पुस्तक समीक्षा
चोखा दाम – सतीश सरदाना
बोधि प्रकाशन 2026
समकालीन हिंदी कहानी का एक बड़ा संकट यह है कि वह कई बार अपने समय के शोर में मनुष्य की धीमी आवाज़ खो देती है। कहीं ‘विचार’ कथा पर भारी पड़ जाता है, कहीं ‘घटना’ ‘संवेदना’ को विस्थापित कर देती है और कहीं ‘पात्र’ केवल किसी विमर्श के प्रतिनिधि बनकर रह जाते हैं। ऐसे समय में सतीश सरदाना का कहानी-संग्रह ‘चोखा दाम’ पाठक को एक अलग अनुभव देता है। यह संग्रह किसी विचारधारा का घोषणापत्र नहीं है, न ही मात्र घटनाओं का दस्तावेज़ इसकी सबसे बड़ी शक्ति यह है कि यह मनुष्य को उसकी समूची जटिलता, विडंबना, करुणा और अपूर्णता के साथ देखने का साहस करता है।
संग्रह की कहानियाँ असाधारण घटनाओं के बजाय साधारण जीवन के उन क्षणों पर केंद्रित हैं जहाँ जीवन चुपचाप अपना सबसे गहरा अर्थ रचता है। एक पुराना रुमाल, धुली हुई नाइटी, शर्ट का सीधा किया गया कॉलर, एक अदद टॉयलेट-बाथरूम, अध्यापिका का स्नेह, घरेलू कामगार स्त्री का मौन, बूढ़े पिता का अपराधबोध—ये सब मामूली दिखने वाले प्रसंग हैं, पर इन्हीं में लेखक मनुष्य की गरिमा और रिश्तों का गहरा अर्थ खोजते हैं।
संग्रह में कुल 22 कहनियाँ हैं जिनमे कुछ लम्बी कहानी है तो कुछ अत्यंत लघु जैसे आशा और विषयों की भी विविधता है। भाषा हमारे जीवन से जुड़ी है जो पाठक को अपने साथ बहा ले जाती है । यहाँ कुछ कहानियों पर बात करना ज़रूरी समझा ।
‘चोखा दाम’ बाज़ार और मनुष्य का मूल्य: कहानी बाज़ार की भाषा का उपयोग करते हुए मनुष्य के मूल्य को पुनर्परिभाषित करती है। यहाँ ‘एंड माल’ केवल वस्तु नहीं, बल्कि वह मनुष्य है जिसे समाज अनुपयोगी घोषित कर देता है। किंतु कहानी इस अवधारणा को उलट देती है, मनुष्य का मूल्य उसकी उत्पादकता में नहीं, बल्कि उसके संबंधात्मक अस्तित्व में निहित है। सतीश सरदाना दिखाते हैं कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी सफलता-असफलता से नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में उसकी आवश्यकता से तय होता है। ‘एंड माल’ का रूपक कहानी को यथार्थ से उठाकर दार्शनिक ऊँचाई देता है।
कहानी का अंतिम वाक्य “एंड माल का चोखा दाम लगा था” सिर्फ़ चौंकाता नहीं, बल्कि पाठक की दृष्टि बदल देता है। दरअसल पूँजीवादी मूल्य-तंत्र की आलोचना है। यह पाठक को उस दृष्टि से मुक्त करता है जो मनुष्य को ‘उपयोगिता’ के आधार पर आँकती है। हरियाणवी और उत्तर भारतीय मुहावरों का स्वाभाविक प्रयोग भाषा को जीवंत बनाता है, हालाँकि कहीं-कहीं लेखक की समाजशास्त्रीय टिप्पणियाँ कथा की गति को धीमा करती हैं।
स्मृति, इतिहास और ऋण: ‘बूढ़ा हो गया हुआ पौधा’
यह कहानी पितृसत्ता और स्मृति के बीच फँसी स्त्री-जीवन की त्रासदी को उभारती है। यहाँ पुरुष निर्णय लेते हैं और स्त्रियाँ उनके परिणाम भुगतती हैं। वैदेही, मैथिली, नानी और कोठेवालीसभी स्त्रियाँ अलग-अलग प्रकार के दर्द की प्रतिनिधि हैं।
कहानी का केंद्रीय बिंदु ‘ऋण’ है विभाजन का, शरण का, विवाह का और अंततः अपराधबोध का। लेखक इतिहास को बड़े आख्यान के रूप में नहीं, बल्कि परिवार की स्मृतियों और रिश्तों की दरारों में दर्ज करते हैं।
सत्ता, धर्म और स्त्री-शरीर ‘सुबह होने में कितनी देर है’
यह कहानी केवल शोषण या पाखंड की कथा नहीं, बल्कि सत्ता, धर्म, स्त्री-शरीर और सामाजिक मौन की गहरी पड़ताल है। लेखक किसी पात्र से भाषण नहीं दिलवाते, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ रचते हैं जहाँ पाठक स्वयं व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा हो जाता है। कहानी यह दिखाती है कि कैसे आर्थिक निर्भरता, सामाजिक असुरक्षा और सांस्कृतिक दबाव स्त्री की ‘सहमति’ को निर्मित करते हैं—जो वास्तव में सहमति नहीं, बल्कि विवशता है।
अंतिम प्रश्न “सुबह होने में कितनी देर है?” सिर्फ़ रात के समाप्त होने की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति, भय के अंत और न्यायपूर्ण समाज की आकांक्षा है। माछीराम का चरित्र संस्थागत सत्ता का रूपक बन जाता है, जबकि सोबती और अन्य स्त्रियाँ उस व्यवस्था में फँसी हुई असहाय चेतनाएँ हैं।
शिक्षा का मानवीय अर्थ- ‘आशा’
यह कहानी संग्रह में एक राहत की तरह आती है। यहाँ शिक्षा सूचना नहीं, बल्कि विश्वास है। आशा मैडम केवल पढ़ाती नहीं, बल्कि विश्वास सुरक्षा और सहारा देती हैं।
अंतिम पंक्तियाँ “उसकी जगह एक आशा ने ले ली थी… वह आशा जो मूर्तिमान भी थी और अमूर्त भी।” यह पूरी कहानी का भाव-सार प्रस्तुत करती हैं।
श्रम, वर्ग और पहचान ‘औजारन’
शीर्षक ही कहानी का अर्थ खोल देता है—समाज घरेलू कामगार स्त्री को ‘औजार’ समझता है, जबकि कहानी सिद्ध करती है कि वही सबसे संवेदनशील मनुष्य है।‘औजारन’ को यदि इंटरसेक्शनैलिटी के दृष्टिकोण से पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि स्त्री की पहचान एकरेखीय नहीं है। वह वर्ग, धर्म, लिंग और श्रम इन सभी आयामों के बीच निर्मित होती है। लेखक साधारण घटनाओं के माध्यम से उसके भीतर के संघर्षों को उजागर करते हैं।
राजनीति और विचार ‘टोकस तो गया’
यह संग्रह की सबसे राजनीतिक और समकालीन कहानी है, महामारी, सांप्रदायिकता और मीडिया, ये सभी तत्व मिलकर एक वैचारिक परिदृश्य निर्मित करते हैं। पात्रों के संवाद अत्यंत जीवंत हैं, परंतु कुछ स्थानों पर लेखक का वैचारिक हस्तक्षेप अधिक स्पष्ट हो जाता है, जिससे पात्र प्रतीक में बदलने लगते हैं।
स्त्री-गरिमा और निजी स्पेस ‘एक अदद टॉयलेट बाथरूम’
यह कहानी स्त्री-गरिमा और घरेलू सत्ता-संबंधों की मार्मिक पड़ताल है। ‘एक अदद’ शब्द ही विडंबना को उद्घाटित करता है जो सुविधा सामान्य होनी चाहिए, वही निर्मला के लिए सपना बन जाती है।यह कहानी वर्जीनिया वुल्फ की ‘ए रूम ऑफ़ वन’ज़ ओन’ की भारतीय सामाजिक यथार्थ में पुनर्व्याख्या है। ‘टॉयलेट-बाथरूम’ यहाँ केवल भौतिक सुविधा नहीं, बल्कि स्त्री के ‘बॉडी पॉलिटिक्स’ और ‘डिग्निटी’ का प्रतीक बन जाता है।
त्रिखंडी शिल्प अर्थात् भाई, पिता और पति के माध्यम से कहानी एक गहरी त्रासदी रचती है। यहाँ ‘टॉयलेट-बाथरूम’ केवल सुविधा नहीं, बल्कि स्त्री के सम्मान और निजी स्पेस का प्रतीक बन जाता है।
अपराधबोध और अस्तित्व ‘व्यर्थ जीवन’
यह कहानी अपराधबोध से भरे एक बूढ़े पिता की मनःस्थिति को उजागर करती है। यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का संकट है जो अपने ही घर में अनचाही हो जाती है।यह कहानी अस्तित्ववादी दर्शन – विशेषतः जाँ-पॉल सार्त्र और कामू की अवधारणाओं की याद दिलाती है। यहाँ जीवन का अर्थ प्रश्नांकित है – क्या केवल जीवित रहना ही जीवन है? पाठक को भीतर तक झकझोर देता है।
स्मृति और प्रेम ‘इश्क का क्या है’
पहली दृष्टि में यह हल्की-फुल्की प्रेमकथा लगती है, पर वास्तव में यह स्मृति और अधूरे प्रेम की कहानी है।यहाँ स्मृति ही प्रेम का वास्तविक स्थान बन जाती है।
अनुपस्थिति की उपस्थिति: ‘उसके कपड़े’। कपड़े यहाँ स्मृति के ठोस अवशेष बन जाते हैं, जो मृत्यु के बाद भी संबंधों को जीवित रखते हैं। कपड़े यहाँ स्मृति के प्रतीक बन जाते हैं वे चीज़ें जो किसी के जाने के बाद भी बची रहती हैं। यह कहानी अनुपस्थिति की उपस्थिति को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।
सतीश सरदाना की कथा-दृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे अपने पात्रों को नायक या खलनायक में विभाजित नहीं करते। वे उन्हें उनकी जटिल मानवीयता के साथ प्रस्तुत करते हैं।
स्त्री-पात्रों का चित्रण भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है वे केवल पीड़िता नहीं, बल्कि संवेदनशील, जटिल और जीवंत व्यक्तित्व हैं। भाषा सरल, बोलचाल की और मुहावरेदार है, जिसमें हरियाणवी और उत्तर भारतीय जीवन की सहज छाप है।
हाँ, कुछ कहानियों में लेखक का वैचारिक हस्तक्षेप कथा के प्रवाह को थोड़ा बाधित करता है, परंतु समग्रतः उनकी संवेदना विचार पर भारी पड़ती है।
निष्कर्षतः, ‘चोखा दाम’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यह संग्रह हमारे समय के मनुष्य, उसके संबंधों, उसके अकेलेपन, प्रेम, अपराधबोध और जिजीविषा का संवेदनशील दस्तावेज़ है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह पाठक को अपने आसपास के ‘साधारण’ मनुष्यों को असाधारण दृष्टि से देखने के लिए विवश करता है।

कहानी संग्रह के लेखक -सतीश सरदाना
