, पूर्णांक 55, 2001
7 पृ. 95, वही
8. पृ. 96, वही
9. पृ. 95, वही
10 पृ. 96, वही
11 पृ. 80, सपा. सुधीर सुमन: ‘समकालीन जनमत’, अंक 2-3, वर्ष 22, सितंबर-2003
12. संपादकीय से, संपा. रमणिका गुप्ता: ‘युद्धरत आम आदमी पूर्णांक 55, 2001

मिस यूनिवर्स बनेगी डा.अंबेडकर को आदर्श मानने वाली रोशमिता

29 जनवरी को फिलीपिंस के मनीला में आयोजित मिस यूनिवर्स कॉन्टेस्ट में भारत का प्रतिनधित्व करने वाली रोशमिता हरिमूर्ती बाबासाहेब डा.भीमराव आंबेडकर को अपना रोल माडल मानती हैं. 22 साल की रोशमिता बाबा साहब को इन शब्दों में अपना रोल मॉडल बताती हैं, ‘ मेरे रोल मॉडल सामाजिक न्याय के नेता और भारत के संविधान के प्रणेता डा. बी आर अंबेडकर हैं. यह वे हैं, जिनके कारण पिछड़ा समुदाय, जिससे मैं भी आती हूँ, राष्ट्रीय आख्यानों में अपनी जगह बना रही है. उन्होंने कहा था कि आप किसी भी समुदाय की उन्नति को उसकी महिलाओं  की प्रगति के पैमाने से माप सकते हैं.’

बेंगलुरु की रोशमिता ने 15 लड़कियों के बीच इस प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेने के लिए जीत हासिल की। रोशमिता अभी इंटरनेशनल बिजनेस की पढ़ाई कर रही हैं। उन्हें भरोसा है कि आपका वोट उन्हें इस प्रतियोगिता में भारत का परचम लहराने का मौका उपलब्ध कराएगा।

रोशमिता बताती हैं, ‘मैं  अपने दादा दादी के साथ ज्वाइंट परिवार में रहती हूं।  क्योंकि मैं अपने परिवार में पहली संतान थी इसलिए मेरी परवरिश मेरे परिवारवालों ने बहुत ही अच्छे तरीके से की है। तब तक सबकुछ ठीक था जब मैने अपने दादाजी को डायबिटीज से खो नहीं दिया। अगर उन्हें सही समय पर चिकित्सा मिल जाती तो शायद वह ठीक हो जाते। उनके गुजरने के बाद मैंने और मेरे डॉक्टर पिता ने डिसाइड किया कि हम एक ऐसे अस्पताल का निर्माण करेंगे जिसमें लोगों को तुरंत और आसानी से चिकित्सा उपलब्ध हो सके।’

इन्हें जीत के लिए आपके वोट की जरूरत है। फिलीपींस में चल रहे इस मुकाबले में जीत के लिए आप अपना वोट इस लिंक पर जाकर कर सकते हैं। वोटिंग के लिए दो दिन का समय बाकी है। जल्दी कीजिए और विदेश में भारत का परचम लहराने का मौका मत गंवाइये।

वर्ष 2000 में लारा दत्‍ता को मिस यूनिवर्स का ताज मिला था। इसके बाद भारत के किसी प्रतिभागी को यह ताज नहीं मिला है। 2016 का मिस इंडिया खिताब जीतने के बाद  रोशमिताने इस बार भारत की ओर से उम्मीद जगा दी है.  वह बेंगलुरू के माउंट कार्मेल कॉलेज की छात्रा रही हैं।

रोशमिता को वोट करने के लिए आपको  इस लिंक पर जाकर रोशमिता हरिमूर्ति को सर्च करना है। इसके बाद उनके नाम के आगे मानइन 0 प्लस लिखा नजर आएगा। आपको प्लस पर क्लिक करना है। आप दस बार तक प्लस पर क्लिक कर सकते हैं। इसके बाद ऊपर जाकर आपको Cast Your Vote पर क्लिक करना है। आपका वोट रोशमिता को मिल जायेगा।

डाॅ. उतिमा केशरी की कविताएं

उतिमा केशरी

प्रकाशित कृतियांः चार कविता संग्रहः
‘मुहिम के स्वर’, ‘बौर की गंध’,‘तभी तो प्रेम ईश्वर के करीब है’एवं ‘उदास है गांव’ प्रकाशित.
‘जगदीशचंद्र माथुर के नाटकों में परंपरा और प्रयोग’-नामक आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित.
संपर्कः9771893850

कला के अधिनायकः हुसैन

हे!
हर दिल अजीज हुसैन
हम ऋणी हैं, तुम्हारी कला-साधना के.
पीड़ा में भी आनंद उठाने का
हौसला,
तुम्हारा उत्स था.
तुम साधते रहे, अपनी कूची को
अर्जुन की तरह,
लड़ते रहे-बिलकुल अकेले,
अभिमन्यु की तरह
और
कर्ण की तरह तन्हा रहना
कभी साला नहीं तुम्हें.
भीष्म पितामह की तरह
जख्मी होकर, पी गए
दर्द के हलाहल को
शिव की तरह.
नुक्कड़ की चाय की चुस्की का आस्वाद,
भला तुम्हें छोड़, कौन ले सकता है!
समय की धारा को,
तुमने ही दिया एक नई दृष्टि.
सचमुच, तुम कला के अधिनायक हो!
विराट के, इस महा-अस्तित्व में
तुमने जिस्म छोड़ा है
पर
रूह तो,
तुम्हारा
हर कलाकार प्रेमी के पास
आज भी
प्रेरणास्रोत बन
एक विलक्षण धरोहर के रूप में है.

आठ जून दो हजार नौ

रंगमंच के,
श्लाका पुरुष
हबीब तनवीर!

छियासी वर्ष का वह योद्धा
भारत के रंगमंच की आत्मा में
उत्फुल्ल जिजीविषा से समाया हुआ.
राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय पहचान
देनेवाले
हबीब तनवीर साहेब ने
बुनियाद डाली
नाट्य की एक नई परंपरा की.
उनके सपने और संघर्ष ने
कई ऐतिहासिक प्रयोग किए,
वे जानते थे-
कैसे बनाया जाता है
मिट्टी से सोना जैसा आकर्षण
देखा था मैंने-
पटना के पुस्तक मेला में
उनकी आंखों की गहराई
और उन चमक को-

वह खनकती रोबीली आवाज
आज भी गूंज रही है
मेरे मानस में
उपलब्धियों की उंचाई पर
आसीन होते हुए भी,
एक आम आदमी की तरह
सहज और आत्मीय.

सच!
हबीब साहेब!
आप हैं हर साहित्यकार के कीमत
समर्पित और निष्ठा भाव से
नाटक करनेवाले-
जगा गए मेरे मन में भी
एक गहरा रचनात्मक सम्मान!
वैचारिक प्रतिबद्धता से लबरेज
तेजोदीप्त हबीब साहेब को-
बार-बार मेरा सलाम.

 मैना 

मैना.
पाखी लोक की परी,
रोज आती है,
मेरे आंगन
छांव-कुठांव से
दाना चुगने.
उसकी मनस्विता की छटा से
मेरा मन थिरकने लगता है
और
बुनने लगता है-
प्रीतिकर संभावना
तभी तो मैं जोहती हूं बाट,
उसकी, दमकती मुद्रा का
जब उड़ती है फुर्र से
अपना गत्वाजोन दिखाकर
तब
मैं भी रचने लगती हूं,
रस निष्पति के सारे अलंकार.

कुली

रेलगाड़ी के रूकते ही
खड़े हो जाते हैं कुली
मानो! कर रहे हों अभिवादन
यात्रियों का.

सभी कुली आजमाते हैं-
अपना-अपना भाग्य.
कोई, अपना सामान उठवाते हैं
तो कोई स्वयं ही पीठ पर लाद
चल देते हैं.

कुली दूुर तक पीछा करता है,
उन यात्री का
और हर क्षण घटाता है
अपनी मजदूरी की दर
बाबू! दस के बदले पांच दे देना
पांच न सही दो दे देना!
पर, यात्री नहीं देखते मुड़कर
एक बार भी उस कुली को.

कुली कुछ दूर आगे बढ़ता है
वह मन से हारता नहीं है,
रहता है चुनौती के साथ
पुनः अगली ट्रेन की प्रतीक्षा करते हुए.

 खंडहर और बूढ़ा आदमी!

मेरे घर के सामने
उस खंडहरनुमा मकान में
न जाने कब से
वह बूढ़ा आदमी काट रहा है-
अपना बचा-खुचा जीवन!
वह खंडहर
पुराने मंदिर की तरह
सुनसान है,
सूखे तालाब की तरह
उदास है.
निस्सिम रात्रि में
कुत्ते की भौंकने की तरह
मनहूस दिखता है.
कहती है दादी-
उनका दोनों बेटा
परदेश  में जा बसा है,
बेटी, अपनी ससुराल में.

बूढ़ी के अनंत यात्रा पर
जाने के बाद
हो गया है-
बिलकुल अकेला.
वह प्राणी, अब हो गया है-
संदर्भहीन भी.
अपनी पकी दाढ़ी, मूछों
और

जटिल केश -राशि से आच्छादित
जब चलता है-तीन टांगों पर,
तब, उनकी झुकी गर्दन,
बना डालती है-समकोण
अपनी देहयष्ठि पर.
तब मैं फर्क नहीं कर पाती
खंडहर और उनमें.
एक बिना सांस का
एक दूसरा, सांस से जीता है.

कल्याणी ठाकुर चरल: बंगाल का दलित स्वर

बंगला दलित साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर कल्याणी ठाकुर चरल  के  जीवन  और  दलित  स्त्री  की  अस्मिता  को  मजबूती  से  स्थापित  करने  में  उनकी  भूमिका  को  स्त्रीकाल  के स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत बता रहे हैं  मोहम्मद दिलवर हुसैन. 





अगर बंगाला दलित साहित्य की शीर्षस्थ लेखिकाओं की बात की जाये तो कल्याणी ठाकुर का नाम सबसे आगे होगा। कल्याणी ठाकुर मानती हैं कि दलित लेखन प्रमुख तौर पर दमन और घृणा के इतिहास को उजागर करने से संबंधित है। यह वह दमन और घृणा है,  जिसका सामना कुछ दलित जातियों को सदियों से करना पड़ा है। दलित साहित्य के इस समूचे परिदृश्य के अपने अर्थ, लक्ष्य और उद्देश्य हैं। परंतु उनको लगता है कि अगर दलित लेखक अपने लेखन को साहित्य जगत में स्थायित्व दिलाना चाहते हैं तो उनको धीरे-धीरे इसमें सौंदर्यबोध को शामिल करना होगा।

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कल्याणी ठाकुर का जन्म सन 1965 में पश्चिम बंगाल के नाडिया जिले में बागुला के निकट पुरबापारा गांव में हुआ था। उनका परिवार नामशूद्र जाति से ताल्लुक रखता था, जो सन 1947 में पूर्वी पाकिस्तान से आया शरणार्थी परिवार था। उनके पिता कृष्ण चंद्र ठाकुर को लोग केस्टो साधू कहकर पुकारते थे। वह मतुआ धर्म के अनुयाई होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता थे। वह सार्वजनिक शिक्षण के प्रतिपादक थे और सत्य और सादगी के आदर्शों में यकीन करते थे। कल्याणी पर अपने पिता का प्रभाव था और उनमें भी सत्य के प्रति टिके रहने और जूझने की भावना प्रबल है। उन्होंने बगुला श्रीकृष्ण कॉलेज से अकाउंटेंसी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और कलकत्ता विश्वविद्यालय से सांध्यकालीन पाठ्यक्रम में स्नातकोत्तर किया। ऐसा इसलिए क्योंकि इस दौरान वह एक सरकारी कार्यालय में लिपिकीय नौकरी करने लगी थीं।

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वह जिस इलाके में पलीं-बढ़ीं वहां का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य कुछ ऐसा था कि बचपन में ही वह अपनी जातीय अस्मिता को लेकर सचेत हो गईं। वह याद करती हैं कि कैसे पुरबापारा के अधिकांश प्रवासी नामशूद्र जैसी निचली जाति से ताल्लुक रखते थे। उस क्षेत्र में रहने वाले ऊंची जाति के लोग इन्हें नीची नजर से देखते थे। ऊंची जाति वाले उनको अक्सर अपराधी, बेईमान और अपवित्र मानते थे। बहरहाल इस जातीय कटुता और पूर्वग्रह  से उनका सामना तब हुआ जब उन्होंने सरकारी कार्यालय में नौकरी शुरू की। वह भी तथाकथित आधुनिक और प्रबुद्ध लोगों के शहर कोलकाता में। उन्हें अपने कार्यालय में हर कदम पर यह याद दिलाया जाता कि उनकी जाति क्या है। उनके उच्चवर्ण वाले शिक्षित सहकर्मी उन्हें अपमानित करने का एक भी मौका गंवाते नहीं थे। चूंकि कल्याणी कभी अपनी आवाज उठाने में झिझकती नहीं थीं इसलिए उन्होंने प्रतिरोध स्वरूप अपनी जातीय पहचान को कभी शर्म का विषय नहीं माना। उल्टे वह अपने और अपने समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ती रहीं।  मुक्त विचारों और पहचान वाली स्त्री होने के नाते उनके पहनावे, उनकी संगत और यहां तक कि उनके लेखन के लिए उनको लगातार उलाहने दिए गए।

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वह कोलकाता के गोलपार्क में महिलाओं के एक हॉस्टल में रहा करती थीं। उस समय में उन्होंने कोलकाता के तमाम हॉस्टलों में रहने वाली महिलाओं को आवाज देने के लिए नीड़ नामक एक वॉल मैगजीन प्रकाशित करनी शुरू की। इस काम में सफलता मिलने के बाद उन्होंने इस पत्रिका का मुद्रित संस्करण प्रकाशित करना शुरू किया। अपने पहले अंक से लेकर आज तक नीड़ में हाशिए के लोगों की उन चिंताओं को शामिल किया जाता है जो अब तक अनसुनी रह गईं।

सके बाद कल्याणी एक दलित प्रकाशन समूह और बौद्धिक समूह के संपर्क में आईं, जिसका नाम था ‘चौथर्य दुनिया’ (चौथी दुनिया)। इस प्रकाशन से ही ‘धोरलेई जुद्धो सुनिश्चित’  (मात्र स्पर्श से हो सकता है युद्ध का निर्धारण), ‘जे मेये अंधार गान'(अंधेरे को गिनने वाली लडक़ी) और ‘चंडालिनीर कोबिता’ (चंडालिनी का काव्य) जैसी रचनाएं प्रकाशित हुईं। इनमें से चंडालिनी की कविता ने उन्हें बंगाल के महिला दलित स्वर की पहचान दिलाई। इसके बाद उनका एक कहानी संग्रह ‘फिरे एलो उलांगो होये'(नग्न वापसी) और एक नॉन फिक्शन संग्रह ‘चंडालीनीर बिबृत्ति’ (चंडालिनी का अभिकथन) प्रकाशित हुए। बंगाल के साहित्यिक समाज में एक निचली जाति की लेखिका द्वारा इतने स्पष्ट तरीके से जातीय और वर्गीय दमन और शोषण का सुस्पष्ट चित्रण करना अप्रत्याशित था। हाल ही में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी है, ‘ऐमी कानो चरल लिखी?’ (मैं चरल क्यों लिखती हूं?) इसमें उन्होंने अपने जीवन की पूरी कहानी लिखने के साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि आखिर क्यों उन्होंने अपने नाम में चरल के रूप में दालित  पहचान जोड़ी।
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वर्ष 2012 में कल्याणी को पुड्डुचेरी में स्पैरो वुमेन आकाईव द्वारा आयोजित लेखक कार्यशाला में बंगाल का प्रतिनिधित्व करने के लिए बुलाया गया था। अप्रैल 2016 में वह मेलबर्न में स्थानीय यूनेस्को कार्यालय द्वारा समर्थित और मोनाश विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘लिटरेरी कॉमंस: राइटिंग ऑस्ट्रेलिया-इंडिया इन द एशियसन सेंच्युरी विद दलित, इंडीजीनस ऐंड मल्टीलिंगुअल टंग’ में सम्मानित अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया।

कल्याणी का मानना है कि प्रतिरोध भले ही छोटे पैमाने पर क्यों न किया जाए वह हर प्रकार के दमन के खिलाफ हमेशा से मौजूद रहा है। इन प्रतिरोध की आवाजों में से कई शायद मुख्यधारा के इतिहास में दर्ज नहीं किए गए हों लेकिन इससे उनका महत्त्व कम नहीं हो जाता। यही वजह है कि आवाज उठाना कभी बंद नहीं करना चाहिए। हमेशा यह कोशिश करनी चाहिए कि दुनिया को जायज ढंग से अपनी आवाज सुनाई जाए। चूंकि बंगाल में जातिवाद मौजूद है इसलिए इसके विरुद्ध संघर्ष में उन लोगों की आवाज बाहर आनी चाहिए जिनको खामोशी से दबा दिया गया। लैंगिक असमानता और निरंकुशता भी जातीय-अन्याय के दायरे से बाहर नहीं हैं।
कल्याणी ने साहित्यिक लेखन के साथ-साथ हमेशा जरूरतमंदों का साथ दिया है और उनके पक्ष में खड़ी रही हैं। चौथी दुनिया के साथ अपने जुड़ाव के दौर में उन्होंने दलित कल्याण मंच आयोजित किया। इसका उद्देश्य था बंगाल के निचली जातियों वाले समुदायों की बेहतरी के लिए काम करना। हालांकि अभी इसे वांछित रूप दिया जाना है क्योंकि खुद उनके समूह में सहयोग का अभाव है। वह अंबेडकरवादी हैं और इसलिए सोचती हैं कि जिन दलितों को कुछ हासिल हो चुका है वे समाज को कुछ वापस दें वरना हालात कभी नहीं सुधरेंगे।

घरेलू कामगार महिलाओं की दीदी: संगीता सुभाषिणी

कल्याणी का सोचना है कि पढ़े-लिखे दलितों को और अधिक सशक्त बनने के लिए पढऩे की आदत डालनी होगी। उनके मुताबिक इस वक्त पुस्तकालयों की स्थापना करना भी स्कूल बनाने जैसा ही अहम है। वंचित वर्ग द्वारा अपने समान लोगों के लिए बनाए गए पुस्तकालय उनके साहित्य और इतिहास को रसूखदार सांस्कृतिक और राजनीतिक समूहों के वर्चस्व से बचा सकते हैं।

रण में सामाजिक सक्रियता की मिसाल हैं पंक्ति जोग

मोहम्मद दिलवर हुसैन ने अंग्रेजी से एम ए करने के बाद आईसीएसएसआर के शोध प्रोजेक्ट के तहत लोकसाहित्य, धर्म और जाति के अंतर्संबंध पर काम किया है.


मूल अंग्रेजी से अनुवाद पूजा सिंह ने किया . अनुवादक पूजा सिंह पत्रकार हैं, अभी साप्ताहिक शुक्रवार के साथ काम कर रही हैं. 

मिर्चपुर के दलित आज भी कर रहे एक अदना सा घर का इन्तजार



हरियाणा में हिसार के मिर्चपुर गांव में रह रहे दलितों पर एक बार फिर हमला हुआ है. स्थानीय पुलिस के मुताबिक़, “बच्चों के बीच हुई कहासुनी से बात बढ़ गई और दोनों पक्ष भिड़ गए.”

नारनौद थाने के एसएचओ ने बीबीसी को बताया, “मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक़ नौ लोग घायल हैं. सभी घायल दलित समुदाय से हैं. हमने एससी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है.”


उन्होंने बताया कि पीड़ित बड़े अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने के लिए हिसार गए हैं.लेकिन मिर्चपुर के दलितों का पूरा मामला है क्या, जानने के लिए पढ़ें ये रिपोर्ट.

क्या दलित सिर्फ़ चुनावी मुद्दा भर हैं? क्या दलित उत्पीड़न के ख़िलाफ़ समाज की संवेदनाएं अस्थायी होती हैं और घटना दर घटना एक उबाल लेकर शांत हो जाती है?


ये सवाल हैं मिर्चपुर के विस्थापित परिवारों में से एक व्यक्ति का, जो पीडितों में एक मात्र एमए (एजुकेशन) और एमफ़िल है.

वर्ष 2010 की 21 अप्रैल को मिर्चपुर के वाल्मीकि परिवारों पर गांव के ही जाटों ने हमला किया था, उनके कई घरों को जला दिया गया था, दो लोगों की हत्या हुई थी और कई घायल हो गए थे. उस वक्त अश्विनी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से एमफ़िल कर रहे थे, उसके बाद से उनके बीच से अब तक कोई उच्च शिक्षा तक नहीं जा सका.

विस्थापित लोगों का दर्द


उन दिनों वाल्मीकि परिवार के ये लोग काफ़ी दहशत में थे. इनपर हमले के दोषियों की जब गिरफ़्तारी हुई तो हिसार की दर्जनों खाप पंचायतों ने सरकार को दोषियों की रिहाई की चेतावनी दी.

इसके बाद ही पीड़ितों के बहिष्कार का भी सिलसिला शुरू हुआ. अमूमन भूमिहीन और सफाई करके या खेतों में काम करके जीविका चलाने वाले इन लोगों को काम देने से भी मना किया जाने लगा.


गाँव और पास की दुकानों ने भी इन्हें सामान देने से इनकार कर दिया. मजबूरन गाँव के 150 से भी ज़्यादा वाल्मीकि परिवार गाँव छोड़ कर दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर में रहने को मजबूर हो गए. उसके बाद हिसार के ही वेदपाल तंवर ने इन्हें अपने फ़ार्म हाउस में जगह दी, तब से वे वहीं रह रहे हैं.

सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष


गाँव छोड़ने के बाद भी दबंगों ने इन्हें चैन से नहीं रहने दिया. इनपर लगातार दवाब बनाया जाता रहा कि वे मुक़दमा वापस लें, मुक़दमे की पैरवी न करें और गवाही न दें.

अदालत के आदेश से गवाहों को सुरक्षा दी गई. तंवर फ़ार्म हाउस में बमुश्किल जीवन यापन कर रहे लगभग 120 परिवारों में से कम से कम 50 को पुलिस सुरक्षा दी गई है. इनकी सुरक्षा में तैनात हरियाणा पुलिस का जवान भी इनके साथ ही रहता है, उसके खाने-पीने की ज़िम्मेदारी भी आम तौर पर इन लोगों की ही है.
झुग्गियां डालकर रह रहे इन लोगों को शौच के लिए पास के खेतों में जाना पड़ता है.


गाँव से विस्थापित हैं, इसलिए कोर्ट के आदेश के बावजूद इन्हें मनरेगा के तहत कोई काम नहीं मिलता.
बड़ी मशक्क़त से बीपीएल योजनाओं के तहत इन्हें राशन देने की ज़िम्मेदारी तंवर फ़ार्म हाउस के पास की एक सरकारी राशन दुकान को दी गई है. शुरू-शुरू में पास के सरकारी स्कूलों ने भी इनका नामांकन देने से अलिखित तौर पर मना कर दिया था-लेकिन अब कुछ बच्चे पास के सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. 9वीं की पढाई छोड़कर आशीष अपनी और अपनी दादी की देखभाल के लिए मज़दूरी करने के लिए विवश है.

आज भी डराता है गाँव, चाहते हैं पुनर्वास


तंवर फ़ार्म हाउस में झुग्गियां डालकर रह रही महिलाओं का एक समूह बताता है कि अब उस गाँव में क्या रखा है, आज भी वहाँ के लोग डराते हैं. महिलाएं बताती हैं कि उस गाँव में आज भी 40-50 वाल्मीकि परिवार रहता है, लेकिन गाँव के जाटों ने उनका बहिष्कार जारी रखा है.


घटना के समय के ख़ौफ़ को याद कर सुनीता कहती हैं, “हम अब उस गाँव में नहीं जा सकते हैं, सरकार हमें हिसार में ही कोई जगह देकर बसाए.”

इन्हें अपने फ़ार्म हाउस में जगह देनेवाले वेदपाल तंवर कहते हैं, “इनके साथ अत्याचार कांग्रेस की हुड्डा सरकार के समय में हुआ था. वह जाटों के लिए जाटों की सरकार थी, इस मामले में अभियुक्त जाट थे. इसलिए सरकार ने इनसे ज़्यादा मदद जाटों की. इन्होंने वोट बीजेपी को दिया, लेकिन बीजेपी की सरकार भी इनकी समस्या पर ध्यान नहीं दे रही है. दलितों की राजनीति की दावेदारी करने वाली मायावती ने इन्हें समय देकर भी इनसे मिलना उचित नहीं समझा.”

अठावले का दौरा और हुक्मरानों की चालाकियां


उत्तरप्रदेश के चुनाव में अपनी पार्टी आरपीआई के उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करने के पहले केंद्रीय सामाजिक अधिकारिता मंत्री (राज्य) रामदास अठावले पिछले 19 जनवरी को इन विस्थापित पीड़ितों से मिलने तंवर गेस्ट हाउस पहुंचे. मंत्री अधिकारियों को महाराष्ट्र के पीड़ित परिवारों के पुनर्वास के उदाहरण देते दिखे.

पीड़ितों ने उन्हें बताया कि मामले में दोष सिद्ध होने के बाद अनुसूचित जाति-जनजाति क़ानून के तहत पुनर्वास उनका अधिकार है तो अठावले ने मुख्यमंत्री खट्टर से मिलकर इनके पुनर्वास के लिए प्रयास का आश्वासन दिया.
वे पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए मानने से इनकार कर गए कि उत्तरप्रदेश के चुनावों में दलित राजनीति पर दावेदारी के लिए वे इन दलितों की सुध ले रहे हैं, लेकिन वे यह कहने से भी नहीं चूके कि वे दलित वोटों को मायावती के क़ब्ज़े से मुक्त करेंगे.

अभिशप्त होने के लिए मज़बूर


प्रशासन की असंवेदनशीलता का आलम यह है कि जब मंत्री के सामने सुप्रीमकोर्ट के 2011 के आदेश की बात उठाई गई कि प्रत्येक पीड़ित परिवार को महीने में दो क्विंटल गेहूं देने का आदेश दिया गया था, तो मंत्री के सामने उपस्थित एसडीएम और अन्य अधिकारी एक काग़ज़ दिखाकर बताते रहे कि इन्हें लाखों रुपए का मुआवज़ा दिया गया है.



दरअसल वे काग़ज़ हमले के शुरुआती दिनों में दिए गए मुआवज़े के रिकार्ड थे. जब न्यायालय के आदेश के बारे में उनसे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उन्होंने वह आदेश नहीं देखा है.
न्यायालय ने पीड़ितों को नौकरी देने का भी आदेश दे रखा है, लेकिन पीड़ित बताते हैं कि कुछ महीने की कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी के बाद उन्हें हटा दिया गया.

सवाल है कि क्या सरकारों और राजनीति की असंवेदनशीलता झेल रहे मिर्चपुर के दलितों की अगली पीढ़ी भी विस्थापन और पुनर्वास की अनिश्चितता के बीच जीने के लिए अभिशप्त है?

नीतीश जी,आपकी पुलिस बलात्कारी को बचा रही है.

मुकेश कुमार 

21 जनवरी को जिस वक्त पूरे राज्य में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में शराबबंदी को लेकर करोड़ों लोग मानव श्रृंखला में खड़े थे उसी वक्त घर में अकेली नाबालिग मुस्लिम बच्ची के साथ भागलपुर जिले के बिहपुर प्रखण्ड के एक गांव में भूमिहार जाति के एक दबंग प्रभाष चौधरी ने दुष्कर्म कर उसकी योनी को तेज धार वाले हथियार से लहूलुहान कर दिया. न्याय मंच की एक जांच टीम ने घटना स्थल पर जाकर पूरे मामले की गहराई से छानबीन की. उक्त जांच टीम में न्याय मंच के डॉ. मुकेश कुमार, अंजनी, मोहम्मद आकिब, अमित कुमार और अन्य शामिल थे. घटना स्थल से लौटकर जांच टीम ने बताया कि घटना के 5 दिन बीत जाने के बाद भी बलात्कारी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. बलात्कारी के दबदबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस घटना के बाद से पूरे इलाके के लोग इतने दहशत में हैं कि मामले पर कोई खुलकर बोलने तक को तैयार नहीं है. इस भयानक दहशत के बीच आज न्याय मंच की टीम ने उक्त गांव जाकर पीड़ित परिवार से मिलकर पूरे मामले की छानबीन की. पीड़िता के भाई ने बताया कि जिस वक्त यह वारदात हुई उस वक्त बहन घर में अकेली थी. अम्मी बीमार थी, जिसे डाक्टर से दिखाने के लिए अब्बू उन्हें लेकर भागलपुर गए हुए थे और हम भाई-बहन भी घर से बाहर थे. बहन को अकेली पाकर प्रभाष चौधरी ने उसे झोपड़ी के अंदर ले जाकर दुष्कर्म किया और तेज हथियार से उसके गुप्तांग घायल कर फरार हो गया. बलात्कारी ने पहले बच्ची के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया, ताकि वह चीख-चिल्ला न पाये, और उसके बाद इस घटना को अंजाम दिया.



पीड़िता के भाई ने बताया कि हमारे घर के पास लगभग 11 बीघा जमीन प्रभाष चौधरी की है. अपनी जमीन और फसल की देखभाल करने वह अक्सर यहाँ आता-जाता था और हमारे घर भी आता-जाता था. घटना के दिन भी वह इसी क्रम में आया था और बच्ची को अकेली पाकर उसने इस घटना को अंजाम दिया. इस घटना को अंजाम देकर जब वह भाग गया तो बच्ची झोपड़ी से बाहर निकलकर गिरते-पड़ते खेतों से बाहर आयी. यहाँ बता दें कि पीड़ित परिवार जहां झोपड़ी बनाकर रह रहा है, उसके चारों ओर खेत ही खेत है और उसमें अभी मकई की लहलहाती फसल लगी है. मक्के की यह फसल अब तैयार होने की तरफ बढ़ रही है. मक्के का पौधा इतना बड़ा है कि सड़क पर से आने-जाने वालों की बात तो दूर पीड़ित परिवार की झोपड़ी दिखाई तक नहीं देती है. इसी का फायदा उठाकर बलात्कारी भागने में कामयाब रहा. घटना के बाद पीड़िता सड़क पर आ गई और लोगों से उसने सारी बात बतायी, तो आस-पास के लोगों ने उसकी बिगड़ती हुई गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे हरिओ गांव पंचायत के मुखिया के पास ले गए. उसके बाद उसे उसी गांव के एक मेडिकल प्रैक्टिस्नर के पास इलाज के लिए ले जाया गया. तब तक बलात्कारी प्रभाष चौधरी के भाई को भी घटना ककई खबर मिल गई थी और वह भी हरिओ गांव आ पहुंचा और उसने पीड़िता की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए उसे देर शाम हरिओ से चार-पाँच किलोमीटर दूर नारायणपुर के एक निजी क्लिनिक में भर्ती कराया. 22 जनवरी की सुबह वहाँ से बच्ची को लाया गया और पीड़िता के परिजनों और बलात्कारी के भाई की मौजूदगी में दोनों पक्षों में सुलह कराने और मामले को रफा-दफा करने की नीयत से पंचायत के मुखिया ने पंचायत बुलाई. पंचायत में बलात्कारी प्रभाष चौधरी को भी बुलाया गया था, किन्तु वह नहीं आया. उसके नहीं आने पर उसका भाई पूरे मामले से पीछे हट गया और उसने कहा कि मानवता के नाते हमने इलाज करा दिया, अब मुझे इस मामले से कोई मतलब नहीं है. पंचायत की बैठक बेनतीजा देखते हुए मुखिया ने पीड़ित परिवार को पुलिस के पास भेज दिया. उसके बाद पीड़िता के माँ-बाप ने नवगछिया के महिला थाना में इस पूरे मामले की शिकायत दर्ज करते हुए छानबीन शुरु की. लेकिन पुलिस अब तक बलात्कारी को गिरफ्तार नहीं कर पायी है. उसके पिता को पुलिस ने कुछ घंटे के लिए गिरफ्तार कर थाना जरूर लाया किन्तु बाद में उसे भी छोड़ दिया.

बलात्कारी प्रभाष चौधरी और उसका परिवार पूरे इलाके में दबदबा रखता है और क्षेत्र के राजद-भाजपा के नेताओं का उसके यहाँ आना-जाना लगा रहता है. यही कारण है कि मुस्लिम नाबालिग बच्ची के साथ हुई इस शर्मनाक घटना के इतने दिन बाद भी न तो सेकुलरिज़्म की बात करने वाली पार्टी राजद के स्थानीय विधायक और सांसद ने ही मुंह खोला है और न ही राज्य की विपक्षी पार्टी बीजेपी के नेताओं का ही कोई प्रेस बयान तक आया है. पीड़ित परिवार से इन लोगों ने मिलना तो खैर जरूरी नहीं ही समझा है.

बताते चलें कि भागलपुर जिले का यह पूरा इलाका भूमिहार जाति के सामंती दबदबे वाला इलाका रहा है. क्षेत्र की अस्सी फीसदी से अधिक जमीन पर इसी जाति विशेष के लोगों का कब्जा बना हुआ है. इस इलाके के दलित-वंचित-कमजोर-अल्पसंख्यक तबके के ज़्यादातर लोग इन्हीं भूस्वामियों के खेतों में मजदूरी और उनके घरों में काम कर अपना जीवन-यापन करते हैं. इन गरीब-दलित मजदूरों के परिवार की महिलाओं की इज्जत-आबरू से खेलना इस इलाके के भूमिहार भूस्वामियों के लिए कोई नई बात नहीं रही है. इलाके में यह सब लंबे समय से होता रहा है जो किसी न किसी रूप में आज भी जारी है. यही कारण है कि नाबालिग के साथ दुष्कर्म का यह घृणित मामला स्थानीय संपन्न लोगों के लिए कोई मुद्दा नहीं है. और जिन दबे-कुचले शोषित लोगों और सामाजिक संगठनों की नजर में यह घृणित घटना मायने रखती है, वे भूमिहार जाति के वर्चस्व के आगे कुछ बोलने और पीड़ित के इंसाफ के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं.

पीड़ित परिवार निहायत ही गरीब है और खेत मजदूरी कर किसी तरह अपना जीवन-यापन करता है. परिवार में कोई पढ़ा-लिखा नहीं है. पिछले तीन पीढ़ियों से यह अल्पसंख्यक परिवार एक भूस्वामी के खेत में झोपड़ी बनाकर रह रहा है. पीड़िता के भाई ने जांच टीम को बताया कि भूमिहार जाति के एक भूस्वामी ने ही अपने खेत की देखभाल करने के लिए हमारे पूर्वजों को यहाँ बसने के लिए जमीन दी थी. तबसे हमारा परिवार यहीं रहता आ रहा है. हमलोग दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं और अपना गुजर-बसर करते हैं. बसने की जमीन के एवज में हमलोग भूस्वामी की फसल की देख-रेख करते आ रहे हैं. फसल की देख-रेख के बदले हमें कोई मजदूरी-मेहनताना नहीं मिलता है. जिस दिन हम उनके खेतों में काम करते हैं, उस दिन की ही मजदूरी हमें दी जाती है. कुल मिलाकर पीड़ित परिवार ने जांच टीम को बताया कि हम गरीब-मजदूर लोग इतने ताकतवर लोगों से कैसे लड़ेंगे! पीड़ित परिवार फिलहाल पुलिस-प्रशासन से ही न्याय की उम्मीद कर रहा है. लेकिन ऐसे मामलों में, जहां बलात्कारी सवर्ण-सामंती तबके से ताल्लुकात रखता है, उसके प्रति पुलिस और सत्ता का रवैया हमेशा सवालों के घेरे में रहा है.

इस घटना के खिलाफ अब तक कोई मुस्लिम संगठन भी इस मामले में सामने नहीं आया है. घटना के बाद इस पूरे इलाके में झूठी कहानियां प्रचारित कर मामले को दबाने की कोशिशें तेज हो उठी हैं. यह झूठा प्रचार चलाया जा रहा है कि जमीन पर अवैध कब्जा करने की नियत से आरोपी को झूठे मुकदमे में फंसाया जा रहा है.

पितृसत्तात्मक पुरुषवादी व सामंती शोषण से अनुकूलित इस पिछड़े इलाके में इस किस्म का प्रचार अत्यंत ही आसान हो जाता है. बलात्कारी को बचाने में लगे लोग आम जनता की इस पिछड़ी हुई चेतना का फायदा उठाते हुए बलात्कारी को बचाने में जुट गए हैं. जबकि सच्चाई यह है कि पीड़ित परिवार जिनकी जमीन पर कई पीढ़ियों से रह रहा है, वह जमीन बलात्कारी की न होकर उसी जाति के दूसरे भूस्वामी की है और उन्होंने इससे पूर्व पीड़ित परिवार को जमीन खाली करने के लिए भी नहीं कहा था. लेकिन अब इस बात की आशंका तेज हो गई है कि मामले को ठंढा करने और पीड़ित परिवार को दबाने हेतु उस भूस्वामी से भी दबाव बनवाया जा सकता है, जिसकी जमीन पर पीड़ित परिवार कई पीढ़ियों से रह रहा है. इस मामले में ‘सेफ़्टिक वल्व’ के तौर पर इस भूस्वामी का इस्तेमाल किया जा सकता है.

न्याय मंच ने पुलिस के तौर-तरीकों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पुलिस केवल कार्रवाई का दिखावा कर रही है. जिस झोपड़ी में बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना हुई, वहाँ मिट्टी पर गिरे हुए खून को घटना के छह दिन के बाद भी अब तक जांच के लिए नहीं लाया गया है. इससे साफ जाहिर होता है कि पुलिस बलात्कारी को गिरफ्तार कर सजा दिलाने के प्रति गंभीर नहीं है. न्याय मंच ने बलात्कारी की गिरफ्तारी और पीड़िता के बेहतर इलाज की गारंटी और पीड़ित परिवार के सुरक्षित पुनर्वास की गारंटी की मांग की है. जांच टीम ने कहा है कि इस जघन्य घटना के बाद पीड़ित परिवार का वहाँ अकेले रहना खतरे से खाली नहीं है. इसलिए दूसरे स्थान पर पीड़ित परिवार के सुरक्षित पुनर्वास कराते हुए न्याय की गारंटी मिलनी चाहिए. न्याय मंच ने कहा है कि इस घटना ने नीतीश सरकार के महिला सशक्तिकरण और न्याय के साथ विकास के दावों की पोल खोलकर रख दी है और भूमि सुधार की जरूरत को नये सिरे से सामने ला दिया है.

पितृसत्ता के बदलते स्वरूप

डिम्पल

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा,रिसर्चर ( स्त्री अध्ययन ) M.phil,संपर्क: dimpledu1988@gmail.com

लैंगिक वर्चववादी समाज में स्त्री-पुरूष के अधिकारों को लेकर द्वंद्व घर और बाहर दोनों क्षेत्रों में बना हुआ है . आधुनिक कहलाने व बनने की होड़ में वे केवल उन्हीं बातों को अपना रहे हैं, जिनसे उनके हित जुड़े हुए, बाकि को नजरअंदाज करते जाते हैं.   वे  ठीक से न तो आधुनिकता को ही ग्रहण कर पाते हैं और न ही परम्परा का दामन ही पूर्णत: छोड़ पाते हैं,  ऐसे में द्वन्द्ता का प्रश्न बना हुआ है- जिसका प्रभाव स्त्री – पुरूष के संबंधों पर भी देखा जा सकता हैं. यही कारण है कि आज भी महिलाओं के संबंध में घर व बाहर काम करने को लेकर बंधी भूमिकाओं में ज्यादा बदलाव नहीं आए हैं . इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरूष अपने जीवन में समय व स्थिति के अनुसार बदलावों के नाम पर लीपापोती करने का प्रयास बखूबी कर रहा है, लेकिन महिलाओं को समान अधिकार तथा हक़ देने से अभी भी बच रहा है, जिसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करना अनिवार्य हो जाता है .


पुरुष समाज की जेंडरगत अवधारणा में व्यवस्थित व्यवस्था के अंतर्गत अधिकारों की समानता को लेकर भयाक्रांत भी हैं,  जिसे कही न कही वह अपने एकाधिकारों को छिनने के रूप में भी देखता है, जिससे महिलाओं की यौनिकता , प्रजनन तथा कार्य क्षमता पर नियंत्रण के नए रूप इस व्यवस्था में सामने आ रहे हैं, जैसे सुपर मॉम, सुपर पत्नी आदि के कॉन्सेप्ट . अत: हम कह सकते हैं कि इस बदलते परिवेश व भूमिकाओं में महिलाओं पर स्त्रियोचित आदर्श के लबादे को इस कदर थोपा जा रहा. जिस पर समय समय पर विभिन्न प्रतिरोधी अभिव्यक्तियां भी सामने आयी हैं , अत: इस स्थापित पितृवत व्यवस्था में स्त्री –पुरूष संबंधों में द्वन्द्ता के प्रश्न दोनों के बीच मौजूद हैं, क्योंकि वह खुद को निर्धारित भूमिकाओं से इतर नहीं देख व समझ पा रहे हैं,  कारण घर – परिवार में स्त्री को स्त्री व पुरूष को पुरूष बनाने की प्रक्रिया उनकी संस्कार रुपी परवरिशों में शामिल की जाती हैं.   ऐसे में यदि कोई इस स्थापित व्यवस्था की व्यवहारिकी से इतर व्यवहार या अधिकारों की मांग करता है तो ऐसे में उसके प्रति समाज की हेय  दृष्टि काम करती हैं . महिलाओं के संदर्भ में अक्सर कहा जाता हैं कि पानी सर से ऊपर उठ चुका हैं इनमें शर्म लिहाज नहीं बची और तो और उन्हें  चरित्रहीन ,पथभ्रष्ट , घर तोडू कहा जाता है. कई बार उन्हें पुरूषों की होड़ करने वाली औरत या ज्यादा हो तो मर्दाना महिला तक की संज्ञा दे दी जाती है, ऐसे में महिलाओं की खुद की पहचान कहां ?

समाज में मनुवाद की ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक जड़े घुन की तरह इस तरह से रच बस गयी हैं कि इस बदले हुए परिवेश में वह नए रूप में हमारे समक्ष आ रही हैं, जिसे हम जाति , वर्ग , लिंग , क्षेत्र , भाषा , धर्म आदि के आधार पर भी समझ सकते हैं. महिलाओं पर महिलाओं द्वारा पैट्रिआर्की  के तहत नियंत्रण आदि को समझते हुए भी इसके विभन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला जा सकता है.

आज का पुरूष अपने लिए पढी -लिखी स्त्री की चाह तो रखता है, परंतु अपने हितों और शर्तों के अनुसार. ऐसे में महिलायें भी खुद को पुरूषों से कमतर देखने व समझने के अनुकूलन में ढल जाती हैं. समाज में जेंडर के आधार पर स्त्री व पुरूष के मन व मस्तिष्क को संरचनागत ढाँचे के अनुसार उनकी मनोवैज्ञानिकी तैयार करने की पूरी प्रक्रिया चलती है. यही कारण है कि इस बदलते परिवेश में पुरूष आज भी महिलाओं के प्रति बंधी बंधाई पारम्परिक रूढ़िवादी परिपाटियों से खुद को मुक्त नहीं कर पाता है,  न ही महिलायें ही खुद को पूर्णत: मुक्त कर पायी हैं . ऐसे में यदि कोई महिला या पुरूष इस स्थापित व्यवस्था से इतर जाने का प्रयास करता है तो उन्हें अन्य उदाहरणों द्वारा सचेत किया जाता हैं .ऐसे में समाज में व्याप्त विभिन्न ठेकेदार इस व्यवस्था को यथावत् बनाए रखने हेतु कई हथकंडो का सहारा लिया करते हैं, जैसे खाप पंचायत आदि .

पुरुष समाज की जेंडरगत अवधारणा में व्यवस्थित व्यवस्था के अंतर्गत अधिकारों की समानता को लेकर भयाक्रांत भी हैं,  जिसे कहीं न कहीं  वह अपने एकाधिकारों को छिनने के रूप में भी देख रहा है, जिससे महिलाओं की यौनिकता , प्रजनन तथा कार्य क्षमता पर नियंत्रण के नए रूप इस व्यवस्था में सामने आ रहे हैं, जैसे सुपर मॉम, सुपर पत्नी आदि के कॉन्सेप्ट . अत: हम कह सकते हैं कि इस बदलते परिवेश व भूमिकाओं में महिलाओं पर स्त्रियोचित आदर्श के लबादे को इस कदर थोपा जा रहा. जिस पर समय समय पर विभिन्न प्रतिरोधी अभिव्यक्तियां भी सामने आयी हैं  अत: हम कह सकते हैं कि ऊपर से नीचे तक व्यवस्था के अंतर्गत रची -गढ़ी साजिशों व रणनीति के तहत यह सब किया गया है. यही कारण हैं कि आज इतिहास में His Story से Her Story की बात सामने आती हैं

घर से  राज्य तक महिलाओं के अधिकारों के संबंध में लैंगिक हेजेमनी की स्थिति को विभिन्न तरह की संस्थाओं के संस्थानीकरण (विद्यालय ,कानून, विवाह, रीति-रिवाज़ तथा धार्मिक संस्थायें आदि व्यवस्थायें) द्वारा इसे बनाए रखने के उपक्रम के रूप में भी समझा जा सकता हैं .

अनारकली आरावाली 24 मार्च से

अनारकली आॅफ आरा देश भर में 24 मार्च को रीलीज़ हो रही है. नील बटे सन्नाटा के बाद स्वरा भास्कर की यह महत्वाकांक्षी सोलो फिल्म है. प्रोमोडोम कम्युनिकेशन्स के बैनर तले बनी इस फिल्म में उसने एक सड़कछाप गायिका का किरदार निभाया है. फिल्म का निर्देशन किया है अविनाश दास ने. अनारकली की कहानी भी उन्होंने ही लिखी है. इससे पहले अविनाश दास प्रिंट और टीवी के पत्रकार रहे हैं. उन्होंने आमिर ख़ान की सत्यमेव जयते के लिए भी रिपोर्टिंग की है. अनारकली में स्वरा भास्कर के अलावा संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी और इश्तियाक़ ख़ान महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं. फिल्म का अनोखा संगीत रचा है रोहित शर्मा ने, जिन्होंने शिप आॅफ थिसियस में भी संगीत दिया था.

अनारकली आॅफ आरा एक सोशल म्‍यूजिकल ड्रामा है. अनारकली बिहार की राजधानी पटना से चालीस किलोमीटर दूर आरा शहर की एक देसी गायिका है, जो मेलो-ठेलों, शादी-ब्‍याह और स्‍थानीय आयोजनों में गाती है. यह फिल्‍म एक ऐसी घटना से जुड़ी है, जिसके बाद अनारकली का जीवन एक उजाड़, डर और विस्‍थापन के कोलाज में बदल जाता है.

अनारकली के गीत लोगों के मन के दबे हुए तार छेड़ते हैं. उसे सुनने वाले उस पर फिदा हो जाना चाहते हैं और अनारकली अपने प्रति लोगों की दीवानगी को अपनी संगीत यात्रा में भड़काती चलती है. उसके प्रेम का अपना अतीत है और सेक्‍स पर समझदारी के मामले में रूढ़ीवादी भी नहीं है. इतनी खुली शख्‍सीयत के बावजूद उसके पास एक आत्‍मसम्‍मान है, जिसका एहसास वह कई मौकों पर सामने वाले को कराती भी रहती है. वह एक तेवर रखती है, जिसमें जमाने की परवाह नहीं है, लेकिन रिश्‍तों के मामले में संवेदनशील भी है. फिल्‍म में उसके इर्दगिर्द पांच लोग हैं – जो उसके प्रेम के एक ही धागे में बंधे हैं. सब अपनी अपनी तरह से अनारकली को प्रेम करते हैं. लेकिन आखिर में अनारकली को अकेले ही अपने रास्‍ते पर जाना है और वही होता है. पूरी कहानी में कठिन से कठिन मौकों पर उसकी आंखें आंसू नहीं बहाती और बाहर की उदासी को वह अपनी हिम्‍मत से खत्‍म करने की कोशिश करती है. अनारकली एक ऐसा किरदार है, जो हिंदी सिनेमा में अब तक नहीं आया है.