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नाम अम्बेडकर विश्वविद्यालय, काम दलितों की उपेक्षा

दलित शोधार्थी गरिमा एवं रश्मि द्वारा लिखा गया

प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक छात्र समुदाय (PDSC) द्वारा किये गए प्रदर्शन के दौरान यह एक बार फिर सिद्ध हो गया कि ‘हमारी’ अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली (AUD) के खाने के दांत कुछ हैं, और दिखाने के कुछ और हैं. अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली (AUD) दिल्ली राज्य सरकार द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त एक सरकारी यूनिवर्सिटी है, जिसमे 85% सीटें दिल्ली के नागरिकों के लिए आरक्षित हैं. शुक्रवार, 24 मार्च, 2017 को अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक छात्र समुदाय (PDSC), जो कि हाशियागत समाज से आ रहे विधार्थियो का एक फ्रंट है,  ने कुलपति के दफ्तर के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया, जिसकी कई मांगें थीं, जैसे कि एमए, एमफिल तथा पीएचडी की प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र अंग्रेज़ी के साथ ही साथ कम से कम दिल्ली की अन्य राज्य स्तरीय भाषाओँ (पंजाबी, हिंदी तथा उर्दू) में भी छापे जाएँ, अंग्रेजी सुधार के लिए लैंग्वेज सेल का गठन (जोकि अभी सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित है) दो स्तरों पर किया जाए, पहला, बुनियादी अंग्रेजी भाषा को सिखाने के स्तर पर, तथा दूसरा अकादमिक अंग्रेज़ी के सुधार और सिखाने के स्तर पर, इस लैंग्वेज सेल को हर विभाग/स्कूल के स्तर पर लागू किया जाए जैसे कि हर विभाग/स्कूल के पास अपने अंग्रेजी भाषा प्रशिक्षक हों, यूनिवर्सिटी में सामाजिक विज्ञान के सभी अनुशासनों के सेमिनार इत्यादि गैर-अंग्रेज़ी भाषा में भी हों (अभी के समय में लगभग 99% लेक्चर और सेमिनार केवल अंग्रेज़ी भाषा में ही होते हैं), अनुवाद सेल का गठन किया जाए और जब तक किसी छात्र को यूनिवर्सिटी का लैंग्वेज सेल कम से कम बुनियादी अंग्रेज़ी नहीं सीखा पाता तब तक उस छात्र को उसकी भाषा में असाइनमेंट, परीक्षा, शोध-प्रबंध और थीसिस लिखने दिया जाए (अभी के लिए दिल्ली की राज्य स्तरीय भाषाओँ में: हिंदी, उर्दू तथा पंजाबी). प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक छात्र समुदाय (PDSC) ने कुछ इन्ही मांगों के साथ अपना मांग-पत्र (डिमांड चार्टर) कुलपति को एक प्रक्रियात्मक (Procedural) तरीके से 20 फ़रवरी, 2017 को भेजा था. जिसमे हमने इन सभी मुद्दों पर उनकी ठोस राय मांगी थी. इसके करीब एक महीने बाद भी उन्होंने कोई जवाब देना जरूरी नहीं समझा है.

यह प्रदर्शन हाशिए के समाज से आ रहे छात्रों की आवाज़ था, जिसकी उपेक्षा और तिरस्कार जी ने यह कह कर किया  कि “हम उनके खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे”. इसके बाद भी जब हमने उनसे मिलने का आग्रह किया तो उन्होंने यह कहकर टाल दिया कि वह केवल निर्वाचित स्टूडेंट कौसिल (Elected Student Council) से ही मिलेंगे और उनके माध्यम से ही वह इस मुद्दे पर बात करेंगे. हम कुलपति से पूछना चाहते हैं कि क्या आपको PDSC द्वारा AUD परिसर में 410 छात्रों के बीच किये गये सर्वे की रिपोर्ट दिखाई नहीं देती? क्या आपको यूनिवर्सिटी में दलित, ओबीसी और आदिवासी समुदाय का ड्राप-आउट रेट दिखाई नहीं देता? पिछले 5 सालों से कैंपस में उठ रहे भाषाई भेदभाव के मुद्दे पर छात्र आपको एम्पिरिकल (empirical) रिसर्च करके दिखा रहे हैं कि भाषा की बुनियाद पर किस तरह भेदभाव आपकी यूनिवर्सिटी में होता है, इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता? कि आप अपने कीमती समय में से कुछ समय हमको दे पाए? और आप हमारे इस मुद्दे को यह कह कर टाल दे रहें हैं कि केवल निर्वाचित स्टूडेंट कौंसिल (जोकि पिछले साल ही बनी है और खुद अपने अस्तित्व को तलाश रही है) ही इस मुद्दे को कहे.

यह वही यूनिवर्सिटी है जो हर साल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में अम्बेडकर मेमोरियल लेक्चर करवाती है. यह वही यूनिवर्सिटी है जिसने इसी साल फ़रवरी में दलित पंजाबी गायिका, गिन्नी माही का शो भी करवाया था. यह वही यूनिवर्सिटी है जहाँ दलितों, बहुजनों तथा आदिवासियों के नाम पर कलेक्टिव भी है जो खुद को यूनिवर्सिटी के दलित, बहुजन तथा आदिवासी तबके के “एकमात्र प्रतिनिधि” के बतौर पेश भी करता आया है. यह हमारे लिए बहुत ही निराशाजनक बात है कि न तो AUD का ज़्यादातर संपन्न तबका जोकि, अम्बेडकर, मार्क्स, स्पिवाक, बटलर, फूको और ऐसे ही तमाम फिलोस्फर को इस्तेमाल कर दमित अस्मिता को अपना विषय बनाकर उन पर लिखता रहा है, बतियाता रहा है, (अपनी अकादमिक और राजनीतिक दुकान चलाता रहा है), मिसाल के तौर पर, अभी हालिया दौर में CPSH में हुए इलेक्शन में भी कई उम्मीदवारों ने भाषा के मुद्दे की संवेदनशीलता को अपने चुनावी मेनिफेस्टो में पहचाना. यह एक सराहनीय बात है कि उन्होंने इसे पहचाना. लेकिन सवाल यह है कि क्यों हम और हमारा मुद्दा, मात्र चुनावी मेनिफेस्टो तक ही सीमित है? यह हमारे लिए बहुत ही हैरानी और निराशाजनक बात है कि यहाँ तक कि वह कलेक्टिव जोकि फेसबुक और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जातिगत भेदभाव पर बातें करते हैं, जातिगत भेदभाव के खिलाफ पॉलिटिक्स करते हैं, दलित, ओबीसी तथा आदिवासी समुदाय की एकता के नारे लगाते हैं उन्होंने क्यों हमारे इस मुद्दे पर हमारे साथ खड़े होना ज़रूरी नहीं समझा? सवाल यह भी है कि क्या आपकी पॉलिटिक्स का रिश्ता कैंपस के “दूसरे” दलित और बहुजन के मुद्दों से है? यह उनकी पॉलिटिक्स पर एक प्रश्नचिन्ह है या हम जैसे दलित-ओबीसी छात्रों के सामाजिक-आर्थिक अस्तित्व पर एक प्रश्नचिन्ह? या फिर यह विचारधाराओं के संघर्ष में एक नए तरह का जातिगत और जातियों के भीतर ही एक आर्थिक भेदभाव है?

तो अंतत: साथियों ‘हमारी’ अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में अम्बेडकर के बारे में अकादमिक चर्चाएँ और अम्बेडकर को ज़रूर याद किया जाएगा लेकिन सिर्फ और सिर्फ अंग्रेज़ी में. अम्बेडकर की एक बड़ी तस्वीर कुलपति जी के दफ्तर में और यूनिवर्सिटी में ज़रूर लगेगी लेकिन दलित, ओबीसी, आदिवासी और गरीब-वंचित समुदाय के लोग कैंपस तक आ पायेंगे, यहाँ सर्वाइव कर पायेंगे यह मुद्दा नहीं है. अगर आ भी जायेंगे तो उनको अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के कारण ग्रेड कम मिले, उनको रिपीट करना पड़े या वह यह यूनिवर्सिटी छोड़ कर चले जाएँ इन सब मुद्दों से उन्हें कोई वास्ता नहीं. क्योंकि बाबा साहेब “जिन्दा” हैं, कुलपति की यूनिवर्सिटी की तस्वीरों में कुलपति  की यूनिवर्सिटी की अंग्रेजीवादी अकादमिक चर्चाओं में. बाकी जिन समुदाय के उत्थान के लिए बाबा साहेब ने संघर्ष चलाया उस समुदाय के लोग इस कैंपस में ‘जिंदा’ हैं इससे कुलपति का कोई नाता नहीं. जिन समुदायों को बाबा साहेब ने शिक्षित हो, संघर्ष करो, संगठित हो का नारा दिया था, उनके शिक्षित होने, संघर्ष करने और संगठित होकर कुलपति से मिलने पर कुलपति का इगोइस्टिक ब्राह्मणवादी रवैया कहता है कि “मैं सिर्फ निर्वाचित ‘स्टूडेंट कौंसिल’ से मिलूंगा”. तो साथियों, ‘हमारी’ यूनिवर्सिटी मानती है कि जातिगत भेदभाव होता है लेकिन केवल ‘हमारी’ अम्बेडकर यूनिवर्सिटी के ‘बाहर’ इसलिए ‘जागरूकता’ फैलाना ज़रूरी है लेकिन केवल यूनिवर्सिटी के ‘बाहर’. इसीलिए ही दलित पंजाबी गायिका गिन्नी माही जी का शो कराया जाता है, हर साल अम्बेडकर मेमोरियल लेक्चर कराया जाता है.

नोट: सुझाव तथा राय के लिए हमे नीचे लिखी ईमेल आईडी पर सम्पर्क कर सकते हैं. garima.16@stu.aud.ac.in, rbala.16@stu.aud.ac.in

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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अखिलेश्वर पांडेय की कविताएं

अखिलेश्वर पांडेय

‘पानी उदास है’ कविता संग्रह प्रकाशित.एनएफआई का फेलोशिप और नेशनल मीडिया अवार्ड., प्रभात खबर में कार्यरत. संपर्क:apandey833@gmail.com
मोबाइल : 8102397081

पतरा


परदेस जाने से पहले
गांव में अब दिखाते हैं पतरा
दिशाशूल का भरम मिटाने को
पंडित जी की सलाह जरूरी है
पतरा में सब लिखा होता है
कब होगी बारिश
कब डालना है खेत में बीज
कब होगा दुल्हन का गवना
मुनिया के स्कूल जाने का सु-दिन
पेट का अजन्मा बेटा है या बेटी
110 वर्षीय दद्दा के मरने का दिन भी

गाय का पहला दूध
खेत का पहला अन्न
बेटे की पहली कमाई का दशांश
दे आता है यजमान घर पर
पुरोहित जी उचारते हैं भविष्य
बांचते हैं हस्तरेखा
बताते हैं –
यह साल अच्छा नहीं तुम्हारा
हर शनिवार पीपल में जल दो
जलाओ घी का दीया
करो हनुमत आराधना
पहनो लाल वस्त्र
तब मिलेगी क्लेश से मुक्ति

यह सब सुन
चकरा गया
भकोलवा का दिमाग
बोल पड़ा –
सब हमही करेंगे तो
आप का करियेगा…?

मेरे गांव में


हौंसले की झाड़ू से दुख बुहारती है मां
मुश्किलों की मोतियाबिंद से
कमजोर हो गयी हैं आंखे उसकी
फिर भी –
भूत-भविष्य-वर्तमान
बहुत साफ-साफ दिखता है उसे!

बचपन की भौजाइयां
असमय बूढ़ी हो गयी हैं
जिम्मेवारियों की बोझ ने
छिन ली है उनकी खूबसूरती
हंसी-मजाक की जगह ले ली है
नाती-पोतों ने!

शाम होते ही कई घरों से
छनकर आने लगी टीवी की आवाज
स्टार प्लस देख रहे बच्चे और बूढ़े
कैडबरी और मैनफोर्स का विज्ञापन आते ही
छोटी बहू ने बदल दिया चैनल
अब शाहरुख के आगे नाच रही सन्नी लियोनी
गा रही गाना –
लैला ओ लैला!

लल्लन बाबू का छोटका स्साला
गबरू जवान हो गया है
छेड़ता है लड़कियों को राह चलते
मैंने पूछा उससे
क्यूं भई! क्या चल रहा है
बोला-
पुलिस में जाने की तैयारी कर रहा हूं!

पढ़ा था जिस जर्जर स्कूल में मैं
अब वह आलीशान बन गया है
कई कमरे, रंग रोगन, चारदिवारी
सबकुछ एकदम चकाचक
बस
मास्साब की जगह बच्चों ने ले ली है
अब बच्चे ही पढ़ाते हैं बच्चों को!

आम का लंगड़ा पेड़
अब भी खड़ा है यूं ही तन कर
इस बार आये हैं खूब मंजर
रामदीन काका कह रहे थे-
अब भी वैसी है मिठास उसमें
तो फिर
आसपास के बाकी पेड़ कहां गये!

चिड़िया



चिड़िया हरती है
आकाश का दुख
उसके आंगन में चहचहाकर
भर देती है संगीत
सूने मन में

बादलों को चूमकर
हर लेती है सूरज का ताप
बारिश होने पर
तृप्त होती है चिड़िया

सुस्त पड़ते ही सूरज के
लौट आती है घोसले में
चोंच में दाने भरकर
खिलाती है बच्चों को
सिखाती है बहेलियों से बचने का हूनर
पढ़ाती है सबक
पंख से ज्यादा जरूरी है हौसला

चिड़िया प्रेम करती है पेड़-पौधों से
करती है प्रार्थना – न हो कभी दावानल
सलामत रहे जंगल
बचा रहे उसका मायका
वह जानती है
उड़ान चाहे जितनी लंबी हो
लौटना पेड़ पर ही है
इसका बचे रहना जरूरी है
मां-बाप की तरह.

अकारण


धूप की चौहद्दी नहीं देखी जाती
हवा का रास्ता नहीं पूछा जाता
कोई आ जाये जो घर पर बेवक्त
तो कारण नहीं पूछते
मौत दे दे दस्तक अचानक
तो वक्त नहीं पूछते उससे
बच्चों की खिलखिलाहट का रहस्य
क्यों पूछना भला!
कैसे जाना जा सकता है
फूलों का रंग रहस्य
भात के अदहन का तापमान
थर्मामीटर से नापता है कोई भला!

यह द्वापर नहीं
कलियुग है साहब!
निशाना साधिये
मछली की आंख मत देखिये
प्रेम में ऊंच-नीच
राजनीति में सही-गलत
इस सब चक्कर में
क्यों पड़ते हैं…?

छोटे कपड़े पहनने वालों का कद भी
बड़ा होता है
बड़ी-बड़ी बातें छोटे लोग भी कर सकते हैं
उम्र, अनुभव और उपलब्धियों का
लेखा-जोखा रखना फिजूल है.

औरत होना कला है


महावर से छुपाना बिवाई
सस्ता सा पाउडर पोतकर
ढंक लेना आंखो के नीचे का कालापन
चलताऊ किस्म के क्रीम से
बचाना गालों की लाली
यह सब उपक्रम आसान नहीं
ना ही आसान है औरत होना

रोपित इच्छाओं की पेड़ की तरह
करते रहना फल-फूल की बारिश
जरूरतमंद घरवालों को देते रहना
ससमय
मुस्कान व खुशियों का तोहफा
क्या इतना आसान है!

हां है आसान
एक औरत के लिए
यह सब सहज और सरल भी
क्योंकि
यह सब नहीं करता पुरुष
इसलिए करना ही पड़ता है
हर औरत को
इसलिए आसान है

अहिल्या, सीता, राधा, रुक्मिणी
मेनका, रंभा से लेकर देविकारानी से आलिया तक
इतने रुपों में भी
कहां पहचान पाया कोई पुरुष उसे
मां ,बेटी, बहन, दोस्त, प्रेमिका और पत्नी तक
कितने कम नाम और पद हैं इस दुनिया में औरत के लिए
पर जिम्मेवारियां कम नहीं!

रुदाली से रुपाली तक
हर भूमिका में फिट है वह
हर मोरचे पर डटी है
दीपमाला में जलती
शोरूम के काउंटर पर मुस्कराती
अबोध बच्चे को कराती स्तनपान
गांव पोखर में नहाती
खेतों में गेहूं की बालियां समेटती
किचेन में सोंधी रोटी बनाती हुई
हर जगह…

औरत  होना अभिशाप नहीं
एक कला है
यह जान जाती है हर लड़की
पैदा होते ही.

ऐसी जगह

तुम्हारे छतनार जुड़े में टंकना चाहता हूं
टहकार पलास का ऐसा फूल
जो मुरझाये नहीं कभी
हमारे प्यार की तरह
महुए सी मादक तुम्हारी आंखों में
लगाना चाहता हूं रात का काजल
मैं तुमसे प्यार करना चाहता हूं उतना
जितना नदी मछली से करती है
हवा खूशबू से
ओस दूब से
और
भूख अन्न से

चिड़िया की बची हुई नींद
घड़ी से थोड़ा सा ज्यादा वक्त
बारिश से उसका सूखापन
और
राख से नमी मांग कर
निकल पड़ेंगे हम सैर पर
एक ऐसी दुनिया में
जहां
जिया जा सके अपनी शर्त पर
आदर्श या आडंबर के बिना
शहरी बनने की ढोंग किये बगैर
बिना छिपाये अपना गंवईपन
जहां सूरज के निकलने की शर्त
पूरब न हो
ना हो चांद के होने की शर्त
आसमान
देवता मंदिर के बाहर भी
बिराजते हों
ऐसी जगह चलेंगे हम
जहां रोशनी को अंधेरा मिटाने का
गुमान न हो
न फूलने-फलने पर इतराते हों पेड़
जहां गेहूं और गुलाब की खेतें
ना हों अलग-अलग
ऐसी जगह ढूंढेंगे हम

फिर देखना तुम
तब डरेगा नहीं कोई प्रेमी
ताकतवर मुस्कानों से
बीज अंकुरित होंगे
बिना प्रार्थना के
प्रेमियों को नहीं करना होगा
बसंत का इंतजार
लगानी नहीं पड़ेगी ‘प्रेम दिवस’ की होर्डिंग्स
खत्म हो चुका होगा भय का कारोबार.

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विमर्श की ज़रुरत कहाँ

स्त्री की दशा को लेकर कई सारे व्याख्यान आयोजित होते हैं लगातार बहसें चल रही हैं पर ये बहसें कहाँ चल रही इसको देखना बहुत महत्वपूर्ण है ।ये सारी बहसें उच्च शिक्षण संस्थाओं तक ही सिमित हैं जहाँ पहले ही से एक बौद्धिक वर्ग बैठा है और बार बार हर बार उन्हीं विषयों की पुनरावृत्ति होती है ताली बजती लोग चाय पीते हैं और चले जाते हैं . अब ज़रा ध्यान से सोचिये उच्च शिक्षा में जो भी पहुंचता है वह लगभग 21 तक की आयु का हो जाता है फिर इन सब को समझने में उसे लगभग 5 साल निकल जाते हैं मतलब 25 साल मान लीजिए इन 25 साल वो अपने बचपन के उन मूल्य और धारणाओं में बंध चुका होता है जिन मूल्यों का स्त्री चिंतन से टकराव रहता है तो उसके लिए अपने को परिवर्तित करना बहुत कठिन हो जाता हो वो चाहे लड़का हो लडक़ी हो या थर्ड जेंडर हो अब अगर मैं उच्च शिक्षा तक ना पहुँचता तो शायद यहाँ थर्ड जेंडर ना लिखता .पितृसत्ता ,सामजिक गढ़न आदि शब्द उच्च शिक्षा में आकर ही सुना और समझा जाता है अगर आप बहुत प्रसिद्ध विश्वविद्यालय को छोड़ दें तो कहीं भी जाकर अगर पूछेंगे कि पितृसत्ता का अर्थ क्या है शायद ही कोई बता पाय गाँवो में तो बिल्कुल नहीं इसलिए मेरा मानना ये है कि क्यों ना इन विमर्शों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ दिया जाय अगर ऐसा होता है तो बचपन से इंसान काफी हद तक इन बातों से परिचित रहेगा और उसी अनुसार अपना व्यवहार करेगा ।

आज  हम बाजारवाद की कितनी भी आलोचना कर लें किंतु एक कटु सत्य यह भी है की उसी बाजार ने हम लोंगो की जीवन शैली पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया है उसी बाज़ारवाद में बचपन फल फूल रहा है कैसा बचपन जिसमें शीला ,मुन्नि और भी कितने ऐसे लड़कियों के नाम है जो प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों रूप से बचपन के उस कोमल दिमाग में ऐसा बीजा रोपण कर रहे हैं जो महिलाओं के प्रति एक नकारात्मकता को जन्म दे रहा है जो बड़ा होकर किसी ना किसी रूप में एक मनोविकार को जन्म दे रहा है इसलिये जब उस व्यवस्था से लड़ना है तो बीज को ही ऐसा पानी दिया जाय तो पौधा अपने आप ही बढ़िया निकलेगा और वो भी  स्वाभाविक ढंग से  उच्च शिक्षा  में आकर व्याख्यान ,कार्यशाला आदि महज़ औपचारिकता रह जाते है कोई परिवर्तन नहीं उन कस्बों में उन गाँवों में विमर्श की ज़रुरत है जहाँ ज्ञान सृजन की परंपरा में ही वो स्थापित है जिसमे कई सपने बनने से पहले ही टूट रहे हैं.

क्योंकि कोई भी हो उसके जीवन में ज्ञान अर्जन करने की प्रक्रिया , ज्ञान का संचयन करने का बहुत असर पड़ता है अगर बचपन से उसको इस प्रकार से ढाला जाय कि उसे जेंडर की समझ हो जाय तो उसकी मानसिकता उसी तरह विकसित होगी जिस विकसित मानसिकता की बात उच्च शिक्षा में की जाती है इंसान को इस बात का पता रहेगा तो निश्चित रूप से वो जागरूक रहेगा भी  आज जहाँ लोग घर जाते ही मम्मी चाय ले आओ ,भाभी कपड़े धो दो जैसे आदेशात्मक शब्दों का प्रयोग बड़े सहज ढंग से करते हैं अगर बचपन से वो इन सब बातों को जान जाएगा तो शायद वह ये सारी बातें नहीं बोलेगा इसलिए मुझे लगता है ऐसे चिंतन प्राथमिक शिक्षा में होने चाहिए .प्राथमिक शिक्षा में उसके जानने की तीव्र इच्छा होती है वह अगल  बगल के माहौल को बहुत तेज़ी से ग्रहण करता है हर बात को बड़े ध्यान से सुनने व् समझने की कोशिश करता है वहीँ से व्यक्ति में धारणाएं बनना प्रारंभ होती वहीँ से वो दुनिया को समझने का प्रयास करता है वो ऐसी बातें जब शिक्षा के माध्यम से जल्दी से सीख लेगा और किशोर होते होते इन सब बातों को आत्मसात करने लगेगा छोटी छोटी ऐसी कहानियाँ ऐसे खेल जो समानता को बढ़ावा देते हैं ,को प्राथमिक शिक्षा में लागू करें मेरे विचारों से बहुत कारगर होंग जब बचपन से किसी को भी यह सुना जायेगा कि लड़कियों की तरह क्यों रो रहे हो ,लड़की पराया धन होती है ये सारी बातें छोटे से दिमाग में जम जाती हैं अगर इसकी जगह अपनी प्यारी सी संतान को ये सिखाया जाय की हर वो इंसान जो मेहनत करेगा परिश्रम करता है परिस्थितियों से लड़ता है वो मजबूत होगा इसमें किसी जेंडर का ज़िम्मेदारी ज़रूरी नहीं है तो इंसान की समझ पहले से ही काफी परिपक्व हो जायेगी हाँ इस बात का ध्यान रखना आवश्यक होना चाहिए कि एक बच्चे के अनुसार किसी नाटक के माध्यम से किसी छोटी फिल्म के माध्यम से किसी छोटे से खेल के माध्यम से खेल खेल में बच्चा बहुत बड़ी बातें प्यार और आराम से सीख लेगा और खासकर गाँवो में जहाँ बहुत ज़रुरत है  कस्बों में  जहाँ  लोगों को जागरूक करने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है धीरे धीरे जागरूकता का अभियान चलाया जाना चाहिए चितंन के स्थान और उसके स्तर को व्यापक करने की आवश्यक है तभी सामजिक परिवर्तन की गति तेज़ हो पायेगी।


 तभी उस समानता वाले समाज की प्रक्रिया आगे बढ़ पायेगी जिसका सपना वातानुकूलित कमरों में बैठे बुद्धजीवी देख रहे हैं

दक्षम द्विवेदी
शोधार्थी  म गा अ हि वि वि वर्धा
संपर्क -mphilldaksham500 gmail.com

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है मुझको जमशेद तेरे जाम से भी काम…..!!

प्रो.परिमळा अंबेकर

विभागाध्यक्ष , हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और. परिमला आंबेकर मूलतः आलोचक हैं.  हिन्दी में कहानियाँ  अभी हाल से ही लिखना शुरू किया है. संपर्क:09480226677



औरतों का मन और उसकी मानसिकता को भला कौन नहीं जानता…? घर बैठे हर ज्ञान का हर विज्ञानी व्यवस्था का हर तंत्रज्ञान के परिणामों एवं अंजामों का रिप्लिका ढूंढ निकाल लेती है वह। उसका अपना घर ,उसका अपना आंगन उसका अपना घर के पीछे का गत्ता बस उसके लिये काफी है विश्व के प्रतिरूप को गढने के लिये। आज के दौर में फेसबुक, एक मैजिक दंड है जो औरत के हाथ लगा है। किसी की मेहरबानी ही नही, किसी की कृपादृष्टि ना भी तो सही, जी हुजूरी भी नहीं, डर भी नहीं, बस जामे जमशेद का करामत, कि बटन के दबने की देरी…टच स्क्रीन पर देखते जाओ, पढते जाओ, लाइक करते जाओ, दुनिया भर की बातें कहते जाओ, लिखते जाओ अपनी अंतरग की कथाएं …प्रंसगें..तूल चूल की बातें …!! घटनाएं, प्रसंग, होनी अनहोनी खोजी खबरी बातें, घर के दिये से लेकर दिल्ली तक की बातें !! भाई बंध की अवाम की बातें, जिल्लत प्रेम की रोमियो-जूलियट टाइप की बातें, भय और विश्वास की सुधिजनों की बातें, लौकिक अलौकिकता की आध्यात्मिक बातें …मन के परतों में छिपी जलीयता की सृजनात्मक कलम की बातें,बुद्धि के कोहों में लगे जमे विचारों की बत्तियों के जलने की बातें, अंतरंगता की लडियों के रेशों को बाहरी जीवन तरंग के रंगों में रंगने की रंगरेजों की बातें…!!


सोने पर सुहागा, उठते बैठते सोते-जागते,बतियाते मुस्कुराते हुवे याने हर पोज़ में फोटो को अपने वाॅल पर चिपकाते जाइए। औरत के अनेक रूपों में फेसबुकी रूप का अलग ही वर्चस्व और अलग ही अंदाज है। हर क्षण हर विचार और हर घटना प्रसंग को फेसबुक के वाल की आँखों से देखने वाली औरत, चित्रों को उसी अंदाज में चुनती है जिस अंदाज में अपने बया की सिलायी के लिये दर्जी पक्षी तिनको को चुगता है । दर्जी पक्षी का बया, उसके अंदाजो हिस्से से खुलता है और बंद भी होता है। कारण औरत का फेसबुकी वाल भी उसके हिसाब से संकोच को ओढती है और ओढी संकुचितता को खोलते जाती है ।

 मेरे मुताबिक आदम से भी हव्वा अधिक सोशल है । यानि उसके अंतर्रमन की परतों की गहरायी में जल का लरजना जितना अदृश्य और अध्वनित है, बाह्य जगत के साथ का उसका संबंध , संबंधो की टहनियां ,उन टहनियों में उगे फुनगियों की लाली और हरियाली उतनी ही साक्ष्य है स्फुरित हैं। वह अपने हर भाव और संवेदना की दुनिया को, बाहरी जगत् के रेशों की बुनावट को अपनाते जाती है। अपने सजने संवरने से लेकर , व्यवहार और विचार तक में समाज की प्रतिक्रिया को अत्यंत ही तल्खी के साथ गुनते जाती है और उतनी ही शिद्दत से बाह्य समाज की रंगों अंदाज को अनुभव भी करते जाती है। इसीलिए दुनियादारी या दुनिया के अहसास के कैनवास के कंटेक्सट में औरत मर्द से भी अधिक , अपने केा उकेरते जाती है, स्वयं को ढालते जाती है। इसीलिए श्रंगार के प्रसाधन हो या रंगबिरंगी साजो सामान सभी को औरत अपने मानदंड से चुनती है,अपने लिए, अपनी तुष्टि के लिए, न कि मर्दवादी समाज के निर्णयों के आग्रह से। दुनिया की नजर से अपनी आत्मतुष्टि का परंपरागत हव्वायी स्वभाव फेसबुकी वाल पर अपने को जाहिर करने के इंटरनेट के प्रस्ताव को तपाक से स्वीकारने में औरत को मदत कर रहा है।

जितनी तीव्रता से औरत अपने सौन्दर्य और सौन्दर्यबोध की आत्मतुष्टि की अपेक्षा रखती है उतनी ही उसकी चेतना उसके विचार और संवेदना के लिए समाज द्वारा दिये जाने वाले लाइक के प्रति केन्द्रित होती है। प्रकाशन विचारों का या भावों का या बोधों का जो आत्मिक हो या दैहिक, सृजनात्मकता का आखिरी और अनिवार्य पडाव है । हर कला, जिस तरह कलाकार के रचनात्मक बोध से बाहर पडते जाता है उतनी सहजता से रचनाकार भी उस कला के रूप का बाह्य प्रकाशन चाहता है। समाज द्वारा उसकी पहचान चाहता है। प्रकाशन की खुशी अद्भुत होती है, मन के कोने का बडी ही आत्मीयता से सहेजने वाला बोध, एक अदृश्य विश्वास से भेदने वाला बोध, अपनी अस्मिता की पहचान की अद्वितीय आनंद से उद्बोधित कर देनेवाला बोध। बस लाइक् का एक क्लिक , और उसमें भी अपेक्षित या अनपेक्षित उंगलियों से क्लिक किया गया लाइक … । फेसबुक पर का यह सृजनात्मक या कलात्मक अभिव्यक्ति से औरत को मिलने वाला लाइक, जामे जमशेद नही तो और क्या है ?


फेसबुक का माध्यम औरत के लिए जितना घर के आंगन में रंगोली काढने जितना सरल है और सहज भी है लेकिन आंगन में कढे रंगोली का स्पर्श नहीं दे पाता  वह सत्य का आभास मात्र है। आभासी दुनिया की अपनी सीमाएं और बंदिशें इस लोक के साथ भी जुडे हुए हैं । लेकिन समाज में जहां मनुष्य रहते हैं, जिनमें आपसी संपर्क के रूप में जब इंटरनेट का माध्यम जबरदस्त माध्यम के रूप में स्थायी रूप में स्थापित हो रहा हो, वहां आभास के भास होनें में समय नहीं लगेगा। झूठ माने जाने वाली प्रक्रिया धीरे -धीरे सच में बदलने के सोशल प्रोसेस में ढलते हुवे स्थापित हो जाती है। इसीलिए आज इस आभासी दुनिया के सोसियलाइजेशन में औरत अपनी अस्मिता के अनेक आयामों को तलाश रही है । टीन ऐज से लेकर वृद्धा तक अपनी जिजिविषा के लौ में फेसबुक वाल पर अपना हस्ताक्षर दर्ज कर रही है । परिवार से लेकर समाज, समाज से लेकर संस्कृति, संस्कृति से लेकर राजनीति, राजनीति से लेकर धर्म, शिक्षा विज्ञान चिंतन विमर्श माध्यम जैसे अनेक डोमेन में आज औरत ने अपनी अलग अंगीठी सुलगा कर रक्खी है। औरत का बोल्ड और सुलझा हुआ व्यक्तित्व , सोच और विमर्श का गंभीरता और निर्णयों का ठहराव और ठोसपन से लेकर कलात्मकता और सृजन की बारीक नक्काशियों को भी उकेरने की कला उसके ई- लेखन में जाहिर हो रहा है ।

  केवल दिवार ही नहीं है सामने या सिर्फ लाइक बटोरने का झोला ही नहीं, साथ ही उसके हाथ दमदार हथियार भी लगे हैं। अनचाहे विचार या व्यक्ति को उसकी मानसिकता एवं भावों को, ना की तर्जनी दिखाने की संभावना और साथ ही अनसुलझे असामाजिक तत्वों को पूरी तरह ब्लाक कर अपना स्वतंत्र सोच और वैचारिक स्वछंदता केा स्टैंड करने की। आरंभ की दुविधाएं और असहजताएं मिटकर एक आरोग्यपूर्ण अभिव्यक्ति माध्यम के रूप में वह ई-जाल को प्रयोग में जब ला रही है तब विसंगतियां और अश्लीलता अपने आप झडकर शुद्ध निर्मल जल ऐसा जाम में भरते जा रहा हैकि उसमें अपना मुख स्वयं देखे और दिखाये ।

औरत के लिये सोशल मीडिया  हाथ की दूरी पर हथेली में समा जानेवाली सहज और सरल अभिव्यक्ति की मीडिया है, जो हंडी की उबाल मात्र से दाल और चावल के पकने या न पकने का अहसास जरूर देता है। कुकर की सीटी के प्रेशर की तरह भावनाओं की तीव्रता और उसके विरेचना के सुख का अहसास भी उसके लिए एक तरह का साइकोलाजिकल सूदिंग ही समझिए। यह तो सर्वविदित समाजिक दर्शन है कि मनुष्य उसी जमीन और जगह में जडे जमा सकता है या बडी  सहजता से मुक्ति का श्वास ले सकता है जहा, यानी जिस परिसर में उसकी पहचान हो या उसकी अपनी आइडेंटिटी हो। आज के दौर में औरत को चाहे इस दायरे की सीमा कुछ भी क्यों न हो, सोशल मीडिया एक ढंग से उसकी अस्मिता को पाने हेतु सृजनात्मकता के आनंद का स्पेस प्रदान कर रहा है।
लेख, कथा, रिपेार्ट आदियों के छपने की काल सीमा जहां मासिक या साप्ताहिक पत्र पत्रिकाओं ने छोटा कर दिया तो फेसबुक ने उस अवधि को और भी घटाकर क्षण में लाकर धर दिया। अब बैठकर लिखा या लिखे हुए को फेसबुक वाल पर चढाने की देरी, पाठकों के हथेली में खुलते जाते हैं लेखन के राज , कथा के रहस्य या घटनाओं के हलचल । और तो और साथ में चस्पाएं चित्र इतने पूरक और आकर्षक होते हैं, जैसे फेसबुक के रीडर के साथ बयानबाजी कर रहे हो। यह जाहिर बात है कि औरत अधिक कलात्मकता रखती है अपनी सोच में और अभिव्यक्ति में। सौन्दर्यबोध और सुंदर संवेदना, उसका भावनालोक और उस भावनालोक के सामाजिक दायरे के भीतर की प्रस्तुति को अधिक आकर्षक और कलापूर्ण बनाता है। फेसबुक के पोस्ट औरत की सौन्दर्य चेतना से लबालब होते हैं। अव्वल दर्जे का महिला लेखन से लेकर चौका चूल्हा संभालनेवाली गृहणी के पोस्ट भी अपने अपने एस्थटिक के स्तर के आधार से, पूरक चित्र और रंगों से सजे पूजा मंडप की तरह लगते हैं। जीवन और समाज में सौन्दर्य ही एक ऐसा बोध है, जिसका कोई स्तर नहीं होता।


परंपरागत मुख्यधारा के साहित्य ने औरत के रचना संसार को नजरअंदाज किया- नून,  तेल,साग सब्जी का साहित्य मानकर उसे चारदिवारी के बीच का साहित्य कहकर उसका लेबल किया। महिला साहित्य का उल्लेख केवल नाम के वास्ते (गिनती में बस, खेल में नहीं) की रस्म अदायगी को समीक्षक और इतिहासकार निभाते आये हैं, वहीं शास्त्रीय और परंपरागत साहित्य की इस मानसिकता को लेखिकाओं ने चुनौती दी। महिला लेखनको मानते-मनवाते आज इक्कीसवी सदी में हाशिये से साहित्य के केंद्र में महिला की कलम आ गई है। वहीं सोशल मीडिया में औरतों का हस्तक्षेप पुरूष लेखन के दखल से भी दस प्रतिशत अधिक अपनी प्रतिभागिता को स्वयं की सृजनात्मकता और सौन्दर्यबोध के माध्यम से साबित कर रही है । फेसबुक के लिंक के माध्यम से पाठकों को बडी सहजता से उनकी उॅुंगली थामें अपने रचना संसार में प्रवेश करवाती हैं और साहित्य आस्वादन के अपने कैनवास को परत दर पतर खोलते जाती है । दैहिक-अनुभव से आत्मिक आनंद की ओर, इश्के लौकिकी से इश्के अलौकिकी की ओर …!! बस और कुछ नही तो, साहित्यिक लेखन के चारपायी पर बैठकर अपनी रचनात्मक स्थापनाओं को देखने की या दिखाने का भाग मिले या न मिले, लेकिन दस -बीस लाइक में ही सही अपने आप को अवाम में आम न मानने की आत्मिक आभास से तो फूले न समाने का गुबारा तो हाथ में पकडा दिया है फेस बुक ने औरतों के हाथों में। हाथ के इस फुग्गे को फोडने या फुलाने की स्वतंत्रता उसके हथेली की लकीरों में बंधी हुई है ।

औरतों का फेसबुकी डोमेन में आदमियों से भी दस प्रतिशत अधिक संख्या में भाग लेना सचमुच में एक आरोग्यपूर्ण पहल है। आनंद, शांति, सुख सुहाग की डोली चढकर आई या चढने के भावों से सजी संजोयी औरत आभासी दुनिया को अपने घर आंगन के जनानी बैठकों का टच देती है। उसका आंगन उसका अपना है। वह स्वतंत्र है कि वहां तुलसी का बिरवा सजाये या बंगडी, साडी बर्तन भांडों का, पास पडोसियों से मिलकर खरीद-फरोख्त करे या उस आंगन के फैलाव में अपनी चारपाई लगाकर आस पडोसियों से संगे संबंधियों से गप्प लडाये और अपनी चौपायी खुद सजाये। हमारी आभासी दुनिया में औरतों की और भी अनेक ऐसी चैपाइयां हैं जो औरों से भी कुछ अधिक बेदखली, बेहिसाबी स्वतंत्रता और स्वछंदता रखती हैं। कारण औरतों के वाल के उतने ही नमूने मिलेंगे, जितनी उनकी अस्मिता-एक से एक सुंदर, एक से एक बेबाक, एक से एक कलात्मक और एक से एक विश्वसनीय…सौन्दर्य और विचार की चेतना के जगर- मगर धुति से भरपूर।

आज ,  औरत को लेकर उसके संबंधों को लेकर उसकी अस्मिता को लेकर परंपरा से चली आ रहे,बने बनाये मिथक प्रतिमान और संकेत टूट रहे हैं। उसका अपना घर के कोने में आज सारा विश्व समाये जा रहा है। तकनीक की सूक्ष्मताओं और प्रयोग की जागरूकता से वाकिफ औरत ने आज आभासी दुनिया को अपने हथेली में कैदकर लिया है । वुमन फ्रेंडली तकनिकी और साइबर माध्यम आज उसके लिये वह जाम है जिसे जब चाहे खोल सकती है और जब चाहे उसमें झांक सकती है। और अंत में कहूं तो , मिस्कीन शाह के तर्ज में जमशेद के जाम को आभासी दुनिया मानकर आज यह कहने में ही उसकी सच्चाई  है –
है मुझको ऐ जमशेद तेरे जाम से भी काम
जहां-नुमा है मुझे अपने खुश-खिराम से भी काम ।
– मिस्कीन शाह

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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स्त्री-पुरुष अलग-अलग प्रांत नहीं

डॉ. आरती  

संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com

तेजाब हिंसा से संबंधित खबरों के शीर्षकों की बानगी देखिए-

. प्रेम प्रस्ताव ठुकराए जाने पर युवती पर फेंका तेजाब… 
  . बाइक सवार बदमाशों ने छात्रा पर फेंका…
  .शादी से इंकार करने पर…
 . जेठ से विवाह करने से इंकार किया तो…


और क्रूरता की हद देखिए…

.शादी की पहली रात ही दुल्हन के गुप्तांगों पर…
.रेप पीडि़ता की मदद करने वाले वकील पर…

इसके अलावा कुछ खबरें ऐसी भी बनती हैं जैसे कि घरेलू झगड़ों में… आपसी रंजिश में… इच्छित गवाही न देने पर… दबंगई के चलते… सबक सिखाने के लिए… इत्यादि इत्यादि।

तेजाब हथियार की मानिंद प्रयोग किया जा रहा है। अन्य हथियारों को रखने के लिए लाइसेंस की जरूरत होती है, लेकिन तेजाब बेचने वालों के लिए या खदीदने पर कोई नियम आड़े नहीं आता। कुछ समय पहले तक कोई नियम कानून नहीं था, अभी 2013 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को एसिड की बिक्री पर रोक लगाने और सख्त नियम बनाने के लिए आदेश दिए थे और अधिकतम तीन महीने का समय दिया था। उसके बावजूद भी घटनाएं साफ इशारा करती हैं कि तेजाब की बिक्री खुलेआम चल रही है।


यूं तो भारतीय कानून ने तेजाब हमले को विशिष्ट दण्डनीय अपराध की कोटि में रेखांकित करते हुए अपराधी के लिए दस साल की सजा मुकर्रर की है लेकिन कोर्ट में लटके हुए सैकड़ों से अधिक मामले कोई दूसरी ही कहानी बयां करते हैं। वही हाल सहायता राशि के संबंध में भी है। यूं तो तेजाब पीडि़ता को अब उसके इलाज के लिए पांच लाख रुपए की सहायता दी जानी नियमानुसार है, उसमें भी पहले सप्ताह ही एक तिहाई राशि दी जानी चाहिए किंतु कुछ दिनों पहले ही मैंने अखबार में पढ़ा कि सहायता राशि न मिलने पर कलेक्टर ऑफिस के सामने परिजनों ने सामूहिक आत्महत्या का प्रयास किया। इसके अलावा भी अनेक उदाहरण हैं। नियमों की जटिलता और जानकारियों का अभाव भी पीडि़त के रास्ते में दीवार-दर-दीवार खड़े करते जाते हैं।

क्या सजा के खौफ से तेजाब हमलों को रोका जा सकता है ( ! )

इसी वर्ष 9 सितंबर 2016 को ही तेजाब हिंसा से संबंधित एक केस को अदालत ने जघन्य अपराध मानते हुए अभियुक्त को मृत्युदण्ड की सजा सुनाई है। यह फैसला तेजाब हिंसा के मामले में चिन्हित करने वाला है। (मृत्युदण्ड मिल पाया या नहीं यह एक अलग मुद्दा है)

ये तो खबरों, हिंसा के कारणों पर और नियम-कानूनों-प्रावधानों पर एक सरसरी निगाह डालने जैसा था। इन सबके इतर यहां महत्वपूर्ण यह है कि आखिर लोग इतने क्रूर क्यों हैं? यह तेजाब हमला जिसकी शिकार 80 फीसदी से अधिक महिलाएं ही हैं, क्यों ये लड़कियां इस क्रूरतम हिंसा की चपेट में अधिक आती हैं? भारत के साथ ही पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, कंबोडिया जैसे देशों में अच्छे खासे प्रतिशत लोग तेजाब पीडि़त हैं।  यहां तो एक सीधा सपाट या बयान यह दिया जा सकता है कि ये क्षेत्र अपेक्षाकृत शिक्षा, जागरुकता आदि दृष्टियों से पिछड़े हुए हैं। परंपराओं, कुरीतियों में जकड़े हुए हैं लेकिन इंग्लैंड में भी 2004-05 में पचपन केस तेजाब हमले के अस्पताल रिकार्ड के अनुसार थे। और 2014-15 में यह संख्या 106 पहुंच गई। यह संख्या पाकिस्तान के मुकाबले (वहां काम कर रहे ‘सर्वाइवर्स फाउंडेशन’ के मुताबिक 2012 में 7,516 तेजाब हमले के शिकार थे) कम है किंतु उसका (तेजाब हमलों) अस्तित्व ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस जैसे विकसित, शिक्षित व जागरुक देशों में भी है।

हम अपने देश की ही बात करें तो आज कई फाउंडेशन इस दिशा में कार्यरत हैं। बदलाव लाने की कोशिश की जा रही है। ‘स्टॉप एसिड अटैक’, ‘एसिड सर्वाइवर्स फाउंडेशन’ और कई इस दिशा में कार्यरत हैं। ‘स्टॉप एसिड अटैक’ को अमेरिका का ‘बॉब्स 2016 सोशल चेंज अवार्ड’ भी मिला है।

इन सबसे इतर इस दिशा में सोचने और गहरे मंथन करने की जरूरत यहां है कि आखिर ऐसे अपराध लड़कियों के मामलों में ही अधिकतम क्यों हो रहे हैं?

हमें समझने की कोशिश करनी चाहिए कि ये घटनाएं आखिर किस ओर इशारा करती हैं? इनकी जड़ों में क्या छिपा हुआ है? गहराई से देखें तो बलात्कार से भी अधिक मारक असर तेजाब हिंसा का होता है। बलात्कार पीडि़ता शारीरिक से अधिक मानसिक प्रताडऩा की शिकार होती है। समाज में गहरे धंसी वर्जीनिटी (शुचिता) एक ऐसी अवधारणा है जिसके मानसिक प्रभाव से रेप पीडि़ता अधिक प्रताडि़त होती है किंतु तेजाब हमले में यदि वह बच भी जाती है तो जिंदगी भर न जाने वाले दाग और हर सुबह आईना देखते ही ‘डरावने’ शब्द से सामना करती है। अंतहीन दर्द, बार-बार होने वाली सर्जरी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाती हैं। और सबसे अहम आत्मविश्वास ही डगमगा जाता है। हर सुबह वह घटना दोहराई जाती है, खुद की परछाई से ही डर!!

क्या इसे ही जंगलराज कहते है योगी जी

इनके, यानी तेजाब पीडि़तों के रूबरू होते ही, उनकी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दुश्वारियों को जान-समझकर और कि आखिर ये घटनाएं होती क्यूँ हैं? जैसे प्रश्नों का सामना करते ही राकेश सिंह नाम का एक शख्स लोगों को समझाने और अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोजने एक अदद साइकिल लेकर निकल पड़ा। राकेश सिंह का जन्म बिहार में हुआ है। उच्च शिक्षा लेने के बाद कुछ साल उन्होंने एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी भी की। राकेश लेखक भी हैं। इनकी पहली पुस्तक बीबीसी द्वारा जारी की गई सूची के अनुसार (2010) में टॉप 10 में थी। और अचानक ही नौकरी, लेखन, ऐशोआराम सब छोडक़र जेंडर जागरुकता अभियान पर साइकिल से निकल पड़े। राकेश सिंह कहते हैं कि- ‘इन घटनाओं के सामान्य कारण देखो तो घोर आश्चर्य होता है कि एक दिन पहले तक प्रेमिका के कदमों में चांद-तारे तोड़ कर डाल देने की बात करने वाला युवक, अगले दिन उसी के चेहरे को तेजाब से नहला देता है।’ कैसे वह इतना क्रूर हो जाता है? आखिर उसके भीतर क्या धंसा होता है जो कि वह इतना अमानवीय, असंवेदनात्मक काम को कर सकता है?

लगभग अभी तक ग्यारह राज्यों (तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पांडिचेरी और अभी वे महाराष्ट्र यात्रा पर हैं) की साइकिल यात्रा कर, देश को अलग-अलग कोणों से देख-पहचान कर, वे इनसे पीछे छिपे कारण की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि- ‘पितृसत्ता द्वारा लडक़ा-लडक़ी की अलग-अलग तरीकों से की गई परवरिश, सभी धर्मग्रंथों और उनके पैरोकारों द्वारा अलग-अलग चिन्हित मान्यताएं और समाज में स्त्री की वनिश्त पुरुष की सुपीरियर पोजीशन मनवाती हुई परंपराएं (उन्हें हम रूढिय़ाँ ही कहें) ही वे मुख्य कारक हैं जिससे पुरुष हमेशा ही खुद को स्त्री से बेहतर और प्रेम में भी खुद को शासक ही मानता है। उन्हें ‘न’ सुनना मंजूर नहीं। एक पुरुष को इतना असंवेदनशील, समाज की जड़ों में जमी सदियों पुरानी परंपराएं और रूढिय़ां ही बनाती हैं जिन्हें हम कभी बदलने की कोशिश नहीं करते।’

प्यार पर न चढाओ हैवानियत की चादर

 दहेज प्रथा, शिशुवध, बलात्कार और तेजाब हमले जैसी घटनाएं जेंडर के नीचे दबे हुए प्रश्नों का प्रतिफल हैं। ऐसे प्रश्नों को सामाजिक रूढिय़ों की कारा से बाहर निकालकर, उनके उत्तर लोगों को समझाना बेहद जरूरी है। उत्तर आधुनिकता के दौर में जब पूरी दुनिया ‘एक गांव- मुहल्ले’ में तब्दील हो गई है। संचार क्रांति ने दूरियों के पैमानों को समाप्त कर दिया तब भी स्त्री और पुरुष जेंडर के बीच वही दूरी कायम है, वे अभी भी अलग-अलग प्रांत हैं। दिन-रात साथ रहते काम करते हुए भी मकान के दो तल्ले हैं। पुरुष शासक और स्त्री मजदूर। इस उत्तर को पाने के कारणों की तह में जाकर उन्हें पाटना होगा तभी तेजाब हिंसा जैसे क्रूर से क्रूरतम अपराधों पर अंकुश लगाना संभव हो सकेगा।

ये क्रूरताएं हमारे समय और देशकाल के चेहरे पर काले धब्बे हैं। ये कहानियां यूं नहीं खत्म होंगी। राकेश सिंह जैसे जज़्बेवाले कितने ही लोग लड़-भिड़ रहे हैं। हमें भी उनकी जंग में शामिल होना होगा। हर बदलाव मुमकिन होते हैं। हर समय को अपने भीतर ही औजार ढूंढऩे होते हैं।
पाश ने कहा भी है-
जब बंदूक न होगी तब तलवार होगी
तलवार न हुई, लडऩे की लगन होगी
लडऩे का ढंग न हुआ, लडऩे की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी…



आखिरी में जो लड़ रहे हैं, इस तेजाब पीडि़तों के लिए और वे सब भी जो हमारे समय की क्रूरता, असंवेदना और विशेषकर लैंगिक मानसिकता के शिकार हुए हैं, उनके लिए- कामरेड पेरिन दाजी के शब्दों में-
अपने लिए जिए तो जिए
तू जी ऐ दिल जमाने के लिए…

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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शास्त्रीय सुरों की मल्लिका जिन्हें जनता ने ‘गानसरस्वती ‘ नाम दिया

स्त्रीकाल डेस्क 


‘गानसरस्वती ‘ नाम से समादृत भारतीय शास्त्रीय संगीत गायिका किशोरी आमोनकर का  सोमवार देर  रात मुम्बई में निधन हो गया.   84 साल की उम्र में हमें अलविदा कह गई किशोरी ताई अमोणकर का सम्बन्ध अतरौली जयपुर घराने से रहा है। उनकी मां मोगुबाई कुर्डीकर भी इसी घराने की मशहूर शास्त्रीय गायिका थीं।

10 अप्रैल 1931 को मुम्बई में ही पैदा हुई ‘गानसरस्वती ‘ किशोरी ताई ने अपनी मां और विख्यात गायिका मोगुबाई कुर्डिकर को अपना गुरु माना और संगीत साधना की.  ‘स्वरार्थरमणी – रागरससिद्धान्त’ यह संगीतशास्त्र पर आधारित ग्रंथ की वह रचयिता थीं. ख्याल, ठुमरी और भजनों की  इस शास्त्रीय गायिका  को शास्त्रीय संगीत में भावनाप्रधान गायन कला को पुनर्जीवित करने का श्रेय जाता है.

सुनें यह तराना 

किशोरीताई अमोणकर कई सम्मान से सम्मानित थी. 2002 में पद्म विभूषण से सम्मनित होने के पहले वे संगीत नाटक अकादमी सम्मान, 1985 , पद्मभूषण सम्मान, 1987 , संगीत सम्राज्ञी सम्मान, 1997 से सम्मानित हो चुकी थीं. उसके बाद भी संगीत संशोधन अकादमी सम्मान, 2002 संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, 2009 से  वे सम्मानित हुईं  1964 की हिन्दी फिल्म , ‘गीत गाया पत्थरों ने’  में उन्होंने गायन किया था, और  1991 में रिलीज हुई ‘दृष्टि’  फिल्म में उन्होंने  संगीत निर्देशन  किया था.

उनके चाहने वालो के द्वारा दिया गया उनका नाम  गानसरस्वती हालांकि उनका सबसे बड़ा सम्मान था.  उनके  पति रवि आमोनकर ने उनका पूरा साथ दिया.1992 में रवि अमोनकर का निधन हुआ है.

सॉफ्ट पोर्न नहीं: ये मध्यवर्गीय स्त्री की कामनाओं के नोट्स हैं

एक आंकडे के अनुसार भारत में 67 प्रतिशत लोगों के पास आज भी गैस कनेक्शन नहीं है, वे लकड़ी, कोयला या अन्य इंधन माध्यमों के उपयोग से खाना बनाते हैं- इस तरह गैस की बढ़ती कीमत 67 प्रतिशत का कंसर्न नहीं है, वे उससे ज्यादा गंभीर चिंताओं से घिरे हैं, लेकिन गैस की कीमत बढना 33% के लिए गहरा कंसर्न है और बचे 67 के लिए भी क्योंकि हर बार बढ़ती कीमत गैस तक उनकी पहुँच से उन्हें दूर कर देगा.


सेक्स में ओर्गैज्म की प्राप्ति, सेक्स का पोजीशन या सेक्सुअलिटी की दृष्टि से उत्पीड़ित के भाव से मुक्ति जैसे मुद्दों से ज्यादा जरूरी मुद्दे जरूर हो सकते हैं मातृत्व मृत्यू दर का बढ़ना, स्वास्थ्य  सुविधाओं का अभाव, भ्रूण ह्त्या, आनर कीलिंग, शिक्षा या जाति-वर्ग आधारित आधारित भेदभाव के मुद्दे, लेकिन इन चिंताओं से मुक्त एक समूह के लिए सेक्स में ओर्गैज्म की प्राप्ति, सेक्स का पोजीशन या सेक्सुअलिटी की दृष्टि से उत्पीड़ित के भाव से मुक्ति भी एक गहरा कंसर्न है और वह इस कंसर्न को जाहिर करने के अधिकार से वंचित नहीं हो सकता. और यह भी सच है कि यह कंसर्न जेंडर विभेद से पीड़ित हर स्त्री का होगा, जब विभेद और उत्पीडन के दूसरे मसले जब हल भी हो जायेंगे,  क्योंकि सेक्सुअलिटी जेंडर भेद का मूल आधार है.



लक्ष्य समूह 


ये बातें इसलिए कि पिछले दिनों नीलिमा चौहान की ‘वाणी प्रकाशन’ से आई किताब ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ को लेकर एक समूह हाय-तौबा कर रहा है, वह इस किताब को साहित्य और विमर्श की अगंभीरता का एक नमूना मान रहा है. इसे सॉफ्ट पोर्न तक कहा जा रहा है, तो कई आलोचक प्रकारंतर से इसे स्त्री-विरोधी भी बता रहे हैं. ऐसा भी नहीं है कि प्रकाशन के बाद इस किताब ने सिर्फ तौबा-तौबा ही बटोरे हैं, बल्कि कई प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ और आलोचना मेरी नजरों से भी गुजरे. किताब का आक्रामक प्रचार भी किया प्रकाशकों ने. इस दोहरे वातावरण में मैं यह किताब पढ़ रहा हूँ. हालांकि पूर्व की टिप्पणियाँ या आलोचनायें पूर्वग्रह निर्माण के लिए काफी होती हैं, लेकिन आलोचना कर्म के लिए उनका अपना महत्व भी होता है.


उर्दू की रवानगी वाली हिन्दुस्तानी भाषा( हिन्दी नहीं) का मिजाज आपको यदि बाँध लेता हो, इश्मत चुगताई के कहन का चुटीलापन यदि आपको प्रिय रहा हो और 19वीं सदी की कुछ महत्पूर्ण किताबों, मसलन सीमंतनी उपदेश और स्त्री-पुरुष तुलना की शैली, उसके विमर्श के विषय पुरुषवादी जड़ता को तोड़ने और स्त्रियों के मन-परत पर बैठे अनुकूलन से उन्हें सहज मुक्त करने की दिशा में कारगर लगते हों, तो यह किताब आपको उसी कड़ी में दिखेगी- उसका आधुनिक वर्जन. इस किताब का लक्ष्य समूह मध्यवर्गीय स्त्रियाँ हैं, इसलिए इससे कुछ अधिक की अपेक्षा रखना किताब के साथ ज्यादती होगी.



मातृसत्तातमक व्यवस्था स्त्रीवादियों का लक्ष्य नहीं है : संजीव चंदन


अनुकूलन पर प्रहार 


यह किताब सबसे पहले तो अनुकूलन पर प्रहार करती है- मध्यवर्गीय विवाहिता स्त्री के अनुकूलन पर. अनुकूलन का परिवेश, क्षेत्र रसोई घर से लेकर फेसबुक पर उपस्थिति तक में है- जहां, स्त्रियाँ, पत्नियां पति या पुरुष के आईने से अपना स्व निर्धारित कर रही हैं. हिन्दी साहित्य में जैनेन्द्र की पत्नी से लेकर प्रेमचंद की बड़े घर की बेटियों का बड़ा दबदबा रहा है- ‘पतनशील पत्नियों के  नोट्स’, इस दबदबा को अतिक्रमित कर रही है-किताब में शामिल नोट्स सचेत करते हैं कि इन पत्नियों और बड़े घर की बेटियों के मोहल्ले में ही ‘हाडा रानी’ भी रहती है-जो लड़ाई के मैदान में जाते अपने पति को अपना सिर अर्पित कर देती है कि कहीं मोहपाश उन्हें हरा न दे. किताब में पहला ही शीर्षक नोट है ‘बीबी हूँ जी, हॉर्नी हसीना नहीं.’ घर-गृहस्थी में कैद स्त्री से पति चंचल और उन्मुख देह की चाह भी रखता है, मसालों के गंध और गृहस्थी की चिंताओं से थोड़ा अलग होकर जबतक की हॉर्नी हसीना की भूमिका में वह आती है, पति संतुष्ट हो चुका होता है. पत्नी के भीतर सुप्त स्त्री जाग्रत होकर फिर हताश हो जाती है: ‘हाय, हर बार ठीक उस वक्त, जब तुम किला फतह कर रहे होते हो, मैं बाँध के परे रह गई कसमसाती, प्यासी, मुरझाई नदी बनकर रह जाती हूँ. यह लो, एकबार फिर इस बेमकसद कवायद में हारी हुई हताश बीबी रह गई है और एक जमकर बरसा हुआ जिस्म दोबारा पति में तब्दील होकर, पीठ घुमाकर बेखबर पड़ा सोया है. उफ्फ, कैसी जहरीली नागन सी है ये रात, कितनी आवारा, कितनी बदचलन, कितनी खार खाई सी.’



पत्नी और स्त्री के दो राहे से गुजरती स्त्री ही अपनी कामनाओं के साथ ‘पतनशील पत्नी’ है. कामनाओं को मारकर वह मसालों का गंध समेटे पत्नी है और पतनशील होते ही वह स्त्री हो जाती है. ऐसा भी नहीं है कि कामनाओं और वासनाओं की अभियक्ति किसी नीलिमा चौहान का एकांगी स्वर भर है, या बाजार की मांग के पूर्ती के लिए किसी व्यापारी लेखिका का टूल भर( जैसा कि कुछ आलोचनाएँ कहने का प्रयास करती दिखी) . कामनाओं  की सहज अभिव्यक्ति 19वीं सदी में समता का संघर्ष करती, लड़कियों के लिए स्कूल खोती, पठन-पाठन में लगी, प्लेग के बीमारों की सुश्रूषा करती सावित्रीबाई फुले के यहाँ भी है, यानी मुद्दों का चुनाव अनिवार्य रूप से मुक्ति संघर्ष को एकहरा नहीं करता. सावित्रीबाई फुले की एक श्रृंगार कविता पढी जा सकती है:

कितनी स्त्रीवादी होती हैं विवाहेत्तर संबंधों पर टिप्पणियाँ और सोच (!)

सुनहरी चंपा

जैसे मदन करता है आकर्षित अपनी प्रियतमा रति को,
वैसे ही चंपा जगाती है कवि की संवेदनाएं,
…वह देती है आनंद और ऐन्द्रिक सुख,
पारखी को करती है प्रसन्न और फिर नष्ट हो जाती है।
और यह भी


जाई फूल

…एकदम शुभ्र, नशीली खुशबू से लबरेज़,
वह अपनी कोमल चमक से करता है मुझे प्रफुल्लित।
उसकी मीठी मुस्कुराहट और शर्मीली नज़र,
मेरे दिमाग को ले जाती है किसी दूसरी दुनिया में।


अनुकूलन का एक दूसरा प्रसंग भी है-खुद को पुरुषों की नजर से देखना- आत्मसात किये जा चुके मेल गेज की जद्द में जीना और नियन्त्रण की लाठी को अपने सर पर लटकाये चलना: ‘जान लीजिये कि लडकी कभी अकेली नहीं होती, अपने गुसलखाने में भी नहीं, अपने कमरे के अपने बिस्तर पर भी नहीं, अपने घर से बाहर तो कभी भी नहीं. उसके भगवान, उसके बड़े-बुजूर्ग, उसके वहम, उसके सबक, उसकी फितरत, उसका आगा-पीछा हमेशा उसके साथ हुआ करता है.’

हमबिस्तर नहीं, हमदिवार 


कई-कई नोट्स में लेखिका स्त्री-पुरुष के साझेपन के स्वांग की बखिया उधेड़ती जाती है. स्पष्ट करती है कि पति और पत्नी दो दुनिया हैं, एक से दिखते हुए- एक होने का स्वांग रचते हुए. स्वांग से अपने स्व को स्त्री तभी देख सकती है, जब वह आरोपित पत्नीत्व से पतित होती है- पतनशील होती है-अपनी इच्छाओं, वासनाओं, कामुकता, स्वप्नों और सहजताओं के पूरे पॅकेज के साथ पतनशील


स्व की पहचान, और अपनी एजेंसी का निर्माण


इस किताब के लेखन में कोई ख़ास योजना नहीं दिखती- प्रसंगवश लिखे गये छोटे नोट्स से यह किताब शक्ल लेती है. इस किताब के मूल में सोशल मीडिया का प्रभाव भी कहा जा सकता है, जिसके प्रभाव में लप्रेक नामक विधा में किताब लिखी गई और चर्चित हुई तो छः शब्दों में या ट्वीटर की शब्द संख्या में कहानियां लिखी गई. सोशल मीडिया ने गद्य लेखन की क्षणिकाओं, हाइकुओं को जन्म दिया. किताब में शामिल नोट्स भी सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक के स्टेटस से पैदा हुए हैं. फिर भी एक ख़ास किस्म की सरोकारी योजना है किताब में शामिल नोट्स की, वह है स्त्रियों के अपने कर्तापन को पुख्ता करना-उत्पीड़ित भाव से मुक्ति का आयोजन करना. इस प्रक्रम में छेड़ी जाती स्त्री भी छेड़ने वाले के मर्दाने आनंद को रफूचक्कर कर देती है या रेडलाईट पर घूरती स्नेहिल आँखों को स्नेहिल प्रत्युत्तर दे देती है. नोट्स में स्त्री अपने ऊपर हर प्रकार के आरोपण को खारिज कर देती है, निर्मित छवि, स्टीरियोटाइप या वस्त्र से लेकर चाल-चलन, देह और देह के बाहर हर अभिव्यक्ति के लिए निर्धारित स्टीरियोटाइप को नकार देती है.



इस किताब के अपने मायने हैं, एक ख़ास पाठक वर्ग के लिए इसका व्यापक सन्दर्भ है. यह बोरियत भरी गद्यात्मकता से मुक्त होने के कारण रचनात्मक लेखन की किताब है और रचनात्मकता के लिए अनिवार्य कल्पनाशीलता या गल्पात्मकता की सीमा से थोड़ी दूरी पर ठहरकर ललित टिप्पणियों की किताब है- ऐसी ललित टिप्पणियाँ- जो पूरा-पूरा विमर्श रचती हैं.


इस किताब को इसलिए कभी न पढ़ें कि आपको इसमें घरेलूं हिंसा की जानकारियाँ देते लेख मिलेंगे या उससे संघर्ष के दास्तान, या यौन हिंसा के खिलाफ महिलाओं के संघर्ष का इतिहास मिलेगा या बस्तर से लेकर नंदीग्राम और मणिपुर संघर्ष करती स्त्रियों की कहानियां, या जाति उत्पीडन के हृदयविदारक प्रसंग. इसलिए भी कभी न पढ़ें कि यह आपको किसी किस्सागोई का आनंद देगी, या अच्छी कहानियां पढने की आपकी चाहत को पूरा करेगी, इस किताब को आप तब पढ़ें जब मध्यवर्गीय स्त्री के, जो रसोई घर में है, कालेजों में-विश्वविद्यालयों में पढ़ाती है, कॉर्पोरेट में या सरकारी संस्थानों में क्लर्की से लेकर अफसरी करती है- घर गृहस्थी संभालती है और फेसबुक ट्वीटर पर विचरण भी करती है-जिसका एक पति है और एक दोस्त, सिर्फ एक पति, या एक पति और प्रेमी भी, या सिर्फ एक प्रेमी, स्वत्व को समझना चाहते हों- बिना बोझिल विश्लेषणों के. और हाँ, अपराजिता शर्मा   के द्वारा आवरण  और इलस्ट्रेशन  इस किताब की प्रस्तुति की एक ख़ास उपलब्धि है .  


संजीव चंदन स्त्रीकाल के संपादक हैं  


संपर्क :8130284314


स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 

संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 




‘अनारकली आॅफ आरा’ : आंसुओं से उपजी आग और भरोसे की उम्मीद

मृणाल वल्लरी 
 
राष्ट्रगान के वक्त खड़े होने की ड्यूटी पूरी करने के बाद जब आप खींचती हुई एक खास जमीनी मंचीय आवाज के साथ दुष्यंत कुमार की पंक्तियों से रूबरू होते हैं, तभी एक सोंधी खुशबू से सराबोर सिनेमा का अंदाजा लगा लेना चाहिए। तो इसी के साथ खुश मेरा मन भी ढेर सारी उम्मीदों के साथ परदे पर टिक गया था। शुक्रवार को सिनेमा घरों में आने के बाद महज तीन दिनों के भीतर बहुत सारे लोगों ने इतना लिख दिया था कि शायद इससे पहले किसी फिल्म के साथ ऐसा नहीं हुआ हो। शुरुआती सीन पर्दे पर आने से पहले ही आंखों के सामने तैरने लगा। ‘अनारकली आॅफ आरा’ के प्रमोशन के वक्त से ही ‘मोहल्ला लाइव’ पर चला सिनेमा का डिबेट याद आ रहा था। अनुराग कश्यप की शैली और गालियों पर चला विमर्श। उसे याद करते हुए इस फिल्म के नाम और उसके कॉन्सेप्ट का अंदाजा लगा कर थोड़ा पूर्वग्रह से ग्रसित थी। लग रहा था कि अभी तक फेसबुक पर लिखा गया जो पढ़ा वह महज दोस्तों की हौसलाअफजाई तो नहीं थी। फिल्मों में अनुराग कश्यप किस हद तक स्त्री विरोधी दिखने लगते हैं, वह सोच रही थी।
अनारकली की भूमिका: स्वरा भास्कर
बल्कि ‘रिवोली’ में शो के लिए अंदर जाते वक्त भी पूर्वग्रह बरकरार था। इसके पहले ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ ने वैसे भी पत्रकारों पर संदेह पैदा कर दिया था कि भदेसपन के नाम पर खिलवाड़ करके खुद को बचा ले जाने और उसके जरिए एक व्यवस्था को आगे बढ़ा देने का खेल कैसे किया जाता है। दरअसल, जब आप पहले ही घेरने लायक, आलोचना करने लायक खोजने का मूड बना कर बैठ जाएं और बाद में जीवंत से सेट के साथ हर दृश्य पर मुग्ध होते जाएं तो क्या हालत होती है, मैं ‘अनारकली आॅफ आरा’ देखते हुए हर अगले मिनट महसूस कर रही थी। दुख हुआ जब बगल में बैठे दो लोग यह कह कर उठ कर चले गए कि ‘अरे… यह तो भोजपुरी फिल्म है!’ मन किया कि उनकी बांह पकड़ कर बैठा दूं कि भाई, थोड़ी देर बैठ जाओ!
इस फिल्म पर इतने सारे लोगों ने इतना कुछ लिख दिया है कि सोचती हूं कि अब मैं क्या लिखूं। यह क्या कम है कि अंदाज के उलट ‘अनारकली आॅफ आरा’ कहीं से भी स्त्री विरोधी नहीं होती है, बल्कि स्त्री की जिंदगी पर अपने हक के जयकारे के साथ खत्म कर होती है। फिल्म की शुरुआत का गाना जहां जिंदगी छीन लेता है तो इसका आखिरी गाना और उसका अंत अपनी जिंदगी पर अपने हक का दावा स्थापित करता है। ‘जन -गन- मन’ पर तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से सभी खड़े होने ही लगे हैं, मेरे सामने की लाइन में जो छह-सात महिलाएं बैठी थीं, आखिरी सीन में अनारकली का लहंगा उड़ते ही वे सभी खड़े होकर देर तक ताली बजाती रहीं। फिल्म के साथ यह दृश्य मेरे लिए नहीं भुला सकने वाला दृश्य रहा। पूरी तरह कमर्शियल ‘चक दे इंडिया’ के बाद हॉल में मेरा इस तरह का यह दूसरा अनुभव था।
महानगरों के हिसाब से कम से कम गाने के सब-टाइटल दिए जाते तो अच्छा रहता। उन महिलाओं के बीच बातचीत से लग रहा था कि उन सबने ‘अब त गुलमिया के ना ना ना…’ को ठीक से नहीं समझा। और अगर ‘अपनी रे देहिया की हम महरनिया’ को नहीं समझा तो फिर उनके लिए यह क्लाइमेक्स तो आम हिंदी फिल्मों की तरह ही था। भोजपुरी के शब्दों के कारण बहुत से महानगरीय दर्शक इस गाने का असल संदेश नहीं समझ पाए। कुछ और भी जगह लोग शब्दों को लेकर उलझ रहे थे और एक-दूसरे से पूछ रहे थे। लेकिन अनारकली जो थी, उससे अलग शक्ल में उसे दिखाया भी कैसे जा सकता था!
बहरहाल, दुष्यंत कुमार की वे शुरुआती पंक्तियां और हीरामन। अनारकली से लेकर कोई और… दिल्ली से लेकर पटना और आरा तक। हर स्त्री को एक हीरामन जरूर मिलता है जो उसकी जिंदगी का सफर आसान करता है! और फिर हालात के सामने लाचारी की राह में वह छूट भी जाता है। यह हीरामन उसका प्रेमी या पति या हमेशा साथ रहने वाला दोस्त नहीं होता है। इस हालत को कौन और कब समझेगा कि इस हीरामन के नाम वह अपनी लिखी किताब समर्पित नहीं कर सकती है, सार्वजनिक मंच पर उसका नाम लेकर गीत नहीं गा सकती है, वाट्स ऐप या फेसबुक पर उसकी प्रोफाइल नहीं डाल सकती है… मोबाइल या किसी और पासवर्ड में उसके नाम के शब्द नहीं होते हैं…!
नायिका स्वरा भास्कर  और निदेशक अविनाश दास
 
दरअसल, अनारकली अगर सामंती पितृसत्ता के खिलाफ जंग का चेहरा है तो हीरामन उस पुरुष का चेहरा है जिसमें स्त्री भी समाई होती है। पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिल्ली से वापस जाती अनारकली और छत पर रोता हुआ हीरामन। हीरामन के इसी आंसू को तो अनारकली अपनी जमा-पूंजी कहती है…‘आपके जइसा साधु इंसान मिला… यही हमरी जमा-पूंजी है!’ घर की दहलीज से बाहर निकली हर स्त्री के पास ऐसी एक जमा-पूंजी जरूर होती है। एक रोता हुआ हीरामन सामने वाली स्त्री को कितना मजबूत कर देता है! अनारकली के प्रतिरोध का स्वर का आग बन जाना हीरामन के आंसू के बिना अधूरा रहता!
सिनेमा हॉल में मौजूद अमूमन हर स्त्री की आंखें अपनी जिंदगी में कभी मौजूद रहे अपने-अपने हीरामन को याद कर जरूर गीली हुई होंगी। हमारे उस हीरामन को, जो कहीं छूट गया है, फिर से आंखों से निकालने के लिए थैंक्यू अविनाश दास। चुनावी नतीजों और पिछले कुछ समय से बने माहौल के कारण जो एक डिप्रेशन की स्थिति बनी थी, ‘मोरा पिया मतलब का यार…’ जैसे बड़े महत्त्व के गीतों से लैस ‘अनारकली आॅफ आरा’ देखने के बाद दिमाग उससे भी कुछ हल्का हुआ। हीरामन और अनारकली थोड़ी-सी जिंदगी की उम्मीद जगा गए, थोड़ा रुला कर बड़ा भरोसा पैदा कर गए…!
लेखिका  पत्रकार  हैं , जनसत्ता से  संबद्ध . संम्पर्क : mrinaal.vallari@gmail.com

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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समकालीन कहानी: भाषिक अस्मिता और भूमंडलीकरण की चुनौतियाँ (संदर्भः उदय प्रकाश की कहानी मैंगोसिल)

रानी कुमारी 

रानी कुमारी (शोधार्थी) पीएच. डी (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय संपर्क:मो. 8447695277



समकालीन समाज भूमंडलीकरण के प्रभाव में पल बढ़ रहा है। इसी कारण इसके सरोकार बदल गए हैं। इसे मूल्य-परिवर्तन भी कहा जा सकता है। परंपरागत मूल्यों से आज के मूल्य एकदम बदले हुए हैं। भाव-बोध बदल गया है। जाहिर है कि जब भाव बदला है तो भाषा भी बदलेगी। व्यक्ति और समाज के इस बदलते भाव-बोध को उसकी (साहित्यिक-भाषिक) अभिव्यक्ति से समझा जा सकता है।

जब हम समकालीन कहानी कर बात करते हैं तो उसका कथा-पटल बेहद विस्तृत मिलता है। उसमें स्त्री, दलित, आदिवासी और अन्य अस्मिताओं को स्थान मिल रहा है। बात जब आलोच्य कथाकार उदय प्रकाश की आती है तो उनके लेखन में भूमंडलीकरण से उपजी स्थितियो को बखूबी देखा जा सकता है।

आज का समय बड़ी तेज़ी से बदल रहा है। समाज में हो रहे परिवर्तन को साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है। आज हम भूमंडलीकरण के दौर में हैं। जिसके कारण विज्ञान और प्रौधोगिकी के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। दुनिया में हो रही घटनाओं का ब्यौरा जल्द ही हम तक पहुँच जाता है। साहित्य भी इन बदलावों से अछूता नहीं रहा है। साहित्यिक विधाओं में व्यक्त संवेदना से यह बदलाव नज़र आ जाता है। जिसका श्रेय सूचना तंत्र को जाता है। इन सब बातों की गहन पड़ताल हमे उदय प्रकाश की कहानियों में भी मिलती है।


उदय प्रकाश की कहानियों का विषय विविध रहा है। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए एक ’सस्पेंस’ बना रहता है। अपनी कहानियों में वह हाशिये के लोगों से लेकर पूंजीपति वर्ग की बात करते हैं। उन्होंने हिन्दी कहानी के नैरेटिव स्ट्रक्चर (कथ्य संरचना) और सरोकारों को बदल दिया है। उनकी कहानियों में पात्र खुद ही संवाद करता है और कहानीकार कम ही दिखाई पड़ता है। जबकि पहले की कहानियों में कहानीकार ज्यादा मौजूद रहते थे और पात्र कम संवाद करते थे। उनके नैरेशन से पाठक उद्वेलित हो जाता है। जैसे: ’हीरालाल का भूत’, ’और अंत में प्रार्थना’, ’छप्पन तोले का करधन’, ’पॉल गोमरा का स्कूटर’, ’दिल्ली की दीवार’ और मैंगोसिल आदि उदय प्रकाश के विषय में कहा भी गया है कि “सरोकारो का अलग होना किसी अलग दुनिया से साक्षात्कार कराने से नहीं है बल्कि अलग तरीके से हाशिये की दुनिया की तकलीफ़ो को समझने से है। भ्रष्टाचार के बारे में हम जानते हैं पर उसके स्वरूप और प्रक्रिया को नहीं पहचान पाते जिसके चलते भ्रष्टाचार की जड़े समाज में इतनी गहरी हैं।’’  दरअसल वैश्वीकरण के दौर में घूस लेने-देने में फर्क नहीं आया है बल्कि ’ब्लैक मनी’ (अन-अकाउंटेड मनी) के इस्तेमाल में भी फर्क नहीं आया है। इसका उदाहरण ’दिल्ली की दीवार’ कहानी है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय समाज निरंतर परिवर्तनशील रहा है। परंपरागत भारतीय समाज में राजनीतिक-सामाजिक संस्कृति की रचना हुई थी। लेकिन 1990 के दौर में यह राजनीतिक और सामाजिक संस्कृति बदल गई है। “चार दशक से ज्यादा की अवधि में जिस राष्ट्रीय राजनीतिक-सामाजिक संस्कृति की रचना हुई थी, एक पल में उसकी बागडोर ऐसे हाथों में चली गयी जो शुद्ध रूप से भारतीय हाथ नहीं थे। यह भारत के ग्लोबलाइज़ेशन यानी भूमंडलीकरण की शुरुआत थी।’’


देखा जाए तो भूमंडलीकरण और वैश्वीकरण नाम ज्यादा चर्चित हैं। डॉ. अमरनाथ ने भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के पीछे अमेरिका का हाथ माना है। उनके अनुसार “यह शब्द बीसवीं सदी के अंतिम दशक में व्यापक रूप में प्रयोग में आया 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद जब दुनिया एक ध्रुवीय हो गयी और अमेरिका के नेतृत्व में बहुराष्ट्रीय कंपनियो ने दुनिया के, खासतौर पर तीसरी दुनिया के बाज़ार पर कब्ज़ा जमाना शुरू किया तो इसे न्याय संगत ठहराने के लिए भूमंडलीकरण जैसा आकर्षक नाम दिया गया।’’  भूमंडलीकरण का अर्थ है कि विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ देना और एक नई भूमंडलीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति का निर्माण करना। इससे उपभोक्तावादी संस्कृति और मूल्यो का जन्म हुआ।



1990 के बाद विश्व में अनेक घटनाएँ घटी। जिसमे एक मुख्य सोवियत संघ का पतन होना भी था। विचारों, सोच, रिश्तों, पहनावे तक में बदलाव दिखाई देने लगे। आस-पास के परिवर्तन का असर भाषा पर भी पड़ा। भाषा में से शिष्टता धीरे-धीरे गायब होने लगी। मुश्किल से प्रयोग होने वाले शब्द अब रोज़मर्रा की ज़िंदगी में प्रयोग होने लगे।

 वैश्वीकरण के दौर में ‘भाषा’ का संकट गहराता जा रहा है। साहित्य, आम-बोलचाल की भाषा और समाचार पत्रों की भाषा बदलती जा रही है। जहाँ शुद्ध हिन्दी या फिर अंग्रेजी का इस्तेमाल होता था। आज उसकी जगह ‘हिंगलिश’ ने ले ली है। प्रत्येक भाषा का मर्म, अपनत्व खोता जा रहा है। पुष्पपाल सिंह का मत है कि ‘‘भाषाई परिनिष्ठता, शुचिता का प्रश्न यहाँ बेमानी हो गया है, भाषाई शुचिता की दीवारें तेजी से गिरती जा रही हैं। यहाँ यह विचारणीय नहीं है कि बाज़ार की शक्तियों ने हिन्दी को कितना ऊर्जावान और सक्षम-सशक्त किया है, चिंता का विषय यह है कि भूमंडलीकरण की इस प्रक्रिया ने जनभाषाओं और बोलियों को हाशिए पर डालकर उन्हें विलुप्ति की ओर अग्रसर किया है। प्रांतीय भाषाओं की भी स्थिति यही है, उनका अधिकाधिक अंग्रेजीकरण हो रहा है। हिन्दी और शेष प्रांतीय भाषाओं की जातीय अस्मिता और चरित्र की निजता विलुप्ति की प्रक्रिया में है।’’  हाल के दिनों में आदिवासी बहुल क्षेत्रों से किसी भाषा-भाषी के मरने के साथ उसकी भाषा के भी मर जाने की खबरें आई हैं। यह भूमंडलीकरण का ही प्रभाव है कि हम भाषा-भाषी को भी लाभ व उपयोगितावादी नजरिये से देखते हैं। इस बदलाव को आज के साहित्य में देखा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि यह भाषागत बदलाव सिर्फ उदय प्रकाश के यहाँ दिखाई देते हैं, अन्य कथाकारों के यहाँ भी दिखाई देते हैं – मनोहर श्याम जोशी, काशीनाथ सिंह, अलका सरावगी, प्रभा खेतान, सुरेन्द्र वर्मा, अखिलेश, संजीव आदि। लेकिन उदय प्रकाश इन सबसे अलग अपनी छवि निर्मित करते हैं। हाशिए के लोगों के जीवन को उनकी शैली में ही अभिव्यक्त करते हैं। ऐसा लगता है कि आम और खास आदमी उन सब को अपनी आँखों से देख पा रहा है, समझ पा रहा है।


उदय प्रकाश की कहानियों में भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद और सूचना-तंत्र से उपजी स्थिति और उसके प्रभावों को केंद्र में रखा जाता रहा है। पर उन्होंने हाशिये के लोगों का नारकीय जीवन भी प्रस्तुत किया है। समाज के ठेकेदारों ने गरीब लोगों का जमकर शोषण किया। इस शोषण का शिकार अलग से बनती है ‘स्त्री’। ऐसा ही कुछ उनकी कहानी ‘मैंगोसिल’ में दिखाई देता है। अमानवीय स्थितियों, व्यक्ति विरोधी व्यवस्था के वीभत्स जंजाल में से कुछ मानवीय, कुछ सुंदर, कुछ जीवनपरक खोजने का प्रयास मैंगोसिल कहानी में दिखाई पड़ता है।

मैंगोसिल, महाराष्ट्र के दलित चन्द्रकान्त थोराट की कहानी है। चन्द्रकान्त, 55 साल के बिल्डर के यहाँ गाड़ी चलाता है। दरोगा के कहने पर बिल्डर, शोभा के घर उसे अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए जाता है। चन्द्रकान्त को इस बात का अंदाजा ही नहीं है कि उसके (शोभा) साथ क्या क्या होता है? शोभा अपने पति के साथ सारणी में रहती थी। रमाकांत (शोभा का पहला पति) इतना नीच आदमी था कि अपनी पत्नी शोभा के लिए दलाल ढूंढता था। अपनी पत्नी की दलाली करने से उसे कुछ रुपये और शराब पीने को मिल जाती थी। पुलिस के दरोगा की नजर शोभा पर पड़ गई। जिसके बाद शोभा कि जिंदगी नरक से भी भयावह बन गई। हर रोज शोभा के साथ बलात्कार होता, जिसमें उसका पति भी शामिल होता। एक दिन दरोगा अपने साथ अधेड़ बिल्डर को शोभा के घर लाता है। वह रात शोभा के लिए भयावह और यंत्रणादायक होती है। इन सब से परेशान होकर शोभा, बिल्डर के ड्राइवर चन्द्रकान्त के साथ भाग जाती है।

कहानी में नया मोड़ आता है। शोभा, चन्द्रकान्त की पत्नी बनकर उसके साथ रहती है। भयावह और यंत्रणा से भरी जिंदगी जीने के बाद, वह माँ बनने का सुख बहुत देर से पाती है। शोभा को दो बच्चे सूर्यकांत और अमरकान्त होते हैं। कहानी के अंत में मैंगोसिल नाम की बीमारी के कारण परेशान होकर सूर्यकांत आत्महत्या कर लेता है।


स्त्री के शोषण की इतनी वीभत्स कहानी, बहुत कम ही दिखाई पड़ती है। शोभा के साथ जो दुर्व्यवहार  किया जाता है वह उपभोक्तावादी संस्कृति का चरम रूप है। जहाँ स्त्री एक वस्तु है। ‘जिसका इस्तेमाल करो और नष्ट कर दो।’ शोभा की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है ‘‘मैली-गँधाती बनियान से मटके की तरह बाहर निकली दरोगा की रोयेंदार रीछ जैसी तोंद और पसीने तथा मैल से चीकट हो चुके उसके जांघिये के बीच धंसा हुआ शोभा का सिर। शोभा की हर सांस के साथ मोहल्ले की नालियों से भी विकट बदबू अंदर जाती और वह बहुत मुश्किल से वहीं, दरोगा की जांघ पर, उल्टी करने से खुद को रोकती। दरोगा दारू पीता हुआ उसके बालों को सहलाता जाता और मुंह से ऐसी आवाज निकालता जैसे उसे नींबू की खटास और हरी मिर्च के तितास का स्वाद एक साथ मिल रहा हो। घर का दरवाजा खुला रहता था और देर रात बाहर गली में निकलने वाले अक्सर यह दृश्य देखते। बल्कि घर के सामने खाली पड़ी जगह, जहाँ लोग दिशा – फरागत के लिए जाया करते थे, वहाँ अंधेरे में, पुलिस के दलाल रमाकांत के घर पर, आधी रात चलने वाली इस जिंदा ब्लू फिल्म को देखने वाले कम उम्र शोहदों की भीड़ लग जाती।’’  दरोगा, बिल्डर, रमाकांत द्वारा शोभा का शोषण पहली, दूसरी दुनिया का शोषणकारी द्वन्द्व और उससे पैदा हुई तीसरी दुनिया (सूर्यकांत $ मैंगोसिल) को प्रतीकात्मक रूप में देखा जा सकता है। यहाँ तीसरी दुनिया के निर्माण की प्रक्रिया को भी समझा जा सकता है कि किस प्रकार शोषण से शोभा और सूर्यकांत की दुर्गति होती है ऐसा एक बहुत बड़ा वर्ग हमारे समाज में पनपता व बढ़ता जा रहा है।


भूमंडलीकरण के कारण नैतिकताएँ, मर्यादाएँ टूट रही हैं। जहाँ सिर्फ स्वार्थ, लाभ और भ्रष्टाचार का ही घिनौना रूप दिखाई देता है। जिस समाज में पति ही पत्नी के लिए दलाल ढूंढ रहा हो, वह समाज क्या नवयुवकों को शिक्षा देगा? जहाँ रक्षक (पुलिस) ही भक्षक हो, वहाँ स्त्री कैसे अपने वजूद की रक्षा कर पाएगी? उसकी अस्मिता और पहचान पर लगातार खतरा मंडराता रहता है। ‘‘भूमंडलीकरण वस्तुतः आर्थिक जगत में पनपने वाला जंगल राज है। यह समाज में आर्थिक स्वरूप के अनुरूप वर्गभेद, विषमता, वर्ग-संघर्ष, कटुता, शत्रुता पैदा कर रहा है। भौतिकतावादी सभ्यता का विकास कर रहा है। इसका मुख्य लक्ष्य ही भौतिक सुख का भोग है।’

उदय प्रकाश समाज का ऐसा घिनौना चेहरा हमारे सामने लाते हैं, जो पाठक के अन्तर्मन को झकझोर के रख देता है। भूमंडलीय यथार्थ एवं भाषा का एक सशक्त उदाहरण कहानी में इस प्रकार हैं बिल्डर और दरोगा ने शोभा के साथ अप्राकृतिक काम किया और बिल्डर ने उसके रेक्टम में बियर की बोतल घुसेड़ दी। दरोगा ने हंसते हुए पूछा – ‘ये क्या कर रहे हो?’ तो बिल्डर ने कहा था – ‘अरे यार पीछे ड्रिल करके जरा बोर बड़ा कर लेने दे, तभी तो नीचे मोटर फिट होगा! साला मेरा बीस हॉर्सपावर का जेनुइन क्रांपटन का मोटर है।’ और ठहाके मार कर हंसने लगा था। शोभा की सांसे रुक चुकीं थीं, वह लहूलुहान थी। कमरे के फर्श पर उसका खून फैल गया था, दरी भीग गई थी और मानिटर पर ब्लू-फिल्म चल रही थी। बेहोशी ने शोभा को उन पीड़ाओं के अनुभव से बचाया, जिनसे होश में रहने पर उसे गुजरना पड़ता। उस रात जब दरोगा और बिल्डर गये, तब सुबह के चार बजने वाले थे। असहनीय दर्द के बीच, बेहोशी टूटने पर शोभा ने जब अपने कपड़े पहनने और अपनी देह में लिपटा खून और वीर्य धोने के लिए उठना चाहा, तो उसने पाया कि रमाकांत उसके ऊपर चढ़ा हुआ है।’’  कहानी का यह प्रसंग हमें भूमंडलीय यथार्थ से रूबरू कराता है। जिसमें इसका साथ ‘भाषा’ देती हैं। जैसे-थूक, लार, वीर्य, खून, ब्लू-फिल्म आदि जैसी शब्दावली जो अब तक की हिन्दी कहानी में वर्जित मानी जाती थी। ‘‘भाषा केवल विचार, भावना, इच्छा एक दूसरे को विदित कराने का व्यावहारिक स्तर का संज्ञापन साधन नहीं। भाषा केवल अपनी-अपनी छोटी बड़ी अस्मिता जतन करने का सामाजिक प्रतीक नहीं। (मैं महाराष्ट्रीयन हूँ ऐसी छोटी-बड़ी अस्मिताएँ हो सकती हैं।) भाषा तो इन सबसे बढ़कर और अधिक कुछ है। भाषा मानव की काव्यात्मक, आध्यात्मिक, वैचारिक सर्जनशीलता को खिलाने का माध्यम भी है। भाषा के वैश्विकीकरण की क्रिया में यह महत्त्वपूर्ण बोध खोना नहीं चाहिए।’’  अशोक केलकर जी ने अपने लेख ‘भाषा का वैश्विकीकरण और वैश्विकीकरण की भाषा’ में ठीक कहा है, लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में भाषा का बोध खत्म होता जा रहा है। जहाँ सिर्फ भाषा को ईजी और फूहड़ बनाने की प्रक्रिया जारी है। समाज में ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं। आए दिन अखबारों, टी.वी. चैनलों पर बलात्कार की खबरें आती हैं। कहानीकार अपने समय और समाज को संबोधित, रचनाक्रम करता है। जिसमें उदय प्रकाश काफी हद तक सफल होते हैं।



भूमंडलीय दृष्टिकोण को जयनन्दन की कहानी ‘विश्व बाज़ार का ऊँट’ से भी समझा जा सकता है। जहाँ उसके भाषाई पहलू खुलकर सामने आते हैं। किस तरह भूमंडलीकरण के कारण समाज का दोहन हुआ है और हो रहा है। जहाँ अब पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतर नहीं दिखाई देता, बल्कि कुछ सालों के फासले ही इस अंतर को बढ़ा देते हैं। युवा पीढ़ी पर उपभोक्तावादी समाज और बाज़ार का विशेष प्रभाव पड़ा है। आज कोई भी सूचना आप को तुरंत मिल जाएगी। जिसके कारण आज जैसे बच्चों का बचपन खोता जा रहा है। पहचान का संकट और भाषाई अस्मिता आज खतरे में दिखाई देती है। ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ में भाषाई अस्मिता को बखूबी देखा जा सकता है। भूमंडलीय यथार्थ को समझने के लिए उसी भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए, जो वर्तमान दौर में बोली जा रही है। ‘मैंगोसिल’ कहानी में लेखक ने उसी यथार्थ को पकड़ने की कोशिश की है। कहा जा सकता है कि ‘‘ ‘वारेन हेस्टिंग का साँड’, ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’, ‘और अंत में प्रार्थना’, ‘मैंगोसिल’, ‘मोहनदास’ और ‘पीली छतरी वाली लड़की’ ये कहानियाँ साहित्य में नव औपनिवेशिक परिवेश, पात्र, अस्मिता और आत्मनिर्वासन का द्वंद, इतिहास और आख्यान का जटिल तनाव, संप्रेषणीयता और वाक्य संरचना, यथार्थ कल्पना और फैंटेसी, आख्यान के पारंपरिक स्वरूप तथा बदलते यथार्थ के संदर्भ में नयी संरचना की चुनौतियाँ, भाषा में परिवर्तन के साथ ही नये संदर्भों की बहुलार्थी भाषा को लेकर हमारे समय के यथार्थ को पकड़ती है, अभिव्यक्ति करती है, खंडित करती है, और उसे गढ़ती भी है।’’


इस प्रकार हम कह सकते है कि भूमण्डलीकरण ने हमारे भाव, भाषा और बोली को भी बदल कर रख दिया है। बाज़ार ने ‘भाषा’ रूपी संस्कार को बुरी तरह बदल दिया हैं। बाज़ार ने जिस नई भाषा को गढ़ा है, उसका असर समाज पर भी पड़ा है, उसे कथा साहित्य के माध्यम से बखूबी समझा जा सकता है। कथाकार उदय प्रकाश ने अपने कथा साहित्य में उस बदलती हुई भाषा पर फोकस किया है तथा भूमण्डलीय यथार्थ से हमारा परिचय रचनात्मक स्तर पर करवाया है।

संदर्भ: 

   1शीतलवाणी, त्रैमासिक पत्रिका, संपादक-डॉ. वीरेंद्र आज़म, अगस्त-अक्टूबर 2012, सहारनपुर, पृ. 22.
 
2भारत का भूमंडलीकरण, संपादक-अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, संस्करण-2008, पृ. 21.
 
3हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, डॉ. अमरनाथ, राजकमल प्रकाशन, पहला                              संस्करण-2009, पृ. 372.
  
4भूमंडलीकरण और हिन्दी उपन्यास, पुष्पपाल सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, पहला संस्करण-2012, पृ. 72-         73.
  
5मैंगोसिल कहानी संग्रह, उदय प्रकाश, पृ. 91.
  
6 अक्षर पर्व, साहित्यिक-वैचारिक मासिक पत्रिका, संपादक-सर्वमित्रा सुरजन, दिसम्बर-2014, पृ. 66.
 
7मैंगोसिल कहानी संग्रह, उदय प्रकाश, पृ. 92.
 
8आलोचना, त्रैमासिक पत्रिका, प्रधान संपादक-नामवर सिंह, संपादक-परमानंद श्रीवास्तव, अप्रैल-जून     2002, पृ. 89.
 
9सृजनात्मकता के आयाम, उदय प्रकाश पर एकाग्र, संपादक-ज्योतिष जोशी, नयी किताब प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2013, पृ. 87.

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1.जाति कोई अफ़वाह नहीं
                                
किताब के बारे में 


रोहित वेमुला एक शानदार लेखक थे और उनका लेखन आधुनिक भारत में जाति की पीड़ादायक हक़ीक़त को बयान करता है। 17 जनवरी 2016 को खुदकुशी कर लेने वाले रोहित ने फेसबुक पर आठ साल के अपने लेखन के दौरान गाज़ा से लेकर गाज़ियाबाद तक, शायद ही कोई मुद्दा हो जिस पर टिप्पणी नहीं की हो। जाति से लेकर गाय की राजनीति तक पर लिखी गई पोस्टों में वे एक गज़ब की काव्यात्मक भाषा और रेडिकल नज़रिए के साथ अपनी बात कहते हैं, जिसमें ताज़गी है, मुद्दों को सुलझाने की एक ज़िद है और सवाल करने का अपार साहस है।

लेखक परिचय


रोहित वेमुला (26 वर्ष) हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक होनहार शोधार्थी और एक छात्र नेता था, जो डॉ. बी.आर. आंबेडकर के जाति के खात्मे की लड़ाई में मजबूती से यकीन करता था। उसे विश्वविद्यालय कैंपस में होस्टल और सार्वजनिक जगहों से बहिष्कृत कर दिया गया था और 17 जनवरी 2016 को अपनी खुदकुशी के बाद वो दलितों के प्रति होनेवाले भेदभाव के खिलाफ व्यापक आंदोलन का चेहरा बन गया। रोहित की मां राधिका वेमुला और उसके छोटे भाई राजा वेमुला उसके इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहे हैं।

खास बातें


• इस साल के सबसे चर्चित युवा शख्सियतों में से एक
• पहली बार उनका लेखन प्रकाशित हो रहा है
• देश भर में उनके इंसाफ के लिए चल रहे आंदोलन में लाखों युवा भाग ले रहे हैं। सबकी रुचि उनका लिखा पढ़ने में है।


 प्रकाशक :जगरनॉट बुक , लेखक: रोहित वेमुला, प्रकाशन:जनवरी 2017• कीमत:250• पृष्ठ 302


 2.शाह मोहम्मद का तांगा
   
  किताब के बारे में 


सतलुज में बाढ़ आई है और गांव ख़ाली हो गया है। क्या मदद का इंतज़ार करते बेसहारा क़ायम दीन को बचाने कोई आएगा या वो डूब जाएगा? तांगे वाला शाह मोहम्मद मोटर गाड़ियों की फंतासी में जीता था, लेकिन क्या हुआ जब फंतासी से निकल कर मोटर गाड़ियां उसके रास्ते में आ खड़ी हुईं?

इन कहानियों में कोई भी एक आदर्श किरदार नहीं है। दबे-कुचले तबकों से आने वाले इन किरदारों में अच्छाइयां भी हैं और बुराइयां भी। वे एक दूसरे से प्यार भी करते हैं और किसी की जान भी ले सकते हैं। अपनी सादगी में ये कहानियांप्रेमचंद के करीब हैं तो अपने कसैलेपन में मंटो की याद दिलाती हैं। नातिक़ अपनी इस शोहरत पर खरे उतरे हैं कि वे पाकिस्तानी अदब की दुनिया के सबसे चमकदार सितारे हैं।

लेखक परिचय


अली अकबर नातिक़ का जन्म 1974 में ओकारा, पाकिस्तान में हुआ था। मैट्रिक करने के बाद उन्होंने अपने परिवार के गुज़ारे के लिए एक राजमिस्त्री के रूप में काम करना शुरू किया और गुंबदों और मीनारों के माहिर मिस्त्री बन गए। उन्होंने उर्दू और अरबी साहित्य खूब पढ़ा और प्राइवेट से बीए की डिग्री हासिल की। उन्होंने उर्दू पत्रिकाओं में अपनी शुरुआती कहानियों और कविताओं के प्रकाशन के साथ ही साहित्य की दुनिया में अपना खास मुकाम बना लिया। उन्हें उर्दू में लिखने वाले बेहतरीन युवा लेखकों में से एक माना जाता है।

 खास बातें


• पाकिस्तानी के सबसे मशहूर लेखकों में से एक
• हिंदी में पहली बार प्रकाशित कहानी संग्रह
• प्रेमचंद और मंटो की परंपरा की कहानियां


 प्रकाशक :जगरनॉट बुक, लेखक: अली अकबर नातिक़, प्रकाशन:जनवरी 2017• कीमत:250• पृष्ठ 204•

3 .ज़िंदगी लाइव
   26/11 की वह रात जो खत्म नहीं हुई

किताब के बारे में 


मुंबई 26/11 की रात। हर तरफ़ अफरा-तफरी का माहौल पसरा हुआ। वहीं दिल्ली में टीवी ऐंकर सुलभा और उनके रिपोर्टर पति विशाल काम की आपाधापी में अपने छोटे-से बेटे अभि को क्रेच से उठाना भूल जाते हैं। ये भूल बहुत भारी साबित होती है। उनका बेटा गुम हो जाता है और बाद में उसका अपहरण कर लिया जाता है। उसकी तलाश में वे बदहवास हो जाते हैं। क्या अभि उन्हें मिल जाएगा या ये उनके जीवन के सबसे भयावह दिन होंगे?

लेखक परिचय


प्रियदर्शन एनडीटीवी में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और एक वरिष्ठ लेखक और कवि हैं। विभिन्न प्रकाशनों से उनकी कई फिक्शन और नॉनफिक्शन किताबें छप चुकी है। इसके अलावा वे जाने मानी कृतियों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

खास बातें


• यह एक अपराध कथा है जो बड़ी तेजी से आगे बढ़ती और रोमांचक मोड़ लेती है
• इस कहानी की पृष्ठभूमि 26/11 के मुंबई हमले हैं
• लेखक एक जानेमाने टीवी पत्रकार और कवि हैं

 प्रकाशक :जगरनॉट बुक, लेखक: प्रियदर्शन, प्रकाशन: अक्तूबर 2016 • कीमत:250• पृष्ठ 258•

4.लक्ष्मी प्रसाद की अमर दास्तान 

किताब के बारे में 


एक दुबली और लंबी सी लड़की पूरे गांव को बदल देती है. अड़सठ साल की बूढ़ी नोनी आपा एक शादीशुदा आदमी की ओर आकर्षित हैं और सोचती हैं कि रिश्तों को परिभाषित करना ज़रूरी क्यों है. बबलू केवट का परिवार आतंकित है कि उसपर सेनिटरीनैपकिन्स का जुनून सवार है और पांच शादियां करनेवाली एक नौजवान लड़की अपनी हरेक शादी के मंसूबे बनाते वक्त मौसम की भविष्यवाणियों पर नज़र रखती है. इस मज़ेदार, बारीक निगाहों वाली और समझदार क़िस्सागोई से आप खुद को दूर नहीं रख सकेंगे.

लेखक परिचय


ट्विंकलखन्ना एक मशहूर स्तंभकार और बेस्टसेलिंग किताब मिसेज़फनीबोन्स की लेखिका हैं। वे मुंबई में रहती हैं।

खास बातें


• ये अंग्रेजी की बेस्टसेलर कहानियां हैं
• ट्विंकलखन्ना के प्रशंसकोंकी एक बड़ी तादाद है और लोग उनकी लिखी रचनाएं पसंद करते हैं



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प्रस्तुति :मनीषा कुमारी 

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