राजेंद्र यादव से मन्नू का प्रेम ठोस था: वे पत्नी और प्रेमिका दोनो रहीं

वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा से पाखी के राजेंद्र यादव विशेषांक  के लिए प्रेम भारद्वाज ने 2011 में बातचीत की थी. तब राजेंद्र जी जीवित थे. एक लम्बी बातचीत का यह हिस्सा राजेंद्र जी से मन्नू भंडारी के रिश्ते के संश्लिष्ट स्तरों को  सपष्ट करता है. मन्नू, मीता और मैत्रेयी- तीन एम के साथ उनके रिश्ते को केंद्र में रखकर की गई बातचीत आज फिर प्रासंगिक है. 

राजेंद्र यादव के साथ तीन ‘‘एम’’ जुड़े हुए हैं - मन्नू , मीता और मैत्रेयी ! मुझे लगता है , आप तीनों को ही बेहद करीब से जानती हैं। इन तीनों के बारे में कुछ बताएं ?
‘‘ डायल ‘एम’ फॉर  मर्डर ’’ की तर्ज का प्रश्न  है यह । मैं इन तीनों में से सिर्फ मन्नू जी के निकट हूं । मैत्रेयी से मित्रता औपचारिक है । मीता से मेरा कोई परिचय नहीं । मन्नू जी और मैत्रेयी की तरह मीता किसी एक का नाम नहीं है । मीता एक कल्ट है , एक प्रवृत्ति  है - मटुकनाथ (लीजिए , यहां भी एम) की तरह । हिन्दी साहित्य में राजेंद्र जी की मीता की तर्ज पर मीताओं की भरमार हैं । यह ज़रूर है कि एक मीता को तो स्वीकार कर के ही चलीं मन्नू जी - अपने जीवन के लंबे पैंतीस साल ।                            
राजेंद्र जी की ही डायरी के पन्ने का अंश देखें -
‘‘शायद मेरी इस मानसिक छटपटाहट को मन्नू समझ रही है । वह बैठ कर बातें करना चाहती है, और मैं टाल देता हूं । एक बार तो उसने कहा था कि अगर आपको लगता है कि इस जड़ता और अवरोध से आप यहां से बाहर जाकर निकल सकते हैं तो नगीना के साथ कुछ दिन रह लीजिए ... दया और करुणा ही हुई सुन कर ... यह बात उसने किस यातना बिन्दु पर पहुँचकर कही होगी ... । लगता मुझे भी है कि शायद इस अंधे कुंए से वही साथ निकाल सकता है मगर हिम्मत नहीं पड़ी । मैं नगीना के साथ रहने दस दिनों को जाऊंगा यह कह कर मैं निकल सकता हूं ? चुपचाप चोरी छिपे जाऊं और भला मानुस बन कर लौट आऊं , यह तो हो सकता है । यही शायद होता भी रहा है । मगर कह कर खुलेआम जाना कैसा लगता है जाने ... चला भी गया तो शायद लौटने का मुंह नहीं रहेगा । यहां भी सब चीजें , रहना - व्यवहार नार्मल नहीं रह पायेंगे ... । ’’                                                   - तद्भव: 11 , पृष्ठ - 181

दुर्लभ रागात्मकता: राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी 

मैत्रेयी ने अब कहा है कि राजेंद्र जी ने हमारे भरोसे को तोड़ा है ! छिनाल प्रकरण पर राजेंद्र जी का स्टैंड क्या सही था जिसके कारण मैत्रेयी ने उनसे नाता तोड़ लिया ?
मैत्रेयी के इस वक्तव्य से उनकी बिलख सामने आ रही है । कैसा भरोसा तोड़ा है ? पारिभाषित  किस्म का नाता टूटने का मसला है यह ! राजेंद्र जी तो रिश्तों -नातों की पारिभाषाओं से बाहर ही खड़े होते रहे हैं । मैत्रेयी की समझ का द्वैध है कि वे राजेंद्र यादव के बौद्धिक पुंसत्व को समझ ही नहीं पाईं । अब वे आरोप लगा रही हैं क्योंकि उनकी कच्ची कसौटियां दरक गईं । लंबा अरसा लगा उसे समझने में कि स्त्रियों के मुद्दों पर राजेंद्र जी भरोसे के लायक नहीं हैं । स्त्री विमर्श  की जो स्यूडो परिभाषायें वे रचते रहे हैं , उस पर भरोसा किया तो ग़लती मैत्रेयी की थी । सबसे बड़ी बात तो यह कि मैत्रेयी को न उनके स्त्री विमर्श  का हिमायती बनना चाहिये था और न उनसे कोई अपेक्षा  पालनी चाहिये थी , पर उसका तो तब राजेंद्र जी के संरक्षण में ट्रेनिंग पीरियड चल रहा था । जो व्यक्ति लगातार इस तरह की बातें लिखता रहा है ‘‘ न जाने कितनी लड़कियाँ, अभिनेत्रियाँ और सामाजिक कार्यकर्ता अपने को गुंडी, लफंगी, रंडी और फाहिशा कहकर या सुनकर इस कान से उस कान निकाल देती हैं या उसका मजा लेती हैं। ’’ (हंस, अक्टूबर 2010) पहले कभी यह भी लिखा था कि वे बलात्कार का भी मज़ा लेती हैं । ऐसे विचारों पर भरोसा ? जो दाम्पत्य की गहरी निष्ठाओं को ठुकरा सकता है , उससे कैसी अपेक्षाएं पाल रखी थीं मैत्रेयी ने ? सच पूछें तो राजेन्द्रजी हर रिश्ते  में खोटे साबित हुए हैं । वे मन्नूजी के लिए ग़ैर ज़िम्मेदार और अराजक पति , मीता के लिए अवसरवादी प्रेमी और मैत्रेयी के लिए झूठे मित्र हैं। हर स्तर पर उन्होने रिश्तों  की मर्यादा भंग की है और अपने संबधों को चौराहे की चीज़ बनाकर रख दिया है । सारी दुनिया को सीख देनेवाला इतना बड़ा साहित्यकार इस उम्र तक मर्यादा में रहना सीख ही नहीं पाया। मैत्रेयी मित्र न भी होतीं तो भी एक वरिष्ठ साहित्यकार होने के नाते राजेंद्र जी से उम्मीद की जा सकती थी कि वे साहित्य में अभद्र भाषा का खुलकर विरोध करेंगे । गली मोहल्लों के चालू अखाड़ों जैसा घटिया माहौल साहित्य में बन गया है , जहां भाषा की कोई मर्यादा नहीं । कोई भी किसी के लिए कुछ भी लिख कर ऐंठ दिखा कर निकल जाए - यह पढ़े लिखों की दुनिया है ?

यह ठीक है कि हर व्यक्ति को वैचारिक स्वतंत्रता दी जानी चाहिये । ज़रूरी नहीं कि हमख़याल मित्रों में भी सबकी प्रतिक्रिया किसी मुद्दे पर एक सी हो ! पर राजेंद्र जी का स्टैंड बिल्कुल सही नहीं था । स्त्री विमर्श  के पैरोकार ने पहले लेखिकाओं को खूब हुड़काया - खुलकर लिखो - यह भी (ही) तो जिन्दगी का हिस्सा है । जब लेखिकाएं खुलकर लिखने लगीं और छिनाल प्रकरण की विभूतियों को नौकरी से बर्खास्त करने की मांग आई तो राजेंद्र जी ने कहा - यह तो महिलाओं का तालिबानी रवैया है । यानी खुलकर लिखो , छिनाल कहलाओ और छिनाल कहलाये जाने का भी उत्सव मनाओ । तालिबानी रवैया मत अपनाओ । राजेंद्र जी की यह प्रतिक्रिया अप्रत्याशित तो नहीं थी । दूसरे सच की गुहार लगाएं तो तालिबान और अपने सौ गुनाह माफ । पर असहमति के कारण नाता तोड़ लेने की बात मेरी समझ से बाहर है ।

राजेंद्र जी अक्सर कहा करते हैं कि मैंने तीन औरतों के साथ न्याय नहीं किया ! दो तो मन्नू और मीता हैं , तीसरी मैत्रेयी नहीं तो फिर कौन हैं ?
यह सवाल निजी है। जहां तक मेरी जानकारी है , राजेंद्र जी ने यह कभी नहीं कहा ! सिर्फ दो के प्रति न्याय न करने की बात कही है।  मुजरिम करार देने के लिये तो इतना ही काफी है कि अपनी समर्पिता और एकनिष्ठ पत्नी के साथ आपने न्याय नहीं किया । ‘‘ 23 लेखिकाएं .....’’ वाली पुस्तक में जयंती रंगनाथन के सेक्स संबंधी लंबे साक्षा त्कार में उन्होंने अपना सेक्स के स्तर पर तीन के साथ रिश्ता  स्वीकार किया है । तीसरी , चौथी  , पांचवीं - कई हो सकती हैं ,उसके बारे में सिर क्यों खपाया जाये । हां , यह एक बहुत बड़ा भ्रम रहा हिन्दी जगत में कि मैत्रेयी के कारण मन्नू जी से राजेंद्र जी को अलग होना पड़ा । दोनों के बीच अलगाव का कारण मैत्रेयी बिल्कुल नहीं रही । अलग होने के बाद भावात्मक संबल और व्यावहारिक सुख सुविधाओं के लिये उन्होंने मैत्रेयी को थाम लिया हो , वह बात दीगर है । आखिर भावात्मक संबल और घर की सुरक्षा  की दरकार एक व्यक्ति को होती ही है। जो अपने घर को सिर्फ शरणस्थली , सुख सुविधाओं का ठिया समझे , घर के ठौर को ठोकर मारे , उसकी कद्र न करे , आखिर देर सबेर समय उसे समझा ही देता है कि उसने क्या खोया और बदले में उसे कहां ठौर तलाशना पड़ रहा है ।

राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी और नन्ही रचना यादव 
मन्नू जी राजेंद्र जी से अक्सर कहा करती हैं कि ‘‘ जब करने का साहस रखते हैं , तो बताने का क्यों नहीं ’’ वो कौन सी बात बताने के लिये कहती हैं जिसका साहस राजेंद्र जी नहीं कर पा रहे हैं !
राजेंद्र जी और मन्नू जी के नज़दीक रह चुके कई मित्रों की सबसे ज्यादा और सबसे बड़ी शिकायत यही है कि राजेंद्र जी की कथनी और करनी में बहुत बड़ी फांक हैं । अपने पचासों साक्षात्कारों , प्रवचनों में जिस सैद्धांतिकी   का वे किसी मसीहा के अंदाज़ में प्रतिपादन करते हैं , अपने निजी संबंधों में ही नहीं , संपादन और लेखन में भी - वे सतह पर ईमानदार दिखाई देते अपने ही वक्तव्य को निभा नहीं पाते । उदाहरण पचासों हैं पर यहां एक वाकया बताना चाहती हूं । अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा -‘‘ जिस तरह साहित्य में एक तरह की हिप्पोक्रेसी थी , कुछ चीज़ों को सामने आने नहीं दिया जाता था , उसी तरह व्यक्तिगत जीवन में भी कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें दबा ढंका कर रखा जाता था कि भई ये साहित्य की चीजें नहीं हैं । लोगों की ज़िंदगी का जो महत्वपूर्ण भाग है ( यानी सेक्स ), जो समाज का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा (!) है , उसको लोग बोल नहीं रहे हैं । मैंने बोलना शुरु किया । प्रेम प्रसंग किसकी ज़िंदगी में नहीं होते । कौन सा लेखक ऐसा है जो यह कह सके कि मेरे साथ कोई अफेयर नहीं हुआ , मैंने किसी लड़की की तरफ झांका नहीं । हरेक के साथ प्रेम प्रसंग हैं , उनमें से कोई लिखने की हिम्मत नहीं करता । नैतिकता के प्रश्न  हों या व्यक्तिगत प्रश्न  , मैंने उनको खुलकर कहा है ( ‘‘मुड़ मुड़ के देखता हूं ’’ में )। उन पर बात की है और मैं समझता हूं कि इससे ही लोगों की हिप्पोक्रेसी टूटे क्योंकि आपको दूसरों को नंगा करने के बजाय पहले खुद नंगा होना होगा तभी आपको हक है कि आप दूसरों के बारे में कुछ कह सकें । हमारे यहां पता नहीं कितने लोग हैं जो क्लेम करते हैं कि मुझसे ज्यादा सच्चा कोई नहीं है । उन बेवकूफों और दंभियों से यह कहा जाए कि कुछ सच अपने बारे में भी बोलो ! ’’( 23 लेखिकाएं और राजेंद्र यादव - साधना अग्रवाल द्वारा साक्षा त्कार में )
इतना बड़ा प्रवचन सुनने के बाद कोई भी मुस्कुराकर यही पूछेगा - ‘‘ राजेंद्र जी , आपका अपने बारे में क्या ख्याल है ?’’ यह सैद्धांतिकी पहले अपने पर लागू करते ! अपने बारे में कितना सच बोला है उन्होंने । मन्नू जी से अलग होने के ‘‘कारण’’ के बारे में उनके प्रचारित झूठों का तो अंबार लगा है । 1995 में मन्नू जी से अलग होने के बाद     ‘‘ एशियन एज ’’ को एक साक्षात्कार दिया तो कारण यह बताया कि मैं तो बहुत सोशल हूँ  और मुझसे मिलने वालों का आना जाना , उन्हें खिलाना पिलाना मन्नू को पसंद नहीं था तो हमने सोचा चलो , अलग रहने का प्रयोग कर देखा जाए । जाहिर है , मन्नू जी इस बयान से बहुत आहत हुईं क्योंकि उनके यहां हमेशा  ही साहित्यिक मित्रों की बैठकें जमती रही हैं। कथादेश  के लिये जब मैंने मन्नू जी के बारे में नामवर जी का साक्षात्कार लिया था तो उन्होंने मेरे सामने कहा था - ‘‘ दिल्ली में मैं जितने साल रहा हूं । पचास प्रतिशत खाना तो मैंने इस हौज खास वाले घर में खाया है । ’’ मन्नू जी के सिर पर सारी जिम्मेदारियां । कॉलेज में पढ़ाना । ट्यूशन करना । घर आकर मित्र मंडली की बखुशी  आवभगत करना । राजेंद्र जी पर न कोई जिम्मेदारी , न उसका अहसास । न आर्थिक सहयोग , न काम काज में कोई सहयोग । फिर भी हर बार जहां दांव लगा , वहां मन्नू जी को कठघरे में खड़ा करने में कोई कोताही नहीं बरती उन्होंने । यह सिलसिला अब तक चलता ही जा रहा है । 2008 में जब कथादेष के लिये मन्नू जी वाले अंक की योजना आकार ले रही थी , मैंने राजेंद्र जी से कहा - अच्छा लगता है यह देखकर कि आप दोनों का आपस में एक स्वस्थ संवाद भी है , मन्नू जी पर सिर्फ दो पेज लिखकर दें , मुझे इस अंक में कोई विवाद खड़ा नहीं करना ! पर नहीं , अपनी फितरत से कहां बाज आने वाले थे वह ! दो पन्नों की जगह छह पन्नों का साक्षा त्कार दिया उन्होंने अर्चना वर्मा को और उसमें फिर बेसिर पैर की बातें -‘‘ ठाकुर साहब ने घेर -घार हमारी शादी करवा दी !’’ मन्नू जी ने पढ़ा तो फिर आहत हुईं -‘‘ शादी के समय तीस साल की उम्र थी राजेंद्र की ! बाल विवाह हो रहा था हमारा कि कोई घेर घार कर शादी करवा दे ?’’ और शारीरिक विकलांगता और भावात्मक आघात को एक ही तराजू पर तोलना और सबसे बढ़कर अपनी आज़ादी के राग अलापना -  ‘‘ परिवार तो ऐसी चीज़ है जो कल्पना के पंखों को क्लिप करती है ! वैयक्तिकता समाज के दबावों को , परिवार को नकार कर पाई जाती है । परिवार में रहते हुए कोई क्रांतिकारी काम नहीं कर पाता !’’ एक बार मन्नू जी पर बनी साहित्य अकादमी की फिल्म में उनके मुंह से एक बुदबुदाहट -‘‘ आय हैव नॉट  बीन फेअर टू हर ! ’’ सुनकर बहुत अच्छा लगा था पर अपने साक्षात्कारों में हमेशा  उस कन्फेशन पर घड़ों पानी उड़ेलते रहे और अब तक अनफेअर ही बने चल रहे हैं।
राजेंद्र जी को साक्षात्कार देने का आब्सेशन है । एक ही बात को घुमाफिराकर अपनी लच्छेदार भाषा में कहते चले जाते हैं । अगर कोई उनके साक्षात्कारों और जीवन को लेकर तौले तो विरोधाभाषों  का एक पोथा तैयार हो जाएगा । वे कहते हैं - ‘ शादी  एक पिंजरा है , उसमें आपको मूवमेंट की उतनी ही सुविधा है जितनी पिंजरा देता है ! ’’ पर इस पिंजरे में वे बने रहना चाहते थे । मन्नू जी पिंजरे का दरवाज़ा खोल कर बाहर का रास्ता न दिखा देतीं तो वे आज भी इसी पिंजरे में बने रहते । दरवाज़ा खोल दिया गया तो ‘‘पिंजरे का पंछी’’ अराजक होकर अपनी आज़ादी का परचम फहराकर, आज़ादी के गीत गाने लगा ।
  इसी साल 2011 में एक रेडियो चैनल से आई एक लड़की ने अलगाव का कारण पूछ लिया तो यहां एक अलग उत्तर  हाजिर था -‘‘ मैं पढ़ने लिखने वाला आदमी हूं , मन्नू को हमेशा  यही लगता था कि मैं उसे समय ही नहीं देता। उसकी यह शिकायत हमेशा  रही । उसके परिवार में बड़े आदर्श  पति रहे हैं । तो एक आदर्श  पति का रोल तो मैं निभा नहीं सकता था । ’’ संयोग कि लड़की वहां से साक्षात्कार लेकर सीधे मन्नू जी के यहां चली आई । मन्नू जी ने कहा - ‘‘ मैं समय मांगती थी , इस लिये वे अलग हुए ? समय तो खुद मेरे पास नहीं था । कॉलेज की नौकरी , घर का खर्च किसी तरह चला पाने के लिये कॉलेज  के बाद ट्यूशन , साल के 361 दिन काम । फिर अपना लिखना । हमारे कॉमन  मित्र । उनका आना । हमारा उनके यहां जाना । मेरे पास ही समय कहां था जो मैं इनसे समय की मांग करती ? उनके जाने के बाद मन्नू जी ने राजेंद्र जी से पूछा - ‘‘ अलग होने का सही कारण क्यों नहीं बताते । आपमें अगर करने की हिम्मत है तो कहने की हिम्मत क्यों नहीं है । हर साक्षात्कार में एक अलग कारण गढ़ लेते हो और उसका ठीकरा मेरे सिर पर फोड़ते हो ! ’’ अगला जवाब हाजिर था - ‘‘ अरे , तो मैं क्या माथे पर चिपका कर घूमूं कि मैंने यह यह किया । अब यह सब हर किसी को बताने की बातें थोड़े ही हैं । ’’ ......अब आप उनके सच बोलने और दूसरों को नंगा करने के बजाय खुद नंगे होने के गर्वीले वक्तव्य पर सिर टकराते रहें कि वह सीख आखिर किनके लिये दी गई है ? किन्हें बेवकूफ और दंभी कहा गया था ?
राजेन्द्र यादव को बहुतों से जवाबदेह होना है - अपनी पत्नी , प्रेमिका और मित्रों से , साथी लेखकों और पाठको से । अपने भीतर झांक कर देखें तो शायद अपने आप से भी ।

पर वह बात कौन सी थी ? क्या आप राजेंद्र - मन्नू जी के अलगाव की मूल वजह के बारे में कुछ बता सकती हैं क्योंकि मन्नू जी के अलावा जिन तीन चार लोगों को उसके बारे में पता है , उनमें से एक आप भी हैं जो मन्नू जी के बेहद करीब हैं ?
सच तो यह है कि अलग रहना दोनों का आपसी सहमति से लिया हुआ निर्णय नहीं था जैसा कि राजेंद्र जी कहते रहे हैं - ‘‘ मैं कई बार छह महीने बाहर रहा ताकि रोज रोज का क्लेश मिटे , मुझे विवाह और आजादी में से एक को चुनना था , विवाह के आचरण की आचार संहिता में मेरा दम घुटता था । हमने अलग रहने के प्रयोग किए । ’’ जैसे राजेंद्र जी अपनी आजादी के लिए खुद अलग हुए हों । दरअसल यह मन्नू जी का एकल निर्णय था जिसे राजेंद्र जी को स्वीकृति देने पर मजबूर होना पड़ा ।
 एक औरत की ज़िन्दगी में - चाहे वह कितनी भी पढ़ी लिखी , आत्मनिर्भर और नामचीन क्यों न हो - हादसों और आघातों को पीछे ठेलकर जब तक वह अपने वैवाहिक संबंध को चला सकती है , चलाती है । 1994 में उज्जैन से जब मन्नू जी दिल्ली लौटीं तो स्टेशन पर चहकते हुए राजेंद्र जी और आत्मीयता और अपनत्व से भरा घर । मन्नू जी को लगा कि अब उम्र का भी तकाज़ा है और आखिर घर से जुड़ाव भी होता ही है । उन्हें भीतर एक आशा  बंध रही थी कि अब सब ठीक हो जाएगा , हंस की आर्थिक स्थिरता के कारण भी राजेंद्र जी में बदलाव आएगा । लेकिन कुछ ही दिनों में राजेंद्र जी के छलात्कार का शिकार बनी एक और ‘‘मीता’’ मन्नू जी की ही गोद में सिर रखकर अपना दुखड़ा रो रही थी । उनसे तीस साल छोटी वह मीता अपने परिवार और दोनों बच्चों को छोड़कर राजेंद्र जी के साथ आने का निर्णय ले चुकी थी और उनके ढुलमुल रवैये को देखकर परेशान थी । मन्नू जी बुरी तरह टूटीं और निर्णय लिया  -‘‘ बस , बहुत हुआ , सो फार एंड नो फर्दर !’’ ये उन्हीं के शब्द हैं ।  यह कांड न हुआ होता तो मन्नू जी तो सबकुछ भूल कर नये सिरे से ज़िंदगी शुरु करने के लिये साथ रहने को तैयार थीं ही । कोई भी औरत अपना घर-परिवार तोड़ना नहीं चाहती जब तक सिर के ऊपर से पानी न गुज़र जाये । अब चूंकि हंस की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो चुकी थी । मन्नू जी ने अपना फैसला सुना दिया और उस पर डटी रहीं । वे यह जानती हैं कि आज वे अगर ज़िन्दा हैं तो अपने इस निर्णय पर टिके रहने की वजह से ही , वर्ना रोज़ रोज़ का यह तनाव और राजेंद्र जी के बेरोकटोक कारनामे , उनके लिये अंततः जानलेवा और घातक ही साबित होते ।

मन्नू जी के लिये कुछ लोग कहते हैं कि मन्नू जी को राजेंद्र जी से जो फायदा उठाना था , उठा लिया और बाद में उन्हें घर से बेदखल कर दिया ?
पति पत्नी के रिश्तों  में भी जोड़-घटाव , फायदा-नुकसान , हानि-लाभ  --  पुरुषवादी सोच इससे आगे जा ही नहीं सकती । भावनात्मक तकलीफ को समझ पाना उनके बूते का है ही नहीं । जो ऐसा कहते हैं , उन्होंने मन्नू जी की किताब ‘‘ एक कहानी यह भी ’’ में बिट्वीन द लाइंस पढ़ने-समझने की कोशिश ही नहीं की । समावर्तन के अक्टूबर 2008 के अंक में मैंने मन्नू जी पर नौ पन्नों का संस्मरण लिखा है , उसमें विस्तार से इस पर चर्चा की है ।
मन्नू जी अपनी शादी से पहले ही एक प्रतिष्ठित लेखिका थीं । अपने लेखन के लिये राजेंद्र जी के नाम का सहारा नहीं लिया उन्होंने । हां , राजेंद्र जी से प्रोत्साहन ज़रूर मिलता रहा, जिसके कारण ज़िंदगी के तनावों को अनदेखा करती रहीं और ज़िंदगी चलती रही । प्रेम विवाह था , घर से विद्रोह किया था इसलिये विवाह को निभाना एक बड़ी जिम्मेदारी भी थी । विवाह को न चला पाना एक बहुत बड़ी हार होती । अपनी तथाकथित आत्मकथा में न चाहते हुए भी वे काफी कुछ संकेतों में कह ही गई हैं । जब उनकी इस किताब का फाइनल प्रूफ आया था , मैंने उनसे बहुत बार कहा कि आप अलग होने की इस वजह को थोड़ा सा खोलकर लिखिये । उनको तरह तरह से समझाया । मिन्नते कीं । पर वे भी कम ज़िद्दी नहीं । कहने लगीं - चौदह  साल से इस किताब को मर-मर कर तो लिखा है , अब मैं एक शब्द नहीं जोड़ूंगी । दरअसल वे इसे निजी त्रासदी ही समझती रहीं , इसका एक बड़ा समाजशास्त्रीय कोण समझ ही नहीं पाईं कि यह सिर्फ उनकी  निजी समस्या नहीं हैं । हजारों महिलायें ऐसे अनुभवों से गुज़रती हैं और इसे खोलकर लिखना , उसका एक तार्किक विश्लेषण  करना , पाठिकाओं को एक सकारात्मक सीख देगा । अब वे कहती हैं कि मैंने लिख दिया होता तो इस तरह हर रोज़ राजेंद्र एक नया ठीकरा मेरे सिर पर न फोड़ते ।
जब साथ थे , तब भी हमेशा  यह आरोप लगाते थे कि लेखिका होकर भी तुम लेखक की जरूरत नहीं समझती । तुम घरेलू औरतों की तरह बिहेव करती हो । मन्नू जी कहती हैं -‘‘ पिता से झगड़ कर , घर से विद्रोह कर मैंने शा दी की । बिछिए पहनना , मांग भरना , करवाचैथ का व्रत करना - किसी तरह का घरेलू औरत का स्वांग नहीं किया , सिर्फ एकनिष्ठता की मांग की और वह भी एक ‘मीता’ को स्वीकार करते हुए। ’’ पर मीताओं का बहुवचन कोई पत्नी स्वीकार नहीं कर पाती ।
उनके भीतर के लेखक ने हमेशा  उनके भीतर की स्त्री को ढांपे रखा , सिर उठाने नहीं  दिया वर्ना इतनी छूट कहां कोई स्त्री दे पाती । कोई आधुनिक , स्वतंत्रचेता , देह मुक्त स्त्री ( जैसी स्त्री गढ़ना राजेंद्र जी के स्त्री विमर्श  का स्वप्न है ) इतनी ‘स्पेस’ अपने साथी पुरुष को दे पाती ? उसकी रासलीलाएं , उसके झूठ , उसकी संवादहीनता , उसकी असंवेदनशीलता - पैंतीस साल के लंबे अरसे तक बर्दाश्त कर पाती ? यह उस परंपरावादी खांटी घरेलू लेखिका के ही बूते का था कि अपने पति के लेखन को सबसे ऊंचा  दर्जा देती रही और सारी छूट भी लेखिका ने ही दी - यह मानते और स्वीकार करते हुए कि लेखिका को लिखने के लिए चाहे पहाड़ों के रिसार्टों पर जाने और प्रेमी पुरुष की जरूरत महसूस न हो पर उंगलियों में अदा से सिगार पकड़ने वाले लेखक की दैहिक और भावनात्मक जरूरतें एक आम सामान्य पुरुष  से अलग और ज्यादा है और विशिष्ट  पुरुष  को जीवनसाथी बनाने का चुनाव भी तो उनका अपना ही था , फिर शिकायत कैसी और किससे ? फिर तो यह चुनौती सी जान पड़ी कि इस विशिष्ट  प्राणी को सहेज कर , संभालकर रखना है । जैसा भी है , जितना भी अपने हिस्से यह विशिष्ट  पुरुष आ पड़ा है , उसे पोशक खूराक हर तरह से उपलब्ध करवाकर खुश  रखना है । पर उनकी सारी मजदूरी , मशक्कत बेकार गई । जिनके लिये घर परिवार प्राथमिकता में नहीं आता , उन्हें ताउम्र इसकी अहमियत समझ नहीं आ सकती ।


अलगाव के बाद भी राजेंद्र जी और मन्नू जी कई जगह एक साथ दिखते हैं ! दोनों में अब कैसी केमिस्ट्री है ?

जब जब किसी साक्षात्कार में राजेंद्र जी कुछ आपत्ति जनक बोल जाते हैं , मन्नू जी चुप हो जाती हैं , उनसे बात करना बंद कर देती हैं। एक सप्ताह से ज़्यादा यह अबोला चल नहीं पाता । आखिर राजेंद्र जी फोन करेंगे -‘‘ क्या अभी तक मुंह फुलाकर नाराज़ बैठी हो ! ’’ और संवाद का सिलसिला फिर शुरु हो जाता है। लंबे समय तक साथ रहते हुए मन्नू जी ने संवादहीनता का इतना लंबा दौर झेला है कि उन्हें फोन पर इतना भी बात कर लेना सुकून देता है । और माफ कर देना तो मन्नू जी के जैनी संस्कारों में है । नहीं जानती , लेकिन राजेंद्र जी के भीतर मन्नू जी को लेकर कहीं एक गहरा अपराधबोध तो है ( होना भी चाहिये ) जिसकी वजह से साक्षा त्कारों में तमाम उल्टे सीधे बयान देने के बाद भी राजेंद्र जी रिश्ता  टूटने नहीं देते क्योंकि अपनी फितरत से वे भी वाकिफ हैं। उनका अपना सामंती रवैया चाहते हुए भी छूटे नहीं छूटता । राजेंद्र जी का आगे बढ़कर मन्नू जी से संपर्क बनाये रखना , फोन करना मुझे अच्छा लगता है क्योंकि मन्नू जी जिस तरह बिना भूले उसका ज़िक्र करती हैं , उन्हें भी अच्छा लगता होगा ।
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