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कर्मानन्द आर्य की कवितायें: अगली पीढ़ी की लड़की और अन्य

कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

काठमांडू का दिल

लड़कियां जो सस्ता सामान बेचकर
लोगों को लुभाती हैं
लड़कियां जो जहाजी बेड़े पर चढ़ने से पहले
लड़कपन का शिकार हो जाती हैं
उन्हीं को कहते हैं काठमांडू का दिल
पहाड़ तो एक बहाना है
उससे भी कई गुना शक्त है वहां की देह
उससे भी कहीं अधिक सुन्दर हैं
देहों के पठार
और अबकी बार जब भी जाना नेपाल
उसका बचपन जरुर देख आना
होटल में बर्तन धोते किसी बच्चे से ज्यादा चमकदार हैं उनकी आँखें
नेपाल में आँखे देखना
थाईलैंड नहीं
जो आवश्यकता से अधिक गहरी और बेचैन हैं
फिर दिल्ली के एक ऐसे इलाके में घूमने जाना
जिसे गौतम बुद्ध रोड कहते हैं
जो कई हजार लोगों को मुक्त करता है
उनके तनाव और बेचैनी से
वहां ढूँढना वह लड़की जो सस्ता सामान बेचकर
जहाज ले जाती है अपने गाँव

पढ़ें : सुनो चारुशीला और अन्य कवितायें

मिलन

पैरों की धूल चढ़कर बैठ जाती है माथे पर
उसे उतारता नहीं हूँ
तुमसे प्यार है तो तुम्हारी धूल भी पसंद है मुझे
यानी प्यार में सुखी होने के लिए
वह सब करता हूँ जो पसंद भी नहीं
पुरुष का अहंकार नहीं
यह प्यार है
जिसमें बन जाना होता है छोटा
झुक जाना होता है जमीन तक
चलना होता है लंगड़ाकर
गिरकर, और गिरना होता है
यह प्यार ही है
झुकता हूँ, चलता हूँ, दौड़ता, हांफता हूँ
फिर गिर पड़ता हूँ
गिरकर होता हूँ सुखी
इसी क्रम में चढ़ती है धूल, थकती हैं साँसें
कोई पड़ाव नहीं आता
प्यार के लिए

जाने कितने बरस, जाने कितनी सदियाँ
बीत चुकी हैं
दौड़ रहा हूँ, भाग रहा हूँ
मिलन की चाह है
अभी तक आधा अधूरा है मिलन

पढ़ें मैं अपनी पीढ़ियों में कायम हूँ, मैं इरोम हूँ

प्रतिमान

कविता की कचहरी में
हमारे लिखने से कई लोग
संदेह से भर गए हैं कि तुम लिखने कैसे लगे हो
कमजोर है तुम्हारी भाषा
मटमैले हैं तुम्हारे शब्द
अभी तो अक्षर ज्ञान लिया है तुमने
कैसे लिख सकते हो, तुम
सुनहरी सुबह, दशरथ मांझी के हौसले सी होती है
मौसम,
मेरी कॉम जैसा होता है
और मिज़ाज
फूलनदेवी सा
कैसे लिख सकते हो तुम कि तराई की औरतें
अपना देह बेचकर जहाज लाती हैं
भूख ईलाज है धनपशुओं के लिए
कैसे लिख सकते हो तुम

कैसे लिख सकते हो
सताए हुए लोग क्रांति का बीज बोते हैं
भूख से बिलखकर
कविता नहीं लिखी ग्वाले ने
जब बाजार में सजी कविता
वह नहीं था दूधिये का पैरोकार
कैसे लिख सकते हो तुम
परिंदे की उड़ान से बनी
लड़ते आदमी की देहें
बहुत घायल हैं
कैसे लिख सकते हो तुम
कविता हमारी पहचान है
इस इलाके में तुम कैसे ?
अनगढ़ है भाषा
टूटे हुए हैं शब्द
काँप रही है इनकी भंगिमा

माई बाप !
लिखने दीजिये हमें
अभी तो लिखनी है हमें अगली सदी की कविता
हम तैयार कर रहे हैं
संगीत की सुन्दरतम धुन
कला के मोहक रंग
कविता में चाहतों का इच्छित इतिहास
आदमी के आदमखोर होते जाने की पीड़ा
नगर से गाँवों की तरफ
लगातर बढ़ रही धुंध
हमें लिखने दीजिये पोथी
हमारी यही अनगढ़ता प्रतिमान बनेगी एक दिन
हमारी कविता में

पढ़ें : कर्मानन्द आर्य की कवितायें

साथ

पेड़ चाहता है ऊँचा उठे
धरती चाहती है फैले
सूरज चाहता है किसी भी तारे से
अधिक चमकदार और गहरा दिखाई दे उसका चेहरा
हवा चाहती है निर्झर
नदी चाहती है समुद्र से सुन्दर हो उसकी काया
सड़क चाहती है सभ्यतायें उसकी हमसफ़र हों
मैं मनुष्य होकर

कुछ नहीं चाहता था
सिवाय इसके कि दुनिया बच्चेदार और खूबसूरत बनी रहे
हवा चले तो गीत बजें
हाथ सलामत रहें तो रोटी का जुगाड़ रहे
सच बोलें तो दोस्त खड़े हों साथ
तरक्की हो
कसरत करें तो मोहतरमा की सेहत बढ़े

मैंने वह सब किया है जो मनुष्य होने के नाते करते हैं लोग
पर आज मुआफ़ी मांग रहा हूँ दोस्त
मैंने अगली सदी के लिए कुछ नहीं किया
नदियों को पंगु किया
पेड़ोंके तोड़ दिए पाँव
खोद डाला चट्टानों का दिल
और तो और
ड्रग्स तक बेचा है मेरी सदी के लोगों ने

प्रकृति के सहारे जीने वाले मेरे दोस्त
न्याय के कटघरे में खड़े अपने इस दोस्त को बताओ
अगली सदी का मनुष्य किसके पापों की सजा पायेगा

पढ़ें कर्मानंद आर्य की कवितायें : वसंत सेना और अन्य

अगली पीढ़ी की लड़की

हमारी कोई ब्रांच नहीं है
हमारी कोई सीरीज नहीं है
हमारी कोई श्रृंखला नहीं है
हम इस दुनिया में बिलकुल अकेली हैं
हमसे मिलना तुम
हम लड़ती हैं तो समूह नहीं बनाती
हम दौड़ती हैं तो समूह नहीं बनाती
हम काम करती हैं तो समूह नहीं बनाती
हम असंगठित मजदूर हैं
सभाभवन की
जहाँ दहाड़ती हैं राजा की आवाजें

मुखविर हैं काली मूछें
हम चुहियायें हैं व्यवस्था की
हम अठारह से चौबीस हैं
हमारी किताब की गिनती ख़त्म हो जाती है चालीस बाद
लोगों को पसंद नहीं आते हमारे सूखे स्तन
जैसे चंद्रमा उतरता है
काली अँधेरी नदी में वैसे ही उतर जाती हैं हम
वैसे उतरती है हमारी उम्र
हम सेब नहीं रह जातीं
हम अनार नहीं रह जातीं
हम कटहल हो जाती हैं भाषा में
हमें खाती जाती है हमारी चिंता

सुनो बाबू !
ये जो तुम रात भर खेलते हो हमारे साथ लुकाछिपी
करते हो मर्यादा तार-तार
बनाते हो पतनशील
पत्नी और वेश्या को एक साथ मिला लेने का करते हो स्वांग
प्रेमिकाओं के तलछट पर रगड़ते हो माथा
यही वे करने लगें
तब बताओ क्या कहोगे तुम
क्या करोगे तुम जब बगावत की वेदी पर डाल दें वे
गंदी सोच का कूड़ा
जो पतनशील हैं
वे ज्वलनशीलहो गई हैं इन दिनों
वहीव्यवस्थाकी जंजीर तोड़कर
जी रहीं हैं काठ का जीवन

हम वही हैं हमारी कोई ब्रांच नहीं है
नहीं है हमारा संघ
नहीं है हमारी शाखा !!

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

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मुस्लिम स्त्रियों के मसले पर अतिसक्रिय संघ-भाजपा की स्त्रीविरोधी विरासत



मुकेश कुमार 


आज जहां मुस्लिम स्त्रियों के बुर्के और तीन तलाक संघियों का प्रिय मुद्दा बना हुआ है, वहीं हिन्दू स्त्रियों के जिंस-पैंट अथवा अन्य फैशनेबल ड्रेस भी इनके निशाने पर रहते हैं. स्त्रियों के बदन पर ज्यादा और कम कपड़े-दोनों संघियों को परेशान करते हैं. कौन क्या खाये-क्या पहने, यह तय करते हुए पितृसत्तात्मक हिंदुत्ववादी मूल्यों की ये पताका फहरा देना चाहते हैं. कुल मिलाकर स्त्रियों को लेकर इनके ख्यालात परस्पर अंतर्विरोधी ही कहे जाएंगे. सच्चाई तो यह है कि बुर्का -हिजाब और तीन तलाक का मुद्दा ये इसलिए उठाते हैं क्योंकि इस बहाने इन्हें मुसलमानों और इस्लाम पर हमला करने का अवसर मिल जाता है. इनकी वास्तविक चिंता में स्त्रियों की मुक्ति का एजेंडा न तो पहले कभी रहा है और न ही इस बार भी है. उनका मकसद स्त्रियों को औजार के रूप में इस्तेमाल करने का ही रहा है.

स्त्रियां कैसे ज्यादा से ज्यादा शिक्षित हों, इसकी चिंता इन्हें नहीं रहती है. इसके बजाय शिक्षा का निजीकरण व भगवाकरण करने को लेकर ही ये चिंतित रहते हैं और उसी दिशा में इनके कदम बढ़ते हैं. स्त्रियों के नौकरी व अन्य रोजगार में जाने और आर्थिक तौर पर स्वावलंबी बनने को ये हमेशा हिकारत की नजर से देखते हैं. इस मामले में ये आज भी मनुस्मृति को ही अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं. इनके लिए स्त्री के दो रूप हैं- स्त्री या तो देवी है या फिर चाहरदीवारी में कैद मध्ययुगीन भोग की वस्तु. बच्चे पैदा करने की मशीन. इसलिए ये बीच-बीच मे मुसलमानों का खतरा बताकर हिंदुओं से 4 और दस बच्चे पैदा करने की भी अपील करते ही रहते हैं. स्त्रियों को लेकर इनका यह दो अतिवादी नजरिया है. यानी स्त्रियां इनकी नजर में ‘मनुष्य’ कभी नहीं हैं.


मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ

यही वजह है कि संघ में आज भी स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है. अंतिम निष्कर्ष में ये स्त्रियों को पुरुषों के बराबर मानने के बजाय पुरुषों के मातहत ही रखना चाहते हैं. अपना गणवेश तय करने में ये एकदम आधुनिक हो उठते हैं और ‘हाफ’ से लेकर ‘फुल’ पैंट तक पहुंच जाते हैं. उस वक्त इन्हें अपनी परंपरा-संस्कृति का वस्त्र धोती-कुर्ता और भगवा वस्त्र याद नहीं आता है, किन्तु स्त्रियों को ये साड़ी-ब्लाउज में ही देखना पसंद करते हैं. स्त्रियों के स्वतंत्र निर्णयों को ये गुंडा वाहिनी और खाप पंचायत बनाकर भी कुचल देने पर आमादा रहते हैं. लव जिहाद के नाम पर ये साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के साथ-साथ स्त्रियों को अपने काबू में ही रखने की ही कोशिश करते हैं.
दरअसल संघ-बीजेपी आज भी राष्ट्रीय आंदोलन की उसी समाजसुधार विरोधी-स्त्रीविरोधी धारा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके आक्रामक अगुआ तिलक और थोड़े लिबरल अगुआ मालवीय थे. यह अकारण नहीं है कि सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने मालवीय को भारत रत्न के सम्मान से नवाजा. तिलक ने अपने दौर में बालिका विवाह पर रोक लगाने का तीखा विरोध किया था और कांग्रेस अधिवेशन के मंच से सामाजिक सम्मेलन की चली आ रही परम्परा पर उग्र विरोध के जरिये समाप्त कराया था.

प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिला आंदोलन का पत्र/ तीन तलाक से निजात की मांग

सूक्ष्मता से संघ-बीजेपी के चाल-चरित्र को देखें तो स्त्रियों को लेकर इनका अप्रोच खुलकर सामने आ जाता है. स्त्रियों की मुक्ति से इनका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है. हिन्दू स्त्रियों की हजारों वर्षों की पितृसत्तात्मक गुलामी के खात्मे के लिए इनके पास न तो कोई सकारात्मक एजेंडा है और न ही कोई कार्यक्रम. मुस्लिम स्त्रियों का बुर्का अगर उनके विकास में बाधक और गुलामी का प्रतीक है तो हिन्दू स्त्रियों का घूंघट, सिंदूर, चूड़ी और अन्य आभूषण कौन सा हिन्दू स्त्रियों की मुक्ति में सहायक है! लेकिन हिन्दू स्त्रियों को इससे मुक्ति मिले- इसपर ये कभी कुछ नहीं बोलेंगे, उलटे वे इन चीजों की तरफदारी ही करते दिख जाएंगे. विधवा प्रथा, सती प्रथा से लेकर बाल विवाह तक के पक्ष में आज भी ये कुतर्क करते और उसे महिमामंडित करते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं. भारत में चिंताजनक ढंग से बढ़ती बालिका भ्रूण हत्या और स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में गिरावट इनके चिंता का विषय बनते कभी किसी ने नहीं देखा होगा. बलात्कार की घटनाओं पर इनके नेताओं की स्त्रीविरोधी शर्मनाक पितृसत्तात्मक प्रतिक्रिया तो जगजाहिर ही है. बलात्कारी के बजाय बलत्कृत स्त्री में ही सारा दोष ढूंढते हुए ये बलात्कारी का बचाव करते हुए देखे जा सकते हैं. इसलिए स्त्रीविरोधी आचरण करने वाले तथा बलात्कार के आरोपी को अपनी पार्टी में शामिल करने में इन्हें कभी कोई नैतिक परेशानी नहीं होती. संघ-बीजेपी के इस मंसूबे को समझना जरूरी है. और स्त्री प्रश्न को पितृसत्तात्मक व धार्मिक दायरे में हल करने के बजाय स्त्री-पुरुष बराबरी की दिशा में निरंतर बहस व संघर्ष को आगे बढ़ाने की जरूरत है. स्त्री के बहाने एक धर्म विशेष को टारगेट करने के इस षड्यंत्र के खिलाफ सही पोजीशन सामने लाना होगा, अन्यथा आरएसएस-बीजेपी इस मुद्दे के आधार पर हमेशा नफरत की राजनीति करता रहेगा. जब बाबासाहेब डा. आंबेडकर हिन्दू कोड बिल के लिए संघर्ष कर रहे थे, जिसके तहत हिन्दू सवर्ण महिलाओं की जिन्दगी बेहतर बनाने की दूर-दृष्टि काम कर रही थी, तब संघ और उसकी विचारधारा के लोग उसका विरोध कर रहे थे. आज मुस्लिम स्त्रियों के मसले पर वे अतिसक्रिय हैं

मेल:drmukeshkumar.bgp@gmail.com 
मो.9911886215

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वृत्तचित्र ‘तेरी जमीं तेरा आसमां’ का प्रीमियर 29 अप्रैल को अमेरिका में

‘तेरी जमीं तेरा आसमां’ नामक 45 मिनट के वृत्तचित्र की थीम है ‘भारतीय नारी! तू आजाद कहां।’ इस फिल्म में विभिन्न क्षेत्रों की भारतीय महिलाएं चाहे वे सामान्य घरेलू महिलाएं हों या असाधारण काम करने वाली कोई स्त्री, शिक्षिकाएं हों या श्रमिक, छात्राएं हों या अधिवक्ता, आधी आबादी का आधा आकाश छेंकने वाली ये महिलाएं आपसे बात करती हैं। दर्शकों के साथ अपने अतीत और वर्तमान की यात्रा को साझा करते हुए वे बताती हैं कि उनके लिए अब और भविष्य में आजादी के मायने क्या हैं? वे बताती हैं कि कैसे पीडि़त अथवा संरक्षित की छवि से परे वे अपने आसपास होने वाले बेहतर और सकारात्मक बदलाव की कारक बनना चाहती हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की औरतों की ज़ुबानी कही गई कहानी है, जहां पैदा होने वाली पूर्णा मालावत, कल्पना चावला और टीना डाबी अपने सपनों को न केवल पूरा कर सकीं बल्कि उन्होंने  पूरा आकाश छू लिया।

शनिवार , 29 अप्रैल 2017, को यूनाइटेड स्टेटस में ‘ब्रैंडिज युनिवर्सिटी, बोस्टन’  के द हेलर स्कूल के एंफी थिएटर में इस फिल्म का पहला शो 12.15 मिनट पर होगा.  जीवन गावंडे द्वारा निर्देशित, मनीषा बांगड़ की  पटकथा और कांसेप्ट पर बनी  बेहद कम बजट वाली इस फिल्म का निर्माण बामसेफ और एएएनए के कार्यकर्ताओं द्वारा दिए गए चंदे से किया गया है। पहले शो के अवसर पर मनीषा बांगड़ वहाँ उपस्थित होंगी. वे 30 अप्रैल को ‘ब्रैंडिज युनिवर्सिटी, बोस्टन’ में ‘पितृसत्ता और भारतीय स्त्रीवाद’ पर आयोजित सेमिनार में भी हिस्सा लेंगी.

देखें एक टीजर :

डॉ. मनीषा बांगड़ बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। वह देश में मूलनिवासी बहुजन की प्रमुख आयोजक हैं। वह पेशे से हेपटोलॉजिस्ट चिकित्सक हैं जो लीवर, गॉल ब्लैडर और पैंक्रियाज आदि से संबंधित शाखा है। डॉ. बांगड़ हैदराबाद स्थिति डेक्कन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेज में गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी और हेप्टोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर भी हैं।  वह विभिन्न मीडिया पोर्टलों पर लिखती और बोलती रही हैं। बीते एक दशक के दौरान उनको कई प्रमुख राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों, शासकीय उद्यमों, मानवाधिकार और फुले-अंबेडकर की वैचारिकी वाले संस्थानों में बतौर वक्ता आमंत्रित किया गया है। इनमें संयुक्त राष्ट्र, इसरो, ओएनजीसी, नाल्को, जेएनयू, एचसीयू आदि प्रमुख हैं। इस दौरान उन्होंने लैंगिक समानता, स्वास्थ्य, विज्ञान और शिक्षा से लेकर जाति और फुले, पेरियार तथा आंबेडकर, राष्ट्र, राष्ट्रीयता  और लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद तक पर अपनी बात रखी।

जीवन गावंडे मूलनिवासी पब्लिकेशन ट्रस्ट के बोर्ड के सदस्य हैं। वह आवाज इंडिया टीवी के एक्ज्क्यूटिव प्रोड्यूसर और सब एडिटर भी हैं। उन्हें विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़े मुद्दों और ख्यात व्यक्तित्त्वों के जीवन पर 90 वृत्तचित्र बनाने का श्रेय हासिल है। उनकी फिल्मों शिक्षा में षडयंत्र और संत रविदास को व्यापक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सराहना मिली। फिलहाल वह केरल और आंध्र प्रदेश में बौद्घ विरासत की खोज विषय से संबंधित एक वृत्त चित्र की योजना पर काम कर रहे हैं।

विकल सिंह की कवितायें

विकल सिंह


गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत है. . संपर्क: vikalpatel786@gmail.com मो: 07897551642

आदिवासी स्त्री

“वह सभ्य समाज की जड़ता को
सिंचित करती नक्कासी में,
न धर्म-भेद का ज्ञान उसे
न जाती मथुरा काशी में !
रहती सदैव वह कर्मरत
नक्कासी, शिल्प में हस्तरत,
मुख पे मनुष्यत्व का तेज लिए
रहती सदैव संघर्षरत !”



हिंदी साहित्य में आदिवासी स्त्री का सवाल


आदिवासी विकास का अद्वैत प्लम्बन

ऐसा क्यों है कि
हमारी बस्तियाँ
तुम्हारी आँख की किरकिरी
बनती जा रही हैं ?
हर ज़ानिब1
हमारे ही घर क्यों
दीखते हैं तुम्हें ?
तुमने जो विकास का
खाका तैयार किया है,
उसमें हमारा विकास
तो नदारद है ।
गर कुछ है तो
हमारे बीवी, बच्चों
की चीखें और
हमारी उम्मीदों का
टूटना है ।
तुम जानते हो
कि इन उम्मीदों और सपनों के
सिवा कुछ भी तो नहीं है
हमारे पास खोने को !
ये पहाड़, ये झरने
ये प्रकृति ही हमारी
धरोहर है !
क्या तुम इसे भी
छीन लेना चाहते हो ?
नहीं ! नहीं ! साहब !
यदि विकास हमारी

बस्तियों का उजड़ना है
तो नहीं चाहिए
हमें ये विकास !
क्योंकि इन बस्तियों
का उजड़ना
हमारी अस्मिता,
सभ्यता और
संस्कृति का उजड़ना है हम प्रकृति की
गोद में रहते आये हैं,

ये झरने ये पहाड़
हमें अत्यधिक प्यारे हैं ।
हमें अपने हाल
पे छोंड दीजिए साहब !
जाइए पहले विकास का
अद्वैत2 प्लम्बन3 तैयार कीजिए,
जिसमें विकास मुख्य धारा के
लोगों का नहीं, बल्कि हमारा हो
हमारी संस्कृति मरे नहीं,
हमारे बच्चे चीखें नहीं,
और हम
प्रकृति की गोद में मुस्कराएँ !”
1. दिशा  2. भेद रहित  3. तरीका

नगाड़े की तरह बजते है शब्द

मैं स्त्री हूँ, जरा गौर से देखना मुझे

“मैं स्त्री हूँ,
जरा गौर से देखना मुझे…
देखना तुम
मेरे माथे की बिन्दिया को
जो मेरी है पर चमकती
किसी और के लिए !
मैं स्त्री हूँ,
जरा गौर से देखना मुझे…
देखना तुम
मेरे सिन्दूर को
जो मेरा है पर नाम उस पर किसी
और का है !
मैं स्त्री हूँ,
जरा गौर से देखना मुझे…
देखना तुम
मेरे नाम को
जिस पर अधिकार
किसी और का है !
मैं स्त्री हूँ,

जरा गौर से देखना मुझे…
मेरा सब कुछ किसी
और का है,
बताओ मुझे, मुझ में
मेरा क्या है ?”

एक स्त्री की व्यथा


“मैं एक ऐसी वस्तु बना दी गई
जिसे जैसा चाहा इस्तेमाल किया जाता रहा ।
वस्तु, जिसका कोई मूल्य नहीं
कोई नाम नहीं
कोई जाति नहीं
कोई धर्म नहीं
जब जिसे जैसी जरूरत हुई,
इस्तेमाल किया मुझे !
लगातार मुझे हाशिए की ओर
ढ़केले जाते हुए भी
मैं कभी टूटी नहीं, हमेशा
हाशिए को ही हथियार बनाने की
कोशिश में जुटी रहती हूँ ।
कभी मेरे शरीर को आंटे की
लोथी सा मसला गया,
तो कभी देह पर पड़े निशान
कई दिनों तक
याद दिलाते रहे मुझे, उस
निरीह अवस्था को !
क्या मैं इतनी कमज़ोर हूँ कि
इसका प्रतिकार तक न कर सकी,
या निर्मित किया गया है मुझे
कुछ ऐसा ही !
क्यों बचपन से मुझे
कम बोलने, कम खाने, तेज न दौड़ने जैसे
संस्कारों में ढ़ाला गया ?
शायद इसलिए कि मैं
इसका प्रतिकार ना कर सकूँ !”

खुदमुख्तार स्त्रियों का कथा -वितान: अन्हियारे तलछट में चमका

आधुनिकता का आइना


“शहर से गर्मियों की छुट्टियों में
आना होता था जब गाँव
गाँव आते ही सुखिया चाचा
दौड़कर आते
और
पूछते मेरी राजी ख़ुशी !
बातों ही बातों में
पूरे गाँव का हाल बता देते वो
यूँ उम्र में वो पचास के पार होंगे
पर चेहरे में बुढ़ापे की एक झलक भी न थी
कोसों  दूर पैदल चले जाते
पर वो तो सुखिया चाचा थे
जो बुढ़ापे में भी जवानी का दम रखते थे
अब तो रामू, शिवबरन और माधव
जवानी में भी बूढ़े नज़र आते हैं
सुना है रामू बहुत तेज कार चलाता है
वक़्त की रफ़्तार से भी आगे
निकलना चाहता है शायद !”

टूटते सपने 

“आम जन में एक आह है,
एक टीस है
उन सपनों के न पूरे होने की,
जिन्हें वह पालता है,
पोषता  है,
अपनी खुशियों के लिए,
अपने विकास  के लिए
पर वही सपने एक दिन बिखर जाते हैं
मुट्ठी में आई हुई रेत की तरह !
क्यों उनके सपने संवरने से
पहले बिखर जाते हैं ?
क्यों आर्थिक तंगी उन्हें,
दिनों-दिन
खोखला कर रही है ?
क्या यह सारी सुख-सुविधाएँ
बस चन्द लोगों के लिए हैं ?
जो संसद पर बैठे हैं और
सारे ऐशो-आराम भोगते हैं ।
तब क्या धूमिल का कहना
न्याय संगत है,
कि क्या आज़ादी सिर्फ़
तीन थके हुए रंगों का नाम है,
जिसे एक पहिया ढ़ोता है ?
यह पहिया है मध्यवर्ग,
जो आज़ादी के पूर्व से अब तक
गतिशील है,
उसका लगातार घूमना
उसके संघर्ष का प्रतीक है ।

कभी तो उसका संघर्ष ख़त्म होगा,
कभी तो उसके सपने पूरे होंगे,
कभी तो वह सही मायने में
स्वतंत्र होगा,
बस इसी उम्मीद के साथ
आज आम जन जिन्दा है ।”

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सांस्कृतिक पिछड़ापन और हाशिये से उभरती कविता

रविता कुमारी

हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय
हरिद्वार, उत्तराखण्ड
ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in



भारत सम्मान का वह शब्द है जिसके आगे विश्व नतमस्तक होता है। इसकी कला, संस्कृति, दर्शन, योग और विज्ञान की चर्चा विदेशियों तक ने की है। भारत का वह समाज जो सामाजिक न्याय और आपसी सहयोग में विश्वास करता है और अपने नागरिकों को संवैधानिक रूप से मिलजुल कर रहने का सन्देश भी देता है। सामाजिक समरसता सबको न्याय और स्वतंत्रता देने की बात करती है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत विविध भाषाओँ, विभिन्न बोलियों, विभिन्न संस्कृतियों, अस्मिताओं और परम्पराओं का देश है।  सामान नागरिक संहिता यहाँ की विशेषता है। लेकिन जब हम समाज के आंतरिक ढाँचे को ठीक से देखते हैं तब हमें बहुत रूखेपन का एहसास होता है। हमें अपनी शिक्षा पर कोफ़्त होती है कि आखिर हम किस समाज में जी रहे हैं। मनुष्य ही मनुष्य का दुश्मन क्यों होता जा रहा है। वह जाति, वर्ण, वर्ग, अर्थ, कला, इतिहास, संस्कृति, भाषा, समुदायमें बंटकर एक दूसरे की हत्या पर क्यों उतारू है।फिर हम उन तटों तक जाते हैं जहाँ से नदियों को गंद्लाने की प्रक्रिया शुरू होती है। हम संस्कृति के उस स्वरूप तक पहुँचते हैं जिसमें निर्माण और ध्वंश दोनों के तत्व समान रूप से मौजूद हैं।

सभ्य समाज को जहां जीवन जीने के तमाम अधिकार प्राप्त थे तो वही असभ्य समाज को उसके प्रत्येक अधिकारों से वंचित रखकर उसका कई प्रकार से शोषण आरम्भ हो गया। जिससे वे सामाजिक और आर्थिक स्तर के साथ-साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ते चले गये और समाज में उनकी स्थिति दयनीय हो गयी।भारतीय समाज वर्ग-भेद के आधार पर समाज का विभाजन करता है। जिसके संचालन में सबसे अहम भूमिका वेद, उपनिषदों और पुराणों ने निभाई है। जिन्होंने समाज को चलाने के कुछ नियमों और मापदण्ड़ों का निर्माण किया। जिसने समाज के सबसे निचले तबके  हाशियेसमाज से उसके तमाम अधिकार छीनते हुए, उसे पशु की श्रेणी में रख शारीरिक श्रम करने का अधिकारी घोषित कर उसका हजारों वर्षों तक शोषण किया। हाशिये की वैचारिकी के सशक्त हस्ताक्षर कर्मानंद आर्य की कविता ‘संस्कृति का इतिहास भूगोल’ का एक अंश यहाँ देना चाहूंगी।  कविता सम्पूर्ण अपवंचित समाज को कैसे मुखर शब्द नवाजती है:
दम घुटता है
किस संस्कृति की बात करते हो आप
वह संस्कृति जिसने हमें छोड़ दिया पशुवत
चाण्डाल कहके निकाल दिया बस्तियों से
चमार का कहके मजाक उड़ाया
नीचों का नाच कहा / कलाओं का किया अपहरण
हमारी प्रतिभा को नोचकर
दुष्ट बिचौलिए को / सौंप दिया अकादमी
किसी ऐरे गैरे को बना दिया गन्धर्व
सत्ता के भांडों को बना दिया लोक कवि
जिसको तू हमारी संस्कृति कहता है
और लूटता है कला के नाम पर
बता उसमें मैं कहाँ हूँ / उसमें मेरी संस्कृति कहाँ है
(अयोध्या और मगहर के बीच)

हाशिये की कविता मानव को सम्मानपूर्वक जीवन जीने और उसके अधिकारों के पक्ष को प्रस्तुत कर उसे उसके प्रति सजग करती है। हाशियेकवि की कविता अपनी आत्मसन्तुष्टी व सुख के लिए नही अपितु समाज में अपने खोए हुए अस्तित्व और स्वाधीनता की खोज व पहचान का मार्ग है। कविता उसकी मर्मान्तिक पीड़ा, दर्द उसके भोगे-जिये हुए जीवन की गाथा है जो उसे मुक्ति के लिए लगातार प्रेरित करती है। डॉ एन सिंह अपनी अभिव्यक्ति को स्वर देते हुए लिखते है-

झुर्रियों में अंकित है अतीत का इतिहास,/
जिसके पीछे छुपा हुआ, एक दर्द का हास।/
छाया है दूर-दूर सन्नाटा और सूनापन,/
शोषण से कातर है, ये आँखें उदास।
(सतह से उठते हुए)

आदिकाल से ही हाशिये के लोगों की अस्मिता, अस्तित्व और स्वाधीनता को सदैव नकारा गया है। जो किसी न किसी रूप में वर्तमान समय में भी जारी है। हाशिये की कविता का आर्विभाव ही युगों-युगों से चली आ रही परम्परा,दासता, मूलभूत अधिकारों को दिलाना तथा उनमें अपने अस्तित्व, अस्मिता के प्रति चेतना जगाने के कारण हुआ। हाशिये की कविता हाशिये के समाज की वेदना करूणा की सामाजिक अभिव्यक्ति है। उसका कवि अपने समाज की स्वतंत्रता, न्याय और बन्धुत्व की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध है। कवि का अपने समाज के प्रति श्रद्धा भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वह उस समाज के प्रति विद्रोह करता है जिसने मनुष्य को मनुष्य मानने से इनकार किया, उसका विद्रोह उस समाज के प्रति है जिसने उसके जीवन को अन्याय, अपमान, अत्याचार, बेबसी, लाचारी, गरीबी और गुलामी का पर्याय बना दिया है।

समाज की तरह ही साहित्य और कला में भी एक बड़ा तबका है जिसे जगह नहीं मिली है। जिसे मुख्यधारा होना चाहिए था वह आज भी हाशिये पर पड़ा हुआ है। नगरों शहरों से बाहर है।  नदियों के तट पर और नालों के संघातों पर वह जीवन की रचना कर रहा है। वह अपनी भाषा, कला, संस्कृति, इतिहास को पुनर्जीवित कर रहा है।  ओम प्रकाश बाल्मीकि के शब्दों में कहूँ तो ‘गूंगा नही है वो’।  वह सब समझता है और अपने हक़ के लिए लड़ने मरने को तैयार है। उसके अन्दर भूख प्रबल हुई है। पर वह अपने विधाताओं से पूछ भी रहा है :
वे जो गिडगिडाते रहे / माई-बाप तुम्हारे चरणों में
जो स्याही की तरह फैल गए / अंगूठे के नीचे
फालों के बीच जोत दिए गए
परती की तरह उघाड़ ली गई जाँघों की मिट्टी
उनके बारे में क्या कहता है तुम्हारा इतिहास
तुम्हारी संस्कृति में कहाँ हैं वे लोग
वे स्त्रियाँ जो जलावन की तरह / देश के नाम पर जल गई
उनको इतिहास / तथाकथित इतिहास में
कितना हिस्सा दोगे तुम
(कैसे बाँटोगे इतिहास, अयोध्या और मगहर के बीच)

स्वतन्त्रता मिलने के बाद समाज के शोषित वर्ग में भी अपनी सामाजिक स्थिति को सुधारने व अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए भावना जाग्रत हुई साथ ही उनमें अपनी आत्माभिव्यक्ति के लिए भी चेतना का संचार हुआ। जिसके कुछ रूप हमें हाशिये का साहित्य की विभिन्न विधाओं में देखने को मिलता है। समाज में हो रहे शोषित वर्ग के विरूध भेदभाव, जातिगत तिरस्कार, अपमान, शारीरिक, मानसिक व आर्थिक शोषण, भूख, गरीबी, अस्पृश्यता, बेरोजगारी का चित्रण हाशिये के साहित्यकारों ने अपनी रचना का विषय बनाया है। जिसकी तीव्र अभिव्यक्ति साहित्य की प्रथम विधा कविता में देखने को मिलती है। हाशिये के कवियों ने हिन्दू धर्म, वर्ण व्यवस्था, जाति भेद जैसे तत्वों का अपनी कविता में विरोध किया है।
हाशिये की कविता इस विषमतापूर्ण समाज व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था के प्र्रति विद्रोह कर अपनी सत्ता और स्वाधीनता के लिए ओर अधिक मुखर हो प्रश्न करती है कि जो वेदना, पीड़ा हमने भोगी है:
क्या उसे महसूस करने की अनुभूति है तुम्हारे पास?-
“तुम क्या जानों/जाति की व्यथा/शोषण की पीड़ा/
अपमानों की यत्रंणा/दासता की वेदना/
क्योंकि तुम्हारे बाप ने नही काढ़ी मरे जानवरों की खाल/
तुम्हारी माँ ने नही ढोया मैला/तुम्हारे बच्चों ने/
घर-घर जुठन की जुहार नही लगाई/
तुम्हें कीड़ों से बजबजाते गंदे नाले के किनारे/
अंधेरे घरों में रहना नही पड़ा/
इसलिए सत्य को देखने की/
अनुभूति और वेदना कहां है तुम्हारे पास।“

हम आज जब अपने इतिहास को उठाकर देखते है तो लगभग सभी धार्मिक ग्रन्थों रामायण, गीता, वेद, उपनिषदों ने सभी सवर्ण कही जाने वाली जातियों के लिए सांस्कृतिक वैधता प्रदान कर उन्हें शिक्षा ग्रहण करने की अनुमति प्रदान की वही दलितों व शोषितों के लिए शिक्षा प्राप्त करने जैसा कोई प्रावधान नही किया है। विभिन्न सांस्कृतिक बदलाओं को अस्मिता का कवि इस रूप में व्यक्त करता है:
अफगानी लाल मिट्टी लगाये
वह अभी अभी लौटा है
बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर होते हुए
इसी साल पहुंचा है दिल्ली
अपनी स्थायी राजधानी
यहीं से शासन चलेगा पूरे देश में
विद्रोह बर्दास्त नही किया जायेगा
विधर्मी बक्शे नही जायेंगे
खून बहा दिया जायेगा उन कौमों का
जो उठाएंगी आवाज
(औरंगजेब लौट आया है)

ज्ञान प्राप्ति के अच्छे साधनों के रूप में भी उच्च जातियों द्वारा रचित धर्मग्रन्थों को ही श्रेष्ठ आधार मानकर शोषित जातियों के अनुभव संसार को हमेशा बहिष्कृत कर उन्हें शिक्षा प्राप्त कर शिक्षित होने से सदैव वंचित रखा गया। जो दलितों, शोषितों और पिछड़ों के लिए किसी त्रासदी से कम नही है। स्कूल, कालेजों में दी जाने वाली शिक्षा आज भी जाति आधारित ही है जो समाज में हाशियाविरोधी जाति आधारित संस्कारों, जातिवाद व अस्पृश्यता को ही बढ़वा देकर समाज को विघटन और वर्णवाद की ओर ही ले जा रही है।
समाज की इसी वर्णवादी व्यवस्था ने रोहित वेमुला जैसी अनेकों जिंदगियों को काल के गर्त में समा जाने को मजबूर किया है। एम्स, आई टी, आई आई टी, आई आई एम, जैसे देश के बड़े शिक्षा संस्थान इसके ज्वलंत उदाहरण है। आज का युग विज्ञान का युग है। आजादी के इतने वर्षों के बाद 21वीं सदी में प्रवेश करने पर जहाँ विज्ञान और प्रोद्यौगिकी ने अपने वर्चस्व को चारों ओर कायम किया है। विकास की नित-नई ऊँचाईयों को छूआ जा रहा है। नये-नये प्रयोग व आविष्कार हो रहे है। जीवन जीने की शैली और तौर-तरीके सरल से सरलतम होते जा रहे है। किन्तु विकास और आविष्कार के इस युग में क्या हम सभ्य है?,संस्कृत है? वह जो मजबूर है, लाचार है, गरीबी और भूखमरी से बेहाल है, देश की हाशियेकहे जाने वाली 90 प्रतिशत जनसंख्या आज भी गुलाम है, साधनहीन है।

देश के सरकारी एवं गैरसरकारी क्षेत्रों के संस्थानों में भी अपने सहकर्मियों से अमानवीय-व्यवहार, छींटाकशी, जातिसूचक शब्दों के प्रयोग व कई प्रकार के शोषणों की घटनाएं भी आएं दिन देखने को मिलती है। शिक्षा क्षेत्र में केन्द्र व राज्य सरकारों के अधीनस्थ विश्वविद्यालयों में आरक्षण को सही ढंग से लागू न करने के कारण भी अभी तक गिने-चुने हाशियेशिक्षकों को ही स्थान मिल पाया है। तथा वहाँ के खाली पड़े पदों पर अनावश्यक नियमों को लागू कर दलितो, आदिवासीयों तथा अल्पसंख्यकों को दूर रखने का षड़यन्त्र रचा जा रहा है। जिससे वे अपने समाज, समुदाय, के उत्थान में सहयोग न कर सके जो कि सवर्णों की मनुवादी मानसिकता और सोच को ही प्रदर्शित करता है। हाशियेकविता ऐसे ही व्यक्ति के मन की बेचैनी, कुलबुलाहट व गुस्से को व्यक्त करने की कविता है जो अपनी एक अलग सत्ता और स्वाधीनता के लिए मानसिक प्रताड़ना से सदैव के लिए मुक्त होना चाहती है-
“आदमी की जाति। । । । । । । । । । /
मगरमच्छ सी सभी स्थलों पर खड़ी है/
सिर्फ अछूत को निगलने किसी ओर को नही…………… /
यही तो उत्तर आधुनिकता का /
जातिबोध है मानव बोध नही।“

हमेशा ही यह देखा गया है कि दलितों ने जब कही भी नाममात्र की जमीन, नौकरियां प्राप्त की है वहां पर आर्थिक रूप से सम्पन्न समाज द्वारा उनका आर्थिक, सामाजिक व शारीरिक शोषण होने लगता है। उन्हें आगे बढ़ने से रोकने व अपने जीवन स्तर को ऊँचा उठाने से रोकने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप गोहाना, खैरलांजी, मिर्चपुर, भगाना, बथानी टोला, जैसी घटनाएं सामने आती है।परन्तु केवल निराशा ही नहीं है. कुछक्षेत्रों में मनुष्यों ने अभूतपूर्व उन्नति की है. वह विकास के पथ पर अग्रसर हुआ है:
तुम्हारी परम्परा से लड़ते हुए हमने जाना है
तुम्हारी परम्परा रूढ़ और काली है
सघन और बदबूदार काइयां, भीतर पड़े हुए जाले बताते है
तुममें वर्षों से हलचल नही हुई
मैंने ट्रेन की टिकटें खरीद ली है
उस ट्रेन की टिकटें जिसका वास्ता विकास से है।

  विकास के मार्ग को खोजने व नव-निर्माण का यह उद्घोष कवि उस समुदाय, उस वर्ग विशेष के लिए कर रहा है। जो अभी तक समाज में अपने लिए कोई सम्मानीय दृष्टि पाने और अपनी स्थिति को बेहतर बनाने में समर्थ नही हो सका है। सभ्यता के विकास के साथ ही प्रारम्भ हो गया था मनुष्य के निरन्तर चिरकालिक सभ्य होने का मार्ग। मनुष्य सामाजिक  प्राणी होने के कारण आरम्भ से ही समूह में रहता आया है। समूह में रहकर ही उसने अपने जीवन का विकास किया। विकास के इसी क्रम में धीरे-धीरे सम्पत्ति के प्रति उसका मोह उत्पन्न होने के साथ ही शरू हुई अपने को अधिक श्रेष्ठ और सभ्य दिखाने की प्रक्रिया। जिसने समाज में वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया। समाज की इसी वर्णव्यवस्था ने मनुष्य को मनुष्य में भेद कराने के साथ दासता व गुलामी को जन्म देकर समाज को दो भागों में विभक्त कर दिया। जहां समाज का एक वर्ग सभ्य श्रेणी का माना गया। वही दूसरी ओर समाज में एक ऐसा वर्ग भी तैयार हुआ जिसे असभ्य समाज अर्थात हाशियेसमाज के नाम से जाना गया।

वही हाशिये कीस्त्रियों व बच्चों की स्थिति में भी कोइ विशेष सुधार नही आया है। उनकी स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है। उनकी स्थिति को सुधारने के लिए उन्हें विकास की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, आर्थिक विकास में विशेष कानूनों के प्रावधान रखने और प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की बेहद आवश्यकता है। दलितों के प्रति सवर्णों की अनुदार नीतियों व स्थितियों के चलते एन आर सागर आजादी के इतने वर्षों बाद भी दलितों के प्रति गैर दलितों के व्यवहार में कोई सुधार न होने पर कहते हैं-
“देश हुआ आजाद बताओं/
तुमको क्या अधिकार मिला?/
भाई चारे के बदले में नफरत का संसार मिला/
बराबरी की मांग उठाई मार पड़ी, घर-द्वार जला/
आजादी की बात कही सामांतवाद ने सिर कुचला/
खोज करो अपनी आजादी खोई किस जंगल में/
उठो कसम लो!! बदला लोगे उससे तुम हर हाल में।“

निसन्देह हाशिये कीकविता एक ऐसे समाज का स्वर है जिसने सत्ता और स्वाधीनता के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ी है जो वर्तमान में भी जारी है। हजारों वर्षों से जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था का दंश झेलने वाले समुदाय से प्रतिरोध के स्वर धीरे-धीरे उभर रहे है। जो अपने साथ चेतना, जागरूकता, विकास और नव-निर्माण का उद्धोष लिये हुए है। दलित कवि असंग घोष लिखते हैं कि :
कहते हैं दीमकें चाट जाती हैं किताबें
पोथी पतरा और ग्रन्थ
फिर वे क्यों नहीं चट कर पायीं
वेद, पुराण, उपनिषद और मनुस्मृति ?
बताओ तो!
(हम ही हटायेंगे कोहरा)

हम और हमारा समाज भले ही तीसरी सदी में जी रहा हो, पर हम उत्तरआधुनिक होने को लालायित है. कला संस्कृति, इतिहास, साहित्य में ऐसे बनावटी लोगों भरमार है जहाँ हाशिये की आवाज दबी हुई है.मनुष्य ने मनुष्य को बहुत सताया है। स्त्री के रूप में आधी मानवता और दलितों के रूप में एक बडा वर्ग जीता जागता उदाहरण है हमारे सामने। मुख्य धारा को  एक भी आदिवासी लेखक की याद नहीं आती है, जो हमारी हिन्दी के पाठ्यक्रमों में हो। क्या कारण हैं कि आदिवासी रचनाकार साहित्यिक विधाओं में उच्चतर स्थिति में नहीं हैं? क्या लेखन नहीं हैं? क्या प्रकाशन की स्थितियां नहीं हैं या सही समय पर समुचित प्रोत्साहन का अभाव है? यह सब कुछ अंतत: उसी चालाक भद्रलोक के हित में होता है जिसने अधिसंख्यक जन को हाशिये पर धकेलने की साजिशें कींI और यही वर्तमान पूंजी-केंद्रित इस देश का- धन, धर्म और सत्ता का- यथार्थ है, जहां राष्ट्र-समाज ‘इंडिया बनाम भारत’ में विभाजित नजर आता है!

1. अयोध्या और मगहर के बीच, पृष्ठ79
 2. डॉ एन आर सिंह-सतह से उठते हुए, पृ.-52
 3. अयोध्या और मगहर के बीच, पृष्ठ 99
 4. कंवल भारती-तब तुम्हारी निष्ठा क्या होगी, पृ.-51
5.  अयोध्या और मगहर के बीच, पृष्ठ88
 6. डॉ प्रेम शंकर-अपनी सदी के उपेक्षित, पृ.-32
7.  डॉ कर्मानन्द आर्य-रचनाकार ब्लॉग, 4/2013
8.  एन आर सागर-आजाद है हम, पृ.-52
9. असंग घोष,हम ही हटायेंगे कोहरा, पृष्ठ ८३

डॉ0 रामविलास की आलोचना और स्त्री संदर्भ

अपराजिता शर्मा


सहायक प्रोफ़ेसर,(हिंदी विभाग),मिरांडा हाउस,दिल्ली विश्वविद्यालय . संपर्क:aparajitasharmamh@gmail.com

बाजारवाद पर जो लोग अच्छी चर्चा कर रहे हैं वे स्त्रीवादी विमर्श के लोग हैं. बाजार का सबसे बड़ा असर व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन पर पड़ा है. इसने व्यक्तिगत भावनाओं, धाार्मिक आस्थाओं और परम्परागत समाज के स्त्रियोचित-पुरुषोचित व्यवहार को लाभ के लिए भुनाया है. औरत की देह के सवाल को नग्नता, वासना, उत्पाद से जोड़ा है और यह सब बाजार की लाभ नीतियों के तहत बड़ी कुशलता से किया गया है. मिडिल क्लास जो दैनंदिन दिनचर्या और रूचियों तक सीमित है वस्तुतः उपभोक्तावादी है. उसके लिए सभी प्रश्न इच्छा-अनिच्छा के प्रश्न हैं. सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक रूप में वे गौण हैं. वामपंथ ने बाजार के खतरों और नीतियों को पहले-पहले भांपा लेकिन मजदूर से किसान के संघर्ष तक ही अपनी पहुँच बना सके. नामवर सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था – ‘‘हमलोगों ने स्त्रियों पर होनेवाले अत्याचारों पर उतना ध्यान नहीं दिया जितना देना चाहिए था.’’ (स्वाधीनता, पत्रिका, शारदीय विशेषांक, 2000, पृ0 – 28) यह एक ऐसी कमजोरी थी, जिसे यूरोपियन देशों और खासतौर से अमेरिका के वामपंथी दलों ने सबसे पहले पकड़ा.

अपने एक लेख ‘स्त्री-दृष्टि और रामविलास शर्मा’ में डॉ0 अर्चना वर्मा ने स्त्री के सवालों को उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में देखते वामपंथ के संदर्भ में लिखा – ‘‘पुराने क्लासिक वाम से उसका रिश्ता अगर विरोध का नहीं है तो प्रगाढ़ असहमति का अवश्य है.’’ (रामविलास शर्मा का ऐतिहासिक योगदान, संपा0 प्रदीप सक्सेना, पृ0-692) प्रगाढ़ असहमति की तमाम वजहों और उदाहरणों के बाद भी यह देखना और समझना नए रास्तों की ओर ले जा सकता है कि क्या हिंदी आलोचना के महत्वपूर्ण मार्क्सवादी आलोचक डॉ0 रामविलास शर्मा की आलोचना में स्त्री-मुक्ति के ध्येय को कोई स्थान मिला है या उनकी इतिहास-दृष्टि यहाँ चूक जाती है.

रामविलास शर्मा अपनी तरह के अकेले साहित्यिक समालोचक हैं जो लगभग 60 वर्षों तक योजनाबद्ध तरीके से साहित्य, दर्शन, इतिहास, भाषा, समाज और मार्क्सवाद से जुड़े रहकर निरंतर साधना करते रहे. उनकी साहित्यिक चिंताएँ निश्चित ही बड़ी और विस्तृत फलक तक जाने वाली है. नामवर सिंह ने 1983 मई में मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा भोपाल में आयोजित विशेष व्याख्यानमाला ‘डॉ॰ रामविलास शर्मा’ के उद्घाटन सत्र में जो व्याख्यान दिया (प्रलेस के मुखपत्र में प्रकाशित, 1984 मार्च) उसका मूल स्वर था ‘हिन्दी के हित का अभिमान वह, दान वह’ में वह कहते हैं.‘‘जहाँ तक मेरी जानकारी है समूचे भारतीय इतिहास में ऐसा कोई साहित्यिक समालोचक नहीं है जो इतिहासकारों से संवाद की स्थिति में हो. जो इनकी खोज से प्राप्त तथ्यों को साहित्य की कसौटी पर जाँच सकता हो.’’

रामविलास शर्मा के विशुद्ध  विपुल योजनाबद्ध 60 वर्षीय निरंतर सक्रिय लेखन के सिलसिले में यह सवाल किया जाना असंगत और निरर्थक नहीं होगा कि लेखन की प्रौढ़ावस्था में भारतीय साहित्यिक, सामाजिक स्तर पर तमाम अस्मितामूलक विमर्शों को लेकर उनकी क्या प्रतिक्रिया थी. क्या उनके लेखन में स्त्री-अस्मिता या स्त्री-संदर्भ का कोई स्थान मिला है. ऋग्वेद से सबाल्टर्न इतिहासकारों तक जाने वाले रामविलास शर्मा जब जातीय जागरण और एकता की बात करते हैं, भारतीयता के विशेष संदर्भ में, साहित्य, इतिहास, भाषा और समाज का मूल्याँकन करते हैं. साम्राज्यवादी ताकतों के षडयंत्रों की पहचान कर भारतीय राजनीति और इतिहास को उनके प्रति सचेत रहने की सलाह देते हैं, तब क्या 1979  में संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा में स्त्री अधिकारों को लेकर लिए गए निर्णयों से अभी -अभी जागे भारतीय समाज की ओर उनकी दृष्टि गई.  स्त्री अधिकारों और मुक्ति के स्वप्न की इस विश्व व्यापी वैधता को क्या उनके लेखकीय सरोकारों में कोई स्थान मिला. गाँधी, अम्बेडकर, लोहिया पर लिखने की जरूरत महसूस करने वाले रामविलास शर्मा को क्या स्त्री-मुक्ति के स्वप्न बेचैन करते हैं. जिन महाकाव्यों, रामायण और महाभारत को भारतीय साहित्य के आदि स्रोत के रूप में वह देखते हैं ,उनमें स्त्री-पात्र और प्रश्नों की निर्णायक भूमिका से टकराने और वर्तमान में स्त्री-मुक्ति तथा अधिकारों की माँग के सामूहिक स्वरों के बीच कोई महत्वपूर्ण हस्तक्षेपकारी टिप्पणी वे करते हैं या उनके साहित्यिक मूल्य इसमें बाधा बनते हैं. व्यक्तिगत स्तर पर पारिवारिक आदर्श और स्त्री समानता को स्वीकार करने वाले मार्क्सवादी आलोचक स्त्री के स्वाधीन अस्तित्व के सवालों, समस्याओं को किस प्रकार देखते हैं यह जानना आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण होगा.

 जेंडर की अवधारणा और अन्या से अनन्या

एक मानववादी दर्शन होने के नाते मार्क्सवाद मूलतः स्वतंत्रता का दर्शन है, विवशता के खिलाफ मानव-मुक्ति का दर्शन. स्वतंत्रता के लिए उन परिस्थितियों का निराकरण करना बहुत जरूरी है जो व्यक्ति को अमानुषिक जीवन जीने को विवश करती है और इस प्रक्रिया में व्यक्ति के भीतर कुंठित यौन इच्छाओं, परायेपन, आत्मनिर्वासन आदि को जन्म देती है. पूंजीवादी समाज की मुख्य पहचान यही घुटन, संत्रस और कुंठा है, स्वतंत्रता नहीं. वैचारिक संदर्भों से जुड़कर स्वतंत्रता अपना अर्थ पाती हैं. जिन परिस्थितियों और नियमों के आगे हम विवश है, उनकी वैज्ञानिक तर्कसंगत जानकारी प्राप्त करके, उन्हें निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति का साधन बना सके. वैज्ञानिक ज्ञान की सहायता से हम विवशता से मुक्त होकर स्वतंत्रता का साक्षात्कार कर सकते हैं. यह बात बाह्य प्रकृति और आंतरिक प्रकृति दोनों पर लागू होती है.

रामविलास शर्मा

स्वतंत्रता का यह प्रश्न एक ओर ऐतिहासिक दृष्टि से सृजित मानवीय संभावनाओं की ओर ले जाने वाले अस्मितामूलक विमर्शों की भूमि तैयार करता है दूसरी ओर सृजनशीलता और स्वतंत्रता की मानवीय क्षमता के अभाव में आत्मनिर्वासन की स्थिति को जन्म भी देता है. 50-60 के दशक में हिन्दी साहित्य में जिस प्रयोगवादी, अस्तित्ववादी प्रवृत्ति की झलक दिखाई देती है वह दरअसल स्वतंत्रता और सृजनशीलता की इसी मानवीय क्षमता के अभाव का परिणाम है.

जैनेन्द्र की कहानियों में स्त्री-प्रश्न

 डॉ॰ रामविलास शर्मा की आलोचना में स्वतंत्रता को तो मूल्य के रूप में खोजा-देखा जा सकता है लेकिन सीधे-सीधे वहाँ स्त्री-विमर्श के सवालों की खोज ठीक उसी तरह का निरर्थक श्रम होगा, जैसे कलावादी आलोचकों में हिन्दी जाति के सांस्कृतिक इतिहास को खोजना और उनसे जनवादी मूल्यों की मांग करना.

यह सवाल सीधे-सीधे एक बहुत बड़े वैचारिक मतभेद से टकराते हुए लौट आता अगर मार्क्सवाद जीवन और कला के मूल्यों को  अलग-अलग मानते हुए उसके सामाजिक सरोकारों की अवहेलना करता. संस्कृति, परम्परा और समाज के कई अहम सवालों के साथ स्त्री संबंधी प्रश्न भी डॉ॰ रामविलास शर्मा की आलोचना में ऐतिहासिक परम्परा के भीतर ही जन्म लेते हैं. वे बराबर इस बात पर बल देते हें कि परम्परा में जो उपयोगी और सार्थक है, उसे भी बिना मूल्यांकन के न अपनाना चाहिए. इस तरह वे ऐतिहासिक भौतिकवाद की वैज्ञानिक प्रणाली से समाज में व्यापक परिवर्तन की ओर ध्यान केन्द्रित करते हैं, जिनमें स्त्री की स्थिति पर विचार भी महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय है. परम्परा का उत्तराधिकारी होने के कारण वे उन मूल्यों के स्वीकार को प्रमुखता से रेखांकित करते हैं जिनमें समस्त मानव समुदाय को एक जाति के रूप में संगठित करने की क्षमता हो. इतिहास और संस्कृति के आधार पर निर्मित यह अस्मिता बोध ही उनके आलोचना कर्म का लक्ष्य है. अस्मिता-बोध का यह प्रश्न उनके यहाँ वर्ग चेतना से जुड़ा है जो पचास-साठ के दशक में पश्चिमी आधुनिकतावाद के प्रभाव से आए, महायुद्धों की विभीषिका में जन्मे विधवस्त जीवन, फासीवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के अस्तित्ववादी रूप से एकदम जुदा है. प्रगतिवाद की प्रतिक्रियास्वरूप जन्मे प्रयोगवाद की आधारभूमि भी यही आधुनिकतावाद है जिसमें मूल स्वर निराशा, अवसाद, घुटन, यौन कुंठाएँ और उपभोक्तावादी-समझौतावादी प्रवृत्ति हैं.

 प्रयोगवाद में दर्शन और ठोस वैचारिक भूमि का अभाव था. प्रयोग पर बल देने के कारण ये रचनाकार अपने ढंग से व्यक्तिगत  प्रयोगशीलता और वैचारिक शून्यता की ओर बह निकलते हैं. जिसका परिणाम अंततः आत्मग्रस्तता के रूप में दिखाई देता है. विचारधारा के स्थान पर रहस्यवाद, दर्शन और अस्तित्व की पहचान बन जाता है. इसके विपरीत रामविलास शर्मा 50-60 के दशक में अपनी ठोस वैचारिक भूमि पर खड़े रहकर साहित्यिक समीक्षा से भाषा, इतिहास और संस्कृति के सवालों की ओर बढ़ जाते हैं. इस यात्र में जो सबसे रक्षणीय है, वह है भारत की सांस्कृतिक परम्परा और जीवन से जूझकर विकसित होती सामूहिकता की भावना. एक ओर जहाँ प्रयोगवादी आधुनिकतावादी कला की सामाजिक प्रासंगिकता का अस्वीकार कर समाज से व्यक्ति के रूप में भी विच्छिन्न होते जाते हैं वहीं रामविलास शर्मा कला के अपेक्षाकृत स्थायी मूल्यों की खोज करते हैं. उन्होंने लिखा, ‘‘साहित्य मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन से सम्बद्ध है. आर्थिक जीवन के अलावा मनुष्य एक प्राणी के रूप में भी अपना जीवन बिताता है. साहित्य में उसकी बहुत सी आदिम भावनाएँ प्रतिफलित होती है जो उसे प्राणीमात्र से जोड़ती है. इस बात को बार-बार कहने में कोई हानि नहीं है कि साहित्य विचारधारा मात्र नहीं है. उसमें मनुष्य का इन्द्रिय बोध, उसकी भावनाएँ, आन्तरिक प्रेरणाएँ भी व्यंजित होती है. साहित्य का यह रूप अपेक्षाकृत अधिक स्थायी होता है.’’ (परम्परा का मूल्याँकन, पृ0-11)

पितृसत्ता पुरुषों का अमानवीयकरण करती है : कमला भसीन


 विचारधारा वृहत्त साहित्यिक सामाजिक मूल्यों का निर्माण तो करती है लेकिन मात्र वैज्ञानिक विश्लेषण ही प्रस्तुत करना उसकी सार्थकता नहीं है. मनुष्य की आंतरिक प्रकृति के अनुकूलन का कार्य भी वह कुशलता से करती है. इन्द्रियबोध और आंतरिक प्रेरणा के अभाव में एक तरह की यांत्रिकता, वैचारिकता पर दबाव बनाने लगती है. यही कारण है कि किसी विचारधारा में मनुष्यों और सामाजिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों को ऐतिहासिक संदर्भों में समझने में असंगतियाँ और दोष दिखाई देने लगते हैं.

रेखांकन/अपराजिता शर्मा

अज्ञेय ने ‘भारतीय परम्परा-संघर्ष का उपयोग’ शीर्षक से एक निबंध लिखा, जिसमें उन्होंने कहा-‘‘वास्तव में कला की कोई सामाजिक प्रासंगिकता नहीं है क्योंकि इसका सच अपने आपमें है, स्वायत्त और आत्मतुष्ट है और जिसकी अहमियत उसके निज के अस्तित्व की शर्तों पर ही आंकी जा सकती है.’’ (नित्यानंद तिवारी, सृजनशीलता का संकट, पृ0-57)


 एक ओर अज्ञेय कला भी सामाजिक प्रासंगिकता का अस्वीकार कर रहे हैं दूसरी ओर रामविलास शर्मा कला को मानवीय जीवन के अपेक्षाकृत स्थायी सामाजिक मूल्य के रूप में देखते हैं. तो यह बड़ा वैचारिक अंतर अस्तित्ववादी प्रश्नों से भी बड़े अलग-अलग रूपों में टकराता है. 1950-60 की साहित्यिक अभिव्यक्ति में व्यक्ति-समाज के संबंध ही नहीं, व्यक्ति के आपसी संबंध भी अभिव्यक्ति के संकटों के रूप में उठ खड़े होते हैं. इन्हीं आवाजों में स्त्री-मुक्ति के स्वर भी सुनाई देने लगते हैं. ऐसा नहीं है कि स्त्री की दशा और पुरुष द्वारा एक विशेष सामाजिक व्यवस्था के भीतर सदियों से हो रहे शोषण का विरोध साहित्य के फलक पर पहली बार हो रहा था. लेकिन यह पहली बार हो रहा था कि एक व्यक्ति के रूप में अपने अस्तित्व के प्रश्नों को लेकर स्त्री उठ खड़ी होती है. सामाजिक संबंधों के बीच स्त्री-अस्मिता के प्रश्नों पर तो बात रामविलास शर्मा की आलोचना में आरम्भ से ही मिलती है लेकिन एक अस्तित्ववादी संघर्ष के रूप में वह उनके चिंतन में नहीं आती. रामविलास शर्मा की इतिहास-दृष्टि, स्त्री को उसी तरह उतना ही सामाजिक व्यवस्था का शिकार मानती हैं जितना, जिस तरह श्रमिक, दलित को. सुसंगठित रूप में स्त्री अधिकारों की मांग उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही दिखने लगती है. उससे पहले, बहुत पहले पंडिता रमाबाई सन् 1870 के नागरिक समाज में एक बड़े विस्फोट के रूप में मौजूद रही. ‘हिंदू स्त्री का जीवन’पुस्तक की भूमिका में अनुवादक शंभु जोशी यह प्रश्न उठाते हैं कि आखिर क्यों पंडिता रमाबाई इतिहासकारों की नजर में नहीं आ पाईं? इसका कारण यह हो सकता है कि इतिहास लिखने का कार्य उस दृष्टिकोण से हो सकता है कि जिसमें स्त्रियाँ एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में कहीं भी नहीं थी.(हिंदू स्त्री का जीवन, पं॰ रमाबाई, अनु॰ शंभू जोशी, सम्वाद प्रकाशन, मेरठ, पहला संस्करण-2006)

 खुदमुख्तार स्त्रियों का कथा -वितान: अन्हियारे तलछट में चमका

 एक ओर हिंदी साहित्य में कलावादी, प्रयोगवादी विचारकों का धड़ा सक्रिय हो रहा था तो दूसरी ओर उसी समय रामविलास शर्मा भाषा और समाज के सवालों से टकराते हुए, उस क्षेत्र में व्यापक स्तर पर शोध कार्य करने का विचार कर चुके थे. इस समय वे अपने आलोचक जीवन के शिखर पर थे. निराला की साहित्य साधना के लिए उन्हें अकादमी पुरस्कार मिल चुका था. द्विवेदी युगीन हिंदी नवजागरण पर एक गम्भीर पुस्तक अभी-अभी लिखी ही थी. इस समय तक हिन्दी जाति और नवजागरण की आधार भूमि के रूप में भाषा की भूमिका वे पहचान चुके थे. इसीलिए इस क्षेत्र में गंभीर शोध कार्य करना चाहते थे. ऐसे शोध कार्य का अर्थ था साहित्यिक समीक्षा को तिलांजलि. लगभग 10 वर्षों के शोध के बाद ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी भाषा’ के रूप में तेरह सौ पृष्ठों का ग्रंथ तीन खंडों में (1979-81 में) प्रकाशित हुआ.

 डॉ॰ शर्मा भाषा और साहित्य के माध्यम से समाज निर्माण की व्यापक समस्या का हल करना चाहते थे. इस परिप्रेक्ष्य से जुड़कर सांस्कृतिक इतिहास और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रश्नों को भी हल करने के उपाय ढूंढे जा सकते हैं. वे कहते हैं.‘‘शोषण पर आधारित वर्ग विभक्त समाज में स्त्री-पुरुष दोनों का शोषण होता है और उसको बदलने के लिए सामाजिक सम्बन्धों को बदलना जरूरी है.’’ (परंपरा का मूल्यांकन, पृ॰-31) अब तक रामविलास शर्मा की आलोचना और इतिहास-दृष्टि को आधार मानकर जिन भी पक्षों पर विचार-विमर्श हुए उनमें स्त्री संदर्भों और समस्याओं पर सबसे कम विचार हुआ. इस संदर्भ में कुछ ही लेख प्राप्त हुए.

 पहला लेख, फरवरी 2011 में ‘साम्य’ पत्रिका के अंक-26 में जगदीश्वर चतुर्वेदी द्वारा लिखित है, जिसका शीर्षक है ‘रामविलास शर्मा की इतिहास दृष्टि के कुछ पहलू’. इस लेख में रामविलास शर्मा की इतिहास-दृष्टि के नियामक तत्वों की चर्चा के साथ साहित्येतिहास सम्बन्धी उनकी अवधारणाओं की गंभीर, विशद चर्चा की गई है. लेख के अंतिम हिस्से में ‘स्त्री विमर्श और स्त्री संदर्भ’ उपशीर्षक के अन्तर्गत रामविलास शर्मा के लेखन के उन हिस्सों पर संक्षेप में चर्चा की गई है जो स्त्री-सम्बन्धी विवेचन से जुड़े हैं. यह विश्लेषण मोटेतौर पर भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति और वैचारिकी के(वामपंथी विचारधारा के) तहत उसका ऐतिहासिक क्रम में दर्शाता है.

जगदीश्वर चतुर्वेदी स्वयं भी मार्क्सवादी आलोचक हैं इसलिए वर्ग-संघर्ष और उत्पादन सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में ही वह भी इन संदर्भों की पुनर्व्याख्या करते हैं. उन्होंने लेख में यह स्थापित किया कि‘‘रामविलास शर्मा ने स्त्री के सवाल को उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में रखकर विश्लेषित किया, साथ ही स्त्री की आज की स्थिति को आधुनिक भारत के परिप्रेक्ष्य में रखकर विश्लेषित किया, स्त्री की पराधीनता को देश की पराधीनता से जोड़कर देखा. स्त्री की पराधीनता का मुख्य स्रोत आर्थिक पराधीनता को माना.’’(साम्य-26, प्रलेस, अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़, फरवरी-2011, पृ॰-71)

रामविलास शर्मा स्वयं बदलते हुए सामाजिक परिवेश और विभिन्न क्रांतियों के कारण राजनीतिक-सांस्कृतिक बदलावों के संदर्भ में नारी की परिवर्तित स्थिति पर विचार करने की आवश्यकता महसूस करते रहे थे. (निराला की साहित्य साधना, खंड-2, पृ॰-41)

 स्त्री अस्मिता आंदोलन इतिहास के कुछ पन्ने

दूसरा और महत्त्वपूर्ण लेख ‘स्त्री-दृष्टि और रामविलास शर्मा’ शीर्षक से डॉ0 अर्चना वर्मा का, प्रदीप सक्सेना के संपादन में तैयार पुस्तक ‘रामविलास शर्मा का ऐतिहासिक योगदान’ में मिलता है. यह लेख इसलिए भी अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जिस परिवर्तन और क्रांति का जिक्र रामविलास शर्मा बदलते हुए सामाजिक परिप्रेक्ष्य में कर रहे हैं, अर्चना वर्मा स्वयं उसकी सशक्त हस्ताक्षर हैं. स्त्री-मुक्ति के प्रश्नों का उन्होंने स्वयं एक स्त्री विमर्शकार के रूप में उठाया और सुलझाया है. दूसरा कारण जो इस लेख को महत्त्वपूर्ण बनाता है वह है वैचारिक भिन्नता.

अर्चना वर्मा स्त्री-मुक्ति के प्रश्नों को ‘पुरुष-मात्र के विरुद्ध नहीं, समाज की पितृसत्तात्मक संरचना के विरुद्ध’ देखती हैं. उनका मत है कि स्त्री-पुरुष दोनों ही उसकी उपज है और अपने-अपने कठघरों के बंदी रहे हैं. बेशक यह सामाजिक समस्या ही है, स्त्री-पुरुष का घरेलू झगड़ा नहीं. (रामविलास शर्मा का ऐतिहासिक योगदान, सपा॰ प्रदीप सक्सेना, अनुराग प्रकाशन, दिल्ली प्र॰ सं॰-2013, पृ॰-706)

अपने लेख में वे साहित्य संसार और आलोचना जगत में डॉ॰ रामविलास शर्मा को पुराने क्लासिकल वाम के प्रमुख वक्ता के रूप में देख रही हैं, -‘‘जिस नये वाम के विविधवर्णी, बहुमुखी, बहुजातीय, उत्पीड़न विरोधी, भिन्नतापोषी, उदारतावादी वैचारिक समुच्चय से स्त्री ने ‘अपनी दृष्टि’ पाई और ‘अपना विमर्श’ रचा पुराने क्लासिकल वाम से उसका रिश्ता अगर विरोध का नहीं तो प्रगाढ़ असहमति का अवश्य है.’’ (वही, पृ0 692)

निराला के साथ रामविलास शर्मा

प्रगाढ़ असहमतियों को दर्ज कराने हेतु जिन लिखित संदर्भों का सहारा इस लेख में लिया गया है वह अधिकांशतः ‘घर की बात’ से लिए गए हैं. कहा जा सकता है कि वे संदर्भ नितांत व्यक्तिगत व्यवहार का हिस्सा रहे हैं. उन्होंने लिखा‘‘घर की बात के साक्ष्य के आधार पर देखा जा सकता है कि ब्रह्मचर्य, एकनिष्ठ, दाम्पत्य, सदाचार, कथनी-करनी के अभेद आदर्श का वास्तविक व्यवहार, परिवार में बेटे-बेटी-बहू के समता का संस्कार, डॉ॰ शर्मा के व्यक्तित्व में आचरण की शुद्धता का परम्परागत और लगभग आर्य समाजी आदर्श बोलता है.’’ (वही, पृ0-699)

 वे एक वामपंथी आलोचक की दृष्टि से भिन्न वैचारिक आलोचना मूल्यों का साक्ष्य प्रस्तुत कर डॉ॰ शर्मा को सिरे से खारिज नहीं करतीं बल्कि उनकी सैद्धान्तिक सीमाओं की ओर इस महत्त्वपूर्ण और छूटे हुए विषय के संदर्भ में ध्यान ले जाती हैं और लिखती हैं.‘‘उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता भी उनके एकनिष्ठ व्यक्तित्व की ऐसी ही प्रतिश्रुति है. ऐसी आदर्शनिष्ठा और वैचारिक आस्था अपने आपमें एक निहित पवित्रता से मूल्य-मंडित हो जाती है. तथ्य सम्मत वैज्ञानिक प्रामाणिकता, बुद्धि सम्मत तर्कसंगति और यथार्थनिष्ठा के बावजूद अपने स्वभाव में वह लगभग भक्ति जैसी निश्शंकता के समकक्ष होती है. उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता उन्हें परिवर्तन और गतिशीलता में विश्वास तो देती है लेकिन.’’ (वही, पृ0-699)

 निश्चय ही इस लेकिन के साथ तमाम वैचारिक साहित्यिक असहमतियों की तार्किक विवेचना संलग्न है.ऐेतिहासिक प्रक्रिया में कोई समस्या उभरती है तो उसके हल की सम्भावना भी कहीं उसमें निहित होती है. मार्क्सवाद समानता की धारणा के परिप्रेक्ष्य में स्त्री-पुरुष संबंधों पर विचार करता है और दोनों को समाज के महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में देखता है. वहाँ वर्ग-भेद, स्त्री-पुरुष-भेद नहीं है. वर्ग-मुक्ति समाज की कल्पना, दोनों (स्त्री-पुरुष) के लिए शोषण-मुक्त (व्यक्तिगत-सामाजिक स्तर पर) समाज की कल्पना है. लेकिन सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया से लिंगवादी प्रभुत्व का गहरा संबंध है. मार्क्सवादी स्त्रीविमर्श की लेखिका ‘मिशेल बरेट’ ने लिंग की धारणा के भीतर स्त्री-परम्परा को समाज व्यवस्था से जोड़कर देखा. रामविलास शर्मा ने भी ‘स्त्रीवादी मार्क्सवादियों की तरह लिंग भेद को ऐतिहासिक प्रक्रिया में रखकर विश्लेषित किया है.’ (साम्य-26, पृ0-74)

रामविलास शर्मा ने चाहे भाषा, समाज, इतिहास, संस्कृति या साहित्य के किसी भी पक्ष पर विचार किया हो, उसको स्त्री संदर्भ किसी न किसी रूप में जुड़ते रहे. भले ही उन्होंने स्त्री संबंधी प्रश्नों पर अलग से, विस्तार से ना लिखा हो लेकिन यथोचित यथास्थान जिस भी विषय पर लिखते रहे उसमें इन प्रश्नों पर ठहर का विचार किया. ‘घर की बात’ कैसे व्यक्तिगत प्रसंग रहे हों या ‘निराला की साहित्य साधना’ जैसा वृहत्त साहित्यिक संदर्भ. ऋग्वेद के मूल्यांकन और ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ के पहले खंड के पहले अध्याय ‘श्रम और संस्कृति’ में वे ‘गृह निर्माण, परिवार और नारी’ विषय पर लिखते हैं. श्रम और संस्कृति की परम्परा में सबसे पहला ध्यान उनका मातृसत्ता से पितृसत्ता के हस्तांतरण की ओर ही जाता है. इसी खंड में वे योग और धर्म द्वारा स्त्री को माया के रूप में प्रतिष्ठित करने के षड्यंत्रों की पड़ताल करते हैं. उन्होंने ‘भिक्षुनारी और संसार’ शीर्षक के अंतर्गत योग, वैराग्य और गौतम बुद्ध के सामंती समाज की स्त्री के प्रति सोच को स्पष्ट करते हुए कहा- ‘‘बुद्ध की सबसे बड़ी समस्या, रोग, मृत्यु, दुख नहीं थी, उनकी सबसे बड़ी समस्या थी काम-वासना. स्त्री के प्रतिबद्ध का दृष्टिकोण सामंती व्यवस्था के बैरागियों जैसा है. उसकी तरफ देखो भी मत, हमेशा उससे दूर रहो.’’ (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, प्रथम भाग, पृ0-575)

बुद्ध की दृष्टि में नारी पुरुष से हीन है इसलिए पुरुष साधना द्वारा जो कुछ पा सकता है उसे नारी के लिए प्राप्त करना असंभव है. डॉ॰ रामविलास शर्मा सामंती समाज की इस व्यवस्था पर विस्तार से लिखते हैं. वे योग-धर्म और पुरोहितों की बनाई इस स्त्री विरोधी और वर्ण समर्थक व्यवस्था के विरोध में लिखते हैं लेकिन वहाँ लिखते हैं जहाँ लिखा जा सकता था.

जब तुलसीदास को एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग नारी-विरोधी और वर्ण-समर्थक घोषित करने लगता है तो  वह तार्किक असहमतियों से यह सिद्ध करते हैं कि किस प्रकार एक सामंती व्यवस्था में रहते हुए वे वर्णजाति आदि को चुनौती देते हैं और नारी समाज की समस्याओं का हल धर्म और कर्मकाण्ड के प्रभुत्व पर टिकी इस सामंती व्यवस्था के खंडित हो जाने में देखते हैं. उन्होंने लिखा ‘‘हिन्दी में अनेक ऐसे पुरातनपंथी लेखक हैं जो योग के उद्धार में भारतीय संस्कृति का प्रसार देखते हैं. उन्हें याद रखना चाहिए कि कुण्डलिनी जगाने की कितनी ही कोशिशें करें, यह अर्धसामंती समाज व्यवस्था अब कुछ ही दिनों की मेहमान है.’’(परम्परा का मूल्यांकन, पृ0-83)

 गण समाजों का उल्लेख करते हुए उन्होंने ऐसे गण समाजों का विशेष उल्लेख किया जिनमें नारी की प्रधानता थी. गांधी, अंबेडकर, लोहिया जैसे आधुनिक राजनीति के धुर विशेष पुरुषों पर लिखते हुए भी वे ‘वर्णविहीन समाज में नारी’ विषय पर लिखते हैं और स्त्रियों की स्वाधीनता पर जोर देते हैं.‘‘जहाँ ये आदिम साम्यवादी समाज थे, वहाँ स्त्रियाँ स्वाधीन थीं और जितनी दीर्घ अवधि इन साम्यवादी समाजों की थी उतनी ही अवधि स्त्रियों की स्वाधीनता की भी थी.’’ (गांधी, अंबेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएँ, पृ॰-650) इसी प्रसंग में वह लिखते हैं कि ‘‘आदि पर्व में  उद्दालक की एक कथा है. इस कथा के अनुसार एक पुरुष-एक स्त्री की विवाह-प्रथा बल पूर्वक स्थापित की गई.’’ (वही, पृ0-650)

उनके स्त्री संबंधी लेखन को पढ़े बिना यह कहना आसान है कि ‘‘डॉ॰ रामविलास शर्मा के संस्कार और विचार का संयुक्त आदर्श, दाम्पत्य को ही प्रेम का वैध पर्याप्त मानता है. द्विवेदीयुगीन नैतिकतावाद इस संदर्भ में उनका आदर्श है. साहित्य में भी वे इसी प्रेम का चित्रण होते हुए देखना चाहते हैं.’’ (रामविालस शर्मा का ऐतिहास योगदान, संपा0-प्रदीप सक्सेना, पृ0-703 यदि यह पूर्णतः सत्य होता तो वे ऐसे उल्लेख और प्रसंगों को कभी नहीं छूते जहाँ इस निष्कर्ष से सामना करना पड़ा कि ‘‘एक स्त्री -एक पुरुष की विवाह-प्रथा चालू होने पर भी स्त्री की स्वतंत्रता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई. श्वेतकेतु ने विवाह का नियम बनाया. उसके बहुत दिन बाद तक भी स्त्रियां अपनी सापेक्ष स्वाधीनता का उपयोग करती रहीं.’’(गांधी, अंबेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएँ, पृ॰-651)

वे ऐसे तमाम उदाहरण जुटाते हैं जहाँ सामंती समाज के पहले और उसके खत्म होने के बाद स्त्रियों के लिए सापेक्ष स्वाधीनता, समानता का व्यवहार संभव हो. उन्होंने लिखा वर्णविहीन समाज में ‘‘स्त्रियाँ शस्त्र धारण करती थीं. युद्ध करती थीं, शास्त्र चर्चा में भाग लेती थीं. स्वयं शास्त्रों  का  निर्माण करती थीं. इसके उदाहरण वैदिक परंपरा में है.’’(वही,पृ॰-651)

 वे इतिहासकारों द्वारा जुटाए उन साक्ष्यों को भी अपने लेखन में शामिल करते हैं जो स्त्री स्वाधीनता के प्रमाण और आम जन के बीच उसकी समझ को विकसित करने में सहायक हो सके. ‘‘महाभारत में स्त्रियों की यौन-स्वच्छंदता के बारे में जो बातें कही गई हैं, वे बहुत कुछ भारत की जनजातियों में प्रचलित रही हैं. डी॰एन॰ मजूमदार कहते हैं. जनजातीय समाज में विवाह पूर्व यौन स्वच्छंदता स्वीकार की जाती हैं.’’ (वही, पृ0-652) सामंती समाज में पुरोहिता, शासकों यानि धर्म और राजनीति के ठेकेदारों ने जो व्यवहार अलग-अलग वर्णों के लोगों के साथ किया था वही व्यवहार स्त्री के साथ भी किया.

 डॉ॰ रामविलास शर्मा इतिहास और संस्कृति के इस पक्ष पर लगातार लिखते रहे हैं. उनकी इतिहास-दृष्टि स्त्रियों के लिए समान अधिकारों वाली सामाजिक व्यवस्था के पक्ष में बराबर प्रमाण जुटाती रही और आज के समय में उसे पाने का मार्ग प्रशस्त करती रही. ‘‘वर्तमान अर्द्धसामंती व्यवस्था में मनुष्य की प्रेम और सौंदर्य की कोमल भावनाएँ बुरी तरह कुचली जाती हैं. विवाह का आधार है सम्पत्ति और कुलीनता, प्रेम करने के लिए प्रेयसी अलग होती है बच्चे पैदा करने के लिए पत्नी अलग. सामंती बन्धनों के खत्म होने पर सौंदर्य और प्रेम की भावनाएँ अपने सहज रूप में पल्लवित होंगी और नारी, कवियों की नायिका मात्र न रह जायेगी. वह श्रम करने वाली, समान अधिकारवाली नागरिक भी होगी.’’ (परम्परा का मूल्यांकन, पृ0-82) ‘समान अधिकारवाली नागरिक’ के जिस रूप में वह स्त्री समाज का भविष्य देखते हैं क्या वह स्त्री का सबसे प्रबल समर्थन नहीं करता. व्यक्तित्व की जिस सार्थकता और सारतत्व की माँग स्त्री-विमर्श की लेखिकाओं ने उठाई है उसमें राजनीतिक रूप से सशक्त (नागरिक होना, राजनीतिक मौलिक अधिकारों से लैस) होना ही तो है.

 सौंदर्य और प्रेम की सहज भावनाएं इस समानता के अधिकार वाले संबंध से ही पल्लवित होंगी.गैर परम्परागत और अति-आधुनिक होते हुए जिस वातावरण का निर्माण अस्मितामूलक विमर्श करते हैं, उसमें विद्रोह और क्रांतिकारी अंतर्वस्तु कम और एक ठोस परिस्थिति में संबंधों की टकराहट से निर्मित यातना और अकेलापन अधिक है. प्रेम जीवन की सारवस्तु है, वह स्वाधीनता से पोषित होता है और पारस्परिकता में निखरता है. हिंदी के मार्क्सवादी आलोचक और स्त्रीवादी आलोचक दोनों रामविलास शर्मा की स्त्री-संबंधी वैचारिकता को नहीं समझ पाए हैं.

महादेवी के कवि मन को जब सारा साहित्यिक समाज ‘मैं नीर भरी दुूःख की बदली’ के रूप में देख रहा था तब डॉ॰ रामविलास शर्मा लिखते हैं, ‘‘महादेवी जी का और उनकी कविता का परिचय केवल ‘नीर भरी दुख भी दुख की बदली’ या ‘एकाकिनी बरसात’ कहकर नहीं दिया जा सकता. उन्हीं के शब्दों में उनका परिचय देना हो तो मैं यह पंक्ति उद्धत करूँगा. ‘रात के उर में दिवस की चाह का शर हूँ’.’’(परंपरा का मूल्यांकन, पृ॰-182)

मानवीय प्रेम, मानवीय-सौंदर्य स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक सहज-संबंध के विकास में महत्त्वपूर्ण है. जिस तरह सामंती-व्यवस्था के पहरेदारों, पुराहितों ने सदियों तक उस व्यवस्था को कायम रखा कला कला के लिए या सामाजिक उत्तरदायित्व से मुक्त होकर प्रयोग करने की स्वाधीनता की गुहार मचानेवाले साहित्यकारों ने भी उसकी पराधीनता को पीड़ावाद का रूप दिया. ‘‘ये लोग फॉर्म की रट लगाकर साहित्य में उच्च कोटि के विचारों के महत्त्व को अस्वीकारते हैं. इनकी मति सीप के समान नहीं है जिससे मोती निकले, वह घोंघे की तरह है जो सेक्स के लिए मुँह फैलाकर अपने अंदर सिमट जाता है. जन-संस्कृति, ग्राम-गीतों, प्राचीन साहित्य से इनकी सरस्वती नहीं जागृत होती, न विदेश के जनवादी लेखक इन्हें अच्छे लगते हैं, इनकी प्रेरणा का स्रोत एजरा पाउंड, टी॰एस॰ इलियट, स्पेण्डर आदि लेखक हैं जो जन शिविर के विरोधी हैं.’’ (वही, पृ0-87)


 डॉ॰ रामविलास शर्मा की विशेषता यह है कि वे ऐतिहासिक परम्परा से अलग होकर किसी बड़े सामाजिक बदलाव को सहजता में विकसित होता नहीं देखते, साथ ही इस बात पर भी जोर देते हैं कि परंपरा में जो उपयोगी और सार्थक है, उसका मूल्यांकन किए बिना नहीं अपनाना चाहिए.वह जानते हैं ‘‘स्त्री की परतंत्रता का कारण सामंती सम्बंधों के अवशेष और समाज-संचालकों के सामंती संस्कार हैं. नारी की पराधीनता को यदि पीड़ावाद का रूप दे दिया जाए तो इससे सामंती बंधनों और सामंती संस्कारों की रक्षा होती है. नारी की दासता और परवशता के सहारे जिस आध्यात्मवाद की रचना हुई है वह ढह पड़े अगर नारी इन सामन्ती बंधनों को तोड़ने के लिए कटिबद्ध हो जाए.’’ (वही, पृ0-185)

 रामविलास शर्मा जिस-जिस प्रसंग में भी स्त्री के संदर्भ में विचार करते हैं वह उनकी इतिहास दृष्टि का सबसे प्रासंगिक हिस्सा हो जाता है. इसलिए साम्राज्यवादी हितों और सामन्ती अवशेषों को समाप्त कर जातीय एकता की स्थापना करने की दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ-साथ स्त्री की स्वाधीनता का प्रश्न भी वे भारतीय जनसाधारण की स्वाधीनता की समस्या के एक अंग के रूप में उनकी आलोचना में उपस्थित है.

 जो साहित्यिक विचारक सेक्स में क्रांति की बात करते हैं वे दरअसल इस समस्या को और उलझाते हैं तथा सामंती हितों को पुष्ट करते हैं. ‘‘सामंती संबंधों की परिधि में पुरुष का एक अपना निहित स्वार्थ होता है. मजदूर वर्ग से बाहर अन्य वर्गों का पुरुष जिनमें नारी स्वतंत्र श्रमिक नहीं है सामंती साम्राज्यवादी बंधनों से पीडि़त होते हुए भी, स्वयं नारी का स्वामी बनकर उसके श्रम का फल आत्मसात कर लेता है.इसलिए ऐसे लेखक जो सामंतविरोधी सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों से दूर हैं, स्वभावतः पीड़ा वाद के समर्थक बन जाते हैं.’’ (वही, पृ0-186)

 सामंतवाद और साम्राज्यवाद के समान ध्येय हैं – धर्म और राजनीति के एकीकरण से जनता को पथभ्रष्ट करना. अब जब जमाना बदल रहा है उदार अर्थव्यवस्था में राजनीति और संस्कृति संकीर्ण हो रही है, नागरिक हितों से अधिक उपभोक्तावादी मानसिकता को प्रश्रय दिया जा रहा है ऐसे समय में साहित्य को भी उसकी परम्परा के संदर्भों से काटकर साम्प्रदायिक, सामंती परम्पराएं गढ़ी जा रही हों, तब रामविलास शर्मा जैसे आलोचक को बार-बार पढ़ा जाना और भी जरूरी हो जाता है

 सामंतवाद जितना कमजोर होगा, उन्मुक्त वातावरण में सांस्कृतिक सामाजिक विकास उतना ही जोर पकड़ता जाएगा. दलितवादियों, नारीवादियों और उत्तर आधुनिकतावादियों से उनका मतभेद संभवतः इसी कारण है कि वे पृथकतावादी दृष्टिकोण से नहीं, असमानताओं को अन्तःसूत्रित दृष्टि से देखते थे. जो लोग फॉर्म की बात करते हुए उनसे वैचारिक मतभेद रखते हैं वे प्रेम, सौंदर्य, जीवन और विद्रोह की उपस्थिति एक ही साथ एक ही जीवन में समझने की सामर्थ्य ही नहीं रखते. इसका कारण संभवतः ऐसी विचारधाराओं का प्रभाव है, जो सामन्तवाद और साम्राज्यवादी हितों से समझौता करना सिखाती है.

तारसप्तक के अनेक कवियों ने आरंभ में खुद को कम्युनिस्ट घोषित किया और अगले संस्करण में साम्यवाद से मोहभंग की घोषणा भी कर दी. वैचारिक दुर्बलता अकेलेपन और यातना का परिणाम साथ लेकर आई.व्यक्तिगत अस्मिता के संकटों से जूझते हुए बहुत से भूतपूर्व मार्क्सवादी, नई पीढ़ी के दलित, स्त्री और उत्तर आधुनिक चिंतकों के बीच डॉ॰ रामविलास शर्मा तब भी मार्क्सवादी बने रहे.

 वे शेष बुद्धिजीवियों को भी द्वन्द्व से निकलने का एक ही मार्ग सुझाते हैं.‘भारत में सामन्ती अवशेषों और साम्राज्यवादी हितों को समाप्त करना.’ साथ ही स्त्री-मुक्ति और उसकी समस्याओं के निराकरण के संदर्भ को भी इस अभियान का हिस्सा बना लेना चाहते हैं और कहते हैं,‘‘भारतीय नारी सदियों की सामंतीदास्तान से तभी मुक्त हो सकेगी जब वह शेष जनता के साथ साम्राज्यवाद विरोधी, सामंतविरोधी स्वाधीनता आंदोलन में आगे बढ़कर हिस्सा लेगी.’’ (वही, पृ0-186)

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खुदमुख्तार स्त्रियों का कथा -वितान: अन्हियारे तलछट में चमका

विकल सिंह


‘अन्हियारे तलछट में चमका’ कहानीकार अल्पना मिश्र का पहला उपन्यास है.यह उपन्यास समाज में स्त्रियों की स्थिति को तो रेखांकित करता ही है, साथ ही उनके शोषण के नये सूत्रों को भी प्रस्तुत करता है.जहाँ एक ओर उपन्यास में लेखिका ने स्त्री की परम्परागत छवि को तोड़ते हुए स्त्री आत्मनिर्भरता के पक्ष को उजागर किया है, वहीं  स्त्री के आत्मनिर्भर होने के बावजूद उसे आर्थिक स्वतंत्रता न मिल पाने जैसे पक्ष को भी प्रस्तुत करना नहीं भूली हैं.इस दृष्टि से यह उपन्यास और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.यह सच है कि आज स्त्री को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता तो मिलने लगी है, लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता अब भी नहीं मिल पाई है .‘अन्हियारे तलछट में चमका’ मुख्यतः चार स्त्रियों बिट्टो की माँ, बिट्टो, मुन्ना बो (सुमन) और ननकी के माध्यम से व्यक्त संघर्षरत औरतों की कहानी है.इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्री किस प्रकार उपेक्षित है? अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए उसका जीवन किस प्रकार संघर्षमय बना हुआ है? क्या स्त्री का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाना मात्र उसकी स्वतंत्रता का पर्याय माना जाना चाहिए, जबकि उसे आर्थिक स्वतंत्रता न मिल पाई हो? इन सब पहलुओं को अल्पना जी ने इस उपन्यास ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ के माध्यम से प्रस्तुत किया है.

 स्त्री को इस पुरुष प्रधान  समाज में एक वस्तु के रूप में देखा जाता रहा  है .अपने-आप और अपने लिए जीने का अधिकार स्त्री को नहीं है.वैवाहिक जीवन में तो ये बात और भी स्पष्ट हो जाती है.उपन्यास की स्त्री पात्र ‘सुमन’ को अपनी ससुराल में अनेक प्रकार की यातनाओं का सामना करना पड़ता है, बिना किसी अपराध के उसका पति ‘मुन्ना’ गाली-गलोज करते हुए उसे बेरहमी से पीटता है.यह सिर्फ एक सुमन की आपबीती नहीं है, बल्कि न जाने ऐसी ही कितनी असहाय स्त्रियों की कथा-व्यथा है जो इस पुरुष वर्चस्ववादी समाज में दम तोड़ती नजर आती हैं.स्त्री पर होने वाली ज्यादती को उपन्यास के इस प्रसंग के माध्यम से समझा जा सकता है- “अरे बाप रे, अरे राम, बचाओ .अरे मुन्ना इ का कर रहे हो ? काहे हमारी जान पे पड़े हो ?…फिर जोर-जोर से चीखीं .उनकी चीख कहीं तक जा रही थी, इसका भरोसा खुद सुमन को नहीं था .अलबत्ता उनकी चीख पर तड़ तड़ चार-छः झापड़ मुन्ना जी जड़ते जाते।”1 बिना किसी अपराध के सुमन को अपनी ससुराल में अपने पति द्वारा इस प्रकार प्रताड़ित और अपमानित करना पुरुषवर्चस्ववादिता के घिनौने रूप का एक प्रमाण है, जिसे स्त्रियाँ चुपचाप वर्षों से सहन करती आई हैं.

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 यह विडम्बना ही रही है कि स्त्रियाँ अपनी अस्मिता के बचाव के प्रति अधिक सक्रीय नहीं रही हैं.यदि वह संगठित होना चाहें तो भी नहीं हो सकती हैं.ऐसा करने पर उनके वापस आने के दरवाजे बंद हो जाते हैं.घर-परिवार और समाज में उनकी असुरक्षा की स्थिति और भी बढ़ जाती है.बावजूद इसके वर्तमान परिदृश्य में अपने शोषण के प्रति स्त्रियों में प्रतिकार की भावना का स्वर तीव्र हुआ है.इस उपन्यास में यह दिखाया गया है कि ‘सुमन’ अपने पति के द्वारा दिए दुःख और अपमान को चुपचाप सहन नहीं करती वह इसका विरोध करती है.स्त्री प्रतिरोध का तीव्र स्वर उपन्यास के इस प्रसंग के माध्यम से देखा जा सकता है- “पिशाच आदमी है, नर पिशाच है ! औरत को इंसान नहीं समझता है.औरत क्या है? देह भर है? जैसे चाहा मसला, रौंदा? जो चाहा किया? औरत आवाज उठा दे तो बहुत बुरी.प्रेम न किया गुनाह कर दिया.उसी की सजा काट रही हूँ.घर से भागने का कोई रास्ता मिलता तो वही चुनती, काहे इस जंजाल में पड़ती.लेकिन मति मारी गई थी.तुम्हीं मिले इस दुनिया में हमें? ला के नरक में झोंक दिये.अरे, इससे अच्छा तो भीख माँग लेते, जहर खाके मर जाते.जानते तो कभी ऐसा न करते।”2 स्पष्ट है कि अब स्त्री पहले की अपेक्षा अपने अधिकारों और शोषण के प्रति सचेत हुई है.पहले जहाँ स्त्री इसे अपनी किस्मत या नशीब मानकर चुपचाप सहन कर लेती थी, वहीं अब वह उसका प्रतिरोध करने लगी है.स्त्री का यह प्रतिक्रियावादी कदम उसकी स्वतंत्रता का परिचायक सिद्ध हो सकता है, ज़रूरत है तो सिर्फ दृढ़ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से पुरुषवर्चस्ववादी इन गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की.

उपन्यास में सुमन ही नहीं बल्कि बिट्टो और उसकी माँ भी स्वयं के प्रति सचेत हैं, उनमें प्रतिकार की भावना है.तमाम हाशियों, घेरों व परिधियों को तोड़कर केन्द्रीय स्वतंत्र स्थान प्राप्त करने के लिए वह दृढ-संकल्प हैं और इसके लिए वह निरंतर संघर्षरत हैं.स्त्रियों का शोषण होना  इस पुरुष सत्तात्मक समाज में आम बात रही है.शोषण का आधार भले ही अलग-अलग हों.इस सन्दर्भ में लमही पत्रिका के संपादक विजय राय पत्रिका की सम्पादकीय में लिखते हैं-“स्त्रियों का शोषण किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं है.स्त्रियों का शोषण संस्थाबद्ध तरीके से पुरुषों द्वारा होता रहा है.चाहे वह सवर्ण समाज हो, चाहे वह दलित समाज हो-दोनों में स्त्रियों का शोषण समान रूप से प्रचलित है।”3 यह बड़ा ही दुःखद है कि समाज का कोई भी वर्ग-समुदाय क्यों न हो, लेकिन स्त्री का शोषण सभी जगह होता रहा है.पहले जहाँ स्त्रियों को घर की चार-दीवारी में रखकर शिक्षा से वंचित रखा जाता था अब वहीं उसे थोड़ी स्वतंत्रता जरूर मिली है.आज समाज में स्त्री को शिक्षा के अवसर मिलने लगे हैं.शिक्षित होकर अब वह असहाय होने की बजाय दूसरों का सहारा बनने लगी है.बावजूद इसके स्त्रियों की स्थिति आज भी इस पुरुष सत्तात्मक समाज में बदली नहीं है.पहले जहाँ स्त्री-जीवन आर्थिक स्वावलंबन के लिए संघर्षमय था, वहीं अब आर्थिक स्वतंत्रता के लिए.आज भी स्त्रियाँ अपनी कमाई अगर अपने हाँथ में रखना चाहें तो उन्हें हिंसा, प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है.अधिकांश ऐसी कमाऊ बहुएँ हैं जिन्हें अपनी कमाई लाकर ससुराल वालों को देनी पड़ती है, ऐसा न कर विरोध जताने पर उनके साथ मारपीट शुरू कर दी जाती है.उनका अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता, अपनी ही कमाई पर अपना हक़ नहीं होता, बल्कि अपनी जरूरतों के लिए भी उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है.स्त्री की अपनी कमाई पर स्वंम उसका अधिकार न होना एक बिषम परिस्थिति है.इस सन्दर्भ में बिट्टो की माँ से सम्बंधित उपन्यास का यह प्रसंग दृष्टव्य है– “गहन जरूरत के बावजूद उन्हें अनिवार्य रूप से अपनी तनख्वाह लाकर हर महीने पिता जी के सामने स्टूल पर रखनी पड़ती थी.शायद पहले, जब हम कुछ छोटे थे, तब उन्हें तनख्वाह रखकर चरण भी छूना पड़ता था.बाद में हम बहनों के बार-बार टोकने पर माँ ने चरण छूकर आशीर्वाद लेना बंद कर दिया.उससे भी पहले उन्हें दादी के चरण के पास रुपया रख कर पांव लगी करके आशीर्वाद लेना पड़ता था।”4 इस उपन्यास के माध्यम से हम स्त्रियों की इस समस्या पर भी विचार कर सकतें है कि मात्र आर्थिक स्वावलंबन ही उनकी मुक्ति का हथियार नहीं बन सकता है, हाँ कुछ हद तक उन पर हो रही प्रताड़नाएँ जरूर कम हो सकती हैं.आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाओं को ऐसी स्थितियों का सामना तब तक करना पड़ेगा जब तक कि उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो जाती.आर्थिक स्वतंत्रता को नारी स्वतंत्रता का पर्याय माना जा सकता है क्योंकि जब तक वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं होगी, दूसरों पर निर्भर रहेगी.जब स्त्री अपनी कमाई का स्वतंत्रतापूर्वक उपयोग स्वयं के लिए करने में सक्षम हो जाएगी तभी स्त्री का आर्थिक स्वावलंबन उस पर हो रहे शोषण से मुक्ति दिलाने में सहायक सिद्ध होगा.वह तभी पति की दासता से मुक्ति हो सकेगी.इस पुरुषसत्तात्मक विचारधारा का विरोध करते हुए जे. एल. रेड्डी ‘आजकल’ पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख ‘स्त्री-विमर्श के पुरोधा चलम्’ में लिखते हैं- “स्त्री के लिए पति की दासता से बचने का एक ही उपाय है, और वह है आर्थिक स्वतंत्रता.पुरुष स्वेच्छा और ऊच्छृंखलता के साथ जी रहा है.स्त्री को भी ऐसी आजादी होनी चाहिए.पति को चाहिए कि वह पत्नी को अपनी निजी संपत्ति न माने।”5 स्पष्ट है कि स्त्री को आर्थिक स्वावलंबन के साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए.तभी उसका शिक्षित और आत्मनिर्भर होना सार्थक सिद्ध होगा.

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बिट्टो की माँ अपने गाँव की पहली ग्रेजुएट थीं.उनके पति पढ़ी-लिखी लड़की से शादी का पूरा फायदा लेना चाहते थे जिसके कारण वह बिट्टो की माँ को नौकरी पकड़ लेने पर जोर देते थे.परिणामस्वरूप बिट्टो की माँ को सरकारी प्राइमरी पाठशाला में नौकरी मिल जाती है.इससे बिट्टो की माँ की स्थिति में कोई सुधार नहीं होता.वह कमाकर लाती और सारे पैसे उसे अपने पति को देने पड़ते, उन पैसों का उसे कोई लाभ नहीं मिलता.कमाकर लाने पर भी घर का खर्च ठीक से न चल पाने का क्षोभ उसे निरंतर सताता रहता.जब बर्दाश्त की सारी हदें पार हो गयीं तो एक दिन वह इसका विरोध करती है.इस सन्दर्भ में उपन्यास का यह प्रसंग दृष्टव्य है- “दूसरे का रुपया तो नहीं मांगती? अपना ही मांगती हूँ तो नहीं देते.कौन सा अपना पेट भर लूँगी? एक टेबुल खरीदनी है.कोई घर आ जाये तो अच्छा नहीं लगता.माँ बड़बड़ाती जातीं और बर्तन घिसती जातीं.पिता जी माँ का बड़बड़ाना सुन कर टालते जाते.बाहर अपने मित्रों से कहते-‘कमाने भेजो तो औरत हाँथ से निकलने लगती है.रात-दिन चिक-चिक मचाती है.साला, रुपया न लाई, जेवरात लाई है ! घर की जरूरत न होती तो कौन भेजता?”6  ऐसे अमानवीय व्यवहार स्त्री के साथ हमेशा से ही होते रहे हैं.पुरुष-प्रधान समाज ने स्त्री को शिक्षित और आत्मनिर्भर होने के लिए कुछ हद तक स्वतंत्रता तो दी लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता उन्हें नहीं मिलने दी.यहाँ यह बात भी विचारणीय हो जाती है कि इस समाज द्वारा स्त्रियों को शिक्षित और आत्मनिर्भर होने के लिए जो स्वतंत्रता दी गई, वह कहीं न कहीं अपने स्वार्थवश.उपर्युक्त प्रसंग का यह वाक्य ‘घर की जरूरत न होती तो कौन भेजता?’ इसकी पुष्टि करता है.

 एक स्त्री जो पत्नी के रूप में अपना घर-परिवार सब कुछ छोड़कर ससुराल आती है, वहाँ उस पर हो रहे अत्याचार और उसका शोषण उसकी दयनीय स्थिति बयाँ करते हैं.क्या यह अशोभनीय व्यवहार एक स्त्री के लिए न्यायसंगत है? यह पूरे पुरुष सत्तात्मक विचारधारा वाले समाज के लिए एक प्रश्न है.स्त्री की इस दयनीय स्थिति को देखकर नगमा जावेद की ये पंक्तियाँ स्वतः ही स्मरण हो आती हैं, जिन्हें वो अपनी पुस्तक ‘हिंदी और उर्दू कविता में नारीवाद’ में उद्धृत करते हुए लिखती हैं-
“अंग-अंग पे चोट का निशान है
नारी
तू सचमुच कितनी महान है
हँसते जख्मों के साथ जीती है तू
लहू अपनी तमन्नाओं का अधूरी
पीती है तू,
इन्सानियत की तू पहचान है-
सर उठाकर जीना सीख-
कायम तुझसे ही
दुनिया की शान है ?”7

कुल मिलाकर यह उपन्यास पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री के हो रहे शोषण को व्यक्त करता है.शोषण के सूत्र जहाँ आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़ते हैं वहीं पारिवारिक व यौन संबंधी शोषण से भी.स्त्री आज भी समझौतों और दोहरे कार्यभार के बीच पिस रही है.पुरुष सत्ता की नीवें हमारे समाज में बहुत गहरे तक धंसी हुई हैं.इसे तोडना, बदलना या संवारना एक लम्बी लड़ाई है.स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं.स्त्री विकास के बिना, विकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है.इस सन्दर्भ में आजकल पत्रिका में प्रकाशित नाहीद आबिदी के लेख ‘धर्मशास्त्र एवं वर्तमान समाज में नारी की स्थिति’ का यह कथन दृष्टव्य है -“स्त्री-पुरुष एक ही सत्ता के दो रूप हैं.उनमें से किसी एक का अपना अलग एवं पूरा व्यक्तित्व नहीं है.स्त्री पुरुष का और पुरुष स्त्री का पूरक अंश है.जब यह अंश भिन्न-भिन्न होकर अपनी अलग सत्ता बनाने की भूल करते हैं तभी समाज में विघटन तथा विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं.समाज का सम्यक् विकास करने के लिए नारी का विकास आवश्यक है.शरीर का आधा अंग ठीक बना रहे और आधे अंग पर पक्षाघात का प्रभाव रहे तो भला ऐसा शरीर किसी के क्या काम आ सकता है ! समाज रूपी पुरुष की ऐसी अपंग दशा में उसका उत्थान संभव नहीं है.समाज का सम्यक् विकास तब ही संभव है जब स्त्री-पुरुष दोनों का विकास एक साथ हो।”8 स्पष्ट है कि स्त्री विकास के बिना विकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है.लेकिन विडम्बना यह है कि स्त्री यदि आत्मनिर्भर होकर अपने पैरों पे खड़ा होना भी चाहे तो पुरुषवर्चस्ववादी समाज में उसके अवरोध की तमाम बेड़ियाँ उसे पहना दी जाती हैं.क्योंकि यदि स्त्री आत्मनिर्भर हो जाएगी तो वह पुरुष की दासता से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र स्थान प्राप्त कर लेगी.ऐसा इसलिए भी है कि कोई तभी तक दास, गुलाम या असहाय है जब तक वह आत्मनिर्भर नहीं है .



 उपन्यास की एक और महत्वपूर्ण स्त्री पात्र ननकी है.ननकी के रूप में समाज के बंधनों को तोड़ती हुई एक स्त्री का चित्रण इस उपन्यास में किया गया है.ननकी समाज के बंधनों को तोड़कर एक युवक से प्रेम करती है जो प्रेम के नाम पर देह को भोग, गर्भबीज बोकर भाग जाता है .परिवार वालों के लाख मना करने पर वह अपनी संतान को जन्म देने पर अड़ जाती है.घर वाले अपनी इज्जत को बचाने के लिए उसकी शादी एक बूढ़े से करवाकर उससे मुक्त होना चाहते हैं, पर ननकी उस बूढ़े को अपनी हकीकत बता आती है.शादी टूटने की ओर है और अंत में परिवार वालों द्वारा ही उसकी हत्या कर हत्या को आत्महत्या का रूप दे दिया जाता है.ननकी का विवाहपूर्व गर्भधारण करना और बच्चे को जन्म देने की जिद् उसकी हत्या का कारण बनती है.उसकी मृत्यु पर उपन्यास की एक और स्त्री पात्र सुमन, पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री की इस स्थिति को देखकर अत्यधिक व्यथित होती है.इस सन्दर्भ में उपन्यास का यह प्रसंग दृष्टव्य है- “फिर सुमन ने ननकी की चादर ढ़की देह को देखा.आँखों में आंसू छलक पड़े.कैसी सलोनी सी लड़की ! जरा सा भटक जाये आदमी तो सीधा रास्ता पाने की कोशिश नहीं करता क्या? कोई गलती हो जाये तो सुधारने के सब रास्ते औरत के लिये बंद क्यों?”9 ननकी मृत्यु को मुक्ति का रास्ता नहीं मानती थी, वह तो जीना चाहती थी.एक बार ननकी ने सुमन से कहा था- “भाभी मैं हार मानने वाली नहीं हूँ.मैं अपना बच्चा पाल लूँगी.तुम देखना.कोई साथ न दे.बस, जीने दे।”10  इस पुरुष सत्तात्मक समाज में एक लाचार और भयभीत स्त्री के जीने की चाह को देखकर डॉ. नगमा जावेद मालिक अपनी पुस्तक ‘हिंदी और उर्दू कविता में नारीवाद’ में ‘अँधेरे में बुद्ध: गगन गिल’ की पंक्तियों को उद्धृत करती हुई लिखती हैं-
“मैं जीना चाहती हूँ
वह कहती थी
अपने से अक्सर
मैं जीना चाहती हूँ ।”11

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उपन्यास की चौथी महत्वपूर्ण स्त्री पात्र ‘बिट्टो’ है.उसके पति शचीन्द्र की मुख्य समस्या यौन अक्षमता नहीं है, बल्कि उस अक्षमता का अस्वीकार करना है.पत्नी बिट्टो के बार-बार कहने पर भी वह डॉक्टरी इलाज के लिए तैयार नहीं होता है.बिट्टो के समझाने पर भी वह नहीं मानता वह उसकी बातों को उपदेश समझता है और रीझकर उसे धक्का देकर गिरा देता है.वह असहाय सी रोती हुई वहीं बैठ जाती है.इस संदर्भ में उपन्यास के इस प्रसंग को देखा जा सकता है- “ हो गया उपदेश ! परेशान करके रख दिया है.चैन से दो घड़ी बैठ भी नहीं सकता !…..क्या समझ रही हो अपने को? हाँ ! पैसा कमा रही हो तो जो मर्जी बोलोगी? हाँ ! मैं कुछ नहीं हूँ न ! यही साबित करना चाहती हो ! तुम तैश में खुद को भूल गये हो.एक साथ मुझे हिलाते हुए, न जाने कितने झापड़-घूसे-लात जमा रहे हो.मैं बैठी हुई, गिरती हुई, रोकती हुई, रोती हुई…तुम गुस्से में चले गये हो !”12  बिट्टो के उपर्युक्त कथन से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि स्त्री न तो पुरुष का विरोध करती है और न ही वैवाहिक जीवन का.वह वैवाहिक जीवन में ऐसे पति की कल्पना करती है, जो उसे समझे और उसकी भावनाओं की क़द्र करे.यहाँ बिट्टो के पति द्वारा अपनी खामियों को न समझकर अपनी पत्नी को प्रताड़ित पुरुषवर्चस्व मानसिकता का ही एक रूप है, जिसके चलते स्त्री जीवन संघर्षमय बना हुआ है.

निष्कर्षतः अल्पना मिश्र के इस उपन्यास की विषयवस्तु और अनुभूति के स्तर को देखते हुए हम कह सकते हैं कि ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ उपन्यास अपने अधिकारों और स्वत्व के लिए लड़ती एक ऐसी स्त्री की आवाज है, जो आत्मनिर्भर एवं शिक्षित होते हुए भी अभिवंचित है. इस उपन्यास में जितनी भी स्त्री पात्र आई हैं वो सभी नई चेतना से संपन्न हैं.वे जहाँ हैं, उससे और भी अच्छी स्थिति में पहुँचना चाहती हैं.परन्तु इसके लिए वे अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती हैं, बल्कि अपनी संघर्षशीलता से आगे बढ़ने का प्रयत्न करती हैं.अंततः कहा जा सकता है कि यह उपन्यास स्त्री शोषण और प्रतिरोध की चेतना का प्रचारक उपन्यास है.

विकल सिंह  गुजरात केन्द्रीय   विश्वविद्यालय  में शोधरत है.
ईमेल- vikalpatel786@gmail.com
मो: 07897551642 

 संदर्भ सूची  


1. मिश्र,अल्पना, अन्हियारे तलछट में चमका, आधार प्रकाशन, हरियाणा, संस्करण-2114, पृष्ठ संख्या- 75    
2., वही, पृष्ठ संख्या -76
3. संपादक- विजयराय, लमही पत्रिका, त्रैमासिक, लखनऊ, अंक- जन.-मार्च-2015, पृष्ठ संख्या- 03          
4. मिश्र,अल्पना, अन्हियारे तलछट में चमका, आधार प्रकाशन, हरियाणा, संस्करण- 2114, पृष्ठ संख्या- 25
5. परवीन, फरहत (संपादक), आजकल (पत्रिका) दिल्ली, अंक- मार्च 2014, पृष्ठ संख्या- 32
6. मिश्र,अल्पना, अन्हियारे तलछट में चमका, आधार प्रकाशन, हरियाणा, संस्करण- 2114, पृष्ठ संख्या- 25
7. मलिक,डॉ. नगमा जावेद, हिंदी और उर्दू कविता में नारीवाद,प्रकाशन संस्थान,दिल्ली                                  संस्करण-2110,पृष्ठ          संख्या- 54    
8. संपादक- परवीन, फरहत, आजकल पत्रिका, दिल्ली, अंक- मार्च- 2014, पृष्ठ संख्या- 55
9.  वही, पृष्ठ संख्या- 109
10. वही, पृष्ठ संख्या- 107
11. मलिक,डॉ. नगमा जावेद, हिंदी और उर्दू कविता में नारीवाद,प्रकाशन संस्थान,दिल्ली,                              संस्करण-2110,पृष्ठ           संख्या- 155    
12. मिश्र,अल्पना, अन्हियारे तलछट में चमका, आधार प्रकाशन, हरियाणा, संस्करण-2114, पृष्ठ संख्या-            85

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स्त्री अस्मिता आंदोलन इतिहास के कुछ पन्ने

आलोक कुमार यादव


जे.एन.यु.में शोधार्थी, नई दिल्ली . संपर्क:alokjnu87@gmail.com
मोबाइल : 8010333108

 प्राचीन काल से ही स्त्री, स्त्री का शोषण, उसकी समस्याएँ, उसकी सामाजिक स्थिति उसका विकास और समाज के विकास में उसका योगदान विचार क्षेत्र के प्रमुख विषय रहे हैं और वर्तमान में भी है. नारी तुम केवल श्रद्धा हो, देवी माँ, सहचरि प्राण जैसे ब्रह्म वाक्यों को सुनते हुए होश संभालने वाले इस सामाजिक मानस को परिवर्तित कर देना अकल्पनीय बात थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में उभरे सामाजिक अस्मिता के आन्दोलनों ने स्त्री की छवि, स्त्री की सामाजिक स्थिति और स्त्री के बारे में प्रचलित रूढ़िगत और मिथकीय अवधारणाओं को तोड़ा है. सदियों से उसके जिस ‘स्व’ का अपहरण पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने किया था उसे अब वह वापस पाने के लिए प्रयासरत है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि स्थितियाँ पूरी तरह से बदली हैं, स्थितियों में कुछ सकारात्मक बदलाव हुए है. समस्याएँ अभी भी हैं, समस्याओं का स्वरूप बदल गया है.


स्त्री की प्रजनन क्षमता को उत्पादक के रूप में देखा गया. मनु के शब्दों में ‘स्त्रियां खासकर प्रजनन के लिए ही बनाई गई हैं.’ (प्रकरण 10-26) इस संदर्भ में उमा चक्रवर्ती ने लिखा है कि- “पत्नीत्व से वैध मातृत्व के संक्रमण के लिए स्त्री की यौनिकता को व्यवस्थित करना जरूरी हो गया. इसलिए हमारे लिए जिस बात का पता करना महत्वपूर्ण हो जाता है वह यह कि स्त्री की यौनिकता की व्यवस्था किनके हाथों में थी? इसके साथ ही, यह भी कि उसमें खुद स्त्री की सहभागिता थी अथवा नहीं?”1 “पुरुष तंत्र को बनाए रखने के लिए या उसकी वंश वृद्धि के लिए पुत्रसंतान होना आवश्यक है अतः स्त्री का पहला कर्तव्य पुत्र संतान को जन्म देना माना गया.” (अपस्तम्ब धर्मसूत्र 1/10-51-52)

इन सारी बातों का लब्बोलुआब यह है कि स्त्री दासी और गणिका दो ही तरह की वृत्तियों के योग्य है. उसके पास अपना निर्णय नहीं है, उसकी कोई राय नहीं है. भारतीय इतिहास में जब कुछ साहसी दासियों की बाते होती है तो गार्गी का नाम भी आता है. गार्गी ने शास्त्रार्थ करते हुए जब अपने पिता को हराने की स्थिति में पहुँची तो उनके पिता ने ब्राह्मणवादी पुरुषत्व का सहारा लेते हुए उसे धमकी दी ‘गार्गी, बहस को इतना आगे न ले जाओ.’ गार्गी थोड़ी देर के लिए चुप हो गई थी. उमा चक्रवर्ती ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि- “यहाँ यह बात महत्वपूर्ण है कि किसी पुरुष को अधीनता की स्थिति में लाना हो तो उसके विरोध को दबाने के लिए अथवा उसे चुप कराने के लिए जहाँ वास्तव में हिंसा का रास्ता अपनाना पड़ता है वहीं स्त्री के मामले में हिंसा की धमकी से ही काम चल जाता है.”2


पितृसत्तात्मक कायदों के कार्य करने में हिंसा के अंतर्निहित होने का प्रमाण है लेकिन स्त्री के ‘आवेगों’ पर हिंसा के प्रयोग अथवा इसकी धमकी से ही लगाम लगाए रखा जा सकता है. स्त्री को लगाम लगाए रखने के लिए ढेर सारी आचार संहिताएं भी बनाई गई जो उपनिषदों और संहिताओं में थोक के भाव मिलते हैं. सबसे आदर्श संहिता जो भारतीय समाज में व्याप्त है वह रामायण में हमें सूर्पनखा का राम के प्रति यौनाकर्षित होने की परिणति, लक्ष्मण द्वारा उसके नाक काटने की घटना में होते हैं. नाक का कटना एक तरह से यौनांग विच्छेद का रूपक है. अखबारों की रोज की घटनाएं इस तरह की प्रवृत्तियों के विद्यमान होने की सूचक है.

 स्त्री अस्मिता के हनन के उपरोक्त  कुछ उदाहरणों से हम समझ सकते है कि स्त्री की सामाजिक स्थिति क्या थी और क्या है और क्या हो सकती है? यह आन्दोलन प्रथमतः स्त्री को एक इंसान का दर्जा दिलाने के लिए है और इसके लिए सिमोन द बोउवार लिखा है कि- “किसी समाज सुधारक या मसीहा द्वारा स्त्री की मुक्ति का मार्ग नहीं निकलेगा. वह जब भी निकलेगा स्त्री के अपने संघर्षों से ही होकर निकलेगा. यह संघर्ष प्रारंभ होगा अपने अस्तित्व बोध से.”3 दूसरे शब्दों में कहें तो यह अस्तित्व की चेतना ही अस्मिता के होने के अंग हैं. अपने अस्तित्व को लेकर एक चेतना का भाव जगाना ही स्त्री अस्मिता आन्दोलन का लक्ष्य भी है.

अपने इस ‘स्व’ के लिए लड़ाई, स्त्रियों ने सभ्यता के प्रारम्भिक काल से ही लड़नी शुरू कर दी थी. स्त्री आज जिस सामाजिक स्थिति में है वह एक लम्बे संघर्ष की देन है, पराजय और निराशा के क्षण भी इस दौरान आए लेकिन स्त्रियों ने हार नहीं मानी. ज्ञान और सत्ता का संबंध सर्वव्यापी है, जिसके पास ज्ञान रहा वही सत्तासीन रहा, इसलिए स्त्रियों को सर्वप्रथम ज्ञान से ही वंचित रखने की साजिश की गई. पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने प्राचीन काल से ही यह कार्य किया. गार्गी जैसी कुछ स्त्रियाँ अपवाद स्वरूप रहीं. ज्ञान से वंचित रखने की व्यवस्थित साजिश हुई. शिक्षा के संस्थानों से स्त्रियों को दूर रखा गया. धीरे-धीरे वास्तविक ज्ञान के अभाव में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के  नियमों को मानना स्त्री को सत्य लगने लगा और धर्म भी, साथ ही उसे ईश्वर की मर्जी से भी जोड़ दिया.

दरअसल प्राचीन काल में स्त्री के जितने भी शोषण के प्रमुख बिन्दु थे वह मूलत धर्म से ही संचालित हुए. किसी भी बात को तुरन्त ईश्वर की मर्जी और धर्म से जोड़ देना भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था की ही साजिश रही. “इस स्थिति को व्यवस्थित करने का एक प्रयास मनुस्मृति में ;.67द्ध किया गया है. जहाँ स्त्रियों को उपनयन में शामिल होने से रोक दिया गया है. उपनयन संस्कार पवित्र ज्ञान प्राप्ति का प्रारंभ बिंदु था. इसे और गहरे स्थापित करने के लिए कई विकल्प भी सुझाए गए हैं, स्त्रियों के लिए विवाह करना, पुरुषों के उपनयन के समकक्ष था, पति की सेवा करना छात्र होने के समान था और घर के कामों को संपन्न करना पवित्र अग्नि की पूजा अर्चना के समान बताया गया (मनुस्मृति .67). ऐसे निर्देशों को स्वीकार कर लेने का मतलब होता है कि कोई भी गैर घरेलू काम को नारीत्वहीन और गैर पत्नी कार्य माना जाता.”4

स्त्रियों ने अपनी इन समस्याओं के प्रति प्राचीन काल में उस तरह से प्रतिरोध नहीं किया, जिन अर्थों में आज स्त्री अस्मिता की बात हो रही है. स्त्री अस्मिता की व्यवस्थित शुरूआत उन्नीसवीं शताब्दी में होती है. राधा कुमार ने लिखा है कि “उन्नीसवीं सदी को स्त्रियों की शताब्दी कहना बेहतर होगा क्योंकि इस सदी में सारी दुनिया में उनकी अच्छाई-बुराई, प्रकृति, क्षमताएँ एवं उर्वरा गर्मागर्म बहस का विषय थे. यूरोप में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान और उसके बाद भी स्त्री जागरूकता का विस्तार होना शुरू हुआ और शताब्दी के अंत तक इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा जर्मनी के बुद्धिजीवियों ने नारीवादी विचारों की अभिव्यक्ति दी. उन्नीसवीं सदी के मध्य तक रूसी सुधारकों के लिए ‘महिला प्रश्न’ एक केन्द्रीय मुद्दा बन गया था जबकि भारत में खासतौर से बंगाल और महाराष्ट्र में समाज सुधारकों ने स्त्रियों में फैली बुराइयों पर आवाज उठाना शुरू किया.”5

वास्तव में आजादी के पहले से ही चिन्तन की दुनिया में विचारों को आयातित करने की जो प्रवृत्ति बनी, भारत में स्त्री अस्मिता भी उससे अछूती नहीं है.है. स्त्री अस्मिता का एक महत्वपूर्ण पहलू है कि स्त्रियों की शिक्षा पर ध्यान दिया जाय. स्त्री शिक्षा ही वह एकमात्र हथियार है जो स्त्री की चेतना को निर्मित करते हैं और स्त्री अस्मिता की पूरी लड़ाई चेतना से ही लड़ी जा सकती है. “जैसा कि हमें मालूम है कि स्त्रियों को शिक्षित करने के महत्व पर सबसे पहली सार्वजनिक बहस राजा राममोहन राय द्वारा 1815 में स्थापित ‘आत्मीय सभा’ बंगाल में छेड़ी गई.”6 राजा राममोहन राय ने उसके बाद सती प्रथा पर हमला बोलते हुए पहला लेख लिखा था. राजा राममोहन राय ने पहली बार भारत में सतीप्रथा के विरूद्ध आंदोलन चलाया और उनके संघर्षों के फलस्वरूप “विलियम बेंटिक 1829 में जब भारत के गर्वनर जनरल बने तो उन्होंने सती निर्मूलन एक्ट पास किया.”7

सती उन्मूलन आन्दोलन के बाद स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए स्त्रियों की शिक्षा का आंदोलन एकाएक जोर पकड़ने लगा. “लड़कियों के लिए स्कूल सबसे पहले अंग्रेज तथा ईसाई मिशनरियों द्वारा 1810 में शुरू किए गए. स्त्रियों की शिक्षा से संबंधित पहली पुस्तक किसी भारतीय भाषा (बंगाली) में 1819 में एक भारतीय गुरूमोहन विद्यालकार द्वारा लिखी गई जिसे कलकत्ता की कन्याबाल समिति ने 1820 में प्रकाशित किया. 1827 तक मिशनरियों द्वारा हुगली जिले में 12 कन्या पाठशालाएँ चलाई जाने लगीं. एक वर्ष बाद “ ‘लेडी’ स सोसाइटी फार नेटिव फीमेल एजुकेशन इन कैलकटा एण्ड इट्स विसिनिटी” ने स्कूल खोले जो मिस कुक द्वारा चलाए गए. ऐसा देखा गया है कि गरीब इलाकों में खुले स्कूलों के बारे में जानने के लिए स्त्रियाँ भी दिलचस्पी ले रही थीं.”8
हालांकि स्त्रियों को उस समय शिक्षित करने के दो कारण थे, पहला तो यह कि उस समय ईसाई मिशनरियों द्वारा ईसाईयत फैलाने का डर हिन्दुओं को हो गया था इसलिए हिन्दू एवं ब्राह्मणकन्या पाठशालाएँ खोली गई. दूसरा कारण यह था कि भारत में जो उभरता हुआ मध्यवर्ग था वह अपनी स्त्रियों को अंगे्रज स्त्रियों के तरह के पाश्चात्य तौर-तरीकों से परिचित कराना चाह रहा था. राधा कुमार ने अपनी किताब में एक पारसी फ्रांसकी बोमन जी के विचारों को उद्धृत किया है- “हम अपनी पत्नियों तथा पुत्रियों के लिए अंग्रेजी  भाषा, अंग्रेजी  रीति और अंग्रेजी  आचरण चाहते हैं और जब तक हमें यह नहीं मिलेगा तब तक अंग्रेजों  और भारतीयों के बीच की यह खाई बरकरार रहेगी.”9 तो कहीं न कहीं भारतीय स्त्रियों को पश्चात्य विचारों से ही प्रभावित होकर शिक्षा का द्वार पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने खोला. स्त्री शिक्षा की जब भी बात होगी तो ज्योतिबा फुले का नाम लेना जरूरी होगा, ज्योतिबा फुले ने 1852 में तीन कन्या पाठशालाएँ खोली जिसमें उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा को लेकर काम करना शुरू किया.

भारतीय इतिहास में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का आगमन स्त्री अस्मिता इतिहास की भी एक महत्वपूर्ण घटना है. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने सन् 1850 में विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबंध को समाप्त करने के लिए अभियान चलाया. 1855 में भारत के गर्वनर जनरल को विधवा पुनर्विवाह के लिए कानून बनाने के लिए याचिका दायर की.
स्त्री आन्दोलन के इस प्रारम्भिक दौर में स्त्री की समस्याओं को केन्द्र में रखकर लडाईयाँ लड़ी जाती थीं लेकिन बाद में चलकर उन्होंने अपने अधिकारों की मांग करनी शुरू कर दी. 1914 में हुए महायुद्ध ने स्त्रियों के राजनीतिक मूल्य को काफी बढ़ा दिया था. युद्ध में स्त्रियों की भूमिका अत्यन्त महत्वूपर्ण रही. इग्लैण्ड और अमरीका की सरकारों ने युद्ध में स्त्रियों द्वारा भाग लेने की एवज में स्त्रियों के लिए मताधिकार प्रस्तावित किया. स्त्री को मत देने के योग्य समझना उसे एक व्यक्ति के रूप में मान्यता मिलने का सबसे बड़ा प्रमाण है.1921 में भी भारत के विभिन्न प्रांतों में उसे मताधिकार प्रदान किया गया. बंगाल से राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों के प्रयत्नों से स्त्री सुधार की जो हवा बहने लगी थी उसका असर पूरे भारत पर हो रहा था. सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयासों से अंधविश्वासों और कुप्रथाओं की बेड़ियों से स्त्री जाति को निकालने के लिए लगातार सार्थक कदम उठाए जा रहे थे. सती प्रथा के विरूद्ध कानून पारित हो चुका था. 1930 में शारदा एक्ट के तहत निम्नतम विवाह आयु सीमा बढ़ाकर 14 वर्ष कर दी गई थी. भारत में बाल विवाह स्त्रियों की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण रहा है. विवाह की आयु बढ़ा देने से स्त्री शिक्षा की ओर भी थोड़ा रूझान बढ़ा है.

शिक्षा के प्रसार से जब लड़कियाँ विविध व्यवसायों के मार्ग खुले पाने लगीं तो वे आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र और स्वावलम्बी होने लगीं. इस युग में स्त्री को व्यक्तिगत अधिकार देने का भी प्रयास किया गया 1937 में बंगाल में ‘हिन्दू विमैन्स राइट जू प्रापर्टी’ कानून पास किया गया. इससे कुछ वर्षों पहले बंगाल के ही केन्द्रीय व्यवस्थापक मण्डल ने इस तरह की माँग की तो उसे जनता के अत्यधिक विरोध के कारण पास नहीं किया गया था.
स्त्रियों का राजनैतिक क्षेत्र में अवतरण स्त्री स्वतन्त्रता का एक महत्वपूर्ण पहलू है. एनी बेसेन्ट के भारत आने से लेकर उनके कांगे्रस की सभापति बनने के बीच के समय में स्त्रियों में राजनैतिक चेतना जागी. 1947 में कलकत्ता कांगे्रस में तीन स्त्रियाँ एनी बेसेन्ट, अम्मन बीबी और सरोजनी नायडू महत्वपूर्ण पदों पर थीं. भारत के सामाजिक तथा राजनैतिक इतिहास में ये तीन स्त्रियाँ नवयुग के आरम्भ की सूचक थीं. 1921 से 1923 के असहयोग आन्दोलन में स्त्रियों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की. 1923 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दिनों में भारतीय स्त्रियों में राजनैतिक स्तर पर चेतना अत्यंत व्यापक पैमाने पर फैली. देश सेवा के लक्ष्य को लेकर सरोजनी नायडू, कमला देवी, चट्टोपाध्याय, रूक्मिणी लक्ष्मीपति, हंसा मेहता, कस्तुरबा गाँधी, मीराबेन, नेली सेन गुप्ता, सरस्वती देवी जैसी महिलाएँ समस्त नारी जाति की प्ररेणा के रूप में उभरीं. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाली स्त्री अब भारतीय बुद्धिजीवियों की दृष्टि में ‘अवगुण आ सदा उर रहहि’ के स्थान पर सद्गुणों की खान के रूप में स्थापित हो चुकी थी.

अंग्रेजों का आगमन स्त्री स्वाधीनता के पक्ष में महत्वपूर्ण घटना थी. ब्रिटिश राजसत्ता अपने साथ राज्य व्यवस्था ही नहीं, नई आर्थिक रचना और विचारधारा भी लाई. भारतीय जनजीवन पर इस धारा का व्यापक प्रभाव पड़ा. पहले-पहले बदलते आर्थिक संबंधों ने भारत की बुनियादी संस्थाओं की नींव हिला दी. नए आर्थिक संबंधों ने पहले सदियों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था पर आधारित ग्राम्य-व्यवस्था को हिलाया. यद्यपि सीधे-सीधे अंगे्रजों ने स्त्रियों के हित में कोई काम नहीं किया किन्तु नए आर्थिक संबंधों और अंगे्रजी शिक्षा की शुरूआत ने अप्रत्यक्ष रूप से नारी को प्रभावित किया. यह नई शिक्षा स्त्रियों के लिए ही नहीं थी. विदेशी अधिकारियों के नजर में स्त्री शिक्षा की कोई तात्कालिक उपयोगिता नहीं थी क्योंकि स्त्रियों को दफ्तर में क्लर्क नहीं बनाया जा सकता. बहरहाल अंगे्रजों के विरोध में जो स्वाधीनता की लहर उठी उसमें स्त्रियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और स्त्री के सवाल के स्वाधीनता से जोड़ा और अपने अधिकारों के लिए लड़ना शुरू किया. लता सिंह ने लिखा है कि- “1920 के दशक में महिलाओं के अधिकारों पर दो विचारधाराएँ बिल्कुल अलग-अलग तर्को पर आधारित दिखती है एक तर्क था कि औरतों को अधिकार इसलिए मिलना चाहिए क्योंकि वह समाज में माँ की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, दूसरा तर्क यह था कि उनमें और पुरुषों में जैविक असमानताएँ होते हुए भी जहाँ तक इच्छाओं, आकांक्षाओं और क्षमताओं का प्रश्न है विशेष अंतर नहीं होता और उन्हें वे सब अधिकार मिलने चाहिए जो पुरुषों को मिले हुए हैं. पहले तर्क में सोच थी कि प्राकृतिक जैविक अंतरों के कारण दोनों में गुणात्मक अंतर होता है, जबकि दूसरा तर्क यह मानकर चलता था कि प्राकृतिक जैविक अंतरों से यह सिद्ध नहीं होता कि दोनों के गुणात्मक स्वरूप में कोई बुनियादी अंतर है.”10



महत्वपूर्ण यहाँ यह है कि यहाँ पर स्त्रियों को अधिकार मिलने चाहिए, इस बात को सबने स्वीकार किया कि स्त्रियों को अधिकार क्यों मिलना चाहिए? दोनों विचारधाराओं से सहमत असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं है कि एक के तर्क गलत हैं, एक के सही. यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि स्त्रियों को अधिकार मिले, इस बात की स्वीकृति मिली.


हालांकि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान स्त्रियों के सवालों की चर्चा करते हुए लता सिंह ने लिखा है कि- “राष्ट्रवादियों को महिलाओं से मुक्ति तथा उत्थान से कोई सरोकार नहीं था, इसके विपरीत महिलाओं की पत्नी, पुत्री और माँ की भूमिकाओं की और पुष्टि हुई, केवल राष्ट्रीय आन्दोलन की आवश्यकताओं को देखते हुए उसे थोड़ा बहुत विस्तार मिल गया. राष्ट्रवादियों ने महिलाओं की भूमिकाएं और सीमाएँ पहले ही तय कर दी थी और महिलाओं को उन सीमाओं को लाँघने की अनुमति नहीं थी. इस तरह पारंपरिक इतिहास में महिलाओं की संख्या थोड़ी और बढ़ गई. राष्ट्रीयता के इतिहास में महिलाओं का योगदान केवल उनकी पारंपरिक भूमिका का विस्तार मात्र है. राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं का कहीं कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं दिखता.”11

लता सिंह की बात से सहमत हुआ जा सकता है. स्वतन्त्र अस्तित्व की स्त्री स्वाधीनता आन्दोलन में नहीं थी. जो भी स्त्रियाँ थी पार्टी आधारित नियमों के अनुसार चल रही थी, ऐसा नहीं था कि उन्होंने स्त्रियों के लिए कोई विशेष कार्यक्रम चलाया हो जिससे स्त्री चेतना की लहर सी उठ पड़ी हो.


स्वाधीनता प्राप्ति के बाद पूरी तरह से भारतीय सामाजिक संरचना में पितृसत्ता का ही प्रभाव रहा. उदाहरण के लिए संविधान में ही अनुच्छेद 15 में समानता के सिद्धांत को स्वीकारा गया लेकिन साथ ही धर्म के आधार पर बने पारिवारिक कानूनों को मान्यता देकर स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत का विरोध किया गया है. शोषण के विरूद्ध अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया, पर स्त्री और पुरुषों को समान काम के लिए समान वेतन संबंधी कानून 1976 में बनाया गया.

हिन्दू कोड बिल के पास हो जाने से महिलाओं को स्थिति परिवार, विवाह तथा संपत्ति के क्षेत्र में कुछ बेहतर हुई श्रम कानूनों में भी थोड़े सुधार हुए लेकिन कानून पर्याप्त नहीं थे. धीरे-धीरे महिलाओं के अधिकारों के सवाल पर स्थितियाँ उदासीन हो गईं. सन् 1950 से लेकर 1975 तक महिलाओं के सवाल और स्त्री अधिकारों का सवाल दरकिनार रहा. सन् 1975 के बाद से कई महिला संगठन बने जिन्होंने विशेष रूप औरतों पर हिंसा के मुद्दे पर काम करना शुरू किया और इस दिशा में बदलाव के लिए सरकार पर दबाव भी डाले. विकास प्रक्रिया में औरतों को शामिल किया जाने लगा. 1976 में समाज कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत महिला कल्याण और विकास ब्यूरों की स्थापना की गई जिससे स्त्री के शोषण के प्रमुख बिंदुओं पर कार्यक्रम चलाकर उसकी निजता को सुरक्षित करने की कोशिश की गई. साथ ही उन्हें उत्पादन के साथ जोड़ा गया और विकास कार्य में उनकी भागीदारी को सुनिश्चित किया गया.


स्त्री अस्मिता का इतिहास तमाम अवरोधों, विरोधों और संघर्षों के फलस्वरूप आज इस मुकाम पर पहुँचा है. जरूरत है उस इतिहास को टटोलने की, खोजने की और स्त्रियों के साथ न्याय करने की.अंततः ऐतिहासिक परिवर्तनों की प्रक्रिया में स्त्री इतिहास का साथ बखूबी निभा रही है. इस प्रयास की दिशा सही है या गलत, वादों के नारों के बीच स्त्री अपना स्वरूप खो रही है या तलाश रही है इसका निर्णय काल अपने क्रम में स्वयं कर देगा लेकिन स्त्री अस्मिता के आन्दोलन स्त्री मुक्ति की दिशा में सार्थक है इसमें कोई दो राय नहीं है.


संदर्भ :
1. पृ. 70 उमा-चक्रवर्ती: ‘जाति समाज में पितृसत्ता’
2. पृ. 20 वही
3. पृ. 344, सिमोन द बोउवार: ‘द सेकेण्ड सेक्स
4. पृ. 141, संपा. साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता- ‘नारीवादी राजनीति: संघर्ष एवं मुद्दे’.
5. पृ. 25, राधा कुमार: ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’.
6. पृ. 26, राधा कुमार, वही
7. पृ. 27, राधा कुमार, वही
8. पृ. 39, राधा कुमार, वही
9. पृ. 50, राधा कुमार, वही
10. पृ. 160, संपा. साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता- ‘नारीवादी राजनीति: संघर्ष एवं मुद्दे’.
11. पृ. 175, संपा. साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, वही

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जैनेन्द्र की कहानियों में स्त्री-प्रश्न

डॉ.दीनानाथ मौर्य

जूनियर प्रोजेक्ट फेलो (भाषा शिक्षा विभाग) एन0सी0आर0टी0, नई दिल्ली . संपर्क: dnathjnu@gmail.com
मोबाइल : 9999108490

एक बड़े रचनाकार हैं जैनेन्द्र .अपने समय के भी और आज के भी. प्रेमचंद्र के साथ और उनके समय के साथ रहकर जैनेन्द्र ने समाज को और व्यक्ति को नयी/भिन्न नजर से देखा है.बगैर  किसी बंधन में बंधे हुए सामाजिक यथार्थ का उद्घाटन प्रेमचंदजिस तरीके से कर रहे थे उसमें कुछ “और” कर गुजरने की गुंजाईश की तलाश की. यही कारण है की जैनेन्द्र ने अपने साहित्य में प्रेमचंद से वैचारिक समानता रखते हुए भी सर्जनात्मकता का एक भिन्न मार्ग चुना.सामाजिक जकड़न,सामंती संस्कृति की शोषणमूलक प्रवृत्तियों के खिलाफ़ प्रेमचंद्र जो लड़ाई लड़ रहे थे जैनेन्द्र उन्ही के साथ रहकर व्यक्ति की निजी अस्मिता की सुरक्षा का अन्वेषण कर रहे थे. जैनेन्द्र मूलतः चिन्तक थे- मानवीय संबंधों और जीवन व्यवहार सेसम्बद्ध तात्विक प्रश्नों के. व्यक्ति की पूर्णता में समाज की पूर्णता और “सामाजिक” पर“आत्मिक” को प्रतिष्ठित करने वाले जैनेन्द्र की अधिकांश रचनाओं का सरोकार स्त्री-पुरुष संबंधों से जुड़ता है.वे जीवन और साहित्य में बगैर किसी मूढ़ सामाजिक ढांचे और फार्मूले में बधे हुए मानव मन की सहज वृतियों का सरलता से उद्घाटन करते हैं.


काम,प्रेम और परिवार जैनेन्द्र की चिंता के मूल विषय रहे हैं.इन्हीं के आलोक में जैनेन्द्र ने अभिजात समाज के भीतरी खोखलेपन को उजागर किया है और अच्छाई-बुराई दोनों से निर्मित समाज की ठोस नैतिकता को महत्व देना चाहा है. भारतीय समाज की कुटुंब नाम की संस्था में जकड़ी हुयी नारी का जीवन जैनेन्द्र की चिंता का बिंदु वहां बनता है जहाँ माना जाता है की कुटुंब को बनाने और बिगाड़ने की पूरी जिम्मेदा स्त्री की ही होती है.—“पुरुष कुछ नहीं और बिगाड़ता,यहाँ तक की पूरी दुनिया स्त्री की सामाजिक नैतिकता को निर्धरित करने के लिए ही नये-नये नियम गढ़ती है-जनेद्र का यही मानना था. यही कारण है की जैनेन्द्र की कहानियों के“नारी पात्रों की सारी क्लिष्टता या समझ लेने पर सरलता – प्रेम में समर्पण या स्वीकृति का उस मांग से जो कभी उपेक्षित  यौवन रस के चलते और कभी मात्र शरीर और संयोग सुख की अभिलाषा के चलते  और कभी मात्र शरीर और संयोग सुख की अभिलाषा के चलते मानसिक तनाव बनाये रखती है.”1(कहानीकार जैनेन्द्र अभिग्यनौर उपलब्धि  -जगदीश पांडेय) उनकी कहानियों-“जान्हवी”,”त्रिवेणी”,”पत्नी”,”दो सहेलियां” आदि में स्त्री अपने स्वाभाविक इक्छा,आकांक्षा और अधिकार की मांग करने वाली नारी के रूप में सामने आती है.जैनेन्द्र की इन कहनियों में घर है –उसकी छत है,खुला आकाश है,उन्मुक्त पक्षी है,शहर के एक ओर का तिरस्कृत मकान,चूल्हा है,चूल्हे का धुआं है,अँधेरा है और भगवान् को कोसने वाला वह वाक्य है की “भगवान,तूने औरत को क्यों जन्माया?”2 जैनेद्र की कहानियों के नारी पात्र अपने पति को उपदेशक और कामुक क्रांतिकारी  सामाजिक तथा नौकरी –शुदा होने के अतिरिक्त उसे किसी “और” अवस्था में देखने के लिए तडपती है. थोड़े गिले-शिकवे के साथ उसमें जी लेने की चाहत है.और साथ ही  जीवन की हौस को बुझते न देने का गहरा आत्मबल भी.वह प्रेम की भूखी है,पुरुषों की तरह प्यार को सिर्फ़ फुरसत की चीज नही मान पाती है.

जहाँ तक प्रश्न जैनेन्द्र की कहानियों में स्त्री विमर्श का है तो कहा जा सकता है कि भारतीय समाजिक जीवन का आधार ‘कुटुंब ’ नाम की संस्था में जकड़ी हुई नारी ही जैनेन्द्र के केन्द्र में है और जहाँ कुटुंब को बनाने-बिगाड़ने का पूरा दायित्व स्त्री का है-‘पुरूष कुछ नही‘ बनाता-बिगाड़ता। धर्म और सभ्यता, यहाँतक की ‘दुनिया स्त्री पर टिकी है। यही कारण है कि ‘‘जैनेन्द्र के नारी-पात्रों की सारी क्लिष्टता या समझ लेने पर सरलता – प्रेम मे समर्पण या स्वीकृति का उस माॅग से है जो कभी अपेक्षित यौवन रस के चलते और कभी मात्र शरीर और सहयोग सुख की अभिलाषा के चलते मानसिक तनाव बनाये रखती है”. (कहानीकार जैनेन्द्र – अभिज्ञान और उपलब्धी – जगदीश पाण्डेय) उनकी कहानियों – ‘जान्हवी‘ ‘त्रिवेणी‘ ‘पत्नी‘ ‘दो सहेलियाँ’आदि में स्त्री अपनी स्वाभविक इच्छा, आकांक्षा, अधिकार की मांग करने वाली नारी के रूप मे सामने आती है। जैनेन्द्र की इस कहानियों में ‘घर‘ है- उसकी छत है, खुला आकाश है, उन्मुक्त पक्षी है। शहर के एक ओर का तिरस्कृत ‘मकान‘ है, चूल्हे का धुआ है, अॅधेरा है और भगवान को कोसने वाला वह वाक्य है कि ‘भगवान, तूने औरत को क्यों जनमाया ? जैनेन्द्र की नारी पात्र अपने पति को ‘उपदेशक‘ और ‘कामुक‘ क्रान्तिकारी‘ समाजिक तथा नौकरी – शुदा होने के अतिरिक्त उसे ‘किसी और अवस्था‘ में देखने के लिए तड़पती है। थौड़े-गिले-शिकवे के साथ उसमे जी लेने की चाहत है। और जीवन की हौस को बुझते न देने का गहरा आत्म-बल। वह प्रेम की भूखी है, पुरूषों की तरह प्यार को सिर्फ फुरसत की चीज वह नहीं मान पाती है। ‘विवाह‘ और प्रेम का सवाल भी जैनेन्द्र की चिन्ता के मूल प्रश्नों में है। वे विवाह को दो व्यक्तियो का सम्बन्ध नही मानते वे उसे समाज की ग्रन्थि मानते है। विवाह उनके लिए ‘भावुकता का प्रश्न नही, व्यवस्था का प्रश्न है।‘ इसे जैनेन्द्र के स्त्री सम्बन्धी  का कम जोर पक्ष कहा जाना चाहिए। आखिर छायावाद और उसके बाद का वह दौर जब नारी मुक्ति की हवा जोरों से चल रही थी, जैनेन्द्र के यहाँ वह ‘व्यवस्था का प्रश्न‘ में बॅध क्यों गई? यह विचारणीय है। नारी क्यों नियति पर टिकी रह गई? जैनेन्द्र ‘त्यागपत्र‘ में लिखते है – ‘‘दान स्त्री का धर्म हैै। नहीं तो उसका और क्या धर्म है? सवाल यह है कि जैनेन्द्र नारी मन की संवेदना को जानते हुए भी आखिर उसे प्राकृतिक रूप से इसी लायक क्यो घोषित कर देते है?

जैनेन्द्र की कुछ कहानियों में ‘पति-पत्नी और ‘वह‘ का त्रिकोण है तो कुछ में स्त्री-पुरूष के आपसी रिश्तों से उपजी नारी मन की झुंझलाहट। ‘पत्नी‘ (1940) और ‘त्रिवेणी‘(1935) दोनों कहानियाँ लगभग एक जैसी नारी की कथाएं है। ‘पत्नी‘ की पत्नी सुनन्दा अपने पति कालिन्दी चरण की सेवा ‘भारतीय नारी-विधान‘ की तरह ही करती है। लेकिन उसे अपने जीवन के दिनों में अलस भाव से केवल यही सोचने को रह गया है कि (जिन्दगी के) कोयले बुझ न जाये। वह जिनकी अर्धांगिनी है उसी का उत्साह उसे समझ में नही आता। परतंत्रता (सदियों की) की बेड़ियों में जकड़ी इस नारी को (सुनन्दा को) भारत माता की स्वतंत्रता की बात समझ में नही आती है। ‘वह कम पढ़ी-लिखी है, लेकिन उसमे उसका क्या कसूर है? कहकर जैनेन्द्र पूरी सामाजिक व्यवस्था को कटघरे मे खड़ा करते है। घर मे ही बेगानी बन गई नारी की कहानी है- ‘पत्नी‘। किसी ने सही लिखा है-‘‘सुनन्दा का पति परदेश मे नही है, वह घर पर ही है। वह चौकेकी वेबा है, र्निजीव चीजों के बीच ही सुनन्दा की दुनिया बसती है। उसकी ट्रेजडी मे कोई काव्यत्व नही, नाटकीयता नही, नित्य प्रति का मौन मरण है। जहाँदुख एक दिन का नही रोज का है। ध्यान रहे! यह अज्ञेय का ‘रोज‘ नही है। यहाँ अज्ञेय के नीरस, यान्त्रिक विघटनोन्मुख जीवन का रूप नही है- यह तो जैनेन्द्र का अपनी परंपरा मे दो दम्पत्तियों के अनबन की कहानी है, जिसमे चाह और खीझ दोनों दबायी जाती है। खीझ तो कभी प्रकट हो जाती है, लेकिन तब असल चाह पर परदा पड़ जाता है। एक ओर उपेक्षा लेकिन दूसरी ओर मनुहार की भूख है।‘‘ यहाँ जैनेन्द्र यह दिखाने मे सफल है कि ‘क्रान्ति‘ घर के बाहर ही होती थी, यह भी चित्रित करने मे सफल है कि नारी मुक्ति का आन्दोलन घर के भीतर नही चल रहा था। वह मात्र छलावा था, नारी अब भी पिंछड़े मे बंद थी। वे यह भी बताते चलते है आन्दोलन का जिम्मा किस तरह घर के भीतर कैद रहने वाली नारियां उठ रही थी। इस कहानी मे नारी अपने ‘तनिक-सा‘ मान की तलाश करती है यहाँ वह भी कुचल उठा। लेकिन फिर भी सुनन्दा-‘मेरी तो खैर कुछ नही, पर अपने तन का ध्यान रखना चाहिए।‘ की कामना अपने पति से करती है। इस कहानी मे-बच्चो की तरह झगड़ा है, मगर बड़ों की तरह विचार, पति के स्वास्थ्य की चिन्ता है, पति कुछ भी करे, उसमे विश्वास भी है, पति कम से कम पूछॅ तो लिया करे बस इतनी सी ही ललक है।


 ‘पत्नी‘ यदि दो (सुनन्दा और कालिन्दी चरण) के बीच की अबूझ प्रेम कहानी है तो ‘त्रिवेणी‘ (1935) वैवाहिक जीवन की जकड़ बंदी को उजागर करने वाली कथा। कहानी के दो भाग है पहले मे यथार्थ है दूसरे मे पश्चाताप। पहले मे जिन्दगी के चूल्हे की मंद आंच है, वैवाहिक जीवन मे ‘मध्यान्ह का प्रखर ताप है, यहाँ क्षण-क्षण पर बगूले उठ रहे है। दिन काटे जा हे है। जिन्दगी की गाड़ी चू-चू कर चल रही है। जीवन मे रस नही है। पति-पत्नी है, बच्चा भी है, लेकिन जीवन का सार तत्व वहां गायब है। कहानी का दूसरा भाग वह है जहाँ पहले का दुःख उसे पाप लगता है। प्रेम की तरसती त्रिवेणी यहाॅ भोजन बनाने को तैयार है। यहाँ नारजगी नही है और ऋण मांग लेने का साहस है। एक नीरस होते जीवन मे प्रेम को (विवाह से ऊपर) एक निर्णायक तत्व के रूप मे जैनेन्द्र यहाँ प्रस्तुत करते हैं। कहानी का आरम्भिक विद्रोह अन्त मे पश्चाताप क्यो बन जाता है? और स्त्री भारतीय पतिव्रता आर्दश का चोला पहन लेती है। चंचलता और संकोच बगैर ‘प्रेम’ तत्व के किस प्रकार जिन्दगी को उबाऊ बना देते है। जैनेन्द्र इसकी पड़ताल करते यहाँ जान पड़ते है।

पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और जैनेन्द्र (विशेष सन्दर्भ-‘पत्नी’ कहानी)

 ‘जान्हवी‘ कहानी मे किसी को छायावाद की ‘छाया‘ दिख सकती है। और कमोवेश इससे सहमत भी हुआ जा सकता है लेकिन कहानी उससे आगे भी बहुत कुछ कहती है। ‘प्रेम‘ और ‘विवाह‘ के सवाल को जैनेन्द्र ने इस कहानी मे भी नारी मुक्ति के प्रश्न के रूप मे प्रस्तुत किया है। लेकिन हमेशा की तरह जैनेन्द्र की नारी पात्र यहाँ भी किसी तरह का सामाजिक विद्रोह नही करती है। जान्हवी अपने मंगेतर ब्रजमोहन के पास पत्र भेजकर अपने पूर्व प्रेम की सूचना देती है। वह कहती है-‘आप जब विवाह के लिए यहाँ पहुचेंगें तो मुझे प्रस्तुत भी पायेगें विवाह जैसे धार्मिक अनुष्ठान की पात्रता मुझमे नही है। एक अनुगता आपको विवाह द्वारा मिल जायेगी। पर चाहिए की वह जीवन-संगिनी भी हो। वह मै हूँ या हो सकती हूँ.इसमे मुझे बहुत संदेह है। विवाह मे आप मुझे लेगें और स्वीकार करेंगे तो मे अपने आप को दे ही दूँगी, आपके चरणों की धूल माथे से लगाऊॅगी। आपकी कृपा मानूंगी । कृतज्ञ होऊॅगी। पर निवेदन है कि यदि आप मुझ पर से अपनी मांग उठा लेंगे, मुझे छोड़ देंगे, तो मैं और भी कृतज्ञ होंऊॅगी। निर्णय आप के हाथ है। जो चाहे, करे।‘‘ सामाजिक मान्यताओं के बीच जकड़ी जान्हवी जहाँ पढ़ी-लिखी सब की जात एक ही मानी जाती है- लड़की अपने प्रेम का प्रदर्शन/अभीव्यक्ति नही कर सकती है। तथा कथित ‘सामजिकता‘ के ठेकेदारों से वह अन्त तक कहती है- ‘‘दो नैना मत खाइयो‘‘। मत खाइयो – पीउ मिलन की आस!‘‘ मृणाल की तरह अनकहे रूप में वह भी चिड़िया होना चाहती है। पुरूष प्रणान समाज को इसमें कोई आपत्ति नहीं बशर्ते उसे पिजंरे (सामाजिक) में रहना स्वीकार हो।



 सन् 1960 में लिखी कहानी ‘दो सहेलियाँ’ भी कुछ ऐसी ही समस्याओं को सामने लाती है। जसुदा और बसुदा की आधी जीवन यात्रा के बीच विवाह और प्रेम के सवाल को जैनेन्द्र ने पढ़ी-लिखी तथा नौकरी-शुदा नारी की पीड़ा के रूप में प्रस्तुत किसा है। सन्तुष्ट दोनों नहीं है अपने पति तथा अपने समाज से, नारी यहाॅ प्रेम के त्रिकोण पर जिन्दा है। जिसे वसुदा ने बयां कर दिया है -‘‘ तुम न कभी पति की बात करेगी, न उस चेहरे की बात करोगी जो मेरे सारे कष्टों का कारण रहा। उसका प्यार न होता तो मैं तनिक से ही कष्ट में कभी की अडिग चुकी होती और जब तक बड़े आराम से होती।‘‘ इसमें भी नारी अपने को मार कर जीवित रहती है। ‘मन के छलावे में रहने से फायदा नहीं है। मन मार कर ही रहना हो पाता है।‘‘ नारी ने स्वच्छन्द जीवन नहीं देखा, लेकिनयह उसकी आदत का हिस्सा बन गया है। बसु अपने पति से संतुष्ट नहीं है डाªइवर की जगह उसने पति को रखकर घाटे का सौदा क्या सचमुच नहीं किया है। उसका पति उसकी जिन्दगी की गाड़ी का डाªइवर नहीं है- ‘मर्द एक काम में मर्द हो तो उतने से तो चलता नहीं है। बाकी जिन्दगी में भी तो उसे ‘मर्द‘ होना चाहिए।‘ औरत अपनी स्थिति से अवगत है पुरूष कुछ भी करे उसे तो पूरी छूट है लेकिन औरत को, तो मन मार कर ही जीना होता है -‘‘मरद का दिल शीशा होता है। जरा में तरेड़ खा जाता है। मरद तो मरद है। आखिर बिगाड़ तो औरत को भोगना होता है। बे सहारा वही बनती है।‘‘ सच को कहने की छूट और सुनने का साहस समाज में कहाॅ ? जैनेन्द्र ने अन्यन्त्र कही लिखा है कि ‘‘प्रेम जीवन को बहलाने की वस्तु तो बन सकती है, लेकिन जीवन उसके लिए स्वाहा नहीं किया जा सकता। जीवन तो दायित्व है और विवाह वास्तव में उसकी पूर्णता की राह – उसकी शर्त।‘‘

सूरजमुखी अँधेरे के” की नायिका का आहत मनोविज्ञान

जैनेन्द्र के नारी पात्र उनके इसी वक्तव्य पर साइन कर अपने को पुरूष समाज के शोषण से मुक्त कर पाने में असफल रहती है। अत्यधिक नैतिकता वैवाहिक जीवन मे एक स्त्री को कुंठित कर देती है। छः बच्चों की माँ बन चुकी स्त्री उजाले मे पति को ‘सत्यार्थ-प्रकाश‘ के रूप में ही क्यों देखती है। पति का प्यार उसने दिन मे देखा ही नहीं। स्त्री अपने पति को प्रेम के रूप मे देखना चाहती है लेकिन उसने उपदेशक और कामुक के अतिरिक्त कोई और अवस्था देखी ही नही। ‘क्या है स्त्री, क्या है अर्थ, क्या है व्यवसाय ? जैनेन्द्र की नारी को यह सब माया का प्रपंच लगता है।तमाम कष्टों को सहकर अपने पति को इन कष्टों की फिक्र से दूर रखने की कोशिश यहाॅ भी है घर से बाहर बिना बताये निकलने की मनाई भी है साथ मे है पुरूष वादी मानसिकता का वह बंधन जिसके लिए नारी सिर्फ नारी है। इस प्रकार ‘दो सहेलियाँ‘ जैनेन्द्र की नारी जीवन को बेढ़ब जिन्दगी को उजागर करने वाली ऐसी कहानी है जिसमे संवेदनाओ, को मोथरा बना दिया है समाज ने और उसकी झूठी नैतिकता ने ! जैनेन्द्र की नारी जिस तरह ‘त्यागपत्र‘ में समाज को नहीं तोड़ती, वैसे ‘दों सहेलियाँ‘ में भी। वैसे भी जैनेन्द्र तोड़ने के नही जोड़ने के हमेशा कायल रहे है बावजूद कुछ कमजोरियो के। ‘‘उनकी रचनाओं में जिस रास्ते से समाज परिवर्तन की ध्वनि उठती है, वह हृदय-परिवर्तन का रास्ता है। त्याग उनके पात्रों का सबसे बड़ा गुण है, वे दूसरे को तकलीफ पहुचाना तो दूर होम होना जानते हैं-बलिदान, उत्सर्ग की भावना उस समय वातावरण मे थी।‘‘1 इसलिए कोई उन पर गाधीवाद का प्रभाव देखना चाहे तो देख सकता है।

 जैनेन्द्र की नारी-दृष्टि पर बात करते हुए हमें जैनेन्द्र के युग का और अपने युग दोनों का ध्यान रखना चाहिए। साथ में जैनेन्द्र के उन विचारों को भी जिन्होंने उनको नारी जीवन की संवेदना को जानने-समझने की शक्ति दी। जैनेन्द्र के नारी-मत परम्परागत हैं, उनमें समाज धर्म के चलते व्यक्ति (नारी) की प्राकृतिक अवस्था ही दान-धर्म के रूप में मान ली गयी है जो कि जैनेन्द्र के विमर्श का एक कमजोर पक्ष कहा जा सकता है। उनकी नारी बंधनों में बंधती चली जाने वाली, अदम्य आत्मबल रखने वाली, ईमानदार, भारतीय सतित्व आदर्शों को पालने वाली है। आज के प्रगतिशील समीक्षक उनके ‘प्रेम‘ ओर ‘विवाह‘ जैसे मुद्दों पर सवाल उठा सकते है कि । क्या प्रेम गुनाह है? क्या विवाह सिर्फ समाज की ही गाठ है? व्यक्ति की अपनी चाह का कोई योग उसमें नही है। जैनेन्द्र कुमार की चिन्तन प्रक्रिया इसी देश की परंपराओं और संस्कृतियों के समेकित ज्ञान से निर्मित हुई है‘‘। 2 अतः आज की प्रगतिशीलता के बरक्स जैनेन्द्र समय के साथ हैं। श्रीकांत वर्मा ने ठीक लिखा है- ‘‘जैनेन्द्र कुमार की सबसे बड़ी देन है, स्त्री की सामाजिक स्थिति और नियति की परिभाषा। स्त्री-पुरूष संबधों को लेकर तो जैनेन्द्र कुमार के पहले भी लोगों ने लिखा और उसके बाद भी लागों ने लिखा है लेकिन स्त्री की सामाजिक स्थिति पर और उनकी नियती पर सिर्फ एक ही लेखक ने लिखा है, हिन्दी में और वे है जैनेन्द्र कुमार।‘‘ (जैनेन्द्र की आवाज, सम्पादक अशेक बाजपेयी, पृष्ठ-40) प्रेम को जिस तरह का ‘प्रगतिशील‘ समाज ‘ईश्वर‘ की चीज मानता है। कृष्ण राधा से खुलकर प्रेमालाप ही नही ‘रासलीला‘ भी रचाते है लेकिन यदि मनुष्य ऐसा करता है तो वह व्यभिचार क्यों हो जाता है। ‘मीरा‘ को पहली विद्रोही स्त्री मानने वाले क्या खुद के परिवार की लड़की का मीरा हो जाना स्वीकार कर सकेगें? ध्यान रहे जैनेन्द्र कागजी कलाबाजी में नही आये। जिस समस्या का समाधान व्यापक समाज में सम्भव न हो उसको साहित्यिक समाधान के रूप में पेश करने से क्या फायदा?



चैखव में कहीं लिखा है- बड़े रचनाकार का कार्य समाधान देना नही, समस्याओं को सही तरीके से रखना होता है। ‘जैनेन्द्र कुछ इन्ही‘ अर्थों में सफल है। डा0 निर्मला जैन लिखती है- ‘‘जैनेन्द्र के लिए निदान से ज्यादा महत्वपूर्ण है‘‘। 3 ‘‘नारी-पात्रों की सारी विविधताओ को एकत्रित किया जाये तो कृतिकार जैनेन्द्र की ओर से एक ही संकेत है कि नारी कोई रूढ़ प्राणी नही जो जन्म-जन्मान्तर से एक ढर्रे पर चलती चली आयी हो, नारी में यौवन का मद है, आवेश है, जो जीवन भर व्यभिचारी पति से परित्क्त होने पर, जी लेनी की सहिष्णुता भी है।‘‘ (‘कहानी कार-जैनेन्द्र-अभिज्ञान और उपलब्धि‘-लेखक-जगदीश पाण्डेय) आज ‘स्त्री-विमर्श‘ के दौर में जैनेन्द्र पर भले सवाल उठाये जाये, लेकिन परतंत्रता के काल में जैनेन्द्र ने सामाजिक विषयों से अलग नारी के वैयक्तिक सुख दुःख की जो समीक्षा की वह कही न कही आज के स्त्री विमर्श से जुड़ जाता है। समाज को बदलने के हिंसात्मक तरीके के जैनेन्द्र कायल नही। परिवर्तन ऐसा कि लोगों को किसी भी तरह खदेड़ा, कुचला या अपनी जगह पर खचोटा न जाए, बल्कि समझाने के रास्ते, त्याग और साझेपन के जरिये, नम्र और विनीत ढंग से मनवाकर परिवर्तन लाया जाए। जैनेन्द्र का ‘स्त्री-विमर्श‘ भी उनके इसी नम्र और विनीत ढंग से चलने वाला एक घरेलू आन्दोंलन है। जैनेन्द्र ने आज के लिए भूमि तैयार की इसमे कोई संदेह नही।

नोट:- स्त्रीकाल स्त्री के लिए नारी शब्द के प्रयोग के पक्ष में नही है.

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थेरी गाथाओं में अभिव्यक्त मुक्तिकामी स्वर

स्नेह लता नेगी

सहायक प्रो. हिन्दी विभाग,दिल्ली विश्वविद्यालय संपर्क:negi.sneh@gmail.com
मोबाइल : 8586066430

इक्कीसवीं सदी में समाज के हर क्षेत्र में स्त्री ने अपनी बुद्धि और क्षमता का परिचय दिया है। समाज को भी स्वीकार करना पड़ा है कि स्त्री की क्षमताओं का उपयोग किये बिना समाज का समग्र विकास संभव नहीं है। स्त्री भी अपनी पारंपरिक छवि से बाहर निकल कर समाज निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान कर रही हैं। सर्वप्रथम वह बुद्ध ही थे जिन्होंने स्त्री को उसकी क्षमताओं से अवगत किया। स्त्रियों के लिए अलग संघ की स्थापना करके स्त्री को भी शिक्षित होने और निर्वाण प्राप्त करने का स्वतंत्र अवसर प्रदान किया। बुद्ध ने परंपरा से चली आ रही जातीय व्यवस्था, स्त्री-पुरुष असमानता और अंधविश्वासी समाज को मानवता का संदेश दिया। डाॅ. रामधारी सिंह दिनकर का कथन इस संदर्भ में उल्लेखनीय है- ‘‘बौद्ध धर्म का आर्विभाव ऐसे समय में हुआ जब नारी पुरुष के अत्याचारों से दबी जा रही थी, शास्त्रकारों ने जिसे कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं दी, उसके लिए बौद्धकाल में अमर संवेदना का संदेश मिला।’’1 बुद्ध के समय में पहली बार स्त्री को भी पुरुष के समान अपनी क्षमताओं से परिचित होने का अवसर मिला। जिस ज्ञान और सत्ता पर पुरुष का एक छत्र राज था, बुद्ध के समय में इस वर्जित क्षेत्र में स्त्रियों का प्रवेश एक ऐतिहासिक घटना थी।

थेरीगाथा में भिक्षुणी सोमा और मार का संवाद तत्कालीन समाज में स्त्री की स्थिति को दर्शाता है। मार कहता है- ‘‘जो स्थान ऋषियों के द्वारा भी प्राप्त करने में अत्यन्त कठिन है, उसे दो अंगुलि मात्र प्रज्ञा वाली स्त्री प्राप्त कर लेगी, यह कभी संभव नहीं।’’2 सोमा मार को फटकारते हुए कहती है- ‘‘देख! मैंने सभी जगह से अपनी वासना का संपूर्ण विनाश कर दिया है। अज्ञानांधकार को विदीर्ण कर दिया है। पापी मार! प्राणियों का अन्त करने वाले! समझ ले! आज तेरा ही अन्त कर दिया गया! तू मार दिया गया।’’3 सोमा मार के माध्यम से तत्कालीन पितृसत्तात्मक समाज की जड़ों को हिलाकर रखने की चेतावनी देती है जिसने हमेशा ही स्त्री को अक्षम समझकर दबाये रखा।

राजा प्रसेनजीत की रानी को जब बेटी पैदा हुई तो प्रसेनजीत दुःखी मन से बुद्ध के पास जाते हैं, तो बुद्ध राजा को समझाते हैं ‘‘इसमें उदास होने की क्या बात है राजन! कन्या एक पुत्र से भी बढ़कर सन्तान सिद्ध हो सकती है क्योंकि वह भी बड़ी होकर बुद्धिमान तथा शीलवान बन सकती है।’’ बुद्ध स्त्रियों के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं ‘‘स्त्री संसार की विभूति है क्योंकि उनकी अपरिहार्य महत्ता है। उसके द्वारा ही बोधिसत्व तथा विश्व के अन्य शासक जन्म ग्रहण करते हैं।’’4 इसीलिए बुद्ध ने स्त्री को प्रज्ञा का रूप माना है। प्रज्ञा सभी बुद्धों की जननी है। बुद्ध ने सबसे पहले स्त्री के चित्त के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। सामाजिक-आर्थिक स्तर पर सशक्त होने से पहले हमें आत्मिक स्तर पर सशक्त होने की जरूरत है जो बुद्ध ने स्त्रियों के भीतर आत्मविश्वास की लौ जलाकर किया। हमारे समाज में स्त्रियों को कभी भी उसके गुणों से अवगत होने का मौका ही नहीं दिया उसे हमेशा ही परिवार और समाज पर बोझ समझा गया। बुद्ध ने स्त्री को ज्ञान का रास्ता दिखाकर चेतना संपन्न बनाया और ओरों को भी प्रेरित किया। जब समाज में स्त्रियों का आत्मसशक्तिकरण होगा तभी तो वह बाहरी सामाजिक जड़ताओं के विरूद्ध संघर्ष करने में सक्षम होंगी, स्वनिर्णय लेने की स्थिति तक पहुँचेंगी। इसलिए बाहरी परिवर्तन के लिए सबसे पहले आन्तरिक परिवर्तन की आवश्यकता होती है। स्त्री का सशक्त होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके ऊपर समाज और परिवार दोनों का उत्तरदायित्व है। अगर स्त्री आत्मिक स्तर पर सशक्त नहीं है तो परिवार और समाज के सशक्त होने की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। जैसा कि हम अक्सर कहते हैं कि एक स्त्री के शिक्षित होने पर पूरा परिवार शिक्षित होता है ऐसे में स्त्री का आत्मिक स्तर पर सशक्त होना कितना महत्वपूर्ण है हम सोच सकते हैं। जिसके ऊपर समाज के भविष्य की इतनी बड़ी जिम्मेदारी हो उसे कैसे ज्ञान, अध्यात्म और सत्ता से वंचित रख सकते हैं विचारणीय है। इसलिए बुद्ध के संघ में विवाहित-अविवाहित, युवा-वृद्ध, वेश्या, शूद्र-ब्राह्मण, अमीर-गरीब सभी प्रवेश ले सकते थे और ज्ञान अर्जित कर सकते थे। मानसिक और दैहिक शोषण तंत्र से मुक्त हो सकती थी और उस युग की थेरियाँ उसी मुक्ति का प्रतीक हैं।

थेरीगाथा , बौद्ध धर्म और स्त्रियाँ


‘थेरी-गाथा’ 522 गाथाओं का महत्वपूर्ण बौद्ध साहित्य है जिसमें 73 थेरियों के जीवन के कटु अनुभव है जो बुद्ध की समकालीन थी। यहाँ इन भिक्षुणियों ने अपने जीवनानुभवों को व्यक्त करते हुए जीवन की गाथा है। नैतिक सच्चाई, भावनाओं की गहनता और सबसे बढ़कर एक अपराजित वैयक्तिक ध्वनि, यह भिक्षुणियाँ आशावादी हैं। जीवन की विषमताओं पर अपनी विजय गान गाती हैं। ‘‘भिक्षुणियों के उदगारों में निराशावाद का निराकरण है, पुरुषार्थ की विजय है, साधनालब्ध इन्द्रियातीत सुख का साक्ष्य है और नैतिक ध्येयवाद की प्रतिष्ठा है। नारी की सामथ्र्य में उनका विश्वास है। स्त्रीत्व को वे सत्य-प्राप्ति में बाधक नहीं मानती।’’5 सोमा थेरी और मार का संवाद स्त्री के भीतर सम्यक दृष्टिकोण और पुरुषार्थ के गुणों का परिचायक है- ‘‘जब चित अच्छी प्रकार से समाधि में स्थित है, ज्ञान नित्य विद्यमान है और अन्तज्र्ञान पूर्वक धर्म का सम्यक दर्शन कर लिया गया है, तो स्त्रीत्व इसमें हमारा क्या करेगा?’’6

थेरीगाथा के अध्ययन से पता चलता है कि तत्कालीन समाज कितना स्त्री विरोधी था। अमीर घरों की स्त्रियाँ परिवार के भरण-पोषण तक सीमित थी तो गरीब, शूद्र स्त्रियाँ दासियों के रूप में शोषित थी। पूर्णिका ऐसी ही थेरी थी जो दासी थी जिसका जीवन मालिक के भय और दण्ड के साये में यापन होता था। पूर्णिका अपनी गाथा में कहती है- ‘‘मैं पनिहारिन थी। सदा पानी भरना ही मेरा काम था, स्वामिनियों के दण्ड के भय से, उनके क्रोध भरे कुवाच्यों से पीड़ित होकर मुझे कड़ी सर्दी में भी सदा पानी में उतरना पड़ता।’’7 इन थेरियों के सामने एक तरफ सामाजिक उत्पीड़न के चलते स्थिति गुलामों से भी बदतर थी तो दूसरी ओर पारिवारिक वातावरण उससे भी कहीं अधिक खराब था। श्रावस्ती के दरिद्र परिवार में जन्मी सुमंगलमाता अपने कष्टपूर्ण दाद्रियमय पारिवारिक जीवन को अन्य थेरियों के साथ साँझा करते हुए चित्त में संवेग उत्पन्न होने पर पुरुषार्थ की ओर अग्रसर होते हुए परम ज्ञान की प्राप्ति के सुख का उद्गार प्रकट करते हुए कहती है- ‘‘ओह! मैं मुक्त नारी। मेरी मुक्ति कितनी धन्य है। पहले मैं मुसल लेकर धान कूटा करती थी, आज उससे मुक्त हुई। मेरी दरिद्रावस्था के वे छोटे-छोटे बर्तन! जिनके बीच में मैली कुचैली बैठती थी और मेरा निर्लज्ज पति मुझे उन छातों से भी तुच्छ समझता था जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था।… अहो! मैं कितनी सुखी हूँ। मैं कितने सुख से ध्यान करती हूँ।’’8


भिक्षुणी सुमंगला संघ में आकर पहली बार महसूस करती हैं कि वह भी एक इंसान है। स्वतंत्र और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है। उसके भी सुख हैं और वह सुख देह से परे मानसिक बौद्धिक सुख है, निर्वाण प्राप्ति की ओर अग्रसित होने का सुख है। क्यों वह स्त्री होने के कारण किसी की छत्र-छाया में रहे। ये थेरियाँ स्वतंत्रता की कीमत समझ चुकी थीं। तत्कालीन विषम परिस्थितियों में स्त्री अस्तित्व के स्वातंत्र्य की इतनी सहासिक बेबाक स्वीकृति इससे पहले कहीं नहीं दिखाई देती। थेरियों ने जिस सहास के साथ समाज की ग्रसित मानसिकता के विरूद्ध आवाज उठाई वह आज भी प्रेरणा स्रोत है। उससे पहले स्त्री मात्र आनंद प्रदान करने का साधन, संतान पैदा करना, पितृसत्तात्मक व्यवस्था को मजबूत करने की भूमिका में बंधी थी। वंश चलाना, बच्चा पैदा करना उसके जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया था। ऐसे में बुद्ध ने उसे एक मनुष्य के रूप में पहचान दी उसके सामथ्र्य से परिचित कराया। ‘‘थेरीगाथा नारी स्वतंत्रता को प्रकट करने वाला प्रथम ग्रंथ है।’’9



इन थेरियों ने संघ में शामिल होकर स्वयं ज्ञान प्राप्त किया और ओरों को भी शिक्षित होने के लिए प्रेरित किया। संघ के सभाओं, परिषदों को संबोधित करने तथा अन्य गतिविधियों में भाग लेने के लिए स्त्रियों को प्रेरित किया। थेरी गाथा की पटाचारा ऐसी ही थेरी थी जो गौतम बुद्ध के सर्वाधिक प्रिय शिष्याओं में से एक थीं। पटाचारा ने समाज के अन्य स्त्रियों को शिक्षित होने के लिए प्रेरित करती जगह-जगह घूमकर स्त्रियों को जागरूक करतीं। धीरे-धीरे पटाचारा की 500 से भी अधिक शिष्यायें बन गई। अपनी शिष्याओं के साथ पटाचारा समाज में शांति, सद्भाव व स्वाधीनता के आनन्द का संदेश देती थी। पटाचारा उच्च कोटि की कवयित्री होने के साथ-साथ उच्च कोटि की दार्शनिक भी थीं। अपने निजी जीवन के दुःखों के साथ विक्षिप्त अवस्था में बुद्ध का स्नेही सानिध्य पाकर जीवन के निस्सारता पर विचार करते हुए कहा- ‘‘हल से भूमि जोतकर मनुष्य उसमें बीज बोते हैं, इस प्रकार वे धन उपार्जन करते और अपनी स्त्री, पुत्रादि का पालन करते हैं, तो फिर क्यों न मैं साधिका निर्वाण को प्राप्त कर पाती? मैं जो कि शील से सम्पन्न हूँ अपने शास्त्र के शासन को करने वाली हूँ, अप्रमादिनी हूँ, अचंचल और विनीत हूँ।’’10 अपने समस्त दुःखों से छुटकारा पाकर अपनी मानसिक शारीरिक कमजोरियों से ऊपर उठकर बौद्धिक और आध्यात्मिक भूख मिटाने व व्यक्तिगत और सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त करती हुई बुद्ध की समकालीन स्त्रियाँ संघ में शामिल होकर अपने व्यक्तित्व को पूर्ण मनोयोग के साथ जीती हैं। यह भी सत्य है कि भारत की पहली बुद्धिजीवी स्त्रियाँ बौद्ध संघों से ही निकली जैसे गौतमी, सुमंगला, पटाचारा, विशाखा आदि। बुद्ध के विचारों से प्रेरित होकर सावित्री बाई फुले, ज्योतिबा फूले और डाॅ. अम्बेडकर ने स्त्रियों के लिए आन्दोलन चलाया।

तमाम मान्यताओं और परंपराओं से परे बुद्ध मनुष्य मात्र को सर्वोपरि मानते हैं। बुद्ध व्यक्तित्व रूपांतरण की बात करते हैं। जैसे ‘अप्पः दीपो भवः? अपना दीपक स्वयं बनने के लिए प्रेरित करते हैं। बुद्ध स्वयं कहते हैं कि कोई भी बात इसलिए मत मानो कि मैंने कहा है बल्कि अपने तर्क की कसौटी पर कस कर उसके सही गलत को पहचानते हुए मानों अपनी अन्तः प्रज्ञा, तर्क और बुद्धि का प्रयोग करो। पूर्णा और मुक्ता थेरी को दिया गया बुद्ध का यह उपदेश इस संदर्भ में उल्लेखनीय है- ‘‘पूर्णे! तू पूर्णता प्राप्त कर। पूर्णमासी के पूर्ण चन्द्रमा की तरह तू कल्याणकारी धर्मों में पूर्णता प्राप्त कर। प्रज्ञा की परिपूर्णता से तू अन्धकार-पुंज को विदीर्ण कर देगी।’’11 ब्राह्मण धर्म व्यवस्था के अन्तर्गत स्त्री के लिए कोई अधिकार नहीं था ऐसे में बुद्ध ने ब्राह्मणवाद को चुनौती देते हुए निम्न कही जाने वाली जातियों और स्त्रियों को संबल दिया उनके मनोबल को बढ़ाया। थेरी गाथाओं में इन थेरियों में आत्मविश्वास से लबरेज अभिव्यक्ति दिखाई देती है। धम्मदिन्ना थेरी निर्वाण प्राप्ति के मार्ग पर प्रशस्त होते हुए जब वह पुरुषार्थ कर रही थी तब वह कहती है- ‘‘जिसके अन्दर परम लक्ष्य के लिए इच्छा उत्पन्न हुई है और इस इच्छा ने जिसके पूरे चित्त को भर दिया है, जिसका चित्त कभी भोगों में बँधा नहीं, वही ‘ऊध्र्व स्रोता (संसार रूपी स्रोत – धारा के ऊपर जाने वाली) कहलाती है।’’12 ये थेरियाँ मनुष्य की गरिमा को स्थापित करती है और स्वविवेक से प्रकाशित एवं संचालित होने का संदेश देती है।

जब हम स्त्री सशक्तिकरण की बात करते हैं तो मोटेतौर पर हमारी समझ आर्थिक और सामाजिक समानता तक सीमित होती है। लेकिन बुद्ध की दृष्टि से देखें तो हम पाते हैं कि हमें बाहरी स्तर पर भौतिक संसाधनों से सशक्त होने से पहले अन्तर्मन के स्तर पर स्त्री कितनी सशक्त है देखने की जरूरत है। अन्तर्मन के स्तर पर सशक्त होने से आशय है कि जीवन के प्रति हम कितने आशावादी हैं। बुद्ध जीवन के प्रति उसी आशावादी दृष्टिकोण को विकसित करते हुए निर्वाण की (मुक्ति) प्राप्ति की ओर स्त्री का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जहाँ स्त्री ज्ञान और आत्मविश्वास से परिपूर्ण हो। उत्तरा थेरी की गाथा यहाँ उल्लेखनीय है- ‘‘एक निष्ठ होकर मैंने काया, मन और वाणी को संयत किया। फिर तृष्णा को समूल मैंने उखाड़ कर फैंक दिया। आज मैं शान्त हूँ। निर्वाण-प्राप्त हूँ। निर्वाण की परम शान्ति का मैंने साक्षात्कार किया है।’’13 अन्तर्मन का रूपांतरण सब परिवर्तनों की धुरी है। बुद्ध इस तथ्य को समझते थे इसलिये दमन या विरोध की बजाये आंतरिक परिवर्तन पर जोर देते हैं। थेरीगाथा की थेरियाँ उसी आंतरिक परिवर्तन का प्रतीक हैं। इसलिए डाॅ. अम्बेडकर ने कहा था ‘‘मैं समाज की उन्नति का अनुमान इस बात से लगाता हूँ कि उस समाज की महिलाओं की कितनी प्रगति हुई है। नारी की उन्नति के बिना समाज एवं राष्ट्र की उन्नति असंभव है।’’14 बुद्धकालीन समाज की स्त्रियाँ कई संदर्भों में सशक्त थी और अपने समय को भी सशक्त करने की सामाजिक भूमिका भी निभा रही थीं।


थेरी गाथा बुद्धकालीन ही नहीं अपितु हर काल के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो स्त्री जगत को न केवल मानसिक और शारीरिक, बल्कि बौद्धिक और आर्थिक गुलामी के प्रति विद्रोह की शिक्षा देती है। ये थेरियाँ समाज में चली आ रही व्यवस्था, उसके मूल्यों परंपराओं के विरुद्ध आवाज उठाते हुए नवीनता के साथ-साथ आधुनिकता की मशाल जलाए मनुष्य मात्र की परतंत्रता के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है। आज हम जिस स्त्री विमर्श की बात करते हैं वह विमर्श इन थेरियों से ही शुरू होता है जिसने आज स्त्री विमर्श का व्यापक रूप ले लिया है। लेकिन दुःखद आश्चर्य यह है कि थेरियों की इस सहास गाथा को मुख्यधारा का स्त्रीवादी चिंतन रेखांकित नहीं करता। यह हाशिये पर की वैचारिकी के खाते में ही है। यह संघर्ष गाथा भले ही इतिहास के पन्नों में कहीं गुम है लेकिन निश्चित ही भविष्य में स्त्री संघर्ष की बात इन थेरियों के बिना अधूरा है। वास्तव में थेरियों की यह गाथा स्त्री मुक्ति की पहली आवाज थी।

संदर्भ:
1. डाॅ. रामधारी सिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय, पृ. 155
2. भरत सिंह उपाध्याय, थेरी-गाथाएँ, पृ. 26
3. वही, पृ. 27
4. डाॅ. अम्बेडकर, हिन्दू नारी का उत्थान पतन, पृ. 22
5. भरत सिंह उपाध्याय, थेरी-गाथाएँ, वस्तुकथा से
6. वही, पृ. 26-27
7. वही, पृ. 86
8. वही, पृ. 12
9. डाॅ. विमल कीर्ति (अनुवादक), थेरीगाथा, पृ. 4
10. भरत सिंह उपाध्याय, थेरी-गाथाएँ, पृ. 48
11. वही, पृ. 3
12. वही, पृ. 6-7
13.  वही, पृ. 8
14. डाॅ. कुसुम मेघवाल, भारतीय नारी के उद्धारक बाबा साहेब डाॅ. बी. आर. आंबेडकर, पृ. 101

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
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