Home Blog Page 89

ममता कालिया की कहानियों में दाम्पत्य- संबंधों में द्वन्द्व

डॉ. चरणजीत सिंह सचदेव

एसोसिएट प्रोपफेसर, हिंदी विभाग श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय. संपर्क :मोबाईल 9811735605

संबंधों का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है. संबंध दो प्रकार के होते हैं- एक तो खून के जैसे- माता, पिता, पुत्र, बहन, भाई आदि. दूसरा कुछ संबंध समाज में बनते हैं जैसे- मित्र के साथ, पत्नी के साथ आदि. दाम्पत्य संबंध व्यक्ति के द्वारा जोड़े जाते हैं. जिन्हें समाज की स्वीकृति प्राप्त होती है. भारतीय समाज में गृहस्थ आश्रम का आधार दाम्पत्य संबंध ही होते थे. प्राचीन काल में दाम्पत्य संबंधों में रिक्तता होने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता है क्योंकि इन्हें एक नहीं कई जन्मों का संबंध माना जाता है.

आधुनिक काल में अनेक परिवर्तनों के कारण सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन हुए. इसी के अंतर्गत विवाह का स्वरूप भी बदलता चला गया. संबंधों में सबसे अधिक समस्या दाम्पत्य संबंधों की देखने को मिल रही है. स्त्री-पुरुष दोनों ही कार्य कर रहे हैं. घर पर अधिक समय एक-दूसरे को नहीं दे पाते. जिससे अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं. संयुक्त परिवार में संबंधों में आए बिखराव के कारण दाम्पत्य संबंधों में भी बिखराव एवं कड़वाहट की स्थिति आ गई है. आज पति-पत्नी का आदर्शवादी संबंध लुप्त होता जा रहा है. शिक्षा प्राप्त कर स्त्री की आधुनिक सोच महत्वाकांक्षी हो गई है. वह अपने अधिकारों, कर्तव्य, भावना को तर्क की कसौटी पर परखना चाहती है. वह पति की आज्ञा को आँख मूँद के नहीं विश्वास करती बल्कि तर्क-वितर्क कर वाद-विवाद करती है. स्त्री अब भावना के स्तर पर न सोचकर बौद्धिकता के स्तर पर सोचती है. कहा जाता है कि आज के युग में विवाह आध्यात्मिक लाभ, समाज-कल्याण और लोकोपकार की भावना से नहीं किया जाता, बल्कि भौतिक समृद्धि, भावात्मक तथा एन्द्रिक संतुष्टि के लिए किया जाता है. वैयक्तिक हितों व लाभों की ओर आधुनिक मनुष्य का आग्रह बलवान है तथा विवाह-बंधन को ‘स्व’ का होम करके निभाने का आग्रह क्षीण है. पति-पत्नी दो विभिन्न इकाइयां बनकर, अपने अपने स्वार्थ में खोकर, अपनी व्यक्तिगत खुशियों को पूरा करने की कोशिश में एक दूसरे को कुंठित करते हैं और परिणामतः संबंधों में तनाव पनपता है.1 कहानी ‘उनका जाना’ में ममता कालिया ने दाम्पत्य संबंधों में रिक्तता के कारण आयी कड़वाहट, निराशा, अकेलेपन की टीस की समस्या को दिखाया गया है. समाज एवं परिवार के सामने तो पति-पत्नी सभ्य परिवार का उदाहरण देते हुए नजर आते हैं. अकेले में वही पति-पत्नी एक दूसरे की शक्ल भी नहीं देखना चाहते हैं. लेखिका मालती जोशी ने अपनी कहानी ‘उसका जाना’ में यही कड़वाहट को दिखाने का भरसक प्रयास किया है. कहानी मध्यवर्गीय परिवार की है. पति-पत्नी के अलावा एक बेटी और एक बेटा है. बेटी मुन्नी और बेटा मुन्ना दोनों विवाहित है. परिवार में पिता का हुक्म चलता है. पिता जैसा कहते हैं परिवार के सभी सदस्य बिना किसी रोक-टोक के उनके अनुसार उनके कहे पर चल पड़ते हैं. आस-पड़ोस के सभी लोग उन्हें आदर्शवादी परिवार के रूप में देखते एवं जानते हैं. परिवार में बेटी मुन्नी और बेटा मुन्ना को भी अपने माता-पिता को देख ऐसे ही प्रतीत होता है. वह दुनिया के सबसे सुलझे हुए आदर्श माता-पिता हैं. मुन्नी अपने बड़े भाई से कहती है कि मुन्नी माँ पापा की किसी भी बात को नहीं टालती. जैसा वे कहते हैं वैसा ही वे मानती है.

एक दिन मुन्नी अपने पति एवं बच्चों के साथ घुमने के लिए किसी हील-स्टेशन पर जाती है. हील-स्टेशन के खुशनुमा वातावरण का लुत्फ उठा रही होती है अचानक पापा का फोन आता है कि ‘‘मुन्नी तू कहाँ है, जल्दी आ. तेरी माँ मर रही है.’’2 यह खबर सुनते ही मुन्नी के पैरों तले जमीन ही खिसक जाती है. एकाएक ऐसा क्या हुआ, अनेक विचार मन में आते थे. माँ की ऐसी खबर सुनते ही वह अपने घर की ओर रवाना हो जाती है. मुन्नी घर आते ही पिताजी से अनगिनत सवाल पूछती है. पिताजी मुन्नी को कहते हैं ‘‘पहले पागलों जैसी बातें कर रही थी. अचानक चुप हो गयी पाषाण-प्रतिमा की तरह. फिर तो बस बेहोशी में चली गयी. डॉक्टर कहता है रक्तचाप बढ़ने से ब्रेन हेमरेज हुआ है. अब कितने दिन कोमा में रहेगी, कुछ नहीं पता.’’3 मुन्नी पिताजी की बात सुन सदमें में आ जाती है. पिताजी की हालात भी मुन्नी से देखी नहीं जा रही थी. मुन्नी सोचती है पिताजी माँ को कितना प्यार करते हैं. पिताजी चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं. मुन्नी पिताजी से पूछती है कि पिताजी माँ की एकदम हालत ऐसे कैसी हो गई. पिताजी ने मुन्नी की बात को अनसुना कर दिया. मुन्नी ने फिर से वही बात दोहराई पिताजी जोर से बोले ‘‘तू थाना है या कचहरी. मैं स्पष्टीकरण दूँ, यह चाहती है तू? तेरा स्टाफ नहीं हूँ मैं, समझी.’’4 मुन्नी पिता को देख अचंभित हो गई. मन ही मन सोचने लगी मैंने ऐसा क्या प्रश्न किया, जिससे पिता जी आग-बबूला हो गए मैंने अपने मुँह पर चुप्पी का ताला लगा लिया. मुन्नी को माँ की चिंता हो रही थी. ऐसा क्या हुआ होगा जिसने माँ को कोमा तक पहुँचा दिया. पिताजी भी कुछ ढंग से नहीं बता रहे हैं. मुन्नी ने पिताजी को दिलासा देते हुए समझाया. सब ठीक हो जाएगा. पिताजी को कुछ देर आराम करने के लिए कहा. एकाएक वॉर्डबाय भागता हुआ आया और मुन्नी से बोला- ‘‘आपके मरीज को होश आ गया.’’5 मुन्नी बेहताशा दौड़ती हुई माँ के कमरे में पहुँची. माँ को देख मुन्नी की आँखे नम हो आयी. माँ ने मुन्नी की तरफ देखा और बोली- ‘‘बहुत भूख लग रही है.’’6 मुन्नी घर से माँ के लिए जूस और खीर बनाकर लाई थी. उसने माँ को जल्द से उसे खिला एवं पिला दिया. माँ मुन्नी को एक टक देखती रही. मुन्नी ने माँ से कहा, माँ पिताजी को बुला लाती हँू. माँ ने तुंरत उत्तर देते हुए कहा- ‘‘खबरदार जो उन्हें बुलाया. मैं इनकी चिक-चिक से तंग आ गई हूँ. इतनी उम्र मेरी हो गई, अपनी मन-मर्जी का कुछ नहीं किया. तू और तेरा भाई भी उन्हीं का राग अलापते रहे. अपनी मनमर्जी से मर तो लेने दे मुझे.’’7 मुन्नी माँ की बातों को सुन सकते में आ गई. माँ क्या बोले जा रही है. मुन्नी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. माँ को ऐसे बर्ताव करते पहले कभी नहीं देखा था. माँ के चेहरे पर इतनी बैचेनी, बौखलाहट आज से पहले कभी भी नहीं देखी थी. माँ फिर से बोली ‘‘चुप बैठूँ तो चैन नहीं, बोलूँ तो ये बरसे. एक ही घर में मैं कहाँ चली जाऊँ. तेरे पापा तो झक्की हो गये हैं. सारा दिन सैर करें. कभी कहें मथुरा चलो वही रहेंगे, कभी कहे मुन्ना के यहाँ रहेंगे.’8 तेरे पापा ने कभी भी मेरी नहीं सुनी. हमेशा जो उनके मन को अच्छा लगा वे वही सब करते आए हैं. मुझसे भी जबरदस्ती वही करवाते आए हैं. मेरी इच्छाओं को कभी भी मान-सम्मान नहीं दिया है. शुरू से अब तक कठपुतली सा जीवन मैंने जिया है. आखिर कब तक ऐसा करती या सुनती. सब्र का बाँध टूट गया मुन्नी. मुन्नी हैरानी से माँ को देखती रही और बोली, माँ ‘‘उनकी बातों को थोड़ा अनसुना किया करो मम्मी. तुम्हीं ने उन्हें सिर चढ़ाया है.’’9 मुन्नी माँ से कहती है माँ आपने पहले कभी भी इस बात को कभी भी, जिक्र नहीं किया. आपके संबंधों में इतनी खालीपन एवं कड़वाहट आ गई है. माँ मैं क्या कहती बेटा, मुझे लगा कभी तो मेरी भावनाओं को समझेंगे. हमेशा अपनी ही डपली, अपना ही राग अलापते रहे. मैं बहुत दुखी हूँ. शायद यह दुःख मेरे अन्तर्मन में समा गया है. इसी के कारण मुझे दिल का दौरा पड़ा है. मेरा मन ऐसा जीवन जीने से भर गया है. मैं जीना नहीं चाहती. बस अब मुझे मौत अपनी आगोश में ले. मुन्नी, माँ ऐसा मत कहिये. नहीं मुन्नी अब जीवन जीने की इच्छा ही समाप्त हो गई है. कहानी ‘उसका जाना’ में लेखिका ममता कालिया ने दाम्पत्य संबंधों में आयी कड़वाहट, मजबूरी एवं रिश्तों में अकेलेपन की टीस को लेखिका ने दिखाया गया है. लेखिका ने संबंधों में मान-सम्मान की भावना का होना अत्यंत आवश्यक रूप से बताया है. एक साइड तवे पर पड़ी रोटी भी जल जाती है. कहने का तात्पर्य यह है कि संबंधों में (स्त्री-पुरुष) दोनो तरफ इच्छाओं को ध्यान में रखकर ही संबंधों को आगे बढ़ाया जा सकता है, अन्यथा संबंधों में प्यार की जगह झल्लाहट उत्पन्न हो जाती है.



लेखिका ने कहानी ‘दाम्पत्य’ में पति-पत्नी के बीच मन-मुटाव की स्थिति-परिस्थिति की समस्या को चित्रित किया है. पति आलोक और पत्नी सुनीता की शादी को विगत 20 वर्ष हो गए हैं. एक पुत्र भी है जो लगभग 15 वर्ष का है. पति-पत्नी के रिश्ते में रोमांस बिल्कुल खत्म हो गया है. पत्नी सुनीता घर के कामों से इतनी थक जाती है. पति आलोक चाहकर भी उन परेशानियों से सुनीता को बाहर नहीं निकाल पाता. पति-पत्नी के जीवन में प्यार की जगह पीड़ा, कुंठा एवं कड़वाहट ने ले ली है. आलोक बहुत बार प्रयास भी किया. सुनीता पर इसका कोई असर नहीं होता. आलोक का कई बार मन होता. वह अपनी जिंदगी पहले की तरह जिए. आलोक ने कई बार कोशिश भी की. सुनीता के साथ घुमे-फिरे. सुनीता अपने में ही रमी रहती. आलोक की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता. आलोक भी यह कहते-कहते थक गया. अब मन नहीं होता था कि वह सुनीता को कुछ भी बोले. आलोक कहता है कि- ‘‘बीस साल के संग साथ की यह इंतिहा थी कि उसकी पत्नी मुहब्बत को मशक्कत कहने लगी थी. उसने कई बार चाहा, सुनीता को इस बात के भौंडेपन से सचेत करे, लेकिन हर बार उसके चेहरे की चिड़चिड़ाहट, थकान और झाइयाँ देख चुप रह गया.’’10 सुनीता दिन-भर मर खपने के बाद मन प्यार, के नाम से चिढ़ होने लगी. सुनीता और आलोक के विचार एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे. आलोक हर बात को मजाक में ले जाता था. सुनीता को आलोक की इन हरकतों से वह अक्सर परेशान रहती थी. पति-पत्नी में दिन-रात कलेश होने लगा. आलोक भी पत्नी सुनीता के रवैय से खुश नहीं था. आलोक को इस बार महसूस हुआ कि उसका दाम्पत्य जीवन ठीक नहीं चल रहा. लेखिका ममता कालिया ने ‘दाम्पत्य’ कहानी में संबंधों में आई बैचेनी को दिखाया है. शादी के कुछ सालों में ही पति-पत्नी के संबंधों में उदासी आ गई है. संबंध केवल सहयोग, सहानुभूति एवं सहनशक्ति के रूप में दिखाई देते हैं. प्यार प्रायः समाप्त ही हो जाता है.

कहानी ‘वर्दी’ में लेखिका ममता कालिया ने पति की क्रुरता को दिखाया है. जिससे संबंधों में खटास आ जाती है. नायक रमाशंकर पुलिस में सिपाही के पद पर आसीन था. रमाशंकर अपनी पत्नी आशा और बेटे राजू के साथ रहता था. रमाशंकर की ड्यूटी त्यौहारों में अक्सर लम्बी एवं सख्त हो जाती है. आशा अपने पति रमाशंकर से बहुत डरती एवं घबराती रहती थी. रमाशंकर के सामने कुछ भी कहने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी. रमाशंकर और आशा पति-पत्नी की तरह नहीं बल्कि चोर-सिपाही की तरह अपनी जिंदगी बिताते हुए नजर आते थे. रिश्ते में प्यार की जगह डर, कड़वाहट एवं द्वेष ने ले ली थी. आशा का मन स्थिर नहीं रहता था. रमाशंकर की बेरूखी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी. आशा कहती है ‘‘उसका पति अन्य आदमियों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही डपटता था. छोटी-छोटी बात पर वह थाली उठा कर फेंक देता, हाथ में जूता उठा लेता या गालियों की बौछार करने लगता.’’11 आशा को अपने पति का व्यवहार एक आँख नहीं भाता था. पति की तानाशाही से वह ऊब गई थी. अपने रिश्ते को बचाने के लिए वह चुपचाप हर बात सहती. आशा को अपने रिश्ते में कोई सुधार की संभावनाएँ नजर नहीं आती थी. एक बेटा था जिसके लिए वह जीती थी. आशा के जीवन में अगर उसका बेटा राजू नहीं होता तो उसका संबंध रमाशंकर से कब का टूट जाता. लेखिका ममता कालिया ने कहानी ‘वर्दी’ में पुरुष की अहम भावना को दिखाया. पुरुष अपने अहम के आगे किसी की इच्छा को महत्त्व नहीं देता. जिसके कारण संबंधों में तनाव आ गया है.



कहानी ‘इरादा’ में ममता कालिया ने पत्नी की व्यथा को चित्रित किया है. नायिका शांति अपने पति शंकर के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही थी. शांति के घर में उसकी एक बूढ़ी माँ रहती थी. शांति की शादी हो जाने के बाद माँ अकेली और अस्वस्थ रहने लगी. शांति 15 दिन या 1 महीने में माँ से मिलने चली जाती थी. पति शंकर भी उसे बिना रोक-टोक के माँ के पास जाने देता था. शांति के चले जाने से शंकर की माँ को बहुत कष्ट होता. माँ को सारा दिन रसोई घर से जुझना पड़ता. माँ शंकर से शांति को अपने पीहर भेजने के लिए मना करवाती. शंकर माँ के कहे में आकर शांति को पीहर जाने नहीं देता तो शांति गुस्से में आकर कहती है ‘‘मैं क्या इस घर की बंधुआ मजदूर हूँ जो मुझे सुस्ताने का भी हक नहीं, बीमार पड़ने की भी आजादी नहीं.’’12 शांति को अपनी सासू और अपने पति पर बेहद क्रोध आता. शांति ने सोच लिया कि वह अब किसी के दबाब में अपना जीवन नहीं बितायेगी. पति-पत्नी के रिश्ते में अनबन एवं दूरियाँ आने लगी. पति अपनी पत्नी पर माँ के कहने पर हमेशा दबाब बनाने लगा. माँ जैसा कहती शंकर बिना कुछ जाँच-पड़ताल किये बिना शांति को उल्टा-सीधा कह देता. शांति का मन अस्थिर रहने लगा. शांति ने मन अपने को स्थिर करते हुए अपने आपको संभाला. पति शंकर ने शांति से दूरी बनाने का फैसला कर लिया था. शांति ने भी पति की सहमति का साथ देते हुए कहा ‘‘रात मैंने सोचा था, मैं नहीं जाऊँगी, पर अब मेरा इरादा बदल गया है. मैं अगली गाड़ी से जा रही हूँ. अब जब तुम्हारा दिमाग एकदम ठीक हो जाएगा, तभी वापस आऊँगी.’’13 शांति ने मन में ठान लिया. वह घर तभी लौटेगी जब पति शंकर उसे वही मान-सम्मान देगा. शंकर ने भी शांति को कुछ नहीं कहा, जाते समय. लेखिका ममता कालिया ने मध्यवर्गीय परिवार की समस्याओं को उठाया है.

कहानी ‘बोलने वाली औरत’ में नायिका दीपशिखा की हाजि़र जवाबी के कारण परिवार से हमेशा लड़ाई झगड़े द्वंद्व एवं रिश्तों में कड़वाहट उत्पन्न होती है. पति कपिल और दीपशिखा कॉलेज में एक साथ पढ़ते थे. दोनों में प्रेम संबंध होने के कारण जल्द ही शादी के बंधन में बँध जाते है. शादी के बाद कपिल और दीपशिखा आपसी समझ के कारण परिवर्तन आने लगा था. दीपशिखा का बात-बात पर परिवार के सदस्यों से नोक-झोंक होती रहती. कपिल को दीपशिखा की यह बात अच्छी नहीं लगती. कपिल दीपशिखा को समझाता कि ‘‘तुम माँ से क्यों उलझती रहती हो दिन भर’’.14 दीपशिखा कपिल को कहती है मैं नहीं उलझती तुम्हारी माँ ही कुछ ना कुछ कमी निकालती रहती है. कपिल को दीपशिखा की बात पर और गुस्सा आ जाता है. आक्रोश में वह बोलता है कि- ‘‘तुमने माँ को इम्परफेक्ट कहा. तुम्हें शर्म आनी चाहिए. तुम हमेशा ज्यादा बोल जाती हो और गलत भी.’’15 दीपशिखा को कपिल की बात अच्छी नहीं लगी. हमेशा संबंधों में स्त्री को ही क्यों झुकना पड़ता है. गलती हो या नहीं हो कमी औरत ही निकाली जाती है. पति के घर के सभी सदस्य या चाहे वह बिना तर्क के आधार पर बात करे. एकदम सही हम तर्क के आधार पर बात करें गलत क्यों? कपिल को दीपशिखा की हाजिर जवाबी से पहले भी चिढ़ थी. वह दीपशिखा को बहुत समझाने का प्रयास करता. दीपशिखा को जो ठीक लगता. वह वही बात करती. दोनों के बीच संबंधों में तनाव एवं कड़वाहट उत्पन्न होने लगी. दीपशिखा कपिल के कठोर व्यवहार से परेशान थी. मन और दिमाग के बीच अच्छी खासी दूरी आ गई थी. मन जिस बात को स्वीकारने से मना करता. दिमाग उसी बात पर डटे रहना चाहता.

एक दिन दीपशिखा अपने सवालों में उलझी परेशान सोचती है ‘‘एक इंसान को प्रेमी की तरह जानना और पति की तरह पाना कितना अलग था. जिसे उसने निराला समझा वही कितना औसत निकला. वह नहीं चाहता जीवन के ढर्रे में कोई नयापन या प्रयोग. उसे एक परंपरा चाहिए जी हुजूरी की. उसे एक गंधारी चाहिए जो जानबूझकर न सिर्फ अंधी बनी रहे बल्कि गूँगी और बहरी भी.’’16 पति हमेशा से पत्नी को गूँगी और बहरी बनने के लिए ही परामर्श देता रहता है. उसकी कोई पहचान नहीं बनने देना चाहता परिवार या समाज में. दीपशिखा अपने और कपिल के संबंध से दुःखी है. उसने शादी केवल जी हुजूरी के लिए नहीं की थी. पढ़ी-लिखी होने के बाद भी स्त्री आज भी अपने संबंधों को बचाए रखने के लिए अपना अस्तित्व दाव पर लगा देती है. संबंधों में चाहे कितनी भी कड़वाहट भरी हो पर साथ नहीं छोड़ती. लेखिका ममता कालिया ने संबंधों में विवशता का रूप प्रकट किया है. विवशता भी इतनी गहरी स्त्री का संपूर्ण जीवन उसे सँवारने एवं बचाने में लगा रहता है.

कहानी ‘शक’ में लेखिका ममता कालिया ने वैवाहिक संबंधों में ‘शक’ की बीमारी के आने से बसे-बसाये परिवार भी तबाह एवं निस्ते नाबूत हो जाते हैं. ‘शक’ कहानी में नायक और नायिका के संबंधो में दूरियाँ, तनाव एवं कड़वाहट उत्पन्न हो जाती है. दोनों एक-दूसरे की शक्ल भी नहीं देखना चाहते हैं. ‘शक’ कहानी में नायिका कुमुद सक्सेना की संवेदना को व्यक्त किया है. कुमुद अपने परिवार के खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही थी. अचानक कुमुद और सक्सेना जी के बीच संबंधों में दरार पड़ने लगी. कारण सोसाइटी में नये पड़ोसी के आने से. सक्सेना जी नये पड़ोसी के आने से बहुत प्रसन्न दिखाई दे रहे हैं. कुमुद के सामने बार-बार नई पड़ोसन की तारीफ करते रहते हैं. कुमुद पति के इस अनचाहे व्यवहार से परेशान हो जाती है. एक दिन सोसाइटी पिकनिक के दौरान सक्सेना ने सभी के सामने परायी स्त्री के खाने एवं सौन्दर्य की प्रशंसा करते देख पत्नी कुमुद के तन-बदन में आग लग जाती है. संबंधों में तभी से खटास एवं कड़वाहट की स्थिति जन्म ले लेती है. कुमुद सक्सेना सोचती है मैं इस पिकनिक में आई ही क्यों. इस पति ने तो सब कुछ बर्बाद कर दिया. पिकनिक के दौरान कुमुद अपने आपे में नहीं रहती, अपनी मित्र मिसेज अग्रवाल के सामने अपने संबंधों में आई कड़वाहट का खुलासा कर देती है. कुमुद कहती है- ‘‘मन कड़वाहट से और जलन से भर गया. इस आदमी से शादी कर सच, उन्हें एक दिन सुख का नसीब नहीं हुआ.’’17 पति ने परायी स्त्री सरिता की तारीफ कर कुमुद की दुखती रग पर जैसे हाथ रख दिया था. कुमुद ने अपनी घर-गृहस्थी बसाने के लिए अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया था. पति ने कभी मुँह से भी उसकी कोई प्रशंसा नहीं की थी. कुमुद का हृदय जल रहा था. सारा दिन मर-खप के इसके परिवार की सभी जरूरतों को पूरा करती हूँ. अपनी इच्छाओं की भी आहुति देती रही इस पति के लिए. कुमुद तिलमिलाते हुए अपनी वेदना को कहती है ‘‘मैंने क्या नहीं किया इनके लिए, अपना घर छोड़ा, शौक छोड़े, नाते-रिश्ते तोड़े, इनके माँ-बाप का गू-मूत तक उठाया और यह इंसान एक मिनट में तोता चश्म हो गया. वे हल्की-सी कराही, मुझे क्या चूल्हे में जाओ, भाड़ में पड़ो, जब तुम्हें अपनी इज्जत प्यारी नहीं तो मैं कहाँ तक तुम्हें बचाऊँगी. वाह रे मर्द बच्चे, अबला से भी अबला हो गए तुम. तभी शाम को सिर हिला-हिलाकर भजन सुना जा रहा था—.’’18 कुमुद का शरीर शक की बेला में तहस-नहस हो रहा था. इस पति प्राणी के लिए मैंने अपनी पूरी जिंदगी पानी की तरह बहा दी. इस कमजरव के शौक ही नहीं खत्म होते. अब नया शौक आशिकी का चढ़ा है. पति-पत्नी का संबंध प्यार और विश्वास पर टिका होता है, जब वह प्यार शक एवं अविश्वास में बदल जाये तो उस संबंध को कोई नहीं बचा सकता. लेखिका ममता कालिया ने बदलते परिवेश में संबंधों के बदलते रूप को स्पष्ट किया है. पुरुष का परायी स्त्री के प्रति का जो आकर्षण एवं लगाव है. उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है. संबंधों में अवरोध, दरार, खटास एवं कड़वाहट जरूर उत्पन्न हो गई.

कहानी ‘उत्तर अनुत्तर’ में दाम्पत्य संबंधों में सेक्स के कारण भी पति-पत्नी के रिश्ते में कड़वाहट आ जाती है. नायिका मिसेज खन्ना अपने पति खन्ना जी से बहुत लगाव था. मिसेज खन्ना से खन्ना जी देखने में ज्यादा आकर्षक, सुंदर थे. मिसेज खन्ना के मन में अनेक प्रश्न घुमते फिरते रहते हैं. कहीं मिस्टर खन्ना का कहीं और तो चक्कर नहीं है. मिसेज खन्ना अपनी मित्र गुप्ता जी से कहते हैं- कि ‘‘कितना अजीब है न कि शादी में सफर शरीर से शुरु होकर शरीर तक ही बना रहता है. औरत का शरीर ढ़ला नहीं कि मर्द और जगह मुँह मारने लगता है. बीस बरस, पच्चीस बरस, शरीर से आत्मा तक पहुँचने में आखिर कितने बरस लगते हैं.’’19 मिसेज खन्ना का अपने पति से लगातार सेक्स में रिक्तता आने से संबंधों में नीरसता आने लगती है. पति को तो केवल शरीर से ही मतलब है. नारी की इच्छा-अनिच्छा उसके लिए कोई मयाने नहीं रखती. इस बात पर गुप्तानी भी कहती है- ‘‘आदमी तो शरीर को पूजता है. जब तक शरीर काम आए, उसे सजाने के सौ जतन करता है. देखा था न बनारस वाले पांडे जी ने अपनी पत्नी को कैसे छोड़ दिया, जैसे मैली चादर तन से उतारी हो.’’20 पांडे़ जी केवल अपनी पत्नी को उसके रूप-सौंदर्य के आधार पर चाहते थे जैसे ही सौंदर्य में थोड़ी कमी आई, वैसे ही पति-पत्नी के संबंधों में भी प्रेम के स्थान पर कड़वाहट ने जन्म ले लिया.

‘सीमा’ कहानी की नायिका सीमा अपने पति सुभाष के व्यवहार से संतुष्ट नहीं है. पति चाहता है. घर में सब काम उसकी इच्छा अनुसार हो. पत्नी भी उसकी हाँ में हाँ मिलाती रहे. सीमा का व्यवहार पति सुभाष के विपरीत है. सीमा और सुभाष के संबंध मधुर नहीं है. सुभाष सीमा के हर फैसले में अपनी टाँग अड़ाता है जो कई बार उचित और अनुचित होती है. सीमा अपने पति से परेशान हो कहती है ‘‘इसे किसने बना दिया पति और पिता? न यह शख्स पत्नी को समझता है न बेटी को. दिन पर दिन दोनों के अंदर ध्वंसात्मक और सृजनात्मक शक्ति विद्युत ऊर्जा की तरह संचार कर रही है.’’21

सीमा और उसकी बेटी दोनों ही पिता के अनचाहे व्यवहार से खुश नहीं है. सुभाष भी पत्नी की हाजिर-जवाबी से दुःखी है. सीमा पत्नी वाला कोई काम नहीं करती. घर और बाहर दोनों जगह उसकी पहचान शून्य रूपी है. सुभाष पत्नी सीमा पर व्यंग्य कसते हुए कहता है- ‘‘तुम्हारे हाथ तो कुछ भी नहीं आता. तुमसे तो कुछ भी नहीं होता. बाकी औरतें कितनी अच्छी तरह घर संभालती हैं, जानती हो.’’22 सीमा और सुभाष का संबंध प्यार नहीं समझौते की नींव पर टिका हुआ है. समझौता भी नहीं कहेंगे दोनों एक दूसरे पर दिन-रात व्यंग्य कसते रहते हैं. दाम्पत्य संबंधों में केवल खींचतान, कड़वाहट, तनाव, अकेलापन ही है.

समग्रतः कहा जा सकता है कि ममता कालिया ने अपनी कहानियों में दाम्पत्य संबंधों में आ रहे परिवर्तन को दिखाया है. परिवार में पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति प्यार ना रख कर केवल समझौते के आधार पर ही जीवन जी रहे हैं. पति चाहता है कि घर में उसका ही दबदबा चले लेकिन अब पत्नी भी चाहती है कि उसका मान-सम्मान हक उसे दिया जाए. जिसकी वह अधिकारिणी है. पति उसकी बात की परवाह नहीं करता तो वह भी पति की बात को महत्त्व नहीं देती. आज पति-पत्नी एक-दूसरे से झूठ, धोखा, अविश्वास, छल-कपट और बनावटीपन का मुखौटा लगाये संबंधों को जीना चाहते हैं. विश्वास नहीं है तो संबंधों में रिक्तता, कड़वाहटपन, बोझ, अजनबीपन स्वतः आ जाएगा, जिससे जीना मुश्किल ही नहीं दूभर हो जायेगा. ममता कालिया ने अपनी कहानियों में पति-पत्नी के दाम्पत्य संबंधों में आई बैचेनी, कड़वाहट को विभिन्न पहलुओं से चित्रित किया है.

संदर्भ
1- माडर्न टेªण्डस इन मेरिटल रिलेशन्स, ज्योति बेरॉट, पृ- 65-
2- उसका जाना- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 136
3- उसका जाना- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 136
4- उसका जाना- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 137
5- उसका जाना- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 138
6- उसका जाना- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 138
7- उसका जाना- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 138
8- उसका जाना- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 139
9- उसका जाना- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 140
10- दांपत्य- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 54
11- वर्दी- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 94
12- इरादा- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 117
13- इरादा- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 122
14- बोलने वाली औरत, ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 127
15- बोलने वाली औरत, ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 127
16- बोलने वाली औरत, ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 130
17- शक- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 73
18- शक- ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 73
19- उत्तर अनुत्तर – ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 279
20- उत्तर अनुत्तर – ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 280
21- उत्तर अनुत्तर – ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 295
22- उत्तर अनुत्तर – ममता कालिया की कहानियाँ-1, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2005, पृ॰ 295

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

बहुजन चौपाल में हुई चर्चा: भारत का भगवाकरण और सामाजिक न्याय की चुनौतियां

  डिम्पल और अरूण कुमार नारायण 




 बहुजन चौपाल हाशिये के समाज  का वह अम्ब्रेला है जो बहुजन की समस्याओं को उनके नजरिये से देखने व समझने का प्रयास करता है,  जो समाज के दमित ,शोषित तथा उत्पीड़ित लोगों को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर एकजुट कर विभिन्न विचाधाराओं का समन्वय  करता है. बहुजनों में विभिन्न विचारधारा होने के बावजूद  न्याय के मुद्दे पर एकजुट होना  बहुजन चौपाल को सार्थकता प्रदान करता है. अत: देश में न्याय व्यवस्था  को लेकर जो भागवावादी माहौल बना हुआ हैं यह उसके विरूद्ध प्रतिरोधात्मक अभिव्यक्ति व बगावत का बिगुल भी है, जो सामाजिक न्याय की कसौटी तार्किकता को  मानता है.  बहुजन चौपाल कार्यक्रम का आयोजन पटना में सामाजिक न्याय को एक वैकल्पिक विकल्प मानकर आयोजित किया गया.

11 जून 2017 को  बहुजन चौपाल में “भारत का भगवाकरण और सामाजिक न्याय की चुनौतियां” पर प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो . इश्वरी प्रसाद , संचालन संतोष यादव तथा स्वागत डॉ . मुकेश कुमार द्वारा किया गया. इस सत्र  में  आमंत्रित वक्ता के रूप में अलका वर्मा , खालिद   अंसारी ,  अरूण आनन्द , अनिल चमडिया , अशोक दास , सुनील यादव , गुरिंदर सिंह आज़ाद , अरविन्द शेष , मुश्तकीम सिद्दीकी , प्रशांत निहाल आदि थे .

द्वितीय सत्र  की अध्यक्षता प्रो .ओ.पी. जायसवाल, संचालन डॉ.मुकेश कुमार ने किया तथा वक्ता  वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश , डॉ रतन लाल , अशोक भारती , मुलायम सिंह , शरद जायसवाल , गजेन्द्र मांझी , डॉ .पी .एन .पाल , डॉ. के के . मंडल , राजीव यादव , बीरेंद्र कुमार , गौतम कुमार प्रीतम आदि रहे.

इस कार्यक्रम का आयोजन विद्यापति भवन ( पटना म्यूजियम के पीछे ) में हुआ जिसके आयोजन में  बागडोर , न्याय मंच ,सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया), इन्साफ इण्डिया एवं बुद्ध-अम्बेडकर फाउंडेशन की संयुक्त पहल रही. दो सत्रों में यह कार्यक्रम 10  बजे सुबह से शाम 6 बजे तक चला. इस कार्यक्रम में सामाजिक न्याय के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया.  चिरंतन विद्रोही नक्षत्र मालाकार की स्मृति को समर्पित ‘भारत का भगवाकरण और सामाजिक न्याय की चुनौतियां’ विषयक इस कर्यक्रम का आयोजन बिहार, यूपी के उन युवा एक्टिविस्टों ने किया था जो लम्बे समय से समाज निर्माण की सक्रियता से जुड़े रहे और जो लगातार लम्बे समय से दक्षिणपंथियों का सामना भी करते रहे.



“यूरोप के विकास के मूल में फ्रांसीसी राज्य क्रांति रही जिसका प्रभाव पूरी दुनिया के शोषितों , उत्पीड़ितों पर पड़ा जिससे यूरोप के समता , बंधुत्व और आजादी के नारे से अन्य देश भी अग्रसर हुए  और  यूरोप का विकास हुआ . धर्म की मौजूदगी के बावजूद पब्लिक स्फीअर में धर्म के हस्तक्षेप को सीमित किया गया और निजी जिंदगी में धर्म के हस्तक्षेप को एक अलग बात मानी लेकिन सामाजिक जीवन में धर्म के हस्तक्षेप को यूरोप ने रोका, लेकिन भारत में समाजवादी सरकारों ने इस हस्तक्षेप को नहीं रोका. यह उद्गार पहले सत्र में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का है. उर्मिलेश  ने कहा कि बुद्धिज्म के पहले और बाद में भी भारत के कुलीनतंत्र ने यहां के कल्चर को नेस्तनाबूद किया और अपने दर्शन को बहुजन समाज पर थोपा. इस तरह का हमला पूरी दुनिया में आपको नहीं दिखेगा. ब्राहणवादी संस्कृति ने पुस्तकालयों और संस्थाओं को नष्ट किया और वे आज भी कर रहे हैं उन्होंने सवाल उठाए कि क्या हम जाति को खत्म कर लेंगे ? आज के हिन्दुत्वा को बनाए रखते हुए जाति को खत्म नहीं किया जा सकता. जिस सोच और  संरचना से जाति पैदा हुई है उस धार्मिक सोच और  संरचना को बरकार रखते हुए इसे खत्म नहीं किया जा सकता. इन कर्मकांडों के खिलाफ सामाजिक न्याय आंदोलन खड़ा हो जाए तो बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाए. धर्म आपकी राजनीति और जीवन के सभी स्तरों को प्रभावित करता हैं लेकिन जरूरत इस बात की है कि सभी दलित, सामाजिक आन्दोलन इन कर्मकांडों को त्यागे ताकि हिन्दुत्व की ताकतें सबसे कम पढ़ी-लिखी है. उन्होंने अपनी किताबों को भी नहीं पढ़ा उन्होंने कहा कि आर.एस.एस और भाजपा अज्ञान का अथाह सागर है. आश्चर्य है कि इतने अज्ञानी लोग ज्ञानियों से भरे भारत को डिक्टेट कर रहे हैं . अत: यह भारत में ही संभव है उर्मिलेश ने यह भी कहा कि क्रिशचन , इस्लाम, बौद्ध और हिन्दुत्व जिसे मैं ब्राहण धर्म कहता हूं इन तीनों में कर्मकांड हैं, प्रचंड मूर्खताएं हैं, तीनों में डिस्क्रेमिनेशन है , लेकिन हिन्दू धर्म इनके भी बढ़कर सबसे बड़ा पाखंड हैं जिसमें मंदिरों के निर्माण के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता हैं . अत: हिन्दुत्वादी पंक्तियां पहले कांग्रेस मुक्त भारत, फिर विपक्ष मुक्त भारत और अब मीडिया मुक्त भारत की बात कर रहा हैं आज देश भर में 350 चैनल हैं जिसमें से 20 राष्ट्रीय हैं और ये हमारे ओर आपके घरों में घुसकर बीवी बच्चों का दिमाग बदल रहे हैं. मनुष्य होने तथा उनके ज्ञानी बनने की तमाम संभावनाएं नष्ट कर उन्हें हिंदुत्व का रोबोट बना रहे हैं. वे ऐसी मीडिया चाहते हैं जो भजनमंडली की तरह उनके लिए काम करे. बहुजन जातियों के लोगों को वे अपने एजेंट या गुंडे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं उनमें से सरफिरों को इकट्ठा करके मुसलमानों के खिलाफ खड़े कर रहे हैं. चूंकि उन्हें मालुम हैं कि अल्पजन उनको छोड़कर कहीं नहीं जाएगा इसलिए वह अपने स्वार्थों उद्देश्यपूर्ती हेतु बहुजन से रिश्ते बनाते है जिसमें उनकी बड़ी सफलता ही छिपी हुई होती हैं अत: इनकी देशभक्ति और राष्ट्रवाद को चैलेंज किया जाना चाहिए क्योंकि यह कई तिकड़म अपना अलग–अलग मुद्दे उठा लोगों को गुमराह कर रहे हैं जैसे रेलवे स्टेशन, हवाई जहाज को बेच रहे हैं तो कभी अस्पताल बेच रहे है. शहर की बगल की जमीनों को कौड़ी के मोल निजी हाथों में सौंप रहे हैं अभी लगभग 23 रेलवे स्टेशन हाल ही में बिक चुके हैं. अस्पताल, विद्यालय, वि.वि. इन सबों का तेजी से निजीकरण किया जा रहा हैं. वे नहीं चाहते कि शिक्षा के क्षेत्र में बहुजन समाज के बच्चे आगे आये या मीडिया में जाएं. अगर यही निजीकरण की रफ्तार रही तो बहुजन के बच्चे पढ़ने लायक नहीं रहेंगे.

बिहार के संबंध में चर्चा करते हुए उर्मिलेश ने कहा कि लालू और नीतीश सत्ता में बैठे सामाजिक न्याय के आखिरी शहंशाह हैं क्योंकि अगर यह  नहीं जागे तो आप 2020 में कर्पूरी, मंडल सभी परंपरा नष्ट हो जाएगी. भगावा राज्य में स्कूल, कॉलेज और वि.वि. को गरीबों से छीन लेगा और इसी बात को ध्यान में रखकर फीसें बढाई जा रही हैं. इसको चैलेंज करने की जरूरत है, उन्होंने कहा कि नए ढंग के नए प्रतिरोध आंदोलन निजीकरण के खिलाफ खड़े करने होंगे. ब्राहणवादी कर्मकांडों के खिलाफ अभियान चलाने होंगे, रिजर्वेशन की लड़ाई को पुन: जारी रखने की जरूरत हैं और निजीकरण के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करें और प्राइवेट क्षेत्र में आरक्षण की लड़ाई को मजबूत करना होगा 7-8 सालों में सरकार ने रेलवे, अस्पताल आदि कई क्षेत्रों का तेजी से निजीकरण किया, लेकिन पटना में उसके खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हुआ. जबकि अर्जेटीना में इसके खिलाफ बड़े आंदोलन हुए.उनका मानना माना हैं कि आज कश्मीर के खिलाफ पूरे देश को खड़ा किया जा रहा है. ये इतने मूर्ख,काहिल लोग हैं कि अपना इतिहास भी नहीं देखते. शेख अब्दुला नहीं होते तो कश्मीर भारत का अंग नहीं होता .

कार्यक्रम का संचालन कर रहे बागडोर के संयोजक संतोष यादव ने कहा कि आर.एस.एस वर्णाश्रम धर्म की कोख से निकला है. भाजपा भारत की 70 सालों की उपब्धियों को पलटना चाहती है. वह भारत के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक को हिंदू रिपब्लिक बनाना चाहती है. जाति जनगणना की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जाति का सवाल चेतना का सवाल है यह जनगणना हर हाल में होनी चाहिए. उन्होंने इस देश के एक हजार कोर्पोरेटस के निदेशक मंडलों के हुए सामाजिक सर्वे का उल्लेख किया. जिसमें 46 % बनिया, 44 % ब्राहण और 3 % ओबीसी पाए गए इसमें दलित, आदिवासी का प्रतिशत शून्य पाया गया. उन्होंने लोहिया की उस उक्ति को कोड किया जिसमें उन्होंने कहा था कि इस देश के दिमाग पर ब्राहण का राज्य है और जेब पर बनिया का . संतोष ने कहा कि नए समाज को बनाने के लिए इस पारंपरिक वर्चस्व को खत्म करना होगा और सामाजिक न्याय की लड़ाई को ज्ञान और धन के न्यायपूर्ण बंटवारे की ओर केंद्रित करना पड़ेगा. उन्होंने नक्षत्र मालाकार की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने ही यह आह्वान किया था कि ‘जेल, फांसी, नरक सब कबूल है लेकिन गैर बराबरी नहीं , उन्होंने जेपी के समर कैंप शिविर में दो तरह के भोजन की व्यवस्था पर सवाल किया था कि यह दुहरापन नहीं चलेगा . अगर आप मुक्ति चाहते हैं तो उस नारे को अपने जीवन का हिस्सा बनाना पड़ेगा. संतोष ने कहा कि संकीर्ण शुद्ध जातिवाद से सबसे खतरनाक है उससे मुक्ति के बगैर इस समाज का विकास संभव नहीं है.

‘मास मीडिया’ और ‘जन मीडिया’ के संपादक अनिल चमड़िया ने भाजपा की सोच में निहित सांप्रदायिकता को टारगेट करते हुए कहा कि आजादी के दौर में एक ऐसी धारा भी थी जो अंग्रेजों को नहीं भगाना चाहती थी . गोलवलकर आह्वान कर रहे थे कि ब्रिटिश के खिलाफ लड़ने में हिन्दुओं को अपनी शक्ति जाया नहीं करनी चाहिए क्योंकि आपके अंदर ही दुश्मन बैठा हैं. दुश्मन की शिनाख्त वे मुसमलान, क्रिश्चन और कम्युनिस्ट के रूप रहे थे .एक देश के भीतर हिंदू राष्ट्र बनाने की बात वे कर रहे थे. श्री चमड़िया ने कहा कि सत्य आपकी चेतना को एक खास दिशा देता हैं .वायरस जिस तरह कम्यूटर को नष्ट कर देता है  उसकी तरह खंडित विचार व्यक्ति की चेतना को नष्ट कर देते हैं. सावरकर राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का का सैन्यीकरण करना चाहते थे. अनिल चमड़िया  ने कहा कि धर्म के रूप में कई तरह के शेड़स हैं जिसका भाजपा अलग-अलग स्तरों पर प्रयोग कर रहा हैं. यह अकारण नहीं कि सहारनपुर की घटना एक इवेंट बनकर रह जा रही है, वह आंदोलन की एक धारा नहीं बन पा रही है. उन्होंने माना कि आज कई तरह से अंगूठों को काटने की विधियां दफ्तरों, कार्यालयों में ईजाद हो गई हैं. उन्होंने गुजरात की चर्चा करते हुए कहा कि आरक्षण का संबंध सांप्रदायिक दंगों से क्यों जोड़ा जाता है? सांप्रदायिक दंगे यह एहसास कराने की कोशिश करते हैं कि हम सारे के सारे हिंदू हैं.
मुस्लिम समाज में अशराफों के खिलाफ कलम चलाने वाले चर्चित लेखक खालिद अंसारी   ने कहा कि आजादी के पहले कई तरह की ताकतें संघर्ष कर रही थीं. मुसमानों के अंदर दो धाराएं थीं-मुस्लिम लीग और मोमिन कान्फ्रेंस . मुस्लिम लीग अशराफ मुसलमानों का संगठन था जो दो राष्ट्र का समर्थन कर रहा था और मोमिन कान्फ्रेंस दो राष्ट्र के सिद्धांत का विरोध कर रहा था. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद पुराने मुस्लिम लीगी मुसलमान कांग्रेस के साथ जुड़ गए. पसमांदा , दलित और आदिवासी मुसलमानों ने पाकिस्तान बनने का विरोध किया, तब से भारत की राजनीति में उनका पूरी तरह से वर्चस्व है और वह आज तक जारी है. जमाते इस्लामी, ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड- इन सभी संस्थाओं पर इन्हीं 12 % सवर्ण मुसलमानों का कब्जा हैं. पीपुल्स आफ इंडिया के अनुसार भारत में मुसलमानों की 705 जातियां हैं जिसमें से 15-20 % ऐसी जातियां हैं जिन्होंने सारे इंस्टीट्यूशन पर कब्जा जमा रखा है, उन्होंने कहा कि जाति दक्षिण एशिया के सभी धर्मों और क्षेत्रों की समस्या है. दंगे होते हैं साल तीन साल पर कश्मीर में हिंसा फौरी जिंदगी बन गई है. इस पर सेकूलर खेमा कोई चर्चा नहीं करता. आज देख लीजिए मुजफ्फरनगर गुजरात में जहां भी दंगे होते हैं वहां पसमांदा ही क्यों मारे जाते हैं? उन्होंने कहा कि दंगे की भी भारत में जाति होती ह . हिन्दुत्व बढ़ता है तो उसकी एक बड़ी वजह मुस्लिम सांप्रदायिकता है.

उन्होंने कहा कि 70 के बाद सेकुलरिजम आज का सवर्ण सेकुलरिजम है. डॉ साहब अम्बेडकर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कास्ट को अम्बेडकर नेशन कहते हैं , गैंग्स कहते हैं वे जातियों को सामाजिक न्याय की
राजनीति को मुसलमानो के अंदर के ये ही गैंग्स प्रभावित कर रहे थे  अपने अंदर के जातिवाद को भी चुनौती देने की बात उन्होंने कही . राजीतिक सत्ता मिल गई तो उसको ये गैंग्स की तरह इस्तेमाल करते रहे . लोहियावादी 10 वर्ष तक शासन में रहे लेकिन उन्होंने लोहिया की रचनावली नहीं छापी, आंबेडकर की रचनावली नहीं छपी ,उन्होंने कहा कि विचारों का प्रसार होगा तो अंगुलियां अपने उपर भी उठेंगी.

बनारस से आए मशहूर छात्र नेता सुनील यादव ने कहा कि आज ट्रम्प से लेकर सेकुलर राष्ट्र फ्रांस, टर्की आदि दुनिया के पैमाने पर दक्षिणपंथी ताकतों का उभार हुआ है. यह दमन चक्र कहीं धर्म के आधार पर तो कहीं जाति के आधार सभी जगह चल रहा है. भारत में विजेता की स्थिति में हैं ये शक्तियां. सहारनपुर में आर.एस.एस भाजपा हिन्दू मुस्लिम पोलराइजेशन के लिए दंगे करवाती है. यूपी में योगी की सरकार बनने के बाद मुसलमानों और दलितों के उपर हमले बढ़े हैं. वोट लेते समय ये जातियां उनके लिए हिंदू हैं और बाद के दिनों में महज जातियां, इन्होंने संस्थाओं पर कब्जे की भी अजीब मुहिम चला रखी है. उन्होंने सवाल उठाए कि क्या हम केवल हिन्दुत्व की बात करके, डेमोक्रेटिक स्टेट की बात करके उनका मुकाबला कर लेंगे, हमें इस पर भी गौर करना चाहिए. आर.एस.एस भाजपा सुसंगत तरीके से बढ़ रही है. सत्ता के विस्तार के लिए जो भी बिम्ब संभव हो सकते हैं वह उसका इस्तेमाल कर रही है. आज तिरंगे को लेकर माहौल बना दिया गया है . तिरंगे के प्रति आर.एस.एस का नजरिया क्या था. गाय के सवाल पर गौ गुंडे उन्माद फैला रहे हैं. अखलाक की हत्या कर रहे हैं.

दिल्ली से आए युवा पत्रकार अरविंद शेष ने लिखित पर्चे का पाठ किया जिसमें उन्होंने कहा कि चेतना के स्तर पर सशक्तिकरण की प्रक्रिया हमारे समाज में बहुत धीमी रही है, उन्होंने हिन्दू समाज की चेतना को प्रभावित कर रहे कई ढोंगी बाबाओं की पोल खोली और कहा कि ब्राहणवाद से निकलकर ही इंसाफ हासिल किया जा सकता हैं, उन्होंने माना कि विचारधारा आगे तभी बढ़ती है जब वह समाज निर्माण में काम आए.

पंजाब से आए चर्चित युवा कवि गुरिंदर आजाद ने भारतीय राष्ट्रवाद पर ब्राहणवादी ताकतों और अंततः भगवा ताकतों की तेज होती गिरफ्त पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह देश आपका नहीं रहा, वह बहुत बड़ा राज्य का समूह बन गया. उन्होंने माना कि यह राष्ट्रवाद  हमारा नहीं है, भयानक भटकाव है भारत के राज्यों में इस पूरी डायवरर्सिटी को राष्ट्रवाद   के डंडे से हांकने की कोशिशे हो रही हैं. जब स्टेट मजबूत ही नहीं रहेगा तो आप करेंगे क्या?

जे.एन.यू से आए संघर्षशील छात्र नेता प्रशांत निहाल ने वि.वि. स्पेस में सोशल जस्टिस आंदोलन और ब्राहणवादी मानसिकता से जुड़े अनुभव साझा किए, उन्होंने कहा कि एम.फिल, पी.एच.डी में लिखित में 70 और भैवा में 30 अंक दिए जाते हैं. यहां सवर्ण अध्यापकों द्वारा दलित, ओबीसी छात्रों का भयानक भेदभाव होता रहा है. मेरिट के नाम पर उत्पीड़न का पूरा एक पैकेज काम करता रहा है, उन्होंने कहा कि वि.वि. एक प्रोपेगेंडा का स्पेस है जिसे मीडिया के माध्यम किसी खास तरह की विचारधारा को सामने लाने का चलन उसी तरह वि.वि. भी है.

एडवोकेट अलका वर्मा ने कहा कि दक्षिणपंथ का बढ़ता प्रभाव इस देष के लिए खतरा है. उनको रोकने वाली राजनीतिक ताकतें इतनी कमजोर कभी नहीं रहीं.


दलित दस्तक के संपादक अशोक दास  ने कहा कि हम सब भगवाकरण को ढो रहे हैं.उन्होंने सवाल उठाए कि जिस भारत की बहुजन आबादी 80% है क्या उसका भगवाकरण संभव है? हमें खुलकर अपने अंदर झांकने की जरूरत है. आखिर मुट्ठी भर लोग हमारे लिए क्यों चुनौती बने हुए हैं? हमें देखना होगा कि सत्ता वाले कौन लोग हैं?
गजेंद्र मांझी ने माना कि भगवाकरण की ये ताकतें किसानों और दलितों को बहुत चालाकी से अपने में समाहित कर रही हैं उससे निपटने का कार्यभार आज की सबसे बड़ी चुनौती है .

अपने स्वागत भाषण में भागलपुर से आए ‘न्याय मंच’ के डॉ मुकेश कुमार ने कहा कि हम बहुजन चौपाल में शामिल हैं और हमारे सामने मध्य प्रदेश के किसानों की लाशे हैं, दलित छात्र डीका की लाश मौजूद है, गौ आतंकियों द्वारा मारे गए लोगों की लाशे मौजूद हैं, बिहार झारखंड के किसानों की लाशे मौजूद हैं अत: उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय के  पूरे एजेंडे को मुखर करने का एक मौका यह आयोजन हैं जो पूरे देश के स्तर पर इस तरह के कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू करने की बात उन्होंने कही.

मुस्तकीम सिद्दकी ने कहा कि आज बहुजन के दिमाग में आतंक डाल दिया गया है. सांप्रदायिकता प्रशासन तक में चली गई हैं. हाल ही में नवादा में एक खास धर्म के लोगों के उपर हिन्दुत्वादी गुंडों और प्रशासन ने जिस तरह के कहर बरपाए उस घटना में यह प्रवृत्ति खासतौर से दिखी. प्रशासन, मीडिया सब के सब भगवाकरण में रंग गए हैं. राम सेना और हिंदू सेना को ढोनेवाले कौन लोग हैं, उनपर मुख्यधारा का भगवा मीडिया क्यों चुप हैं? भीम सेना बनती है ये ही उसे गुनाहगार साबित करने में लग जाते हैं.

इंजीनियर हरिकेश्वर राम ने सवाल उठाया कि क्या हमारा स्टेट धर्मनिरपेक्ष है? कोर्ट में गीता को माध्यम मानकर शपथ क्यों ली जाती है? ओबीसी के लोग नारियल क्यों फोड़ते हैं? नीतीश मोतिहारी में बहुत बड़ा मंदिर बनवा रहे हैं. मनुवाद को हमलोग आज भी स्वीकार कर रहे हैं. एक बहुत बड़ी आबादी को भेदभाव के आधार पर नीचे रखा गया है. हम इस अन्याय और भेदभाव से मुक्त कैसे हों? सभी क्षेत्रों में निर्णायक जगहों पर संख्यानुपात में उनकी भागीदारी हो. आरक्षण दिए जाने के पीछे यही आधार रहा है . उन्होंने माना कि ये सीधे-सीधे मनुवाद और आंबेडकरवाद की लड़ाई है. इस सत्र के अपने संक्षिप्त अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. ईश्वरी प्रसाद ने सवाल उठाया कि आखिर भाजपा बढ़ इतनी बढ़ क्यों रही हैं ? इस सवाल के शिनाख्त करने की जरूरत है, उन्होंने कहा कि यह एक अजीब विडंबना है कि नीतियों, सिद्धांतों और व्यवहार के स्तर पर आज सभी पार्टियां एक तरह का रोल प्ले कर रही हैं. हमें व्यापक फलक पर इन तमाम सवालों पर सोचना होगा तभी हम सही मायने में भारत के हैं या इस भगवाकरण के इससे निपना होगा.

इस सत्र को डॉ. विनोद पाल, हीरा, नवनीत एवं मनीष ने भी संबोधित किया.

समारोह के दूसरे सत्र की अध्यक्षता इतिहासकार ओ.पी जायसवाल ने की उन्होंने संक्षिप्त किंतु ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में आर.एस.एस और भाजपा की वैचारिक संकीर्णता पर रोशनी  डाली और कहा कि ये बहुत कम पढे-लिखे लोग हैं. जो झूठ बोलने में माहिर हैं. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद जो संस्थाएं खड़ी की गई थीं उसको वे एक-एक कर ध्वस्त कर रहे हैं और वहां आर.एस.एस. की नीतियों को लागू कर रहे हैं . इस सत्र में स्वागत वक्तव्य रिंकु और संचालन मुकेश कुमार ने किया .

इस सत्र को को संबोधित करते हुए प्रो . रतनलाल ने कहा कि जब राज्यसत्ता आततायी हो जाए तो उसे कान पकड़कर सिखाएं कि रास्ता इधर है.उन्होंने कहा कि आज चैथे खंभे में धूल लग गई है. राज्यसत्ता का हर प्रतिरोध पर दमन है, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला किया जा रहा है प्रजातांत्रिक संस्थाएं नष्ट की जा रही हैं और मीडिया सत्ता की दलाली में बिछी हुई है. बहुजन चैपाल के माध्यम से ही तरह की तानाशाही को खत्म किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि उन्हें बीजेपी को हिन्दू राष्ट्र बनाना है तो  वर्णव्यवस्था को बनाये रखना उनकी रणनीति हैं वे 90 वर्ष से गंभीरता से अपने मिशन में लगे हुए हैं उन्हें 90 वर्ष लग गए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में लेकिन वे अपने एजेंडे पर डंटे रहे कि हमें हिन्दू राष्ट्र बनाना है, दूसरी ओर एक छद्म, फर्जी सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करने वाले लोग हैं जिन्होंने सामाजिक न्याय को शंकर की जटा की तरह अपने जटे में ही बांध लिया है और वे नहीं चाहते कि उनके जटे से सामाजिक न्याय की कोई दूसरी धारा फूटे .

भागलपुर से आए प्रो. के.के.मंडल ने कहा कि आज हम सब इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं. भाजपा की सरकार राष्ट्रवाद को रिफाइंड करने की कोशिश कर रही है. उनकी आइडियोलोजी हैं की यह हिंदू राष्ट्र है . इसकी पुष्टि में वे पौराणिक ग्रंथों का हवाला देते हैं. उनकी भारतवर्ष की अवधारणा बिल्कुल निरर्थक है. ऋग्वेद 1028 मंडल में एक बार भी जनपद का इस्तेमाल नहीं है. वहां 10 बार राष्ट्र का संदर्भ आता है, यह राष्ट्र बीजेपी के राष्ट्र  से अलग है. कुरु, पांचाल, ज्योग्रफी पहचान….यज्ञ संदर्भ है धार्मिक है. बौद्धायन धर्मसूत्र में मध्यदेश की बातें कही गई जिसमें संगम तक भारत की अवधारणा करते हैं. उन्होंने कहा कि पातंजलि और मनुस्मृति-दोनों टेक्स्ट में रिपिटेशन है. मगध क्षेत्र जहां राज्य का निर्माण हुआ, अरबनाइजेशन हुआ, उसी मगध एम्पायर में भारत की संकल्पना पहली बार आती है . मध्य गंगा घाटी में यह प्रयोग हो जाते हैं. यह क्षेत्र ब्राहणीकरण नॉम्स के खिलाफ है इस डिसकोर्स में  ऋग्वेद के 10वां मंडल में किकट शब्द है जो ओबीसी मार्जिनल ग्रुप है, इसमें मार्जिनल ग्रुप को कोई स्पेस नहीं है . मुसलमान, ईसाई, बुद्धिस्ट  उनकी राष्ट्रीय अवधारणा में नहीं हैं, उनकी राष्ट्रीय अवधारणा मिथ है, फेक है उसको रिजेक्ट करना होगा. बुद्ध और अम्बेडकर मध्यम मार्ग की बात करते हैं.

सामाजिक न्याय की की चर्चा करते हुए श्री मंडल ने कहा कि आरक्षण को आज बड़े फलक पर ले जाने की जरूरत है. उन्होंने माना कि 30 साल से बिहार में पिछड़ों की सरकार है .  लेकिन यहां का मार्जिनल ग्रुप कहां है? यहां रेप हो रहा है, बाथे के हत्यारे छूट रहे हैं ऐसे में किससे उम्मीद की जाए किसके खिलाफ लड़ेंगे ,बी.पी.एस.सी के द्वारा सहायक प्रोफेसर की बहाली हो रही है उसमें जेनरल कैटोगरी में एक भी ओबीसी/एस-सी/एसटी के लोगों की नियुक्ति नहीं हो रही. आप सब में टॉप कर रहे हैं और आपकी अपनी ही कोई कैटोगरी नहीं है.


अशोक भारती ने  कहा कि जर्मन में जिसे फांसीवाद कहते थे इटली में में उसे ही नाजीवाद कहा गया और भारत में वही भगवाकरण है, उन्होंने माना कि भगवा सरकार तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार है. दलितों, आदिवासी नेताओं को खरीद कर अपने में शामिल करना उनकी मोड्स अपरेंडी है. रामविलास पासवान से लेकर रामदास अठावले तक उनके साथ हैं, जो न्याय की बाते करते थे उनको भी खरीद लिया . अति पिछड़ी जातियों के नेताओं को खरीदने की उनकी नीति है, वे इस देश के अल्पसंख्यक समुदाय को हर स्तर पर अपमानित करते हैं, उनके विरूद्ध झूठा और बुनियाद प्रचार करते रहे हैं ताकि उन्हें देश  का दुश्मन साबित किया जा सके, अलग-अलग राज्यों में ताकतवर अगड़ी जातियां है. पश्चिमी उतर प्रदेश में जाट,रेड्डी, कम्मा, मराठा, पटेल, गुज्जर हैं अत: वे इनके खिलाफ  पिछड़ी अति पिछड़ी जातियों को गोलबंद करना चाहते हैं. मराठा में पटेलों के खिलाफ किया अब बाकी को करने वाले हैं. वे सत्ता हाशिए की जातियों के माध्यम से प्राप्त करना चाहते हैं और उसकी कमान भूरा बाल वाली जातियों को सौंपते रहे हैं. उतर प्रदेश में क्या हुआ? पिछड़ा उप मुख्यमंत्री स्टूल पर बैठा है, वहां सत्ता अति पिछड़ों के नाम पर आयी और नेतृत्व भूरा बाल को दे दिया. ये जो कर रहे हैं वह दरअसल गाय, गोबर और गोमूत्र का दर्शन है , इसको अगर हमने समझ लिया तो अपना काम कर लिया. हमारा संकट यह है कि पिछड़े आपस में एक नहीं हो सकते यह लड़ाइयां कई स्तरों पर लड़े जाने की जरूरत है. वे क्या कर रहे हैं, हमारी लड़ाई कैसे मजबूत होगी, इस पर हमें विचार करना होगा.  संगठन और बिजनेस का ढांचा कैसे बनेगा हमें इस पर भी विचार करना चाहिए, उन्होंने कहा कि बाजार पर कब्जा भूरा बाल वाली जातियों का है. जिस दिन आप इस बाजार से भूरा बाल को खदेड़ देंगे, उस दिन आपने एक बड़ी जंग जीत लेंगे जब तक आप उनकी बाजार खड़ी करते रहेंगे, मजबूत नहीं होंगे हमारा संकट यह है कि आज तक इनके कामों को प्रोत्साहित नहीं किया गया . कई बार प्रताड़ित होने वाले लोग भी प्रताड़ित करनेवाले के दृष्टिकोण से सोचते हैं, हमारा हर काम पहचान और सम्मान के निमित्त बनना चाहिए.

जे.एन.यू से आए छात्र नेता मुलायम सिंह ने कहा कि आप सब गाय, गोरू और गंगा में मत फंसिए प्रोग्राम क्या है इसे कैसे इनीसिएट करना है इसे जनता के बीच आयोजित करें. नीतियां क्या होंगी आर्थिक, सामाजिक इस पर मंथन कीजिए . सामाजिक न्याय की सरकारों के पास आज कोई बड़ा विस्तृत प्रोग्राम नहीं है. हमें अगले 50 साल तक के एजेंडे पर सोचना पड़ेगा. आपकी शिक्षा नीति कहां है? बहुजनों के अंदर चेतना का विस्तार, बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल पाई कि नहीं. अभी तक एम्स जैसा कोई ओर एम्स क्यों नहीं बन पाया. हेल्थ पॉलिसी, छोटी बीमारी तमाम लोग दवाओं के अभाव में मर रहे हैं. कांग्रेस, भाजपा, पड़ोसी देशो से संबंधों को लेकर आपकी पॉलिसी नेशनल और और इंटरनेशनल ऐजेंडे शामिल हो सकते हैं. हम कैसा समाज और दुनिया बनाना चाहते हैंइस पर ध्यान देने की जरूरत हैं क्या जैसा फूल, आंबेडकर सोचते हैं वैसा देश होगा. उन सपनों के देश में जाने के लिए ये बातें कितनी दूर तक सहायक होंगी. जिंदगी जीने से मरने तक बहुत सारी समस्याएं हैं . पार्टी प्रोग्राम विकसित करने पड़ेंगे . प्रोपेगैंडा कैसे करेंगे मीडिया, अल्टरनेटिव, सोशल, प्रिट जर्नल्स, मीडिया हमलोग भी तो हैं . आदमी का जब से कंठ खुला तब से मीडिया आई. लोगों तक अपना विजन कैसे ले जाया जाए , लोकेशन फिट करना पड़ेगा.

रोडमैप पर आनेवाला वह स्थान कहां होगा. इसके लिए मेरी नजर में 7 फार्मू ले है जैसे  साहित्य जनेउधारियों का , कस्ट से पाएं मुक्ति, उन्नति के साथ मंत्र, क्यों नहीं होती देवताओं की मुछे, मिथक, अवतारवाद पुरातनपंथी गार्वेट के खिलाफ आपका मंथन से बुकलेट, 1 महीने 7 सेमिनार, कष्टों पर होगी चर्चा, कैसे होंगे बहुजन खुशहाल, सोशल एजेंडा, अपने इतिहास को जानें रेशनल इतिहास, आर्यों का इतिहास कहा जाता है या हमारे यहां उन्नत सभ्यताएं थीं लेकिन इस पर किसी इतिहासकार ने कुछ नहीं लिखा इसी कारण हमारा सबाल्टन इतिहास पिछड़ गया.

लखनऊ से आए रिहाई मंच के राजीव यादव ने कहा कि भगवा ताकतों से निबटने के लिए हमें हर स्तर पर तकनीक विकसित करनी होगी. भाजपा के समानांतर हमें देश प्रेम की नई परिभाषा गढ़नी पड़ेगी. उतर प्रदेश में भगवा शक्तियों को बड़ी जीत हासिल हुई, उन्होंने भागीदारी आंदोलन की चर्चा की और कहा कि जब तक राजनीतिक ढांचे को आंदोलन नहीं समझेगा तो दलितों के हिन्दूकरण को नहीं रोका जाएगा. गोरखनाथ पीठ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कबीर और गोरखनाथ में एक समानता मिलती है .


शब्बीरपुर की घटना की चर्चा करते हुए राजीव ने कहा कि यहां भाजपा अम्बेडकर को लेकर दलित मुसलमानों में विभाजन करने में कामयाब हुआ उन्होंने आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम समाज के बेगुनाह लोगों को मीडिया, प्रशासन और भगवा गुंडे द्वारा फसाए जाने से संदर्भित कई घटनाक्रमों की चर्चा की, हाल ही बिहार के नवादा और यास्मीन नामक महिला से जुड़े संदर्भ भी उद्घाटित किए और कहा कि दरअसल हमें आज गिरिराज सिंह पर चिंतित होना चाहिए. जो बिहार को गुजरात बनाना चाहते थे  मेरी मान्यता है कि इसी तरह के और सारे युवा चैपाल लगाई जाए.

जे.एन.यू. से आए बीरेंद्र कुमार ने बहुत सारगर्भित अंदाज में अपनी बातें रखीं और कहा कि जे.एन.यू में पढ़ता हूं पुलिस की नजर में मैं माओवादी हूं , अगर मुसलमान होता तो आतंकवादी भी हो जाता, उन्होंने इतिहास लेखन को लक्षित करते हुए कहा कि प्रगतिशील इतिहासकारों ने भी आदिवासियों के संघर्ष और विद्रोह को गायब करके देखा. पिछड़ों, दलितों का सवाल एक तरह का नहीं है. 2017 में हमें नए कंटेंट एवं नए कांटेस्ट में इनकी बात करनी होगी . बिहार, यूपी में फांसीवाद का चरित्र सिर्फ कम्यूनल ही नहीं जातिवादी भी है . सामाजिक न्याय के पुरानी खिलाड़ी बिक गए, खप गए उनको त्याजिए. इसका रास्ता संघर्ष के मैदानों से ही निकलेगा. विपक्ष सड़कों, खेतों और खलिहानों में है, यही फासीवाद को नेस्तनाबूद करेगा. यह जो संकट गहराया है उसकी जड़ में निजीकरण , कॉर्पोरेशन, रामरथ, कमंडल, रणवीर सेना, आतंक आदि मुख्य रहे हैं.

पटना के सामाजिक राजनीतिक विमर्शों की एक अपूर्व कड़ी रहे डॉ.पी.एन.पी पाल ने कहा कि आर.एस.एस और भाजपा कई स्तरों पर बहुजन समाज को अपने अंदर समाहित करने की कोशिश में लगी है , उन्होंने कहा कि संघ के लोग संगठित हैं अत: इनका नेटवर्क हर क्षेत्रों में है . अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,सरस्वती विद्यामंदिर, स्वयंसेवक, सदस्य, बजरंग दल के पूर्णकालिक सदस्य, प्रकाशन सदस्य, मजदूर संघ इनके कामों को आगे बढ़ा रहे हैं, इसके अलावा आशा राम बापू, मोरारी बापू, रामदेव आदि लाखों साधू संत के रूप में ठग उनके विचार को मजबूत करने में लगे हैं और हमारा बहुजन समाज आज भी हिंदू धर्म के सारे कर्मकांडों का वाहक बना हुआ है. वामपंथ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे हाशिए पर क्यों चले गए? इसलिए कि जाति और वर्ग के सवाल को उन्होंने ठीक से समझा नहीं, उसका हल नहीं निकाला. लोहिया समाजवादी एक विकल्प दिया लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हुए. मध्य जातियों से आए तमात नेताओं का पतन परिवार में हो गया उन्होंने कहा कि व्यापक सृजन के जो हाथ हैं वही जातियां वर्तमान फांसीवाद का विकल्प खड़ा कर सकती हैं.
कोचस, रोहतास से आए डॉ. विजय प्रकाश सिंह ने कहा कि आज गांवों और कस्बों के 15 से 30 साल के बहुजन समाज के बच्चों का हिंदू सेवा समिति द्वारा ब्रेनवाश किया जा रहा है इस चुनौती से आपको निपटना होगा और जिला, प्रखंड पंचायत तक जाना होगा इसके लिए मैन पावर, पैसा, बुद्धिजीवी और समय सब चीजों की जरूरत पड़ेगी. सामाजिक न्याय की धज्जियां इस देश की संस्थाओं कम पिछे नहीं रही . 2007 में सुखदेव थोराट एवं पाल एटवेल के एक सर्वे की चर्चा करते हुए डॉ विजय ने कहा कि नामी प्राइवेट उद्योग कंपनियों में जातिवाद किस कदर हावी है की शोध इसको सामने लाता है. सवर्ण, ओबीसी, दलित सब के मार्क्स के  नाम पता अलग-अलग था . कंपनियों में उंची जाति वालों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया, ओबीसी एसटी पर कंपनियों ने कोई संज्ञान नहीं लिया , उन्होंने कहा कि उनके यहां 500 एम. आर आते हैं उनमें एक भी ओबीसी एमआर नहीं आए. उन्होंने माना कि किसी भी देश में हाशिए पर खड़े वर्ग को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक मूलभूत समस्याओं से पार पाने के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना ही सामाजिक न्याय हैं. 70 वर्षों की आजादी में बाधा पैदा किया गया है. नाम के लिए अनुसूचित जातियों को आरक्षण मिल रहा है लेकिन क्लास वन नौकरियों में वे 12 % ही सीट ओबीसी/एस-सी/एसटी के हैं. ओबीसी की 5 % सीटें तक नहीं भरी गईं और फिर भी उनकी छाती फट रही है कि हमारी मेरिट मारी जा रही है, कहां गई तुम्हारी मेरिट जहां सैकड़ों मामले न्यायालयों में लंबित हैं.

अजीत आर्यन ने बढ़ते भगवा हमले पर चिंता जताई कहा कि परिवर्तन आना चाहिए यह काम अलग-अलग तरीके और माध्यमों से लोग कर रहे हैं लेकिन कोई दिशा निकालनी चाहिए जो नई राजनीति से सामने आ सकती हैं. अत: जैसे लोहिया ने छोटी राजनीति की बात कही थी, जो जनता को रोज-ब-रोज शासन-प्रशासन के साथ झेलने पड़ते हैं उसी को उन्होंने बड़ी राजनीति कहा. आज की  चुनौती है कि हम आप अपनी विश्वसनीयता जमीनी स्तर के लोगों के बीच बनाए.

स्कोलर एवं डॉ शरद जायसवाल  ने भारत और खासकर उतर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में हुए दंगों के कारणों की बारीक तफ्तीश की ओर कहा कि आज पश्चमी उतर प्रदेश का हर तीसरा गांव दंगे की चपेट में है वहां आर.एस.एस अपना घृणा प्रयोग कर रहा है. मुसलमानों को नमाज नहीं पढ़ने दिया जाता और उनकी पुरानी मस्जिदों को किसी पौराणिक हिन्दू मंदिर साबित करके पुलिस प्रशासन की मदद से उस पर प्रतिबंध लगावा रही है इसमें पूरी तरह मीडिया और प्रशासन उनकी सहयोगी की भूमिका में है. वे अब कोई शारीरिक हमला नहीं करते बल्कि उनका पूरा मकसद साइक्लोजिकल अटैक का है वे मानते हैं कि डेमाग्राफी को बदला जाए यह प्रयोग गुजरात, कानपुर,बिहार आदि देश के दूसरे शहरों में तीव्रता से किए जा रहे हैं.

आर.एस.एस. ने एक लिस्ट जारी की है जो सुदर्शन टी.वी ने आधे घंटे का एक एपिसोड बना दिया जिससे मस्जिद विवाद हो गया जो शेरपुर हुई घटना हैं वहां मुसलमानों से जमकर लूट-पाट की गई उसमें पुलिस भी शरीक रही. इस घटना पर विपक्ष की ओर से कोई आवाज नहीं उठी सपा, बसपा, कांग्रेस किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जबकि वहां से 35 कि.मी. दूर देबवंद है. बिहार के नवादा में हाल के दिनों में जो घटनाएं मुसलमानों के साथ घटीं, उसमें सत्ताधारी पार्टी के एक एम.एल.सी के घर को भी नहीं बक्शा गया, वहां डेढ़ सौ से उपर घरों पर हमला किया गया , कई दुकानें जला दी गईं. पीरो में हमला हुआ लालू जी ने कोई बयान नहीं दिया बिहार में हाईकोर्ट का निर्णय है कि किसी भी धार्मिक कार्य में कोई  डी जे नहीं बजेगा . इसी डीजे की वजह से ज्यादातर जगहों पर दंगे हो रहे हैं हाईकोर्ट का निर्देश है बावजूद इसके बिहार में इन मौकों पर डीजे बज रहे हैं उन्होंने कहा कि शासक वर्ग बदलाव से बहुत डरता है इसीलिए इस तरह की घटनाओं पर वह चुपी साध लेता हैं,  उनका मानना हैं कि हाशिए के लोगों की दमन की प्रक्रिया में वि.वि. सिस्टम भी शामिल रहा जैसे  जे.एन.यू से लेकर हैदराबाद तक की घटनाओं में इसे देखा जा सकता हैं.

मौटे तौर पर कह सकते हैं कि बहुजन चौपाल सामाजिक न्याय को केंद्र में रख कर एक व्यापक वैचारिकी को जन्म देने का प्रयास हैं, जो न्यायपूर्ण हो तथा जिसका उद्देश्य  समाज में अवरोध उत्पन्न करने वाले कारकों व लोगों की पहचान करना ताकि सामाजिक न्याय की अवधारणा पर बढ़ते हमलों को रोका जा सके और नए दौर में नए परिप्रेक्ष्य से राजनीति के नवीनीकरण को विकसित किया जा सके, हो.  यह राजनीति में सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं अत: भगवाकरण सरकार के समक्ष ऐसे चुनौतीपूर्ण संगठनों या विचारधारा के लोगों को न्याय के सवालों पर बहुजन चौपाल एकत्र होने के साथ एक नयी दिशा देने का प्रयास भी हैं. वर्तमान राजनीति का भगवाकरण इस कदर हो चूका हैं कि एक आम व्यक्ति को न्याय मिलने में इतनी देरी हो जाती कि उसका विश्वास इस संवैधानिक न्याय व्यवस्था से उठने लगता हैं जिसका एक जीता जागता उदाहरण नजीब का लापता होना जिसके लिए भाग्वावादी सरकार जिम्मेदार हैं क्योंकि उनके सत्ता में आते ही मानों बाबरी मस्जिद या कश्मीर , गौ माता , भारत माता जैसे मुद्दे को उठाना तथा धर्म व जाति जैसे के मुद्दे को उठाकर लोगों को गुमराह करना होता  हैं.

बहुजन चौपाल बहुजन की एकता को मजबूत करने की मुहीम भी हैं जो सामाजिक न्याय को आधार बना कर एक ब्लू प्रिंट तैयार किया जो सांकृतिक न्याय प्रकाश डालता हैं.

नयी पीढी की उभरती नयी उर्जा को सही दिशा में लगाने के लिए बहुजन चौपाल एक वैचारिकी मंच प्रदान करता हैं जिससे दमनित शोषित व उत्पीड़ित बहुजन की समस्याओं व मुद्दों को उनके तरीके से देखा व समझा जा सके जोकि यह राजनीति तौर पर सामाजिक तथा बौद्धिक क्षेत्र में हस्तक्षेप द्वारा संभव हो सकेगा. बहुजनों के आत्मसम्मान व सत्ता के साधनों व संसाधनों का समान आबंटन हो सके वह किसी वर्ग वर्चस्व की धरोहर न हो सके. बहुजन चौपाल में बहुजनों के अंतहीन  अन्याय के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी की जिसका आधार न्याय रखा गया.

बहुजन चौपाल जैसे कार्यक्रमों का आयोजन बदलते परिवेश में बदली परिस्थियों के अनुसार  परिवर्तन पर भी बल देता है, जिसमें  सामाजिक न्याय, लैंगिक न्याय, रिजर्वेशन के मुद्दे, जमीनी स्तर से जुड़े किसानों की समस्याओं पर भी ध्यान केन्द्रित किया. मजदूरों की समस्या पर अभिषेक जी जो समान शिक्षा, रोजगार तथा स्वस्थ्य अभियान से जुड़े हैं जिन्होंने मजदूरों की मुलभुत जरूरतों की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया आदि.
पटना की स्थिति से अन्य स्थानों पर महिलाओं की स्थिति क्या होगी इसका अंदाज़ा हॉल  में विद्यमान महिलाओं की संख्या से लगाया गया जिसमें केवल लगभग 10 से अधिक महिलाएं  नहीं थी उसमें भी पुरूष वक्ता की अपेक्षा केवल तीन महिलायें ही शामिल रही. लेकिन 12 जून को हुई मीटिंग में दो महिलाओं डिम्पल और गुंजन ने इस बात को सामने रखा कि महिलाओं की संख्या कम रही जिस पर विचार किया जाना चाहिए, चूंकि महिलाओं के बिना सामाजिक न्याय की बात करना एकतरफा व एकांगी होगा. उन्होंने पटना में ही सक्रिय महिलाओं को शामिल किये जाने की बात रखी ताकि महिलाओं को विश्वास में लेकर गांव से शहर की ओर सांस्कृतिक पलायन को रोका जा सके. महिलाओं के सशक्तिकरण के मुद्दे पर चूंकि महिलाओं के कास्ट, क्लास, वर्ग, क्षेत्र तथा भाषा के आधार पर अनुभव अलग – अलग होते हैं इसलिए उनके संवेदनशील मुद्दों पर उनकी दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए साथ ही महिला आरक्षण बिल पर भी चर्चा की गयी.

रक्षा मंत्रालय ने लिया संज्ञान: सेना के अफसर द्वारा एक लड़की को तेज़ाब फेकने की धमकी मामला



स्त्रीकाल डेस्क 


रक्षा मंत्रालय ने सेना के एक अफसर के खिलाफ जांच की कार्रवाई शुरू कर दी है. पिछले दिनों मुम्बई में एक पेस्टिसाइड कंपनी में काम करने वाली लडकी प्रियंका पांडेय ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा था कि सेना का एक अफसर संदीप कु. चव्हाण है, जिसकी पोस्टिंग इस समय शिलांग में है. उसे पिछले 2 साल से फोन करके और मैसेज करके भद्दी-भद्दी गालियाँ दे रहा है.  उसने  लड़की के पिता  को फोन करके  धमकी दी,  कहा है कि “तुम्हारी बेटी वेश्या है. धंधा करती है.  और ये यह भी कहता है कि मैं तुम्हारी बेटी से शादी करूँगा . इसने लड़की के पिता  के फोन पर ही कहा है कि मैं मई के अंत में शिलांग से मुंबई आ रहा हूँ. तुम्हारी  बेटी मेरा फोन नहीं उठाती है. मैं आर्मी अफसर हूँ. मुझसे पंगा लेना बहुत महंगा पड़ेगा. मई आता हूँ फिर देखता हूँ कौन तुम्हारी बेटी को बचाता है. मैं उसकी जिंदगी बर्बाद कर दूंगा. मैं उसके चेहरे पर तेजाब डाल दूंगा.”

घबराई लडकी ने राष्ट्रपति, रक्षा मंत्रालय, राष्ट्रीय महिला आयोग, आदि को पत्र लिखकर अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई थी. महिला आयोग ने इस मामले को अपने यहाँ दर्ज कर प्रोसिडिंग शुरू की है, जबकि रक्षा मंत्रालय ने अपनी कार्रवाई शुरू करते हुए सम्बंधित क्षेत्र के अधिकारियों को जांच के निर्देश दिये हैं.

लडकी को तंग करने वाला आर्मी ऑफिसर

प्रियंका ने स्पष्ट किया कि  प्रोफेशनल काम के सिलसिले में संदीप मुझे मिला था, तब वह लखनऊ में पोस्टेड था. वह सेना की ओर से पेस्टिसाइड के ऑर्डर के लिए आता था. शुरू में वह इस सिलसिले में मुझसे बातें करता था, तब उसका व्यवहार नॉर्मल था. उसके बाद वह पजेसिव होने लगा मेरे प्रति. मैंने मई 2016 से उससे प्रोफेशनल रिश्ते तोड़ लिए.’ वह इसके बाद अलग-अलग नंबरों से फोन कर प्रियंका को धमकियां देने लगा.  गौरतलब है कि संदीप शादी-शुदा है और दो बच्चों का पिता भी है.

लडकी पर तेज़ाब फेकने की धमकी दे रहा है सेना का अफसर 

मंत्रालय में उसकी शिकायत पर हुई कार्यवाही से प्रियंका आश्वस्त तो हुई हैं, फिर भी डरी हुई हैं कि वह उसका नुकसान न कर दे. इस बीच प्रियंका ने मुम्बई के एक थाने में उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, लेकिन पुलिस ने उसके मामले को संज्ञान लायक नहीं माना और उसे एक अदखल का मामले मानते हुए अपने यह रजिस्टर कर लिया था.

राजेन्द्र यादव को मैत्रेयी द्वारा अपंग कहने से आहत साहित्यकार: पहले भी लिखी थी पंकज बिष्ट को चिट्ठी

स्त्रीकाल डेस्क 


प्रत्यूषचंद्र मिश्र संवेदनशील कवि हैं. राजेंद्र यादव की तरह प्रत्यूष को भी पैरों में समस्या है. राजेंद्र जी को समयांतर में याद करते हुए पंकज बिष्ट ने लिखा था ‘अगर उनके दोनों पैर सही होते तो कहा नहीं जा सकता कि हिंदी साहित्य में उनकी भूमिका क्या रही होती।’ आहत प्रत्यूष ने तब उन्हें चिट्ठी लिखी थी. वे मैत्रेयी पुष्पा द्वारा अपनी किताब ‘सफ़र था कि मुक़ाम था’  में राजेंद्र जी को बार-बार अपाहिज, अपंग, लंगडा कहे जाने से एकबार फिर आहात हुए हैं. प्रत्यूष की चिट्ठी, जो उन्होंने पंकज बिष्ट को लिखी थी. उन्होंने फेसबुक पर संजीव चंदन का स्टेटस में किताब में राजेंद्र जी के लिए मैत्रेयी के इन शब्दों को पढ़कर स्त्रीकाल को 4 साल पुरानी चिट्ठी उपलब्ध कराई है. 


समयांतर (संपादक महोदय)


समयांतर के दिसंबर अंक में राजेंद्र यादव को याद करते हुए पंकज बिष्ट का संस्मरण ‘असहमति के सहयात्री’ में राजेंद्र जी के व्यक्तित्व को कई कोणों से देखने-परखने की कोशिश की गई है। इस आलेख में पंकज जी ने कुछ ऐसी बातें भी जाने-अनजाने कह दी हैं जो उन जैसे संवेदनशील रचनाकार को शोभा नहीं देता। हमारे समाज का पूरा ढांचा ही स्त्रियों, दलितों एवं आदिवासियों के साथ ही विकलांगों के प्रति हिंसक मनोभावों को अपने जेहन में समाए हुए है। अधिकांश लोगों में तो यह चेतना केउपरी स्तर पर ही ही है लेकिन समाज के खासे प्रबुद्ध लोगों के बीच भी यह अवचेतन में गहरे तक धंसा हुआ है जो गाहे-बेगाहे बाहर आ ही जाता है।

कवि जीतेंद्र और तद्भव के संपादक अखिलेश के साथ प्रत्यूषचंद्र मिश्रा

पंकज बिष्ट के इस संस्मरण लेख में इसकी एक साफ झलक देखी जा सकती है। राजेंद्र जी को याद करते हुए उन्होंने उनकी विकलांगता का जिक्र किया है (पृष्ठ 13) । यहां तक तो ठीक था,  लेकिन कहते-कहते उन्होंनें यह भी कह दिया कि ‘अगर उनके दोनों पैर सही होते तो कहा नहीं जा सकता कि हिंदी साहित्य में उनकी भूमिका क्या रही होती।’ मेरी समझ में नहीं आता कि उनके दोनों पैर सही होने से उनके साहित्यिक योगदान पर क्या असर होता? शारीरिक अक्षमता को किसी व्यक्ति की कार्य अक्षमता से जोड कर देखना अक्सर एक सतही निष्कर्ष होता है । होता तो यह है कि शारीरिक अक्षमता व्यक्ति में किसी विशेष क्षमता का सृजन ही करती है। इसके लिए किसी शास्त्र विशेष की जानकारी की आवश्यकता नहीं है। मगही की एक कहावत है ‘आंधर-लांगड़ तीन जौ आगर’.

साहित्यिक मानदंडों की बात करें तो सूरदास की दृष्टि अगर सामान्य रही होती तो शायद वे वो नहीं देख पाते जो उन्होंने देखा। जॉन मिल्टन की पूरी रचनात्मकता का यदि विश्व साहित्य आज भी ऋणी है तो इसमें उनकी विकलांगता कहीं बाधक नहीं बनती। मिल्टन और सूरदास किसी भी साहित्यिक मानदंड पर कहां अक्षम साबित होते हैं मेरी समझ में नहीं आता।हमारे दौर के सबसे बड़े वैज्ञानिक स्टीफेन हाकिंग शारीरिक रूप से यदद पूरी तरह फिट होते तो दुनिया कौन से सातवें ग्रह पर चली गई होती. मेरी समझ में नहीं आता। दरअसल यह हमारी सामान्य समझ ही है जो प्रत्येक चीज को मानकीकृत रूप में देखने की आदि हो चुकी है. शक्ति और वर्चस्व आधारित इस समझ के शिकार हमारे रचनाकार भी हो रहे हों तो क्या आश्चर्य !
प्रत्यूष चंद्र मिश्रा , सम्पर्क: 09122493975

17 जून को संजीव चंदन का फेसबुक स्टेटस 

क्या वह ‘अपाहिज’ छः रोटियाँ खाता था!


इस पोस्ट को लिखते हुए और राजेंद्र जी के समकालीनों से पूछते हुए मैं क्रोध से भी भरा हूँ और व्यंग्य से भी . ‘वह सफ़र था कि मुक़ाम था’ के पेज न 71 पर आकर दिमाग भन्ना गया है कि हमारी भाषा की दुलारी और बड़ी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा क्या वर्जीनिया वुल्फ की किताब के बारे में यह भी नहीं जानती कि वह बहुचर्चित किताब ‘One’s room is own’ है (जैसा कि यहाँ लिखा है) या ‘A room of one’s own. क्या सम्मानित लेखिका गूगल करना भी नहीं जानतीं !

खैर, राजेंद्र जी के समकालीनों से एक सवाल करूं उसके पहले यह किताब पढ़ते हुए यह देख रहा हूँ कि यहां दो चीजों की बड़ी वकालत है , एक मैत्रेयी के खुद के लेखन की और उनकी राजेंद्र जी के प्रसंग में कथित शुचिता की. महिलाओं के मामले में यौन-मुक्ति की पक्षधर लेखिका कमलेश्वर जी के दो महिलाओं से पिता होने को चरित्र का प्रसंग मानती हैं, मानो महिलायें जब यौनमुक्त होंगी तो पुरुष की कोई भूमिका ही नहीं होगी, या फिर विवाहेत्तर प्रेम करती महिलायें चुन-चुनकर क्वांरे पुरुष खोजेंगी, किसी कमलेश्वर को नहीं.

जब वे अपने लेखन, अपनी प्रतिभा की वकालत कर रही होती हैं तो वे राजेन्द्र जी जैसे ‘बड़े संपादक-लेखक’ की गवाही खड़ा करती हैं, अपने लिए लिखे गये उनकी टिप्पणियों का कोट्स लेती हैं और जब वे अपनी शुचिता की गवाही देती हैं तो राजेंद्र जी को अपाहिज, लंगडा, विकलांग बताती हैं- शुचिता का प्रसंग देह से है तो वे पाठकों को ध्यान दिलाती चलती हैं कि दैहिक स्तर पर अपाहिज हैं. यह संबोधन इतनी बार है कि पढ़ते-पढ़ते आप तनाव से भर जायेंगे. औपन्यासिक संस्मरण इस शुचिता की गवाही के लिए पाठकों को कई-कई यात्राओं के प्रंसग से जोड़ता है और फिर उन यात्राओं में एकांत का उद्दीपन भी पैदा करता है. वहाँ फिर बेचारे अपाहिज राजेंद्र जी अपनी सखी से पुराने, नये प्रेम प्रसंग की चर्चा भर ही कर पाते हैं. हद तो यह भी है कि जम्मू में मैत्रेयी ‘दो लम्पट, शराबखोर’ पुरुषों के अकेलेपन से अकेली रु-ब-रू होती हैं, तरस खाती हैं, लेकिन शुचितापूर्ण तरस. वैसा तरस नहीं जैसा चाक की कलावती चाची अपने दामाद पर खाती है! यह महान साहित्यकार का सतीत्व प्रसंग है, जबकि राजेंद्र जी के आस-पास की कथित ‘मुग्धा मध्या ( मैत्रेयी के शब्दों) हुनर नहीं हुश्न का जाल बिछा रही थीं उनके इर्द-गिर्द.

गुस्सा और व्यंग्य से कोई भी भर जायेगा जो राजेंद्र जी को प्यार करता है, जो उनके हस्तक्षेप को हिन्दी समाज और भाषा का युगांतकारी हस्तक्षेप मानता है. राजेंद्र जी हमसब के इसीलिए प्रिय हैं. लेकिन मैं यह पोस्ट अपने गुस्से को व्यक्त करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ. मेरा कौतुहल कुछ और है. राजेंद्र जी को नजदीक से जानने वाले एक बड़े लेखक ने मुझे बताया कि वे बड़े ही संयमित व्यक्ति थे-दो रोटी खाते थे तो दो रोटी ही खायेंगे, दो पैग लेते थे तो दो ही, मजाल है कि कोई तीसरे तक उन्हें ले जाये, चाहे कितना भी सुस्वादु भोजन क्यों न हो और चाहे कितना ही यारबाश महफ़िल क्यों न हो! .’ इस संयम की पुष्टि एक और बड़े लेखक ने की. लेकिन ऐसा क्या है कि वे यात्रा में जाते हुए मैत्रेयी जी के हाथ से पूरे छः पराठे खा गये और दो बाँध कर रख लिए सुबह तक के लिए ! सच में ऐसा भी करते थे क्या राजेंद्र जी !

साहित्यिक मतदाता की खुली चिट्ठी : केजरीवाल सर, लिखवायें किताब की कुंजी ‘सफरनामा कितना सच, कितना झूठ.’

आदरणीय अरविंद जी


यह पत्र जो सार्वजनिक लिख रहा हूँ, उसे हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर परऑफिसियली भी भेजूंगा.  सार्वजनिक इसलिए कि आपका राजनीतिक लक्ष्य पारदर्शी रहा है तो संवाद थोड़ा पारदर्शी भी हो.

वैसे तो मैं आपके प्रति और आपकी राजनीति के प्रति संशकित ही रहता रहा हूँ. खासकर अन्ना के दिनों में ज्यादा संशकित था, वह आंदोलन जिस तरह आपके चाहते हुए और न चाहते हुए आरएसएस के समर्थकों का टूल बन गया था, वह हमने देखा. हालांकि आप कुछ हद तक वहाँ से इसे निकाल पाये तभी संघ समर्थक आपको गलियाते हुए मोदी भक्ति में लीन होते गये और आपकी पार्टी और आपकी राजनीति एक हद तक इस विध्वंसक जमात के प्रभाव से मुक्त हुई.

राजेंद्र यादव की बीमारी के समय तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज का सन्देश

केजरीवाल सर,  हिन्दी अकादमी में आपकी उपाध्यक्ष साहित्यिक झूठ खड़ा कर रही हैं? 

शंका की एक बड़ी वजह आरक्षण और जाति को लेकर आपकी समझ और आपका पिछला रिकार्ड रही है. लेकिन शासन और निर्णयों के स्तर पर आपने मुझे और मुझ जैसों को पुनर्विचार के लिए मजबूर किया है कि एक निश्चित हद तक आप आज राजनीतिक विकल्प हैं और विकल्प की राजनीति कर भी रहे हैं. इसीलिए दिल्ली का वोटर होने के नाते दिलो-जान से चाहा कि आप दिल्ली महानगरपालिका के चुनाव में विजयी होकर आयें-हालांकि वह हो न सका.

मैत्रेयी इतनी इर्ष्यालू थी कि वह नजर रखती थी कि राजेंद्र जी के पास कौन आ रहा है (?)

तो अरविंद जी आप एक राजनीतिक विकल्प के तौर पर दिखते हैं और दिल्ली में स्कूलों, चिकित्सा और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर आप शोर से अधिक करते हुए तथा दूसरे राज्यों के लिए नजीर पेश करते हुए दिखते हैं, इसलिए यह गुफ्तगू कर रहा हूँ. आप यह तो मानते होंगे न शासन जनता के बीच सकारात्मक मेसेज के माध्यम से अपना इकबाल बुलंद करता है. जबकि  केंद्र तथा राज्यों में भाजपा की सरकारें निर्लज्ज उदाहरण पेश कर रही हैं. आप यह मानते होंगे कि आलोचनाओं के प्रति निर्लज्ज आक्रामकता बनाते हुए ही भाजपा ने इशरत जहां के एनकाउन्टर के आरोपी पीपी पांडे को कैसे और कहाँ-कहाँ पदों से नवाजा, डीजीपी बनाया, मामला कोर्ट में आया तो वे हटने को बाध्य हुए. हालांकि  लगता है इस बार भाजपा थोड़ा बैकफुट पर गई है पीपी पांडे का नाम राज्य  मानवाधिकार आयोग के मुखिया के लिए आगे बढ़ाकर फिर पीछे हट गई.

आपके कई अतिरेक और आवेग से असहमत होते हुए भी अरविंद जी मैं यह मानता हूँ कि आप पारंपरिक राजनीति में फिट नहीं हो रहे, उसके लिए सिरदर्द बने हैं, तभी तो पूरी राजनीतिक जमात आपको अछूत मानती है.  चूकी आप पारंपरिक राजनेता नहीं हैं इसलिए ही आप मेरी इस चिट्ठी के मजमून को समझेंगे और आपको संबोधित करने के संदर्भ को भी. अन्यथा यह ऐसा कोई मामला नहीं था कि इसे  साहित्यिक विमर्श, वाद-विवाद से परे ले जाया जाये और एक मुख्यमंत्री को, एक संस्थान के अध्यक्ष को, इसमें दखल देने के लिए कहा जाये. ऐसा चलन भी नहीं रहा है. साहित्यिक जमातें एक-दूसरे पर शाब्दिक बमबारी खूब कर लेती हैं, लेकिन इसे वे बहस और जुगाली तक ही सीमित रखती हैं, कभी मानहानि नहीं, कभी निर्णायक कदम नहीं, क्योंकि कुछ सौ करोड़ की जो साहित्यिक सत्ता है, उसमें आपसी साझेदारी  ऐसे निर्णायक क़दमों से प्रभावित होती है.

वे पत्नी और प्रेमिका दोनो रहीं 

खैर,  लिख इसलिए रहा हूँ कि आप पारंपरिक ढंग से अलग राजनीति कर रहे हैं, इसलिए एक संभावना है कि आप समझते होंगे कि हिन्दी अकादमी जैसे संस्थान सिर्फ बाबूगिरी के लिए नहीं बनाये जाते. उसके अधिकारियों का काम फाइलों पर साइन करना और अपनों को उपकृत करना भर नहीं होता है. साहित्य की संस्थाओं का मकसद साहित्य के प्रति जिम्मेवारी होती है, इसलिए यह प्रसंग आपको शेयर कर रहा हूँ और उचित लगे तो इस पर निर्णायक कदम के लिए आमंत्रित कर रहा हूँ. देखिये मैं आपसे यह नहीं कह रहा हूँ कि हिन्दी अकादमी में आपने किसी सचिव की नियुक्ति क्यों नहीं की, या इस ओर भी ध्यान नहीं खीच रहा हूँ कि नई उपाध्यक्ष के आने के बाद संस्थान के कर्मियों ने हमलोगों से अपने अवसाद के प्रसंग बताने शुरू किये थे. चूकी संस्थानों में महिलायें बहुत कम ही हैं, इसलिए हमसब को लगा था कि महिला उपाध्यक्ष के होने से संस्थान का भला होगा. अवसाद वगैरह को तो शायद उन्होंने कायदे से ठीक कर ही लिया होगा.

इस पत्र का मकसद इन विषयों पर चर्चा करना नहीं है. या यह भी बताना नहीं कि संस्थानों के बड़े पदों पर बैठे लेखक अपनी किताबों के खरीद के लिए कैसे और कितना असरकारी माहौल बनाते हैं. गपशप तो बस यह करना चाहता हूँ कि  आपकी गैर पारंपरिक राजनीति यह जरूर मानती होगी कि साहित्यिक संस्थाओं के जिम्मेवार लोगों को नैतिक होना जरूरी है. साहित्य का ईमानदार इतिहास दर्ज करवना, उसपर शोधपूर्ण या साहित्यिक विधाओं के फ्रेम में लेखन करवाना उनका कर्तव्य है- ऐसा होता है तो साहित्य के शोधार्थी लाभान्वित होंगे. इसीलिए यह सार्वजनिक गप-शप कि बड़े संस्थानों के पदों पर बैठे बड़े लेखक यदि अपने समकालीनों का अपमान करते हैं, झूठ रचते हुए उन्हें बदनाम करते हैं ,  तो उनका यह कृत्य पुस्तकालयों में सुरक्षित भी हो जाता है. और यह खतरनाक है. खतरनाक है कि साहित्य में श्रेष्ठ को संरक्षण देने के लिए बने संस्थानों के बड़े अधिकारी यदि बाजार के खेल में शामिल होकर किताबों का और किताबों में प्रपंच  रचें, यह  ठीक नहीं है भाषा के स्वास्थ्य के लिए.

राजकमल प्रकाशन ‘वह सफ़र था कि मुकाम था’  को निरस्त करे (!)

इसलिए आपसे आग्रह है कि आप हिन्दी अकादमी में आपकी उपाध्यक्ष की लिखी किताब ‘वह सफ़र था कि मुकाम था’ को अध्यक्ष के तौर पर और एक पाठक के तौर पर भी पढ़ें. और फिर अकादमी से ही शोध करवाएं :  ‘सफरनामा: कितना सच, कितना झूठ.’  सच में हिन्दी अकादमी इससे न सिर्फ हिन्दी का भला करेगी बल्कि आपकी उपाध्यक्ष की किताब को पढने के लिए, उसे समझने के लिए एक अधिकारिक कुंजी भी उपलब्ध करा सकेगी.

छूटते डाक से यह चिट्ठी आपको भेज रहा हूँ. फिलहाल सार्वजनिक तौर पर इसे पढ़ लें. 


आपका 
बस आपका अपना 
एक साहित्यिक मतदाता 

जंग खोज निकालता है कोई और खूबसूरत सी चीज

हर्ष भारद्वाज

सरस्वती विद्या मंदिर, फ़ारबिसगंज के छात्र है.

यकीन नहीं होगा आपको कि ये दसवीं में पढ़ रहे एक किशोर की कविताएँ हैं. 


एक दूसरे से प्रेम करते हुए 


मैं चाहता हूँ
कि हम पकड़े जाएं
एक दूसरे से प्रेम करते हुए
और मार दिए जाएं
किसी बन्दूक की आवाज़ पर
या किसी छूरी की चमचमाहट से
या किसी रॉड के भार से।

मैं चाहता हूँ
हम मरने से पहले लिपट जाएं एक दूसरे से
और छू लें एक दूसरे की सांसों को,
पहली बार!
और हमारे बदन में बची थरथराहट
कोई कसर न छोडे
एक दूसरे के
अधमरे,
खूनसनी मरी देह को
पूरा मारने में!

मैं चाहता हूँ
की हम दफना दिए जाएं ,
मेरी देह के ऊपर देह,
उसी आम के बगीचे में
जहां हम छुप -छुप के मिलते थे
और साथ बैठकर बीड़ी पीते थे।

मैं चाहता हूँ
की हम मार दिए जाएं
बहुत चुपके से
बिना किसी शोर के
और फिर हमें कभी कोई खोजे ना।

मैं नहीं चाहता
कि हमारे दफ्न हड्डियों पर
आज से डेढ़ सौ साल बाद शोध हो।
मैं चाहता हूँ कि आज से डेढ़ सौ साल बाद
अगर कोई खोज निकाले हमारी कब्र
और खोदे उसे
तो मेरे छाती के एक हड्डी से लटक रहा हो तुम्हारे कानों का एक झुमका।

जंग खोज निकालता है कोई और खूबसूरत सी चीज 

तुम जानते हो,
मैं कश्मीर हूँ!
मेरे जिस्म पर बहुत उतार चढ़ाव हैं
मेरे जिस्म से फूटते हैं अनगिनत प्यासे झरने।
मैं बहुत खूबसूरत हूँ।

पर क्या देखा है कभी तुमने
मुझे रोते हुए?
और क्या देखा है तुमने कभी
मेरे कटे हुए स्तनों को?
(इन्हें किसने काटा?)
क्या तुम जानते हो
मेरी इस गोरी देह पर क्या जमा है?
यह लाल काला जमा हुआ पहाड़ नहीं
या कोई सूखा झरना नहीं,
या मेरी देह का मैल नहीं!
यह मेरे भीतर से बह रहा खून है
जो अभी भी लाल है
और जमकर काला सा है!
(मैं सोचती हूँ,
की कैसे बचा हुआ है
अभी भी मेरे अंदर खून
वह भी लाल!)

तुम जानते हो
मेरे दोनों हाथों में बारूद है
जो मैंने अपने ही खून से बनाया है,
जिसे मैं अपनी  ही देह पर
जलाती हूँ।
पर क्या करती मैं
खुद पर बम फोड़ने के सिवाय?
वर्षों से होता आया है मेरा बलात्कार
मेरे अपने हीं कहे जाने वाले घर में,
मेरे अपने घर के ही कहे जाने वाले सदस्यों के द्वारा,
मेरी सुरक्षा कर रहे जवानों के द्वारा!

तुमने कभी महसूस किया है,
कि कैसा लगता है जब
कोई बहुत बड़ा इंसानों का झुण्ड
कांधे पर बन्दूक लिये,
तुम्हारी जाँघों को कुचलता है,
अपने जूतों से,
और कुचलता हुआ,
देह के ऊपर चढ़ता है?
और कैसा लगता है
जब तुम्हारी छाती के किनारों पर छिड़ी हो जंग,
और तुम्हारी जिस्म के लिये हो वह जंग?

मैं तो पूरी नग्न हूं,
तुम देख सकते हो
मेरी देह के उतार चढ़ाव पर
खुनें खड्डे!
यह बम की आवाज से बने खड्डें,
मैंने खुद भी किये हैं,
और औरों को भी करने दिए हैं।

क्या तुम सोच सकते हो
की क्यूँ काट दिए मैंने अपने स्तन?
मैनें सोचा की मेरी खूबसूरती ही है
जंग की शुरुआत,
और जंग का अंत ही है मेरी आज़ादी!
पर वे नहीं रुके,
और नहीं रुके उनके हिलते जांघ,
मेरी जाँघों के बीच!

इसीलिए मैं मार रही हूँ खुद को,
अपने ही बनाए बम से
अपने ही धारदार नाखूनों से।
और मैं जानती हूँ
मेरा मरना घोषित किया जाएगा
आत्महत्या!
और बड़े ही आसानी से किया जाएगा ऐसा।

पर क्या कोई जंग कभी खत्म हो सकता है?
नहीं!
वह बस खोज निकालता है
कुछ और
बहुत हीं खूबसूरत चीज़!

आजादी 

हम बुन लेंगे आज़ादी,
सारी बेहूदगी के परे ,
नंगेपन के रेशों से
हम बुन लेंगे अपनी आज़ादी।

जिस तरह मर्द खोदते हैं खेत
हाथों में नसें उगाकर,
उसी तरह हम भी उगाएंगे नस,
अपने हाथों में
और नसों से बुनेंगे आज़ादी।

अब सूखे ख्वाबों और लिपस्टिक से हमारा पेट नहीं भरता है
अब हमें चबाना है आज़ादी।
पर किस तरह की आज़ादी पहनेंगे हम?

नंगेपन को अपना लिबास बना लें
पहनेंगे ऐसी आज़ादी!
मुंह में गाली भर जाए
घोटेंगे ऐसी आज़ादी!

अगर काट दिए जाए हमारे स्तन,
अगर फ़ाड़ दिए गए हमारे कपड़े,
तो हम बहुत से बहुत हाथ पैर मार सकते है,
और कुछ बेसी नहीं कर सकते।
(क्योंकि उनकी अपनी ऐसी भूख  है,
जिसे सिर्फ वे खुद मिटा सकते हैं और कोई नहीं)
लेकिन उन खून सने  स्तनों को लेकर हम,
घुस पाएं अपने ही घरों में
तो होंगे आज़ाद हम (और तुम भी)!
हमारा प्यार हमसे मुँह न फेर ले
हमारे फटे हुए स्लीव देखकर
तो होंगे आज़ाद हम (और तुम भी)!

हमें प्यार करने की आज़ादी हो ,
शादी करने की हो और उससे भी बेसी
तलाक लेने की हो आज़ादी हमें!
होगी ऐसी आज़ादी कि
छातियों पे मर्द उगाएंगे हम,
अनगिनत मर्द!

जिस तरह कुचलता आया है ,
हमारे समाज का ‘सुशील’ मर्द
अनगिनत औरतों के
गिने चुने अंग,
वैसी आज़ादी के साथ अब हम भी जिएंगे!
बहुत घिनौनी होगी , तुम्हारे लिए ऐसी आज़ादी
पर क्या कभी खुद को सूंघा है तुमने,
कि कितनी औरतों की बू आती है तुमसे?

हमें आज़ादी होगी अभद्रता की!
हमें फिक्र न होगी साइकिल चलाने में तब।
हमें शर्म ना आएगी, पेड़ों पर चढ़ने में तब।
कोई आगे से देखता है तो देखे
उसकी आँखें है ,
उसकी मर्ज़ी है।
हम आज़ादी छीनेंगे,
इज़्ज़त जैसे शब्द से!
और आज़ादी होगी हमें कविताएँ छानने की,
मनमर्ज़ी करने की,
आधी रात ट्रेन पकड़ने की!
हमारे काले या गोरे तन ,
किसी को चुभते हैं तो चुभे
इसमे हमारी क्या गलती है?

हम बरस जाएंगे,
बिजली की तरह
इस समाज पर
नंगे या ढके!
चाहे लोग हँसे या रोए,
पर अब हम घरो मे सहेज़ कर
नही रखने देंगे अपने यौवन को।

हमे नही चाहिए आज़ादी,
किसी की इच्छाओं को दबाने की
हमे नही चाहिए आज़ादी, रेप करने की
और नही चाहिए आज़ादी सड़क पर मूतने की!
किसी से डरकर नही चाहते हम रोड पर ना मूतना,
बल्कि इसलिए नही चाहते हम ऐसा करना कि हमें पता है,
कि दुर्गंध क्या होता है
और क्यों होता है!
(जो हमारे सुशील मर्दों को नही पता)

पर हमारी आज़ादी का दुश्मन  है कौन?
बस एक शब्द ही न
‘इज़्ज़त’!
हम जीत लेंगे उस पर,
ऐसी आज़ादी
कि वो शब्द फिर कभी नही दोहराया जाएगा!
उसके अक्षर
ब्लैक होल में दुबक जाएंगे!

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

अपने बच्चों को दूर रखे मर्दानगी की पाठशाला से

इमारतों में बनी पाठशालाएं, जहां हमने अक्षर ज्ञान की शुरुआत की और दुनिया भर का ज्ञान ग्रहण किया। जहां अध्यापकों ने परीक्षाओं का डर दिखाते हुए अलग-अलग तरीकों से हमें पढ़ाया। पाठशाला में किस समय आना है और किस समय जाना है ये सब तय होता है। इस पाठशाला के अलावा कुछ पाठशालाएं ऐसी भी हैं, जहां ना कोई अक्षर ज्ञान सिखाया जाता है और ना कोई किताबी ज्ञान। यहां कोई आने-जाने का समय तय नहीं होता और ना ही इसकी कोई इमारत नज़र आती है। लेकिन इस पाठशाला का वैचारिक ढांचा बहुत मजबूत है, जिसको हिलाने मात्र का प्रयास भी कठिन है। इस पाठशाला में जन्म से ही दाख़िला हो जाता है और यहां सारी उम्र पढ़ाई चलती रहती है। पुरुषों से मर्द बनाने की इस पाठशाला का नाम है :- ‘मर्दानगी की पाठशाला’ जहां पर अलग-अलग तरीकों से मर्दानगी के पाठ पढ़ाए जाते हैं और इसमें किताबी ज्ञान से ज्यादा प्रैक्टिकल सीखने पर ध्यान दिया जाता है।

इस पाठशाला में पुरुषों को मर्द बनाने के लिए, मर्दानगी की दौड़ में दौड़ने के लिए तैयार किया जाता है। सोचने की बात तो ये है कि इस  दौड़ के अंतिम चरण का कोई एक पैमाना नहीं है, जिसको हासिल करके पुरुष अपनी मर्दानगी को साबित कर पाए। ये पैमाने स्थान, समय, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के हिसाब से बदलते रहते हैं। शारीरिक तो कहीं यौनिक, जाति तो कहीं वर्ग के हिसाब से इसके पैमाने बन जाते हैं। मर्दानगी के पैमानों को बनाने में अहम भूमिका सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यताएं और मीडिया बख़ूबी निभा रहे हैं।अगर हम अपने बचपन की बात करें तो जब एक लड़का रोता है तो उसे ये कहकर चुप कर दिया जाता है कि तुम तो शेर बेटे हो, तुम मर्द हो और मर्द कभी रोते नहीं। बार-बार इस पाठ को दोहराया जाता है ताकि उसे ये पाठ याद हो जाए। फिर सिखाया जाता है कि अपनी बहनों की सुरक्षा करो, चाहे बहन उम्र में या कद काठी में बड़ी ही क्यूं ना हो।

हमें हमेशा निडर ओर कठोर बनना सिखाया जाता है। हम ये कभी नहीं कह पाते कि मुझे भी डर लगता है और मुझे भी सुरक्षा की ज़रूरत है। यौनिकता (सेक्शुएलिटी) को लेकर ऐसे पाठ सिखाया जाता है कि यौनिकता को भी हिंसात्मक रूप से देखने और समझने लगते है। इस सब के चलते यौनिकता एक कठिन लड़ाई जैसी लगने लगती है। इतना ही नहीं ज़िंदगी भर असली मर्द बनाने के लिए कुछ पुरुषों को मर्दानगी का मानक बनाकर एक उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है। अगर कोई उस पैमाने तक पहुंच जाए तो ठीक, नहीं तो ‘नामर्द’ का टैग लगा दिया जाता है।

‘नामर्द’ के इस टैग से बचाने का दावा करने वाले अनेक विज्ञापन हम हर जगह देखते हैं। चाहे सड़क के निकट ‘मर्दाना ताकत’ के नाम से बने दवाखाने हो या लिंग के साइज को बढ़ाने संबंधी सार्वजनिक स्थलों पर लगे पोस्टर। मीडिया में रोज़ाना हम देखते हैं कि मर्दानगी को जोखिम और हिंसा रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। विज्ञापनों में हम देख रहे है कि मार्केटिंग के लिए जोखिम भरे तरीकों से असली मर्द की परिभाषा तय की जा रही है और चिंता की बात तो ये है कि ये तरीके दिन-प्रतिदिन और कठिन बनते जा रहे हैं। एक तरफ तो हमारी फिल्में पुरुषों के लिए मर्दानगी के उदाहरण बनाती हैं वहीं दूसरी ओर उत्पादन को बढ़ाने के लिए कंपनियां ऐसे विज्ञापन देती हैं जैसे उनके प्रॉडक्ट को इस्तेमाल किए बिना पुरुषों की मर्दानगी अधूरी है। फिर चाहे तेज़ रफ्तार से बाइक चलाना हो या परफ्यूम लगाते ही कुछ भी कर जाने का जोखिम उठाना हो। भला एक परफ्यूम कैसे मर्दानगी का मानक बन सकता है? सत्ता के इस खेल में ये समझना बहुत ज़रूरी है कि मर्दानगी की इस पाठशाला से फायदा और नुकसान किसे हो रहा है।

सही बात तो यही है कि पितृसत्ता के अलावा किसी को इसमें कोई फायदा नहीं है। मर्दानगी पितृसत्ता की जड़ों को मजबूत करने में सहायक है। मर्दानगी की वजह से लड़कियों और महिलाओं को एक चीज़ की तरह दिखाया जा रहा है और साथ ही हिंसा भी लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन ताज्जुब की बात तो ये है कि जिस मर्दानगी की दौड़ में पुरूष दौड़ रहे है, वो मर्दानगी पुरुषों को भी प्रभावित कर रही है। इस दौड़ में आगे रहने का दवाब पुरुषों को हीन भावना का शिकार बना रहा है। पुरुषों में भावनात्मक पहलू खत्म हो रहा है, सिर्फ हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा मिल रहा है। मर्दानगी की ये पाठशाला पूरे विश्व के लिए बहुत बड़ा खतरा बनती जा रही है। प्यार, शांति और इंसानियत के लिए ये ज़रूरी है कि हम ऐसी पाठशालाओं को बंद कर दें।

 यूथ की आवाज और थंबनेल से साभार

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

राजकमल प्रकाशन ‘वह सफ़र था कि मुकाम था’ को निरस्त करे (!)

स्त्रीकाल डेस्क 


हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष और साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी किताब ‘ वो सफ़र था कि मुकाम था’ में झूठ की बुनियाद पर वरिष्ठ लेखिका मन्नू भंडारी के बारे में अपमानजनक स्थापनायें दी है. उनके झूठ को तथ्यपरक ढंग से स्त्रीकाल ने स्पष्ट किया है. इस विषय पर हमने राजेंद्र यादव और मन्नू-भंडारी को जानने वाली लेखिकाओं से भी लिखने का आग्रह किया है. सोशल मीडिया में भी मैत्रेयी के झूठ के खिलाफ लोग आवाज उठा रहे हैं. सोशल मीडिया में आई टिप्पणियाँ कुछ इस प्रकार हैं: 


स्त्रीकाल व्हाट्स ऐप ग्रुप  में दिलचस्प बहस हुई: 


धर्मवीर: काश ! मैत्रेयी जी आत्मकथा न लिखकर उपन्यास लिख रही होती तो साहित्यिक गल्प का कुछ अवकाश रहता। हो सकता था कि वे हज़ारीप्रसाद द्विवेदी उर्फ़ व्योमकेश शास्त्री वाली परम्परा में कुछ नया जोड़ पाती।और राजेंद्र जी का तो व्यक्तित्व भी इतना सर्वाजनिक है कि वे ना तो “बाणभट्ट की आत्मकथा”के बाण हो सकते हैं ना मन्नू जी निउनिया या मिस कैथराइन ।
पूजा पाठक: पर जरूरी थोड़ी है कि हम हर लेखक को हर अच्छे लेखक के साथ जोड़ कर विशेषता तलाशते रहें मैत्रेयी की अपनी स्वतंत्र लेखन की शैली है मेरे ख्याल से उन्होंने अपनी आत्मकथा और राजेन्द्र यादव पर लिखे संस्मरण को बहुत ही अच्छे ढंग से लिखा है. और बाण ऒर निउनिया कैथराईन हजारी प्रसाद द्विवेदी के काल्पनिक आदर्श पात्र है उन्होंने अपने तरीके से उसे प्रस्तुत किया जो कि उनके संस्कार और  मानसिक स्थिति थी।

केजरीवाल सर,  हिन्दी अकादमी में आपकी उपाध्यक्ष साहित्यिक झूठ खड़ा कर रही हैं? 

संजीव चंदन: कहाँ ठीक लिखा पूजा जी, इसमें तो बहुत सारी फैक्चुअल गलतियां हैं
पूजा: रचनाकार  इतिहास नहीं लिख रहा होता कि सही तथ्य प्रस्तुत करना उसकी बाध्यता होगी
अरुण कुमार: फिर तो आत्मकथाओं के नाम पर कोई भी झूठ फैलाया जा सकता है
पूजा: आत्मकथा में क्या झूठ लिखा है? हां हम उसी से तो उन्हें जान पाते हैं.  हो सकता है आप उन्हें और नजदीक से जानते हो पर प्रत्येक पाठक के लिए तो रचना(आत्मकथा ही) जानने का जरिया है मैंने उन्हें जितना जाना या पढ़ पा रही उसमें मुझे झूठ नहीं दिखा उनका साक्षात्कार भी पढ़ा है.अगर कुछ झूठ है तो अनुरोध है आपसे उसे तथ्य के साथ सामने लाए ताकि हम पाठक जान सके
अरुण: अभी संजीव जी ने स्त्रीकाल पर शेयर किया है, आप उसे एक बार पढे
पूजा: जी जरूर पढ़ूंगी ऒर मुझे सही लगा तो अपने शोध में उसे स्थान भी दूंगी किसी लेखक की आलोचना करना प्रत्येक पाठक का व्यक्तिगत मामला है कि वह उसे किस प्रकार लेता है। मैंने मैत्रेयी के साक्षात्कार देखे भी है अक्सर दूरदर्शन पर प्रसारित होते हैं.
फारूक शाह: संस्मरण में ललित गद्य की छूट होती है, जो कि लेखक के मनोवैज्ञानिक पक्ष से निर्मित होता है . ललित गद्य से मतलब रचनात्मक काव्यात्मक गद्य से है. संस्मरण साहित्य अंतरंगता से एकदम जुड़ा हुआ है. तो प्रस्तुति में फैक्ट की जगह लेखकीय प्रक्षेपण होंगे तो तुरत पाठक के ध्यान में आ jaayegaa
धर्मवीर:  जयशंकर प्रसाद की कविताओं के सन्दर्भ में द्विवेदी जी ने एक अद्भुत बात कही है:”सौंदर्य -पार्थिव सौंदर्य-के प्रति प्रसाद का आकर्षण बहुत अधिक है परंतु शुरू में वे उसे व्यक्त नहीं कर पाते थे।उनके मन में इस बात से कुछ चिंता भी हुई। परंतु बाद में वे इस प्रकार सोचते जान पड़ते हैं कि आवरण और अवगुंठन बुरा क्या है। …..इसी रास्ते सोचता हुआ कवि अवगुंठन के तत्ववाद तक पहुंचता है।….प्रसाद जी के काव्यों में और उनके नाटकों में यही चिंतन प्रणाली स्पष्ट हुई है।”….द्विवेदी जी भी “अवगुंठन के तत्ववाद के कायल”थे।बाणभट्ट की आत्मकथा में व्योमकेश शास्त्री ने स्वीकार किया है कि उसमे प्रेम की व्यंजना “गूढ़ और अदृप्त”भाव से प्रकट हुई है। आत्मकथा की लेखिका मिस कैथराइन की आत्म-स्वीकृति अनुसार -“जब की यह कथा है,वे दिन लज्जा और संकोच में ही निकल गए।कथा लिखने का साहस उन्हें तब हुआ जब वे 68 वर्ष की हो गई।”….भट्टिनी की दृष्टि से देखे हुए अपने प्रिय बाणभट्ट की छवि।…वैष्णव भक्ति के तत्ववाद के अवगुंठन में लिपटी निज प्रेम कहानी।…लकिन द्विवेदी जी से यह सब संभव इसलिए हो पाया कि वे स्वयं को कर्ता मानने के बोझ से मुक्त हैं। उनका प्रिय श्लोक है-“यत्रैवं सति कर्तार मात्मान मन्यते तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वन्न स पश्यति दुर्मति:।।”द्विवेदी जी स्वयं की मति को बचा ले जाते हैं;अपना कृतित्व व्योमकेश शास्त्री को सौप कर क्योँकि उनमें कर्ता होने का भाव प्रबल नहीं है।…..जबकि मैत्रयी जी के यहाँ कर्ता होने का दर्प है। इसलिए उन्हें आत्मकथा के भीतर गल्प की जरूरत पड़ी।(जैसा कि इस रपट में राजेन्द्र जी से जुड़े लोगों ने कहा है) (नामवर जी की किताब -दूसरी परम्परा की खोज में पृ 111से 121 तक से द्विवेदी जी के बारे में समझा गया है)
संजीव: पूजा जी आप उनकी राजेंद्र जी और मन्नू वाली आत्मकथा का अंश पढ़े वे मन्नू भंडारी के बारे में क्या लिख रही हैं पढ़े और इस रपट में पकड़े गये झूठ पढ़ें. धर्मवीर सही कह रहे हैं कि आत्मकथा की जगह गल्प लिख लेतीं. मैंने केवल शैली के सन्दर्भ में बात नहीं कही थी।
पूजा: आत्मकथा तो नहीं संस्मरण लिखा है, जो अभी उनकी नयी किताब प्रकाशित हुई है “वह सफर था कि मुकाम था ” और जहां तक मुझे पता है उनकी आत्मकथा में मन्नू जी पर इतने विस्तार से चर्चा नहीं है.
संजीव:  हां जी, संस्मरण में  झूठ की छूट होती है क्या, संस्मरण में आप खुद उपस्थित होते हैं.
दोनों को न मिलाए यहाँ प्रश्न रोचकता का है आत्मकथा के साथ इमानदारी की बाध्यता है पर मेरे ख्याल से ऒर कोई विधा के साथ नहीं
धर्मवीर:  जिसे टी एस इलियट ने निर्वैयक्तिक होना कहा है (जो कि हर सृजक के लिए जरूरी है)उसी सन्दर्भ में यहाँ कर्ता भाव से मुक्ति की बात मैंने कही है।
पूजा : बतों को पेचीदा क्यों किया जा रहा सीधी ऒर सरल बात है
अरुण: संस्मरण में तथ्यों के साथ छेड़छाड़ ?

मैत्रेयी इतनी इर्ष्यालू थी कि वह नजर रखती थी कि राजेंद्र जी के पास कौन आ रहा है (?)

फेसबुक पर आई टिप्पणियाँ:


गिरिराज किशोर: मैं बहुत आहत हूँ…मरने के बाद जो लिखा जा रहा है वह ठीक नहीं।
गीताश्री: वो लेखिका इसी ताक में थी कि कब मौक़ा मिले और भडांस निकाले. हमने सारा कृत्य देखा हुआ है. किस मुँह से झूठ पर झूठ स्थापित करती जा रही और कई उस दौर के गवाह लोग चुप्पी साधे बैठे. हिंदी अकादमी के आयोजन और उससे मिलने वाले दस हज़ार रुपये का इतना लोभ ! घृणित चुप्पी !
गोपाल कमल : इन्हें अकथ्य अभक्ष्य कुछ से परहेज़ नहीं। दुःख।
अक्षय शर्मा: तो क्या हुआ। आत्मकथा भी एक साहित्यिक विधा है कोई सुप्रीम कोर्ट में दिया गया इकबालिया बयान नहीं जिसे सिर्फ वकील ड्राफ्ट करते हैं और कोई पढ़ता नहीं है।जज भी नहीं। आत्मकथा भी पठनीय होनी चाहिए।
रचना त्यागी : सच हमेशा शब्दों के पीछे होता है …
रचना यादव: वेद दान सुधीर एम्स में राजेन्द्र जी के साथ दिन-रात रहे. वे भी आपको बहुत कुछ बता सकते हैं.
रुपा सिंह:  केजरीवाल जी की नींद और कपिल मिश्रा जी के सपने से हमें क्या लेना देना ! लेकिन इस झूठे पापी लेखन से हम सबका गहरा वास्ता है !शर्मनाक है यह ! सस्ती सनसनी के लिए यह लेखन होता तो फिर भी क्षम्य होता ! लेकिन मन्नू जी का ऐसा अपमान , जिसे करते राजेंद्र यादव जी को संकोच हुआ ( तद्भव के प्रस्तुत अंश )-उनके लिए ऐसी झूठी , चालबाज़ बातें ? असहनीय है ! वह सच सामने आना चाहिए, जिसका अनुमान सबको है !
लहक हिन्दी: राजकमल प्रकाशन जल्द से जल्द वह सफ़र था कि मुकाम को निरस्त करे. कभी -कभी मुनाफा से अधिक जरूरी व्यक्ति के महत्व को भी देखना चाहिये. इसमें देरीठीक नहीं है.
पुष्पा तिवारी: अगर लेखक जो बड़े भी हैं महान भी हैं इतिहास तो छोड़िए भूगोल में भी दर्ज हो जाएंगें । वे सब एक सच सामने लाने में एकजुट नहीं होंगे तो
रश्मि भारद्वाज: राजेंद्र जी को मन्नू जी की आंतरिक यातना का अंदाज़ा था जिसे मैत्रेयी जी ने प्लेटोनिक प्रेम का कवर चढ़ा पूरी तरह ही खारिज़ कर दिया । मन्नू जी का प्रेम खलनायिका का प्रेम हो गया और मीता का महान ! जबकि जिससे खुले में मिलने का साहस भी न, जो साथ भी न निभाए वह प्रेम कैसा ! मैत्रेयी जी मेरी प्रिय लेखिका रहीं हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह मन्नू जी पर लिखा, हैरान हूँ पढ़कर …
कविता: राजेन्द्र जी ने कई बार खुले शब्दों में यह कहा कि वे मन्नू जी के अपराधी हैं, पर उस वक्त उनके लिये यह समझ पाना मुश्किल था …. एक बार तो किसी पत्रकारिता विश्वविधालय में भी जहां अभय कुमार दूबे उन्हें लेकर गये थे …और वे अपने साथ मुझे और राकेश को लेते गये थे
रश्मि भारद्वाज: और इतनी छोटी सी बात और समझने जाओ तो कितनी गहरी, मैत्रेयी जी को ना दिखी ! वह तो वैवाहिक प्रेम को प्रेम मानती ही नहीं, इतने रूमानी और यथार्थ से दूर हैं उनकी सोच कि क्या दिशा मिलेगी इससे समाज को ! प्रेम उत्श्रृंखलता नहीं, प्रेम त्याग भी, अपने स्व का त्याग और वह मन्नू जी ने अंत तक निभाया।
संजीव चंदन: प्रेम तो प्रेम ही रहेगा न विवाह में या विवाह के बाहर. मैत्रेयी जी का वश चले तो विवाह के बाहर को उत्तम का अंतिम दर्जा दिला दें, लेकिन उसका क्या जिसने प्रेम किया , विवाह किया और फिर प्रेम करती रही, उसका भी क्या जो पितृसत्तात्मक वयवस्था में विवाहपूर्व प्रेम न कर पाई, लेकिन विवाह के बाद ही प्रेम कर लिया. संकट यह है कि मन्नू और राजेंद्र जी के विलगाव के बीच वे अपना और डाक्टर साहब का कंट्रास्ट पैदा कर रही हैं और वहीं राजेंद्र जी से प्रेम के मामले में भी मन्नू और मीता का !
उर्मिला उर्मिल: कल्पना की कौड़ी लाकर उसे साहित्यिक कलेवर में लपेट देना एक बात है ,और खुद एक अच्छे , आदर्श व्यक्तित्व के रूप में जीवन जीना बिलकुल दूसरी बात है ।इसे कहते हैं कथनी और करनी का अंतर ।

वे पत्नी और प्रेमिका दोनो रहीं 

वीरू सोनकर: मैत्रेयी पुष्पा जी के लिए मैंने बड़े ही आदर पूर्वक आज से डेढ़ दो वर्ष पूर्व ही यह बात कह दी थी कि वह एक राजनैतिक प्रतिभा से भरपूर महिला हैं जो गलत जगह पर आ गयी हैं वह साहित्य को राजनीति की तरह बरतती और समझती रही हैं जहाँ साहित्य, नैतिकता और आत्मलोचना से संचालित और प्रेरित होता है वही राजनीति में घात-प्रतिघात गिरोहबंदीक में माहिर होना अनिवार्य है. सामने का शीशा साफ करने से, दुसरो के चेहरे पर सप्रयास कालिख पोतने से खुद का चेहरा नही साफ होता. मैं नही समझता कि वह अब इस उम्र में इस बात को नही समझती होगी. राजेन्द्र यादव की विरासत की इकलौती दावेदार बनने के अतिरिक्त प्रयासों से मैत्रेयी जी का खुद का इतिहास अपनी आभा खो चुका है यह बात जान कर भी वह अपना कीचड़-फेकू अभियान खत्म नही करने वाली हैं
आज मैत्रेयी जी इस बात का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हो चुकी हैं कि ‘महत्वकांक्षा’ किस प्रकार से एक लेखक की नैतिकता/लेखकीय निष्पक्षता/लेखकीय उत्तदायित्व को कैसे खा जाती है .फिलहाल वह हिंदी अकादमी के हाथी पर सवार हैं और वह सिर्फ उन्ही लोगो की जय-जयकार सुनना चाहती हैं जो अकादमी के द्वारा पोषित/लाभान्वित हैं जो उनसे फायदा प्राप्त कर रहे हैं वह मैत्रेयी जी के पक्ष में मन्नू भंडारी के विरुद्ध तर्क/साक्ष्य प्रस्तुत करते रहेंगे, यह उनका काम/व्यापार है पर इतिहास काम/व्यापार और जिंदाबाद के नारों से नही बनता. यथार्थ का अपना ही एक मानक होता है अपनी ही एक खास न्याय प्रणाली होती है. अपना ही एक दस्तावेज होता है जहाँ मैत्रेयी जी अपने सभी प्रयासों के बाद भी ठीक उसी तरह दर्ज होगी, जिस तरह यथार्थ उन्हें पहचान पा रहा है
अंत मे, व्यक्ति माफ करते हैं पर इतिहास माफ नही करता, वह दर्ज करता है खुद को स्थापित करने और मनवाने के सभी प्रयासों को बड़ी ही निष्ठुरता से कुचलते हुए, वह हमारा असली चेहरा सामने लाता है जिसे पीढ़ी ठीक उसी तरह पहचानती है
 वंदना राग: बहुत साफ़ साफ़ लिखा वीरू. और यही साफगोई और स्पष्टता सभी लेखकों में होनी चाहिए. यूँही किसी भी लेखक का महिमामंडन जब उसके लिखे से इतर कारणों से होता है तो उसकी महिमा का स्खलन भी यूँ ही होता है.. स्वतः
वीरू सोनकर: जब तक लेखकों में ‘पाने का लोभ’ और ‘खोने का भय’ समाप्त नही होगा, चुप्पियां यूं ही हमारे समय के माथे पर उगती रहें
उषा यादव उषा: मैं कई लेखिकाओं की आत्मकथा पढ़ी हूँ प्रसिद्धी के लिए लोग कितना नीचे गिर जाते हैं आश्चर्य नहीं लेकिन बुरा बहुत लगता है..
मैत्रेयी पुष्पा: ” चाक ” उपन्यास पर जब हंगामे हुये तो राजेन्द्र यादव ने लेखकीय अनुशासन के तहत यह सिखाया था – अब मान लो कि तुम्हारा लिखा असरदार है । इतने लोग विचलित होरहे हैं । उन लोगों के जबाव में तुम कभी कुछ नहीं कहोगी जैसे अपने विरोधियों से मैं कुछ नहीं कहता ।
जितेन्द्र विसारिया: मैत्रैयी जी यह सब उपन्यास मैं चल जाता है, पर आत्मकथ्य या आत्मकथा में तथ्यों की अनदेखी नुकसानदेह साबित होती है। और लेखक की निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह छोड़ जाती है। हो सके तो इनसे बचिए, आप वरिष्ठ और समझदार हैं
संजीव चंदन: चाक मुझे भी पसंद था, आपकी सारी रचनायें पढ़ी हैं, लगभग- उनपर लिखा है , लेकिन आत्मकथा और संस्मरण में तथ्यों के हेर-फेर!

रवीन्द्र दास:  शायद प्रेम और राजनिती में सब जायज होता है.
ज्ञानेंद्र मिश्रा: राजनीति में जो काम केजरीवाल जी कर रहे हैं साहित्य के क्षेत्र में वहीं काम मैत्रेयी जी कर रही हैं । उनको प्रेम की उदात्तता का एहसास कम प्रपंचों और लांछन लगाने का अनुभव ज्यादा है ।
डॉ. शशि सुभाष मिश्रा : चरित्रहीन तथाकथित शब्द के जादुगरों का जब तक बहिष्कार नहीं होगा,आम पाठक ठगे जाते रहेंगे ! सुधी जानकारों की जिम्मेदारी बनती है,शब्दों के खिलाड़ियों को उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास करवाएं l मन्नू जी, राजेंद्र यादव और उनकी मीताओं का सच अब पाठकों से छुपा नहीं है l मन्नू जी के पासंग भर नहीं “वे” जो गुजर चुके और जो आज अपनी छबि “बचाये” रखने के चोंचलों में लिप्त हैं l
आशुतोष:  झूठ गढ़ने के लिए समय नहीं , ‘हौसला’ चाहिए ।
उमाशंकर सिंह परमार : आप इस अभियान को आगे बढाईये बढिया लग रहा है
सरोज अरोड़ा: कुछ ज्यादा ही एक्सपोजर हो रहा है मैडम मैत्रेयी का. दुनिया में कुछ औरतें ऐसी होती हैं, जो शोर्टकट से आगे बढना चाहती हैं. इसका यह मतलब नहीं है कि पुरुष पवित्र आत्माएं होते हैं.

राजेंद्र यादव से मन्नू का प्रेम ठोस था: वे पत्नी और प्रेमिका दोनो रहीं

वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा से पाखी के राजेंद्र यादव विशेषांक  के लिए प्रेम भारद्वाज ने 2011 में बातचीत की थी. तब राजेंद्र जी जीवित थे. एक लम्बी बातचीत का यह हिस्सा राजेंद्र जी से मन्नू भंडारी के रिश्ते के संश्लिष्ट स्तरों को  सपष्ट करता है. मन्नू, मीता और मैत्रेयी- तीन एम के साथ उनके रिश्ते को केंद्र में रखकर की गई बातचीत आज फिर प्रासंगिक है. 


राजेंद्र यादव के साथ तीन ‘‘एम’’ जुड़े हुए हैं – मन्नू , मीता और मैत्रेयी ! मुझे लगता है , आप तीनों को ही बेहद करीब से जानती हैं। इन तीनों के बारे में कुछ बताएं ?
‘‘ डायल ‘एम’ फॉर  मर्डर ’’ की तर्ज का प्रश्न  है यह । मैं इन तीनों में से सिर्फ मन्नू जी के निकट हूं । मैत्रेयी से मित्रता औपचारिक है । मीता से मेरा कोई परिचय नहीं । मन्नू जी और मैत्रेयी की तरह मीता किसी एक का नाम नहीं है । मीता एक कल्ट है , एक प्रवृत्ति  है – मटुकनाथ (लीजिए , यहां भी एम) की तरह । हिन्दी साहित्य में राजेंद्र जी की मीता की तर्ज पर मीताओं की भरमार हैं । यह ज़रूर है कि एक मीता को तो स्वीकार कर के ही चलीं मन्नू जी – अपने जीवन के लंबे पैंतीस साल ।
राजेंद्र जी की ही डायरी के पन्ने का अंश देखें –
‘‘शायद मेरी इस मानसिक छटपटाहट को मन्नू समझ रही है । वह बैठ कर बातें करना चाहती है, और मैं टाल देता हूं । एक बार तो उसने कहा था कि अगर आपको लगता है कि इस जड़ता और अवरोध से आप यहां से बाहर जाकर निकल सकते हैं तो नगीना के साथ कुछ दिन रह लीजिए … दया और करुणा ही हुई सुन कर … यह बात उसने किस यातना बिन्दु पर पहुँचकर कही होगी … । लगता मुझे भी है कि शायद इस अंधे कुंए से वही साथ निकाल सकता है मगर हिम्मत नहीं पड़ी । मैं नगीना के साथ रहने दस दिनों को जाऊंगा यह कह कर मैं निकल सकता हूं ? चुपचाप चोरी छिपे जाऊं और भला मानुस बन कर लौट आऊं , यह तो हो सकता है । यही शायद होता भी रहा है । मगर कह कर खुलेआम जाना कैसा लगता है जाने … चला भी गया तो शायद लौटने का मुंह नहीं रहेगा । यहां भी सब चीजें , रहना – व्यवहार नार्मल नहीं रह पायेंगे … । ’’                                                   – तद्भव: 11 , पृष्ठ – 181

दुर्लभ रागात्मकता: राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी

मैत्रेयी ने अब कहा है कि राजेंद्र जी ने हमारे भरोसे को तोड़ा है ! छिनाल प्रकरण पर राजेंद्र जी का स्टैंड क्या सही था जिसके कारण मैत्रेयी ने उनसे नाता तोड़ लिया ?
मैत्रेयी के इस वक्तव्य से उनकी बिलख सामने आ रही है । कैसा भरोसा तोड़ा है ? पारिभाषित  किस्म का नाता टूटने का मसला है यह ! राजेंद्र जी तो रिश्तों -नातों की पारिभाषाओं से बाहर ही खड़े होते रहे हैं । मैत्रेयी की समझ का द्वैध है कि वे राजेंद्र यादव के बौद्धिक पुंसत्व को समझ ही नहीं पाईं । अब वे आरोप लगा रही हैं क्योंकि उनकी कच्ची कसौटियां दरक गईं । लंबा अरसा लगा उसे समझने में कि स्त्रियों के मुद्दों पर राजेंद्र जी भरोसे के लायक नहीं हैं । स्त्री विमर्श  की जो स्यूडो परिभाषायें वे रचते रहे हैं , उस पर भरोसा किया तो ग़लती मैत्रेयी की थी । सबसे बड़ी बात तो यह कि मैत्रेयी को न उनके स्त्री विमर्श  का हिमायती बनना चाहिये था और न उनसे कोई अपेक्षा  पालनी चाहिये थी , पर उसका तो तब राजेंद्र जी के संरक्षण में ट्रेनिंग पीरियड चल रहा था । जो व्यक्ति लगातार इस तरह की बातें लिखता रहा है ‘‘ न जाने कितनी लड़कियाँ, अभिनेत्रियाँ और सामाजिक कार्यकर्ता अपने को गुंडी, लफंगी, रंडी और फाहिशा कहकर या सुनकर इस कान से उस कान निकाल देती हैं या उसका मजा लेती हैं। ’’ (हंस, अक्टूबर 2010) पहले कभी यह भी लिखा था कि वे बलात्कार का भी मज़ा लेती हैं । ऐसे विचारों पर भरोसा ? जो दाम्पत्य की गहरी निष्ठाओं को ठुकरा सकता है , उससे कैसी अपेक्षाएं पाल रखी थीं मैत्रेयी ने ? सच पूछें तो राजेन्द्रजी हर रिश्ते  में खोटे साबित हुए हैं । वे मन्नूजी के लिए ग़ैर ज़िम्मेदार और अराजक पति , मीता के लिए अवसरवादी प्रेमी और मैत्रेयी के लिए झूठे मित्र हैं। हर स्तर पर उन्होने रिश्तों  की मर्यादा भंग की है और अपने संबधों को चौराहे की चीज़ बनाकर रख दिया है । सारी दुनिया को सीख देनेवाला इतना बड़ा साहित्यकार इस उम्र तक मर्यादा में रहना सीख ही नहीं पाया। मैत्रेयी मित्र न भी होतीं तो भी एक वरिष्ठ साहित्यकार होने के नाते राजेंद्र जी से उम्मीद की जा सकती थी कि वे साहित्य में अभद्र भाषा का खुलकर विरोध करेंगे । गली मोहल्लों के चालू अखाड़ों जैसा घटिया माहौल साहित्य में बन गया है , जहां भाषा की कोई मर्यादा नहीं । कोई भी किसी के लिए कुछ भी लिख कर ऐंठ दिखा कर निकल जाए – यह पढ़े लिखों की दुनिया है ?

यह ठीक है कि हर व्यक्ति को वैचारिक स्वतंत्रता दी जानी चाहिये । ज़रूरी नहीं कि हमख़याल मित्रों में भी सबकी प्रतिक्रिया किसी मुद्दे पर एक सी हो ! पर राजेंद्र जी का स्टैंड बिल्कुल सही नहीं था । स्त्री विमर्श  के पैरोकार ने पहले लेखिकाओं को खूब हुड़काया – खुलकर लिखो – यह भी (ही) तो जिन्दगी का हिस्सा है । जब लेखिकाएं खुलकर लिखने लगीं और छिनाल प्रकरण की विभूतियों को नौकरी से बर्खास्त करने की मांग आई तो राजेंद्र जी ने कहा – यह तो महिलाओं का तालिबानी रवैया है । यानी खुलकर लिखो , छिनाल कहलाओ और छिनाल कहलाये जाने का भी उत्सव मनाओ । तालिबानी रवैया मत अपनाओ । राजेंद्र जी की यह प्रतिक्रिया अप्रत्याशित तो नहीं थी । दूसरे सच की गुहार लगाएं तो तालिबान और अपने सौ गुनाह माफ । पर असहमति के कारण नाता तोड़ लेने की बात मेरी समझ से बाहर है ।

राजेंद्र जी अक्सर कहा करते हैं कि मैंने तीन औरतों के साथ न्याय नहीं किया ! दो तो मन्नू और मीता हैं , तीसरी मैत्रेयी नहीं तो फिर कौन हैं ?
यह सवाल निजी है। जहां तक मेरी जानकारी है , राजेंद्र जी ने यह कभी नहीं कहा ! सिर्फ दो के प्रति न्याय न करने की बात कही है।  मुजरिम करार देने के लिये तो इतना ही काफी है कि अपनी समर्पिता और एकनिष्ठ पत्नी के साथ आपने न्याय नहीं किया । ‘‘ 23 लेखिकाएं …..’’ वाली पुस्तक में जयंती रंगनाथन के सेक्स संबंधी लंबे साक्षा त्कार में उन्होंने अपना सेक्स के स्तर पर तीन के साथ रिश्ता  स्वीकार किया है । तीसरी , चौथी  , पांचवीं – कई हो सकती हैं ,उसके बारे में सिर क्यों खपाया जाये । हां , यह एक बहुत बड़ा भ्रम रहा हिन्दी जगत में कि मैत्रेयी के कारण मन्नू जी से राजेंद्र जी को अलग होना पड़ा । दोनों के बीच अलगाव का कारण मैत्रेयी बिल्कुल नहीं रही । अलग होने के बाद भावात्मक संबल और व्यावहारिक सुख सुविधाओं के लिये उन्होंने मैत्रेयी को थाम लिया हो , वह बात दीगर है । आखिर भावात्मक संबल और घर की सुरक्षा  की दरकार एक व्यक्ति को होती ही है। जो अपने घर को सिर्फ शरणस्थली , सुख सुविधाओं का ठिया समझे , घर के ठौर को ठोकर मारे , उसकी कद्र न करे , आखिर देर सबेर समय उसे समझा ही देता है कि उसने क्या खोया और बदले में उसे कहां ठौर तलाशना पड़ रहा है ।

राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी और नन्ही रचना यादव

मन्नू जी राजेंद्र जी से अक्सर कहा करती हैं कि ‘‘ जब करने का साहस रखते हैं , तो बताने का क्यों नहीं ’’ वो कौन सी बात बताने के लिये कहती हैं जिसका साहस राजेंद्र जी नहीं कर पा रहे हैं !
राजेंद्र जी और मन्नू जी के नज़दीक रह चुके कई मित्रों की सबसे ज्यादा और सबसे बड़ी शिकायत यही है कि राजेंद्र जी की कथनी और करनी में बहुत बड़ी फांक हैं । अपने पचासों साक्षात्कारों , प्रवचनों में जिस सैद्धांतिकी   का वे किसी मसीहा के अंदाज़ में प्रतिपादन करते हैं , अपने निजी संबंधों में ही नहीं , संपादन और लेखन में भी – वे सतह पर ईमानदार दिखाई देते अपने ही वक्तव्य को निभा नहीं पाते । उदाहरण पचासों हैं पर यहां एक वाकया बताना चाहती हूं । अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा -‘‘ जिस तरह साहित्य में एक तरह की हिप्पोक्रेसी थी , कुछ चीज़ों को सामने आने नहीं दिया जाता था , उसी तरह व्यक्तिगत जीवन में भी कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें दबा ढंका कर रखा जाता था कि भई ये साहित्य की चीजें नहीं हैं । लोगों की ज़िंदगी का जो महत्वपूर्ण भाग है ( यानी सेक्स ), जो समाज का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा (!) है , उसको लोग बोल नहीं रहे हैं । मैंने बोलना शुरु किया । प्रेम प्रसंग किसकी ज़िंदगी में नहीं होते । कौन सा लेखक ऐसा है जो यह कह सके कि मेरे साथ कोई अफेयर नहीं हुआ , मैंने किसी लड़की की तरफ झांका नहीं । हरेक के साथ प्रेम प्रसंग हैं , उनमें से कोई लिखने की हिम्मत नहीं करता । नैतिकता के प्रश्न  हों या व्यक्तिगत प्रश्न  , मैंने उनको खुलकर कहा है ( ‘‘मुड़ मुड़ के देखता हूं ’’ में )। उन पर बात की है और मैं समझता हूं कि इससे ही लोगों की हिप्पोक्रेसी टूटे क्योंकि आपको दूसरों को नंगा करने के बजाय पहले खुद नंगा होना होगा तभी आपको हक है कि आप दूसरों के बारे में कुछ कह सकें । हमारे यहां पता नहीं कितने लोग हैं जो क्लेम करते हैं कि मुझसे ज्यादा सच्चा कोई नहीं है । उन बेवकूफों और दंभियों से यह कहा जाए कि कुछ सच अपने बारे में भी बोलो ! ’’( 23 लेखिकाएं और राजेंद्र यादव – साधना अग्रवाल द्वारा साक्षा त्कार में )
इतना बड़ा प्रवचन सुनने के बाद कोई भी मुस्कुराकर यही पूछेगा – ‘‘ राजेंद्र जी , आपका अपने बारे में क्या ख्याल है ?’’ यह सैद्धांतिकी पहले अपने पर लागू करते ! अपने बारे में कितना सच बोला है उन्होंने । मन्नू जी से अलग होने के ‘‘कारण’’ के बारे में उनके प्रचारित झूठों का तो अंबार लगा है । 1995 में मन्नू जी से अलग होने के बाद     ‘‘ एशियन एज ’’ को एक साक्षात्कार दिया तो कारण यह बताया कि मैं तो बहुत सोशल हूँ  और मुझसे मिलने वालों का आना जाना , उन्हें खिलाना पिलाना मन्नू को पसंद नहीं था तो हमने सोचा चलो , अलग रहने का प्रयोग कर देखा जाए । जाहिर है , मन्नू जी इस बयान से बहुत आहत हुईं क्योंकि उनके यहां हमेशा  ही साहित्यिक मित्रों की बैठकें जमती रही हैं। कथादेश  के लिये जब मैंने मन्नू जी के बारे में नामवर जी का साक्षात्कार लिया था तो उन्होंने मेरे सामने कहा था – ‘‘ दिल्ली में मैं जितने साल रहा हूं । पचास प्रतिशत खाना तो मैंने इस हौज खास वाले घर में खाया है । ’’ मन्नू जी के सिर पर सारी जिम्मेदारियां । कॉलेज में पढ़ाना । ट्यूशन करना । घर आकर मित्र मंडली की बखुशी  आवभगत करना । राजेंद्र जी पर न कोई जिम्मेदारी , न उसका अहसास । न आर्थिक सहयोग , न काम काज में कोई सहयोग । फिर भी हर बार जहां दांव लगा , वहां मन्नू जी को कठघरे में खड़ा करने में कोई कोताही नहीं बरती उन्होंने । यह सिलसिला अब तक चलता ही जा रहा है । 2008 में जब कथादेष के लिये मन्नू जी वाले अंक की योजना आकार ले रही थी , मैंने राजेंद्र जी से कहा – अच्छा लगता है यह देखकर कि आप दोनों का आपस में एक स्वस्थ संवाद भी है , मन्नू जी पर सिर्फ दो पेज लिखकर दें , मुझे इस अंक में कोई विवाद खड़ा नहीं करना ! पर नहीं , अपनी फितरत से कहां बाज आने वाले थे वह ! दो पन्नों की जगह छह पन्नों का साक्षा त्कार दिया उन्होंने अर्चना वर्मा को और उसमें फिर बेसिर पैर की बातें -‘‘ ठाकुर साहब ने घेर -घार हमारी शादी करवा दी !’’ मन्नू जी ने पढ़ा तो फिर आहत हुईं -‘‘ शादी के समय तीस साल की उम्र थी राजेंद्र की ! बाल विवाह हो रहा था हमारा कि कोई घेर घार कर शादी करवा दे ?’’ और शारीरिक विकलांगता और भावात्मक आघात को एक ही तराजू पर तोलना और सबसे बढ़कर अपनी आज़ादी के राग अलापना –  ‘‘ परिवार तो ऐसी चीज़ है जो कल्पना के पंखों को क्लिप करती है ! वैयक्तिकता समाज के दबावों को , परिवार को नकार कर पाई जाती है । परिवार में रहते हुए कोई क्रांतिकारी काम नहीं कर पाता !’’ एक बार मन्नू जी पर बनी साहित्य अकादमी की फिल्म में उनके मुंह से एक बुदबुदाहट -‘‘ आय हैव नॉट  बीन फेअर टू हर ! ’’ सुनकर बहुत अच्छा लगा था पर अपने साक्षात्कारों में हमेशा  उस कन्फेशन पर घड़ों पानी उड़ेलते रहे और अब तक अनफेअर ही बने चल रहे हैं।
राजेंद्र जी को साक्षात्कार देने का आब्सेशन है । एक ही बात को घुमाफिराकर अपनी लच्छेदार भाषा में कहते चले जाते हैं । अगर कोई उनके साक्षात्कारों और जीवन को लेकर तौले तो विरोधाभाषों  का एक पोथा तैयार हो जाएगा । वे कहते हैं – ‘ शादी  एक पिंजरा है , उसमें आपको मूवमेंट की उतनी ही सुविधा है जितनी पिंजरा देता है ! ’’ पर इस पिंजरे में वे बने रहना चाहते थे । मन्नू जी पिंजरे का दरवाज़ा खोल कर बाहर का रास्ता न दिखा देतीं तो वे आज भी इसी पिंजरे में बने रहते । दरवाज़ा खोल दिया गया तो ‘‘पिंजरे का पंछी’’ अराजक होकर अपनी आज़ादी का परचम फहराकर, आज़ादी के गीत गाने लगा ।
इसी साल 2011 में एक रेडियो चैनल से आई एक लड़की ने अलगाव का कारण पूछ लिया तो यहां एक अलग उत्तर  हाजिर था -‘‘ मैं पढ़ने लिखने वाला आदमी हूं , मन्नू को हमेशा  यही लगता था कि मैं उसे समय ही नहीं देता। उसकी यह शिकायत हमेशा  रही । उसके परिवार में बड़े आदर्श  पति रहे हैं । तो एक आदर्श  पति का रोल तो मैं निभा नहीं सकता था । ’’ संयोग कि लड़की वहां से साक्षात्कार लेकर सीधे मन्नू जी के यहां चली आई । मन्नू जी ने कहा – ‘‘ मैं समय मांगती थी , इस लिये वे अलग हुए ? समय तो खुद मेरे पास नहीं था । कॉलेज की नौकरी , घर का खर्च किसी तरह चला पाने के लिये कॉलेज  के बाद ट्यूशन , साल के 361 दिन काम । फिर अपना लिखना । हमारे कॉमन  मित्र । उनका आना । हमारा उनके यहां जाना । मेरे पास ही समय कहां था जो मैं इनसे समय की मांग करती ? उनके जाने के बाद मन्नू जी ने राजेंद्र जी से पूछा – ‘‘ अलग होने का सही कारण क्यों नहीं बताते । आपमें अगर करने की हिम्मत है तो कहने की हिम्मत क्यों नहीं है । हर साक्षात्कार में एक अलग कारण गढ़ लेते हो और उसका ठीकरा मेरे सिर पर फोड़ते हो ! ’’ अगला जवाब हाजिर था – ‘‘ अरे , तो मैं क्या माथे पर चिपका कर घूमूं कि मैंने यह यह किया । अब यह सब हर किसी को बताने की बातें थोड़े ही हैं । ’’ ……अब आप उनके सच बोलने और दूसरों को नंगा करने के बजाय खुद नंगे होने के गर्वीले वक्तव्य पर सिर टकराते रहें कि वह सीख आखिर किनके लिये दी गई है ? किन्हें बेवकूफ और दंभी कहा गया था ?
राजेन्द्र यादव को बहुतों से जवाबदेह होना है – अपनी पत्नी , प्रेमिका और मित्रों से , साथी लेखकों और पाठको से । अपने भीतर झांक कर देखें तो शायद अपने आप से भी ।

पर वह बात कौन सी थी ? क्या आप राजेंद्र – मन्नू जी के अलगाव की मूल वजह के बारे में कुछ बता सकती हैं क्योंकि मन्नू जी के अलावा जिन तीन चार लोगों को उसके बारे में पता है , उनमें से एक आप भी हैं जो मन्नू जी के बेहद करीब हैं ?
सच तो यह है कि अलग रहना दोनों का आपसी सहमति से लिया हुआ निर्णय नहीं था जैसा कि राजेंद्र जी कहते रहे हैं – ‘‘ मैं कई बार छह महीने बाहर रहा ताकि रोज रोज का क्लेश मिटे , मुझे विवाह और आजादी में से एक को चुनना था , विवाह के आचरण की आचार संहिता में मेरा दम घुटता था । हमने अलग रहने के प्रयोग किए । ’’ जैसे राजेंद्र जी अपनी आजादी के लिए खुद अलग हुए हों । दरअसल यह मन्नू जी का एकल निर्णय था जिसे राजेंद्र जी को स्वीकृति देने पर मजबूर होना पड़ा ।
एक औरत की ज़िन्दगी में – चाहे वह कितनी भी पढ़ी लिखी , आत्मनिर्भर और नामचीन क्यों न हो – हादसों और आघातों को पीछे ठेलकर जब तक वह अपने वैवाहिक संबंध को चला सकती है , चलाती है । 1994 में उज्जैन से जब मन्नू जी दिल्ली लौटीं तो स्टेशन पर चहकते हुए राजेंद्र जी और आत्मीयता और अपनत्व से भरा घर । मन्नू जी को लगा कि अब उम्र का भी तकाज़ा है और आखिर घर से जुड़ाव भी होता ही है । उन्हें भीतर एक आशा  बंध रही थी कि अब सब ठीक हो जाएगा , हंस की आर्थिक स्थिरता के कारण भी राजेंद्र जी में बदलाव आएगा । लेकिन कुछ ही दिनों में राजेंद्र जी के छलात्कार का शिकार बनी एक और ‘‘मीता’’ मन्नू जी की ही गोद में सिर रखकर अपना दुखड़ा रो रही थी । उनसे तीस साल छोटी वह मीता अपने परिवार और दोनों बच्चों को छोड़कर राजेंद्र जी के साथ आने का निर्णय ले चुकी थी और उनके ढुलमुल रवैये को देखकर परेशान थी । मन्नू जी बुरी तरह टूटीं और निर्णय लिया  -‘‘ बस , बहुत हुआ , सो फार एंड नो फर्दर !’’ ये उन्हीं के शब्द हैं ।  यह कांड न हुआ होता तो मन्नू जी तो सबकुछ भूल कर नये सिरे से ज़िंदगी शुरु करने के लिये साथ रहने को तैयार थीं ही । कोई भी औरत अपना घर-परिवार तोड़ना नहीं चाहती जब तक सिर के ऊपर से पानी न गुज़र जाये । अब चूंकि हंस की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो चुकी थी । मन्नू जी ने अपना फैसला सुना दिया और उस पर डटी रहीं । वे यह जानती हैं कि आज वे अगर ज़िन्दा हैं तो अपने इस निर्णय पर टिके रहने की वजह से ही , वर्ना रोज़ रोज़ का यह तनाव और राजेंद्र जी के बेरोकटोक कारनामे , उनके लिये अंततः जानलेवा और घातक ही साबित होते ।

मन्नू जी के लिये कुछ लोग कहते हैं कि मन्नू जी को राजेंद्र जी से जो फायदा उठाना था , उठा लिया और बाद में उन्हें घर से बेदखल कर दिया ?
पति पत्नी के रिश्तों  में भी जोड़-घटाव , फायदा-नुकसान , हानि-लाभ  —  पुरुषवादी सोच इससे आगे जा ही नहीं सकती । भावनात्मक तकलीफ को समझ पाना उनके बूते का है ही नहीं । जो ऐसा कहते हैं , उन्होंने मन्नू जी की किताब ‘‘ एक कहानी यह भी ’’ में बिट्वीन द लाइंस पढ़ने-समझने की कोशिश ही नहीं की । समावर्तन के अक्टूबर 2008 के अंक में मैंने मन्नू जी पर नौ पन्नों का संस्मरण लिखा है , उसमें विस्तार से इस पर चर्चा की है ।
मन्नू जी अपनी शादी से पहले ही एक प्रतिष्ठित लेखिका थीं । अपने लेखन के लिये राजेंद्र जी के नाम का सहारा नहीं लिया उन्होंने । हां , राजेंद्र जी से प्रोत्साहन ज़रूर मिलता रहा, जिसके कारण ज़िंदगी के तनावों को अनदेखा करती रहीं और ज़िंदगी चलती रही । प्रेम विवाह था , घर से विद्रोह किया था इसलिये विवाह को निभाना एक बड़ी जिम्मेदारी भी थी । विवाह को न चला पाना एक बहुत बड़ी हार होती । अपनी तथाकथित आत्मकथा में न चाहते हुए भी वे काफी कुछ संकेतों में कह ही गई हैं । जब उनकी इस किताब का फाइनल प्रूफ आया था , मैंने उनसे बहुत बार कहा कि आप अलग होने की इस वजह को थोड़ा सा खोलकर लिखिये । उनको तरह तरह से समझाया । मिन्नते कीं । पर वे भी कम ज़िद्दी नहीं । कहने लगीं – चौदह  साल से इस किताब को मर-मर कर तो लिखा है , अब मैं एक शब्द नहीं जोड़ूंगी । दरअसल वे इसे निजी त्रासदी ही समझती रहीं , इसका एक बड़ा समाजशास्त्रीय कोण समझ ही नहीं पाईं कि यह सिर्फ उनकी  निजी समस्या नहीं हैं । हजारों महिलायें ऐसे अनुभवों से गुज़रती हैं और इसे खोलकर लिखना , उसका एक तार्किक विश्लेषण  करना , पाठिकाओं को एक सकारात्मक सीख देगा । अब वे कहती हैं कि मैंने लिख दिया होता तो इस तरह हर रोज़ राजेंद्र एक नया ठीकरा मेरे सिर पर न फोड़ते ।
जब साथ थे , तब भी हमेशा  यह आरोप लगाते थे कि लेखिका होकर भी तुम लेखक की जरूरत नहीं समझती । तुम घरेलू औरतों की तरह बिहेव करती हो । मन्नू जी कहती हैं -‘‘ पिता से झगड़ कर , घर से विद्रोह कर मैंने शा दी की । बिछिए पहनना , मांग भरना , करवाचैथ का व्रत करना – किसी तरह का घरेलू औरत का स्वांग नहीं किया , सिर्फ एकनिष्ठता की मांग की और वह भी एक ‘मीता’ को स्वीकार करते हुए। ’’ पर मीताओं का बहुवचन कोई पत्नी स्वीकार नहीं कर पाती ।
उनके भीतर के लेखक ने हमेशा  उनके भीतर की स्त्री को ढांपे रखा , सिर उठाने नहीं  दिया वर्ना इतनी छूट कहां कोई स्त्री दे पाती । कोई आधुनिक , स्वतंत्रचेता , देह मुक्त स्त्री ( जैसी स्त्री गढ़ना राजेंद्र जी के स्त्री विमर्श  का स्वप्न है ) इतनी ‘स्पेस’ अपने साथी पुरुष को दे पाती ? उसकी रासलीलाएं , उसके झूठ , उसकी संवादहीनता , उसकी असंवेदनशीलता – पैंतीस साल के लंबे अरसे तक बर्दाश्त कर पाती ? यह उस परंपरावादी खांटी घरेलू लेखिका के ही बूते का था कि अपने पति के लेखन को सबसे ऊंचा  दर्जा देती रही और सारी छूट भी लेखिका ने ही दी – यह मानते और स्वीकार करते हुए कि लेखिका को लिखने के लिए चाहे पहाड़ों के रिसार्टों पर जाने और प्रेमी पुरुष की जरूरत महसूस न हो पर उंगलियों में अदा से सिगार पकड़ने वाले लेखक की दैहिक और भावनात्मक जरूरतें एक आम सामान्य पुरुष  से अलग और ज्यादा है और विशिष्ट  पुरुष  को जीवनसाथी बनाने का चुनाव भी तो उनका अपना ही था , फिर शिकायत कैसी और किससे ? फिर तो यह चुनौती सी जान पड़ी कि इस विशिष्ट  प्राणी को सहेज कर , संभालकर रखना है । जैसा भी है , जितना भी अपने हिस्से यह विशिष्ट  पुरुष आ पड़ा है , उसे पोशक खूराक हर तरह से उपलब्ध करवाकर खुश  रखना है । पर उनकी सारी मजदूरी , मशक्कत बेकार गई । जिनके लिये घर परिवार प्राथमिकता में नहीं आता , उन्हें ताउम्र इसकी अहमियत समझ नहीं आ सकती ।

अलगाव के बाद भी राजेंद्र जी और मन्नू जी कई जगह एक साथ दिखते हैं ! दोनों में अब कैसी केमिस्ट्री है ?


जब जब किसी साक्षात्कार में राजेंद्र जी कुछ आपत्ति जनक बोल जाते हैं , मन्नू जी चुप हो जाती हैं , उनसे बात करना बंद कर देती हैं। एक सप्ताह से ज़्यादा यह अबोला चल नहीं पाता । आखिर राजेंद्र जी फोन करेंगे -‘‘ क्या अभी तक मुंह फुलाकर नाराज़ बैठी हो ! ’’ और संवाद का सिलसिला फिर शुरु हो जाता है। लंबे समय तक साथ रहते हुए मन्नू जी ने संवादहीनता का इतना लंबा दौर झेला है कि उन्हें फोन पर इतना भी बात कर लेना सुकून देता है । और माफ कर देना तो मन्नू जी के जैनी संस्कारों में है । नहीं जानती , लेकिन राजेंद्र जी के भीतर मन्नू जी को लेकर कहीं एक गहरा अपराधबोध तो है ( होना भी चाहिये ) जिसकी वजह से साक्षा त्कारों में तमाम उल्टे सीधे बयान देने के बाद भी राजेंद्र जी रिश्ता  टूटने नहीं देते क्योंकि अपनी फितरत से वे भी वाकिफ हैं। उनका अपना सामंती रवैया चाहते हुए भी छूटे नहीं छूटता । राजेंद्र जी का आगे बढ़कर मन्नू जी से संपर्क बनाये रखना , फोन करना मुझे अच्छा लगता है क्योंकि मन्नू जी जिस तरह बिना भूले उसका ज़िक्र करती हैं , उन्हें भी अच्छा लगता होगा ।

मैला ढोने वाली महिलाओं के लिए प्रधानमंत्री को ख़त

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी,
मैं आपका नारा..‘सबका साथ सबका विकास’ की तरफ आपका ध्यान ले जाना चाहूंगी कि इस नारे में क्या वे  महिलाएं भी शामिल हैं जो अपने माथे पर ‘मानव-मल’ उठाने के लिए विवश हैं ? जबकि भारत में केवल रिकार्ड के लिए और कानूनन नियमानुसार मानव-मल उठाना निषेध है । दलित महिलाएं इस घृणित कार्य को करने के लिए इसलिए भी मजबूर हैं क्योंकि उनके पास रोजी-रोटी का और कोई चारा नहीं है..जी हां यहां मैं बताना चाहूंगी कि वे दलित महिलाएं जो कई  सदी से इस काम में लगी हुई हैं जब वे इसे छोड़कर दूसरे काम के लिए जाती हैं तो उन्हें अस्पृश्य कहकर काम नहीं दिया जाता है ।

उत्तराखण्ड जिसे देवभूमि कहा जाता है वहां के एक छोटे शहर हरिद्वार के जबरदस्तपुर गांव में 45 साल की राज दुलारी हैं, जो प्रति दिन 20 घरों से मानव-मल को साफ करने का काम करती हैं। कैसा देश है यह यहां एक व्यक्ति अपना मल भी साफ नहीं कर सकता ? उसके अपने मल को उठाने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की जरूरत पड़ती है ? भारत को कैसे विकसित और महान कहा जा सकता है जिसके  ‘हरि के द्वार’ में इस तरह का घृणित काम करने के लिए महिलाएं धकेल दी जाती हों ?

भारत जैसे खूबसूरत देश में, जिसे आप एक विकसित देश और डिजिटल इंडिया बनाने के लिए दिन-रात सबके साथ की बात कर रहे हैं , उनमें ये मैला ढोने वाली महिलाएं कहां आती हैं ? मुझे पता है भारत के विकास में आपको इन महिलाओं की शायद कोई आवश्यकता न हो किन्तु मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूं कि इन्हें छोड़कर आप वास्तविक और विकसित भारत कभी बना नहीं पायेंगे । आज हमें विकसित और अतुलनीय भारत से कहीं ज्यादा वास्तविक भारत बनाने की जरूरत है ।

भारत में बेसलाइन सर्वे के अनुसार 11 करोड़ 10 लाख 24 हजार 917 घरों में शौचालय नहीं हैं इसलिए ‘खुले में शौच नहीं करना चाहिए’ ये पहल भी आपने ही शुरू की । तुरन्त घरों में शौचालय बनाने के लिए लोगों को जागरूक किया । महोदय आपने ‘स्वच्छता अभियान’ चलाया, जिसके लिए केन्द्र सरकार द्वारा 19,314 करोड़ रूपये खर्च किए गये, आपकी इस पहल के लिए लोग कायल भी हुए, तो  फिर आपकी आंखों से ये दलित महिलाएं और उनके माथे पर मानव-मल की टोकरी कैसे अनदेखी रह गयी ? इस घृणित पेशे में लगी इन महिलाओं की महज दिन-भर की कमाई केवल 10रूपये है । आप सोच सकते हैं कि एक व्यक्ति इस महगांई के समय में मात्र 10 रूपये में घर कैसे चला सकता है? जहां इतने करोड़ रूपये स्वच्छ भारत मिशन के लिए लगाए जा रहे हैं उसमें कुछ पैसे क्या इन महिलाओं को रोजगार के लिए दिए जा सकते हैं ?

एक स्त्री जिसे भारत में आदर्श देवी लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती कहकर सम्मान दिया जाता है, नवमी में जिनके पांव धोकर पिया जाता है,,,“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ जैसे सूक्तियों से भारत को नवाजा जाता है. फिर ये कौन सा भारत है और वे कौन सी महिलाएं है जिनके माथे पर मानव-मल की टोकरी है?  विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आपको ऐसे घृणित कामों को नज़रअन्दाज नहीं करना चाहिए । हजार पहल हमारी तरफ से और एक पहल आपकी तरफ से जरूर होनी चाहिए कि हमारे देश की दलित महिलाएं जिन्होंने विवश होकर अपने माथे पर सदियों से ये मानव-मल की टोकरी उठा रखी है उसे कहीं दफन  करें ताकि भारत जैसे देश में कहीं यह सुनने को न मिले कि जो देश संयुक्त राष्ट्र संघ में विकास का एक मापदण्ड तैयार कर रहा है उसमें वे महिलाएं भी हैं जिनके माथे पर मानव-मल की टोकरी है ।

इस पत्र के माध्यम से मैं मैला-प्रथा उन्मूलन के लिए आपकी तरफ से विशेष पहल चाहती हूं ।
कृपया  शीघ्र से शीघ्र इसे भारत के कोने-कोने से समाप्त करें ।
धन्यवाद !

प्रार्थी
प्रियंका सोनकर

प्रियंका दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में तदर्थ शिक्षिका हैं. संपर्क: priyankasonkar@yahoo.co.in