लोक से विश्व तक गूंजती छत्तीसगढ़ की धड़कन अब खामोश: तीजन बाई
रीतिकालीन कविता और स्त्री यौनिकता विमर्श
हँसना है तो थोड़ा रो लें: मैं वापस आऊंगा’
“भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता कीअभिव्यक्ति : एक आलोचनात्मक अध्ययन”
किरण मुक्तिप्रिया की कवितायें
पिता भी होते हैं माँ
देह का स्त्रीवादी पाठ और मित्रो मरजानी
क्रान्ति
नील नीले रंग के
क्योंकि वह स्त्री थी
खोल दो ..
दिलों में मुहब्बत नहीं तो कायनात में यह कैसी बहार?
सूखा नशा