Home Blog Page 90

कहानी में तीसरा कक्ष

अनुपम सिंह

अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com



जया जादवानी की कहानियों का पहला संग्रह “मुझे ही होना है बार –बार” मेरे सामने है. संग्रह का नाम  इन पंक्तियों  में से चुना गया है –‘सिर्फ मैं ही हो सकती हूँ ,सिर्फ मुझे ही होना है . मुझे ही बिखरना है टूटकर ,मुझे ही बनना है . सृष्टि के अंत के बाद भी मुझे ही होना है …लगातार…..बार-बार”. इस  कहानी संग्रह को पढ़ते हुए पहली  कहानी ‘शाम की धूप” में ही नाम धारी पात्र मिलते हैं –रामखेलावन और राजू . बाकि सभी कहानियां बिना नाम वाले पात्रों की कहानियां हैं, जिसके लिए कहानीकार ने प्रतीकों का सहारा लिया है . इनकी सभी कहानियों को प्रतीकों का वितान कहा जा सकता है . जहाँ प्रतीकों के संबंधों को समझने में जरा सी भी चूक हुई वहां कहानी पूरी तरह से उलझ कर रह जायेगी . इस संग्रह की पहली कहानी ‘शाम की धूप ‘संग्रह की अन्य कहानियों से लम्बी है या औपन्यासिक विन्यास (जिसे कहानी के फ्लैप पर लिखा गया है )लिए हुए है . लेकिन अन्य कहानीकारों की कहानियां देखें तो इसे औपन्यासिक विन्यास की कहानी नहीं कह सकते . यद्यपि इनकी कहानियां स्त्री चेतना की कहानियां हैं लेकिन शाम की धूप उससे थोडा भिन्न है .इस  कहानी  में स्त्री चेतना  दिखाई देती है लेकिन पाठक पर उस स्त्री चेतना का प्रभाव उस रुप में नहीं पड़ता है जैसा कि अन्य कहानियों में उभर कर आई स्त्री चेतना का . यह कहानी स्त्री विडम्बना से अधिक एक ‘छीजते पुरुष’ की कहानी है. लेकिन यदि उस छीजते (वृद्ध होते )पुरुष को उसके पुन्सत्तव को नष्ट होता मान लें तो निःसंदेह यह कहानी स्त्री चेतना की कहानी होगी . यदि ऐसा माना जायेगा तो कहानी में अनावश्यक विस्तार देखाई देगा .

मैंने इस समीक्षा को कहानी में तीसरा कक्ष शीर्षक दिया है . और इस संग्रह में “तीसरा कक्ष” नाम की एक कहानी भी है .इनकी कहानियों को पढ़ते हुए मुझे लगातार महसूस हो रहा था कि इनकी सभी कहानियों को “तीसरा कक्ष” नाम से संगृहित किया जा सकता था . बहरहाल यह रही मेरी दृष्टि . कहानीकार ने स्त्री की समाज में  जो दोयम दर्जे की स्थिति है उसी को सभी कहानियों में प्रस्तुत करके यथास्थितिवाद का विरोध किया है. इनकी सभी कहानियों में ,जिसको मैंने तीसरा कक्ष कहा है, ऐसे बिंदु हैं जहाँ कोई नहीं जाता है ,क्योंकि वहां कहीं गहराई है, तो कही अंधकार ,कहीं मरे हुए सपनों की लाश है तो कहीं स्त्री का टूटा हुआ स्वतंत्र व्यक्तित्व .सभी उस पहले और दूसरे कक्ष तक ही रह जाते हैं . ‘वहां मैं हूँ’ कहानी का तीसरा कक्ष यह है कि  –“उसने मेरी देह की कमर में हाथ डाल दिया है ,वह मुझे चूम रहा है ,मेरी देह को –माथा ,होठ ,गला ,कंधे “ यह ‘ मैं ’ जो अपने जिस्म को देख रही है वही रहती है उस तीसरे कक्ष में, जहाँ से सभी को पहचानने की कोशिश करती है –“वह मेरे जिस्म के नजदीक आता है . मैं खुद को दूर कर लेती हूँ –अब तुम्ही भुगतो . मैं अपने शरीर से दूर खड़ी उसे देखती हूँ” कहानी का तीसरा कक्ष ‘आत्म’ का कक्ष है ,’चेतन’ का कक्ष है. पहले में तो ख़त्म हो गए संबंधो का ठंठापन है, जिसको लाश की तरह सब ढो रहे हैं . कोई स्त्री जब अपने इसी तीसरे कक्ष में रहती है तो सपने बुनती है , उसे पूरा करने के लिए संघर्ष करती है ,जैसे ही वह पहले वाले कक्ष में प्रवेश करती है भयातुर हो जाती है , क्योंकि यहाँ कोई उसके सपने को झाड़ू  से साफ करता है . लेकिन बचे हुए टुकड़े उसके पैरों में चुभते हैं तब उसको समझ में आता है –‘’कि न तो सपने को रख सकते हैं न  फेक सकते हैं. इन्हें बाहर फेकने की बजाय अपने अन्दर फेकना चाहिए था ’’जहाँ वे सुरक्षित रहते हैं . सपने जीवन के आधार हैं ,”इन्हें जीवित रहना चाहिए ये दुनिया की किसी भी चीज से ज्यादा कीमती हैं‘’ सपने विहीन जीवन मछली के सामान है जो पानी के बिना जिन्दा  है और तड़प रही है . “इनको जिलाए रखने का एक ही तरीका है पानी……. पानी” पहला कक्ष जहाँ वह खिलौने से खेलती है . दूसरा कक्ष जहाँ वह खेलने के लिए बनायीं जाती है . मेरे ख्याल से तीसरा  कक्ष वह  है, जहाँ वह इन सब का निषेध करती है .

स्त्री  इस तीसरे कक्ष में जाकर ही निषेध की ताकत बटोर पाती है  ,जहाँ पुरुष  जाना ही नहीं चाहता है .पहले और दूसरे कक्ष का ही दरवाजा वह खोलता है ,जहाँ वह रहता है . यहाँ यह याद दिलाना अवश्यक है कि  उसका भी एक तीसरा कक्ष है, जिसके दरवाजे वह कभी नहीं खोलता है . “ वह खोलता एक ही है जहाँ वह होता है . बाकी  सब तो बंद पड़े रहते हैं”.  गर्द, सीलन, स्मृतियों की गंध उस तीसरे कमरे में कैद रखता है . वह ही नहीं उसके तीन-तीन बच्चे भी कैद हैं ,उसके पेट से निकालकर . लेकिन एक दिन उसे अँधेरे और ख़ामोशी से ऊब कर ,“ उसने हडबडाकर दरवाजा खोल दिया …..एक चीख उसके गले से फूटी, हवा में उठी और उठती चली गयी…..हवा ने सुना ,बरगद ने सुना ,फूल, पत्तियों ,नदियों ,समुद्रों ,आसमान और बादल ने सुना. सबने चौककर उसे देखा …..उसने एक पल खुद को तोला और बाहर अँधेरे में छलांग लगा दी ” . कैद से मुक्ति ही स्त्री आन्दोलनों का लक्ष्य है . लेखिका हर तरह के कैद से ,गुलामियों से मुक्त करने के लिए संकल्प बद्ध है .’जब वह होता है’ कहानी में ‘वह’ कौन है? वह पति, प्रेमी, दोस्त कोई भी हो सकता है ,लेकिन यहाँ ‘वह’ एक स्त्री का स्वप्न है.  जो आसमान के समान ही असीम है संभावनाओं से भरा हुआ है .आसमान पुरुष का भी प्रतीक होता है तो क्या सिर्फ पुरुष को ही सपने देखने का अधिकार है .एक स्त्री को जिसको धरती के सामान घोषित किया गया है . जहाँ  नैतिकता ,मर्यादा ,वर्जना ,त्याग आदि के जंगल ,नदी पहाड़ उग आयें हैं जिसके नीचे उसका दम घुट रहा है . “अरे …रे …रे मेरी छोटी –सी बच्ची …..देखो ये सरे खिलौने तुम्हारे हैं …ये घोड़ा..ये हाथी…ये गुडिया …गुड्डा …इन सबसे खेलो तुम …देखो बहार मत जाना …बहार बारिश है ,धूप है …काली आंधी चल रही है “. लेकिन लेखिका कहानी के अंत में  तीसरे  कक्ष का वह दरवाजा खोल ही देती है ,जहाँ से सपने आ रहे हैं ,ताजा हवा आ रही है.कहानीकार का उद्देश्य एक तीसरे रस्ते की तलाश  है जो उन दोनों रास्तों से भिन्न है ,जो पहले और दूसरे कक्ष तक ही ले जाते हैं .-“प्रकृति का चक्र अब रोकना बेमानी है . मैंने अपनी छाती के सरे द्वार खोल दिए और अपना चेहरा उन बरसाती बूदों के नीचे कर लिया ….”. इसी प्राकृतिक और आप्राकृतिक के भेद से सब कुछ ठहरा हुआ था ,स्त्रियों की प्रकृति सिर्फ देह तक ही सीमित थी ,देह से बाहर  उसकी कोई पहचान नहीं थी . लेकिन अब  वह इस निषेधाज्ञा को तोडती ,धूप में तपती ,बारिश में भीगती है . स्त्री अपने वजूद को तलाश रही है .-“मैं वहां नहीं जाती ,जहाँ जाने के लिए मुझे मना किया जाता है ,वे जो कहते हैं ,ठीक कहते होंगे . बस कभी कभी मैं खिलौने तोड़  के देख लेती हूँ. माँ की की आँख बचाकर तेज बारिश  में खिड़की में अपना हाथ निकाल लेती हूँ , खूब दोपहर में ,घर के सारे के सारे लोग सो जाते हैं ,छत पर धुप में पसीना पसीना होकर देखती हूँ . नंगे पैर चलती हूँ तलवे जलते हैं तो मुझे असीम शांति मिलती है ….” .

यदि मैं इनकी कहानियों के लिए एक वाक्य में कुछ कहूँ तो यह कि  इनकी कहानियां निषेधाज्ञा का उल्लंघन हैं . वह स्त्री-पुरुष किसी के लिए भी खीचे गए किसी भी लाइन को पार करना चाहती हैं . स्त्री संघर्ष का इतिहास सौ साल से अधिक के संघर्ष का इतिहास है . जिस तरह स्त्री संघर्ष का इतिहास एक देश के भूगोल को लांघ गया, स्त्री भी वैसे ही भूगोल की सीमा को तोड़ना चाहती है . मैंने कहीं पढ़ा था कि  “स्त्री मुक्ति दिवस न पूर्वी है न पश्चमी वह अंतरराष्ट्रीय  है “. लेखिका की दृष्टि  भी स्त्री के लिए भूगोल की जो सीमा है उसको तोड़ने पर  है –“हमें पूरा का पूरा तय कर दिया जाता है जैसे भारत या किसी भी देश के मानचित्र को यहाँ से वहां तक . सरहदों के पास जाने से खतरा है अब मैं किसे बताऊँ मुझे सरहदों के पास जाना ही इसलिए है . नहीं तो क्या जरुरत है फिर “.  स्त्री इन सीमाओं को तोड़कर ही अपने सपने की तलाश पूरा कर सकती है . कोई सवाल कर सकता है कि  स्त्रियों ने  ऐसा  कौन सा  सपना  देखा है,  जिसके लिए वे सभी सीमाओं को तोड़ देना चाहती हैं . तो जवाब यदि इस कहानी से देना हो तो वह होगा ‘समानता’ का . जहाँ स्त्री को  सिर्फ देह न समझा जाय .

किताब: मुझे ही होना है बार-बार 
लेखिका: जया जादवानी 
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन 

गर्भवती महिलायें कर सकती हैं मांसाहार और सेक्स: विशेषज्ञों की राय

स्त्रीकाल डेस्क 


एक ओर जहाँ भारत में मातृ मृत्यू दर बहुत ज्यादा है वहै, वहीं भारत सरकार के आयुष मंत्रालय (जो आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धी तथा होमियोपेथी के विकास के लिये कार्य करता है) ने अपनी एक स्वास्थ्य सलाह पुस्तिका में स्वस्थ प्रसव और सेहतमंद बच्चे के लिए सलाह दी है कि गर्भवती महिलायें मांसाहार न करें. वासना से बचें.  सेक्स न करें  लगता है, इक्कीसवीं सदी में भी देश की वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियाँ विज्ञान और शोध पर अपना आधार विकसित करने के बजाय, महाभारत के अभिमन्यू-मिथक से ही संचालित हो रही हैं. रें .  महाभारत के अभिमन्यू के मिथक से संचालित यह सुझाव कई मामले में अवैज्ञानिक है, खासकर तब, जब भारत की बहुसंख्य आबादी मांसाहारी है और बहुत बड़ी संख्या के लिए जरूरी पोषण आहार मांसाहार पर निर्भर है. सेक्स करने के लेकर भी डाक्टरों की राय आयुष मंत्रालय से ज्यादा वैज्ञानिक है. दुखद सत्य यह है कि 5 वर्ष से छोटे बच्चे तथा माँयें भारत में कुपोषण के सबसे ज्यादा शिकार हैं, और आसानी से कहा जा सकता है कि आयुष का स्वास्थ्य-बोध इस प्रकार की सलाह देते समय पोषण में वंचित इस आबादी के स्वास्थ्य से ज्यादा तथाकथित ‘संस्कृति’ पर अधिक ध्यान दे रहा है.से दूर रहने की आयुष की सलाह का सीधा व प्रचलित अर्थ जो होता है यानि कि सेक्स से दूर रहना, तो यह पूर्णत: अवैज्ञानिक है और फिर से भारतीय संस्कृति की ‘नयी व्याख्याओं’ से प्रेरित दिखाई देती है.

मातृ मृत्यु  का नियन्त्रण महिला स्वास्थय का जरूरी पहलू 

आयुष मंत्रालय ने मदर एंड चाइल्ड केयर नामक बुकलेट जारी करते हुए अपने सुझाव में कहा कि गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान इच्छा, क्रोध, लगाव, नफरत और वासना से खुद को अलग रखना चाहिए. साथ ही बुरी सोहबत से भी दूर रहना चाहिए. हमेशा अच्छे लोगों के साथ और शांतिप्रिय माहौल में रहें.  आयुष मंत्रालय दो कदम आगे बढ़कर कहता है कि यदि आप सुंदर और सेहतमंद बच्चा चाहती हैं तो महिलाओं को “इच्छा और नफरत” से दूर रहना चाहिए, आध्यात्मिक विचारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. अपने आसपास धार्मिक तथा सुंदर चित्रों को सजाना चाहिए.  केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने पिछले सप्ताह इस बुकलेट को नई दिल्ली में हुई राष्ट्रीय स्वास्थ्य संपादकों के एक सम्मेलन में जारी किया था.

सामूहिक नसबंदी के कारण भारतीय स्त्रियों की मौत

स्त्रीकाल के  संस्थापक संपादकों में से एक महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर डाॅ. अनुपमा गुप्ता कहती हैं कि गर्भावस्था के दौरान भारत में 50 % से अधिक महिलायें खून की कमी तथा कुपोषण के अन्य प्रकारों से जूझती हैं , जिनके लिए मांसाहारी भोजन में  प्रोटीन, आयरन और कार्बोहाइड्रेट की पूर्ती होती है.  खुद शाकाहारी गुप्ता बहुसंख्य मांसाहारी जनता की हकीकत को नजरअंदाज करने से बचने का सुझाव देती हैं. उन्होंने कहा कि सेक्स करना या न करना स्वास्थ्य की स्थिति का मामला है. मसलन पहले तीन महीने में सेक्स करना कई तरह की समस्यायें पैदा कर सकता है, लेकिन यदि गर्भावस्था सामान्य है तो उसके बाद के तीन महीनों में सावधानी के साथ सेक्स किया जा सकता है. बल्कि कई बार महिला के मानसिक स्वास्थ्य के लिए यह लाभकारी भी सिद्ध होता है. क्योंकि शरीर व मन पर अतिरिक्त बोझ डालने वाली इस स्थिति के दौरान कई महिलाओं में तनाव की स्थिति निर्मित होती है और सेक्स तथा पति से शारीरिक निकटता इस तनाव को दूर करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि  गर्भावस्था के दौरान सेक्स के फायदे गिनाने वाले चिकित्सीय शोध इंटरनेट पर न भी मिलें तो, ‘गर्भावस्था में मनोविज्ञान’ पर उपलब्ध पुस्तकें इस तथ्य पर प्रकाश डाल सकती हैं.

गर्भवती महिला का डायट

चाइल्ड केयर लीव बनाम मातृत्व की ठेकेदारी पर ठप्पा 
डाॅ. अनुपमा कहती हैं कि  क्रोध, नफरत आदि मनोभावों से बचना गर्भवती स्त्री के लिए जरूर फायदेमंद है, जिसका अनुपालन किया जा सकता है, और उसका कारण वैज्ञानिक है. लेकिन बड़ी बात यह है कि यह तभी कारगर हो सकता है, जब महिला का परिवार और समाज भी इस प्रकार का वातावरण निर्मित करने में सामूहिक रूप से योगदान दे. यदि माँ बन रही स्त्री के चारों ओर प्रताड़णा, धोखे, लालच और नफरत का वातावरण पहले से ही है, तो वह अकेली स्वयं को तथा आने वाले बच्चे को इन सब से कैसे बचा पायेगी? क्या गर्भावस्था के दौरान उसे वनवास में रहने की सलाह दी जा रही है?
सच तो यही है कि आयुष गर्भवती स्त्रियों को जो सलाहें दे रहा है, वे तब तक कारगर नहीं हो सकतीं जब तक समूचा समाज इसमें मदद नहीं करता. वे कहती हैं साथ ही यदि ये सलाहें चिकित्सा से जुड़े एक जिम्मेदार मंत्रालय द्वारा दी जा रहीं हैं, तब इन सलाहों को सबसे पहले वैज्ञानिक होना चाहिये और तब ही उनके सवालिया सांस्कृतिक व आध्यात्मिक पहलुओं की तरफ नज़र डालने के बारे में सोचा जा सकता है, उसके पहले बिल्कुल नहीं. स्त्रियों को उनके मौलिक अधिकारों तक को देने में कछुये की चाल से चल रहे एक देश-समाज में, स्वस्थ व नीतिवान शिशुओं को जन्म देने की जितनी जिम्मेदारी माँ की हो सकती है, उससे कहीं अधिक परिवार और समाज की होनी चाहिये, इस सत्य का सामना सरकारी महकमों को करना ही चाहिये, यदि वे सचमुच ही देश की तरक्की चाहते हैं

मैत्रेयी इतनी इर्ष्यालू थी कि वह नजर रखती थी कि राजेंद्र जी के पास कौन आ रहा है (?)

स्त्रीकाल डेस्क 

मैत्रेयी पुष्पा की किताब ‘वह सफ़र था कि मुकाम था’  हंस के संपादक राजेंद्र यादव  से उनकी जगजाहिर घनिष्ठता को स्पष्ट करती हुई एक रेफरिंग दस्तावेज है. लेकिन  ऐसे  दस्तावेज  होने की संभावनाओं के साथ लिखी गई किताबों में गल्प और किस्सागोई नहीं होने चाहिए, जिससे मैत्रेयी जी ने इस किताब को भर दिया है- ऐसा लगता है. किताब का एक अंश समालोचन  में प्रकाशित हुआ है, जो राजेंद्र जी की पत्नी और लेखिका मन्नू भंडारी के प्रति विद्वेष से भरा है. यह अंश राजेंद्र यादव  के बीमार होने और हॉस्पिटल में दाखिल होने से शुरू होता है और आगे मन्नू  जी के खिलाफ प्रलाप करते हुए राजेंद्र जी से लेखिका की अंतरंगता, सखी-भाव को बताते हुए बढ़ता है. सखी-भाव का आश्रय है राजेंद्र यादव की ”मीता.’ जिनके संदर्भ में मैत्रेयी जी का दावा है कि उन्होंने उन्हें देखा है. स्त्रीकाल ने राजेंद्र जी की बीमारी के चश्मदीदों, उनकी सेवा में लगे लोगों से बात कर मैत्रेयी की दावे की सत्यता की पडताल की. तथ्यों के आधार पर अपनी पहली रपट में स्त्रीकाल  ने स्पष्ट कर दिया कि हिन्दी अकादमी की उपाध्यक्ष और साहित्यकार मैत्रेयी  जी झूठ रच रही हैं. इस क़िस्त में हम उन दिनों राजेंद्र जी के आस-पास रहे उनके आत्मीय लोगों के हवाले से समझते हैं कि मैत्रेयी अपने संस्मरण में कितना प्रतिशत कल्पना डाल रही हैं-पता नहीं किस उद्देश्य से. पिछली क़िस्त में हमने देखा कि राजेंद्र जी को अस्पताल ले जाने का मैत्रेयी का दावा किस तरह झूठा और काल्पनिक है, वैसे ही मन्नू जी पर किया गया उनका प्रहार भी विद्वेषपूर्ण है:

वेददान सुधीर 

मैत्रेयी पुष्पा खुद को खुदा समझने लगी हैं, वे भूल गईं कि राजेंद्र जी ने उन्हें स्थापित किया है. जब राजेंद्र यादव अपस्ताल में भर्ती हुए तब मैं भी अस्पताल पहुँच गया था. यह सच है कि मैत्रेयी पुष्पा की बेटियाँ एम्स में थीं. मैत्रेयी के पति की अस्पताल में भूमिका जरूर थी मदद करने की, लेकिन मन्नू भंडारी के बारे में उसके दावे सर्वथा झूठे हैं. मन्नू जी अक्सर राजेंद्र जी के खाने-पीने से लेकर हर बात का ख्याल रखती थी. उनका रूटीन था किशन से जानना कि राजेंद्र जी  को क्या खिलाया ? मैत्रेयी इर्ष्यालू भी हैं.  वे मन्नू जी पर कीचड़ उछाल रही हैं. वे कुत्सित विश्लेषण की विशेषज्ञ हैं. अपने को सही ही सिद्ध करना  था मन्नू जी को तो उन्होंने राजेंद्र जी को खुद से अलग क्यों किया होता !  नगीना को मैंने बहुत कम ही देखा है. नगीना खुद भी मन्नू जी का सम्मान करती थीं. राजेंद्र यादव अस्पताल से निकलकर अपनी बेटी रचना के यहाँ गये . राजेंद्र जी उन्मुक्त पक्षी थे, वे किसी की परवाह नहीं करते थे. उन्होंने अपने घर जाने को तय किया तो उन्हें कौन रोक सकता था. उन्हें मैत्रेयी की भी परवाह नहीं थी. मैत्रेयी इतनी इर्ष्यालू थी कि वह नजर रखती थी कि राजेंद्र जी के पास कौन आ रहा है. एक स्त्री थीं, पत्रकार, उनके राजेंद्र जी से मिलने आने पर वह चौकन्नी हो जाती थी. मन्नू जी को किसी के लायसेंस की जरूरत नहीं थी. राजेंद्र जी और मन्नू जी के रिश्तों की तरह मैंने कोई रिश्ता नहीं देखा. मैत्रेयी चाहती थी कि वह राजेन्द्र जी की ख़ास मित्र बने,सबसे प्रिय. राजेंद्र जी ने उसकी साहित्यिक मदद भी खूब की.

किशन
राजेंद्र जी की बीमारी की खबर सुनकर सुधीश पचौरी उनके घर आ गये थे. और नवभारत टाइम्स में रहने वाले पुनीत टंडन और आभा टंडन भी आ गये थे, जिनकी हैदराबाद ब्लास्ट में बाद में मौत हो गई. राजेंद्र जी के अस्पताल में भर्ती होने के बाद उनकी देखभाल मन्नू जी और रचना दी ने की. मैं तब बहुत छोटा था. इतना समझ नहीं पाता था लेकिन यह तो है कि मैत्रेयी जी के पति और उनके बच्चों के एम्स में होने से कुछ मदद मिली थी. बाबूजी को पहले जेनरल वार्ड में एडमिट किया गया था फिर उन्हें कमरा मिला , क्योंकि उन्हें देखने कुछ बड़े लोग आने वाले थे, चन्द्रशेखर, लेकिन वे आ नहीं पाये. सुषमा स्वराज  आई थीं, दो मिनट के लिए- ( हालांकि अरविंद जैन की याद से सुषमा ने बुके और एक कार्ड भिजवाया था, वे खुद नहीं आ पायीं थीं) .मन्नू जी लगभग दिन भर रहती थीं.

जब बीमार हुए थे बाबूजी तो मैंने सबको खबर कर दी थी. उस समय मोबाइल तो नहीं था न, लेकिन मैंने फोन कर दिया था. मैं बच्चा सा था उस समय, बहुत घबड़ा गया था. सुधीश पचौरी तुरत आ गये थे. सुधीश जी ने उनको फोन किया था. मैत्रेयी जी के बच्चो के होने से डाक्टरों से आसानी से अपॉइंटमेंट मिल जाता था.

केजरीवाल सर, हिन्दी अकादमी में आपकी उपाध्यक्ष साहित्यिक झूठ खड़ा कर रही हैं? (मन्नू-मीता-मैत्रेयी के सच की खोज)

शिव कुमार शिव : 
एक दिन बाद जब मै दिल्ली पहुंचा उस समय वह जेनरल वार्ड  से कमरे मे आ गए थे। उस समय जब मै वहाँ पहुँचा तब वहां  मैने देखा कि मन्नू जी हैं, महेश दर्पण हैं, और अरविंद जैन हैं। 2 रातो तक उनकी देखभाल महेश दर्पण ने की थी और फिर मै वहाँ स्थाई रूप से रहने लगा । मैत्रेयी  जी का कहीं नामो निशान नही था । लगभग 5 दिन बाद शाम को 4 बजे मैत्रेयी  जी गुप्त रूप से राजेंद्र जी से मिलने पहुंची । जब वह कमरे में थी, तब मै चौकीदारी कर रहा था। उन्हे याद हो तो आधे घंटे के बाद मैंने उन्हे गाड़ी मे बिठा दिया था । यह कहना लाज़िमी होगा कि उनकी देखभाल और संभाल का पूरा जिम्मा मन्नू जी का था । मैत्रेयी को तो उनकी बीमारी का पता बहुत दिन बाद चला । हालांकि इस बीमारी के दौरान के कई प्रसंग है जो अद्भुत भी हैं और रोचक भी.  लेकिन वे कहीं  नही हैं,  जो इतना झूठा शोर मचा रही है । उनके जिंदा रहते तो आपने उनका लेखकीय शोषण किया अब मुर्दे को तो बख्श दो यार !

इन बयानों को पाठक आत्मकथा अंश के पहले हिस्से से जोड़कर पढ़ सकते हैं, जिसमें मैत्रेयी जी राजेंद्र जी का शुगर टेस्ट कराने के बाद अपने पति द्वारा उन्हें एम्स में भर्ती कराने का उल्लेख करती हैं, जो किसी भी तथ्य से पुष्ट नहीं होता. यानी मैत्रेयी जी झूठ रच रही हैं.

स्त्रीकाल में क्रमशः जारी

मन्नू भंडारी के नाम

आज हरदिल अज़ीज साहित्यकार मन्नू भंडारी का जन्मदिन है. उनके प्रति असीम रागात्मकता और सम्मान के साथ वरिष्ठ साहित्यकार सुधा अरोड़ा की यह कविता स्त्रीकाल के पाठकों के लिए.  


जिन्हें वे संजोकर रखना चाहती थीं 
सुधा अरोड़ा

वे रह रह कर भूल जाती हैं
अभी अभी किसका फोन आया था
किसकी पढ़ी थी वह खूबसूरत सी कविता
कुछ अच्छी सी पंक्तियाँ थी
याद नहीं आ रहीं . . . .

दस साल हो गये
अजीब सी बीमारी लगी है जान को
रोग की तरह…. भूलने की
बस, कुछ भी तो याद नहीं रहता
सब भूल – भूल जाता है

वह फोन मिलाती हैं
एक क़रीबी मित्र से बात करने के लिए
और उधर से ‘हलो` की आवाज़ आने तक में
भूल जाती हैं किसको फोन मिलाया था
वह  शर्मिन्दा होकर पूछती हैं,
‘बताएंगे , यह नंबर किसका हैं?`
‘पर फोन तो आपने किया है !`
सुनते ही वह घबराकर रिसीवर रख देती हैं

क्या हो गया है याददाश्त को
बार-बार बेमौके शर्मिन्दा करती है !

किसी पुरानी फिल्म के गीत का मुखड़ा
इतराकर खिलते हुए फूल का नाम
नौ बजे वाले सीरियल की कहानी का

सुधा अरोड़ा और मन्नू भंडारी

छूटा हुआ सिरा,
कुछ भी तो याद नहीं आता
और याद दिलाने की कोशिश करो
तो दिमाग की नसें टीसने लगती हैं
जैसे कहती हों, चैन से रहने दो,
मत छेड़ो, कुरेदो मत हमें !
बस, यूं ही छोड़ दो जस का तस !
वर्ना नसों में दर्द उठ जाएगा
और फिर जीना हलकान कर देगा,
सुन्न कर देगा हर चलता फिरता अंग
साँस लेना कर देगा दूभर
याददाश्त का क्या है
वह तो अब दगाबाज़ दोस्त हो गयी है ।
कूरियर में आया पत्रिका का ताजा अंक
दूधवाले से लिए खुदरा पैसे
कहाँ रख दिए, मिल नहीं रहे
चाभियाँ रखकर भूल जाती हैं
पगलायी सी ढूँढती फिरती है घर भर में
एक पुरानी मित्र के प्यारे से खत़ का
जवाब देना था
जाने कहाँ कागजों में इधर उधर हो गया
सभी कुछ ध्वस्त है दिमाग में
जैसे रेशे रेशे तितर बितर हो गये हों …

नहीं भूलता तो सिर्फ यह कि
बीस साल पहले उस दिन
जब वह अपनी

शादी की बारहवीं साल गिरह पर
रजनीगंधा का गुलदस्ता लिए
उछाह भरी लौटी थीं
पति रात को कोरा चेहरा लिए
देर से घर आये थे
औरतें ही भला अपनी शादी की
सालगिरह क्यों नहीं भूल पातीं ?

बेलौस ठहाके, छेड़छाड़, शरारत भरी चुहल,
सब बेशुमार दोस्तों के नाम,
उनके लिए तो बस बंद दराज़ों का साथ
और अंतहीन चुप्पी
और वे झूठ की कशीदाकारी वाली चादरें ओढ़े
करवटें बदलती रहतीं रात भर !

पति की जेब से निकले
प्रेमपत्रों की तो पूरी इबारतें
शब्द दर शब्द रटी पड़ी हैं उन्हें –
चश्मे के केस में रखी चाभी से
खुलती खुफिया संदूकची के ताले से निकली –
सूखी पतियों वाले खुरदरे रूमानी कागज़ों पर
मोतियों सी लिखावट में प्रेम से सराबोर
लिखी गयी रसपगी शृंखला शब्दों की
जिन्हें उनके कान सुनना चाहते थे अपने लिए
और आँखें दूसरों के नाम पढ़ती रहीं ज़िन्दगी भर !
सैंकड़ों पंक्तियाँ रस भीनी
उस ‘मीता` के नाम
जिन्हें वह भूलना चाहती हैं
रोज़ सुबह झाड़ बुहार कर इत्मीनान से
कूड़ेदान में फेंक आती हैं –
पर वे हैं
कि कूड़ेदान से उचक उचक कर
फिर से उनके ईद – गिर्द सज जाती हैं
जैसे उन्हें मुँह बिरा – बिरा कर चिढ़ा रही हों।

……और इस झाड़ बुहार में फिंक जाता है
बहुत सारा वह सब कुछ भी
याददाश्त से बाहर
जिन्हें वह संजोकर रखना चाहती थीं,
और रख नहीं पायीं ……..

2007

( “कम से कम एक दरवाज़ा” में संकलित एक कविता ) 

21वीं सदी: स्त्री-सम्वेदी पुरुष की परिकल्पना और ‘कठपुतलियाँ’

 तरुणा यादव 

उत्तर आधुनिक युग में स्त्री के जीवन में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। बदलते परिवेश में युवा स्त्री परिवार के बीच पुरुष के प्रभुत्व को चुनौती देती हुई परिधि से केन्द्र में आने की निरंतर कोशिश कर रही है। कुछ हद तक उसे सफलता भी मिली है। इसके बावजूद हम यह नहीं कह सकते है कि स्त्री विमर्श अपने उद्देश्यों को पूर्णतया पा चुका है, स्त्री विमर्श अभी आने वाले दो-तीन दशकों तक ज्वलंत मुद्दा रहेगा। लेकिन 21वीं सदी की लेखिकाएँ जैसे इस विमर्श को लेकर चल रही हैं और युवा पीढ़ी की स्त्रियाँ भी धीरे-धीरे पुरुष वर्चस्व का प्रतिकार कर रही हैं तो वह दिन अब दूर नहीं, जब यह विमर्श कबीर की साखियों की चिर-प्रासंगिकता को पीछे छोड़कर अपना मुकाम हासिल करने में कामयाब होगा और होना भी चाहिए क्योंकि आखिर कब तक यह षड्यंत्रकारी पितृसत्ता अपनी भयावह विद्रूपताओं के साथ स्त्रियों को मुहँफाड निगलती रहेगी। आखिर एक दिन तो इसे थमना ही पड़ेगा अपने जोरदार प्रतिरोध के साथ। लेकिन अभी वह समय बिल्कुल नहीं आया; है! हाँ कुछ अध कचराए विकृत मानसिकता वाले, अपने को बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग जरूर गली नुक्कड़ के मुहानों, सभाओं और सरकारी कुर्सियों को तोड़ते हुए फैशन की तरह यह फिकरा कसते मिलेंगे- ‘अब काहे की स्त्रियों का शोषण हो रहा है अब तो पुरुष विमर्श की जरूरत है। या फिर स्त्री विमर्श सिर्फ देह मुक्ति का विमर्श है। खैर! ये हवाई बातें ठीक वैसे ही उस कहावत की तरह है जिसके पैर न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई। किन्तु स्त्रियों को इसकी परवाह न करते हुए अभी अपनी मंजिल तक अपना संघर्ष जारी रखना है और जो अधकचराये लोग स्त्री-विमर्श को देह मुक्ति का विमर्श मानते हैं, उन्हें भी उन्हीं की भाषा में जवाब देना है जैसे ‘प्रतियोगी’ कहानी में नीलाक्षी सिंह बाजार को बाजार की भाषा में जवाब देती है। मनीषा कुलश्रेष्ठ अपनी ‘कठपुतलियाँ’ कहानी में स्त्री विमर्श को देह-मुक्ति का विमर्श मानने वालों को उन्हीं की भाषा में जवाब देती है।

‘कठपुतलियाँ’ कहानी मनीषा कुलश्रेष्ठ के इसी शीर्षक के संग्रह में प्रकाशित है। मनीषा अपनी कहानियों में ऐसे चरित्रों की तलाश करती है जिनका जीवन और आवाज समाज में त्याग की महिमामयी प्रति मूर्ति के रूप में अभिव्यक्ति पाता है। लेखिका पात्रों की रचना के समय उनके व्यक्तित्वों के अनेक स्तरों का उद्घाटन करती हैं, ‘कठपुतलियाँ’ कहानी मुख्य रूप से जैसलमेर के ग्रामीण परिवेश की है। कहानी की मुख्यधारा में तीन पात्र हैं – सुगना, रामकिसन और जोगेन्द्र। हाशिए पर है मायका, ससुराल और परम्परागत पंचायत। जो मुख्यधारा की पृष्ठभूमि को तैयार करके भारत में वास्तव में निःशुल्क (फ्री) मिलने वाली अत्यधिक और अनावश्यक सलाह की तरह जीवन में जबरन घुस कर उसे तीव्रता से प्रभावित करते हैं।

कहानी की शुरूआत में ही रचनाकार दरवाजे के पीछे लटकी कठपुतलियों की ओर इशारा करती है और लिखती है कि – ‘‘कभी सुगना उदास होती तो …. इन कठपुतलियों को एक साथ ढेर बनाकर ताक पर रख देती और साँकल लगाकर गुदड़ी पर ढह जाती। कभी गुस्सा होती तो जोर से झिंझोड़ देती सबके धागें। कुछ मटक जातीं एक-दूसरे में अटक जाती। किसी नर्तकी की गर्दन उसी के हाथों में उलझ जाती। कोई राजा डोर से टूट मुंह  के बल गिरा होता। ढीठ मालिन टोकरी समेत उसके ऊपर।’’1 यहाँ कठपुतलियाँ प्रतीक है सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के हाथों की कठपुतलियाँ बनी औरतों की। यहाँ कठपुतलियों को गुस्से में झिझोड़ना दबी, कुचली औरतों को उनके अधिकारों के प्रति जाग्रत करना है जिसमें कुछ मटक कर यानि थोड़ा-सा अधिकार या प्यार पाकर इतरा कर उसी में उलझी रह जाती है। कुछ अपनी ही समस्यायों में उलझ कर फँसी उलझी रह जाती है तो कुछ पितृसत्तात्मक व्यवस्था की  नृत्यांगनायें यानि पुरुषवादी महिलाएँ बन उन्हीं के हाथों में अपनी गर्दन सौंप देती हैं। दूसरी ओर पितृसत्ता रूपी कोई राजा किसी शिक्षित या जागृत स्त्री से मुँह की खाकर भी ढीठ हुआ फीके पड़ चुके अपने दम्भी  पुरुषत्व के साथ स्त्री समाज के आस-पास मुँह खिसयाता रहता है।

जाहिर है सुगना को कठपुतली रूपी औरतों का चित्र  मात्र भी पसंद नहीं, तभी तो  वह कठपुतलियों को खीज कर आँखों के आगे से हटा कर ताक पर रखकर साँकल के अंदर रख देती है। सुगना का विवाह पिता ने जोगेन्द्र से तय किया था पर पिता की मृत्यु के बाद माँ ने लेन-देन के कारण तोड़कर कठपुतलियाँ दिखाने वाले लँगड़े तीस वर्ष की उमर के दो बच्चों वाले नसबंदी करवा चुके विधुर से करा दिया। सुगना की माँ को किसी और के साथ जिन्दगी बसानी थी इसलिए जल्दी-जल्दी उसने लड़की का ब्याह 13 वर्ष की उम्र में ही निपटा दिया। शादी का सौदा उसने रामकिसन से दो हजार रूपये लेकर किया था। रामकिसन शादी के बाद अपनी शारीरिक जरूरतें तो सुगना से पूरी करता रहा लेकिन सौन्दर्य की मरूस्थल सुगना से उठती रेतीली देह रूपी लहरों की पूर्ति करने में वह नाकामयाब रहता है। लेखिका के शब्दों में – ‘‘वह धम्म से गुदड़ी पर सुन्न होकर पड़ जाती। अपने वजूद को, अपनी देह को हाथ से टटोलती। सोचती-उलझती लेकिन समझ नहीं आता-रात किस मुहाने पर जाकर उफन पड़ी थी। वह कि रामकिसन कुंठित हो गया और छिटक गया उससे दूर। पहले देह जब शान्त नदी-सी पड़ी रहती थी तो वह मीलों तैर जाता था। अब जब वह नैसर्गिक आकांक्षाओं से भरपूर नदी में बदल जाती है और इन्हीं आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु प्रसन्न-प्रगल्भ तो रामकिसन के लिए मुश्किल हो जाता है इस उफनती नदी को बाँहों में भरकर तैरना। बहुत डरपोक थी सुगना, अब रामकिसन चाहे जैसे नचाए। वह तृप्ति की डकार लेता….. तो वह जूठन के इधर-उधर गिरे टुकड़े समेट …. भूखी ही उठ जाती।’’2

दूसरी ओर रचनाकार कहती है कि सुगना की मोहक हँसी को भी शतरंज के घोड़े की तरह टेढ़ी चाल चलने वाले सर्प ने यानि लगड़े रामकिसन ने ही डस लिया था। रसोई और कोठरी रूपी पितृसत्ता की चारदीवारियों से सुगना को घुटन होती है। उसे तो खुले में खड़ा खेजड़े का पेड़ भाता है जिस पर वह प्यासे पक्षियों के लिए दाना-पानी लगाती है पेड़ सुगना को उस घर में अपने अस्तित्व का प्रतीक लगता है तो दाना-पानी उस के जीवन की छोटी-छोटी खुशियों के प्रतीक हैं। खेजड़े के पेड़ के चारों ओर सुगना का चबूतरा बनाना अपने अस्तित्व को उस घर में भी सीमित कर लेना है। रामकिसन के घर में पहले की औरत के दोनों बच्चों को संभालना, पूरे दिन पति की अनुपस्थिति में घर का कामकाज और प्रतीक्षा करना, रेगिस्तानी क्षेत्र के कारण पानी की किल्लत से दूसरे गांव कुलधरा के कुंए से पानी लाना ही सुगना की दिनचर्या थी। रामकिसन के अलावा नयी ब्याहता जवान औरत के सपनों को समझने वाला और कौन होता ? पर उसके लिए तो वह बच्चों को संभालने वाली और जरूरत के मुताबिक यौन सुख देने वाली औरत मात्र थी। इस दिनचर्या में कुलधरा कुएँ से पानी लेने आते-जाते एक दिन तूफान के समय उसकी भेंट जोगिन्द्र से हुई, जिसके साथ उसकी शादी टूट गयी थी। खेजड़े के पेड़ की जड़े काँपने लगी थी। दोनों की देखा-देखी मे भावनात्मक आत्मीयता स्थापित हो गई। जोगिन्द्र की आँखों के जंगल में सुगना को प्रेम रूपी फसल लहराती दिखाई देने लगी।

मरूस्थल में पीली आंधी का तूफान आता है और सुगना का लूगड़ा सर से उखड़कर फरफराने लगता है। रचनाकार के शब्दों में – ‘‘कुर्ती-काँचली में अटका छोर छूट गया …. बस घाघरे में अटका छोर छुड़ा पाता तो यह लूगड़ा तेज हवाओं के साथ कहीं परदेश ही जा उड़ता।’’3 यहाँ घाघरे के छोर में लूगड़े का अटका रह जाना दिखाता है कि युवा पीढ़ी की स्त्री के पाँव अपनी मर्यादा रूपी जमीन पर दृढता से टिके हुए है; नहीं तो उसी दिन जोगी के साथ सुगना भाग भी सकती थी, परन्तु वह तो रामकिसन के बच्चों से जुड़ी हुई थी।

खैर! मरूस्थल में प्रेम की फसल लहराई भी और फसल रूपी बीज सुगना के गर्भ में भी छोड़ दिया। यहाँ भी रचनाकार अपने व्यंग्य के पैनेपन और धार से पितृसत्ता पर करारी चोट करती है। पंडित का फिकरा गूंजा – ‘‘विधवा, गाभण…. रितुमती औरताँ, छोड़ी हुई लुगायाँ हवन सूँ आप ही उठ के चली जावो … बुरो मत मानजो सा …. भगवान री बनायी रीत है … आरती में कोई भेदभाव नी…. आरती के टेम वापस आ … सको …. अपनी-अपनी श्रद्धा आसूँ भेंट चढ़ा सको।’’4 जाहिर है कहानी में पंडित के इस वक्तव्य को पढ़कर स्त्री-विमर्श का प्रतिकार करने वालों की आँखें बरबस ही नीची हो जाएँ, कि आज भी प्रकृति जन्य स्थितियों में औरतों के धार्मिक आयोजनों में शरीक होने पर प्रतिबन्ध लगाने वाली यह पुरुषवादी मानसिकता आखिर कब बदलेगी। प्रकृति ने माँ बनने का गौरवपूर्ण अधिकार सिर्फ स्त्रियों को ही दिया है। इसलिए नहीं कि वह कमजोर है अपितु इसलिए की उसमें दूसरे प्राणी को समझने और स्नेह-सिक्त करने के लिए पुरुष के अतिरिक्त शक्ति व संवेदनशीलता होती है। फिर भी गर्भ भार से क्लान्त एक स्त्री पर लगभग सभी आयोजनों (यज्ञ, मृत्यु, शोक, विवाह आदि) में जाने पर प्रतिबंध लगाये जाते हैं। मैं प्रश्न करना चाहती हूँ कि पितृसत्ता के ये सारे प्रतिबंध सिर्फ स्त्री पर ही क्यों लगाएँ जाते हैं? पिता बनने वाले पुरुष व स्त्री माँ बननेवाली दोनों का ही समान आचरण होता है। तो क्या सिर्फ इसलिए कि स्त्रियों को प्रकृति ने जिस अतिरिक्त स्नेह से आपूरित किया है उसे दबाना ही पितृसत्ता का उद्देश्य है ताकि सृष्टि में उससे ऊपर किसी का वर्चस्व ही न उठ पाए। तो क्या ये दमन मात्र अधिकार लिप्सा का एक मोहकारी षड्यन्त्र है ? अगर हाँ तो फिर 21वीं सदी की स्त्रीयाँ अधिकार मोह में लिप्त मर्दवादी मानसिकता को ये भी बताना चाहती है कि वह भी उसी लोकतंत्र देश की नागरिक है जिस देश का नागरिक दम्भयुक्त वह पुरुष है जो उसे बिना चुनाव के ही दबाना चाहता है।

मनीषा कुलश्रेष्ठ

कहानी में सुगना ढीठ होकर यज्ञ में आहूतियाँ देती है और सन्देश देती है कि तुम्हारी बनाई हुइ मान्यताओं की अब धज्जियाँ उड़ने का समय आ चुका है। ये 21वीं सदी की स्त्रियाँ हैं। इन्हें  तुम और ज्यादा नहीं बरगला सकते हो। सुगना गर्भवती हुई तो नसबन्दी करवाए पति को संदेह हुआ। रामकिसन की माँ जो कि पितृसत्ता की चौकीदारिन है ने जाति दण्ड दिलवाने की ठान ली। जाति पंचायत हुई पंचायत में पंच कहता है कि – ‘‘अग्नि परीक्षा औरत की मर्जी से ही ली जाती है।’’5 मेरे सामने सबसे बडा सवाल यह है कि जब रामकिसन से सुगना की शादी सुगना की मर्जी से नहीं हुई, जो औरत अपनी मर्जी से शादी नहीं कर सकती वह भला अपनी मर्जी से अग्नि परीक्षा क्यों देगी? या फिर मर्जी पूछने वाली यह पंचायत सिर्फ अग्नि परीक्षाओं में ही मर्जी क्यों पूछती है? शादी के समय पंचायत के न्यायधीश  क्या छुट्टियों पर होते हैं? दूसरी ओर जोगिन्द्र पंचायत में मौजूद रहता है वह कहता है कि – ‘‘सुगना सुन, मैं हरजाने के चार हजार लाया हूँ …. दो हजार में छीना था न तुझे मुझसे मैं दुगुना हरजाना भरूँगा। उसे बोल, छाती ठोक के कह दे कि बच्चा तेरा-मेरा है। कोई जरूरत नहीं गरम तेल में हाथ डालने की….. या गरम ईंट पकड़ने की। ये पंच अपना फायदा देखते हैं ऐसी चीजों में। औरत का चरित्र खराब निकले तो भी पंचों की चांदी, न निकले तो भी उनकी चांदी। दोनों तरफ का पैसा उनको तो मिलता ही है।’’6 यहाँ जोगिन्द्र के माध्यम से पंचायत रूपी पितृसत्ता के किलों पर करारा व्यंग्य करती है नरेटर। हालांकि जोगिन्द्र भी कोई दूध का धुला नहीं है, स्वयं शादी-शुदा होते हुए भी उसने अबोध सुगना को बरगला कर उससे शारीरिक संबंध स्थापित किये थे।

यहाँ तक आपको लगता होगा कि मैं और रचनाकार दोनों ही स्त्री-विमर्श में स्त्री-देह-मुक्ति  का तिल्लिस्म रच आपको बरगला रहे हैं। नहीं यहाँ से कहानी अपनी तमाम दकियानूसी सोच को पीछे धकेलकर एक नए आयाम की ओर अग्रसर होती है। सुगना ने पंचायत में दृढ़ता से कहा – ‘‘यह बच्चा बंसी का ही भाई या बहन है। मुझे बंसी के बापू के साथ ही रहना है …. और आप ही कहो क्या कहूँ?’’7 सुगना अग्नि परीक्षा में सफल हुई। पंचायत होते समय जोगिन्द्र वहाँ मंडराता रहा व अनुरोध करता रहा कि सुगना उसके साथ भाग चले। गर्भ के बच्चे को जोगिन्द्र से जोड़ दे। हरजाने की राशि वह दे देगा। परंतु सुगना ने अपने प्रेम और शारीरिक जरूरतों को किनारे कर दिया। दो छोटे-छोटे बच्चों नंद-बंसी के लिए रामकिसन के साथ रहना पसंद किया। वह ऐसी समूची औरत बन गयी जो केवल देह मुक्ति के लिए आजाद नहीं होना चाहती थी।

स्त्री-विमर्श के अंतर्गत सिर्फ स्त्रियों की छवि को ही नहीं गढ़ा जाता और न ही ये पुरुष के विरोध में उपजा कोई प्रतिरोधी आंदोलन है। अपितु यह पुरुष के भी सह अस्तित्व को गढ़ कर समाज को एक नए सिरे से देखता है और उसी की मांग भी करता है। कहानी सिर्फ सुगना की ही नहीं, अपितु यह रामकिसन रूपी पुरुष के चरित्र को भी एक नया आयाम प्रदान करती है। कहानी में रामकिसन का सीमा पार  चार किलोमीटर जाकर ग्वारपाठे और छीपकली का तेल लेकर आना, जोगेन्द्र के बच्चे के साथ सुगना को अपनाना बताता है कि 21वीं सदी का पुरूष भी धीरे-धीरे गहरी संवेदना, विवेक और स्त्री के प्रति उदात्त संभावनाओं से ओत-प्रोत होता जा रहा है। गर्भवती होने पर भी सुगना पर हाथ न उठा कर अपितु स्वयं को ही नुकसान पहुँचाना रामकिसन के उदात्त चरित्र को सिर्फ ऊपर ही नहीं उठाता अपितु उसे समाज के उस सर्वोच्च शिखर पर स्थापित करता है जहाँ से उसे पितृसत्ता की गगनचुम्बी इमारतें भी छू नहीं सकती। प्रभा खेतान अपने उपन्यास ‘छिन्नमस्ता’ में लिखती है कि – ‘‘हर व्यक्ति अपने आप में एक इकाई अवश्य होता है, पर उसमें सच्चे स्त्री और पुरुष वही हो पाते हैं जो पुरुष प्रधान समाज की सीमाओं को पार करके अपने स्वभाव में स्त्री की करुणा को संचित कर पाते हैं, वे ही जीवन का सच्चा सृजन कर पाते हैं।’’7

रही बात कहानी की तो अगर कहानी के पार जाकर सोचा जाये तो कि सुगना और रामकिसन का आगे का जीवन कैसा रहा होगा तो इसमें कोई संदेह नहीं की सुगना के लिए रामकिसन विश्व विजेता सिकन्दर से भी बढ़़कर कोई अन्य ही महान पुरुष सिद्ध हुआ होगा और सुगना स्वयं अपने आप में उसकी रानी। अतः कहानी यहाँ चीख-चीख कर सीमोन के विचारों का समर्थन करते हुए यह बताना चाहती है कि भले ही औरतों की लड़ाई आपने आप में विशिष्ट है, पर वह पुरुषों के साथ मिलकर ही लड़ी जानी चाहिए।वस्तुतः पुरुषों का विरोध करके स्त्री-मुक्ति संभव हो ही नहीं सकती है क्योंकि सिर्फ स्त्रियों को ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था या मर्दवादी मानसिकता से मुक्ति नहीं चाहिए अपितु वैयक्तिक स्तर पर भी प्रत्येक स्त्री-पुरुष को इससे छुटकारा पाना है। ताकि परस्पर सामंजस्य, समन्वय एवं सद्भाव से युक्त सह-अस्तित्वपरक समाज की संरचना का मानवीय स्वप्न पूरा हो सके।

अतः कहानी में स्पष्ट किया गया है कि स्त्री को देह से मुक्ति नहीं चाहिए और न ही वह पुरुष के बरक्स किसी प्रतिसंसार की मांग करती है बल्कि वह तो पुरुष के साथ मिलकर सह अस्तित्वपरक समाज की स्थापना करना चाहती है। वस्तुत इस कहानी में स्त्री के पक्ष-विपक्ष पर विचार करते हुए स्त्री को मनुष्य रूप में स्वीकारने की मांग की गई है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती दी गई है और इस व्यवस्था के विरूद्ध संवाद करते हुए उन मूल्यों को खंडित किया गया है जो स्त्री के शोषण का कारण बनते हैं। इसलिए आज स्त्री की समाज में बदलती हुई स्थिति और भूमिका के प्रश्न नए परिप्रेक्ष्य में उभर कर सामने आए हैं। कहा जा सकता है कि स्त्री-विमर्श किसी प्रतिस्पर्धा या आवेश का आंदोलन नहीं है और न ही यह केवल स्त्री समस्याओं पर केन्द्रित बहस। डाॅ. रोहिणी अग्रवाल के अनुसार – ‘‘स्त्री-विमर्श अपनी मूल चेतना में  स्त्री को पराधीन बनाने वाली पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था का विश्लेषण करता है। यह स्त्री को एक जीवंत मानवीय इकाई समझने का संस्कार देता है।’’8 इसका एकमात्र उद्देश्य तो लिंगगत भेदभाव से ऊपर उठ कर ऐसे समाज की स्थापना करना है जहाँ सभी का समान अधिकार है।

संदर्भ –
1. मनीषा कुलश्रेष्ठ, कठपुतलियाँ, पृ0 7
2. वही, पृ0 11
3. वही, पृ0
4. वही, पृ0
5 वही, पृ0
6. वही, पृ0
7. प्रभा खेतान, छिन्नमस्ता, पृ0 211
8. डाॅ. रोहिणी अग्रवाल, स्त्री लेखन: स्वप्न और संकल्प, पृ0 12

लेखिका महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से शोध करने के बाद हरियाण शिक्षा विभाग में हिन्दी की प्रवक्ता है. संपर्क: tarunayadav87@gmail.com

‘ग्लोबल बहुजन एवार्ड’से सम्मानित हुईं मनीषा बांगर

स्त्रीकाल डेस्क 


बामसेफ की उपाध्यक्ष मनीषा बांगर न सिर्फ देश में बल्कि दुनिया भर के बहुजनों के बीच बहुजन-क्रान्ति का बिगुल बजा रही हैं.  पिछले दिनों वे यूनाइटेड स्टेटस की एक माह की यात्रा पर थीं. बताती हैं कि वे कई सालों से अमेरिका, यूरोप के देशों में  बहुजन सन्देश के लिए यात्रा करती रही हैं. पेशे से गेस्ट्रोएंटेरोलाजिस्ट और डेक्कन इंस्टीट्यूट ऑफ़  मेडिकल साईसिंस, हैदराबाद में एसोसिएट प्रोफेसर मनीषा ने इस नीवनतम  यात्रा के दौरान केलीफोर्निया विश्वविद्यालय, ब्रांडिएस विश्वविद्यालय, डेविस व ओहलान कालेज आदि जगहों पर विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए. इस दौरान उन्होंने  यह स्पष्ट किया कि  ‘हिन्दू जाति व्यवस्था और भारत  में व्याप्त गरीबी के बीच सीधा संबंध है’. उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों , जैसे मुस्लिम, इसाई, बौद्ध, सिक्ख सहित भारत के मूलनिवासियों के हालात के लिए न सिर्फ हिन्दू व्यवस्था को जिम्मेवार ठहराया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी के शासन में आने से इन सभी समुदायों के खिलाफ हिंसा बढ़ी हैं.

बहुजन आंदोलन को समर्पित शख्सियत

हिन्दू गौरव के लिए यात्रा करने वाले विवेकानंद आदि अतीत हो गये, अब मनीषा बांगर जैसी विदुषियाँ पशिचिमी देशों को यहाँ की बदहाली और हिन्दू धर्म के संबंध पर जरूरी सन्देश दे रही हैं. यह सन्देश कई अर्थों में जरूरी और प्रासंगिक है. विवेकांनंद फाउंडेशन के करीबी प्रधानमंत्री के समय में भगवा-उत्साह के अतिरेक को देश-दुनिया देख रही है . ऐसे में यथार्थ से परिचित कराती मनीषा का उचित सम्मान मेंटेका, केलीफोर्निया के मेयर गैरी सिंह द्वारा किया गया और ‘ग्लोबल बहुजन अवार्ड’ प्रदान किया गया. इस अवसर पर उन्हें प्रदत्त  अभिनंदन पत्र के अनुसार, ‘ पददलितों के उत्थान और दमितों की रक्षा के लिए इनके द्वारा किए गए प्रशंसनीय कार्य और भारत में स्वतंत्रता के कारवां को आगे ले जाने के लिए’ उन्हें यह सम्मान दिया गया.

क महीने की अपनी अमेरिका यात्रा में उन्होंने   जनसमूहों को विभिन्न कार्यक्रमों में संबोधित किया.  मनीषा ने अपने संबोधन में  कहा कि ‘अवसरों की समानता के बगैर, प्रजातंत्र का कोई अर्थ नहीं है. परंतु भारत में स्वशासन के सत्तर वर्ष बाद भी जाति प्रथा के कारण, मूलनिवासियों को उनका यह मूलाधिकार नहीं मिल सका है.’  उनकी इस यात्रा का प्रायोजन भीमराव अम्बेडकर सिक्ख फाउन्डेशन ने किया था.  फाउंडेशन के संस्थापक भजन सिंह ने कहा, ‘हम भारत के लोगों की समृद्धि के प्रति डाॅ बांगर की अटूट प्रतिबद्धता के कायल हैं. उन्होंने न्याय, समानता और बंधुत्व की स्थापना के लिए वैश्विक स्तर पर जो कार्य किया है, वह प्रशंसनीय  और प्रेरक है.’

नाम जोती था मगर 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

स्त्री विमर्श और ‘कठगुलाब’

सतीश कुमार 

सहायक प्रोफेसर (गेस्ट फैकल्टी) हिंदी विभाग चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय भिवानी (हरियाणा) संपर्क : 9813293269

स्त्री-विमर्श रूढ़िवादी मान्यताओं, परंपराओं के प्रति अंसतोष, आक्रोश व उससे मुक्ति का स्वर है। यह पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे नैतिक मानदंडों, मूल्यों व अंतर्विरोधों को समझने व पहचानने की गहरी अंतदृष्टि है। स्त्री-विमर्श का प्रमुख लक्ष्य है- स्त्री को भी मनुष्य रूप में देखा जाए। उसको भी पुरूष की भाँति राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक समानता का अधिकार मिले। इसे ‘नारीवाद’ भी कहा जाता है। ‘‘अंग्रेजी में इसके लिए Feminism’ शब्द प्रचलित है।’’1 मनुष्य होने के नाते पुरूष और स्त्री समाज में समान अधिकारों के हकदार हैं। लेकिन पितृसत्तात्मक समाज लैंगिक आधार पर स्त्री को उसके अधिकारों से वंचित रखता है। इसका परिणाम यह हुआ कि स्त्री समाज में  हाशिए पर चली गई। इन असमानताओं के विरूध और अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए स्त्री ने जो आवाज उठानी शुरू की है, जो संघर्ष आरम्भ किया है; यही स्त्री-विमर्श है।

प्रोफेसर रोहिणी अग्रवाल ‘स्त्री-विमर्श’ का अर्थ समझाते हुए लिखती हैं- ‘‘स्त्री को केंद्र में रख कर समाज, संस्कृति, परम्पराएँ एवं इतिहास का पुनरीक्षण करते हुए स्त्री की स्थिति पर मानवीय दृष्टि से विचार करने की अनवरत प्रक्रिया। . . . स्त्री विमर्श के अंतर्गत अतीत या समकालीनता प्रमुख नहीं रहती वरन् भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों कालखण्डों पर एक-दूसरे की अन्वति एवं संगति में विश्लेषण करने का भाव प्रधान रहता है। स्त्री विमर्श चेतना के प्रसार का आख्यान है।’’2 स्त्री-विमर्श अपनी ‘अस्मिता’ की पहचान, अपने अस्तित्व बोध और अधिकार को बताने और जताने का एक वैचारिक चिंतन है। ‘मनुष्य’ होने की न्यूनतम गरिमा से विहिन स्त्री को उसकी स्वतन्त्र जीवन्त अस्मिता से परिचित करके प्रदीप्त करना ही स्त्री विमर्श का मूल लक्ष्य है। स्त्री विमर्श का प्रथम कार्य पुरूष सत्ता को शक के घेरे में लेना है क्योंकि स्त्री पर चिंतन और उसके नियमों का सारा प्रावधान पुरूष ही करते आए हैं। इसी कारण ‘सीमोन द बउवार’ अपनी कृति ‘द सैकिंड सैक्स’ में लिखती हैं कि ‘‘अब तक औरत के बारे में पुरूष ने जो कुछ लिखा, उस पर शक किया जाना चाहिए क्योंकि  लिखनेवाला न्यायाधीश और अपराधी दोनों है।’’3 यही सही है कि स्त्री जीवन हिंदी के शुरूआती साहित्य से ही रहा है। लेकिन यह देखने वाली बात है कि इनमें स्त्री की या तो जीवनगाथा केन्द्र में रही है या उसकी व्यथा की कथा। अपनी अस्मिता व अपनी आत्मचेतना के प्रति स्त्री की सजगता विशेष रूप से स्वातंत्र्योत्तर कालीन साहित्य में ही अधिक उभर कर सामने आती है। स्त्री-विमर्श समकालीन वैचारिक चिंतन है। सारांशतः कहा जा सकता है कि ‘‘स्त्री-विमर्श एक दृष्टि है, जो परंपरा के दबाव, संस्कार एवं पूर्वाग्रह से मुक्त होकर व्यक्ति की पहचान लिंग में नहीं, ‘मनुष्य’ में प्रस्थापित करने की ऊध्र्वमुखी चेतना देती है।’’4

आधुनिक हिन्दी साहित्य, विशेषकर कथा साहित्य में पुरूष रचनाकारों की मान्यताओं के आगे लेखिकाओं ने स्त्री-विमर्श को आगे ले जाने की बागडोर अपने हाथों में ले ली। इस संवर्ग की पहली लेखिका के रूप में कृष्णा सोबती का नाम लिया जा सकता है।  ‘डार से बिछुड़ी’, ‘मित्रो मरजानी’ जैसे इनके कई उपन्यास स्त्री विमर्श के प्रारम्भिक आधार माने जा सकते हैं। इस श्रृंखला में उपन्यास लेखिकाओं की एक सूची है, जिनमें प्रमुख हैंः- उषा प्रियंवदा, मंजुल भगत, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, प्रभा खेतान, अलका सरावगी, राजी सेठ, मैत्रेयी पुष्पा, मृणाल पाण्डेय आदि। इन्होंने स्त्री विमर्श के उन विविध पक्षों को सामने रखा है- जहाँ स्त्री  शक्ति की सामाजिक समानान्तरता की संघर्ष भरी भूमिका दृष्टिगत होती है। मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘कठगुलाब’ इसी श्रृंखला का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है।

‘‘कठगुलाब’, पुरूष-प्रधान समाज में  स्त्री  के दोहन-शोषण और मुक्ति-संघर्षकी कथा है।’’5 इसमें लेखिका ने स्त्री चेतना को विभिन्न पहलुओं से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत उपन्यास में  स्त्री की विविध समस्याओं व उससे संबंधित अनेक प्रश्न दिखाई पड़ते हैं; यथाः- पुरूष सत्ता से मुक्ति, देह और काम विमर्श का स्वनिर्णय (फ्रीडम और सेक्स), जीवन में स्त्री को स्वयं निर्णय लेने का अधिकार, स्वयं से जुड़ी अस्मिता के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता और उसका प्रयोग-व्यवहार इत्यादि।‘‘कठगुलाब’ सही मायनों में एक विस्तृत फलक का उपन्यास है, स्त्री विमर्श को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करता हुआ; उसके करूण वर्तमान की परम्परा की अनवरतता से जोड़कर उस भयावह भविष्य की ओर संकेत करता हुआ जो यदि संवेदनहीन बौद्धिक पेचीदगियांे और प्रतिशोधात्मक प्रतिक्रियाओं में उलझ गया तो सिर्फ टूटकर बिखर जाएगा।’’6

‘कठगुलाब में पांच कथावाचक हैं, जिनमें से चार महिलाएँ हैं और एक पुरूष। ये सभी अपनी-अपनी कहानी बताते हैं। इनके नाम हैंः- स्मिता, मारियन, नर्मदा, असीमा और विपिन। ये सभी स्वभाव व प्रकृति से एक-दूसरे से अलग हैं। महिलाओं में नर्मदा को छोड़कर शेष सभी पढ़ी-लिखी हैं। ये सभी अपने-अपने अनुभव के आधार पर स्त्री-जीवन के विभिन्न पहलुओं पर हमारे समक्ष रखती हैं। इन स्त्रियों के संदर्भ में ‘कठगुलाब’ उपन्यास की आलोचना करती हुई प्रोफेसर रोहिणी अग्रवाल लिखती हैं कि ‘‘उपन्यास की औरतें निखालिस औरतें हैं। उसी एक आदिम हूक के साथ आज भी वे सृष्टि की पहली आदिम औरत की तरह मां बनकर अपने को अंकुआने, हरियाने और खुलकर झूम उठने के उन्माद से सराबोर कर लेना चाहती हैं। वह चाहे परम्परा की बैसाखियों पर टिकी पितृसत्तात्मक व्यवस्था की प्रतिनिधि नर्मदा हो या जमीन के बहिश्त अमरीका की सुशिक्षिता, स्वतंत्रचेत्ता मारियन या उग्र फेमिनिस्ट असीमा। फिर स्मिता की क्या बिसात! . . . यानी सारी समस्या अभिधात्मक नहीं, प्रतीकात्मक है। बेशक वे मां बनने के लिए ललक रही हैं, गर्भ धारण कर रही हैं, लेकिन मां नहीं बन पा रही हैं। हर बार गर्भपात!एबार्शन ! कहीं पति की मार(स्मिता के सन्दर्भ में); कहीं प्रेमी पति की मनुहार (मारियन के सन्दर्भ में) और कहीं क्रूर विधाता की मार (मारियन, नर्मदा, नीरजा के सन्दर्भ में)। ठीक ‘कठगुलाब’ की तरह, पुष्पित होने की सारी सम्भावनाआंे को अपने भीतर निगलकर काठ-सी सख्त बेजान होने की यंत्रणा। सैंकड़ों कलियां खिली हैं जिस पर, लेकिन फूल बन कर खिलने का दम एक में भी नहीं। उसी अविकसित-अगतिशील अवस्था में अडोल सी कठगुलाब की झाड़ियों पर लदी हैं- सारी महक, रंग, सुन्दरता  यकायक पानी की बौछार पाते ही ठीक जादुई कहानियों की तरह झनन हुम करके खिल गईं, खिलती गईं, काठ में उकेरे सदाबहार फूलों की तरह। ये स्त्रियां भी हरिया कर सदाबहार हो जातीं यदि इन्हें भी इनके सहचर पुरूषों की संवेदना का तरल स्पर्श मिलता; यदि विश्वास, सद्भाव, आत्मीयता की तरल बौछार ने इनकी हृदयगत कोमलता को निरन्तर सींचा होता। वे गुलाब नहीं जो उग आने पर अपने आप खिल भी जाते हैं, कठगुलाब हैं जिन्हें  थोड़ी सी देखभाल से खिलाना पड़ता है।’’7

‘कठगुलाब’ उपन्यास के मूल में स्त्री की पीड़ा है, संघर्ष है। समाज में विभिन्न स्त्रियों की सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं, अतः उनके संघर्ष भी एक-दूसरे से भिन्न हैं। परन्तु संघर्ष व पीड़ा सभी स्त्रियों के जीवन में है। उपन्यास की कथावाचक स्त्रियाँ इसी संघर्ष व पीड़ा को अपने-अपने अनुभव के आधार पर व्यक्त करती हैं। शुरूआत करते हैं- स्मिता से। स्मिता, अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् अपनी बहन-बहनोई के घर में रहती है। वह पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहती है लेकिन उसका जीजा जल्दी ही उसकी शादी करवाकर उससे निजात पाना चाहता है। स्मिता उसे अपने घर में  बोझ लगती है। लेकिन साथ-साथ वह यह भी चाहता है कि जब तक स्मिता उसके घर में है, तब तक वह उसका उपभोग करे। उसकी नजर हमेशा उस पर टिकी रहती थी। प्रतिदिन वह उस पर कसीदे कसता रहता था। एक दिन वह शाम को शराब पीकर कहता है- ‘‘यह मेरी साली है स्मिता। क्या चीज है यार। घर में रहती है तो समझो . . . लार टपकती रहती है अपनी . . . साली आधी घरवाली . . . हा-हा-हा . . .।’’8 वैसे भी समाज में ‘‘हक माना जाता है जीजा का साली पर, अश्लील मजाक करने का।’’9 इतना ही नहीं, एक दिन वह मौका पाकर स्मिता का बलात्कार करता है। ऐसे समय में उसकी बहन भी उसे नहीं बचाती है। बल्कि उसके जीजा की गलतियों पर ही पर्दा डालती है। उसका साथ देने की बजाय उसे ही नसीहत देती है। जब स्मिता अपने जीजा की शिकायत पुलिस में करने जाती है तो वह उसे ही चुप रहने को कहती है- ‘‘नहीं। पुलिस के पास गयी तो बदनामी के सिवा कुछ हासिल नहीं होगा। अकेली जान, वे भी तेरा फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। नहीं, यह रास्ता ठीक नहीं है।’’10 मायूस होकर स्मिता वहाँ से पढ़ाई के लिए कानपुर चली जाती है। वह परिस्थितियों से हार मानने वालों में से नहीं है। वह जीवन पर्यंत संघर्ष करती है। अपनी मेहनत, प्रतिभा व लगन से वह अपने लिए निरन्तर नए रास्ते तलाश करती है। अपनी मेहनत के बल पर ही वह बाॅस्टन यूनिवर्सिटी में दाखिला पाती है और अमेरिका चली जाती है। अमेरिका में वह जिम जारविस से विवाह करती है किन्तु वहाँ भी उसे दुःख ही मिलता है। ‘‘फिर एक बलात्कार। पहले अस्मिता पर अब शिशु पर। मेरी चीख ने अस्पताल के दरो-दरवाजे हिला दिए। बचपन के बँधे-रूँधे बलात्कार के क्षण से, आँतों में घुटी जो पड़ी थी।’’11

जिम के साथ रहते हुए उसे ऐसा अनुभव होता है कि जिम के लिए वह पत्नी या प्रेमिका नहीं अपितु अध्ययन का विषय है। प्रेम के नाम पर मनोविश्लेषण का माध्यम बनना हास्यास्पद लगता है। फलस्वरूप उनका संबंध टूट जाता है। इस दौरान लेखिका स्मिता का दबंग रूप भी उपन्यास में प्रस्तुत करती है। एक बार जब वह अपने पति जिम जारविस द्वारा पीटी जाती है तो वह चुप नहीं बैठती बल्कि वह भी उसकी पिटाई करती है। ‘‘उसने जिम को पटकनी देकर जमीन पर गिरा दिया। उसकी बेल्ट छीन ली और अच्छी तरह उसकी धुलाई करके रख दी।’’12 वह अपनी विपरीत परिस्थितियों में भी राह निकाल लेती है। वह अपनी शिक्षा, अपने कैरियर व जीवन के प्रति सजग है। इसी कारण वह निरन्तर सक्रिय बनी रहती है। परिस्थितियों की मार को भाग्य या किस्मत मानकर उन्हें झेलते जाना, उसकी दृष्टि में गलत है। वह न सिर्फ स्वयं के जीवन की समस्याआंे के प्रति सजग है बल्कि अन्य स्त्रियांे के जीवन की समस्याओं को भी सुनना, जानना, समझना और उन्हें दूर करना चाहती है। इसीलिए वह अमेरिका में रिलिफ फाॅर एब्यूज्ड वूमन ‘राॅ’ नामक संस्था से जुड़ती है, जो पीड़ित स्त्रियों के कल्याण के लिए बनाई गई है।

‘कठगुलाब’ में दूसरी कथावाचक हैं- मारियन। वह भी अत्यन्त मेहनती व सजग स्त्री है। उसे शादी में धोखा मिलता है। लेकिन वह उम्मीद नहीं तोड़ती। वह इस उम्मीद पर कि इस बार उसकी भावनाओं का सम्मान हो पाएगा, दूसरी शादी करती है। लेकिन ऐसा नहीं होता। फिर भी वह हिम्मत नहीं हारती। भले ही मारियन और स्मिता की कहानी अलग-अलग हों, लेकिन दोनो ही अपने दुःख से ऊपर उठने के लिए प्रयत्नशील हैं। साथ-साथ अन्य दुःखी स्त्रियों के साथ अपना दुःख बाँटने के प्रति सजग हैं। मारियन का अन्तद्र्वन्द्व, अपनी माँ द्वारा की गई उपेक्षा, समर्पित व ईमानदार होते हुए भी सच्चा जीवन साथी नहीं मिल पाने का दुःख, बार-बार मिले धोखे तथा चाहकर भी माँ नहीं बन पाने की पीड़ा को लेकर है। ‘‘स्मिता समेत राॅ की सब औरतें जानती थी कि भरपूर चाहने के बावजूद, मेरा बच्चा नहीं हुआ था। पर इस न होने के पीछे कितना विषाद और अपमान छिपा था, उसके बारे में मैंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा था।’’13 राॅ की सभी स्त्रियों के पुरूषों के बारे में एक ही राय थी कि ‘‘मर्द नाम का प्राणी खुदगर्ज और जालिम होता-ही-होता है।’’14 यह राय ऐसे ही नहीं बनी है बल्कि इसके पीछे राॅ संस्था की महिलाओं के अपने-अपने अनुभव हैं। मारियन अपना अनुभव साझा करती हुई बताती है कि जब वह उपन्यास लिखती है तो उसे यहाँ भी अपने पति इर्विन से धोखा ही मिलता है। मारियन उपन्यास लिखने के लिए स्रोत इकट्ठा करती है, उसका पति इर्विन उससे वादा करता है कि वह उन दोनों का सम्मिलित उपन्यास होगा। लेकिन जब उपन्यास प्रकाशित होता है तो उस पर मारियन का नाम कहीं भी नहीं होता है। ‘‘पूरी किताब में, आगे-पीछे कहीं मेरे योगदान के लिए आभार प्रकट नहीं किया गया था। समर्पण तक मेरे नाम नहीं था। था, हर औरत के नाम। याद आया, मैंने ही एक दिन कहा था, हम अपने उपन्यास को हर औरत के नाम सपर्पित करेंगे। पर . . . तब,  मैं यही जानती थी कि वह हमारा, हम दोनों का साँझा उपन्यास है।’’15 मारियन के इस उपन्यास में स्पेन की रूथ, इटली की एलेना, स्काॅटलैंड की सूजन तथा पाॅलैंड की राॅकजान की दर्दभरी कथा को प्रस्तुत किया है।

नर्मदा, स्मिता की बहन नमिता के घर काम करती है। नर्मदा का बहनोई उससे जबरदस्ती शादी भी कर लेता है। जीवन में अनेक दुःखों और शोषण की शिकार नर्मदा के हृदय में ढे़र सारी उलझने हैं। लेकिन उसके हृदय में अपने प्रेमी के लिए भी उथल-पुथल मची रहती है। यथाः- ‘‘उसके मारे तो मैंने अपने जालिम जीजा से भी लड़ाई मोल ले ली थी, बहोत समझो चाकू न घोंप दिया सीने में।’’16 अन्य उलझनों से तो वह फिर भी समझौता कर लेती है।

‘कठगुलाब’ में स्त्री कथावाचकों में असीमा का चरित्र सबसे अलग है। उसका तो नाम ही उसके दबंग व्यक्तित्व का परिचायक है। उसने अपना नाम सीमा से असीमा कर लिया है, क्योंकि उसे सीमा में बंधकर घुट-घुट कर जीना पसन्द नहीं है। वह स्त्री के शोषण को सहन नहीं करती है।उसके पिता ने दो बच्चों के होते हुए भी उसकी माँ को छोड़कर दूसरा विवाह कर लिया था। पहले उसे अपने पिता से नफरत हुई और फिर पिता के साथ जाने वाले भाई से। धीरे-धीरे उसे पूरी पुरूष जाति से नफरत हो जाती है। वह स्त्रियों का शोषण करने वाले प्रत्येक पुरूष से प्रतिशोध लेना चाहती है। ऐसे पुरूषों से वह घृणा करती है, उन्हें हरामी कहती है, उसकी दृष्टि में पुरूष की गलतियों पर पर्दा डालना तथा उन्हें हर बात के लिए क्षमा कर देना बिल्कुल गलत है। उसका मानना है कि औरतों का शोषण इसलिए होता है कि वह स्वयं अपना महत्त्व नहीं समझती है। वह कहती है कि ‘‘जब तक औरत यह समझती रहेगी कि मर्द ही असल कमाऊ होता है, उसकी कमाई को अनदेखा किया जाता रहेगा।’’17 वह पुरूषों का विरोध करती है लेकिन अन्दर ही अन्दर अनेक प्रश्न उसके हृदय और मस्तिष्क में सदैव द्वन्द्व पैदा करते हैं कि क्या सभी पुरूष एक जैसे होते हैं या सभी स्त्रियाँ एक जैसी होती हैं ? क्या स्त्री-पुरूष संबंध को एक सामान्यीकृत रूप दिया जा सकता है ? असीमा के दिमाग में ऐसे अनेक प्रश्न जन्म लेते हैं कि ‘‘स्त्री-पुरूष के बीच के रिश्ते का क्या स्वरूप होना चाहिए ? सामान्यीकरण असंभव है, इसलिए होना चाहिए कि बात करना फिजूल था। असीमा जानती थी, उसे सिर्फ यह पूछने का अधिकार था कि उसके और किसी एक पुरूष के बीच के रिश्ते का क्या स्वरूप हो सकता था।’’18

असीमा का चरित्र साहस से भरा हुआ है। वह आम लड़कियों की भाँति दब्बू प्रवृत्ति की नहीं है और न ही उसका जीवन स्वयं तक ही सीमित है। वह अनपढ़, गरीब महिलाओं व उनके बच्चों के हितों के प्रति भी सजग है। बाल-मजदूरी हटाने तथा प्राथमिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार को वह आवश्यक मानती है। इसी प्रकार के प्रश्न उसे परेशान करते रहते हैं कि ‘‘क्या हिन्दुस्तान में बाल-मजदूरी खत्म की जा सकती है?क्या मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उसका कारगर हल बन सकती है ?’’19

‘कठगुलाब’ उपन्यास की सभी स्त्री-पात्रों में अस्मिता बोध अत्यन्त गहरा है। स्मिता, मारियन, असीमा की माँ नर्मदा, नीरजा इत्यादि स्त्रियाँ इस उपन्यास की कड़ियाँ प्रतीत होती हैं। इन सभी स्त्रियों के जीवन की कथा भले ही अलग-अलग है, लेकिन इन सभी कथाओं से ही उपन्यास की सम्पूर्णता है। परिस्थितियाँ अलग-अलग होते हुए भी इन सभी स्त्रियों में अस्मिता बोध का भाव स्पष्ट दिखाई देता है। इनके अन्दर स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा हुआ है। ये कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती है अपितु संघर्ष करती है। ये सभी अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए निरन्तर संघर्ष करती हैं। उदाहरणस्वरूप, स्मिता के जीवन का लक्ष्य था कि वह अपने बलात्कारी से प्रतिशोध ले और उसे सजा दिलवाए। ‘‘कोई दिन ऐसा न जाता, जब मैं अपने इरादे को पूरा करने की योजना न बनाती। क्या-क्या ख्याल आते थे मन में . . . मैं रणचण्डी बनी उसका संहार कर रही हूँ। कभी गदा, कभी तलवार, कभी बरछी, कभी खड्ग; बचपन में सुनी पौराणिक कहानियों का हर दैवी हथियार, मेरे हाथों, उसका नाश करा चुका था।’’20

मृदुला गर्ग

अतः निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि ‘कठगुलाब’ मृदुला गर्ग की स्त्री-विमर्श के दृष्टिकोण से एक सफलतम कृति है। इस उपन्यास में केवल भारतीय ही नहीं अपितु यूरोपीय स्त्रियों की पीड़ा की कहानी भी है। इसमें स्त्री-विमर्श की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समीक्षा की गई है, जिसमें यह बात उभरकर सामने आती है कि स्त्री चाहे किसी भी देश की क्यों न हो, वह प्रताड़ित होती है। इन सब के बावजूद भी स्त्री ने पूरी दुनिया के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उसने दुनिया को यह दिखा दिया है कि वह किसी भी क्षेत्र में पुरूषों से कम नहीं है। समाज-सुधार, शिक्षा, चिकित्सा, राजनीति, प्रशासन, तकनीक, विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों में स्त्रियाँ सफलतापूर्वक काम कर रही हैं। जिस तीव्रता से स्त्री ने समाज में गति पकड़ी है, उसी तीव्रता से साहित्य में भी उसका चित्रण होने लगा है। मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘कठगुलाब’  इसी कड़ी का एक सफल उदाहरण है। यह उपन्यास जहाँ एक ओर स्त्रियों की पीड़ा और उनके संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है, वहीं दूसरी ओर उनकी उपलब्धियों का भी ठोस प्रमाण है। स्त्री-विमर्श के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण आयामों को इस उपन्यास में उठाया गया है- स्त्री सशक्तिकरण, स्त्री हिंसा व यौन उत्पीड़न का विरोध, स्त्री शिक्षा का समर्थन, अन्याय का विरोध, स्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्त्री की अस्मिता, अधिकारों और कत्र्तव्यों के प्रति जागरूकता इत्यादि ऐसे महत्त्वपूर्ण पहलू हैं।

अतः संक्षेप में कह सकते हैं कि ‘कठगुलाब’ उपन्यास स्त्री-विमर्श को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करता है।


सन्दर्भ  सूची 

1. डाॅ॰ अमरनाथ, हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, पृ॰ 385
2. उद्धृत, डाॅ॰ रोहिणी अग्रवाल, साहित्य की जमीन और स्त्री-मन के उच्छ्वास, पृ॰ 11
3. डाॅ॰ रोहिणी अग्रवाल, साहित्य का स्त्री-स्वर, पृ॰ 9
4. सं॰ डाॅ॰ लालचन्द गुप्त ‘मंगल’, हिन्दी साहित्य: वैचारिक पृष्ठभूमि, पृ॰ 243
5. डाॅ॰ रामचन्द्र तिवारी, हिंदी का गद्य-साहित्य, पृ॰ 266
6. डाॅ॰ रोहिणी अग्रवाल, इतिवृत्त की संरचना एवं संरूप, पृ॰ 65
7. वही, पृ॰ 65-66
8. मृदुला गर्ग, कठगुलाब, पृ॰ 15
9. वही, पृ॰ 23
10. वही, पृ॰ 23
11. वही, पृ॰ 59
12. वही, पृ॰ 55
13. वही, पृ॰ 104
14. वही, पृ॰ 65
15. वही, पृ॰ 96
16. वही, पृ॰ 155
17. वही, पृ॰ 141
18. वही, पृ॰ 196
19. वही, पृ॰ 194
20. वही, पृ॰ 25

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

केजरीवाल सर, हिन्दी अकादमी में आपकी उपाध्यक्ष साहित्यिक झूठ खड़ा कर रही हैं? (मन्नू-मीता-मैत्रेयी के सच की खोज)

स्त्रीकाल डेस्क 


प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका समालोचन में मैत्रेयी पुष्पा की किताब ‘वह सफ़र था कि मुकाम था’ का एक अंश छपा. यह अंश हंस के संपादक और हमसब के प्रिय लेखक राजेंद्र यादव से लेखिका की घनिष्ठता की बानगी है. पाठकों के लिए इसमें भावनात्मक खुराक भी है- अपने प्रिय लेखक संपादक की प्रेमिका के एक इमेज से जुड़ने की. विवाहेत्तर प्रेम की यह ‘मीता’ साहित्य जगत की राधा है. शीर्षक भी बड़ा भावुक और सनसनी पैदा करने वाला, ‘ हाँ, मैंने मीता को देखा है.’ मानो लेखिका ही एक मात्र ऐसी स्रोत हैं, जो इस महान प्रेम की साक्षी है. इस प्रेम का रोमांच पाठक तबतक अनुभव नहीं करेगा जबतक इसका एक विलेन न हो. विवाहेत्तर प्रेम की सबसे उचित विलेन तो स्वाभाविक है कि पत्नी ही होगी. पत्नी यानी मन्नू भंडारी, कालजयी कथाकार! लेखिका खुद को कृष्ण की द्रौपदी की तरह पेश करना चाह रही हैं इस प्रसंग में,  राजेंद्र जी और उनकी मीता के लिए खूब निष्ठा, स्नेह और समर्पण के साथ. वे इस महान प्रेम की एकमात्र साक्षी भी हैं और उनके बीच का विश्वासी माध्यम भी.
लेकिन इस पूरी कथा को रचते हुए, आत्मकथा में काल्पनिक कहानी की छौक देते हुए, वे शायद भूल गईं की राजेंद्र जी अभी उतने अतीत भी नहीं हुए हैं. उनसे जुड़े लोग आज भी हैं, खुद ‘कथित खलनायिका’ मन्नू जी भी हैं. वे अकेली नहीं हैं, जिन्होंने मीता को देखा है. हां मीता यानी नगीना जैन, आगरा की एक प्रतिष्ठित महिला को साहित्य जगत की राधा होते देखने वालों में कई लोग अभी जीवित और सक्रिय हैं. खुद राजेंद्र जी ने उनका नाम इतना गुप्त नहीं रहने दिया था. तद्भव में वे बता चुके थे, मीता यानी ‘नगीना जैन’. 

हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

इतिहास को सही दर्ज करने के लिए जरूरी है कि उनके समकालीन बोलें अन्यथा पता नहीं किस विवशता या उद्देश्य से मैत्रेयी जी एक झूठा साहित्य-इतिहास अपनी आत्मकथा में दर्ज करना चाह रही हैं. हो सकता है इस कहानी के और भी पात्र जल्द बोलें, लेकिन फिलहाल मैत्रेयी जी की आत्मकथा का झूठ- सच स्पष्ट होना चाहिए. राजेंद्र जी जब एम्स में भर्ती थे तो उनके आस-पास और भी लोग थे,  उनके हवाले का सच कुछ और भी है. हमें यहाँ उनके हवाले का सच जानना चाहिए , फिर इसके और पात्र जब बोलें या राजेंद्र जी और मीता के और हमराज बोलें तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि एक बड़ी उपन्यासकार और आजकल हिन्दी अकादमी, दिल्ली, की उपाध्यक्ष, को साहित्यिक इतिहास का इतना बड़ा झूठ रचने की जरूरत क्यों आन पडी.

एक साहित्यिक रपट के तौर पर इस पूरे प्रसंग को लेते हुए स्त्रीकाल ने इसके किरदारों से संपर्क किया. जब राजेंद्र जी एम्स में भर्ती थे तो उनके साथ हमेशा रहने वाले और खासकर रात में रहने वाले कहानीकार और ‘किस्सा’ के संपादक शिव कुमार शिव से भी संपर्क किया गया. उन सबके हवाले से जो सच-झूठ बनता है उसे हम सिलसिलेवार समझते हैं.

मैत्रेयी  का दावा: पूछ ही सकती हूँ कि अगर उनके टेस्ट नार्मल थे तो डॉक्टर साहब (मेरे पति) उनको लेकर एम्स क्यों गए थे? जल्दी से जल्दी कैज्युअलिटी में दाखिल क्यों कराया था?

राजेंद्र यादव और मैत्रेयी

सच: शिवकुमार जी और अन्य स्रोत बताते हैं कि टेस्ट तक तो डाक्टर साहब के हस्तक्षेप से ही हुआ था भर्ती होने के पहले, लेकिन ऐसा नहीं था कि राजेन्द्र जी को टेस्ट के बाद डाक्टर साहब यानी (मैत्रेयी के पति) उन्हें अस्पताल ले गये थे. अस्पताल दाखिल करवाया गया था उनके घर से. जब दाखिल करवाया गया तो आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी राजेंद्र जी के घर पर थे और उन्हें भर्ती करवाने वाला शख्स था, ‘औरत होने की सजा’ का लेखक और तबतक उनके प्रिय लोगों में से एक एवं हंस के तत्कालीन कानूनी सलाहकार अरविंद जैन. डाक्टर साहब और मैत्रेयी दूर-दूर तक नहीं थे. वहीं अरविंद जैन बताते हैं कि ‘‘उन्हें दाखिल करते वक्त फॉर्म भरने की जब बारी आई तो मैंने उनका अपने से रिश्ता लिखा, ‘ पिता.’’

मैत्रेयी का दावा: खैर, मन्नू दी तैयार हुईं. हमारी जान में जान आई कि जिन्दगी भर साथ निभाने के वादे पर विवाहिता होनेवाली पत्नी ने हमारी अरज सुन ली, इन अलगाव भरे दिनों में कड़वे अनुभवों से गुजरते हुए. मुश्किल लम्हे उनके लिए भी और हमारे लिए भी. सद्भाव ने मुश्किल हल कर दी.

सच: मन्नू भंडारी उनके एडमिट होने के दूसरे दिन सुबह आईं. उन्होंने वहाँ राजेंद्र जी के इलाज में हो रहे खर्च के बारे में पूछा और अरविंद जैन को उन्हें भर्ती कराने में हुए खर्च के पैसे दिये.

मैत्रेयी का दावा: अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मन्नू जी ने अपने अलगाव को सुरक्षित रखा. आने-जाने की औपचारिकता या लोक-लाज अस्पताल  तक ही थी जहाँ तमाम साहित्यकार आते-जाते. वे इस नाजुक मौके की नब्ज पहचानती थी कि राजेन्द्र जी के आसपास दिखने में उनके बड़प्पन और पति की बेजा हरकतों के ग्राफ की नाप-तौल होगी और वे उत्तम कोटि नारी की उपमा बनेंगी.

सच: राजेंद्र जी के अस्पताल में दाखिल होने के दूसरे दिन ही शिव कुमार शिव दिल्ली आ गये थे. उनका समय ज्यादातर अस्पताल में ही बीतता था. उन्होंने बताया कि मन्नू जी का उनदिनों न सिर्फ नियमित आना होता था, बल्कि फोन पर भी वे खबर लेती थीं. शिव जी के अनुसार, जो अक्सर दिल्ली आने पर राजेंद्र जी के यहाँ रहते थे, मन्नू जी राजेंद्र जी को सुबह छः बजे नियमित फोन किया करती थीं, .

मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव

मैत्रेयी का दावा: उन्होंने मुझ नाम बताया लेकिन मैं यहाँ लिखूँगी नहीं क्योंकि उन्होंने हमेशा उनका नाम छिपाया और उनको मीता नाम से लिखा.

सच: राजेंद्र जी ने खुद तद्भव पत्रिका में उनके नाम का खुलासा किया था- नगीना जैन
उद्धरण ‘‘शायद मेरी इस मानसिक छटपटाहट को मन्नू समझ रही है । वह बैठ कर बातें करना चाहती है, और मैं टाल देता हूं । एक बार तो उसने कहा था कि अगर आपको लगता है कि इस जड़ता और अवरोध से आप यहां से बाहर जाकर निकल सकते हैं तो नगीना के साथ कुछ दिन रह लीजिए … दया और करुणा ही हुई सुन कर … यह बात उसने किस यातना बिन्दु पर पहुँचकर  कही होगी … । लगता है  मुझे भी है कि शायद इस अंधे कुंए से वही साथ निकाल सकता है, मगर हिम्मत नहीं पड़ी । मैं नगीना के साथ रहने दस दिनों को जाऊंगा यह कह कर मैं निकल सकता हूं ? चुपचाप चोरी छिपे जाऊं और भला मानुस बन कर लौट आऊं , यह तो हो सकता है । यही शायद होता भी रहा है । मगर कह कर खुलेआम जाना कैसा लगता है जाने … चला भी गया तो शायद लौटने का मुंह नहीं रहेगा । यहां भी सब चीजें , रहना – व्यवहार नार्मल नहीं रह पायेंगे … । ’’                                                   – तद्भव: 11 , पृष्ठ  – 181
:
दरअसल मैत्रेयी कुशल कहानीकार की तरह पाठकों की संवेदना और निजी में तांक-झाँक की उनकी इच्छा को सहला रही हैं: 


मैत्रेयी का दावा : उन्होंने मेरी ओर कागज की एक बहुत छोटी चिट बढ़ाई. हाथ काँप रहा था.
‘‘इसमें एक नम्बर लिखा है, टेलीफोन कर दो.’’
‘‘कहाँ करना है ? अच्छा, मैं घर से मोबाइल फोन ले आऊँगी, आप ही कर देना बिस्तर पर लेटे-लेटे.’’
‘‘आगरा करना है, लेकिन मैं नहीं करूँगा.’’
‘‘क्यों, आप क्यों नहीं ?’’
‘‘अरे यार, तुम भी! सारी बात पूछकर मानोगी. उसकी भाभी मेरी आवाज पहचानती है, उसे फोन नहीं देगी.’’
‘‘उसको किसको ?’’
उन्होंने मुझ नाम बताया लेकिन मैं यहाँ लिखूँगी नहीं क्योंकि उन्होंने हमेशा उनका नाम छिपाया और उनको मीता नाम से लिखा.

सच: कहानीकार कविता ने सटीक सवाल किये हैं अपनी टिप्पणी में कि राजेंद्र जी ने फिर कथित भाभी को खुद फोन क्यों नहीं किया, जब उन्हें नाम ही छिपाना था तो. राजेंद्र जी से जुड़े सारे लोग जानते हैं और बताते हैं कि जब नगीना आई थीं उन्के फ़्लैट पर रहने तो वे हंस के दफ्तर भी आती थीं, साहित्य की दुनिया उनसे इतना अपिरिचित भी नहीं है. दरअसल इस कहानी के किरदारों के अनुसार नगीना दो बार आई थीं एक बार इस बीमारी के बाद और एक बार इसके पहले जब वे कवि केदारनाथ सिंह के यहाँ किराये पर रहते थे.
स्रोत : समालोचन 

राजेंद्र जी साहित्यकारों के साथ


शिव कुमार शिव का फेसबुक पोस्ट: 
एक दिन बाद जब मै दिल्ली पहुंचा उस समय वह जेनरल वाड मे कमरे मे आ गए ये। उस समय जब मै वहाँ पहुँचा तब वहां  मैने देखा कि मन्नू जी हैं, महेश दर्पण है और अरविंद जैन हैं। 2 रातो तक उनकी देखभाल महेश दर्पण ने की थी और फिर मै वहाँ स्थाई रूप से रहने लगा । मैत्रेयी  जी का कहीं नामो निशान नही था । लगभग 5 दिन बाद शाम को 4 बजे मैत्री जी गुप्त रूप से राजेंद्र जी से मिलने पहुंची । जब वह कमरे में थी, तब मै चौकीदारी कर रहा था। उन्हे याद हो तो आधे घंटे के बाद मैंने उन्हे गाड़ी मे बिठा दिया था । यह कहना लाज़िमी होगा कि  उनकी देखभाल और संभाल का पूरा जिम्मा मन्नू जी का था । मैत्रीय को तो उनकी बिमारी का पता बहुत दिन बाद चला । हालांकि इस बीमारी के दौरान के कई प्रसंग है जो अद्भुत भी हैं और रोचक भी.  लेकिन वे कहीं  नही हैं,  जो इतना झूठा शोर मचा रही है । उनके जिंदा रहते तो आपने उनका लेखकीय शोषण किया अब मुर्दे को तो बख्श दो यार !

सवाल यही है कि हिन्दी अकादमी की उपाधयक्ष और हमसब की प्रिय कहानीकार को झूठ बोलने, झूठी  कहानी लिखने की जरूरत क्यों आन पड़ी. हमारी कोशिश होगी कि इस कुछ सच्ची-कुछ झूठी कहानी के अन्य किरदारों से भी उनका पक्ष लेकर आयें. ताकि इतिहास में कुछ गलत दर्ज न हो. अभी तक हमारे पास यही तथ्य है, हो सकता है सारे किरदारों के बोलते-बोलते इसमें कुछ जुड़े या घटे. 

स्त्री कामुकता का उत्सव मानती फ़िल्म ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ’

सौम्या गुलिया

सौम्या दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं.नाटक के एक समूह ‘अनुकृति’ से जुड़ी हैं. संपर्क : ई मेल-worldpeace241993@gmail.com



“If sexuality is one dimension of our ability to live passionately then in cutting off our sexual feelings, we diminish our overall power to feel” By Judith Plaskow


जूडिथ प्लास्कों की कामुकता पर गई यह टिपण्णी मनुष्य के जीवन में कामुकता की ज़रूरत को स्पष्ट करती है। कामुकता मनुष्य को मानसिक एवं शारीरिक बल प्रदान करती है। ऐसे में जाहिर है कि लैंगिक आधार पर कामुकता का विभाजन नहीं किया जा सकता लेकिन फिर भी विश्व के लगभग सभी देशों में स्त्री की कामुकता का दमन किया गया है। यहाँ तक भी तर्क दिए गए कि स्त्री में कामेच्छा होती ही नहीं है। स्त्री की कामेच्छा को ‘हिस्टीरिया’  नाम देकर उसे मनोरोगों तक की श्रेणी में रख दिया गया। स्त्री की कामुकता को स्वीकार करना पितृसत्तात्मक समाज के ठेकेदारों को कभी भी स्वीकार्य नहीं रहा। स्त्री की कामुकता को पुरुषों ने अपने आनंद का एक माध्यम बना लिया। पुरुष ने कभी उसकी देह को अपनी यौन संतुष्टि के लिए नो चा तो कभी स्त्री की प्रजनन क्षमता का दोहन अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए किया। यदि कभी किसी स्त्री ने समाज की इन चिरपरिचित मान्यताओं को ठुकराकर अपनी कामुकता पर अपना अधिकार जाताना चाहा तो समाज ने उसे चरित्रहीनता का तमगा पहनाकर वेश्या की श्रेणी में रख दिया। यही कारण रहा कि जब-जब सिनेमा में स्त्री की कामुकता को स्वायत्तता प्रदान करने की कोशिश की गयी तो कभी सेंसर बोर्ड या कभी समाज ने उसका विरोध किया गया।

जिस हिंदी सिनेमा में हमेशा से बलात्कार और छेड़खानी के दृश्यों की भरमार रही है। कभी जमींदार तो कभी साहूकार तो कभी पिता, भाई या पति के दुश्मन सभी के निशाने पर हमेशा स्त्री की देह रही और स्त्री सुनहले कहे जाने वाले पर्दे पर बलात्कृत होती रही। समाज में छेड़खानी की जिन घटनाओं पर खूनखराबे हो जाते हैं। फिल्मों में अक्सर हीरो ने कभी हिरोइन का दुपट्टा खींचा तो कभी हाथ पकड़ा लेकिन छेड़खानी की इन हरकतों और बलात्कार के दृश्यों पर न तो कभी सेंसर बोर्ड ने प्रतिबंध लगाए और न ही मर्दानगी के इस ओछे प्रदर्शन पर तथाकथित भारतीय संस्कृति के संरक्षकों ने परदे पर दिखाए जाने का विरोध किया। इसी सिनेमा में स्त्री की कामुकता के स्वायत्त प्रदर्शन पर इतना बवाल होना स्त्री के प्रति समाज का दोहरे मापदंड नहीं तो और क्या है ? सोनाली बोस की सितम्बर 2014 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘मार्गरीटा विथ अ स्ट्रॉ’ कई कारणों से महत्वपूर्ण है। यह फिल्म एक विकलांग स्त्री की सेक्सुअलिटी को तो सेलिब्रेट करती ही है साथ ही लैंगिक अल्पसंख्यकों को लेकर हो रही बहसों और आन्दोलनों को सकारात्मक रूप में हमारे सामने रखती है।

बोस की फिल्म को हिंदी सिनेमा में स्त्री कामुकता के इतिहास में मील के पत्थर के रूप में देखा जा सकता है। जिसकी मुख्य नायिका लायला(कल्कि कोचीन) अपनी कामुकता के हर अँधेरे कोने में झाँकना चाहती है, अपनी कामुकता का आनंद उत्सव मनाना चाहती है और यह करने के लिए वह समाज की सारी मर्यादाओं को बेख़ौफ़ होकर लांघती है। वह जानती है कि उसकी कामुकता उसकी निजी संपत्ति है जिसमें वह अपनी माँ तक का दखल नहीं चाहती तभी तो जब उसकी माँ उसके पोर्न देखने पर सवाल उठाती हैं तो वह साफ़ शब्दों में कह देती है कि यह उसका निजी मसला है। लायला दिल्ली महानगर के एक एकल मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती है। घर में लायला की माँ (रेवती) पिता (कुलजीत) और एक छोटा भाई है। लायला के परिवार में उसकी माँ प्रधान भूमिका में है। इसीलिए कहा जा सकता है कि बोस ने परिवार का सेटअप मातृसत्तात्मक रखने की कोशिश की है। लायला मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रस्त है जिसके कारण वह ठीक ढंग से बोल नहीं पाती, किसी भी चीज़ को अच्छे से पकड़ नहीं पाती और पूरा समय व्हील चेयर पर रहती है। लेकिन फिल्म का केन्द्रीय विषय लायला की इन मुश्किलों पर प्रकाश डालना नहीं लगता। कम से कम फिल्म के आरम्भ में तो कतई नहीं। लायला सत्रह-अठारह साल की है और अपनी उम्र के किसी भी लड़के-लड़की की तरह एकदम सामान्य है। वह देश के प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती है। वह कुशाग्र बुद्धि की लड़की है और अपने कॉलेज के म्यूजिक बैण्ड के लिए गाने भी लिखती है। वहीं उसका दिल बैंड के मुख्य गायक नीमा पर आ जाता है। वह नीमा को अपने प्रति आकर्षित करना चाहती है। इसीलिए उसे प्रभावित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहती। तभी तो वह घर आते ही फेसबुक पर नीमा को खोजती है और अपनी व्हीलचेयर वाली तस्वीर से व्हीलचेयर को काट-छाँट कर उसे अपनी प्रोफाइल पिक्चर बनाती है। फिल्म के इस दृश्य में स्त्री कामुकता के महत्वपूर्ण पक्ष देह छवि(बॉडी इमेज) का विश्लेषण किया जा सकता है। देह छवि मनुष्य की कामुकता का एक प्रमुख घटक है। एक कामुक मनुष्य के रूप में हमारा अस्तित्व बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने शरीर को कैसे देखते हैं और हमारे शरीर की यौन इच्छाओं और यौन संतुष्टि आदि से जुड़े अनुभव कैसे हैं। कामुकता और देह छवि के सम्बन्ध को लेकर किये गए शोधों की एक लम्बी श्रृंखला मौजूद है। देह छवि स्त्री कामुकता के सन्दर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योकि हमेशा से ही पुरुषों की अपेक्षा स्त्री का आंकलन उनकी देह के आधार पर किया जाता है। इस विषय पर किये गए शोधों के परिणामों से यह बात सामने आई है कि नकारात्मक देह छवि वाली स्त्री अपनी कामुकता को भी प्राय: नकारात्मक रूप में ही देखती है। साथ ही नकारात्मक देह छवि के चलते यौन संतुष्टि का स्तर भी प्रभवित होता है। अपनी देह को लेकर स्त्री के मन में एक हीनता बोध घर कर लेता है जिसके चलते वह स्त्री कामुक क्रियाओं में खुलकर भाग नहीं ले पाती।

व्हीलचेयर लायला की देह छवि का ऐसा ही एक नकारात्मक पहलू है जिसे वह काट-छाँट कर स्वयं से अलग कर देती है। वह अपने शरीर के हर हिस्से को बेहतर बनाना चाहती है ताकि वह नीमा को आकर्षित कर सके। इसके लिए वह लिपस्टिक लगाकर खुद को आईने में निहारती है। वह अपनी आई(माँ) से उसके बालों को हर दिन धोने की जिद करती है। नीमा के आते ही लायला के बाह्य व्यक्तित्व में आने  वाले ये सारे बदलाव उसकी कामुकता का ही एक पहलू है।

लायला अपनी स्वाभाविक यौन इच्छाओं को संतुष्ट करने में झिझकती नहीं है। वह उसकी ही तरह व्हीलचेयर पर रहने वाले अपने दोस्त ध्रुव को कोने में ले जाकर किस करने की पहल करती है। उसका यह पहल करना उसे हिंदी सिनेमा की उन स्टीरियोटाइप अभिनेत्रियों की छवि से अलगाता है जो हमेशा अपनी यौन इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए अभिनेता के ग्रीन सिग्नल देने का इंतजार करती हैं। नीमा के प्रति आकर्षित होने पर अपने भीतर उठी कामेच्छाओं को शांत करने के लिए लायला पोर्न देखती है और हस्तमैथुन करती है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार परदे पर किसी स्त्री की यौनिकता को इतनी स्वाभाविकता और बहादुरी के साथ फिल्माया गया है। जिस समाज में पोर्न जैसी सामग्रियों को सिर्फ पुरुषों की कामुकता को संतुष्ट या उत्तेजित करने वाले माध्यम के रूप में देखा जाता है उसी समाज की किसी स्त्री को परदे पर पोर्न देखते दिखाया जाना वाकई स्त्रियों की कामुकता पर लगायी गयी पितृसत्तात्मक समाज की तमाम पाबंदियों को ध्वस्त करना ही है। ऐसा करने में बोस निसंदेह सफल रही हैं। हस्तमैथुन की क्रिया की यदि बात की जाए तो यौन संतुष्टि प्राप्त करने के लिए किये जाने वाली इस क्रिया को लगभग हर सभ्यता और समाज में हेय और घृणित कर्म के रूप में देखा जाता रहा है। कई समाजों में तो हस्तमैथुन को मनोरोग की श्रेणी में रखा जाता है बल्कि चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान इसके एक स्वाभाविक यौन क्रिया होने के प्रमाण तक दे चुके हैं। स्वयं स्त्रियाँ भी हस्तमैथुन को एक मानसिक विकार के रूप में देखती हैं और इसे अपनी काम-कुंठा का नतीजा मानती है। लगभग सभी स्त्रियाँ अपने जीवन में कभी न कभी हस्तमैथुन करती है लेकिन समाज के द्वारा इसे एक टैबू की श्रेणी में रखे जाने के कारण किसी के सामने यह स्वीकारने में शर्म महसूस करती है कि हाँ हमने अपनी यौन संतुष्टि के लिए हस्तमैथुन जैसी स्वाभाविक क्रिया की है। चूँकि फिल्म की मुख्य किरदार लायला विकलांग भी है तो यहाँ मुझे एक वाकया याद आ रहा है कि एक विकलांग लड़की की कामुकता को लेकर पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ तक कितनी असंवेदनशील हो सकती हैं। यह घटना कुछ चार-पांच साल पहले की है जब मै अपनी बीए की पढाई के लिए देश के प्रतिष्ठित कॉलेज माने जाने वाले मिरांडा हाउस के हॉस्टल में रह रही थी। जहाँ कुछ दृष्टिबाधित छात्राएं भी रहती थीं। तभी हॉस्टल में एक विडियो की चर्चा सुनी, देखा तो पता चला कि यह विडियो एक सामान्य छात्रा ने अपनी दृष्टिबाधित रूम मेट का बनाया है जब वह अपने को कमरे में अकेला समझकर हस्तमैथुन कर रही थी। उस विकलांग छात्रा के अन्तरंग पलों के विडियो का मजाक यह कहकर उड़ाया जा रहा था कि अरे! ये लोग भी ऐसे काम करते हैं। विडियो बनाने वाली लड़कियां खुद को नारीवादी कहते नहीं थकती थी और अपने कामुक अनुभवों के किस्से दंभ भरकर सुनाती थीं। इन लड़कियों के द्वारा एक विकलांग लड़की के नितांत निजी पलों में की गई कामुक अभिव्यक्ति का मखौल उड़ाने की धृष्टता हमारे समाज के तथाकथित प्रगतिशील लोगों की संकीर्ण और असंवेदनशील सोच के सच को हमारे सामने खोल कर रखती है। लेकिन बोस की फिल्म का हस्तमैथुन की इस स्वाभाविक क्रिया के साथ किया गया ट्रीटमेंट बेहद स्वाभाविक है। फिल्म यह दृश्य रात के वक़्त का है। जब लायला के सभी घरवाले सो जाते है तो वह पोर्न देखती है और उसके पश्चात् की कामोत्तेजना को शांत करने के लिए कैमरे से पीठ फेरकर खिड़की की तरफ मुँह करके हस्तमैथुन करती है। बोस ने इतने चुनौतीपूर्ण दृश्य को भी बखूबी फिल्माया है और लायला की बॉडी लैंग्वेज ही है जो इस दृश्य में संवादों की भूमिका निभा रही है।

इसके बाद के एक दृश्य में लायला अपनी एक महिला मित्र के साथ होलसेल की एक दुकान पर वाईब्रेटर खरीदने जाती है। दुकान का मालिक पूजा-पाठ में लगा होता है जब लायला उसे कहती है कि उसे वाईब्रेटर चाहिए तो वह समझता है कि लायला को मोबाइल फ़ोन चाहिए जिनको वाईब्रेशन पर करने की सुविधा हो और कहता है कि आजकल तो सभी फ़ोन में होता है और हँसते हुए आगे कहता है कि “मैंने तो अपनी वाइफ को भी वाईब्रेटर पे डाल रखा है।” जिसपर लायला की विदग्ध हँसी ने पूरे दृश्य को और भी अर्थपूर्ण बना दिया है। दरअसल लायला सिर्फ दुकानदार पर ही नहीं हँसती बल्कि पूरे समाज की उस मानसिकता पर हँसती है जिसके लिए स्त्री के मुँह से कामुकता शब्द भी सुनना अप्रत्याशित है। इस दृश्य को बोस ने एक हास्य व्यग्य के अंदाज में फिल्माया है, व्यंग्य उस देश की स्थिति पर जिस देश में लड़कियों को सैनेट्री पैड्स तक खरीदने से पहले दस बार सोचना पड़ता है और कंडोम खरीदना हो तो हज़ार बार क्योकि उनके बेधड़क होकर पैड्स और कंडोम मांगने से आजू-बाजु खड़े लोग के द्वारा उनके चरित्र पर सवालिया निशान लगाये जाते हो ऐसे समाज में एक लड़की का सेक्स टॉय मांगना दुकानदार को अप्रत्याशित लगेगा ही।

लायला अपने कॉलेज के बैंड के लिए गीत लिखती और कंपोज़ करती है। एक  प्रतियोगिता में उसके कॉलेज के बैंड को पहला पुरस्कार मिलता है। प्रतियोगिता की होस्ट पुरस्कार की घोषणा करते हुए कहती है कि “जब हमें पता चला की इस गाने के लिरिक्स एक विकलांग लड़की ने लिखे है तो हमें ये अवार्ड इसी ग्रुप को देना पड़ा। लायला, आपकी प्रोब्लेम्स बाकि लोगों से अलग रही होगी। विल यू प्लीज़ शेयर योर एक्सपीरियंस विथ अस?’’ इसके जवाब में गुस्साई लायला उसे मिडिल फिंगर दिखाकर वहाँ से चली जाती है क्योकि लायला को सहानुभूति नहीं चाहिए। वह बाकि लोगों से अलग नहीं होना या दिखना चाहती और फिर लायला के व्यक्तित्व की जिंदादिली इस बात का सबूत भी है कि वह किसी भी लिहाज़ से किसी से कम नहीं है। इस वाकये के बाद लायला नीमा के गले लगकर रोती है लेकिन जैसे ही वह नीमा को कहती है कि मुझे सिर्फ तुम चाहिए तो एक आधी-अधूरी लड़की के इस प्रोपोज़ल को वह अस्वीकार कर देता है क्योकि लायला समाज के द्वारा द्वारा गढ़े गए सम्पूर्ण नारी के मानकों पर खरी नहीं उतरती और इसी कारण सामान्य लोगों से प्यार करने या प्यार पाने का अधिकार यह समाज उसे नहीं देता। इसीलिए नीमा, लायला के प्रति अगर कुछ रख सकता है तो सिर्फ सहानुभूति रख सकता है, प्रेम नहीं। पहले तो प्रेम निमंत्रण देने का हक़ हमारे समाज ने सिर्फ पुरुषों को दिया है। एक आदर्श नारी से सिर्फ गर्दन हिलाने और मुस्कुराने भर की अपेक्षा की जाती है ऐसे में एक लड़की, वह भी विकलांग लड़की के द्वारा अपने प्रेम का इज़हार करना तो पितृसत्तात्मक समाज के पुरुष को अटपटा लगेगा।

फिल्म की निर्देशक सोनाली बोस ने यह फिल्म अपनी चचेरी बहन मालिनी चिब जोकि खुद भी मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रस्त है के जीवन से प्रेरित होकर बनाई है। जिस घटना ने उन्हें यह फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया उसका ज़िक्र करते हुए बोस कहती है कि एक बार मालिनी के चालीसवें जन्मदिन की पार्टी में उन्होंने मालिनी से पूछा कि उन्हें इस जन्मदिन पर क्या गिफ्ट चाहिए तो मालिनी के जवाब ने उन्हें चौका दिया। बोस याद करते हुए कहती है कि उसने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘वह सेक्स करना चाहती है।’ इस जवाब पर बोस इसलिए नहीं चौकी कि अच्छी भारतीय लडकियां ऐसी बाते नहीं करती बल्कि इसलिए चौंकी कि मालिनी पूरी तरह मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रस्त है और हमारा समाज कभी भी विकलांगता और कामुकता को एक साथ नहीं देखता, न ही हम इस बारे में बात करते हैं और न सोचते हैं क्योकि हमें ऐसा करना ज़रूरी नहीं लगता। मालिनी की तरह ही लायला भी इसी बीमारी से ग्रसित है। ऐसे में लायला के द्वारा अपनी कामुकता का ऐसा खुला प्रदर्शन समाज को अखरेगा ही।

जिस समाज में स्त्री की कामुकता पर बात करना ही एक टैबू हो उसमें एक विकलांग स्त्री की कामुकता पर समाज के विचारों का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। हमारे समाज में विकलांग व्यक्ति को एसेक्सुअल  माना जाता है यानि कि समाज ऐसे व्यक्ति की सेक्स सम्बन्धी ज़रूरतों को ही ख़ारिज कर देता है। समाज की इसी सोच के कारण विकलांग व्यक्ति अपनी कामेच्छा को अपने भीतर ही दबाता रहता है जोकि एक समय के बाद मानसिक कुंठा का रूप धारण कर लेती है। विकलांग लोगों की कामुकता को नकारने वाले लोगों को अमेरिका के NCBI में प्रकशित एक शोध को पढ़ना चाहिए जिसके अनुसार “The period between 12 and 25 years of age is essential for human sexual development: physical changes, masturbation, dating, beginning intimate relationships and sexual experiences। This applies to people with and without physical disabilities or chronic illnesses।”  स्पष्ट है कि कामुकता हर मनुष्य के जीवन का एक अभिन्न अंग है और किसी भी आधार पर मनुष्य को इससे अलग नहीं किया जा सकता। मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रस्त लोगों की कामुकता को लेकर उनसे की गयी चर्चा में यह तथ्य सामने आये हंक कि “Seventy-six percent of the participants had experience with masturbation। Most young adults with CP had reached one or more sexual milestones; 78% had experience with French kissing, 70% with caressing under clothing, 65% with cuddling nude and 54% with sexual intercourse। Twenty percent had no sexual experience with a partner।”  यह आंकड़े बताते हैं कि किसी भी सामान्य मनुष्य की तरह ज्यादा नहीं तो कम पर इन लोगों की भी अपनी सेक्स सम्बन्धी ज़रूरतें होती हैं।

एक विकलांग बच्चे को उसकी कामुकता से परिचित करवाने में माता-पिता या संरक्षकों की बहुत ही अहम भूमिका हो सकती है। इसका प्राय: समाज में अभाव देखा जाता है। माता-पिता अक्सर इस बात को नज़रंदाज़ कर देते हैं कि उनका बच्चा एक कामुक प्राणी भी है। प्राय: उनको यह अहसास नहीं होता कि एक सकारात्मक देह छवि (बॉडी इमेज) का विकास होना कितना ज़रूरी है और उनकों अपने बच्चे की कामुक भावनाओं का भी ख्याल रखना चाहिए। फिल्म में लायला की माँ लायला के साथ हमेशा हर परिस्थिति में उसकी हिम्मत बनकर उसके साथ खड़ी रहती है। वह अपनी बेटी की हर ज़रूरत, हर अहसास को समझती है लेकिन जब उसे यह पता चलता है कि लायला अपने लैपटॉप में पोर्न देखती है तो वह असहज हो जाती है। ऐसी है असहजता तब भी उसके चेहरे पर झलकती है जब लायला यह बताती है कि कॉलेज के एक लड़का उसे बहुत पसंद है। यह असहजता एक असुरक्षा और अज्ञानता के भाव से जन्मी है। वह समझती है कि लायला की विकलांगता के कारण ये सारी बातें व्यर्थ है और इसीलिए वह लायला की कामुकता को कभी समझने की कोशिश ही नहीं करती। समाज के अन्य लोगों की तरह वह भी यही सोचती है कि एक विकलांग स्त्री की कामेच्छायें नहीं होती।
लायला को न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल जाने के बाद बोस ने भारत और अमेरिका का एक तुलनात्मक सेटअप हमारे सामने रखा है। बोस ने ऐसा सोच समझ कर किया है ताकि वह भारत और पश्चिम के विकलांगता और कामुकता के साथ किये जाने वाले ट्रीटमेंट का तुलनात्मक नज़ारा दर्शकों के सामने रख पाए। बोस के द्वारा दिखाई गई घटनाओं का मकसद यह दिखाना लगता है कि पश्चिम में विकलांग लोगो की जिंदगी बहुत ही ज्यादा आसान और सुविधाजनक है। हाँ, इस बात को मानने से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भारत की अपेक्षा पश्चिम में विकलांग लोगों के लिए अधिक सुविधाएँ हैं। चाहे वह सडकों इमारतों और सार्वजनिक परिवहन में व्हील चेयर के लिए बने रैंप हो या फिर बस के संचालक से लेकर क्लास में अध्यापक का व्यवहार, वहीं इसके उलट भारत में विकलांग नागरिक बुनयादी सुविधाओं से भी वंचित है। हमारा इन्फ्रास्ट्रक्चर केवल सामान्य लोगों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है उसमे विकलांग लोगों के लिए कोई सुविधा मुहैया नहीं कराई जाती। इसीलिए लायला के लिए न्यूयॉर्क में सब कुछ भारत से अधिक सामान्य और सहज है। लेकिन क्या विकलांग व्यक्ति की कामुकता के प्रति भी पश्चिम इतना सामान्य है जितना बोस दिखाना चाहती हैं। अपने जीवन का अधिकतर समय पश्चिम के देशों में बिताने वाली सोनाली बोस की बहन मालिनी चिब के एक कथन से इस सवाल का उत्तर मिल जाता है जिसमे वह कहती है कि “I am 45 year old female। Above average (double MA) attractive, witty। Yet I have never had a romantic relationship। I want to be touched। I want to be loved romantically। I want to experience my sexuality। But I can’t। Because I am disabled।” वह आगे कहती है कि “Even in the West, which is far more advanced in terms of access and facilities — sexuality is still a taboo।”
मालिनी की शिकायत से यह स्पष्ट है कि एक विकलांग व्यक्ति के लिए अपनी कामेच्छाओं को संतुष्ट करना जितना मुश्किल भारत में है उतना ही मुश्किल पश्चिम में भी क्योकि वहाँ लोग आपकी कामेच्छाओं को लेकर सहज हो सकते हैं उस पर बात कर सकते हैं लेकिन वहां भी लोग एक विकलांग व्यक्ति को अपना  साथी बनाना पसंद नहीं करते। इसी सम्बन्ध में मालिनी आगे कहती हैं कि “I have had a few close relationships with men where we discussed everything from my body, to disabled people having sex। But when it came to having sex with me, they quickly changed the topic by declaring, “You are not my type”। Of course, deep down I feel rejected।”

लेकिन फिर भी न्यू यॉर्क जाने के बाद लायला के पास अपनी यौनेच्छा को शांत करने के अनेकों मौके आते हैं। चाहे वह अपने सहायक सहपाठी को किस करना हो उसके साथ सेक्स करना हो या फिर खानुम के आने से अपनी कामुकता के एक नए पहलू से परिचित होना। वहाँ जाकर लायला को अपनी अधूरी कामेच्छाओं को पूरा करने, अपने शरीर को महसूस करने और अपनी अव्यक्त कामुकता और अस्मिता के एक नए पहलू को जीने का भरपूर मौका मिलता है। मार्गरीटा  पीने के बाद जोकि लायला की कामुकता के लिए उत्प्रेरक का काम करती है, लायला खानुम के स्पर्श को महसूस करती है और खानुम के प्रति आकर्षित होती है। खानुम के साथ अन्तरंग पल बिताने के बाद लायला को अपने समलिंगी होने का अहसास होता। दोनों एक विश्वास के बंधन में बंध तो जाते है। लेकिन फिर भी विश्वास, सच्चे प्यार या फिर केवल फायदे के लिए बनाये गए सम्बन्ध की यह कशमकश जारी रहती है। शायद इसीलिए खानुम के साथ सम्बन्ध में रहते हुए भी  लायला मौका पाते ही अपने सहपाठी टाइपिस्ट जार्ड(विललियन मोसेले) के साथ हमबिस्तर हो जाती है। लायला को तभी यह भी पता चलता है कि वह केवल लेस्बियन नहीं है। लायला समाज में इतरलिंगी संबंधो की वैधता को अपनी कामुकता के एक नए आयाम के बूते पर चुनौती देती है। लायला अपनी कामुकता का भरपूर आनंद लेती है। खानुम से मिलने के बाद लायला को अहसास होता है की उसे न केवल अपनी शारीरिक अवस्था से संघर्ष करना है बल्कि अपनी सेक्सुअल आइडेंटिटी के लिए भी खुद से और समाज से संघर्ष करना है, जैसे खानुम कर रही है। खानुम पाकिस्तानी-बंगलादेशी मूल की लड़की है और भिन्न यौनिक उन्मुखीकरण यानि की लेस्बियन होने के कारण वह अपने परिवार और समाज से निरंतर लड़ाई लड़ रही है। अपने लेस्बियन होने की बात को अपने परिवार वालों पर जाहिर होने की घटना को याद करते हुए खानुम लायला को बताती है कि ‘अम्मी मुझे डॉक्टर के पास ले गई जैसे तो मुझे कोई मर्ज़ है जिसका इलाज हकीम करते हैं।’ इस पर लायला का यह कहना कि ‘मेरी आई को तो हार्ट अटैक आ जाएगा।’ विभिन्न देशों और समाजों की समलैंगिकता के प्रति सोच को बताते हैं। आज भी इतरलिंगी लोगों से भिन्न उन्मुखीकरण वाले लोगों को समाज मनोरोग से ग्रस्त मानता है। इस दृश्य के बाद के दृश्य में लायला लाइब्रेरी की सेल्फ से ‘अ वीमेन लाइक दैट’ किताब पढ़ने के लिए उठाती है। जिसका इस्तेमाल बोस ने लायला को अपनी कामुकता के नए आयाम को समझने के लिए किया है। इसके बाद की फिल्म में लायला पर इस किताब का प्रभाव साफ़ नज़र आता है। जॉन लारकिन द्वारा सम्पादित इस किताब में विभिन्न लेस्बियन और बाईसेक्सुअल लेखकों ने अपने जीवन के अनुभवों को साझा किया है। इसी कारण लायला के लिए खानुम के साथ रहते हुए भी जेफ्फेरी के साथ सम्बन्ध बनाना कामुक प्रयोगों की दृष्टि से स्वाभाविक होता है।

सोनाली बोस ने खानुम और लायला के समलैंगिक सम्बन्ध का ट्रीटमेंट किसी भी सामान्य इतरलैंगिक सम्बन्ध की तरह ही किया है। जिसमे प्रेम में उन्मत्त दो प्रेमिकाएं है, आरोप-प्रत्यारोप है, आँसू है। हालाँकि फिल्म में समलैंगिक सम्बन्ध में रह रही दोनों औरते विकलांग हैं लेकिन फिर भी फिल्म इनके सम्बन्ध को असामान्य की श्रेणी में नहीं रखती बल्कि अन्य फिल्मों द्वारा फिल्माए गए प्रेम संबंधों की तरह ही इसे फिल्माती हैं।
ऐसे तो बोस की यह फिल्म समलैंगिक संबंधों को दर्शाने वाली हिंदी सिनेमा की पहली फिल्म नहीं है लेकिन फिर भी समलैंगिकता के साथ अपने ट्रीटमेंट की वज़ह से यह फिल्म महत्वपूर्ण ज़रूर है। वैश्वीकरण के प्रभाव और लैंगिक अल्पसंख्यकों के द्वारा लगातार अपने अधिकारों के लिए किये जा रहे संघर्ष के फलस्वरूप हिंदी सिनेमा में नब्बे के दशक में प्रत्यक्ष नैरेटिव के रूप में समलैंगिकता का चित्रण होना आरम्भ हुआ। समलैंगिकता को अपना विषय बनाने वाली फिल्मों में दीपा मेहता की ‘फायर’(1998), करन राजदान की ‘गर्लफ्रेंड’(2004), मधुर भंडारकर की ‘पेज थ्री’(2005), मधुर भंडारकर की ‘फैशन’(2008), अनुराग बसु की ‘लाइफ इन अ मेट्रो’(2007), श्याम बेनेगल की ‘वेलकम टू सज्जनपुर’(2008), रीमा कागती की ‘हनीमून ट्रेवल्स प्रा।लि।’(2007), पार्वती बाल गोपालन की  ’प्यार का सुपरहिट फार्मूला’(2003), दीपा मेहता की ‘वाटर’(2005), संजय शर्मा की ‘न जाने क्यूँ’(2010), जोया अख्तर की ‘लक बाय चांस(2009)’, अपर्णा सान्याल और अरुणिमा शंकर की ‘टेढ़ी लकीर’(2004), नागेस कुकुनूर की ‘तीन दीवारें’(2003), तरुण मनसुखानी की ‘दोस्ताना’(2008), ओनिर की ‘माय ब्रदर निखिल’(2005) और ‘आइ ऍम’(2010) आदि प्रमुख हैं। लेकिन इनमे से कुछेक फिल्मों को छोड़कर सिनेमा में समलैंगिकता की एक स्टीरियोटाइप छवि को ही दर्शकों के सामने परोसा गया। ‘दोस्ताना’ और ‘कल हो न हो’ जैसी फिल्मों में जहाँ कहानी में हास्य पैदा करने के लिए ऐसे संबंधों का प्रयोग किया गया तो वहीं ‘गर्लफ्रेंड’ जैसी फिल्मों में समलैंगिकों को हिंसक और मनोरोगियों के रूप में दिखाया गया। जबकि बोस की फिल्म समलैंगिकता और द्विलैंगिकता को एक सामान्य व्यवहार के रूप में हमारे सामने रखने के कारण महत्वपूर्ण हो जाती है। वह अपने कलाकारों को हिंसक नहीं बनाती, उनका मखौल नहीं उड़ाती और न ही उनके प्रेम को इतरलिंगीयों के प्यार से हेय बनाकर प्रस्तुत करती हैं। दीपा मेहता की ‘फायर’ में दिखाई गयी समलैंगिकता भी परिस्थितिजन्य है जोकि पतियों के द्वारा उपेक्षा करने पर पनपती है लेकिन बोस के यहाँ ऐसा नहीं है। लायला का लेस्बियन होने का चुनाव किसी परिस्थिति के दबाव में लिया गया चुनाव न होकर एक स्वतंत्र और सोचा समझा चुनाव है तो वही खानुम का यौनिक उन्मुखीकरण भी स्वाभाविक है। अक्सर समलैंगिक संबंधों को केवल शरीर की आवश्यकता से जोड़कर दिखाया जाता है लेकिन लायला और खानुम का सम्बन्ध किसी भी इतरलिंगी सम्बन्ध की तरह ही सामान्य है।

जैसे-जैसे समाज में विभिन्न सेक्सुअल पहचानों ने अपने अधिकारों को लेकर आवाज़ उठानी शुरू की वैसे ही सिनेमा आदि माध्यमों ने भी उन पर बात करनी शुरू कर दी है। अब भी देश में समलैंगिकता को अवैध माना जाता है। हमारा दंड संहिता समलैंगिक संबंधों को अप्राकृतिक कहकर स्वीकार नहीं करता है। ऐसे में सिनेमा आदि माध्यमों पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि उनके द्वारा इन सेक्सुअल पहचानों के चित्रण में लापरवाही न बरती जाए। फिल्म के निर्माता निर्देशकों को ओनिर और सोनाली बोस जैसे निर्देशकों से प्रेरणा लेनी चाहिए और सीखना चाहिए कि समलैंगिकता जैसे नाज़ुक मुद्दों पर किस तरह से काम किया जाये। लेकिन बोस का मुख्य लक्ष्य कोई समलैंगिक फिल्म बनाना न होकर एक स्त्री की कामुकता के विविध आयामों को आकार देना है। फिल्म की बनावट पर बात की जाये तो फिल्म के अन्तराल के पहले हिस्से का प्रयोग बोस ने अपने किरदारों और वातावरण को स्थापित करने के लिए किया है जिसे वह अन्तराल के बाद भी थोडा सा खींचती है ताकि फिल्म में तारतम्यता बनी रहे। जोकि कुछ हद तक उचित भी लगत्ता है लेकिन लायला की जिंदगी में और नयी घटनाएँ घटित करने के चक्कर में बोस ने कथानक में ज़रूरत से ज्यादा संघर्षों और युक्तियों का प्रयोग कर दिया है जोकि फिल्म को त्रासद बना रहा है। शायद यही कारण रहा कि फिल्म का दूसरा हिस्सा घटनाओं की अधिकता और संवादों में एक तरह की एकरेखीयता के कारण प्रशंसा पाने में असफल रहा।  जैसे लायला की माँ रेवती को कैंसर होना, उस पर लायला की खुद की विकलांगता और सेक्सुअल आइडेंटिटी के लिए निरंतर संघर्ष और फिर लायला को उसकी कामुकता के एक और आयाम से परिचित करवाने वाली उसकी समलैंगिक साथी खानुम का पाकिस्तानी-बंगलादेशी मूल का होने के बाद अँधा भी होना। दरअसल फिल्म के दूसरे हिस्से में एक के बाद एक ऐसी घटनाओं की धका-पेल से फिल्म अपने मुद्दे से भटकती सी लगती है और जाहिर है इससे फिल्म का वज़न भी कुछ कम ही हुआ है।

फिल्म के दूसरे हिस्से में एक के बाद एक त्रासद घटनाओं का यह सारा ताना-बाना कई बार ऐसा संकेत करता है जैसे कि फिल्म बनाने वाले दर्शकों से अपने किरदारों के लिए सांत्वना जुटाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते जबकि फिल्म के आरम्भ में स्थिति इसके बिलकुल उलट थी। अच्छे से बोल और चल न सकने वाले मुख्य किरदार के बावजूद भी फिल्म में जीवन्तता थी जिसका फिल्म के आखिरी हिस्से में पूरा अभाव दीखता है। ऐसे में केवल कल्कि ने फिल्म को भटकने से बचाने की कोशिश की है जिसमे वह काफी हद तक सफल भी हुई है। इन त्रासद घटना चक्रों के बीच अपनी कामुकता के संबध में अडिग और निडरता के साथ विभिन्न आयामों को खोजने वाली लड़की के महत्वपूर्ण और संवेदनशील चित्रण के माध्यम से दर्शकों को फिल्म के साथ जोड़े रखा है। कल्कि ने लायला के किरदार को जिया है और यही कारण है कि दर्शक लायला की कहानी में यकीन कर पायें।

लायला को अपनी कामुकता को अभिव्यक्त करने पर अपनी माँ तक से नकार मिलती है। एक समेस्टर ख़त्म हो जाने के बाद जब लायला खानुम को लेकर अपने घर दिल्ली आती है जो वहां आकर परिवार का एक हिस्सा बन जाती है। लायला उसके हर फैसले में उसका साथ देने वाली माँ को अपने और खानुम के सम्बन्ध के बारे में बताने की कोशिश करती है जो लायला की बात को किसी और ही अर्थ में ले लेती हैं। वैसे फिल्म में लायला के साथ यह कई बार होता है क्योंकि लायला लोगों को उनकी कल्पना के परे की बातें कहकर अक्सर झटका देती रहती है। लायला माँ से हिंदी और अंग्रेजी के मिले-जुले लहज़े में कहती है कि ‘माँ आइ एम बाई’ तो माँ ‘बाई’ का अर्थ काम वाली बाई समझकर मध्यवर्गीय भारतीय परिवार में घरेलू कामों में फंसी स्त्री के शोषण के अर्थ में लेकर इसका जवाब देती है कि ‘मै क्या कम बाई हूँ।’ यद्यपि ऐसे अप्रत्याशित मौके पर ऐसा प्रतीकात्मक हास्य पैदा करने का बोस का अंदाज़ और कल्कि और रेवती की बेहतरीन अदाकारी वाकई काबिल-ए-तारीफ है।
लायला जब खानुम के समक्ष यह स्वीकारती है कि उसके साथ होते हुए भी उसने एक दूसरे लड़के के साथ सम्बन्ध बनाये और खानुम को धोखा दिया तो दोनों का सम्बन्ध हमेशा के लिए ख़त्म हो जाता है। लेकिन इस घटना से लायला को यह सीख मिलती है कि जीवन का सच्चा सार हमारे भीतर ज्ञान की रौशनी के होने में ही है। हमें ज़रूरत है तो बस इस रौशनी को अपने बाह्य जीवन और आसपास के लोगों में प्रसारित करने की। फिल्म लायला के कामुकता के विविध आयामों को खोजने के साथ-साथ आत्म अन्वेषण के बारे में भी है। फिल्म का आखिरी दृश्य इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब वह अपनी माँ के देहांत और खानुम के द्वारा छोड़े जाने पर अकेले बाहर निकल जाती है मार्गरीटा पीने क्योकि अब उसे खुद को सम्पूर्ण बनाने के लिए किसी सहारे की आवश्यकता नहीं रहती। लायला का सेल्फ उसके लिए सबसे ज़रूरी हो जाता है। यह फिल्म का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दृश्य है लायला के लिए भी और दर्शकों के लिए भी। इससे बेहतर प्रतीकात्मक अंत शायद ही कुछ और होता।

लायला के किरदार पर उसके यौन उत्सुक मन एवं अति सक्रिय ‘लिबिडो’ के कारण यह भी आरोप लगाये गए कि लायला अपनी यौनिकता से आगे कुछ और क्यों नहीं सोच पाती? ऐसे लोगों को यह समझता होगा कि कामुकता एक मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।  दरअसल कामुकता और कामुक प्रबोधन हमारी अस्मिता के अन्वेषण में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अपनी यौनिकता के विषय में जानने की उत्सुकता और शरीर से मिलने वाला कामुक आनंद हमारे विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू है। इसलिए यदि लायला अपनी कामुकता को लेकर नित नए प्रयोग करती है तो किसी भी अन्य मनुष्य की तरह ऐसा करना सामान्य ही है। इसमें कुछ भी अटपटा नहीं है क्योकि आप विकलांग है तो इसका यह अर्थ तो कतई नहीं लिया जा सकता कि आपकी कामुकता भी विकलांग स्थिति में ही होगी। कई बार विकलांग लोगों को अपनी कामुकता को जानने समझने का मौका ऐसे नहीं मिल पाता जैसे एक सामान्य मनुष्य को मिलता है। वे लोग कामुक आनंद से वंचित रहते है इस कारण भी अक्सर इन लोगों में सेक्स को लेकर हताशा आ जाती है। ऐसा सामान्य लोगों के साथ भी संभव है। एक कहावत है कि ‘कला सुखद स्थिति को व्यथित कर देती है और व्यथित को शांतिप्रदान करती है।’ बोस की फिल्म इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। फिल्म उन सभी व्यथित विकलांगों को हौसला और हिम्मत देती है जिनकी कामुकता को समाज टैबू मानता आया है और शांतिप्रद जीवन जी रहे समाज के उन सभी लोगों को बैचैन करती है जिनके लिए स्त्री और विकलांगों के द्वारा अपनी कामुकता की अभिव्यक्त करना और उससे आनंद प्राप्त करना एक असामान्य घटना हैं। भारत में कामुकता के इर्द गिर्द बनी फ़िज़ूल की मर्यादाओं के कारण स्त्रियाँ अपनी कामुकता को नकारती रहती हैं। इस नकार का सीधा सा अर्थ है कि यदि कोई स्त्री अपनी यौन संतुष्टि को पूरा करने के लिए साथी की तलाश करती है तो हमारे समाज में उसे चरित्रहीन और भौंडा समझा जाता है।

एक मनुष्य होने के कारण हमारी कामुकता बहुत ही जटिल रूप में हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व, स्वास्थ्य और ख़ुशी से जुड़ी है। यदि व्यक्ति के जीवन में यौन संतुष्टि है तो इस बात से काफी हद तक उस व्यक्ति के जीवन से संतुष्ट होने का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इसी कारण मानव जीवन के इस पहलू को पूरी तरह नकारा जाना व्यक्ति के भीतर एक कभी न भरे जाने वाला खालीपन पैदा कर देता है।

सिनेमा में अन्य सभी ललित कलाओं से अधिक जन के साथ संवाद स्थापित करने की क्षमता है। यह विचारधाराओं को जन मस्तिष्क में गढ़ने का काम भी करता है, सामाजिक बदलाव की मुहिम में सक्रिय भागीदार भी होता है। इसका स्पष्ट कारण है कि प्राय: लोग फ़िल्मी सितारों की हर बात का अनुकरण करते हैं। कई बार जहाँ कंपनियाँ अपने उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए फ़िल्मी सितारों से अपना विज्ञापन करवाकर लाभ कमाती हैं तो वही सरकार जनहित में जारी विज्ञापनों से भी इन फ़िल्मी हस्तियों को जोड़ती है ताकि लोग दिखाई जा रही बात पर अतिररिक्त ध्यान दे। कुछ अभिनेता जैसे आमिर खान स्वयं भी सामाजिक बदलाव के लिए आगे आ रहे हैं। स्टार प्लस पर दिखाया जाने वाला ‘सत्यमेव जयते’ आमिर का एक ऐसा ही सराहनीय प्रयास है। ऐसे में स्पष्ट है कि फिल्मों के माध्यम से स्त्री कामुकता का जैसा चित्रण किया जायेगा समाज में इनकी स्थिति में उसी के अनुरूप परिवर्तन आयेंगे।

‘मार्गरीटा विथ अ स्ट्रॉ’ की लायला हिंदी सिनेमा के लिए एक उदहारण है जो हमारे सिनेमा को  यह सीखता है कि स्त्री की कामुकता को परदे पर कैसे फिल्माया जाए। साथ ही स्त्रियों को भी यह समझना होगा कि कहीं देह की स्वतंत्रता के नाम पर वह पुरुषवादी मानसिकता का शिकार तो नहीं हो रहीं हैं। मार्गरीता की तीनों मुख्य स्त्री पात्र लायला, लायला की माँ और खानुम, अपने व्यक्तित्व और कामुकता की खुद मालकिन हैं। यह फिल्म हमें एक स्त्री की कामुकता के हर संभव आयाम से परिचित करवाती है। स्त्री की कामुकता को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक कारक प्रभावित करते है। सत्ता के केंद्र में बैठा पुरुष स्त्री की कामुकता को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है ताकि वह सत्ता पर अपना अधिकार बनाये रख सके। फिल्म में लायला की कामुक अभिव्यक्ति और उसकी कामुक इच्छाओं के आड़े यह सारे तंत्र और ताकतें आती तो है लेकिन वह इन सबकों रौंदती हुई अपनी धुन में आगे बढ़ती चली जाती है। वह विभिन्न देशकालों में अपनी कामुकता के साथ बेख़ौफ़ होकर नए-नए प्रयोग करने से घबराती नहीं।

प्राय: ऐसी फ़िल्में व्यवसाय करने में उतनी सफल नहीं होती और उनकों बाकि मसाला फिल्मों जैसे दर्शक नहीं मिलते इसीलिए ऐसी फिल्मों पर बात करना और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इस प्रकार के सकारात्मक सिनेमा को पहुँचाया जा सके और स्त्री देह को वस्तु मानकर व्यवसायीकरण के लिए इस्तेमाल करने वाले निर्माता निर्देशकों को स्त्री कामुकता को सही मायनों में परदे पर दर्शाए जाने की प्रेरणा मिले। एक विकलांग स्त्री की कामुकता को भी कैसे इतने जीवंत तरीके से फिल्माया जा सकता है यह हमारी फिल्मों को ‘मार्गरीटा विथ अ स्ट्रॉ’ से सीखना चाहिए।

केवल भारतीय समाज ही नहीं बल्कि सदियों से दुनिया के हर समाज में स्त्रियाँ अपनी देह पर अपना अधिकार पाने के लिए संघर्षरत है। इसीलिए ‘मार्गरीटा विथ अ स्ट्रॉ’ जैसे फिल्मों के माध्यम से सिनेमा को इस संघर्ष में स्त्रियों का साथ देना चाहिए। साथ ही हिंदी सिनेमा की ऐसी पहलों का विरोध करने वाले पितृसत्तात्मक समाज के ठेकेदारों एवं स्वयं को भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृति का संरक्षक कहने वाले समूह और लोगों को यह समझना होगा कि इसी भारतीय हिन्दू धर्म की प्राचीन संस्कृति ने हमें हमारी कामना का उत्सव मानना सिखाया है। ऐसे में स्त्री की कामना को कैद कर अपने हितों के लिए प्रयोग करना सरासर गलत है।

1. Hysteria was the first mental disorder attributed to women (and only women) — a catch-all for symptoms including, but by no means limited to: nervousness, hallucinations, emotional outbursts and various urges of the sexual variety

2. http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3093545/

3. http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3093545/
4. http://femina.in/editors-blog/intimacy-for-the-differently-abled-2677.html
5. I’m single because of my body by Malini Chib
Mumbai Mirror | Nov 3, 2011
6.  एक प्रकार का पेय पदार्थ ( लायला की पसंदीदा कॉकटेल ड्रिंक)

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

स्त्रीवाद और महादेवी की ‘श्रृंखला’ की कड़ियाँ’

साक्षी यादव   

 शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय. तदर्थ प्राध्यापिका, लक्ष्मीबाई कॉलेज. संपर्क : sakshi060188@gmail.com

वर्तमान स्त्री विमर्श में कई आयाम  जुड़ चुके हैं  यथा उदारवादी ,मार्क्सवादी ,मनोविश्लेषणवादी ,उग्र नारीवादी. जब किसी भी विमर्श में और अधिक पड़ाव जुड़ते हैं तो वह उसकी प्रगति का निशान होता है .परन्तु कई बार यही स्थिति आपसी असहमति की द्योतक भी बन जाती है .स्त्री विमर्श में ये दोनों ही स्थितियां विद्यमान है .स्त्री विमर्श को इसके समग्र रूप में व्याख्यायित करने की आवश्यकता है न कि  खंडित करके .आज हम स्त्री की मूलभूत समस्याओं के लिए भी लड़ रहे है और कामकाजी आधुनिक स्त्री की समस्याओं के लिए भी.आवश्यकता है तो इनके आपसी समन्वय की .इनकी लड़ाई दो भिन्न छोरों पर होने के स्थान पर एक छोर हो जानी चाहिए . शहरी स्त्री जो साधन संपन्न  (अर्थ ,निर्णय ,समाज )है , उनका दायित्व है कि वो पिछड़ी स्त्रियों के लिए भी अपनी आवाज़ उठायें.   चूँकि हमारे समाज में स्त्री से सम्बंधित अनेक विकृत स्थितियां विद्यमान है ऐसे में सभी स्तरों पर कार्य की आवश्यकता दुरूह होने पर भी आवश्यक है .इनमे भी जातिगत जटिलतायें इस समस्या को बाधा देती है .इसके अलावा आदिवासी स्त्रियाँ, जिन तक विकास की लहर सही रूप में पहुँच नहीं पाती ,और अधिक विकट स्थिति उत्पन्न करते हैं .इस तरह से स्त्रीवादी विमर्श अपने ही अंदर दलित और हशिया के विमर्श के बीज समेटे हुए है .यह स्त्री के अर्थ तंत्र और समाजतंत्र में व्याप्त विकृतियों का आइना हैं .

स्त्री के सरोकारों की शुरुआत हमें नवजागरण काल में विशेष सुनने को मिली .यह वो समय था जब सभी समाज सुधारको ने करबद्ध होकर स्त्री की सामाजिक स्थिति में बदलाव के प्रयास किए .इसी समय परोक्ष  रूप से  की चाहनाओं को स्वर मिला .वो भी समाज का एक अभिन्न अंग है और वह भी समाज की कुरूप मुखौटे को उदघाटित कर सकती है , यह रूप भी हमें इसी दौर में दिखा .ताराबाई शिंदे ,पंडिता रमाबाई ,व अज्ञात हिन्दू औरत के रूप में हमे यह विद्रोह का स्वर दिखा .इससे पूर्व भी सत्यशोधक आंदोलन, ब्रहम समाज (राजा राममोहन राय , (प्रार्थना समाज (केशवचंद्र के प्रयासों ने इसकी पृष्ठभूमि निर्मित की .इसके बाद आर्य समाज (दयानंद सरस्वती ),थियोसोफिकल सोसाइटी(एनी बेसेंट )ने मूलभूत बदलाव के लिए सामाजिक कार्य किए .इनके कार्यों में पर्दा प्रथा निषेध ,सती प्रथा निषेध ,स्त्री शिक्षा जैसे कार्य शामिल थे .नवजागरण कालीन इन प्रयासों ने बदलाव की एक नींव तैयार कर दी थी .असल बदलाव तो स्त्री के राजनीति में जुड़ने से हुआ .उसकी लगातार बढती राजनितिक सक्रियता ,राजनितिक सहभागिता व विरोध के स्वर ने राजनीति में एक महत्वपूर्ण जगह बनाई.वह धीरे-धीरे समझ गयी कि बिना राजनितिक सहयोग के उसका आगे बढ़ पाना असंभव है .अतः स्वतंत्रता से पूर्व भी हमें अनेक स्त्रियाँ राजनितिक गतिविधियों में  सक्रिय दिखी .यथा –भगिनी निवेदिता ,सरोजनी नायडू ,कमला देवी चट्टोपाध्याय ,दुर्गाबाई देशमुख ,अरुणा आसफअली आदि .इसी दौरान हमें महादेवी वर्मा की ‘श्रंखला की कड़ियाँ ‘ भी मिलती है .

‘श्रंखला की कड़ियाँ’  1942 में प्रकाशित  महादेवी वर्मा की अलग -अलग निबंधों का संकलन है .महादेवी ने स्त्री की सामाजिक से लेकर आर्थिक परतंत्रता का विश्लेषण इसमें किया  है .महादेवी वर्मा के समय में स्त्री विमर्श जैसी कोई धारा न  थी .परन्तु यह महादेवी की दूरदृष्टि ही थी जो वर्तमान समय में भी हमें उनकी इस रचना से स्त्री विमर्श की अनुगूंज देखने को मिलती है.  वास्तव में महादेवी जिस परिवार में पली बढ़ी वह उन्ही नवजागरण कालीन स्थितियों को, समाज सुधार व स्त्री के स्तर में सुधार  पर विश्वास करने वाला था. महादेवी के पिता आर्यसमाजी थे, जिन्होंने महादेवी की शिक्षा और उनके हर निर्णय में उनका साथ दिया .महादेवी का तत्कालीन विपरीत स्थितियों में भी आत्मबल का कारण हम उनकी इस परवरिश में ढूंढ सकते हैं. यद्यपि उनका विवाह बचपन में ही हो गया था,  परन्तु उनको यह बंधन स्वीकार्य नहीं था .ऐसी ही परिस्थितियों ने उनके स्त्री लेखन को भी प्रभावित किया होगा .महादेवी ने 1935  में ‘चाँद’पत्रिका में सम्पादन का कार्यभार संभाला .जिसमे वे समय समय पर स्त्री केन्द्रित मुद्दे उठाती रहती थी  .’श्रंखला की कड़ियाँ’उनके इन्ही लेखों का संकलन है .

 महादेवी का विश्लेषण या आलोचना जब हुई भी तो एक भारतीय संस्कृति की प्रवक्ता के रूप में .उनको ‘आधुनिक कालीन मीरा’ कहा गया.  भारतीय संस्कृति व हिंदुत्व को लेकर लगाव दिखता तो है पर केवल  इन्हीं  सन्दर्भों के इर्द- गिर्द उनको समझना उनके साथ अन्याय होगा .महादेवी अपने विवेक के अनुसार परम्परा को तोडती भी हैं और अपनी मानवतावादी और स्त्री दृष्टि के कारण भविष्य उपयोगी भी हैं .

महादेवी वर्मा मानती थीं  कि स्त्रियों का कोई भी इतिहास नही मिलता .सत्य ही है क्योंकि  इतिहास तो शक्ति संपन्न सत्ता पक्ष का होता है, जिसके पास सारे संसाधन हैं- अर्थात पुरुष सत्ता, इसने ही समाज ,धर्म, संस्कृति ,अर्थ तंत्र को संचालित किया .अतः उसी का इतिहास भी लिखा गया . “समाज की दो आधार शिलाएं हैं ,अर्थ तंत्र का विभाजन और स्त्री पुरुष-सम्बन्ध .इनमे से यदि किसी एक की नभी स्थिति में विषमता उत्पन्न  होने लगती है ,तो समाज का सम्पूर्ण प्रासाद हिले बिना नही रह सकता”.1  यहाँ तो दोनों ही स्थितियों में असमानता देखने को मिलती है .यह सामाजिक असमानता स्त्री की आर्थिक आश्रयता के कारण है .इसी कारण उसके सभी निर्णय किसी और के होते हैं  और वह कठपुतली की तरह उनका अनुपालन करती है . “औरत का अपना कुछ भी नही होता .अपनी जो जिंदगी है ,वह भी औरत की नहीं .औरत पुरुष की संपत्ति होती  है.सिर्फ पुरुष नहीं, पुरुष शासित इस समाज की संपत्ति होती है .”2

महादेवी वर्मा का दृष्टिकोण उदारवादी नारीवाद से अधिक मेल खाता है .वे स्त्री की शिक्षा, स्वावलंबन के अतिरिक्त उन स्त्रीत्व  के गुणों को भी श्रेयस्कर समझती हैं, जिनसे दुनियावी कुरूपता को ढका जा सकता है. .वस्तुतः उनका दृष्टिकोण आशावादी ही अधिक था .इसीलिए वे  को उसके शोषण और परतंत्रता के बावजूद अक्षय वात्सल्यमयी पुकारती हैं .जो स्त्रीत्व का गुण है उसे छोड़ना नही चाहती . “जन्म से संतप्त और जीवन से अभिशप्त अक्षय वात्सल्यमयी  नारी” पुकारती है .स्त्री का यह गुण मानवता के विकास और उसको जीवित  रखने के लिए बेहद ज़रूरी है .यद्यपि  स्त्रीवाद इस वत्सल्यामयता को भी एक सीमा पर सामाजिक बंधन और शोषण का कारण समझता है और उसकी लिए विविध प्रकार के तर्क भी प्रस्तुत करता है .

महादेवी वर्मा समाज और धर्म में स्त्रियों की दोयम स्थिति पर भी सवाल खड़े करती हैं .महादेवी व्यंग्य करती हैं –“हमारी पूजा अर्चना की सफलता के लिए यह परम आवश्यक है कि हमारा देवता हमारी वस्तुओ पर हमारा अधिकार रहने दे और केवल वही स्वीकार करे जो हम देना चाहते हैं .”3 इसके अतिरिक्त पतित वेश्याओं पर भी महादेवी का ध्यान गया ,वे लिखती हैं –“जैसे दास प्रथा के युग में स्वामियों के निकट दास  व्यक्ति न होकर यन्त्र था ,वैसे ही समाज सदा से पतित स्त्रियों को भी समझता है .”4 वेश्यावृति इसी पुरुष सत्ता का परिणाम है,  जिसमें  परुष के भोग विलास की माध्यम बनती स्त्री को पुरुष की इच्छा का ग्रास बनना पड़ता है .आज इचित रूप से वेश्यावृति स्वीकारती स्त्रियों में भी कहीं न कहीं इसी विकृत सत्ता का हाथ है, जिसमें  अर्थ की आवश्यकता का और भोग विलास का एकात्म स्थापित हो गया है .

पुरुषसत्ता के एकाधिपत्य के साथ ही पुरुष ने जिस समाज ,धर्म ,शास्त्र ,नैतिकताओ का निर्माण किया उनमें स्वयं को श्रेष्ठ स्थान पर रख स्त्री को अपने अधीनस्थ बना लिया .इस अधीनस्थता के कारण में स्त्री की जैविक स्थिति व उससे उपजे अर्थ पारतंत्र्य को सामने रखा .समाज व्यवस्था की निर्मिति  इसी को ध्यान में रखकर की गयी .इस प्रकार यह पुरुष सत्तात्मक समाज स्त्री के शोषण का सर्वप्रमुख कारक बना .इसके साथ स्त्रियाँ पालतू जंतुओं के सामान पुरुष की संपत्ति मात्र बनकर रह गयीं .

महादेवी वर्मा ने श्रंखला की कड़ियाँ में स्त्री शिक्षा , स्वातंत्र्य ,स्वावलंबन ,वेश्यावृति ,ऐतिहासिक न्यूनता ,असमान सामाजिक स्थिति व साथ ही स्त्री की राजनितिक सहभागिता के प्रशन को भी अपने विश्लेषित मुद्दे के रूप में अपनी इस पुस्तक में  उठाया है .यद्यपि इसमें अधिक तर्कपूर्ण और गहन विवेचन नही मिलता है ,जो आज के स्त्री विमर्श के लिए अपेक्षित है .परन्तु महादेवी का इन विषयों पर चर्चा भी एक नई उपलब्धि थी.उनका यही प्रयास अग्रिम स्त्री विमर्श की वैचारिकी का अधार माना जा सकता  है .नही तो इसको एक शुरुआत के रूप में अवश्य देखा जा सकता है .इसका सम्बन्ध नवजागरण कालीन समाज सुधार की  प्रवृति से भी है .महादेवी वर्मा के पिता गोविंदप्रसाद आर्य समाजी थे .उन्होंने ही अपनी बेटी को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया .उनके पिता ने सामाजिक अवहेलना की चिंता किए बगैर उनकी ज़िदगी के लगभग सभी निर्णयों में उनका साथ दिया.निसंदेह महादेवी पर भी इस आचरण का बहुत प्रभाव पड़ा होगा .उनकी विचार दृष्टि भी आर्यसमाजी सुधर की पक्षधर थी बल्कि वे इससे भी आगे की सोच रखती थीं .महादेवी से पूर्व भी स्त्री क राजनितिक और कानूनी सुधार की एक धारा विद्यमान मिलती हैं –

1 – सती प्रथा निषेध अधिनयम (१८२९)

२- बाल विवाह निरोधक अधिनियम (१९२९)

3 – हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (१८५६)

4 –हिन्दू स्त्रियों का संपत्ति का अधिकार अधिनियम (१९३७)

5 – विशेष विवाह अधिनियम (१८७२ ,१९२९ ,१९५४ )

महादेवी और निराला

इन कानूनी प्रावधानों का भी प्रभाव महादेवी वर्मा के दृष्टिकोण पर अवश्य ही पड़ा होगा . स्त्री जागरण के लिए स्त्री का तर्कपूर्ण लेखन व भावात्मक – यथार्थवादी लेखन स्त्री सरोकारों को अभिव्यक्त करने के लिए अत्यंत अवश्यक है .नवजागरण कालीन स्थितियों ने स्त्रियों को प्रेरित कर अपनी स्थिति पर सोचने की जगह बनाई. मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं – “ श्रृंखला की कड़ियाँ’के माध्यम से महादेवी वर्मा एक स्त्रीवादी दार्शनिक के रूप में हमारे सामने आती हैं .हिंदी में स्त्री जीवन की वास्तिविकताओं और कामनाओ का कलात्मक चित्रण करने वाली लेखिकाएं और भी हैं तथा स्त्री स्वाधीनता का आन्दोलन चलने वाली कार्यकर्ताओं की भी कोई कमी नहीं है ,लेकिन भारतीय स्त्री की जटिल समस्याओं और उसकी दासता की दारुण स्थितियों और उनकी मुक्ति की दिशाओं का मूलगामी दृष्टि से जैसा विश्लेषण महादेवी वर्मा की पुस्तक ‘श्रंखला की कड़ियाँ”में है वैसा हिंदी में अन्यत्र कहीं नही है”.5

1 – ‘श्रंखला की कड़ियाँ’महादेवी वर्मा ,पृष्ठ 115

2 – औरत का कोई देश नहीं , तसलीमा नसरीन , पृष्ट 155

3 – श्रंखला की कड़ियाँ ,महादेवी वर्मा ,पृष्ट 91

4 – वही, पृष्ठ 81

5 –नवजागरण और महादेवी वर्मा का रचना कर्म :स्त्री विमर्श के स्वर , कृष्णदत्त पालीवाल ,पृष्ठ 281

6 –स्त्री संघर्ष का इतिहास ,राधा कुमार

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com