फ़िलिस्तीन: एक नया कर्बला-लेखिका नासिरा शर्मा
प्रकाशक: लोकभारती प्रकाशन
पुस्तक अंश
दोहरी सियासत का शिकार फ़िलिस्तीन

7 अक्टूबर, 2023 में अचानक फिलिस्तीन की हमास पार्टी ने 500 रॉकेट इजरायल पर फेंके। इस हमले से विश्व के लोग चौंके ही नहीं बल्कि कुछ को सदमा लगा कि शेर की माँद में हाथ डालने की हिमाकत हमास ने किसके उकसाने पर की, खासकर तब जब न उनके पास लम्बी फ़ौजें हैं और न खतरनाक हथियार। और जब इजरायल में घायल लोगों की संख्या और हालत देखी ख़ासकर बच्चों की तो सभी को महसूस हुआ कि एकाएक हमास ने ऐसा क़दम क्यों उठाया और सीधे ही उसकी आतंकवादी गतिविधि पर रोक लगाने के लिए आवाजें उठने लगीं जिसमें भारत भी शामिल था। परन्तु इनके बीच ऐसे लोग भी थे जो ताज्जुब कर रहे थे कि आख़िर हमास ने इतनी बडी ताक़त जो इंटेलीजेंसी में मशहूर है, उसे हमास द्वारा उठाए गए कदम की भनक तक न हुई? कहीं यह ख़ुद पर हमला करवाने का इजरायल का षडयंत्र तो नहीं है वरना हमास इस तरह के ख़तरे उठाकर अकारण ही एक ऐसे देश को चुनौती क्यों देगा जो सैन्य संगठन में महाबलि है। कुछ को शंका हुई कि इसके पीछे जरूर ईरान, लेबनान के हिज़्बउल्लाही का हाथ है। अभी यह अटकलें लग ही रही थीं कि अपने बचाव में इजरायल ने हमास को जवाब दिया और क़हर फ़िलिस्तीन की आम जनता पर टूटा,जो एक बार नहीं, लगातार चल रहा है।
अभी तक समाचारों में रूस और यूक्रेन छाया हुआ था। अब उसके स्थान पर फ़िलिस्तीन-इज़रायल की चर्चा शुरू हो गई। दिल दहलाने वाले वीडियो से विश्व के संवेदनशील बुद्धिजीवी एवं सोशल एक्टिविस्ट ने अपने-अपने विचार देने शुरू कर दिए। जिसके ऐतिहासिक सन्दर्भ थे इसलिए इजरायल की हिमायत में उठी आवाजें थमने लगीं और इस लम्बे चले आ रहे युद्ध के ऐतिहासिक व वैश्विक कारणों की जिज्ञासा बढ़ गई। ख़ासकर महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व के कथन पढ़कर।
विलियम स्कॉटरिट्टर (William Scottritter), जो अमेरिकन लेखक और अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध विशेषज्ञ हैं, साथ ही पूर्व संयुक्त राष्ट्र विशेष आयोग के हथियार निष्क्रिय रहे हैं एवं पूर्व संयुक्त राज्य मरीन कॉप्स के खुफिया अधिकारी रह चुके हैं, का कहना है कि इजरायल को यह हक नहीं है कि जानबूझकर सिविलियंस पर निशाना बाँधे क्योंकि इंटरनेशनल लॉ साफ-साफ यह कहता है लेकिन इजरायल अपनी मनमर्जी कर रहा है और पूरी दुनिया चुप है। फिर कटाक्ष करते हुए उन्होंने आगे कहा, “इजरायल असाधारण नेशन है जिसकी जनता भी असाधारण है कि जो नॉर्मल रूल-रेगुलेशन हैं उन लोगों पर अप्लाई नहीं होता है क्योंकि वह ख़ुदा के चुने हुए लोग हैं, वह कुछ भी कर सकते हैं। ।
दूसरी ओर, फ़िलिस्तीन में हो रहे नरसंहार के बारे में नॉरमैन फिंकेलेस्टीन हैं और इजरायल पेलेस्टाइन कॉन्फिलिक्ट और होलोकस्ट पर महत्त्वपूर्ण काम है, (Norman Finkelstein) की है जो अमेरिकन पॉलिटिकल साइंटिस्ट, एक्टिविस्ट उनका कहना है कि “इज़रायल ने हमेशा जिम्मेदारियों को नकारा है और यूएस गवर्नमेंट और ब्रिटिश गवर्नमेंट पर आप कभी विश्वास न करें।”ताज्जुब की बात यह है कि अमेरिकन ज्यूश (Jews) की संस्था ‘प्रो पैलेस्टाइन’ है। उन्होंने गाजा में युद्ध-विराम की माँग करते हुए कहा, “फ़िलिस्तीन को आजाद करो! “
इसी के साथ पूरे विश्व में एक प्रश्नावली चल पड़ी है कि आप किसके साथ हैं? यह विचित्र-सी बात है कि जब शान्ति की माँग होनी चाहिए उस समय इस तरह के गेम खेले जा रहे हैं। बहरहाल, सैकड़ों लोग अमेरिकन राजधानी वाशिंगटन डी.सी. के स्टेट डिपार्टमेंट के सामने बैनर और फ़िलिस्तीन झंडे लेकर फ़िलिस्तीन के सपोर्ट में खड़े हुए। इसी बीच कतर के शेख तमीम बिन हमद-अल-थान (Tamim Bin Hamad Al-Than) ने फ़िलिस्तीन में होती तबाही को देखकर कहा, “अब बहुत हो चुका, अब बस! क्योंकि इस जंग ने सारी हदें तोड़ते हुए खून बहाया है।”
इन सारी हमदर्दी का जवाब डिफेंस मिनिस्टर ने यह कहकर दिया कि यूएस झिझकेगा नहीं गाजा युद्ध अगर इलाक़ाई लड़ाई में बदलती है ।हॉवर्ड की फ़िलिस्तीनी अकादमी ने कहा, वह हमें गाड़ना चाहते हैं मगर वह नहीं जानते कि हम बीज हैं जो ख़बरें हमें वीडियो द्वारा फ़िलिस्तीन की दिखाई जा रही हैं उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता है क्योंकि यह सच्चाई को सनद बनाकर पेश करता है। शिफा व दूसरे अस्पतालों पर गिरे बम से जो बचे ज़ख़्मी लोग आ रहे थे उनमें से ज्यादा तादाद उन बच्चों की थी जो दूध पीते थे। उनसे बड़े बच्चों का हाल अजीब था। वह सहमे और काँप रहे थे। कुछ चकराए हुए थे। कुछ स्कूल बस में थे। जो भी देखा उससे महसूस हुआ कि कई दशकों से चल रही लड़ाई ने उन्हें यह सन्देश दे दिया है कि अब यही और ऐसी ही हमारी ज़िन्दगी है ।
एक वीडियो में बच्चे अपने हाथ पर नाम इस तरह लिखवा रहे हैं जैसे अंजाम जानते हैं। तभी एक लड़के ने बताया कि यदि वह जंग में मरता या मलबे में दबता है तो नाम लिखे जाने से पहचान लिया जाएगा। बात यहीं ख़त्म नहीं होती बल्कि ‘सूखी कच्ची नहर की तरह ख़ुदी जमीन पर मिट्टी से लड़के खेल रहे हैं और जौ पूछा जाता है, ‘यह कैसा खेल है?’ तो हँसते हुए जवाब देते हैं कि इसलिए मिट्टी से खेल रहे हैं कि कल यहीं दफ़न होना है। उनकी बात की सच्चाई तब पता चलती है जब इस नहरनुमा क़ब्र में एक साथ सफ़ेद चादरों में लिपटे शव पंक्तिबद्ध लिटा दिए जाते हैं। उस पर बुलडोजर से मिट्टी डाली जाती है। उनकी कमर पर लिपटे कफ़न पर भी कुछ लिखा दिखता है। यह सब देखकर किसी को भी जंग से नफ़रत हो जाएगी और उसका सबसे तीखा सवाल होगा कि आखिर मानवाधिकार कमेटी क्या अपना कर्तव्य भूल चुकी है? या फिर जो यह मांग कर रहे हैं कि युद्ध विराम हो वह यह सवाल क्यों नहीं उठाते कि आख़िर हथियार सप्लाई पर रोक क्यों नहीं लग पा रही है? अमेरिका हथियार और पानी एक साथ भेज रहा है।
जो कुछ आज फ़िलिस्तीन में हो रहा है, उसे सीरिया, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में हम देख चुके हैं। यह बारूदी खेल इनसानों के साथ पर्यावरण और महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों को जिस तरह ध्वंस कर रहा है उसका भविष्य में क्या परिणाम देखने को मिलता है, यह तो हमारी आनेवाली पीढ़ियाँ झेलेंगी। अभी जो सबसे खतरनाक काम हो रहा है वह आतंकवाद को ख़त्म करने के नाम पर आतंकवाद है, जो बच्चे इस समय फ़िलिस्तीन में बच गए हैं वह उनकी यादों का हिस्सा बन चुका है और बड़े होने पर वह अपने साथ हुए जुल्म का जवाब किस तरह देंगे? हमास को खत्म करने के नाम पर ग़ाज़ा के आम आदमी पर आफत टूट रही है और यह बात खुद एक आम फ़िलिस्तीनी मलबे के ढेर पर खड़ा होकर कह रहा है, “यह हमारे साथ इज़रायल क्या कर रहा है? हम हमास नहीं हैं?” दूसरी ओर, एक दस-ग्यारह वर्ष की एक लड़की जिसने अपनी माँ को खोया है वह क्रोध में रोते, हुए कह रही है, “मैं तुम्हारा पैर चूमने को तैयार हूँ हमारे ऊपर बम मत गिराओ! “
यह सारे दृश्य जो हम वीडियो के जरिए देख रहे हैं यह सिनेमा नहीं, यथार्थ है और इस यथार्थ को जिसे हम नरसंहार कह सकते हैं या फिर हठ जो कि एक बेहद वहशतनाक, गैर-इनसानी कार्य है; लेकिन सभी महत्त्वपूर्ण देश जो हमदर्दी भरे सन्देश भेज रहे हैं उसकी जगह उन्हें ठोसे क़दम उठाना चाहिए मगर सब आराम से बैठे इस ख़ूनी लड़ाई को देख रहे हैं।। इज़रायली एम्बेसेडर यू.एन. गीलाड इरडान (Gilad Erdan) और उनकी टीन ने यलोस्टार लगाया जब यू.एन. सिक्योरिटी कौन्सिल की मीटिंग चल रही थी।
उनके इस अन्दाज को चेयरमैन याद बाशीम (Yad Bashem), दानी दयान (Dani Dayan) ने कंडॅम किया मगर एम्बेसेडर का कहना था ‘ज्यूश पोलैंड में पीला स्टार लगाते थे; जब नाजियों ने पोलैंड पर 1938 में क़ब्ज़ा कर लिया था फिर उन्हें जर्मनी में पहनना पड़ा था इसलिए वह पीला स्टार तब तक लगाए रहेंगे जब तक यू.एन. सिक्योरिटी कौंसिल के मेम्बर हमास के आतंकवादी गतिविधियों को कंडेम नहीं करेंगे और हमारे होस्टेजेज़ की रिहाई की माँग नहीं करेंगे।”
गीलाड इरडान को नाजियों का जुल्म तो याद आया परन्तु जिस होलोकॉस्ट से ज्यूश क़ौम गुजरी है, क्या वही सब कुछ गाजा में दोहराना चाहती है, उनके साथ जिन्होंने उन्हें पनाह दी थी? ग़ाज़ा में आम आदमी पानी, ईंधन, बिजली के न होने से परेशान है। अस्पतालों पर बम गिराने से पहले इज़रायल सेना ने एलान के साथ कहा गया, “डॉक्टर अस्पताल छोड़कर बाहर आ जाएँ।” मगर किसी डॉक्टर ने इस एलान को नहीं माना और डॉक्टर अल-देरगान (Al-Dergan) ने कहा कि “यह कैसे मुमकिन है कि हम बीच ऑपरेशन में अस्पताल शिफ्ट करें और मरीजों को छोड़ जाएँ। बम बरसता है तो बरसे हमारे सिरों पर”।
इस मुश्किल समय में जब दवा के साथ दूसरे मेडिकल एक्यूपमेंट्स खत्म हो रहे हैं और हर दो मिनट बाद कोई-न-कोई जख़्मी आ रहा है। यू.एन. के अधिकारी ने बताया कि 7 अक्टूबर से 25 अक्टूबर तक मरने वालों की जो लिस्ट है वह डेढ़ सौ पन्नों की है जिसमें से छह पन्ने इन बच्चों के नामों की है जो एक साल से कम के हैं। गाजा में रहनेवाले दरअसल एक खुली जेल में रह रहे हैं, ऐसा कहा जा रहा है। अब उनकी संख्या कितनी रह गई है उसकी भी लिस्ट या आँकड़ा मिल जाएगा। लेकिन जो लोग संयुक्त राष्ट्र के राहत कार्य में (U.N.R.W.A.) में जुटे उनमें से लगभग 70 लोगों के मरने का आँकड़ा सामने आया है। एशियन एड, रेडक्रॉस में जो काम कर रहे हैं और जो अस्पतालों में काम कर रहे हैं वह हमास से नहीं हैं मगर मानवीय स्तर पर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। जबकि हमास को वह उस तरह ढेर नहीं कर पा रह हैं।
रिचर्ड बोएड बार्रेट (Richaard Boyd Barrett) आयरिश एंटी मूवमेंट के चेयरमैन का कहना है : “इज़रायल का जो नक़्शा मैंने देखा उसमें न फ़िलिस्तीन था न ग़ाज़ा था। पहले से ही ऍथेनिकली ग़ाज़ा को साफ कर दिया जैसे वह धीरे-धीरे कर रहे हैं। कोई भी दुनिया का नेता एथेनिकली क्लींजिंग को डिफेंड नहीं कर सकता है”।
इजरायली प्रोफेसर ईलान पापे (Ilan Pappe) जो हिस्टोरियन और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी और हिब्रो यूनिवर्सिटी यरूशलम से सम्बन्धित है। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में नक़ाबा के बारे में बताया है जिसका डर ज्यूश के दिलों में रहता है कि फिर वह नये संकट का सामना न करें। प्रोफेसर ईलान पापे ने नक़ाबा का अर्थ बताते हुए कहा, “नक़ाबा ऍथैनिक क्लींजिंग है जो व्यवस्थित रूप से हो, जो फ़िलिस्तीन में करनी है (de Arabise Palestine) जिसमें उनके चले जाने के बाद जो भी उनसे सम्बन्धित अवशेष बचे उन्हें सिरे से साफ करना है जो 1948 से शुरू हुआ। नक़ाबा अभी चल रहा है क्योंकि 50 प्रतिशत लोग फ़िलिस्तीन हटे हैं और इजरायल केवल 80 प्रतिशत जमीन ले पाया है। नक़ाबा रोज़ हो रहा नबुलस, ग़ाज़ा, गैलीली, नक़ाबा। हमको फ़िलिस्तीन की बर्बादी पर बातचीत करनी चाहिए।”
प्रो. ईलान पापे चूँकि बुद्धिजीवी हैं और वह संवाद से इस समस्या का हल ढूँढ़ना चाहते हैं… और इजरायल और उनके मिस्र देश लगातार शान्ति वार्ता के बाद भी हथियार देते हैं और एक युद्ध समाप्त नहीं हो पाता कि दूसरा शुरू हो जाता है। मुझे 1978 में पी.एल.ओ. के चेयरमैन यासिर अराफ़ात का इंटरव्यू याद तुम्हारा आ रहा है जिसमें उन्होंने कहा था कि वेस्ट मीडिया और इजरायली इस इलाके में बेबी है। कोई ऑर्गेनाइज्ड टेररिज्म, पर ध्यान नहीं दे रहा है। जिस तरह के खौफ़नाक हमले हुए यू.एन. की सिक्योरिटी में उसकी आलोचना करनी चाहिए: और जो मानवाधिकार की बातें करते हैं, जब बात फ़िलिस्तीन और लेबनान की आती है तो वह कहाँ चले जाते हैं? हमारे फैक्स देखें, लेबनान के गाँवों पर हमला हुआ, उसमें से कुछ गाँव पूरे के पूरे साफ़ कर दिये गए मगर वैस्टर्न प्रेस ने अपने कैमरे ऑन नहीं किए क्योंकि इजरायल उनका बेबी है।” इसमें कोई शक नहीं है कि वेस्टर्न वर्ल्ड के साथ कुछ हो जाता है तो उसको इतना बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है कि उनका पल्ला न केवल सही नज़र आने लगता है बल्कि भारी हो जाता है। यह भी सच है कि अरब दुनिया में जो खबरें छपती हैं चूंकि अरबी में रहती हैं। इसलिए बाक़ी दुनिया उन्हें नहीं पढ़ पाती है और एक तरफ़ा दृष्टिकोण अपना लेती है।
इस समय प्रश्न उठ रहा है कि अरब देश इस कठिन समय में क्यों नहीं साथ दे रहे हैं हमले ग़ाज़ा में हुए हमले से तबाह एक बेबस फ़िलिस्तीनी ने कहा कि ‘अरब देश मुर्दा हो चुके हैं’। यह सही नहीं, वह जाग रहे हैं और अपना-अपना लाभ और नुकसान देख रहे हैं क्योंकि 16 सितम्बर, 2020 को अरब-इजरायल के बीच ‘इब्राहम समझौता’ हुआ था जिसकी मध्यस्थता की भूमिका अमेरिका ने की। इस समझौते का मुख्य मक़सद रहा कि अरब-इजरायल के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर सम्बन्धों को सामान्य बनाया जाए। तब हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि कोई अरब देश 1967 की तरह एकजुट होगा और इज़रायल के क़ब्ज़े वाला हिस्सा लौटाएगा क्योंकि दुनिया अपना रुख बदल रही है और नए तरह के मापदंड वजूद में आ रहे हैं।
जैसे कि यदि पहले की तरह भागे या खदेड़े फ़िलिस्तीनी इन देशों की तरफ़ भागे थे और बस गए थे मगर इस बार यह देश इसलिए भी ऐसा नहीं कर रहे हैं कि यदि फ़िलिस्तीनियों ने जगहें खाली छोड़ी तो इज्जरायल को आगे बढ़ने का मौक़ाम मिल जाएगा और इस तरह फ़िलिस्तीन कुछ वर्षों में इजरायल स्टेट में बदल जाएगा। इसलिए इजरायली एसेम्बली के मेम्बर की बेहद कड़वी जबान से यह आवाज निकली है कि ग़ाज़ा में कम बच्चे मरे हैं, इसकी संख्या इससे भी ज्यादा होनी चाहिए। लेकिन वह यह नहीं देख पाई है कि अस्पतालों में घायलों को देखते हुए डॉक्टर और पत्रकार जिस तरह जख्मी माँ के बिना बच्चों को वह सीने से लगा थपकते हैं और उन्हें बहलाते हैं और जो बड़े बच्चे हैं उन्हें टॉफ़ी या खिलौने देते हुए हँसाते हैं। फिर मुट्ठी से मुट्ठी टकराकर उन्हें कहलाते हैं-फ़िलिस्तीन जिन्दाबाद! वही बच्चे गाते हैं जो ग़ाज़ा के हीरो हैं-“जब तक हम जीत नहीं जाते / हम राह ढूँढ़ लेंगे / बाग का दरवाज़ा खोल देंगे/ हमें जिन्दा रहना पसन्द है। जीत का मार्च तब तक निकालेंगे।”
जून, 1967 में छह दिवसीय युद्ध के दौरान, इज्जरायल ने फ़िलिस्तीन के ब्रिटिश जनादेश का हिस्सा रहे शेष क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया, जॉर्डन से वेस्ट बैंक (पूर्वी यरूशलम सहित) और मिस्त्र से गाजा पट्टी ले ली। मिस्र और सीरिया द्वारा सैन्य धमकियों के बाद जिसमें मिस्र के राष्ट्रपति नासिर की संयुक्त राष्ट्र से मित्र-इजरायल सीमा से अपनी शान्ति रक्षक सैनिकों को हटाने की माँग भी शामिल थी। जून, 1967 से इजरायली सेना मिस्त्र, सीरिया और जॉर्डन के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने गई। इस युद्ध के परिणामस्वरूप इजरायल रक्षा बलों ने वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी, गोलान हाइट्स और सिनाई प्रायद्वीप पर विजय प्राप्त की और सेना के अधीन कर दिया। इज़रायल ने अरब सेनाओं को पूर्वी यरूशलम से पीछे धकेल दिया जहाँ यहूदियों को पूर्व जॉर्डन के शासनकाल में जाने की इजाजत नहीं थी। इजरायल ने यरूशलम को अपनी राजधानी बनाना चाहा और शामिल कर लिया? मगर उसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिली। इजरायल ने क़ब्ज़ा की हुई भूमि पर यहूदी बस्ती बसाना शुरू कर दी।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ‘शान्ति के लिए भूमि’ फार्मूले को बढ़ावा देते हुए संकल्प-242 पारित किया जिसमें उपरोक्त अरब लीग देशों द्वारा युद्ध के सभी राज्यों को समाप्त करने के बदले में 1967 में क़ब्जे वाले क्षेत्रों से इजरायल की वापसी का आह्वान किया गया था। लेकिन इस बार इजरायल और अमेरिका व बाक़ी देश इस सिलसिले में कोई कोई ठोस क़दम नहीं उठा पा रहे हैं और अरब देशों का मंशा भी अभी साफ नहीं कि वह 1967 की तरह कोई सामूहिक क़दम उठाएँगे, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। मिस्त्र ने फ़िलिस्तीनियों को लेने से इनकार कर दिया है।
इजरायली गालित अतबरयान (Galit Atbaryan) का कहना है कि “फ़िलिस्तीन को धरती से मिटा देना चाहिए। इन शैतानों को इजिप्ट या फिर उड़कर उत्तर-दक्षिण पार चले जाना चाहिए वरना मारे जाएँगे और इस बार उनकी मौत बहुत भयानक होगी।”
एमनेस्टी इंटरनेशनल स्काइप ने कहा है, “इज़रायल सफ़ेद फ़ासफोरस का प्रयोग कर रहा है?”
संयुक्त राष्ट्र इस पूरे नरसंहार को अपराध है, अपराध कह रहा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के ऑफ़िसर क्रेग मुखिबॅर (Craig Mokhiber) ने इस्तीफ़ा दे दिया है। उनका कहना है कि “जो कुछ ग़ाज़ा में हो रहा है वह इजरायली नरसंहार है।”
2014 में एक इंटरव्यू में एक अमेरिकन अफ़सर ने आक्रोश में भरकर कहा था, “जागो अमेरिकंस जागो! तुम ऐसी जंग में खींचे जा रहे हो जो अरब वर्ल्ड, मुस्लिम वर्ल्ड है, जिसमें तुम्हें यक़ीन दिलाया जाएगा कि बहुत कुछ भयानक होनेवाला है। और यह काम मुस्लिम नहीं करेंगे बल्कि ‘मोसाद’ करेगा जो बेहद चतुर और क्रूर है। अमेरिका पर अटैक ख़ुद करेगा और दिखाएगा ऐसा जैसे अरबों ने किया है। ‘फाल्स फ्लैश’ की मेरी परिभाषा है।”।
अमरीकी जनता भी इस बात को महसूस कर रही है कि उसके जवान कहीं-न-कहीं लड़ाई में मारे जाते हैं और उसमें भी विफलता हाथ लगती है और वह देश भी बर्बाद होता है। इसी सिलसिले में हार्ट के स्पेशलिस्ट एवं एक्टर बसीम यूसुफ़ का कहना है कि “एक अमेरिकन नागरिक के नाते मैं यह सवाल कर रहा है कि अमेरिका 4 बिलियन डॉलर सालाना खर्च कर रहे हैं और कहीं नहीं पहुंच पा रहा है। हमास के बहाने उसका टारगेट सिविलियंस हैं। इसके लिए पुतिन की आलोचना यूक्रेन के सिलसिले से हई मगर इजरायल जिसके पास आर्मी है वह बम बरसा रहा उस पर जिसके पास कुछ नहीं है।” उनसे पूछा गया कि “आप अगर इजरायली होते तो?” इस पर उनका जवाब था कि “मैं जितना भी नरसंहार कर सकता करता क्योंकि दुनिया ने छूट दे रखी है, वह मुझसे यह करवाती’। उन्होंने आगे कहा कि “फ़िलिस्तीनियों को जॉर्डन या इजिप्ट क्यों ले, क्यों न यूरोप ले जिसके 44 देश हैं। क्यों न अमेरिका ले जिसके पचास प्रान्त है? और फिर सारे फ़िलिस्तीन, जॉर्डन और मिस्त्र में धकेलकर वह फिर जॉर्डन, मिस्र में घुसे?” ग्रेट इजरायल के सपने को लेकर यह समस्या गहरी और उलझी है और रोज-ब-रोज्ज उलझाई जा रही है हर तरफ़ की राय से। जबकि इजरायल का निशाना कहीं और है।
इजरायली पत्रकार जीडियन लेवी (Gideon Levi) का कहना है कि ‘उन लोगों की जुबान सुनें जो टू स्टेट समाधान को सपोर्ट करते हैं कि फ़िलिस्तीनियों का गैर-फौजीकरण कर दिया जाए। क्या उनके पास सेल्फ डिफेंस का कोई अधिकार नहीं है। उन लोगों की ज़िन्दगी ख़तरे में है। इज़रायल कोई भी हथियार रख सकता है मगर फ़िलिस्तीन नहीं। यह किस किस्म का जस्टिस है? इज़रायल फौजी घर-घर हमास को ढूँढ़ रही है लेकिन कितने घर और इमारतें ग़ाज़ा में बचे हैं? यह जंग बन्द होती है तो जो फ़िलिस्तीनी सड़क पर पनाह लिये हैं। उनका ज़िम्मेदार कौन और उनको कौन फिर से बसाएगा इसलिए बेहतर है प्रधानमंत्री नेतन्याहू का जाना
इन विभिन्न स्तरों पर लिखी और कही अभिव्यक्तियों और इस एकतरफ़ा नरसंहार को समझने के लिए हमें इस समस्या को बुनियादी रूप से समझना होगा जिसके लिए हमें यरुशलम में जन्मे तीन धर्मों के साथ उस इतिहास को भी समझना होगा तभी हम अपनी तरफ़दारी को सही तरह से समझ सकेंगे और इस तरह के युद्धों के विरुद्ध आवाज उठा सकेंगे जिसका परिणाम पूरा विश्व किसी-न-किसी स्तर पर झेलता है। यह शब्द दूसरे अन्दाज से अहमद ख़ालिद स्वाफ़लाह ने कहा है-
यह इज़रायली शहर नहीं बल्कि गैरकानूनी बसावट है
यह भिड़न्त नहीं बल्कि
यह इज़रायल की डिफेन्स फ़ोर्स नहीं
बल्कि फ़िलिस्तीन पर
क़ब्ज़ा करने की फ़ोर्स है
यह टेररिज्म नहीं बल्कि फ़िलिस्तीन नरसंहार है
यह इजरायली लोग नहीं बल्कि जबर्दस्ती बसे लोग हैं।

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