1.तुम बताओ…
मौन के इन मोतियों में, गूँजते हैं साज़ कितने?
इन झुकी सी पलकों के, अक्स में परवाज़ कितने?
तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!
क्या किसी के अक्स ने, मन के मुकुर को है निहारा?
क्या किसी को भोर के, तारों ने छुपकर है पुकारा?
क्या किसी की आहटों पर, धड़कनें नव-छंद रचतीं?
क्या किसी के वास्ते, आँखें तुम्हारी रात जगतीं?
सर्द सी इन धड़कनों में, तप रहे हैं राज़ कितने,
तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!
क्या वह मेरे अश्क सा है, या कोई मुसकान सा है?
मेरी ही धड़कन का हिस्सा, या कोई अनजान सा है?
राजकुँवर वो कौन है, जो नींद की चोरी करे है,
किसके ख़ातिर ये कुँआरी, आँख रतजग से भरी है?
उस छलिये की प्रीत में, तुम भूल बैठी काज कितने,
तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!
क्या तुम्हारी चूड़ियों की, खनक में वो नाम सा है?
क्या तुम्हारे होंठ पर, वो अनकहे पयाम सा है?
मुस्कुरा कर आज अपने, होंठों की गिरहें तो खोलो,
मौन का श्रृंगार तज कर, आज कुछ तो सच तुम बोलो!
देखती हो तुम मुझी में, खुद के ही अंदाज़ कितने,
तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!
मैं यथार्थ की ज़मीं पर, नेह का बादल बना हूँ,
तुम जो कह दो तो मैं समझूँ, मैं ही वो राजकुँवर हूँ!
तुम मेरी इन धड़कनों की, आज बस आवाज़ सुन लो,
कल्पना का मोह तजकर, सत्य का आकाश चुन लो।
टूट कर फिर जुड़ रहे हैं, आज दिल के साज़ कितने,
तुम बताओ हैं तुम्हारी, ज़िंदगी में स्वप्न कितने!
2.ग़ज़ल
ये जो चेहरों पे कई लोग नज़र आते हैं
इनमें कुछ लोग तो लाचार नज़र आते हैं
शहर की भीड़ में चुपचाप खड़े रहते हैं
घर से निकले हुए बेदार नज़र आते हैं
दूर तक रौशनी का नाम नहीं मिलता अब
मर्ग-ए-उम्मीद के आसार नज़र आते हैं
लोग रिश्तों को भी बाज़ार में ले आए हैं
अब सभी दिल के खरीदार नज़र आते हैं
जिनके लफ़्ज़ों में कभी प्यार की खुशबू थी बहुत
आज वो ज़हर के व्यापार नज़र आते हैं
दर्द लिखता है तो हर शेर में जल उठता है
शिवम् (वर्ना) कुछ लोग तो गद्दार नज़र आते हैं
3.तुम्हारे शहर में क्या??
तुम्हारे शहर में क्या अब भी चाँदनी रातें सजती हैं?
या बस बल्ब की रौशनी में उजाले गढ़े जाते हैं?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी कोई छत पर सोता है?
या हर कोई ए.सी. की ठंडी कैद में दम तोड़ता है?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी माँ के हाथ की रोटी मिलती है?
या सिर्फ़ डिब्बाबंद खाने से भूख मिटाई जाती है?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी भाई की कलाई पर राखी बंधती है?
या बस ऑनलाइन गिफ़्ट्स से रिवाज़ निभाए जाते हैं?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी दादा-दादी कहानियाँ सुनाते हैं?
या बस स्क्रीन के पर्दे ही बच्चों को सुलाते हैं?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी सुबहें संगीतमयी होती हैं?
या अलार्म की झंकार से ही ज़िंदगी शुरू होती है?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी नल से ठंडा पानी पीते हैं लोग?
या हर घूँट में प्लास्टिक की बोतल का स्वाद घुल चुका है?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी रिश्ते ख़तों में साँस लेते हैं?
या बस “seen” का जवाब ही इश्क़ की ताबीर होती है?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी लड़कियाँ बेख़ौफ़ चलती हैं?
या हर मोड़ पर डर की सलवटें बढ़ती जाती हैं?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी इश्क़ बेनाम होता है?
या हर मोहब्बत का टैग अब स्टेटस में दिखता है?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी अलसाई दोपहरों में
खटिया डालकर नीम तले सुस्ताते हैं लोग?
या बस केबिन में सिर झुकाकर ब्रेक टाइम निकालते हैं?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी रिश्ते जिए जाते हैं?
या हर नाता ज़रूरतों के तकाज़े में गढ़ा जाता है?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी घर लौटने की बेचैनी होती है?
या हर रास्ता अब अजनबियों से भरा लगता है?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी गाँव की मिट्टी महकती है?
या कंक्रीट की दीवारों में साँसें घुटने लगी हैं?
तुम्हारे शहर में क्या अब भी कोई अपने शहर को याद करता है?
या हर कोई सिर्फ़ अपनी ही तन्हाई से मोहब्बत करता है?
4.ग़ज़ल
जहाँ तक दर्द की परछाइयाँ जाती नहीं,
बात उस ठहरी हुई हर दास्तां तक ले चलो।
जो लहू खेतों में बहकर मिट गया बेअहतराम,
अब उसे रोटी की महकी मेज़बां तक ले चलो।
बस्तियाँ जलती रहीं, खामोश था हर एक घर,
इस सियासत की तपिश को अब अमन तक ले चलो।
फिर वही मज़हब के नामों पर लहू बहने लगा,
अब सलीबों से हटा कर कर्बला तक ले चलो।
जिनकी आँखों में चमक थी इक नई उम्मीद की,
उन सवालों को किसी दर के चलन तक ले चलो।
हक़ की बातें सिर्फ़ काग़ज़ पर सजी रह जाएँगी,
अब इरादों को दिलों की आंच तक ले चलो।
शिवम् अवस्थी हिंदी साहित्य के विद्यार्थी, शोध-सहयोगी एवं सृजनशील कवि हैं। हिंदी, संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा में विशेष रुचि रखने वाले शिवम् ने हिंदी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्रथम श्रेणी से पूर्ण की है और वर्तमान में IGNOU से हिंदू स्टडीज़ में स्नातकोत्तर अध्ययनरत हैं।

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