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निडरता की ओर छोटी-सी यात्रा

डॉ. आरती  

संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com

अनुभव बटोरने के लिए दुनियाभर के लेखकों द्वारा की गई यात्राओं के अनेक किस्से हैं। उस लिहाज से अपने गृह राज्य से हजार-दो हजार किलोमीटर दूर की यात्रा करना कोई उल्लेखनीय बात नहीं होती। वो भी आज के सुख-सुविधापूर्ण यातायात के साधनों के जमाने में तो हर्गिज नहीं। लेकिन जब कर्फ्यू लगता है तो लोग अपने पड़ोस के घर तक जाने का जोखिम मोल नहीं लेते। तब इंसानियत के लिए, हाथों में हाथ लेकर निडरता से दस कदम चलना भी एक चुनौती होती है। जब एक लेखक या कलाकार की अभिव्यक्ति पर पहरे बिठा दिये जाएँ, उसे निर्देशित किया जाए कि वो सिफ वही लिखे जो सत्ता को पसंद आता हो, तब विवेक से सत्ता को अप्रिय लगने वाला सच लिखना तो बड़ी बात है ही। बर्टोल्ट ब्रेष्ट ने लिखा था –
क्या अँधेरे वक्त में भी गीत गाए जाएँगे
हाँ, अँधेरे वक्त में भी
अँधेरे के बारे में गीत गाए जाएँगे।


जो बोलने और लिखने के लिए वे लेखक शहीद हुए, जो वे लिखना और बोलना सही और जरूरी समझते थे, उनके विचारों के साथ और उनके परिजनों-साथियों के साथ एकजुटता दर्शाने के लिए, मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ ने अपने पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक की यात्रा का कार्यक्रम बनाया। ये एक छोटा-सा कदम ही था लेकिन इसने बहुत सारे अनुभव दिये और हौसलों को मजबूत किया। इन्हीं राज्यों में पिछले चार वर्षों में हमारे तीन बड़े लेखक, विचारक और आंदोलनकारी शहीद हुए। उनके कायर-हत्यारे नाकारा सरकारों की ढील की वजह से अब तक खुले घूम रहे हैं और शेष समाज के लिए खतरा बने हुए हैं। सच और सच की तलाश की लड़ाई में डाॅ. नरेन्द्र दाभोलकर, काॅमरेड गोविंद पानसरे और प्रो. एम. एम. कलबुर्गी ने अपनी शहादत दी है और उनके परिवारजन तथा साथी न्याय के लिए सब्र के साथ वर्षों से लड़ रहे हैं। केवल उनके लिए न्याय नहीं, इस पूरे समाज के लिए और एक तर्कशील विचारवंत समाज की स्थापना के लिए भी न्याय।

हम सोचकर निकले थे कि उनकी लड़ाई में अपनी आवाज मिलाकर आएँगे। हम सोचकर निकले थे कि सच्चाई के लिए उठते नारों की बँधी मुट्ठियों में अपनी मुट्ठी भी लहराकर आएँगे। हम सोचकर निकले थे कि नजदीक से चीजों को जानकर आएँगे। लेकिन जब हम पहुँचे और जिस तरह लोगों ने तमाम शहरों में जो इज़्ज़त और प्यार दिया, जो भरोसा दिखाया, उससे लगा कि हमने कोई बड़ी जिम्मेदारी ले ली है जो सिर्फ़ इस यात्रा के साथ समाप्त नहीं होगी।

लिखने, बोलने और अहिंसात्मक प्रतिरोध करने, लोगों में तर्कशीलता एवं विवेक के इस्तेमाल की समझाने की प्रवृत्ति को जगाने के प्रयासों में लगे, देश के तीन प्रबुद्ध चिंतक, समाजसेवी और लेखकों की पिछले वर्षों में लगातार उग्र और कट्टरपंथियों द्वारा हत्याएँ की गईं। महाराष्ट्र में तर्क और विवेक पर आधारित कार्य करतेे हुए लोगों को बरगलाने वाले ढोंगी बाबाओं का प्रतिरोध करने की वजह से डाॅ. नरेन्द्र दाभोलकर की 20 अगस्त, 2013 में गोली मारकर हत्या की गई। इसी प्रकार विख्यात सीपीआई नेता और समाजसेवी काॅमरेड गोविंद पानसरे और उनकी पत्नी काॅमरेड उमा पानसरे को भी कट्टरपंथियों ने अपनी बंदूक का निशाना बनाया। फलस्वरूप काॅमरेड गोविंद पानसरे की 20 फरवरी, 2015 को मृत्यु हो गई और काॅमरेड उमा अभी तक पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सकी हैं। उन्हें भी सिर में गोली लगी थी। कर्नाटक के विख्यात लेखक और 2006 में साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजे गए प्रो. एम.एम. कलबुर्गी की उनके घर में घुसकर हत्या की गई। विवेकशील विचारों को समाप्त कर देने के लिए की गई ये हत्याएँ बेहद चिंतनीय हैं लेकिन उससे भी ज़्यादा खतरनाक है सरकारों का लगभग उदासीन रवैया। हालाँकि प्रतिक्रियास्वरूप पिछले चार वर्षों में भारतीय जागरूक जनमानस के बीच इसकी तीखी आलोचना हुई। अनेक लेखकों, पत्रकारों, संस्कृतिकर्मियों, समाजविदों और वैज्ञानिकों ने अपने सम्मानों को लौटाकर, लेख, कविताएँ लिखकर और सड़कों पर उतरकर हत्यारों के न पकड़े जाने को लेकर प्रतिरोध दर्ज किया।

इसी क्रम में ‘मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ’ ने ग्यारह चयनित सदस्यों का दल बनाकर इन लेखकों के विचारों पर हुए कट्टरवादी हमले और अब तक इनके हत्यारों के पकड़े न जाने की न्यायिक शिथिलता के प्रति अपना असंतोष व लेखक परिवारों और उनके साथ न्यायिक लड़ाई लड़ रहे, उनके सहयोगियों के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करने के लिए शहीद लेखकों के गृहनगरों की यात्रा का आठ दिवसीय कार्यक्रम बनाया। यह कार्यक्रम इस तरह नियोजित किया गया कि इसमें हम इन लेखकों के परिजनों से भेंट के साथ-साथ ऐसे मोर्चों और व्यक्तियों से मिलने का अवसर भी पा सकें जो जनसंघर्षों में या किसी न किसी तरह सृजनात्मक तरह से एक बेहतर मानवीय संस्कृति के निर्माण की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

14 फरवरी, 2017 से प्रारंभ यह दल पुणे से सतारा, गोवा, धारवाड़ और कोल्हापुर होते हुए स्थितियों को नजदीक से परखते, समझते, विश्लेषण करते हुए 21फरवरी को वापस आया। इस दल में प्रलेस के प्रांतीय अध्यक्ष राजेन्द्र शर्मा (भोपाल), प्रांतीय महासचिव और राष्ट्रीय सचिव मंडल सदस्य विनीत तिवारी (इंदौर), प्रांतीय कार्यकारी दल सदस्य हरनाम सिंह चांदवानी (वरिष्ठ पत्रकार, मंदसौर), सुसंस्कृति परिहार (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, दमोह), तरुण गुहा नियोगी (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, जबलपुर), हरिओम राजोरिया (प्रांतीय अध्यक्ष मंडल सदस्य, अशोकनगर), सीमा राजोरिया (प्रलेस सदस्य व भारतीय जन नाट्य संघ, इप्टा अशोक नगर), दिनेश भट्ट (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, छिंदवाड़ा), शिवशंकर शुक्ल ‘सरस’ (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, सीधी), बाबूलाल दाहिया (प्रांतीय सचिव मंडल सदस्य, सतना) एवं आरती (प्रलेस सदस्य, भोपाल) शामिल हुए।


म.प्र. प्रलेस के ये सभी पदाधिकारी और सदस्य अलग-अलग जिलों से पुणे में 14 फरवरी को इकट्ठे हुए। इकट्ठे होने की जगह रेलवे स्टेषन भी हो सकती थी लेकिन तय की गई जगह थी महाराष्ट्र की ही नहीं देश भर की प्रमुख अर्थशास्त्री, आंदोलनकारी और विचारवंत लेखिका और हाल ही में दिवंगत डाॅ. सुलभा ब्रह्मे द्वारा बनाई ‘लोकायत’ नामक संस्था का कार्यालय। वहाँ पुणे के ही एक अन्य सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता अमित नारकर ने हमें ‘लोकायत’ संस्था के कार्यों व संगठन की जानकारी दी। शुरुआत से ही हमारा समूह खामोशी से एक अध्ययन दल में बदल गया। लोकायत के कार्यों को जानते और सुलभा ब्रह्मे जी के बारे में जानते-समझते ये एहसास भी हुआ कि ऐसे ज़रूरी लोगों के बारे में भी हम कितना कुछ नहीं या न के बराबर ही जानते हैं। ये ख्याल भी आया कि दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी के बारे में भी हिंदी का संसार आमतौर पर तब तक नहीं ही जानता था जब तक कि वे शहीद हो जाने की वजह से सभी जगह चर्चित नहीं हो गए।


‘लोकायत’ से हम पुणे के करीब 50 कि.मी. दूर ‘तलेगांव दाभाड़े’ में विदुर महाजन (लेखक और सितार वादक) एवं उनकी पत्नी अपर्णा महाजन (अंग्रेजी की प्राध्यापिका) के बहुत ही कलात्मक और प्राकृतिक खूबसूरती से आच्छादित ‘मैत्रबन’ (यानी ‘दोस्तों के घर’) पहुँचे। पहाड़ी की तलहटी में बने इस मैत्रबन के बनने की कहानी से लेकर, उसका स्थापत्य, फर्नीचर, सैकड़ों पेड़-पौधे और पूरा माहौल ही एक अलग दुनिया का अहसास करवा रहा था। और सबसे खास तो अपर्णा और विदुर का वो सहज और गर्मजोश व्यवहार था, जिसे छूकर पेड़-पौधे और मिट्टी, पत्थर, लकड़ी सभी क़रीबी और पुराने परिचित लगने लगे थे। शाम को विदुर महाजन ने सितार वादन और सभी साथियों ने कविता-पाठ किया। इस स्थान का कोना-कोना, अनगिनत किस्मों के पेड़-पौधे, विदुर-अपर्णा महाजन के प्रकृति और कला प्रेम की कहानी खुलकर कहते हैं। विदुर ने शाम को अपने उस अभियान की भी जानकारी दी जिसमें वे शास्त्रीय संगीत को खास लोगों के दायरे से निकालकर उसे आम ग्रामीण लोगों से परिचित करवाने के लिए सैकड़ों गाँवों में साधारण जन के बीच सितार और शास्त्रीय संगीत लेकर गए जिनमें से अधिकांश ने जीवन में पहली बार ही सितार सुना था। उन्होंने दो एकड़ की उस आत्मीय जमीन के बीचोंबीच बना वह डोम भी बताया जिसमें करीब दो सप्ताह तक बंद रहकर उन्होंने अपनी एक पुस्तक पूरी की थी। विदुर की पारिवारिक पृष्ठभूमि संगीत या कला की नहीं थी लेकिन विदुर को शास्त्रीय संगीत में इतनी दीवानगी थी कि वो तलेगाँव से मुंबई तक संगीत विदुषी ख्यात गायिका किशोरी अमोनकर से संगीत सीखने के लिए अप-डाउन किया करते थे। विदुर ने कविताओं, दर्शन और संस्मरणों की किताबें मराठी में लिखी हैं और वे महाराष्ट्र साहित्य अकादमी से पुरस्कृत भी हुई हैं। रात तारों भरी थी और साथियों के साथ बातें करने की एक दूसरे को जानने की उत्कंठा से और 11 लोगों की चहल-पहल से आबाद मैत्रवन की वो रात अविस्मरणीय बन गई।



15 फरवरी यानी अगले दिन सुबह हमने अंतरराष्ट्रीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे में विद्यार्थियों से मुलाकात कर, संस्थान के अधिकारियों एवं शासन की रीतियों-नीतियों पर चर्चा की। ये वही संस्थान है जिसने भाजपा के सत्ता में आने के बाद कला, संस्कृति और शिक्षा के संस्थानों के संप्रदायीकरण और राजनीतिक नियुक्तियों के खिलाफ पूरे देश को जगाने वाली आवाज उठाई थी। वहाँ नाचीमुत्थु, रोहित, राॅबिन और अन्य विद्यार्थियों ने प्रलेस के दल को पूरे संस्थान का भ्रमण करवाया। प्रभात स्टूडियो, फिल्म एडिटिंग एवं लायब्रेरी, कैंटीन, हाॅस्टल आदि जगहों का विस्तार से परिचय दिया। इसके बाद पुणे की प्रलेस इकाई एवं अन्य संस्थाओं द्वारा साधना मीडिया सेंटर में चर्चा का आयोजन था। साधना समाचार पत्र करीब 6 दशकों पहले महाराष्ट्र के प्रसिद्ध समाज सुधारक ‘साने गुरूजी’ द्वारा आरंभ किया गया था और आज तक सतत यह वैज्ञानिक चेतना और समाजवादी विचारों के प्रसार में संलग्न है। इसमें म.प्र. प्रलेस द्वारा की जा रही यात्रा के उद्देश्य को पुणे के लेखकों, विचारकों, समाजसेवियों एवं पत्रकारों तथा अंधश्रृद्धा निर्मूलन समिति (अनिस) के कार्यकर्ताओं के बीच साझा किया गया। इस बैठक में 93 वर्षीय काॅमरेड शांता ताई रानाडे (वरिष्ठ सीपीआई नेता व गोविंद पानसरे की राजनीतिक सहयोगी, पिछले साठ सालों से राजनीतिक तथा वैचारिक मोर्चों पर सक्रिय), एस.पी. शुक्ला (वरिष्ठ विचारक, पूर्व सदस्य योजना आयोग, पूर्व वित्त एवं वाणिज्य सचिव), लता भिसे (भारतीय महिला फेडरेशन की राज्य नेत्री), मिलिंद देशमुख (अनिस कार्यकर्ता), नंदिनी जाधव (अनिस कार्यकर्ता), नीरज (लोकायत), अहमद शेख (थियेटर कलाकार), दीपक मस्के (अंबेडकरवादी विचारक और प्रलेस, पुणे), माओ भीमराव (प्रलेस, महाराष्ट्र) एवं अपर्णा, जहाँआरा, शैलजा, रुचि भल्ला, राधिका इंग्ले,सुनीता डागा के साथ ही अनिस, प्रलेस एवं थियेटर से जुड़े कई युवा भी उपस्थित थे। लेखिका राधिका इंग्ले तो देवास से अपने किसी अन्य कार्यक्रम में पुणे आई थीं। उन्हें दस्तक वाट्सअप समूह से इस बैठक की जानकारी मिली तो वे आ गईं। इसी तरह लेखिका रुचि भल्ला पुणे से 110 किमी दूर स्थित फलटण शहर से इस बैठक की जानकारी पाकर इस लोभ में भी आई थीं कि यहाँ उन्हें हिंदी सुनने को मिलेगी जो उन्होंने फलटण रहते 3 महीनों से नहीं सुनी थी। हमारे दल के वरिष्ठ साथी हरनाम सिंह जी ने म.प्र. प्रलेस के सांगठनिक ढांचे और कार्यों का विस्तृत परिचय दिया एवं कहानीकार दिनेश भट्ट ने यात्रा का उद्देश्य साझा किया। हरिओम राजोरिया एवं शिवशंकर शुक्ल ‘सरस’ ने कुछ कविताओं का पाठ भी किया। मराठी के कवियों का भी कवितापाठ हुआ। इस बैठक की विशेषता कट्टरवाद एवं अन्य सामाजिक मुद्दों पर हुई चर्चा थी। आज की परिस्थिति में फासीवाद ताकतों के खिलाफ सभी को एकजुट होकर उनका प्रतिकार करना चाहिए, यह समय की आवश्यकता है, इस बात पर सभी ने जोर दिया। एस. पी. शुक्ला ने हमें महाराष्ट्र की तर्कशील परंपरा और संत साहित्य के भीतर मौजूद रही मानवतावादी धारा का तथा काॅमरेड गोविंद पानसरे द्वारा शिवाजी को हिंदू राजा की चैखट से बाहर निकालने के तथा उनके व्यक्तिगत जीवन के मार्मिक प्रसंगों से संक्षेप में परिचित करवाया।

शाम को हम युवा फिल्म निर्देशक क्रांति कानाडे के घर गए। वहाँ उनकी बनाई और राष्ट्रपति पुरस्कार एवं कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजी लघु फिल्म ‘चैत्र’ देखी। उल्लेखनीय बात ये कि उनके घर की पूरी बनावट इस तरह की गई है कि पूरे क्षेत्रफल का अधिकांश हिस्सा किसी भी सार्वजनिक किस्म के कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल हो सकता है। क्रांति का कहना है कि जब सरकारें सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा करती जा रही हैं और उन्हें निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, साहित्य, नाटक, फिल्म आदि करने के लिए सभी जगहें या तो बहुत महँगी कर दी गई हैं या फिर सरकारी विचारधारा के अनुकूल होने की शर्त उन पर जड़ दी गई है तो उन जगहों को वापस हासिल करने के लिए लड़ना तो होगा ही, साथ ही हममें से जिनके पास भी जगहें हैं, उन्हें आगे आना होगा और अपने निजी आकाश में सार्वजनिक की जगह बढ़ानी होगी। क्रांति ने हमें अपनी नई फिल्म ‘सीआरडी’ का ट्रेलर भी दिखाया जो अभी हाल ही में अमेरिका के पाँच महानगरों में रिलीज हुई है। फिल्म का ट्रेलर देखकर ही ये अंदाजा लग गया कि दक्षिणपंथियों को इससे खासी तकलीफ रहेगी।

शाम को ही पुणे से चलकर हम करीब आधी रात सतारा पहुँचे। 16 फरवरी को हमारी मुलाकात डाॅ. नरेन्द्र दाभोलकर के बेटे डाॅ. हमीद दाभोलकर, डाॅ. शैला दाभोलकर (डाॅ. दाभोलकर की पत्नी) एवं अनिस के कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों के साथ हुई। डाॅ. दाभोलकर के बेटे और अनिस कार्यकर्ता हमीद दाभोलकर ने डाॅ. दाभोलकर के कार्यों, संघर्षों एवं हत्या का वर्णन करते हुए न्याय प्रक्रिया में आनेवाली अड़चनों का विस्तृत विवरण दिया। उन्होंने कहा कि अनिस की स्थापना हुए 25 साल हो गए। महाराष्ट्र के 30 जिलों में करीब 4 से 5 हजार स्वैच्छिक कार्यकर्ता सामाजिक जागरुकता की लड़ाई लड़ रहे हैं। महाराष्ट्र के साथ ही कर्नाटक और दिल्ली में भी नयी इकाइयाँ खुली हैं। उन्होंने बताया कि लोगों का शोषण करने और अंधविश्वास फैलाने वाले कारकों के खिलाफ महाराष्ट्र राज्य में अब कानून भी (डाॅ. दाभोलकर की हत्या के बाद) बन चुका है। म.प्र. प्रलेस के सदस्यों ने डाॅ. शैला से भी विस्तृत और अंतरंग बातें की। उन्होंने कहा कि यह सामाजिक न्याय की लड़ाई है जो आगे भी चलती रहेगी। नरेन्द्र की हत्या के बाद भी लड़ाई थमी नहीं है और थमेगी भी नहीं। डाॅ. दाभोलकर के और उनकी शादी के दिलचस्प किस्सों के साथ ही डाॅ. दाभोलकर के दृढ़ निश्चय और अडिग निर्णयों के बारे में उन्होंने जो बातें कीं, उनसे सभी का दिल भर आया।

सतारा से दोपहर को ही निकलकर हमने गोवा की ओर प्रस्थान किया। गोवा वह स्थान है जहाँ दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्या के हत्यारों के सूत्र जिस सनातन संस्था के साथ जुड़े बताये जाते हैं, उसका मुख्यालय है। रात करीब 10.30 बजे हम गोवा पहुंचे। यहाँ हमारा आत्मीय स्वागत सुविख्यात मजदूर नेता काॅमरेड क्रिस्टोफर फोन्सेका व उनकी पत्नी काॅमरेड शांति नाम वकील) ने किया। काॅमरेड क्रिस्टोफर एवं काॅमरेड शांति ने गोवा के ताजे हालात, राजनीतिक गतिविधियों, मजदूर संगठनों की जानकारी दी। अगले दिन 17 फरवरी को गोवा के प्रसिद्ध स्थल ‘कला सांस्कृतिक भवन’ में गोवा के लेखकों, समाजसेवकों एवं पत्रकारों के साथ एक बैठक हुई जिसमें साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त लेखक डाॅ. दत्ता नाईक, दिलीप बोरकर, रजनी नैयर (हिन्दी और कोंकणी की लेखक), चितांगी नमन (कवि, युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त), महेश, प्रभु देसाई एवं अन्य प्रतिष्ठित लोग भी मौजूद थे। सभी ने गोवा के ऐतिहासिक-राजनीतिक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लेखकों की हत्याओं के विरोध में गोवा के 30 लेखकों ने अपने सम्मान शासन को वापस किए (इसमें राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान शामिल हैं)। इस बैठक का मकसद गोवा के साहित्यकारों से गोवा के उस पहलू को जानना था जो आमतौर पर पर्यटक के तौर पर आने वाले कभी जान नहीं पाते। गोवा का मुक्ति संग्राम, वहाँ के भौगोलिक और सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को जानने के लिए गोवा के ही विद्वानों को सुनना हम लोगों ने तय किया था और यही किया भी।

डाॅ. दत्ता नाईक ने अपने उद्बोधन में कहा कि – दुनिया में पर्यटन के लिए विख्यात गोवा में यहाँ के लोगों के लिए रोजगार की काफी कमी है जिससे वे विदेश या भारत के अन्य भागों की ओर पलायन करते हैं। सन् 2012 में खदानों के पूर्णतः बंद होने से पूर्व गोवा खदानों के लिए जाना जाता था। पहले यहाँ खेती भी आजीविका का माध्यम थी। इसके बाद यहाँ सरकारों द्वारा केवल पर्यटन एवं होटल उद्योगों को ही बढ़ावा दिया जाता है जिसने वर्गभेद को और गहरा किया है। युवा कवि नमन ने प्रलेस से बात करते हुए कहा कि दुनियाभर में फिल्मों के द्वारा परोसी गई गोवा की छवि (समुद्री बीच और कसीनो) से इतर आपने इसके भीतर की कलात्मकता, जन-जीवन और संघर्षों की ओर देखने की पहल की, उन्हें करीब से जानने की कोशिश की, यह बेहद सराहनीय है।

गोवा के एटक मज़दूर संगठन के कार्यालय में प्रेस काॅन्फ्रेंस का आयोजन था। प्रेस काॅन्फ्रेंस में हमारे दल ने गोवा के मीडियाकर्मियों से मुलाकात की एवं अपनी यात्रा का उद्देश्य बताया। इसका एक महत्त्व ये भी था कि जिस सनातन संस्था के सदस्यों पर इन तीनों विद्वानों की हत्या का आरोप है, उसका मुख्यालय गोवा में ही है, उस तक भी मीडिया के मार्फ़त ये संदेष पहुँचे कि विचारों नहीं मारा जा सकता। मीडिया की ओर से प्रश्न पूछा गया कि हत्याओं के इतने वर्षों बाद यह यात्रा क्यों? इसका उत्तर विनीत तिवारी ने देते हुए कहा कि हम अपने प्रदेशों में अनेक तरीकों से (लेखन, भाषण, जुलूस, प्रदर्शन और ज्ञापन) द्वारा विरोध दर्ज करते रहे हैं। हममें से कुछ पदाधिकारी पहले भी आकर शहीद लेखकों के गृहनगरों में आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सेदारी करके गए हैं। लेकिन अब इतने दिनों तक न्यायिक प्रक्रिया की सुन्नावस्था देखकर, शहीद हुए परिवार के लोगों एवं अन्य प्रादेशिक लेखकों के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए इस यात्रा का आयोजन किया, ताकि यह संदेश दूर तक जाए कि इस लड़ाई में हम भी उनके साथ हैं। पत्रकारों को राजेन्द्र शर्मा, हरिओम राजोरिया और सीमा राजोरिया ने भी संबोधित किया। शाम को हम प्रसिद्ध ‘पिलार सेमिनरी म्यूजियम’ को देखने गए। वहाँ फादर काॅस्मे जोस कोस्टा ने म्यूजियम में गोवा की ऐतिहासिकता से संबंधित बारीक जानकारियाँ दीं एवं वहाँ के विद्यार्थियों एवं शिक्षकों से मुलाकात भी करवाई।


18 फरवरी की सुबह ‘द पलोटी इंस्टीट्यूट आॅफ फिलाॅसफी एवं रिलीजन’ में विद्यार्थियों से एवं वहाँ के शिक्षकों से भी इस यात्रा और गोवा के विषय पर विस्तृत चर्चा हुई। वैसे तो वह भी ईसाइयत के धार्मिक षिक्षक तैयार करने का इंस्टीट्यूट है लेकिन वहाँ सिर्फ़ धर्मषास्त्रों की ही पढ़ाई नहीं होती। इंस्टीट्यूट के विद्यार्थियों ने साहित्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को लेखकों के सामने रखा। उनके पूछे प्रश्नों पर भी काफी चर्चा हुई। सुसंस्कृति परिहार जी ने प्रगतिषील लेखक संघ के सुदीर्घ और व्यापक इतिहास से संक्षेप में परिचय करवाया।

18 फरवरी की दोपहर हमने गोवा से, दो दिन में हम सबके बेहद अजीज बन गए काॅमरेड क्रिस्टोफर और काॅमरेड शांति से विदा ली। दो दिनों में इन दोनों ही शख्सियतों ने हम सबको बेहद प्रभावित और प्रेरित भी किया। कभी न भूल सकने वाली शख्सियतें हैं काॅमरेड शांति और काॅमरेड क्रिस्टोफर। अब हम अपनी अगली मंजिल धारवाड़ (कर्नाटक) की ओर रवाना हुए।

धारवाड़ पहुँचकर सीधे हम ‘दक्षिणायन संस्था’ की ओर से आयोजित ‘सोशल मीडिया वर्कशाप’ का हिस्सा बने। यहाँ पर प्रसिद्ध समाजसेवी और लेखक प्रो. गणेश देवी मौजूद थे। साथ ही उनकी पत्नी सुलेखा जी और कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों से आये जाने-माने लेखक, कवि, पत्रकार, समाजसेवी और शोधार्थी-विद्यार्थी भी। यहाँ पर जानकारी देना आवश्यक है कि ‘दक्षिणायन संस्था’ प्रो. गणेश देवी एवं अन्यों के प्रयास का वह प्लेटफार्म है जो फासीवाद के बरअक्स लोगों को एक साथ, एकजुट करने का प्रयास कर रहा है। प्रो. एम.एम. कलबुर्गी की हत्या की न्यायिक लड़ाई कर्नाटक के जागरुक लेखक, पत्रकार, समाजसेवी नागरिक मिलकर लड़ रहे हैं। प्रो. गणेश देवी ने हमें दक्षिणायन का सविस्तार परिचय कराया। हमारे साथियों के परिचय के बाद, चाय के दौरान सोशल मीडिया वर्कशाप में आये सभी प्रतिभागियों के साथ हमारे दल का लंबा फोटोसेशन चला जो हमारी यात्रा के उद्देश्य एवं प्रतिरोध के साथ खड़े होने के संकल्प की टिप्पणियों के साथ सोशल मीडिया के सभी प्लेटफाॅर्मों (फेसबुक, ट्वीटर, वाट्सअप, इंस्टाग्राम, गूगल) पर छाया रहा और अभी भी उपलब्ध है। यहीं पर प्रसिद्ध माक्र्सवादी चिंतक और जाने माने समाजसेवी एस. आर. हिरेमठ जी से मुलाकात हुई। वे बस बाहर जाने से पहले हमसे मिलने के लिए ही इंतज़ार में रुके हुए थे। हिरेमठजी अनेक वर्षों से आदिवासियों के हक़ों और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खि़लाफ लड़ाई लड़ रहे हैं और कर्नाटक के खनन माफिया की रीढ़ पर प्रहार करने के लिए वे देशभर में जाने जाते हैं। यह प्रो. कलबुर्गी का सत्य व ज्ञान से अर्जित स्थान है कि सभी लेखक और अन्य उनके बाद भी उनके सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं।



19 फरवरी की सुबह हम प्रो. कलबुर्गी के घर उनकी पत्नी उमादेवी और उनके पोते अमोघवर्ष से मुलाकात करने पहुँचे। प्रो. गणेश देवी और सुलेखा जी ने ये बैठक तय की थी। वे भी वहाँ थे। छोटे से ड्राइंगरूम में सोफे पर प्रो. कलबुर्गी की तस्वीर के आसपास तरतीब से सँजोया हुआ उनका रचना संसार देख एक क्षण के लिए समय रुक सा गया। प्रो. गणेश देवी ने हमें बताया कि कलबुर्गी जी ने दर्शन, इतिहास और अन्यान्य गूढ़ विषयों पर 120 से अधिक ग्रंथों की रचना की है और वे लिंगायत समाज के सही इतिहास को लोगों के सामने लाने की लड़ाई लड़ रहे थे। श्रीमती उमादेवी के द्वारा बताया गया और अब तक का सुना घटनाक्रम आँखों के सामने से गुजर गया। सचमुच ये पल बेहद भावुक कर देने वाले थे। अपनी एकजुटता जाहिर करने के बाद हमने उमाजी से और अमोघवर्ष से विदा ली और उमाजी ने प्रो. कलबुर्गी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तिका ‘प्रो. एम.एम. कलबुर्गी-द आर्किटेक्ट आॅफ महामार्ग’ हम सभी को भेंट दी।

धारवाड़ में हम आनंद करंदीकर और अरुंधति से भी मिले जो लेखकों को सोशल मीडिया के सार्थक और उद्श्यपूर्ण उपयोग की जानकारी दे रहे थे। यहाँ हमने शंकर गुहा नियोगी (छत्तीसगढ़ में पूँजीपतियों और माफियाओं के गठजोड़ ने जिनकी हत्या 28 सितंबर 1991 को कर दी थी) पर बनाई फिल्म और एक अन्य लघु फिल्म भी जिसमें वेलेन्टाइन डे पर बजरंग दल के लोगों द्वारा युवाओं पर लाठियाँ बरसाने के प्रतिरोधस्वरूप प्रेम के गहरे और विषद अर्थों को उठाया गया था, देखी। हिरेमठ जी के सहयोगी इकबाल पुल्ली जी ने हमें कर्नाटक के भीतर चल रहे विभिन्न जनांदोलनों की जानकारी भी दी। उन्होंने हमें‘समाज परिवर्तन समुदाय’ के कार्यालय का भ्रमण भी कराया जो हिरेमठ जी के क्रांतिकारी कार्यों की जमीन है। यहाँ आते-आते हमें लगने लगा था कि हम अपने पड़ोसी राज्यों, उनके लोगों और उनके संघर्षों के बारे में कितना कम जानते हैं और कैसे मुख्यधारा मीडिया हमें न जानने देने की साजिशें रचता है। हमारी यात्रा का उद्देश्य विस्तृत हो गया था। हम नई बातें सीख रहे थे और अपने कार्यक्षेत्र में नये कामों को करने की प्रेरणा से भर रहे थे।


धारवाड़ से चलकर शाम होते-होते हम कोल्हापुर में थे। यहाँ प्रो. मेघा पानसरे (काॅमरेड गोविन्द पानसरे की बहू) और उनके बेटे कबीर और मल्हार से बेहद आत्मीय मुलाकात हुई।20 फरवरी को सुबह 7.30 बजे हम काॅमरेड पानसरे के घर के सामने से प्रारंभ होने वाले ‘निर्भय मार्निंग वाॅक’ में शामिल होने पहुँचे। ‘निर्भय मार्निंग वाॅक’ का आयोजन काॅमरेड पानसरे की हत्या के बाद से उनके सहकर्मियों, साथी कार्यकर्ताओं, माॅर्निंग वाॅक के साथियों और वे सब भी जो इस प्रतिरोध में शामिल हैं, ने किया है। वे हर माह की 20 तारीख को (20 फरवरी को ही उनकी हत्या हुई थी) कोल्हापुर के अलग-अलग क्षेत्रों में जुलूस निकालते हैं। काॅमरेड गोविंद पानसरे और काॅमरेड उमा पानसरे को तभी गोली मारी गई थी जब वे अपने घर से बाहर माॅर्निंग वाॅक पर निकले थे। उनकी हत्या को दो साल पूरे हो गए लेकिन देशभर में लोगों के तीव्र प्रतिरोध के बावजूद शासन हत्यारों को पकड़ तक न सकी। इस पूरी रैली का सबसे याद रह जाने वाला नारा था – आम्बी सारे, पानसरे। कई जनगीतों के साथ यह रैली चलती रही। लोग नारे लगाते जा रहे थे। एक जनगीत की दो पंक्तियां अभी भी गूंज रही हैं-
‘गोल्या लाठी घाल्या, विचार नहीं मरणार’, मराठी से अधिक परिचित न होने पर भी यह याद है, अपने अर्थ के साथ। यह यात्रा बिन्दु चैक पर जाकर पूरी हुई। यहाँ उस स्कूल के सभी विद्यार्थी और शिक्षक मौजूद थे जिसमें काॅमरेड पानसरे पढ़े भी थे और जहाँ उन्होंने पढ़ाया भी था। सबने काॅमरेड पानसरे के हत्यारों के पकड़े जाने की लड़ाई को जारी रखने और उनके बनाए मूल्यों को जीवन में अपनाने की शपथ ली। इस जुलूस में भारी संख्या में कोल्हापुर के नागरिक, मीडियाकर्मी, माक्र्सवादी कार्यकर्ता और सभी सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल थे। इस ‘निर्भय माॅर्निंग वाॅक’ रैली का प्रतिनिधित्व एन.डी. पाटिल (सुविख्यात माक्र्सवादी विचारक और समाजसेवी) ने किया। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि – यह रैली चुनौती है हत्यारों को और उन्हें बचाने सत्ता में बैठे लोगों को कि हम भयभीत नहीं हैं।

वहाँ से लौटकर हमने काॅमरेड पानसरे की पत्नी उमादेवी से उनके घर आकर मुलाकात की। इसके बाद हमारी बैठक काॅमरेड पानसरे द्वारा स्थापित ‘श्रमिक प्रतिष्ठान’ के कार्यालय में हुई। वहाँ काॅमरेड दिलीप पवार, काॅमरेड एस. बी. पाटिल और काॅमरेड पानसरे के अन्य सहयोगियों और साथियों ने पानसरे जी के जीवन, उनके कार्यों, संघर्षों और निर्भयता के साथ मंजिल पाने तक डटे रहने की क्षमताओं और कार्यप्रणाली पर प्रकाश डाला। किसी महान व्यक्तित्व के जीवन और उनके कामों से जुड़ी छोटी-छोटी बातें भी बेहद महत्त्वपूर्ण होती हैं और वे एक न देखे, न मिले हुए व्यक्ति को भी आपके सामने ला खड़ा करती हैं। इस बातचीत के दौरान ऐसा ही महसूस हो रहा था। पानसरे जी की लिखी पुस्तकें‘शिवाजी कौन है?’ और ‘राजर्षि शाहू की शिक्षा नीति’ पुस्तकें भी उन्होंने हमें भेंट में दीं। एक ख़ास बात और देखने को मिली कि कार्यालय में काॅमरेड पानसरे जिस कुर्सी पर बैठते थे, वह दो साल बाद आज भी उनकी याद में खाली रखी गई है।

मेघा जी ने हमें कोल्हापुर विश्वविद्यालय में भ्रमण का अवसर भी दिया। वे ‘रूसी अध्ययन’ विभाग की प्रमुख भी हैं। उनके विभाग में ही बैठकर थोड़ी देर बातचीत कर, मेघा जी के बताए अनुसार हमने मराठी के विख्यात साहित्यकार ‘विष्णु सखाराम खांडेकर स्मृति संग्रहालय’ का भ्रमण भी किया। यहाँ करीने से सँजोई कवि की स्मृतियों के प्रतीकों ने एक बार फिर हमारे प्रदेश के कवियों की याद दिलाई। हमारे खाते में जो सुभद्रा कुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, हरिशंकर परसाई जैसे अनेक नाम हैं लेकिन इस तरह से सँजो सकने का हुनर नहीं। किसी साहित्यकार का वि.वि. में इतना सम्मानजनक स्थान पाना, हम लोगों के लिए अत्यंत सुखद अनुभव था। सिर्फ संग्रहालय ही नहीं, विश्वविद्यालय में जहाँ-तहाँ दीवारों पर भी मराठी साहित्यकारों के ‘मूल्य वाक्य’ सूक्तियों के रूप में तस्वीरों के साथ दिखे।


तीन बजे हमारी मुलाकात ‘साहू स्मारक भवन’ भवन में कोल्हापुर के प्रिंट एवं इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के पत्रकारों से हुई। पत्रकार वार्ता को राजेन्द्र शर्मा, विनीत तिवारी, सुसंस्कृति परिहार, हरिओम राजोरिया ने संबोधित किया। प्रेस काॅन्फ्रेंस समाप्त होते-होते कार्यक्रम का समय हो गया था जिसमें भारी संख्या में कोल्हापुर और बाहर के लोग भी उपस्थित थे। इतनी तादाद में लोगों की उपस्थिति काॅमरेड पानसरे की लोकप्रियता और उनके विचारों के समर्थन को प्रमाणित करने वाली थी। कार्यक्रम की शुरूआत फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जनगीत
‘ऐ ख़ाकनशीनों उठ बैठो, वो वक्त़ क़रीब आ पहुँचा है।
अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें, अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं,
जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जाएँगे…’
को हमारे साथियों हरिओम राजोरिया, सीमा राजोरिया, तरुण गुहा नियोगी, हरनाम सिंह, राजेन्द्र शर्मा और विनीत तिवारी ने गाकर की।

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. गणेश देवी, मुख्य वक्ता जाने-माने पत्रकार निखिल वागलेे, हमीद दाभोलकर और विनीत तिवारी मंच पर मौजूद थे। स्वागत की परंपरा के बाद मेघा पानसरे ने मंचासीन अतिथियों का परिचय कराया साथ ही म.प्र. प्रलेस के लेखकों की यात्रा के उद्देश्य को भी श्रोताओं के सामने व्यक्त किया और कहा कि – देश के जागरुक चिंतक, कवि, कलाकार भी हमारे साथ हैं। दो साल बाद भी हत्यारे पकड़े नहीं गए। लेकिन इन शहीदों के रास्ते पर चलने वाले हम भी थके नहीं हैं। यह लड़ाई न्याय पाने तक थमने वाली नहीं है।



हमीद दाभोलकर ने अपने उद्बोधन में स्पष्ट रूप से कहा कि – तीनों ही शहीदों के हत्यारे ‘सनातन धर्म संस्था’ और ‘हिंदू जन जागरण समिति’ से हैं और प्रमाणों के बावजूद वे खुले घूम रहे हैं। प्रलेस महासचिव और म.प्र. प्रलेस लेखक यात्रा दल के मार्गदर्शक विनीत तिवारी ने देश में दिनोंदिन बढ़ते कट्टरवाद व विचारों पर हमले के अन्य उदाहरणों को सामने रखते हुए जोर देकर कहा कि एक लेखक या एक अकादमिक विद्वान के भीतर अनेक पुस्तकों का निचोड़ और सदियों की संचित ज्ञान निधि होती है। अगर राज्य नागरिकों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाता तो हम नागरिक ऐसे राज्य से लोकतंत्र की रक्षा करने के उपाय अपनाएँगे लेकिन हम अब और किसी को भी खोने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हमें इस यात्रा के अनुभवों ने और भी अधिक निर्भीक, मजबूत और ज़िम्मेदार बनाया है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रतिष्ठित पत्रकार निखिल वागलेे ने सत्ता के इशारों पर काम करने में लगी पुलिस मशीनरी के एक और पहलू को उजागर करते हुए वह नोटिस जो पुलिस की तरफ से कार्यक्रम में आने से पूर्व उन्हें दिया गया, जिसमें लिखा था कि वे पानसरे स्मृति के कार्यक्रम में किसी व्यक्ति या संस्था का नाम लेकर आरोप नहीं लगाएँगे और ऐसा कुछ भी नहीं कहेंगे जो लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाए, अन्यथा उन्हें पुलिस गिरफ़्तार कर सकती है। ऐसा ही नोटिस आयोजकों को भी दिया गया था। ढेर सारे पुलिस वाले अधिकारी, कर्मचारी, थानेदार और सिपाही कार्यक्रम स्थल पर हाॅल के अंदर-बाहर मंडरा रहे थे। निखिल वागले ने मंच से पुलिस, प्रशासन और सत्ताधीशों को करारा जवाब देते हुए कहा कि उन्हें किन लोगों की भावनाओं की चिंता है। वे ऐसे नोटिस हत्यारों को पैदा करने वाली संस्थाओं और समितियों को क्यों नहीं देते जो विचारों को स्थापित करने के नाम पर हत्या करने, हुड़दंग मचाने का काम करते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस की मंच से आलोचना करते हुए कहा कि वो महाराष्ट्र में लोकतंत्र को क्या मजाक बना देना चाहते हैं?

अंत में कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. गणेश देवी का वक्तव्य हुआ। उन्होंने कहा कि- आज के हालात अघोषित आपातकाल जैसे ही हैं। केन्द्र सरकार हर क्षेत्र में स्वतंत्र विचारों का विरोध लाठी डंडे के साथ करती है। उन्होंने एफटीआईआई, चेन्नई के आंबेडकर, फुले और पेरियार के विचारों पर मनन करने वाले चेन्नई स्टडी सर्कल, जेएनयू, रोहित वेमुला और नजीब को याद करते हुए कहा कि विचार को गुलाम बनाने की कोशिशें कामयाब नहीं होंगी। उन्होंने कहा कि देश में ही नहीं दुनियाभर में फासीवादी प्रवृत्तियाँ उभर रही हैं और ये मानवता के लिए खतरा हैं। आज की सबसे बड़ी जरूरत फासीवाद विरोधी विचारों, व्यक्तियों और संगठनों के एकजुट होकर कट्टरपंथियों का प्रतिरोध करने की है।


कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मेघा पानसरे और अन्य साथियों से विदा लेकर और साथ रहने की प्रतिज्ञा को दोहराते हुए हम वापसी की ओर चल पड़े। हमारे कुछ साथियों ने सतारा स्टेशन से और कुछ ने पुणे से वापसी की राह पकड़ी। इस 14 से 20 फरवरी की यात्रा ने हमारे अनुभव संसार को बढ़ाया और विचारों की आजादी के लिए लड़ने के हमारे संकल्प को मजबूत किया। इस छोटी-सी यात्रा के बीच हम वैचारिक, सांगठनिक और अद्भुत समाहारी, प्रेरणादायी व्यक्त्तिवों से मिले। उनके कार्यों को जाना। समाज के लिए अड़े रहने की शक्ति और उससे हासिल की जा सकने वाली खुशी से भी परिचित हुए। इस यात्रा का खाका महासचिव विनीत तिवारी ने बनाया था। इस तरह की यात्रा की सोच उनकी वैचारिकता और देश भर में फैले उनके ज़मीनी संपर्कों का परिणाम है। यात्रा को उनके सांगठनिक और व्यक्तिगत सूत्रों, परिचयों और हर शहर में उनके अभिन्न मित्रों के सहयोग ने अधिक मूल्यवान बनाया। इन सात दिनों में हम सब शाम को अपने दिनभर के कार्यों, मुलाकातों और रोजमर्रा में नए-नए मिलने वाले अनुभवों पर चर्चा करते। कई बार कुछ मुद्दे अचानक आ जाते और घंटों साथियों के बीच उन पर बहसें होती रहीं। शिक्षा, साहित्य, रिश्ते, सामाजिक स्थितियों पर होने वाले विचार-विमर्ष और जनगीतों, शास्त्रीय संगीत से लेकर फ़िल्मी गाने तक सफ़र का हिस्सा बनते रहे। इस सफ़र के दौरान साथियों के बीच अनेक विषयों पर हुईं बेहद दिलचस्प चर्चाएँ और सोच के दायरों को विस्तृत करने वाली गर्मागर्म बहसें भी स्मृति में रहेंगी।



सात दिन तक लगभग 14 से 16 घंटे जिन साथियों के साथ गुजारे, उनके व्यक्तित्व के भी कुछ नये पहलुओं को जानने का मौका मिला। इतने दिनों तक कोई भी सिर्फ़ औपचारिकता का आवरण ओढ़कर नहीं रह सकता। बाहर के भले लोगों से हुई मुलाकात ने जहाँ हमें भी बेहतर बनाने का काम किया, वहीं अपने ही साथियों के साथ बने जीवंत और अनौपचारिक संपर्क ने एक संगठन के तौर पर भी हमें समीप किया। अपने साथियों पर लिखने का काम कभी अलग से।

हमारे 14 से 21 फरवरी की यात्रा के बीच हुए कार्यक्रमों की प्रेस, इलेक्ट्रानिक मीडिया, आॅनलाइन मीडिया और सोशल मीडिया पर छपी खबरें साथियों द्वारा अभी तक प्राप्त हो रही हैं। हमारे बाहर के देखे अनुभव खासकर मीडिया ने हमें उनकी तुलना अपने प्रदेश से करने पर बार-बार मजबूर कर देते हैं। गोवा,कर्नाटक और महाराष्ट्र में कार्यक्रमों के हुए विशद, विस्तृत, शुद्ध और ‘जैसा कहा गया वैसा ही लिखा गया’, इन कवरेजों ने मीडिया पर खोता जा रहा विश्वास फिर से जगा दिया। हम अद्भुत जीवट वाले निडर लोगों से मिले। यह सोच अधिक दृढ़ हुई कि विचार और तर्कशील कर्म का साथ देने और अन्याय का प्रतिरोध करने के निडरता और सच्चाई ही सच्चे हथियार हैं। इनकी ताक़त को हमने अलग-अलग रूपों में बहुत ही नज़दीक से महसूसा। इस पूरी यात्रा का उल्लेख विनोद के उल्लेख के बिना पूरा नहीं होता जो यूँ तो सिर्फ़ हमारे वाहन चालक थे लेकिन यात्रा समाप्त होते-होते वे हमारे साथी बन गए। इससे हमारा ये विश्वास भी पुख्ता हुआ कि अगर हम अपने विचार योजनाबद्ध रूप में आम लोगों के बीच लेकर जाएँगे तो लोग तार्किक विचारों को सुनने- समझने और अपनाने के लिए तैयार होते हैं।

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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तुम मेरे साथ रहो मेंरे कातिल मेरे दिलदार

निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamai

मेरे लिये प्रेम उतना ही सहज है जितना धूप, बारिश ,बादल, पानी. प्रेम तो घटा की तरह उमड़ कर आता है, आप भीतर तक भीग जायें. बारिश की झिर-झिर जैसे सुनायी देती है प्रेम आपके भीतर वैसे ही बजता है. मैंने हर दिन प्रेम किया है. मुझे राम रधुराई के सांवले रंग से प्यार है. मुझे कामदेव से प्यार है. जिनकी वजह से पूरी कायनात मुहब्बत में गिरफ्तार है. जब आपको लगे दरख्त झुककर बेलों पर छा गए, नदियां समंदर में जा मिलीं,, जल , थल एक  हुए, कोकिल की आवाज खुद मुहब्बत की आवाज बन गई. तो यकीनन आप प्रेम में हैं. प्रेम यही तो है. जो आपको यकीन दिलाये कि आप जिंदा कौम है.

अगर आप मनुष्य हैं तो प्रेम तो होगा ही. क्या कोई प्रेम विहीन दुनिया में जी सकता है? मनुष्य होने की पहली शर्त प्रेम ही है. इस देश के संविधान ने भी दो वालिग लोगों को प्रेम करने, अपने प्रेम के साथ रहने और जीने की आजादी दी है. फिर क्या वजह है कि आज हमारे देश में प्रेम के विरुद्ध अभियान चलाया जा रहा है. प्रेम को अपराध की तरह देखा जा रहा है. कौन लोग हैं,जो प्रेम को हिंसा में बदलने की साजिश कर रहे हैं. कौन लोग है जो प्रेम को हिंसक और बदबूदार विचारों की आग में जला देना चाहते हैं.

जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार


प्रेम का जादू एक ऐसा विविधतापूर्ण कथानक है ,जिसे कितने ही स्वरों में गाया जा सकता है. और हर एक आदमी का प्रेम दूसरे आदमी के प्रेम से उतना ही अलग होगा जितने संगीत के दो स्वर. प्रेम का यह स्वर हर युग में हम सुनते रहे हैं. सोहनी-महीवाल,हीर-रांझा,शीरीं-फरहाद,लैला-मजनू,सस्सी-पुन्नु और मिर्जा गालिब-जैसे प्रेमी युगल सदियों से हमारे देश के जनमानस में रचे बसे हैं, जिनका प्रेम सांस्कृतिक प्रतीकों में बदल गया जिसे ना तो सामाजिक निषेध  दुनियाबी रस्मों-रिवाज छू पाते हैं. उसी देश में प्रेम एक अपराध है. उसी देश में प्रेम को लव जेहाद कहा जा रहा है. उसी देश में प्रेमियों पर पहरा बिठाया जा रहा है. जिस रोमियों को इतिहास में हम प्रेम के लिए मर मिटने के लिए जानते है उसे हमारी सत्ता प्रेम पर पहरा बिठाने के लिए इस्तेमाल कर रही है. ये हमारी सभ्यता और इतिहास के साथ बलात्कार है. जो लोग प्रेम के विरुद्ध खड़े हैं वे भाषा,जाति, धर्म, सम्प्रदाय, लिंग विभेद के साथ खड़े हैं. जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो उस समय सारी दिवारें टूट जाती हैं. प्रेम करने का मतलब है एक -दूसरे के लिए सर झुकाना. एक-दूसरे की खुशी  में शामिल होना. महान नाटककार कामू कहते हैं- प्यार तो धीरे-धीरे सर झुका देता है. जिनकी गर्दन अकड़ी हुई हो, सिर उठा हुआ हो, आंखें जमी हुई हों उनके अभिमानी दिल में प्यार क्या करेगा?

रक्त शुद्धता, स्त्री दासता और लव जेहाद


महान नर्तकी  इजाडोरा कहती है.- कितना अजीब और परेशानी भरा है एक मनुष्य के हाड़-मांस के माध्यम से उसकी आत्मा तक पहुंचना. हांड, मांस के आवरण के जरिये आंनद,उत्तेजना और मोह को तलाशना. सबसे बढ़कर इस आवरण के जरिये उस चीज को तलाशना, जिसे लोग खुशी कहते हैं-और उस चीज को , जिसे लोग प्रेम कहते हैं. प्रेम दरअसल तमाम सत्ता को चुनौति देता है. इसलिए प्रेम उनलोगों के लिए खतरा है जो अपनी अपनी सत्ता बनाये रखना चाहते हैं. जब आप प्रेम करते हैं तो वे तमाम दीवारें दरकती हैं जिन्हें धर्म ने समाज के ठेकेदारों ने अपने फायदे के लिये बनाया. सबसे पहले घर की जंजीरे टूटती हैं. यही वजह है जब यूपी में प्रेम पर पहरा बिठाया गया तो मां, बाप खुश हुए. क्या हम ऐसा माहौल नहीं बना सकते जहां हमारी नयी पीढ़ी खुली हवा में सांस लें. वे जान सके की प्रेम का सही मतलब  होता है. एक जिम्मेदार प्रेमी होना. पर कुछ लोग प्रेम को अपराध साबित करने में लगे हैं. इसलिए अब यूपी के शिक्षण संस्थानों में पुलिस सादे वेश में पहरा देगी. ये पहरा सिर्फ प्रेम पर नहीं है. ये पहरा हमारे खान, पान, पहने, ओढ़ने, सोचने, विचारने और बोलने -लिखने पर भी है. यह संयोग नहीं है कि जब कोई लड़की कविता लिखती है तो उसे बलात्कार की धमकी दी जाती है. जब प्रेम में रहती है तो उसपर हमला किया जाता है.

हमारा समाज स्त्री को एक माल की तरह देखता है. उसे लगता है कि किसी कौम, समुदाय या व्यक्ति से बदला लेने का यह तरीका सबसे कारगर है कि एक स्त्री के साथ बलात्कार कर दिया जाय. स्त्री गुलाम है, भोगने की वस्तु है इसलिए उसपर हमला परिवार के पौरुष पर हमला है. इतने हिंसक और धृणा के इस वातावरण में मुझे लगता है प्रेम ही है जो हमें बचा सकता है. प्रेम ही है जो हमें मनुष्य बने रहने में मददगार हो सकता है. मेरी उम्मीद नयी पीढ़ी है. मैं यकीन के साथ कह सकती हूं कि ये पीढ़ी प्रेम के पक्ष में रहेगी. ये पीढ़ी सारी वर्जनाओं के विरुद्ध खड़ी होगी. मैं फैज की तरह कहना चाहती हूं अपनी नयी पीढ़ी से-तुम मेरे साथ रहो मेंरे कातिल मेरे दिलदार.

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नाम जोती था मगर वे ज्वालामुखी थे

महात्मा जोतीबा  फुले की जयंती  (11 अप्रैल ) पर विशेष…. 


मनीषा बांगर और डा. जयंत चंद्रपाल 


इनका जीवनक्रम ज्योति था बिलकुल ज्योति की तरह अन्धकार को विलय करनेवाला ..  पर उनके कवन ज्वाला मुखी थे | इसीलिए उनका जीवनक्रम तो महत्वपूर्ण है ही मगर उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है उनके कवन… उनके विचार… |उनका जीवन हमारे लिए श्रद्धा और आस्था का विषय बन सकता है तो उनके कवन हमारे लिए दर्शन और संकल्प का विषय बन सकता है | वैसे भी हमें हमारे मार्गदर्शक डी के खापर्डे साब ऐसा कहा करते थे कि व्यक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके विचार होते है; जब तक सांस चलती रहती है जीवन चलता रहता है; सांस रुक जाती है जीवन समाप्त हो जाता है मगर जब तक उनके विचार जिन्दा रहते है तब तक व्यक्ति जिन्दा रहता है |

क्या है जोतीराव फुले के कवन…?
क्या है उनकी विचारधारा…?  और
क्या है उनका सामाजिक क्रांतीवाद…?
जो ज्योति को ज्वालामुखी में बदल देता है |
जोतीराव के सामाजिक क्रांतीवाद की रूपरेखा अत्यंत स्पष्ट थी…

उनका सामाजिक क्रांतिवाद सबसे पहले दुश्मन की सही सही पहचान करता है और फिर उनसे निपटने के उपाय बताता है | अगर एक लाइन में कहा जाय तो  उनके  सामाजिक क्रांतिवाद का प्रारंभ होता है “शूद्र -अतिशूद्र बनाम शेठजी भटजी” संकल्पना से. यह महात्मा बुद्ध  की “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय” की संकल्पना का पुनरुत्थान है |

सावित्रीबाई फुले : शैक्षिक –सामाजिक क्रान्ति की अगुआ

जोतीराव यहाँ पर नहीं रुकते. शुद्र-अतिशूद्र बनाम शेठजी भटजी” संकल्पना से प्रारंभ करते है और आगे कहते है की यह आर्य इरानी भट्ट बाहर से आये है | यहाँ पर वे “शूद्र -अतिशूद्र बनाम शेठजी भटजी” की संकल्पना को विकसित करते है “मूलनिवासी बनाम विदेशी” के नारे से |

यहाँ पर वे स्पष्टरूप से कहते हैं कि  यह जो भटजी (शेठजी भटजी) है वह आपके दुश्मन है और वे इस देश के मूलनिवासी नहीं है वे विदेशी है और बाहर से आये है… वे आर्य है और इरान अर्थात मध्य एशिया से आये हैं | इन्होने आपको न केवल राजनितिक या आर्थिक गुलाम बनाया है बल्कि सांस्कृतिक एवं मानसिकरूप से भी गुलाम बनाया है |

जोतीराव के विचारदर्शन का महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वे सामाजिक ध्रुवीकरण पर बल देते हैं,  इसीलिए तो वे  शूद्र-अतिशूद्र , जो आजके समय के SC-ST-OBC और कुछ मध्यवर्ती जातियां उनके आपसी भाईचारे के आधार पर मूलनिवासियो के बहुजन समाज की संकल्पना रखते है , और इन्ही से राष्ट्र निर्माण का काम होगा यह संदेश देते है | इसीलिए तो वे कहते है कि “हजारो जातियों में बंटे लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते है” अर्थात अगर आप राष्ट्र निर्माण करना चाहते हो तो फिर तो आपको इन जातियों को तोडना होगा और  जातियो को शेठजी भटजी तोड़ेंगे यह मानना बेवकूफी होगी |

जो लोग जाति विभाजन के आधार पर जिन्दा है और आपके मालिक बने बैठे है वह जातियों को तोड़ेंगे ऐसा मानना एक छलावा है | इसीलिए जातियों को तोड़ने के लिए शूद्र अतिशुद्रो में भाईचारा का निर्माण कर उनका एक समाज निर्माण करना ही उपाय है | उनकी यह विचारधारा उनके द्वारा लिखित/निर्मित साहित्य से सम्पूर्ण स्पष्ट होती है |

महात्मा फुले का क्रांतिकारी स्त्रीवाद

तृतीय रत्न (1855) इस नाटिका में ब्राह्मणों की प्रतीकात्मक सता को चुनौती देते हुए  मनोवैज्ञानिक भय के आधार पर ब्राह्मण किस तरह से शोषण का जाल रचता है उस प्रक्रिया को स्पष्ट स्वरुप देते है |  कुनबी दंपति और धूर्त ब्राह्मण के संवादों के माध्यम से ब्राह्मणों की चालाकी को उजागर करने है  और यह भी स्पष्ट करते हैं  कि

अंग्रेजो के आने से नए ज्ञानतंत्र का विकास जरूर हुआ है पर फिर भी कैसे ब्राह्मण नयी स्थितियों  में भी अपने ज्ञान या सूचनाओं का इस्तेमाल शूद्र  अतिशुद्रो को मुर्ख बनाकर ठगने के लिए करता है |  अंग्रेजो के नए बनाए प्रशासनतंत्र में भी ब्राह्मणों ने अपना जाल बना लिया है और वहां बैठकर वे ब्राह्मणवादी चालबाजियो से एक परंपरागत शोषण और पाखंड का शोषण कर रहे है |

विद्रोह की मशाल है सावित्रीबाई फुले की कविताएं

ब्राह्मणा चे कसब अर्थात ब्राह्मणों की चतुराई (1869)‘, बीस पन्ने की इस लघुकिताब में वे कहते हैं कि शूद्र  जातियों में आज भी पुरोहितगिरी प्रकोप चलता है और उनके घरो में आज भी बाजीराव पेशवा के जमाने की पुरोहितगिरी राज कर रही है | किस तरह ब्राह्मण सदियों से शास्त्र, ग्रह, नक्षत्र एवं ज्योतिष के आधार पर पुरोहितगिरी के हथकंडे अपनाते है और  शुद्र अतिशूद्रो का शोषण करते है |  इस लघुपुस्तिका में इस बात का वर्णन करते हैं  कि   किस तरह ब्राह्मण ग्रह और नक्षत्रो का भय दिखाकर शूद्रअतिशूद्रो को दुविधा में डाल कर डराते है; और  जब भय के मारे शुद्र अतिशूद्र की मति मारी जाति है तो कैसे वे शस्त्र एवं ज्योतिष का सहारा लेकर चतुरायपूर्ण उपाय बताते हुए ब्रह्मभोज, जप, तप, यज्ञ और ग्रहशांति के नाम पर लुटने खसोटने का काम करते है | इस तरह वे शूद्र अतिशूद्रों को बर्बाद करने की उनकी जालसाजी का पर्दाफाश करते है

शिवाजी का पोवाडा (जून-1969)  यह वीरगाथा के रूप में एक महाकाव्य है |  इसमें वे शिवाजी के ओजस्वी एवं निर्भीक चरित्र का बहुत ही अनुपम वर्णन करते है | साथ साथ यह भी कहते हैं कि  कुनबी माली महार मातंग यह जातीय आरम्भ में शाषक जातियां थी वे शासन करते थे,  पर ब्राह्मणों की चालाकियो ने उन्हें शूद्र अतिशूद्र बना दिया और अधिकार वंचित करते हुए गुलाम बना दिया | इस पोवाडा में वे अपने आक्रामक एवं तर्कनिष्ठ शैली से
ब्रह्मा द्वारा चार वर्णों की उत्पति की कठोर आलोचना भी करते हैं | इस रचना में शिवाजी के गौरव गान के जरिये उन्ही जातियों को अपने गौरवशाली अतीत की पहचान कराते हुए उन्हें याद करने की प्रेरणा दी गई है |  इसी  जून १९६९ में उन्होंने एक और पोवाडा भी रचा था शिक्षा विभाग के ब्राह्मण अध्यापक का |

1973 में जोतीराव की सबसे महत्वपूर्ण रचना “गुलामगिरी” प्रसिद्ध होती है | अब ज्योति से ज्वालामुखी होने का परिचय तो इस किताब की प्रस्तावना से ही मिल जाता है | प्रस्तावना में वे लिखते हैं कि  “ सैकड़ो  सालो से आज तक  शूद्र अतिशूद्रो समाज, जबसे इस देश में ब्राह्मणों की सत्ता कायम हुई तब से लगातार जुल्म और शोषण के शिकार है | ये लोग हर तरह की यातनाओं और कठिनाइयो में अपने दिन गुजार रहे हैं,  इसलिए इन लोगो को इन बातो की और ध्यान देना चाहिए और गंभीरता से सोचना चाहिए |  ये लोग अपने आपको ब्राह्मण पंडा पुरोहितों की जुल्म ज्यादतियों से कैसे मुक्त कर सकते हैं,  यही आज हमारे लिए महत्वपूर्ण सवाल है | यही इस ग्रन्थ का उद्देश्य भी है |

आक्रमक शैली में लिखे  गये इस ग्रंथ में गुलामी के मनोविज्ञान, यांत्रिकी और षड़यंत्र को उजागर किया गया है | पुरुष प्रधान समाज के पाखंड और जाति एवं लिंग के आधार पर किये जा रहे शोषन का मुद्दा भी उठाया गया है | उनका कहना है कि  धर्मशास्त्रों  की आज्ञाओ से उपजे भयो और प्रलोभनों पर कड़ी गुलामी की यह इमारत अपने आप में विशुद्ध भारतीय घटना है | जोतीबा  इन भयों और लोभ लालच की जाँच पड़ताल करते है और बतलाते है कि  यह सब किसलिए और किन लोगों  ने रचा है |

“गुलामगिरी” ग्रंथ शूद्रों  को उनके वास्तविक इतिहास का ज्ञान भी करता है |  इसमें यह भी बताया गया है कि .षड्यंत्रकारी शास्त्रकारो ने किस तरह गोल मोल पुराण कथाओ में खुद के षड्यंत्रों को देवी देवताओ के किस्सों में लपेटा है और बाद में उन्ही किस्सों को घटनाओ का स्वरुप देते हुए त्योहारों और अनुष्ठानो से जोड़कर लोगो के मन में गहराई तक उतार दिया है ताकी किसी अच्छे से अच्छे पढ़े लिखे व्यक्ति के मन में भी उन मान्यताओ के बारे में कोई प्रश्न ही पैदा ना हो

सावित्रीबाई फुले-स्त्री संघर्षो की मिसाल

यह बिलकुल स्वाभाविक लगता है की.. डॉ अम्बेडकर की किताब “शूद्रो की उत्पति” का आधार “गुलामगिरी” ही रही होगी ।  और  इसी लिए ही तो 25 अक्तूबर 1954 को पुरंदरे स्टेडियम की जहाँ बाबासाहब का हीरक महोत्सव मनाया गया था;  वहां बाबा साहब ने कहा की मेरे तिन गुरु है … बुद्ध, कबीर और जोतिबा फुले …. इस तरहा जोतीराव का स्थान बाबासाहब के जीवन मे गुरुवर्य का था

1983 में उनकी किताब आती है किसान का कोड़ा; यह किताब  जोतीराव फुले के आर्थिक दर्शन को स्पष्ट करती है |  पेशवाई में किसान वह वर्ग था जो सामाजिक आर्थिक एवं धार्मिक हर तरह से सताया हुआ था |  इनके प्रति जोतिबा की संवेदना स्फुट ना हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता |  इस किताब की प्रस्तावना में ही जोतीबा लिखते हैं, “शूद्र किसान के इस दयनीय एवं दीन अवस्था के धार्मिक एवं राज्य सम्बन्धी कई कारण है | उन तमाम कारणों में से कुछ कारणों का विश्लेषण करने के उद्देश से ही मैंने इस ग्रंथ को लिखा है | जोतिबा किसानो के इस शोषण के सन्दर्भ में कहते है के “ दुनिया के तमाम देशो के इतिहास की एक दुसरे से तुलना करने से यह निश्चित रूप से दिखाई देता है कि इस देश के अज्ञानी, अनपढ़, भोलेभाले शुद्र किसानो की स्थिति अन्य देशो के किसानो से भी बदतर है | पशु से भी बुरी स्थिति में पहुंची है |

सरकारी तंत्र में पनप रहे ब्राह्मणवाद को पहचानते हुए और उसको बेनकाब करते हुए लिखते हैं कि “सरकारी विभागों में ब्राह्मण कर्मचारियो का वर्चस्व  होने की वजह से वे अज्ञानी किसानो को इस तरह से फांसते है की उनके पास अपने नन्हे मुन्हें बच्चो को स्कूल में दाखिला देने के लिए तक के साधन नहीं बचता |अगर किसीके पास कुछ साधन बच भी गये  तो पंडो की गलत सलाह की वजह से आपने बच्चो का स्कूल में दाखिला नहीं कराते |” उनके द्वारा साहित्य निर्माण का कार्य निरंतर चलता रहता है ।

1885 में उनकी कई किताबें प्रसिद्ध होती है जिनमे मुख्य है सतसार भाग – 1 और 2, जो कि महिलाओं के अधिकारों को ध्यान में रखकर लिखी गई थी एक तरफ वे ब्राह्मणवादी शास्त्रों पर धावा बोलते है तो दूसरी तरफ पंडिता रमाबाई का समर्थन कर खलबली मचा देते है |  सतसार दो में भी पंडिता रमाबाई प्रकरण को एक सन्दर्भ की तरह उपयोग करते हुए वे समाज के स्त्री विरोधी मानस का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते है | इशारा नाम से प्रसिद्ध उनकी किताब में उन्होंने कैसे जातियों का असंतुलन समूचे देश के विकास को प्रभावित करता है इस बात को उजागर किया है |  1985 में ही उनकी किताब ‘अछूतों की कैफियत’ तैयार हो चुकी थी मगर वे प्रसिद्ध नहीं कर पाए |

उन्होंने अपनी आखिरी रचना  “सार्वजनिक सत्य धर्म” लिखा और उसको 1891 में प्रसिद्ध किया गया | इस पुस्तक में उन्होंने  समता मूलक समाज का निर्माण करने के लिए ३३ नियम बनाए यह नियम नैतिकता, समानता, अधिकार, स्वतंत्रता सहित तर्कशीलता के आयामों को तो स्थान दिया ही जाता है इसके साथ साथ एक अनुसासन के भी बात मुख्यरूप से रखी गई है | बाबासाहब की २२ प्रतिज्ञा और जोतीबा के इस तैतीस नियम बहुत ही क्रांतिकारी नजर आते है |

और इस तरह यही उनके क्रांतिकारी कवन,  यही उनकी क्रांतिकारी विचारधारा,  यही उनका सामाजिक क्रान्तिवाद उन्हें नाम से ज्योति पर कार्य एवं विचार से ज्वाला मुखी बना देते है ।*

संदर्भ:


आधुनिक सामाजिक क्रांति के पितामह महात्मा जोतीराव फुले_
लेखक – डी के खापर्डे

_युगपुरुष महात्मा जोतीराव फुले_
लेखक – मुरलीधर जगताप

_जोतिबा फुले – जीवन और विचार_
लेखक – संजय  जोठे

मनीषा  बहुजन विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. डा. जयंत चन्द्रपाल बहुजन विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. 
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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सावित्री हमारी अगर माई न होती

जोतीबा  फुलेकी जयंती  (11 अप्रैल) पर उन्हें और सावित्रीबाई  फुलेको याद करते हुए  बाल गंगाधर “बागी” की कविता पढ़ते है. 


क्रांति ज्योति सावित्रीबाई फुले
सावित्री हमारी अगर माई न होती
तो अपनी कभी भी पढ़ाई न होती
जानवर सा भटकता मैं इंसान होकर
ज्योति शिक्षा अगर तूं थमाई न होती

ये देह माँ ने दिया पर सांस तेरी रही
ये दिया ही न जलता, गर तूं बाती न होती
किसकी अंगुली पकड़, चलता मैं दिन ब दिन
गर तूं शिक्षा की सरगम सुनाई न होती

गीत हम गा रहे हैं जो खुशी के लिये
ये ज़ुबां ही न खूलता, गर तूं आयी न होती
कौन कहता ये एहसान नहीं भूलना
नारी विधवा दलित गर उठाई न होती

अनपढ़ बेढंगी यह दुनिया समझती
ज्ञान का बिगुल गर बजाई न होती
अछूतों का कोई नामों निशां न होता
तोड़ी जातियो की अगर कलाई न होती

बरसता मजलूमों के आँखॊं से सावन
गोद में ले अगर माँ हँसाई न होती
कौन जलते हमारे बदन को बचाता
धूप में छाँव बन गर तू छाई न होती

ज़ुल्म से बचाती क्या आँचल में ढँक के
ज़ालिमों पर अगर माँ सवाई न होती
मर्तबा आसमां से न बड़ा उसका होता
जाति खाई से हमें गर उठाई न होती

क्या तेरे ऊपर लिखूं,मैं तो कुर्बान हूँ
ये कलम गर हमारी, तुम्हारी न होती
पहनाता क्या आँसू की माला तुम्हें
माँ दौलत अगर ये तुम्हारी न होती

मैं न होता मेरा कोई,अफ़साना क्या
मेरी तहरीर गर मेरी माई न होती
कौन माँ सी निगहबां यहाँ सोचता
तू कलम की, अगर माँ सिपाही न होती

जख्म पर कौन ममता का मरहम लगाता
डाक्टर बन अगर की दवाई न होती
न शादी विधवाओं का होता कभी
केशवपन को अगर तूं मिटाई न होती

कोई आलिम न होता जहाँ में यहाँ
माँ सबक गर यह सबको पढ़ाई न होती
समता शिक्षा का तूफान चलता भी क्या
‘बागी’ फूले संग लड़ी गर लड़ाई न होती

सम्मति : क्रांतिकारी कवि बागी को जब भी मौका मिले सुनिये और उनकी किताब “आकाश नीला है” को पढिये । दलित कविता को इस नयी पीढ़ी के कवि ने वो धार और लोकप्रियता दी है जो पहले हिन्दी दलित कविता की  पहचान नहीँ थी…बधाई बागी जी…. प्रो. सूरज बडत्या

सावित्रीबाई फुले : शैक्षिक –सामाजिक क्रान्ति की अगुआ


बाल गंगाधर “बागी”
शोध छात्र-  जे एन यू,  नई दिल्ली
फोन न. 09718976402……… Email.    balgangadhar305@gmail.com


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नाम अम्बेडकर विश्वविद्यालय, काम दलितों की उपेक्षा

दलित शोधार्थी गरिमा एवं रश्मि द्वारा लिखा गया

प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक छात्र समुदाय (PDSC) द्वारा किये गए प्रदर्शन के दौरान यह एक बार फिर सिद्ध हो गया कि ‘हमारी’ अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली (AUD) के खाने के दांत कुछ हैं, और दिखाने के कुछ और हैं. अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली (AUD) दिल्ली राज्य सरकार द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त एक सरकारी यूनिवर्सिटी है, जिसमे 85% सीटें दिल्ली के नागरिकों के लिए आरक्षित हैं. शुक्रवार, 24 मार्च, 2017 को अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक छात्र समुदाय (PDSC), जो कि हाशियागत समाज से आ रहे विधार्थियो का एक फ्रंट है,  ने कुलपति के दफ्तर के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया, जिसकी कई मांगें थीं, जैसे कि एमए, एमफिल तथा पीएचडी की प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र अंग्रेज़ी के साथ ही साथ कम से कम दिल्ली की अन्य राज्य स्तरीय भाषाओँ (पंजाबी, हिंदी तथा उर्दू) में भी छापे जाएँ, अंग्रेजी सुधार के लिए लैंग्वेज सेल का गठन (जोकि अभी सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित है) दो स्तरों पर किया जाए, पहला, बुनियादी अंग्रेजी भाषा को सिखाने के स्तर पर, तथा दूसरा अकादमिक अंग्रेज़ी के सुधार और सिखाने के स्तर पर, इस लैंग्वेज सेल को हर विभाग/स्कूल के स्तर पर लागू किया जाए जैसे कि हर विभाग/स्कूल के पास अपने अंग्रेजी भाषा प्रशिक्षक हों, यूनिवर्सिटी में सामाजिक विज्ञान के सभी अनुशासनों के सेमिनार इत्यादि गैर-अंग्रेज़ी भाषा में भी हों (अभी के समय में लगभग 99% लेक्चर और सेमिनार केवल अंग्रेज़ी भाषा में ही होते हैं), अनुवाद सेल का गठन किया जाए और जब तक किसी छात्र को यूनिवर्सिटी का लैंग्वेज सेल कम से कम बुनियादी अंग्रेज़ी नहीं सीखा पाता तब तक उस छात्र को उसकी भाषा में असाइनमेंट, परीक्षा, शोध-प्रबंध और थीसिस लिखने दिया जाए (अभी के लिए दिल्ली की राज्य स्तरीय भाषाओँ में: हिंदी, उर्दू तथा पंजाबी). प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक छात्र समुदाय (PDSC) ने कुछ इन्ही मांगों के साथ अपना मांग-पत्र (डिमांड चार्टर) कुलपति को एक प्रक्रियात्मक (Procedural) तरीके से 20 फ़रवरी, 2017 को भेजा था. जिसमे हमने इन सभी मुद्दों पर उनकी ठोस राय मांगी थी. इसके करीब एक महीने बाद भी उन्होंने कोई जवाब देना जरूरी नहीं समझा है.

यह प्रदर्शन हाशिए के समाज से आ रहे छात्रों की आवाज़ था, जिसकी उपेक्षा और तिरस्कार जी ने यह कह कर किया  कि “हम उनके खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे”. इसके बाद भी जब हमने उनसे मिलने का आग्रह किया तो उन्होंने यह कहकर टाल दिया कि वह केवल निर्वाचित स्टूडेंट कौसिल (Elected Student Council) से ही मिलेंगे और उनके माध्यम से ही वह इस मुद्दे पर बात करेंगे. हम कुलपति से पूछना चाहते हैं कि क्या आपको PDSC द्वारा AUD परिसर में 410 छात्रों के बीच किये गये सर्वे की रिपोर्ट दिखाई नहीं देती? क्या आपको यूनिवर्सिटी में दलित, ओबीसी और आदिवासी समुदाय का ड्राप-आउट रेट दिखाई नहीं देता? पिछले 5 सालों से कैंपस में उठ रहे भाषाई भेदभाव के मुद्दे पर छात्र आपको एम्पिरिकल (empirical) रिसर्च करके दिखा रहे हैं कि भाषा की बुनियाद पर किस तरह भेदभाव आपकी यूनिवर्सिटी में होता है, इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता? कि आप अपने कीमती समय में से कुछ समय हमको दे पाए? और आप हमारे इस मुद्दे को यह कह कर टाल दे रहें हैं कि केवल निर्वाचित स्टूडेंट कौंसिल (जोकि पिछले साल ही बनी है और खुद अपने अस्तित्व को तलाश रही है) ही इस मुद्दे को कहे.

यह वही यूनिवर्सिटी है जो हर साल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में अम्बेडकर मेमोरियल लेक्चर करवाती है. यह वही यूनिवर्सिटी है जिसने इसी साल फ़रवरी में दलित पंजाबी गायिका, गिन्नी माही का शो भी करवाया था. यह वही यूनिवर्सिटी है जहाँ दलितों, बहुजनों तथा आदिवासियों के नाम पर कलेक्टिव भी है जो खुद को यूनिवर्सिटी के दलित, बहुजन तथा आदिवासी तबके के “एकमात्र प्रतिनिधि” के बतौर पेश भी करता आया है. यह हमारे लिए बहुत ही निराशाजनक बात है कि न तो AUD का ज़्यादातर संपन्न तबका जोकि, अम्बेडकर, मार्क्स, स्पिवाक, बटलर, फूको और ऐसे ही तमाम फिलोस्फर को इस्तेमाल कर दमित अस्मिता को अपना विषय बनाकर उन पर लिखता रहा है, बतियाता रहा है, (अपनी अकादमिक और राजनीतिक दुकान चलाता रहा है), मिसाल के तौर पर, अभी हालिया दौर में CPSH में हुए इलेक्शन में भी कई उम्मीदवारों ने भाषा के मुद्दे की संवेदनशीलता को अपने चुनावी मेनिफेस्टो में पहचाना. यह एक सराहनीय बात है कि उन्होंने इसे पहचाना. लेकिन सवाल यह है कि क्यों हम और हमारा मुद्दा, मात्र चुनावी मेनिफेस्टो तक ही सीमित है? यह हमारे लिए बहुत ही हैरानी और निराशाजनक बात है कि यहाँ तक कि वह कलेक्टिव जोकि फेसबुक और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जातिगत भेदभाव पर बातें करते हैं, जातिगत भेदभाव के खिलाफ पॉलिटिक्स करते हैं, दलित, ओबीसी तथा आदिवासी समुदाय की एकता के नारे लगाते हैं उन्होंने क्यों हमारे इस मुद्दे पर हमारे साथ खड़े होना ज़रूरी नहीं समझा? सवाल यह भी है कि क्या आपकी पॉलिटिक्स का रिश्ता कैंपस के “दूसरे” दलित और बहुजन के मुद्दों से है? यह उनकी पॉलिटिक्स पर एक प्रश्नचिन्ह है या हम जैसे दलित-ओबीसी छात्रों के सामाजिक-आर्थिक अस्तित्व पर एक प्रश्नचिन्ह? या फिर यह विचारधाराओं के संघर्ष में एक नए तरह का जातिगत और जातियों के भीतर ही एक आर्थिक भेदभाव है?

तो अंतत: साथियों ‘हमारी’ अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में अम्बेडकर के बारे में अकादमिक चर्चाएँ और अम्बेडकर को ज़रूर याद किया जाएगा लेकिन सिर्फ और सिर्फ अंग्रेज़ी में. अम्बेडकर की एक बड़ी तस्वीर कुलपति जी के दफ्तर में और यूनिवर्सिटी में ज़रूर लगेगी लेकिन दलित, ओबीसी, आदिवासी और गरीब-वंचित समुदाय के लोग कैंपस तक आ पायेंगे, यहाँ सर्वाइव कर पायेंगे यह मुद्दा नहीं है. अगर आ भी जायेंगे तो उनको अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के कारण ग्रेड कम मिले, उनको रिपीट करना पड़े या वह यह यूनिवर्सिटी छोड़ कर चले जाएँ इन सब मुद्दों से उन्हें कोई वास्ता नहीं. क्योंकि बाबा साहेब “जिन्दा” हैं, कुलपति की यूनिवर्सिटी की तस्वीरों में कुलपति  की यूनिवर्सिटी की अंग्रेजीवादी अकादमिक चर्चाओं में. बाकी जिन समुदाय के उत्थान के लिए बाबा साहेब ने संघर्ष चलाया उस समुदाय के लोग इस कैंपस में ‘जिंदा’ हैं इससे कुलपति का कोई नाता नहीं. जिन समुदायों को बाबा साहेब ने शिक्षित हो, संघर्ष करो, संगठित हो का नारा दिया था, उनके शिक्षित होने, संघर्ष करने और संगठित होकर कुलपति से मिलने पर कुलपति का इगोइस्टिक ब्राह्मणवादी रवैया कहता है कि “मैं सिर्फ निर्वाचित ‘स्टूडेंट कौंसिल’ से मिलूंगा”. तो साथियों, ‘हमारी’ यूनिवर्सिटी मानती है कि जातिगत भेदभाव होता है लेकिन केवल ‘हमारी’ अम्बेडकर यूनिवर्सिटी के ‘बाहर’ इसलिए ‘जागरूकता’ फैलाना ज़रूरी है लेकिन केवल यूनिवर्सिटी के ‘बाहर’. इसीलिए ही दलित पंजाबी गायिका गिन्नी माही जी का शो कराया जाता है, हर साल अम्बेडकर मेमोरियल लेक्चर कराया जाता है.

नोट: सुझाव तथा राय के लिए हमे नीचे लिखी ईमेल आईडी पर सम्पर्क कर सकते हैं. garima.16@stu.aud.ac.in, rbala.16@stu.aud.ac.in

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अखिलेश्वर पांडेय की कविताएं

अखिलेश्वर पांडेय

‘पानी उदास है’ कविता संग्रह प्रकाशित.एनएफआई का फेलोशिप और नेशनल मीडिया अवार्ड., प्रभात खबर में कार्यरत. संपर्क:apandey833@gmail.com
मोबाइल : 8102397081

पतरा


परदेस जाने से पहले
गांव में अब दिखाते हैं पतरा
दिशाशूल का भरम मिटाने को
पंडित जी की सलाह जरूरी है
पतरा में सब लिखा होता है
कब होगी बारिश
कब डालना है खेत में बीज
कब होगा दुल्हन का गवना
मुनिया के स्कूल जाने का सु-दिन
पेट का अजन्मा बेटा है या बेटी
110 वर्षीय दद्दा के मरने का दिन भी

गाय का पहला दूध
खेत का पहला अन्न
बेटे की पहली कमाई का दशांश
दे आता है यजमान घर पर
पुरोहित जी उचारते हैं भविष्य
बांचते हैं हस्तरेखा
बताते हैं –
यह साल अच्छा नहीं तुम्हारा
हर शनिवार पीपल में जल दो
जलाओ घी का दीया
करो हनुमत आराधना
पहनो लाल वस्त्र
तब मिलेगी क्लेश से मुक्ति

यह सब सुन
चकरा गया
भकोलवा का दिमाग
बोल पड़ा –
सब हमही करेंगे तो
आप का करियेगा…?

मेरे गांव में


हौंसले की झाड़ू से दुख बुहारती है मां
मुश्किलों की मोतियाबिंद से
कमजोर हो गयी हैं आंखे उसकी
फिर भी –
भूत-भविष्य-वर्तमान
बहुत साफ-साफ दिखता है उसे!

बचपन की भौजाइयां
असमय बूढ़ी हो गयी हैं
जिम्मेवारियों की बोझ ने
छिन ली है उनकी खूबसूरती
हंसी-मजाक की जगह ले ली है
नाती-पोतों ने!

शाम होते ही कई घरों से
छनकर आने लगी टीवी की आवाज
स्टार प्लस देख रहे बच्चे और बूढ़े
कैडबरी और मैनफोर्स का विज्ञापन आते ही
छोटी बहू ने बदल दिया चैनल
अब शाहरुख के आगे नाच रही सन्नी लियोनी
गा रही गाना –
लैला ओ लैला!

लल्लन बाबू का छोटका स्साला
गबरू जवान हो गया है
छेड़ता है लड़कियों को राह चलते
मैंने पूछा उससे
क्यूं भई! क्या चल रहा है
बोला-
पुलिस में जाने की तैयारी कर रहा हूं!

पढ़ा था जिस जर्जर स्कूल में मैं
अब वह आलीशान बन गया है
कई कमरे, रंग रोगन, चारदिवारी
सबकुछ एकदम चकाचक
बस
मास्साब की जगह बच्चों ने ले ली है
अब बच्चे ही पढ़ाते हैं बच्चों को!

आम का लंगड़ा पेड़
अब भी खड़ा है यूं ही तन कर
इस बार आये हैं खूब मंजर
रामदीन काका कह रहे थे-
अब भी वैसी है मिठास उसमें
तो फिर
आसपास के बाकी पेड़ कहां गये!

चिड़िया



चिड़िया हरती है
आकाश का दुख
उसके आंगन में चहचहाकर
भर देती है संगीत
सूने मन में

बादलों को चूमकर
हर लेती है सूरज का ताप
बारिश होने पर
तृप्त होती है चिड़िया

सुस्त पड़ते ही सूरज के
लौट आती है घोसले में
चोंच में दाने भरकर
खिलाती है बच्चों को
सिखाती है बहेलियों से बचने का हूनर
पढ़ाती है सबक
पंख से ज्यादा जरूरी है हौसला

चिड़िया प्रेम करती है पेड़-पौधों से
करती है प्रार्थना – न हो कभी दावानल
सलामत रहे जंगल
बचा रहे उसका मायका
वह जानती है
उड़ान चाहे जितनी लंबी हो
लौटना पेड़ पर ही है
इसका बचे रहना जरूरी है
मां-बाप की तरह.

अकारण


धूप की चौहद्दी नहीं देखी जाती
हवा का रास्ता नहीं पूछा जाता
कोई आ जाये जो घर पर बेवक्त
तो कारण नहीं पूछते
मौत दे दे दस्तक अचानक
तो वक्त नहीं पूछते उससे
बच्चों की खिलखिलाहट का रहस्य
क्यों पूछना भला!
कैसे जाना जा सकता है
फूलों का रंग रहस्य
भात के अदहन का तापमान
थर्मामीटर से नापता है कोई भला!

यह द्वापर नहीं
कलियुग है साहब!
निशाना साधिये
मछली की आंख मत देखिये
प्रेम में ऊंच-नीच
राजनीति में सही-गलत
इस सब चक्कर में
क्यों पड़ते हैं…?

छोटे कपड़े पहनने वालों का कद भी
बड़ा होता है
बड़ी-बड़ी बातें छोटे लोग भी कर सकते हैं
उम्र, अनुभव और उपलब्धियों का
लेखा-जोखा रखना फिजूल है.

औरत होना कला है


महावर से छुपाना बिवाई
सस्ता सा पाउडर पोतकर
ढंक लेना आंखो के नीचे का कालापन
चलताऊ किस्म के क्रीम से
बचाना गालों की लाली
यह सब उपक्रम आसान नहीं
ना ही आसान है औरत होना

रोपित इच्छाओं की पेड़ की तरह
करते रहना फल-फूल की बारिश
जरूरतमंद घरवालों को देते रहना
ससमय
मुस्कान व खुशियों का तोहफा
क्या इतना आसान है!

हां है आसान
एक औरत के लिए
यह सब सहज और सरल भी
क्योंकि
यह सब नहीं करता पुरुष
इसलिए करना ही पड़ता है
हर औरत को
इसलिए आसान है

अहिल्या, सीता, राधा, रुक्मिणी
मेनका, रंभा से लेकर देविकारानी से आलिया तक
इतने रुपों में भी
कहां पहचान पाया कोई पुरुष उसे
मां ,बेटी, बहन, दोस्त, प्रेमिका और पत्नी तक
कितने कम नाम और पद हैं इस दुनिया में औरत के लिए
पर जिम्मेवारियां कम नहीं!

रुदाली से रुपाली तक
हर भूमिका में फिट है वह
हर मोरचे पर डटी है
दीपमाला में जलती
शोरूम के काउंटर पर मुस्कराती
अबोध बच्चे को कराती स्तनपान
गांव पोखर में नहाती
खेतों में गेहूं की बालियां समेटती
किचेन में सोंधी रोटी बनाती हुई
हर जगह…

औरत  होना अभिशाप नहीं
एक कला है
यह जान जाती है हर लड़की
पैदा होते ही.

ऐसी जगह

तुम्हारे छतनार जुड़े में टंकना चाहता हूं
टहकार पलास का ऐसा फूल
जो मुरझाये नहीं कभी
हमारे प्यार की तरह
महुए सी मादक तुम्हारी आंखों में
लगाना चाहता हूं रात का काजल
मैं तुमसे प्यार करना चाहता हूं उतना
जितना नदी मछली से करती है
हवा खूशबू से
ओस दूब से
और
भूख अन्न से

चिड़िया की बची हुई नींद
घड़ी से थोड़ा सा ज्यादा वक्त
बारिश से उसका सूखापन
और
राख से नमी मांग कर
निकल पड़ेंगे हम सैर पर
एक ऐसी दुनिया में
जहां
जिया जा सके अपनी शर्त पर
आदर्श या आडंबर के बिना
शहरी बनने की ढोंग किये बगैर
बिना छिपाये अपना गंवईपन
जहां सूरज के निकलने की शर्त
पूरब न हो
ना हो चांद के होने की शर्त
आसमान
देवता मंदिर के बाहर भी
बिराजते हों
ऐसी जगह चलेंगे हम
जहां रोशनी को अंधेरा मिटाने का
गुमान न हो
न फूलने-फलने पर इतराते हों पेड़
जहां गेहूं और गुलाब की खेतें
ना हों अलग-अलग
ऐसी जगह ढूंढेंगे हम

फिर देखना तुम
तब डरेगा नहीं कोई प्रेमी
ताकतवर मुस्कानों से
बीज अंकुरित होंगे
बिना प्रार्थना के
प्रेमियों को नहीं करना होगा
बसंत का इंतजार
लगानी नहीं पड़ेगी ‘प्रेम दिवस’ की होर्डिंग्स
खत्म हो चुका होगा भय का कारोबार.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर


अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.


दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

विमर्श की ज़रुरत कहाँ

स्त्री की दशा को लेकर कई सारे व्याख्यान आयोजित होते हैं लगातार बहसें चल रही हैं पर ये बहसें कहाँ चल रही इसको देखना बहुत महत्वपूर्ण है ।ये सारी बहसें उच्च शिक्षण संस्थाओं तक ही सिमित हैं जहाँ पहले ही से एक बौद्धिक वर्ग बैठा है और बार बार हर बार उन्हीं विषयों की पुनरावृत्ति होती है ताली बजती लोग चाय पीते हैं और चले जाते हैं . अब ज़रा ध्यान से सोचिये उच्च शिक्षा में जो भी पहुंचता है वह लगभग 21 तक की आयु का हो जाता है फिर इन सब को समझने में उसे लगभग 5 साल निकल जाते हैं मतलब 25 साल मान लीजिए इन 25 साल वो अपने बचपन के उन मूल्य और धारणाओं में बंध चुका होता है जिन मूल्यों का स्त्री चिंतन से टकराव रहता है तो उसके लिए अपने को परिवर्तित करना बहुत कठिन हो जाता हो वो चाहे लड़का हो लडक़ी हो या थर्ड जेंडर हो अब अगर मैं उच्च शिक्षा तक ना पहुँचता तो शायद यहाँ थर्ड जेंडर ना लिखता .पितृसत्ता ,सामजिक गढ़न आदि शब्द उच्च शिक्षा में आकर ही सुना और समझा जाता है अगर आप बहुत प्रसिद्ध विश्वविद्यालय को छोड़ दें तो कहीं भी जाकर अगर पूछेंगे कि पितृसत्ता का अर्थ क्या है शायद ही कोई बता पाय गाँवो में तो बिल्कुल नहीं इसलिए मेरा मानना ये है कि क्यों ना इन विमर्शों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ दिया जाय अगर ऐसा होता है तो बचपन से इंसान काफी हद तक इन बातों से परिचित रहेगा और उसी अनुसार अपना व्यवहार करेगा ।

आज  हम बाजारवाद की कितनी भी आलोचना कर लें किंतु एक कटु सत्य यह भी है की उसी बाजार ने हम लोंगो की जीवन शैली पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया है उसी बाज़ारवाद में बचपन फल फूल रहा है कैसा बचपन जिसमें शीला ,मुन्नि और भी कितने ऐसे लड़कियों के नाम है जो प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों रूप से बचपन के उस कोमल दिमाग में ऐसा बीजा रोपण कर रहे हैं जो महिलाओं के प्रति एक नकारात्मकता को जन्म दे रहा है जो बड़ा होकर किसी ना किसी रूप में एक मनोविकार को जन्म दे रहा है इसलिये जब उस व्यवस्था से लड़ना है तो बीज को ही ऐसा पानी दिया जाय तो पौधा अपने आप ही बढ़िया निकलेगा और वो भी  स्वाभाविक ढंग से  उच्च शिक्षा  में आकर व्याख्यान ,कार्यशाला आदि महज़ औपचारिकता रह जाते है कोई परिवर्तन नहीं उन कस्बों में उन गाँवों में विमर्श की ज़रुरत है जहाँ ज्ञान सृजन की परंपरा में ही वो स्थापित है जिसमे कई सपने बनने से पहले ही टूट रहे हैं.

क्योंकि कोई भी हो उसके जीवन में ज्ञान अर्जन करने की प्रक्रिया , ज्ञान का संचयन करने का बहुत असर पड़ता है अगर बचपन से उसको इस प्रकार से ढाला जाय कि उसे जेंडर की समझ हो जाय तो उसकी मानसिकता उसी तरह विकसित होगी जिस विकसित मानसिकता की बात उच्च शिक्षा में की जाती है इंसान को इस बात का पता रहेगा तो निश्चित रूप से वो जागरूक रहेगा भी  आज जहाँ लोग घर जाते ही मम्मी चाय ले आओ ,भाभी कपड़े धो दो जैसे आदेशात्मक शब्दों का प्रयोग बड़े सहज ढंग से करते हैं अगर बचपन से वो इन सब बातों को जान जाएगा तो शायद वह ये सारी बातें नहीं बोलेगा इसलिए मुझे लगता है ऐसे चिंतन प्राथमिक शिक्षा में होने चाहिए .प्राथमिक शिक्षा में उसके जानने की तीव्र इच्छा होती है वह अगल  बगल के माहौल को बहुत तेज़ी से ग्रहण करता है हर बात को बड़े ध्यान से सुनने व् समझने की कोशिश करता है वहीँ से व्यक्ति में धारणाएं बनना प्रारंभ होती वहीँ से वो दुनिया को समझने का प्रयास करता है वो ऐसी बातें जब शिक्षा के माध्यम से जल्दी से सीख लेगा और किशोर होते होते इन सब बातों को आत्मसात करने लगेगा छोटी छोटी ऐसी कहानियाँ ऐसे खेल जो समानता को बढ़ावा देते हैं ,को प्राथमिक शिक्षा में लागू करें मेरे विचारों से बहुत कारगर होंग जब बचपन से किसी को भी यह सुना जायेगा कि लड़कियों की तरह क्यों रो रहे हो ,लड़की पराया धन होती है ये सारी बातें छोटे से दिमाग में जम जाती हैं अगर इसकी जगह अपनी प्यारी सी संतान को ये सिखाया जाय की हर वो इंसान जो मेहनत करेगा परिश्रम करता है परिस्थितियों से लड़ता है वो मजबूत होगा इसमें किसी जेंडर का ज़िम्मेदारी ज़रूरी नहीं है तो इंसान की समझ पहले से ही काफी परिपक्व हो जायेगी हाँ इस बात का ध्यान रखना आवश्यक होना चाहिए कि एक बच्चे के अनुसार किसी नाटक के माध्यम से किसी छोटी फिल्म के माध्यम से किसी छोटे से खेल के माध्यम से खेल खेल में बच्चा बहुत बड़ी बातें प्यार और आराम से सीख लेगा और खासकर गाँवो में जहाँ बहुत ज़रुरत है  कस्बों में  जहाँ  लोगों को जागरूक करने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है धीरे धीरे जागरूकता का अभियान चलाया जाना चाहिए चितंन के स्थान और उसके स्तर को व्यापक करने की आवश्यक है तभी सामजिक परिवर्तन की गति तेज़ हो पायेगी।


 तभी उस समानता वाले समाज की प्रक्रिया आगे बढ़ पायेगी जिसका सपना वातानुकूलित कमरों में बैठे बुद्धजीवी देख रहे हैं

दक्षम द्विवेदी
शोधार्थी  म गा अ हि वि वि वर्धा
संपर्क -mphilldaksham500 gmail.com

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर


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है मुझको जमशेद तेरे जाम से भी काम…..!!

प्रो.परिमळा अंबेकर

विभागाध्यक्ष , हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और. परिमला आंबेकर मूलतः आलोचक हैं.  हिन्दी में कहानियाँ  अभी हाल से ही लिखना शुरू किया है. संपर्क:09480226677



औरतों का मन और उसकी मानसिकता को भला कौन नहीं जानता…? घर बैठे हर ज्ञान का हर विज्ञानी व्यवस्था का हर तंत्रज्ञान के परिणामों एवं अंजामों का रिप्लिका ढूंढ निकाल लेती है वह। उसका अपना घर ,उसका अपना आंगन उसका अपना घर के पीछे का गत्ता बस उसके लिये काफी है विश्व के प्रतिरूप को गढने के लिये। आज के दौर में फेसबुक, एक मैजिक दंड है जो औरत के हाथ लगा है। किसी की मेहरबानी ही नही, किसी की कृपादृष्टि ना भी तो सही, जी हुजूरी भी नहीं, डर भी नहीं, बस जामे जमशेद का करामत, कि बटन के दबने की देरी…टच स्क्रीन पर देखते जाओ, पढते जाओ, लाइक करते जाओ, दुनिया भर की बातें कहते जाओ, लिखते जाओ अपनी अंतरग की कथाएं …प्रंसगें..तूल चूल की बातें …!! घटनाएं, प्रसंग, होनी अनहोनी खोजी खबरी बातें, घर के दिये से लेकर दिल्ली तक की बातें !! भाई बंध की अवाम की बातें, जिल्लत प्रेम की रोमियो-जूलियट टाइप की बातें, भय और विश्वास की सुधिजनों की बातें, लौकिक अलौकिकता की आध्यात्मिक बातें …मन के परतों में छिपी जलीयता की सृजनात्मक कलम की बातें,बुद्धि के कोहों में लगे जमे विचारों की बत्तियों के जलने की बातें, अंतरंगता की लडियों के रेशों को बाहरी जीवन तरंग के रंगों में रंगने की रंगरेजों की बातें…!!


सोने पर सुहागा, उठते बैठते सोते-जागते,बतियाते मुस्कुराते हुवे याने हर पोज़ में फोटो को अपने वाॅल पर चिपकाते जाइए। औरत के अनेक रूपों में फेसबुकी रूप का अलग ही वर्चस्व और अलग ही अंदाज है। हर क्षण हर विचार और हर घटना प्रसंग को फेसबुक के वाल की आँखों से देखने वाली औरत, चित्रों को उसी अंदाज में चुनती है जिस अंदाज में अपने बया की सिलायी के लिये दर्जी पक्षी तिनको को चुगता है । दर्जी पक्षी का बया, उसके अंदाजो हिस्से से खुलता है और बंद भी होता है। कारण औरत का फेसबुकी वाल भी उसके हिसाब से संकोच को ओढती है और ओढी संकुचितता को खोलते जाती है ।

 मेरे मुताबिक आदम से भी हव्वा अधिक सोशल है । यानि उसके अंतर्रमन की परतों की गहरायी में जल का लरजना जितना अदृश्य और अध्वनित है, बाह्य जगत के साथ का उसका संबंध , संबंधो की टहनियां ,उन टहनियों में उगे फुनगियों की लाली और हरियाली उतनी ही साक्ष्य है स्फुरित हैं। वह अपने हर भाव और संवेदना की दुनिया को, बाहरी जगत् के रेशों की बुनावट को अपनाते जाती है। अपने सजने संवरने से लेकर , व्यवहार और विचार तक में समाज की प्रतिक्रिया को अत्यंत ही तल्खी के साथ गुनते जाती है और उतनी ही शिद्दत से बाह्य समाज की रंगों अंदाज को अनुभव भी करते जाती है। इसीलिए दुनियादारी या दुनिया के अहसास के कैनवास के कंटेक्सट में औरत मर्द से भी अधिक , अपने केा उकेरते जाती है, स्वयं को ढालते जाती है। इसीलिए श्रंगार के प्रसाधन हो या रंगबिरंगी साजो सामान सभी को औरत अपने मानदंड से चुनती है,अपने लिए, अपनी तुष्टि के लिए, न कि मर्दवादी समाज के निर्णयों के आग्रह से। दुनिया की नजर से अपनी आत्मतुष्टि का परंपरागत हव्वायी स्वभाव फेसबुकी वाल पर अपने को जाहिर करने के इंटरनेट के प्रस्ताव को तपाक से स्वीकारने में औरत को मदत कर रहा है।

जितनी तीव्रता से औरत अपने सौन्दर्य और सौन्दर्यबोध की आत्मतुष्टि की अपेक्षा रखती है उतनी ही उसकी चेतना उसके विचार और संवेदना के लिए समाज द्वारा दिये जाने वाले लाइक के प्रति केन्द्रित होती है। प्रकाशन विचारों का या भावों का या बोधों का जो आत्मिक हो या दैहिक, सृजनात्मकता का आखिरी और अनिवार्य पडाव है । हर कला, जिस तरह कलाकार के रचनात्मक बोध से बाहर पडते जाता है उतनी सहजता से रचनाकार भी उस कला के रूप का बाह्य प्रकाशन चाहता है। समाज द्वारा उसकी पहचान चाहता है। प्रकाशन की खुशी अद्भुत होती है, मन के कोने का बडी ही आत्मीयता से सहेजने वाला बोध, एक अदृश्य विश्वास से भेदने वाला बोध, अपनी अस्मिता की पहचान की अद्वितीय आनंद से उद्बोधित कर देनेवाला बोध। बस लाइक् का एक क्लिक , और उसमें भी अपेक्षित या अनपेक्षित उंगलियों से क्लिक किया गया लाइक … । फेसबुक पर का यह सृजनात्मक या कलात्मक अभिव्यक्ति से औरत को मिलने वाला लाइक, जामे जमशेद नही तो और क्या है ?


फेसबुक का माध्यम औरत के लिए जितना घर के आंगन में रंगोली काढने जितना सरल है और सहज भी है लेकिन आंगन में कढे रंगोली का स्पर्श नहीं दे पाता  वह सत्य का आभास मात्र है। आभासी दुनिया की अपनी सीमाएं और बंदिशें इस लोक के साथ भी जुडे हुए हैं । लेकिन समाज में जहां मनुष्य रहते हैं, जिनमें आपसी संपर्क के रूप में जब इंटरनेट का माध्यम जबरदस्त माध्यम के रूप में स्थायी रूप में स्थापित हो रहा हो, वहां आभास के भास होनें में समय नहीं लगेगा। झूठ माने जाने वाली प्रक्रिया धीरे -धीरे सच में बदलने के सोशल प्रोसेस में ढलते हुवे स्थापित हो जाती है। इसीलिए आज इस आभासी दुनिया के सोसियलाइजेशन में औरत अपनी अस्मिता के अनेक आयामों को तलाश रही है । टीन ऐज से लेकर वृद्धा तक अपनी जिजिविषा के लौ में फेसबुक वाल पर अपना हस्ताक्षर दर्ज कर रही है । परिवार से लेकर समाज, समाज से लेकर संस्कृति, संस्कृति से लेकर राजनीति, राजनीति से लेकर धर्म, शिक्षा विज्ञान चिंतन विमर्श माध्यम जैसे अनेक डोमेन में आज औरत ने अपनी अलग अंगीठी सुलगा कर रक्खी है। औरत का बोल्ड और सुलझा हुआ व्यक्तित्व , सोच और विमर्श का गंभीरता और निर्णयों का ठहराव और ठोसपन से लेकर कलात्मकता और सृजन की बारीक नक्काशियों को भी उकेरने की कला उसके ई- लेखन में जाहिर हो रहा है ।

  केवल दिवार ही नहीं है सामने या सिर्फ लाइक बटोरने का झोला ही नहीं, साथ ही उसके हाथ दमदार हथियार भी लगे हैं। अनचाहे विचार या व्यक्ति को उसकी मानसिकता एवं भावों को, ना की तर्जनी दिखाने की संभावना और साथ ही अनसुलझे असामाजिक तत्वों को पूरी तरह ब्लाक कर अपना स्वतंत्र सोच और वैचारिक स्वछंदता केा स्टैंड करने की। आरंभ की दुविधाएं और असहजताएं मिटकर एक आरोग्यपूर्ण अभिव्यक्ति माध्यम के रूप में वह ई-जाल को प्रयोग में जब ला रही है तब विसंगतियां और अश्लीलता अपने आप झडकर शुद्ध निर्मल जल ऐसा जाम में भरते जा रहा हैकि उसमें अपना मुख स्वयं देखे और दिखाये ।

औरत के लिये सोशल मीडिया  हाथ की दूरी पर हथेली में समा जानेवाली सहज और सरल अभिव्यक्ति की मीडिया है, जो हंडी की उबाल मात्र से दाल और चावल के पकने या न पकने का अहसास जरूर देता है। कुकर की सीटी के प्रेशर की तरह भावनाओं की तीव्रता और उसके विरेचना के सुख का अहसास भी उसके लिए एक तरह का साइकोलाजिकल सूदिंग ही समझिए। यह तो सर्वविदित समाजिक दर्शन है कि मनुष्य उसी जमीन और जगह में जडे जमा सकता है या बडी  सहजता से मुक्ति का श्वास ले सकता है जहा, यानी जिस परिसर में उसकी पहचान हो या उसकी अपनी आइडेंटिटी हो। आज के दौर में औरत को चाहे इस दायरे की सीमा कुछ भी क्यों न हो, सोशल मीडिया एक ढंग से उसकी अस्मिता को पाने हेतु सृजनात्मकता के आनंद का स्पेस प्रदान कर रहा है।
लेख, कथा, रिपेार्ट आदियों के छपने की काल सीमा जहां मासिक या साप्ताहिक पत्र पत्रिकाओं ने छोटा कर दिया तो फेसबुक ने उस अवधि को और भी घटाकर क्षण में लाकर धर दिया। अब बैठकर लिखा या लिखे हुए को फेसबुक वाल पर चढाने की देरी, पाठकों के हथेली में खुलते जाते हैं लेखन के राज , कथा के रहस्य या घटनाओं के हलचल । और तो और साथ में चस्पाएं चित्र इतने पूरक और आकर्षक होते हैं, जैसे फेसबुक के रीडर के साथ बयानबाजी कर रहे हो। यह जाहिर बात है कि औरत अधिक कलात्मकता रखती है अपनी सोच में और अभिव्यक्ति में। सौन्दर्यबोध और सुंदर संवेदना, उसका भावनालोक और उस भावनालोक के सामाजिक दायरे के भीतर की प्रस्तुति को अधिक आकर्षक और कलापूर्ण बनाता है। फेसबुक के पोस्ट औरत की सौन्दर्य चेतना से लबालब होते हैं। अव्वल दर्जे का महिला लेखन से लेकर चौका चूल्हा संभालनेवाली गृहणी के पोस्ट भी अपने अपने एस्थटिक के स्तर के आधार से, पूरक चित्र और रंगों से सजे पूजा मंडप की तरह लगते हैं। जीवन और समाज में सौन्दर्य ही एक ऐसा बोध है, जिसका कोई स्तर नहीं होता।


परंपरागत मुख्यधारा के साहित्य ने औरत के रचना संसार को नजरअंदाज किया- नून,  तेल,साग सब्जी का साहित्य मानकर उसे चारदिवारी के बीच का साहित्य कहकर उसका लेबल किया। महिला साहित्य का उल्लेख केवल नाम के वास्ते (गिनती में बस, खेल में नहीं) की रस्म अदायगी को समीक्षक और इतिहासकार निभाते आये हैं, वहीं शास्त्रीय और परंपरागत साहित्य की इस मानसिकता को लेखिकाओं ने चुनौती दी। महिला लेखनको मानते-मनवाते आज इक्कीसवी सदी में हाशिये से साहित्य के केंद्र में महिला की कलम आ गई है। वहीं सोशल मीडिया में औरतों का हस्तक्षेप पुरूष लेखन के दखल से भी दस प्रतिशत अधिक अपनी प्रतिभागिता को स्वयं की सृजनात्मकता और सौन्दर्यबोध के माध्यम से साबित कर रही है । फेसबुक के लिंक के माध्यम से पाठकों को बडी सहजता से उनकी उॅुंगली थामें अपने रचना संसार में प्रवेश करवाती हैं और साहित्य आस्वादन के अपने कैनवास को परत दर पतर खोलते जाती है । दैहिक-अनुभव से आत्मिक आनंद की ओर, इश्के लौकिकी से इश्के अलौकिकी की ओर …!! बस और कुछ नही तो, साहित्यिक लेखन के चारपायी पर बैठकर अपनी रचनात्मक स्थापनाओं को देखने की या दिखाने का भाग मिले या न मिले, लेकिन दस -बीस लाइक में ही सही अपने आप को अवाम में आम न मानने की आत्मिक आभास से तो फूले न समाने का गुबारा तो हाथ में पकडा दिया है फेस बुक ने औरतों के हाथों में। हाथ के इस फुग्गे को फोडने या फुलाने की स्वतंत्रता उसके हथेली की लकीरों में बंधी हुई है ।

औरतों का फेसबुकी डोमेन में आदमियों से भी दस प्रतिशत अधिक संख्या में भाग लेना सचमुच में एक आरोग्यपूर्ण पहल है। आनंद, शांति, सुख सुहाग की डोली चढकर आई या चढने के भावों से सजी संजोयी औरत आभासी दुनिया को अपने घर आंगन के जनानी बैठकों का टच देती है। उसका आंगन उसका अपना है। वह स्वतंत्र है कि वहां तुलसी का बिरवा सजाये या बंगडी, साडी बर्तन भांडों का, पास पडोसियों से मिलकर खरीद-फरोख्त करे या उस आंगन के फैलाव में अपनी चारपाई लगाकर आस पडोसियों से संगे संबंधियों से गप्प लडाये और अपनी चौपायी खुद सजाये। हमारी आभासी दुनिया में औरतों की और भी अनेक ऐसी चैपाइयां हैं जो औरों से भी कुछ अधिक बेदखली, बेहिसाबी स्वतंत्रता और स्वछंदता रखती हैं। कारण औरतों के वाल के उतने ही नमूने मिलेंगे, जितनी उनकी अस्मिता-एक से एक सुंदर, एक से एक बेबाक, एक से एक कलात्मक और एक से एक विश्वसनीय…सौन्दर्य और विचार की चेतना के जगर- मगर धुति से भरपूर।

आज ,  औरत को लेकर उसके संबंधों को लेकर उसकी अस्मिता को लेकर परंपरा से चली आ रहे,बने बनाये मिथक प्रतिमान और संकेत टूट रहे हैं। उसका अपना घर के कोने में आज सारा विश्व समाये जा रहा है। तकनीक की सूक्ष्मताओं और प्रयोग की जागरूकता से वाकिफ औरत ने आज आभासी दुनिया को अपने हथेली में कैदकर लिया है । वुमन फ्रेंडली तकनिकी और साइबर माध्यम आज उसके लिये वह जाम है जिसे जब चाहे खोल सकती है और जब चाहे उसमें झांक सकती है। और अंत में कहूं तो , मिस्कीन शाह के तर्ज में जमशेद के जाम को आभासी दुनिया मानकर आज यह कहने में ही उसकी सच्चाई  है –
है मुझको ऐ जमशेद तेरे जाम से भी काम
जहां-नुमा है मुझे अपने खुश-खिराम से भी काम ।
– मिस्कीन शाह

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com
 

स्त्री-पुरुष अलग-अलग प्रांत नहीं

डॉ. आरती  

संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com

तेजाब हिंसा से संबंधित खबरों के शीर्षकों की बानगी देखिए-

. प्रेम प्रस्ताव ठुकराए जाने पर युवती पर फेंका तेजाब… 
  . बाइक सवार बदमाशों ने छात्रा पर फेंका…
  .शादी से इंकार करने पर…
 . जेठ से विवाह करने से इंकार किया तो…


और क्रूरता की हद देखिए…

.शादी की पहली रात ही दुल्हन के गुप्तांगों पर…
.रेप पीडि़ता की मदद करने वाले वकील पर…

इसके अलावा कुछ खबरें ऐसी भी बनती हैं जैसे कि घरेलू झगड़ों में… आपसी रंजिश में… इच्छित गवाही न देने पर… दबंगई के चलते… सबक सिखाने के लिए… इत्यादि इत्यादि।

तेजाब हथियार की मानिंद प्रयोग किया जा रहा है। अन्य हथियारों को रखने के लिए लाइसेंस की जरूरत होती है, लेकिन तेजाब बेचने वालों के लिए या खदीदने पर कोई नियम आड़े नहीं आता। कुछ समय पहले तक कोई नियम कानून नहीं था, अभी 2013 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को एसिड की बिक्री पर रोक लगाने और सख्त नियम बनाने के लिए आदेश दिए थे और अधिकतम तीन महीने का समय दिया था। उसके बावजूद भी घटनाएं साफ इशारा करती हैं कि तेजाब की बिक्री खुलेआम चल रही है।


यूं तो भारतीय कानून ने तेजाब हमले को विशिष्ट दण्डनीय अपराध की कोटि में रेखांकित करते हुए अपराधी के लिए दस साल की सजा मुकर्रर की है लेकिन कोर्ट में लटके हुए सैकड़ों से अधिक मामले कोई दूसरी ही कहानी बयां करते हैं। वही हाल सहायता राशि के संबंध में भी है। यूं तो तेजाब पीडि़ता को अब उसके इलाज के लिए पांच लाख रुपए की सहायता दी जानी नियमानुसार है, उसमें भी पहले सप्ताह ही एक तिहाई राशि दी जानी चाहिए किंतु कुछ दिनों पहले ही मैंने अखबार में पढ़ा कि सहायता राशि न मिलने पर कलेक्टर ऑफिस के सामने परिजनों ने सामूहिक आत्महत्या का प्रयास किया। इसके अलावा भी अनेक उदाहरण हैं। नियमों की जटिलता और जानकारियों का अभाव भी पीडि़त के रास्ते में दीवार-दर-दीवार खड़े करते जाते हैं।

क्या सजा के खौफ से तेजाब हमलों को रोका जा सकता है ( ! )

इसी वर्ष 9 सितंबर 2016 को ही तेजाब हिंसा से संबंधित एक केस को अदालत ने जघन्य अपराध मानते हुए अभियुक्त को मृत्युदण्ड की सजा सुनाई है। यह फैसला तेजाब हिंसा के मामले में चिन्हित करने वाला है। (मृत्युदण्ड मिल पाया या नहीं यह एक अलग मुद्दा है)

ये तो खबरों, हिंसा के कारणों पर और नियम-कानूनों-प्रावधानों पर एक सरसरी निगाह डालने जैसा था। इन सबके इतर यहां महत्वपूर्ण यह है कि आखिर लोग इतने क्रूर क्यों हैं? यह तेजाब हमला जिसकी शिकार 80 फीसदी से अधिक महिलाएं ही हैं, क्यों ये लड़कियां इस क्रूरतम हिंसा की चपेट में अधिक आती हैं? भारत के साथ ही पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, कंबोडिया जैसे देशों में अच्छे खासे प्रतिशत लोग तेजाब पीडि़त हैं।  यहां तो एक सीधा सपाट या बयान यह दिया जा सकता है कि ये क्षेत्र अपेक्षाकृत शिक्षा, जागरुकता आदि दृष्टियों से पिछड़े हुए हैं। परंपराओं, कुरीतियों में जकड़े हुए हैं लेकिन इंग्लैंड में भी 2004-05 में पचपन केस तेजाब हमले के अस्पताल रिकार्ड के अनुसार थे। और 2014-15 में यह संख्या 106 पहुंच गई। यह संख्या पाकिस्तान के मुकाबले (वहां काम कर रहे ‘सर्वाइवर्स फाउंडेशन’ के मुताबिक 2012 में 7,516 तेजाब हमले के शिकार थे) कम है किंतु उसका (तेजाब हमलों) अस्तित्व ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस जैसे विकसित, शिक्षित व जागरुक देशों में भी है।

हम अपने देश की ही बात करें तो आज कई फाउंडेशन इस दिशा में कार्यरत हैं। बदलाव लाने की कोशिश की जा रही है। ‘स्टॉप एसिड अटैक’, ‘एसिड सर्वाइवर्स फाउंडेशन’ और कई इस दिशा में कार्यरत हैं। ‘स्टॉप एसिड अटैक’ को अमेरिका का ‘बॉब्स 2016 सोशल चेंज अवार्ड’ भी मिला है।

इन सबसे इतर इस दिशा में सोचने और गहरे मंथन करने की जरूरत यहां है कि आखिर ऐसे अपराध लड़कियों के मामलों में ही अधिकतम क्यों हो रहे हैं?

हमें समझने की कोशिश करनी चाहिए कि ये घटनाएं आखिर किस ओर इशारा करती हैं? इनकी जड़ों में क्या छिपा हुआ है? गहराई से देखें तो बलात्कार से भी अधिक मारक असर तेजाब हिंसा का होता है। बलात्कार पीडि़ता शारीरिक से अधिक मानसिक प्रताडऩा की शिकार होती है। समाज में गहरे धंसी वर्जीनिटी (शुचिता) एक ऐसी अवधारणा है जिसके मानसिक प्रभाव से रेप पीडि़ता अधिक प्रताडि़त होती है किंतु तेजाब हमले में यदि वह बच भी जाती है तो जिंदगी भर न जाने वाले दाग और हर सुबह आईना देखते ही ‘डरावने’ शब्द से सामना करती है। अंतहीन दर्द, बार-बार होने वाली सर्जरी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाती हैं। और सबसे अहम आत्मविश्वास ही डगमगा जाता है। हर सुबह वह घटना दोहराई जाती है, खुद की परछाई से ही डर!!

क्या इसे ही जंगलराज कहते है योगी जी

इनके, यानी तेजाब पीडि़तों के रूबरू होते ही, उनकी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दुश्वारियों को जान-समझकर और कि आखिर ये घटनाएं होती क्यूँ हैं? जैसे प्रश्नों का सामना करते ही राकेश सिंह नाम का एक शख्स लोगों को समझाने और अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोजने एक अदद साइकिल लेकर निकल पड़ा। राकेश सिंह का जन्म बिहार में हुआ है। उच्च शिक्षा लेने के बाद कुछ साल उन्होंने एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी भी की। राकेश लेखक भी हैं। इनकी पहली पुस्तक बीबीसी द्वारा जारी की गई सूची के अनुसार (2010) में टॉप 10 में थी। और अचानक ही नौकरी, लेखन, ऐशोआराम सब छोडक़र जेंडर जागरुकता अभियान पर साइकिल से निकल पड़े। राकेश सिंह कहते हैं कि- ‘इन घटनाओं के सामान्य कारण देखो तो घोर आश्चर्य होता है कि एक दिन पहले तक प्रेमिका के कदमों में चांद-तारे तोड़ कर डाल देने की बात करने वाला युवक, अगले दिन उसी के चेहरे को तेजाब से नहला देता है।’ कैसे वह इतना क्रूर हो जाता है? आखिर उसके भीतर क्या धंसा होता है जो कि वह इतना अमानवीय, असंवेदनात्मक काम को कर सकता है?

लगभग अभी तक ग्यारह राज्यों (तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पांडिचेरी और अभी वे महाराष्ट्र यात्रा पर हैं) की साइकिल यात्रा कर, देश को अलग-अलग कोणों से देख-पहचान कर, वे इनसे पीछे छिपे कारण की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि- ‘पितृसत्ता द्वारा लडक़ा-लडक़ी की अलग-अलग तरीकों से की गई परवरिश, सभी धर्मग्रंथों और उनके पैरोकारों द्वारा अलग-अलग चिन्हित मान्यताएं और समाज में स्त्री की वनिश्त पुरुष की सुपीरियर पोजीशन मनवाती हुई परंपराएं (उन्हें हम रूढिय़ाँ ही कहें) ही वे मुख्य कारक हैं जिससे पुरुष हमेशा ही खुद को स्त्री से बेहतर और प्रेम में भी खुद को शासक ही मानता है। उन्हें ‘न’ सुनना मंजूर नहीं। एक पुरुष को इतना असंवेदनशील, समाज की जड़ों में जमी सदियों पुरानी परंपराएं और रूढिय़ां ही बनाती हैं जिन्हें हम कभी बदलने की कोशिश नहीं करते।’

प्यार पर न चढाओ हैवानियत की चादर

 दहेज प्रथा, शिशुवध, बलात्कार और तेजाब हमले जैसी घटनाएं जेंडर के नीचे दबे हुए प्रश्नों का प्रतिफल हैं। ऐसे प्रश्नों को सामाजिक रूढिय़ों की कारा से बाहर निकालकर, उनके उत्तर लोगों को समझाना बेहद जरूरी है। उत्तर आधुनिकता के दौर में जब पूरी दुनिया ‘एक गांव- मुहल्ले’ में तब्दील हो गई है। संचार क्रांति ने दूरियों के पैमानों को समाप्त कर दिया तब भी स्त्री और पुरुष जेंडर के बीच वही दूरी कायम है, वे अभी भी अलग-अलग प्रांत हैं। दिन-रात साथ रहते काम करते हुए भी मकान के दो तल्ले हैं। पुरुष शासक और स्त्री मजदूर। इस उत्तर को पाने के कारणों की तह में जाकर उन्हें पाटना होगा तभी तेजाब हिंसा जैसे क्रूर से क्रूरतम अपराधों पर अंकुश लगाना संभव हो सकेगा।

ये क्रूरताएं हमारे समय और देशकाल के चेहरे पर काले धब्बे हैं। ये कहानियां यूं नहीं खत्म होंगी। राकेश सिंह जैसे जज़्बेवाले कितने ही लोग लड़-भिड़ रहे हैं। हमें भी उनकी जंग में शामिल होना होगा। हर बदलाव मुमकिन होते हैं। हर समय को अपने भीतर ही औजार ढूंढऩे होते हैं।
पाश ने कहा भी है-
जब बंदूक न होगी तब तलवार होगी
तलवार न हुई, लडऩे की लगन होगी
लडऩे का ढंग न हुआ, लडऩे की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी…



आखिरी में जो लड़ रहे हैं, इस तेजाब पीडि़तों के लिए और वे सब भी जो हमारे समय की क्रूरता, असंवेदना और विशेषकर लैंगिक मानसिकता के शिकार हुए हैं, उनके लिए- कामरेड पेरिन दाजी के शब्दों में-
अपने लिए जिए तो जिए
तू जी ऐ दिल जमाने के लिए…

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शास्त्रीय सुरों की मल्लिका जिन्हें जनता ने ‘गानसरस्वती ‘ नाम दिया

स्त्रीकाल डेस्क 


‘गानसरस्वती ‘ नाम से समादृत भारतीय शास्त्रीय संगीत गायिका किशोरी आमोनकर का  सोमवार देर  रात मुम्बई में निधन हो गया.   84 साल की उम्र में हमें अलविदा कह गई किशोरी ताई अमोणकर का सम्बन्ध अतरौली जयपुर घराने से रहा है। उनकी मां मोगुबाई कुर्डीकर भी इसी घराने की मशहूर शास्त्रीय गायिका थीं।

10 अप्रैल 1931 को मुम्बई में ही पैदा हुई ‘गानसरस्वती ‘ किशोरी ताई ने अपनी मां और विख्यात गायिका मोगुबाई कुर्डिकर को अपना गुरु माना और संगीत साधना की.  ‘स्वरार्थरमणी – रागरससिद्धान्त’ यह संगीतशास्त्र पर आधारित ग्रंथ की वह रचयिता थीं. ख्याल, ठुमरी और भजनों की  इस शास्त्रीय गायिका  को शास्त्रीय संगीत में भावनाप्रधान गायन कला को पुनर्जीवित करने का श्रेय जाता है.

सुनें यह तराना 

किशोरीताई अमोणकर कई सम्मान से सम्मानित थी. 2002 में पद्म विभूषण से सम्मनित होने के पहले वे संगीत नाटक अकादमी सम्मान, 1985 , पद्मभूषण सम्मान, 1987 , संगीत सम्राज्ञी सम्मान, 1997 से सम्मानित हो चुकी थीं. उसके बाद भी संगीत संशोधन अकादमी सम्मान, 2002 संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, 2009 से  वे सम्मानित हुईं  1964 की हिन्दी फिल्म , ‘गीत गाया पत्थरों ने’  में उन्होंने गायन किया था, और  1991 में रिलीज हुई ‘दृष्टि’  फिल्म में उन्होंने  संगीत निर्देशन  किया था.

उनके चाहने वालो के द्वारा दिया गया उनका नाम  गानसरस्वती हालांकि उनका सबसे बड़ा सम्मान था.  उनके  पति रवि आमोनकर ने उनका पूरा साथ दिया.1992 में रवि अमोनकर का निधन हुआ है.