7 अगस्त राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर विशेष
सिनेमा के संदर्भ में हमने ‘बोर्न एक्टर’ के विषय में हमेशा सुना लेकिन श्याम बेनेगल ‘बोर्न डायरेक्टर’ थे. ‘जीना इसी का नाम है’ मैं वे कहते हैं कि – मैं कभी एक्टर नहीं बनना चाहता था हाँ, मैं एक्टरों को बनाने के लिए ही आया था’. उनका यह वाक्य नेपोटिज्म के लिए खुली चुनौती के रूप में ले सकते हैं . उन्होंने एक्टर बनाए भी. वे मानते थे हिंदी सिनेमा “क्रिएट स्टार्स” हर कोई स्टार नहीं हो सकता. ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, शबाना आज़मी, इला अरुण, स्मिता पाटिल जैसे नॉन फिल्मी चेहरों को उन्होंने एक चमक प्रदान की, तो शशि कपूर जैसे स्टार को बेहतर एक्टर भी बनाया इसी कार्यक्रम में अमरीश पुरी स्वीकार करते हैं “तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो … श्याम एक फिल्म इंस्टीट्यूशन है जो कभी सिखाते नहीं फिर भी उनके निर्देशन में कोई भी एक्टर बन सकता है” वास्तव में श्याम बेनेगल सिनेमा ही के लिए ही बने थे उनके भीतर जब सिनेमा का ‘अंकुर’ फूटा सिनेमा ने मानो अपनी ‘भूमिका’ सामाजिक सराकारों को समझना आरम्भ किया और दर्शकों की भी मानसिकता तैयार हुई. श्याम बेनेगल ‘सिनेमा की दुनिया एक अल्टरनेटिव दुनिया मानते हैं’ जो हमें एक बेहतर दुनिया की ओर ले जाने के लिए तैयार करती है. वे उस अभिनव सिनेमा के सृजनकर्ता थे जिसे आर्ट सिनेमा या कला सिनेमा अथवा समानांतर सिनेमा कहते हैं. कला सिनेमा से जुड़े लोग धीरे-धीरे अलग होते चले गए लेकिन श्याम बेनेगल ऐसे निर्देशक रहे जिन्होंने हमेशा सिनेमा में नवाचार किया, नवाचार उनके सिनेमा की विशेषता थी . गोविंद निलहनी के अनुसार आप एक थिंकिंग पर्सन यानी विचारक थे, गिरीश कर्नाड बताते हैं ‘आपने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी पसंद के अनुसार ही कलाकार और तकनिशियनों का चुनाव किया और अपनी पसंद के विषय पर ही फिल्म बनाई, जिसके लिए फंडिंग भी करनी पड़ी तो की’. क्राउड फंड से बनी उनकी ‘मंथन’ फ़िल्म के बारे में हम जानते भी है जो किसानों के दो-दो रुपयों के फंड से बनी. उनकी अधिकतर फिल्में ‘एनएफडीसी’ के सहयोग से तो कभी जान-पहचान के फाइनेंसर के माध्यम से ही बनी. आन्दोलनकारी किसानों के हित में यदि आज के समय में ‘मंथन’ जैसी फ़िल्म बनानी हो तो मुमकिन ही नहीं. इसके सामाजिक और राजनीतिक दोनों ही कारण हैं। आज के फिल्म मेकर्स हजार करोड़ क्लब को टारगेट बनाकर फ़िल्म बना रहे हैं, आदर्श और विचार खोखले हो चुके हैं. हाँ, प्रोपेगेंडा फिल्मों का बाज़ार गर्म है । विज्ञापन बनाने के समय के उनके साथी ‘कर्सी काटकर बताते हैं कि ‘विज्ञापन निर्माण के समय भी हमेशा सिनेमा की ओर ही आपका झुकाव रहा, न केवल सिनेमा बल्कि आपका मन इतिहास दर्शन राजनीति तेरे लिए जन्म और कला में भी बराबर रमता था जो सच्चे कलाकार की पहचान है’ विज्ञापन फिल्में बनाने के अनुभव पर श्यामजी कहते हैं ‘यह अनुभव बहुत काम आया’. मुझे लगता है जैसे विज्ञापनकर्ता अपने उपभोक्ता को अपना सामान खरीदने के लिए कन्वेंस करता है, ठीक उसी प्रकार की अप्रोच श्यामजी फिल्मों में दिखाई पड़ती है. उनकी फ़िल्मों की विश्वसनीयता हमें आश्वस्त करती हैं। सुसमन फिल्म देखते हुए भी हमें उनकी यह विशेषता नजर आती है कि किस तरह से प्रचारात्मक, डॉक्यूमेंट्री सामग्री को कथा में पिरोकर एक अद्भुत फीचर फिल्म वे प्रस्तुत करते हैं.
अब बात फिल्म सुसमन की, फिल्म का शीर्षक कबीर के दोहे ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ के सुष्मना शब्द से प्रेरित है. सुषुम्ना क्रिया योग ध्यान का नियमित अभ्यास तीसरी आंख की पूर्णता में मदद करता है, इस घटना को ‘त्रिवेणी संगम या मुक्ति संगम’ के रूप में भी जाना जाता है. जो अज्ञानता हमें घेर लेती है, इससे वह साफ हो जाती है और नियमित ध्यान से यह हमें दिव्य शक्ति की ओर ले जाती है. हमें प्रबुद्ध प्राणियों में बदल देती है. यह तो हुआ इसका योग अर्थ. सुसमन फिल्म के संदर्भ में हम बात करें तो इसे निर्देशक श्याम बेनेगल की जागृत ‘तीसरी आँख’ से जोड़ना चाहिए. कहा जाता है कि सत्यजीत राय की एक तीसरी आँख हुआ करती थी जो कैमरे से पहले ही देख लिया करती थी, मुझे लगता है कि सत्यजीत राय से सर्वथा प्रभावित श्याम बेनेगल ने भी इस तीसरे नेत्र को प्राप्त कर लिया था। दूसरा, कबीर आत्मा के लिए शरीर रूपी चादर का निर्माण जिस धागे से करते हैं वह कमजोर हो गया, उसके समान ही बुनकर समाज भी अब कमजोर होता जा रहा है. इन बुनकरों की आर्थिक स्थिति भी कमजोर और दयनीय होती चली जा रही है.

औद्योगिक क्रांति के बाद उत्पादन के साधनों में क्रांतिकारी परिवर्तन आया. उससे हमें सुविधा और साधन तो मिले लेकिन हथकरघा कारीगरों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. क्रांतिकारी कवि कबीर जुलाहा थे, उनके युग में पूंजीवाद विशेषकर नगरों में आ चुका था, लेकिन उत्पादन के लिए बाजार हस्तशिल्प पर ही निर्भर था लेकिन बीसवीं सदी की औद्योगिक क्रांति के बाद उत्पादन में जो युगांतरकारी परिवर्तन आया, उससे कम समय और श्रम में अधिक उत्पादन होने लगा जिसका सीधा प्रभाव परंपरागत तरीकों पर पड़ा और कामगार कारीगर मजदूर में बदलने लगे, उनकी रोजी-रोटी बंद होने लगी . मशीनी अर्थव्यवस्था ने उन्हें बाजार से लगभग बेदखल कर दिया. यदि वे बाजार से जुड़ना भी चाहे तो बिचौलिए हमेशा बीच में रहते. अपनी इस स्थिति की वजह से कामगार कारीगर शहरों की ओर पलायन करने को विवश हुए लेकिन शोषण तो वहां भी हो रहा था. आजादी के बाद मशीनों को और ज्यादा महत्व दिया जाने लगा ताकि अधिक उत्पादन हो, लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो लेकिन इस उत्पादन की यांत्रिकता ने मनुष्य को भी यंत्रवत बना दिया. यंत्रों के दुष्प्रभाव पर मनोज कुमार की ‘शोर’ फ़िल्म में अपने ढंग से बात करती है जबकि नायक का बेटा बोल नहीं पाता तो वह दिन रात फैक्ट्री के शोर में काम करता है ताकि उसका इलाज करवा सके लेकिन अंतत: जब बेटा बोलता है तो उसके कान बहरे हो जाते हैं. 20वीं सदी के अंत तक आते-आते फैक्ट्रियों का प्रभाव का संकट गहराने लगा था. जहाँ तक हस्तकरघा की बात करें तो एक क्षेत्र था जहाँ इस काम की न केवल पहचान बाकी थी बल्कि उसकी प्रतिष्ठा करने के लिए लोग आगे आ रहे थे. फ़ैशन की दुनिया ! यहाँ हस्त निर्मित वस्तुओं के सौंदर्य को पहचानते हुए जब इन्हें आगे लाने की कोशिश की तो बिचौलियों के आधिपत्य के कारण इनकी स्थिति दयनीय ही बनी रही. फ़िल्म का नायक रामलू इसी तरह का कारीगर है. उसके काम की पहचान फ़ैशन की दुनिया की मंदिरा करती है जो बाद में उसे एग्जीबिशन में पेरिस लेकर जाती है . सुखद अंत पर यह ख़त्म होने वाली फ़िल्म सरकार की को-ऑपरेटिव योजना की प्रचारात्मक फिल्म है. वास्तव में विज्ञापन की दुनिया से जुड़े और डॉक्युमेंट्री की समझ रखने वाले श्याम बेनेगल के लिए इस तरह की फ़िल्म बनाना मुश्किल नहीं था. इसके पहले भी वह ‘मंथन’ बना चुके थे। और 2000 में उन्होंने इसी तरह से सरकारी एजेंडे को ध्यान में रखते हुए ‘हरी-भरी’ फिल्म बनाई थी. लेकिन प्रचारात्मक होने के बावजूद भी ये फ़िल्में कहीं भी बोर नहीं करती. खूबसूरत कथानक, रोचक चरित्र और प्रभावशाली संवाद के साथ बेहतरीन अभिनय, फ़िल्में संदेश के साथ-साथ फिल्मों का मूल तत्व यानी मनोरंजन भी देती हैं।
सुस्मन फ़िल्म का कथानक वैसे तो कर्नाटक के पोचमपल्ली हथकरघा कारीगरों से सम्बद्ध है लेकिन यह समस्त भारतीय हथकरघा कारीगरों की समस्या को समेटे हुए हैं जिसका संकेत हमें बिल्कुल के प्रारंभ में ही हो जाता है. फिल्म का आरंभ वनराज भाटिया के शानदार संगीत के साथ शुरू होता है जिसमें कैमरा अलग-अलग साड़ियों पर आ रहा है, फैशन डिजाइनर मंदिरा जिसे एक प्रदर्शनी के लिए पेरिस जाने की तैयारी करनी है. वह सभी राज्यों की साड़ियों की विशेषता बता रही है । जब फैशन डिजाइनर मंदिरा भारत के विभिन्न राज्यों की साड़ियों की विशेषता पर बात कर रही है तो चंदेरी साड़ी पर बात करते हुए अफसोस प्रकट करती है कि अब इस तरह की साड़ी बनाने वाले कारीगर बहुत कम बचे हैं बल्कि सिर्फ दो ही बचे हैं. इस फिल्म के संदर्भ में मैंने जब लेखक अब्दुल बिस्मिल्लाह जी से प्रश्न किया था कि क्या यह फिल्म आपके उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ से प्रेरित है क्योंकि उपन्यास 86 में आया और फिल्म 87 में, तो उन्होंने कहा था कि ‘नहीं, वह अलग कहानी है, मेरी कहानी बिल्कुल अलग है’ लेकिन मूल समस्या एक है. वास्तव में यह मूल समस्या पूरे भारत के हस्तशिल्प कारीगरों की है. हस्तशिल्प, हथकरघा उद्योग आज भी हाशिए पर है जबकि यह है एक बहुत बड़ा रेवेन्यू देश को देते हैं. विदेशों में उनकी बहुत माँग है. फिल्म में रामलू ‘पेरिस एग्जीबिशन’ के लिए ही काम कर रहा है, काम सही समय पर खत्म होने पर जब पार्टी दी जाती है और मंदिरा पूछती है कि ‘रामलू क्यों नहीं आया तो बिचौलिया नरसिंह कहता है ‘कारीगर का अब क्या काम ? उसका काम खत्म है यहाँ आकर क्या करेगा? वैसे भी वह कारीगर तो अच्छा है पर उसका दिमाग ठीक नहीं है’। यानी काम की प्रतिष्ठा है लेकिन कारीगर की नहीं । रामलू अपने गांव भर में सबसे बेहतरीन कामगार बुनकर है. जब गांव में सहकारी समिति यानी को-ऑपरेटिव सोसाइटी का गठन हुआ तो उसने वहां भी काम किया था लेकिन जब देखा कि वहां भी भ्रष्टाचार और शोषण है तो वह वापस अपने परंपरागत ढंग से काम करने लगा. उसका मामा ही उसका एजेंट है. वह जानता है कि उसका शोषण हो रहा है लेकिन अपने माल को बाजार में पहुंचने के लिए उसके पास कोई और विकल्प नहीं है.एक साड़ी को बनाने में दस महीने का समय लगता है.

जैसा हमने पहले कहा कि यह प्रचारात्मक फ़िल्म होने के साथ-साथ समाज के अन्य पहलुओं पर भी गंभीरता से अपनी बात करती चलती है जो कहानी की बुनावट में इस तरह गुँथा है कि कलात्मकता निखर कर आती है जैसे फिल्म 1970 भिवंडी में हुए सांप्रदायिक दंगों का भी उल्लेख करती है और समझ आता है कि दंगे विकास की प्रक्रिया को बाधित करते हैं गोंड्डिया नाम का गरीब कारीगर जब मज़दूर के रूप में शहर जाता है तो वह दंगे का अपना अनुभव बताता है “बड़ी मुश्किल से जान बचाकर आए हैं, शहर में बहुत बड़ा दंगा हो गया हम आधी रात को सो रहे थे कोई हजारों लोग लाठी लेकर आए और फैक्ट्री की मशीने तोड़ डाली आग लगा दी, हम लोगों को बहुत मारा नागेश्वर को भी बहुत मारा” यानी गाँव से जो लोग रोजी-रोटी की खातिर शहर की ओर जाते हैं, तमाम कठिनाइयों को झेलते हुए दंगों का भी सामना करते हैं. उसकी पत्नी कहती है ‘न यहाँ के रहे न वहां के’ . गांव में भी दोनों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी जीवन निर्वाह के लिए उसकी पत्नी येल्लम्मा बहुत थोड़े से पैसों के लिए अपने देह का सौदा करती है. उसका पति जानता है लेकिन कुछ बोल नहीं पाता. तेल चोरी के इलज़ाम में जब उसकी गठरी उलट दी जाती है तो उसमें गिने- चुने चिथड़े पुरी तस्वीरें कागज दिखते हैं तो शबाना आजमी हैरानी से कहती है “बस इतना ही है” तब गोंड्डिया कहता है ‘हां अम्मा तन पर दो कपड़े और दो हाथ इतना ही है हमारे पास’ इस छोटे से संवाद में उन कारीगरों की दयनीय स्थिति उजागर हो जाती है। कुछ नहीं मिलने पर भी रामलू का छोटा भाई लक्ष्यमा उसे खूब मारता है तब गोंड्डिया कहता है “बाबू गरीब इंसान नहीं होता! उसके जुबान कहाँ होती है? हमसे अच्छे तो कुत्ते हैं अब हम यहां नहीं रहेंगे! . रामलू की बेटी चिन्ना जब शादी करके शहर जाती है तब वह वहां पर भी येलम्मा को एक आदमी से पैसा लेते हुए देखती हैं और वह घबरा जाती है . शहर में रहने की समस्या पर भी फ़िल्म टिप्पणी करती है. चिन्ना अपनी मां को कहती है कि ‘मैं अब घर नहीं जाऊंगी वहां मेरा दम घुटता है झुग्गियां बहुत पास पास है, एक झोपड़ी में तीन चार लोग रह रहे हैं. गांव के खुले वातावरण में रहने वाली चिन्ना को देखकर ‘पिया का घर’ फ़िल्म की याद आती है जहां खुले वातावरण में रहने वाली जया भादुरी को चॉल में रहना पड़ता है लेकिन अंत में वह समझौता कर लेती है जबकि श्याम बेनेगल की चिन्ना लौट जाती है वह समझौता करने को तैयार नहीं . यही अंतर है परम्परागत नायिका और श्याम बाबू की नायिका में ! हालाँकि रामलू का भाई भी मामा की तरह एजेंट बन जाता है और समिति के साथ मिलकर कच्चे माल का सौदा करता है और अपनी पत्नी को शहर ले जाने की बात करता है तो जानकी शहर जाने को तैयार हो जाती है, यह जानते हुए भी कि शराब पीकर वह अक्सर उसे मारेगा लेकिन शहर में उसके पास एक घर है.
रामलू ने भी अपनी स्थिति को स्वीकार कर लिया है, पूछने पर यही जवाब देता है काम खत्म होने के बाद कारीगर को पूछता कौन है? फ़िल्म का हर किरदार अपने आप में महत्वपूर्ण है, जिसमें एक बेघर बुनकर गोंडाया और उसकी पत्नी येल्लम्मा है तो नागेश्वर की मां पर्वतअम्मा भी है, जिसके लिए दहेज के कोई मायने नहीं है जबकि उसका बेटा दहेज माँग रहा है. पर्वताम्मा अपने वचन को निभाकर अपने बेटे की शादी करती है. भीम नागेश्वर की तरह शहर नहीं जाता बल्कि गांव में ही पहले शहरी भ्रष्टाचार को तोड़ने के लिए तत्पर है. जब रामलू काम करने पर मना कर देता है तब एक दृश्य में गौरम्मा उसके कंधे को छूना चाहती है लेकिन वह उसको झटक कर आगे बढ़ जाता है उसकी उदासीनता सिर्फ पत्नी के प्रति नहीं बल्कि इस पूरे पेशे के प्रति नजर आती है कि अब हमारा कुछ नहीं हो सकता कोई सहारा हमें नहीं दे सकता. एक पूरे समाज को मानो दया पर निर्भर रहना पड़ रहा है। फिल्म में ओम पुरी की खामोशी ही बुनकर समाज के लुप्त होते बुनकर समाज को हमारे सामने प्रकट करती है.

गाँव छोड़कर शहर जाने वाले नागेश्वर का भाई भीमा सोसाइटी में होने वाले घोटालों को बार-बार उजागर करता है लेकिन कहीं किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता. जब वह रामलू को समझाता है कि वह वापस से सोसाइटी में आकर काम करें मैं वहां सेक्रेटरी बनने वाला हूं लेकिन रामलू मना कर देता है. औद्योगिक क्रांति ने जिस तरह परंपरागत कामगारों को बेरोजगार किया फैशन डिजाइनर मंदिरा उनके लिए सच में कुछ करना चाहती है तो उसका साथी इसे “छिछली रूमानियत कहता है” उन दोनों का संवाद इंडस्ट्री युग में मशीन होते इंसान और बची हुई इंसानियत के बीच का संवाद है वह कहता है – “तुम जैसे इमोशनल फूल्स ही हैंडलूम को म्यूजियम तक पहुंच जाएंगे!… तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है इन छिछली रोमानियत से हैंडलूम इंडस्ट्री बर्बाद हो रही है जस्ट चेंज योर एटीट्यूड, इन्हें पैसे दो बस थोड़ी सी ठीक से बात करो डॉन’ट गेट इमोशनली इंवॉल्व देम’. तब मंदिरा गंभीरता से जवाब देती है कि-
‘मैं तुम्हारी तरह बर्ताव करूं तो सारे कारीगर बेरोजगार हो जाएंगे…
वह तो हो ही जाएंगे आज नहीं तो कल. आजकल ऐसे कारीगर गिनती के रह गए हैं और तुम्हारी इस आर्टिफिशियल ऑक्सीजन के सहारे कितना दिन आगे बढ़ पाएंगे…
आई एम टोटल डिसएग्री विद यू. हैंडलूम म्यूजियम की चीज नहीं है यह एक जीवित जिंदा कला है जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हुई है यू हैव टू सेंसिटिव की आईटी और तुम मुझे भी सिंसेरली नहीं लेते हो’
“फिर यह कोई मजदूर नहीं है कि एक हटाया दूसरा ले लिया यह हाईली स्किल्ड क्राफ्ट पीपल हैं” लेकिन इस तरह की सोच वाले लोग बहुत कम है और अब तो बिल्कुल नहीं बचे. इस कला के सच्चे कद्रदानों तक नरसिंह जैसे बेईमान एजेंट पहुंचने नहीं देते’
फ़िल्म के अंत में पेरिस में एक पत्रकार रामलू से प्रश्न करता है- ‘जैसे-जैसे इंडस्ट्री बढ़ रही है कलाएं खत्म हो रहे हैं’ रामलू बहुत ही भावुक जवाब देता है “जिंदगी ढंग से कट जाए तो यह काम छोड़कर मशीन के पीछे क्यों जाए कोई हाथ से काम करने में जो चैन मिलता है वह मशीन से नहीं मिलता” लेकिन उसकी भावनाओं की कोई कदर नहीं है। रामलू का भावुक जवाब बाजार की व्यवहारिकता और व्यवसायिकता के आगे किसी तरह टिक नहीं पाएगा और व्यावहारिकता तो यही है कि कला का मूल्य है मगर उसका मूल्य कलाकार को नहीं मिलता बिचौलिया सारा लाभ उड़ा ले जाते हैं . फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष और खूबसूरती इसका संगीत और कबीर के गीत. वनराज भाटिया का संगीत और कबीर के गीतों का इस्तेमाल फिल्म को बेहतरीन बनाता है. आपको बता दे कि केंद्र सरकार ने हथकरघा उद्योग के महत्व के बारे में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से जुलाई 2015, 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में मनाने को घोषित किया है. हैदराबाद में हथकरघा हैंडलूम दिवस बुनकरों को सम्मानित करने और हथकरघा उद्योगों पर प्रकाश डालने के लिए 7 अगस्त को प्रतिवर्ष मनाया जाता है. राष्ट्रीय हथकरघा दिवस देश के सामाजिक आर्थिक विकास और बढ़ाने में उजागर करता है, विद्या बालन, नीना गुप्ता, कोंकना सेन, अरुंधति रॉय, प्रियंका चोपड़ा और शबाना आज़मी जैसी अभिनेत्रियां हैंडलूम को बढ़ावा देने वाली ब्रांड एंबेसडर हैं.
फ़िल्म के अंत में मंदिरा की भूमिका में नीना गुप्ता का संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है ‘हमें रचनात्मक व्यक्तियों के लिए जगह बनानी चाहिए ताकि वह औद्योगिक समाज में भी काम कर सके, साथ ही एक ऐसा तरीका जिससे अपने हाथों से काम करने वाले कारीगरों को बाजार उपलब्ध कराया जा सके. क्या आपको लगता है कि हमें अपने बचे हुए कुशल कारीगरों को खत्म हो जाने देना चाहिए या उन्हें ऐतिहासिक काल में गुम हो जाने देना चाहिए’. 1987 में भारतीय पैनोरमा के लिए इस फिल्म का चुनाव किया गया लंदन फिल्म महोत्सव, शिकागो फिल्म महोत्सव, वेंकूवर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव सिडनी और मेलबॉर फिल्म महोत्सव में फिल्म को आमंत्रित किया गया. आपको बता दे कि सन 2000 में प्रियदर्शन द्वारा तमिल में इस फिल्म को कांचीपुरम के नाम से पुनर्निमित किया गया लेकिन क्यों ? इसके कारणों पर भी खोज करनी होगी. अब तीसरी बार इस विषय पर फ़िल्म न बनानी पड़े इसकी आशा भी कर सकते हैं .
