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जजिया कर से भी ज्यादा बड़ी तानाशाही है लहू पर लगान



संपादकीय 

सोचता हूँ कि सैनिटरी पैड पर लगाया जाने वाला टैक्स क्या पुरुष लिंग के अहम से उपजा निर्णय नहीं है? क्या निर्णय लेने वाली संस्थाओं पर महिलाओं का नेतृत्व होता तो यह टैक्स लगना या उसे बढ़ाना संभव था? ऐसा इस परिवेश में सोच रहा हूँ जहाँ बमुश्किल 12% स्त्रियाँ ही सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं और शेष, यानी देश की महिलाओं की बहुसंख्य आबादी, पारम्परिक तौर पर इस्तेमाल किये जाने वाले कपड़ों का ही इस्तेमाल करती हैं. कल्पना कीजिए कि इस देश में व्यवस्था पर महिलायें काबिज होतीं तो क्या वे इस तरह के टैक्स के बारे में सोच भी सकती थीं, नहीं. इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि एक महिला सांसद सुष्मिता देव के द्वारा इस तरह के टैक्स के खिलाफ जब ऑनलाइन पेटीशन शुरू किया गया तो महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने अपने कैबिनेट के साथ वित्तमंत्री से आग्रह किया कि सैनिटरी पैड को टैक्स मुक्त करने की दिशा में सरकार आगे बढे.

इस देश में 20% से अधिक लडकियां माहवारी शुरू होने के बाद स्कूल छोड़ देती हैं और जो जाती भी हैं, उनमें से एक बड़ी संख्या माहवारी के दिनों में स्कूल नहीं जाती हैं. माहवारी के दिनों में गंदे कपड़ों के इस्तेमाल से खराब स्वास्थ्य की चिंता करने की जगह व्यवस्था सैनिटरी पैड पर टैक्स बढाने में लगी है.

यूं शुरू हुई हैप्पी टू ब्लीड मुहीम

कंडोम और कंट्रासेप्टिव पर नहीं लगाये जाते टैक्स


सैनिटरी पैड महिलाओं के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा मामला है, और उसपर सरकार टैक्स लगाती है, जबकि कंडोम और कंट्रासेप्टिव पर नहीं. हालांकि कंडोम और कंट्रासेप्टिव भी महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है-खासकर प्रजनन पर आंशिक अधिकार और अनचाहे गर्भ से मुक्ति के प्रसंग में. इन दोनो अनिवार्य उत्पादों का संबंध दरअसल महिलाओं के प्रजनन और सेक्स से जुड़ा मामला है, जिससे पुरुष का अपना वंश जुड़ा है और राज्य की जनसंख्या संबंधी नीति भी, इसके माध्यम से राज्य और परिवार एक हद तक जनसंख्या पर कंट्रोल रखना चाहता है.  लेकिन सैनिटरी पैड  सीधे महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है, जो असंवेदनशील और पुरुषवादी राज्य के लिए एक गैरजरूरी प्रसंग है. इससे स्वास्थ्य के प्रति राज्य का रवैया भी स्पष्ट होता है, जिसके तहत अपने स्वास्थ्य की रखवाली नागरिक का निजी मुद्दा है.

माहवारी पर बात की झिझक हुई ख़त्म


माहवारी के प्रति रवैया और कुंठा 


पिछले दिनों एक शिक्षिका ने बताया कि उसके स्कूल में जब लड़कियों को सैनिटरी पैड बांटने की बारी आती है तो एक अजीब सा माहौल होता है. शिक्षिकाएं इसे बांटने से बचना चाहती हैं. वह स्कूल सह-शिक्षा का स्कूल है. साथी लड़के और किशोर छात्र तथा पुरुष सहकर्मी क्रमशः लड़कियों और शिक्षिकाओं के लिए भी कथित असहज माहौल बनाते हैं. माहवारी के दिन घरों में भी सहज माहौल वाले नहीं होते. आज जब महिलाओं का एक हिस्सा इस पर खुलकर बात करना शुरू कर रही हैं तो उन्होंने कई प्लेटफ़ॉर्म पर बताया है कि कैसे घरों में पुरुष सदस्यों से इसे छुपाया जाता है या कपड़े इस्तेमाल करना, उन्हें धोना-सुखाना कितना गुप्त मिशन सा होता है. ऐसी स्थिति में गंदे कपड़ों का या गीले कपड़ों का इस्तेमाल उनके लिए बीमारियाँ लेकर आता रहा है. माहवारी को अपवित्र भी माना जाता है. एक ओर प्रजनन को पवित्र मानने वाला समाज, देवियों की योनि की पूजा करने वाला और पत्त्थर की मूर्तियों की कथित माहवारी में निकले कथित खून को प्रसाद स्वरुप लेने वाला समाज इन अनिवार्य दिनों से गुजर रही स्त्रियों को अपवित्र मानता है. महिलाओं ने पीढी-दर-पीढी इस मानने को आत्मसात भी कर लिया है. परिणाम स्वरुप माहवारी उनके लिए एक कुंठा लेकर आता है. इस कुंठा के खिलाफ भी मुखर स्त्रियों के एक समूह ने जंग छेड़ रखा है. अपनी बात कह रही हैं, कविताओं में दर्ज कर रही हैं.

महावारी से क्यों होती है परेशानी


सरकार को क्या करना था क्या करने लगी 


स्वास्थ्य सरकारों की जिम्मेवारी है. उसे माहवारी के प्रति अपवित्रता और गुप्तता के भाव के खिलाफ अभियान चलाना चाहिए था. और साथ ही महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड की अबाध और मुफ्त उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए थी. लेकिन इसके विपरीत वह कर लगाती है, कर बढाते जाती है- जिसका परिणाम होगा इस सुविधा से महिलाओं का और वंचन. ऐसा इसलिए होता है कि व्यवस्था पुरुषों के द्वारा पुरुषों के लिए संचालन के अधोषित दर्शन से संचालित होती है. स्त्री उसके लिए एक अलग-‘अदर’ पहचान है. न सिर्फ सैनिटरी पैड के सन्दर्भ में बल्कि में अन्य मामलों में भी ‘अलग पहचान’ का यह भाव सामने आता रहता है. अभी नीट की परीक्षा में लड़कियों के अन्तःवस्त्र निकलवाने का प्रसंग भी प्रायः इसी भाव से प्रेरित है, जिसमें लम्बी अभ्यस्तता के कारण महिलायें भी शामिल हो जाती हैं- यानी महिलाओं के खिलाफ महिला एजेंट हो जाती है. जब व्यवस्था एक ख़ास समूह के प्रति उत्तरदायी हो जाती है, तो इस तरह की घटनाएँ होती हैं. कभी तीर्थ यात्रा के लिए हिन्दू यात्रियों पर लगने वाला जजिया कर, जिसे अकबर ने हटाया था, की तरह ही है हिन्दू-हित की बात करने वाली सरकार के द्वारा महिलओं के लिए अनिवार्य सैनिटरी पैड पर कर लगना या बढाना. यह स्वागत योग्य कदम है कि महिलाओं ने इसपर मुखर विरोध किया है. महिला सांसदों से लेकर सरकार की मंत्री मेनका गांधी तक ने. कई स्त्रियों ने, जिनमें सेलिब्रेटी भी शामिल हैं, सोशल मीडिया में ‘लहू पर लगान’ शीर्षक से इसका विरोध किया है.

संजीव चंदन 

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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छन्ने की लौंडिया गुनगुनाती है

राकेश तिवारी


‘चर्चित कथाकार. उसने भी देखा’ और ‘मुकुटधारी चूहा’ कहानी संग्रह.  एक उपन्यास ‘फसक’. पत्रकारिता पर एक पुस्तक ‘पत्रकारिता की खुरदरी ज़मीन’. संपर्क: 9811807279

छन्ने की लड़की के कल्ले फूटते ही गली बड़ी बेसब्र हो गई।
कुछ-कुछ बेसुरी।
बिना तिराहे-चौराहे वाली इस गली में, जहां वह रहती है, लोग आजकल भटक जाते हैं।  वह सड़क पर आहिस्ता और घर में खुल कर गाती है।
छन्ने की लड़की इन दिनों कतार में खड़ी गुनगुनाती है।
उसी कतार में लगे एक उजले, मुलायम और लचकदार युवक ने उसे ‘अमृता शेरगिल की पेंटिंग से निकल भागी लड़की’ का ख़िताब दिया है।
मुहल्ले की बेडौल और झाईंदार स्त्रियां उसे ईश्वर की बेहतरीन कलाकृति मानती हैं।
 लाइन मारने की उम्र पार कर गए अधेड़ उसे चोर निगाहों से देखते हैं।
गली के लड़कों को यह सोच कर घबराहट होती है कि किसी दिन लड़की के घर के नीचे भी कतार न लग जाए।
अठारह की उम्र में उसके छत्तीस दीवाने हैं और बहत्तर फ़साने।
वह ऐसी ही है।
पर कहते हैं, ‘वैसी’ नहीं है।
पता नहीं।

स्कूटर-बाइक के मैकेनिक आस-पास की गलियों से निकल कर ब्रेक जांचने इसी तरफ़ आते हैं। कालिख लगे कपड़ों में दुपहियों की कान फोड़ हूं-हूं के साथ गली में फर्रांटे भरते हैं और बीच-बीच में ब्रेक की चिंघाड़ गुंजाते हैं। कॉलेज के लड़के आते-जाते इसी गली से होकर गुज़रते हैं। नए-नए मूंछें निकाल रहे स्कूली बच्चे झुंड बना कर एकाध चक्कर गली का लगा जाते हैं। इन दिनों पुलिस भी गुंडे-मवालियों की धर-पकड़ के लिए इसी गली में दबिश दे रही है। कुछ पुलिसिये यूं ही सूंघते-मंडराते हैं। किसी ठेले के हत्थे पर डंडा बजा दिया। किसी की दुआ-सलाम क़बूल की और किसी को बेवजह डपट दिया। नज़र उनकी दुमंज़िले पर रहती है। मंडराने वालों में शादीशुदा फ़रेबी भी हैं। लकदक वर्ग के इज़्ज़दार लोग भी आजकल यहां पाए जा रहे हैं, जो आम तौर पर ऐसी गलियों में नहीं घुसते। जिनके टहलने और पाये जाने के इलाक़े अलग होते हैं। जहां चौड़ी-चिकनी सड़कों के किनारे म्यूनिसिपल्टी के माली फूल-पौधे लगाते हैं।

 गली कौड़ियों वाली एक संकरी गली है। जिसमें दोनों तरफ़ मकान हैं। कुछ मकान बिना पलस्तर के हैं। कुछ जर्जर हैं। कुछ पैंतीस फुट के प्लाट में कुतुबमीनार की तरह खड़े हैं। दुमंज़िले, तिमंज़िले मकानों के नीचे दुकानें हैं। कहीं हुक में बकरे लटके हैं, कहीं पंक्चर लग रहे हैं। कहीं से मूंगफली भुनने की गंध आती है, तो कहीं से तंदूरी रोटी की। यहां सब्जी, फल, छोले-कुलछे और चने-मुरमुरे से लेकर ब्रा तक ठेलों में बिकती हैं। ठेले वाले दुकानों के आगे खड़े रहते हैं और गली को ज़्यादा संकरी बना देते हैं। कई घरों की खटिया और लद्दड़-गूदड़ भी सड़क पर फैला रहता है। औरतें सर्दियों की दुपहरी में धूप की ओर पीठ किये बैठी रहती हैं और बच्चों को कूटती-गरियाती हैं। गर्मियों की रातों में वे आंचल गिराये हाथ-पंखा झलती हैं। हवाओं को लगातार एक ही सूचना देती हैं कि बड़ी उमस है। बच्चे सुबह-शाम नालियों में शौच करते मिल जाते हैं। कभी-कभी उनके शौच में केंचुए (राउंड वर्म) निकलते हैं.  छन्ने कबाड़ी की लड़की इसी गली में रहती है। इन दिनों इसे ‘छन्ने कबाड़ी की लौंडिया वाली गली’ कहा जाने लगा है।

 गली में हर वक़्त किसी न किसी घर से लड़ने-झगड़ने की आवाज़ें आती रहती हैं। अन्यथा ठोक-पीट का शोर और बरतनों की खटर-पटर लगातार चलती है। सुबह से शुरू हुई ये आवाज़ें रात को दस-ग्यारह बजे के बाद थकने लगती हैं। लेकिन सुबह चार बजे से आवाज़ों का जागरण फिर शुरू हो जाता है। इन आवाज़ों को आराम नहीं है।

इसी गली में एक दुकान छन्ने कबाड़ी की है। जिसके सामने सलीम भाई मुर्ग़े वाला क़ाबिज़ है। जहां बीमार लगने वाले पंख नुचे मुर्ग़े और मुर्ग़ियां छोटे-छोटे खानों वाली जालियों में बंद रहते हैं। उसके दाईं तरफ़ तीन दुकान छोड़ कर मितरां दा ढाबा है। यहां से, साठ डिग्री के कोण से, छन्ने का दुमंज़िला साफ़ दिखाई देता है। कुछ हरामी लौंडों का अड्डा यहां भी है। असल में, सलीम भाई की दुकान से आंखों की ‘ कसरत ’ में गर्दन को तकलीफ़ उठानी पड़ती है। उस पर सामने बैठा छन्ने और अंदर बैठे सलीम भाई, दोनों ताड़ लेते हैं। इसीलिए सलीम भाई के ‘कसरती’ लौंडे दिन में दो-चार बार मितरां दा ढाबा की ओर चले आते हैं।



छन्ने की दुकान घर के नीचे है। या यूं कहिए कि दुकान के ऊपर छन्ने का घर है। कभी छन्ने का बाप इस जगह झुग्गी डाल कर रहता था। वह फेरी लगा कर रद्दी ख़रीदा करता था। छन्ने की दुकान के सामने एक बड़ा-सा तराजू लटका रहता है और तराजू के एक पलड़े में हमेशा बड़े-बड़े बाट रखे होते हैं। छन्ने पुराने अख़बार, शराब की खाली बोतलें, प्लास्टिक, लोहा, पीतल  और अल्यूमीनियम ख़रीदता है। पर आपको कोई भी पुरानी चीज़ बेचनी हो और उसके पास जाएं तो वह दाम ज़रूर लगाता है। जैसे कुछ साल पहले एक महिला अपने लकवा पड़े ससुर का हारमोनियम बेचने आ गई थी। हारमोनियम में न लोहा, न पीतल। छन्ने ने दो सौ से बोली लगाई। उस औरत ने तीन सौ पर छोड़ दी। सोचा— चल छोड़ परे, बेकार में जगह घेर रही है। पर छन्ने हारमोनियम का क्या करता ?  घरवाली के आगे पटक कर बोला, “ये ले, इसे बजाया कर।  दिल बहलेगा।”

क़सम खुदा की, इन दिनों गली कौड़ियों वाली में रौनक-मेला लगा है। जिसे देखो वही गली का रुख़   किए हुए है। कुछ लोग जिज्ञासावश आते हैं। एक बार आते हैं तो दुबारा आते हैं। तिबारा आते हैं। कुछ बार-बार आते हैं। गली के लोग सब समझते हैं।  उन्हें पता है कि इतनी तरह के नमूने आख़िर क्यों दिखाई दे रहे हैं।

पर, माफ़ी चाहते हुए, पहले मैं छन्ने की लुगाई का ज़िक्र करना चाहूंगा। एक ज़माने में उसकी खूबसूरती के बड़े चर्चे थे। इसके बावजूद कि लोगों ने उसे उतनी ही बार देखा था जितनी बार गिनती करने में भ्रम नहीं होता। एक बार जब छन्ने सरेआम उसका हाथ दबोचे फिल्म दिखाने ले गया था। उन दिनों गली में दुकानें कम थीं और ऐसी खुल्मखुल्ला दीवानगी भी कोई नहीं दिखाता था। कुछ लोग गश खा गए थे। तीन-चार बार उसे तब देखा गया जब वह पेट से थी और छन्ने उसे अस्पताल ले गया था। पहली ज़चगी तो घर पर ही कर ली थी। एक बार लोगों ने उसे तब देखा था जब वह छन्ने से लड़ कर गली में दौड़ती हुई सरपट निकल गई थी और उसके गालों पर डेढ़ आंसू थे। रोती हुई औरत गली के लोगों को बेहद खूबसूरत लगी थी। जब गली के लोगों को पता चला कि वह छन्ने से अनबन के बाद भागी है तो उनकी निगाह में वह और खूबसरत हो गई थी। कइयों ने उसे पलकों पर बिठा कर रोज़ सुबह रबड़ी-जलेबी और शाम को लाल-हरी चटनी के साथ समोसे खिलाने की कल्पना कर ली थी।
छन्ने की घरवाली जैसे सरपट गई, घंटे भर में वैसे ही सरपट लौट आई। लोगों के दिल में फिर छुरी चली। हाये ! ये क्या हो गया। इतनी जल्दी सुलह-सफाई  ?   कुछ दिन तो सब्र करती। पर खड़ूस तो असल में मायके वाले निकले। बैरंग लौटा दिया— अरे, मार-कूट लिया तो क्या हो गया ?  सब मारते हैं। सबर से काम लो। थोड़ा बर्दाश्त करना सीखो। आहिस्ता-आहिस्ता मुट्ठी में करो और पुचकार कर गले में पट्टा डाल दो।

लकड़बग्घे पट्टा नहीं पहनते। छन्ने ने भी नहीं पहना। उल्टा घरवाली नज़रबंद हो गई। हर दो-ढाई साल में एक बच्चा जनती और महीने-डेढ़ महीने आराम के बाद फिर वही चूल्हा, वही चौका। सुंदरता के पुरस्कार में उसे दीवारें मिली थीं। जिनसे छन कर कभी-कभार सिसकियां और कराहें बाहर जा आतीं। मानो, दीवार सिसकती हो। पड़ोसी अनुमान लगाते कि कबाड़ी अपनी उजली और मूक दीवार पर लात-घूंसे बरसाता होगा । आश्चर्य, खासकर, उन्हें होता जिन्हें अपनी दीवारें कुछ कम उजली या बदरंग लगती थीं। या जिनकी दीवारों के आंख, कान, नाक और मुंह निकले हुए थे।

  खैर, यहां बात कबाड़ी की औरत की नहीं हो रही। वैसे भी, वह अब धुआंई-पीली दीवार बन चुकी थी।
घिसी हुई पीली दीवार।
पिटी हुई पीली दीवार।
बात कबाड़ी की लड़की की हो रही है, जो हर सुबह सूरज की तरह गली में उगती है। धूप से  वायटामिन-डी लेती है और हवा से खनिज पदार्थ। इसीलिए इतनी सुर्ख़ है। इतनी कि अगर अगले साल उसका सपना सच हो गया तो खाते-पीते घर की लड़कियों पर कहर बरपेगा। वह बारहवीं का इम्तिहान देने वाली है। उसने तय कर रखा है कि बारहवीं करते ही कॉलेज जाएगी। कॉलेज जाएगी तो तय था कि वहां औसत रूप-रंग की नख़रीली, ग़ुस्सैल और घमंडी लड़कियों की छुट्टी हो जानी है।

छुट्टी इसलिए हो जानी है, क्योंकि छन्ने की लड़की खूबसूरत है। हरदम मुस्कराती है। बात-बेबात गुनगुनाती है।
लड़की हर सुबह ज़्यादा खिली और स्वस्थ लगती है। उसका निखार दिन पर दिन बढ़ता जाता है। बढ़ते निखार के साथ उसके दीवानों की संख्या बढ़ रही है। इससे छन्ने की दिक़्क़तें बढ़ रही हैं। वह डरा हुआ रहता है। अपनी पत्नी से कहता है, “लौंडिया सयानी हो गई।”
“अभी अठारा की भी ना हुई।”
छन्ने चुप। कुछ सोच कर फिर कहता है, “लौंडिया के पर लिकड़ रहे हैं।”
औरत भुनभुनाती है, “थोड़ा तो उड़ लेन दो। फिर तो…।”
कबाड़ी के दांत बजते हैं। आंखें बाहर निकल आती हैं। भुजाएं फड़कने लगती हैं।

आजकल कई जगह लंबी कतारें लगती हैं। लगती क्या हैं, लोग कतार लगाने को बावले हुए पड़े हैं। एक कतार गली के बाहर, आधा किलोमीटर की दूरी पर लगी है। छन्ने की लड़की रोज़ इस कतार में खड़ी होती है। कतार में खड़ी बुदबुदाती है। शायद प्रार्थना करती है। वह कसमसाती है। कसमसाहट काम नहीं आती। वह गुनगुनाती है। गुनगुनाहट बेअसर हो गई है। वह थोड़ी-थोड़ी देर में पीछे मुड़ कर देखती है। कतार लगातार लंबी होती जाती है। वह पंजों के बल उचक कर आगे देखती है। लोग बातें करते हैं। खूब बातें करते हैं। ज़्यादातर अच्छी-अच्छी और भविष्य को लेकर आश्वस्त करने वाली बातें। कुछ लोग उनसे असहमत होते हैं। पर उनके तेवर देख कर निराश हो जाते हैं। बाकी लोग सहम जाते हैं और छन्ने की लड़की को देखने लगते हैं। कुछेक की निगाहें हटती नहीं। मानो, सुंदरता देश-दुनिया और रोटी-पानी से बड़ी चीज़ हो। छन्ने की लड़की तड़प कर गेट के अंदर देखती है। कुछ नहीं दिखाई देता। वह बेबसी के कतार को देखती है। लेकिन आगे से कतार छोटी होने का नाम नहीं लेती, जबकि पीछे से लंबी होती चली जाती है। लोग खिसक क्यों नहीं रहे ? आगे क्या हो रहा है?  वह सोचती है।

लड़की रोज़ कतार में खड़ी होती है और बुदबुदाती है। मानो, किसी के पसीजने की प्रार्थना करती हो। वह आकाश की ओर देखती है। इधर-उधर देखती है। अपने पैर के नाखूनों को देखती है। चुपचाप। फिर अपनी ही चुप्पी से परेशान हो जाती है और गुनगुनाती है। वह अब भी गुनगुना रही है। पर अचानक कतार में भगदड़-सी मच गई है। मायूस लोग कतार से हटने लगे हैं। आगे से एक कातर-सी आवाज़ आती है। बड़ी ही मायूस और निराशा में डूबी। यह आवाज़ पीछे की तरफ़ आती चली जाती है। कतार की पूंछ तक पहुंच जाती है। सब निराशा में डूब जाते हैं। कुछ लोग भुनभुनाते हुए कतार से हट जाते हैं। कुछ निराशा के बावजूद आवाज़ पर भरोसा नहीं करते और खड़े रहते हैं। क्या पता, सच न हो। ‘विसSSर्जन’ की आवाज़ धोखा हो। वे एक हाथ पेट पर रखते हैं और दूसरे से कंधों को सांत्वना देते हैं। उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।

कबाड़ी की लड़की कतार में लगने के लिए अगले दिन फिर निकलती है। स्कूटर मिस्त्री नसीर अपना खटारा स्कूटर लेकर उसके पीछे लग गया  है। गली से बाहर निकलते ही वह मुख्य सड़क पर पहुंच जाती है। नसीर बड़ी अदा से उसका रास्ता काट कर दाएं से बाईं तरफ़ निकलता है और कुछ आगे चल कर स्कूटर खड़ा कर देता है। वह बिना हैलमेट के है और स्कूटर पर बैठे-बैठे कंघा निकाल कर बाल संवारता है। उसके क़रीब आने से पहले पान का पीक थूकता है। वह पीछे मुड़ कर नहीं देखता, सिर्फ़ कनखियों से देखता रहता है। अपने सेल फोन के साथ खुचर-पुचर करता है। दुबारा कनखियों से देखता है। वह आ रही है। नसीर इधर-उधर देखता है। कहीं कोई है तो नहीं। कोई नहीं है। सिवाय एक झटियल-से आदमी के, जो कंधे पर कोई थैला-सा लिए दूर से चला आ रहा है। वह गली में जाएगा। नसीर अनुमान लगाता है। लड़की के क़रीब आते ही वह ज़ोर से कहता है, “आई लभ्यू।”

तुरंत स्कूटर पर किक मारता है और सर्र-से आगे निकल जाता है। कुछ आगे चल कर पलटता है। लड़की मुस्कराती है। नसीर रुक जाता है। वह क़रीब आती है। नसीर ग़ौर करता है। वह खुश-खुश लगती है। गुनगुनाती हुई उसके बगल से निकल जाती है। वह दाएं हाथ को बाईं तरफ़ लेजा कर सीने पर रखता है और ‘हायेSSS, क्या बात है’ कहता हुआ उसी तरफ़ निकल जाता है जहां, उसे पता है, लौंडिया कतार में लगेगी।

अगले दिन राजू ‘सिक्स पैक’ से मुलाक़ात के दौरान नसीर बताता है, “कल मज़ा आ गया उस्ताद, ‘आइ लभ्यू’ बोल दिया।”
“उसने क्या जवाब दिया ?”
“मुस्करा दी।”
“वह तो हमेशा मुस्कराती है।”
“गुनगुनाने लगी।”
“उससे क्या होता है ? वह हमेशा गुनगुनाती है।… मैंने तो फिलाइंग किस दी थी।” उसने अपना हाथ चूमते हुए हवा में लहराया, “ऐसे।
“तो फिर उसने क्या किया ?”— नसीर ने पूछा।
“मुस्करा दी … और गुनगुनाने लगी।…पर लपेटे में नहीं आती। बड़ी बेरहम लौंडिया है।”
“बेमुरव्वत।” कहते हुए नसीर का उत्साह ठंडा पड़ गया।
    
कोई नहीं जानता कि वह मुस्कराती-गुनगुनाती क्यों है। कोई नहीं जानता कि वह किसी भी फ़ब्ती का जवाब क्यों नहीं देती। कोई कुछ भी बोल दे वह चुपचाप सुनती ही नहीं, बल्कि मुस्करा देती है। उसके मुस्कराने और गुनगुनाने के चर्चे हैं। लोग रीझे हुए हैं। पर सच तो यह है कि वह गली कौड़ियों वाली के लड़कों की परवाह नहीं करती। किसी की नहीं करती। असल में, वह जिन दो सपनों को पोस रही है, उन्हीं में खोई रहती है। एक तो बारहवीं के बाद कॉलेज में एडमिशन लेना है। दूसरा, टीवी पर चलने वाले किसी रियलिटी शो में गाने का एक मौक़ा हासिल करना है।

इसके सिवा, उसे कुछ नहीं दिखाई देता। कुछ सुनाई नहीं देता। सच पूछें तो छन्ने की लड़की को पता ही नहीं कि वह मुस्कराहट बांट रही है। कि लोग उससे उम्मीदें लगा बैठे हैं। अभी तो वह खुद बड़ी उम्मीदों के साथ कतार में खड़ी बुदबुदाती है। पर बुदबुदाहट काम नहीं आती। वह निराश हो जाती है और गुनगुनाती है। गुनगुनाहट में बड़ी ताकत है। यह निराशा से उबारती है। गुनगुनाहट ठंडे आदमी को भी गुनगुना बनाए रखती है।

 वह हरदम संगीत में रमी हुई सुरीली लड़की है। संगीत उसकी मुस्कराहट है और संगीत ही गुनगुनाहट।वह इतनी सुंदर है कि पेंटिंग तो क्या, तस्वीर में मौजूद लड़कियां भी झेंप जाएं। इतना ही सुरीला उसका गला है। वह फ़िल्मी गानों को हू-बहू गा लेती है। उतने ही दर्द के साथ, उतने ही आनंद के साथ। वैसे ही उतार-चढ़ाव के साथ। वैसी ही मुरकियां लेकर। लेकिन उसने संगीत सीखा नहीं है। मां को हारमोनियम बजाने का शौक बचपन से था। कभी वह भी गाती थी। कुछ साल पहले छन्ने ने तीन सौ की हारमोनियम क्या निछावर की, उसे जीने का मक़सद मिल गया। उसने यह मक़सद अपनी लौंडिया को सौंप दिया।

तब से दोनों मां-बेटी साथ बैठ कर हारमोनियम पर गाने-बजाने का रियाज़ करने लगीं। अब मां बजाती है, बेटी गाती है। जब वह गाती है, उसकी गोरी गर्दन पर फूली हुई नीली नसें साफ़ दिखाई देती हैं। जब मां बजाती है, बैठे-बैठे उसकी कमर टेढ़ी हो जाती है। उनकी जुगलबंदी देख कर कई बार ऐसा लगता है, जैसे दोनों गाने-बजाने के लिए ही बनी हैं। गाते-गाते बेटी के दिमाग़ में रियलिटी शो में जाने की धुन सवार हो गई— वहां गाना है जहां सितारे गाते हैं। वहां गाना है, जहां सितारे बनते हैं। नीले आकाश में टंगे पीले सितारे।

 नीले आकाश में टंगने के लिए क्या किया जाए ? उसने कई लोगों से सलाह-मशविरा किया। मां ने भी किया। मां उसे आकाश के भी ऊपर टांगना चाहती है। अलग नज़र आने वाला चमकदार सितारा बना कर। मां-बेटी को ज़्यादातर ने यही बताया कि किसी अच्छे गुरु से संगीत की बारीक़ियां सीखनी होंगी। फ़िल्मी गीत गा लेने से काम नहीं चलेगा। तब उन्होंने गुरु की तलाश शुरू की। कई गुरु-मर्द मिले। लेकिन संगीत में अनाड़ी बाप ने भेजने से इनकार कर दिया। ना। क़तई नहीं। गला पकड़ कर कहेगा, गले से आवाज़ निकालो। फिर पेट पकड़ कर कहेगा पेट से निकालो। और अगर छाती से आवाज़ निकालनी हो तो…। ना। ना बाबा, ना।


 आख़िर लड़की की मुलाक़ात एक गुरुवाइन से हो गई। बिल्लौरी आंखों और कटे बालों वाली गुरुवाइन। जो बिना कत्थे का पान खाती थी। चूना लगा हुआ। गाते हुए उसके मटमैले दांत मुंह से बाहर छलक आते हैं। गदराई औरत और गदराई हुई आवाज़। जब वह गाती है, अपने गदराए हुए पैर हिलाती है। लेकिन बड़ी ही बदमिज़ाज़। अक्खड़ और लठमार भाषा में बात करने वाली। बात-बात में अपमानित करती है। लौंडिया का मन तो नहीं था उससे सीखने का, लेकिन धुन के आगे मन हार गया।

पर गुरुवाइन का एक दूसरा चेहरा भी है। उसे लौंडिया की मां ने देखा है। उसने एक दिन लौंडिया की मां को समझाया था कि लड़की होनहार है। सातवें सुर की तरह चढ़ेगी।

मां ने पूछा कि आसमान पर टंगेगी ?  गुरुवाइन ने कहा— हां, पर दिमाग़ सातवें आसमान में न चढ़े। उससे मत कहना कि मैं उसके बारे में क्या सोचती हूं। कभी मत कहना। सितारे प्रशंसा से नहीं, अपमान और आलोचना से बनते हैं।



जिस वक़्त छन्ने कबाड़ी के ज़ीने में भगदड़ मची, राजू ‘मितरां दा ढाबा’ में चाय पी रहा था। कौड़ियों वाली गली का यह ढाबा अंधेरी सुरंग जैसा लगता है। दोपहर हो या रात, वहां चौदह वॉट का इकलौता सी.एफ.एल. जलता रहता है, जो धुएं से पीला पड़ गया है और ढाबे के अंधेरेपन में जिसका काफ़ी योगदान लगता है। कुछ लोग भागते हुए ज़ीना चढ़ रहे थे। कुछ उतर रहे थे। बच्चों के रोने की आवाज़ें तेज़ होने लगीं। तभी छन्ने एक रोते हुए बच्चे के पीछे-पीछे गोली की तरह सीढ़ियां फलांग गया। अगले ही पल वह अपनी घरवाली को गोद में उठाए ज़ीने से सड़क पर उतर आया। दुकान के बाहर से, दाईं तरफ़ की, नौ खड़ी सीढ़ियां दुमंजिले में पहुंचाती हैं। दो-तीन लोग उसकी ऐंठती-छटपटाती घरवाली का सिर और पैर पकड़े छन्ने की मदद कर रहे थे। छन्ने की दुकान के ठीक सामने एक ऑटो खड़ा हो गया था। उसने तेज़ी से घरवाली को ऑटो में डाला और पीछे खड़ी एक महिला को उसके अंदर लगभग ठेल दिया। दो-तीन बच्चे चीखते हुए ऑटो की तरफ़ लपके लेकिन छन्ने ने उन्हें बाहों से झिंझोड़ कर वापस ज़ीने की ओर धकेल दिया।

ढाबे वाला ऑटो की रवानगी देख कर बोला, “लो, छन्ने ने एक और मॉडल तैयार कर दिया।”  छन्ने ने दूसरे ऑटो को हाथ दिया और बिना कुछ बोले उसमें घुस गया। ऑटो चल पड़ा। एक लड़का दौड़ता हुआ उस ऑटो के अंदर बैठ गया और उसने रफ़्तार पकड़ ली।

 “नहीं, यह ज़चगी का मामला नहीं है।” बगल वाला अधेड़ पनवाड़ी, जो अपनी छोटी-सी दुकान के अंदर पालथी मार कर बैठता है, मुंह बाहर निकाल कर ढाबे वाले को बताने लगा, “वह परास्त होकर कभी नहीं गई।”
पनवाड़ी के मुंह में कोई आधा कप पीक होगा। उसने पीक थूक कर बताया कि छन्ने की घरवाली ज़चगी के लिए हमेशा मुस्कराती हुई गई है। वह योद्धाओं की तरह जाती है। पहले ज़ीना उतर कर पति की दुकान के सामने खड़ी होती है। फिर छज्जों की तरफ़ देखती है और पेट आगे निकाल कर स्कूटर की ओर ऐसे बढ़ती है जैसे कोई बच्चा या शराबी मूतने जा रहा हो। फिर वह स्कूटर पर बैठते-बैठते बच्चों को हाथ हिलाती है। मानो, जंग जीतने की शुभकामनाएं मांग रही हो।


  “नहीं ज़चगी का मामला नहीं है। बात कुछ और है।”—उसने पूरे विश्वास के साथ कहा और अपने खोखे से उतर कर छन्ने की दुकान की ओर बढ़ गया, जहां कुछ लोग अब भी खड़े थे। कुछ लुगाइयां भी थीं। मर्द और औरतें, सभी फुसफुसा रहे थे। छन्ने ने किसी को कुछ नहीं बताया। पर बच्चे बता रहे थे कि मां को कोई फोन आया था। वह चीखी। बिलबिलाती हुई पूरे घर का चक्कर काटने लगी।  ग़ुसलख़ाने की तरफ़ भी भागी थी। फिर धड़ाम् की आवाज़ आई। बच्चों ने देखा, मां फर्श पर गिरी है। उसे क्या हुआ यह पक्के तौर पर कोई नहीं जानता था। बच्चों ने छन्ने को बुलाया। छन्ने ने अपनी पत्नी के मुंह पर पानी के छींटे मारे। मां ने बाप से आधे-अधूरे-से कुछ वाक्य कहे— मेरी लौंडिया।… मेरी सुरीली लौंडिया का आसमान।…पता नहीं क्या हुआ…कोई देखो।

असल में आज लौंडिया फिर कतार में खड़ी थी। नसीर ने आज उसका पीछा नहीं किया। वह अब भी उदास था। राजू ‘सिक्स पैक’ ने दुबारा फ्लाइंग किस दी। वह उसी तरह मुस्कुराई और कतार में समा गई। बाप नहीं चाहता था कि वह कतार में खड़ी हो। लेकिन मज़बूरी। एक तो वह अंगूठा छाप। दूसरा, दुकान छोड़ नहीं सकता। तीसरा, सारी जिंदगी नक़द का धंधा करता रहा। जेब में लिया और जेब से दिया। पर अचानक ही, जेब धोखा दे गई। जो था, सब मिट्टी हो गया। लौंडिया वही मिट्टी लेकर कतार में लगती है। किसी तरह बदली हो जाए।

 कतार में खड़े होते छठा दिन है। केवल कतार का मुंह गेट में घुस पाता है। न पूंछ, न पेट। वह कभी पूंछ में होती है, कभी पेट में। सारा दिन खड़ी रह जाती है। राजू ‘सिक्स पैक’ जैसे धैर्यवान लड़के तक घंटे- दो घंटे में लौट जाते हैं। आख़िर कितनी देर लड़की को देखता रहेगा। पर लड़की के धैर्य ने अब तक जवाब नहीं दिया है। गुनगुनाहट उसका सबसे बड़ा सहारा है।

छन्ने को पता था कि आज लड़की तड़के निकल पड़ी थी। किसी ने लड़की को बताया था कि लोग तो खा-पीकर रात से ही कतार में लग जाते हैं। जिस वक़्त वह पहुंची, कतार उतनी बड़ी तो नहीं थी, लेकिन कई लोग पहले से खड़े थे। उसने अनुमान लगाया और पीछे खड़ी महिला से, जो नाक से बोलती थी, अपनी खुशी साझा की— आज बारी आ सकती है। महिला की नाक ने भी खुशी में मामूली मिनमिन-सी की। मानो, वह पूरी तरह आश्वस्त न हो। गेट खुलने तक कतार इतनी बड़ी हो गई कि घुमा कर लगाई जाने लगी। दोपहर बारह बजे तक कतार धीरे-धीरे खिसकते हुए आगे बढ़ने लगी। वह गेट चढ़ने वाली सीढ़ियों तक पहुंच गई थी। उसे उम्मीद होने लगी कि आज बारी आ जाएगी। उसने पीछे वाली महिला से फिर कहा। महिला की नाक से उम्मीद निकली— हां, लगता तो है।
लौंडिया को बड़ा अच्छा लग रहा था। वह गुनगुनाने लगी। आगे-पीछे खड़े लोग ग़ौर से उसे देख रहे थे। घंटों कतार में खड़ी होने के बावजूद लड़की गुनगुना रही है। ग़ज़ब का धैर्य है। लोगों को आश्चर्य हो रहा था। पीछे खड़ी औरत को नहीं हुआ। वह जानती थी कि यह उम्मीद की गुनगुनाहट है।

 पर उसी वक़्त अचानक भगदड़ मच गई। कुछ लोग घूम कर आ रही कतार की पूंछ से निकल कर मुंह में घुसने लगे। कुछ लोगों ने हल्ला मचा दिया। लड़की भी चिल्लाई। देखते-देखते धक्का-मुक्की होने लगी। लड़की आख़िरी सीढ़ी पर पहुंच चुकी थी। उसे पांच-दस मिनट बाद गेट के अंदर होना था। लेकिन धक्का-मुक्की में वह सीढ़ियों से गिर गई। कहते हैं, ठोढ़ी पर लगने से उसकी जीभ कट गई। कुछ लोगों का कहना था आगे के दो दांत टूटे। लड़की का फोन छिटक कर दूर जा गिरा था। उसके मुंह से एक बार ‘सा-सा, रे-रे, गा-गा’ निकला और फिर खून बहने लगा। लोग घबरा गए। किसी ने लड़की के फोन से की गई आख़िरी कॉल देखी। नंबर मिलाया। उधर से उसकी मां बोल रही थी। फोन करने वाले ने घटना बयान कर दी— लड़की की ठोढ़ी फूट गई। शायद जीभ कट गई हो। या फिर दांत टूट गए। लड़की के मुंह से सरगम के साथ बहुत खून निकल रहा है।

यह सुनते ही मां घर के अंदर भागने लगी। फिर छटपटा कर गिर पड़ी। घर पहुंचा एक पुलिस वाला लगातार एक ही सवाल पूछ रहा था, “बाथरूम की तरफ़ क्यों भागी ?  वहां फिनाइल रखा था ?”
दूसरे नंबर की लड़की ने कहा, “नहीं।”
“उसके मुंह से फिनाइल की बदबू आ रही थी ?”
“जब फिनाइल था ही नहीं तो बदबू कैसे आएगी ?”
“जवाब ‘हां’ या ‘ना’ में दे लौंडिया। ज़्यादा होशियार बनने की ज़रूरत नहीं।” पुलिस वाला खिसिया गया था, इसलिए भुनभुनाने लगा, “किसने क्या पिया और क्या खाया, ये तय करना हमारा काम है।”

घबराए हुए बच्चे पुलिस वाले का चेहरा देखने लगे। अब इस मुसीबत की घड़ी में यह फिनाइल कहां से आ गया ?
छन्ने के घर और दुकान पर भीड़ उमड़ पड़ी। सब बुझे हुए थे। लड़कों की आंखें टपकने को थीं। वे एक-एक कर अस्पताल की ओर भाग रहे थे। कौन जाने खून देना पड़ जाए। किसी ने कहा कि खून देने से भाई-बहन का रिश्ता हो जाता है। नसीर तैश में आ गया, “मुझे परवाह नहीं है। लौंडिया की जान बचनी चाहिए।”

राजू ‘सिक्स पैक’ लगभग रो पड़ा, “मैं तो खून दिए बिना भी उसे बहिन बना सकता हूं। बस, उस सुरीली आवाज़ को बचना चाहिए।”
दीवानों की पलकें सगे भाइयों की तरह भीग गईं।
छन्ने जब मौक़े पर पहुंचा तो कतार फिर से लग रही थी। लोग तेज़ या मद्धम स्वर में बातें कर रहे थे। उसने घृणा से कतार की ओर देखा। कतार के बाहर भी चार-चार, छह-छह लोगों के झुंड दिखाई दे रहे थे। रुई के फाहे जैसा उजला और नाज़ुक लड़का भीगी पलकों वाला दीवाना लग रहा था। वह रुआंसे स्वर में कह रहा था— काश ! लड़की पेंटिंग से निकल कर कतार में खड़ी न हुई होती। काश !… किसी ने उसे टोका, “वह पेंटिंग से नहीं, बांसुरी से निकल कर आई होगी। या फिर सितार से या हारमोनियम से।”

 छन्ने ने सुना और तड़प कर रह गया। वह ऑटो घुमा कर अस्पताल की ओर भागा, जहां लौंडिया को ले जाया गया था। जहां अब तक उसकी मां भी भर्ती हो चुकी होगी। जहां, हो सकता है, दोनों को अगल-बगल लिटाया गया हो। जहां, हो सकता है, अब तक दोनों आपस में बातें करने लगी हों। जहां, हो सकता है, दोनों गुनगुनाने लगी हों। जहां, हो सकता है, दोनों रो रही हों। हो सकता है दोनों ही सो रही हों।

छन्ने भागा चला जा रहा था। उसके दिमाग़ पर लगातार हथौड़ा बज रहा था। क्या हुआ होगा ? लौंडिया की  जीभ तो नहीं कटी होगी। दांत भी नहीं टूटे होंगे। लेकिन ठोढ़ी कितनी फूटी होगी ? उसका सुर तो निकल रहा होगा ? और  उसकी मां ? वो  पागल हारमोनियम ? उसकी धौंकनी को क्या हुआ ? सोचा भी नहीं कि बिना जुगलबंदी के, बिना सरगम के, घर क्या सचमुच घर रह जाएगा ? क्या अब हम दीवारों के बीच के सन्नाटे को सुनेंगे ? वैसे, अगर सन्नाटे का कोई संगीत होता होगा, तो वह ज़रूर पागल कर देता होगा।
अस्पताल पहुंचने में अभी और कितना समय लगेगा ?
कथादेश से साभार

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हिन्दी नवजागरण और स्त्री

अंजली पटेल

,गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत

है. Email : anjalipatelbindki@gmail.com

नवजागरणएक कालवाची शब्द है, जहाँ इसकी पृष्ठभूमि विभिन्न आन्दोलनों से जुड़ती है तो वहीं स्त्री उत्थान की दृष्टि से भी यह कालखण्ड अपना विशेष महत्त्व रखता है।नवजागरण शब्द के अर्थ पर यदि विचार किया जाये तो हमें ‘नवीन चेतना’ का बोध होता है।यह चेतना किस प्रकार उस समय और समाज को प्रभावित कर रही थी? इस चेतना को विकसित रूप प्रदान करने में किन-किन साहित्यकारों एवं समाजसुधारकों का योगदान रहा है?उस समय ही इस चेतना के जागृत या विकसित होने की आवश्यकता क्यों हुई?क्या नवजागरण को स्त्री उत्थान के प्रस्थान बिन्दु के रूप में देखा जा सकता है?यहाँ नवजागरण को लेकर इन सब पक्षों पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। उस समय समाज में साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में स्त्रियों का भी योगदान कम महत्वपूर्ण न था। स्त्रियों ने उस समय हो रहे आन्दोलनों में बढ़चढ़ कर भाग लिया।यह वह दौर था जब स्त्रियोंपर वर्षों से हो रहे अत्याचार पर समाज सुधारकों का ध्यान गया और उन्होंने उनके अधिकारों को महत्त्व दिया। इसके लिए उन्होंने कई आन्दोलन किए, जिसमें न सिर्फ पुरुष, बल्कि खुद स्त्रियाँ भी खुलकर सामने आईं। इन स्त्री समाज सुधारकों के रूप में पण्डिता रमाबाई, ताराबाई शिंदे एवं रख्माबाईअग्रणीय हैं।


नवजागरण का आरम्भ 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से माना जाता है। इस समय ही स्त्रियों द्वारा अपने अधिकार के लिए पूरे विश्व में एकजुट होकर आन्दोलन किया गया था। यही कारण है कि स्त्रियों द्वारा अपने हक़ के लिए सामूहिक रूप से किए गये इस प्रथम प्रयास को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के रूप मं  मनाया जाने लगा।भारत में नवजागरण का उदय सबसे पहले बंगाल और महाराष्ट्र राज्य में हुआ। बंगाल और महाराष्ट्र के समाज सुधारकों ने ही सबसे पहले समाज में फैली बुराइयों पर आव़ाज उठाना शुरू किया। इन समाज सुधारकों में राजाराममोहन राय, महादेव गोविन्द रानाडे, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और केशवचन्द्र सेन आदि को देखा जा सकता है।नवजागरण शब्द का हिन्दी में पहली बार प्रयोग करने का श्रेय मार्क्सवादी आलोचक ‘रामविलास शर्मा’ को जाता है, जिन्होंने 1977 ई. में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और नवजागरण’ में नवजागरण शब्द की संकल्पना प्रस्तुत की है, यह शब्द उन्होंने अंग्रेजी शब्द ‘रेनेसां’ के पर्याय में प्रयुक्त किया है।भारत में नवजागरण का जनक ‘राजाराम मोहन राय’ को माना जाता है,जिन्होंने सती प्रथा,बाल विवाह,पर्दा प्रथा आदि घातक और अनिष्टकारी कुरीतियों का विरोध किया। हिन्दी नवजागरण काल से स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का संबंधभी महत्वपूर्ण है। हिन्दी के विकास में उनका योगदान बहुत अधिक है एवं अन्धविश्वासों और रूढ़ियोंसम्बन्धी मतों का उन्होंने विरोध किया है। इस प्रकार हिन्दी नवजागरणमें स्वदेशीयता की भावना को उजागर करना,धार्मिक अन्धविश्वासों का विरोध करनाएवंसमाज सुधारआदि सभी बातें दिखाई पड़ती हैं।


नवजागरण में समाज में स्वतंत्र अस्तित्व की धारणा परिलक्षित होती है, जिसमें व्यक्ति विकास की ओर उन्मुख होता है।इस समय न केवल पुरुष, बल्कि स्त्रियों में भीअपने अधिकारों के प्रति जागृत भाव पैदा होता है। यही भावना विकसित होकर एक चेतना का रूप ले लेती है, जो नवजागरण में स्त्री उत्थान का प्रमुख कारण बनती है।चाहे वह 1829 ई. में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगना हो या 1856 ई. का विधवा पुनर्विवाह कानून का पारित होना हो या फिर चाहे 1857 ई. की क्रान्ति, सब इसी चेतना का परिणाम हैं। नवजागरण में उपजी यह नई चेतना समाज में हर स्तर पर धीरे-धीरे अपना प्रसार कर रही थी। सामाजिक राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक पहलू इससे प्रभावित हो रहे थे।पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से प्रभावित एक नया बुद्धिजीवी वर्ग तैयार हो रहा था। इस बुद्धिजीवी वर्ग की आकांक्षाएँ पहले से काफ़ी भिन्न थी, जो कि ख़ुद हर तरफ़ बदलाव चाह रहा था। इस नये वर्ग को स्त्रियों की स्थिति में भी कुछ बदलाव की ज़रूरत महसूस हुई। इस नये वर्ग की आकांक्षाओं के अनुरूप स्त्रियों को ढ़ालने के लिए उनकी स्थिति में परिवर्तन करना आवश्यक था।यह परिवर्तन कुछ विशिष्ट गुणों, स्वभाव और विशेषताओं से युक्त स्त्री के रूप में परिलक्षित हो रहा था।लेकिन यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि उन्हें उस समय ही स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?इससे पहले ऐसा प्रयास क्यों नहीं किया गया?इसको जानने के लिए राधा कुमार का यह कथन देख सकते हैं- “स्त्रियों की शिक्षा के आन्दोलनों का उल्लेख आम तौर से उभरते मध्यवर्ग द्वारा अपनी स्त्रियों को पाश्चात्य तौर-तरीकों में ढ़ालने की आवश्कता के रूप में किया जाता है।ब्रिटिश शिक्षा के प्रसार और पुरुषों को रोजगार के नए अवसरों के मद्देनज़र सार्वजनिक तथा निजी का विचार पैदा हुआ तथा दोनों के समन्वय स्थापित करने के बजाय, घर और संसार के बीच विरोध के स्वर उभरे। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो घर एक पुण्य स्थान होने के बजाय परम्पराओं का मुर्दा बोझ ढ़ोता नज़र आया, जिसे फूहड़ और आदिम कहकर धिक्कारा गया।अतः इसे सुधारकर बाहरी दुनिया के साथ सौहार्द स्थापित करने की आवश्यकता दिखाई पड़ी।”1 इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि पुरुष अपने स्वार्थसिद्ध हेतु स्त्रियों की स्थिति में सुधार व शिक्षापर बल देते हैं।इससे पहले समाज में फैली कुरीतियों को ख़त्म करने की ज़रूरत महसूस नहीं होती है।पुरुष वर्ग अपने हित के लिए ही इन स्थितियों में सुधार करने की कोशिश करता है।बहरहाल जो भी हो नवजागरण में स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन हेतु बात तो उठती है। वह किसी भी रूप में क्यों न हो।परिवर्तन की इस दिशा में स्त्री और उसका जीवन बहस का केन्द्रीय मुद्दा बनकर सामने आया। इस सन्दर्भ में राधा कुमार कहती हैं- “उन्नीसवीं सदी को स्त्रियों की शताब्दी कहना बेहतर होगा क्योंकि इस सदी में सारी दुनिया में उनकी अच्छाई, बुराई,प्रकृति, क्षमताएँ एवं उर्वरा गर्मा-गर्म बहस का विषय थे।”2 इस प्रकार नवजागरण को स्त्री आत्मचेतना का प्रारम्भिक चरण कहा जा सकता है।


नवजागरण काल स्त्री हित के दृष्टिकोण से इसलिए भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि वर्षों से लगभग अभिशाप सी बनी ‘सती प्रथा’ को समाप्त करने की पहल ‘राजा राममोहन राय’द्वारा इसी समय की गई।वह पहले भारतीय थे जिन्होंने सती प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन चलाया।1818 ई. में बंगाल के गवर्नर ‘विलियम बैंटिक’ ने प्रान्त में ‘सती प्रथा’ पर रोक लगाई थी और 1829 ई. में इस पर कानून बना दिया गया।बावजूद इसके हिन्दी नवजागरण में‘भारतेन्दु’ विधवा स्त्री के सती होने को प्रोत्साहित करते नज़र आते हैं।स्त्री के लिए भारतेन्दु का आदर्श क्या है, यह उनके ‘नील देवी’ नाटक के अंतिम वाक्य से समझा जा सकता है-“अब मैं सुखपूर्वक सती हुंगी।”3 यह है उनका आदर्श जहाँ स्त्री अपने पति के मृत्यु के बाद उसके हत्यारे से बदला लेकर सती हो जाती है, इससे अधिक भारतेन्दु की नज़रों में स्त्रियों केजीने की कोई उपयोगिता नहीं है। स्पष्ट है कि ‘सती प्रथा’ पर प्रतिबंध लग जाने पर भी उस समय के हिन्दी साहित्यकारों में स्त्री के प्रति सिर्फ सहानुभूति ही थी, उनके अधिकारों और मुक्ति की बात वह स्वीकार नहीं पाए थे।


नवजागरण काल में ही स्त्रियों को शिक्षित करने की पहल सबसे पहले ‘राजा राममोहन राय’ द्वारा स्थापित ‘आत्मीय सभा’ में की गई,क्योंकि किसी भी समाज का आधार-स्तम्भ वहाँ की स्त्रियाँ होती हैं।यदि समाज में सुधार लाना है तो आवश्यक हो जाता है कि पहले स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाया जाये और इसके लिए स्त्री का शिक्षित होना जरूरी है।लेकिन नवजागरण में स्त्रियों कोशिक्षा देने की जो बात उभरकर सामने आती है उसका एक मात्र उद्देश्य था समाज में उदित हुए इस नये बुद्धिजीवी वर्ग के अनुरूप स्त्रियों को ढ़ालना। इन स्त्रियों को शिक्षित करने का उद्देश्य इन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना या आत्मनिर्भर बनाना नहीं था, बल्कि उन्हें उनके पतियों की अनुगामिनी बनाना था।इस बात का साफ़-साफ़ उल्लेख हमें नवजागरण के अग्रदूत कहे जाने वाले ‘भारतेन्दु’ के इस कथन से हो जाएगा- “लड़कियों को भी पढ़ाइए किन्तु उस चाल से नहीं जैसे आज-कल पढ़ाई जाती हैं जिससे उपकार के बदले बुराई होती है।ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें।पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें।”4 भारतेन्दु के इस कथन से हमें उस समय की स्त्री शिक्षा की दशा समझ में आती है।तत्कालीन समाज में ‘स्त्री शिक्षा’को उतना महत्व नहीं मिल पाया था।उस समय लोगों की धारणा थी कि स्त्री को पढ़ाने से वह पथभ्रष्ट हो जायेगी, अतः उसे घर की चार-दीवारी में कैद करके रखा जाता था।उस समय समाज में जो स्त्री शिक्षा दी जा रही थी वह केवल उन्हें एक निपुण गृहिणी बनाने तक सीमित थी।प्रायः उनको रसोई में खाना बनाने व खर्च में मितव्ययता बरतने की शिक्षा दी जाती थी।इस प्रकार शिक्षा के नाम पर स्त्रियों को जो भी सिखाया जाता था वह सिर्फ पति और बच्चों की देखभाल करने और उन्हें खुश रखने तक ही सीमित था।



हिन्दी नवजागरण के आरंभिक दौर के उपन्यासों के केन्द्र में स्त्री शिक्षा ही रही है। जैसे- ‘देवरानी जेठानी की कहानी’, ‘भाग्यवती’, ‘वामा शिक्षक’ एक सीमा तक ‘परीक्षा गुरु’ आदि उपन्यासों में स्त्रियाँ ऐसे चरित्र के रूप में सामने आई हैं, जिनके माध्यम से तत्कालीन समाज व्यवस्था में सुधार की सम्भावना दिखाई पड़ती है।शिक्षा के प्रारूप एवं पाठ्यक्रम को लेकर सबकी एक ही राय थी। आदर्श शिक्षा वही जो लड़की को सुघड़, गृहिणी,समर्पिता पत्नी और कर्तव्य परायण माँ बनाये। उस समय के पाठ्यक्रम में हिन्दी के तत्कालीन दो उपन्यासों (‘देवरानी जेठानी की कहानी’-1870 व ‘भाग्यवती’-1879)को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था। इन दोनों उपन्यासों के केन्द्र में स्त्री शिक्षा है। यह दोनों उपन्यास एक कुशल गृहिणी बनने के सभी गुणों को आधार बना कर लिखे गये हैं।श्रृद्धाराम फुल्लौरी अपने उपन्यास ‘भाग्यवती’ की भूमिका में लिखते हैं- “बहुत दिनों से इच्छा थी कि कोई ऐसी पोथी हिन्दी भाषा में लिखूँ कि जिसके पढ़ने से भारतखंड की स्त्रियों को गृहस्थ धर्म की शिक्षा प्राप्त हो, क्योंकि यद्यपि कई स्त्रियाँ कुछ पढ़ी लिखी तो होती हैं, परन्तु सदा अपने ही घर में बैठे रहने के कारण उनको देश-विदेश की बोल-चाल और अन्य लोगों से बात-व्यवहार की पूरी बुद्धि नहीं होती…और कई विद्या से हीन होने के कारण सारी आयु चक्की और चरखा घुमाने में समाप्त कर लेती हैं।”5 इसके अतिरिक्त ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ में एक पढ़ी लिखी स्त्री और एक अनपढ़ स्त्री में क्या अन्तर होता है? इसको ध्यान में रखते हुए पण्डित गौरी दत्त ने इस पुस्तक की रचना की है। इस सन्दर्भ में उपन्यास की भूमिका में वे लिखते हैं- “पढ़ी और बेपढ़ी स्त्रियों में क्या-क्या अन्तर है, बालकों का पालन और पोषण किस प्रकार होता है, और किस प्रकार होना चाहिए, स्त्रियों का समय किस-किस काम में व्यतीत होता है।बेपढ़ी स्त्री जब एक काम को करती है, उसमें क्या-क्या हानि होती है। पढ़ी हुई जब उसी काम को करती है, उससे क्या-क्या लाभ होता है। स्त्रियों की वह बातें जो आज तक नहीं लिखी गई हैं, मैंने खोज कर सब लिख दी हैं।”6 उपर्युक्त कथनों से स्पष्ट होता है कि इन दोनों उपन्यासों में स्त्री को गृहस्थ कामों में दक्ष होने व अपने कुल की मर्यादा की रक्षा करने वाली शिक्षा दी गई।इस बात का समर्थन करते हुए इन दोनों उपन्यासों के संबंध में ‘रोहिणी अग्रवाल’ का कहना है- “दोनों उपन्यासों का सुर सत्यनारायण व्रत-कथा जैसा विशुद्ध उपदेशात्मक-लड़कियों को पढ़ाओगे तो कुल की मर्यादा, प्रतिष्ठा और समृद्धि बढ़ेगी, नहीं पढ़ाओगे तो आपसी कलह, द्वेष और मूर्खता के कारण स्त्री परिवार और संतान, वर्तमान और भविष्य सब को डुबो देगी। नाक कटेगी सो अलग।”7 स्पष्टहै कि हिन्दी नवजागरण में स्त्री शिक्षा को लेकर उस समय साहित्यकारों द्वारा जो लिखा जा रहा था, वह स्त्री उत्थान या उसके स्वतंत्र अस्तित्व के पक्ष में नहीं था।यहाँ यह विचारणीय है कि उस समय स्त्री शिक्षा को महत्व तो मिला, लेकिन वह शिक्षागृहस्थ धर्म, बच्चों का पालन-पोषण एवं कुल की मर्यादातक ही सीमित थी।


हिन्दी नवजागरण में ही ‘भाग्यवती’ उपन्यास में श्रृद्धाराम फुल्लौरी ने भारतीय स्त्रियों की दशा और उसके अधिकारों को लेकर क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत किए हैं।श्रृद्धाराम फुल्लौरी ने भाग्यवती के पिता पण्डित उमादत्त के माध्यम से बाल विवाह का विरोध कराया है।उपन्यास में उमादत्त जी पूरे तर्क के साथ बाल विवाह का विरोध करते हैं। उमादत्त अपने बेटे लालमणि का विवाह 18 वर्ष होने के पश्चात् करने की बात कहते हैंऔर अपनी बेटी भाग्यवती की 11 वर्ष की हो जाने पर, लेकिन उनकी पत्नी राजी नहीं होती है।वह भाग्यवती की शादी 7 वर्ष में ही करा देना चाहती थी। इस पर उमादत्त कहते हैं पहले विवाह बड़ी आयु में ही हुआ करते थे मगर जब से हमारे यहाँ मुस्लिमों का शासन हुआ। मुस्लिम शासक कुँवारी हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर लिया करते थे, इस्लाम में विवाहित लड़कियों का अपहरण करना वर्जित था। इसलिए सात-आठ वर्ष में ही लड़कियों का विवाह कर दिया जाता था। पत्नी को समझाते हुए उमादत्त जी कहते हैं-“सो अब तो ईश्वर ने हमको उस महाराज अंग्रेज की प्रजा बनाया है कि जो कभी अन्याय नहीं करना चाहता फिर अब छोटी अवस्था में लड़की-लड़कों के विवाह करने में क्या प्रयोजन है?”8 इसमें लेखक ने उस समय समाज में हो रहे बाल विवाह को स्पष्ट तर्क के माध्यम से खत्म करने की बात की है। उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए बाल विवाह किए गए।लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, तो हमें भी बदलना चाहिए न कि रूढ़िवादिता को अपना लेना चाहिए।इस उपन्यास में चारदीवारी के अन्दर स्त्री के शिक्षित-अशिक्षित होने के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया गया, बल्कि घर से बाहर की स्थितियों को विवेक-बुद्धि के माध्यम से सुलझाते हुए चित्रित किया गया है।यद्यपि भाग्यवती की माँ रूढ़िवादी व संकीर्ण सोच की स्त्री के रूप में चित्रित की गई है, लेकिन वह स्वयं पढ़ी लिखी है।इससे वह भाग्यवती को घर पर ही कई विषयों का अध्ययन कराती है। उमादत्त समय-समय पर भाग्यवती की प्रगति रिपोर्ट की सूचना उसकी माँ से लेते रहते हैं।भाग्यवती की माँ पति उमादत्त को बेटी की शिक्षा की प्रगति-सूचना देते हुए बताती है-“सहस्त्रनाम गीता तो आप उससे सुन ही चुके हैं पर उसे पीछे मैंने उसको भाषा व्याकरण,ऋजुपाठ, हितोपदेश और शिक्षा-मंजरी पढ़ाई और अब वह भूगोल-खगोल नाम का ग्रन्थ पढ़ रही है और फिर मेरी इच्छा है कि थोड़ी गणित विद्या पढ़ा के पीछे से आत्मचिकित्सा आरम्भ करा दूंगी, क्योंकि उसके पढ़ने से प्राणी को लोक-परलोक दोनों भाँति के व्यवहार प्रतीत हो जाते हैं गृहस्थ धर्म और मनुष्य धर्म को सर्व प्रकार से जान लेता है…सच पूछो तो हमारी भाग्यवती के समान सीने-पिरोने में इस गली में की कोई लड़की भी चतुर नहीं।”9 इस प्रकार स्पष्ट है कि उस समय स्त्री को दी जाने वाली शिक्षा उसे एक कुशल गृहिणी बनाने पर बल देती थी।

भाग्यवती पढ़ी-लिखी व अपनी समझ-बूझ के कारण अपने ससुराल में बहुत ही सम्मान पाती है।घर का हर सदस्य उससे पूछ कर ही कार्य करता है।घर का कुशल प्रबंधन देख भाग्यवती की सास बहुत खुश होती है और उसे घर की सारी ज़िम्मेदारी सौंप देती है,भाग्यवती उसे बखूबी निभाती भी है।एक बार भाग्यवती के घर भ्रष्ट पुलिस वाले चोरी की तहकीकात के सिलसिले में रिश्वत लेने के उद्देश्य सेउसके घरवालों को धमकाते हैंतो भाग्यवती क़ानूनी भाषा का प्रयोग करते हुए कहती है- “क्यों जमादार जी! आपने हमारे घर की बदनामी या बदमाशी किस मिसल में लिख देखी है या आपको खुद ही हमारे घर पर कुछ शक हुआ है कि जिसके सबब हमारी तलाशी लोगे? अच्छा, हमको सरकारी हुक्म से कुछ उज्र और इनकार नहीं, पर आप हमको इतनी बात एक कागज पर लिख दें कि हम अपने आप इस घर की तलाशी लेते हैं और यह भी बता दें कि यदि हमारे घर से चोरी का कुछ माल बरामद न हुआ तो हम हत्तक की नालिश किस पर करें?”10 स्पष्ट है कि भाग्यवती के पढ़े लिखे होने के कारण ही वह अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर भ्रष्ट पुलिस वालों को अच्छा सबक सिखाकर उनको उन्हीं की भाषा में करारा जवाब देती है। यहाँ भाग्यवती का व्यक्तित्व इस बात को और पुष्ट कर देता है कि उस समय स्त्रियों को इसलिए ही शिक्षित बनाया जा रहा था कि वह अच्छी गृहस्थी चलाएँ और अपनी कुल-मर्यादा को बढ़ाएँ।



नवजागरण काल में सामाजिक स्तर पर स्त्री-मुद्दों को लेकर हो रहे आंदोलनों में स्त्री को एक ‘आदर्श हिन्दू स्त्री’ की रूढ़ि छवि में बांध दिया जाता है।ब्याह के बाद उस शिक्षित, सुयोग्य कुलवधू के लिए पितृ-पक्ष के पास बस एक ही उपदेश होता है, जिसमें उसे सिखाया जाता है कि पति और ससुराल पक्ष की सेवा करना और नितांत अभावों में रहकर भी कुल की मर्यादा को बनाए रखना।हिन्दी नवजागरण में स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखे गए प्रमुख उपन्यास ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ में भी यही बात सामने आती है।इस उपन्यास में छोटेलाल की पत्नी (जो कि पढ़ी-लिखी थी)के पिता का पत्र आता है उस पत्र में लिखा होता है-“मैं तुमसे उसी दिन प्रसन्न हूँगा जब मैं यह सुनूंगा कि तम्हारी ससुराल वाले तुमसे प्रसन्न हैं। तुम्हारा पढ़ना-लिखना उसी दिन काम आवेगा जब तुम अपनी सास की आज्ञा में रहोगी। अपने धर्म-कर्म पर चलना, ईश्वर को याद रखना। आए-गए का आदर-सम्मान करना, यह अच्छे कुल की बेटियों के धर्म हैं।”11 क्या एक स्त्री को इसलिए ही शिक्षित किया जाता है कि वह अपने ससुराल वालों की सेवा कर सके? पति धर्म व अतिथि धर्म निभा सके।क्या इसके अतिरिक्त उसके जीवन में शिक्षा का कोई महत्व नहीं है? यह सब पक्ष हिन्दी नवजागरण में स्त्री अस्तित्व और अस्मिता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं, जो यह स्पष्ट करते हैं कि स्त्री सशक्तिकरण की जड़ें बुनियादी तौर पर इतनी खोखली क्यों हैं? समाज में यह रूढ़िवादिता आज इतनी हावी हो चुकी है कि न केवल पुरुष, बल्कि खुद स्त्रियाँ भी पति धर्म और ससुराल पक्ष में कुल की मर्यादा के लिए खुद को मिटा देने में गर्व का अनुभव करती हैं।

हिन्दी नवजागरण में ही स्त्री हित की बात करने वालों में ‘पण्डिता रमाबाई’ का नाम आता है। उनके लिए स्त्री-शिक्षा केवल कुशल गृहिणी बनने तक सीमित नहीं थी और न ही अक्षर-ज्ञान व हिसाब-किताब तक। वह ऐसी शिक्षा चाहती थीं, जो स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाए और सामाजिक कुरीतियों से लड़ने का बल प्रदान करे। इसी प्रकार ‘ताराबाई शिंदे’ और ‘रख्माबाई’ ने भी अपने-अपने विचारों से ‘बाल विधवा’ व ‘अनमेल विवाह’ को लेकर आन्दोलन किया।उनके इस तरह के उठाये गये कदमों का भारतीय नवजागरण के नेताओं ने साथ नहीं दिया और उसे एक तरह का अपवाद मानकर चुप रहे। साथ ही साथ हिन्दी पट्टी के समाज सुधारक व राजनेता उनकी विद्रोही प्रवृति को कुचलकर एक आदर्श हिन्दू पत्नी बनाने को दृढ़ रहे। इस सन्दर्भ में ‘दयानंद सरस्वती’ की इस टिप्पणी को देख सकते हैं- “लड़कियों की शिक्षा का चरित्र लड़कों की शिक्षा से भिन्न होना चाहिए…हिन्दू लड़की को हिन्दू लड़कों से भिन्न प्रकृति के कार्य करने होते हैं अतः मैं उस व्यवस्था को प्रोत्साहित नहीं करूँगा जो उन्हें उनके राष्ट्रीय चारित्रिक गुणों से वंचित कर दे। हम अपनी लड़कियों को ऐसी शिक्षा नहीं देंगे जो उनकी सोच को बदल दे।”12 विचारणीय है कि यहाँ भी बेटा-बेटी में भेद-भाव देखने को मिलता है जो आज तक नहीं बदल पाया है।महान समाज सुधारक ‘दयानंद सरस्वती’ का स्त्री-शिक्षा के प्रति यह दृष्टिकोण स्त्री हित के लिए कहीं से भी न्यायोचित नहीं जान पड़ता है।उस समय स्त्री-उत्थान के लिए सबसे जरूरी था स्त्री की सोच में बदलाव लाना और यह बदलाव स्त्री को शिक्षित करके ही लाया जा सकता था। परिणाम स्वरूप पुरुष वर्चस्व के चलते इन महिला समाजसुधारकों का विरोध किया गया और स्त्री-शिक्षा और उस समय के हिन्दी साहित्य में ऐसी विषयवस्तु को केन्द्र में रखा गया, जिससे स्त्रियाँ अपनी सोच को बदल न पाएँ और पति की दासता और गृहस्थ धर्म को ही सर्वोपरि मानती रहें।

यह विडम्बना ही है कि हिन्दी में नवजागरण युग की लेखिकाएँ एक ‘अज्ञात हिन्दू महिला’ (जिनकी 1882 में रचित पुस्तक ‘सीमंतनी उपदेश’ को डॉ धर्मवीर ने 1984 में खोज निकला) और ‘दुखिनीबाला’ (जिनकी 1915 से 1916 तक ‘स्त्री दर्पण’ में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित पुस्तक ‘सरला:एक विधवा की आत्मजीवनी’ को प्रज्ञा पाठक ने 2005 में ‘कथादेश’ में प्रकाशित कराया)को साहित्यक परिदृश्य से गायब कर दिया जाता है। उनके लेखन को पुरुष के समकक्ष नहीं माना जाता है।स्त्रियों द्वारा अपने अधिकारों की मांग किए जाने पर उसे कठोरता से उपेछित कर दिया जाता था।उनका मानना था कि स्त्रियों को स्वतंत्र होकर निर्णय लेने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। परिवार के दायरे के भीतर रहते हुए पुरुषों के हाथों से ही उद्धार होना चाहिए।‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका पतिव्रता धर्म की आलोचना करते हुए कहती हैं-“ऐ नेक गरीब भोली हिन्दनियों, इस खुदमतलबियों के कहने को हरगिज न मानो। तुमको पतिव्रता महात्म्य सनाते हैं और तुम्हारे खाविंदों को कोकशास्त्र और नायिकाभेद और बहार ऐश और लज्ज्तुल निसा की पोथियाँ सुनाकर कहते हैं- इस दुनिया में जिसने दो चार दस बीस कन्याओं का संग नहीं उसका पैदा होना ही निष्फल है।”13 इससे स्पष्ट है कि हिन्दी नवजागरण में स्त्रियों को पतिव्रता रहने का पाठ पढ़ाया जाता था और पुरुष को एक नहीं कई स्त्रियों के साथ संबंध बनाने की बात कही जाती रही है।इस प्रकार उस समय स्त्रियों को घर के अन्दर व शिक्षा में पुरुष के समकक्ष रहनेके अधिकार नहीं थे।समाज में यही मानसिकता आज भी कार्य कर रही हैऔर यही मानसिकता स्त्री हित के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है, जिसे दूर किए जाने की जरूरत है।


हिन्दी नवजागरण में स्त्री हित के लिए लड़ने वाली ‘अज्ञात हिन्दू महिला’ ने तमाम विरोधों के बावजूद हार नहीं मानी। वह समाज में पुरुषों का हित साधने के लिए महिलाओं को शिक्षा दिये जाने के तर्क को स्वीकार नहीं करती हैं। उन्हें स्त्री के लिए ऐसी शिक्षा चाहिए थी, जिससे वह अपना जीवन खुद सवाँर सके।स्त्री का किसी और पर आश्रित होना उन्हें स्वीकार्य नहीं था। यद्यपि वह पुरुषों की प्रगति का विरोध नहीं करती हैं। वह तो बस स्त्री-प्रगति के लिए चिंतित हैं।इस सन्दर्भ में अपने एक कथन में वह कहती हैं-“अगर कहो कि हिन्दुस्तानियों ने विद्या में बहुत तरक्की की है और इल्म हासिल किया है, बेशक माना। फिर हमें क्या, एक के खाना खाने से दूसरे का पेट नहीं भरता है।”14यहाँ लेखिका ने सिर्फ पुरुषों को ही बढ़ावा दिए जाने को गलत बताया है।उनकी नज़र में स्त्री को भी पुरुषों के समान प्रगति के सारे अवसर मिलने चाहिए।स्त्रियों के प्रति यही उपेक्षित भाव उसके पिछड़ेपन का प्रमुख कारण रहा है।

नवजागरण काल में स्त्रियों को एक वस्तु के रूप में देखा जाता रहा है, जिसे पुरुष जिस रूप में चाहे उसमें ढ़ाल सकता है। स्त्रियों की अपनी कोई इच्छा-आकांक्षा नहीं होती है, उनसे एक आदर्श पत्नी की तरह व्यवहार करने की कामना की जाती है।स्त्रियाँ ऐसा करती भी हैं, जिसे नवजागरण के समय के प्रमुख हिन्दी उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’ में मदनमोहन की पत्नी में शत प्रतिशत घटित होते दिखाया गया है।वह अपने पति की सच्ची शुभचिंतक, सुख-दुःख की सच्ची संगिनी व हमेशा आज्ञा का पालन करने वाली पत्नी के रूप में दिखायी गई है।उसका अपना कोई नाम नहीं होता है वह ‘मदनमोहन की पत्नी’ के नाम से ही जानी जाती है। शुभचिंतक स्त्री जब अपने पति को कोई नेक सलाह देना चाहती है, तो उसे बड़ों की तरह दबाकर नहीं, बराबर वालों की तरह झगड़ कर नहीं, अपितु किस तरह विचार कर देती है, इसे इस कथन में देख सकते हैं- “छोटों की तरह अपने पति की पदवी का बिचार करके उनके चित दुःखित होनें का बिचार करके, अपनी अज्ञानता प्रकट करके, स्त्रियों को ओछी समझ जता कर धीरज से अपना भाव प्रकट करती है, परन्तु कभी लौटकर जवाब नहीं देती, बिबाद नहीं करती।”15 इसमें एक आदर्श स्त्री की छवि गढ़ने की कोशिश की गई है, जिससे वह कभी समानता व मुक्ति की बात न सोच सके।

स्त्री को हमेशा ही ऐसी शिक्षा दी जाती रही है कि पुरुष उससे श्रेष्ठ है।समाज में स्त्री की अपेक्षा पुरुष को ही अधिक सम्मान मिलता है। इसका कारण यह है कि समाज में पुरुष का ही वर्चस्व है, वह धन का उपार्जन करता है और उसकी एक छवि हम सब के मन में अंकित हो गई है।हिन्दी नवजागरण में भी यही भाव देखने को मिलता है। लाला श्री निवास दास कृत 1882 ई. में प्रकाशित उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’में भी पतिव्रता धर्म चित्रित हुआ है।इस सन्दर्भ में उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र मदनमोहन की पत्नी के कथन को देखा जा सकता है- “प्यारे प्राणनाथ! मैं आपकी हूँ और अपनी चीज पर उसके स्वामी को सब तरह का अधिकार होता है।”16 इससे यह स्पष्ट होता है कि वह अपने को चीज ( दासी ) समझने का अधिकार खुद पुरुष को दे रही है। पुरुष वर्ग तो ऐसा चाहता ही है।यहाँ विचारणीय बात यह है कि समाज में पुरुषों को सबसे ज्यादा सम्मान खुद स्त्रियों द्वारा ही दिया जाता है।तमाम व्रत-उपवास और जी हुजूरी स्त्रियाँ ही वर्षों से पुरुषों के लिए करती आई हैं। अतः जब तक स्त्रियाँ खुद पुरुषों की जी हुजूरी का विरोध नहीं करेंगी तब तक स्त्री-मुक्ति का सपना साकार नहीं हो सकता है।

नवजागरण काल में विधवा पुनर्विवाह के मुद्दे को उठाया जाता है, इससे पहले ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया था।लेकिन प्राचीन काल में विधवाओं के विवाह की प्रथा थी मगर वह विवाह मृत पति के छोटे भाई देवर से ही हो सकती थी।नवजागरण के समय में कई पुरुष सुधारकों ने विधवाओं के प्रति उदारता और करुणा का भाव दिखाया और विधवा पुनर्विवाह को उचित ठहराया है। सर्वप्रथम ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने 1856 ई. में विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबंध को हटाने का अभियान चलाया, जिसमें वे काफ़ी हद तक सफल भी होते हैं। लेकिन समाज इसको पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर पा रहा था।इस सन्दर्भ में भारतेन्दु के इस कथन को देख सकते हैं- “जो विधवा विवाह नहीं करती है, उसको पाप तो नहीं होता, पर जो नहीं करती, उसको पुण्य अवश्यक होता हैं।”17 स्पष्ट है कि समाज में यह धारणा थी कि जब एक विधवा स्त्री दूसरा विवाह करती है तो वह पाप की भागीदार बनती है।यहाँ विचारणीय यह है कि ऐसी मान्यताओं के चलते यदि कोई विधवा स्त्री अपना पुनर्विवाह कर भी ले तो क्या वह शोषित होने से बच जाएगी? उसके सामने वही परिस्थिति पुनः भी आ सकती है। इस सन्दर्भ में अज्ञात हिन्दू महिला का कहना है कि- “पुनर्विवाह करने की इच्छा करने वालियों को याद रखना चाहिए कि हमें भी शादी करने के पीछे इन्हीं के मानिंद रोना पड़ेगा। जहाँ हजार-लाख-करोड़ को ठोकर खाते देखा, हमको चाहिए कि हम भी अंधों के माफिक अपने तई गिरवें नहीं बल्कि देख के कदम रख उसको जीत लेवें।…हे प्यारी बहनों, वही काम करों जिससे तुम्हें इस दुनिया में सुख मिले। बड़े भारी दुखों की जड़ काम है। पहले काम को रोको। इसको रोकने की यह तजवीह है की जब इसका ख्याल पैदा हो तक इसके दुखों का ख्याल करो।”18 लेखिका के इस कथन पर यदि विचार करें तोस्पष्ट हो जाता है कि एक विधवा स्त्री को पुनर्विवाह करने से पहले अपने वैवाहिक-जीवन की समस्याओं पर विचार कर लेना चाहिए।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि हिन्दी नवजागरण में स्त्री-उत्थान के लिए अनेक प्रयास किए गए। उस समय वर्षों से रूढ़ि बनी कुरीतियों को समाप्त करने के लिए अनेक आन्दोलन चलाये गये जो स्त्री हित की दृष्टि से कारगर साबित हुए।साथ ही स्त्रियों की सोच में बदलाव व उन्हें जागरूक करने के लिए स्त्री शिक्षा को महत्व दिया गया। वर्षों से चली आ रही सती प्रथा, बाल विवाह, परदा प्रथा आदि कुरीतियों को बंद कराया गया।इस प्रकार हिन्दी नवजागरण को स्त्री-उत्थान के प्रस्थान बिंदु के रूप में देखा जा सकता है।नवजागरण में एक तरफ जहाँ स्त्रियाँ अपने शोषण के प्रति आवाज उठा रही थीं, तो दूसरी ओर उस समय के पुरुष समाज सुधारक एवंसाहित्यकार स्त्री की ऐसी छवि गढ़ रहे थे जिसके सूत्र उनके शोषण से जुड़ रहे थे।उस समय के हिन्दी साहित्य में स्त्री को आदर्श पत्नी व कुलीन बहू जैसे चरित्रों से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा था।इसका प्रभाव यह हुआ कि स्त्री के खुद के मन में भी उसकी यह छवि अंकित हो गई।परिणामस्वरूप स्त्री ने खुद ही आदर्श पत्नी व कुलीन बहू के संस्कारों को अपना लिया।आज स्त्री अगर शोषित या उत्पीड़ित है तो उसका एक कारण यह है कि स्त्री खुद अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को चुपचाप सहन कर लेती है।जब तक स्त्री खुद अपने उत्पीड़न का प्रबल विरोध नहीं करेगी तब तक स्त्री, आदर्श पत्नी व कुलीन बहू जैसे तमगों के कारण उत्पीड़ित होती रहेगी।हिन्दी नवजागरण में रख्माबाई, पण्डिता रमाबाई एवं ताराबाई शिंदे जैसी स्त्री समाज सुधारकों ने ही स्त्री हक़ के लिए सर्वप्रथम प्रयास किए थे।जिसके परिणामस्वरूप उस समय स्त्री अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हुई।जबकि उस समय के पुरुष समाज सुधारकों द्वारा स्त्री हित के लिए जो भी प्रयास किए गए वह कहीं न कहीं उनके खुद के स्वार्थ हेतु थे।

सन्दर्भ-सूची

1. कुमार,राधा, स्त्री संघर्ष का इतिहास, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2011, पृष्ठ संख्या- 39
2. वही, पृष्ठ संख्या-23
3. http://hindisamay.com/title= नील देवी/भारतेन्दु हरिश्चंद्र
4. सं.-ओमप्रकाश सिंह, भारतेन्दु हरिश्चंद्र ग्रंथावली- 6, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, संस्करण- 2010, पृष्ठ                     संख्या-70
5. सं.- मधुरेश,  भाग्यवती, यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- भूमिका
6. http://hindisamay.com/title= देवरानी जेठानी की कहानी/पण्डित गौरी दत्त
7. अग्रवाल,रोहिणी, स्त्री लेखन:स्वप्न और संकल्प,राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2012,            पृष्ठ सं-43
8. सं.- मधुरेश,  भाग्यवती, यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 25
9. वही, पृष्ठ संख्या-  28-29
10. वही, पृष्ठ संख्या-101
11. http://hindisamay.com/title= देवरानी जेठानी की कहानी/पण्डित गौरी दत्त
12. कुमार, राधा, स्त्री संघर्ष का इतिहास, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2011, पृष्ठ संख्या- 72
13. सं.- डॉ. धर्मवीर, सीमन्तनी उपदेश, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2006, पृष्ठ संख्या-112
14. वही, पृष्ठ संख्या- 44
15. दास, श्रीनिवास, परीक्षा-गुरु, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 89
16. वही, पृष्ठ संख्या- 163
17. http://hindisamay.com/title= वैदिक हिंसा हिंसा न भवति/भारतेन्दु हरिश्चंद्र
18. सं.- डॉ. धर्मवीर, सीमन्तनी उपदेश, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2006, पृष्ठ संख्या-88

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अरे वे माँ नहीं, भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ) थीं !

स्त्रीकाल डेस्क 
भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट) लीला सेठ का कल निधन हो गया. वह 86 साल थीं और कल रात दिल का दौरा पड़ने से नोएडा स्थित निवास पर उनका निधन हो गया. उनके बेटे शांतुम के अनुसार ‘‘कल रात करीब दस बजकर 28 मिनट पर दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.”
लखनऊ में वर्ष 1930 में जन्मी लीला सेठ भारत की पहली महिला थीं, जिन्होंने 1958 में लंदन बार की परीक्षा पास की थी. 1959 में उन्होंने कोलकाता  और पटना में कानूनी प्रक्टिस शुरू की और 19 साल बाद 1978 में दिल्ली हाई कोर्ट में पहली महिला न्यायाधीश बनीं. इसके 13 साल बाद हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं. 1995 मे उन्होने पुलिस हिरासत मे हुई राजन पिलाई की मौत की जांच के लिये बनाई एक सदस्यीय आयोग की ज़िम्मेदारी संभाली. 1998 से 2000 तक वे भारतीय विधि आयोग की सदस्य रही और हिन्दू उतराधिकार कानून में संशोधन कराया जिसके तहत संयुक्त परिवार मे बेटियों को बराबर का अधिकार प्रदान किया गया.2012 में निर्भया काण्ड के बाद बनी जस्टिस वर्मा कमिटी की वे सदस्य थीं.
लीला सेठ की आत्मकथा ‘आॅन बैलेंस’, हिन्दी अनुवाद ‘घर और अदालत’ बहुचर्चित आत्मकथाएं रही हैं. उन्होंने 2014 में प्रकाशित हुई किताब ‘टॉकिंग आॅफ जस्टिस: पीपुल्स राइट्स इन मॉडर्न इंडिया’ भी लिखी, जिसमें उन्होंने 50 साल से ज्यादा लंबे अपने कानूनी करियर में अपने सामने आए महत्वपूर्ण मुद्दों की बात की.2010 में उन्होंने एक किताब ‘वी द चिल्ड्रेन ऑफ़ इंडिया’ लिखी.
और हाँ, वे प्रसिद्द लेखक विक्रम सेठ की माँ थीं.

निलंबित हुईं नक्सलियों के शहरी नेटवर्क के शक के साथ संविधानवादी जेलर वर्षा डोंगरे

स्त्रीकाल डेस्क 
 
फेसबुक पर अपने पोस्ट से छतीसगढ़ के प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा देने वाली रायपुर सेंट्रल जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को सरकार ने निलंबित कर दिया है. हालांकि उनके निलंबन की वजह फेसबुक पोस्ट नहीं है, बल्कि उनकी छुट्टी बताई जा रही है.  वर्षा डोंगरे को ईमेल के जरिए छुट्टी खारिज किए जाने की सूचना भेजी गई थी, लेकिन 6 मई तक ड्यूटी से नदारद होने की दलील के साथ जेल मुख्यालय ने उन्हें निलंबित कर दिया. वर्षा पर जेल मैन्युअल की धारा 207 का उल्लंघन करने का आरोप है. 
 
इससे पहले वर्षा डोंगरे के फेसबुक पोस्ट के मामले को सरकार ने गंभीरता से लिया था, जिसके बाद जेल प्रभारी आर आर राय की अध्यक्षता में जांच कमेटी का गठन किया गया था. इस मामले की जांच जारी है.  उनकी पोस्ट को लेकर उन्हें नोटिस जारी करके जवाब तलब किया है. सूत्रों के अनुसार सरकार को शक है कि कहीं वर्षा डोंगरे शहरी नक्सल कनेक्शन तो नहीं !
कुछ दिन पहले रायपुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने छतीसगढ़ पुलिस के बीच यह कह कर हडकंप मचा दिया है कि पुलिस आदिवासी लड़कियों को नग्न करती है और उसके हाथों और स्तनों पर करेंट लगाया जाता है. यह सब उन्होंने अपने फेसबुक के एक स्टेट्स में लिखा था. हालांकि वह स्टेट्स अब उनके एफबी वाल पर नहीं है, उन्हें इसी बीच शो-काज नोटिस थमा दिया गया था.  इसके पहले भी छत्तीसगढ़ की  पीएससी के परीक्षाफल को लेकर वर्षा डोंगरे की  याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पहले ही फटकार लगाई थी और वर्षा डोंगरे के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला दिया है.
वर्षा डोंगरे का फेसबुक पोस्ट: 
 
मुझे लगता है कि एक बार हम सबको अपना गिरेबान झांकना चाहिए. सच्चाई खुद-ब-खुद सामने आ जाएगी. घटना में दोनों तरफ से मरने वाले अपने देशवासी है. भारतीय हैं, इसलिए कोई भी मरे तकलीफ हम सबको होती है. पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में लागू करवाना. उनके जल-जंगल-जमीन को बेदखल करने के लिए गांव का गांव जला देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिला नक्सली हैं या नहीं इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दूध निकालकर देखा जाता है. टाइगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान पांचवीं अनुसूची के अनुसार सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन को हड़पने का.आखिर ये सब कुछ क्यों हो रहा है? नक्सलवाद का खात्मा करने के लिए. लगता नहीं.
 “सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल-जंगल-जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है. वे नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं, लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू-बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं. उन्हें फर्जी केसों में चारदीवारी में सड़ने के लिए भेजा जा रहा है, आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाए? ये सब मैं नहीं कह रही बल्कि सीबीआई रिपोर्ट कहती है. सुप्रीम कोर्ट कहती है. जमीनी हकीकत कहती है. जो भी आदिवासियों की समस्या का समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं, चाहे वह मानवाधिकार कार्यकर्ता हों, चाहे पत्रकार…उन्हें फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूंस दिया जाता है. अगर आदिवासी क्षेत्रों में सब कुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है? ऐसा क्या कारण कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता है.”
“मैंने स्वयं बस्तर में 14 से 16 साल की माड़िया- मुड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था, जिन्हें थाने में महिला पुलिस को बाहर कर नग्न कर प्रताड़ित किया गया था. उनके दोनों हाथों की कलाइयों और स्तनों पर करंट लगाया गया था. जिसके निशान मैंने स्वयं देखे. मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टॉर्चर किए गए. मैंने डॉक्टर से उचित उपचार और आवश्यक कार्रवाई के लिए कहा.”
उन्होंने लिखा है, “हमारे देश का संविधान और कानून किसी को यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें. इसलिए सभी को जागना होगा. राज्य में पांचवीं अनुसूची लागू होनी चाहिए. आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए. उन पर जबरदस्ती विकास न थोपा जाए. जवान हो किसान सब भाई-भाई है. अत: एक-दूसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और न ही विकास होगा. संविधान में न्याय सबके लिए है.”
“हम भी सिस्टम के शिकार हुए, लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े. षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई. प्रलोभन और रिश्वत का ऑफर भी दिया गया. हमने सारे इरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई, आगे भी होगी.”
सोनी सोरी का समर्थन 
पुलिस दमन की शिकार रही सोनी  सोरी ने स्त्रीकाल को बताया कि “वर्षा उनकी भी जेलर रही हैं. शायद अपनी जिम्मेवारी के दवाब में वे काफी सख्त भी थीं. मैं जेल में उनसे भी नफरत करती थी, लेकिन जब मैं जेल से बाहर आने लगी तो उन्होंने मुझसे माफी मांगी और तब मुझे लगा कि वे अलग हैं और अधिकारियों से वे जेल में सिर्फ अपनी ड्यूटी निभा रही थीं . आज उन्होंने जो भी कहा है, ‘ सौ फीसदी सच कहा है, मैं उनके साहस को सलाम करती हूँ.

सोनी सोरी की जेलर रही वर्षा डोंगरे ने कहा पुलिस करती है महिलाओं का अश्लील टॉर्चर

स्त्रीकाल डेस्क 


दो दिन पहले रायपुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने छतीसगढ़ पुलिस के बीच यह कह कर हडकंप मचा दिया है कि पुलिस आदिवासी लड़कियों को नग्न करती है और उसके हाथों और स्तनों पर करेंट लगाया जाता है. यह सब उन्होंने अपने फेसबुक के एक स्टेट्स में लिखा था. हालांकि वह स्टेट्स अब उनके एफबी वाल पर नहीं है, उन्हें इसी बीच शो-काज नोटिस थमा दिया गया है.  इसके पहले भी छत्तीसगढ़ की  पीएससी के परीक्षाफल को लेकर वर्षा डोंगरे की  याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पहले ही फटकार लगाई थी और वर्षा डोंगरे के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला दिया है. देखें उनका पूरा पोस्ट और जानें उनके जेल में बंद रही सोनी सोरी क्या कहती हैं उनके बारे में: 


रायपुर की डिप्टी जेलर का नक्सल समस्या पर फेसबुक स्टेट्स: 

मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सच्चाई खुदबखुद सामने आ जाऐगी… घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं…भारतीय हैं । इसलिए कोई भी मरे तकलिफ हम सबको होत है । लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना… उनकी जल जंगल जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाऐं नक्सली है या नहीं इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दुध निकालकर देखा जाता है । टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों के जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान अनुसार 5 वी अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमींन को हड़पने का…. 

सोनी सोरी



आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है । नक्सलवाद खत्म करने के लिए… लगता नहीं । सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्ही जंगलों में है जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है । आदिवासी जल जंगल जमींन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है । वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केशों में चार दिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है । तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाऐ… ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहता है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहता है । जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हो चाहे पत्रकार… उन्हे फर्जी नक्सली केशों में जेल में ठूस दिया जाता है । अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है । ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता ।





मैनें स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था । उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था जिसके निशान मैने स्वयं देखे । मैं भीतर तक सिहर उठी थी…कि इन छोटी छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए…मैनें डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा ।
हमारे देश का संविधान और कानून यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें…।
इसलिए सभी को जागना होगा… राज्य में 5 वी अनुसूची लागू होनी चाहिए । आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए । उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जावे । आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं । हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक… पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझे …किसान जवान सब भाई भाई है । अतः एक दुसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा…। संविधान में न्याय सबके लिए है… इसलिए न्याय सबके साथ हो… 


हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए… लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई प्रलोभन रिश्वत का आफर भी दिया गया वह भी माननीय मुख्य न्यायाधीश बिलासपुर छ.ग. के समक्ष निर्णय दिनांक 26.08.2016 का para no. 69 स्वयं देख सकते हैं । लेकिन हमने इनके सारे ईरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई… आगे भी होगी ।अब भी समय है…सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे ।
ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे….
जय संविधान जय भारत





क्या कहती हैं पुलिस कस्टडी और जेल में पुलिस अत्याचार की शिकार रही सोनी सोरी अपने इस पूर्व जेलर के बारे में: 
सोनी  सोरी ने स्त्रीकाल को बताया कि “वर्षा उनकी भी जेलर रही हैं. शायद अपनी जिम्मेवारी के दवाब में वे काफी सख्त भी थीं. मैं जेल में उनसे भी नफरत करती थी, लेकिन जब मैं जेल से बाहर आने लगी तो उन्होंने मुझसे माफी मांगी और तब मुझे लगा कि वे अलग हैं और अधिकारियों से वे जेल में सिर्फ अपनी ड्यूटी निभा रही थीं . आज उन्होंने जो भी कहा है, ‘ सौ फीसदी सच कहा है, मैं उनके साहस को सलाम करती हूँ.’

नोटिस की पुष्टि के लिए जब वर्षा से सम्पर्क किया गया तो उनसे सम्पर्क नहीं हो सका 

हमारे समय के अंधेरे में



स्त्रीकाल डेस्क


 जनवादी लेखक संघ और राजेंद्र प्रसाद अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार दिनांक 29 अप्रैल, 2017 को आइटीओ के निकट राजेंद्र प्रसाद भवन, नई दिल्ली में मुक्तिबोध के जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर एक परिसंवाद का आयोजन किया गया. परिसंवाद की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखक दूधनाथ सिंह ने की. स्वागत वक्तव्य राजेंद्र प्रसाद अकादमी के निदेशक अनिल मिश्र ने दिया. कार्यक्रम का संचालन आलोचक-कथाकार संजीव कुमार ने किया. स्वागत वक्तव्य में अनिल मिश्र ने कहा कि यह बड़ा संकटपूर्ण समय है. ऐसे कठिन दौर में समाजवादी और साम्यवादी धाराओं में एकता होनी चाहिए. अगर यह एकता संभव नहीं तो उनमें आपस में संवाद तो होना ही चाहिए. 1973 में स्थापित राजेंद्र प्रसाद अकादमी के बारे में उन्होंने कहा कि राजेंद्र भवन में अकादमिक गतिविधियों को फिर से तेज किया जा रहा है. संचालक संजीव कुमार का कहना था कि परिसंवाद का शीर्षक बांधता नहीं बल्कि यह खुलकर बातचीत करने का अवसर देता है. उन्होंने बताया कि मुक्तिबोध पर दो दिनों का एक उत्सवधर्मी कार्यक्रम इस वर्ष नवंबर महीने में किया जाएगा जिसमें मंचन, रचनापाठ और परिचर्चा आदि का समावेश रहेगा. आलोचक आशुतोष के एक लेख के हवाले से उन्होंने कहा कि ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है त्यों-त्यों मुक्तिबोध समकालीन होते जा रहे हैं. बिना ग्राम्शी को पढ़े मुक्तिबोध आर्गेनिक बुद्धिजीवी की बात कर रहे थे. क्या हमारा बुद्धिजीवी समाज से कटा हुआ ‘ब्रह्मराक्षस’ होगा? आज फासीवाद हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित कर रहा है. संविधानेतर शक्तियों को सरकार प्रश्रय दे रही है. पुलिस गुंडों की हिफाजत कर रही है. रामजस प्रकरण इसका ताजातरीन उदाहरण है. उत्तर प्रदेश की पुलिस किस दायित्व के निर्वहन में लगा दी गई है?

 परिसंवाद का आरंभ करते हुए कवि-चिंतक मनमोहन ने कहा कि बिना क्रांतिकारी चुनौती के प्रतिक्रांति का बड़ा अभियान चला हुआ है. मुक्तिबोध का जन्म शताब्दी वर्ष इस तरह का होगा, सोचने की बात है यह. मुक्तिबोध के समय में जनवादी संस्थाएं बन रहीं थीं. नई कविता के दौर में उन्हें पहचान मिली. ’70 के दशक की अकविता के ‘निह्लिज्म’ (सर्व नकार) के लिए मुक्तिबोध जरूरी थे. रचनात्मक अंतर्दृष्टि देने वाले रचनाकार के रूप में मुक्तिबोध हमारे साथ रहे हैं. वे प्रगतिवाद की मुख्यधारा में नहीं रहे. उन्होंने अपनी अलग राह बनाई. मुक्तिबोध से जैसा रिश्ता बनना चाहिए था, नहीं बना. उनकी आइकॉनिक छवि उनसे संवाद करने में बाधा रही है. उनकी छवि से तरह-तरह के काम लिए गए. कला की रहस्यात्मकता उनके साथ जुड़ी रही है. आजादी के बाद जो जनतांत्रिक खाका बना उसकी कृत्रिमता को, उसके सतहीपन को उन्होंने समझ लिया था. उन्होंने आजादी के बाद की परिस्थिति को तस्लीम किया. शीतयुद्ध के सवालों को, परिमल के प्रश्नों को मुक्तिबोध ने झूठा नहीं कहा. बदले परिवेश में प्रगतिशील आंदोलन को अभिव्यक्ति के प्रश्न की गहराई से जोड़ा. सामाजिक जनतंत्र के बगैर राजनीतिक जनतंत्र नहीं चल सकता- आंबेडकर के इस निष्कर्ष की ताईद मुक्तिबोध के यहाँ है. जो जनवाद की जगह है वही फासीवाद का कार्यस्थल भी है. ‘कामायनी’ के मनु का उनका विश्लेषण देखिए. वैयक्तिकता का उभार का कारण स्पष्ट होगा. राजनीति ने समाज सुधार का काम छोड़ दिया. इस किनाराकशी से विच्छिन्न ‘व्यक्ति’ का जन्म हुआ. ऊपर जो फासीज्म दिख रहा है वह नीचे से ताकत ले रहा है. इसने राज्य पर कब्ज़ा कर लिया है. राजनीतिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की तैयारी की जा रही है. कांग्रेसमुक्त भारत के नारे को मुक्तिबोध के लंबे दु:स्वप्न के संदर्भ में पढ़िए. मुक्तिबोध की कैनोनिकल उपस्थिति सदा-सर्वदा के लिए नहीं है. उन्हें निशाने पर लेना बहुत आसान है. कल कहा जा सकता है कि वे बेकार हैं, कठिन हैं, टी.एस. इलियट की नक़ल हैं. हिंदी पाठ्यक्रमों का मुक्तिबोध से नफरत का रिश्ता है. मुक्तिबोध आज के और आगे के कवि हैं. जो साहित्य में, विचार-जगत में नए-नए आ रहे हैं, उन तक मुक्तिबोध को पहुँचाना पड़ेगा. मुक्तिबोध का ‘सेलिब्रेशन’ भी खतरा है.

अधिग्रहण और कुपाठ से मुक्तिबोध को बचाए जाने की जरूरत रेखांकित करते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि जिस आसन्न फासीवाद से मुक्तिबोध रूबरू थे वह आज हमारे सामने है. रूलिंग विचारधारा के रूप में. इतिहास पर मुक्तिबोध की पुस्तक प्रतिबंधित की गई थी. चीन के हमले ने बहुसंख्यकवाद की विचारधारा को साम्यवाद पर हमले का अवसर दिया था. तभी से कम्युनिस्टों को देशद्रोही कहे जाने की शुरुआत हुई थी. नेहरू और नेहरूवियन मॉडल की कई चीजों की आलोचना करने वाले मुक्तिबोध ने नेहरू की मृत्यु पर कहा था कि अब फासीवाद का खतरा बढ़ गया है. मुक्तिबोध ने वर्ग की बात करते-करते जाति-वर्ण के प्रश्नों को पीछे कर देने की वामपंथी पद्धति की आलोचना की थी. उनके भक्तिकाल पर लिखे निबंध को याद किया जा सकता है जहाँ कबीर और तुलसी आमने-सामने हैं. मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन पर उनकी टिप्पणी को याद कीजिए और आज स्वच्छता, पर्यावरण आदि पर कार्यक्रम कराने वाली साहित्य अकादमी से उसकी तुलना कीजिए, मुक्तिबोध की दूरदर्शिता स्पष्ट हो जाएगी. वीरेन्द्र यादव ने कहा कि मुक्तिबोध के वैचारिक पक्ष को नज़रअंदाज़ करके हम उनके साथ अन्याय करेंगे.

 यह हो सकता है कि हमें यूपी पुलिस को बचाने की आवाज उठानी पड़े- इस बिडंबना की ओर इशारा करते हुए आलोचक गोपालजी प्रधान ने कहा कि मुक्तिबोध ऐसे मुद्दों को छूते हैं जिसे पढ़ते हुए हम शर्मिंदा होते हैं. हममें आत्मालोचन के साहस की कमी आई है. मुक्तिबोध अपने वर्ग के प्रति निर्मम थे. वे आत्मालोचन को कसौटी की तरह इस्तेमाल करते थे. गोपालजी ने कहा कि मार्क्सवादी वैचारिकी में सामाजिक और राजनीतिक श्रेणियों के मध्य दरार नहीं थी. यह दरार बाद में आई है. इसे पाटने की जरूरत है. मुक्तिबोध ने अपने समय से जूझते हुए अपने लिए सम्पूर्ण वैचारिकी बनाई थी. अपने लिए विचार आयत्त किया था. भक्त कवियों के बारे में जैसे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि उनकी कविता उनके दार्शनिक चिंतन का सह-उत्पाद है उसी तरह कहा जा सकता है कि मुक्तिबोध का रचनाकर्म उनकी वैचारिकी का हिस्सा है, सह-उत्पाद है. गोपालजी ने जोर देकर कहा कि भारतीय मार्क्सवादियों ने सोवियत रूस के समक्ष कभी आत्मसमर्पण नहीं किया. वे हंगरी, चेकोस्लोवाकिया आदि के संबंध में भी संवेदनशील, खुले हुए रहे हैं.

हिंदी कविता की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर शुभा ने मुक्तिबोध की रचना ‘नए की जन्मकुंडली’ के संदर्भ में कहा कि मुक्तिबोध इसकी तरफ ध्यान दिलाते हैं कि स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी परिघटना संयुक्त परिवार का टूटना और एकल परिवार का बनना है. पतिव्रता धर्म, वर्णव्यवस्था ये सब समाज की स्वचालित मशीनें हैं. जब धर्म का अनुशासन टूट रहा था तब हमने उसका विश्लेषण नहीं किया. अब जैसे पूरा समाज और परिवार अंतःप्रवृत्तियों को सौंप दिया गया है. यह आत्मग्रस्तता कन्जूमरिज्म के आगे की चीज है. मुक्तिबोध के संदर्भ से शुभा ने कहा कि बाहर परिवर्तन की बात करना और घर के अंदर उसे बनाए रखना सबसे बड़ा पाखण्ड है. परिवार में फासिज्म की मौजूदगी को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि जेंडर, दलित और परिवार पर चुप्पी ने वर्ग संघर्ष की संकीर्ण अवधारणा को जन्म दिया. डेमोक्रेसी एक सुविधा बन गई. सामाजिक रूपांतरण का मुद्दा स्थगित हो गया. रूपांतरण का बीज शब्द आत्मसंघर्ष है. गाँव किले की तरह अभेद्य रहे. दुलीना में पाँच दलितों को गाय के नाम पर मार दिया गया. गाँव का रूपांतरण हमारे अजेंडे में कभी न आया. रिस्क न लेकर, परिवर्तन को जगह न देकर भी साहित्यकार बने रहना पाखंडी होना है. आज दलित और स्त्री विमर्श में भी दक्षिणपंथ आ बैठा है. मध्यवर्ग का बनना कभी रुका नहीं. अभी नया मध्यवर्ग सामने आ रहा है. साहित्यकार प्रतिपक्ष बन सकते हैं, वे प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने को तैयार रहें. वे न अपने को विशिष्ट मानें और न विशिष्ट बनें.



 वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि वे मुक्तिबोध से तब मिले जब 17 वर्ष के रहे. जब वे 24 वर्ष के हुए तब मुक्तिबोध की मृत्यु हो गई. परिचय के ये सात साल न पर्याप्त हैं और न उल्लेखनीय. मुक्तिबोध ने गढ़े गए लालित्य के स्थापत्य को ध्वस्त किया. जब साम्यवादी व्यवस्थाएं नृशंसता पर उतर आई थीं तब उन्होंने अंतःकरण का प्रश्न उठाया. पिछले 50 वर्ष की कविता ने मुक्तिबोध से बहुत कम सीखा है. कवि लालित्य में ही उलझे रहे हैं. मुक्तिबोध के बीज शब्द हैं- आत्मसंघर्ष, अंतःकरण और आत्माभियोग. मुक्तिबोध अपनी जिम्मेदारी को केंद्रीय मानते हैं. वे सबसे बड़े आत्माभियोगी कवि हैं. उन्होंने 1964 में जिस फैंटेसी को प्रस्तुत किया था वह 2014-15 में साकार हो गई. ऐसा दुनिया के साहित्य में बहुत कम हुआ है कि फैंटेसी साकार हो जाए. ‘अंधेरे में’ कुल चार चरित्र हैं- टालस्टाय, तिलक, गाँधी और अनाम पागल. इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण गाँधी का चरित्र है. मुक्तिबोध गाँधीवादी से मार्क्सवादी बने थे. उनमें गाँधी वाला तत्व कभी समाप्त न हुआ. अभी हमने युवाओं का एक सम्मेलन किया था. 56 युवा आए थे. किसी ने न मुक्तिबोध का जिक्र किया और न राजनीतिक परिस्थिति का. अशोक जी ने कहा कि मुक्तिबोध की इतिहास वाली किताब के विरोध में जो मार्च निकला था उसमें वामपंथी भी शामिल थे. इसने मुक्तिबोध को तोड़ दिया. वे कभी इस आघात से उबर न सके.


 लेखक-विचारक चंचल चौहान ने कहा कि उन्होंने एम.ए. का लघु शोधप्रबंध मुक्तिबोध पर लिखा था. मार्क्सवाद को समझे बगैर मुक्तिबोध की कविताएं दुरूह लगेंगी. उनकी कविताओं की बड़ी ख़राब व्याख्या राम विलास शर्मा ने की थी. नामवर सिंह की आलोचना ने भी न्याय नहीं किया. मुक्तिबोध ने जोर देकर कहा था कि मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिलते. परिवर्तन सर्वहारा ही करेगा. चिंतकों, साहित्यकारों को सर्वहारा से जुड़ना होगा. चंचल चौहान ने कहा कि मध्यवर्ग के प्रति प्रगतिशीलों का रवैया ठीक नहीं है. मुक्तिबोध इसे ठीक करना चाहते थे. फासीवाद के दौर में आप एक बड़े वर्ग को छोड़कर मुकाबला नहीं कर सकते.


 कवि-विचारक अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि लेखकों की जन्मशताब्दी मनाने के कारणों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए. पिछली शताब्दी के छठे-सातवें दशक में मुक्तिबोध को लेकर जो बहसें हुई हैं वे दिक्कततलब हैं. हमें कविताओं को स्थिर कर देने से बचना चाहिए. मुक्तिबोध द्वंद्व से आगे बढ़कर त्रिकोण बनाते हैं. इस त्रिकोण की पहचान करनी होगी. अच्युतानंद ने प्रश्न किया कि मुक्तिबोध के यहाँ प्रकृति इतनी भीषण रूप में क्यों आती है? सूखी बावड़ी, घुग्घू उनकी कविताओं में बार-बार आए हैं. असल में, मुक्तिबोध औद्योगिक क्रांति के कारण मनुष्य और प्रकृति के बीच बिगड़े संतुलन को देख रहे थे. ये खतरे बाद के दिनों में बढ़े हैं. अभी कॉल सेंटरों में, एप्प-जगत में कैसी सामाजिकता विकसित हो रही है? आज के टकरावों को समझने के लिए ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान मुख्य टूल हो सकते हैं. टकराव से बने अंतरालों को बचाने की बात मुक्तिबोध के यहाँ है. हम जिस कौम की चर्चा करते थे उसमें बदलाव आ चुका है. अब यह कहना कि जिंदा कौमें 5 वर्ष तक इंतजार नहीं करतीं, कोई अर्थ नहीं देता. अब तो कौमें 10 वर्षों तक इंतजार करने को तैयार दिखती हैं. कौमों के चरित्र में आए बदलाव को समझना होगा.

 वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी ने कहा कि नई पीढ़ी ने मुक्तिबोध को समझे बिना ही उनका स्वागत किया. गाँधी की हत्या समाज में फासिज्म की मौजूदगी का उद्घोष था. मुक्तिबोध आगे की इत्तिला देते हैं. उन्होंने इस हत्या को, पंजाब और बंगाल परिघटनाओं को देखा था. मुक्तिबोध की शैली पुराणकारों की शैली लगती है- भविष्य की सूचना देने वाली. कबीर और मुक्तिबोध ऐसे रचनाकार हैं जो हमेशा प्रासंगिक रहेंगे.

आलोचक वैभव सिंह ने कहा कि ‘अंधेरे में’ चेतावनी देने वाली रचना है. वह ‘डिस्टोपिया पोएट्री’ है. अमेरिका में इस समय डिस्टोपिया उपन्यास खूब पढ़े जा रहे हैं. प्रेमचंद ने साहित्यकार को स्वभावतः प्रगतिशील बताया था. मुक्तिबोध ने इस अवधारणा को तोड़ा. प्रेमचंद कवच की तरह इस्तेमाल किए जा रहे थे. वैभव सिंह ने कहा कि बहुत से लेखक इस समय चुप्पी के मोड में चले गए हैं. चुप हो जाना कई बार तंत्र की मदद करना होता है. तीसरी दुनिया के देशों की वैचारिक हलचलों के स्रोत के रूप में मार्क्सवाद रहा है. मुक्तिबोध की समझ के निर्माण में मार्क्सवाद की मुख्य भूमिका रही है लेकिन रेणु के साथ मुक्तिबोध ऐसे लेखक हैं जिन्होंने खुद मूल्यों को अन्वेषित किया था. मुक्तिबोध कंटेंट की कमी की बात नहीं करते, वे शिल्प की कमी की बात करते हैं. ‘अंधेरे में’ कविता में सबसे ज्यादा प्रकाश के बिंब हैं. ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ मध्यवर्ग की बनावट के भीतर है. यह मध्यवर्ग किसी लाभ के लिए कैसा भी समझौता करने को तैयार है. मुक्तिबोध देख रहे थे कि लोकतंत्र के अंदर फासीवाद की प्रवृत्तियाँ मौजूद रहती हैं. खतरा हमेशा बना रहता है. वैभव सिंह ने कहा कि मुक्तिबोध के यहाँ विचारधारा और निजी बौद्धिक ईमानदारी का सुमेल है.


 संपादक-कवि मदन कश्यप ने इस जिज्ञासा से अपनी बात शुरू की कि ‘अंधेरे में’ कविता में आखिर वह कौन-सी बात है कि यह सारे आंदोलनों से जुड़ जाती है! सभी आंदोलनों ने अपने को इस कविता से जोड़ा, नक्सलवाड़ी ने भी. यह वर्ष अक्टूबर क्रांति का वर्ष भी है. महिमामंडन के दौर में हम क्रांति की विफलताओं पर भी बात करें. साहित्यकार समय की जटिलता के हिसाब से विचारधारा का विस्तार करते हैं. राजनेता उसका सरलीकरण करते हैं. मदन जी ने अति लोकप्रियता को लोकतांत्रिक नहीं माना. अति लोकप्रियता डर से पैदा होती है. आज के शासक की लोकप्रियता नेहरू वाली लोकप्रियता नहीं है. इसकी व्याख्या की जानी चाहिए; विरोध करने से काम नहीं चलेगा. आज की क्रूरताओं के विकास में हमारी क्या भूमिका है- मुक्तिबोध और नागार्जुन से हम इसकी पहचान करना सीख सकते हैं. हम धर्म को, नैतिकता को उनके खाते में डाल आए; उन्होंने जो चाहा, किया. मुक्तिबोध ने इन प्रश्नों को छोड़ा नही था. हम अपनी अक्षमता को स्वीकार करते हुए संघर्ष की तरफ जाएं.

कथाकार रजनी दिसोदिया ने कबीर की साखियों के हवाले से मुक्तिबोध को समझने का उद्यम किया. उन्होंने कहा कि ‘अंधेरे में’ कविता आपको अंदर तक देख लेती है. आज का मध्यवर्ग जगा हुआ है मगर वह रिस्क नहीं ले सकता. हमारी भूल गलती आज जिरहबख्तर पहन कर बैठी हुई है. हमने पूरे संवैधानिक तरीके से उसे चुना है. जो पोस्ट-ट्रुथ है उससे कैसे लड़ें? यह जटिल स्थिति है. भारत बहु सत्यों वाला देश है. हम थोड़ा-थोड़ा सबसे उलझ सकते हैं मगर किसी को बर्खास्त नहीं कर सकते. अभी जो भी मारे जा रहे हैं, सामान्य लोग हैं. चाहे वे सेना के सिपाही हों, आदिवासी हों या किसान. रजनी दिसोदिया ने मिथकों से टकराने का भी सुझाव दिया.


 कवि-अनुवादक संजीव कौशल ने कविता के लिए ज्ञान और संवेदना दोनों को अनिवार्य माना. उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध इस संबंध में कवि से प्रतिबद्धता की मांग करते हैं. वे कवि को एक्टिविस्ट के रूप में भी देखना चाहते हैं. आज तक कविता की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी जा सकी है. यह विधा निरंतर वर्धनशील है, किसी खांचे में बंधने से इनकार करती हुई. संजीव कौशल ने कहा कि जब बहुत आवश्यक है तब लेखकों के बीच संवाद ठप पड़ा है. आज हम जो देख रहे हैं वह अभी पाँच-सात साल और चलेगा. इसके बाद अपने-आप ढह जाएगा. जनता खुद ढहा देगी.


 कवि-कार्यकर्ता-आलोचक बली सिंह ने मुक्तिबोध को आधुनिकता का बहुत बड़ा क्रिटीक माना. मनुष्य-केंद्रित आधुनिकता को भयंकर समस्याग्रस्त बताते हुए बली सिंह ने मनुष्येतर जगत के प्रति संवेदना पैदा करने की जरूरत बताई. मुक्तिबोध को उन्होंने दबी-कुचली अस्मिताओं से तादात्म्य स्थापित करने वाला कवि बताया. जिस ‘श्यामल समूह’ का जिक्र मुक्तिबोध की कविता में आता है वह यही अस्मिता है. मुक्तिबोध ने अपने को क्रांतियुग का कवि माना था, उत्पीड़ित समुदायों के उभार वाले युग का कवि. सत्-चित्-आनंद की त्रयी को सत्-चित्-वेदना में बदलने वाले मुक्तिबोध ने पूँजीवाद को जिन्न कहा था. सुनहरी दुनिया बसा देने वाला जिन्न आज मध्यवर्ग को सम्मोहित किए हुए है.

आलोचक कवितेन्द्र इंदु ने कहा कि जैसे हिंदू जनता पर्व-त्यौहार के अनुसार देवताओं को याद करती है वैसे ही हम लोग भी जन्म शताब्दियों के अवसर पर लेखकों को याद करते हैं. जिस भाव से कुछ वर्ष पहले राम विलास शर्मा को याद किया था गया था वैसे आज मुक्तिबोध को याद किया जा रहा है. हमने मुक्तिबोध को मौलिक आलोचक की तरह देखने की कोशिश नहीं की है. मुक्तिबोध ने आलोचना की शब्दावली विकसित की. उनकी प्रासंगिकता इससे जांची जाए कि उनका लिखा हुआ आज घटित हो रहा है. वामपंथी समीक्षकों ने जाति और जेंडर पर मुक्तिबोध के विचारों की समीक्षा नहीं की. ऐसा लगता है कि इसे उन्होंने किसी ‘दलित’ या ‘स्त्री’ विमर्शकार के लिए छोड़ रखा है. भक्ति आंदोलन पर मुक्तिबोध का निबंध ऐतिहासिक महत्व का है. जब इतिहास के पुनर्लेखन का काम होना चाहिए था, संक्षिप्त इतिहास लिखने का चलन है. जिस अकादमिया पर वामपंथियों का वर्चस्व रहा है उसका उन्होंने क्या किया है… हमने कैसी यूनिवर्सिटी बनाई है? लेखक संगठनों में व्यापक एकता की जरूरत बताते हुए कवितेन्द्र ने पूछा कि कई संगठन मिलकर काम क्यों नहीं कर सकते?

 वरिष्ठ लेखिका रेखा अवस्थी ने कहा कि मुक्तिबोध संस्कृति और आत्मा के संकट की पहचान करने वाले रचनाकार हैं. आजादी के बाद जो विचलन आया उसे संभालने में हम विफल रहे. हमने आत्मसंघर्ष की कसौटी भुला दी. मुक्तिबोध का संगठन पर विश्वास था तभी उन्होंने ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्य’ जैसी कहानी लिखी. लेखक-प्राध्यापक रोहिताश्व ने अन्य भाषाओँ के समानधर्मा लेखकों से जुड़ने की बात की. सचेत हुए बिना किसी दूसरे कलबुर्गी की हत्या रोकी नहीं जा सकेगी. जलेस के महासचिव मुरलीबाबू ने कहा कि मुक्तिबोध का साहित्य फासीवादी निरंकुशता के दौर को परिभाषित करता है. उन्होंने कहा कि संगठनों का मजाक उड़ाने वाले व्यक्तिवादी हैं.


परिसंवाद की अध्यक्षता कर रहे दूधनाथ सिंह ने कहा कि मुक्तिबोध की सबसे अच्छी कविता ‘चंबल की घाटियाँ’ है. डकैत चंबल की घाटियों में ही नहीं रहते, अन्यत्र भी होते हैं. चर्चित कविता ‘भूल-गलती’ का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा कि अगर इस कविता में ‘आलमगीर’ शब्द न आया होता तो हम शिवाजी-औरंगजेब के संदर्भ को पकड़ न पाते और मुक्तिबोध की मराठा पक्षधरता को देखने में चूकते जाते. हमें मुक्तिबोध की सीमाओं पर भी बात करनी चाहिए. सिर्फ वाह-वाह करके हम किसी का भला नहीं करेंगे. मुक्तिबोध की भाषा में जो तात्समिकता है वह उनके मराठीभाषी होने के कारण है. वे उस तात्समिकता से बड़ा काम निकालते हैं मगर वही उनकी सीमा भी है. वे कभी उससे मुक्त नहीं हो पाए. साहित्यिक संगठन को जरूरी बताते हुए उन्होंने कहा कि जनता की चेतना का स्तर उठाने का काम जारी रहना चाहिए. इससे सत्ता परेशान होती है और ध्यान देती है. बड़े कवि की पहचान कराते हुए उन्होंने कहा कि कविता में संस्कृतियों का सम्मिश्रण काम्य स्थिति है. जायसी को उद्धृत करके हुए सत्राध्यक्ष ने परिसंवाद का समापन किया-  ‘केहि न जगत जस बेचा, केहि न लीन्ह जस मोल. जो यह पढ़ै कहानी, हम संवरै दुइ बोल ..’

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क्या ‘महिलायें’ सिर्फ़ ‘पुरुषों’ की जरुरत की वस्तु हैं ??

हिमांशु यादव

जर्मन अध्ययन केंद्र ,गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत है. संपर्क :9998780243, 9104676458

Email : yadavhimanshu2642@gmail.com

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। हमारे देश में यह प्रसिद्ध श्लोक बड़े ही गर्व के साथ हमें सुनाया जाता है . हमें सिखाया जाता है कि महिलाओं की इज्जत करनी चाहिए. बचपन से ही ‘रानी लक्ष्मी बाई’ जैसी वीरांगनाओं की वीरता के किस्से भी सुनाये जाते हैं . भारतीय समाज में तो स्त्री को देवी तक का रूप दे दिया गया है . धन की देवी, विद्या की देवी, शक्ति की देवी और भी तमाम तरह की देवियाँ हमारे यहाँ मौजूद हैं .

बहुत ही सराहनीय भी है कि हमारे ही समाज की, हमारे ही देश की कुछ महिलाओं ने सफलता के उस शिखर को भी छुआ है जहाँ तक पहुँच पाना अत्यंत ही मुश्किल है . उन महिलाओं के जज्बे को भी सलाम है जिन्होंने अपनी कामयाबी के बलबूते पर हमारे देश के परचम को सम्पूर्ण विश्व में लहराया है . भूतकाल से लेकर वर्तमान तक अनेक महिलाओं ने किसी न किसी क्षेत्र में यह कर दिखाया है कि वे पुरुषों से किसी भी मायने में कम नहीं हैं .


हम इन्हीं सभी बातों, नामों तथा कहानियों में उलझकर रह जाते हैं . हम केवल इतना ही सोच पाते हैं कि महिलाओं को भी बराबरी का अधिकार दिया गया है . हम आंकड़ों में यह देखकर गौरवान्वित महसूस करते हैं कि महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ रही है . कुछ कामयाब महिलाओं का उदाहरण देकर, हम यह कह भी देते हैं कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं . परन्तु सच इसके ठीक विपरीत है . सच इतना डरावना है कि हम सच के पास जाने से भी डरते हैं .


हमारे ही समाज में हमें दोयम दर्जे का आचरण देखने को मिलता है . हमारे ही समाज में जहाँ महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता है, वहीँ उसी समाज में, महिलाओं को डायन भी कहा जाता है .


हमारे ही समाज में,एक तरफ महिलाओं की आज़ादी की भी बातें की जाती हैं तथा वहीँ दूसरी तरफ,उन्हें पर्दे में रहने को मजबूर किया जाता है . हमारे ही समाज में महिलाओं को पूजा जाता है तथा हमारे ही समाज में महिला को दहेज़ के लिए जला दिया जाता है .


मैं स्त्रीवादी नहीं हूँ, तथा ना ही स्त्रीवादियों के विपक्ष में हूँ . परन्तु कुछ सवाल हमेशामेरे दिमाग में कौंध जाते हैं:

1. आखिर हमारे समाज में लड़कियों को युवा अवस्था में आ जाने के बाद घर से बाहर निकलने के लिए अपने चेहरे पर नकाब बांधकर क्यों चलना पड़ता है ?

2.आखिर हमारे समाज में महिलाएं अपने पिता, पति या भाई के नाम से ही क्यों जानी जाती हैं ?

3.आखिर मेरी  पत्नी को मिसेज हिमांशु यादव के नाम से क्यों जाना जाये ? अगर मुझे Mr.ABC(जो भी मेरी पत्नी       का नाम हो) के नाम से जाना जाता है तो क्या बुराई है?

4.आखिर बार-बार हम पिताजी से ही क्यों पूछते रहते हैं कि आप सेवानिवृत कब होंगे ? क्या हमारे घर में हम           कभी अपनी माताजी से पूछते हैं कि वो सेवानिवृतकब होंगी ?

5.क्यों हमारे घर में हमारे माता-पिता हमारी बहनों को ही यह कहते हैं कि आप जीन्स-टीशर्ट पहनकर बाहर मत     जाया करो . क्या कभी हमारे पिताजी या किसी और ने हमें या हमारे भाई को यह कहा है कि जीन्स मत पहना     करो .

यह सब बातें बेशक हमें बहुत ही मामूली प्रतीत होती हैं परन्तु यही सच है . हम कभी भी यह उदाहरण देने से नहीं चूकते हैं कि लड़कियां हमारे रीति-रिवाजों को तोड़कर समाज का नाम बदनाम कर रही हैं . आपके नज़रिये से यह ठीक हो सकता है, पर हम यह क्यों भूल जाते हैं कि ऐसा करने के लिए भी हमने ही उन्हें मजबूर किया हैं . बचपन से ही हम उन्हें एक निश्चित दायरे में बांधना शुरु कर देते हैं . हमारे ही घरों में उन्हें यह सिखाया जाता है कि यह करना है, वह करना है . यह नहीं करना है, वह नहीं करना है . झाड़ू-पोंछा और रसोई से आगे वो सोच ही नहीं पाती हैं .

आप किसी भी एक साधारण सी गाली का उदाहरण ही ले लीजिये . बहन…. से लेकर तमाम तरह की गालियाँ भी महिलाओं को संबोधित कर के ही बनायीं गयी हैं . हमारे ही समाज में संतान उत्पति नहीं होने पर महिला को बांझ कहकर गाली दी जाती है तथा उसी समाज में मासिक धर्म (जो की संतान उतप्ति के लिए जरूरी है) के समय में महिला को अपवित्र समझा जाता है उसके साथ अपने ही घर में अपने ही लोगों द्वारा दोहरा बर्ताव किया जाता है .

‘आदमी की निगाह में औरत’ पुस्तक में लेखक राजेंद्र यादव लिखते हैं कि औरत को हमने केवल सम्भोग करने तथा स्वयं की शारीरिक जरूरत की वस्तु ही समझा है .



मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी रहा है, जो मैं आप लोगों से साझा करना चाहता हूँ . मेरी एक महिला मित्र हैं, या यूँ कह लीजिये कि हुआ करती थी. चूँकि अब वो शादी-शुदा हैं तो संपर्क में नहीं हैं . जब उनकी शादी तय हुयी थी,किसी अनजान लडके के साथ पारिवारिक संबंधों के कारण तो उन्होंने विरोध किया परन्तु असफल रहीं . शादी के बाद तथाकथित सुहागरात की रात को उनके पति महोदय उनके कमरे में आये . पास बैठे, बातें की . धीरे-धीरे उन्होंने अपनी पत्नी के उन अंगों पर छुआ जहाँ पर छूना उनकी पत्नी को नहीं भाया . उन्होंने विरोध किया और कहा कि मैं सहज महसूस नहीं कर रही हूँ, आप मेरे लिए अनजान हैं और मैं किसी अनजान व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध नही बना सकती हूँ . पति महोदय को बुरा लगा और उन्होंने कहा कि “अगर मेरे साथ यह सब नहीं करना चाहती हो तो फिर मुझसे शादी ही क्यों की ? मैं बाहर जा रहा हूँ, बाजार में पैसे के लिए औरतें यह सब करती हैं .”

इस घटनाकर्म ने आज मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया . इस छोटी सी दर्द भरी कहानी को सुनने के बाद मैं राजेंद्र यादव जी की लिखी हुयी बातों को को नकारने का साहस नहीं कर सकता हूँ . इस छोटे से घटनाकर्म में हमें दो बातें देखने को मिलती हैं . पहली तो यह जब उनके पति महोदय कहते हैं कि ‘अगर मेरे साथ यह सब नहीं करना चाहती हो तो फिर मुझसे शादी ही क्यों की ?’


यह वाक्य हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि “शादी”जो की भारतीय समाज में एक पवित्र बंधन माना जाता है, क्या यह इसलिये ही पवित्र है की शादी के बाद पुरुष किसी अनजान महिला (उसकी पत्नी जिसे वो शादी से पूर्व नहीं जानता है) के साथ संभोग कर सकता है, चाहे उसकी मर्जी हो या ना हो ?



दूसरी बात हमारे सामने यह आती है कि आखिर ऐसी क्या वजह है, जो बहुत सी महिलाएं आज भी, आज़ादी के 70 साल बाद भी, पैसा कमाने के लिए अपना जिस्म बेचने पर मजबूर हैं ?

बचपन से ही हमारी मातायें अपने बच्चों को दो अलग अलग तरह का नजरिया देती हैं . बच्चे को वो ही बताती हैं कि यह खिलौना लड़की का है, यह खिलौना लडके का है . यह कपडा लड़की का है यह कपडा लड़के का है . लड़कियां जब युवावस्था में प्रवेश करती हैं तो शरीर में हो रहे अवांछित बदलावों के बारे में वह सबसे पहले अपनी माता या बड़ी बहन से ही निसंकोच बताती हैं . उस समय उसके दिमाग में इतना कचरा भर दिया जाता है कि यह नहीं करना है, वहां नहीं जाना है . एक युवा अवस्था में प्रवेश कर रही लड़की को दूसरी महिला या लड़की द्वारा ही यह बताया जाता है कि लड़कों से दूर रहना है . किसी हमउम्र लडके से ज्यादा खुलकर कोई बात नहीं करनी है . किसी भी हमउम्र लडके के साथ अकेले में कहीं जाना नही है . रात में किसी लडके के साथ रुकना नही है . और भी तमाम तरह की बातें उनके दिमाग में भर दी जाती हैं . उनके दिमाग में इतनी बातें बहर दी जाती हैं की वो हर एक लडके में एक गन्दा तथा हवस से भरा मर्द देखने लगती हैं .


वह उसी लडके के साथ खुलकर बातें करने में संकोच करने लगती है जिसके साथ उसने अपना पूरा बचपन बिताया है . मैंने मेरे निजी अनुभव में आज तक कभी ऐसा नही देखा है जब किसी युवा लडके ने अपनी हमउम्र लड़की को यह कहा हो कि अब तुम जवान हो गयी हो अब तुम मुझसे बातें करना बंद कर दो . या फिर, अब तुम बड़ी हो गयी हो अब तुम मेरे साथ अपनी भावनाएं नहीं साझा कर सकती हो . या फिर, कभी किसी लडके ने कहा हो कि अब तुम जवान हो गयी हो अब तुम मुझे वेसे नही छू सकती हो जैसे पहले छुआ करती थी . शायद ही किसी लडके ने कहा हो कि अब तुम १६-१७ साल की हो गयी हो अब हम गले नहीं मिल सकते हैं .


अगर हम सही मायनों में बदलाव चाहते हैं तो हमें जरुरत है शुरुआत अपने आप से करने की, अपने ही घर से करने की . हमारे माता-पिता को यह सोचना बंद करना होगा कि यह लड़की है इसलिए जीन्स नहीं पहन सकती है . हमें यह सोचना होगा कि जब हम किसी लड़की को बाइक पर बैठाकर घुमा सकते हैं तो हमारी बहन को भी किसी के साथ बाइक पर बैठकर घुमने का अधिकार है . लड़कियों को भी यह सोचना होगा कि जब कोई लड़का आपको पटाने की या फंसाने की बात कर सकता है तो लड़कियां भी किसी लडके को पटा सकती हैं तथा फंसा सकती हैं .



सवाल बहुत से हैं… और हमारी दिन-प्रति दिन बीतती जिंदगी में भी हर पल हर जगह कुछ सवाल हमारा रास्ता रोकते रहते हैं, परन्तु हम अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं . हम आगे तो बढ़ जाते हैं परन्तु आगे बढ़कर, मुड़कर देखते हैं तो हम पाते हैं की हम बहुत कुच्छ पीछे छोड़ आये हैं . मैं चाहता हूँ आने वाला वक़्त इन सवालों का जवाब दे .

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पढ़ें जगरनॉट एप पर हिन्दी की बेहतरीन किताबें

 पूजा मेहरोत्रा

जगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड अपने हिंदी पाठकों के और करीब पहुंच गया है। उसने अपने पाठकों को जगरनॉट हिंदी एप की सौगात दी है। यह एप आसानी से स्मार्टफोन पर डाउनलोड हो रहा है। एप एनड्रॉयड और आईओएस प्लैटफ़ॉर्म के साथ-साथ www.juggernaut.in पर भी मौजूद है।

एप लांच के पहले महीने में पूरे एकमाह बेहतरीन लेखकों की 200 से अधिक किताबें आप मुफ्त में पढ़ सकते हैं।


एप पर कई जानी मानी हस्तियों की लिखी कहानियां, उपन्यास और आत्मकथा के साथ बदलते परिवेश की कई मजेदार किस्से कहानियां पढने को मिल रही हैं। जिसमें अभिनेत्री सनी लियोनी की कहानियाँ, इंडिया के सुपरफूड्स पर लिखनेवाली रुजुता दिवेकर की किताब, ज़िंदगी गुलज़ार है जैसे पाकिस्तानी टीवी शो की मशहूर लेखिका उमेरा अहमद के उपन्यास, विलियम डेलरिंपल और अनिता आनंद की लिखी किताब कोहिनूर के साथ साथ सेलीब्रिटी लेखकों अरुंधति रॉय, एपीजे अब्दुल कलाम, सुधा मूर्ति, कन्हैया कुमार, स्वदेश दीपक, नासिरा शर्मा, रोहित वेमुला, देवी प्रसाद मिश्रा और काशीनाथ सिंह की महत्वपूर्ण किताबें पहले महीने में मुफ्त में पढी जा सकती हैं। जून माह में जेब पर ज्यादा भार न डालते हुए बहुत कम दामों पर किताबें मौजूद होंगी, जबकि कुछ क्लासिक किताबें तब भी पाठक मुफ्त में ही पढ़ सकेंगे।

 2016 में लॉंच हुआ इंग्लिश एप पाठकों की खास पसंद बना हुआ है। इसपर मौजूदा एक्टिव यूजर्स की संख्या 770 हजार के आंकड़े को पार कर चुकी है। जबकि एप पर 5000 से अधिक अंग्रेज़ी इ बुक्स पढ़ी जा सकती हैं।

जगरनॉट बुक्स के एप पर पाठक किताबों को उसके कवर, प्रिव्यू और कैटेगरी के माध्यम से खोज, देख और पढ़ सकेंगे। आपको अगर दोस्तों को किताब उपहार में देनी है तो आप एप के माध्यम से आसानी से ऐसा कर सकेंगे। इसके साथ ही एप का खास फीचर पाठक और लेखक की दूरी को कम करते हुए पाठकों को सुविधा देता है कि वह अपने फेवरेट लेखक से सवाल करें और किताब पर अपनी प्रतिक्रिया दें, लेखक पाठकों की प्रतिक्रिया और सवालों के जवाब भी देंगे।

जरुर पढ़े ये किताबें

एप पर आई अपनी किताब का इज़हार करते हुए जिंदगी लाइव के लेखक प्रियदर्शन कहते हैं-मेरी खुशकिस्मती है कि मैं  हिंदी के उन पहले लेखकों में हूं जिनकी किताब जगरनॅाट के ऐप पर आ रही है। बड़ी तेजी से बदलती और डिज़िटल होती दुनिया में ऐप आपको बहुत बड़े और अंतरराष्ट्रीय पाठक समुदाय से जोड़ सकते हैं। इत्तिफाक से मेरे उपन्यास ‘ज़िंदगी लाइव’ की प्रकृति भी इस तेज़ रफ़्तार माध्यम के अनुरूप है। हिंदी प्रकाशन के इस ऐतिहासिक प्रस्थान बिंदु का हिस्सा होना सुखद है।

जगरनॉट बुक्स की प्रकाशक चिकी सरकार कहती हैं, ‘मैं हिंदी के पाठकों के लिए जगरनॉट एप लांच करते हुए काफी उत्साहित हूं। मेरा मानना है कि हिंदी पाठकों का बाज़ार शायद इंग्लिश से भी बड़ा हो।’


‘कल मिलना मुझे’ की लेखिका प्रत्यक्षा- उत्साहित हूँ कि जगरनॉट पर किताब आ रही है. नये समय में नये माध्यम का इस्तेमाल बढ़िया है. कहानी, मोबाईल ही नया कागज़ है. उम्मीद है उपन्यास एक जादुई मोहब्बत की दुनिया की नशीली फंतासी में लीन कर दे पाठक को ।

जगरनॉट बुक्स की कार्यकारी संपादक हिंदी, रेणु आगाल कहती हैं, ‘हमें उम्मीद है कि ये लोगों के पढ़ने के तरीके को बदलेगा क्योंकि पहली बार हम ऐसा बुकशेल्फ तैयार कर रहे हैं, जिसमें सबकी पसंद का कुछ न कुछ है- रोमांस से लेकर क्लासिक तक, साहित्य और उपन्यास से लेकर राजनीतिज्ञों की जीवनी तक। और ये सब ऐसी कीमतों पर उपलब्ध होगा, जिनका जेब पर भी ज़्यादा भार नहीं पड़ेगा। अगर आप हिंदी की किताबें खोज रहे हैं तो आप को दूर जाने की, दुकान खोजने की ज़रुरत नहीं, ये आपके अपने स्मार्टफोन पर मिल जाएंगी।’

अपनी खुद की सामग्री के अलावा कई प्रमुख हिंदी प्रकाशकों जैसे प्रभात प्रकाशन और डायमंड बुक्स की किताबों के साथ साथ प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका तद्भव की चुनी हुई रचनाएँ किताबें  भी एप पर मिलेंगी।

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अपना कमरा : सार्थकता का एहसास





वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One’s Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. 


अनिता भारती 

मैं और मेरे साथ गली के अन्य बच्चे खिड़की पर टकटकी लगाये अंदर देख रहे थे. मैं लगभग सवा चार साल की थी . अंदर कमरे में मेरा छोटा भाई पैदा हो चुका था . उसे दाई पानी भरे तसले में नहला रही थी . गली-मोहल्ले कि औरतें माँ के पास खड़ी थीं. कमरे के नाम पर सबसे पहले यही याद बाकी है .



किराये के कमरे में रहते हुए मैंने कितनी ही बार माँ को स्वयं के मकान के लिए रोते और पिता से झगड़ते देखा, क्योंकि  किराये के मकान में रहते हुए कोई चीज अपनी नहीं होती. बस एक एहसास होता है कि जैसे कोई यायावर किसी सराय में रुके और सोचे रात भर के लिए यह मेरी जगह है. जब मैं पाँचवीं कक्षा में थी, हमारा अगला पड़ाव था गोविन्दपुरी. पिता ने टिन की  छत डालकर दो कच्चे कमरे बनाये. यहां मानसिक रूप से बीमार माँ का अधिकतर समय अपने आप से बातें करने, रोने, चिल्लाने में ही बीत जाता था, इसलिए उस घर को बेच कर फिर पिताजी के रिश्ते की एक बहन के यहाँ आना पड़ा. बुआ का व्यवहार शुरू में अच्छा था, पर मेरी माँ कि बीमारी से तंग आकर उन्होंने अल्टीमेटम दे दिया जितनी जल्दी हो सके, घर खली कर दो. पिता ने इधर-उधर से उधार लिए पैसों से एक सूखे जोहड़ पर पचपन गज का टुकड़ा लिया . वहां न बिजली थी और न ही सड़क और न पानी की कोई सुविधा. जब घर बनना शुरू हुआ, तभी बारिश से हमरे बनाते घर की पूरी छत बह गयी . दोबारा से छत बनी . माँ और पिता विवशता से कभी छत से टपकते पानी को रोकने के लिए रखी कटोरी, गिलास, परात आदि को देखते तो कभी कोने में सिकुड़ कर बैठे अपने छोटे-छोटे बच्चों को.

अपने लिए एक अदद कमरे की आदत हमें नहीं पड़ सकी, क्योंकि कमरे हमारे लिए नहीं, हम कमरों के लिए बने थे . हमें साहित्य का चस्का लग चुका था. पढ़ने के लिए नितांत अकेलेपन की आवश्यकता होती है पर मुझे शोर-शराबे में पढ़ने कि आदत पड़ चुकी थी.हमारा बिस्तर ही हमारा कमरा था. उसी पर लेटे-लेटे न जाने उपन्यास और कहानियाँ पढ़ डालीं.

यहाँ झील और ज्यादा गहरी और शांत हो गयी

1990 के अंत में अमेरिका ने इराक पर जबरदस्ती हमला कर दिया. अमेरिका की  साम्राज्यवादी नीतियों और युद्ध का विरोध करने के लिए दुनिया के अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी ‘खाड़ी शांति दल’ बनाया गया . इस दल का नायकत्व बेला भाटिया और ज्यांद्रेज कर रहे थे. बेला भाटिया से मेरी मित्रता थी . उन्होंने मुझे ‘खाड़ी शांति दल’ में शामिल होने को कहा . हमारा पहला पड़ाव अम्मान का होटल था . यहाँ मैं पहली बार अकेले एक कमरे में रही और वहाँ मैंने कई कविताएँ लिखीं. इराक में उन दिनों कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. पीस कैंप में हम फर्श पर दरियाँ बिछा कर सोते थे. सारे ऊनी कपड़े पहनने और रजाई ओढ़ने के बाद भी ठंड नहीं जाती थी. ऐसे ही पन्द्रह-सोलह दिन बीतने पर आधी रात को अचानक पता चला कि अमेरिका पीस टीम को मिसाइल से उड़ाने वाला है. इस सूचना से आनन-फानन में कैंप पूरा खली हो गया. मैं आराम से अपने बिस्तर पर सो रही थी, मुझे पता नहीं चला. हमारे साथी राजीव सिंह ने अपनी जान जोखिम में डालकर मुझे जगाया, ‘सारे लोग जा चुके हैं .
कैंप किसी भी समय उड़ाया जा सकता है और तुम यहाँ सो रही हो!’ हमें पीस कैंप से निकल कर इराक के फाइव स्टार होटल अलराशिद में ले जाया गया . वहाँ सबने अपने-अपने पार्टनर ढूंड लिए. मैं फिर अकेली खड़ी थी. अब केवल डबल बेडरूम वाले कमरे बचे रह गये थे. संकट यह था कि मैं किसके साथ रहती. तभी मैंने देखा कि जो मुझे जगाकर कैंप से बहार लाये थे, वह भी अकेले खड़े थे. अब हम दोनों ही बचे थे, इसलिए हमें एक ही कमरे में रहना पड़ा. मुझे उस समय नहीं पता था कि होटल का वह कमरा मेरे जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ले आयेगा.

कोने से कमरे तक: चार पीढ़ियों की अन्तर्यात्रा

अगले दिन हमें पता चला कि हमारा पीस कैंप तबाह किया जा चुका है. उसी रात हमरे होटल को निशाना बनाकर मिसाइल दागी गयी . होटल की दीवारें बड़ी जोर से हिलीं, जैसे कि भूकंप आया हो . मैं लुढ़कती हुई कमरे के दरवाजे से जा टकरायी. समझ में नहीं आया कि अचानक क्या हुआ . हमें तत्काल होटल के बंकर में पहुँचाया गया.

विवाह के बाद मेरे सामने कमरे का झंझट नये रूप में खड़ा था . मुझे और मेरे पति को कमरे के नाम पर स्टोर रूम मिला, जो मुश्किल से दस बाई छह का होग. उसमें एक तरफ कबाड़ भरा हुआ था. मैंने कबाड़ को सलीके से सजाते हुए उस कमरे को शयनकक्ष बनाया. हमारे दो साल इसी कमरे में बीते. कितनी ही रातें मुझे और मेरे पति को एक ही करवट सोकर बितानी पड़ीं  उस छोटे से स्टोर रूम ने मेरे अंदर कि चेतना को न केवल मरने से बचाकर रखा बल्कि उसे और धार दी  ज़िंदगी ने मुझे अपने कमरे के होने कि सार्थकता और निरर्थकता के अंतर को बखूबी समझा दिया.

अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.


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जाति के प्रश्न पर कबीर
दलित स्त्रीवाद 


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