स्त्री अस्मिता आंदोलन इतिहास के कुछ पन्ने

आलोक कुमार यादव
जे.एन.यु.में शोधार्थी, नई दिल्ली . संपर्क:alokjnu87@gmail.com मोबाइल : 8010333108  

 प्राचीन काल से ही स्त्री, स्त्री का शोषण, उसकी समस्याएँ, उसकी सामाजिक स्थिति उसका विकास और समाज के विकास में उसका योगदान विचार क्षेत्र के प्रमुख विषय रहे हैं और वर्तमान में भी है. नारी तुम केवल श्रद्धा हो, देवी माँ, सहचरि प्राण जैसे ब्रह्म वाक्यों को सुनते हुए होश संभालने वाले इस सामाजिक मानस को परिवर्तित कर देना अकल्पनीय बात थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में उभरे सामाजिक अस्मिता के आन्दोलनों ने स्त्री की छवि, स्त्री की सामाजिक स्थिति और स्त्री के बारे में प्रचलित रूढ़िगत और मिथकीय अवधारणाओं को तोड़ा है. सदियों से उसके जिस ‘स्व’ का अपहरण पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने किया था उसे अब वह वापस पाने के लिए प्रयासरत है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि स्थितियाँ पूरी तरह से बदली हैं, स्थितियों में कुछ सकारात्मक बदलाव हुए है. समस्याएँ अभी भी हैं, समस्याओं का स्वरूप बदल गया है.

स्त्री की प्रजनन क्षमता को उत्पादक के रूप में देखा गया. मनु के शब्दों में ‘स्त्रियां खासकर प्रजनन के लिए ही बनाई गई हैं.’ (प्रकरण 10-26) इस संदर्भ में उमा चक्रवर्ती ने लिखा है कि- “पत्नीत्व से वैध मातृत्व के संक्रमण के लिए स्त्री की यौनिकता को व्यवस्थित करना जरूरी हो गया. इसलिए हमारे लिए जिस बात का पता करना महत्वपूर्ण हो जाता है वह यह कि स्त्री की यौनिकता की व्यवस्था किनके हाथों में थी? इसके साथ ही, यह भी कि उसमें खुद स्त्री की सहभागिता थी अथवा नहीं?”1 “पुरुष तंत्र को बनाए रखने के लिए या उसकी वंश वृद्धि के लिए पुत्रसंतान होना आवश्यक है अतः स्त्री का पहला कर्तव्य पुत्र संतान को जन्म देना माना गया.” (अपस्तम्ब धर्मसूत्र 1/10-51-52)

इन सारी बातों का लब्बोलुआब यह है कि स्त्री दासी और गणिका दो ही तरह की वृत्तियों के योग्य है. उसके पास अपना निर्णय नहीं है, उसकी कोई राय नहीं है. भारतीय इतिहास में जब कुछ साहसी दासियों की बाते होती है तो गार्गी का नाम भी आता है. गार्गी ने शास्त्रार्थ करते हुए जब अपने पिता को हराने की स्थिति में पहुँची तो उनके पिता ने ब्राह्मणवादी पुरुषत्व का सहारा लेते हुए उसे धमकी दी ‘गार्गी, बहस को इतना आगे न ले जाओ.’ गार्गी थोड़ी देर के लिए चुप हो गई थी. उमा चक्रवर्ती ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि- “यहाँ यह बात महत्वपूर्ण है कि किसी पुरुष को अधीनता की स्थिति में लाना हो तो उसके विरोध को दबाने के लिए अथवा उसे चुप कराने के लिए जहाँ वास्तव में हिंसा का रास्ता अपनाना पड़ता है वहीं स्त्री के मामले में हिंसा की धमकी से ही काम चल जाता है.”2

पितृसत्तात्मक कायदों के कार्य करने में हिंसा के अंतर्निहित होने का प्रमाण है लेकिन स्त्री के ‘आवेगों’ पर हिंसा के प्रयोग अथवा इसकी धमकी से ही लगाम लगाए रखा जा सकता है. स्त्री को लगाम लगाए रखने के लिए ढेर सारी आचार संहिताएं भी बनाई गई जो उपनिषदों और संहिताओं में थोक के भाव मिलते हैं. सबसे आदर्श संहिता जो भारतीय समाज में व्याप्त है वह रामायण में हमें सूर्पनखा का राम के प्रति यौनाकर्षित होने की परिणति, लक्ष्मण द्वारा उसके नाक काटने की घटना में होते हैं. नाक का कटना एक तरह से यौनांग विच्छेद का रूपक है. अखबारों की रोज की घटनाएं इस तरह की प्रवृत्तियों के विद्यमान होने की सूचक है.


 स्त्री अस्मिता के हनन के उपरोक्त  कुछ उदाहरणों से हम समझ सकते है कि स्त्री की सामाजिक स्थिति क्या थी और क्या है और क्या हो सकती है? यह आन्दोलन प्रथमतः स्त्री को एक इंसान का दर्जा दिलाने के लिए है और इसके लिए सिमोन द बोउवार लिखा है कि- “किसी समाज सुधारक या मसीहा द्वारा स्त्री की मुक्ति का मार्ग नहीं निकलेगा. वह जब भी निकलेगा स्त्री के अपने संघर्षों से ही होकर निकलेगा. यह संघर्ष प्रारंभ होगा अपने अस्तित्व बोध से.”3 दूसरे शब्दों में कहें तो यह अस्तित्व की चेतना ही अस्मिता के होने के अंग हैं. अपने अस्तित्व को लेकर एक चेतना का भाव जगाना ही स्त्री अस्मिता आन्दोलन का लक्ष्य भी है.

अपने इस ‘स्व’ के लिए लड़ाई, स्त्रियों ने सभ्यता के प्रारम्भिक काल से ही लड़नी शुरू कर दी थी. स्त्री आज जिस सामाजिक स्थिति में है वह एक लम्बे संघर्ष की देन है, पराजय और निराशा के क्षण भी इस दौरान आए लेकिन स्त्रियों ने हार नहीं मानी. ज्ञान और सत्ता का संबंध सर्वव्यापी है, जिसके पास ज्ञान रहा वही सत्तासीन रहा, इसलिए स्त्रियों को सर्वप्रथम ज्ञान से ही वंचित रखने की साजिश की गई. पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने प्राचीन काल से ही यह कार्य किया. गार्गी जैसी कुछ स्त्रियाँ अपवाद स्वरूप रहीं. ज्ञान से वंचित रखने की व्यवस्थित साजिश हुई. शिक्षा के संस्थानों से स्त्रियों को दूर रखा गया. धीरे-धीरे वास्तविक ज्ञान के अभाव में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के  नियमों को मानना स्त्री को सत्य लगने लगा और धर्म भी, साथ ही उसे ईश्वर की मर्जी से भी जोड़ दिया.

दरअसल प्राचीन काल में स्त्री के जितने भी शोषण के प्रमुख बिन्दु थे वह मूलत धर्म से ही संचालित हुए. किसी भी बात को तुरन्त ईश्वर की मर्जी और धर्म से जोड़ देना भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था की ही साजिश रही. “इस स्थिति को व्यवस्थित करने का एक प्रयास मनुस्मृति में ;.67द्ध किया गया है. जहाँ स्त्रियों को उपनयन में शामिल होने से रोक दिया गया है. उपनयन संस्कार पवित्र ज्ञान प्राप्ति का प्रारंभ बिंदु था. इसे और गहरे स्थापित करने के लिए कई विकल्प भी सुझाए गए हैं, स्त्रियों के लिए विवाह करना, पुरुषों के उपनयन के समकक्ष था, पति की सेवा करना छात्र होने के समान था और घर के कामों को संपन्न करना पवित्र अग्नि की पूजा अर्चना के समान बताया गया (मनुस्मृति .67). ऐसे निर्देशों को स्वीकार कर लेने का मतलब होता है कि कोई भी गैर घरेलू काम को नारीत्वहीन और गैर पत्नी कार्य माना जाता.”4


स्त्रियों ने अपनी इन समस्याओं के प्रति प्राचीन काल में उस तरह से प्रतिरोध नहीं किया, जिन अर्थों में आज स्त्री अस्मिता की बात हो रही है. स्त्री अस्मिता की व्यवस्थित शुरूआत उन्नीसवीं शताब्दी में होती है. राधा कुमार ने लिखा है कि “उन्नीसवीं सदी को स्त्रियों की शताब्दी कहना बेहतर होगा क्योंकि इस सदी में सारी दुनिया में उनकी अच्छाई-बुराई, प्रकृति, क्षमताएँ एवं उर्वरा गर्मागर्म बहस का विषय थे. यूरोप में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान और उसके बाद भी स्त्री जागरूकता का विस्तार होना शुरू हुआ और शताब्दी के अंत तक इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा जर्मनी के बुद्धिजीवियों ने नारीवादी विचारों की अभिव्यक्ति दी. उन्नीसवीं सदी के मध्य तक रूसी सुधारकों के लिए ‘महिला प्रश्न’ एक केन्द्रीय मुद्दा बन गया था जबकि भारत में खासतौर से बंगाल और महाराष्ट्र में समाज सुधारकों ने स्त्रियों में फैली बुराइयों पर आवाज उठाना शुरू किया.”5

वास्तव में आजादी के पहले से ही चिन्तन की दुनिया में विचारों को आयातित करने की जो प्रवृत्ति बनी, भारत में स्त्री अस्मिता भी उससे अछूती नहीं है.है. स्त्री अस्मिता का एक महत्वपूर्ण पहलू है कि स्त्रियों की शिक्षा पर ध्यान दिया जाय. स्त्री शिक्षा ही वह एकमात्र हथियार है जो स्त्री की चेतना को निर्मित करते हैं और स्त्री अस्मिता की पूरी लड़ाई चेतना से ही लड़ी जा सकती है. “जैसा कि हमें मालूम है कि स्त्रियों को शिक्षित करने के महत्व पर सबसे पहली सार्वजनिक बहस राजा राममोहन राय द्वारा 1815 में स्थापित ‘आत्मीय सभा’ बंगाल में छेड़ी गई.”6 राजा राममोहन राय ने उसके बाद सती प्रथा पर हमला बोलते हुए पहला लेख लिखा था. राजा राममोहन राय ने पहली बार भारत में सतीप्रथा के विरूद्ध आंदोलन चलाया और उनके संघर्षों के फलस्वरूप “विलियम बेंटिक 1829 में जब भारत के गर्वनर जनरल बने तो उन्होंने सती निर्मूलन एक्ट पास किया.”7

सती उन्मूलन आन्दोलन के बाद स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए स्त्रियों की शिक्षा का आंदोलन एकाएक जोर पकड़ने लगा. “लड़कियों के लिए स्कूल सबसे पहले अंग्रेज तथा ईसाई मिशनरियों द्वारा 1810 में शुरू किए गए. स्त्रियों की शिक्षा से संबंधित पहली पुस्तक किसी भारतीय भाषा (बंगाली) में 1819 में एक भारतीय गुरूमोहन विद्यालकार द्वारा लिखी गई जिसे कलकत्ता की कन्याबाल समिति ने 1820 में प्रकाशित किया. 1827 तक मिशनरियों द्वारा हुगली जिले में 12 कन्या पाठशालाएँ चलाई जाने लगीं. एक वर्ष बाद “ ‘लेडी’ स सोसाइटी फार नेटिव फीमेल एजुकेशन इन कैलकटा एण्ड इट्स विसिनिटी” ने स्कूल खोले जो मिस कुक द्वारा चलाए गए. ऐसा देखा गया है कि गरीब इलाकों में खुले स्कूलों के बारे में जानने के लिए स्त्रियाँ भी दिलचस्पी ले रही थीं.”8
हालांकि स्त्रियों को उस समय शिक्षित करने के दो कारण थे, पहला तो यह कि उस समय ईसाई मिशनरियों द्वारा ईसाईयत फैलाने का डर हिन्दुओं को हो गया था इसलिए हिन्दू एवं ब्राह्मणकन्या पाठशालाएँ खोली गई. दूसरा कारण यह था कि भारत में जो उभरता हुआ मध्यवर्ग था वह अपनी स्त्रियों को अंगे्रज स्त्रियों के तरह के पाश्चात्य तौर-तरीकों से परिचित कराना चाह रहा था. राधा कुमार ने अपनी किताब में एक पारसी फ्रांसकी बोमन जी के विचारों को उद्धृत किया है- “हम अपनी पत्नियों तथा पुत्रियों के लिए अंग्रेजी  भाषा, अंग्रेजी  रीति और अंग्रेजी  आचरण चाहते हैं और जब तक हमें यह नहीं मिलेगा तब तक अंग्रेजों  और भारतीयों के बीच की यह खाई बरकरार रहेगी.”9 तो कहीं न कहीं भारतीय स्त्रियों को पश्चात्य विचारों से ही प्रभावित होकर शिक्षा का द्वार पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने खोला. स्त्री शिक्षा की जब भी बात होगी तो ज्योतिबा फुले का नाम लेना जरूरी होगा, ज्योतिबा फुले ने 1852 में तीन कन्या पाठशालाएँ खोली जिसमें उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा को लेकर काम करना शुरू किया.


भारतीय इतिहास में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का आगमन स्त्री अस्मिता इतिहास की भी एक महत्वपूर्ण घटना है. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने सन् 1850 में विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबंध को समाप्त करने के लिए अभियान चलाया. 1855 में भारत के गर्वनर जनरल को विधवा पुनर्विवाह के लिए कानून बनाने के लिए याचिका दायर की.
स्त्री आन्दोलन के इस प्रारम्भिक दौर में स्त्री की समस्याओं को केन्द्र में रखकर लडाईयाँ लड़ी जाती थीं लेकिन बाद में चलकर उन्होंने अपने अधिकारों की मांग करनी शुरू कर दी. 1914 में हुए महायुद्ध ने स्त्रियों के राजनीतिक मूल्य को काफी बढ़ा दिया था. युद्ध में स्त्रियों की भूमिका अत्यन्त महत्वूपर्ण रही. इग्लैण्ड और अमरीका की सरकारों ने युद्ध में स्त्रियों द्वारा भाग लेने की एवज में स्त्रियों के लिए मताधिकार प्रस्तावित किया. स्त्री को मत देने के योग्य समझना उसे एक व्यक्ति के रूप में मान्यता मिलने का सबसे बड़ा प्रमाण है.1921 में भी भारत के विभिन्न प्रांतों में उसे मताधिकार प्रदान किया गया. बंगाल से राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों के प्रयत्नों से स्त्री सुधार की जो हवा बहने लगी थी उसका असर पूरे भारत पर हो रहा था. सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयासों से अंधविश्वासों और कुप्रथाओं की बेड़ियों से स्त्री जाति को निकालने के लिए लगातार सार्थक कदम उठाए जा रहे थे. सती प्रथा के विरूद्ध कानून पारित हो चुका था. 1930 में शारदा एक्ट के तहत निम्नतम विवाह आयु सीमा बढ़ाकर 14 वर्ष कर दी गई थी. भारत में बाल विवाह स्त्रियों की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण रहा है. विवाह की आयु बढ़ा देने से स्त्री शिक्षा की ओर भी थोड़ा रूझान बढ़ा है.

शिक्षा के प्रसार से जब लड़कियाँ विविध व्यवसायों के मार्ग खुले पाने लगीं तो वे आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र और स्वावलम्बी होने लगीं. इस युग में स्त्री को व्यक्तिगत अधिकार देने का भी प्रयास किया गया 1937 में बंगाल में ‘हिन्दू विमैन्स राइट जू प्रापर्टी’ कानून पास किया गया. इससे कुछ वर्षों पहले बंगाल के ही केन्द्रीय व्यवस्थापक मण्डल ने इस तरह की माँग की तो उसे जनता के अत्यधिक विरोध के कारण पास नहीं किया गया था.
स्त्रियों का राजनैतिक क्षेत्र में अवतरण स्त्री स्वतन्त्रता का एक महत्वपूर्ण पहलू है. एनी बेसेन्ट के भारत आने से लेकर उनके कांगे्रस की सभापति बनने के बीच के समय में स्त्रियों में राजनैतिक चेतना जागी. 1947 में कलकत्ता कांगे्रस में तीन स्त्रियाँ एनी बेसेन्ट, अम्मन बीबी और सरोजनी नायडू महत्वपूर्ण पदों पर थीं. भारत के सामाजिक तथा राजनैतिक इतिहास में ये तीन स्त्रियाँ नवयुग के आरम्भ की सूचक थीं. 1921 से 1923 के असहयोग आन्दोलन में स्त्रियों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की. 1923 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दिनों में भारतीय स्त्रियों में राजनैतिक स्तर पर चेतना अत्यंत व्यापक पैमाने पर फैली. देश सेवा के लक्ष्य को लेकर सरोजनी नायडू, कमला देवी, चट्टोपाध्याय, रूक्मिणी लक्ष्मीपति, हंसा मेहता, कस्तुरबा गाँधी, मीराबेन, नेली सेन गुप्ता, सरस्वती देवी जैसी महिलाएँ समस्त नारी जाति की प्ररेणा के रूप में उभरीं. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाली स्त्री अब भारतीय बुद्धिजीवियों की दृष्टि में ‘अवगुण आ सदा उर रहहि’ के स्थान पर सद्गुणों की खान के रूप में स्थापित हो चुकी थी.

अंग्रेजों का आगमन स्त्री स्वाधीनता के पक्ष में महत्वपूर्ण घटना थी. ब्रिटिश राजसत्ता अपने साथ राज्य व्यवस्था ही नहीं, नई आर्थिक रचना और विचारधारा भी लाई. भारतीय जनजीवन पर इस धारा का व्यापक प्रभाव पड़ा. पहले-पहले बदलते आर्थिक संबंधों ने भारत की बुनियादी संस्थाओं की नींव हिला दी. नए आर्थिक संबंधों ने पहले सदियों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था पर आधारित ग्राम्य-व्यवस्था को हिलाया. यद्यपि सीधे-सीधे अंगे्रजों ने स्त्रियों के हित में कोई काम नहीं किया किन्तु नए आर्थिक संबंधों और अंगे्रजी शिक्षा की शुरूआत ने अप्रत्यक्ष रूप से नारी को प्रभावित किया. यह नई शिक्षा स्त्रियों के लिए ही नहीं थी. विदेशी अधिकारियों के नजर में स्त्री शिक्षा की कोई तात्कालिक उपयोगिता नहीं थी क्योंकि स्त्रियों को दफ्तर में क्लर्क नहीं बनाया जा सकता. बहरहाल अंगे्रजों के विरोध में जो स्वाधीनता की लहर उठी उसमें स्त्रियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और स्त्री के सवाल के स्वाधीनता से जोड़ा और अपने अधिकारों के लिए लड़ना शुरू किया. लता सिंह ने लिखा है कि- “1920 के दशक में महिलाओं के अधिकारों पर दो विचारधाराएँ बिल्कुल अलग-अलग तर्को पर आधारित दिखती है एक तर्क था कि औरतों को अधिकार इसलिए मिलना चाहिए क्योंकि वह समाज में माँ की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, दूसरा तर्क यह था कि उनमें और पुरुषों में जैविक असमानताएँ होते हुए भी जहाँ तक इच्छाओं, आकांक्षाओं और क्षमताओं का प्रश्न है विशेष अंतर नहीं होता और उन्हें वे सब अधिकार मिलने चाहिए जो पुरुषों को मिले हुए हैं. पहले तर्क में सोच थी कि प्राकृतिक जैविक अंतरों के कारण दोनों में गुणात्मक अंतर होता है, जबकि दूसरा तर्क यह मानकर चलता था कि प्राकृतिक जैविक अंतरों से यह सिद्ध नहीं होता कि दोनों के गुणात्मक स्वरूप में कोई बुनियादी अंतर है.”10


महत्वपूर्ण यहाँ यह है कि यहाँ पर स्त्रियों को अधिकार मिलने चाहिए, इस बात को सबने स्वीकार किया कि स्त्रियों को अधिकार क्यों मिलना चाहिए? दोनों विचारधाराओं से सहमत असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं है कि एक के तर्क गलत हैं, एक के सही. यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि स्त्रियों को अधिकार मिले, इस बात की स्वीकृति मिली.

हालांकि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान स्त्रियों के सवालों की चर्चा करते हुए लता सिंह ने लिखा है कि- “राष्ट्रवादियों को महिलाओं से मुक्ति तथा उत्थान से कोई सरोकार नहीं था, इसके विपरीत महिलाओं की पत्नी, पुत्री और माँ की भूमिकाओं की और पुष्टि हुई, केवल राष्ट्रीय आन्दोलन की आवश्यकताओं को देखते हुए उसे थोड़ा बहुत विस्तार मिल गया. राष्ट्रवादियों ने महिलाओं की भूमिकाएं और सीमाएँ पहले ही तय कर दी थी और महिलाओं को उन सीमाओं को लाँघने की अनुमति नहीं थी. इस तरह पारंपरिक इतिहास में महिलाओं की संख्या थोड़ी और बढ़ गई. राष्ट्रीयता के इतिहास में महिलाओं का योगदान केवल उनकी पारंपरिक भूमिका का विस्तार मात्र है. राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं का कहीं कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं दिखता.”11

लता सिंह की बात से सहमत हुआ जा सकता है. स्वतन्त्र अस्तित्व की स्त्री स्वाधीनता आन्दोलन में नहीं थी. जो भी स्त्रियाँ थी पार्टी आधारित नियमों के अनुसार चल रही थी, ऐसा नहीं था कि उन्होंने स्त्रियों के लिए कोई विशेष कार्यक्रम चलाया हो जिससे स्त्री चेतना की लहर सी उठ पड़ी हो.

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद पूरी तरह से भारतीय सामाजिक संरचना में पितृसत्ता का ही प्रभाव रहा. उदाहरण के लिए संविधान में ही अनुच्छेद 15 में समानता के सिद्धांत को स्वीकारा गया लेकिन साथ ही धर्म के आधार पर बने पारिवारिक कानूनों को मान्यता देकर स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत का विरोध किया गया है. शोषण के विरूद्ध अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया, पर स्त्री और पुरुषों को समान काम के लिए समान वेतन संबंधी कानून 1976 में बनाया गया.


हिन्दू कोड बिल के पास हो जाने से महिलाओं को स्थिति परिवार, विवाह तथा संपत्ति के क्षेत्र में कुछ बेहतर हुई श्रम कानूनों में भी थोड़े सुधार हुए लेकिन कानून पर्याप्त नहीं थे. धीरे-धीरे महिलाओं के अधिकारों के सवाल पर स्थितियाँ उदासीन हो गईं. सन् 1950 से लेकर 1975 तक महिलाओं के सवाल और स्त्री अधिकारों का सवाल दरकिनार रहा. सन् 1975 के बाद से कई महिला संगठन बने जिन्होंने विशेष रूप औरतों पर हिंसा के मुद्दे पर काम करना शुरू किया और इस दिशा में बदलाव के लिए सरकार पर दबाव भी डाले. विकास प्रक्रिया में औरतों को शामिल किया जाने लगा. 1976 में समाज कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत महिला कल्याण और विकास ब्यूरों की स्थापना की गई जिससे स्त्री के शोषण के प्रमुख बिंदुओं पर कार्यक्रम चलाकर उसकी निजता को सुरक्षित करने की कोशिश की गई. साथ ही उन्हें उत्पादन के साथ जोड़ा गया और विकास कार्य में उनकी भागीदारी को सुनिश्चित किया गया.

स्त्री अस्मिता का इतिहास तमाम अवरोधों, विरोधों और संघर्षों के फलस्वरूप आज इस मुकाम पर पहुँचा है. जरूरत है उस इतिहास को टटोलने की, खोजने की और स्त्रियों के साथ न्याय करने की.अंततः ऐतिहासिक परिवर्तनों की प्रक्रिया में स्त्री इतिहास का साथ बखूबी निभा रही है. इस प्रयास की दिशा सही है या गलत, वादों के नारों के बीच स्त्री अपना स्वरूप खो रही है या तलाश रही है इसका निर्णय काल अपने क्रम में स्वयं कर देगा लेकिन स्त्री अस्मिता के आन्दोलन स्त्री मुक्ति की दिशा में सार्थक है इसमें कोई दो राय नहीं है.  

संदर्भ :
1. पृ. 70 उमा-चक्रवर्ती: ‘जाति समाज में पितृसत्ता’
2. पृ. 20 वही
3. पृ. 344, सिमोन द बोउवार: ‘द सेकेण्ड सेक्स
4. पृ. 141, संपा. साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता- ‘नारीवादी राजनीति: संघर्ष एवं मुद्दे’.
5. पृ. 25, राधा कुमार: ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’.
6. पृ. 26, राधा कुमार, वही
7. पृ. 27, राधा कुमार, वही
8. पृ. 39, राधा कुमार, वही
9. पृ. 50, राधा कुमार, वही
10. पृ. 160, संपा. साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता- ‘नारीवादी राजनीति: संघर्ष एवं मुद्दे’.
11. पृ. 175, संपा. साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, वही

स्त्रीकाल का संचालन 'द मार्जिनलाइज्ड' , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब 'द मार्जिनलाइज्ड' से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी 'द मार्जिनलाइज्ड' से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 
Blogger द्वारा संचालित.