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युवाओं के गायक संभाजी समाज बदलने के गीत गाते हैं

कुसुम त्रिपाठी

स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें
प्रकाशित हैं , जिनमें ‘ औरत इतिहास रचा है तुमने’,’  स्त्री संघर्ष  के सौ
वर्ष ‘ आदि चर्चित हैं. संपर्क: kusumtripathi@ymail.com

संभाजी भगत के क्रांतिकारी पोवाड़े के श्रोता-दर्शक चंद बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि विशाल व्यापक जनता है जो आज अपने अधिकारों के हनन के लिए तत्पर तंत्र के खिलाफ प्रतिरोध की संस्कृति के समर्थन में लड़ रही है। उनका पोवाड़ा दर्शकों को आनन्दित नहीं करता बल्कि एक मुद्दे को लेकर झकझोरता है और उसे सार्थक दिशा की ओर उन्मुख करता है। उस दिशा की ओर जहां बदलाव और संघर्ष की ताकतें एक जुट हो रही हैं। संभाजी के पोवाड़ा जिसके वे गायक, गीतकार, संगीतकार हैं,  तमाम शोषित, पीड़ित जनता के अन्याय अत्याचार के विरूद्ध उन्हें उकसाने, उन्हें समाज को बदलने के लिए प्रेरित करते हैं। कला और संस्कृति की दुनिया मे लोकशाहिर संभाजी भगत यह कहते हुए अपने पोवाड़ा प्रस्तुत करते हैं.मैं आपका यहां मनोरंजन करने नहीं आया हूँ, बल्कि मैं आपकों अस्वस्थ करने आया हूँ, जो लोग यहां मनोरंजन के उद्देश्य से आए हैं, वे कृपया यहां से चले जायें। संभाजी भगत की आंखों में व्यवस्था विरोधी आग है, उनकी आवाज में सहयाद्री की सिंह गर्जना है। दस से पचास हजार की भीड़ उनका पोवाड़ा सुनने के लिए इकट्ठा हो जाती है।

संभाजी का जन्म 1 जून 1959 को महाराष्ट्र के सातारा जिला के जावली तहसील के महू नामक गांव में हुआ। जो पंचगनी के पास है। वे एक भूमिहीन दलित परिवार में पैदा हुए. उनकी माता का नाम गीता तथा पिता का नाम भीमा था। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने महात्मा फुले हाई स्कूल, पंचगनी में की। संगीत का शौक उनको बचपन से ही था। उन्होनें बताया कि गांव के उनके एक शिक्षक थे, जिनका नाम देवधर गुरू जी था। वे सभी बच्चों को नहलाते, तैयार करते और स्कूल ले जाते थे। मुझे कंधे पर बिठाकर स्कूल ले जाते थे। वे गुरू जी कलापथक चलाते थे। उन दिनों महाराष्ट्र में लोग शाहिर अण्णाभाउ साठे और शाहिर अमर शेख से प्रभावित थे। देवधरे गुरू जी हम लोगों को इनके गाने सीखाते थे और जगह-जगह कला-पथक में गवाते थे। इससे संगीत में रूचि बढ़ी। इसके बाद संभा जी जब 8 वीं कक्षा में आए तब हाईस्कूल में जाने के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों को पार कर जाना पड़ता था । जिससे वे और उनके साथी रोज देर से स्कूल पहॅुंचते थे। देर से स्कूल पहुंचने पर क्लास टीचर इन छात्रों की पिटाई करते थे। एक दिन स्कूल के कार्यक्रम में संभाजी ने इस मार-पिटाई के खिलाफ प्रोटेस्ट कविता लिखी और उसे गाकर सुनाया। उसके बाद प्रिसिंपल ने तुरन्त बुलाया। संभाजी को लगा, अब तो खैर नहीं मुझे जरूर स्कूल से निकाला जायेगा, पर उल्टा हुआ । प्रिंसिपल ने संभाजी को शाबासी दी, गाने की तारीफ की और क्लास टीचर की मार-पिटाई बन्द करवाई। तब से संभाजी सहयाद्री की पर्वत श्रृंखलाओं में कविता लगातार लिखते और गाते रहे जो अब तक जारी है। घोर गरीबी और दरिद्रता में उनका बचपन बीता।


12 वीं कक्षा की पढ़ाई खत्म करके वे उच्च शिक्षा की चाहत लिए मुम्बई महानगर में  4 जून 1980 को आए। वे बड़ा-पाव के ठेले पर काम करने लगे और वहीं रास्ते पर सो जाया करते थे। बड़ा -पाव बेचने वाले मालिक ने संभाजी में पढ़ाई के प्रति आतुरता देखी। उन्होंनें संभाजी का नाम वडाला स्थित आम्बेडकर कालेज ऑफ़ कामर्स एण्ड इकोनाम्किस में बी-कॉम में लिखवा दिया। वहीं सिद्धार्थ विहार हॉस्टल में उनके रहने का प्रबंध भी हो गया। यह वही हॉस्टल था जहां पर दलित पैंथर आंदोलन का जन्म हुआ था ।

जूलाई 1980 में संभाजी भगत एप्लायमेंट एक्सचेंज से घर लौट रहे थे। उन्होंने चर्च गेट स्टेशन के पास कुछ कालेज के विद्यार्थियों को नुक्कड़ नाटक करते हुए देखा। वे रूककर नाटक देखने लगे। उन्होंने देखा कि थोड़ी – ही देर में पुलिस इन छात्र -छात्राओं को उठाकर ले जा रही थी। संभाजी को लगा इतना अच्छा नाटक चल रहा था, पुलिस इन लोगों को क्यों उठा ले गई! तब उन्हें एहसास हुआ कि नाटक सत्ता विरोधी है। ये विद्यार्थी सच्चाई बता रहे थे। ये सभी साहसी थे। उन्हें सच्चाई बताने से रोका गया। संभाजी इस समूह से बहुत प्रभावित हुए। फिर उन्होंने पता किया कि ये कौन लोग थे। उन्हें पता चला कि ये विद्यार्थी प्रगति संगठन से जुड़े विद्यार्थी थे और उनकी नाट्य मण्डली का नाम आह्वान नाट्य मंच है। मेरी पहली पहचान संभाजी से इसी वर्ष हुई। मैं विद्यार्थी प्रगति संगठन और  आह्वान नाट्य मंच से जुड़ी थी। संभाजी आह्वान नाट्य मंच से जुड़ गये। वे सनोबर आंस्पीन्डर को अपना गुरू मानते हैं जो आ आह्वान नाट्य मंच की संस्थापकों में से एक थी ।

1980 का दशक एक ऐसा दशक था जब मुम्बई में छात्र आन्दोलन, महिला आन्दोलन, गिरणी कामगार के साथ – साथ अन्य ट्रेड युनियन आन्दोलन अपने उभार पर थे। ये सभी आन्दोलन एक- दूसरे से जुड़े थे। संभा जी भगत इन सभी आन्दोलनों से जुड़े थे। उन्होंनें आह्वान नाट्य मंच में आने के बाद मार्क्स और अम्बेडकर को पढ़ा । वे अपने छात्र-जीवन में ही प्रसिद्धी पा चुके थे । कालेज के विद्यार्थी पिकनिक पर जाते समय रास्ते में ट्रेन व बसों में उनका पौवाड़ा गाया करते थे । आह्वान नाट्य मंच में वैसे तो सामूहिक नाटय लिखे जाने की परम्परा थी, पर मुझे याद है संभा जी ने नाटकों में लोकधर्मी परम्परा गौंधड, बारूड, पोवडा शैली का प्रयोग नुक्कड़ नाटकों में शुरू किया। ज्यादातर नुक्कड़ नाटकों में गीत-संगीत संभाजी के होते थे हालांकि उन्होनें कभी भी शास्त्रीय संगीत या गीत व्यावसायिक तरीके से किसी संस्था में जाकर प्रशिक्षण नहीं लिया था। अभी भी मुझे याद है जब वे मेरे घर पर दकली या ढ़ोलकी लेकर गानों की धुन बनाते थे। वे स्वयंभू हैं। उस समय आह्वान नाट्य मंच के जो चर्चित नुक्कड़ नाटक थे- शिक्षा का सर्कस (1980) यूनिवर्सिटी का तमाशा देखो (1980), दमन का विरोध (1981) गिरनी कामगार का संघर्ष (दो भागों में 1982 – 83) रोटी का खेल (1984),  झोपडवासियों को गुस्सा क्यों आता है (1985) चुनाव बहिष्कार करो इत्यादि। 1980 – 95 के बीच संभा जी भगत विलास घोगरे और गदर के संपर्क में आए। ये तीनों लोक संगीत की परम्परा की तलाश में गांव-गांव घूमते थे । संभा जी ने इन्हीं लोगों के साथ रहकर देश की जातिवादी, धार्मिक क्रूरता, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक विषमता, सांस्कृतिक तौर पर साम्राज्यवादी हमला जैसे मसलों पर जानना शुरू किया। ये तीनों आदिवासी इलाकों से लेकर गांव-गांव, बस्ती-बस्ती घुमते और लोक -सांस्कृतिक परम्पराओं को  लेकर क्रांतिकारी गाने लिखते। संभा जी गदर को अपना बड़ा भाई मानते है। क्रांतिकारी गाना गाने के कारण दोनों गढ़चिरोली में एक साथ जेल गये। जेल आना-जाना गिरफ्तारियां आम बात थीं।

संभा जी भगत ने पहली बार अर्धसत्य फिल्म में काम किया । 1992 – 93 दंगों के समय संभा जी स्तब्ध रह गये थे। कामरेड पांसारे की सलाह पर उन्होनें 2012 में शिवाजी अंडरग्राउण्ड इन भीमनगर मोहल्ला नाटक लिखा। संगीत निर्देशन भी उन्हीं का है। इस नाटक ने मराठी नाटकों की परम्परा में तहलका मचा दिया । इससे पहले गिरणी कामगारों के जीवन पर आधारित चिठाटया गिरणी वग नामक नृत्य- नाट्क लिखा था । इसका निर्देशन सुनील श्यानबाग ने किया था ।

2004 में संभाजी ने विद्रोही शाहिरी जलसा की स्थापना की। संध-परिवार शिवसेना तथा धार्मिक कट्टरवादियों के खिलाफ विद्रोही साहित्य सम्मेलन शुरू किया। 2011 में विद्रोही शाहिरी जलसा के माध्यम से गरीब बस्तियों के नवयुवकों को ट्रेनिंग देना शुरू किया । वे फासिस्टवादी, जातिवादी, पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ गाने गाते हैं साथ ही फूले आम्बेडकर और भगत सिवंह के गाने गाते हैं. ऐसी ही संभा जी से ट्रेनिंग प्राप्त कबीर कला मंच के युवक – युवतियों को 2012 में माववादी से सहानुभुति रखने वाला कहकर गिरफ्तार कर लिया और साढे तीन वर्ष बाद उन्हें जमानत पर छोड़ा । 2000 में संभाजी की आत्मकथा कातल खलचा वाणी (पत्थर के नीचे का पानी) छपी । 2004 से 2008 तक उन्होनें मराठी समाचार पत्र महानगर और सम्राट पेपर में कालम लिखें ।
अप्रैल 2015 में कोर्ट फिल्म आई। जिसे राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुल 24 पुरूस्कार मिले। आस्कर में फिल्म भेजी गई। इस फिल्म के गीतकार, संगीतकार और गायक संभाजी हैं। जून 2015 में नागरिक फिल्म में भी उन्होनें गाना गाया तथा संगीतकार गीतकार भी वे ही हैं । इस फिल्म के लिए संभाजी को महाराष्ट्र सरकार का राज्य पुरस्कार मिला, जिसे उन्होनें दाम्भोलकर, पानसारे और कलबुर्गी की हत्या के विरोध में पुरस्कार लौटा दिया । सरपंच भगीरथी फिल्म में भी गीतकार, संगीतकार संभाजी भगत हैं. इन दिनों उनका नाटक स्टैचु ऑफ़ लिबर्टी हाउस फूल जा रहा है ।

संभा जी भगत ने 2016 में ‘द वॉर बीट’ नाम से इन्टरनेट पर गाने लोड करना शुरू किया है। वे कहते है। द वॉर बीट’ इसलिए शुरू किया क्योंकि आज मीडिया के सभी साधनों पर फासिस्ट ताकतों का कब्जा है। लोकतांत्रिक स्थानों पर हमें हमारी बात प्रेषित करने का साधन खत्म हो गया है। सइबर – टेकनालांजी में थोड़ा बहुत स्पेस बचा है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी इन्टरनेट का प्रयोग होने लगा है। इसलिए हमने अपनी बात अपनी भाषा में कहने के लिए इस साधन को अपनाया और हम सफल भी हो रहे हैं।

3 जून 6 जून 2017 को संभाजी ने कला- संगिनी के बैनर तले 150 युवा कलाकारों को इकट्ठा किया। साने-गुरूजी स्मारक के मानगांव जो रायगड़, जिला महाराष्ट्र में है, वहां ट्रेनिंग कार्यक्रम लिया। इसमें कलाकारों को वैचारिक व सैद्धान्तिक आधार पर आज फासिस्ट ताकतों से विभिन्न माध्यमों का तकनीक  का प्रयोग करते हुए कैसे लड़ा जाये पहले सिखाया गया। इस ट्रेनिंग में 15 समूह के लोगों ने भाग लिया। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हेतु कला – संगिनी की स्थापना की गई। इन युवकों ने चार दिन में 12 लघु फिल्में और 14 गाने बनाये।

संभाजी कहते हैं जहां आन्दोलन की जरूरत होती है, मैं वही होता हूँ । मैं अपना जलसा झोपड़ियों, बस्तियों, गांवों में करता हूँ। मेरा एक सपना है – मैं दलित संशोधन केन्द्र की स्थापना करूं, जहां गरीब, दलित बच्चों के लिए मैं रेडियो, टी.वी. सेन्टर खेल सकूं। उन्हें साउन्ड रिकार्डिगं, गीत-संगीत, फिल्म बनाना सीखा सकूं, ताकि अपनी बात करने के लिए हमें किसी और के पास न जाना पड़े। हम अपने माध्यमों से फासिस्ट ताकतों, ब्राहमणवाद, जातिवाद व पूंजीपतियों के खिलाफ आन्दोलन खड़ा कर सकें। उनकी मान्यता है कि आने वाली युवा पीढ़ी की नारियां स्वयं अपना इतिहास रचेगीं। स्त्रियों की भूमिका के बिना समाज में कोई क्रांति नहीं लाई जा सकती ।

संभाजी के पोवाडा में सत्ताविरोधी आक्रोश साफ दिखाई देता है । वे पूंजीपतियों, सामांतवादी, साम्राज्यवादी शक्तियों के विरूद्ध हुंकार भरते हैं। मनुवादियों, ब्राहमणविादियों तथा फासिस्ट संस्कृति के खिलाफ युवकों को लामबन्द होने की प्रेरणा देते हैं।

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मुस्लिम महिलाओं की निर्णय स्वतंत्रता: प्रतिरोध का एक स्वरूप

आरिफा खातून

पी-एच.डी शोधार्थी,मानवविज्ञान विभाग.संपर्क: arifakhatoon08@gmail.com

इस्लाम में विश्वास रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति मुसलमान कहलाता है और मुसलमानों को नियंत्रित या शासित करने वाली विधि को मुसलमान विधि या शरीयत कहा जाता है। मुस्लिम धार्मिक किताब कुरआन वह प्रथम धार्मिक किताब है जिसमें आज से 1400 वर्ष पूर्व ही औरतों को पुरुष के बराबर मान लिया गया (सिंह,2008)। लेकिन मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था में औरतों को मर्दों के मुकाबले दोयम दर्जे का माना जाता है, औरत के सामाजिक स्तर का सम्बन्ध सामाजिक मूल्यों से ताल्लुक रखने वाली समस्याओं से है। औरत के दर्जे से अर्थ यह है कि एक समाज विशेष में औरत को मर्द से ऊँचा, नीचा या बराबर क्यों माना जाता है।परिवार, विवाह, शिक्षा, राज्य आदि सामाजिक और राजनैतिक संस्थाएं इस तरह की होनी चाहिए कि वह मनुष्य के स्वभाविक विकास को कुंठित ना करें बल्कि उसे आजादी के साथ अधिक विश्वास का मौका दे। यही संस्थाएं जोकि मनुष्य को  संतुष्ट करने के लिए बनाई थी, उनको कुंठित कर रही हैं। अगर हम स्त्री के अधिकार की बात करते हैं तो उसके निर्णय लेने की स्वतंत्रता के अधिकार को कैसे नजरंदाज कर सकते हैं। निर्णयन स्वतंत्रता ही स्त्री का सबसे बड़ा मानवाधिकार है। मूलतः समाज पितृसत्तात्मक है, निर्णय प्रक्रिया से व्यवस्थित इस पितृसत्तात्मक समाज में अभी भी उच्च स्तर पर लैंगिक असमानता व्याप्त है। सामाजिक और आर्थिक रूप में महिलाओं में निर्णय के विकल्प बहुत सीमित होते हैं। निर्णय लेने का अधिकार सभी व्यक्ति को होता है। इसमें महिलाओं का भी अहम स्थान है जो कि हमारे देश कि कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं। निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं कि भूमिका उनकी स्वायत्तता या स्वतंत्रता को दर्शाती है निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं कि भूमिका प्राकृतिक और सीमित होती है। महिलाओं का निर्णय कई सामाजिक संस्थाओं से प्रभावित रहता है जैसे परिवार,विवाह, नातेदारी इत्यादि। जिसके कारण मूलतः उन्हें ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं जो कि उनके स्वयं के नहीं होते मतलब कि उनमें उनकी पसंद शामिल नहीं होती है। निर्णय लेने में महिलाओं कि भूमिका कमजोर उजागर होती है और संसाधनों पर उनका बहुत ही कम नियंत्रण होता है। निर्णय प्रक्रिया में शिक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।“शिक्षा महिलाओं की पारंपरिक पारिवारिक भूमिका से अलग नहीं करती लेकिन एक माँ और पत्नी के रूप में उनके सामाजिक मूल्यों को बेहतर और सशक्त बनाती है। बेहतर स्थिति में होने का प्रभाव उनके निर्णयन क्षमता पर भी आवश्यक रूप से दिखाई पड़ता है (Srinivas1977)”।

सुधार नहीं पूर्ण बदलाव चाहेंगी महिलायें

अगर हम एक स्त्री को उसके समस्त निर्णय का अधिकार देते हैं तो इसका मतलब है की हम उसे स्वतंत्र जीवन का उपहार दे रहे होते हैं और उसके व्यक्तित्व को बढ़ावा दे रहे होते हैं, क्योंकि अपने जीवन के फैसले स्वयं करने से व्यक्तित्व का विकास होता है। मुस्लिम समाज में महिलाओं को अपने अस्तित्व को लेकर अधिक संघर्षरत होना पड़ता है क्योंकि उनके स्वतंत्र अधिकारों को अकसर शरीयत और धर्म का हवाला देकर मारा जाता रहा है। आमतौर पर महिलाओं के संबंध में देखा जाता है कि उन्हें केवल कुछ घरेलू निर्णय लेने का ही अधिकार प्राप्त होता है और यह निर्णय उनके खुद के नहीं बल्कि पारिवारिक होते हैं। महिला अपने बच्चे का पालन पोषण करती है लेकिन उस बच्चे के बारे में फैसला लेने का हक उनको बहुत कम ही मिलता है। ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां महिलाओं को अभी भी स्वतन्त्रता नहीं मिली है। मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति और भी गंभीर है। मुस्लिम समाज में महिलाओं को और अधिक नियमों और प्रथाओं का पालन करना पड़ता है। अगर हम महिलाओं के व्यक्तिगत जीवन को देखें तो वहाँ भी उनको अपनी स्वतन्त्रता के लिए अभी भी संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्हें किससे शादी करनी है? कितने बच्चे पैदा करने हैं? किस प्रकार के कपड़े पहनने हैं? कहाँ पढ़ाई करनी है? समाज के किन लोगों से ही व्यवहार रखना है? महिलाओं के व्यक्तिगत जीवन के सम्पूर्ण निर्णय का संचालन अप्रत्यक्ष रूप से उनके पारिवारिक सदस्य और समाज के ठेकेदारों द्वारा नियंत्रित होता है। यदि महिलाओं के पास स्वायत्ता और सामाजिक आर्थिक स्वतंत्रता हो तो वह अपनी निर्णय क्षमता का भरपूर उपयोग कर सकती हैं। उनकी स्वतंत्रता का क्षेत्र जितना बढ़ता जाएगा निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी उसी क्रमानुपात में बढ़ेगी।

कुछ मुस्लिम महिलाओं के रचनात्मक प्रतिरोध की दास्तान 


1.भारत का पहला कन्या स्कूल खोलने में फातिमा शेख ने सावित्रीबाई फुले की मदद की थी। फातिमा शेख सावित्रीबाई फुले की सहयोगी थीं। जब ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने का बीड़ा उठाया, तब फातिमा शेख ने भी इस मुहिम में उनका साथ दिया।उस जमाने में अध्यापक मिलने मुश्किल थे। फातिमा शेख ने सावित्रीबाई के स्कूल में पढ़ाने की जिम्मेदारी भी संभाली। इसके लिए उन्हें समाज के विरोध का भी सामना करना पड़ा। फातिमा शेख पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका थीं। हालांकि इतिहास ने उन्हें नजरंदाज कर दिया। फातिमा के बड़े भाई उस्मान शेख ने भी महिलाओं की शिक्षा को समर्थन दिया।

नादिया अली का सेक्सुअल क्रूसेड

2.“मसीह अलीनेजाद” जो कि एक इरानी पत्रकार एवं नारीवादी महिला है, कहती हैं कि मैंने हमेशा से माँ, बहनों व चाचियों को हिजाब पहने देखा। यह सामान्य सी बात थी, पर जब वह सात साल की हुईं, तो उन्हें अहसास कराया गया कि हिजाब पहनना नियम है। उन्हें हिदायत दी गई की वह बिना स्कार्फ पहने घर से बाहर न निकलें। उन्हें अपने काले घुँघराले बालों को हवा में लहराना बहुत पसंद था, मगर उन पर हिजाब का नियम थोप दिया गया। इस बार उन्होंने सवाल उठाये, पर सबने डांट दिया। स्कूल की खेल प्रतियोगिताओं में लड़कों को हिस्सा लेते देख मसीह ने कहा किवह भी खेलना चाहती हैं, पर शिक्षक ने मन कर दिया। मसीह कहती हैं की तब मैं आजादी के मायने नहीं जानती थी, ना ही तब मैं महिला अधिकारों को समझती थी। पर मुझे हर दिन यह अहसास होता था की भाई और मेरे बीच भेदभाव हो रहा है। बड़ी हुई तो पता चला कि पूरे देश में महिलाओं के साथ भेदभाव हो रहा है। तमाम पाबंदियों के बावजूद मसीह की पढाई जारी रही। कालेज के दौरान वह छात्र राजनीति में आ गईं। यह बात पुरुषों को पसंद नहीं आई। 1994 में एक छात्र प्रदर्शन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके मन में ढेरों सवाल थे। वह अपने देश की हुकूमत से सवाल पूछना चाहती थीं कि महिलाओं पर पाबंदियां क्यों थोपी गई हैं? कालेज  से निकलने के बाद उन्होंने पत्रकारिता करने का फैसला किया। वह ईरान लेबर न्यूज एजेंसी में काम करने लगीं, यहाँ उन्हें पार्लियामेंट कवर करने का मौका मिला। साल 2005 में उन्होंने एक खबर लिखी, जिसमें सांसदों के भ्रष्टाचार का खुलासा था। खबर पर भारी हंगामा हुआ, उन्हें पार्लियामेंट की रिपोर्टिंग से बाहर कर दिया गया। मसीह कहती हैं, जब मैं सांसदों से सवाल पूछती थी, तब वह जवाब देने की बजाय मुझसे कहते थे, पहले आप हिजाब पहनकर आइये, तब बात करेंगे। वे मर्द पत्रकारों से बात करते थे और मुझे जानबूझ कर नजर अंदाज करते थे। उनका मकसद मुझे अपमानित करना था। साल 2014 में उन्होंने फेसबुक पर माई स्टीलथी फ्रीडम पेज बनाया। इसका मकसद ईरान की महिलाओं को एक फोरम मुहैय्या कराना था, जहाँ वे हिजाब के खिलाफ  अपनी आवाज उठा सकें। बस चाँद दिनों में ही यह पेज पूरी दुनियां में मशहूर हो गया। ईरान की लाखों महिलाओं ने इस पेज पर अपने सन्देश पोस्ट किए। तमाम महिलाओं ने बिना हिजाब के अपनी तस्वीरें पोस्ट कीं और इच्छा जाहिर की कि उन्हें बिना हिजाब के बाहर निकलने की इजाजत दी जाए। मसीह कहती हैं कि मैंने कभी सोंचा भी नहीं था कि इतनी महिलाएं मेरे अभियान से जुड़ेंगी। पेज पर महिलाओं के फोटो और सन्देश देखकर लगता है कि वे अपनी आजादी के लिए किस कदर बेताब हैं। उनके जज्बे को सलाम!  आज पूरी दुनियां में इस अभियान की चर्चा है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने इसे स्कार्फ क्रांति का नाम दिया।

3. मलाला युसुफजई है जिसने शिक्षा के अधिकार के लिए आतंकियों से टक्कर ली। मलाला ने तालिबान के कट्टर फरमानों से जुड़ी दर्दनाक दास्तानों को महज 11 साल की उम्र में अपनी कलम के जरिए लोगों के सामने लाने का काम किया। 2008 में तालिबान ने स्वात घाटी पर अपना नियंत्रण कर लिया। वहां उन्होंने डीवीडी, डांस और ब्यूटी पार्लर पर बैन लगा दिया। साल के अंत तक वहां करीब 400 स्कूल बंद हो गए। इसके बाद मलाल के पिता उसे पेशावर ले गए जहां उन्होंने नेशनल प्रेस के सामने वो मशहूर भाषण दिया जिसका शीर्षक था- हाउ डेयर द तालिबान टेक अवे माय बेसिक राइट टू एजुकेशन? तब वो महज 11 साल की थीं। साल 2009 में उसने अपने छद्म नाम श्गुल मकईश् से बीबीसी के लिए एक डायरी लिखी। इसमें उसने स्वात में तालिबान के कुकृत्यों का वर्णन किया था। 2012 को तालिबानी आतंकी उस बस पर सवार हो गए जिसमें मलाला अपने साथियों के साथ स्कूल जाती थीं। उन्होंने मलाला पर एक गोली चलाई जो उसके सिर में जा लगी। मलाला पर यह हमला 9 अक्टूबर 2012 को खैबर  पख्तूनख्वा प्रांत के स्वात घाटी में किया था। जब वह स्वस्थ हुई तो अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार, पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार (2011) के अलावा कई बड़े सम्मान मलाला के नाम दर्ज होने लगे। 2012 में सबसे अधिक प्रचलित शख्सियतों में पाकिस्तान की इस बहादुर बाला मलाला युसूफजई के नाम रहा। लड़कियों की शिक्षा के अधिकार की लड़ाई लड़ने वाली साहसी मलाला यूसुफजई की बहादुरी के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा मलाला के 16वें जन्मदिन पर 12 जुलाई को मलाला दिवस घोषित किया गया। बच्चों और युवाओं के दमन के ख़िलाफ और सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले भारतीय समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी के साथ संयुक्त रूप से उन्हें 10 दिसंबर 2014 को नार्वे में आयोजित एक कार्यक्रम मे शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। 17 वर्ष की आयु में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली मलाला दुनिया की सबसे कम उम्र वाली नोबेल विजेती बन गयी।

मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड

4. बेनजीर भुट्टो 2 दिसंबर 1988 को मुस्लिम दुनियां की पहली मुस्लिम महिला प्रधानमंत्री बनीं। उस देश (पाकिस्तान) की प्रधानमंत्री जहाँ सत्तारूढ़ कट्टरपंथियों का मानना था कि मुस्लिम औरतें शासन नहीं कर सकतीं यह इस्लाम के खिलाफ है। बेनजीर औरतों की ताकत बनकर उभरीं। वह मात्र ३५ बरस की सबसे कम उम्र की प्रधानमंत्री  बनीं। बेनजीर लोकतंत्र के अधिकार में तथा तानाशाही के खिलाफ लडती रहीं , वह पाकिस्तान में इस्लामी कानून लागू करने के सख्त खिलाफ थीं। बेनजीर पाकिस्तान को लोकतान्त्रिक देश बनाने के पक्ष में थीं जिसमें सभी को समान अधिकार मिले। वह महिलाओं के अधिकारों को लेकर लड़ती रहीं। इसी कारण रावलपिंडी  में  27 दिसंबर  2007 को बेनजीर भुट्टो की निर्मम हत्या कर दी गई। अपनी हत्या से पहले बेनजीर ने अपनी जीवनी  “मेरी आपबीती” लिखी। सन्डे टाइम्स लिखता है कि “यह आपबीती एक बहुत बहादुर औरत कि आपबीती है जिसने अनेक चुनौतियाँ स्वीकार कीं, जिसके परिवार के अनेक लोग शहीद हुए, जिसके परिवार के अनेक लोग शहीद हुए, जिसने पाकिस्तान की आजादी की मशाल जलाये रखी, बावजूद तानाशाही के विरोध के।”

मलाला की कहानी बी बी सी के जुबानी

5. महिलाओं को हर जगह अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष करना पड़ा है। चाहे वह धार्मिक स्थल में प्रवेश को लेकर ही क्यों न हो। मजारों  और मंदिरों में प्रवेश का अधिकार अभी भी पूरी तरह से महिलाओं को नहीं मिल पाया है। हाल ही में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने हाजी अली दरगाह में प्रवेश की इजाजत पा कर ऐतिहासिक जीत हासिल की। हाजी अली दरगाह में 2012 से पहले महिलाएं जाती थीं मगर उसके बाद हाजी अली दरगाह ट्रस्ट ने परम्पराओं का हवाला देते हुए औरतों के भीतरी हिस्से तक जाने पर पाबन्दी लगा दी। मजार में प्रवेश पर पाबन्दी को जाकिया सोमन, नूरजहाँ एवं  साफिज नियाज ने चुनौती दी। 24 अक्टूबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने पुरुषों की तरह महिलाओं को भी दरगाह में प्रवेश देने का फैसला सुनाया। जो संस्था इसकी लड़ाई लड़ रही है उसके कुछ और भी सवाल हैं, जो हाजी अली दरगाह में प्रवेश से कहीं ज्यादा तल्ख और मुस्लिम समाज के भीतर मर्दों के वर्चस्व को चुनौती देते हैं। इस संस्था के उभार से खास तौर से उन मौलानाओं की दुनिया में हड़कंप तो मची ही होगी जो रस्मो रिवाज की व्याख्या करते समय मुस्लिम औरतों के हक के सवाल को टाल जाते हैं। इसलिए एक बड़े टकराव के लिए तैयार रहना चाहिए। 2007 में यह संस्था बनी थी और संविधान के फ्रेम के तहत मुस्लिम महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने का इरादा रखती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में कानूनी सुधार की बात करती है। धर्म की सकारात्मक और उदार व्याख्या में यकीन रखती है। मुस्लिम औरतों के आर्थिक और धार्मिक अधिकारो में बराबरी लाना चाहती है। मुस्लिम समाज के भीतर जातिगत भेदभाव के प्रति समझ पैदा करना चाहती है। दलित मुस्लिमों के सवाल उठाना चाहती है। पूंजीवाद, सांप्रदायिकता, फांसीवाद और साम्राज्यवाद का विरोध करती है। यह संस्था मुस्लिम समाज के भीतर एक वैकल्पिक प्रगतिशील आवाज बनना चाहती है।

इनके अतिरिक्त और भी मुस्लिम महिलाओं ने समय-2 पर अपने साहस का परिचय दिया है। जिनमें रजिया सुल्तान का नाम उल्लेखनीय है। रजिया सुल्तान मुस्लिम एवं तुर्की इतिहास कि पहली महिला शासक थीं।
इन सभी महिलाओं के संघर्ष की दास्तान को जानकार लगता है कि जब बंदिशों में यह इतने साहसी कार्य कर सकती हैं जोकि ना सिर्फ खुद के लिए बल्कि समाज के लिए भी थे। तो यदि इन्हें अपना जीवन जीने की स्वतंत्र छुट दे दी जाए तो निश्चित ही महिलाएं समाज में व्याप्त कुरीतियों और रुढियों को तोड़कर समाज का एक नया ढांचा प्रस्तुत करेंगी।


सन्दर्भ सूचि
1.सिंह, निशांत (2008). मानवाधिकार और महिलाएं. राधा पब्लिकेशन, नईदिल्ली
2.Srinivas,M. N.  (1977). The Changing Position of Indian Women.  Man, New Series
3.भुट्टो, बेनजीर (2012). मेरी आपबीती. राजपाल एंड सन्ज. नई दिल्ली
4.हिंदुस्तान अखबार, 22 मार्च 2015

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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अस्तित्व के प्रश्न खड़े करती दलित स्त्री पात्र

शिप्रा किरण

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग.बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय
लखनऊ,
संपर्क: kiran.shipra@gmail.com



अभिव्यक्ति के तमाम सशक्त माध्यमों में से एक है- सिनेमा. जिसके बहुत गहरे और गंभीर सरोकार हैं. आमतौर पर समझा जाता रहा है कि सिनेमा मात्र मनोरंजन का ही एक साधन है. यह मात्र मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि अपने विभिन्न टूल्स के साथ प्रतिरोध का एक जरिया भी है. इसने अपने अन्दर तमाम सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को समेटा है. लगभग सभी आधुनिक-उत्तर आधुनिक विमर्श फिल्मों का हिस्सा बने हैं. उन्हीं अस्मितामूलक विमर्शों में एक  है- स्त्री विमर्श. साहित्य या समाजविज्ञान की तरह हिन्दी सिनेमा ने स्त्री से सम्बंधित विषयों को विमर्श की तरह तो प्रस्तुत नहीं किया क्योंकि सिनेमा एक उद्योग है और उसके बाजार की अपनी एक सीमा है परन्तु यह अवश्य हुआ है कि विमर्श के तमाम पहलुओं को सिनेमा ने अपना विषय जरूर बनाया. स्त्री मुक्ति और उसकी अस्मिता की पहचान करना या उसे रेखांकित करने का कार्य हिंदी सिनेमा ने जरूर किया है. ध्यान देने वाली बात यह है कि आज स्त्री विमर्श के भीतर भी एक नई धारा की शुरुआत हो चुकी है जिसे ‘दलित स्त्रीवाद या अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म’ कहा जाता है. साहित्य और सामजिक विज्ञानों के अंतर्गत दलित स्त्रीवाद, दलित स्त्रियों के अधिकारों और संघर्षों को मुखर आवाज देने वाला माध्यम है. खासकर दलित स्त्रियों का लेखन उनकी अभिव्यक्ति का एक औजार बन कर सामने आया है. सिनेमा ने भी समय≤ पर दलित स्त्री की विभिन्न छवियों को उनकी समस्याओं के साथ अभिव्यक्त किया है. साहित्य और सिनेमा दोनों ही कला के दो मजबूत स्तम्भ हैं साहित्य की तरह ही सिनेमा भी अपने दृश्य रूप में समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ता है. कहीं न कहीं सिनेमा और साहित्य दोनों ही कला रूपों की यह जिम्मेवारी है कि वह समाज के हाशिये को केंद्र में लाने का प्रयास करे. दलित विमर्श के इस दौर में जब दलित स्त्रीवाद उस विमर्श की एक जरूरी शाखा बन कर हमारे सामने है साहित्य के क्षेत्र में अधिकांश दलित स्त्रियों का कहना है कि उनको अब भी दलित सहित्य में वह स्थान नहीं मिला है जबकि उनका शोषण सर्वाधिक और दोहरा-तिहरा है. इसी सन्दर्भ में प्रख्यात मराठी लेखक और अम्बेडकरवादी चिन्तक यशवंत मनोहर अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म के एक स्वतंत्र श्रेणी में हो रहे साहित्यिक विकास के विषय में उसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं- “यह फेमिनिज्म स्त्री को गुलाम करने वाली पूरी समाज व्यवस्था बदलना चाहता है…जिन जिन अविष्कारों ने स्त्रियों को पुरुषों की दासी बनाया है उन सब अविष्कारों को अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म नकारता है…अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म का पुरुष से विरोध नहीं है. उसकी लड़ाई पुरुष के अहंकार से है, उसके अन्दर की वर्चस्व भावना से है…स्त्री किसी की गुलाम नहीं होगी. वह स्वतंत्र, समंजस, बुद्धिवादी और सम्पूर्ण मानव होगी.”1 इधर के कुछेक वर्षों में दलित स्त्रीवाद विमर्श की एक नई शाखा बन कर भले ही उभरा है लेकिन दलित स्त्री के दोहरे शोषण को, उसकी अस्मिता पर आए संकटों को, उस पर हो रहे चैतरफा अत्याचारों को हिंदी सिनेमा अपने तरीके और अपने स्तर पर न जाने कितने वर्षों से चित्रित करता आ रहा है.

समाज और कलाएँ खासकर साहित्य और सिनेमा हमेशा से एक दूसरे के पूरक रहे हैं. 1936 में आई अशोक कुमार-देविका रानी अभिनीत तथा हिमांशु राय द्वारा निर्मित ‘अछूत कन्या’ एक दलित स्त्री को केन्द्रीय पात्र के रूप में रखकर बनाई गई फिल्म है. जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है फिल्म एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अछूत बिरादरी या दलित समुदाय से सम्बन्ध रखती है. पूरी फिल्म दलित स्त्री पात्र कस्तूरी (देविका रानी) के इर्द-गिर्द ही रची-बसी है. एक दलित स्त्री और ब्राह्मण युवक प्रताप (अशोक कुमार) के प्रेम की कहानी कहती यह फिल्म उस सामंतवादी-जातिवादी समाज में एक साहसी उपस्थिति दर्ज कराती है. “फिल्मों की लगातार उपेक्षा के दौर में जमींदारी समाज को चुनौती देने वाली फिल्में आईं. अछूत कन्या 1936 में आयी थी. ब्राह्मण और हरिजन युवती के अंतरजातीय संबंधों पर बनी यह फिल्म स्त्री की स्वतंत्र इच्छा शक्ति को बिना लाग लपेट के रेखांकित कर सकी थी.”2 और यह सिर्फ एक युवा दलित स्त्री और युवा ब्राह्मण पुरुष के बीच के सहज आकर्षण और प्रेम की ही अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि इन दोनों के पिता और परिवारों के बीच के मानवीय प्रेम और भाईचारे की कहानी भी बयान करती है. दलित कस्तूरी का पिता दुखिया, प्रताप के ब्राह्मण पिता मोहनलाल के शरीर से सांप का जहर चूस कर उसकी जान बचाता है वहीं से दोनों के दोस्ती की शुरुआत होती है. यह दोस्ती किसी भी जाति-धर्म के बंधन से बहुत परे थी. इसी दोस्ती के मजबूत दरख्त के साए में कस्तूरी और प्रताप का बचपन बीतता है. दोनों दो दोस्तों के प्रेम को देखते हुए जवान होते हैं. वही प्रेम उन्हें विरासत में मिलता है जो उम्र के साथ धीरे-धीरे विस्तार पा रहा होता है. दोनों के पिता अपने बच्चों कस्तूरी और प्रताप के प्रेम समबन्ध और उनके आपसी स्नेह से वाकिफ भी रहते हैं लेकिन उन्हें इस बात का अंदाजा भी अच्छी तरह रहता है कि इस सम्बन्ध की कोई अंतिम व सुखद परिणति नहीं हो सकती. प्रताप का पिता मोहनलाल एक जगह अपनी पत्नी अर्थात प्रताप की माँ से कहता है- “कस्तूरी हमारी जात की रहती तो प्रताप के लिए कैसी अच्छी थी? माँ जवाब देती है, कहती है- “होती तब न? पर वह तो अछूत की बेटी है.” दोनों का आपसी लगाव देख माता-पिता कुछ सशंकित भी हैं. प्रताप के माँ-बाप का यह संवाद उनकी शंका को अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करता है- “अब भी कुछ नहीं बिगड़ा. हम प्रताप के लिए कन्या खोजते हैं उधर दुखिया से कहते हैं कि कस्तूरी के लिए भी वर ढूंढें.” दोनों का अपनी अपनी जाति में जल्द से जल्द विवाह कर देना ही उन्हें एक दूसरे से दूर करने का एकमात्र उपाय लगता है. प्रताप के माता-पिता को भी कस्तूरी से बहुत स्नेह है लेकिन जाति की श्रेष्ठता का अहसास भी उनके भीतर लगातार बना रहता है यह अलग बात है कि वह अहसास कभी अहंकार या झूठे गर्व में तब्दील नही हो पाता क्योंकि उनकी मनुष्यता उस जातिवादी श्रेष्ठता पर कहीं अधिक भारी पड़ती है. छुआछूत और जातिवाद मनुष्य के चेतन-अवचेतन पर इस तरह हावी है कि कस्तूरी के प्रति अगाध स्नेह रखने के बावजूद प्रताप की माँ जब यह जानती है कि प्रताप कस्तूरी के हाथ का बना खाना खाया करता है. माँ की त्योरियां चढ़ जाती हैं- “बाम्हन का पूत होके इसके हाथ का खाता है?” प्रताप की माँ के स्नेहिल रूप का अचानक इस तरह कठोर हो जाना कस्तूरी को असहज कर देता है. जो कस्तूरी थोड़ी देर पहले प्रताप को खाना खिलाकर इतरा रही थी अब डर सी जाती है. जल्दी जल्दी कहने लगती है- “माँ, गुस्सा न हो अब मैं इसे कभी न खाने दूंगी. माँ, मैं कसम खाती हूँ अब कभी न खाने दूंगी.” कस्तूरी दुखी तो होती है पर अधिक देर नहीं क्योंकि उसे अपनी अछूत स्थिति स्वीकार्य है. उस रुढ़िवादी समाज में किसी दलित कन्या के लिए इतना ही काफी था कि उसका किसी ब्राह्मण परिवार से सहज सम्बन्ध है. वह एक ब्राह्मण युवक के साथ खेलती और घूमती है. तब वहाँ जाति चेतना, वर्ग चेतना या जातीय अस्मिता का तो प्रश्न ही नहीं था. अपने जातिवादी-सामंती समाज और इस मेल-मिलाप के परिणामों का भान भी इन दोनों परिवारों को बखूबी है और अपने भाईचारे और दोस्ती को रिश्ते या पारिवारिक सम्बन्ध में न बदल पाने का दुःख भी दोनों तरफ है. जब प्रताप की माँ दोनों को ना मिलने का आदेश देती है. प्रताप का पिता कस्तूरी के पिता से कहता है- “दुखिया, हम एक जात के होते तो कैसा अच्छा था!” तब कस्तूरी का पिता कहता है- “हाँ भैया, ये दोनों एक दूसरे पर जान देते हैं.” यह संवाद दोनों की ही विवशता और व्यथा की तीव्रता बताता है. निश्छल और सच्चे-एकनिष्ठ प्रेम के बावजूद जाति की दीवार उन्हें मिलने नहीं देती. प्रताप का विवाह एक ब्राह्मण लड़की से कर दिया जाता है. कस्तूरी अकेली रह जाती है. हमेशा की हंसती-चहकती कस्तूरी अब उदास सी हो जाती है. पिता के समझाने पर कहती है- “बचपन में खेलना बुरा नहीं था तो अब कैसे हो गया? पिता कहता है- “अब तुझसे कौन दलील करे? वह जवाब देती है- मैं दलील नहीं करती बापू मैं तो बस जानना चाहती हूँ….बोलो जवाब दो” पिता उसके सवाल को अनसुना करने का प्रयास करता है “अगर वह बाम्हन है और मैं अछूत तो इससे हमारा साथ क्यों छूटे?” वह बार-बार यही प्रश्न करती है. तब तक जब तक कि पिता उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दे देता. इसलिए उस समय और सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए प्रमोद भारद्वाज ने इस फिल्म की रीलीज को उस समाज में ‘पहला उपद्रव’ कहा है- “पहला उपद्रव ‘अछूत कन्या’ (1936) से हुआ. यह एक वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक और ईमानदार अभिव्यक्ति थी. यह उपद्रव किसी खास दर्शक समूह में नहीं हुआ, क्योंकि इस फिल्म का मकसद किसी को सताना या चिढ़ाना कतई नहीं था. आजादी का आन्दोलन था. समाज शुद्धिकरण की प्रक्रिया में था. मनुष्य को हमेशा दूसरा नागरिक बनाने बताने वाली मान्यताओं की सीवनें उधड रही थीं.”3  सन1936 में अपने परिवार, उस समाज से सहज और आवश्यक प्रश्न करती, जवाब मांगती दलित स्त्री है अछूत कन्या की कस्तूरी. जिस समाज में स्त्री होने का अर्थ मुंह बंद कर हर तरह के अत्याचार को सहना, पुरुष सत्ता को सिर झुका कर स्वीकार करना, ना हँसना और न ही कुछ बोलना हो उस समाज में एक दलित लड़की कस्तूरी का एक ब्राह्मण युवक के साथ खूब घूमना, खुल कर हँसना, उछलना कूदना और गाने गाना, अन्य स्त्री पात्रों की तरह सिर पर आँचल ना रखना पूरी सामंती और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को चुनौती है. यह ठीक है कि दोनों विवाह बंधन में नहीं बंध सके लेकिन उनका प्रेम अंत तक उस समाज को बेचैन किये रहा और पितृसत्ताक समाज के आँख की किरकिरी बना रहा. कस्तूरी का विवाह एक दलित युवक मन्नू से कर दिया जाता है. वह अपने पति के प्रति समर्पित रहने का हरसंभव प्रयास करती है लेकिन प्रताप को नहीं भूल पाती. कस्तूरी के मन में अपने पति की पहली पत्नी के लिए भी कोई दुर्भावना नहीं रहती किन्तु पहली पत्नी कजरी प्रताप की पत्नी मीरा के साथ मिलकर कस्तूरी के खिलाफ उसे बदनाम करने की एक साजिश रचती है. एक दलित स्त्री ही यहाँ दलित स्त्री के खिलाफ खड़ी हो जाती है. जहां प्रताप की पत्नी को अपने अधिकारों के प्रति कोई चेतना नहीं थी वहीं मन्नू की पहली पत्नी अपने पति से मिलने वाले अधिकारों के प्रति सजग थी. लेकिन इसी सजगता में वह अनजाने ही नकारात्मक भूमिका में आ जाती है. जबकि वह अपने पिता और पति दोनों की ही ज्यादती का शिकार थी. वह अपने पति के साथ रहना चाहती थी लेकिन उसके पिता को यह मंजूर नहीं था. जब वह अपने पिता का विरोध कर पति के साथ रहने आती है तो पति उसे स्वीकार नहीं करता. दलित स्त्री अपनी जाति में भी पुरुषवादी मानसिकता और शोषण का शिकार है. दलित स्त्रियों पर होने वाले दोहरे शोषण के विषय में मोहनदास नैमिषराय लिखते हैं- “वैसे तो पूरे भारतीय समाज की स्त्रियाँ पितृसत्ता के बोझ के नीचे कराह रही थीं लेकिन दलित स्त्रियों को न केवल अपने समाज की पितृसत्ता को झेलना पड़ता था बल्कि सवर्ण समाज की पितृसत्ता भी उनका शोषण और दमन करती थी.”4 यह ठीक है की फिल्म में कस्तूरी किसी विद्रोही भूमिका में नजर नहीं आती किन्तु उस दौर में जब लोग इश्क का नाम जबान पर लाने से डरते हों, एक स्त्री का खुलकर प्रेम करना वह भी एक दलित स्त्री का किसी ब्राह्मण युवक से प्रेम करना. प्रेम को छुपाने की जगह खुलकर उसे अभिव्यक्त करना, अपने विवाह, अपने प्रेम सम्बन्ध, जातियों के अंतर जैसे मसलों से जुड़े सवाल उठाना, भयानक रुढियों में जकड़े उस गुलाम-सामंती समाज में एक दलित स्त्री के लिए इससे बड़ा विद्रोह और क्या होगा. 1936 में ही प्रकाशित प्रेमचंद के गोदान की दलित पात्र सिलिया और मातादीन के प्रेमसंबंध वाले प्रकरण को भी इस सन्दर्भ में याद किया जा सकता है. अंतर यह है कि वहां विद्रोह का तीव्र और अधिक मुखर रूप था. और यह अंतर विधाओं के बीच के अंतर के कारण था. उनके दर्शक और पाठक वर्ग के अंतर के कारण था. इसी सन्दर्भ में अरुण कुमार ने लिखा है- “हिन्दी के कथा साहित्य में ऐसे उदाहरण तो थे. फिल्मों में इसे जगह मिल जाने को सामाजिक ढाँचे के लिए चुनौती भी समझा गया. संयोग या दुर्योग से राजनैतिक आन्दोलन के उस दौर में कुछ ऐसे अंतरजातीय दाम्पत्य सम्बन्ध भी हुए जिन्हें कांग्रेस के कई नेताओं ने अच्छा नहीं समझा. इसे राजनैतिक सरगर्मी का सामाजिक प्रभाव भी मना जा सकता है…बिहार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के एक नेता कुलानंद झा ‘वैदिक’ एक हरिजन युवती से परिणय सूत्र में बंधे थे. दरभंगा के विप्र समाज ने उनका बहिष्कार किया.”5  हिंदी सिनेमा और उससे जुड़े लगे कहीं न कहीं इन सब बातों के साक्षी थे, उन्हें भी खबर थी. और उन्हें ऐसे मुद्दों से अपनी फिल्म के लिए विषय भी मिले. लेकिन सभी जातिगत और स्त्री मुद्दे के भी कुछ पक्षों को उठाने के बावजूद यह हमारे समाज की विडम्बना ही थी कि निर्देशक एक दलित स्त्री और ब्राह्मण पुरुष का विवाह करा पाने का साहस नही कर पाता और फिल्म के अंत में कस्तूरी एक तेज गति से आती ट्रेन को दुर्घटना से बचाने के प्रयास में अपने प्राण गँवा देती है. अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद अछूत कन्या हिन्दी सिनेमा के इतिहास की पहली साहसिक फिल्म कही जा सकती है जो दलित स्त्री की आवाज बन कर हमारे सामने आती है. इसी फिल्म के बारे में फिल्म आलोचक प्रहलाद अग्रवाल लिखते हैं- “अछूत कन्या में अछूत नायिका को छोड़ने की दुर्बलता उस समय की भीषणतम सच्चाई थी…अछूत कन्या में छुआछूत के अमानवीय कृत्य को बड़ी तीव्रता से उकेर कर उसकी भर्त्सना की गई थी. यह उस समय आसान बात नहीं थी. यह बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध था और राष्ट्र इस समस्या से गहराई तक ग्रस्त था.”6

अछूत कन्या के 23 वर्ष बाद अर्थात 1959 में एक फिल्म आती है- सुजाता. कुछ समानताओं और असमानताओं के साथ यह फिल्म भी दलित युवती और ब्राह्मण युवक के प्रेम की कहानी है. नूतन और सुनील दत्त के अतिरिक्त तरुण बोस-सुलोचना के अभिनय से सजी विमल राय की यह फिल्म हिन्दी सिनेमा के इतिहास में अपनी खास जगह बना चुकी है. सुजाता एक दलित परिवार की लड़की है जिसके माता-पिता हैजे की महामारी का शिकार हो चुके हैं. उनकी दुधमुंही बच्ची को बस्ती के लोग वहाँ के इंजीनियर उपेन्द्रनाथ चैधरी (तरुण बोस) के घर लेकर आते हैं और उस बच्ची को सँभालने की गुहार लगाते हैं. पहले तो इंजीनियर बच्ची को सँभालने के लिए राजी नहीं होता लेकिन पत्नी चारू (सुलोचना) के कहने पर वह इस शर्त पर उसे रखने को तैयार हो जाता है कि जल्द ही उसके बिरादरी वाले आकर उसे ले जाएंगे. लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसे बनती हैं कि वह बच्ची वहीं उस ब्राह्मण इंजीनियर के परिवार में पलती और बड़ी होती है. चारू और उपेन्द्र नाथ सुजाता को अपनी सगी बेटी रमा (शशिकला) के साथ पालते हैं. पत्नी चारू सुजाता की व्यवस्था अपने घर से कहीं अलग करने का हरसंभव प्रयास करती है लेकिन चारू का सहज मातृत्व उसकी जातिवादी सामजिक बुद्धि के आड़े आ जाता है. व्यवहारिक बुद्धि पर भावना की जीत होती है और अंततः सुजाता उनकी सगी बेटी रमा के साथ ही खेलते-खेलते युवा होती है. विवशता में बना यह सम्बन्ध अब एक गहरे मानवीय सम्बन्ध में बदल जाता है. यही मानवीय स्नेह और सरोकार ‘अछूत कन्या’ के मोहनलाल और सुजाता के उपेंद्रानाथ को एक समान स्तर पर लाकर खड़ा करता है. “सुजाता (1959) विमल राय की यह बहुचर्चित फिल्म, दलित विमर्श पर बनी पूर्व की अछूत कन्या का परिष्कृत रूप है…यहाँ भी अछूत कन्या की तरह दलित युवती (नूतन) और ब्राह्मण युवक (सुनील दत्त) है.”7 कुछ अर्थों में तो यह अछूत कन्या का परिष्कृत रूप कही जा सकती है लेकिन ‘अछूत कन्या’ में प्रताप की माँ और ‘सुजाता’ में भी रमा की माँ चारू की लगभग एक सी ही स्थिति है. पिताओं या पुरुषों से अधिक माओं या स्त्रियों में जातिवाद और छुआछूत की भावना अधिक प्रबल रूप में दिखाई देती है. इसके कारण भी हैं. हजारों वर्षों से स्त्रियाँ एक खास तरह से प्रायोजित, योजनाबद्ध और खतरनाक मानसिक कंडिशनिंग का शिकार रही हैं. ये कंडिशनिंग इतनी बारीकी से की गई है कि उन्हें स्वयं इसका रत्ती भर भी अहसास नहीं होता. उन्हें पता ही नहीं होता कि दूसरी स्त्री से किया गया उनका दुर्व्यवहार जाने-अनजाने ही उन्हें पूरी स्त्री जाति का शत्रु बनाता जा रहा है. उन्हें जरा भी समझ नहीं कि वह पितृसत्तात्मक समाज द्वारा किस तरह सदियों से इस्तेमाल की जा रही हैं. उन्हें इसी तरह अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर, स्त्रियों को ही स्त्रियों के खिलाफ खड़ा कर ‘स्त्री ही स्त्री की शत्रु’ जैसे पुरुषवादी जुमले फेंकती पितृसत्ताक मानसिकता ऐसे गढ़े गए जुमलों को भी अपने लाभ में इस्तेमाल कर ले जाती है. स्त्रियाँ भी इस तरह के ‘अस्मिता-विरोधी’ जुमले धड़ल्ले से प्रयोग करती हुई धीरे-धीरे उसी पुरुषवादी मानसिकता का शिकार होती जाती हैं. दोनों फिल्मों की माँओं को वर्तमान सन्दर्भों में इस तरह भी देखे जाने की जरूरत है. यह जरूर है कि ‘अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ के समय और सन्दर्भ वर्तमान से बहुत हद तक भिन्न हैं लेकिन पूरी तरह भिन्न भी नहीं. उन्हें वर्तमान से पूरी तरह काटकर न देखा जा सकता है ना ही समझा जा सकता है. वह भी कहीं न कहीं पुरुषवाद के भवन को मजबूत करने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा हैं. माँ चारू जब-जब सुजाता को मेहमानों के सामने “यह हमारी बेटी जैसी है” कहती है सुजाता का दिल चाक-चाक हो जाता है. माँ का ममतामयी मन तो उसे अपनी बेटी स्वीकार करता है लेकिन वर्णवादी बुद्धि उससे बार-बार यही कहलाती है. एक  माँ और एक ब्राह्मण स्त्री के द्वंद्व को चारू के चरित्र में स्पष्ट देखा जा सकता है. किन्तु पिता जिसे वह बापू कहती थी का बराबरी वाला स्नेह उसे बुरी स्थितियों में भी सांत्वना देता है. एक दिन जब सुजाता की अम्मी चारू उसे मेहमानों के लिए चाय लाने से मन करती है तो सुजाता हैरान रह जाती है. वह अम्मी से पूछती है- “मैं कौन हूँ? मैं ये जानना चाहती हूँ कि मैं हूँ कौन?…मेरे हाथ की चाय वो क्यों न पीते? क्या मेरे हाथ से छू जाने से चाय जहर बन जाती?” लेकिन अम्मी उसके सवालों को टाल जाना चाहती हैं. सुजाता जिद करती है- “बिना जाने नहीं छोडूंगी? बताओ.” ‘अछूत कन्या’ की कस्तूरी की तरह यहाँ भी दलित स्त्री प्रश्न करती है. वहां प्रश्न कुछ भोले थे. वो जाति और वर्ण की सीमा के भीतर थे लेकिन यहाँ सुजाता का प्रश्न जाति-वर्ण से आगे जाकर स्त्री-प्रश्न और दलित स्त्री के प्रश्न का प्रतिनिधित्व करता है. यह उसकी पहचान, उसके व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने वाला और उन तमाम संकटों से जूझने के बाद पूछा जाने वाला स्वाभाविक प्रश्न है जो किसी भी स्त्री-दलित स्त्री द्वारा पूछा ही जाना चाहिए. वर्तमान समय में जब स्त्री विमर्श में स्त्री और दलित स्त्रीवाद के अंतर्गत दलित स्त्री पहचान के संकटों से लगातार जूझ रही1959 में सुजाता यदि ऐसे ज्वलंत प्रश्न खड़े कर रही थी तो सहज ही यह समझा जा सकता है यह फिल्म क्यों हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित होती है. इसके माध्यम से हम स्त्री के विशेषकर दलित महिलाओं के दोहरे दमन की स्थितियों से भी रूबरू होते हैं. जो आज का एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन कर हमारे सामने है. आज जब दलित स्त्रीवाद एक आन्दोलन के रूप में हमारे सामने है. इस विषय पर मोहनदास नैमिषराय ने लिखा है- “दलित समाज जहां एक ओर अपने अन्दर एक मध्यवर्ग के उदय से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है वहीं उसे दलित आन्दोलन के भीतर एक और आन्दोलन की आहटें भी सुननी पड़ रही हैं. यह है दलित महिलाओं का आन्दोलन जो समग्र महिला समुदाय के मुक्ति आन्दोलन का हिस्सा होने के साथ-साथ दलित समाज में पितृसत्ता का प्रश्न उठाता है. दलित महिलाओं की त्रासदी यह है कि उन्हें एक गाल पर ब्राह्मणवाद का तो दूसरे गाल पर पितृसत्ता का थप्पड़ खाना पड़ता है.”8 अपने अछूत होने की सच्चाई जानकर और यह जानकर कि वह इस ब्राह्मण परिवार पर एक बोझ है सुजाता को आघात पहुंचता है. वह आत्महत्या करने निकल पड़ती है पर नदी किनारे गांधीजी की मूर्ती और उनका यह सन्देश कि “मरें कैसे? आत्महत्या करके? कभी नहीं. आवश्यकता हो तो जिंदा रहने के लिए मरें.” देख आत्महत्या का विचार त्याग घर लौट आती है. जबरीमल पारिख सुजाता में दिखाए गए आत्महत्या के दृश्य और गाँधी जी के उस सन्देश को केंद्र में रखकर लिखते हैं- “यह फिल्म गांधी और रवीन्द्र के इसी सन्देश को आधार बनाती है.”9 इन्हीं ऊहापोहों और अलग-अलग घटनाओं के बीच एक दिन अधीर (सुनील दत्त) नामक ब्राह्मण युवक का सुजाता के जीवन में प्रवेश होता है. दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं. अधीर एक आधुनिक युवक है वह जाति को नहीं मानता. सुजाता को विवाह के लिए मना लेना चाहता है. उसे महात्मा बुद्ध के शिष्य आनन्द को एक चांडाल कन्या चांडालिका द्वारा पानी पिलाने की कथा सुना  कर आत्मनिंदा व आत्महत्या को पाप बताते हुए सुजाता के मन में बसे हीनभाव और द्वन्द्व को दूर कर देना चाहता है. लेकिन सुजाता असमंजस में है. वह कहानी सुन कर कहती है- “वह तो पुराने जमाने की बात है. आजकल ऐसा हो सकता है?” तब अधीर कहता है- “हमारे जमाने में भी ऐसा महापुरुष हुआ है जिसने अपना सारा जीवन छुआछूत को मिटाने में लगा दिया. गांधीजी.” फिर वह सुजाता को अछूत लड़की लक्ष्मी की कहानी बताता है जिसे गांधीजी ने अहमदाबाद के आश्रम में रखा था. जिससे आश्रम को चंदे मिलने बंद हो गए थे किन्तु गांधीजी अपने निर्णय पर अटल रहे थे. सुजाता इन कहानियों को सुनकर उत्साहित हो जाती है लेकिन वह विवाह के लिए फिर भी तैयार नहीं है वह नहीं चाहती कि उसके कारण अधीर उसकी बहन रमा से विवाह करने से इनकार कर दे. किन्तु अधीर सिर्फ और सिर्फ सुजाता से ही विवाह करना चाहता है वह अपनी नानी (ललिता पवार) से कहता है कि- “मैं सुजाता के अलावा और किसी से ब्याह नहीं करूंगा.” और घर छोड़ कर जाने लगता है तब उसकी नानी बुझे मन से यह सम्बन्ध स्वीकार कर लेती है. और इस रिश्ते की बात करने सुजाता के घर जाती है. पूरी बात जानकर रमा की माँ तथा सुजाता की अम्मी अर्थात चारू सुजाता को भला-बुरा कहती है और इसी दौरान सीढियों से फिसल कर गिर जाती है. अंत में सुजाता के रक्त दान से ही चारू की जान बचती है. होश में आने पर जब चारू को यह पता चलता है कि उसकी जान किसी और ने नहीं सुजाता ने बचाई है और उसका खून सिर्फ सुजाता के खून से ही मिल सका तो वह अपने अपराधों का पश्चाताप करती है. तब वह पहली बार कहती है- “तू भी तो हमारी ही बेटी है.” इस तरह सर्वसम्मति से अधीर और सुजाता का विवाह हो जाता है. फिल्म का सुखद अंत होता है. “यह फिल्म यह सन्देश भी देती है कि सवर्ण और दलितों के बीच सिर्फ छुआछूत का मिटना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके बीच हर तरह की दूरी का मिटना भी जरूरी है…बिना किसी तरह की उग्र मुद्रा अपनाए और किसी को खलनायक बनाए फिल्म सही और गलत का विवेक प्रस्तुत करती है.”10 ‘अछूत कन्या’ में जो दलित नायिका कस्तूरी एक ब्राह्मण युवक के प्रेम में होने के बावजूद उसके साथ विवाह बंधन में नहीं बंध पाती और ब्राह्मण-दलित दोनों समुदाय के सामने अपनी पवित्रता और सच्चाई का सबूत देते हुए अपनी जान गवां देती है, ‘सुजाता’ तक आते-आते वही दलित नायिका अपने प्रेमी के साथ विवाह कर लेने की स्थिति में अवश्य आ गई है. यह घटना 1936 और 1959 के मध्य के लम्बे अंतराल को तो चिन्हित करती ही है समय के साथ बदलती सामजिक परिस्थितियों की भी पहचान कराती है. कहानी के प्लाट और विषय की समानता के बावजूद दोनों के ही दलित स्त्री पात्रों में कुछ बड़े अंतर भी हैं. सुजाता से लगभग 23 साल पहले बनी अछूत कन्या की कस्तूरी कई जगहों पर सुजाता से आगे निकल जाती है. एक सबसे जरूरी अंतर तो यह है वह विपरीत परिस्थितियों में भी आत्महत्या का मार्ग नहीं चुनती बल्कि उसका विचार भी दिमाग में नहीं लाती. वह जिजीविषा से भरपूर है. एक जातिवादी-मर्दवादी समाज के आगे वह अपने घुटने नहीं टेकती. वह जब तक जीती है चुनौती बनकर. मरने के बाद भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सन्देश बनकर जीवित रहती है. अछूत कन्या की कस्तूरी सुजाता की तुलना में अधिक स्वतंत्र है. लेकिन सुजाता का स्त्री अस्मिता से जुड़ा ‘मैं कौन हूँ’ जैसा गंभीर सवाल उसे उत्तर-आधुनिक विमर्श के बहुत करीब ले आता है. दोनों ही फिल्मों ने कुछ सीमाओं के बाद भी अपने-अपने स्तरों पर अपने समय से कहीं आगे जाकर स्त्री स्वतंत्रता, स्त्री अस्मिता और दलित स्त्री की समस्याओं को मजबूती से चित्रित किया है. हिन्दी सिनेमा जगत में आरम्भ से ही कुछ ऐसे कलाकार रहे हैं जिन्होंने विषयों को चुनने के जोखिम उठाए- “खतरा भी था उन फिल्मों से जिनके जरिये स्त्री की स्वतंत्रता का पक्ष प्रबल हो रहा था. जमींदारी समाज के लिए यह शुभ संकेत नहीं था. एक दौर में प्रेमचंद को भी अपने सामंत विरोधी रुझान के कारण आलोचना झेलनी पड़ी थी. अब विमल राय की सुजाता ब्राह्मण से विवाह करने के ख्वाब देखने लगी थी.”11  इस तरह दोनों ही फिल्में अपने साहसी विषयों और अपने मुख्य स्त्री किरदारों के माध्यम से हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ सार्थक अध्याय जोड़ने में सफल रहीं.


सन्दर्भ सूची
1.अनभै साँचा, सं-द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, अक्टूबर-दिसंबर 2008, पृ. 205
2.सिनेमा और हिंदी सिनेमा, अरुण कुमार, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 2007, पृ. 102
3.सदी का विवादास्पद सिनेमा, प्रमोद भारद्वाज, दैनिक जागरण नवरंग, 18 दिसंबर 1999, पृ. 02.
4.आधुनिकता के आईने में दलित, अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, पहला संस्करण 2002, पृ. 233
5.सिनेमा और हिंदी सिनेमा, अरुण कुमार, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 2007, पृ. 102
6.सदी का विवादास्पद सिनेमा, प्रमोद भारद्वाज, दैनिक जागरण नवरंग, 18 दिसंबर 1999, पृ. 02
7.समसामयिक सृजन, सं- महेंद्र प्रजापति, अक्टूबर-मार्च 2012-13, पृ. 49
8.आधुनिकता के आईने में दलित, अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, पहला संस्करण 2002, पृ. 230
9.अनभै सांचा, अक्टूबर-दिसंबर, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, 2008, पृ. 199
10.अनभै सांचा, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, अक्टूबर-दिसंबर, 2008, पृ. 199
11.सिनेमा और हिंदी सिनेमा, अरुण कुमार, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 2007, पृ.            103

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स्त्री के लिए एकांत, आज अभी भी ‘लक्जरी’ माना जाता है

विपिन चौधरी


विपिन चौधरी युवा कविता की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं.विश्व की दूसरी भाषाओं से अपनी रुचि के साहित्य का अनुवाद भी करती रही हैं.संपर्क: vipin.choudhary7@gmail.com

हमारे प्राचीन शास्त्रों ने इंसान के अकेलेपन से जन्म और मृत्यु को जोड़ते हुए कहा गया है कि इंसान का अकेलापन, जीवन का शाश्वत  सत्य है. तमाम तरह के रिश्ते-नाते और बंधनों के बावजूद इंसान अकेला हैं. दूसरी ओर  ‘एकांत’ इंसान द्वारा अर्जित एक ऐसी वृहत  मानसिक अवस्था भी है, जहाँ एकांत सिर्फ उसे पाने वाले की दिशा- निर्देश के अनुसार ही काम करता है. पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष अपने लिए ‘एकांत’ रचता आया है, लेकिन स्त्री के लिए  ‘एकांत’ तक पहुँचने का रास्ता आज भी बीहड़ बना हुआ है. स्त्री के जीवन के ढेरों पेचों-ख़म ही, एकांत तक उसकी पहुँच को दूर कर कर  देते हैं.यही कारण है कि समाज के परंपरागत ढांचे में रची-बसी एक भारतीय स्त्री के लिए आज के आधुनिक  दौर में भी  ‘ एकांत’ बहुत दूर की चीज़ है. इसका एक कारण यह भी है कि स्त्री और समाज के एक बड़े वर्ग  का एकांत की परिभाषा से सहज परिचय नहीं हो पाया है.  अक्सर एकांत को अकेलेपन का ही दूसरा रूप मान लिया जाता है जिसका सीधा अर्थ ही  चुप्पी,अवसाद और समाजिक दूरी है. इसी तरह जब एक स्त्री के  सम्पूर्ण  व्यक्तित्व को लेकर बात की जाती है तो  ‘एकांत तक पहुँचने से पहले  ‘अकेलापन’ आ धमकता है। एक चेतना-संपन्न स्त्री के संदर्भ में जिस ‘एकांत’ की बात कही जाती है, उस एकांत के लिए अभी तक स्त्री के एक बड़े वर्ग ने मानसिक रूप से तैयारी नहीं की है.  इसके पीछे स्त्री का सामाजिक सेट-अप और घर-परिवार से उसके घनिष्ट सरोकार हैं.

सदियों से हमारा स्त्री-वर्ग,  इसी परिवार के वायुमंडल में रच-बस कर खुद को धन्य मानता आया है. कुदरत ने स्त्री को उसके परिवेश  ने उसे इसी मानसिक समझ के साथ ही रचा है जिस पर समाज ने ठप्पा लगा कर उसे मज़बूत कर दिया.  सच है कि पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार के लिए खुद को भुला देना ही स्त्री को सदियों से भाता आया है.  तभी उसने अपने लिए कभी भी एकांत नहीं चुना या इस दिशा में कभी सोचा ही नहीं। दरअसल विवाह के बाद बच्चे होने की प्रक्रिया में फिर स्त्री बच्चे की परवरिश में लग जाती है और अपनी सभी रुचियों को भूल जाती है. भारत में  सामूहिकता को प्राथमिकता दी जाती रही है.  आज एकल परिवार का ज़माना है. एकल परिवार की नौकरीपेशा स्त्री के कंधों पर दोहरा भार है । यदि उसे ‘एकांत’ का संज्ञान हो भी तो परिवार से छिटक कर, अपने लिए किसी भी तरह के ‘एकांत’ में प्रवेश करना, उसे अपराध-बोध के गिरफ्त में ले जाने के लिए  काफी है. आज की स्त्री, चाहे आर्थिक रूप से  आत्मनिर्भर हो गयी हो और समाज को उसकी अलग पहचान के लिए बाध्य भी होना पड़ा हो  लेकिन अपने लिए उस ‘एकांत’ की  बात करना, जिसमें वह अपमें मन-मुताबिक सर्जन कर सके, अपने मन का अलहदा संसार रच सके, वैसा एकांत आज भी उसे दुर्लभ जान पड़ता है.

आखिर क्या है ‘स्त्री का एकांत’

एकांत की अवधारणा को कई तरह से समझा जा सकता है. ‘एकांत’ का सेवन एक सजग  इंसान के भीतर ईंधन का काम करता है.   जैसे एक अकेला पेड़ अपने जड़ों को दूर-दूर तक फैला कर अपने अस्तित्व को विस्तृत करता है, बस वैसे ही  ‘एकांत’ स्त्री के  समूचे व्यक्तित्व में फ़ैल कर पुख्ता  बनाता है. एकांत ऐसा टॉनिक है जिसके जरिये कोई भी स्त्री अपने मानस की सेहत को और अधिक दुरुस्त कर सकती है. सर्जनात्मक स्तर पर काम करने के लिए जरुरी  ‘एकांत’ को हांसिल करने के लिए अपने समय की कई प्रसिद्ध स्त्री रचनाकारों को घरेलू और सामाजिक स्तर पर काफी जद्दोजहद करनी  पड़ी।  इन लेखिकाओं को घर-बाहर के ढेरों काम-काज निपटा कर देर रात को  ही लिखने के लिए उन्हें मनवांछित’ एकांत’ मिलता था. एकांत स्त्री की अपनी व्यक्तिगत नागरिकता का नाम है। इस एकांत में स्त्री के मन की स्वतंत्रता सम्माहित है. संसार भर के कलात्मक व्यक्तित्व  वाले लोगों को स्वतन्त्रता बेहद प्रिय होती है वे बेरोकटोक जीवन का रसास्वादन करना चाहते हैं। किसी भी बंधन में बंधते ही वे बंदी पक्षी की  तरह फड़फड़ाने लगते हैं.  स्वतंत्रता ही उनकी जीवनी शक्ति होती है और एकांत ही उनको स्वतंत्रता मुहैया करवाता है.

स्त्री- सशक्तिकरण के लिए जरुरी है ” एकांत “


एकांत की चाह रखना ही स्त्री अधिकारों की सबसे पहली कड़ी है. 1960-70 पश्चिम में चल रहे नारीवादी आंदोलनों द्वारा स्त्री के लिये  एकांत की चाह ने ही संसार भर की स्त्रियों को इस दिशा में सोचने की आँख दी. तब स्त्रियों ने यह जाना कि  एकांत का आशय स्त्री की उस सकारात्मक आज़ादी से है जहाँ वह अपना मनचाहा रच सके. तब तक जागरूक स्त्रियां जान ही गयी थी कि किसी भी  स्त्री के लिए एकांत को पाना  महत्वपूर्ण के साथ-साथ कठिन भी है. आज तक किसी भी स्त्री को रेडीमेड एकांत नहीं मिला,  जिस तरह अपने नाखूनों से खुरच कर जानवर अपने लिए एक सुरक्षित जगह बनाता है उसी तरह स्त्री को अपने हाथों से अपना एकांत बनाना पड़ता है. एक सजग स्त्री के सशक्तिकरण में ‘एकांत’ सबसे सशक्त  टूल के रूप में  काम करता है. उसके जरिये स्त्री अपने विचारों की धार को तेज़ कर सकती है और अपने  बौद्धिक संसार को और अधिक विस्तृत कर सकती है. इसके लिए उसे सबसे पहले अपने घर और  समाज से लड़ना पड़ता है.आज भी देखने को मिलता है कि यदि कोई स्त्री स्वेच्छा से अपने लिए एकांत का वरण करती है तो भी समाज  उसे ‘बेचारी ‘ की संज्ञा देता है. क्योंकि समाज, स्त्री को उसके  इस एकांत के साथ देखने में अभ्यस्त नहीं है. एकांत में जाने वाली  स्त्री अपने जीवन के सभी जोखिम खुद उठाती हैं  और साथ ही वह अपने सुख दुःख की खुद ही जिम्मेवार होती है.

DINA TSYPINA

एकांत के भीतरी सुख


एकांत में इंसान की अंदरूनी आवाज़ सबसे मुखर होती है. वह बिना किसी शोर- शराबे के आप लगभग ‘ध्यान’ की अवस्था  में  चला जाता हैं. हर स्त्री को अपने एकांत की अलहदगी को ‘अकेलापन’ बनाने से बचना चाहिए।    एकांत में बार- बार सोचने से चीज़ें साफ होती जाती हैं और जिन चीज़ों को आप दूर की अलभ्य चीज़ समझते हैं वह आपके करीब आती दिखती हैं. अपने जीवन की  समस्याओ पर बार बार सोचना और उसपर अपनी राय बनाना एकांत के बाई- प्रोडक्टस हैं. एकांत को ध्यान की संज्ञा इसलिए भी दी जाती है क्योंकि धुंधली आकृतियां इसी एकांत के आलोक में स्पष्ट  हो जाती हैं. रचनात्मक काम के लिए  एकांत  बहुत जरुरी है, ऐसा एकांत, जिसका समूचा आकाश खाली हो और सिर्फ स्त्री विशेष का मन ही वहां पंछी की तरह मुक्त होकर विचरण कर सके.

 जिन्होंने गढ़ा अपना ‘एकांत’

मीराबाई का जन्म, सोलहवी सदी में जोधपुर के चोंकड़ी नामक गाँव में हुआ था. वे एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और सजग  स्त्री थी. विवाह के पश्चात पति के निधन होने के बाद  घर वालो के व्यावहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृन्दावन चली गयी. उस समय उन्होंने अपने एकांत को खोजा जो  उन्हें कृष्ण भक्ति में मिला और उसी दौरान उन्होंने तुलसीदास को ख़त लिखा. इसी तरह छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा, जिन्हें आधुनिक मीरा भी कहा जाता है, ने अपने लिये एक सुद्रढ़ एकांत रचा और उसके भीतर भरपूर सृजनात्मक जीवन जिया. देश-दुनिया में हर दौर में कुछ स्त्रियाँ ऐसी रहीजो अपने एकांत को गढ़ने में पूरी तरह से सफल रही। चाहे संसार भर की आधी-आबादी के हिसाब से उनकी संख्या नगण्य रही हो मगर उन्होंने अपने एकांत को पुष्ट करते हुये,अपने समय की दूसरी स्त्रियों के ह्रदयों को भी झंकृत किया और इतिहास में दर्ज हो गयी.    1815 को न्यूयॉर्क में जन्मी एक अमेरिकी नारी-मताधिकारवादी, सामाजिक कार्यकर्ता एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन, ने 76 वर्ष की उम्र में  राष्ट्रीय अमेरिकी महिला मताधिकार एसोसिएशन के अध्यक्ष के पद से  इस्तीफा देते हुए ‘ द solitudeसोलिट्युड ऑफ़ सेल्फ’ शीर्षक से  एक बहुत महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। जिसमें स्त्री की व्यक्तिगत खुशी, मानसिक विकास और स्व-संप्रभुता के बारे में महत्वपूर्ण  बातें दर्ज थी। इसी तरह से स्त्री-अधिकार कार्यकर्ता सुसन बी. अंथोनी ने स्त्री के पक्ष में कहा कि ‘स्वतंत्रता में ही असली खुशी है’

और असली स्वतंत्रता का अर्थ ‘स्त्री का एकांत’ से है. स्त्री के लिए बंधन के सभी रूप,परंपरा, निर्भरता, अंधविश्वास से पूरी तरह से मुक्ति पाकर‘एकांत’ ही उसके स्वयं के व्यक्तिगत जीवन की जिम्मेदारी उठाता है।

1929, को  वर्जीनिया वूल्फ ने अपने निबंध ‘ए रूम ऑफ़ वन’स ओन’ में स्त्री के इसी एकांत की अवधारणा को विस्तृत किया है.  अंग्रेजी उपन्यासकार और कवि  ऐमिली ब्रोंटे, जो अपने एकमात्र  क्लासिक उपन्यास,’ वुदरिंग हाइट्स’ के लिए जानी जाती हैं. ऐमिली  ब्रोंटे की शांत और एकांतिक जीवन शैली इसी ‘एकांत’ का परिचायक थी. ऐमिली की दिनचर्या बहुत ही शांत और नियमित थी। वह हर-रोज़ सुबह- सवेरे उठती, घर में बिछें कालीनों को झाड़ती, प्रतिदिन सिलाई-बुनाई करती, फिर ऊपर जाकर अपनी मौसी के  बताये पाठ को पढ़ती। फिर अपने भाई-बहनों के साथ घर के सामने वाले बंजर मैदान पर खिले जंगली फूलों के बीच सैर करने  निकल जाती।   चौदह साल की उम्र में घर के काम-काज में दक्ष और घर पर रह कर  अपनी पढ़ाई  करने वाली ऐमिली नन्हें पक्षियों को अपने हाथों में लेकर कहानियां सुनाती। बहुत बचपन में ही ऐमिली ने अपना एकांत रच  लिया था जिसे उसने ताउम्र संजोये रखा. ऐमिली ने अपनी पसंदीदा जर्मन भाषा सीखी, फ्रेंच भाषा के साहित्य और व्याकरण  का भी बराबर अध्ययन किया. संगीत की पढाई और रियाज किया.  इसी तरह ऐमिली की बड़ी बहन और ‘जेन आयर’ उपन्यास की लेखिका चार्लोट ब्रोंटे का कहना था,
” सबसे अधिक मैं खुद की परवाह करती हूँ । मैं एकान्त और मित्रहीन होने की वजह से खुश हूँ और इस अवस्था में, मैं अपने आप का अधिक सम्मान करती हूँ । “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लेखिका व नाटककार, ईव एंस्लर कहती हैं, स्त्रियों को अपने एकांत का आनंद उठाना चाहिए। जिन जगह पर आप कभी नहीं गए हो वहां घूमना चाहिए और अकेले ही तारों की छांव में  सो जाना चाहिए और लंबे समय तक  एकांत में रहने के आशातीत लाभ हैं।

सुसन संटोंग, जोसेपहिन बौर्गिस जैसी बौद्धिक दुनिया की प्रसिद्ध स्त्रियों ने अपने एकांत की रक्षा करते हुए खूब काम किया और  अपने विचारों से लोगों को प्रभावित किया. इस तरह 1889 को यूक्रेन में जन्मी रूस की आधुनिक कवयित्री, अन्ना अख्मातोवा ‘सोलिट्युड’ शीर्षक की अपनी कविता में कहती हैं,
मुझपर ढेरों पत्थर फेंके गए,
कि अब उनसे नहीं लगता है डर
पत्थरों का गड्ढे से
बन गयी है लंबी ठोस मीनार,
सबसे लंबी मीनारों से भी अधिक लंबी
मैं भवन-निर्माताओं  का शुक्रिया अदा करती हूँ कि ,
उनके पास से चिंता और उदासी गुजर जाती होगी
यहाँ से मैं पहले- पहले सूर्य के आने  को  देखूंगी ,
सूर्य की आखिरी किरण यहाँ आनंद में भर उठती है
और मेरे कमरे की खिड़कियों में
अक्सर प्रवेश करती हैं  उत्तरी हवाएं
और कबूतर मेरे हाथ से गेहूं के दाने खाता है
मेरे अधूरा पन्ने से संबंधित
प्रेरक शक्ति के दैवीय शांत और नाजुक
गहरे पीले हाथ,
यह खत्म हो जाएगा।

हर स्त्री को एकांत के लिए समय निकालना चाहिये। दुनिया की लगातार शोर-शराबा से दूर, अपनी शक्ति के साथ जुड़ने के लिए, और अपनी स्वतंत्रता और साहस का परीक्षण करने के लिए एकांत आज की स्त्री के लिये बेहद जरुरी है वहीँ हर हाल में  समाज  को एकांत का सम्मान करना चाहिये क्योंकि इसी एकांत के भीतर आपको एक सजग स्त्री  विचरण करती हुए मिलेगी.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
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सेक्स के दौरान जयश्रीराम: मोदी और हिन्दुत्वादियों पर तंज ‘#SextInTheTimeofNDA’

#SextInTheTimeofNDA.फेसबुक पर इस हैश टैग की धूम है.  काउंसिल फॉर सोशल डेवललमेंट में रीसर्च असोसिएट द्युति सुदीप्ता ने सरकार की शिक्षा और शोध विरोधी नीतियों, जेंडर स्टडीज केन्द्रों पर हो रहे हमलों के खिलाफ या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णयों पर तंज का एक नायाब सिलसिला चला रखा है अपने फेसबुक पेज पर. इस कड़ी में उन्होंने समाज में बनते बनाये जा रहे हिन्दुत्ववादी वर्चस्व और उसे मिल रहे संरक्षण पर तंज किया है. 


इसके समर्थन और विरोध में लोग अपने कमेन्ट कर रहे हैं. पिछले 24 घंटे में द्युति ने ऐसे कई तंज भरे पोस्ट लिखे हैं. 

कुछ चुनींदा  #SextInTheTimeofNDA पोस्ट: 




जेंडर स्टडीज के ऊपर सरकार की नीति पर चोट 




शोध-ग्रांट पर रोक



सरकार और अंबानी-अडानी का  रिश्ता 


डिमनीटाइजेशन
मोदी जी के वादे
सेक्स के दौरान जयश्रीराम, हिन्दू वर्चस्ववादियों पर तंज
इन पोस्ट पर पक्ष-विपक्ष के कई कमेन्ट हैं. सामान विचार वालों के लिए तो यह नायाब तंज हैं लेकिन विरोधी भी कहाँ रुकने वाले. एक विरोधी कमेन्ट द्युति के पोस्ट पर:

100 दिन का जश्न मनाते सीएम योगी को महिला पुलिस अधिकारी ने दिया करारा संदेश

स्त्रीकाल डेस्क 


“जहां भी जाएगा, रौशनी लुटाएगा 
किसी चिराग का अपना मकां नहीं होता.
बहराइच ट्रांसफर हो गया है, यह नेपाल की सीमा है, चिंतित मत हों दोस्तों मैं खुश हूँ… मैं मानती हूँ कि यह मेरे अच्छे कामों का पुरस्कार है. आप सभी बहराइच आमंत्रित हैं.”

यह फेसबुकपोस्ट है उस महिला पुलिस अधिकारी (सीओ), श्रेष्ठा सिंह, का, जिसे योगी सरकार ने  बीजेपी नेताओं को चालान काटने के पुरस्कार स्वरुप बुलन्दशहर से बहराईच भेज दिया. वह आईएएस अधिकारी दुर्गा नागपाल जितनी खुशनसीब नहीं है , जिसे अखिलेश सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा था . दुर्गा नागपाल को मीडिया ने खूब कवरेज दी थी, लेकिन योगी-मोदी से अभिभूत मीडिया के लिए श्रेष्ठा दुर्गा नागपाल जैसी क्रांतिकारी नहीं हैं.

उत्तरप्रदेश में 244 अफसरों का ट्रांसफर किया गया है, जिनमें बुलंदशहर के स्याना की सीओ श्रेष्ठा सिंह भी शामिल हैं, जिन्होंने हाल ही में ट्रैफिक नियम तोड़ने के मसले पर स्थानीय बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की जमकर क्लास लगाई थी. इस घटना का विडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था.  अब श्रेष्ठा सिंह का ट्रांसफर किए जाने का मुद्दा भी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है. खुद श्रेष्ठा ने अपने फेसबुक पेज पर एक टिप्पणी  लिखी, जिसके पक्ष-विपक्ष में लोग बंट तो गये हैं, लेकिन एक छोर से दूसरे छोर पर ठाकुर का तबदाला कुछ तो सन्देश है, मसलन बीजेपी नेताओं को अधिकारी अबध्य मानें. इसके पहले भी थानों पर हमला करने वाले या एसएसपी के आवास पर हमला बोलने वाले बीजेपी कार्यकर्ताओं और सांसद पर कभी ठोस  कारवाई नहीं हुई, बल्कि पुलिस अधिकारियों का ही तबादला कर योगी एक सन्देश दे रहे हैं.

बीजेपी नेता से टकराव का पूरा मामला क्या था? 
23 जून का है, जब बीजेपी की जिला पंचायत सदस्य के पति प्रमोद लोधी बाइक से घर जा रहे थे. चेकिंग के दौरान बाइक के कागज नहीं दिखाने पर पुलिस ने उनका चलान काट दिया और बाइक जब्त कर ली. पुलिस के सामने कथित तौर पर धौंस दिखाने पर आरोपी नेता को अरेस्ट कर लिया गया. इसके बाद बीजेपी समर्थकों ने कोर्ट परिसर में पुलिस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और बीजेपी नेता प्रमोद लोधी को पुलिस हिरासत से छुड़ाकर स्याना विधायक देवेंद्र लोधी के चैंबर में लाकर बैठा दिया. काफी देर तक पुलिस और बीजेपी समर्थको में झड़प होती रही. बीजेपी समर्थकों ने कोर्ट परिसर में पुलिस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और सीओ श्रेष्ठा सिंह से भिड़ गए. उधर बीजेपी नेता प्रमोद लोधी का आरोप था कि चालान काटने के बाद पुलिसकर्मी ने बाइक की चाबी देने के नाम पर उनसे 500 रुपये की रिश्वत की मांग की थी.

बहस के दौरान श्रेष्ठा ने बीजेपी नेताओं से स्पष्ट कहा था कि वे सीएम योगी आदित्यनाथ से लिखवाकर ले आएं कि पुलिसवाले वाहन चेकिंग नहीं कर सकते, तो हम नहीं करेंगे।

सवाल है कि क्या सीएम योगी ने अपने समर्थकों को इस तबादले से कोई सन्देश दिया है? हालांकि  श्रेष्ठा ठाकुर के इरादे बता रहे हैं कि वे इस तबादले से अपनी कार्यशैली को प्रभावित नहीं होने देंगी.

स्त्री आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की कविताएं

अरुण नारायण

युवा आलोचक.बिहार विधानसभा में कार्यरत संपर्क :मोबाईल 8292253306

उत्तिमा केशरी हिंदी कविता में वर्षों से सक्रिय एक जरूरी कवयित्री हैं। लेकिन दिल्ली या राज्यों की राजधानी से दूर रहने के कारण हिंदी काव्य परिद्रश्य में उनको जो जगह मिलनी चाहिए, उनपर जो चर्चाएं होनी चाहिए, उससे वह वंचित रही हैं। अभी हाल ही में 115 कविताओं का उनका संकलन ‘उदास है गांव’ नाम से आया है, जिसे उद्भावना प्रकाशन गाजियाबाद ने साया किया है।

एक स्त्री का आत्मसंघर्ष इन कविताओं का मूल स्वर है। उनका यह संघर्ष घर, परिवार, समाज, धर्म, पुरुष सत्ता और परंपरा से हर जगह, हर मोर्चें पर है। इसीलिए इस संग्रह की कविताओं में जो स्त्रियां आई हैं उनमें पर्याप्त विविधता है। यहां कई तरह की स्त्रियों की चिंताएं हैं। उनके यहां ‘मीरगंज वाली चाची’ हैं, कई मिथकीय चरित्र हैं। रामायण की अहिल्या, सुमित्रा और उर्मिला हैं, मांएं हैं, मजदूरिनें हैं, साहित्यिक कृतियों में आए चरित्र भी हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए मेरे जेहन में यह सवाल कौंधता रहा कि आखिर इन सब को कोई कवयित्री क्यों याद करती है? इन सवालों का जवाब उत्तिमा जी की इन कविताओं में ही निहित है। अपनी एक कविता ‘कैकेयी और परंपरा’ में वे लिखती हैं, ‘राजा दशरथ की तरह/जब-जब करेंगी पुरुष सत्ता छल/स्त्री से/तब-तब ऐसी ही होगी, उनकी परिणति’;128द्ध।

पौराणिक और मिथकीय प्रसंगों का अस्मितावादी विमर्श अपने नजरिये से व्याख्या कर रहे हैं तो स्त्री भला पीछे क्यों रहे। उसके साथ तो कदम कदम पर अवमानाना की साजिशें की जाती रही हैं। हिंदी कविता का जो शुचितावादी और एकांगी विमर्श था, उसको ये कविताएं व्यापक फलक पर विस्तारित करती हैं। ‘एकाकी जीवन’ मां पर केंद्रित कविता है जो रामायण की मिथकीय स्त्रियों के एकाकीपन की परतों को उधेड़ती हुई मां के अकेलेपन को उससे जोड़ती है। ‘अहिल्या एक रासायनिक पदार्थ’ में कवयित्री पितृसत्ता को टारगेट करते कहती लिखती हैं, ‘तीर्थ को क्या गए/कि/इंद्र ने छल से कर लिया/तुम्हें वरण/तुमनेही तो कहा था अहिल्या/कि हे गौतम ऋषि /तुम तो किरण विज्ञान के ज्ञाता हो/तम के पार जाने की क्षमता है तुममें/क्योंकि तुम गौतम हो!/मैं तो एक रासायनिक पदार्थ हूं/तुम्हारे प्रयोगशाला के/इंद्र है सूरज मंडल के अंतस की किरण/और श्राप दिया, यही तो थी उनकी खोज/जब तक पूरी नहीं हुई खोज/मैं प्रयोगशाला में स्थापित रही।/आखिर कब करोगे प्राण प्रतिष्ठा/इस रासायनिक पदार्थ में?/उतर दो न/हे महामानव/गौतम ऋषि’ ’;144द्ध

‘गांधारी का शाप’ योगेश्वर कृष्ण पर एकाग्र कविता है। जो संग्रह की उल्लेखनीय कविताओं में है। गांधारी के शाप के बाद जरा के वाण से घायल कृष्ण की मनःस्थिति और राधा से उनके प्रेम-यह है इस कविता का प्रतिपाद्य। कविता की यह पंक्ति द्रष्टव्य है, जिसमें कृष्ण की प्रेम की उत्कटता को कवयित्री ने इनकी मार्मिक काव्य पंक्तियों में समेटा है, ‘अच्छा हुआ जरा पारधी/कि/ये तीर पैर में लगा/वरना/हदय में राधा थी/अनर्थ हो जाता’;186द्ध कवयित्री ने कुछ चर्चित चरित्रों पर भी अपनी कलम चलाई है। ‘हामिद का चिमटा’, ‘चित्रलेखा’, और लीडिया एविलोव’ आदि कविताओं में उनका यह रूप हम पाते हैं। जहां वे इन चरित्रों की संवेदना में गहरे डूबकर कविता को एक भिन्न आस्वाद में विस्तारित करती हैं। अपनी ‘चित्रलेखा’ कविता में वह लिखती हैं, ‘योग और साधना की सीढ़ियां/ चढ़ते-चढ़ते/तुमने भी पा लिया-/प्रेम की पूर्णता को…./ तुम बंधी रहो सदा, पति के आलिंगन पाश में/ठीक कुमारगिरी की तरह’;161-62द्ध यक्षिणी प्रश्न’ संग्रह की एक बहुत ही भाव प्रवण कविता है। यूं तो इस तरह के हिंदू मिथकीय चरित्रों पर उत्तिमा जी की कई कविताएं हैं, मसलन ‘अहिल्या एक रासायनिक पदार्थ’, ‘कैकेयी और परंपरा’, जो स्त्रीवादी नजरिए से लिखी गई है। इनमें पुरुष चरित्र को चुनौती के स्वर में संबोधित हैं ये कविताएं जो अपने काव्य कहन की भंगिमा में बहुत ही सटीक उतरे हैं। ‘यक्षिणी प्रश्न’ में कवयित्री शिव को भी नहीं बरजती। यक्षेश्वर को संबोधित कर कहती है, ‘तुम तो भोगते रहे उनके शाप/और, मेरे वियोग को/वे अल्कापुरी के स्वामी/करुणानिधान हैं/तुम्हें शाप देकर/स्वयं किया अभिशाप मुक्त/मगर, /मेरा यौवन तो चुका यशेश्वर!/ अब मैं जाना चाहती हूं/देवयोनि का त्यागकर/मानवों की नगरी में।’;181-82द्ध अपनी एक ‘मैना’ शीर्षक कविता में वह लिखती हैं, ‘जब उड़ती है फुर्र से/अपना गत्वाजोन दिखाकर/तब/मैं भी रचने लगती हूं/रस निष्पति के सारे अलंकार’ ;167द्ध

उत्तिमा केशरी ने समकालीन स्त्री की विडम्बना को भी अपनी कविताओं में बहुत शिद्द से उतारा है। ‘निवेदन कवि पत्नी का’ में में वह लिखती हैं-‘क्या तुम लौटते हो कभी/रात से आने से पहले/अपना घर/तुम्हें पता नहीं/कि/रात सबका अपना होता है/फिर भी/तुम लिख रहे हो,/समय के विरूद्ध कविता!/दोस्तों के लिए चिट्ठियां/और भर रहे हो कूचियों से /सूर्य में/सूर्योदय का सुनहरा रंग।’ ;77द्ध मां पर संग्रह में यूं तो कई कविताएं हैं। लेकिन उनमें ‘कई-कई छत’ कविता अव्वल है। इसमें वे लिखती हैं, ‘तुम थी तो एक छत था/अब/कई-कई छत बनते जा रहे हैं-मां’;61द्ध ‘मेरी बहन’ शीर्षक कविता पिता को संबोधित है। पारंपरिक रूढ़ियों से बंधे पिता से कवयित्री पूछती हैं, ‘आखिर क्यों बांध दिया आपने/ उसे/जाति के कोल्हू में!/जहां उसे /टूटना पड़ता है-/अपनी हर अतृप्त पल/देह के ताप से।’;76द्ध हिंदी में किसी कवयित्री ने इतनी साहसिक और विवेक वाली कविताएं शायद ही लिखी हों। जिसमें पिता को कटघरे में खड़ा किया जा रहा हो। संग्रह में स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर भी कई कविताएं हैं।‘उफनती नदी’ एक वैसी ही कविता है। जिसमें उत्तिमा ने एक अधवयस दंपति की प्रेम की प्यास को अभिव्यक्ति दी है। आदिवासी जीवन पर भी कई कविताएं इस संग्रह में हैं।अपनी एक कविता ‘मन की पवित्रता’ में वे लिखती हैं, ‘आज की स्त्री/देह की पवित्रता में नहीं/ मन की पवित्रता में जीती है।’ ;184द्ध

मिथकीय चरित्रों पर लिखी गई ज्यादातर कविताओं में पितृसत्ता को टारगेट किया गया है। लेकिन ‘शकुनिया काकी’ कविता के आरंभ में ही कवयित्री लिखती हैं, ‘बिषपुरवाली शकुनियां काकी/जब निकलती है-/नहा-धोकर पूजा करने मां काली थान/तो महमहा उठता है खुशबुओं से/गांव की गलियां।;154द्ध यह किसी समाज का सच हो सकता है। लेकिन यह किसी यथार्थ को देखने का बिलकुल ही एकांगी दृष्टिकोण है। कोई स्त्री लेखिका इसे कविता में क्यों लाए, इससे क्या अभिप्राय सिद्ध होता है, यह तो यथास्थितिवाद का पृष्ठपोषण कहलाएगा क्योंकि यहां धार्मिक कर्मकांडों में आस्था जमाई जा रही है। जो स्त्रियों की पराधीनता की सबसे बड़ी कारक रही है।

उत्तिमा ने हाशिए का जीवन जी रही कामगार स्त्रियों की पीड़ा की भी थाह ली है। ‘कमली’में वह लिखती हैं, ‘कमली खो चुकी है/वक्त के पहले ही/अपने यौवन का भूगोल/बचपन के इतिहास में’;152द्ध आगे वह लिखती हैं, ‘थकी कमली,/ बंद करना चाहती है-/यह घिनौना खेल/जेहाद करना चाहती है/सेठ केषवमल के खिलाफ/ताकि /कोई और कमली, विमली, शिमली/न आए सेठ के कोठी पर/काम करने’;152-53द्ध‘वह स्त्री’ में कवयित्री की मान्यता है, ‘प्रेम एक रसायन है/जो लोहे को सोना बना देता है/और साधारण को असाधारण/तभी तो वह /जीती है सुख-दुख में भी/अपने प्रेम के साथ’;151द्ध  संग्रह की एक छोटी-सी कविता है-‘वह’ नाम से, जो बच्चे की कल्पनाशीलता को सामने लाती है। उसकी कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य है, ‘छोटी लड़की/बना रही है-/कोरे कागज पर/कभी कोठी, कभी अटारी/कभी पौधे को/कभी आकाश में /उगे चांद तारे को/तो कभी जमीं पर /दाना चुगती चिड़िया को/चित्रों को/मानो वह बचा लेना चाहती है-/चिड़िया के घोंसले की गर्माहट/और ओस की बूंदों की तरलता को/अपनी निष्कपटता में/आकुलता के साथ’। ’;149द्ध  संग्रह की कई कविताओं में स्त्री-पुरुष के अंतरंग क्षणों के अनुभव हैं, जो बहुत सूक्ष्मता के साथ इन कविताओं में उतरे हैं। संग्रह में मां और पिता पर भी कई कविताएं हैं। एक कविता में वे लिखती हैं, ‘रामचरण जब-जब बाज की तरह/उसपर झपटता है/तब वह ऐसे कांप उठती है/जैसे कि कोई वृक्ष/अपनी ही परछाई से डरकर/कांप उठता है।’’;147, सुनैनाद्ध

 संग्रह की ‘चुपके-चुपके’, सिर्फ एक बार’, ‘तुम्हारा आना’ आदि अच्छी प्रेम कविताएं हैं। ‘स्मृति की सीढ़ियां’, ‘फटकनी’ आदि कविताएं भी महत्वपूर्ण हैं। ‘वह छोटी चिड़ियां’ में कवयित्री फर्माती हैं, ‘वह स्वाभिमानिनी/जब घुम-घुमकर गाती है/अपनी किलंगी/आकाश की ओर उठकर/तो/ लगता है/मानो!/वह गा रही है-प्रार्थना के गीत’’ ;141द्ध  संग्रह में ‘दादी और आजादी’, ‘सूरजी’, ‘वह स्त्री है,’ जो काली होने के कारण पहले घर परिवार से ही उपेक्षा, अपमान सहती है और बाद में सामंती यौन शोषण के कारण दम तोड़ देती है। कवयित्री ने बेसरी की पीड़ा को मार्मिक स्वर दिया है। ‘कुली’ भी एक खूबसूरत कविता है जिसमें उसकी बेचारगी को कवयित्री ने पकड़ा है। ‘नायाब तोहफा’ शीर्षक कविता में बच्चे की फिलिंग्स को बहुत गहरे डूबकर उतारा गया है। मां बच्चे को कितना प्रेम करती है उसकी एक-एक फिलिंग्स उसे गहरे झकझोरती है। कविता की पंक्ति है, ’जहां-जहां तुम छुपते थे,/बचपन में/वहां-वहां पैबस्त हो गई है-/तुम्हारी उपस्थिति।’ ;111द्ध  ‘खंडहर और बूढ़ा आदमी’ शीर्षक कविता में विधुर जीवन जी रहे बूढ़े की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी गई है। उस बूढ़े के दोनों बेटे विदेश जा बसे हैं और बेटी ससुराल। पत्नी दिवंगत हो चुकी हैं। कवयित्री को उस बूढे विधूर और खंडहर में समानता नजर आती है। वह लिखती हैं, ‘एक बिना सांस का/एक दूसरा, सांस से जीता है।’;106द्ध

‘आठ जून दो हजार नौ’ नाटककार हबीब तनवीर पर लिखी कविता है। वह लिखती हैं, ‘वे जानते थे/कैसे बनाया जाता है/मिट्टी से सोना जैसा आकर्षण।’;39द्ध संग्रह में कुछ और भी उल्लेखनीय कविताएं हैं जिनमें ‘आंखें, ‘प्रेम एक यौगिक तत्व है’, ‘किन्नरों की प्रार्थना’, ‘पुस्तक और कैनवास’, ‘बूट पाॅलिश करती फुनियां’, ‘महक की खोते’, जिंदगी’, ‘आत्मिक न्याय का युद्ध’, मुहावरों मंे आंखें’, ‘सिर्फ मैं थी तुम्हारे साथ’,‘खटरी का आत्मयुद्ध’, ‘परदेशी बेटा के लिए बूढ़े बाप का खत’, ‘दादाजी’ और ‘तीसरी जगह’ आदि संग्रह की महत्वपूर्ण कविताएं हैं। ‘कला के अधिनायक हुसैन’ में वह लिखती हैं, ‘तुमने जिश्म/पर/रूह तो/तुम्हारा/हर कलाकार प्रेमी के पास/आज भी /प्रे्ररणास्रोत बन/एक विलक्षण धरोहर के रूप में है।’ ;19.20द्ध उम्र की देहरी पर बुढ़ापे का आना कितना भयावह होता है इसका अहसास संग्रह की ‘दादाजी शीर्षक कविता को पढ़ते आप कर सकते हैं। रिटायर दादाजी की मनःस्थिति को इन पंक्तियों में देखें, ‘अब/सब कुछ/छूटता जा रहा है/पुरानी डायरियां/और /और फटे वस्त्रों की तरह/संबंधों की डोर/दादाजी का अपना ही घर/अब लग रहा है/उन्हें/अपरिचित-घर!’ उम्र के इसी पड़ाव को लक्षित कर ‘परदेशी बेटा के लिए बूढ़े बाप का खत’ और ‘तीसरी जगह’ शीर्षक कविताएं भी लिखी गई हैं।

उत्तिमा ने बाल मजदूर, आदिवासी स्त्री हर वह व्यक्ति और प्रवृति की कविताएं लिखी हैं जो दबे कुचले हैं। वह दवाब व्यक्ति, व्यवस्था और परंपरा-हर तरफ से है। अगर वो धार्मिक रूढ़ियों को अपनी कविता में लाने से परहेज करतीं तो हिंदी कविता में किसी भी समकालीन बड़ी कवयित्री होने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता था।
इस काव्य संग्रह का आवरण  बिहार के प्रसिद्ध चित्रकार आनंदी प्रसाद बादल ने बनाया है, जो अपनी कलात्मक दक्षता से पाठकों को गहरे अभिभूत करता है।


किताबः उदास है गांव
कवयित्रीः उत्तिमा केशरी
प्रकाशकः उद्भावना प्रकाशन, एच 55, सेक्टर-23, राजनगर गाजियाबाद
पेज संख्याः 190
कीमतः 150 रुपया



संदर्भ 
उत्तिमा केशरी का काव्य संग्रह ‘उदास है गांव’

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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रविकांत की कविताएं : तलाक दी गयी औरेतें और अन्य

रविकांत

   सहायक प्रोफेसर-हिन्दी विभाग,लखनऊ विश्वविद्यालय , लखनऊ.संपर्क:9451945847

तलाक दी गई औरतें
  ( हेमलता के लिए )

तलाक दी गई औरतें
दूसरी औरतों की तरह ही होती हैं
बल्कि, वे होती हैं, थोड़ी ज्यादा ही औरतें
क्योंकि, वे रोती हैं ज्यादा और हॅसती हैं कभी-कभी।
तलाक दी गई औरतें
होती हैं वे थोड़ी ज्यादा ही औरतें
क्योंकि, वे सोती हैं फकत पहर दो-पहर
पूरी बस्ती के  सो जाने बाद,
और, उठ जाती हैं भिनसारे
औरतों से भी पहले।
वे जिन घरों में रहती हैं
वहाँ कोई औरत (मेहरी) काम पर नहीं आती
तलाक दी गई औरतें टी0 वी0 सीरियल भी नहीं देखतीं
और वे घर में खटती हैं भौजाइयों से ज्यादा
क्योंकि वे होती हैं थोड़ी ज्यादा ही औरतें।
तलाक दी गई औरतें
अन्य औरतों से ज्यादा
प्यार करती हैं अपने आदमियों को
जैसे हेमलता आज भी करती है हमसे।
तलाक दी गई औरतें
बहुत ज्यादा औरतें होती हैं
जब, उनका इन्तजार होता है
लम्बा, बहुत लम्बा, इतना लम्बा
कि न जाने कितना लम्बा।

तलाक, चाहे कचहरी में हुआ हो
जज की निगहबानी में
या, पंचायत में मिला हो
रवायतों की मेहरबानी में
याकि, तलाक सौंपा गया हो
वकीलों के बैठकखानों में
वकील जब अकेले में पूछता है
निरे अकेले की बातों और गॉठों को
अपनी नंगी निगाहों से टटोलता है औरतपने को
तब भी उसकी नजरें नहीं गड़तीं
कील-कांटे की तरह
क्योंकि वे होती हैं थोड़ी ज्यादा ही औरतें।
तलाक दी गई औरतें
चाहे जिस धर्म, जाति या वर्ग-समुदाय की हों,
उनका दुख एक जैसा होता है, पहाड़-सा
क्योंकि, ग़म का कोई मजहब़ नहीं होता
अकेलेपन की कोइ जाति नहीं होती
ऑसुओं का कोई वर्ग या समुदाय नहीं होता
तलाक दी गई औरतों के ऑसुओं का सैलाब
होता है उफनाती- बरसाती नदी-सा।
तलाक दी गई औरतें

MOHSEN DERAKHSHAN

तब और ज्यादा औरत हो जाती हैं
जब दूर कहीं बजती है शहनाई
पल भर को जैसे खो जाती हैं वे
और, अगले ही पल वे महसूस करती हैं
कि ढेर सारा थूक और बलगम से
सनी हैं उनकी जांघें,
तब बेचैन हो उठती हैं तलाक दी गई औरतें,
और, पसीने से तर-बतर जब वे
धड़कनों को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाती हैं
तो वे पाती हैं कि लटक गईं सूखी छातियों पर
उग आए हैं कैक्टस, और
पेट पर छितरा गई हैं अनगिनत जलकुंभियाँ।
तलाक दी गई औरतें
औरतों से ज्यादा रहती हैं बीमार
कभी सन्निपात कभी मिरगी के दौरे उन्हें आते हैं अक्सर।
औरतों की तरह ही जब वे जाती हैं  अस्पताल
तो डॉक्टर कभी उॅगलियों से, कभी आले से
दबा-दबाकर ढूढँता-टटोलता है गदराइयों को
तब वे कुछ महसूस नहीं करतीं
न दुख, न दर्द।
तलाक दी गई औरतें
होती हैं, ज्यादा ही औरतें
क्योंकि , हारी – बीमारी में
न उन्हें दवा लगती है और न दुआ
धीरे-धीरे घुलती जाती है, उनकी जिंदगी
और एक दिन वे समा जाती हैं
धरती में सीता की तरह!

इन दिनों………
(पेशावर आतंकी हमले में मारे गए बच्चों
      की याद में…..)
इन दिनो,
मुझे नींद नहीं आती
जबकि,
मैं आगरा या अलीगढ़ में
नहीं रहता।

न मैं मुसलमान हूँ,
न घर वापसी
न घर से बेघर होने,
न घर का न घाट का रहने
का खतरा है, मुझ पर।
फिर भी,
इन दिनों…….
मुझे नींद नहीं आती।

मैं बस्तर कभी नहीं गया
इस देश  के आदिवासियों को भी
मैं नहीं जानता,
मैं नहीं जानता उनका माओवादी बनना
और पुलिस के एनकाउण्टर में मारा जाना।
मैं सोनी सोरी से कभी नहीं मिला
और,
न ही मैंने मुँह खोला है,
इरोम शर्मिला के समर्थन में।
मैं पढ़ता-पढ़ाता जरूर हूँ
लेकिन,
बहस नहीं करता
गीता-कुरान पर,
और, न ही मेरे थैले या
आलमारी में है क्रान्ति का साहित्य
न मैं दाढ़ी रखता हूँ,
न भाषण  देता हूँ।
फिर भी,
इन दिनों…….
मुझे नीद नहीं आती।

LEYLA KAYA KUTLU

मेरा कोई बच्चा
स्कूल नहीं जाता,
मैं, किसी बच्चे की माँ नहीं हूँ,
किसी स्कूल की प्रिंसिपल भी नहीं,
जो कहूँ कि सारे बच्चे मेरे हैं
और पेशावर
हमसे बहुत दूर,
पाकिस्तान में है।
फिर भी,
इन दिनों…….
मुझे नींद नहीं आती।

हाँ हजूर…….
मैं दलित जरूर हूँ
लेकिन,
बेलछी या झज्जर में नहीं रहता,
नवाबों के शहर लखनऊ में,
रहता हूँ।
छोड़ दिया मैंने कब का
चम्बल का वह गाँव
जहाँ कभी फूलन अंगारा बनी थी।
मैं विधानसभा या पुराने लखनऊ में भी
नहीं रहता,
मेरा घर भी कहाँ है
विश्वविद्यालय के पुराने मकान में
निपट बुद्धिजीवियों के बीच रहता हूँ,
फिर भी,
इन दिनों…
मुझे नींद नहीं आती।

और सबसे बढ़कर
मैं स्त्री नहीं हूँ
अफस्पा मेरे राज्य का कानून नहीं है
मुझे चिंकी भी कोई नहीं कहता
कश्मीर  मेरे मुल्क में है
लेकिन मैं कश्मीरी  नहीं हूँ
तालिबान, बोकोहरम, आई. एस.
मैंने सिर्फ टी0 वी0 पर देखे-सुने हैं
और,
इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, नाईजीरिया
मेरे मुल्क नहीं हैं।
फिर भी,
इन दिनों…
मुझे नींद नहीं आती।

तुलसीराम को याद करते हुए

(1)

मृत्यु जीवन का अन्त नहीं
अनंत द्वार है जीवन का।’
बुद्ध के इस दर्शन  को
समझने के लिए,
तुम्हारे जीवन से ज्यादा
मुफीद
क्या है मेरे लिए।

JORGE MUNGUIA

तुम्हारे जीवन और
तुम्हारे मृत्युबोध से
कितना सीखा जा सकता है
बुद्ध की सीख के बिना भी।

बुद्ध राजा थे
तुम राजा नहीं थे
बुद्ध क्षत्रिय थे
तुम क्षत्रिय नहीं थे
तुम हलवाहे थे
किसी बांभन के
तुम चमार थे
इस मृतप्राय समाज के
और उतने ही पवित्र
जितनी पाक थी
रैदास की कठौती।

धर्म (बौद्ध) कहता है
कि सिद्धार्थ ने देखा
एक सपना
सपने में देखे-
हाथी, घोड़ा, शेर …..
इतिहास खमोश है,
लेकिन धर्म कहता है
कि बुद्ध भागे थे
इस सपने की खातिर।

सपने भी जिंदगी से
सीधे बावस्ता होते हैं
तुलसीराम जी……
तुमने देखे होंगे
सपने में
ढोर ढगर, कुत्ते, गिद्ध
क्योंकि, तुम राजकुमार नहीं थे,
चमार थे।

यह अब इतिहास है
और सत्य है
कि तुम भागे थे
सपने नहीं, हकीकत देख।
तुम भागे थे
बीएचयू से जेएनयू तक
मार्क्स से अम्बेडकर तक
जैसे भागे थे कबीर
काशी  से मगहर तक
मौत से जीवन तक
मरते हुए समाज को
जीना सिखाते हुए।

2

धर्म नहीं, इतिहास कहता है
कि बुद्ध भागे नहीं थे
देश निकाला मिला था
उन्हें,
धर्म इतिहास नहीं होता
अलबत्ता,  इतिहास
बन सकता है धर्म,
इतिहास वह नहीं कहता
जो धर्म कहता है।
भागे तो तुम थे
‘मुर्दहिया’ और मरते
हुए समाज से;
जहाँ मौत के लिए
मरते हुए,
जीवन की कोई आशा  नहीं होती।

YELENA LEZHEN

तुम्हारा भिनिष्क्रमण
भी कितना अजीब था
एक मौत (मुर्दहिया) से
दूसरी मौत (मर्णिकर्णिका)
की यात्रा का।
मुर्दहिया; मौत का पहला ठीया
जहाँ मौत पर मंडराते हुए गिद्ध
महाभोज में उतराते हुए गिद्ध।
मणिकर्णिका; मौत का दूसरा ठीया
यहाँ भी ब्रह्मभोज के लिए
मंडराते हैं गिद्ध,
लेकिन,  वे हैं सिद्ध ।
नोंच-नोंचकर खाते हुए
आदमी का मांस
हजारों सालों से
वे जीवित  हैं
जीवित  है  उनका  वर्ण
जीवित  है  उनका धर्म
और
जीवित  है उनका कर्म (कांड)।

गिद्धों की दृश्टि
सैकड़ों कोस की होती है
उनकी उम्र भी तो होती है
सैकड़ों बरस
मणिकर्णिका  पर  मंडराने
वाले गिद्ध भी
बड़ी पैनी – धारदार नजर रखते हैं
इसलिए  तो  वे  यहाँ
काबिज हैं
हजारों-हजार  सालों से।

उनकी उम्र भी लंबी
होती है गिद्धों की तरह,
दरअसल, दूसरों पर
पलने वालों की
उम्र लंबी होती ही है।
होरी की उम्र कितनी थी
जब उसका दम, निकल गया था
सड़क पर
गिट्टी तोड़कर ढोते हुए……

कमलेश्वर  (कितने पाकिस्तान)
के अदीब से पूछो,
दंगों में मरने वालों की
उम्र क्या थी?
हाँ, ठीक सुना आपने
कुछ गिद्ध मंडराते हैं
दिल्ली के आस-पास
और दूसरी राजधानियों में भी।
क्या कहा……?
अब दिखते कहाँ हैं गिद्ध?
अमाऽऽ   अपने मोतियाबिंद
का ऑपरेशन कराइए!
अपना रूपरंग-हुलिया
सब बदल चुके हैं गिद्ध,
आजकल बड़ी शाइस्तगी
से शिकार करते हैं
गिद्ध!

तुलसीराम देख पाते थे
इन गिद्धों को
अपनी एक आँख से
(काने जो थे वे)
गिद्धों और इंसानों में
फर्क करने के लिए
और उन्हें पहचानने के लिए
आँखें भले ही
दोनों सही-सलामत हों
लेकिन,
दृष्टि  एक चाहिए,
तुलसीराम की तरह।

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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दिलचस्प रही माहवारी के सम्बन्ध में मेरी पहली जानकारी

 नवल किशोर कुमार


स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया न सिर्फ स्त्रियों के मानस को नियंत्रित और संचालित करती है, बल्कि पुरुषों का भी ख़ास मानसिक अनुकूलन करती है. माहवारी को लेकर पुरुषों के बीच की धारणा को समझने के लिए यह एक सीरीज है, जिसमें पुरुष अपने अनुभव इस विषय पर लिख सकते हैं.

बिहार की राजधानी पटना के जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर एक गाँव मेरा संसार था. गाँव में ही नक्षत्र मालाकार हाई स्कूल और गाँव में ही खेलने और भैंस चराने को पर्याप्त मैदान. देश दुनिया की खबरों में दिलचस्पी पिता जी की वजह से बढ़ी. निरक्षर होने के बावजूद वे अखबार खरीदते थे. पढ़ कर सुनाने का काम मेरे बड़े भाई कौशल किशोर कुमार करते थे. पापा को मेरी तोतली आवाज पसंद थी. इसलिए भैया को इस काम से मुक्ति मिल गयी.

बचपन में अखबारों को पढ़ते समय कई अवसर पर तब विज्ञापन भी पढ़ जाया करता था. एक विज्ञापन निरोध का था. सरकार की ओर से जारी विज्ञापन में निरोध का महत्व बताया गया था. याद नहीं कि उस वक्त पापा की प्रतिक्रया क्या थी. लेकिन मैंने अपने हमउम्र साथियों को निरोध को गुब्बारा बनाने से रोका था. मेरा तर्क था कि यह सरकारी है. इसका इस्तेमाल हम बच्चे नहीं कर सकते.

जब मैंने स्त्रियों की माहवारी को पहली बार जाना 

ऐसे माहौल से निकल इंटर की परीक्षा पास करने के फ़ौरन बाद शादी हो गयी. सेक्स सम्बन्धी जानकारी का घोर अभाव था. फिर भी काम चलने लायक जानकारी गाँव और कालेज के दोस्तों ने दे दी थी. लेकिन माहवारी भी कोई चीज होती है, इसकी जानकारी तो बाद में तब मिली जब मेरी होम मिनिस्टर(मेरी पत्नी) ने पैड लाने को कहा. मेडिकल स्टोर पर गया. पैड मिला. आश्चर्य तब हुआ जब दुकानदार ने काले रंग के प्लास्टिक में लपेट कर दिया.

खैर, घर गया तो इसकी जरुरत के बारे में पत्नी से पूछा. पहले तो वह मुस्कराई. फिर पांच दिनों की जुदाई का सवाल मेरे पहले सवाल का विस्तार कर गया. हालांकि जब जवाब मिला तब मेरी हालत यह थी कि न मुस्करा सकता था और न दुखी होने का भाव चेहरे पर ला सकता था.

समय बीता और समय ने पत्रकार बना दिया. नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन के तत्वावधान में आयोजित एक कार्यक्रम को कवर करने के बाद एक खबर लिखी – 94 फीसदी बिहारी नौजवान कंडोम यूज करना नहीं जानते. एक प्रमाण मैं खुद था. अखबार में खबर छपी और लोगों ने तारीफ़ की तब हौसला बढ़ा. अगली स्टोरी माहवारी पर केन्द्रित थी. 97-98 फीसदी बिहारी महिलायें घर का कपड़ा इस्तेमाल कराती हैं. संयोग ही कहिये कि 5 महीने के बाद राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों में सैनिटरी पैड किशोरी बच्चियों के मध्य वितरित करने का फैसला लिया.

यूं शुरू हुई हैप्पी टू ब्लीड मुहीम 

बहरहाल वक्त के साथ लोगों की सोच बदली है. व्यक्तिगत तौर पर मैंने कई बार पैड खरीदा है और बिना अखबार में लपेटे या काले रंग के आवरण से छुपाये. अब कोई शर्म या हिचक नहीं होती है. हाँ, कंडोम के मामले में अभी तक अज्ञानी ही हूँ. जानने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई.

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक हैं 

जीएसटी इम्पैक्ट: क्या महिलायें भेजेंगी वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री को सैनिटरी पैड (!)

आधी रात को देश की आर्थिक आजादी का बिम्ब रचते हुए 30 जून की रात 12 बजे देश में एक टैक्स क़ानून, जीएसटी ( गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) लागू कर दिया गया. कांग्रेस के जमाने के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और अब राष्ट्रपति ने इस कथित ड्रीम अर्थ-सुधार की नीव रखी थी और उसे पूरा किया नरेंद्र मोदी और उनके वित्त मंत्री अरुण जेटली ने. प्रधानमंत्री मोदी को देश में कई न्यू नॉर्मल स्थापित करने का श्रेय देने वाले अरुण जेटली ने संसद के सेंट्रल हाल में जो कवायद की उसके बाद 1 जुलाई से देश का न्यू नार्मल है: जीएसटी. और हाँ इसके साथ ही एक न्यू नार्मल और होने जा रहा है, महिलाओं की माहवारी के दौरान इस्तेमाल होने वाले सैनिटरी पैड का लक्जरी, यानी विलासिता वस्तु का दर्जा. अपने लौह इरादों के से खुद को सरदार वल्लभ भाई पटेल की छवि में ले जाने का इरादा रखने वाले नरेंद्र मोदी और उनके वित्त मंत्री को इसका कोई फर्क नहीं पड़ा कि उनके ही कैबिनेट की एक साथी, मेनका गांधी इस टैक्स को न लगाने का सरकार से बार-बार आग्रह कर रही हैं. कई महिला सांसदों ने इसके खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चला रखा है.

लेकिन यह न्यू नॉर्मल वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री के लिए सुखद खबरें लेकर नहीं आने वाला है. पहले से ही महिला सांसदों, उनके मंत्री और कई नामचीन हस्तियों ने उन्हें इस पर पुनर्विचार का आग्रह करते हुए ‘लहू पर लगान’ टैग लाइन से सोशल मीडिया पर अभियान चला रखा था. अब एक अपुष्ट खबर है कि यह एक आंदोलन की शक्ल लेने वाला है. दो दिन पहले ही अभिनेत्री कोंकणा सेंन ने कहा कि ‘जिस प्राकृतिक शारीरिक स्थितियों पर आपका नियंत्रण नहीं हो सकता, उसे विलासिता कैसे कहा जा सकता है और उसपर 12% टैक्स कैसे लगाया जा सकता है.’ इस निर्णय से नाराज महिलाओं का कहना है कि” सैनिटरी पैड महिलाओं के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा मामला है, और उसपर सरकार टैक्स लगाती है, जबकि कंडोम और कंट्रासेप्टिव पर नहीं.”

 कंडोम और कंट्रासेप्टिव भी महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है-खासकर प्रजनन पर आंशिक अधिकार और अनचाहे गर्भ से मुक्ति के प्रसंग में. इन दोनो अनिवार्य उत्पादों का संबंध दरअसल महिलाओं के प्रजनन और सेक्स से जुड़ा मामला है, जिससे पुरुष का अपना वंश जुड़ा है और राज्य की जनसंख्या संबंधी नीति भी, इसके माध्यम से राज्य और परिवार एक हद तक जनसंख्या पर कंट्रोल रखना चाहता है.  लेकिन सैनिटरी पैड  सीधे महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है, जो असंवेदनशील और पुरुषवादी राज्य के लिए एक गैरजरूरी प्रसंग है. इससे स्वास्थ्य के प्रति राज्य का रवैया भी स्पष्ट होता है, जिसके तहत अपने स्वास्थ्य की रखवाली नागरिक का निजी मुद्दा है.

जजिया कर से भी ज्यादा बड़ी तानाशाही है लहू का लगान 

सैनिटरी पैड खरीदने आई महिलाओं ने  नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि ‘यदि सैनिटरी पैड विलासिता की वस्तु है जिसके कारण उसपर 12% जीएसटी लगाया जा रहा है तो क्यों न वह विलासिता वस्तु हमारे वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री को गिफ्ट के तौर पर भेजा जाये. हम सैनिटरी पैड खरीदकर कर 12% जीएसटी बिल के भुगतान की रसीद के साथ उन्हें भेजते हैं, जिसका भुगतान उन्हें नहीं करना पड़ेगा.’