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रंडी, या रंडी से कम और हाँ, बीबी से भी बलात्कार हक़ नहीं

अखिलेश कुमार


बी.एच.यु. से इतिहास में स्नातक कर रहे है संपर्क:akhileshfssbhu@gmail.com

मैंने पहली बार जब ‘ना’ कहा तब मैं 8 बरस की थी,
“अंकल नहीं .. नहीं अंकल ‘

एक बड़ी चॉकलेट मेरे मुंह में भर दी अंकल ने,
मेरे ‘ना’ को चॉकलेट कुतर कुतर कर खा गई,
मैं लज्जा से सुबकती रही, बरसों अंकलों से सहमती रही,
फिर मैंने “ना” कहा रोज ट्यूशन तक पीछा करते उस ढीठ लड़के को’ “ना ,प्लीज मेरा हाथ ना पकड़ो “ना…
मैंने कहा न ” ना ”

मैं नहीं जानती थी कि “ना “एक लफ्ज़ नहीं,
एक तीर है जो सीधे जाकर गड़ता है मर्द के ईगो में,

कुछ पलों बाद मैं अपनी साईकिल सहित औंधी पड़ी थी,
मेरा ” ना” भी मिट्टी में लिथड़ा दम तोड़ रहा था,

तीसरी बार मैंने “ना” कहा अपने उस प्रोफेसर को,
जिसने थीसिस के बदले चाहा मेरा आधा घण्टा,

मैंने बहुत ज़ोर से कहा था ” ना ”

“अच्छा..! मुझे ना कहती है ” और फिर बताया कि
जानते थे वो, क्या- क्या करती हूँ मैं अपने बॉयफ्रेंड के साथ,
अपने निजी प्रेमिल लम्हों की अश्लील व्याख्या सुनते हुए मैं खड़ी रही बुत बनी,

सुलगने के वक्त बुत बन जाने की अपराधिनी मैं
थीसिस को डाल आयी कूड़ेदान में और
अपने ‘”ना ” को सहेज लायी,

वो जीवनसाथी हैं मेरे जिन्हें मैं कह देती हूँ कभी कभार
” ना ,,,,प्लीज़ ,आज नहीं ”

वे पढ़े लिखे हैं ,ज़िद नही करते, झटकते हैं मेरा हाथ और मुंह फेर लेते हैं निःशब्द,
मेरे स्नेहिल स्पर्श को ठुकराकर वे लेते हैं ‘ना’ का बदला,

आखिर मैं एक बार आँखें बंद कर झटके से खोलती हूँ,
अपने “ना “को तकिए के नीचे सरकाती हूँ,
और उनका चेहरा पलटाकर अपने सीने पर रख लेती हूँ,

“मैं और मेरा ‘ना’ कसमसाते रहते हैं रात भर,”
“” ना “” क्या है ?,,,,,,केवल एक लफ्ज़ ही तो जो बताता है मेरी मर्ज़ी, खोलता है मेरे मन का ताला,
कि मैं नहीं छुआ जाना चाहती तुमसे, कम-से-कम इस वक्त,

तुम नहीं सुनते,
तुम ‘ना’ को मसल देते हो पंखुरी की तरह,
कभी बल से , तो कभी छल से,

और जिस पल तुम मेरी देह छू रहे होते हो,
मेरी आत्मा कट कट कर गिर रही होती है,

“कितने तो पुरुष मिले, कितने ही देवता,”

एक ऐसा इंसान न मिला..
जो मुझे #प्रेम करता मेरे _____”नां” __के साथ,……..

विवाह के भीतर बलात्कार 

“क्यों भाभी, अभी तो आपकी शादी को एक ही साल हुये हैं फिर इसकी क्या ज़रूरत थी?”
{बेबी-बम्प के साथ एक लड़की और मैं, लड़की बरामदे में और घर के बाहर झांकती है और  धीरे से बोलती है
“बाबू, अभी तो मैं भी ये बच्चा नहीं चाहती  थी लेकिन तुम्हारे भईया कहाँ सुनने वाले हैं,  ”
“आप उन्हें मना भी तो कर  सकती थीं ”
“मैं उन्हें कैसे मना कर सकती हूँ, आख़िर वो मेरे हसबैंड हैं , वैसे भी मेरा मन उनके लिए कहाँ मायने रखता है क्योंकि मेरी तबियत चाहे ठीक हो या ना हो उन्हें तो सिर्फ मेरे साथ ……. करने से मतलब हैं  ”
“अरे आप मना क्यों नहीं कर  सकती हैं आख़िरकार  वो आपको शादी करके लाये हैं कोई खरीदकर नहीं ”
“कैसे बातें कर रहे हो, उन्हें मना करके मुझे नरक में  जाना है जाना है क्या ? ”


   ‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में (!)

  दोस्तों ये हैं उस समस्या का असल रूप जिसे क़ानून की क़िताबों में “विवाह में  बलात्कार” यानी “Marital Rape” के नाम से  जाना जाता हैँ। (अग़र सोशल मीडिया के ज़माने मैं भी आपका पाला इस शब्द से न पड़ा हो तो जान लीजिये कि “बलात्कार वह सम्बन्ध होता है जो कि प्यार  के अभाव में स्थापित किया जाये” और ये कोई ज़रूरी नहीं की शादी होते ही प्यार भी हो जाएगा इसलिए ऐसे ज़बरदस्ती के शारीरिक सम्बन्ध को  “विवाह में  बलात्कार”  की संज्ञा दी गयी है।)


 हर लड़की का यह सपना होता है की जब वो बड़ी हो तब उसकी केयरिंग करने वाला उसे समझने वाला एक अच्छे दिलवाला पति या बॉयफ्रेंड मिले लेकिन वहीँ लड़की जब 20-21 साल तक अपने मैरिज लाइफ के सुनहरे सपने संजोकर जबरन हलाल (सॉरी निक़ाह) होने के लिए  पिया की सेज पर बैठा दी जाती है तब  नियति से उसका पहला क्रूर साक्षात्कार  होता है क्योंकि उसका राजकुमार उस पर आकर ऐसे टूट पड़ता है मानो वो कई  जन्मों का भूखा हो ,हवस का पुजारी।



अग़र आप संस्कारी होंगे(Anti-Romeo Squad या बानर दल वाले) तो ये कहेंगे  कि  हंमारी संस्कृति में तो पत्नी को अर्धांगिनी कहा गया है, तो फिर ऐसा कोई अपनी पत्नी के साथ कैसे कर सकता है।  आईये आपको आँकड़ों की  मदद से समझाता हूँ क्योंकि “हाथ कंगन को आरसी क्या ,पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या और पान को बनारसी क्या? ”

National Health Family Survey 2016  के अनुसार भारत में 37% औरतें अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी में शारीरिक , मानसिक और Sexual हिंसा (विवाह में  बलात्कार) झेलती हैं। प्रख्यात समाजशास्त्री डॉ. राम आहूजा का मानना  था कि “शिक्षित महिलाओं की तुलना में घरेलु हिंसा (जिसमें Marital Rapes  भी शामिल है) अशिक्षित महिलाओं के साथ ज्यादा होती है “, जबकि इस  सर्वे के मुताबिक घरेलु हिंसा और विवाह में बलात्कार झेलने वाली  महिलाओं में  केवल 29% औरतें ही   नहीं पढ़ी- पढ़ी-लिखी थी जबकि  71% औरतें ग्रेजुएट थीं या इससे भी अधिक पढ़ी लिखी थीं। इस रिपोर्ट के अनुसार  39% महिलाओं के  पति उनकी मर्जी के बिना उनके  करते हैं और 46% औरतों ने यह भी बताया की उनके  पतियों द्वारा contraception का यूज़ ना  बिना अपनी मर्जी के प्रेग्नेंट हो चुकी हैं। यह एक प्रमाणित तथ्य है कि पति खुद contraception means का यूज़ नहीं करता  बल्कि  अपनी पत्नी को जबरदस्ती contraceptive pills दे-देकर उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से अपाहिज  बना देते हैं क्योंकि अनवांटेड-72 जैसे गर्भनिरोधक दवाओं  के साइड-इफ़ेक्ट के कारण औरतों और अनब्याहीं लड़कियों में अधकपारी, खून की कमी , चक्कर आना और बाँझपन जैसे समस्याएं आम हो जाती हैं। और फिर गाँव के लोग ही   नहीं बल्कि कुछ पढ़े-लिखे भी इनसे छुटकारा पाने के लिए साधुओं और तांत्रिकों के पास जाते हैं जो कि धर्म  की आड़ में अपनी हवस पूरी करते हैं।

 “विवाह में  बलात्कार  के कारण

भारत जैसे देश में जहां एक घर के छज्जे का पानी अग़र दूसरे घऱ की छत पर गिरने लगता है तो मार-काट मच जाती है वहीँ घरेलु हिंसा और   “विवाह में  बलात्कार चाहे वो पति करे, देवर करे या ससुर करे ) का नाम सामने आने पर लोग इसे “दूसरे के घऱ की बात” कहकर चुप करवा देते हैं। असल में  इन सबके पीछे लोगों की धार्मिक अंधभक्ति काम करती है, आईये समझते हैं कैसे ?



किसी भी धर्म में  सबसे अधिक आस्था(या अंधभक्ति?)औरतें  ही रखती हैं और वहीँ  धर्म का सबसे आसान शिकार भी  बनती हैं। इसी की वज़ह से कठमुल्लों और पंडों ने करवाचौथ जैसे व्रत और तीन-तलाक़ व हलाल निकाह जैसे अमानवीय नियम बनाकर पुरुषों की सत्ता को स्त्रियों पर थोप दिया है।  क्या हिन्दू क्या मुस्लिम बल्कि पुरे दक्षिण-एशिया में कोई भी ऐसी बीवी नहीं है जोकि  इन सब कुरीतियों पर आवाज़ उठाये। और सबसे बड़ी बात हमारे धर्मग्रंथों नें भी इन्हीं पुरुषसत्तात्मक कुरीतियों को प्रश्रय ही दिया है।  चलिए इसकी भी  थोड़ी सी झलकी  आपको दिखा देते हैं

उस आख़िरी दृश्य में अनारकली !


 मनुस्मृति (5.147-150)  के अनुसार, “पिता या पिता की आज्ञा से भाई चाहे जिस भी आदमी से तुम्हारी शादी करा दे उस की ज़िन्दगी  भर सेवा करो और उसके मारने के बाद भी धर्म का उल्लंघन  ना करों। ” इसी में   स्मृतिकार आगे कहता है कि, “अग़र पति विद्या-गुण आदि से हीन, शराबी, कदाचारी या दूसरी औरत के साथ सम्बन्ध रखता हो  तब भी पत्नी को उसकी सेवा देवता के समान  करनी चाहिए। पत्नी को कोई   भी व्रत, उपवास या यज्ञ अलग से करने की आवश्यकता नहीं है  क्योंकि वह पति की सेवा करने  से ही स्वर्ग में पूजित होती है।” ऐसे  स्मृतिकार तो औरतों को स्वर्ग का लालच किस तरह देते हैं ये देखिये,”जो स्त्री स्वर्ग जाना चाहती हो उसे अपने जीवित या मृत पति की इच्छा के विरुद्ध कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए।”


 और तो और ये धर्मग्रन्थ  औरतों को किस तरह से मानसिक ग़ुलाम बनातें हैं ये भी देखिये, मनुस्मृति (5.147-166) में स्मृतिकार कहता है कि “अपने हीन पति(Scrubbed Husband) को त्याग कर अन्य  श्रेष्ठ पुरुष को स्वीकार करने वाली  स्त्री इस संसार में निंदित होती हुई व्यभिचारिणी(Adulteress) कहलाती है। ऐसे कोई औरत  जो दूसरे आदमी से सम्बन्ध रखती है तो उसे कुष्ठ रोग(Leprosy) हो जाता है और अगले जन्म में वह गीदड़ी (Jackal ) के रूप में जन्म लेती है।”

 दरअसल, बचपन  से ही हमारे चेतन में धार्मिक प्रवित्तियां इतनी कूट-कूट कर भर दी  जाती हैं की अगर कोई पंडित ये कहे की ये गोबर नहीं गंणेश हैं तो हम भी वहीँ  मान बैठते हैं। हमारी महिलाएं तो इस मामले में और भी ज्यादा अन्धविश्वासी होती हैं वरना चन्द्रमा के किये की सज़ा अहिल्या को नहीं भुगतनी पड़ती और ना ही पांडवों के कर्मों का पाप द्रौपदी को भरी  सभा में निर्वस्त्र होकर झेलना पड़ता।

वास्तव में  जो पति दिनभर काम के बाद घऱ आता है तो वह पत्नी को For Granted Thing समझ लेता है और बिस्तर पर उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ रेप करता है {जिनको रेप शब्द पर आपत्ति है वे जान लें की सेक्स और रेप में वहीँ अंतर है जो किसी लड़की की  हाँ या ना में हैं , या यूँ कहें की ज़मीन या आसमान में है।} और पत्नी के कॉउन्टर-रिस्पांस न  देने पर ” साली ठण्डी है ”  कहता है और थप्पड़ लगाकर अपनी मर्दानगी साबित करता है।  और हमारी वहीँ  औरतें सुबह  कड़क सर्दी में उठकर,  पति की लंबी उम्र के लिए वट- सावित्री या एकादशी का व्रत करती हैं , और फिर से अपनी गृहस्थी में कोल्हू के बैल की तरह रम जाती हैं। और हम अंधे-बहरे लोग, “ये तो उनका आपस का मामला है” कहकर मुंह फेर लेते हैं।

  उपाय


“शिक्षा सभी रोगों की रामबाण दवा है”, मतलब  ये की जब तक हमारी स्कूल  की किताबों में ये लिखा रहेगा, “राजू विद्यालय जा”, “आनंद पढ़ाई कर”, “कमला कपड़े धो”,”किरण माँ की मदद कर” तब तक “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ”  के नारे खोखली लफ़्फ़ाज़ी ही साबित  होंगे क्योंकि आज भी हमारे देश के लगभग सभी बोर्डों की स्कूली किताबों में पुरुषसत्तात्मक सत्ता की साफ़ झलक देखने  को मिलती है। अग़र आपकी मेमोरी कमजोर ना हो तो{ आप कुछ ही दिनों में सब कुछ भूल जाते है,क्योंकि आपको न तो ईरोम शर्मीला का सोलह साल का अनशन याद  रहता है, न ही इशरत जहाँ की क़ुरबानी और ना ही सोनी सूरी पर हुआ अत्याचार }  आपको याद होगा कि कुछ ही महीने पहले महाराष्ट्र सरकार के  ग्यारहवीं की समाजशास्त्र की Text Book में ये कहा गया था कि कम गोरी या अपाहिज न लड़कियों के माता -पिता को अधिक दहेज देना पड़ता है और ऐसी  लड़कियों के पति भी उनसे प्यार नहीं  करते हैं। {अब ये मत कहियेगा कि ये तो भगवा या बानर दल वालों  की ही सोच है क्योंकि मैंने ऐसी घटिया सोच रखने वाले तथाकथित समाजवादियों को भी देखा है} ऐसे सोच वैसे लोग भी रखते हैं जिनका नारीमुक्ति  और नारीवाद का प्रश्न केवल लड़कियों के शॉर्ट्स पहनने, सिगरेट-शराब पीने , और पब में डांस करने तक ही सीमित  रह जाता है क्योंकि ये Elite Feminist समाज के निचले तबके तक  तक जा ही नहीं पाते हैं वरना ये देखते कि किस तरह गाँव में लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी गयी सरपंच की जगह उसका पति-देवर या भाई काम करता है।

 रंडी अश्लील शब्द है और फक धार्मिक (!) … पिंक के बहाने कुछ जरूरी सवाल

बहरहाल, चाहे “विवाह में बलात्कार ” हो या कोई और घरेलू हिंसा , उसे रोकने के लिए हमें पहली पाठशाला से ही लैंगिक समानता विषयक कविता, कहानियों और उदाहरणों को शामिल  करना होगा , और हाँ ये “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” वाली बात तो भूल ही जाईये क्योंकि इसका भी यहीं हश्र हुआ है जो रघुबीर सहाय जी  की कविता में है:-
“पढ़िए गीता
बनिए सीता
फिर इन सब में लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घर-बार बसाइए.

होंय कँटीली
आँखें गीली
लकड़ी सीली, तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइए.”

तो रेपिस्ट पतियों ये बात याद रखो कि पत्नी  सिर्फ हमबिस्तर नहीं बल्कि हमसफ़र होती है.
और आधी आबादी के लिए मेरा यहीं सन्देश है की
“तुम चुप रहकर जो सहती हो , तो क्या ये ज़माना बदला है.
तुम बोलोगी मुंह खोलोगी , तब ही तो ज़माना बदलेगा.


सन्दर्भ:  


1.”अस्मिताओं का संघर्ष : भारतीय संस्कृति का पुनर्लेखन ” , 
2. कमल किशोर कठेरिया , 
3. वाणी प्रकाशन-2016
4.   P. Venugopal:Different Forms of Violence and Harassment against Women, Indian Journal of       Criminology vol.29, 2001
5.   Ram Ahuja : Disquistional Criminology

लेखक का शीर्षक अनारकली ऑफ़ आरा फिल्म से साभार लिया गया है.
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 
दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर
अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.
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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 
 

उस आख़िरी दृश्य में अनारकली !

डिस्क्लेमर: इस फिल्म के साथ हालिया प्रदर्शित फिल्म पिंक और पार्च्ड की एकाधिक बार तुलना इसलिए कि ये सारी फ़िल्में स्त्रीवादी फ्रेम की दावेदारी रखती हैं. 

अनारकली ऑफ़ आरा एक सीधी रेखा की कहानी, कई बार जानी पहचानी कहानी पर बनी फिल्म है. फिल्म की केन्द्रीय घटना तो एक खबर का कथांतरण है-चर्चित गायिका देवी ने 2011 में बिहार के जेपी यूनिवर्सिटी छपरा के तत्कालीन कुलपति पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था. कहानी के परिवेश को थोड़ा खीच कर पीछे ले जाया जा सकता है, जब अलग-अलग अवसर पर नर्तकियों का नाच बिहार की संस्कृति में आम था. लेकिन क्या ख़ास है, जो अविनाश दास के लेखन और निर्देशन में बनी पहली ही फिल्म को बेहद खास बनाता है, पहली ही कृति के क्लासिक हो जाने की हद तक ख़ास.

मैं बहुत निर्मम दृष्टि लेकर फिल्म देखने गया था. ऐसा इसलिए भी कि अपने पास से बेहद पास से किसी साथी की कोई मार्क होती सफलता सामने आती है तो आप उत्सुकता, कौतुहल, अभिमान और कुछ-कुछ कठोर आलोचना के भाव से उस सफलता को देखते हैं. मुम्बई की ओर रुख करने के तीन-चार साल के भीतर अविनाश दास ने एक फिल्म हमारे सामने रख दी-निदेशन और लेखन के साथ तो स्वाभाविक है इन मिश्रित भावों के साथ इस घटना का स्वागत. इसी बीच ‘ ज़रा घिस ल, तनी रगड़ ल, ये दारोगा दुनलिया में जंग लागा हो’ जैसे गीत और कथित द्विअर्थी संवादों के टीजर सामने आ रहे थे, फिल्म भी नाचने-गाने के पेशे वाली एक स्त्री के इर्द-गिर्द बताई जा रही थी, फिर तो एक बात और स्वाभाविक थी -इसे देखते वक्त जाति और जेंडर की दृष्टि का केंद्र में होना. इस तरह सिनेमा देखने के निर्मम टूल से गुजरना था फिल्म को, उसके निदेशक, कथाकार, अभिनेत्री और अभिनेताओं को.  फिल्म निर्माण और उसके चलने की व्यावसायिक आवश्यकताओं के बीच रस्सी संतुलन की अपेक्षा तब और बढ़ जाती है, जब देश के सबसे संवेदनशील माने जाने वाले विश्वविद्यालय की प्रोडक्ट और देश की अलग-अलग घटनाओं पर अपनी बेबाक और प्रगतिशील राय रखने वाली अभिनेत्री इसकी लीड भूमिका में हो.
 ‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में (!)

पावरफुल इमेजरी (बिंब) जो फिल्म को ख़ास बनाते हैं:    

इसके पहले कि कैमरे की बोलती भाषा, जो स्पष्ट बिंबों के माध्यम से सामने आती है को पढ़ें, डिकोड करें एक संकेत की ओर ध्यान स्वतः रुक जाता है. आप फिल्म देखने के पहले तक तो गानों और कथित द्विअर्थी संवादों की सूचना से लोडेड भाव में होते हैं, कुछ और देखने-बूझने के इरादे में होते हैं कि पर्दे पर दुष्यंत की पंक्ति आपकी सोच को थोड़ा झटका देती है और आप सचेत हो जाते हैं कि आप जिस मानस से यहाँ फिल्म देखने आये हैं, उससे कुछ तो अलग दिखने वाला है. पंक्ति है:
  ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा 
                मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा. 
अब ज़रा कैमरे की भाषा और फिल्मकार के सचेत संकेतों को समझते हैं

प्रतिनायकों की जाति और जनेऊ (यज्ञोपवीत का धागा) का सन्देश 

फिल्म का पहला प्रतिनायक आरा के किसी कुबेर सिंह विश्वविद्यालय, जो संवादों में आरा का कुंवर सिंह विश्विद्यालय ही है, का कुलपति है. नाम के पीछे चौहान सरनेम लगा है, जिससे यदि जाति स्पष्ट नहीं हो तो उसे समझाने के लिए बार-बार उसके गले से लटकते जनेऊ पर फोकस करता कैमरा उसकी जाति स्पष्ट कर देता है- द्विज जातियों के बीच लोकेट कर देता है. प्रतिनायक के साथ ही दूसरा प्रतिनायक है थाने का थानेदार: जिसके कंधे से लगे नेम प्लेट पर कैमरे का फोकस सूचित करता है- बुलबुल पांडे.



नायिका के घर से झांकती वर्गीय और सामाजिक स्थिति 

फिल्म का एक ख़ास और बहुत देर तक बार-बार दिखने वाला लोकेशन है नायिका अनारकली का घर, जो है तो किसी रिहायशी इलाके में ही, कोठा नहीं है, लेकिन उसके घर का आँगन, छोटी-छोटी कोठरियां, चापानल, स्टोव पर बनता खाना, बिखरे-बेतरतीब सामान और नृत्य के साज-सामान- ये सब काफी हैं गायिका-नर्तकी के पेशे से गुजर बसर करने वाली नायिका की वर्गीय और सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करने के लिए, बहुत कुछ उसके नाम और उसके आस-पास के लोगों के नाम-काम से भी स्पष्ट हैं. और  उसकी मां की शादी के नाच के दौरान ह्त्या के बाद बेटी का भी इस पेशे में आने की विवशता, यानी पीढी-दर-पीढी सा चलन के साथ ही बेटी का पढाई इसलिए छोड़ना का स्कूल का मास्टर उसके गायिका की बेटी होने के कारण ही शायद, उससे अश्लील गाना सुनना चाहता है- इस सबके साथ दुष्यंत की पंक्ति काफी है नायिका की सामाजिक स्थिति और संघर्ष से दर्शकों को जोड़ देने के लिए.

 रंडी अश्लील शब्द है और फक धार्मिक (!) … पिंक के बहाने कुछ जरूरी सवाल

हीरामन की खोज 

तीसरी कसम फिल्म के नायक हीरामन का भोलापन तीसरी कसम फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है- तीसरी कसम के इस भोले और नन-डिमांडिंग आशिक की छाप दर्शकों पर अमिट पड़ती है यह चरित्र आज भी हिन्दी सिनेमा की मजबूत उपस्थिति है. इस फिल्म में भी एक हीरामन है, सातवें दशक के हीरामन सा ही भोला, लेकिन ग्रामीण नहीं स्लमवासी हीरामन !. नायिका के द्वारा पहली बार अपनी बांह पर छुअन के अहसास का आनंद लेते/ उसे याद करते हीरामन को एकाधिक बार देखना नायिका के प्रति उसकी मोह को स्पष्ट करता देता है. उसकी ‘छुअन’ के प्रति प्रतिक्रया शायद आपको हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास के नायक ‘रैक्व’ की पीठ पर स्त्री की छुअन के बाद की प्रतिक्रिया से जोड़ दे, यदि आपने ‘अनामदास का पोथा पढ़ा हो तो.’ और वह क्षण भी आप नोटिस करेंगे, जब भोगने या ऐन्द्रिक प्रेम के लिए अपने चारो ओर नाचते पुरुषों के बीच एक हीरामन को देखकर अनारकली उसके पाँव छू कर अपनी प्रतिक्रया देती है, सम्मान देती है.  ‘देश के खातिर’ के अपने टेक के साथ यह हीरामन भी यकीनन आपको फिल्म देखने के बहुत बाद तक याद रहेगा.

और अनारकली की  वह पदचाप, चेहरे का वह तोष 

फिल्म के अंत में अनारकली अपनी लड़ाई को अपनी नाच के तांडव भाव से क्लाइमेक्स तक ले जाती है, तांडव भाव के साथ उसका क्रोध, उसकी बदहवासी, उसकी पीड़ा लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के बाद तक जारी रहते हैं- लड़ाई के अंजाम के साथ वह अकेले निकल पड़ती है सड़कों पर, सडक जो अपने दृश्यों से किसी भी शहर के सिविल लाइन इलाके की सडक है- और अचानक से, झटके में वह इस तांडव भाव से
बाहर निकलती है, उसकी चाल बदल जाती है, उसकी  पदचाप भी और चेहरे पर पीड़ा की जगह तोष का भाव खिल जाता है- वह भाव बदले के भाव या जंग जीतने के भाव से अलग है, सारी चीजों से निकल आने का भाव और अपनी लड़ाई के अंजाम की पटकथा खुद लिखने का भाव, उसके आस-पास तब न उसका हीरामन है, न नया दोस्त अनवर और न कोई अन्य रखवाला- यहीं से यह फिल्म ‘नो’ कहने के महत्व को समझाने के लिए बनी कोर्ट रूम में अतिनाटकीय और अविश्वसनीय रूप से घटित होने वाली फिल्म ‘पिंक’ से कोसो आगे चली जाती है. पिंक फिल्म में मैंने मर्दाने या संरक्षक स्त्रीवाद की आलोचना करते हुए एक विस्तृत समीक्षा पहले लिखी थी- इस पूरे दृश्य में कैमरे की भाषा है और कैमरे के पीछे से संचालक का विवेक, जिसे स्वरा भास्कर के अभिनय ने बखूबी अभिव्यक्त किया है.


कहानी जानी-पहचानी होकर भी क्यों नई है? 


ऐसी कितनी कहानियां हम सबने देखी होंगी अलग-अलग फिल्मों में. एक नायिका, नाचने-गाने वाले परिवेश से, और उसे भोगने के लिए व्याकुल शक्तिशाली खलनायक के षड्यंत्रों और उनके खिलाफ नायिका के संघर्षों से आगे बढ़ती कहानी. उन फिल्मों में पीडिता नायिका होती है और उसके उद्धार के लिए एक प्रेमी होता है, एक नायक होता है. लेकिन अनारकली ऑफ़ आरा के इर्द-गिर्द प्रेमियों की जमात तो है, लेकिन उद्धारक की भूमिका वह उन्हें लेने नहीं देती, अपने हिस्से की लड़ाई वह खुद लड़ती है अंजाम तक-मर्द तो बहुत हैं, नाच-गाने के उसके लिए सट्टा ठीक करने वाला उसका आशिक रंगीला, हीरामन, उसका कमउम्र आशिक अनवर और कैसेट कंपनी का मालिक- सबके सब उसके मददगार हैं, लेकिन न कोई उद्धारक है, न उद्धार के लिए तत्पर, और न ही ऐसा स्पेस उन्हें अनारकली देती है. कहानी नायिका की एजेंसी को कर्तापन के भाव को बखूबी उभारती है. वह स्वीकार करती है कि ऐसा नहीं है कि नाचते-गाते हुए वह किसी के साथ संबंध बनाने से पूरी तरह परहेज करती हैं, लेकिन कोई बिना उसकी मर्जी के सरेआम उसकी बेइज्जती नहीं कर सकता है. यही कर्तापन इस फिल्म की कहानी को प्रचलित कहानियों से अलग करता है. कहानी का अंत एक सन्देश से होता है, ‘पत्नी के भी न कहने के अधिकार से’ और हाँ अंत प्रतिनायक की मौत या ह्त्या से नहीं उसकी संभावित गिरफ्तारी और उसके बहते आंसुओं के साथ होता है. पूरी फिल्म में दर्शक नायिका की पीड़ा से जबतक कि जुड़ता है और उसके प्रति किसी सहानुभूति भाव में आता है, नायिका पीडिता की बनती छवि से बाहर आ जाती है, बार-बार बाहर आ जाती है, अपनी लड़ाई में अपनी एजेंसी के साथ- बेचारा दर्शक भी उसके उद्धारकर्म में अपनी भूमिका नहीं निभा पाता.



आंचलिकता के बावजूद संप्रेषणीयता


फिल्म अपने नाम, अपने कथा-परिवेश, फिल्मांकन और संवाद के स्तर पर आंचलिक है. उसके द्विअर्थी संवादों को समझने के लिए भी उस अंचल की भाषा को समझना जरूरी है. लेकिन कुछ तो दृश्य माध्यमों की अपनी ताकत के कारण और कुछ आंचलिक भाषा के बीच से संवाद की संप्रेषणीयता के कारण दर्शक शायद ही कहीं खुद को डिटैच महसूस कर पाता होगा. फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ की क्षमता को जो समझता है, वह इसे भी समझ सकता है.

न विक्टिमाइजेशन, और न देह राग 

इस फिल्म की खासियत है कि इसमें कथाकार और निदेशक का दूसराभाव (अदरनेस) शायद ही कहीं हावी हुआ है, निश्चित तौर पर वह इस चरित्र के लिए अदर है, लेकिन उसका अदर होना इस फिल्म को कहीं प्रभावित करता नहीं दिखता. नायिका का न तो कहीं विक्टिमाइजेशन है, अति पीडिता की छवि है, और न ही कहीं उसकी देह की अतिकेंद्रियता या दैहिक अंतरंगता के लम्बे प्रसंग- ये सारे तत्व ऐसी थीम पर बनी फिल्मों में बहुधा पाये जाते हैं. इन तत्वों के होने या सायास उन्हें लाने से महिला निदेशक भी नहीं बच पाती हैं, हालिया प्रदर्शित फिल्म पार्च्ड इसका एक उदाहरण है.

अभेनित्रियों की उपस्थिति 


यह फिल्म बॉलीवुड में नायिकाओं की बढ़ती ताकत का भी एक उदाहरण है, जो अपने अभिनय के बल पर नायक विहीन सफल फ़िल्में दे रही है. स्वरा भास्कर फिल्म की नायिका के रूप में अप्रतिम है. फिल्म का अभिनय पक्ष काफी मजबूत है- जो सभी चरित्रों के हिस्से से एक समान सच है. मुझे अनारकली (स्वरा के अभिनय से उभरी अनारकली) में वे नायिकायें दिखाई दे रही थीं, जिनसे अपने शोध के दौरान मैं मिला था- नाच-गाने और देह व्यापार से जुडी महिलायें- उस आख़िरी दृश्य में भी जब अपनी अस्मिता के सम्पूर्ण बोध के साथ अनारकली सडक पर अपादमस्तक अकेली थिरक सी उठती है.
और अंत में गीत. सच में इस फिल्म के गीत इसकी जान हैं. एक गायिका की कहानी में जिसका होना जरूरी भी है. एक गीत साथी डा. सागर ने भी लिखा है, अपने चिरपरिचित अंदाज का श्रृंगार गीत.

पुनश्च 


अनारकली यानी बाई जी


‘बाई जी’ (अनारकली)के बारे में तो बचपन में बहुत पहले सुन लिया था, जब लोग दुर्गापूजा के आयोजन के लिए गाँव के लिए बाई जी बुलाने की तैयारी करते, गाँव में कभी बाई जी नहीं आई-लौंडा नाच या वीसीआर रिकार्ड से काम चलाया गया. सबसे स्पष्ट और बाई जी की यौनिकता पर सीधा प्रहार करते हुए घटना का जिक्र सुना शहर में सातवीं-आठवीं में, जब पान की दुकान पर पता चला कि पड़ोस के विधायक जी के परिवार के लोगों ने ‘बाई जी’ लोगों को बुलाया था- नाच के दौरान और तथा नाच के बाद रात भर तंग करते रहे-प्राइवेट पार्ट को टच, चोट आदि, आदि -बाई जी रोते -रोते गईं थीं. आगे चलकर यह भी सुना कि मध्य बिहार के एक बाहुबली ने एक बाई जी से शादी कर ली-हालांकि बाद के दिनों में उन्हें घर में सम्मानित देखा, मोहल्ले में दबंग. फिर एम.फिल के रिसर्च के दौरान ‘बाई जी’, यानी नाचने वाली महिलाओं से उनके कोठे पर मिला और देह व्यापार करने वालियों से भी. जिनसे मिला, उनमें से कुछ सिन्दूर लगाती थीं, उनके बच्चे पढ़-लिख रहे थे और वे रोज मुजरा करतीं अपने कोठे पर.


एक कहानी भी पढ़ी हरि भटनागर  की इन दिनों ‘मुसुआ’. कहानी का अंत एक किशोर होते बच्चे ‘मुसुआ’ के द्वारा अपनी बाई जी से बदला लेने के साथ होता है, वह उनका टहलुआ होता है, रोज उनकी देह टिपता है, पाँव- पीठ, जांघ-कभी वासनात्मक सोच नहीं होती उसके मन में- लेकिन किसी दिन अपने एक अपमान का बदला लेने के लिए वह उनके लहंगे में ‘मूस’ डाल देता है- बाई जी पीड़ा से कराहती हैं और वह ताली बजाकर हंसता है.
बाई जी की पहली घटना और कहानी में बाई जी के साथ मुसुआ का बदला-‘बाई जी’ की यौनिकता पर मर्दाने हमले से जुड़े हैं, कमोवेश एक जैसे. हालांकि मुसुआ की बाई जी दबंग हैं, मेरे शोध की बाई जी लोगों की तरह या बाहुबली की पत्नी की तरह- पीड़ा के उनके अपने प्रसंग होंगे विधायक जी वाली घटना की बाई जी की तरह, लेकिन अधिकाँश मामले में लोगों के साथ व्यवहार करते हुए वे दबंग होती जाती हैं और अपनी अस्मिता के प्रति सचेत और यौनिकता के प्रति अपने नियन्त्रण बोध से भरी भी- इसके उदाहरण कोठों के इलाके से घूमते हुए कई बार आपको मिल सकते हैं, जब बुलंद आवाज में बाई जी लोग किसी-किसी ‘मर्द’ को डपटती आपको मिल जायेंगी.

और एक बाई जी अनारकली ऑफ़ आरा के रूप में भी है स्क्रीन पर. वह दबंग, बोल्ड और अपनी वजूद पर अधिकार बोध से भरी है- वह गालियाँ गाती जरूर है, विधायक जी के परिवार जैसे गलीजों से निपटना भी जानती है- हालांकि इस फिल्म का प्रतिनायक विधायक नहीं, कोई पारम्परिक लफंगा नहीं- एक बड़ा भारी शिक्षाविद है, शिक्षा का अफसर!

संजीव चंदन स्त्रीकाल के संपादक है 
संपर्क :8130284314 


स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर
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क्या इसे ही जंगलराज कहते है योगी जी

योगी जी इधर आप रोमियो स्क्वैड बना रहे हैं  उधर आपके राज्य के दबंग बलात्कार पीडिता को तेज़ाब पिला रहे हैं. क्या इसी को जंगलराज कहते हैं….? 

गैंग-रेप, एसिड अटैक और अब दबंगों ने सरेआम पिलाया तेजाब, शीरोज की सदस्य विमला गंभीर हालत में केजीएमयू में भर्ती.


एसिड अटैक सर्वाइवर्स द्वारा चलाए जा रहे कैफे शीरोज हैंगआउट की सदस्य विमला को 23 मार्च को  कुछ दबंगों ने लखनऊ के मोहनलालगंज स्टेशन के पास चलती ट्रेन में जबरन तेजाब पिलाकर मारने की कोशिश की. विमला गंभीर हालत में लखनऊ की किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में एडिमट हैं. मौके पर मौजूद जीआरपी ने विमला पर हुए इस हमले की जानकारी कैफे शीरोज की लखनऊ शाखा को दी है. अपनी बेटी को हाईस्कूल की परीक्षा दिलाने के लिये विमला 10 मार्च को कैफे से छुट्टी लेकर घर गई थीं. आज वे रायबरेली से वापस लखनऊ लौट रही थीं और इसी की जानकारी पाकर अपराधियों ने विमला पर चलती ट्रेन मे हमला कर दिया.

अगर पुलिस पहले दर्ज किये गए मामलों में कोई कानूनी कार्यवाही करती तो शायद इस घटना को बचाया जा सकता है. विमला पर इससे पहले भी चार बार अलग अलग हमले कराए गए हैं जिनकी एफआईआर दर्ज होने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गई. फिलहाल पुलिस ने भरोषा दिया है कि विमला के परिवार को सुरक्षा दी जाएगी और उनकी बेटी को कल हाईस्कूल की परीक्षा दिलाने के लिये पुलिस मौजूद होगी और सीधे उन्हे लखनऊ में किसी सुरक्षित जगह लाया जाएगा.

कौन हैं विमला


विमला एक बहादुर महिला हैं जो सभी ओर से बेरूखी झेलने के बाद भी अपनी लड़ाई लड़ रही हैं. 2009 में उनके गांव के ही कुछ दबंगों ने उनके साथ गैंगरेप किया और धमकी दी कि अगर उन्होने कानूनी कार्यवाही की तो जान गंवानी पड़ेगी. विमला ने रायबरेली जिले के ऊंचाहार थाने में इस बारे में सूचना दी हालाकि पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की. विमला की कोशिशों से एक लंबे समय बाद एफआईआर लिखी गई. किसी की भी गिरफ्तारी नहीं हुई साथ ही दो सालों बाद 2011 में विमला पर चाकू से हमला किया गया. एक बार फिर, इस घटना की एफआईआर तो दर्ज हुई लेकिन आरोपियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. 2012 में भी विमला पर जानलेवा हमला किया गया और इस बारे में पुलिस फिर कुछ न कर सकी. विमला ने हिम्मत खो दी थी लेकिन वह कुछ लोगों की मदद से लड़ती रही. 2013 में विमला पर उन्ही दबंगों ने एसिड अटैक कर दिया जिससे उनका शरीर बुरी तरह झुलस गया.

इस बीच विमला की जंग जारी रही. कभी वो लोग विमला को बयान देने से रोकते थे तो कभी उसे और उसके बच्चों को जान से मार देने की धमकी देते थे. कुछ समय छिपते छिपाते विमला अपनी लड़ाई लड़ती रहीं और 2016 में उन्होने कैफे शीरोज हैंगआउट के रीच-आउट एंड वेलफेअर विभाग से संपर्क किया. विमला को कैफे पर बतौर सहायक मैनेजर नियुक्त कर छांव फाउंडेशन ने उनकी कानूनी लड़ाई में कार्यवाही शुरू की. इसकी सूचना पर उन दबंगों ने कैफे को भी लिखित धमकी पत्र भेजा जिसमे लिखा था- “सविनय निवेदन है कि विमला को अपनी कंपनी से निकाल दो या केस वापस करवा दो, अगर यह सब नहीं किया तो विमला के शरीर में खून नहीं तेजाब दौड़ेगा” इस धमकी के बाद कैंपेन टीम ने यूपी पुलिस से इस बारे में संपर्क कर कार्यवाही की अपील की. पुलिस अपना काम कर ही रही थी कि कुछ महीनों के भीतर आज सुबह घर से छुट्टी से लौट रही विमला को कुछ लोगों ने जबरन तेजाब पिला दिया जिससे उसके अंदरूनी अंग बुरी तरह झुलस गए हैं. विमला की हालत अभी नाजुक है और वे कुछ भी बोल नहीं पा रही हैं.

इस घटना के बाद शीरोज भी डर गई हैं 

कैफे शीरोज से जुड़ी सभी एसिड अटैक सर्वाइवर्स, जो सर्वाइवर से बेहतर शीरोज (SHE+Heroes) कहलाना पसंद करती हैं, इस घटना के बाद पहली बार डरा हुआ और अकेला महसूस कर रही हैं. इस बारे में एक वीडियो बयान जारी कर (लिंक- bit.ly/HelpVimla) कैंपेनर लक्ष्मी ने लोगों से इस घटना को नवनियुक्त मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मंत्री महिला एवं बाल विकास रीता बहुगुणा जोशी से अपील की है कि वे जल्द से जल्द इस मामले में अपराधियों पर कार्यवाही करवाने की कोशिश करें. साथ ही विमला और उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराने के लिये भी सोशल मीडिया पर एक कैंपेन चलाया जा रहा है.

पुलिस ने दिलाया है कार्यवाही का भरोसा 

घटना की जानकारी पाकर एसएसपी मंजिल सैनी, एसपी रायबरेली, एसपी नार्थ लखनऊ आज कैफे शीरोज हैंगआउट पहुचे और मामले की पूरी जानकारी लेकर कार्यवाही का आश्वासन दिया है. साथ ही इस बारे में आश्वस्त भी किया है कि विमला की बेटी बिना किसी डर के अपने हाईस्कूल का इम्तेहान दे सकेगी और फिर उसे लखनऊ लाकर किसी सुरक्षित स्थान पर रखा जाएगा.सूचना मिलने तक पुलिस अपराधियों का पता नहीं लगा सकी है और इस घटना से जुड़े किसी भी हमलावर का पता नहीं चल पाया है.

किसी भी सूचना के लिये नीचे दिये नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है-
9717900302, 9958066951, 7052957657

उपासना झा के फेसबुक वाल से साभार 

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शैली किरण की कविताएँ

शैली किरण


प्रवक्ता, हिंदी राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला धनेटा, संपर्क:Shellykiran72@gmail.com

1

सुनो मित्र, मेरे अन्तर्मन की….

मुझे नहीं बनना तुम्हारी रोल माडल,
मुझे नहीं सजना किंगफ़िशर के कैलेंडर पर,
मुझे नहीं चाहिए,तुम्हारे प्रेम अश्वाशन,

मुझे नहीं बनना वनवास पाने को सीता,
मुझे नहीं बँटने के लिए होना द्रोपदी,
मुझे नहीं होना मीरा ,तुम्हारी स्तुति पाने को,

मैं ख़ुश हूँ,
प्रकृति होकर,हँसकर ,रोकर,
कुछ नहीं पाना मुझे,
तुम्हारे विचार तुम्हारी संस्कृति ढोकर,

मित्रता का अर्थ है,स्वीकार्य,
स्वतंत्रता का सम्मान,
मैं दोस्त हूँ तो इंसान मुझे,
बराबर हर स्तर पर मान..।

2


बीमारी ..
बीमारी एक कला फ़िल्म है,
ब्लैक एंड वाइट ,
जिसका अंत लेखक नहीं,
निर्देशक तय करता है ।
बीमारी एक गीत है,
शोक गीत,
अनचाहा अलाप,
जिसकी तान ,
गीतकार नहीं,
संगतकार तय करता है ,
बीमारी एक खरपतवार है,
विचार का कुपोषण,
जिसका बढ़ना ,
किसान नहीं,
मौसम तय करता है,
बाहर सब समान्य है,
भीतर टूट रहा होता है जीवन,
दीमक की तरह,
शोर नहीं करती बीमारी,
पर बीमार हो जाता है खोखला ।



3

सुनो साथी,
खंड खंड टूटेंगे,
वो जुगत लगाकर तोड़ेंगे,
हम अमीबा की तरह,
बढ़ेंगे,
जितना तोड़ेंगे,
उतना बढ़ेंगे,
वे रक्तबीज कहकर,
उपहास करेंगे,
हम अणु अणु,
बिखर विध्वंस रचेंगे,
ये दुनिया ख़ूबसूरत होगी,
इक दिन,
जागती आँख से,
हम कीड़े मकोड़े,
मकड़ी के विरुद्ध,
जाल बुनेगे..!

4


सुनो प्रिय,
जब मैं कहती हूँ,
लौट जाओ,
उस वक़्त भी,
राह तुम्हारी ताक रही होती हूँ,,
गिनकर क़दमों की आहट,
खिड़की से झाँक रही होती हूँ,,
तुमने कहा प्रेम,
और खो गए उसमें,
हो गए मौन,
मैं तलाश करने लगी वजूद,
समझ स्वयं को गौण,
और एक दिन समझ आया,
तुम प्रेम हो,
नहीं हो साया,,!
प्रेम करता है स्वतंत्र,
करता नहीं पराया,,!

5


सुनो सखी,
तुमसे बात करने को,
आज शब्द नहीं मेरे पास,
मन को यूँ समझा लेना,,
बस ये की अनंत शून्य,
पूरा करने ख़ुद को,
निगल जाता है,
कई सूर्य और चंद्रमा,
बस अमावस की रात में,
तारों सी टिमटिमा लेना,
आसमा की बाँहों में सर धर,
आँसू बहा लेना !
हम औरतें सुख की चाबी,
तलाश करती है तमाम उम्र,
पर दुःख का ताला,
हमारी क़िस्मत का दरवाज़ा,उसके भीतर क्रांति है,

6


गरीब ने दूसरे गरीब की थाली ,
ईर्ष्या से देखी,
बादशाह की थाली,
देखने की हिम्मत,
किसी में नहीं थी,
संत्री ने मंत्री की थाली देखी,
और थूक दिया रसोइये पर,
मंत्री पर थूकने की हिम्मत,
किसी में नहीं थी,
बादशाह बदले ,
प्रजा नहीं,
थाली में युगों परोसा गया ताज,
सब मूक घृणा में जले,
क्योंकि बलिदान की आग में,
जलने की हिम्मत किसी में नहीं थी.




सुनो प्रिय,
प्रेम और महत्वाकांक्षा में,
जब द्वंद्व हो,
तुम महत्वाकांक्षा चुनना,
क्योंकि मैं सदियों से,
प्रेम चुनते आई हूँ ।
पलकों के करघे पर,
रेशमी सपने,
आँसुओं की बाढ़ में,
बुनते आई हूँ,,।सुनो प्रिय,
प्रेम और महत्वाकांक्षा में,
जब द्वंद्व हो,
तुम महत्वाकांक्षा चुनना,
क्योंकि मैं सदियों से,
प्रेम चुनते आई हूँ ।
पलकों के करघे पर,
रेशमी सपने,
आँसुओं की बाढ़ में,
बुनते आई हूँ,,.

8


सुनो प्रिय,
शिकायतों की एक पोटली है,
मेरे पास,
जिसे तुम्हें दिखाना है,
पर जग से छिपाना है,
जैसे बचपन में सुंदर कंचे,
रखने पडते थे,
छिपाकर सबकी नज़र से,
जैसे बचपन में इकठ्ठा रेजगारी समेटे,
बचा ली गुल्लक मँहगाई के असर से,
जैसे माँ छिपाकर रखती थी,
कँवलनयन काजल की डिब्बी,
और लिपस्टिक ,
बचा जाती थीं दीवारें,
रंगीन तस्वीरों से,
जैसे बची रहती थी,
पेसिंल छीलने के बाद,
जियोमैटरी बाक्स में,
छील से बनी कलाकृतियाँ,
चाक के छोटे टुकड़े,
हो सकता है,इक उम्र में,
जज्बात हो जाते हैं कचरा,
बढप्पन निगल जाता है बचपना,
गंभीरता का चश्मा,
देखने लगता है,
सबकुछ साफ़ ,
चाहता है सबकुछ संपूर्ण,
सब हो उजला,
पर फिर भी लिखना,
एक बचकाना प्रेम पत्र,
किसी दिन शिकायतों की पोटली खोलेंगे,
गुड्डी गुड्डे के साथ घर घर खेलेंगे.

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कुमकुम में लिपटी औरते

सुनीता झाड़े


सुनीता झाड़े मराठी और हिन्दी में कविताएँ  लिखती हैं  तीन मराठी कविता संग्रह प्रकाशित संपर्क: commonwomen@gmail.com



एक

डोर बेल बजाने के
कोई तीसरी चौथी बार में
दीक्षित भाभी दरवाजा खोलती हैं
पहली नजर में दिखाई देता है
माथे पर जोर से लगाया कुमकुम
कुछ रूठ कर हाथ पांव फैलाता हुआ
भीगी पलकें, झुकीं ऑंखें….

किसी और के आने की आहट सुन
अंदर जाकर सारे रंगों को
मलकर निकालती हुई
अपनी धवल काया के साथ
अपने घर के दीवान-ए-खास पर बैठती
दीक्षित  भाभी…
कुछ पूछती नहीं
फिर भी कराह कर कहती
बहुत मन करता है
कुमकुम लगाने को
अभी तो कोई बुलाता भी नहीं
घर में भी कोई नहीं लगाता
सब टालते हैं
वैधव्य मानो छूत की बीमारी हो कोई….

बाद तुम्हारे


दो

वह अपने आपको
थ्री फोर्थ पेंट-टी शर्ट में ढाले
अपने मंहगे से सोफा सेट पर
पैरों को यूं फैला बैठी…
फिर अपनी रुआंसी आवाज को
हौले से थाम
हाथों से बतियाते
‘भाभी के यहां हो आई
… पुजा प्रसाद के लिए
बुलाया था
वहां उनकी दूर की बहन
कुमकुम लगाने आई
तब उन्होंने सबके सामने कहा
उन्हे कुमकुम ना लगाना सखी

उन्हें क्या लगा?
क्या मैं उनकी कुमकुम की मोहताज हूं
मैं अपने घर नहीं लगा सकती
देखो,
पुजाघर में रखे कुमकुम को
आड़े हाथों माथे पर फैलाये  रक्त..रक्त…


हम गुनाहगार औरतें और अन्य 

तीन

देर रात उसके मुंह से आनेवाली
शराब की बू को टालते
धीरे से उसके गले से नीचे उतर
बाहों में…
फिर सीने पर माथा टेकती
उसी मन्नत के साथ
सुनो,
(उसकी नशे में डूबी उंगलियों को माथे से छूआते…)
मुझे यहां माथे पर कुमकुम लगाना बहुत अच्छा लगता है
मेरी इसी चाह के लिए ही सही
तुम यूं शराब पीकर खुद को मारना छोडो…
.
.
.
उसके तकिये के करीब सीमोन द बोउआर की *सेकंड सोच.!

(सीमोन द बोउआर की मुल किताब का नाम ’सेकंड सेक्स’)

महाराष्ट्र के हर घर में हर दिन पुजा के समय, हर त्योहार में माथे पर हल्दी कुमकुम
लगाने की प्रथा है. इस प्रथा में घर की सुहागने ही शामिल  होती है. उन्ही को यह सम्मान दिया जाता है. बाकी जिनके पति नही है, छोड गये है, या छोड दिया गया है उनको यह सम्मान ना देकर अपमानित किया जाता है. सारे शुभ कार्य में उनको बडे ही अभद्र व्यवहार का सामना करना पडता है. उपर तीनो कविताओं की नायिका ऐसे ही मराठी घरों में से है…

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राष्ट्रपति, क्या कुलपति के खिलाफ कार्रवाई करने वाले हैं!

स्त्रीकाल डेस्क 


कार्य स्थलों पर महिला कर्मियों के यौन  उत्पीडन को लेकर 2013 में क़ानून बना. इसके पहले कार्यस्थलों पर यौन  उत्पीड़न के प्रसंग में 1997 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशाखा बनाम राजस्थान बनाम सरकार के मामले में दिये गये दिशानिर्देश का अनुसरण किया जाता था, जिसे  विशाखा गाइडलाइन  भी कहा जाता है. 2013 में बना क़ानून कार्यस्थलों पर यौन उत्पीडन के मामले में बहुत स्पष्ट प्रावधान करता है. उसके प्रावधानों  में धारा 16 के अनुसार शिकायतकर्ता पीडिता के नाम, उसकी पहचान आदि को जांच के दौरान जांच समिति या नियोक्ता जाहिर नहीं कर सकता है. यदि ऐसा वह करता है तो धारा 17 में उसपर स्पष्ट कार्रवाई का प्रावधान है.

देखें धारा 16-17 के प्रावधान : 

 

पूरा क़ानून पढने के लिए  क्लिक करें : कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न क़ानून 

गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा ( केन्द्रीय विश्वविद्यालय) के कुलसचिव के हस्ताक्षर से उसकी वेब साईट पर एक नोटिस लगी. यह नोटिस चीनी छात्राओं द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप पर विश्वविद्यालय के  एक असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के निलंबन की है.  एक्ट की धारा 16 कहती है कि पीडिता का नाम और पहचान जांच चलने तक उजागर नहीं करना चाहिए , जबकि इस नोटिस में पीड़िताओं  नाम स्पष्ट रूप से जाहिर किये गये हैं.
देखें तस्वीर, इसे विश्वविद्यालय यदि हटाती भी है तो भी 48 घंटे से यह वहाँ बना हुआ है, स्क्रीनशॉट स्त्रीकाल के पास है. यहाँ दी गई तस्वीर में पीड़िताओं के नाम ब्लैक कर दिये गये हैं.

अब सवाल है कि यदि क़ानून का उल्लंघन विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारी कर रहे हैं  तो धारा 17, जो ऐसा करने वाले को दण्डित करने का प्रावधान करती है का अनुपालन कौन करेगा. कुलपति का नियोक्ता भारत के राष्ट्रपति होते हैं, तो क्या राष्ट्रपति कुलपति और अन्य शीर्ष अधिकारियों पर कार्रवाई करने वाले हैं? लेकिन राष्ट्रपति मानवसंसाधन विकास मंत्री की अनुशंसा पर काम करते हैं, तो क्या देश के मानवसंसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर ऐसी अनुशंसा करने वाले हैं?  क्या विदेशमंत्री सुषमा स्वराज पीडिता के विदेशी होने के कारण कानूनी कार्रवाई के लिए हस्तक्षेप करेंगी ! सवाल है कि क्या सरकार अपने क़ानून का उल्लंघन करने वाले शीर्ष अधिकारियों का न सिर्फ बचाव करने से बचेगी, बल्कि क्या एक विदेशी छात्रा के उत्पीडन के मामले में अधिकारियों को दंडित करने की मिसाल कायम करेगी?

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कमल कुमार की कविताएं

कमल कुमार

कहानी, उपन्यास, कविता, आलोचना, स्त्री-विमर्शआदि पर 35 पुस्तकें प्रकाशित . सम्पर्क : kamalxyz@hotmail.com

जीवन से भिड़ंत की कविता

मैं मुक्तिबोध नहीं, न ही शैलेश मटियानी हूं
मैं न ‘वाम’ मैं न दक्षिण में और केंद्र में भी नहीं
विषमताओं, विरोधों, असंगतियों से संघर्ष
जीवन राग बन गया है कविता में
तभी कविता में मेरा चेहरा मुरझाया नहीं
भयावह भी नही हुआ खुरदरे कंटीले यथार्थ में
ताकि असहाय न हो जाए जीवन/
कथा साहित्य में पात्रों के अन्याय और उत्पीड़न को
अपने अन्तःकरण में सोख लिया
उसकी रचनात्मक पुनरावृत्ति में
वह सघन, उदार और विस्तृत हो गया/
साहित्य की भी राजनीति है/यहां है
बड़े शिरोमणि, मठाधीश और माफिया के सरगना
हाशिये पर खिसका देते है लिखे को
पर मैं जीतने की दौड़ में भी नहीं
आस्थावान मैं ‘आत्मा के ताप’ से संचालित
रचनाकर्म अपनी निरंतरता में क्रमशः रहें
इसी आंकाक्षा के साथ अग्रसर हूं
‘रजा’ का केंद्र ‘बिंदु’ है और मेरा भी
रच रही हूं शब्दों में जीवन की ज्यामिति/
अब नहीं रहा काल या इतिहास में सब्र पारखी का
समय की आंधी उड़ा ले जाएगी सभी/
‘मुट्ठियों में मठाधीशों’ की बचा रह जाए शायद/
आलोचकों की चर्चा में बनती है श्रेष्ठ कविता
कविता का ‘श्रेष्ठ’ धुंधलाने को विवश है.
बाज़ार ही करेगा चुनाव/कवि के सार्वजनिक सरोकारों का
कविता भी तो अब ‘फिनिश्ड प्रोडेक्ट’ है
आसानी से पहुंच जाती है पाठकों के बाज़ार में
आलोचकों को विमर्श में सभाओं और संस्थानों में
होने को सम्मानित और पुरस्कृत/
अपने समय और स्थितियों से घिरी
जीवन से भिड़ंत की कविता रच रही हूं मैं..

अल्बेयर कामू!

कामू, आप चिंतक, विचारक, लेखक पत्रकार थे
नाटककार, निदेशक, नोबेल पुरूस्कार विजेता भी!
परंतु आपके मित्र सात्रे ने, आलोचको ने क्या किया?
विद्धेष और उपेक्षा की राजनीति के बीच
आपको अपनों और दूसरों ने गलत ही समझा
शायद वक्त से पहले कह दिया था आपने.
आप जानते थे सत्ताएं क्रांति नहीं दमन से

अपनी सर्वज्ञता स्थापित करती है
एक विजयी और सफल नेता के पीछे
असंख्य जनों की विफलता और पराभव होता है/
स्वंतत्रता और समानता का पाठ
माक्र्स ने नहीं भूख और गरीबी ने पढ़ाया था
साहित्यकार ही उठाता है आवाज़
निरंकुश सत्ताधारियों के विरोध में.
‘ओशो’ की तरह समझा था जीवन को
तनी हुई रस्सी पर संतुलन साधकर
अनिश्चय की ओर आगे बढ़ते जाना है
आपने झेला था अभाव को बीमारी को उत्पीड़न को
पर अल्जीरिया जन्मभूमि की उदार प्रकृति
समुद्र की लहरों, नीले आकाश, धूप हरियाली ने
आपकी आत्मा को मुक्त कर दिया था
सकारात्मक सोच ने कुंठाओं से परे
मानवीय आस्था का असीम आकाश दिया था.
उस कार दुर्घटना में ‘पहले आदमी’ के
अधूरे पन्नों के बीच मृत मिले थे
कामू आप पहले नहीं
अपनी तरह के आखिरी आदमी भी थे!
नहीं, आप जानते थे समय सब मिटा देता है
तो भी इस दुनिया में सब वैसे ही चलता रहता है.
आपने जाना था, कोई सत्यपूर्ण नहीं होता
न कोई अभिव्यक्ति अंतिम होती है
कांच के टुकड़ों को जोड़ने जैसा होता है सच!
अपने को जानते है हम अपनी असफलताओं में
जीवन की अनिश्चित स्थितियों में
यह सीखा था आपने फुटबाॅल के खेल में
गेंद कभी हमारी चाही दिशा में नहीं आती
यह अनुभव जीवन का दिशा निर्देश करते रहे.
बचपन में ही ‘धार’ लिया था ‘लेखक बनूंगा’
शब्द ही शक्ति बनेंगे मेरे सत्य की
मेरी पीड़ा और त्रासदियों से मुुक्त करेगें
उम्र के पहले पड़ाव पर लेखक बन गये थे.
उस छोटे से कमरे में आसपास की दुगन्र्ध से बेपरवाह
छोटी सी खिड़की के सामने देखते थे
बच्चों की चिलूपों में लड़खड़ाते बीमार को
सड़क पार करते- और अपने अकेलेपन को/
उस अकेलेपन ने आपको कभी अकेला नहीं किया
एक बड़े मानवता के घेरे में बांध दिया

ले गया आपसे नियति, मनन चिंतन की ओर
सिद्ध कर सके थे सृजन का रास्ता
अकेला है पर अकेलेपन का नहीं
लालटेन की मद्धम और शब्दों के उजाले में
सपने को तर्क में और कल्पना को सच में बदलते देखा था/
कामू! हिंदू दर्शन को समझ गये थे
ग्रेनिये से प्रेरित हुए थे शासद!
शब्द स्वयं प्रकाशित, स्वयं सिद्ध, भविष्य के महान शून्य में
काल की सीमाओं के पार ज्योति आवृत्त अस्तित्व है-ओइम्
क्षितिज के पार महाकाश दृश्य हो गया था
एक भीतरी महोत्सव में प्रकृति के रहस्य खुल गये थे
‘मैं नहीं’ ‘बस तुम हो’, ‘तुम मुझमें हो’ ‘तत्वाससि’
बीईग एण्ड नंथिगनेस!
एक अटूटविश्वास मैं जीऊंगा और लिखूंगा.
मेरी अभिव्यक्ति मेरे अपराधों की स्वीकृति है
कड़वे अनुभवों के अंगूरों को कुचल कर निकला अमृत है
इससे मानवता के प्रति असीम करूणा है
जीवन के अधूरेपन को पूर्णता की ओर ले जाती है.
‘द रिबेल’-सत्ता की दमन क्रांति का मुखौटा पहनता है
एक विस्फोट ‘बस और नहीं.’
बर्फीले तूफानों में भीतरी धूप की आंच थी
पहाड़ों पर जो वृक्ष सहजते हैं  बर्फीली हवाएं
उनमें खिलते है सुन्दर फूल और लगते हैं बादाम.
अपनी आस्था और विश्वास से
कुछ भी उपलब्ध किया जा सकता है
‘मैं सोचता हूं’ इसलिए मेरा अस्तित्व है
कथा का सुखद अंत नहीं-

जो कही जा रही है वही सच है-‘स्ट्रेज़र’
जीवन के विरोधाभासों और विडम्बनाओं में
स्थित होता है ‘केलीगुला’
गिरगिर कर उठना, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना
जीवन जीने योग्य है ‘मिथ आफ सिसिफस’
कामू स्वयं उतरे थे ‘द फाॅल में ‘डायरी’ के पन्नों में
चलता रहा सृजन कम निरंतरता में
जीवन के अंतिम क्षणों तक
नहीं रूदृ कर सका बीमार दुर्बल शरीर
पारिवारिक सामाजिक दुःख और संताप
आप जान गये थे अपने साथ
परंतु अपने से अलग होने को शब्दों के विमर्श को.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

भाषा बहता नीर

निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamai

मैं जब बड़ी हो रही थी तो मेरे आस -पास अनेक बोली और भाषा के रंग थे.मैथिली, मगही, बंगला, उर्दू, पंजाबी, तेलगू समेत बिहार के हर कोस पर बदल जाने वाली बोली हमारे बीच थी.हमसबों ने उसी परिवेश में रहते हुए कुछ भाषा बिना मेहनत किये सीख ली.जैसे बंगला, उर्दू और मैथिली, कुछ पंजाबी और कुछ तेलगू के शब्द.बंगला और उर्दू तो जैसे हमारे बीच की भाषा हो गयी.भाषा के संस्कार जेर, जबर, नुख्ता दुरुस्त हुए .ये सब इसलिए हुआ कि अलग-अलग भाषा, संस्कृति से जुड़े लोग एक ही मुहल्ले में साथ रहते थे.हमारे बीच भात और रोटी का साथ था.मां कोई सालन बनाती तो शबनम चाचा के घर भेजती , चच्ची गोश्त भेजती.उसी मुहल्ले में केरल से आकर बसे परिवार  से हमलोगों की गहरी दोस्ती थी.

रज्जी उस परिवार का बेटा और मैं उसकी दीदी थी और अरमान भाई हमसब के भाई.अरमान भाई को इस बात का मलाल वर्षो तक रहा कि मेरी वजह से मुहल्ले की सारी लड़कियों के  वो बहन हो गये थे.राखी के दिन हमारे अपने भाईयों से ज्यादा मुहल्ले के भाई थे जो बहनों की सुरक्षा में लगे रहते थे.कभी-कभी हमें खींज होती थी उनके भाई वाले रौब से .पर हम सीख रहे थे, जीवन के अनेक रंगों से घुल-मिल रहे थे.आज जब मैं अपने देश में भाषा को लेकर गहरी हो रही दीवार को देखती हूं तो लगता है कि हम किस रास्ते चल पड़े हैं .


हम कौन सी जुबान को अपना कहें, किसे पराया.सारी जुबानें हमारे देश के रगों में बह रही हैं.हिन्दी , उर्दू तो बहनें हैं.उसे कैसे अलग कर सकते हैं.मैंने उर्दू और बंगला का संस्कार अपने बचपन से पाया.अगर नसीम चाचा, शबनम चाचा और उस जुबान को बोलने वाली मेरी सहेलियां नहीं होतीं तो हमसब उर्दू की खुशबू से उसकी तहजीब से वाकिफ नहीं होते.मुझे याद है छुटपन में हम सारे दोस्त कभी शबनम चाचा तो कभी रज्जी के घर पडे रहते.हिन्दी, उर्दू, कन्नड, बंगला जुबान का घाल-मेल होता रहता.हमलोग खूब हंसते.अक्सर देर हो जाती तो चच्ची कहती अरे अपने घर जाओ.रात हो रही है.उनका कहना था बाज ;बुरी आत्मा बदरुहें बच्चों की शक्ल में निकलती हैं. बदरुहें हवा में चिरागों की तरह उड़ती हैं.हमारी बोउदी  कहती – तुमरा एकला जाबे ना, दादा संगे निये जाओ और काकी कहती भादों के पुर्नमासी रैत में आत्मा सब नाव पर सवार  घुमैत रहे छै.हम बच्चे थोड़ा डरते और थोडा आत्मा के रहस्यमयी दुनिया के असर में रहते. ये कितनी अनोखी बात थी कि एक ही तरह की चिंता सारी जुबान में थी.बंगला मैंने सबसे आसानी से सीखा .बंगला और मैथिली का स्क्रिप्ट एक ही है.भला हो उस समय का जिसमें सारी जुबानें एक दूसरे की कातिल नहीं दोस्त थीं, बहनें थीं.

ये जुबान हमारी रुहें हैं.इसी दौर में मैंने उर्दू  पढ़ा, बंगला  और मैथिली भी.उर्दू का स्क्रिप्ट नहीं सीख पाने का मलाल है मुझे .इस बात का गहरा अफसोस है कि मैं अपने देश की और जुबान नहीं सीख पायी.उर्दू से मुहब्बत हुई.फैज मेरे पंसदीदा शायर हैं.क्रांति और मुहब्बत से लबरेज उनकी नज्म हम जंवा दिलों पर राज करती थीं, आज भी करती हैं.मैेने उर्दू में लिखने वाले तमाम अफसानानिगार को पढ़ा.मंटो, इस्मत, कुर्रतुल-एन हैदर को पढ़ते हुए जाना कि जुबान और देश की मुक्तलिफ तहजीव को जाने बगैर आप ना तो बेहतर अफसानानिगार हो सकते हैं ना बेहतर इंसान.जब मैं कुर्रतुल एन हैदर को पढ़ती हूं तो लगता है कि उन्होंने अपने देश की संस्कृति को कितने बेहतर तरीके से समझा है.कितनी गहरायी है उनमें.अपनी एक कहानी में लंका का बयान जो उन्होंने किया वो क्या  बगैर अपनी संस्कृति को समझे लिखा जा सकता है.

वे लिखती हैं-‘समंदर के वस्त में एक पहाड़ है .उस पर ब्रह्मा ने एक मजबूत किला बनाया है.जो इंद्र के शहर अमरावती से भी ज्यादा खूबसूरत था जो लंका कहलाता था.उसके चारों ओर समंदरी पानी की खंदक थी और उसकी दीवारें सोने की थी.जिसमें हीरे जवाहरात जड़े थे.रावण ने उस लंका को अपनी राजधानी बनाया था.इशरत, दौलत, बेटे, अफवाज, फतहो-नुसरत, ताकत, जहानत, सबकुछ उसका था.ये कुर्रतुल एन हैदर ही लिख सकती हैं.जिनके लिए रामयण और कुराण अलग नहीं है.जिन्होंने दुनिया की सारी तहजीब, इतिहास और संस्कृति को समझा है.अब जो लोग भाषा को लेकर नफरत की दीवार खडे कर रहे हैं वे बतायें ये किसकी भाषा है? किसका तहजीब है? तुम कौन सा रंग चुनोगे हर रंग मुहब्बत का है.हर जुबान हमारी है, हर तहजीब में देश बसा है और हर  शब्द में महकतें हैं रंग-बिरंगी जुबां के फूल.

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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नीलेश झाल्टे  जलगाँव  स्थित  पत्रकार हैं  और  दैनिक  लोकमत  समाचार  से  जुड़े  हैं  . संपर्क: 9822721292

 

औरतें : अंतिम किस्त

एदुआर्दो गालेआनो / अनुवादक : पी. कुमार  मंगलम 

अनुवादक का नोट 

“Mujeres” (Women-औरतें) 2015 में आई थी। यहाँ गालेआनो की अलग-अलग किताबों और उनकी लेखनी के वो हिस्से शामिल किए गए जो औरतों की कहानी सुनाते हैं। उन औरतों की, जो इतिहास में जानी गईं और ज्यादातर उनकी भी जिनका प्रचलित इतिहास में जिक्र नहीं आता।  इन्हें  जो चीज जोड़ती है वह यह है कि  इन सब ने अपने समय और स्थिति में अपने लिए निर्धारित भूमिकाओं को कई तरह से नामंजूर किया।

उत्सव जो नहीं रहा


पातागोनिया के अर्जेंटीना में पड़ने वाले हिस्से के खेत-मजदूरों ने लम्बे होते काम के घंटों और लगातार छोटी पड़ती पगार के खिलाफ हड़ताल शुरू की थी। सेना ने तब हालात ‘ठीक’ करने का जिम्मा संभाल लिया था।
गोली चलाने से, जाहिर है, ‘थकान’ हो ही जाती है। 17 फरवरी, 1922 की उस रात हत्याएँ करने से थके सैनिक सान खुलियान बंदरगाह के वेश्याघर गए। वे वहाँ अपनी इस ‘मेहनत’ के बदले मिलने वाला ईनाम वसूलने गए थे।

औरतें

लेकिन, वहाँ काम करने वाली पाँचों औरतों ने देखते ही दरवाजे उनके मुहँ पर मारे थे और “हत्यारों, खूनियों, यहाँ से बाहर…” चीखते हुए इन सैनिकों को खदेड़ दिया था।
ओसवाल्दो बाइएर ने उन औरतों का नाम संभाल कर रखा है। उनके नाम थे: कोंसुएलो गार्सिया, आन्खेला फोर्तुनातो, आमालिया रोद्रीगेज़, मारिया खुलियाचे और माउद फ़ॉस्टर।
रंडियाँ! गैरत वालियाँ!



औरतें-क़िस्त दो (स्पेनिश कहानियाँ )


 लूई


मैं वह जानना चाहती हूँ, जो वे जानते हैं-उसने कहा।उसके साथ देश-निकाला भुगत रहे साथियों ने उसे चेताया कि वे जंगली लोग इंसानों का मांस खाने के सिवाय कुछ और नहीं जानते:
-तुम वहाँ से ज़िंदा नहीं निकलोगी।

औरतें – क़िस्त तीन ( स्पैनिश कहानियां )

लेकिन लुई मिशेल ने न्यू कालेदोनिया के मूलवासियों की जबान सीखी, उनके जंगल गई और ज़िंदा वापस लौटी।

उन लोगों ने उससे अपने दुःख बताए और पूछा कि उसे वहाँ क्यूँ भेज दिया गया था।
-क्या तुमने अपने पति का क़त्ल किया था?
तब उसने उन्हें पेरिस कम्यून के बारे में बताया:
-ओह!- तब तुम भी हमारी ही तरह हारी हुई हो। उन्होंने कहा।

छपने का ख़तरा


2004 में ग्वातेमाला की सरकार ने सत्ता के कानून से ऊपर बैठे होने की ‘रवायत’ एक बार तोड़ी थी। तब सरकारी तौर पर यह स्वीकार किया गया कि मिरना माक की हत्या राष्ट्रपति के आदेश पर की गई थी।
मिरना ने एक ‘प्रतिबंधित’ खोज कों अंजाम दिया था। धमकियों की परवाह न कर वह उन जंगलों और पहाड़ों में गई थी, जहां अपने ही देश में बेदखल, सेना के नरसंहारों में ज़िंदा बचे आदिवासी मारे-मारे फिरते थे। उसने उनकी आवाजों और अभिव्यक्तियों को दर्ज भी किया था।

औरतें – क़िस्त चौथी ( स्पैनिश कहानियां )

उसी समय यानी 1989 में सामाजिक विज्ञान पर हुई एक कांग्रेस में सयुंक्त राज्य अमरीका से आए एक मानवशास्त्री ने वहाँ के विश्वविद्यालयों की शिकायत की थी। नाराजगी विद्यार्थियों पर लगातार कुछ न कुछ प्रकाशित करते रहने के दबाव से थी।

-मेरे देश में- उसने कहा– अगर आप छपते नहीं हैं तो समझो गए।
तब मिरना ने कहा था:
-मेरे देश में आप की खैर नहीं गर आप छपते हैं।
उसके बाद वह छपी थी।
उसे चाकुओं से गोदकर मार डाला गया था।

साँस लेती संगमरमर 


आफ्रोदिता यूनानी मूर्तिकला के इतिहास की पहली निर्वस्त्र स्त्री थी। संगतराश प्राक्सितेलेस ने उसे तराशते वक्त देह का कपड़ा उसके पैरों के पास गिरा दिखाया था।। कोस शहर ने प्राक्सितेलेस से यह मांग की कि वह आफ्रोदिता को कपड़े पहनाए। एक दुसरे शहर स्नीदो ने, हांलाकि, आफ्रोदिता का स्वागत किया और उसके लिए एक मंदिर भी बनवाया। और तब देवियों में सबसे ज्यादा औरत और औरतों में सबसे ज्यादा देवी यहाँ रही थी।

मर्द’ तैयार करती सोच की पहली सीख : उलटबांसियां: उलटी दुनिया की पाठशाला (1998)

स्निदो में हांलाकि उसे घेरे में बंद और कितने ही पहरे में रखा गया था, चौकीदार उसके लिए पागल लोगों को पहरा तोड़ने से रोक नहीं पाते थे। इतने पहरे और इतनी बंदिशों से आजिज़ आकर आफ्रोदिता आखिर आज ही की तरह एक दिन भाग गई थी।

लेखक के बारे में

एदुआर्दो गालेआनो (3 सितंबर, 1940-13 अप्रैल, 2015, उरुग्वे) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। साप्ताहिक समाजवादी अखबार  एल सोल  (सूर्य) के लिये कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन अपने देश के समाजवादी युवा संगठन  से गहरे जुड़ाव के साथ-साथ चला। राजनीतिक संगठन से इतर भी कायम संवाद से विविध जनसरोकारों को उजागर करना उनके लेखन की खास विशेषता रही है। यह 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातिना (लातीनी अमरीका की खुली धमनियां) से सबसे पहली बार  जाहिर हुआ। यह किताब कोलंबस के वंशजों की  ‘नई दुनिया’  में चले दमन, लूट और विनाश का बेबाक खुलासा है। साथ ही,18 वीं सदी की शुरुआत में  यहां बने ‘आज़ाद’ देशों में भी जारी रहे इस सिलसिले का दस्तावेज़ भी। खुशहाली के सपने का पीछा करते-करते क्रुरतम तानाशाहीयों के चपेट में आया तब का लातीनी अमरीका ‘लास बेनास..’ में खुद को देख रहा था। यह अकारण नहीं है कि 1973 में उरुग्वे और 1976 में अर्जेंटीना में काबिज हुई सैन्य तानाशाहीयों ने इसे प्रतिबंधित करने के साथ-साथ गालेआनो को ‘खतरनाक’ लोगों की फेहरिस्त में रखा था। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अनुभव को साझा करते गालेआनो इस बात पर जोर देते हैं कि “लिखना यूं ही नहीं होता बल्कि इसने कईयों को बहुत गहरे प्रभावित किया है”।


अनुवादक का परिचय : पी. कुमार. मंगलम  जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय से लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .  

 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य सभी  किताबें  उपलब्ध हैं.

फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com  

नीलेश झाल्टे  जलगाँव  स्थित  पत्रकार हैं  और  दैनिक  लोकमत  समाचार  से  जुड़े  हैं  . संपर्क: 9822721292

यहाँ झील और ज्यादा गहरी और शांत हो गयी

नूर ज़हीर

वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है.
हाल में हिन्दी अकादमी द्वारा शिखर सम्मान से सम्मानित नूर ज़हीर का यह लेख द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन से प्रकाशित ‘मेरा कमरा’ किताब का हिस्सा है.

एक छोटा सा कमरा हो, जिसकी एक खिडकी पहाड़ों की तरफ और दूसरी नीली, झिलमिलाती झील की तरफ खुले. लिखने की मेज हो और बाकी दप दीवारें, जिनमे खिड़कियाँ न हों, किताबों से भरी अलमारियों,ताकों से ढकी हों. मेज पर कागज-कलम तो हो ही,साथ ही जरुरत के
शब्दकोश,पर्यायवाची,मुहावरे-कहावतों की किताबें जरुर खुली-बिखरे पडी हों,जो हर आनेवाले को,यानी कमरे की मालकिन को भी यह एहसास दिलाएं की इस जगह काम होता है,यहाँ फिजूल वक़्त जाया न कीजिए,कुछ लिखिए-पढ़िए.



आज जब जवानी के ख़्वाब  की तस्वीर नजरों के सामने आती है तो ग़ालिब के शे’र का एक मिसरा याद आता है-‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले ‘लेकिन इस शे’र का दूसरा मिसरा अभी तक की गुज़री जिन्दगी पर पूरा नहीं उतरता, क्योंकि बहुत अरमान मेरे तो कभी नहीं निकले.
यह देखकर की वक़्त का कोई मूड नहीं है मेरे अरमान पूरे करने का, मैंने अपने ख़्वाब का दायरा कुछ घटा  दिया.झील या पहाड़ में से एक हो तो चलेगा.इतनी किताबें भी न हों तो भी चलेगा.घटते –घटते यह कमरा एक जरुरत भर की जगह रह गया.इस्टमैन कलर से ख़्वाब ब्लैक एंड व्हाईट हुए.दिल ने अलग एक कमरा और थोड़े से सुकून से समझौते कर लिया. इतना तो एक लेखक को चाहने का हक़ है,चाहे वह लेखक औरत ही क्यूँ न हो.

आज पुराने ख़्वाबों की पोटली खोलती हूँ तो दिल फिर उन वीरानियों में लौट जाना चाहता है,जहाँ ख्याल पर चाहतों की धमाचौकड़ी मची रहती है.सोचती हूँ अगर वह कमरा मिल जाता जो मैं सोलह सत्रह साल की उम्र मी चाहती थी,जब मैंने यह पक्का फैसला कर लिया थी की मुझे लेखक ही बनना है और खुछ नहीं तो…मैंने उस कमरे को हासिल करने की ज्यादा शिद्दत से कोशिश क्यों नही की.
क्या मेरा एक्टिविज्म जो मुझे सड़क-सड़क ,गाँव-गाँव घसीटता रहा ,वह जिम्मेदार है, क्योंकि काफी बड़ी उम्र तक तो जीवन में कुछ स्थायी हुआ ही नहीं या जब घर बसाने का फैसला किया तो एक ऐसे आदमी का हाथ पकड़ा जो लिखने के लिए एकांत या किसी  खास जगह को जरुरी नहीं समझता था और मैं अपनी जरुरत का एहसास उसे दिला पाने में नाकामयाब रही या यह कि बच्चों की जरूरतों और शोर-शराबे को ज्यादा एहमियत दे और अपनी जरुरत के बारे में नहीं सोचा.



ऐसा नहीं कि शौहर और बच्चे मेरे कोई बुरे है या मैं उनकी जरूरतें पूरी करके खुद को खुश नहीं पाती थी.सुबह उठकर अक्सर चार बजे घर के किसी कोने में दरी बिछाकर,तख्ती पर कागज़ लगाकर जल्दी जल्दी छः बजने के अन्दर वह सब लिख डालने की कोशिश करती जिसने रात भर में दिमाग के कोने –खुदरों से निकलकर एक शक्ल अख्तियार कर ली थी.छः बजे बच्चों को उठाकर स्कूल के लिए तैयार करना होता था.


अकसर खाली मिले कुछ लम्हों में झील और पहाड़ों वाला ख़्वाब सामने आकर मुह चिढाता.फर्क बस इतना होता की झील और नीली और ज्यादा गहरी, शांत हो गयी थी.कभी कभी तो उसके एक सिरे से सूरज उगाता दिखाई देता कभी कोई कश्ती तिरती हुई गुजर जाती .अजीब बात है की पूरे देश से हरियाली कम होती जा रही है.लेकिन मेरे ख़्वाबवाले पहाड़ ज्यादा हरे हो गए थे. ऊँचे देवदार के पेड़ों से ढकें.कभी कभी तो उनके बीच में से कोई झरना भी फूट पड़ता जो कल कल करती झील में रूपोश हो जाता.ख़्वाब था या कमबख्त पर्यावरण मंत्रालय का विज्ञापन.

एक चीज और यदि मैं अपनी मेज के आसपास होती तो मेरे दिल को बेहद तस्कीन पहुँचती .हुआ यूँ की जिस रचनाकार को भी मैं पढती और अगर वह मुझे बहुत पसंद आता तो जी चाहता उसकी तस्वीर मेरी मेज के आसपास हो. मैं लिखते लिखते सर उठाऊ तो उससे नज़ारे चार करके पूछ सकूँ-क्यों दोस्त यह चित्रण पसंद आया?यार यह कुछ वैसा नहीं बन रहा जैसा दिल चाहता है तुम ज़रा मदद करो न! प्रेमचंद,शेक्सपियर,यशपाल, अमृतलाल नागर, सीमोन डा बोउआर, वर्जीनिया वुल्फ, इस्मत चुगताई सब मौजूद रहते.रोज उनकी गिनती बढ़ती, क्योंकि मेरी किताबें ,मेरी जानकारी में इजाफा होता.


फिर कुछ ऐसा हुआ की घर भी अपना हो गया जिसके चलते मैं अपनी जरूरत और जेब के हिसाब से अपनी किताबें बढ़ा सकती थी .मेज एक कमरे में लग गयी.दो दीवारों पर लकड़ी के टाक भी बन गए और किताबों से भर गए .कमरा उतना हवादार है जितना एक फ़्लैट में हो सकता है सुकून उतना नहीं जितने की जरुरत है.निचलेवाले फ़्लैट की मिसेज जैन तार सप्तक में बात करते है फोन पर हो या धोबी से या अपने पतिदेव से.दिलासा यहीं है कि उनके बच्चे और मियाँ कभी बात नहीं करते फ़्लैट उपर होने से सड़क का शोर भी उतना नहीं आता गरज ये कि अपने कमरे की ख्वाहिश में जितने व्यवहारिक चीजें है,सो पूरी हो गयी है हाँ,पहाड़ ,झील नदारद है और शायद कभी होंगे भी नहीं.

सच पूछिए तो अपनी सुस्ती की देखकर कभी-कभी यह भी ख्याल आता है कि अगर यह सब पहले मिल जाता और पूरा का पूरा मिल जाता तो क्या मेरे लेखन में कुछ बदलाव आ गया होता? क्या मैं बेहतर लिख पाती ?क्या मैं ज्यादा लिख पाती?अभी तक  जो लिखा ,वह एक चुनौती,एक ढिठाई से लिखा कलम चलाते रहेंगे हालत साथ दे या की मुखालिफ हो. अगर सब कुछ मिल जाता तो शायद वह चुनौती या वह अड़ियलपन भी जाता रहता जो लेखन का आधार बना.आज यह हालत है कि वह खुद -ब -खुद चार बजे आँख खुल जाती है. मेरे कमरे में जहाँ कल्पना में तो पलंग नहीं था लेकिन हकीकत में एक अदद बिस्तर शामिल है,जब सूरज आकर रुकता है तो मुझे लिखता हुआ या कम से कम कुर्सी पर बैठे, कोहनियाँ मेज पर टिकाये खुद से बातें करते देखता है सूर्य भी पुरुष है कामकाजी महिला को सह नहीं पाटा ,आगे बढ़ जाता है.

मेरे सवालों का कोई जवाब नहीं दे सकता यह कमरा भी नहीं. एक तरह से अच्छा है यही मान लिया जाए की वह ख्वाब्वाला कमरा नहीं मिला जैसा की एक शे’र है-
यारब दुआए वस्ल ना हरगिज क़ुबूल हो,
फिर दिल में क्या रहेगा जो हसरत निकल गयी.

हाँ,एक चीज जरुर है जो इस अधूरे मगर मेरे अपने कमरे ने दी है.सिर्फ मेरे कमरा होने के कारण मैं इसकी दीवारों,दरवाजों पर कुछ भी लगा या चिपका सकती हूँ बहुत सारे लेखकों की तस्वीरों के अलावा एक नोटिस,कोई एक बरस पहले इस कमरे में अन्दर आनेवाले दरवाजे पर लगाई –‘यह नास्तिक का कमरा है .आस्थावान ज़रा सोच-समझ कर अन्दर आयें.