पोस्ट ट्रुथ के दौर में युवाओं (जेन Z) के आंदोलन : कुछ सवाल, कुछ जवाब

पोस्ट ट्रुथ और टकराते नैरेटिव्स के दौर में युवाओं के आंदोलन को इतिहास, वर्तमान और उसके स्वरूप के जरिये समझने की कोशिश करें। इस लेख में हमलोग इसे तीन में देखते हैं।
भाग 1: अभिजीत दीपके: पोस्ट ट्रूथ और उनका दलित होना,अम्बेडकरवादी स्पेस से होना
गांधी:
“मैं आपको बता दूँ कि मैं अपने विद्यार्थी जीवन से ही, जब आपका जन्म भी नहीं हुआ था, अछूतों की समस्या पर विचार करता आया हूँ।”
डॉ. आंबेडकर:
“यह सही है महात्माजी कि आपने अछूतों की समस्या पर मेरे जन्म से पहले सोचना शुरू कर दिया था। वृद्ध लोग प्रायः अपनी आयु का उल्लेख करना पसंद करते हैं। यह भी सही है कि आपके कारण कांग्रेस ने इस समस्या को मान्यता दी, लेकिन कांग्रेस ने औपचारिक मान्यता देने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया।”
ऊपर का यह संवाद एक अपेक्षाकृत युवा का संवाद है अपने से पूर्व की पीढ़ी के प्रभावी नेता से 1931 में। उस नेता ने इसके पहले अपने पूर्व की पीढ़ी के नेताओं की जगह ली थी। और उससे नेतृत्व हासिल करने, छीनने के लिए उसके समूह के युवा तैयार थे, लेकिन यह संवाद उसके समूह के युवा से नहीं है, यह कोई और था जो उसके समूह से बाहर का था और एक बड़ी जनता के नेतृत्व के लिए दस्तक दे रहा था।

अभिजीत दीपके और उनके साथियों ने जब चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी के बैकड्रॉप से कॉक्रोच जनता पार्टी मुहीम शुरू की तो उन्हें इंस्टाग्राम पर जबरदस्त फॉलोइंग मिली। आजकल नई पीढ़ी इंस्टा आदि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर है इसलिए सीजेपी को ‘जेन जी ‘ ( Gen Z) की मुहीम बताया गया। हालांकि खुद अभिजीत जेन मिलेनियल ( Gen Y) हैं । एक – डेढ़ साल पहले पैदा होते तो जेन जी होते।यह बला क्या है, जेनरेशन का नामकरण! मुझे तो बस युवा समझ में आते हैं। लेकिन नामकरण है तो है।
पहले आए बेबी बूमर्स (1946 से 1964)। इनका नामकरण द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मदर में आए उछाल के आधार पर हुआ, जो कथित रूप से युद्ध से लौटे सैनिकों और युद्ध के साये से बाहर निकले अन्य नागरिकों के कारण आया बताया जाता है।

1965 से 1980 के बीच जन्मे लोग Gen X कहलाए। कई वजहों से इन्हें एक अज्ञात प्रकृति वाली, बदलती संस्कृति की पीढ़ी माना गया। कंप्यूटर भारत में भले ही राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने तक व्यापक नहीं हुआ था, लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में उसका स्वागत हो रहा था। Generation X शब्द पहले से प्रचलन में था, लेकिन 1991 में डगलस कूपलैंड के उपन्यास Generation X: Tales for an Accelerated Culture के बाद यह नाम व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गया।1981 से 1996 के बीच जन्मे लोग जेन मिलेनियल (Gen Y) कहलाए। अमेरिकी समाजशास्त्री और इतिहासकार विलियम स्ट्रॉस (William Strauss) और नील होवे (Neil Howe) ने अपनी 1991 की किताब Generations में इस शब्द को लोकप्रिय बनाया। जाहिर है, इस पीढ़ी के बच्चे नई सदी के आसपास बड़े हुए।
जेन जी (Gen Z) 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोग हैं। इन्हें डिजिटल नेटिव्स भी कहा जाता है। इस नामकरण का आधार अंग्रेजी वर्णमाला का क्रम बना। पहले इनके लिए कई नाम प्रस्तावित हुए, लेकिन अंततः Gen Z ही सबसे अधिक प्रचलित हो गया।

2013 के बाद पैदा हुए बच्चे जेन अल्फा (Gen Alpha) हैं। अगले कुछ वर्षों में, 2029 के बाद, इनमें से पहले बच्चे मतदाता बनने शुरू होंगे। मार्क मैक्रिंडल (Mark McCrindle) ने 2008 में एक शोध के दौरान इस पीढ़ी के लिए ‘जेन अल्फा’ नाम प्रस्तावित किया, जो बाद में व्यापक रूप से प्रचलित हो गया।
बांग्लादेश, नेपाल आदि के सत्ता परिवर्तन को ‘जेन जी’ आंदोलन द्वारा परिवर्तित बताया गया। तब से भारत में भी एक बड़ा समूह ऐसे किसी विरोध और सत्ता परिवर्तन की उम्मीदों से भरा था। यहां कुछ रुमानियत सरीखा भी दिखा—इंतजाररत बुद्धिजीवियों में। यहां से एक पोस्ट-ट्रुथ की रचना शुरू होने की संभावना बनने लगी। गोया यह कि जेन जी नेटिज़न्स के रूप में भारत के जाति-धर्म से ऊपर की दुनिया में पले-बढ़े हों और वे मोनोलिथ कैटेगरी की तरह पेश आएंगे, एक्ट करने वाले हैं, कर रहे हैं। इस पोस्ट-ट्रुथ पर खड़े और भी पोस्ट-ट्रुथ हैं, जिनमें एक सीजेपी, दीपके भी किरदार हुए। लेकिन इस बीच युवाओं के आंदोलन का इतिहास—थोड़ा-सा इस आंदोलन के सापेक्ष, जो जंतर-मंतर पर हुआ, जेन जी का आंदोलन।


भारत में 1946 से 1964 तक पैदा हुई ‘बेबी बूमर्स’ पीढ़ी का आंदोलन था 1974 का आंदोलन, जिन्हें आजादी से मोहभंग हो गया था। 1971 में बांग्लादेश के जन्म के बाद लोकप्रियता के शिखर पर पहुंची इंदिरा गांधी ‘देवी से दानवी’ दिखने लगी थीं। लेकिन क्या वह एकरूप था? क्या उसी वक्त ऐसे युवा नहीं थे, जो इमरजेंसी तक से खुश थे? उसे सिर्फ ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ के प्रति हिकारत के नजरिए भर से नहीं देखा जा सकता। उसके लिए ‘लेंस फ्रॉम बिलो’, सामाजिक श्रेणी के निचले पायदान से देखने की जरूरत है। खुद जीतन राम मांझी तब जेन बूम युवा थे। अभिजीत दीपके की तरह ही, थोड़े—करीब दो साल पहले—पैदा हुए थे। उनके समाज के थोड़े लोगों को इमरजेंसी अच्छी लग रही थी—समय पर मजदूरी, अपमान के दैनंदिन में कमी, जमींदारों में भय। एक ओर तरह-तरह की गालियां देते जेन बूम थे—’गली-गली में अंडी है, इंदिरा गांधी रं.. है।’ ऐसे अनेक। ये उत्तर भारत के बेबी बूमर्स थे, वरना दक्षिण भारत में इंदिरा गांधी का आधार लगभग बना हुआ ही था। इन गाली देते युवाओं का भी कोई एक होमो चरित्र नहीं था। इनमें से कई बस थोड़े दिन पहले ही बिहार जैसे राज्य में आरक्षण के खिलाफ नारे लगा चुके थे—’आरक्षण कहां से आई, कर्पूरी की मां…..’ बेबी बूमर्स के खाते में एक सत्ता परिवर्तन है—इंदिरा गांधी कुछ दिनों के लिए सत्ता से बाहर हुईं, लेकिन फिर वापस भी हुईं। बेबी बूमर्स के खाते में महाराष्ट्र का पैंथर आंदोलन भी है, जिसने इंदिरा गांधी से ज्यादा मोरारजी देसाई को नापसंद किया, उनकी दक्षिणपंथी, प्रो-सवर्ण नीतियों और मन के कारण। उन पर नागपुर इलाके में जूते भी फेंके गए। ये संवैधानिक भारत के युवा थे, लोकतंत्र के असर से पैदा हुए थे। 1974 का आंदोलन भी कोई मोनोलिथ नहीं था। उसमें भी वर्ग, जाति की आकांक्षाओं की अपनी-अपनी लय थी। इस पीढ़ी ने नक्सलबाड़ी आंदोलन को भी जन्म दिया, आगे बढ़ाया।

जेन एक्स ने 1990 के आंदोलनों की शुरुआत की। जेन एक्स के हिस्से में तीन तरह के आंदोलनों की श्रेणियां थीं—मंडल, कमंडल और भूमंडल। ये तीनों आंदोलन साफ-साफ भारत के स्तरीकृत समाज के अलग-अलग इंटरेस्ट के केंद्र-बिंदुओं से जुड़े थे। तीनों ही नारों में गालियां थीं। गालियों का विरूप देखना हो तो आरक्षण-विरोधी आंदोलन की गालियां देख लें। यह जेनरेशन भी कोई कम क्रिएटिव नहीं था, भले ही क्रिएटिविटी के रंग अलग-अलग थे। झाड़ू लिए डॉक्टर और ‘मेरे पतियों से नौकरी मत छीनो’ की तख्तियों में गार्गी जैसे एलीट कॉलेजों की लड़कियां भद्दी, भोंडी, वीभत्स रचनात्मकता का चरम पेश कर रही थीं।

एक चौथा आंदोलन भी था, जो उत्तर भारत में इस पोस्ट की शुरुआत के युवा नायक को गली-गली में पहुंचा रहा था। एक अलग राजनीतिक परिवर्तन का आगाज दे रहा था, कांशीराम जी के साथ साइकिल चला रहा था। तो इस पीढ़ी के कमंडलधारी युवाओं ने देश के फैब्रिक को भी तार-तार किया। बाबरी मस्जिद उसकी शिकार हुई। गालियां और सांप्रदायिक नारे गली-गली तक इस पीढ़ी ने पहुंचाए। इस पीढ़ी ने भी उस वक्त के बेबी बूमर्स की सरकार ले ली। राजीव गांधी सत्ता से बेदखल हुए, सामाजिक रूप से उनसे प्रगतिशील और यथार्थवादी सोच वाली वी. पी. सिंह की सरकार भी। चंद्रशेखर भी गए। गद्दी पर बैठा एक खुर्राट ब्राह्मण राजनीतिज्ञ।

जेन वाई, मिलेनियल, जब युवा हुआ, हो रहा था, तो उसने संचार क्रांति के पंख पाए। ऑरकुट से लेकर फेसबुक और ट्विटर तक का निवासी हुआ। इसने जेन एक्स और बेबी बूमर्स पीढ़ी का उत्पात देखा था, उनकी फसलें इसके हिस्से थीं। गुजरात था, ओपन मार्केट था, बदलती दुनिया थी, एक मायालोक भी अब उसकी पॉकेट में था, या साइबर कैफे में, जो उसके पहले की पीढ़ी के लिए मायापुरी और मस्तराम की फुटपाथी उपलब्धता तक सीमित हुआ करता था। इस पीढ़ी के ख्वाब सिलिकॉन वैली में पलने शुरू हुए। हेमा मालिनी, रेखा, मंदाकिनी, बिपाशा से भी आगे उनके सपने थे—ब्रिटनी स्पीयर्स से लेकर शकीरा और माइकल जैक्सन तक। इसने 2012 का आंदोलन देखा, किया। इसी ने शाहीन बाग का आंदोलन भी किया, जो सौ सालों का सबसे बड़ा नागरिकता आंदोलन था। सरकार बदलकर जो इस पीढ़ी ने लाई, वह नरेंद्र मोदी की सरकार थी। शाहीन बाग आंदोलन से इसकी ही लाई सरकार और उन्मादी हुई, तो अपने सीएए-एनआरसी प्रोजेक्ट को रोक भी दिया/धीमा भी किया। इस पीढ़ी ने अपनी पूर्ववर्ती विरासत को भी बढ़ाया। और सांप्रदायिक हुई। पिछली पीढ़ी ने बाबरी मस्जिद तोड़ी, तो इस पीढ़ी ने राम मंदिर बनवाया। इसी पीढ़ी ने मणिपुर की त्रासदी झेली, तो उसे वीभत्स बनाने में शामिल भी हुई।

यह भी कोई मोनोलिथ कैटेगरी नहीं थी। इस पीढ़ी के दौर में आजादी और संविधान 60 साल से 70 साल की ओर बढ़े। सत्ता में और अन्य स्पेस में बंटवारे हुए। इसमें से एक बड़ा वर्ग अन्ना आंदोलन को लेकर सशंकित था, उसके साथ नहीं था। उसे दिख रहा था कि भ्रष्टाचार के दायरे से कैसे अकूत संपत्ति अर्जित किए धार्मिक संस्थानों को बाहर रखा जा रहा है या आंदोलनकारी अपने एनजीओ, अपनी संस्थाओं को बाहर रख रहे हैं। इस समूह को 70 साल की आजादी और संविधान का हासिल मिल रहा था। वह देख रहा था कि इन्हें संभव करने वाले नेता जंतर-मंतर पर सबसे ज्यादा टारगेट हो रहे हैं, गालियां खा रहे हैं।

उसके बाद का यह जेन जी आंदोलन, जो अपने पूर्ववर्तियों से ज्यादा नेटिजन है। उसका ठिकाना अब इंस्टाग्राम से लेकर अलग-अलग सोशल मीडिया साइटें हैं। अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों, खासकर 2012 और 2020 के आंदोलनों से ज्यादा प्रसार की सहूलियत थी। शाहीन बाग के रचनात्मक पोस्टर हों, नारे हों या अन्ना आंदोलन में दी जा रही गालियां—नारे ग्लोबल होने में वक्त लेते थे, फिर भी। इस बार उनमें पंख लगे थे। यह आंदोलन इंस्टा और यूट्यूब के बूम से पोषित रहा। लेकिन क्या मोनोलिथ और जाति-धर्म से ऊपर एकदम पवित्र? क्या गालियां देते युवा इस वक्त के लिए भी कोई अजूबा थे? पड़ोसी मुल्क में शेख हसीना के ब्रा, बिकनी से खेलते जेन ज़ेड उसके आदर्श नहीं थे। मेलोनी यूं ही भाभी हुई क्या? और क्या वह जेन वाई की ईजाद ‘सविता भाभी’ की कल्पना को जेन ज़ेड के लिए नहीं उकसाती है? क्या ‘जो बीबी को पे…’ वह ‘देश को पे…’ जैसे जुमले निर्वात से आए थे? और क्या वे उनसे भिन्न थे, जो पिछले 12 सालों से सत्ता-विरोधी लोगों को मिल रहे हैं, उन हैंडल्स से, जिन्हें आदरणीय प्रधानमंत्री भी फॉलो करते देखे गए हैं? क्या इस पीढ़ी के युवा धार्मिक स्थलों के पास सांप्रदायिक गानों पर नाच नहीं रहे? क्या इसी पीढ़ी के युवा ‘भाभी की ढोढ़ी’ पर नहीं फिसल रहे?


सवाल है कि क्या इस आंदोलन के वायरल रील ही यथार्थ हैं या पैलेट गन और कील लगी लाठियां भी, क्या इसके पूर्व की पीढ़ी का इनके प्रति उन्मादी रुमानियत ही यथार्थ है, और क्या अभिजीत का दलित होना और उसी रूप में उनका सार्वभौम नेता होना स्वीकार्य है?


भाग दो : जेन Z के प्रति रुमानियत और भय

“डी. राजा और सीताराम येचुरी की जितना हमारा पार्टी नेतृत्व सुनता है, उतना हम कांग्रेसियों का नहीं।”
— जयराम रमेश, स्त्रीकाल और द मार्जिनलाइज़्ड पब्लिकेशन के एक कार्यक्रम में।
“मैं उपवास नहीं करता, मैं भूखा रहा हूँ, मैंने भूख से संघर्ष किया है।”
— डी. राजा, सीपीआई महासचिव, लेखक के साथ एक लंबे इंटरव्यू में।
“उस अनशन में कुछ भी महान या उदात्त नहीं था। वह एक घृणित और निकृष्ट कार्य था। वह अनशन अछूतों के हित में नहीं, बल्कि उनके विरुद्ध था। वह असहाय लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार छोड़ने के लिए विवश करने का सबसे निकृष्ट प्रकार का दबाव था।”
— बाबा साहेब, 1932 के महात्मा गांधी के अनशन पर, अपनी किताब व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स में।
जयराम रमेश और के. सी. वेणुगोपाल ही आज कांग्रेस के मुख्य नेतृत्व हैं। वे राहुल गांधी को शेप करते रहे हैं और उनके रुख के लिए नैरेटिव पैदा करते रहे हैं। जयराम रमेश का उपरोक्त कथन 2021 में कांस्टीट्यूशन क्लब में दिए गए भाषण का हिस्सा है। तब राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय की पिच पर बैटिंग नहीं शुरू की थी। वे सॉफ्ट हिंदुत्व के पैरोकार थे।
अभिजीत दीपके ने जब इंस्टाग्राम पर सीजेपी की शुरुआत की, तो पहले कुछ घंटों में, बल्कि लगभग एक दिन तक, उनका बांग्लादेश और नेपाल के जेन Z अभियान की तरह स्वागत हुआ। मेरे एल्गोरिद्म का कांग्रेस इकोसिस्टम भी उत्साहित था और वे लोग भी, जो 2024 में निर्णायक जीत से चूकने के बाद कोई और संघर्ष की धुरी खोज रहे थे; जेन Z जिनके सपनों में पल रहा था; और वे भी, जो आंदोलनों को एक प्रक्रियात्मक विकास और द्वंद्व के ज़रिये देखते हैं।

दूसरे दिन तक वह एल्गोरिद्म बदल गया था। उसमें से कांग्रेस समर्थक समूह शंकाओं से भर गए थे। इस वक्त तक दीपके की जाति और आम आदमी पार्टी से उनका पुराना रिश्ता, दोनों सामने आ चुके थे। कांग्रेसी तंत्र ने इसे एक तार्किकता देते हुए अन्ना आंदोलन से धोखे की बात भी कहनी शुरू कर दी थी, इसलिए सावधान रहने की चेतावनी भी।
सीजेपी ने NEET लीक को मुद्दा बनाया, तो राहुल गांधी का राजस्थान में कार्यक्रम NEET स्टूडेंट्स के बीच बना। यद्यपि उनके युवा संगठन इसके पहले से ही आने वाले चुनावों से गुजरने वाले राज्यों में आंदोलन कर रहे थे। सीजेपी इस बीच पैदा हुआ और सक्रिय होने लगा। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को ऑनलाइन पुश करता रहा और राहुल गांधी इस बीच विदेश चले गए या सीन से गायब हो गए। उनका अगला कार्यक्रम एक महीने बाद पटना में निर्धारित हुआ।

मैंने अपने एक लाइव इंटरव्यू में उनके विदेश यात्राओं के मैनेजर और ओवरसीज़ कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा से पूछा था कि ठीक चुनाव के वक्त आप राहुल गांधी के विदेश दौरे क्यों तय करते हैं? उनका उत्तर संतोषजनक नहीं था।
अभिजीत दीपके का आंदोलन जंतर-मंतर पर शुरू हुआ और उन्हें सोनम वांगचुक का साथ मिला और शुरू से लेफ्ट पार्टियों का भी। पोस्ट ट्रुथ नैरेटिव की रचना इस हद तक प्रभावी थी कि इस जेन Y के मुख्य नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन जेन Z की संभावनाओं को उकसा रहा था, तो दूसरी ओर कांग्रेसी और अन्य तबकों को अन्ना आंदोलन का भय सता रहा था और केजरीवाल के नेतृत्व में एक और ‘तिकड़म’ की शंका प्रताड़ित कर रही थी। वे प्रोजेक्ट कर रहे थे कि अन्ना आंदोलन से ठगे गए हैं, अब नहीं। जबकि दोनों आंदोलनों की भिन्नता स्पष्ट थी। अन्ना आंदोलन भ्रष्टाचार से आकंठ डूबे मध्यवर्ग के नैतिक गिल्ट को सहलाने वाले भ्रष्टाचार के मुद्दे के आधार पर खड़ा था और आंदोलनकारी धार्मिक संस्थाओं में कैद अकूत संपत्ति से लेकर एनजीओ के भ्रष्टाचार को अलग करके सिर्फ़ उन नेताओं को ज़्यादा टारगेट कर रहे थे, जो कभी इस देश की ब्राह्मणवादी निरंतरता को एक झटका देने के क्रूसेडर रहे थे। वे संसद की गरिमा के खिलाफ थे। हम जैसे लोग इसलिए उसके विरोधी थे। लेकिन अतीत की गलती की ढाल के साथ लड़ रहा कांग्रेस का इकोसिस्टम अपने पोस्ट ट्रुथ को व्यापक कर रहा था और स्वयं भी इसमें घिर गया।

इस बीच दीपके-वांगचुक और नेहा बोरा सहित अनेक युवाओं का अनशन शुरू हो गया।
जयराम रमेश और के. सी. वेणुगोपाल की टीम अपनी ज़िद पर थी और उनका इकोसिस्टम उस ज़िद को ठोस यथार्थ बताने का तर्क दे रहा था। इस बीच राहुल गांधी की पटना की सभा चार दिन के लिए टली, फिर भीड़ न जुटने के डर से निरस्त हो गई। उधर जंतर-मंतर पर अनशन की निरंतरता अपना ताप पैदा कर रही थी। यह गांधीवादी पैटर्न पर यदि अनशन था, तो स्टेट के खिलाफ महात्मा गांधी के महज़ एक-दो, या थोड़ा-बहुत तीसरे (पूना पैक्ट के दौरान) आंदोलन के आईने में ही हो सकता था। अन्यथा गांधी के अनशन आत्मशुद्धि और अंतरात्मा जगाने के ही ज़्यादातर रहे हैं। स्टेट के खिलाफ किसी एक मुद्दे पर अनशनकारियों की मौत का भी इतिहास है, नेहरू काल से लेकर मोदी काल तक।
सोनम वांगचुक के अनशन से पक्ष-विपक्ष अपने-अपने तरीके से निपट रहा था कि इसी बीच राहुल गांधी विदेश से वापस आ गए। लगभग पूरा विपक्ष अभिजीत दीपके और सोनम वांगचुक के साथ था, लेकिन कांग्रेस आशंकाओं से घिरी थी, आशंकाएँ फैला रही थी। इस वक्त तक जयराम रमेश खुश होंगे कि डी. राजा का अब कांग्रेस नेतृत्व नहीं सुनता है। वेणुगोपाल और जयराम रमेश की टीम उन्हें राहुल से मिलने भी नहीं देती। येचुरी अब रहे नहीं। युवाओं पर लाठीचार्ज के बाद सोनम वांगचुक से (तब तक अस्पताल में एडमिट) विपक्ष के नेताओं ने अनशन तोड़ने की अपील की। और भी कई कारणों से उन्होंने अनशन तोड़ा, तो उन्हें शंकाओं और अफवाहों का टारगेट बनाया गया। कांग्रेस का तंत्र फ़िलहाल ऐसे अभियानों के लिए बीजेपी के बाद दूसरे नंबर पर मीडिया पावर से लैस है। शंकाओं और अफवाहों से टारगेट करने का उसका एक इतिहास रहा है। यदि उन्हीं हथियारों से परीक्षण होगा, तो नेहरू के साथ कभी खट्टे और कभी मीठे रिश्ते वाले शेख अब्दुल्ला के बारे में क्या राय बनेगी? कश्मीर घाटी के दोनों ही नेता, या ऐसे अन्य नेता, अपने कोर मुद्दे की धुरी पर होते हैं। उन्हें लोग सुविधा से क्रेडिट और डिस्क्रेडिट करते हैं। नेहरू या मोदी से रिश्तों के बनने-बिगड़ने से नेताओं की विश्वसनीयता क्यों तय होगी, और क्या इस वक्त मुद्दे और उसके ताप को भाँपने की ज़्यादा ज़रूरत नहीं थी?

इस ताप को कुछ ख़बरों के अनुसार सोनिया गांधी ने भांपा। उन्होंने सीजेपी आंदोलन से दूरी ख़त्म करने का सुझाव दिया। लेकिन जयराम रमेश और के. सी. वेणुगोपाल की टीम वाला तंत्र भला क्योंकर तैयार होता? राहुल जी का समानांतर स्टेज तैयार किया गया। यह सब 2024 के चुनाव के पहले से इस टीम का पैटर्न है। उधर आम आदमी पार्टी के नेताओं द्वारा कांग्रेस पर हमलावर टिप्पणियां , सोनम वांगचुक और दीपके का कांग्रेस की गतिवधियों के कारण पलटवार सरीखा जवाब कांग्रेस के आशंका नैरेटिव को बढ़ाने वाला ही था।

सोनम वांगचुक की अस्पताल शिफ्टिंग और संसद मार्च के साथ अभिजीत दीपके का नेतृत्व सामने आ चुका था। दीपके और उनकी टीम नई स्थितियों को बेहद परिपक्व अंदाज़ में, राजनीतिक चतुराई के साथ नेतृत्व देती दिखी। लेकिन शंकाओं की राजनीति करने वाली टीम ने उन्हें और अधिक डिस्क्रेडिट करना शुरू किया, मानो किसी गुप्त एजेंडे से लैस हो। जबकि आंदोलन अपनी प्रक्रिया से गुजर रहा था। वहाँ रील वाले थे, तो लाठियाँ खाने वाले भी; पैलेट गन भी झेल रहे थे युवा, और बिना डरे इस आंदोलन को रचनात्मकता के साथ एक उद्देश्य की ओर ले जा रहे थे। रील ही उस आंदोलन का यथार्थ नहीं है, जो एक वर्ग की जेन Z परिकल्पना को उनके पोस्ट ट्रुथ के पैमाने पर फिट सिद्ध कर रहा है।
यह आंदोलन भी पीछे के आंदोलनों की तरह कई धाराओं के लोगों का समुच्चय ही था। जैसे अन्ना आंदोलन में लेफ्ट, समाजवादी, भाजपाई, संघी, बाबा रामदेव, किरण बेदी, अनुपम खेर जैसे लोग भी थे; जैसे राजीव गांधी के खिलाफ लेफ्ट, भाजपा और जनता दल सब थे; जैसे इंदिरा गांधी के खिलाफ हर तबका था। इस आंदोलन में अलग-अलग इंटरेस्ट ग्रुप के लोग थे। राम मंदिर चोरी से दुखी भी, उसके राजनीतिकरण वाले भी; यूजीसी सर्कुलर से ख़फा सवर्ण इंटरेस्ट के लोग भी, तो यूजीसी सर्कुलर के समर्थक भी। भरत तिवारी एन्काउंटर से दुखी युवा भी तो एन्काउंटर को लेकर योगी नीति के समर्थक रहे युवा भी।
इस आंदोलन के सीजेपी वाले हिस्से का नेतृत्व शुरू में भी और अंत में भी दीपके और उनकी टीम के हाथ में रहा, जो सत्ता पक्ष और सबसे बड़े विपक्ष—दोनों के निशाने पर रहे। सीजेपी ही आंदोलन की धुरी भी थी, शेष समर्थक समूह वृत्त। इस आंदोलन ने संसदीय राजनीति के शासकों को थोड़ा भयभीत किया। ये युवा आज जंतर-मंतर पर हैं, तो कल ये या इनकी पीढ़ी का कोई और बेंगलुरु में होगा। एक टीम गई भी और वहाँ उमर खालिद के पक्ष में तख्ती लिए किसी महिला पर मुक़दमा भी हुआ, वैसे ही जैसे बीजेपी सरकारें करती हैं। फिर भी क्या दीपके का नेतृत्व यहाँ से युवाओं के एक बड़े वर्ग के लिए जाति-श्रेणी से मुक्त होने वाला है? क्या उनका आंदोलन आंबेडकरवादी है? क्या महाराष्ट्र के शहर-शहर में सीजेपी के समर्थन में आंदोलन के बावजूद, और उनमें दलित स्पेस की अच्छी भागीदारी के बावजूद, दीपके को आंबेडकरवादी समूह अपने नेता के रूप में देखेगा, देख रहा है? ये सारे सवाल अभी और व्यापक होंगे। फिलहाल तो इतना ही कि औरंगाबाद और पुणे जैसी आंबेडकरवादी वैचारिकी और आंदोलनों की भूमि में रहते हुए भी दीपके ने राजनीतिक ट्रेनिंग आम आदमी पार्टी में ली, जो बाबा साहेब से लेकर भगत सिंह तक को अपने अवसरवादी ऑप्टिक्स का प्रतीक बनाती रही है।
इस आंदोलन का एक बड़ा सन्देश लड़कियों की इसमें भागीदारी और उनका नेतृत्व है। इससे अच्छी और बुरी लड़कियों का बायनरी टूटा, लेकिन क्या पहली बार? और नेहा बोरा एवं दीपके की भागीदारी के बीच सीजेपी के आंदोलन में स्त्री नेतृत्व का क्या यथार्थ रहा? और जेन Z के बेख़ौफ़ रील बनाते समूह जेनरेशन अल्फ़ा के दौर में कहाँ होंगे?

भाग 3 : नेहा बोरा की बुरी ( baddie) साथी: राजनीति की नई धमक, नई भाषा

‘क्या पुरुष भी उन्हीं दोषों से ग्रस्त नहीं होते, जिनका आरोप स्त्रियों पर लगाया जाता है?’
— ताराबाई शिंदे
युवाओं के आंदोलन में एक ओर अभिजीत दीपके और उनकी टीम का नेतृत्व रहा, तो दूसरी ओर नेहा बोरा सहित लेफ्ट संगठनों की लड़कियों का।
किसी भी स्तर पर लड़कियाँ अपने पुरुष साथियों से अलग नहीं थीं। रील के लिए पोज़ देतीं, डायलॉग बोलतीं या दूसरी गतिविधियाँ करती लड़कियाँ भी जानती थीं कि कौन-सी भाषा हुक्मरानों को चुभेगी और कौन-सा दृश्य वायरल होगा। रील बनाती लड़कियाँ उसके आर्थिक पक्ष को भी जानती हैं, उसे हासिल करती हैं। वे जानती हैं कि वायरल होने के साथ उनके बटुए में डॉलर का अर्थशास्त्र भी जुड़ा है।
उन पर कई खेमों से हमले हो रहे हैं। दक्षिणपंथी समूह अपने कुंद दिमाग और एजेंडे के साथ तो हमलावर हैं ही, कुछ उदार सोच वाले लोग भी कम-से-कम लड़कियों की भाषा, उनके कपड़ों और उनके दृश्यों के लिए एक सीमा तय करना चाहते हैं। कुछ लड़कियाँ समाज द्वारा तय मानक की कपड़ो में नहीं थीं और ‘च’ सीरीज़ की गालियाँ भी धड़ल्ले से दे रही थीं। उन्हें ‘बुरी लड़कियाँ’ कहा जा रहा है।
इन लड़कियों ने अभी भी और इसके पहले भी अपने लिए ऐसे संबोधनों को ठेंगा दिखाया है और खुद को baddie कहकर बताया है कि बुरी होना मतलब cool, confident, intelligent और charming होना है।
जो लोग उनके लिए मानक तय कर रहे हैं या उन्हें गालियाँ दे रहे हैं, उन्हें न तो ‘च’ वर्ड सीरीज़ की गालियों में अपना उद्गार व्यक्त करती लड़कियाँ अच्छी लगती हैं, न प्रतिरोध के लिए सामने आईं डंडे खाती लड़कियाँ। उन्हें तो पढ़ती और बढ़ती लड़कियाँ भी पसंद नहीं हैं। उन्हें पसंद हैं लड़कियों को पीछे से डंडा मारते या डंडा डालते हुए राज्य और परिवार-संरक्षित मर्द। लड़कियों ने कंधे से कंधा मिलाकर डंडे भी खाए और जेल भी गईं।


ऐसा नहीं है कि खुद को गर्व से baddie कहने वाली लड़कियों से पहले की पीढ़ी ने ऐसा नहीं कहा या अपने ऐक्शन और शब्दों से ‘बुरी लड़की’ की छवि को प्यार नहीं किया। जेन ज़ेड से पहले की मिलेनियल पीढ़ी की भाजपा की बददिमाग सांसदों में से एक कंगना रनौत ने भी तो कभी ‘बुरी लड़की’ की छवि से प्यार किया। उस छवि का व्यावसायिक दोहन भी किया और अब उसका विरोध उन्हें सत्ता दिला रहा है। विरोध के नाम पर सीमा लांघकर वह सत्ता के साथ अपना स्पेस विस्तार कर रही है।
इन लड़कियों के अलावा भी लड़कियाँ थीं, हैं, उस आंदोलन में। नेहा के बारे में मैं लिख चुका हूँ। एसएफआई की आइशे घोष की गिरफ्तारी के लिए पुलिस उनके पार्टी दफ्तर तक पहुँच गई। 2019 में वे जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष बनीं। इस प्रदर्शन में उन्होंने तीन दिन का प्रतीकात्मक अनशन भी किया था। ये लड़कियाँ हर स्तर पर नेतृत्व के लिए तैयार हैं, राजनीतिक सोच और राजनीतिक शब्दावली से लैस। ये जेन Z हैं या थोड़ा पहले पैदा हुई जेन Y।
लड़कियाँ जिस वक्त दहलीज़ पार करती हैं, परम्परा द्वारा तय सीमाओं को चुनौती देती हैं, उसी वक्त वे देहमुक्ति, देह के बिंब और उस पर आरोपित टैबुओं से मुक्ति की ओर भी कदम बढ़ा देती हैं। अच्छी-बुरी के दायरे को 19वीं सदी से ही पारंपरिक और लिबरल—दोनों तरह का पितृसत्ताक तय करने की कोशिश करता रहा है, और वे हर दौर में इस फासले को संकुचित करती रही हैं। बल्कि वे बताती हैं कि तुम्हारी निर्धारित ‘बुरी’ ही वास्तव में अच्छी है—baddie है। भाजपा समर्थकों के ट्रोल को ठेंगा दिखाते हुए थोड़ी ही देर पहले राजनीतिक बाइट देती लड़कियों ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जमकर नाचा, खूब नाचा, बिना किसी भेद के लड़कियों और लड़कों के साथ।

अभिजीत घोषित तौर पर अभी किसी संगठित राजनीतिक दल से नहीं जुड़े हैं। नेहा बोरा और आइशे घोष जुड़ी हैं। वे संसदीय राजनीति के फ्रेम के भीतर हैं और सीजेपी अभी इस दायरे में नहीं आया है। सीजेपी के मंच पर भी लड़कियाँ थीं, लेकिन वे कोरम पूरा करती दिखीं। वे कम-से-कम मुझे बोलती नहीं दिखीं। जब-जब अभिजीत या दूसरे पुरुष नेता बोल रहे थे, वे उनके बगल में हर बार खड़ी दिखीं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे नेतृत्व नहीं कर सकतीं।
अब सवाल है कि आगे क्या? यह उन्हें तय करना है। राजनीति से अपने ढंग से संवाद करने और उसमें भागीदारी करने में आज की युवा पीढ़ी पीछे नहीं है और आगे भी नहीं रहेगी। इस पीढ़ी को जेन अल्फा या उससे आगे के युवाओं से भी संवाद करना है। उनकी उम्मीदों को आकार देना है या उनकी उम्मीदें उनसे टकराएँगी।
जो जंतर-मंतर पर हुआ, संघर्ष उससे बड़ा है और जाहिर है, उसके नेता और उसके भागीदार इसे समझते भी हैं। राजनीतिक, सांस्कृतिक और आकस्मिक स्पेस पर बैठे बेबी बूमर्स या जेन एक्स के तिकड़मों को वे भी देख रहे हैं। लेकिन उन पर उम्मीदों का ऐसा बोझ क्यों डाला जाए कि जो आप नहीं कर सके, ‘वैसा जेन ज़ेड अभियान ‘ आपके पोस्ट-ट्रुथ का सच बन जाए? वे उसका टूल क्यों बनें? अपनी राह वे खुद तय कर रहे हैं। उन्होंने आपको किसान आंदोलन और शाहीन बाग आंदोलन के बाद एक उम्मीद दी है। अब आप उन पर अपने संदेहों का पोस्ट-ट्रुथ रचें, उनके स्पेस को सबोटाज करने की राजनीति करें या उनके राजनीतिकरण की प्रक्रिया में वास्तव में शामिल हों—यह आपको तय करना है। हर युवा पीढ़ी का आंदोलन अपनी पिछली पीढ़ी से पुष्ट और संवर्धित होता है। और हाँ, कोई भी युवा पीढ़ी मोनोलिथ नहीं होती, होमोजीनियस नहीं होती। जंतर-मंतर के पहले एससी-एसटी आंदोलन भी एक सच था। उस वक्त भी देश भर के युवाओं ने गोलियाँ तक खाई थीं, महज़ आठ साल पहले।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

ISSN 2394-093X
418FansLike
783FollowersFollow
73,600SubscribersSubscribe

Latest Articles