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100 दिन का जश्न मनाते सीएम योगी को महिला पुलिस अधिकारी ने दिया करारा संदेश

स्त्रीकाल डेस्क 


“जहां भी जाएगा, रौशनी लुटाएगा 
किसी चिराग का अपना मकां नहीं होता.
बहराइच ट्रांसफर हो गया है, यह नेपाल की सीमा है, चिंतित मत हों दोस्तों मैं खुश हूँ… मैं मानती हूँ कि यह मेरे अच्छे कामों का पुरस्कार है. आप सभी बहराइच आमंत्रित हैं.”

यह फेसबुकपोस्ट है उस महिला पुलिस अधिकारी (सीओ), श्रेष्ठा सिंह, का, जिसे योगी सरकार ने  बीजेपी नेताओं को चालान काटने के पुरस्कार स्वरुप बुलन्दशहर से बहराईच भेज दिया. वह आईएएस अधिकारी दुर्गा नागपाल जितनी खुशनसीब नहीं है , जिसे अखिलेश सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा था . दुर्गा नागपाल को मीडिया ने खूब कवरेज दी थी, लेकिन योगी-मोदी से अभिभूत मीडिया के लिए श्रेष्ठा दुर्गा नागपाल जैसी क्रांतिकारी नहीं हैं.

उत्तरप्रदेश में 244 अफसरों का ट्रांसफर किया गया है, जिनमें बुलंदशहर के स्याना की सीओ श्रेष्ठा सिंह भी शामिल हैं, जिन्होंने हाल ही में ट्रैफिक नियम तोड़ने के मसले पर स्थानीय बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की जमकर क्लास लगाई थी. इस घटना का विडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था.  अब श्रेष्ठा सिंह का ट्रांसफर किए जाने का मुद्दा भी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है. खुद श्रेष्ठा ने अपने फेसबुक पेज पर एक टिप्पणी  लिखी, जिसके पक्ष-विपक्ष में लोग बंट तो गये हैं, लेकिन एक छोर से दूसरे छोर पर ठाकुर का तबदाला कुछ तो सन्देश है, मसलन बीजेपी नेताओं को अधिकारी अबध्य मानें. इसके पहले भी थानों पर हमला करने वाले या एसएसपी के आवास पर हमला बोलने वाले बीजेपी कार्यकर्ताओं और सांसद पर कभी ठोस  कारवाई नहीं हुई, बल्कि पुलिस अधिकारियों का ही तबादला कर योगी एक सन्देश दे रहे हैं.

बीजेपी नेता से टकराव का पूरा मामला क्या था? 
23 जून का है, जब बीजेपी की जिला पंचायत सदस्य के पति प्रमोद लोधी बाइक से घर जा रहे थे. चेकिंग के दौरान बाइक के कागज नहीं दिखाने पर पुलिस ने उनका चलान काट दिया और बाइक जब्त कर ली. पुलिस के सामने कथित तौर पर धौंस दिखाने पर आरोपी नेता को अरेस्ट कर लिया गया. इसके बाद बीजेपी समर्थकों ने कोर्ट परिसर में पुलिस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और बीजेपी नेता प्रमोद लोधी को पुलिस हिरासत से छुड़ाकर स्याना विधायक देवेंद्र लोधी के चैंबर में लाकर बैठा दिया. काफी देर तक पुलिस और बीजेपी समर्थको में झड़प होती रही. बीजेपी समर्थकों ने कोर्ट परिसर में पुलिस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और सीओ श्रेष्ठा सिंह से भिड़ गए. उधर बीजेपी नेता प्रमोद लोधी का आरोप था कि चालान काटने के बाद पुलिसकर्मी ने बाइक की चाबी देने के नाम पर उनसे 500 रुपये की रिश्वत की मांग की थी.

बहस के दौरान श्रेष्ठा ने बीजेपी नेताओं से स्पष्ट कहा था कि वे सीएम योगी आदित्यनाथ से लिखवाकर ले आएं कि पुलिसवाले वाहन चेकिंग नहीं कर सकते, तो हम नहीं करेंगे।

सवाल है कि क्या सीएम योगी ने अपने समर्थकों को इस तबादले से कोई सन्देश दिया है? हालांकि  श्रेष्ठा ठाकुर के इरादे बता रहे हैं कि वे इस तबादले से अपनी कार्यशैली को प्रभावित नहीं होने देंगी.

स्त्री आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की कविताएं

अरुण नारायण

युवा आलोचक.बिहार विधानसभा में कार्यरत संपर्क :मोबाईल 8292253306

उत्तिमा केशरी हिंदी कविता में वर्षों से सक्रिय एक जरूरी कवयित्री हैं। लेकिन दिल्ली या राज्यों की राजधानी से दूर रहने के कारण हिंदी काव्य परिद्रश्य में उनको जो जगह मिलनी चाहिए, उनपर जो चर्चाएं होनी चाहिए, उससे वह वंचित रही हैं। अभी हाल ही में 115 कविताओं का उनका संकलन ‘उदास है गांव’ नाम से आया है, जिसे उद्भावना प्रकाशन गाजियाबाद ने साया किया है।

एक स्त्री का आत्मसंघर्ष इन कविताओं का मूल स्वर है। उनका यह संघर्ष घर, परिवार, समाज, धर्म, पुरुष सत्ता और परंपरा से हर जगह, हर मोर्चें पर है। इसीलिए इस संग्रह की कविताओं में जो स्त्रियां आई हैं उनमें पर्याप्त विविधता है। यहां कई तरह की स्त्रियों की चिंताएं हैं। उनके यहां ‘मीरगंज वाली चाची’ हैं, कई मिथकीय चरित्र हैं। रामायण की अहिल्या, सुमित्रा और उर्मिला हैं, मांएं हैं, मजदूरिनें हैं, साहित्यिक कृतियों में आए चरित्र भी हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए मेरे जेहन में यह सवाल कौंधता रहा कि आखिर इन सब को कोई कवयित्री क्यों याद करती है? इन सवालों का जवाब उत्तिमा जी की इन कविताओं में ही निहित है। अपनी एक कविता ‘कैकेयी और परंपरा’ में वे लिखती हैं, ‘राजा दशरथ की तरह/जब-जब करेंगी पुरुष सत्ता छल/स्त्री से/तब-तब ऐसी ही होगी, उनकी परिणति’;128द्ध।

पौराणिक और मिथकीय प्रसंगों का अस्मितावादी विमर्श अपने नजरिये से व्याख्या कर रहे हैं तो स्त्री भला पीछे क्यों रहे। उसके साथ तो कदम कदम पर अवमानाना की साजिशें की जाती रही हैं। हिंदी कविता का जो शुचितावादी और एकांगी विमर्श था, उसको ये कविताएं व्यापक फलक पर विस्तारित करती हैं। ‘एकाकी जीवन’ मां पर केंद्रित कविता है जो रामायण की मिथकीय स्त्रियों के एकाकीपन की परतों को उधेड़ती हुई मां के अकेलेपन को उससे जोड़ती है। ‘अहिल्या एक रासायनिक पदार्थ’ में कवयित्री पितृसत्ता को टारगेट करते कहती लिखती हैं, ‘तीर्थ को क्या गए/कि/इंद्र ने छल से कर लिया/तुम्हें वरण/तुमनेही तो कहा था अहिल्या/कि हे गौतम ऋषि /तुम तो किरण विज्ञान के ज्ञाता हो/तम के पार जाने की क्षमता है तुममें/क्योंकि तुम गौतम हो!/मैं तो एक रासायनिक पदार्थ हूं/तुम्हारे प्रयोगशाला के/इंद्र है सूरज मंडल के अंतस की किरण/और श्राप दिया, यही तो थी उनकी खोज/जब तक पूरी नहीं हुई खोज/मैं प्रयोगशाला में स्थापित रही।/आखिर कब करोगे प्राण प्रतिष्ठा/इस रासायनिक पदार्थ में?/उतर दो न/हे महामानव/गौतम ऋषि’ ’;144द्ध

‘गांधारी का शाप’ योगेश्वर कृष्ण पर एकाग्र कविता है। जो संग्रह की उल्लेखनीय कविताओं में है। गांधारी के शाप के बाद जरा के वाण से घायल कृष्ण की मनःस्थिति और राधा से उनके प्रेम-यह है इस कविता का प्रतिपाद्य। कविता की यह पंक्ति द्रष्टव्य है, जिसमें कृष्ण की प्रेम की उत्कटता को कवयित्री ने इनकी मार्मिक काव्य पंक्तियों में समेटा है, ‘अच्छा हुआ जरा पारधी/कि/ये तीर पैर में लगा/वरना/हदय में राधा थी/अनर्थ हो जाता’;186द्ध कवयित्री ने कुछ चर्चित चरित्रों पर भी अपनी कलम चलाई है। ‘हामिद का चिमटा’, ‘चित्रलेखा’, और लीडिया एविलोव’ आदि कविताओं में उनका यह रूप हम पाते हैं। जहां वे इन चरित्रों की संवेदना में गहरे डूबकर कविता को एक भिन्न आस्वाद में विस्तारित करती हैं। अपनी ‘चित्रलेखा’ कविता में वह लिखती हैं, ‘योग और साधना की सीढ़ियां/ चढ़ते-चढ़ते/तुमने भी पा लिया-/प्रेम की पूर्णता को…./ तुम बंधी रहो सदा, पति के आलिंगन पाश में/ठीक कुमारगिरी की तरह’;161-62द्ध यक्षिणी प्रश्न’ संग्रह की एक बहुत ही भाव प्रवण कविता है। यूं तो इस तरह के हिंदू मिथकीय चरित्रों पर उत्तिमा जी की कई कविताएं हैं, मसलन ‘अहिल्या एक रासायनिक पदार्थ’, ‘कैकेयी और परंपरा’, जो स्त्रीवादी नजरिए से लिखी गई है। इनमें पुरुष चरित्र को चुनौती के स्वर में संबोधित हैं ये कविताएं जो अपने काव्य कहन की भंगिमा में बहुत ही सटीक उतरे हैं। ‘यक्षिणी प्रश्न’ में कवयित्री शिव को भी नहीं बरजती। यक्षेश्वर को संबोधित कर कहती है, ‘तुम तो भोगते रहे उनके शाप/और, मेरे वियोग को/वे अल्कापुरी के स्वामी/करुणानिधान हैं/तुम्हें शाप देकर/स्वयं किया अभिशाप मुक्त/मगर, /मेरा यौवन तो चुका यशेश्वर!/ अब मैं जाना चाहती हूं/देवयोनि का त्यागकर/मानवों की नगरी में।’;181-82द्ध अपनी एक ‘मैना’ शीर्षक कविता में वह लिखती हैं, ‘जब उड़ती है फुर्र से/अपना गत्वाजोन दिखाकर/तब/मैं भी रचने लगती हूं/रस निष्पति के सारे अलंकार’ ;167द्ध

उत्तिमा केशरी ने समकालीन स्त्री की विडम्बना को भी अपनी कविताओं में बहुत शिद्द से उतारा है। ‘निवेदन कवि पत्नी का’ में में वह लिखती हैं-‘क्या तुम लौटते हो कभी/रात से आने से पहले/अपना घर/तुम्हें पता नहीं/कि/रात सबका अपना होता है/फिर भी/तुम लिख रहे हो,/समय के विरूद्ध कविता!/दोस्तों के लिए चिट्ठियां/और भर रहे हो कूचियों से /सूर्य में/सूर्योदय का सुनहरा रंग।’ ;77द्ध मां पर संग्रह में यूं तो कई कविताएं हैं। लेकिन उनमें ‘कई-कई छत’ कविता अव्वल है। इसमें वे लिखती हैं, ‘तुम थी तो एक छत था/अब/कई-कई छत बनते जा रहे हैं-मां’;61द्ध ‘मेरी बहन’ शीर्षक कविता पिता को संबोधित है। पारंपरिक रूढ़ियों से बंधे पिता से कवयित्री पूछती हैं, ‘आखिर क्यों बांध दिया आपने/ उसे/जाति के कोल्हू में!/जहां उसे /टूटना पड़ता है-/अपनी हर अतृप्त पल/देह के ताप से।’;76द्ध हिंदी में किसी कवयित्री ने इतनी साहसिक और विवेक वाली कविताएं शायद ही लिखी हों। जिसमें पिता को कटघरे में खड़ा किया जा रहा हो। संग्रह में स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर भी कई कविताएं हैं।‘उफनती नदी’ एक वैसी ही कविता है। जिसमें उत्तिमा ने एक अधवयस दंपति की प्रेम की प्यास को अभिव्यक्ति दी है। आदिवासी जीवन पर भी कई कविताएं इस संग्रह में हैं।अपनी एक कविता ‘मन की पवित्रता’ में वे लिखती हैं, ‘आज की स्त्री/देह की पवित्रता में नहीं/ मन की पवित्रता में जीती है।’ ;184द्ध

मिथकीय चरित्रों पर लिखी गई ज्यादातर कविताओं में पितृसत्ता को टारगेट किया गया है। लेकिन ‘शकुनिया काकी’ कविता के आरंभ में ही कवयित्री लिखती हैं, ‘बिषपुरवाली शकुनियां काकी/जब निकलती है-/नहा-धोकर पूजा करने मां काली थान/तो महमहा उठता है खुशबुओं से/गांव की गलियां।;154द्ध यह किसी समाज का सच हो सकता है। लेकिन यह किसी यथार्थ को देखने का बिलकुल ही एकांगी दृष्टिकोण है। कोई स्त्री लेखिका इसे कविता में क्यों लाए, इससे क्या अभिप्राय सिद्ध होता है, यह तो यथास्थितिवाद का पृष्ठपोषण कहलाएगा क्योंकि यहां धार्मिक कर्मकांडों में आस्था जमाई जा रही है। जो स्त्रियों की पराधीनता की सबसे बड़ी कारक रही है।

उत्तिमा ने हाशिए का जीवन जी रही कामगार स्त्रियों की पीड़ा की भी थाह ली है। ‘कमली’में वह लिखती हैं, ‘कमली खो चुकी है/वक्त के पहले ही/अपने यौवन का भूगोल/बचपन के इतिहास में’;152द्ध आगे वह लिखती हैं, ‘थकी कमली,/ बंद करना चाहती है-/यह घिनौना खेल/जेहाद करना चाहती है/सेठ केषवमल के खिलाफ/ताकि /कोई और कमली, विमली, शिमली/न आए सेठ के कोठी पर/काम करने’;152-53द्ध‘वह स्त्री’ में कवयित्री की मान्यता है, ‘प्रेम एक रसायन है/जो लोहे को सोना बना देता है/और साधारण को असाधारण/तभी तो वह /जीती है सुख-दुख में भी/अपने प्रेम के साथ’;151द्ध  संग्रह की एक छोटी-सी कविता है-‘वह’ नाम से, जो बच्चे की कल्पनाशीलता को सामने लाती है। उसकी कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य है, ‘छोटी लड़की/बना रही है-/कोरे कागज पर/कभी कोठी, कभी अटारी/कभी पौधे को/कभी आकाश में /उगे चांद तारे को/तो कभी जमीं पर /दाना चुगती चिड़िया को/चित्रों को/मानो वह बचा लेना चाहती है-/चिड़िया के घोंसले की गर्माहट/और ओस की बूंदों की तरलता को/अपनी निष्कपटता में/आकुलता के साथ’। ’;149द्ध  संग्रह की कई कविताओं में स्त्री-पुरुष के अंतरंग क्षणों के अनुभव हैं, जो बहुत सूक्ष्मता के साथ इन कविताओं में उतरे हैं। संग्रह में मां और पिता पर भी कई कविताएं हैं। एक कविता में वे लिखती हैं, ‘रामचरण जब-जब बाज की तरह/उसपर झपटता है/तब वह ऐसे कांप उठती है/जैसे कि कोई वृक्ष/अपनी ही परछाई से डरकर/कांप उठता है।’’;147, सुनैनाद्ध

 संग्रह की ‘चुपके-चुपके’, सिर्फ एक बार’, ‘तुम्हारा आना’ आदि अच्छी प्रेम कविताएं हैं। ‘स्मृति की सीढ़ियां’, ‘फटकनी’ आदि कविताएं भी महत्वपूर्ण हैं। ‘वह छोटी चिड़ियां’ में कवयित्री फर्माती हैं, ‘वह स्वाभिमानिनी/जब घुम-घुमकर गाती है/अपनी किलंगी/आकाश की ओर उठकर/तो/ लगता है/मानो!/वह गा रही है-प्रार्थना के गीत’’ ;141द्ध  संग्रह में ‘दादी और आजादी’, ‘सूरजी’, ‘वह स्त्री है,’ जो काली होने के कारण पहले घर परिवार से ही उपेक्षा, अपमान सहती है और बाद में सामंती यौन शोषण के कारण दम तोड़ देती है। कवयित्री ने बेसरी की पीड़ा को मार्मिक स्वर दिया है। ‘कुली’ भी एक खूबसूरत कविता है जिसमें उसकी बेचारगी को कवयित्री ने पकड़ा है। ‘नायाब तोहफा’ शीर्षक कविता में बच्चे की फिलिंग्स को बहुत गहरे डूबकर उतारा गया है। मां बच्चे को कितना प्रेम करती है उसकी एक-एक फिलिंग्स उसे गहरे झकझोरती है। कविता की पंक्ति है, ’जहां-जहां तुम छुपते थे,/बचपन में/वहां-वहां पैबस्त हो गई है-/तुम्हारी उपस्थिति।’ ;111द्ध  ‘खंडहर और बूढ़ा आदमी’ शीर्षक कविता में विधुर जीवन जी रहे बूढ़े की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी गई है। उस बूढ़े के दोनों बेटे विदेश जा बसे हैं और बेटी ससुराल। पत्नी दिवंगत हो चुकी हैं। कवयित्री को उस बूढे विधूर और खंडहर में समानता नजर आती है। वह लिखती हैं, ‘एक बिना सांस का/एक दूसरा, सांस से जीता है।’;106द्ध

‘आठ जून दो हजार नौ’ नाटककार हबीब तनवीर पर लिखी कविता है। वह लिखती हैं, ‘वे जानते थे/कैसे बनाया जाता है/मिट्टी से सोना जैसा आकर्षण।’;39द्ध संग्रह में कुछ और भी उल्लेखनीय कविताएं हैं जिनमें ‘आंखें, ‘प्रेम एक यौगिक तत्व है’, ‘किन्नरों की प्रार्थना’, ‘पुस्तक और कैनवास’, ‘बूट पाॅलिश करती फुनियां’, ‘महक की खोते’, जिंदगी’, ‘आत्मिक न्याय का युद्ध’, मुहावरों मंे आंखें’, ‘सिर्फ मैं थी तुम्हारे साथ’,‘खटरी का आत्मयुद्ध’, ‘परदेशी बेटा के लिए बूढ़े बाप का खत’, ‘दादाजी’ और ‘तीसरी जगह’ आदि संग्रह की महत्वपूर्ण कविताएं हैं। ‘कला के अधिनायक हुसैन’ में वह लिखती हैं, ‘तुमने जिश्म/पर/रूह तो/तुम्हारा/हर कलाकार प्रेमी के पास/आज भी /प्रे्ररणास्रोत बन/एक विलक्षण धरोहर के रूप में है।’ ;19.20द्ध उम्र की देहरी पर बुढ़ापे का आना कितना भयावह होता है इसका अहसास संग्रह की ‘दादाजी शीर्षक कविता को पढ़ते आप कर सकते हैं। रिटायर दादाजी की मनःस्थिति को इन पंक्तियों में देखें, ‘अब/सब कुछ/छूटता जा रहा है/पुरानी डायरियां/और /और फटे वस्त्रों की तरह/संबंधों की डोर/दादाजी का अपना ही घर/अब लग रहा है/उन्हें/अपरिचित-घर!’ उम्र के इसी पड़ाव को लक्षित कर ‘परदेशी बेटा के लिए बूढ़े बाप का खत’ और ‘तीसरी जगह’ शीर्षक कविताएं भी लिखी गई हैं।

उत्तिमा ने बाल मजदूर, आदिवासी स्त्री हर वह व्यक्ति और प्रवृति की कविताएं लिखी हैं जो दबे कुचले हैं। वह दवाब व्यक्ति, व्यवस्था और परंपरा-हर तरफ से है। अगर वो धार्मिक रूढ़ियों को अपनी कविता में लाने से परहेज करतीं तो हिंदी कविता में किसी भी समकालीन बड़ी कवयित्री होने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता था।
इस काव्य संग्रह का आवरण  बिहार के प्रसिद्ध चित्रकार आनंदी प्रसाद बादल ने बनाया है, जो अपनी कलात्मक दक्षता से पाठकों को गहरे अभिभूत करता है।


किताबः उदास है गांव
कवयित्रीः उत्तिमा केशरी
प्रकाशकः उद्भावना प्रकाशन, एच 55, सेक्टर-23, राजनगर गाजियाबाद
पेज संख्याः 190
कीमतः 150 रुपया



संदर्भ 
उत्तिमा केशरी का काव्य संग्रह ‘उदास है गांव’

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
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रविकांत की कविताएं : तलाक दी गयी औरेतें और अन्य

रविकांत

   सहायक प्रोफेसर-हिन्दी विभाग,लखनऊ विश्वविद्यालय , लखनऊ.संपर्क:9451945847

तलाक दी गई औरतें
  ( हेमलता के लिए )

तलाक दी गई औरतें
दूसरी औरतों की तरह ही होती हैं
बल्कि, वे होती हैं, थोड़ी ज्यादा ही औरतें
क्योंकि, वे रोती हैं ज्यादा और हॅसती हैं कभी-कभी।
तलाक दी गई औरतें
होती हैं वे थोड़ी ज्यादा ही औरतें
क्योंकि, वे सोती हैं फकत पहर दो-पहर
पूरी बस्ती के  सो जाने बाद,
और, उठ जाती हैं भिनसारे
औरतों से भी पहले।
वे जिन घरों में रहती हैं
वहाँ कोई औरत (मेहरी) काम पर नहीं आती
तलाक दी गई औरतें टी0 वी0 सीरियल भी नहीं देखतीं
और वे घर में खटती हैं भौजाइयों से ज्यादा
क्योंकि वे होती हैं थोड़ी ज्यादा ही औरतें।
तलाक दी गई औरतें
अन्य औरतों से ज्यादा
प्यार करती हैं अपने आदमियों को
जैसे हेमलता आज भी करती है हमसे।
तलाक दी गई औरतें
बहुत ज्यादा औरतें होती हैं
जब, उनका इन्तजार होता है
लम्बा, बहुत लम्बा, इतना लम्बा
कि न जाने कितना लम्बा।

तलाक, चाहे कचहरी में हुआ हो
जज की निगहबानी में
या, पंचायत में मिला हो
रवायतों की मेहरबानी में
याकि, तलाक सौंपा गया हो
वकीलों के बैठकखानों में
वकील जब अकेले में पूछता है
निरे अकेले की बातों और गॉठों को
अपनी नंगी निगाहों से टटोलता है औरतपने को
तब भी उसकी नजरें नहीं गड़तीं
कील-कांटे की तरह
क्योंकि वे होती हैं थोड़ी ज्यादा ही औरतें।
तलाक दी गई औरतें
चाहे जिस धर्म, जाति या वर्ग-समुदाय की हों,
उनका दुख एक जैसा होता है, पहाड़-सा
क्योंकि, ग़म का कोई मजहब़ नहीं होता
अकेलेपन की कोइ जाति नहीं होती
ऑसुओं का कोई वर्ग या समुदाय नहीं होता
तलाक दी गई औरतों के ऑसुओं का सैलाब
होता है उफनाती- बरसाती नदी-सा।
तलाक दी गई औरतें

MOHSEN DERAKHSHAN

तब और ज्यादा औरत हो जाती हैं
जब दूर कहीं बजती है शहनाई
पल भर को जैसे खो जाती हैं वे
और, अगले ही पल वे महसूस करती हैं
कि ढेर सारा थूक और बलगम से
सनी हैं उनकी जांघें,
तब बेचैन हो उठती हैं तलाक दी गई औरतें,
और, पसीने से तर-बतर जब वे
धड़कनों को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाती हैं
तो वे पाती हैं कि लटक गईं सूखी छातियों पर
उग आए हैं कैक्टस, और
पेट पर छितरा गई हैं अनगिनत जलकुंभियाँ।
तलाक दी गई औरतें
औरतों से ज्यादा रहती हैं बीमार
कभी सन्निपात कभी मिरगी के दौरे उन्हें आते हैं अक्सर।
औरतों की तरह ही जब वे जाती हैं  अस्पताल
तो डॉक्टर कभी उॅगलियों से, कभी आले से
दबा-दबाकर ढूढँता-टटोलता है गदराइयों को
तब वे कुछ महसूस नहीं करतीं
न दुख, न दर्द।
तलाक दी गई औरतें
होती हैं, ज्यादा ही औरतें
क्योंकि , हारी – बीमारी में
न उन्हें दवा लगती है और न दुआ
धीरे-धीरे घुलती जाती है, उनकी जिंदगी
और एक दिन वे समा जाती हैं
धरती में सीता की तरह!

इन दिनों………
(पेशावर आतंकी हमले में मारे गए बच्चों
      की याद में…..)
इन दिनो,
मुझे नींद नहीं आती
जबकि,
मैं आगरा या अलीगढ़ में
नहीं रहता।

न मैं मुसलमान हूँ,
न घर वापसी
न घर से बेघर होने,
न घर का न घाट का रहने
का खतरा है, मुझ पर।
फिर भी,
इन दिनों…….
मुझे नींद नहीं आती।

मैं बस्तर कभी नहीं गया
इस देश  के आदिवासियों को भी
मैं नहीं जानता,
मैं नहीं जानता उनका माओवादी बनना
और पुलिस के एनकाउण्टर में मारा जाना।
मैं सोनी सोरी से कभी नहीं मिला
और,
न ही मैंने मुँह खोला है,
इरोम शर्मिला के समर्थन में।
मैं पढ़ता-पढ़ाता जरूर हूँ
लेकिन,
बहस नहीं करता
गीता-कुरान पर,
और, न ही मेरे थैले या
आलमारी में है क्रान्ति का साहित्य
न मैं दाढ़ी रखता हूँ,
न भाषण  देता हूँ।
फिर भी,
इन दिनों…….
मुझे नीद नहीं आती।

LEYLA KAYA KUTLU

मेरा कोई बच्चा
स्कूल नहीं जाता,
मैं, किसी बच्चे की माँ नहीं हूँ,
किसी स्कूल की प्रिंसिपल भी नहीं,
जो कहूँ कि सारे बच्चे मेरे हैं
और पेशावर
हमसे बहुत दूर,
पाकिस्तान में है।
फिर भी,
इन दिनों…….
मुझे नींद नहीं आती।

हाँ हजूर…….
मैं दलित जरूर हूँ
लेकिन,
बेलछी या झज्जर में नहीं रहता,
नवाबों के शहर लखनऊ में,
रहता हूँ।
छोड़ दिया मैंने कब का
चम्बल का वह गाँव
जहाँ कभी फूलन अंगारा बनी थी।
मैं विधानसभा या पुराने लखनऊ में भी
नहीं रहता,
मेरा घर भी कहाँ है
विश्वविद्यालय के पुराने मकान में
निपट बुद्धिजीवियों के बीच रहता हूँ,
फिर भी,
इन दिनों…
मुझे नींद नहीं आती।

और सबसे बढ़कर
मैं स्त्री नहीं हूँ
अफस्पा मेरे राज्य का कानून नहीं है
मुझे चिंकी भी कोई नहीं कहता
कश्मीर  मेरे मुल्क में है
लेकिन मैं कश्मीरी  नहीं हूँ
तालिबान, बोकोहरम, आई. एस.
मैंने सिर्फ टी0 वी0 पर देखे-सुने हैं
और,
इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, नाईजीरिया
मेरे मुल्क नहीं हैं।
फिर भी,
इन दिनों…
मुझे नींद नहीं आती।

तुलसीराम को याद करते हुए

(1)

मृत्यु जीवन का अन्त नहीं
अनंत द्वार है जीवन का।’
बुद्ध के इस दर्शन  को
समझने के लिए,
तुम्हारे जीवन से ज्यादा
मुफीद
क्या है मेरे लिए।

JORGE MUNGUIA

तुम्हारे जीवन और
तुम्हारे मृत्युबोध से
कितना सीखा जा सकता है
बुद्ध की सीख के बिना भी।

बुद्ध राजा थे
तुम राजा नहीं थे
बुद्ध क्षत्रिय थे
तुम क्षत्रिय नहीं थे
तुम हलवाहे थे
किसी बांभन के
तुम चमार थे
इस मृतप्राय समाज के
और उतने ही पवित्र
जितनी पाक थी
रैदास की कठौती।

धर्म (बौद्ध) कहता है
कि सिद्धार्थ ने देखा
एक सपना
सपने में देखे-
हाथी, घोड़ा, शेर …..
इतिहास खमोश है,
लेकिन धर्म कहता है
कि बुद्ध भागे थे
इस सपने की खातिर।

सपने भी जिंदगी से
सीधे बावस्ता होते हैं
तुलसीराम जी……
तुमने देखे होंगे
सपने में
ढोर ढगर, कुत्ते, गिद्ध
क्योंकि, तुम राजकुमार नहीं थे,
चमार थे।

यह अब इतिहास है
और सत्य है
कि तुम भागे थे
सपने नहीं, हकीकत देख।
तुम भागे थे
बीएचयू से जेएनयू तक
मार्क्स से अम्बेडकर तक
जैसे भागे थे कबीर
काशी  से मगहर तक
मौत से जीवन तक
मरते हुए समाज को
जीना सिखाते हुए।

2

धर्म नहीं, इतिहास कहता है
कि बुद्ध भागे नहीं थे
देश निकाला मिला था
उन्हें,
धर्म इतिहास नहीं होता
अलबत्ता,  इतिहास
बन सकता है धर्म,
इतिहास वह नहीं कहता
जो धर्म कहता है।
भागे तो तुम थे
‘मुर्दहिया’ और मरते
हुए समाज से;
जहाँ मौत के लिए
मरते हुए,
जीवन की कोई आशा  नहीं होती।

YELENA LEZHEN

तुम्हारा भिनिष्क्रमण
भी कितना अजीब था
एक मौत (मुर्दहिया) से
दूसरी मौत (मर्णिकर्णिका)
की यात्रा का।
मुर्दहिया; मौत का पहला ठीया
जहाँ मौत पर मंडराते हुए गिद्ध
महाभोज में उतराते हुए गिद्ध।
मणिकर्णिका; मौत का दूसरा ठीया
यहाँ भी ब्रह्मभोज के लिए
मंडराते हैं गिद्ध,
लेकिन,  वे हैं सिद्ध ।
नोंच-नोंचकर खाते हुए
आदमी का मांस
हजारों सालों से
वे जीवित  हैं
जीवित  है  उनका  वर्ण
जीवित  है  उनका धर्म
और
जीवित  है उनका कर्म (कांड)।

गिद्धों की दृश्टि
सैकड़ों कोस की होती है
उनकी उम्र भी तो होती है
सैकड़ों बरस
मणिकर्णिका  पर  मंडराने
वाले गिद्ध भी
बड़ी पैनी – धारदार नजर रखते हैं
इसलिए  तो  वे  यहाँ
काबिज हैं
हजारों-हजार  सालों से।

उनकी उम्र भी लंबी
होती है गिद्धों की तरह,
दरअसल, दूसरों पर
पलने वालों की
उम्र लंबी होती ही है।
होरी की उम्र कितनी थी
जब उसका दम, निकल गया था
सड़क पर
गिट्टी तोड़कर ढोते हुए……

कमलेश्वर  (कितने पाकिस्तान)
के अदीब से पूछो,
दंगों में मरने वालों की
उम्र क्या थी?
हाँ, ठीक सुना आपने
कुछ गिद्ध मंडराते हैं
दिल्ली के आस-पास
और दूसरी राजधानियों में भी।
क्या कहा……?
अब दिखते कहाँ हैं गिद्ध?
अमाऽऽ   अपने मोतियाबिंद
का ऑपरेशन कराइए!
अपना रूपरंग-हुलिया
सब बदल चुके हैं गिद्ध,
आजकल बड़ी शाइस्तगी
से शिकार करते हैं
गिद्ध!

तुलसीराम देख पाते थे
इन गिद्धों को
अपनी एक आँख से
(काने जो थे वे)
गिद्धों और इंसानों में
फर्क करने के लिए
और उन्हें पहचानने के लिए
आँखें भले ही
दोनों सही-सलामत हों
लेकिन,
दृष्टि  एक चाहिए,
तुलसीराम की तरह।

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
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दिलचस्प रही माहवारी के सम्बन्ध में मेरी पहली जानकारी

 नवल किशोर कुमार


स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया न सिर्फ स्त्रियों के मानस को नियंत्रित और संचालित करती है, बल्कि पुरुषों का भी ख़ास मानसिक अनुकूलन करती है. माहवारी को लेकर पुरुषों के बीच की धारणा को समझने के लिए यह एक सीरीज है, जिसमें पुरुष अपने अनुभव इस विषय पर लिख सकते हैं.

बिहार की राजधानी पटना के जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर एक गाँव मेरा संसार था. गाँव में ही नक्षत्र मालाकार हाई स्कूल और गाँव में ही खेलने और भैंस चराने को पर्याप्त मैदान. देश दुनिया की खबरों में दिलचस्पी पिता जी की वजह से बढ़ी. निरक्षर होने के बावजूद वे अखबार खरीदते थे. पढ़ कर सुनाने का काम मेरे बड़े भाई कौशल किशोर कुमार करते थे. पापा को मेरी तोतली आवाज पसंद थी. इसलिए भैया को इस काम से मुक्ति मिल गयी.

बचपन में अखबारों को पढ़ते समय कई अवसर पर तब विज्ञापन भी पढ़ जाया करता था. एक विज्ञापन निरोध का था. सरकार की ओर से जारी विज्ञापन में निरोध का महत्व बताया गया था. याद नहीं कि उस वक्त पापा की प्रतिक्रया क्या थी. लेकिन मैंने अपने हमउम्र साथियों को निरोध को गुब्बारा बनाने से रोका था. मेरा तर्क था कि यह सरकारी है. इसका इस्तेमाल हम बच्चे नहीं कर सकते.

जब मैंने स्त्रियों की माहवारी को पहली बार जाना 

ऐसे माहौल से निकल इंटर की परीक्षा पास करने के फ़ौरन बाद शादी हो गयी. सेक्स सम्बन्धी जानकारी का घोर अभाव था. फिर भी काम चलने लायक जानकारी गाँव और कालेज के दोस्तों ने दे दी थी. लेकिन माहवारी भी कोई चीज होती है, इसकी जानकारी तो बाद में तब मिली जब मेरी होम मिनिस्टर(मेरी पत्नी) ने पैड लाने को कहा. मेडिकल स्टोर पर गया. पैड मिला. आश्चर्य तब हुआ जब दुकानदार ने काले रंग के प्लास्टिक में लपेट कर दिया.

खैर, घर गया तो इसकी जरुरत के बारे में पत्नी से पूछा. पहले तो वह मुस्कराई. फिर पांच दिनों की जुदाई का सवाल मेरे पहले सवाल का विस्तार कर गया. हालांकि जब जवाब मिला तब मेरी हालत यह थी कि न मुस्करा सकता था और न दुखी होने का भाव चेहरे पर ला सकता था.

समय बीता और समय ने पत्रकार बना दिया. नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन के तत्वावधान में आयोजित एक कार्यक्रम को कवर करने के बाद एक खबर लिखी – 94 फीसदी बिहारी नौजवान कंडोम यूज करना नहीं जानते. एक प्रमाण मैं खुद था. अखबार में खबर छपी और लोगों ने तारीफ़ की तब हौसला बढ़ा. अगली स्टोरी माहवारी पर केन्द्रित थी. 97-98 फीसदी बिहारी महिलायें घर का कपड़ा इस्तेमाल कराती हैं. संयोग ही कहिये कि 5 महीने के बाद राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों में सैनिटरी पैड किशोरी बच्चियों के मध्य वितरित करने का फैसला लिया.

यूं शुरू हुई हैप्पी टू ब्लीड मुहीम 

बहरहाल वक्त के साथ लोगों की सोच बदली है. व्यक्तिगत तौर पर मैंने कई बार पैड खरीदा है और बिना अखबार में लपेटे या काले रंग के आवरण से छुपाये. अब कोई शर्म या हिचक नहीं होती है. हाँ, कंडोम के मामले में अभी तक अज्ञानी ही हूँ. जानने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई.

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक हैं 

जीएसटी इम्पैक्ट: क्या महिलायें भेजेंगी वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री को सैनिटरी पैड (!)

आधी रात को देश की आर्थिक आजादी का बिम्ब रचते हुए 30 जून की रात 12 बजे देश में एक टैक्स क़ानून, जीएसटी ( गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) लागू कर दिया गया. कांग्रेस के जमाने के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और अब राष्ट्रपति ने इस कथित ड्रीम अर्थ-सुधार की नीव रखी थी और उसे पूरा किया नरेंद्र मोदी और उनके वित्त मंत्री अरुण जेटली ने. प्रधानमंत्री मोदी को देश में कई न्यू नॉर्मल स्थापित करने का श्रेय देने वाले अरुण जेटली ने संसद के सेंट्रल हाल में जो कवायद की उसके बाद 1 जुलाई से देश का न्यू नार्मल है: जीएसटी. और हाँ इसके साथ ही एक न्यू नार्मल और होने जा रहा है, महिलाओं की माहवारी के दौरान इस्तेमाल होने वाले सैनिटरी पैड का लक्जरी, यानी विलासिता वस्तु का दर्जा. अपने लौह इरादों के से खुद को सरदार वल्लभ भाई पटेल की छवि में ले जाने का इरादा रखने वाले नरेंद्र मोदी और उनके वित्त मंत्री को इसका कोई फर्क नहीं पड़ा कि उनके ही कैबिनेट की एक साथी, मेनका गांधी इस टैक्स को न लगाने का सरकार से बार-बार आग्रह कर रही हैं. कई महिला सांसदों ने इसके खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चला रखा है.

लेकिन यह न्यू नॉर्मल वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री के लिए सुखद खबरें लेकर नहीं आने वाला है. पहले से ही महिला सांसदों, उनके मंत्री और कई नामचीन हस्तियों ने उन्हें इस पर पुनर्विचार का आग्रह करते हुए ‘लहू पर लगान’ टैग लाइन से सोशल मीडिया पर अभियान चला रखा था. अब एक अपुष्ट खबर है कि यह एक आंदोलन की शक्ल लेने वाला है. दो दिन पहले ही अभिनेत्री कोंकणा सेंन ने कहा कि ‘जिस प्राकृतिक शारीरिक स्थितियों पर आपका नियंत्रण नहीं हो सकता, उसे विलासिता कैसे कहा जा सकता है और उसपर 12% टैक्स कैसे लगाया जा सकता है.’ इस निर्णय से नाराज महिलाओं का कहना है कि” सैनिटरी पैड महिलाओं के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा मामला है, और उसपर सरकार टैक्स लगाती है, जबकि कंडोम और कंट्रासेप्टिव पर नहीं.”

 कंडोम और कंट्रासेप्टिव भी महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है-खासकर प्रजनन पर आंशिक अधिकार और अनचाहे गर्भ से मुक्ति के प्रसंग में. इन दोनो अनिवार्य उत्पादों का संबंध दरअसल महिलाओं के प्रजनन और सेक्स से जुड़ा मामला है, जिससे पुरुष का अपना वंश जुड़ा है और राज्य की जनसंख्या संबंधी नीति भी, इसके माध्यम से राज्य और परिवार एक हद तक जनसंख्या पर कंट्रोल रखना चाहता है.  लेकिन सैनिटरी पैड  सीधे महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है, जो असंवेदनशील और पुरुषवादी राज्य के लिए एक गैरजरूरी प्रसंग है. इससे स्वास्थ्य के प्रति राज्य का रवैया भी स्पष्ट होता है, जिसके तहत अपने स्वास्थ्य की रखवाली नागरिक का निजी मुद्दा है.

जजिया कर से भी ज्यादा बड़ी तानाशाही है लहू का लगान 

सैनिटरी पैड खरीदने आई महिलाओं ने  नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि ‘यदि सैनिटरी पैड विलासिता की वस्तु है जिसके कारण उसपर 12% जीएसटी लगाया जा रहा है तो क्यों न वह विलासिता वस्तु हमारे वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री को गिफ्ट के तौर पर भेजा जाये. हम सैनिटरी पैड खरीदकर कर 12% जीएसटी बिल के भुगतान की रसीद के साथ उन्हें भेजते हैं, जिसका भुगतान उन्हें नहीं करना पड़ेगा.’

उन दिनों मम्मी की जगह बुआ या चाची खाना देती थी

नीतीश के एस

  लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. संपर्क:9650280564

स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया न सिर्फ स्त्रियों के मानस को नियंत्रित और संचालित करती है, बल्कि पुरुषों का भी ख़ास मानसिक अनुकूलन करती है. माहवारी को लेकर पुरुषों के बीच की धारणा को समझने के लिए यह एक सीरीज है, जिसमें पुरुष अपने अनुभव इस विषय पर लिख सकते हैं.


अनुभव और जीवन एक दूसरे के पर्यायवाची होते, अगर अनुभवों को इस्तेमाल करने की समझ सब में एक सी होती। किसी स्त्री के लिए माहवारी के अनुभव अलग होते हैं और पुरुष के लिए नितांत विपरीत। माहवारी से मेरा परिचय बहुत छुटपन में हो गया था। बस ये पता देर से लगा कि ये माहवारी है, न कि कोई गंभीर बीमारी।

यूं शुरू हुई हैप्पी टू ब्लीड मुहीम 


घर में अक्सर ये माहौल बन जाता था कि आज अमुक औरत रसोई में नहीं जाएगी। ये सिर्फ आज का नाम अगले तीन चार दिन चलता। पहले पहल तो नोटिस ही नहीं किया। बच्चे ऑब्जर्व करते हैं, अडॉप्ट करते हैं, नोटिस नहीं करते। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। लेकिन जब हर दूसरे महीने मम्मी की जगह बुआ या चाची खाना देती, मम्मी पूजा भी नहीं करतीं, ये सब देख कर एक अजीब सा भेदभाव समझ आने लगा था।

थोड़ा बड़ा हुआ तो रुतबा और औकात घर की अलमारियों तक पहुँच गयी। बच्चों के साथ खेलते हुए कुछ छिपा देना, किसी का कहना कि अलमारी से कुछ निकाल लाओ वग़ैरह -वग़ैरह। वहां कभी- कभी कपड़ों और सामान के बीच एक काली पन्नी दिखती। वही काली पन्नी जिसे पापा चुपचाप ला कर मम्मी को देते, चाचू चाची को देते। मौका और समझ मिलने के साथ इन काली पन्नियों के बारे में भी पता चला। ये सब उस उम्र के खुराफ़ाती दिमाग की दास्तान है जब बच्चे होमवर्क के लिए मार खाते हैं।

जजिया कर से बड़ी तानाशाही लहू पर लगान 


स्कूल में एक बार एक फीमेल क्लासमेट को कुछ दिक्कत हुईं। चार- पांच लड़कियां उसे घेर कर घर तक छोड़ कर आई। ये माहवारी से पहली प्रत्यक्ष मुठभेड़ थी। उसकी स्कर्ट के धब्बों ने काफी कुछ समझा दिया था। लेकिन अभी भी जानकारी के नाम पर सब कुछ खुद के बनाई हुई धारणाएं थी। वो सही थी या ग़लत ये जानने के लिए आठ साल इंतज़ार करना पड़ा।



उम्र में बीस का पड़ाव पार करने के तीन साल बाद एक लड़की से दोस्ती हुई। हालांकि फीमेल फ्रेंड्स तो पहले भी थीं। लेकिन कभी किसी से इंटिमेसी नहीं बनी। साथ काम करने वाली इस लड़की से हुई दोस्ती जल्दी ही घनिष्ठ हो गयी और मामला कुछ प्यार जैसा लगने लगा था। यह बात अलग है कि ये रिलेशन बहुत लंबा नहीं चल पाया लेकिन इसने मुझे बहुत कुछ सिखाया। पीरियड्स और उनसे जुड़ी कुछ बारीकियां, उनमे दी जाने वाली दवाइयां, उनके घरेलू नुस्खे, पीरियड्स की जटिलताओं में से कुछ के बारे में जानने का मौका मिला। ये वक़्त मेरे लिए जागरूकता के मामले में सबसे शानदार था। कुछ काम्प्लेक्स इश्यूज पर जानकारी का अच्छा आधार मिला इस वक़्त में जिसने बाद में मुझे खुल कर बात करने का कॉन्फिडेंस दिया।

माहवारी पर बात की झिझक हुई खत्म 


समय गुज़रा और औरतों की उन समस्याओं पर जानकारी बढ़ती गयी जिनको ले कर हम टैबू शब्द का इस्तेमाल करते हैं। उत्तराखंड के गाँवों में सैनिटरी नैपकिन बाँटने के दौरान काफी अनोखे अनुभव मिले। अनपढ़ से गाँव में कहीं दुत्कारा गया, कहीं हाथों हाथ लिया गया। लेकिन एक सबसे ज़रुरी बात जो पता चली वो ये थी कि किसी को तो बात करनी होगी। साल 2015 में माहवारी पर किये वर्कशॉप में जब स्त्री रोग विशेषज्ञों ने मेंस्ट्रुअल कप के बारे में अनभिज्ञता जताई तब इस बात पर यकीन पुख़्ता हो गया।

जब मैंने स्त्रियों की माहवारी को पहली बार जाना

आज फिर से यहाँ लिखने का मकसद यही है। कुछ विषयों पर बात करना बहुत ज़रूरी है। बात करने से ही बात बनती है। जानकारी देने से ज़्यादा ज़रूरी है उस मुद्दे पर बात करने की झिझक ख़त्म की जाये। जानकारी से ज़्यादा ज़रूरी जानकारी से जुड़ा विश्वास है।

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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कोलकाता प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय में अध्यापक का जाति आधारित उत्पीड़न

.डिम्पल


अनिल पुष्कर से बातचीत तथा ईमेल से चर्चा के दौरान पता चला कि कोलकाता प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय में चयन के बाद से ही उनके खिलाफ षड्यंत्र रचा जाने लगा. कारण यह रहा कि हिंदी विभाग की विभागाध्यक्षा अपने जानकार को नियुक्त कराना चाहती थीं, परन्तु सेलेक्शन बोर्ड द्वारा अनिल पुष्कर का चयन हुआ. उसी विभाग में सत्यदेव तथा कुछ समय बाद मुन्नी गुप्ता की नियुक्ति हुई परन्तु सवर्ण ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रस्त हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर मजूमदार, जो सामाजिक विज्ञान फैकल्टी की डीन भी हैं, ने अपने अधिकारों व सत्ता का दुरूपयोग किया. अनिल जी और उनके साथ और असिस्टेंट प्रोफेसर को विश्वविद्यालय की ओर से 21 अप्रैल 2017 को डिस्चार्ज लैटर “अनसैटिसफाइड परफार्मेंस’ टिप्पणी के साथ थमा दिया गया. उससे पूर्व कोई नोटिस का न दिया जाना सोची समझी साजिश को उद्घाटित करता है. स्थिति इससे और स्पष्ट हो जाती है, जब उनकी नियुक्ति को लेकर फर्जी केस भी सामने आया, कोई आधारभूत तथ्य न होने पर वह कोर्ट द्वारा ख़ारिज कर दिया गया. उसके बाद प्रशासन द्वारा SC और OBC शिक्षकों के निष्कासन के में अपनाई गई अलोकतांत्रिक प्रक्रिया कई प्रश्न खड़े करती है.

प्रथम दृष्टया यह जातिवादी मामला है. हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्षा तथा अन्य जातिवादी शिक्षकों द्वारा अनिल पुष्कर पर जातिवादी हमले होते रहे थे. शुरुआती दिनों में जब अनिल ने जॉब ज्वाइन किया तो उन्होंने घर जाने के लिए प्रार्थना पत्र लिखित रूप में दिया, ताकि वह घर जाकर अपना सामान ला सकें. विभाग में छुट्टी देते हुए यह विश्वास दिलाया गया कि अगर वीसी के कुछ कहने पर विभागध्यक्ष देख लेंगी, परन्तु जब वे एक सप्ताह बाद लौटकर आये तो पता चला कि वीसी नाराज इस बात पर थी कि न्यू फैकल्टी छुट्टी पर कैसे चला गया. उसके बाद ऑनलाइन लीव अप्लीकेशन सिखाने के नाम पर उनकी छुट्टियां काट ली गईं, जबकि अन्य लोगों की छुट्टियां मैनेज हो रही थीं.

प्रताड़ना के कई तरीके थे. मसलन विभागीय बैठकों की सूचनाएं नहीं देना. हर वक्त मानसिक रूप से प्रताड़ित करना. विभागीय साप्ताहिक सेमिनारों में भी ज्ञान के वर्चस्व तथा जाति से अनिल को दो-चार होना पड़ा. सवाल न करने देना, सवाल करने पर प्रताड़ित करना यह कहते हुए कि आपकी बारी आयेगी तो देख लेंगे. उदहारण के लिए एक ‘समकालीन मणिपुरी कविता’ पर एक सेमीनार में विभागाध्यक्षा के लेक्चर के बाद उनके ही आग्रह पर अनिल ने जब टिप्पणी की तो उन्हें आन्दोलनकारी बताते हुए अपमानित किया गया. ऐसे अनेक उदाहरण हैं, मसलन इस्मत चुगताई की कहानी पर सेमिनार में या कलकत्ता और कथा का भूगोल विषय पर लेक्चर के बाद. अनिल कहते हैं, ‘मुझे यह अहसास होने लगा था कि अनुसूचित जाति से आने के कारण मेरी प्रतिभा इनके जाति- अभिजात्यपन पर भारी पड़ रही रही थी.’ प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के भीतर जाति का सवाल बहुत बड़ा है. अनिल के उच्च शिक्षित होने के बावजूद हिन्दी विभाग का ब्राह्मण समूह उन्हें निचले दर्जे का समझता रहा. अतः ऐसे कई मौके आये जब अनिल प्रताड़ित हुए. अनिल बताते हैं कि ‘हद तो तब हो गयी जब विभागाध्यक्षा द्वारा कहा गया कि दलितों की पैदाइश तो शायद उन नाजायज संबंधों से हुई हैं जब उच्च कुल के पुरूषों द्वारा निचली जाति की महिलाओं के साथ जबरन शारीरिक संबंध कायम किये गये. तब मैं इनकी समझ और सोच पर आश्चर्यचकित था.’

प्रताड़ित किए जा रहे हिंदी प्राध्यापक

अनिल के अकादमिक क्रेडिट को भी विभाग में नकारा जाने लगा. नैक के समक्ष उनके अकादमिक काम को मानने से इनकार कर दिया गया.  अनिल के ऑनलाइन और प्रिंट मिडिया में छपे हुए कई लेखों को उन्होंने यह कहते हुए खारिज किया कि इनमें से एक भी आर्टिकल लिटररी और रिसर्च आर्टिकल नहीं है जबकि उसके ही समक्ष सीनियर शिक्षकों के सामान्य से लेखों को नैक में शामिल किया गया था. इसके साथ ही परीक्षा के समय अनिल पुष्कर द्वारा बनाये गए प्रश्न पत्र को पूरी तरह से बदल देना जो केवल शिक्षक ही नहीं बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है, या उन्हें परेशान करने के नित्य नये तरीके इजाद करना, तथा  बच्चों को लिखित शिकायत करनी के लिए मानसिक दबाव बनाना आदि प्रताड़ना की लम्बी फेहरिश्त है.

अनिल कहते हैं, ‘2016 की तमाम घटनाओं के बाद 2017 की जितनी भी कक्षाएं ली हैं, उनमें से अधिकांश के रिकार्डिंग्स मौजूद हैं, जबकि अन्य सीनियर अध्यापकों से पूछा जाना चाहिए कि उनकी कितनी कक्षाओं की रिकार्डिंग मौजूद हैं.’ वे यह भी कहते हैं कि ‘छात्रों में भी यह सन्देश आ चुका था कि विभागाध्यक्ष  मेरे खिलाफ कोई साजिश कर रही हैं इसलिए वे अनिल की हर क्लास की रिकार्डिंग करने लगे थे.

विभागध्यक्ष के कारनामे कई हैं. मसलन, कई बार अनिल को बुलाकर कहना कि लेक्चर अच्छा देते हो लेकिन केवल लेक्चर देने से काम नहीं चलेगा तुम नोट्स भी लिखवाओ जबकि छात्रों के पास पहले ही हैण्डराइटिंग में नोट्स मौजूद होते थे. अनिल पुष्कर द्वारा लिए गये असाइनमेंट को खारिज करना और छात्रों को टॉर्चर करने के लिए दुबारा लिखित परीक्षा लेना. या विद्यार्थियों पर दवाब बनाना कि अनिल के खिलाफ शिकायत करें. लेकिन विद्यार्थियों ने अनिल और उनके साथ निष्कासित शिक्षक का साथ दिया. विश्वविद्यालय से निष्कासन के बाद छात्र आशंकित और आक्रोश में थे उन्होंने एकजुट होकर प्रशासन के सामने इस फैसले का विरोध किया.जिसकी ख़बरें अखबारों में दर्ज  हैं. अनिल और उनके साथी प्राध्यापक का एक महिला विभागाध्यक्ष द्वारा जाति-उत्पीडन सवाल खडा करता है कि आखिर एक शोषित समूह को दूसरे शोषित समूह का उत्पीड़न करने में आखिर क्या सुख मिलता है.अंततः शोषण की संस्कृति ही पुष्ट होती है.

लेखिका सामाजिक सक्रियता हैं.
संपर्क: dimpledu1988@gmail.com

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
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जब मैंने स्त्रियों की माहवारी को पहली बार जाना

जीतेंद्र कुमार

  लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. संपर्क: 9968205114

स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया न सिर्फ स्त्रियों के मानस को नियंत्रित और संचालित करती है, बल्कि पुरुषों का भी ख़ास मानसिक अनुकूलन करती है. माहवारी को लेकर पुरुषों के बीच की धारणा को समझने के लिए यह एक सीरीज है, जिसमें पुरुष अपने अनुभव इस विषय पर लिख सकते हैं.

एक न्यूक्लिअर  फैमिली में नौकरीशुदा महिला होने के नाते मां पर जिम्मेवारियां कुछ ज्यादा ही थीं। ऊपर से पीरियड्स में अत्यधिक दर्द और रक्तस्राव की वजह से उन्होंने गर्भाशय का आपरेशन कर उसे निकलवा दिया था। हालांकि उन दिनों ये बात समझ नही आई सिवाय इसके कि माँ की तबियत खराब है। बहन छोटी थी। साथ मे शहरी और थोड़ा बहुत शायद वामपंथ मिश्रित अम्बेडकरवादी विचारधारा की वजह से पीरियड्स को लेकर मेरे घर मे किसी तरह का भेदभाव भी नही था। तो कुल मिलाकर मुझे पीरियड्स के बारे में कुछ भी पता नही था। छठी में स्कूल में एक लड़की को दोपहर के अवकाश के दौरान चुपचाप बैठे देख जब मैंने “चुप-चुप बैठी हो जरूर कोई बात है” वाला गीत गाया जो दूरदर्शन के किसी एडवर्टिजमेंट में लगभग हर रोज पांच बार आता था, उस लड़की ने प्रिंसिपल मैडम से शिकायत की और मेरी खूब पिटाई हुई। वजह समझने में 5-6 साल लगे कि यह गीत किसी सैनिटरी नैपकिन के विज्ञापन के लिए था। तो इस तरह से उस समय तक मुझे कुछ भी पता नही था पीरियड्स के बारे में। हालांकि उन्ही दिनों खेतों या कूड़े के ढेरों पर कपड़ों से तह किये बेलनाकार टुकड़े को देख दूसरे लड़कों के माध्यम से पता चला कि महिलाएं इसे अपने शरीर के अंदर डालती हैं। क्यों डालती हैं इसके हम बच्चों के अपने फंतासी की कहानियां थीं। बहरहाल इसका कुल मतलब यही था कि जो भी है बहुत ही घिनौना होता है। इन कपड़ों से ही हमने महिलाओं के चरित्र को लेकर भी अपनी कल्पनाएं कर डाली थीं।

माहवारी पर बात की झिझक हुई खत्म 

बहरहाल, उन्ही दिनों मेरा दाखिला जिले के नवोदय विद्यालय में हो गया जहां लड़कियां भी होस्टल में रहती थीं लेकिन संपर्क न के बराबर था। लड़कियां क्लास में कम से कम एक साथ बैठती थीं लेकिन बात उनसे कभी कभार ही होती। ज्यादातर शिक्षकों के सामने पढ़ाई की जरूरी बातें या फिर झगड़े। ऐसे में लड़के- लड़कियों का एक दूसरे के बारे में जानना समझना असंभव ही था। एक सीनियर दीदी जो मुझे बहुत माना करती थीं, बहुत सारे लड़कों की नजर में रहती थीं। उन्ही लड़कों में किसी ने मुझे खबर भिजवाई कि वह दीदी गरम पानी मंगवा रही हैं। मैं मेस से पानी गर्म करवा उन्हें पहुचाने गया।  दीदी मेरे हाथ मे गरम पानी देख बहुत झेंप सी गई। मुझे ये सारी बातें सालों बाद समझ आई।

अब तक पीरियड्स को लेकर इधर -उधर की जानकारियां तो हो गईं थी लेकिन ये तमाम जानकारियां स्त्रियों को हम पुरुषों से हीन बनाती थीं और बहुत हद तक उपहास का पात्र भी। दसवीं की बायोलॉजी क्लास में भी टीचर डायग्राम और ब्लैकबोर्ड से ज्यादा इसके बारे में नही बता सके। ऐसे में सोच में आमूल चूल बदलाव तब आया जब आगे के दिनों में एक महिला के संपर्क में आया और उनसे प्रेम हुआ। खास दिनों में जब परेशान देखता तो समझ आने लगा और पहले की पीरियड्स को लेकर रहने वाली घृणा अब लाचारगी और सहानुभूति में बदलने लगी। फिर जब उन्हें भी मुझसे प्रेम हुआ तब धीरे धीरे वो इसके बारे में बताने लगीं। असहाय दर्द से लेकर सामाजिक टैबू की सारी बातें मेरे लिए लगभग नई थी। मेरे घर मे किसी तरह का रोक- टोक न होने की वजह से बहन को लेकर खास तो कभी नही पता चला लेकिन मेरी प्रेमिका अपने कमरे में ही नजरबंद कर दी जाती थी जिसका कभी उसने अफ़सोस भी नही जताया। सालों से अपनी माँ और बड़ी बहनों को उसने ऐसा ही करते देखा था।

जजिया कर से बड़ी तानाशाही लहू पर लगान 

सालों बाद विभिन्न वजहों से मैं पीरियड्स को लेकर ज्यादा जागरूक और महिलाओं के इस मुद्दे को लेकर खासा सेंसिटिव हो चुका था। कई महिला मित्रों की इसमें खास भूमिका रही। मेरा फिलहाल मानना है कि महिलाओं और पुरुषों की बराबरी का द्योतक पीरियड्स की स्वीकार्यता को माना जा सकता है। जिस दिन आम तरीके से किसी भी जगह किसी भी परिस्थिति में अगर किसी महिला का पीरियड्स से गुजरना टैबू नही रह जाता तो समझिये के जेंडर की लड़ाई लगभग जीती जा चुकी है। और हां, प्रेम की इसमें खास भूमिका है। प्रेमीगण प्रेमिकाओं को और प्रेमिकायें अपने प्रेमियों को इसके बारे में जागरूक कर सकती हैं। बाकी लोग तो कर ही सकते हैं।

यूं शुरू हुई हैप्पी टू ब्लीड मुहीम 

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को बेचैन करने वाले नाटकों का पाठ आयोजित

रंगमंच की लोकप्रिय पत्रिका समकालीन रंगमंच द्वारा 27 जून को आयोजित नाट्य पाठ सह परिचर्चा मुक्तधारा ऑडिटोरियम में विचारोत्तेजक बातचीत के साथ संपन्न हुई। इस अवसर पर संजीव चंदन ने अपने दो नाटकों- ‘ओघवती: महाभारत की एक कथा’ और ‘असुर-प्रिया का संताप’ के पाठ किये। ये दोनों नाटक अलग-अलग विषयवस्तु, प्रयोजन और कलेवर के थे।

‘ओघवती…’ जहां महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित एक प्रसंग पर आधारित है, जिसमें अतिथि के समक्ष अपनी पत्नी को प्रस्तुत करने को मृत्यु पर विजय प्राप्त करने का माध्यम बताया गया है, वहीं ‘असुर-प्रिया का संताप’ नाटक में स्त्री और असुर गणों की कृषि संस्कृति और समृद्धि को देवों/आर्यों द्वारा नष्ट करने, उन पर साम-दाम-दंड-भेद से सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने और यज्ञ संस्कृति, पशु-बलि को आरोपित करने के ऐतिहासिक संदर्भ को प्रचलित ब्राह्मण मिथों के भीतर से ही स्पष्ट करने की कोशिश की गयी है।

कार्यक्रम की शुरुआत नाट्यालोचक, कवि और समकालीन रंगमंच के संपादक राजेश चन्द्र ने उपस्थित रंगकर्मियों, पत्रकारों, साहित्यकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का स्वागत करते हुए की तथा पत्रिका के प्रकाशन की पृष्ठभूमि और प्रतिबद्धता पर अपनी बात रखी। उसके पश्चात उषा ठाकुर ने जन-गीत और निर्गुण गीतों का प्रभावशाली गायन प्रस्तुत किया, जिसमें उनके साथ तबले पर संगत की सोहन कुमार ने।

साहित्यकारों, स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं और रंगमंच से जुड़े लोगों ने संजीव चंदन के इन दोनों नाटकों के पाठ के बाद इस पर परिचर्चा में अपनी बातें कहीं। परिचर्चा में शामिल लोगों ने एक तो नाटकों के कम लिखे जाने को चिह्नित किया और अब तक कहानियां लिखते रहे स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन की नाट्य-लेखन में शुरुआत को एक अच्छा संकेत बताया। वक्ताओं ने कहा कि ये नाटक सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को बेचैन करेंगे और लेखक तथा मंचनकर्ताओं को उनसे तीखी प्रतिक्रिया के लिये तैयार रहना चाहिये। वक्ताओं ने जहां ‘असुर-प्रिया का संताप’ को नाट्य-लेखन के स्तर पर भी मजबूत बताया, जिसमें कथानक, दृश्यों और संवाद के साथ ही तत्कालीन समय और वर्तमान के तनाव, द्वंद्व उपस्थित होते हैं, जिससे दर्शक और श्रोता अपना तादात्म्य बना लेता है। उसके ऐतिहासिक बोध और वर्तमान के संघर्षों के प्रति उसके विश्लेषण नये आधार के साथ जुड़ जाते हैं, उसकी सांस्कृतिक तंद्रा टूटती है, उसकी आस्था को झटका लगता है, लेकिन वह इस नये कथानक के साथ जुड़ भी जाता है। वहीं वक्ताओं ने ‘ओघवती: महाभारत की एक कथा’ को मजबूत नाटक मानते हए भी इसके भीतर नायिका के अंतर्द्वन्द्व को और उभारने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। समारोह में उपस्थित निर्देशकों और रंगकर्मियों ने इस नाटक के मंचन के प्रस्ताव दिये, वहीं उनके बीच पौराणिक नाटकों और समकालीन संदर्भों पर आधारित नाटकों के दर्शकों पर प्रभाव को लेकर भी अच्छी बातचीत हुई।

कार्यक्रम में शामिल होने वाले साहित्यकारों, रंगकर्मियों, पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं में रजनीतिलक, सेवाग्राम, महाराष्ट्र से आयीं डॉ. अनुपमा गुप्ता, टेकचंद, कौशल पंवार, मुकेश, सुधांशु  गुप्त, बापी बोस, महेश वशिष्ठ, मंजरी श्रीवास्तव, निवेदिता झा, रचना त्यागी, अपराजिता, विक्रम, राजीव सुमन, धर्मवीर, मनीषा कुमारी, अरुण कुमार, अनिता, अरुण, रीति, स्वीटी, हेमलता यादव, इरेन्द्र बबुअवा, भास्कर झा, गौरव सिंह एवं पाखी ठाकुर आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

औरतों की ईद …

अरशाना अज़मत

औरतों की ईद  यानी .. 
रोज के मुकाबले जल्दी जगने का दिन ..
बावर्चीखाने में ज्यादा खटने का दिन ..
ज्यादा खाना पकाने का दिन..
ज्यादा तरह के खाने पकाने का दिन ..
ज्यादा बर्तन धोने का दिन..
ज्यादा सफाई करने का दिन..

औरतों की ईद यानी ..
रोज के मुकाबले देर से खाने का दिन..
देर से नहाने का दिन..
देर से बिस्तर में जाने का दिन..
देर से टीवी देखने या न देखने का दिन..

ज्यादातर औरतें नहीं जानतीं कि ईद पर रिलीज होती है सलमान खान की पिक्चर..
ज्यादातर नहीं जाती सिनेमा हॉल में पिक्चर देखने…

ज्यादातर को ईदी भी नहीं मिलती..
ज्यादातर नहीं खरीद पातीं अपनी पसंद की झुमकियां…
ज्यादतार दूसरे दिन पहनती हैं चाव से सिलवाया सूट और चूड़ियां..

औरतें बनाती हैं देग भर बिरयानी और खाती हैं मुट्ठी भर चावल…
वो भी अक्सर सबके खा लेने के बाद.. .
रायता, चटनी और सलाद खत्म हो जाने के बाद..

औरतें सुबह सूरज निकलने से पहले बनाती हैं सेवंई ..
औरतें शाम को सूरज ढलने के बाद खाती हैं सेवंई ..

ज्यादातर ईद के दिन घर से नहीं निकलतीं..
ज्यादातर किसी से ईद मिलने नहीं जातीं..
ज्यादातर से ईद मिलने कोई नहीं आता..
उंगलियों पर गिनने लायक होते हैं औरतों के मेहमान…

कहानियों में भी ..
औरतें अमीना होती हैं वे घर में रहती हैं ..
औरतें हामिद नहीं होतीं, वे मेले में नहीं जातीं ..
औरतों को चिमटे की जरूरत होती है …
और जरूरत पूरी करने के लिए हामिद की..
औरतें खुद नहीं खरीदतीं अपने लिए चिमटा..

औरतें शामिल होती हैं इबादत में ..
तैयारियों में …
खरीदारी में …
बाजार भर में दिखती हैं औरतें …

औरतें गायब हो जाती हैं ईद के जश्न से …

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