लोक से विश्व तक गूंजती छत्तीसगढ़ की धड़कन अब खामोश: तीजन बाई
रीतिकालीन कविता और स्त्री यौनिकता विमर्श
हँसना है तो थोड़ा रो लें: मैं वापस आऊंगा’
“भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता कीअभिव्यक्ति : एक आलोचनात्मक अध्ययन”
वेश्यावृत्ति का समुदायिकरण और उसका परंपरा बनना
“रूह कंपाने वाली यात्रा–डायरी”
हिन्दी कविता में मुक्तिबोध के पूर्वज थे जयशंकर प्रसाद – प्रो.मैनेजर पाण्डेय
एक थी रमता और अन्य कविताएँ
सरस्वती और अन्य कविताएँ
“आम औरत की दैहिक या मानसिक यातना के लिए दहकते सवाल“
इतिहास से अदृश्य स्त्रियाँ
अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों नहीं आता…
सूखा नशा