सार
भारतीय भक्ति-काव्य की विविध परंपराओं में कबीर और कनकदास दो ऐसे संत-कवि हैं, जिनकी धार्मिक पृष्ठभूमि, भाषिक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक संदर्भ भिन्न होने के बावजूद उनकी काव्य-दृष्टि में गहरे मानवीय साम्य दिखाई देते हैं। कबीर उत्तर भारत की निर्गुण संत परंपरा के प्रमुख कवि हैं, जबकि कनकदास कर्नाटक की हरिदास वैष्णव परंपरा के महत्त्वपूर्ण कवि। सामान्यतः कबीर को निर्गुण भक्ति और कनकदास को सगुण वैष्णव भक्ति के प्रतिनिधि के रूप में रखकर दोनों के बीच अंतर रेखांकित किया जाता है; किंतु इस लेख का प्रतिपाद्य यह है कि दोनों की काव्य-दृष्टि को केवल निर्गुण-सगुण के द्वैत में सीमित करना उनकी सामाजिक और अनुभवपरक चेतना को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है। दोनों कवियों के यहाँ भक्ति एक वैकल्पिक ज्ञानमीमांसा का रूप ग्रहण करती है, जिसमें शास्त्रीय अधिकार और जन्माधारित सामाजिक प्रतिष्ठा की अपेक्षा अनुभव, आत्मबोध, नैतिक आचरण और मनुष्य की आंतरिक गरिमा को प्राथमिकता प्राप्त होती है।
कबीर की वाणी में जाति, धार्मिक आडंबर, कर्मकांड और पांडित्य पर तीखा व्यंग्य है। कनकदास भी सामाजिक पदानुक्रम को प्रश्नांकित करते हैं, किंतु उनका प्रतिरोध अनेक बार कथा, रूपक और दार्शनिक प्रश्नों के माध्यम से सामने आता है। रामधान्यचरिते में रागी और चावल का रूपक सामाजिक प्रतिष्ठा तथा वास्तविक उपयोगिता के अंतर्विरोध को सामने लाता है, जबकि “नी माययोलगो” में देह, माया, आकाश, मंदिर, आँख, बुद्धि, चीनी, मिठास, फूल और सुगंध के माध्यम से कवि वस्तु और अनुभव, भीतर और बाहर तथा ईश्वर और जगत के संबंधों पर गहरे प्रश्न उठाते हैं। इस प्रकार दोनों कवियों के यहाँ भक्ति केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक आलोचना, आत्मानुभूति और मानवीय समता की काव्यात्मक प्रक्रिया है।
बीज शब्द
कबीर, कनकदास, भक्ति, अनुभव, निर्गुण, सगुण, जाति, सामाजिक प्रतिरोध, मानवीय गरिमा, लोकभाषा, हरिदास परंपरा।
प्रस्तावना
भारतीय भक्ति-काव्य की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसकी बहुध्रुवीयता है। यहाँ एक ओर ईश्वर के प्रति गहन प्रेम, समर्पण और आत्मनिवेदन है, तो दूसरी ओर सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक संस्थाओं और स्थापित ज्ञान-सत्ताओं के प्रति असहमति भी है। भक्ति इसलिए केवल धार्मिक अनुभव की अभिव्यक्ति नहीं है; कई बार वह अपने समय की सामाजिक संरचनाओं के भीतर एक वैकल्पिक मनुष्य-दृष्टि का निर्माण करती है। कबीर और कनकदास इसी संदर्भ में विशेष महत्त्व रखते हैं। कबीर पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तर भारतीय संत-कवि हैं। उनकी वाणी साखी, सबद, रमैनी और उलटबाँसी जैसी विविध लोकाभिव्यक्तियों में संरक्षित हुई। उनके काव्य की मौखिक परंपरा, पाठ-भेद और प्रामाणिकता की समस्या स्वयं कबीर-अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण विषय रही है। Charlotte Vaudeville ने कबीर की वाणी के मौखिक संचरण और उसके विभिन्न पाठ-रूपों की समस्या पर विस्तार से विचार किया है।¹ लिंडा हेस और सुखदेव सिंह भी कबीर को मूलतः एक अत्यंत प्रभावशाली मौखिक कवि के रूप में देखते हैं और इसी आधार पर बीजक की संरचना तथा उसकी काव्य-भाषा का विश्लेषण करते हैं।²
कनकदास का रचनात्मक संसार कर्नाटक की हरिदास परंपरा से संबद्ध है। वे वैष्णव भक्ति के कवि हैं और उनके आराध्य कागिनेले आदिकेशव हैं। उनकी रचनाओं में भक्ति के साथ-साथ दार्शनिक चिंतन, सामाजिक अनुभव, लोकजीवन और रूपकात्मक कथानक का विशिष्ट संयोजन मिलता है। Basrur Subba Rao ने कनकदास की भक्ति-कविताओं, हरिभक्तिसार, रामधान्यचरिते, पहेलियों और लोकगीतों के अंग्रेज़ी trans-creation के साथ विस्तृत परिचय और टिप्पणियाँ दी हैं।³
दोनों कवियों को एक साथ पढ़ते हुए सबसे पहले उनकी धार्मिक भिन्नता सामने आती है। कबीर का राम निर्गुण और निराकार है; कनकदास का आदिकेशव वैष्णव सगुण भक्ति का केंद्र है। लेकिन यह भिन्नता उनके बीच संवाद की संभावना को समाप्त नहीं करती। इसके विपरीत, यह प्रश्न अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि अलग-अलग धार्मिक रूपों में स्थित होकर भी दोनों कवि मनुष्य, ईश्वर, अनुभव और समाज को किस प्रकार देखते हैं। इस लेख का केंद्रीय तर्क यही है कि कबीर और कनकदास के काव्य में भक्ति एक अनुभवपरक और नैतिक ज्ञान-दृष्टि है, जो मनुष्य की गरिमा को जन्म, जाति और बाहरी धार्मिक पहचान से ऊपर स्थापित करती है।
भक्ति और अनुभव : ज्ञान की वैकल्पिक भूमि
कबीर के काव्य की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वे ज्ञान को जीवन से अलग नहीं होने देते। उनके लिए केवल शास्त्र पढ़ लेना ज्ञान नहीं है। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह मनुष्य को रूपांतरित करने का सामर्थ्य रखता हो। इसी कारण उनकी वाणी में पांडित्य और आत्मानुभव के बीच का तनाव बार-बार सामने आता है।
उनकी प्रसिद्ध साखी है—
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥”
यहाँ “जाति” बाहरी आवरण है और “ज्ञान” मनुष्य की वास्तविक क्षमता। तलवार और म्यान का रूपक इस बात को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने रखता है कि किसी वस्तु का मूल्य उसके बाहरी आवरण से नहीं, उसकी वास्तविक शक्ति से निर्धारित होना चाहिए। मनुष्य के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। कबीर के लिए अनुभव ज्ञान का स्रोत है। उनकी कविता उस ज्ञान पर विश्वास नहीं करती जो केवल परंपरा से मिला हो और जिसे स्वयं जिया न गया हो। इसी कारण उनकी भाषा लगातार श्रोता को अपने अनुभव की ओर लौटाती है। लिंडा हेस ने कबीर की काव्य-भाषा की प्रत्यक्षता और आघातकारी शक्ति को उनकी विशिष्ट “rough rhetoric” से जोड़ा है।⁴ उनके अनुसार कबीर की भाषा केवल सूचना नहीं देती; वह श्रोता को अपनी स्थापित धारणाओं के साथ टकराने के लिए विवश करती है। बीजक के परिचय में यह विश्लेषण pp. 3–38 में लिखा गया है।⁵
कनकदास की कविता भी अनुभव को ज्ञान की केंद्रीय भूमि बनाती है, यद्यपि उनकी अभिव्यक्ति का ढंग अलग है। वे अनेक बार प्रश्न पूछते हैं और प्रश्न को अंतिम उत्तर की अपेक्षा अधिक महत्त्व देते हैं। “नी माययोलगो” इसका अत्यंत सुंदर उदाहरण है। इस कविता का के. नरसिम्हा मूर्ती के द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद 1988 में कर्नाटक साहित्य अकादमी के लिए तैयार किया गया था और अनिकेतना में प्रकाशित हुआ। प्रस्तुत लेख में नीचे दिया गया हिंदी पाठ उसी अंग्रेज़ी अनुवाद का हिंदी भावानुवाद है।⁶
हे हरि! क्या तुम माया के भीतर हो,
या माया तुम्हारे भीतर है?
क्या तुम देह के भीतर हो,
या यह देह ही तुम्हारे भीतर है?
क्या आकाश घर के भीतर है,
या घर उस आकाश के भीतर?
या आकाश और घर—दोनों देखने वाली आँख के भीतर हैं?
क्या आँख मन के भीतर है,
या मन आँख के भीतर?
या आँख और मन—दोनों तुम्हारे भीतर हैं?
क्या मिठास चीनी के भीतर है,
या चीनी मिठास के भीतर?
या चीनी और मिठास—दोनों जीभ के भीतर हैं?
क्या जीभ मन के भीतर है,
या मन जीभ के भीतर?
या जीभ और मन—दोनों तुम्हारे भीतर हैं?
क्या सुगंध फूल के भीतर है,
या फूल सुगंध के भीतर?
या फूल और सुगंध—दोनों नासिका के भीतर हैं?
मैं कह नहीं सकता,
हे कागिनेले के आदिकेशव!
हे अद्वितीय प्रभु,
क्या ये सभी वस्तुएँ अंततः केवल तुम्हारे भीतर ही स्थित हैं?⁷
इस कविता में कनकदास किसी एक दार्शनिक निष्कर्ष को स्थापित नहीं करते। वे प्रश्नों की ऐसी श्रृंखला निर्मित करते हैं जिसमें भीतर और बाहर की सामान्य अवधारणाएँ लगातार उलटती रहती हैं। देह और ईश्वर, आकाश और घर, आँख और मन, चीनी और मिठास, फूल और सुगंध—इन सभी संबंधों में कवि यह दिखाता है कि अनुभव की वस्तु को अनुभव करने वाले से पूरी तरह अलग करना संभव नहीं। यहाँ भक्ति एक प्रकार की अनुभवमीमांसा में बदल जाती है। ईश्वर को केवल बाहर स्थित सत्ता के रूप में देखने के बजाय कवि यह पूछता है कि अनुभव की प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक संवेदना के भीतर ईश्वर की उपस्थिति को किस प्रकार समझा जाए। कबीर की भाषा में भी इसी प्रकार का अनुभवपरक आग्रह मिलता है। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति—
“मोको कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में।”
ईश्वर की बाहरी खोज को भीतर के अनुभव की ओर मोड़ देती है। कबीर के लिए ईश्वर की निकटता किसी धार्मिक स्थल की भौतिक निकटता नहीं है; वह चेतना का अनुभव है।
कनकदास और कबीर दोनों की यह विशेषता महत्त्वपूर्ण है कि वे ईश्वर को केवल सिद्धांत नहीं रहने देते; उसे अनुभव का विषय बनाते हैं।
जाति और सामाजिक असमानता : दो कवियों का प्रतिरोध
कबीर के काव्य में जाति-विरोध सबसे स्पष्ट सामाजिक हस्तक्षेपों में से एक है। वे जन्माधारित श्रेष्ठता को मानवीय श्रेष्ठता का आधार नहीं मानते। “जाति न पूछो साधु की” इसी दृष्टि का प्रतिनिधि कथन है। लेकिन कबीर की आलोचना केवल जाति तक सीमित नहीं है। वे धार्मिक कर्मकांड, बाह्य आडंबर और पांडित्य पर भी प्रश्न उठाते हैं। उनके लिए मंदिर और मस्जिद दोनों तब अर्थहीन हो सकते हैं जब मनुष्य अपने भीतर के सत्य से अपरिचित हो। धार्मिक पहचान यदि मनुष्य को मनुष्य से दूर करती है, तो वह आध्यात्मिकता का साधन नहीं रह जाती। Vaudeville ने कबीर की वाणी में उपस्थित धार्मिक और सामाजिक आलोचना को उनके ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़कर देखा है। उनकी पुस्तक में कबीर के समय, भाषा, संप्रदाय और काव्य के विस्तृत विवेचन के साथ चयनित पदों का अंग्रेज़ी अनुवाद भी है।⁸
कनकदास का जाति-विमर्श दूसरी पद्धति से सामने आता है। उनके यहाँ यह प्रश्न केवल सामाजिक अधिकार का नहीं, बल्कि आत्मा के स्वरूप का हो जाता है। वे पूछते हैं—यदि आत्मा ईश्वर से संबंधित है तो उसकी जाति क्या होगी? यदि जीव की अंतिम पहचान शरीर और जन्म से परे है तो जन्माधारित श्रेष्ठता का दावा किस आधार पर टिक सकता है? यहीं कनकदास का सामाजिक प्रतिरोध दार्शनिक बन जाता है। उनके यहाँ जाति-विरोध का अर्थ केवल “निम्न जाति को भी सम्मान दो” नहीं है। इससे अधिक गहरा प्रश्न है—जाति को मनुष्य की मूल पहचान मानने का अधिकार समाज को मिला कहाँ से?
यह प्रश्न कबीर की “ज्ञान” संबंधी कसौटी से संवाद करता है। कबीर बाहरी जाति के स्थान पर आंतरिक ज्ञान को रखते हैं; कनकदास मनुष्य की आत्मिक सत्ता को ही जातिगत वर्गीकरण से बाहर ले जाते हैं। इस दृष्टि से दोनों कवि आधुनिक अर्थ में राजनीतिक घोषणापत्र नहीं लिख रहे, लेकिन वे अपने समय की सामाजिक सत्ता के नैतिक आधार पर गंभीर प्रश्न खड़ा करते हैं।
रामधान्यचरिते : अन्न के रूपक में सामाजिक आलोचना
कनकदास की सामाजिक दृष्टि का सबसे सशक्त उदाहरण रामधान्यचरिते है। यहाँ रागी और चावल के बीच संघर्ष को केवल कृषि या खाद्य पदार्थों की कथा मानना इसके वास्तविक अर्थ को सीमित कर देना होगा। रागी दक्षिण भारतीय श्रमजीवी जीवन से निकटता से जुड़ा अन्न है, जबकि चावल को सामाजिक प्रतिष्ठा का अधिक मूल्य प्राप्त था। कनकदास इस सामाजिक अंतर को कथा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। अन्न मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगते हैं और उनका संघर्ष सामाजिक पदानुक्रम का रूपक बन जाता है।
सुब्बा राव ने राम ध्यान चरित्र को कनकदास की व्यापक काव्य-दृष्टि के संदर्भ में रखा है और उसकी रूपकात्मकता तथा सामाजिक अर्थ की ओर संकेत किया है।⁹ उनकी 2001 की पुस्तक में इस रचना का अंग्रेज़ी trans-creation तथा उससे संबंधित टिप्पणियाँ सम्मिलित हैं।¹⁰ इस रचना का महत्त्व इस बात में है कि कनकदास सीधे यह नहीं कहते कि “समाज की प्रतिष्ठा गलत है”; वे ऐसी कथा रचते हैं जिसमें पाठक स्वयं प्रतिष्ठा और उपयोगिता के बीच का अंतर देखने लगता है।
यहीं कनकदास की काव्य-रणनीति कबीर से अलग दिखाई देती है। कबीर का व्यंग्य तत्काल चोट करता है। वे सीधे कहते हैं, उलटते हैं, प्रश्न करते हैं और चुनौती देते हैं। कनकदास रूपक को धीरे-धीरे खुलने देते हैं। उनके यहाँ प्रतिरोध कथा के भीतर छिपा हुआ है। फिर भी दोनों का उद्देश्य समान है—सामाजिक मूल्यांकन की प्रचलित कसौटियों को अस्थिर करना।
निर्गुण और सगुण के पार : अनुभव की साझा भूमि
कबीर और कनकदास को पढ़ते हुए सबसे अधिक सावधानी इस बात में चाहिए कि दोनों को केवल “निर्गुण” और “सगुण” के दो पृथक खेमों में रखकर उनके बीच संवाद की संभावना समाप्त न कर दी जाए। कबीर के निर्गुण राम निराकार होने पर भी उनके लिए अत्यंत निकट हैं। वह कोई दूर स्थित दार्शनिक सत्ता नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना में अनुभव किया जाने वाला सत्य है। कनकदास का आदिकेशव सगुण वैष्णव आराध्य है, किंतु “नी माययोलगो” में वही ईश्वर देह, मन, आँख, जीभ, फूल, सुगंध और आकाश के साथ इतनी गहरी अंतर्संबद्धता में उपस्थित है कि उसे केवल बाहरी मूर्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता।
कबीर कहते हैं—
“मोको कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में।”
कनकदास पूछते हैं—
क्या आकाश घर के भीतर है या घर आकाश के भीतर?
क्या आँख मन के भीतर है या मन आँख के भीतर?
क्या मिठास चीनी के भीतर है या चीनी मिठास के भीतर?
दोनों की भाषा अलग है, लेकिन दोनों अनुभव की उस सीमा तक पहुँचते हैं जहाँ “अंदर” और “बाहर” की निश्चितता टूटने लगती है। कबीर अधिकतर निषेध और उलटबाँसी से काम लेते हैं; कनकदास संबंध और प्रश्न की संरचना से। कबीर कहते हैं—यह नहीं, वह नहीं; कनकदास पूछते हैं—यह इसके भीतर है या वह इसके भीतर? यह कहना उचित ही होगा कि सगुण और निर्गुण का अंतर वास्तविक होते हुए भी उनके बीच एक गहरी अनुभवपरक समानता मौजूद है।
लोकभाषा और ज्ञान का लोकतंत्रीकरण
कबीर और कनकदास की तुलना का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी लोकाभिमुख भाषा है। दोनों कवि दार्शनिक और आध्यात्मिक प्रश्नों को ऐसी वस्तुओं और प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करते हैं जिन्हें सामान्य मनुष्य अपने जीवन में प्रतिदिन देखता है। कबीर के यहाँ करघा, धागा, घर, बाजार, देह, पानी, कुम्हार, मिट्टी और श्रम के अनेक रूपक मिलते हैं। कनकदास के यहाँ अन्न, चीनी, मिठास, फूल, सुगंध, जीभ, आँख और घर जैसे बिंब दार्शनिक प्रश्नों को जीवन के निकट ले आते हैं। यहाँ लोकभाषा केवल साहित्यिक चुनाव नहीं है। यह ज्ञान-सत्ता के लोकतंत्रीकरण का माध्यम है।
जब दार्शनिक अनुभव संस्कृत या किसी विशिष्ट शास्त्रीय भाषा की सीमाओं से निकलकर लोकभाषा में आता है, तो वह किसी विशेष वर्ग की संपत्ति नहीं रह जाता। भक्त कवि श्रोता को यह अधिकार देता है कि वह स्वयं अनुभव करे और स्वयं प्रश्न पूछे। हेस और सिंह ने द बीजक ऑफ कबीर के माध्यम से कबीर की मौखिक काव्य-परंपरा, उसकी प्रत्यक्षता और उसकी संवादधर्मिता को रेखांकित किया है।¹¹ पुस्तक विवरण के अनुसार बीजक में साखी, सबद और रमैनी जैसी विधाएँ हैं और अनुवाद में विशेष रूप से उन पदों को चुना गया है जो कबीर की काव्यात्मक विशेषताओं को प्रभावशाली रूप में सामने लाते हैं।¹²कनकदास के काव्य में भी लोकजीवन और दार्शनिक प्रश्न का यह संबंध दिखाई देता है। इस अर्थ में दोनों कवियों का साहित्य ज्ञान को “बताता” कम है और जगाता अधिक है।
देह, श्रम और आत्मानुभूति
कबीर और कनकदास दोनों के काव्य में देह की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है। उनकी आध्यात्मिकता देह को केवल त्याज्य या अपवित्र वस्तु मानकर नहीं चलती। देह अनुभव का माध्यम है। कबीर के बुनकर-जीवन से जुड़े रूपकों में श्रम और आध्यात्मिकता का संबंध दिखाई देता है। करघे पर धागे का बुनना जीवन और चेतना के बुनने का रूपक बन जाता है। संसार से अलग होकर सत्य खोजने के बजाय संसार के भीतर रहते हुए सत्य को पहचानना उनके काव्य का महत्त्वपूर्ण आग्रह है। कनकदास के यहाँ भी देह अनुभव की भूमि है। “नी माययोलगो” में देह और ईश्वर के संबंध पर प्रश्न स्वयं यह दिखाता है कि आध्यात्मिकता शरीर-विरोधी दृष्टि में सीमित नहीं है। इसी प्रकार रामधान्यचरिते में भोजन और अन्न के माध्यम से सामाजिक और आध्यात्मिक प्रश्नों को जोड़ना जीवन के भौतिक पक्ष को आध्यात्मिक विमर्श में प्रतिष्ठित करता है। दोनों ही संतों की भक्ति संसार से पलायन की प्रक्रिया नहीं है अपितु उनकी भक्ति संसार को नए ढंग से देखने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
प्रतिरोध की काव्य-भाषा : कबीर का व्यंग्य और कनकदास का रूपक
कबीर की काव्य-भाषा का एक प्रमुख गुण उसका तीखापन है। वह श्रोता को झकझोरते हैं , उस पर अपनी वाणी से आघात आघात करते हैं। वे पाठक को सहज सांत्वना नहीं देते। उनकी भाषा अनेक बार चौंकाती है, असुविधा उत्पन्न करती है और स्थापित धार्मिक-सामाजिक धारणाओं को तोड़ती है। हेस ने कबीर की इसी विशेषता को उनकी “rough rhetoric” कहा है।¹³ यह खुरदुरापन उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी काव्य-रणनीति है। यदि सामाजिक भ्रम गहरा है तो उसे तोड़ने के लिए भाषा को भी तीखा होना पड़ता है।
कनकदास का प्रतिरोध अधिकतर रूपकात्मक है। रामधान्यचरिते में रागी और चावल के माध्यम से सामाजिक श्रेष्ठता का प्रश्न उठाना इसका उदाहरण है। “नी माययोलगो” में प्रश्नों की श्रृंखला के माध्यम से दार्शनिक द्वैतों को अस्थिर करना इसी रणनीति का दूसरा रूप है। कबीर का व्यंग्य हथौड़े की तरह है; कनकदास का रूपक धीरे-धीरे भीतर खुलने वाली गाँठ की तरह। दोनों की विधियाँ अलग हैं, लेकिन दोनों मानवीय विवेक को सक्रिय करती हैं।
निष्कर्ष : भक्ति से मानवीय गरिमा तक
कबीर और कनकदास का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि भारतीय भक्ति-काव्य को केवल धार्मिक भक्ति की भावुक अभिव्यक्ति मानना उसके बौद्धिक और सामाजिक पक्ष को कम करके देखना होगा। दोनों कवियों के यहाँ भक्ति जीवन, अनुभव, ज्ञान और सामाजिक नैतिकता के प्रश्नों से गहराई से जुड़ी है। कबीर के यहाँ मनुष्य की पहचान जाति से नहीं, ज्ञान और साधना से निर्धारित होती है। वे धार्मिक आडंबरों को चुनौती देते हुए ईश्वर को बाहरी संस्थाओं से मुक्त करके अनुभव के क्षेत्र में लाते हैं। उनकी भाषा में व्यंग्य और उलटबाँसी स्थापित ज्ञान-सत्ता के विरुद्ध वैकल्पिक चेतना का निर्माण करती है।
कनकदास दूसरी सांस्कृतिक और धार्मिक भूमि पर खड़े होकर इसी प्रकार का मानवीय प्रश्न उठाते हैं। उनकी वैष्णव भक्ति सामाजिक पदानुक्रम को स्वीकार करने के बजाय उसके नैतिक आधार को प्रश्नांकित करती है। रामधान्यचरिते में अन्न का रूपक सामाजिक प्रतिष्ठा और वास्तविक उपयोगिता के अंतर्विरोध को सामने लाता है। “नी माययोलगो” में वे ईश्वर, माया, देह, मन, इंद्रिय और जगत के संबंधों को प्रश्नों में बदल देते हैं।
विशेष रूप से “नी माययोलगो” का अनुभव यह बताता है कि कनकदास की भक्ति केवल ईश्वर की स्तुति नहीं है। वह अनुभव की संरचना पर विचार करने वाली कविता है। “क्या मिठास चीनी के भीतर है या चीनी मिठास के भीतर?” जैसा प्रश्न वस्तु और अनुभव के बीच संबंध को एक सामान्य उदाहरण से दार्शनिक स्तर तक उठा देता है। इसी तरह फूल और सुगंध, आँख और मन, देह और माया तथा आकाश और घर के संबंधों के माध्यम से कवि यह दिखाता है कि अस्तित्व को सरल द्वैतों में बाँटना संभव नहीं।
कबीर और कनकदास में इसलिए सबसे महत्त्वपूर्ण समानता उनके धार्मिक मतों की समानता नहीं, बल्कि उनकी मानवीय दृष्टि की सक्रियता है। कबीर जाति के स्थान पर ज्ञान को रखते हैं; कनकदास आत्मा की जाति पूछते हैं। कबीर ईश्वर को भीतर खोजते हैं; कनकदास भीतर और बाहर के संबंध को ही प्रश्न बना देते हैं। कबीर की भाषा स्थापित धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार करती है; कनकदास रूपक और प्रश्न के माध्यम से उसी प्रकार के मूल्य-संदेह को उत्पन्न करते हैं। इस दृष्टि से दोनों कवियों की भक्ति को मानवीय गरिमा की खोज के रूप में पढ़ना अधिक सार्थक है।
उनकी भक्ति मनुष्य को किसी नए धार्मिक खाँचे में बंद नहीं करती; वह उसे उसकी निर्मित पहचानों से पीछे हटकर स्वयं को देखने का अवसर देती है। जन्म, जाति, बाहरी धार्मिक पहचान और सामाजिक प्रतिष्ठा से परे मनुष्य की जो आंतरिक सत्ता है, वही उनके काव्य में वास्तविक मूल्य का आधार बनती है। और इसीलिए कबीर और कनकदास को साथ पढ़ने का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह नहीं कि दोनों एक जैसे हैं, बल्कि यह है कि भिन्न धार्मिक- आध्यात्मिक सम्प्रदायों से निकलकर भी दोनों की कविता मनुष्य को उसके भीतर के सत्य और उसकी गरिमा की ओर लौटाती है। भक्ति यहाँ साध्य से अधिक एक दृष्टि है—ऐसी दृष्टि जो मनुष्य को दूसरे मनुष्य को जन्म या जाति से नहीं, बल्कि उसकी मनुष्यता से पहचानना सिखाती है।
फुटनोट्स
- Charlotte Vaudeville, A Weaver Named Kabir: Selected Verses with a Detailed Biographical and Historical Introduction (Delhi: Oxford University Press, 1993), विशेषतः “Kabir’s Language and Languages,” pp. 109–130, तथा “Selected Verses,” pp. 131–147. पुस्तक के 1993 संस्करण में 399 पृष्ठ हैं और bibliography pp. 358–368 में दी गई है।
- Linda Hess and Shukdev Singh, The Bijak of Kabir (New York: Oxford University Press, 2002), Introduction, pp. 3–38. OUP के आधिकारिक विवरण के अनुसार Introduction में कबीर की जीवन-परंपरा, “rough rhetoric” और “The Untellable Story” पर चर्चा है।
- Basrur Subba Rao, Kanaka Dasa: Philosopher-Poet-Hari Dasa: A Trans-Creation of His Bhakti Poems, Hari Bhakti Sara, Rama Dhanya Charitre, Riddles and Folk Songs with Detailed Introductions and Notes (Madras: East West Books, 2001), 403 pp.
- Linda Hess and Shukdev Singh, The Bijak of Kabir, pp. 3–38. OUP का पुस्तक-विवरण कबीर की शैली को vivid, direct और hard-hitting बताता है तथा “rough rhetoric” को Introduction के प्रमुख भाग के रूप में दर्ज करता है।
- वही, pp. 3–38. The Bijak के 2002 संस्करण में translations का खंड pp. 39 से आरंभ होता है।
- K. Narasimha Murthy, English translation of Kanakadasa’s “Nee Mayeyolago,” prepared for Karnataka Sahitya Academy, Bangalore, 1988; published in Aniketana, a quarterly journal of Kannada literature for English readers. उपलब्ध अंग्रेज़ी पाठ में अनुवादक, संस्था और वर्ष स्पष्ट रूप से दिए गए हैं।
- उपर्युक्त अंग्रेज़ी अनुवाद का हिंदी भावानुवाद। यह हिंदी पाठ मूल कन्नड़ से स्वतंत्र नया अनुवाद होने का दावा नहीं करता, बल्कि K. Narasimha Murthy के 1988 के अंग्रेज़ी translation का भावानुवाद है। अंग्रेज़ी पाठ में देह/माया, space/house, eye/mind, sweetness/sugar और fragrance/flower की पूरी क्रमिक संरचना उपलब्ध है।
- Charlotte Vaudeville, A Weaver Named Kabir, pp. 39–108 में कबीर की जीवनी, ऐतिहासिक संदर्भ और कबीर-कालीन परिस्थितियों का विस्तृत विवेचन है; पुस्तक के चयनित पदों और भाषा-संबंधी अध्याय में कबीर की वाणी के पाठ-परंपरा और भाषिक स्वरूप पर भी विचार किया गया है।
- Basrur Subba Rao, Kanaka Dasa, Rama Dhanya Charitre तथा उससे संबंधित introduction और notes. पुस्तक की विषय-सूची में Rama Dhanya Charitre तथा उससे जुड़े कनकदास के सामाजिक-दार्शनिक संदर्भों का समावेश है।
- वही, Kanaka Dasa, pp. 260–317 में “Mystic Philosophy” खंड तथा पुस्तक में Hari Bhakti Sara, Rama Dhanya Charitre और अन्य रचनाओं के trans-creations एवं notes हैं।
- Linda Hess and Shukdev Singh, The Bijak of Kabir, Introduction, pp. 3–38. पुस्तक स्वयं कबीर को एक extraordinary oral poet के रूप में प्रस्तुत करती है।
- वही, “Translations,” pp. 39 onward. OUP के contents में translations के अंतर्गत Śabda, Ramainī और Sākhī के खंड दर्ज हैं।
- Linda Hess and Shukdev Singh, The Bijak of Kabir, Introduction, pp. 3–38.
संदर्भ-सूची
प्राथमिक/अनूदित ग्रंथ
कबीर। कबीर वचनावली। संपादक: श्यामसुंदर दास। काशी: नागरी प्रचारिणी सभा, प्रचलित संस्करण।
कबीर। कबीर ग्रंथावली। संपादक: श्यामसुंदर दास। काशी: नागरी प्रचारिणी सभा, प्रचलित संस्करण।
Hess, Linda, and Shukdev Singh. The Bijak of Kabir. New York: Oxford University Press, 2002. पुस्तक का OUP संस्करण 2002 में प्रकाशित हुआ; मूल अंग्रेज़ी संस्करण 1983 में North Point Press से प्रकाशित हुआ था।
Vaudeville, Charlotte. A Weaver Named Kabir: Selected Verses with a Detailed Biographical and Historical Introduction. Delhi: Oxford University Press, 1993.
Rao, Basrur Subba. Kanaka Dasa: Philosopher-Poet-Hari Dasa: A Trans-Creation of His Bhakti Poems, Hari Bhakti Sara, Rama Dhanya Charitre, Riddles and Folk Songs with Detailed Introductions and Notes. Madras: East West Books, 2001.
आलोचनात्मक संदर्भ ग्रंथ
Hess, Linda. “Kabir’s Language and Languages.” In Charlotte Vaudeville, A Weaver Named Kabir. Delhi: Oxford University Press, 1993, pp. 109–130.
Schomer, Karine, and W. H. McLeod, eds. The Sants: Studies in a Devotional Tradition of India. Berkeley: University of California Press, 1987.
Hawley, John Stratton. Three Bhakti Voices: Mirabai, Surdas, and Kabir in Their Times. New York: Oxford University Press, 2005.
Hawley, John Stratton. A Storm of Songs: India and the Idea of the Bhakti Movement. Cambridge, MA: Harvard University Press, 2015.
Jackson, William J. Songs of Three Great South Indian Saints. New York: Oxford University Press, 2002.
विशेष अनुवाद-स्रोत
Murthy, K. Narasimha. “Nee Mayeyolago.” English translation of Kanakadasa, prepared for Karnataka Sahitya Academy, Bangalore, 1988; published in Aniketana, a quarterly journal of Kannada literature for English readers. इस लेख में दिए गए हिंदी भावानुवाद का आधार यही अंग्रेज़ी translation है।
डॉ. मेधा,
असिस्टेंट प्रोफेसर ,
हिंदी विभाग, सत्यवती कॉलेज ( सांध्य ) ,
दिल्ली विश्वविद्यालय .
