राजकमल प्रकाशन 'वह सफ़र था कि मुकाम था' को निरस्त करे (!)

स्त्रीकाल डेस्क 

हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष और साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी किताब ‘ वो सफ़र था कि मुकाम था’ में झूठ की बुनियाद पर वरिष्ठ लेखिका मन्नू भंडारी के बारे में अपमानजनक स्थापनायें दी है. उनके झूठ को तथ्यपरक ढंग से स्त्रीकाल ने स्पष्ट किया है. इस विषय पर हमने राजेंद्र यादव और मन्नू-भंडारी को जानने वाली लेखिकाओं से भी लिखने का आग्रह किया है. सोशल मीडिया में भी मैत्रेयी के झूठ के खिलाफ लोग आवाज उठा रहे हैं. सोशल मीडिया में आई टिप्पणियाँ कुछ इस प्रकार हैं: 

स्त्रीकाल व्हाट्स ऐप ग्रुप  में दिलचस्प बहस हुई: 

धर्मवीर: काश ! मैत्रेयी जी आत्मकथा न लिखकर उपन्यास लिख रही होती तो साहित्यिक गल्प का कुछ अवकाश रहता। हो सकता था कि वे हज़ारीप्रसाद द्विवेदी उर्फ़ व्योमकेश शास्त्री वाली परम्परा में कुछ नया जोड़ पाती।और राजेंद्र जी का तो व्यक्तित्व भी इतना सर्वाजनिक है कि वे ना तो "बाणभट्ट की आत्मकथा"के बाण हो सकते हैं ना मन्नू जी निउनिया या मिस कैथराइन ।
पूजा पाठक: पर जरूरी थोड़ी है कि हम हर लेखक को हर अच्छे लेखक के साथ जोड़ कर विशेषता तलाशते रहें मैत्रेयी की अपनी स्वतंत्र लेखन की शैली है मेरे ख्याल से उन्होंने अपनी आत्मकथा और राजेन्द्र यादव पर लिखे संस्मरण को बहुत ही अच्छे ढंग से लिखा है. और बाण ऒर निउनिया कैथराईन हजारी प्रसाद द्विवेदी के काल्पनिक आदर्श पात्र है उन्होंने अपने तरीके से उसे प्रस्तुत किया जो कि उनके संस्कार और  मानसिक स्थिति थी।



केजरीवाल सर,  हिन्दी अकादमी में आपकी उपाध्यक्ष साहित्यिक झूठ खड़ा कर रही हैं? 

संजीव चंदन: कहाँ ठीक लिखा पूजा जी, इसमें तो बहुत सारी फैक्चुअल गलतियां हैं
पूजा: रचनाकार  इतिहास नहीं लिख रहा होता कि सही तथ्य प्रस्तुत करना उसकी बाध्यता होगी
अरुण कुमार: फिर तो आत्मकथाओं के नाम पर कोई भी झूठ फैलाया जा सकता है
पूजा: आत्मकथा में क्या झूठ लिखा है? हां हम उसी से तो उन्हें जान पाते हैं.  हो सकता है आप उन्हें और नजदीक से जानते हो पर प्रत्येक पाठक के लिए तो रचना(आत्मकथा ही) जानने का जरिया है मैंने उन्हें जितना जाना या पढ़ पा रही उसमें मुझे झूठ नहीं दिखा उनका साक्षात्कार भी पढ़ा है.अगर कुछ झूठ है तो अनुरोध है आपसे उसे तथ्य के साथ सामने लाए ताकि हम पाठक जान सके
अरुण: अभी संजीव जी ने स्त्रीकाल पर शेयर किया है, आप उसे एक बार पढे
पूजा: जी जरूर पढ़ूंगी ऒर मुझे सही लगा तो अपने शोध में उसे स्थान भी दूंगी किसी लेखक की आलोचना करना प्रत्येक पाठक का व्यक्तिगत मामला है कि वह उसे किस प्रकार लेता है। मैंने मैत्रेयी के साक्षात्कार देखे भी है अक्सर दूरदर्शन पर प्रसारित होते हैं.
फारूक शाह: संस्मरण में ललित गद्य की छूट होती है, जो कि लेखक के मनोवैज्ञानिक पक्ष से निर्मित होता है . ललित गद्य से मतलब रचनात्मक काव्यात्मक गद्य से है. संस्मरण साहित्य अंतरंगता से एकदम जुड़ा हुआ है. तो प्रस्तुति में फैक्ट की जगह लेखकीय प्रक्षेपण होंगे तो तुरत पाठक के ध्यान में आ jaayegaa
धर्मवीर:  जयशंकर प्रसाद की कविताओं के सन्दर्भ में द्विवेदी जी ने एक अद्भुत बात कही है:"सौंदर्य -पार्थिव सौंदर्य-के प्रति प्रसाद का आकर्षण बहुत अधिक है परंतु शुरू में वे उसे व्यक्त नहीं कर पाते थे।उनके मन में इस बात से कुछ चिंता भी हुई। परंतु बाद में वे इस प्रकार सोचते जान पड़ते हैं कि आवरण और अवगुंठन बुरा क्या है। .....इसी रास्ते सोचता हुआ कवि अवगुंठन के तत्ववाद तक पहुंचता है।....प्रसाद जी के काव्यों में और उनके नाटकों में यही चिंतन प्रणाली स्पष्ट हुई है।"....द्विवेदी जी भी "अवगुंठन के तत्ववाद के कायल"थे।बाणभट्ट की आत्मकथा में व्योमकेश शास्त्री ने स्वीकार किया है कि उसमे प्रेम की व्यंजना "गूढ़ और अदृप्त"भाव से प्रकट हुई है। आत्मकथा की लेखिका मिस कैथराइन की आत्म-स्वीकृति अनुसार -"जब की यह कथा है,वे दिन लज्जा और संकोच में ही निकल गए।कथा लिखने का साहस उन्हें तब हुआ जब वे 68 वर्ष की हो गई।"....भट्टिनी की दृष्टि से देखे हुए अपने प्रिय बाणभट्ट की छवि।...वैष्णव भक्ति के तत्ववाद के अवगुंठन में लिपटी निज प्रेम कहानी।...लकिन द्विवेदी जी से यह सब संभव इसलिए हो पाया कि वे स्वयं को कर्ता मानने के बोझ से मुक्त हैं। उनका प्रिय श्लोक है-"यत्रैवं सति कर्तार मात्मान मन्यते तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वन्न स पश्यति दुर्मति:।।"द्विवेदी जी स्वयं की मति को बचा ले जाते हैं;अपना कृतित्व व्योमकेश शास्त्री को सौप कर क्योँकि उनमें कर्ता होने का भाव प्रबल नहीं है।.....जबकि मैत्रयी जी के यहाँ कर्ता होने का दर्प है। इसलिए उन्हें आत्मकथा के भीतर गल्प की जरूरत पड़ी।(जैसा कि इस रपट में राजेन्द्र जी से जुड़े लोगों ने कहा है) (नामवर जी की किताब -दूसरी परम्परा की खोज में पृ 111से 121 तक से द्विवेदी जी के बारे में समझा गया है)
संजीव: पूजा जी आप उनकी राजेंद्र जी और मन्नू वाली आत्मकथा का अंश पढ़े वे मन्नू भंडारी के बारे में क्या लिख रही हैं पढ़े और इस रपट में पकड़े गये झूठ पढ़ें. धर्मवीर सही कह रहे हैं कि आत्मकथा की जगह गल्प लिख लेतीं. मैंने केवल शैली के सन्दर्भ में बात नहीं कही थी।
पूजा: आत्मकथा तो नहीं संस्मरण लिखा है, जो अभी उनकी नयी किताब प्रकाशित हुई है "वह सफर था कि मुकाम था " और जहां तक मुझे पता है उनकी आत्मकथा में मन्नू जी पर इतने विस्तार से चर्चा नहीं है.
संजीव:  हां जी, संस्मरण में  झूठ की छूट होती है क्या, संस्मरण में आप खुद उपस्थित होते हैं.
दोनों को न मिलाए यहाँ प्रश्न रोचकता का है आत्मकथा के साथ इमानदारी की बाध्यता है पर मेरे ख्याल से ऒर कोई विधा के साथ नहीं
धर्मवीर:  जिसे टी एस इलियट ने निर्वैयक्तिक होना कहा है (जो कि हर सृजक के लिए जरूरी है)उसी सन्दर्भ में यहाँ कर्ता भाव से मुक्ति की बात मैंने कही है।
पूजा : बतों को पेचीदा क्यों किया जा रहा सीधी ऒर सरल बात है
अरुण: संस्मरण में तथ्यों के साथ छेड़छाड़ ?

मैत्रेयी इतनी इर्ष्यालू थी कि वह नजर रखती थी कि राजेंद्र जी के पास कौन आ रहा है (?)

फेसबुक पर आई टिप्पणियाँ:

गिरिराज किशोर: मैं बहुत आहत हूँ...मरने के बाद जो लिखा जा रहा है वह ठीक नहीं।
गीताश्री: वो लेखिका इसी ताक में थी कि कब मौक़ा मिले और भडांस निकाले. हमने सारा कृत्य देखा हुआ है. किस मुँह से झूठ पर झूठ स्थापित करती जा रही और कई उस दौर के गवाह लोग चुप्पी साधे बैठे. हिंदी अकादमी के आयोजन और उससे मिलने वाले दस हज़ार रुपये का इतना लोभ ! घृणित चुप्पी !
गोपाल कमल : इन्हें अकथ्य अभक्ष्य कुछ से परहेज़ नहीं। दुःख।
अक्षय शर्मा: तो क्या हुआ। आत्मकथा भी एक साहित्यिक विधा है कोई सुप्रीम कोर्ट में दिया गया इकबालिया बयान नहीं जिसे सिर्फ वकील ड्राफ्ट करते हैं और कोई पढ़ता नहीं है।जज भी नहीं। आत्मकथा भी पठनीय होनी चाहिए।
रचना त्यागी : सच हमेशा शब्दों के पीछे होता है ...
रचना यादव: वेद दान सुधीर एम्स में राजेन्द्र जी के साथ दिन-रात रहे. वे भी आपको बहुत कुछ बता सकते हैं.
रुपा सिंह:  केजरीवाल जी की नींद और कपिल मिश्रा जी के सपने से हमें क्या लेना देना ! लेकिन इस झूठे पापी लेखन से हम सबका गहरा वास्ता है !शर्मनाक है यह ! सस्ती सनसनी के लिए यह लेखन होता तो फिर भी क्षम्य होता ! लेकिन मन्नू जी का ऐसा अपमान , जिसे करते राजेंद्र यादव जी को संकोच हुआ ( तद्भव के प्रस्तुत अंश )-उनके लिए ऐसी झूठी , चालबाज़ बातें ? असहनीय है ! वह सच सामने आना चाहिए, जिसका अनुमान सबको है !
लहक हिन्दी: राजकमल प्रकाशन जल्द से जल्द वह सफ़र था कि मुकाम को निरस्त करे. कभी -कभी मुनाफा से अधिक जरूरी व्यक्ति के महत्व को भी देखना चाहिये. इसमें देरीठीक नहीं है.
पुष्पा तिवारी: अगर लेखक जो बड़े भी हैं महान भी हैं इतिहास तो छोड़िए भूगोल में भी दर्ज हो जाएंगें । वे सब एक सच सामने लाने में एकजुट नहीं होंगे तो
रश्मि भारद्वाज: राजेंद्र जी को मन्नू जी की आंतरिक यातना का अंदाज़ा था जिसे मैत्रेयी जी ने प्लेटोनिक प्रेम का कवर चढ़ा पूरी तरह ही खारिज़ कर दिया । मन्नू जी का प्रेम खलनायिका का प्रेम हो गया और मीता का महान ! जबकि जिससे खुले में मिलने का साहस भी न, जो साथ भी न निभाए वह प्रेम कैसा ! मैत्रेयी जी मेरी प्रिय लेखिका रहीं हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह मन्नू जी पर लिखा, हैरान हूँ पढ़कर ...
कविता: राजेन्द्र जी ने कई बार खुले शब्दों में यह कहा कि वे मन्नू जी के अपराधी हैं, पर उस वक्त उनके लिये यह समझ पाना मुश्किल था .... एक बार तो किसी पत्रकारिता विश्वविधालय में भी जहां अभय कुमार दूबे उन्हें लेकर गये थे ...और वे अपने साथ मुझे और राकेश को लेते गये थे
रश्मि भारद्वाज: और इतनी छोटी सी बात और समझने जाओ तो कितनी गहरी, मैत्रेयी जी को ना दिखी ! वह तो वैवाहिक प्रेम को प्रेम मानती ही नहीं, इतने रूमानी और यथार्थ से दूर हैं उनकी सोच कि क्या दिशा मिलेगी इससे समाज को ! प्रेम उत्श्रृंखलता नहीं, प्रेम त्याग भी, अपने स्व का त्याग और वह मन्नू जी ने अंत तक निभाया।
संजीव चंदन: प्रेम तो प्रेम ही रहेगा न विवाह में या विवाह के बाहर. मैत्रेयी जी का वश चले तो विवाह के बाहर को उत्तम का अंतिम दर्जा दिला दें, लेकिन उसका क्या जिसने प्रेम किया , विवाह किया और फिर प्रेम करती रही, उसका भी क्या जो पितृसत्तात्मक वयवस्था में विवाहपूर्व प्रेम न कर पाई, लेकिन विवाह के बाद ही प्रेम कर लिया. संकट यह है कि मन्नू और राजेंद्र जी के विलगाव के बीच वे अपना और डाक्टर साहब का कंट्रास्ट पैदा कर रही हैं और वहीं राजेंद्र जी से प्रेम के मामले में भी मन्नू और मीता का !
 उर्मिला उर्मिल: कल्पना की कौड़ी लाकर उसे साहित्यिक कलेवर में लपेट देना एक बात है ,और खुद एक अच्छे , आदर्श व्यक्तित्व के रूप में जीवन जीना बिलकुल दूसरी बात है ।इसे कहते हैं कथनी और करनी का अंतर ।

वे पत्नी और प्रेमिका दोनो रहीं 

वीरू सोनकर: मैत्रेयी पुष्पा जी के लिए मैंने बड़े ही आदर पूर्वक आज से डेढ़ दो वर्ष पूर्व ही यह बात कह दी थी कि वह एक राजनैतिक प्रतिभा से भरपूर महिला हैं जो गलत जगह पर आ गयी हैं वह साहित्य को राजनीति की तरह बरतती और समझती रही हैं जहाँ साहित्य, नैतिकता और आत्मलोचना से संचालित और प्रेरित होता है वही राजनीति में घात-प्रतिघात गिरोहबंदीक में माहिर होना अनिवार्य है. सामने का शीशा साफ करने से, दुसरो के चेहरे पर सप्रयास कालिख पोतने से खुद का चेहरा नही साफ होता. मैं नही समझता कि वह अब इस उम्र में इस बात को नही समझती होगी. राजेन्द्र यादव की विरासत की इकलौती दावेदार बनने के अतिरिक्त प्रयासों से मैत्रेयी जी का खुद का इतिहास अपनी आभा खो चुका है यह बात जान कर भी वह अपना कीचड़-फेकू अभियान खत्म नही करने वाली हैं
आज मैत्रेयी जी इस बात का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हो चुकी हैं कि 'महत्वकांक्षा' किस प्रकार से एक लेखक की नैतिकता/लेखकीय निष्पक्षता/लेखकीय उत्तदायित्व को कैसे खा जाती है .फिलहाल वह हिंदी अकादमी के हाथी पर सवार हैं और वह सिर्फ उन्ही लोगो की जय-जयकार सुनना चाहती हैं जो अकादमी के द्वारा पोषित/लाभान्वित हैं जो उनसे फायदा प्राप्त कर रहे हैं वह मैत्रेयी जी के पक्ष में मन्नू भंडारी के विरुद्ध तर्क/साक्ष्य प्रस्तुत करते रहेंगे, यह उनका काम/व्यापार है पर इतिहास काम/व्यापार और जिंदाबाद के नारों से नही बनता. यथार्थ का अपना ही एक मानक होता है अपनी ही एक खास न्याय प्रणाली होती है. अपना ही एक दस्तावेज होता है जहाँ मैत्रेयी जी अपने सभी प्रयासों के बाद भी ठीक उसी तरह दर्ज होगी, जिस तरह यथार्थ उन्हें पहचान पा रहा है
अंत मे, व्यक्ति माफ करते हैं पर इतिहास माफ नही करता, वह दर्ज करता है खुद को स्थापित करने और मनवाने के सभी प्रयासों को बड़ी ही निष्ठुरता से कुचलते हुए, वह हमारा असली चेहरा सामने लाता है जिसे पीढ़ी ठीक उसी तरह पहचानती है
 वंदना राग: बहुत साफ़ साफ़ लिखा वीरू. और यही साफगोई और स्पष्टता सभी लेखकों में होनी चाहिए. यूँही किसी भी लेखक का महिमामंडन जब उसके लिखे से इतर कारणों से होता है तो उसकी महिमा का स्खलन भी यूँ ही होता है.. स्वतः
वीरू सोनकर: जब तक लेखकों में 'पाने का लोभ' और 'खोने का भय' समाप्त नही होगा, चुप्पियां यूं ही हमारे समय के माथे पर उगती रहें
उषा यादव उषा: मैं कई लेखिकाओं की आत्मकथा पढ़ी हूँ प्रसिद्धी के लिए लोग कितना नीचे गिर जाते हैं आश्चर्य नहीं लेकिन बुरा बहुत लगता है..
मैत्रेयी पुष्पा: " चाक " उपन्यास पर जब हंगामे हुये तो राजेन्द्र यादव ने लेखकीय अनुशासन के तहत यह सिखाया था - अब मान लो कि तुम्हारा लिखा असरदार है । इतने लोग विचलित होरहे हैं । उन लोगों के जबाव में तुम कभी कुछ नहीं कहोगी जैसे अपने विरोधियों से मैं कुछ नहीं कहता ।
जितेन्द्र विसारिया: मैत्रैयी जी यह सब उपन्यास मैं चल जाता है, पर आत्मकथ्य या आत्मकथा में तथ्यों की अनदेखी नुकसानदेह साबित होती है। और लेखक की निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह छोड़ जाती है। हो सके तो इनसे बचिए, आप वरिष्ठ और समझदार हैं
संजीव चंदन: चाक मुझे भी पसंद था, आपकी सारी रचनायें पढ़ी हैं, लगभग- उनपर लिखा है , लेकिन आत्मकथा और संस्मरण में तथ्यों के हेर-फेर!


रवीन्द्र दास:  शायद प्रेम और राजनिती में सब जायज होता है.
ज्ञानेंद्र मिश्रा: राजनीति में जो काम केजरीवाल जी कर रहे हैं साहित्य के क्षेत्र में वहीं काम मैत्रेयी जी कर रही हैं । उनको प्रेम की उदात्तता का एहसास कम प्रपंचों और लांछन लगाने का अनुभव ज्यादा है ।
डॉ. शशि सुभाष मिश्रा : चरित्रहीन तथाकथित शब्द के जादुगरों का जब तक बहिष्कार नहीं होगा,आम पाठक ठगे जाते रहेंगे ! सुधी जानकारों की जिम्मेदारी बनती है,शब्दों के खिलाड़ियों को उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास करवाएं l मन्नू जी, राजेंद्र यादव और उनकी मीताओं का सच अब पाठकों से छुपा नहीं है l मन्नू जी के पासंग भर नहीं "वे" जो गुजर चुके और जो आज अपनी छबि "बचाये" रखने के चोंचलों में लिप्त हैं l
आशुतोष:  झूठ गढ़ने के लिए समय नहीं , 'हौसला' चाहिए ।
उमाशंकर सिंह परमार : आप इस अभियान को आगे बढाईये बढिया लग रहा है
सरोज अरोड़ा: कुछ ज्यादा ही एक्सपोजर हो रहा है मैडम मैत्रेयी का. दुनिया में कुछ औरतें ऐसी होती हैं, जो शोर्टकट से आगे बढना चाहती हैं. इसका यह मतलब नहीं है कि पुरुष पवित्र आत्माएं होते हैं. 
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