माहवारी पर बात की झिझक हुई ख़त्म

नूतन यादव 



आज जब महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे पर हर राजनैतिक विचारधारा का विमर्श हमारे समक्ष मौजूद है हम माहवारी या मासिक धर्म के मुद्दे पर मुंह बंद किये बैठे हैं | माहवारी या मासिक धर्म एक ऐसा मुद्दा है, जिसपर परंपरावादियों से लेकर प्रगतिशील तक ,  किसी प्रकार के कदम या आन्दोलन करने से बचते हैं | सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि माहवारी पर पुरुषों का ये रवैया केवल भारत में ही नहीं कनाडा , जर्मनी जैसे देशों में भी उठता है और उसे चुपचाप दबा भी दिया जाता है |गत 28 मई को 'Menstrual Hygiene day पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया | ये कार्यशाला  तीन गैर सरकारी संगठन ‘जागो गाँव’, ’स्ट्रगल फॉर जस्टिस’ तथा ‘परमार्थ चिंतन फाउंडेशन’ द्वारा आयोजित की गई थी , जिसके अंतर्गत माहवारी या मासिक धर्म से जुडी सामाजिक समस्याएं, मिथ, मासिक धर्म के चिकित्सीय पहलुओं आदि पर अलग अलग क्षेत्रों से आमन्त्रित वक्ताओं द्वारा अपने विचार प्रकट किये गए.|



प्रथम वक्ता प्रज्ञा थीं जिन्होंने दर्शकों को दो समूहों में विभाजित कर उनसे अलग अलग प्रश्नों  पर उनकी प्रतिक्रियाएं मांगी ... माहवारी सुनते ही उनके मन में उठने वाला पहला शब्द कौन सा है जिसके जवाब में प्राकृतिक प्रक्रिया ,मौन ,जैविकीय प्रक्रिया जैसे शब्द सामने आये| इसके पश्चात उन्होंने दोनों समूहों से स्त्री की शारीरिक संरचना को रेखांकित कर उनके अंग विशेष को नाम देने को  कहा|  इसके पश्चात उन्होंने दोनों समूह द्वारा बनाये गए रेखाचित्रों की तुलना करते हुए दर्शकों को समझाया कि पुरुष स्त्री अंगों पर खुल कर बात करने में झिझकते हैं. ऐसे में समाज में पुरुषों को आगे बढ़ कर स्त्री की शारीरिक संरचना, उसकी माहवारी और अन्य अंगों सम्बन्धी विषयों पर बात करनी ही होगी, जिससे समाज में व्याप्त फुसफुसाहट का दौर ख़त्म हो और वैचारिक गांठे खुलें.



गुंजन कुमारी जो एक फिजियोथेरेपिस्ट हैं, ने माहवारी के मेडिकल आयाम प्रस्तुत करते हुए दर्शकों को माहवारी से जुड़े रोगों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी. गुंजन ने संतोष मेडिकल कॉलेज गाज़ियाबाद की 25 वर्ष से कम आयु की 200 छात्राओं के साथ एक केस स्टडी की  जिसके अंतर्गत  डिस्मेनरी  से पीड़ित लड़कियों से सम्बंधित डाटा प्रस्तुत किया गया था | डिस्मेनरी के अंतर्गत लड़की को अत्यधिक पीड़ा होती है कार्यशाला में इससे बचने के उपाय आदि पर चर्चा की गई |

जागो री की दिल्ली शाखा से जुडी प्रसिद्ध महिला एक्टिविस्ट शांति ने इस कार्यक्रम में अपने क्रांतिकारी विचारों से सबको अवगत कराया |शांति ने कोई डिग्री नहीं पाई लेकिन उनके अनुभव जिंदगी की सच्चाइयों से उपजे थे |उनका बीटा और वह माहवारी पर एक साथ कार्यशालाओं में जाते हैं और महिलाओं को इस विषय पर जागरूक करते हैं | शांति ने कहा कि जिस माहवारी के रक्त से पुरुष घिन करते हैं उनका जीवन माहवारी के इसी रक्त पर आधारित होता है| शांति ने ये भी बताया कि वे अनेक क्षेत्रों में कार्य कर चुकी हैं जैसे कॉर्पोरेट ,सरकारी क्षेत्र आदि लेकिन माहवारी के विषय पर अधिकतर पुरुष पिछड़ी या रूढीवादी मानसिकता के ही मिले हैं |    अभी हाल ही में माहवारी शीर्षक की अपनी कविता  से चर्चा में आई कवियत्री दामिनी यादव ने भी कार्यशाला अपनी इस कविता का पाठ किया |


“आज मेरी माहवारी का
दूसरा दिन है।
पैरों में चलने की ताक़त नहीं है,
जांघों में जैसे पत्थर की सिल भरी है।
पेट की अंतड़ियां
दर्द से खिंची हुई हैं।
इस दर्द से उठती रूलाई
जबड़ों की सख़्ती में भिंची हुई है,,....

 एक अन्य वक्ता परी सैकिया ने भी अपनी बात रखी ... परी एक मीडिया कर्मी हैं जो पूर्वोत्तर राज्य की निवासी हैं | उन्होंने बताया कि हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों में मासिक धर्म के आरंभ में एक उत्सव मनाया जाता है |किन्तु इसके बाद वही रुढ़िवादी और परंपरागत माहौल पैदा हो जाता है | ये बहुत कुछ ऐसा है जैसे हम किसी ख़ास दिन को मनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और बाद की समस्याओं से अपनी आँखें मूँद लेते हैं | परी ने बताया कि उनके घर में उनके पिता और भाई आरम्भ से उनके लिए सेनेटरी नैपकिन लाते रहे हैं जिस कारण उन्हें अपने घर में माहवारी पर बात करना असहज नहीं लगा |

नितीश के सिंह ने पुरुषों के योगदान और संचार के माध्यमों के बेहतर इस्तेमाल के ज़रिये माहवारी पर संकोच हटाने पर जोर दिया और माहवारी में प्रयोग किये जाने वाले सेनेटरी नैपकिन के अलावा टैम्पोंस और मेंसट्रुअल कप्स जैसे गैर पारंपरिक साधनों पर जानकारी दी. माहवारी में आम तौर पर सेनेटरी नैपकिन की जगह पुराना कपड़ा या कॉटन गौज जैसी चीज़ों का इस्तेमाल होता है लेकिन मोटे तौर पर देखें तो इनमें नैपकिन इस अवस्था में इस्तेमाल होने वाली सबसे प्रचलित वस्तु है, और इससे  वजह से इससे होने वाली बीमारियाँ भी सबसे अधिक. सेनेटरी नैपकिन का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव होता है गीलेपन से होने वाला संक्रमण. ये संक्रमण आगे चल कर तमाम अन्य बीमारियों को दावत देता है. हालाँकि बाजारवाद ने सेनेटरी नैपकिन्स के प्रचार द्वारा एक जागरूकता सी फैलाई ज़रूर है लेकिन ये नाकाफी लगती है. आज बाज़ार में माहवारी के दौरान इस्तेमाल होने वाले कई अन्य साधन उपलब्ध हैं जिनमें टैम्पोन और मेनस्ट्रुअल कप प्रमुख हैं. इनमें संक्रमण का खतरा सेनेटरी नैपकिन की अपेक्षा कहीं कम होता है. भारतीय बाज़ार में माहवारी से जुड़े स्वच्छता उपायों के प्रचार और प्रसार में सप्लाई और डिमांड का नियम तो काम करता ही है, साथ ही इन साधनों की कीमत में फर्क भी असर डालता है.


एक ऐसे समाज में माहवारी को नितांत गुप्त माना जाता है वहां इससे जुडी चीज़ें भी इसकी तरह बेकार मानी जाती हैं. ऐसे में बेहतर विकल्पों के प्रति जागरूकता ज़रूरी है. जहां अच्छे नैपकिन की कीमत 100 से 200 रूपए प्रति दस नग होती हैं, वहीँ साधारण क्वालिटी वाले टैम्पोन भी इसी कीमत में मिल जाते हैं. मेनस्ट्रुअल कप हालाँकि थोड़े महंगे ज़रूर होते हैं और 700 से 2500 रूपए के आस पास प्रति नग मिलते हैं लेकिन सबसे असरदार और री-यूज़ेबल होते हैं , जिसकी वजह से ये सबसे सस्ते साबित होते हैं. इनको अमूमन तीन से पांच साल तक प्रयोग किया जा सकता है, जिससे पैसे की बचत भी बहुत होती. इन मेनस्ट्रुअल कप की सबसे ख़ास बात ये है कि ये टैम्पोन और नैपकिन की अपेक्षा संक्रमण से बचाने में सबसे कारगर होते हैं.

अंत में प्रो सी पी सिंह और प्रो मोहंती ने  अपनी बात रखी  |  प्रो सी पी सिंह ने अपने एक  देशज मुहावरे से अपनी बात आरम्भ की | जो जितना पढुआ, ओ उतना भडुआ ......उनके अनुसार आप जितना अधिक अकादमिक ज्ञान प्राप्त करते है व्यावहारिक ज्ञान से उतना ही दूर होते  जाते हैं | प्रो मोहंती ने माहवारी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कार्यशाला आयोजित करने पर आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि स्त्री सशक्तिकरण के इस महत्वपूर्ण दौर में ऐसे विषयों पर खुल कर बात करना बहुत जरूरी है जिससे आने वाली पीढ़ी एक नए और जेंडर मुक्त समाज का निर्माण कर सके |



कार्यक्रम में महिलाओं और पुरुषों के साथ बच्चों की सहभागिता खास रही लेकिन इससे भी अधिक ख़ास  था माता पिता के साथ बच्चों का कार्यक्रम और वक्ताओं के बारे में बातचीत करना. ये अपने आप में  एक बहुत सकारात्मक बदलाव दिखा कि अभिभावक बच्चों को लाये और उनके साथ माहवारी के विषय पर बात करने में सहज दिखे. कई बच्चियां अपनी माँओं के साथ आई हुई थी उन्होंने पूरे समय तक रूककर वक्ताओं के विचारों को सुने . अगर आज की पीढ़ी इन विचारों को सुनेगी और समझेगी तो उम्मीद की किरण कायम रहेगी .. इस कार्यशाला में लाने के लिए उनके अभिभावकों को साधुवाद देना ही होगा .. यहाँ लाने का निर्णय उनकी खुली मानसिकता को दर्शाती है .स्पष्ट हैं कि वे अपने बच्चों से इस विषय पर बात करते होंगे और इस कार्यशाला के माध्यम से वे उनकी समझ और मानसिकता को और परिपक्व बनाना चाहते हैं | इस कार्यशाला के माध्यम से माहवारी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सारगर्भित  विचार सामने आये | आगे आने वाले समय में इस तरह की कार्यशालाओं से  इस मुद्दे पर एक  सकरात्मक माहौल अवश्य बनेगा   
Blogger द्वारा संचालित.