प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिला आंदोलन का पत्र/ तीन तलाक से निजात की मांग

प्रति 
प्रधान मंत्री 
भारत सरकार 
प्रिय महोदय,
यह पत्र भारतीय मुस्लिम महिलों के लिए इन्साफ और बराबरी की हमारी चिंताओं से आपको वाकिफ़ कराने के उद्देश्य से प्रेरित है. 1985 के शाहबानों प्रकरण के बाद से आज तक मुस्लिम महिलाओं को उनके जीवन के अधिकार के सन्दर्भ में कभी सुना नहीं गया- हमारे देश की राजनीति को बहुत –बहुत शुक्रिया ! मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की बहस को कुछ रेवायती और पितृसत्ताक पुरुषों ने कब्जा रखा है और उन्होंने मुस्लिम पर्सनल ला में किसी सुधार के प्रयास को रोकने की ही कोशिश की है.  इस तरह मुस्लिम महिलाओं को कुरआन-शरीफ़ से मिले अधिकारों से और भारतीय नागरिक होने के अधिकारों से महरूम रखा गया है. प्रायः सभी मुस्लिम मुल्कों, जैसे मोरक्को , ट्यूनीशिया, टर्की , इजिप्ट , जॉर्डन आदि यहाँ तक कि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुस्लिम मुल्कों ने भी विवाह और परिवार के मामलों में पर्सनल लॉ को कोडिफाय किया  है- धन्यवाद हमारे खुदसाख्त रेवायती नेताओं का कि भारतीय मुसलमानों को यह सुविधा नहीं हासिल है परिणाम स्वरूप, हमारे समाज में तीन –तलाक और बहु –विवाह के मामले जारी हैं.

साभार गूगल 

जैसा कि जाहिर है , सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस अनिल दवे और आदर्श कुमार गोयल ) ने भारत सरकार को 23 नवम्बर तक अपना जवाब फ़ाइल करने के लिए कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ जेंडर –विभेद को संविधान की धारा 14,15 और 21 के तहत मूल अधिकारों का एवं अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन क्यों नहीं माना जाना चाहिए ? हम भी मानते हैं कि मुस्लिम महिलाओं के साथ क़ानूनन भेदभाव संविधान की उक्त धाराओं का उल्लंघन है. हमने अभी –अभी 10 राज्यों के 4710 मुस्लिम महिलाओं के बीच किये गये रीसर्च के परिणाम प्रकाशित किये हैं. 92.1% महिलाएं मौखिक और एकतरफा तलाक पर प्रतिबन्ध की पक्षधर हैं , वहीं 91.7% महिलाएं बहु-विवाह के विरोध में हैं. 83.3% महिलाओं ने कहा कि कोडिफायड मुस्लिम पारिवारिक लॉ बनाये जाने पर मुस्लिम महिलाओं को भी न्याय मिल सकेगा. अलग –अलग राज्यों में हमारे जमीनी कार्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर हैं कि हिन्दू , क्रिश्चन , पारसी पर्सनल लॉ की तरह कोडिफायड मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाया जाना जरूरी है, यह मुस्लिम महिलाओं की बराबरी और गरिमा को सुनिश्चित करेगा.

भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में ( बी एम एम ए) एक राष्ट्रीय मोर्चा है, जो पूरे समुदाय और खासकर मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है. यह ‘पाक कुरआन’ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और निहित कर्तव्यों के लिए काम करता है. 9वें साल में भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की सदस्यों की संख्या 70,000 तक हो गई है, जो 13 राज्यों में फ़ैली है. यह भारतीय संविधान में निहित न्याय , लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानता है और कुरआन के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मिले अधिकारों के लिए संघर्ष करता है.

साभार गूगल 

भारतीय मुस्लिम महिलाओं को न्याय शरीयत क़ानून , 1937 में  और डिजाल्युशन ऑफ़ मुस्लिम मैरेज एक्ट , 1939 में सुधार  से अथवा नये मुस्लिम पर्सनल लॉ के निर्माण से ही सुनिश्चित किया जा सकता है. भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन ने कुछ सालों से हजारो मुस्लिम महिलाओं, वकीलों , धार्मिक विद्वानों की सलाह/ सुझाव से कुरआन के सिद्धांतों के अनुरूप मुस्लिम फॅमिली लॉ का ड्राफ्ट बनाया है, जिसमें विवाह की उम्र, मेहर , तलाक़, बहु-विवाह , निर्वाह –भत्ता (मेंटेनेंस) और बच्चों पर अधिकार जैसे विषय शामिल हैं. इस ड्राफ्ट के कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. शादी की न्यूनतम उम्र , लडकी के लिए 18 और लड़के के लिए 21. 
2. बिना बलप्रयोग के और बिना किसी धोखे के दोनो पार्टी की सहमति
3. निकाह के समय दुल्हे के एक साल की आय के बराबर का न्यूनतम मेहर 
4. मौखिक तलाक अवैध घोषित हो. तलाक –ए-अहसन 90 दिन के भीतर अनिवार्य आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया से हो 
5. शादी के भीतर निर्वाह की जिम्मेदारी पति पर हो , यद्यपि पत्नी का स्वतंत्र आर्थिक आधार हो,  तो भी. 
6. मुस्लिम वीमेंस प्रोटेक्शन ऑन डाइवोर्स एक्ट , 1986 के अनुसार मेंटेंनेस
7. बहु –विवाह अवैध घोषित हो 
8. माँ और  पिता, दोनो बच्चे के प्राकृतिक संरक्षक हों 
9. बच्चे का संरक्षण ( कस्टडी ) उसके हितों के अनुसार और उसकी इच्छा के अनुरूप हो 
10. हलाला अपराध की श्रेणी में हो 
11. मुता निकाह भी अपराध की श्रेणी में हो
12. सम्पत्ति के मामले में  कुरआन के नियम लागू हों, कर्ज अदायगी और वसीयत के बाद  
13. लड़कियों को लड़कों की तरह वसीयत/ उपहार या हिबा के जरिये संपत्ति में बराबर भाग हो 
14. निकाहों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन
15. तलाक , बहु –विवाह नियमों के उल्लंघन की स्थिति में काज़ी को जिम्मेवार माना जाये

इस पत्र के साथ पूरे ड्राफ्ट की कॉपी संगलग्न है. यह मसौदा  मुस्लिम महिलाओं की मांगों और उनकी इच्छाओं के मुताबिक़ है और इसके प्रावधान उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने में मदद करेंगे.
हमारा अनुरोध है , कि सरकार किसी कानूनी पहल का निर्णय लेती है , तो मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकार और बराबरी तथा न्याय के संदर्भ में उनके मत का आदर करे.
सधन्यवाद !
नूरजहाँ साफ़िया नियाज़ ज़ाकिया सोमान
संस्थापक , भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन



भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन का नेतृत्व 

प्रधानमंत्री को इस पत्र  के बाद एन डी टी वी पर 'बड़ी खब' की बहस के लिए उसकी प्रस्तुतिकर्ता निधि का नोट 

 भारत में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, करीब 92 फीसदी मुस्लिम महिलाएं एक साथ तीन तलाक पर पाबंदी चाहती हैं। सिर्फ तलाक शब्द का जिक्र भर कर देना, खासकर आजकल सोशल मीडिया के स्काइप, एसएमएस, व्हाट्सएप का इस्तेमाल कर तलाक कह देना, इससे समाज में चिंता बढ़ गई है।

देश के 10 राज्यों में एक गैरसरकारी संस्था 'भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन' ने 4710 मुस्लिम महिलाओं की राय जानी। यह संस्था मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार के लिए काम कर रही है। उसने पाया कि ज्यादातर महिलाएं आर्थिक और सामाजिक तौर पर कमजोर थीं और घरेलु हिंसा का शिकार थीं। इन महिलाओ ने शादी, तलाक, एक से ज्यादा शादी, घरेलू हिंसा और शरिया अदालतों पर खुलकर अपनी राय रखी।

राय देने वालों में 73 फीसदी गरीब तबके से थीं, जिनकी सालाना आय 50 हजार से भी कम है। सर्वे में शामिल 55 फीसदी औरतों की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई और 44 फीसदी महिलाओं के पास अपना निकाहनामा तक नहीं है। यह अध्ययन सन 2013 में जुलाई से दिसम्बर के बीच हुआ।

अध्ययन में सामने आए नतीजों के मुताबिक 92% मुस्लिम महिलाएं मौखिक तलाक के खिलाफ़ हैं। मुस्लिम महिलाओं ने तलाक को एकतरफा नियम बताया। 93% चाहती हैं कि कानूनी प्रक्रिया का पालन हो। उन्होंने तलाक के केस में मध्यस्थता की मांग की। 'भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन' का कहना है कि 2014 में महिलाओं के 235 मामले, जो कि महिला शरिया अदालत में आए, में से 80 फीसदी मौखिक तलाक के थे।

अपने कार्यक्रम 'बड़ी खबर' से पहले जब कुछ रिसर्च की तो हैरान करने वाली जानकारी मिली। कई इस्लामिक देशों में ट्रिपल तलाक पर पाबन्दी  है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ट्यूनीशिया, अलजीरिया, ईराक, ईरान, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में तो इस पर 1961 में रोक लगा दी गई थी...जब फेमिली लॉ आर्डिनेंस लागू किया गया था। इसके तहत हर शादी की रिजिस्ट्री और तलाक से पहले सुलह की कोशिशें एक सरकारी अधिकारी के सामने ज़रूरी हैं। यह भी पता चला की दूसरी शादी पर मलेशिया और ब्रुनेई में रोक है और तुर्की, मिस्त्र, सूडान, ईराक और पाकिस्तान में यह सख्त कायदों के बाद ही हो सकती है।

कई इस्लामिक देशों में एक तलाकशुदा महिला को जीवन निर्वाह के पैसे पति से मिलते हैं, लेकिन हमारे यहां भारत में उसको वक्फ बोर्ड पर निर्भर रहना पड़ता है। राष्ट्रीय महिला आयोग का कहना रहा है कि सबसे बड़ी मुश्किल मुस्लिम महिलाओं में जानकारी की कमी है। अन्य देशों में महिलाओ ने इस प्रथा के विरोध में आवाज उठाई है, लेकिन यहां उस प्रकार की सक्रियता देखने को नहीं मिली है। इस बारे में अॉल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समय-समय पर चिन्ता जाहिर कर देता है। कहते हैं कदम उठाएंगे, लेकिन हर बार कुछ रुकावटें आ जाती हैं।
नूरजहां साफिया नियाज संबोधित करती हुई 
अल्पसंख्यक आयोग के के पूर्व चेयरमेन प्रोफेसर ताहिर महमूद का कहना है कि ट्रिपल तलाक पर पाबन्दी लगा देनी चाहिए और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को समाप्त कर देना चाहिए। वे मुस्लिम लॉ पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ हैं। उनका कहना रहा है कि मौलवियों ने समाज में सुधार की कोशिशों में रोड़े अटकाए। उनका कहना है कि इसमें न्यायपालिका के दखल की जरूरत है।

'बड़ी खबर' कार्यक्रम के दौरान भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की जैबुनिसा रेयाज का कहाना था कि कुरान की रोशनी में ट्रिपल तलाक के मामलों में सुधार की बड़ी जरूरत है। तलाक में कानून की मदद मिले, सुलह की कोशिशों में भी ऐसी मदद मिले,जिसमें जवाबदेही बनती हो। मौजूदा तरीका बिल्कुल नाकाफी है।


सर्वेक्षण को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरगी महली का कहना था कि यह सैम्पल साइज बहुत छोटा है। इस सर्वे को मुस्लिम महिलाओं की आवाज न समझा जाए। उनका यह भी कहना था कि महिलाओं के लिए जो इंतजाम हैं, वे काफी हैं। बहरहाल हमारे साथ सेंटर फार स्टडी अॉफ डेवलपिंग सोसायटी के असिस्टेंट प्रोफेसर हिलाल अहमद का कहना था कि वे इस स्टडी का स्वागत करते हैं। प्रगतिशील मुस्लिम आवाजों को बुलन्द होने की जरूरत है

पत्र आंदोलन के अधिकारिक ब्लॉग से और नोट एन डी टी वी का एक ब्लॉग , साभार 
Blogger द्वारा संचालित.