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जेल में बंद छात्रा का पत्र : “हम भगत सिंह के वारिस हैं जो जेल ही नहीं फांसी से भी नहीं डरते”

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  को काले झंडे दिखाने के बाद  विभिन्न धाराओं में  गिरफ़्तार छात्रा पूजा शुक्ला ने जेल से लिखी चिट्ठी – “हम भगत सिंह के वारिस हैं जो जेल ही नहीं फांसी से भी नहीं डरते”

लखनऊ: 7 जून को लखनऊ विश्विद्यालय के गेट नंबर एक के बाहर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को काले झंडे दिखाने के मामले में गिरफ़्तार किये गए 11 छात्र अभी भी जेल में हैं. गिरफ्तार छात्रों में दो महिला छात्राएं हैं.   जेल के अन्दर से गिरफ़्तार किये गए छात्रों में से एक पूजा शुक्ला ने पत्र लिखा है. पूजा ने अपने पत्र में भगत सिंह और राम मनोहर लोहिया का ज़िक्र करते हुए कहा है कि वह सरकार से डरने वाली नहीं हैं और जो हक़ की लड़ाई है उसमें वो आगे बढ़कर हिस्सा लेंगी. इस सार्वजनिक पत्र में पूजा ने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की सरकार में कमज़ोर क़ानून व्यवस्था के अलावा लखनऊ विश्वद्यालय में हुए कथित भ्रष्टाचार का भी ज़िक्र किया है.

पूजा की चिट्ठी 
उसे ये फ़िक्र है हरदम, नया तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है?
हमें ये शौक़ देखें, सितम की इंतहा क्या है !


ये पंक्तियाँ भगत सिंह की जेल नोटबुक से ली गयी हैं. भगत सिंह हमारे प्रिय नायक हैं. जेल में भगत सिंह के साथ बाबा साहेब और लोहिया जी के दस्तावेज़ों का अध्ययन करने का अच्छा मौक़ा मिला है. सरकार को लगता है हमारी बंदी-अवधि बढ़ा कर वह हमारे हौसलों को कमज़ोर कर देगी तो वह ग़लती कर रही है. हम भगत सिंह के वारिस हैं जो जेल ही नहीं फांसी से भी नहीं डरते.मैं जब छोटी थी तो मुझसे मेरे एक रिश्तेदार ने पूछा कि बेटा तुम्हारी क्या ख्वाहिश है तो मैंने तपाक से जवाब दिया था कि मैं तिरंगे में लपेट कर ले जाई जाऊं.और जब विवि(विश्विद्यालय) पहुंची, तो भगत सिंह के बारे में जाना, समझा, और पढ़ा और उनके रास्ते पर चल पड़ी.

अन्याय के ख़िलाफ़ खड़े होना ज़िन्दगी का मक़सद बन गया. जब सहारनपुर में सरकारी संरक्षण में दलितों का क़त्ल-ए-आम किया जा रहा था तो हमारे लिए यह असहनीय पीड़ा थी, उसी बीच बुलंदशहर से लेकर बाराबंकी तक महिलाओं के बलात्कार हत्याओं की ख़बरें भी दिल दहलाती हैं. ऐसे में 31 मई को अपने साथियों के साथ विधानसभा मार्च कर प्रतिरोध दर्ज कराने की कोशिश करते हैं जिसमें देश-प्रदेश के साथियों के समर्थन से सरकार के ख़िलाफ़ प्रदेश में पहला बड़ा प्रतिरोध दर्ज होता है.

प्रदेश में UPPSC और UPSSC की भर्तियों  पर लगी रोक के ख़िलाफ़ भी जगह-जगह छात्र प्रदर्शन कर रहे होते हैं, हम और हमारे साथी इस सवाल को मज़बूती से उठाने का निर्णय कर लेते हैं.इस बीच लखनऊ विश्विद्यालय में एक फ़र्ज़ी संगठन की आड़ में आरएसएस के प्रोग्राम के लिए 25 लाख रूपये विश्विद्यालय जारी कर देता है जिसका वित्त अधिकारी से लेकर कर्मचारी संगठन भी विरोध कर रहे होते हैं.एक तरफ़ छात्रों के स्मार्ट क्लास रूम, डिजिटल लाइब्रेरी, यहाँ तक कि मेस के लिए भी वीसी साहब पैसा न होने का रोना रोते हैं दूसरी तरफ़ छात्रों के पैसे को नेताओं को ख़ुश करने के लिए लुटाने को हम सब बर्दाश्त नहीं कर सकते थे.

इसलिए 7 जून को लखनऊ विश्विद्यालय में 25 लाख के घोटाले को रोकने, जांच करने के साथ प्रदेश में रोज़गार पर लगी रोक हटाने के लिए हमने मुख्यमंत्री जी के इस कार्यक्रम में शामिल होने का विरोध करते हुए काले झंडे दिखाए. हमारा प्रतिरोध पूरी तरह लोकतान्त्रिक था.छात्रों द्वारा लगातार प्रतिरोध से डरी सरकार ने साज़िशन हम लोगों को जेल में रखा हुआ है. सरकार चाहे जितनी अपराधिक धाराओं में मुक़दमा लगाए या जेल में डाले रखे, इंसाफ़ और हक़ की लड़ाई से हम सब पीछे नहीं हटने वाले.बाहर सभी साथियों से अपील है कि एकजुट होकर लड़ाई को आगे बढायें, लड़ाई जारी रहनी चाहिए, कारवां रुकना नहीं चाहिए.
(पूजा शुक्ला)

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मुबारक हो बिहारवासियों, मर गयी चंचल पासवान

स्त्रीकाल डेस्क 


2012 में चंचल पासवान और उसकी बहन पर तेज़ाब हमला  हुआ था. हमले में उसका चेहरा झुलस गया था और 28% वह जल गई थी. वह 22 जून को दुनिया को अलविदा कह गई. उसकी मौत के बाद अपने फेसबुक पेज पर दो पत्रकारों  ने मार्मिक और सूचनात्मक पोस्ट लिखे. संवेदनशील पत्रकार सरोज की इस विषय पर एक रपट  स्त्रीकाल के 2013 में प्रकाशित दलित स्त्रीवाद अंक में भी छपा था. नवल कुमार ने भी इसके मामले में खबरें लिखी थीं. दोनो ने ही अपने फेसबुक पेज पर उसे अपने तरीके से श्रद्धांजलि दी. सरोज कुमार की 2013 की रपट और सरोज तथा नवल द्वारा दी गई श्रद्धांजलियों को पढ़ हम समझ सकते हैं कि हम किस तरह  ह्रदयहीन समाज हैं. 

घटना के बाद मिलने आये पत्रकार और नेता





मुबारक हो बिहारवासियों, मर गयी चंचला

दुख या शोक मनाने की जरुरत नहीं है। आपको मनाना भी नहीं चाहिए। न आपको न बिहार सरकार को। उसे मरना ही था। जैसे एक दिन सभी को मरना है। हां वह 23 साल की उम्र में तिल-तिलकर मर गयी। हो सकता है कि आपके दिल के एक कोने में आवाज उठे। वैसे यह आवाज उठनी भी चाहिए। वजह यह कि जो मर गयी वह बिहार की बेटी थी। उसका कसूर यह था कि उसके माता-पिता ने बड़े प्यार से उसका नाम चंचला रखा था। पासवान परिवार में जन्मी चंचला का सबसे बड़ा कसूर यह था कि उसने सपने देखे थे। सपने अपने लिये और अपने परिवार के लिए। तभी तो वह मनेर के छितनावा गांव से रोज दानापुर आती थी।

उसकी उंगलियां कम्प्यूटर पर थिरकना चाहती थीं। उसके मन में आईएएस बनने का अरमान था। उसकी इच्छा थी कि मुस्कराहट के लिए तरसती उसकी मां उसकी सफ़लता देख मुस्कराये। दिहाड़ी मजदूर के रुप में काम करने वाला उसका पिता शैलेन्द्र पासवान गर्व से जीना चाहता था। चंचला उसे यह तोहफ़ा देना चाहती थी। लेकिन दे न सकी। मर गयी। सवाल यह नहीं है कि वह मर गयी। सवाल इसलिए नहीं कि उसके ही गांव के शोहदों ने उसके चेहरे पर एसिड डालकर उसका जीवन बर्बाद कर डाला था।

सवाल इसलिए भी नहीं कि हम सभी एक अच्छा बिहारी और अच्छा इंसान खुद को साबित नहीं कर सके हैं। सवाल तो तब उठेगा जब हम संवेदनशील होंगे और हमारी बेटियां बिना किसी भय के सपने देख सकेंगी। जी सकेंगी। अपने माता-पिता के अरमानों को पूरा करेंगी। हां जबतक ऐसा नहीं होता है। हंसिए, मुस्कराइये। चंचला को मुस्कराहट के साथ विदा करिये। इतना तो कर ही सकते हैं न आप और हम सभी। मैं ठीक कह रहा हूं न?

नवल कुमार 

चंचल पासवान नहीं रही. 2012 में जब उस पर तेजाबी हमला हुआ था, तो मैं शुरुआती लोगों में था जिसने उस पर लिखा था और मदद करने की कोशिश की थी. कुछ दोस्तों ने थोड़े-बहुत रूपये चंदा जुटाए थे. बाद में पटना की एक एनजीओ कार्यकर्ता ने उसको लेकर प्रेस कॉनफ्रेंस किया, पीटीशन दायर किया और चंदे की अपील की थी. बाद में उस कार्यकर्ता के प्रति चंचल और उसके पापा में नाराजगी मुझे दिखी थी. एनजीओ वालों पर मुझे ऐसे भी भरोसा नहीं रहता. बाद में उस एनजीओ ने चंचल के मामले को छोड़ दिया. फिर चंचल का परिवार दिल्ली के एक एनजीओ के संपर्क में आया. इनके जरिए अभिनता जॉन अब्राहम ने उसके इलाज की जिम्मेदारी ली थी और उसका इलाज दिल्ली में फोर्टिस हॉस्पिटल में चल रहा था. दो साल पहले यहां उसकी सर्जरी हुई थी. लेकिन चंचल के पापा शैलेश पासवान ने बताय कि उसके बाद फोर्टिस वाले उन्हें टरकाते रहे. चंचल को बीच-बीच में परेशानी होती रही, पटना में ही सरकारी अस्पतालों में उसके पापा दौड़ते रहे. कल अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसकी मौत हो गई. उससे और उसके पापा से मेरी लगातार बात होती थी, पर एक साल से कुछ खबर नहीं मिली थी उसकी. आज उसके यहां फोन किया तो समझ नहीं आया क्या कहूं. एक तो गंभीर रूप से एसिड के घायल तिस पर दलित! चंचल बहुत हिम्मती लड़की थी, उसने बहुत संघर्ष किया. लेकिन हमारे और इस समाज, सिस्टम तथा कुछ ‘अच्छे दिख रहे’ संस्थानों के नकारेपन ने उसको यों ही छोड़ दिया और वह हार गई.
सरोज कुमार 

सरोज कुमार द्वारा अस्पताल में ली गई तस्वीर

 

सावधान! राजा राजसूय यज्ञ पर निकले हैं….तेजाब से जलाए जाती रहेंगी महिलाएं और दलित


भय में जी रहा है दबंगों द्वारा तेजाब से जलाई गई छात्राओं का परिवार
समाजसड़ चुका है। विकास झूठ है फरेब है। हाशिए के लोग इसकी सड़ांध झेलने को मजबूर हैं। महिलाएं और वो भी दलित हैं तो और भयानक शोषण और अत्याचार की शिकार हैं।विकास और सुशासन के नारों के बीच हाशिए के लोग लगातार संघर्ष कर रहे हैं। वहीं बिहार का घमंडी राजा नीतीश राजसूय यज्ञ कर रहा है और महिलाएंसामंतवादियों के चंगुल में नरक भोग रही हैं। उनपर लगातार हमले हो रहे हैं।बिहार में अभी हाल के दिनों में लगातार महिलाओं और दलितों के खिलाफ हमले बढ़े हैं। दूरदराज ही नहीं बल्कि राजधानी और इससे सटे इलाकों में लगातार लड़कियों के रेप और हत्या जैसे मामले सामने आए हैं। अभी रोंगटे खड़े कर देने वाला ताजा मामला बिहार में राजधानी पटना से सटे मनेर थाने के छितनावां गांव का है। दबंगों ने क्रूरता की हद पार करते हुए रविवार 21 अक्टूबर की देर रात घर में घुस कर दो दलित बहनों चंचल और सोनम को तेजाब डालकर बुरी तरह जला दिया। कारण वहीं सामंतवादी पुरुष एंठन। वहीं सामंतवादी सोच कि गरीब, दलित और स्त्री होकर ये सामंतवादी पुरुष के शोषण के विरोध कैसे कर सकते हैं?कैसे नहीं तैयार होगी शोषित होने कोस्त्री?ये सामंतवादी ताकतें इतनी प्रभावशाली हो गई हैं कि सरकार इनके इशारों पर चल रहा है। और जैसे-जैसे हाशिए का समाज सशक्त होने की कोशिश कर रहा है सामंतवादी ताकतों का दमन बढ़ता जा रहा है।

यह सिर्फ मनचली और दबंगई का मामला नहीं है
मीडिया में भी खबरें आई हैं कि प्रेम और शादी से इंकार करने पर दोनों दलित बहनों पर मनचलों ने तेजाब डाला है। बात साफ है कि यह वहीं पुरानी सामंतवादी सोच काम कर रही है कि स्त्री और वो भी गरीब और दलित कैसे पुरुष को अस्वीकार करने की हिम्मत जुटा रही है। तेजाब की शिकार चंचल को दबंग लगातार छेड़खानी करते रहते थे। बाजार या पढ़ने आते-जाते वे लगातार उसे परेशान कर रहे थे। दबंगों के डर से वह चुप रह परिजनों को बताने से बचती रही लेकिन दबंगों के सामने घुटने भी नहीं टेके। वे लगातार उसे बुरे परिणाम भुगतने की धमकी भी देते रहे। पर चंचल झुकी नहीं। हाल ये हुआ कि इन सामंतवादी पुरुषों के अहम को ठेस लगी और इन्होंने चंचल को अपने क्रूरता का शिकार बना डाला। देर रात घर में घुस कर छत पर सो रही चंचल और उसकी छोटी बहन सोनम पर तेजाब डाल कर जला दिया। दलितों और महिलाओं के विरोध को कुचलने के लिए ही सामंतवादी ताकतें इतनी ही क्रूरता पर उतर आई हैं। बिहार में आए दिन दलितों के खिलाफ हो रही हिंसा इसी सामंतवादी सोच को जाहिर कर रहे हैं। इससे पहले भी वैशाली में एक दलित छात्रा को दबंग परेशान करते रहे और विरोध करने पर उन्होंने उसके साथ बालात्कार कर के उसे कुएं में मार कर फेंक दिया था।

बैंक में नौकरी करने का सपना रखने वाली आंखें झुलस गईं
दबंगों की क्रूरता का शिकार हुई इंटर में पढ़ी रही चंचल बैंक में नौकरी करना चाहती थी। उसका यहीं सपना था ताकि गरीब मां-बाप को बेहतर जिंदगी दे सके। इसके लिए वह खूब मन लगा कर पढ़ाई भी कर रही थी। अपने सपनों के उड़ान देने के लिए उसने मनेर से दूर दानापुर में एक निजी संस्थान से कंप्यूटर के डीसीए कोर्स में भी दाखिला ले लिया था। वह रोज ऑटो से पढ़ने आया जाया करती थी।वहीं इसकी छोटी बहन सोनम सातवीं में पढ़ रही थी। सोनम की एक आंख पहले से ही खराब थी, इस हमले के बाद वह और सकते में है।  वह भी पढ़-लिख कर मां-बाप की गरीबी दूर सरकना चाहती थी। लेकिन दबंगों ने तेजाब से न केवल इनके शरीर और आंखों को जलाया है बल्कि इनके सपनों को भी चकनाचूर कर दिया है।

चंचल का चेहरा पूरी तरह से झुलस चुका है। छाती,गला, पीठ और पैर भी तेजाब से जले हुए हैं। शरीर का कुल 28% भाग जल चुका है। वहीं छोटी बहन सोनम का 20 %  भाग, हाथ और पीठ-पैर झुलसा है। चंचल की दशा इतनी बूरी है कि वह बोल भी नहीं पा रही है। बड़ी मुश्किल से कराहते हुए वह कहती है “बैंक में नौकरी पा कर मां-बात की गरीबी दूर करना चाहती थी। अब क्या होगा समझ में नहीं आ रहा। जिंदगी बर्बाद हो गई हैं”।ये बताते हुए उसको रोते हुए साफ महसूस किया जा सकता है लेकिन हालत ऐसी है कि उसके आंसू भी पता नहीं चलते। बस सुनाई पड़ती है तो सिसकियां और दर्द भरी कराह।

वहीं चंचल के पिता शैलेश पासवान के लिए बेटियां ही सबकुछ थीं। ऐसे वक्त में जब बेटियों की चाह कोई नहीं रखता, इन्हें हमेशा बेटियों की ही चाह थी। दो बेटियां होने के बाद इन्होंने और कोई औलाद नहीं चाही। वे फफकते हुए कह पड़ते हैं, “चाहते थे कि बेटियां अपने पैरों पर खड़ा होकर नाम रौशन करेगी। हमारी गरीबी भी दूर होगी। इसलिए बेटियों को पढ़ा भी रहे थे। लेकिन अब बेटियों के इस हाल के बाद भविष्य अंधकारमय हो गया है”।

चंचल की बहन सोनम

कैसे हो इलाज, क्या होगा भविष्य
पीड़ित दलित परिवार बेहद गरीब है। परिवार इंदिरा आवास से उपलब्ध घर में ही रहता है।कमरों का अभाव होने के कारण ही ठंड शुरु हो जाने के बावजूद भी बहनों को छत पर सोना पड़ रहा था। मां-बाप मेहनत मजदूरी करके गुजारा करते हैं। बड़ी मुश्किल से बेटियों की पढ़ाई हो रही थी। सोनम गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ाई कर पा रही थी। चंचल जैसे-तैसे कंप्यूटर कोर्स कर रही थी। वहीं अब इस घटना के बाद परिवार को कुछ सूझ नहीं रहा है। चंचल और सोनम के इलाज में भी पैसे लगेंगे। फिलहाल तो पटना के पीएमसीएच में मुफ्त में इलाज चल रहा है लेकिन दवाएं बाहर से भी खरीदनी पड़ रही हैं। चंचल की हालत इतनी नाजुक है कि इलाज लंबा चलेगा। पूरी तरह से ठीक होने में लंबा वक्त लगेगा। चेहरा इतना झुलसा है कि कैसे ठीक होगी कहना मुश्किल है। बेहतर सर्जरी के लिए अच्छे अस्पताल और इलाज खर्च की जरुरत है। जबकि परिजन इसमें सक्षम नहीं हैं। फिलहाल पीएमसीएच में इलाज चल रहा है लेकिन ऐसे हाल में जब बिना काम किए परिजनों का गुजारा मुश्किल है इलाज कैसे चलता रहेगा कहना मुश्किल है। बार-बार पत्रकारों और संगठनों की पूछताछ से खीज चुकी चचंल की मां सुनैना देवी गुस्से में कहती हैं, “कुछो तो नहीं हो रहा है खबर छपे के। कउनो फायदा नहीं हो रहा। रोजे अखबार में छपइत है लेकिन अभी तक कोई मुआवजे न मिलल”।

बिल्कुल सामंतवादी रिपोर्टिंग कर रहा है दैनिक जागरण
पटना में दैनिक जागरण महिलाओं के मामले में जिस तरह रिपोर्टिंग कर रहा है उससे इसकी सामंतवादी सोच का पता चलता है। पिछले दिनों पटना में गैंग रेप की शिकार लड़की को जहां बेबुनियादी तर्कों के आधार पर वह कटघरे में खड़ा कर रहा था, वहीं इस मामले में भी कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रहा है। 26 अक्टूबर अखबार लिखता है कि चंचल के फर्द बयान पर उसका अंगूठा क्यों लगा जबकि वह इंटर की छात्रा है, हस्ताक्षर होना चाहिए था। इससे काफी कुछ पता चलता है कि गड़बड़ है। अब इस पत्रकार को केवल इस बात से दबंगों पर आरोप को संदिग्ध बता रहा है। जबकि चंचल की हालत बिल्कुल नाजुक थी। वह निश्चेत पड़ी रहती थी। बोल पाने में असक्षम थी। ऐसी नाजुक हाल में  हस्ताक्षर की बजाय अंगूठा ले लिया गया होगा। दैनिक जागरण आगे लिखता है कि अपराधियों को घर में किसी ने नहीं देखा। देर रात सारे लोग सोए थे। सोई अवस्था में तेजाब डाल अपराधी भाग खड़े हुए। ऐसे हाल में अपराधियों को कैसे पहचाना जा सकता था। साफ है कि दैनिक जागरण कैसी रिपोर्टिंग कर रहा है। वह पीड़ित परिवार को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है।

भय के साए में जी रहे हैं परिजन
इस सुशासन में अपराधियों के मनोबल का अंदाजा इसी बाते से लगाया जा सकता है कि मीडिया में इसकी खबर प्रकाशित होने और तीन गिरफ्तारियों होने के बावजूद दबंगों का हौसला कम नहीं हुआ है। दबंग लगातार परिजनों को धमकी देते फिर रहे हैं। चंचल के चाचा मिथिलेश पासवान बताते हैं “26 अक्टूबर की रात को दबंगों ने दुबारा घर पर हमला बोला। रात में दरवाजे पर धक्का देते रहे, जंजीर खटखटाते रहे और दरवाजा न खोलने पर घर उड़ा देने की धमकी दी। वहीं 27 अक्टूबर को कुछ संदिग्ध युवक पीएमसीएच तक पहुंच कर छात्राओं के बारे में पूछते पाए गए”। ऊपर से पुलिस का वहीं पुरानी रटा-रटाया जवाब मिल रहा है कि धड़-पकड़ जारी है। ऐसे हाल में परिजन भय में जी रहे हैं और सुशासन कान में तेल डाल कर सो रही है।

नहीं बढ़े हैं मदद को हाथ
पीड़ित परिवार जहां बेहद गरीब है वहीं इनकी मदद को कोई सामने नहीं आ रहा है। ऐपवा और एक-दो दलित संगठनों ने पीड़ितों से मुलाकात के बाद सरकार से मुआवजे और अपराधियों की गिरफ्तारी की मांग जरुर की है। भाकपा माले ने भी विरोध प्रदर्शन भी किया है। लेकिन इनका दायरा केवल सरकार से मांग तक सीमित होने के कारण कोई तात्कालिक सहायता नहीं पहुंची है। बिहार राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने मुआवजे की बात कही है लेकिन अभी तक कोई सहायता राशि परिजनों को नहीं मिली है। कोई सामाजिक संगठन या एनजीओ ने भी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ली है जबकि पीड़ित परिवार बेहद गरीब है। बहरहाल चंचल और सोनम के सपने टूट चुके हैं और इनको मदद की जरुरत है।

और राजा राजसूय यज्ञ में व्यस्त हैं
ऐसे हाल में जब महिलाओं के खिलाफ लगातार हिंसा सामने आ रही है। राजधानी में पटना में पिछले दिनों कई गैंग रेप के मामले सामने आए हैं। दलित छात्राओं के रेप और हत्या के मामले सामने आए हैं। कुछ ही किलोमीटर दूर मनेर में दबंग इतने हौसले में हैं कि तेजाब से जलाने और गिरफ्तारी के बाद भी दबंगई से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अधिकार यात्रा के आयोजन में व्यस्त हैं। अपराधियों का हौसला यों ही नहीं बढ़ा हुआ है। बल्कि इस सुशासन में इन्हीं लोगों की सहभागिता है। 4 नवंबबर को होने वाले अधिकार सम्मेलन को लेकर बाहुबली अनंत सिंह से लेकर सुनील पांडेय और हुलास पांडेय जैसों के विशालकाय होर्डिंग से पटना की सड़कें पटी पड़ी हैं। और तो और अधिकार सम्मेलन के लिए भारी रंगदारी वसूली जा रही हैं। 28 अक्टूबर को जदयू के पूर्व सासंद पर अधिकार रैली के लिए 7 करोड़ रुपए रंगदारी मांगने का आरोप लगा है। हाजीपुर के एक निजी शैक्षणिक ग्रुप डायरेक्टर ने यह आरोप लगाया है। साफ है कि सरकार में कौन लोग हैं। ऐसे लोग ही सत्ता में शामिल हैं और अधिकार की मांग कर रहे हैं। जहां हाशिए के लोगों के अधिकार छीने जा रहे हैं, शोषण किया जा रहा है। आखिर सुशासन बाबू किनके अधिकारों की बात कर रहे हैं अपराधियों की ही ना। हाशिए के लोगों के अधिकारों की तो न सुशासन बाबू को फिक्र है ना प्रशासन को, फिर सत्ता में सामंतवादी और अपराधी ही तो शामिल हैं। तो क्यों ना अपराधियों और सामंतवादियों का मनोबल बढ़े?

निर्मला पुतुल की कविताएँ: आदिवासी पीड़ा और प्रतिरोध का काव्य-संसार

रेखा सेठी

  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित
संपर्क:reksethi@gmail.com

निर्मला पुतुल का काव्य-संसार एक अलग दुनिया खोलता है। वास्तविक और वैचारिक के अंतर को यहाँ शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। अधिकांशतः स्त्री-कविता की पहचान पितृसत्तात्मक व्यवस्था से मुक्ति की आकांक्षा में पढ़ी जाती हैं किन्तु यहाँ आदिवासी समाज का हाशियाकरण, उसे एक अतिरिक्त आयाम देता है। यहाँ हिंसा के कई रूप हैं और लड़ाई उतनी ही गहरी। आज़ादी के लगभग सात दशक बाद भी यह जन-समाज राष्ट्र की मुख्यधारा में सक्रिय रूप से शामिल नहीं हो पाया है। राजनीति और बाज़ार ने उनकी असुरक्षा को तीव्रतर ही किया है। विकास के नाम पर षड्यंत्रों का शिकार होते हुए इन आदिवासियों को बार-बार विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। निर्मला पुतुल अपनी कविताओं में आदिवासी समाज के अंतर्विरोधों को उकेरते हुए यथास्थिति के प्रतिकार के लिए कविता का अभियान छेड़ती हैं। वे अपने आदिवासी बहनों और भाइयों को विद्रोह के वीर इतिहास की याद दिलाती हैं। बार-बार सचेत करती हैं कि अपने शोषण को पहचानो एवं उदासीन समर्पण की राह छोड़कर संघर्ष की राह चुनो। इस सारे सामाजिक संघर्ष की पृष्ठभूमि में स्त्रियों की स्थिति और भी विकट है। जीवन के अभावों से सतत संघर्ष, कड़ी-मेहनत, दैहिक-आर्थिक शोषण, स्त्री को डायन बना देने वाली कुप्रथाओं का बोझ—सब मिलकर स्त्री के लिए ऐसी व्यूह-रचना करते हैं कि उसका जीवित रहना, इस समाज में साँस लेना भी कड़े जीवट एवं साहस की माँग करता है। निर्मला पुतुल की कविताएँ इस प्रति-संसार को हमारे सामने सजीव कर देती हैं।

स्त्री-कविता की पहचान करते हुए निर्मला पुतुल की कविताओं को शामिल करने का उद्देश्य स्त्री के इस दोहरे हाशियाकरण से जो जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं उनसे साक्षात्कार करना है। इस कवयित्री की मूल भाषा संताली है। पहला संकलन ‘अपने घर की तलाश में’ सन् 2004 में रमणिका फाउंडेशन से संताली-हिंदी द्विभाषिक रूप में प्रकाशित हुआ। इन कविताओं के ताप तथा स्वर की दृढ़ता ने हिंदी समाज को इन्हें गंभीरता से लेने पर विवश किया। इनमें से अधिकांश कविताएँ हिंदी में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा 2005 में प्रकाशित की गईं, जिसका शीर्षक था ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’। निर्मला पुतुल अपनी कविताओं के द्वारा नगाड़े की तरह चोट करने वाले ऊँचे स्वर में सामाजिक न्याय की गुहार कर रही हैं। 2014 में ‘बेघर सपने’ प्रकाशित हुआ जो एक बार फिर शोषण और न्याय के सवालों को उठाता है। इन कविताओं में बार-बार बलात्कार का शिकार होती या फिर घरेलू श्रम की मंडी में बेच दी जाती आदिवासी लड़कियों की पीड़ा साकार हुई है। निर्मला पुतुल का काव्य-संसार आज हिंदी कविता से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

निर्मल पुतुल की कविता में स्त्री-प्रश्न 

निर्मला पुतुल की कविताओं में आ
दिवासी-अस्मिता से अलग कर स्त्री-अस्मिता का कोई अस्तित्व नहीं है। इस कविता में आदिवासी स्त्री-जीवन के असंख्य आख्यान हैं। घर और घर से बाहर जिस गहरे दुःख के अभिशाप को वह निरंतर झेलती हैं ये कविताएँ उसका बयान हैं। अपने एक लेख ‘झारखंडी महिलाओं का पलायन एवं उनका शोषण’ में आदिवासी महिलाओं के जीवन यथार्थ के विषय में निर्मला जी लिखती हैं –“आदिवासी महिलाएँ जिनके पास भूख है, भूख में दूर तक पसरी उबड़-खाबड़ धरती है, सपने हैं, सपनों से दूर तक पीछा करती अधूरी इच्छाएँ हैं, जिसकी लिजलिजी दीवारों पर पाँव रखकर वे भागती हैं, बेतहाशा, कभी पूरब तो कभी पश्चिम की ओर….।”

अपनी कविताओं में कवयित्री इन भागती –हाँफती, डरी हुई महिलाओं के जीवन-प्रसंगों का वर्णन करती है। ये दृश्य करुणा उपजाने वाले हैं ‘ढेपचा के बाबू’ यह दारुण स्त्री-जीवन की प्रतीकात्मक कविता है। यह कविता नहीं कविता में कहानी है, उस स्त्री की जिसका पति उसे छोड़ कश्मीर कमाने गया है, बेटा और बेटी बंगाल। पाँच साल के छोटे बच्चे को लिए वह अकेले हर स्थिति से लड़ रही है। सबकी भूखी ललचायी नज़रे उस पर लगी हैं। ऊपर पाड़ा के लोग उसका सूअर मारकर खा जाते हैं | बाज़ार से उसका सामान चोरी चला जाता है | ज़मीनें बिक रही हैं | लाल कार्ड का लाभ प्रधान हड़प जाता है | स्कूल बंद, खेती बंद, मजदूरी भी पूरी नहीं मिलती, उस पर हँसी-ठट्ठा और अपमान | आदिवासी ग्राम-समाज की औरत को हल चलाने, छत डालने का भी अधिकार नहीं | डायन करार कर नंगा नचाने की दहशत हर दम पीछा करती है | अकेली औरत कैसे निभाए | अपने दुःख और पीड़ा वह किसे दिखाए। बस, इसी आस में बालों में फूल लगाना नहीं छोड़ा है कि कभी उसका पति लौट आएगा। यह कहानी लगभग प्रत्येक आदिवासी स्त्री की है जिसे तरह-तरह का अपमान झेलना पड़ता है। कभी पति के चले जाने पर तो कभी उसके होने पर भी-
कोई आया, कुछ उठा ले गया
तुम बाँसुरी बजाते रहे

अशक्तता, आत्मलिप्तता बन जाती है। आदिवासी जन-समाज में स्त्री हो या पुरुष तथाकथित ऊँची जातियों द्वारा इतने विवश कर दिए गए हैं कि प्रतिकार की आवाज़ नहीं निकल पाती। शायद इसीलिए बस्ती में आग लगे, जुलूस निकले, कुछ भी हो जाए पुरुष ने  अपने दुःख को और अपने साहस को बाँसुरी की आवाज़ में विलुप्त कर दिया | उसकी स्त्री हर-बार चुप रहकर उसकी निष्क्रियता को नहीं झेल सकती-
इस बार मैं चुप नहीं रहूँगी
छीन कर तोड़ दूँगी तुम्हारी बाँसुरी
कि देखो इस बार
वो मुझे उठाने आ रहे हैं।

उठा लिया जाना, यौन-शोषण, आदिवासी स्त्रियों के जीवन की बहुत बड़ी हकीकत है। डर का अनाम साया उन्हें हर वक्त घेरे रहता है। कैसी हैवानियत की शिकार होती हैं ये स्त्रियाँ। घर का दरवाज़ा खोलकर सोने में डरती हैं। दरवाज़े बंद होने पर भी बाहर की आवाजें असुरक्षा के बोध को कम नहीं होने देतीं। टेलीविजन और अखबार के पन्ने रंगे रहते हैं ऐसी वारदातों के बयान से। निर्मला पुतुल अपनी अनेक कविताओं में कभी सीधे कभी सांकेतिक रूप में ऐसी घटनाओं का वर्णन करती हैं। पीड़ा इस बात की है कि आततायियों के चेहरे अलग से पहचाने जाने वाले चेहरे नहीं हैं।  कौन किस भेष में उनका सौदा कर देगा यह साफ़ नहीं। ‘महज़ बोतल भर दारु और एक मुर्गे’ के लिए प्रसव-पीड़ा सहकर जन्म देने वाली माँ ने अपनी बेटी को वहशी दरिंदों के हवाले कर दिया या फिर किसी छोटे-से एहसान के बदले बापू ने मूर्ख बनकर बाघ से दुष्ट आदमियों के हवाले कर दिया। अपना पति भी उसके साथ दरिंदगी कर सकता है। यह नृशंसता की सीमा है जहाँ मानवीय संवेदनाएँ इस कदर मर जाती हैं कि मनुष्य और पशु का अंतर ही न दिखाई पड़े। दैहिक-शोषण जैसे इस समाज में स्त्री की स्वीकृत नियति है। इसलिए कहीं कोई चीख-पुकार नहीं, बस प्रताड़ित स्त्री के गले में अवरुद्ध हो गई चीत्कार भर है जिसे वह चाहकर भी भूल नहीं सकती-
कैसे भूल जाऊं वह राक्षसी रात
जिसमें दुनिया की सारी संवेदनाएँ
मेरा सबसे ऊँचा विश्वास
पवित्र रिश्ते की आस्था
सबकुछ लुट गया


किसी भी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी उन रिश्तों में छले जाना है जिन पर विश्वास अपने से भी अधिक हो। आदिवासी स्त्री के जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि अपने आस-पास के जन-समाज के लिए वह मात्र देह में तब्दील की जाती रही है। जैसे पशुओं में मात्र नर-मादा होते हैं उसी तरह यहाँ भी औरों को उसकी स्त्री-देह ही दिखाई पड़ती है।
जंगली, असभ्य, पिछड़ा कह
हिकारत से देखते हैं हमें

मेरा सबकुछ अप्रिय है उनकी नज़र में

उन्हें प्रिय है
मेरी गदराई देह
मेरा माँस प्रिय है उन्हें !
यह स्थिति उनके जीवन में किसने पैदा की। निश्चित है कि एक स्वावलंबी समाज की तरह जीने वाला यह वर्ग हमेशा से ताकत के इस उलझे हुए समीकरण में नहीं जीता रहा है। विकास की राजनीति एवं बाज़ार के प्रसार ने वहाँ के स्त्री-जीवन को भी अछूता नहीं छोड़ा। स्त्री को मात्र पदार्थ या भोग्या समझने वालों ने यदि उसकी देह का शोषण किया तो बाज़ार की बदलती अर्थ-नीतियों ने अपने घर से उन्हें बेदखल कर शहरों की श्रम मंडी में लगभग उनके लिए मानव-तस्करी की स्थितियाँ पैदा कर दीं। शहरों में घरेलू काम-काज के लिए इन इलाकों से जिन जवान लड़कियों को लाया जाता है, उनका यौन-शोषण भी होता है और श्रम का उचित मूल्य भी नहीं मिलता। बड़े-बड़े शहर इन गाँव-घर की लड़कियों को निगल जाते हैं | गाँवों से इन लड़कियों का शहरों की ओर विगमन इतनी बड़ी संख्या में हो रहा है कि सभी घर खाली हो रहे हैं लेकिन शहर आकर वो लडकियाँ कहाँ गईं उसकी खबर भी किसी को नहीं लगती। निर्मला पुतुल अपने देश की उन सभी लड़कियों को ढूँढ रही हैं-
कहाँ हो तुम माया ? कहाँ हो ?
कहीं हो भी सही सलामत या
दिल्ली निगल गई तुम्हें

क्या सचमुच इतने लोगों से होकर गुजरी तुम
या वे सबके सब ही गुज़रे
अनचाहे तुम्हारी जिंदगी से ?

दिल्ली
नहीं है हम जैसे लोगों के लिए
क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता माया
कि वह ऐसा शमशान है जहाँ
जिंदा दफ़न होने के लिए भी लोग लाईन
में खड़े है ?

झारखण्ड की धरती संताल
परगना की माटी
दुमका के पहाड़
और काठीकुंड के उजड़ते
जंगल पुकार रहे हैं तुम्हें
तुम जहाँ भी हो लौट आओ माया !
लौट आओ !!

 इतना लंबा उद्धरण यहाँ इसलिए देना पड़ा कि कवयित्री जो ब्यौरे दर्ज कर रही है वह उस सामाजिक जीवन की समझ पैदा करने के लिए आवश्यक है। ये कविताएँ निर्मला के अपने जीवनानुभव एवं कार्यक्षेत्र से उपजती है। उनका कहना है-
“बस, फील्ड वर्क के दौरान जो अनुभव मिलता है वही किसी न किसी रूप में यदा-कदा आप तक पहुँचता रहा है। अब चाहे आप इसे साहित्य का दर्जा दें न दें आपकी मर्ज़ी।”


जीवन के खुरदरे यथार्थ का यह तिक्त अनुभव ही काव्यानुभव में रूपांतरित हो जाता है। निश्चित ही वह साहित्य के पाले में है। मुक्तिबोध अपनी कविता ‘चकमक की चिंगारियाँ’ में जिस अनुभव से कविता के उत्स की बात करते हैं – नुकीले कील धँसे पैर से अँगारों के अनुभव से फूटती है कविता। ऐसा ही अनुभव इन कविताओं को अलग-अलग कोटि में खड़ा करता है। अपने ही सपनों – आकांक्षाओं में स्थापित-निर्वासित होती स्त्री अपना घर तलाश रही है।
स्त्री-कविता की अन्य रचनाओं की भाँति ‘घर’ इन कविताओं का भी बीज शब्द है। दो काव्य-संकलनों के शीर्षक ही घर तलाशने और बेघर सपनों की पीड़ा को व्यक्त करते हैं। ‘घर’ आश्रय भी है और स्त्री की निजता का पूर्णत्व भी। पुरुष की मानक दृष्टि से परे स्त्री का अपना एकांत, अपनी ज़मीन, अपना घर उसके लिए महत्त्वपूर्ण है। सपनों में भागती, रिश्तों के कुरुक्षेत्र में अपने आप से लड़ती, तन के भूगोल से परे मन की गाँठे खोलने की आकांक्षाएँ लिए यह स्त्री समाज के स्थापित ढाँचों से भिन्न अपने होने का अर्थ समझना चाहती है।
धरती के इस छोर से उस छोर तक
मुट्ठी भर सवाल लिए मैं
दौड़ती-हाँफती-भागती
तलाश रही हूँ सदियों से निरंतर
अपनी ज़मीन, अपना घर
अपने होने का अर्थ !

 स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व एवं अस्मिता के प्रति यह सचेत भाव निर्मला पुतुल को किसी भी स्त्रीवादी कवयित्री के समकक्ष खड़ा करता है। इतना ही नहीं उसके पास जो मुट्ठी भर सवाल हैं उसमें वह अपने साथी से पूछती है कि ‘क्या है वह उसके लिए’ यानी पुरुष के लिए स्त्री अस्त्तित्व के क्या मायने हैं। क्या वह उसके लिए सिर्फ सर टिकाने के लिए एक तकिया, खूँटी या दीवार है या फिर कोई डायरी, चादर या गेंद जिसे जब जैसा चाहा वैसे इस्तेमाल किया। बात सिर्फ उसके जानने की  ही नहीं, इन लिंग-आधारित असमानताओं को स्वयं स्त्री ने भी स्वीकार कर लिया है। वह उसकी नज़र से ही अपनी दुनिया आँकती है। कवयित्री उससे मुक्ति की घोषणा करते हुए लिखती है –
मैं स्वयं को स्वयं की दृष्टि से देखते हुए
मुक्त होना चाहती हूँ अपनी जाति से
. . . . . . . . . . .. . .. . . . . . .
अपनी कल्पना में हर रोज़
एक ही समय में स्वयं को
हर बेचैन स्त्री तलाशती है
घर प्रेम और जाति से अलग
अपनी एक ज़मीन
जो सिर्फ उसकी अपनी हो
एक उन्मुक्त आकाश
वह पूछना चाहती है कि ‘रसोई और बिस्तर के गणित से परे’ पुरुष उसके विषय में जानता  ही कितना है।

 इन ठेठ स्त्रीवादी कविताओं के बावजूद, स्त्रीवाद के पाखण्ड पर उन्हें बेहद नाराज़गी है। अंतर्राष्ट्रीय महिला-दिवस का आमंत्रण-पत्र पाकर जिस विडम्बना का बोध उन्हें होता है उसे वे ‘एक बार फिर’ कविता में दर्ज करती है जहाँ ऊँची नाक वाली महिलाएँ मंच पर आसीन होकर उनके नेतृत्व का दावा करेंगी। निर्मला पुतुल की नज़र स्त्री की द्वंद्वात्मक स्थिति पर है। स्त्रीवाद के इस मुहावरे में स्त्री की दुनिया के दो प्रति संसार हैं। एक में उस वर्ग की स्त्रियाँ हैं जो बहसें करतीं, सरकारें बनाती-गिराती हैं तो दूसरे में वो मेहनतकश औरतें जो बहसों के मूल में होकर भी योजना-बद्ध ढंग से जीवन के हर मंच से अदृश्य कर दी जाती हैं। रोती  और गाती स्त्रियों की पंक्तियों के बीच एक तीसरी मेहनतकश औरत भी है जो अक्सर कवियों-लेखकों की पकड़ से छूट जाती है। यह पंक्ति नहीं पूरी जमात है जिसमें हर बार दृष्टि-ओझल रही असंख्य स्त्रियाँ हैं। स्त्रियों पर कविता पढ़ने वाले कवियों और स्त्री विमर्श में शामिल लेखकों की नज़र से अक्सर जो स्त्रियाँ छूट जाती हैं, कवयित्री चुनौती भरे स्वर में उन्हें उस ओर देखने के लिए ललकार रही है। “आदिवासी होने पर मुझे गर्व है पर उसमें आदिवासी स्त्री होना मेरे लिए सबसे बड़ी पीड़ा है चूँकि आदिवासी स्त्रियों को हमेशा हेय दृष्टि से देखा गया| कभी लिखो-फेंको वाली कलम की तरह, या फिर सार के भांड की तरह, तो कभी कामुक दृष्टि से देखा गया|…..स्त्री तो स्त्री होती है चाहे वह आदिवासी स्त्री हो या फिर अन्य सभ्य समाज की स्त्रियाँ हो, यहाँ फर्क सिर्फ इतना है कि सभ्य-समाज की स्त्रियाँ घर पर यानी रसोईघर और बेडरूम में प्रताड़ित होती है और आदिवासी स्त्रियाँ बीच सडकों पर पिटती हैं|”

 साहित्यिक जगत का तथाकथित ‘स्त्री-विमर्श’ स्त्री कविता की धुरी नहीं है। ज़मीन से जुड़ी कवयित्रियाँ उसकी निरर्थकता की ओर ही संकेत करती हैं। कोई भी मुक्ति तब तक संभव नहीं जब तक वह सबकी मुक्ति नहीं बनती। स्त्रीवाद के इस द्वंद्व को निर्मला ने अपनी कविता ‘गजरा बेचने वाली स्त्री’ में बखूबी व्यक्त किया है –
सुन्दरता बेचने वाली इस असुंदर स्त्री के
सपनों में आती हैं
कई-कई गजरे वाली स्त्रियाँ
और इसका उपहास करती हुई
गुम हो जाती हैं आकाश में
तब गजरों में पिरोए फूल काँटे की तरह
चुभते हैं उसके सीने में।
यह स्थिति स्त्रीवाद की असली चुनौती है। स्त्री-कविता इस दिशा में क्या प्रयत्न करती है यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा। स्त्रीवाद की हमारी सैद्धांतिकी भी इन मुद्दों को नज़रंदाज़ नहीं कर सकती।

 निर्मला पुतुल के पास स्त्रीत्व का अपना मानचित्र है। इन सब स्थितियों को बयान कर देने भर से उनका दायित्व पूर्ण नहीं होता। वह अपने लोक-आदर्शों को कविता में जगाती हैं ‘सजोनी किस्कू’ जिसने संथाल-विद्रोह के समय घर-बाहर का सब भार वहन किया, फिर भी स्त्री होने का दंड उसे सहना ही पड़ा। पीड़ा-प्रताड़ना के ऐसे कहे-अनकहे अध्याय जब तक स्मृतियों में कौंधते रहेंगे परिवर्तन की चेतना, मुक्ति की आकांक्षा जोर पकड़ेगी। वे बार-बार आह्वाहन करती हैं कि ‘उठो और अपने अँधेरों के खिलाफ लड़ो’। निर्मला की कविताओं में लाचारी के कितने ही बिंब क्यों न हों उनकी कविता का बीज स्वर मुक्ति का है, पराजय का नहीं। आत्मबल ही उसका सहारा है और ढाल भी।
स्त्रियों को इतिहास में जगह नहीं मिली
इसलिए हम स्त्रियाँ लिखेंगी अपना इतिहास
* * *
हम खून से लिखेंगे अपना इतिहास
आँसू से नहीं,
* * *
हम भूगोल की सारी सीमाएँ लाँघकर
पहुँच जाएँगे इतिहास के उस गलियारे में
और दर्ज करेंगे अपना सशक्त हस्ताक्षर

 एक ओर स्त्रीवाद का यह सक्रिय तेवर है जिसके शब्द-शब्द में चुनौती, संघर्ष और विरोध की थाप है। नगाड़े की तरह ही बजते हैं ये शब्द। दूसरी और स्त्री मन की कोमल छवियों में रचा-बसा संगीत भी यहाँ है। उन्मुक्त प्रेम की एक कविता है ‘अभी खूँटी में टाँगकर रख दो मांदल’। मीत के बाँसुरी बजाते ही प्रेयसी के पाँव थिरकने लगते हैं –
मन उड़ियाने लगता है
रूई के फाहे सा दसों दिस


 घर-गृहस्थी के दबावों में प्रीत के इन पलों को स्थगित कर देना पड़ता है, सचेतता राग को नियंत्रित करती है लेकिन प्रेयसी जिस अधिकार से बाँसुरी और मांदल रख देने को कहती है उसमें रखने से अधिक पाना है। प्रेम की ललक ही प्रमुख है। इसके अलावा प्रेम की अन्य कविताओं में वियोग का दुःख प्रधान है। अंतरंगता के क्षण स्मृति का हिस्सा हैं, जो बार-बार जीवित-पुनर्जीवित होते हैं। इनमें सपनों के टूट कर बिखर जाने का दर्द, छोड़ जाने की पीड़ा है तो उसके साथ लौट आने की आकांक्षा भी है। ‘तुम्हारे हाथ’, ‘कुछ भी तो बचा नहीं सके तुम’, मेरा कुसूर क्या है?’, ‘ज़माने में और भी गम हैं मुहब्बत के सिवा’ आदि कविताएँ प्रेम के विषम रूप को अभिव्यक्त करती हैं। आदिवासी जीवन की उद्दामता, ऐन्द्रीयता और मिट्टी की गंध को विपरीत प्रथाएँ लील जाती हैं। अपना ही पुरुष न जाने कब घर से बाहर कर दे या छोड़ कर चला जाए। अन्य स्त्री घर ले आए जैसे कई विकल्प पुरुष को रसिया बनाते हैं और स्त्री के अंतरतम में कारुणिक आर्तनाद के सिवा कुछ नहीं बचता।



 निर्मला पुतुल अपने जन-समाज का जो चित्र प्रस्तुत करती हैं वह रोमानियत भरे राग-रंग का नहीं है, सामाजिक अंतर्विरोध का है जिसमें हर बार स्त्री के हिस्से दुःख ही आता है। लोक-संवेदना के  महीन-दीप्त रंग से रंगी दो महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं – ‘माँ के लिए’, ससुराल जाने से पहले’, तथा ‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा।’ ससुराल जाने से पहले बेटी माँ को तरह-तरह से कुरेदती है कि वह घर-भर की धड़कनों में जिस तरह व्याप्त है उसे माँ कैसे भुला पाएगी। ऐसा ही अनुरोध पिता से भी है। ‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा’ में बेटी बाप से आग्रह करती है कि उसका ब्याह इतनी दूर न कर दें कि वे एक-दूसरे के सुख-दुःख के भागिदार न हो पाएँ। इस कविता के विषय में वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने लिखा –“यह ऐसी कविता है जिसमें एक-साथ आदिवासी लोकगीतों की सांद्र मादकता, आधुनिक भावबोध और प्रतिरोध की गंभीर वाणी गुम्फित हो।”  उतनी दूर मत ब्याहना की टेक लोकगीतों की सी है लेकिन बेटी जो माँग रही है वह आधुनिक भी है और प्रचलित लैंगिक संबंधो की असमानता पर चोट करने वाला भी। इस कविता में विधेय एवं निषेध की पंक्तियों से गुज़रते हुए अपनी बात कही गई है। उसे उस देस नहीं जाना जो पिता के घर से बहुत दूर हो, जहाँ आदमी से अधिक ईश्वर बसते हों। जंगल, नदी, पहाड़ न हों। खुला आँगन न हो। चढ़ता डूबता सूरज न दिखे। मोटरगाड़ियों और दुकानों-मकानों का शहर न हो। वर पढ़ना-लिखना न जानता हो, नशे में न डूबा रहे, बात-बात पर लड़ने को सन्नद्ध न हो। कमाने दूर देश न चला जाए। वह वहाँ जाएगी जहाँ से उसकी आवाज़ पिता तक पहुँच सके जहाँ ऐसा समतापूर्ण समाज हो कि शेर-बकरी एक घाटी पानी पिएँ। उसे उस पुरुष की तलाश है जिसके हाथों ने पेड़ लगाए हों। जो कबूतर के जोड़े-सा उसके संग साथ रहे, बाँसुरी बजाए, उसके लिए फूल चुन लाए और सबसे बढकर –
जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे !

 जिस निश्छल, सम्पूर्ण जीवन की उसे कामना है यदि वह संभव हो तभी स्त्री-जीवन का वृत्त पूरा होगा। द्वंद्व, टकराहट की कई तहों के पार निर्मला पुतुल उस बिंदु तक पहुँचती हैं जो जीवन के उस मूल को बचाएगा जिसे हर हाल में बचाना चाहिए। जीवन के नैसर्गिक रूप का आग्रह इस बात की गवाही देता है कि सामाजिक संरचनाएँ जितनी जटिलतर होती जाएँगी शोषण के उतने ही रूप उसमें घर कर लेंगे।

 आदिवासी अस्मिता के वृहद वृत्त  में स्त्री-अस्मिता की तलाश करने वाली कवयित्री के रूप में निर्मला पुतुल एक व्यापक जन समाज की मुक्ति तलाश रही हैं। बाज़ार की बाहरी ताकतों व अज्ञान के आंतरिक पिशाचों से एक साथ मुक्ति होने पर ही इस स्त्री के जीवन में कोई सुखद मोड़ आएगा जिसे उसे स्वयं अपने आत्मबल के द्वारा अर्जित करना होगा।

राजनीति 


 निर्मला पुतुल की कविताएँ व्यापक सामाजिक संघर्ष की कविताएँ हैं। सामाजिक विडम्बनाओं को तार-तार उधेड़ते हुए जिस वर्ग-विषमता, असमानता को रेखांकित किया गया है उसके स्रोत राजनीति में हैं। लोकतंत्र में, समाज के व्यापक राजनीतिकरण से वैषम्य और भी मारक हो जाता है। कवयित्री अपने इलाके में मूल सुविधाओं की अपेक्षा को बहस का मुद्दा बनाना चाहती है। सड़कें नहीं  है, बिजली नहीं है, बच्चे महाजन के पास हैं, महिलाओं को कोसों दूर झरने से पानी ढोकर लाना पड़ता हैI इन बातो को उठाते हुए निर्मला झारखण्ड के उन आदिवासी लोगों की वकील बनकर जिरह करती हैं। वे तथाकथित सभ्य समाज से पूछना चाहती हैं कि क्यों किसी को भी आदिवासी जीवन के ये अभाव लोकतंत्र का केंद्रीय मुद्दा नहीं लगते। राजनीति द्वारा समस्याओं का हल ढूँढने की कोशिश भीतर के खोखलेपन को बेपर्द करती चलती है। कुर्सी और सत्ता की राजनीति व्यापक मानव समाज की हित-चिंता से बहुत दूर है। हिस्सेदारी के प्रश्नों पर विचार करते हुए उन्होंने लिखा है – “व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सामाजिक हितों की लड़ाई आज तक हमारे संस्कार में शामिल नहीं हो पाई।”  लोकतान्त्रिक समाज व्यवस्था पर यह बहुत बड़ी टिप्पणी है। अपने से परे होकर सोचने का अभ्यास ही लोकतंत्र के स्वप्न को हकीकत बना सकता हैI

इन कविताओं का केंद्र झारखण्ड है जो आज़ादी के बाद से ही विकास एवं शोषण की राजनीति का शिकार होता आया है। ‘विकास बनाम विस्थापन’ यहाँ की राजनीति का बहुत बड़ा मुद्दा है। राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के नाम पर ‘विकास’ का जो मायाजाल बुना गया विस्थापन झेलता आदिवासी जन-समाज उसे संदेह की नज़रों से देखता है –
अगर हमारे विकास का मतलब
हमारी बस्तियों को उजाड़कर कल-कारखाने बनाना है
तालाबों को भोथकर राजमार्ग
जंगलों का सफाया कर आफिसर्स कॉलोनियाँ बसानी हैं
और पुनर्वास के नाम पर हमें
हमारे ही शहर की सीमा से बाहर हाशिए पर धकेलना है
तो तुम्हारे तथाकथित विकास की मुख्यधारा में
शामिल होने के लिए
सौ बार सोचना पड़ेगा हमें।
सड़कों और बाँधो का जाल इस स्वावलंबी समाज को संसाधनों के उत्खनन की मंडी में तबदील करने के लिए अधिक है। बाढ़, सूखा-अकाल झेलते वंचित-वर्ग की विवशता तथा सत्ता के अजब-गजब समीकरण रचते राजनीतिज्ञों के कुचक्र इन कविताओं में एक साथ उभरते हैं।

सक्रिय आंदोलनकर्मी के रूप में निर्मला पुतुल की राजनीतिक चेतना असाधारण है। वह अपने साथियों को सतह के पार देखने के लिए सावधान करती है।“यहाँ पर हमने, वैसे मुखौटे की ओर इशारा किया है जो आदिवासी होने का या इनका साथ देने का भ्रम देते हैं यानी शरीर से आदिवासी और मन से ‘दिक्कु’का रोल करते हैं विकास के नाम पर तरह-तरह के सपने दिखाते हैं, जिनसे कुछ होता जाता नहीं | परिणाम वहीहोता है ढ़ाक के तीन पात| मैंने अपनी कविताओं में उस ओर इशारा किया है| आज़ादी के 67 वर्षों के बाद भी आदिवासियों की स्थिति में गुणात्मक सुधार नहीं हो पाया है|”  नवगठित झारखण्ड राज्य की घोषणा की खबर सुनकर भाई मंगल बेसरा को सचेत करते हुए वे लिखती हैं –
वे तुम्हारे विरोधी थे कल तक
दुश्मन थे तुम्हारे
जिनसे मुक्ति चाहते थे तुम
पर कैसी विडंबना है,
वही खड़े हैं आज सबसे आगे तुम्हारी पंक्ति में
तुम्हारे सबसे बड़े हितैषी बनकर
* * *
पुरखों के सपने रौंदते झक-झक सफ़ेद कुरते वाले के पीछे
मत दौड़ो मेरे भाई। उन्हें पहचानो
वे तुम्हारे सपनों को भुनाने वाले लोग हैं
उनके एजेन्डे में दूर-दूर तक ही शामिल नहीं है
आन्दोलन को जन्म देने वाली आँखों के सपने

 निर्मला का संबंध सामाजिक गतिविधियों से खूब रहा है। वे अपने समाज के अंतर्विरोधों को पहचानती हैं तो राजनीति के फरेब को भी भली-भाँति जानती हैं। इसीलिए उनके स्वर में आशंका बराबर घर किए रहती है। ‘एक खुला पत्र : अपने लालबाबू के नाम’ या ‘खून को पानी कैसे लिख दूँ’ जैसी कविताओं में कवयित्री उन सामाजिक स्थितियों के ब्यौरे देती हैं जिनमें जनता ने जिन पर विश्वास किया वे सत्ता के गलियारों में इतनी दूर निकल गए कि उन तक उनकी आवाज़ भी नहीं पहुँच पाती। नाम बदले हैं, नए राज्य के मुखिया बदले हैं लेकिन इस लोकतंत्र में जो नहीं बदला वो है असहमति के किसी भी स्वर के प्रति संवेदनशील सहिष्णुता। असहमति के स्वरों को ही कभी नक्सलवाद या कोई और नाम देकर मुजरिम करार कर दिया गया। इस विसंगति को शब्द देते हुए उन्होंने लिखा –
न जताएँ कभी असहमति
न करें कभी कोई विरोध
हस्तक्षेप न करें अनेक कामों में
अपनी परिधि में रहें हरदम
बिना इजाज़त झाँके नहीं इधर-उधर
* * *
बिछ जाएँ जब तब उनके इशारे पर उनकी खातिर

निश्चित है यह कविताएँ इस स्थिति का प्रतिकार हैं। इनका एक सन्दर्भ आदिवासी लोक-आदर्शों के प्रति भारतीय इतिहास दृष्टि से भी सम्बद्ध है। संशय और संदेह बहुत गहरा है क्योंकि सिद्धो-कान्हू हो या तिलका-मांझी जिन्होंने 1857 के विद्रोह से बहुत पहले अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया था जिन्होंने अलग-अलग आदिवासी विद्रोहों, मुक्ति आन्दोलनों का नेतृत्व किया उनके ऐतिहासिक योगदान को भारतीय इतिहास में दर्ज ही नहीं किया गया। उसे ज़मीदारों-महाजनों के खिलाफ संघर्ष कहकर हाशिए पर डाल दिया गया। निर्मला पुतुल वर्तमान राजनीति को अंग्रेजों का उत्तराधिकार मानती हैं जिससे उन्हें न्याय की कोई उम्मीद नहीं। इस स्थिति के प्रति सजगता ही हथियार हो सकती है इसलिए सावधानी और सचेतता का टोन उनकी राजनीतिक कविताओं में बराबर बना रहता है।
   
इन सब समस्याओं से अलग राजनीति से जुड़ी एक अन्य कविता है ‘सद्दाम को फाँसी के बाद’। इस कविता का सन्दर्भ सद्दाम हुसैन की फाँसी की घटना है लेकिन उसकी व्यंजना साम्राज्यवाद एवं उसके प्रतिकार से जुड़ी है –
साम्राज्यवाद के दूतो
मत भूलो कि ऐसी कई आवाज़े हैं
जो आज भी उठ रही हैं तुम्हारे खिलाफ
तुम कितनी आवाजों को बंद करोगे ?
आदिवासी राजनीति की चर्चा में जो आक्रोश उभरता है उसी की प्रतिध्वनि यहाँ भी है। समस्त ऐसी रचनाएँ साम्राज्यवादी ताकतों को चुनौती देते हुए विद्रोह के स्वर को मुखर करती हैं। इनके सन्दर्भ भिन्न होते हुए भी इनमें आंतरिक एकसूत्रता विद्यमान है।

आदिवासी जन-समाज 
     
निर्मला पुतुल की कविता का कोई भी पाठ आदिवासी अस्मिता के अध्ययन के बिना संभव नहीं है। स्त्री समस्याओं के सन्दर्भ में हो या राजनीतिक भागीदारी के स्तर पर आदिवासी जन-समाज का हाशियाकरण उनकी काव्य संवेदना को गहरे आंदोलित करता है।
दिल्ली की गणतंत्र झाँकियों में
अपनी टोली के साथ नुमाइश बनकर कई-कई बार
पेश किए गए तुम
पर गणतंत्र नाम की कोई चिड़िया
कभी आकर बैठी तुम्हारे घर की मुंडेर पर?

आदिवासियों के साथ भारतीय गणतंत्र का ऐसा ही रिश्ता बना जहाँ वे प्रतीकात्मक विकास के नाम पर यह वर्ग सिर्फ नुमाइश की तस्वीर बनकर रह गया है। निर्मला की कविताओं में नुमाईश के विरुद्ध चुड़का सोरेन, सजोनी किस्कू की व्यथा-कथा सामाजिक संरचना के ताने-बाने से झाँकती है। जंगलों में शिकार करता, चुड़का सोरेन, इतना सीधा  क्यों है कि उसे औरों द्वारा अपना शिकार होना दिखाई नहीं देता।

आदिवासी जन-समाज का इतिहास अपराजेय वीरता का इतिहास है। तिलका माझी, सिद्धो कान्हू, बिरसा मुंडा, उलगुलान की औरतें सबने अपने-अपने स्तर पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद को चुनौती दी। 1784 में तिलका माझी ने सशस्त्र दस्ते के साथ हमला कर भागलपुर के बहुत से इलाके अपने कब्ज़े में कर लिए थे। संताल-हूल, मुंडा सबने मुक्ति-अभियान चलाए और अंग्रेजी हुकूमत के लिए सरदर्द बने रहे। ये हमले लगातार होते रहे किन्तु इन आदिवासी विद्रोहों को स्वाधीनता आन्दोलनों के प्रयास के रूप में दर्ज नहीं किया गया। अंग्रेज़ अफसरों और सिपाहियों द्वारा आदिवासी महिलाओं से दुष्कर्म, ज़मीन पर कब्ज़ा, संस्कृति पर आघात, जैसे अनेक मुद्दे आदिवासी संघर्ष के मूल में रहते थेI निर्मला पुतुल वर्तमान साहित्य में आत्म-विश्वास खो चुके जन-समाज को इन प्रेरक लोक-आदर्शों की याद दिला रही है। इनके साथ-साथ इन कविताओं में अनेक पात्र हैं —मांझी हडाम, पक्लू मरांडी, पिलचू बूढ़ी, सुबोधिनी मरांडी, बिटिया मुर्मू —इन सबके माध्यम से जिस आदिवासीजन-समाज का चेहरा उभरता है वह भीतरी और बाहरी दोनों पाटों के बीच पिस रहा है | सत्ता द्वारा दमन और अपने अंधविश्वासों की गिरफ़्त उसके जीवन को खोखला किये दे रही है |  शताब्दियाँ बीत जाने पर भी आदिवासी जन-समाज अपने अंधविश्वासों एवं अंतर्विरोधों से मुक्त नहीं हो सका। घड़ा उतार की प्रथा हो या स्त्री-जीवन से जुड़े अंधविश्वास निर्मला लगातार उनका विरोध करती रही हैं क्योंकि इन प्रतिगामी प्रथाओं के कारण ही इस समाज में परिवर्तन या मुक्ति संभव नहीं हो पाते। वे लगातार इन वर्गों को अपनी शोषण के प्रति सचेत दमनकारी शक्तियों को बेनकाब करती हैं-
ये वे लोग हैं
जो हमारे बिस्तर पर करते हैं
हमारी बस्ती का बलात्कार
और हमारी ही ज़मीन पर खड़े हो
पूछते हैं हमसे हमारी औकात।
नागरिक अधिकारों के अभाव में इस समाज की उपस्थिति हमारे गणतंत्र में ‘अन्य’ की रहीI वे आज भी सत्ता-संस्थानों से संघर्ष कर रहे हैं जिसकी अभिव्यक्ति नक्सलवादी आक्रोश के फूटने में रही दूसरी और इनके प्रति सत्ता का दमनकारी चरित्र भी नहीं बदला। इस जन-समाज के साथ हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था, विश्वास का रिश्ता कायम करने में नाकाम रही है।

जल-जंगल-ज़मीन 

आदिवासी जीवन प्रकृति से
साहचर्य का जीवन है। निर्मला अपनी कविताओं में प्रकृति का  उत्सव नहीं मनाती। प्राकृतिक दृश्यों के सुकोमल बिम्ब यहाँ नहीं हैं। जंगलों की अवैध कटाई जल के स्रोत सूखते जाने की गहरी चिंता है। जल-जंगल-ज़मीन उनके अस्तित्व, उनकी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।
क्या तुमने कभी सुना है
सपनों में चमकती कुल्हाडियों के भय से
पेड़ों की चीत्कार ?

धीरे-धीरे इनको ख़त्म करने या इन प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार करने के षड्यंत्र इन्हें इनकी ज़मीन से बेदखल कर रहे हैं। सीधे-सादे आदिवासी भले ही इस षड्यंत्र को न पहचान पायें। निर्मला की कविताएँ इसकी पोल ज़रूर खोलती हैं। वे सवाल करती हैं कि जो धरती खनिजों की सम्पदा से इतनी संपन्न है उसके बाशिंदे गरीबी के अंधेरों में लिप्त क्यों हैं। सामान्यतः जिसकी ज़मीन होती है उसकी संपत्ति पर भी उसी का अधिकार होता है तो फिर आदिवासी ही अपनी सम्पदा से बेदखल कैसे कर दिए गए। वास्तविकता का यह बोध उन्हें और चौकन्ना कर देता है। वे सावधान भी हैं, सजग भी और सक्रिय भी। इसीलिए वे समाज और प्रकृति को अभिन्न जैविक इकाई की तरह बचाने का आह्वान करती हैं-
जंगल की ताज़ा हवा
नदियों की निर्मलता
पहाड़ो का मौन
गीतों की धुन
मिट्टी का सौंधापन
फसलों की लहलहाट

भूमंडलीकरण, बाज़ार और आदिवासी जीवन का संकट 

अपने समय और समाज की धड़कन पर निर्मला पुतुल की जो पकड़ है उसकी एक पहचान बाज़ार के बढ़ते वर्चस्व के परिणामों पर भी है। वैश्वीकरण की अर्थ-नीति छोटे जन-समाजों के अस्तित्व के लिए संकट बनने के साथ-साथ उसके चरित्र को भी हमेशा के लिए बदल रही है। बाज़ार का आकर्षण ही उन्हें अपना शिकार बना लेता है| बदली हुई रुचियाँ अहसास ही नहीं होने देतीं कि उन्होंने क्या खोया-
यह कहते हुए
शर्मिंदा महसूस कर रही हूँ
कि बाज़ार में घूमते
जब प्यास लगती है
तो पानी से ज्यादा
पेप्सी और स्प्राइट की तलब होती है
पता नहीं कब
हमारी प्यास में घुस गया यह सब

 बाज़ार इस तरह अनुकूलन करता है कि अपने होने का अर्थ धुँधला होने लगता है। शहरों की  ब्रांडधर्मिता जैसे सबको एक-सा किये दे रही है, वही चलन कस्बों, गाँवों से होता हुआ संताल परगना जैसे खुद में सिमटे समाजों तक भी फ़ैल चला है-
संथाल परगना
अब नहीं रह गया संथाल परगना।
अपनी भाषा और वेशभूषा में यहाँ के लोग
बाज़ार की तरफ भागते
सब कुछ गड्डमड्ड हो गया


 बाज़ार का सबसे पहला नियम संस्कृति की बहुलता ख़त्म कर उसे एकरूप बनाने का  उपक्रम है। सब एक जैसे रहें, एक जैसा सोचें, असहमति की गुंजाइश भी ख़त्म हो जाए। यह मसला केवल बाजारी उपभोक्तावाद तक सीमित नहीं है। बाज़ार का एजेंडा पूरे देश की संस्कृति पर कब्ज़ा करने का है। इसलिए बड़ी भाषा तो उनके काम की है लेकिन उसके प्रभाव से अन्य भाषिक अस्मिताओं का नष्ट होना अवश्यम्भावी है। देखने में हो सकता है आभास न हो लेकिन होता सब कुछ योजनाबद्ध ढंग से है- ‘वे दबे पाँव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में……’I निर्मला पुतुल इस सारी दुरभिसंधि को भली-भाँति समझती है उसके विरोध में वह वैचारिक एवं काव्यात्मक संघर्ष का बीड़ा उठाए हुए है। अपने एक लेख में उन्होंने लिखा–“ग्लोबलाइज़ेशन नव-उपनिवेशवाद का अभिनव आक्रामक दौर है। इससे कोरपोरेट राजनीति  शुरू हो रही है। आज की राजनीति और अर्थ-नीति मल्टीनेशनल कम्पनियों द्वारा संचालित हो रही है। उनकी धन-लोलुपता, सभ्यता-संस्कृति को प्रदूषित कर रही है। जीवन-मूल्य विघटित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में बहुत सारी जातियों, सभ्यताओं, संस्कृतियों का निःशेष न होना अचरज की बात होगी”  कवयित्री बहुत बड़ी अर्थशास्त्री भले ही न हो लेकिन ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ की उनकी समझ को ख़ारिज नहीं किया जा सकता। उनके दिमाग में यह नक्शा साफ़ है कि सभी साधनों का अधिग्रहण कर बाज़ार एक स्वाबलंबी समाज से उसकी आत्मनिर्भरता छीनकर उनके समक्ष गरीबी-भुखमरी का विकल्प छोड़ता है। कड़ी मेहनत से उपजाया अन्न उनकी पहुँच से बाहर है। वे इस सत्य से भी अनजान हैं कि उनकी बनाई चीज़े कैसे पहुँच जाती हैं बिकने शहर के बड़े बाजारों में जबकि –
जिन घरों के लिए बनाती हो झाड़ू
उन्हीं से आते हैं कचरे तुम्हारी बस्तियों में ?

 यानी दुनिया भीतर दुनिया है, अनेक तहों में लिपटी जिसे पूरा जान पाना कठिन है। निर्मला अपनी तीसरी आँख से उसे पहचान लेती हैं। भूमंडलीकरण के आर्थिक-राजनीतिक, सामाजिक आशय  आदिवासी जन-जीवन मानवीय इतिहास में जिस संकट की रचना करते हैं वे उसकी पूरी खबर लेती
हैं |

विद्रोह और सशक्तिकरण का स्वर 

कविता में विद्रोह की छवियाँ
सदा प्रिय होती हैं। यथार्थ जीवन में विद्रोह की डगर जितनी असाध्य है कविता में पक्षधरता के स्तर पर उस पंक्ति में खड़ा होना उतना ही काम्य। इसलिए जब निर्मला पुतुल लिखती हैं –
आज की तारीख के साथ
कि गिरेंगी जितनी बूँदें लहू की धरती पर
उतनी ही जन्मेंगी निर्मला पुतुल
हवा में मुट्ठी बाँधे हाथ लहराते हुए।

 उनकी इस मुद्रा पर मन रीझ-रीझ जाता है। यथार्थ की बेबाकी, दमन-प्रताड़ना का ऐसा चक्रव्यूह और उसके भीतर से उठने का साहस –– इससे बनी है निर्मला पुतुल। उनके इस साहस को सलाम करने का मन होता है। यह प्रशंसा सिर्फ मुद्रा के लिए नहीं है, उन्होंने एक महीन आलोचनात्मक दृष्टि बुनी है। तमाम सामाजिक विसंगतियों, अंतर्विरोध पर एक-एक कर ऊँगली रखते हुए, फ़ील्ड-वर्क के दौरान अनुभव बटोरते हुए, वे एक व्यापक काव्य-दृष्टि बुनती हैं जिसमें विद्रोह और सशक्तिकरण साझीदार हैं। उनका अनुभव उन्हें बताता है कि स्वयं को सशक्त किए बिना विरोध सकारात्मक नहीं होगा। ‘पहचान’ उनकी कविता का महत्त्वपूर्ण शब्द है
सौदागर हैं वे….. समझो……
पहचानों उन्हें बिटिया मुर्मू ….पहचानो !

 बहुत-सी कविताओं का पाठ इस बात पर बल देता है कि ‘वे नहीं जानते’। न जानने वाला जन-समाज औरों के हाथों चले जाने को अभिशप्त है। निर्मला पुतुल भीतरी और बाहरी अँधेरों से घिरे उस वर्ग की नियति बदल डालना चाहती हैं। वे बार-बार उसे सचेत करती हैं, जगाती है और फुफकारती है-
उठो कि अपने अँधेरे के खिलाफ उठो
उठो अपने पीछे चल रही साजिश के खिलाफ
उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो
जैसे तूफ़ान से बवंडर उठता है
उठती है जैसी राख में दबी चिंगारी

 अधिकांश ऐसी कविताओं का स्वर आक्रोश से भरा, उग्र एवं विद्रोही है। सीधे लक्ष्य पर चोट करने वाला। एक कविता ‘धीरे-धीरे’ इसका अपवाद है। इस कविता में अनेक बिम्ब आए हैं- धरती की छाती फोड़ निकलते अंकुर, धीरे-धीरे फैलती जंगल की आग, बड़े होते बच्चे आदि। ये उन प्रतिक्रियाओं की बात करते हैं जिनमें प्रतिकूल परिस्थितियों की धुँध छंटेगी, सबके असली चेहरे निकल आयेंगे। समय की कोख में पलते गर्भस्थ शिशु की तरह वेदना से फूटेगा एक नया युग, नया समय –
अक्सर चुप रहने वाला आदमी
कभी न कभी बोलेगा ज़रूर सर उठाकर
चुप्पी टूटेगी एक दिन धीरे-धीरे उसकी
निर्मला पुतुल की कविताएँ इसी आदमी की चुप्पी टूटने की मुहिम हैं। अपने जीवन की इन स्थितियों के विषय में उन्होंने बताया है कि जीवन में संघर्ष करते-करते अनेक ऐसे क्षण आए जब “मैं पूर्णतः अकेली पड़ गई। …..बावजूद इसके मैं विरोध करती रही

कविता, भाषा और स्त्री-कविता 

 निर्मला पुतुल की प्रायः सभी कविताएँ पहले संताली में लिखी गई फिर हिंदी में आईं। अपनी संस्कृति के समान अपनी भाषा को बचाने का संकल्प इसके मूल में अन्तर्निहित है अर्थात आदिवासी जीवन का संकट,कविता और साहित्य के सभी पक्षों को आच्छादित करता  है। मुक्तिबोध के ही समान निर्मला पुतुल की कविताएँ भी अलग-अलग न होकर एक ही लम्बी कविता जान पड़ती हैं। ये कविताएँ थोड़े बहुत अंतर से संवेदनात्मक घनत्व की दृष्टि से एक ही वृत्त रचती हैं। अपने ‘काव्यगत उद्देश्यों’ के विषय में वे स्पष्ट हैं। सच को सच और झूठ को पूरी ताकत से झूठ कहने’ के साहस से रची गई कविताएँ हैं। कवयित्री बार-बार कहती हैं कि इनमें कोई चिकनी-चुपड़ी भाषा नहीं हैं। छन्द, तुक, लय पर भी अतिरिक्त ध्यान नहीं है। इन कविताओं को किस काव्य-परंपरा में रखा जाएगा, कविता माना जाएगा या नहीं इसकी चिंता उसे नहीं है। उसके निकट इन कविताओं की दोहरी सार्थकता है – एक तो वह उसके ‘एकांत का प्रवेश-द्वार’ है – “मैं कविता नहीं/ शब्दों में खुद को रचते देखती हूँ।’ इस स्व का संवाद व्यापक परिवेश से है। यह प्रतिबद्ध लेखन है जो लोकतंत्र में बराबरी के हक़ की लड़ाई लड़ता है                     चाहती हूँ मैं
नगाड़े की तरह बजें
मेरे शब्द
और निकल पड़ें लोग
अपने-अपने घरों से सड़कों पर।


सन्दर्भ सूची
1.हिस्सेदारी के प्रश्न-प्रतिप्रश्न, संपादक उमाशंकर चौधरी पृ. 203
2.और तुमबाँसुरी बजाते रहे, बेघर सपने पृ. 21
3.और तुम बाँसुरी बजाते रहे, बेघर सपने, पृ. 21
4. सबसे डरावनी रात, बेघर सपने पृ. 14
5.मेरा सबकुछ अप्रिय है उनकी नज़र में, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ. 72-73
6.तुम कहाँ हो माया?, अपने घर की तलाश में, पृ. 31-33
7.स्त्री होने की सजा सब जगह भोगनी पड़ती है, निर्मला पुतुल से प्रोमिला की बातचीत, आदिवासी अस्मिता की .  पड़ताल करते साक्षात्कार सं रमणिका गुप्ता, पृ. 89
9. अपने घर की तलाश में, नगाड़े की तरह बजते शब्द पृ. 30
10.अपनी ज़मीन तलाशती बेचैन स्त्री, नगाड़े की तरह बजते शब्द पृ. 9-10
11. संवाद, नया ज्ञानोदय, अप्रैल 2017 पृ.19
12.गजरा बेचने वाली स्त्री, बेघर सपने पृ. 33
13. स्त्रियाँ लिखेंगी अपना इतिहास, बेघर सपने पृ. 74
14.अभी खूँटी में टाँगकर रख दो मांदल, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ.78
15.नगाड़े की तरह बजते शब्द के फ्लैप से
16.उतनी दूर मत ब्याहना बाबा, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ.52
17.झारखंडी महिलाओं का पलायन एवं उनका यौन शोषण, निर्मला पुतुल, हिस्सेदारी के प्रश्न-प्रतिप्रश्न, संपादक उमाशंकर चौधरी पृ. 211
18.तुम्हारे अहसान लेने से पहले सोचना पडेगा हमें, बेघर सपने, पृ. 40
19.संवाद, नया ज्ञानोदय पृ. 20
20. भाई मंगल बेसरा, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ. 58-59
21. खून को पानी कैसे लिख दूँ, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ. 34-35
22.सद्दाम को फाँसी के बाद, बेघर सपने पृ.55
23.चुड़का सोरेन से, नगाड़े की तरह बजते शब्द पृ. 20
24. ये वे लोग हैं जो, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ. 54
25.बूढ़ी पृथ्वी का दुःख, नगाड़े की तरह बजते शब्द पृ. 31
26.आओ,मिलकर बचाएँ, नगाड़े की तरह बजते शब्द पृ. 77
27जब टेबुल पर गुलदस्ते की जगह बेस्लरी की बोतलें सजती हैं, बेघर सपने पृ. 65
28. संथाल परगना, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ. 26
29.वैश्वीकरण के भँवर में आदिवासी भाषा-साहित्य, निर्मला पुतुल, आदिवासी साहित्य विमर्श, सं: गंगा सहाय        मीणा पृ.65
30.बाहामुनी, नगाड़े की तरह बजते शब्द , पृ. 12
31.उतनी ही जनमेगी निर्मला पुतुल, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ. 91
32.बिटिया मुर्मू के लिए, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ. 15
33. बिटिया मुर्मू के लिए, नगाड़े की तरह बजते शब्द पृ. 14
34. धीरे-धीरे, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ. 84
35.स्त्री होने की सजा सब जगह भोगनी पड़ती है, निर्मला पुतुल से प्रोमिला की बातचीत, आदिवासी अस्मिता की पड़ताल करते साक्षात्कार सं रमणिका गुप्ता पृ. 87
36. मैं चाहती हूँ, नगाड़े की तरह बजते शब्द पृ. 93

जाति, जेंडर, राजनीति और दलित मुक्ति का प्रश्न: कोविंद बनाम कुमार

रतनलाल 


समाज और संस्थानों में भले ही दलितों का शोषण, भेदभाव और अत्याचार बदस्तूर जारी हो, लेकिन राजनीति में ‘दलित’ शब्द अब तक ब्रांड वैल्यू बनाए हुए है, इसका बाज़ार गर्म है. कम से कम इतना तो मानना पड़ेगा कि डॉ. आंबेडकर और संविधान द्वारा प्रदत राजनीतिक समानता अर्थात् एक व्यक्ति और एक वोट के अधिकार ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को विवश किया है कि सांकेतिक रूप से ही सही, लेकिन सदियों से उपेक्षित जमात को स्वीकार करे.

भारत में एक व्यक्ति बहुल अस्मिताओं के साथ जन्म लेता है, जिसमें सबसे प्रमुख जातिगत पहचान है. ‘जाति’ जन्मना है और ‘वर्ग’ कर्मणा. धर्म, क्षेत्र, राष्ट्रीयता, भाषा, वर्ग इत्यादि बदले जा सकते हैं, पर जाति नहीं. गर्भ-धारण से लेकर देहावसान तक जाति वजूद का हिस्सा बनी रहती है.भारतीय लोकशाही की एक दिलचस्प त्रासदी है – जब कोई ‘गैर-दलित’ किसी सार्वजानिक संस्था के लिए उम्मीदवार होता है या चुना जाता है तब उसके जातीय पहचान की नहीं बल्कि उसके तथाकथित ‘गुणों’, अनुभवों और ‘काबिलियत’ की चर्चा होती है. लेकिन यदि कोई अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग से आए तो उसके समुदाय की चर्चा पहले होती है. इसके ऐतिहासिक कारण हैं. ग़ैर-दलित के लिए यह उम्मीदवारी या अधिकार नैसर्गिक मान लिया जाता है, अर्थात यह उसका जन्मजात अधिकार है. ‘दलितों’ का यह अधिकार नहीं था ख़बर बन जाती है।

बहरहाल, 19 जून यानी सोमवार, को राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन ने श्री रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया, जो अगले तीन दिन तक मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक चर्चा का विषय रहा. 22 जून यानी बृहस्पतिवार को UPA की ओर से मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना कर तुरूप का पत्ता खेला. कई मामलों में यह चुनाव दिलचस्प होने वाला है – विशेष रूप से जाति और जेंडर के प्रश्न को लेकर. ज़रा दोनों उम्मीदवारों के अनुभव और परिचय पर एक नज़र डालें।

दोनों उम्मीदवार लगभग एक ही आयु वर्ग के हैं। मीरा कुमार स्वतंत्रता-सेनानी व भारत के पूर्व प्रधान-मंत्री बाबू जगजीवन राम की बेटी हैं. राजनीति में आने से पहले मीरा कुमार कुछ वर्षों तक भारतीय विदेश सेवा में कार्य कर चुकी हैं. बिजनौर से पहली बार 1985 में सांसद बनी, पाँच बार सांसद रह चुकी हैं। इसके साथ केन्द्रीय मंत्री और लोकसभा स्पीकर होने का अनुभव भी है – पहली महिला और दूसरी दलित लोक सभा स्पीकर. रामनाथ कोविंद उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं. पेशे से वकील हैं, लोकसभा या विधान सभा में नहीं आए, 1994-2006 तक राज्यसभा के सांसद बेशक रहे हैं और अभी बिहार के राज्यपाल हैं.

चूँकि इस चुनाव की उम्मीदवारी में दलित अस्मिता का खेल खेला जा रहा है, इसलिए जातिगत समीक्षा ज़रुरी लगती है. मीरा कुमार चमार/जाटव जाति से हैं, जो पूरे भारत में अनुसूचित वर्ग से सम्बद्ध हैं. रामनाथ कोविंद, कोरी/कोली जाति से हैं जो उत्तर प्रदेश से अनुसूचित जाति से सम्बद्ध हैं. कई प्रदेशों में उनकी जाति पिछड़े वर्ग से सम्बंधित है, जैसा कि गुजरात भाजपा अध्यक्ष जीतू वाघाणी बाकायदा पोस्टर निकाल कर यह प्रचार कर रहे हैं कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार श्री रामनाथ कोविंद OBC समुदाय के एक प्रतिष्ठित नेता हैं.
बहरहाल, दोनों उम्मीदवारों में एक बात कॉमन है – दोनों दलित आन्दोलन या किसी भी प्रगतिशील आन्दोलन  के उत्पाद नहीं है. एक को यदि विरासती कांग्रेसी दलित नेता कहा जा सकता है तो दूसरे को कागज़ी भाजपाई दलित नेता!

लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रपति जैसे पद की उम्मीदवारी के लिए उम्मीदवार की घोषणा करते समय उसकी जातीय पहचान की घोषणा ज़रुरी थी? क्या किसी गैर-दलित की उम्मीदवारी के मामले में ऐसा कभी हुआ? फिर, 19 जून 2017 को कोविंद की उम्मीदवारी की घोषणा करते समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह को क्यों कहना पड़ा कि रामनाथ कोविंद दलित समाज से उठकर आए हैं और उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए बहुत काम किया है. श्री शाह सत्ताधारी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. इसलिए उनकी यह घोषणा कहीं रोहित वेमुला, उना, और सहारनपुर की घटनाओं से उपजे दलित आक्रोश, जिसकी अभिव्यक्ति 21 मई और 18 जून की जंतर मंतर की ऐतिहासिक और अप्रत्याशित रैली में देखी गई, के प्रति हताशा का परिणाम तो नहीं था? क्या कोविंद, सरकार और भाजपा के विरुद्ध उभरे दलित आक्रोश को शांत करने की रणनीति के प्रतीक स्वरुप पेश किए गए?  जाहिर है इन घटनाओं के अलावा अबाध निजीकरण और आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना से दलित वर्ग आक्रोशित  तो है ही. इन मुद्दों पर दलित नेताओं की चुप्पी ने पूना पैक्ट की याद ताज़ा कर दी है।

सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में अपने जलाये गये घर में दलित महिला

अब प्रश्न है कि क्या किसी व्यक्ति का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री बनना दलित मुक्ति का पर्याय है ? क्या इससे दलितों के सम्मान, सुरक्षा, रोज़गार, अधिकार की समस्या हल हो जाएगी? यदि नहीं तो ज़ाहिर है इस तरह किसी व्यक्ति की जाति को प्राथमिकता देकर उम्मीदवार बनाने का महत्त्व सिर्फ शृंगारिक ही है – व्यक्तिगत मुक्ति संभव है, लेकिन जमात की मुक्ति नहीं! इस परंपरा की जड़ें भारतीय इतिहास में देखी जा सकती है – ‘शूद्र’ के राजा बनने के बाद ‘पुरोहित’ घोषणा करता है अब आप शूद्र नहीं क्षत्रिय हुए और आपका धर्म है वर्णाश्रम धर्म की रक्षा करना। नन्द, मौर्य से लेकर शिवाजी तक में इस परंपरा के साक्ष्य देख सकते हैं। यह अकारण नहीं था कि शिवाजी को काशी के ब्राह्मण के बाएँ पैर के अँगूठे से राजतिलक करानी पड़ी थी।

लोकशाही की मर्यादा है – किसी न किसी को तो चुनना है. मायावती ने अपने वादे के अनुसार मीरा कुमार के समर्थन में घोषणा कर दी है. बिहार के दलित नेता रामविलास पासवान ने घोषणा की थी कि कोविंद का विरोध दलित का विरोध समझा जायेगा, अब उन्हें बताना होगा कि क्या मीरा कुमार का विरोध दलित महिला का विरोध होगा या नहीं? बिहार में महिला ‘सशक्तिकरण’ के प्रतीक और महादलितों के ‘शुभचिंतक’, कांग्रेस के गठबंधन में चुनाव जीतने और सरकार चलाने वाले श्री नीतीश कुमार के राजनीतिक व्याकरण में राजेंद्र प्रसाद के बाद बिहार से दूसरी राष्ट्रपति उम्मीदवार जगजीवन बाबू की बेटी ‘महादलित’ महिला मीरा कुमार कहाँ फ़िट बैठती हैं? महिला आरक्षण और सशक्तिकरण पर मुखर आवाज़ बुलंद करने वालीं सुषमा स्वराज जैसे नेताओं का निर्णय भी दिलचस्प होगा – पार्टी लाइन या महिला? दिलचस्प यह भी है की अस्मिता के इस ‘युद्ध’ में जस्टिस कर्णंन को कहीं भुला दिए जाने की साजिश की कोशिश भी है!!!

यह आलेख जनसत्ता में भी प्रकाशित हुआ है. 

लेखक हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक हैं. संपर्क: 9818426159

राष्ट्रवाद का सीमांतः हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन में सहजोबाई और भक्तिकाल

मेधा


आलोचक , सत्यवती महाविद्यालय ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती है . संपर्क :medhaonline@gmail.com

‘हम कौन थे और क्या होंगे अभी’ की चिन्ता राष्ट्र बनने की प्रक्रिया की बुनियादी चिन्ताओं में एक है। इस कारण अस्मितापरक के लिए एक ऐतिहासिक वृतांत का चयन करता है। आश्चर्य नहीं कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम जितना राजनीति के मैदान में लड़ा गया; उतना ही संस्कृति के मैदान में भी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ने भारत विषयक एक वैकल्पिक इतिहास दृष्टि का प्रस्ताव किया। हिन्द स्वराज (महात्मा गांधी) और डिस्कवरी ऑव इंडिया (जवाहर लाल नेहरु हैं ) जैसे ग्रंथ इसके प्रमाण हैं ।


भारत पर अंग्रेजों ने अपना राजनीतिक प्रभुत्व भारत की सांस्कृतिक अवमानना के तर्क से स्थापित किया और उपनिवेशवादी राजदृष्टि में यह मान्यता बद्धमूल थी कि भारत का राजनीतिक पराभव उसकी सांस्कृतिक शक्तिहीनता का ही प्रमाण है। भारत में अपने शासन के औचित्य को साबति करने के लिए हर श्रेणी के ब्रिटिश बुद्विजीवी ने भारत की संस्कृति के बारे में अध्ययन किया। ‘‘प्रशासकों, मिशनरियों, अंग्रेज पत्रकारों और विभिन्न कोटियों के पश्चिमी विद्वानों ने भारतीय संस्कृति के बारे में सनसनीखेज रिपोर्ट लिखी और भारतीय संस्कृति की आधिकारिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन सबों की मान्यताएं आश्चर्यजनक तौर पर समान थीं जिसके अनुसार अतार्किकता, बेईमानी और यौनविकृति भारतीय संस्कृति के मूल तत्व हैं। उनकी इस व्याख्या का मंतव्य स्पष्ट था कि भारत की इस भयावह स्थिति से मुक्ति के लिए एक बुद्विवादी शक्ति का हस्तक्षेप तत्काल जरूरी है। भारत गोरे लोगों पर एक बोझ है यह मानते हुए अंग्रेजों ने अपने शासन को भारत की मुक्ति के लिए अनिवार्य माना।’’ (वूमेन राइट्रिग्स इन इंडिया सं सूजी थारू के ललिता, पेंडोरा प्रेस, लंदन 1993, पृ 1 )


उपनिवेशवादी इतिहास लेखन ने उपयोगितावादी-उदारवादी समझ के तहत यह साबित करने की कोशिश की कि भारत में व्यक्ति-स्वतंत्रता की संकल्पना और इहलौकिक तर्कबुद्धि के विकास की स्थितियां सर्वथा अनुपस्थित रहीं और इस कारण भारत अंग्रेजी शासन से पहले कभी भी लोक कल्याणकारी राजव्यवस्था के आधुनिक ढांचे की तरफ अग्रसर नहीं हो पाया। अंग्रेजी शासन ने इसका एक बड़ा प्रमाण स्त्रियों की हीनदशा को माना। सभ्यतागत दृष्टि से भारत को बर्बर और क्रूर साबित कर अपने शासन के औचित्यकरण के लिए अंग्रेजों ने स्त्री-पुरुष को पैमाना बनाया। भारत में औपनिवेशिक शासन को दृष्टि प्रदान करनेवाली 1826 में पहली बार प्रकाशित जेम्स मील की पुस्तक -‘हिस्टी आफ ब्रिटिश  इंडिया’ में तर्क रखा गया कि किसी भी समाज में स्त्रियों की दशा  से उस समाज की उन्नति-अवनति का पता लगाया जा सकता है-‘‘ असभ्य समाजों की दशा अमूमन हीन होती है जबकि सभ्य लोगों के बीच उनका स्थान उंचा होता है। जैसे-जैसे समाज का विकास होता है अबलाजनों की दशा सुधरती है और यह सुधार जारी रहता है, जब तक वे पुरुषों के साथ बराबरी का संबंध विकसित करते हुए समाज में एक  स्वैच्छिक तथा उपयोगी भूमिका न प्राप्त कर ले।’’( मिल जेम्स, द हिस्ट्री आफ ब्रिटिश इंडिया, पांचवा संस्करण, लंदन 1840, 1840, पृ सं 125 )।



 इस तरह उन्नीसवीं सदी में ‘स्त्री-प्रश्न’ बहुत अधिक प्रभावी हो गए थे। तब तक औपनिवेशिक विचारधारा का अनविार्य उपकरण बन चुका था- ‘स्त्री-प्रश्न ’। औपनिवेशिक प्रतिउत्तर में देशी समाज-सुधारकों ने स्त्री-सुधार के नाम पर आधुनिकता, विक्टोरियाई नैतिकता और परंपरा के घालमेल से एक नई पितृसत्ता की रचना की । इस नई पितृसत्ता में यह अंतर्निहित नहीं था कि ‘औरतें क्या चाहती हैं, बल्कि यह था कि उन्हें पातिव्रत्य के ढांचे में रखते हुए, धार्मिक, सामाजिक मर्यादाओं के दायरे के भीतर रखकर आधुनिक कैसे बनाया जा सकता है। यहां आधुनिक होने का मतलब है अंग्रेज रमणियों की भांति गृह प्रबंधन, आर्यपुत्रों के लालन-पालन और राष्ट्रहितैषी की नई भूमिका के लिए भारतीय महिला को तैयार करना। कहा जा सकता है कि परंपरा की भूमि पर स्त्री की दशा पर विचार नहीं किया जा रहा था बल्कि लता मणि के शब्दों में कहें तो इसके ठीक विपरीत ‘‘स्त्री वह पीठ थी जिस पर परंपरा की लड़ाई लड़ी जा रही थी।’’



 इस लड़ाई का एक सिरा जुड़ता था साम्राज्यवादी इतिहास दृष्टि से जिसने हिन्दूधर्म को पाठाधारित माना। मूल पाठों की खोज और पुनर्रचना के साथ एक पाठाधारित हिन्दूधर्म की रचना की गई। इस पाठाधारित हिन्दूधर्म को सर्वसत्तावादी मानकर उसमें समाजनीति, राजनीति, दंडनीति और अर्थनीति यानी आधुनिक राजव्यवस्था के सारे प्रसंग लक्ष्य करके यह बताने की कोशिश की गई कि भारतीय धर्म व्यक्ति-सत्ता, स्वतंत्रता और मनुष्य मात्र की बराबरी के मूल्य को स्वीकार नहीं करते।


भारत का भक्ति साहित्य उपनिवेशवादी इतिहास दृष्टि की खऱी आलोचना प्रस्तुत करता है। भक्तिकालीन विपुल साहित्य भंडार भारत में एक सुदीर्घ अवधि के भीतर विकसित विविध ज्ञान परंपराओं के भीतर चले वाद-विवाद के साक्ष्य तो देता ही है, उसमें इस वाद-विवाद से उत्पन्न व्यक्ति-चेतना और इस व्यक्ति-चेतना के कोण से सामाजिक आलोचना के भी साक्ष्य मिलते हैं। भक्ति साहित्य के भीतर एकबारगी हम देखते हैं कि समाज के शक्तिवंचित तबके यानी (दलित और स्त्री) को ना सिर्फ अपनी अभिव्यक्ति की भाषा मिलती है, बल्कि यह अभिव्यक्ति एक नई ज्ञानमीमांसा का प्रस्ताव भी करती है, एक ऐसा प्रस्ताव जिसमें ‘कागद की लेखी’ को नहीं बल्कि आंखिन की देखी यानी साक्षात इंद्रियानुभव को प्रमाण स्वीकार किया जा रहा है।

औपनिवेशिकता और नवजागरण की राष्ट्रीय परियोजना की विचारधारा से प्रभावित हिन्दी साहित्य का आधिकारिक इतिहास भक्तिकालीन साहित्य और संतों की इन विशेषताओं का रेखांकन तो करता है, मगर उसके विस्तार को कुछेक प्रमुख व्यक्तित्व और एक छोटे से कालखंड में ही समेटकर देखने की समस्या से ग्रस्त है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में ज्यादातर सूर, तुलसी, कबीर और मीरा की रचनाओं के इर्द-गिर्द और सगुण-निर्गुण विभाजन के बीच सोचने की परिपाटी रही है। इसका एक अनिवार्य परिणाम होता है परवर्ती भक्ति साहित्य और उससे जुड़े व्यक्तित्व की उपेक्षा। भक्ति साहित्य की विवेचना में एक बात यह भी लक्ष्य कर सकते हैं कि भक्तकवि को ज्ञान का रचयिता ना मानकर सिर्फ अपने गुरूवाणी का गान करने वाला माना गया है साथ ही यह विवेचना किसी स्त्री द्वारा रचे भक्ति साहित्य को अकसर सामाजिक मर्यादा के उसी चालू मुहावरे में देखने की कोशिश करती है, जिसकी आलोचना के प्रयास में भक्तिकालीन स्त्री संतों का साहित्य रचा गया है। इसी तरह भक्ति साहित्य के भीतर एक तो स्त्रियों की उपस्थिति को कम करके आंकने की परिपाटी रही, दूसरे यह शायद ही स्वीकार किया गया कि स्त्री संत भी गुरु पद की अधिकारी हो सकती है।

मिसाल के लिए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की इतिहास दृष्टि से जुड़ी कुछ बातों पर गौर करें। उन्होंने लिखा- ‘‘निर्णुण धारा के संतों की बानी में किस प्रकार लोकधर्म की अवहेलना छिपी हुई थी। सगुण धारा की भारतीय पद्धति के भक्तों में कबीर, दादू आदि के लोकधर्म विरोधी स्वरूप को यदि किसी ने पहचाना तो गोस्वामी जी ने। उन्होंने देखा कि उनके वचनों से जनता की चित्तवृति में ऐसे घोर विकार की आशंका है जिससे समाज विश्रृंखल हो जाएगा, उसकी मर्यादा नष्ट हो जाएगीं जिस समाज से ज्ञानसम्पन्न शास्त्रज्ञ विद्वानों, अन्याय, अत्याचार के दमन में तत्पर वीरों, पारिवारिक कर्तव्यों का पालन करने वाले उच्चाशय व्यक्तियों, पतिपरायण सतियों पितृभक्ति के कारण प्रजा का पुत्रवत पालन करनेवाले शासकों आदि के प्रति श्रद्धा और प्रेम का भाव उठ जाएगा उसका कल्याण कभी नहीं हो सकता।’’ …..(हिन्दी साहित्य का इतिहास- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल  पृ सं 76 )

इस कथन में शुक्ल जी तुलसी के माध्यम से अपना मंतव्य भी व्यक्त कर रहे हैं। यहां पर एक आदर्श समाज का चित्रण है, जिसमें  प्रतिष्ठा पाने योग्य या तो शिक्षित और सुसंस्कृत जनता है अथवा शासक वर्ग के लोग, या फिर ‘पतिपरायणा सतियां। ध्यातव्य है कि निर्गुण संतों की वाणी से प्रभावित ‘ अशिक्षित’ और ‘निम्न श्रेणी’ की जनता इस समाज में  प्रतिष्ठा के योग्य नहीं समझी गई है। किसी समाज का कल्याण तभी संभव है, जब स्त्री पितृसतात्मक ढांचे के भीतर रहकर अयोग्य पति की भी सेवा करे और उसी के साथ आग में जलकर सती हो जाए अर्थात् स्वतंत्र एवं आत्मचेतस स्त्री समाज में  सम्मान योग्य नहीं है। इस तरह शुक्ल जी हिन्दी साहित्य में ब्राहमणवादी सामंती मूल्यों वाले समाज को स्थापित कर रहे थे, जिसमें स्त्री के लिए पितृसत्तात्मक संरचना के बाहर कोई स्थान नहीं था।



शुक्ल जी की पुस्तक हिन्दी साहित्य का इतिहास कुल 528 पृष्ठों का है। इसमें से 118 पृष्ठ भक्तिकाल पर खर्च किया गया है। उसमें स्त्री रचनाकारों के नाम पर केवल डेढ़ पृष्ठ मीरा पर खर्च किया गया है।


भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य के इतिहास की उपरोक्त सीमाओं के बरक्स संत कवयित्री सहजोबाई का साहित्य और जीवनवृत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सहजोबाई का समय उत्तर भक्तिकाल (1740) है। वह गुरू की महिमा का गान तो करती हैं, मगर साथ ही अपनी पुस्तक ‘सहज प्रकाश’ में स्वयं ज्ञान रचयिता के रूप में उपस्थित होती हैं। उनका जीवनवृत इस बात के प्रभूत साक्ष्य देता है कि उन्होंने गुरुपद की गद्दी के अंदरूनी संघर्ष में भाग लिया और विजयी रहीं और प्रशासकीय कौशल के साथ अपने संप्रदाय (चरणदासी) के परवर्ती विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। सहजोबाई के इतिवृत में भक्तिकालीन उस विशेषता को स्पष्ट रूप से लक्ष्य किया जा सकता है, जो आध्यात्मिक और इहलौकिक के बीच आत्यांतिक भेद नहीं बल्कि उसकी एकता को स्वीकार करती है और मनुष्य में दिव्यता या फिर देवता में मनुष्यता का आख्यान रचती है।

सहजोबाई का जन्म अठाहरवीं सदी के  पूर्वाध में राजस्थान के ढूसर कुल तथाकथित नीची जाति में हुआ था। आजीवन ब्रहमचारिणी सहजोबाई के गुरु चरणदास थे। कथा के मुताबिक 11 वर्ष की उम्र में सहजोबाई का विवाह किया जा रहा था। विवाह के अवसर पर वर एवं कन्या को आशीर्वाद देने चरणदास को भी आमंत्रित किया गया था। दुल्हन के रूप में सजी संवरी सहजोबाई को देख चरणदास ने कहा –
सहजो तनिक सुहाग पर कहा गुदाये शीश।
मरना है रहना नहीं, जाना विश्वे बी।।

चरणदास के वचन को सुनते ही सहजोबाई बोली मैं विवाह नहीं करूंगी।


सहजोबाई ने 18 साल की उम्र में‘ सहजप्रकाश’ की रचना की। इसका रचनाकाल संवत् 1800 विक्रम है। इनकी वाणी वेलवेडियर प्रेस, प्रयाग से 1908 में छपी थी। 1946 में सहजप्रकाश का प्रकाशन सातवीं बार वेलवेडियर प्रेस से हुआ था। इतने संस्करणों के बावजूद साहित्य के इतिहासकारों ने पर्याप्त स्वीकृति नहीं दी।


अ्रन्य भक्त कवियों की तुलना में अपने गुरू से सहजोबाई का संबंध आत्यांतिक रूप से विशिष्ट है। गृहस्थ जीवन से मुक्ति दिलाकर गुरु ने कर्मजाल से मुक्त करा दिया। सहजो के यहां गुरु और शास्त्रनिर्मित हरि के बीच पक्ष-प्रतिपक्ष का संबंध है। सहजो गुरु और हरि के बीच के द्वंद्व को स्पष्ट तौर पर देखती हैं। हरि ने ‘कर्म-भर्म’ के जिस जाल में फंसाया गुरु ने ‘आत्म-ज्ञान’ द्वारा उससे मुक्ति दिलाई। अर्थात् ‘अन्या’ होने की नियति से मुक्त कर एक व्यक्तित्व प्रदान किया।

 अन्य भक्त कवि गुरु के बताए ‘हरि’ के प्रेम में मग्न होकर संसार को विस्मृत कर देता है और उस प्रक्रिया में गाहे बेगाहे गुरु को सुमिरन कर कृतज्ञता प्रकट करता है कि आखिर गुरु ने ही तो ‘हरि’ तक पहुंचने का मार्ग बताया है। लेकिन सहजोबाई अपनी पूरी काव्य-यात्रा और भक्त-जीवन में उस गुरु के प्रेम में मग्न मालूम पड़ती हैं, जिसने शास्त्रीय हरि से मुक्ति दिलाकर अंततः स्त्री होने की सामाजिक नियति से मुक्ति दिलाई। हां समय-समय पर वह गुरू द्वारा बताए ‘हरि’ को भी याद करती हैं। सहजो के यहां गुरु के लिए वही भावबोध उपस्थित है, जो अन्य भक्त कवियों के यहां हरि के लिए आया है। भक्त कवि ईश्वर के प्रेम में भाव-विभोर होकर ईश्वर  से भांति-भांति के संबंध स्थापित करता है। वह कभी ‘राम की बहुरिया’ तो कभी ‘हरि जननी मैं बालक तोरा’ बन जाता है। ‘भाव-विहवल कबीर के यहां संबंधों की यह विविधता अपने सघनतम रूप में देखी जा सकती है। लेकिन सहजो के यहां संबंधों की यही विविधता गुरु के संदर्भ में मिलती है। गुरू कभी उनके लिए ‘प्राण पियारे’ तो कभी ‘ हम बालक तुम माय हमारी’ है।

सहजोबाई की गुरु-भक्ति के बारे में कई किंवदंतियां और साहित्यिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। उनके गुरू भाई जगजोत सिंह ने लिखा है-
चरणदास की शिष्य  दृढ़, सहजोबाई जान।
ताकी दृढ़ गुरुभक्ति पर , जोगजीत कुर्बान।। (चरणदासी संप्रदाय और उसका साहित्य,डा श्यामसुंदर शुक्ल, कला प्रकाशन,1996 पृ सं 267  )

डा. रामविलास शर्मा ने लिखा है-‘‘ भक्त कवियों ने प्रेम के मंत्र से कर्म के बंधन को काट दिए, पुरोहितों के रचे हुए स्वर्ग और नरक के सुहावने और डरवाने चित्र मिटा दिए। उन्होंने सांस्कृतिक धरोहर को लोक संस्कृति से जोड़कर उसे नया रूप दिया। उन्होंने लोक से अभिन्न रहकर साहित्य में यथार्थवाद  का विकास किया।’’ (इतिहास और आलोचना के वस्तुवादी सरोकार , सं- निर्मला जैन, नित्यानंद तिवारी, पृ सं 13)
लेकिन सहजोबाई हरि के स्थान पर गुरु की भक्ति कर इन संदर्भों से आगे बढ़ जाती हैं। वह मध्यकालीन पितृसतात्मक समाज में लौकिक गुरू को अलौकिक हरि का स्थान देती हैं। मध्यकालीन पितृसतात्मक समाज में स्त्री के भाग्य का रचयिता पिता, पति और पुत्र होता था। सहजो गुरु के रूप में  अपने लिए लौकिक पुरुष का चुनाव कर पितृसत्ता और सनातनी धर्म के ढांचे को एकसाथ चुनौती देती हैं।


आमतौर पर सभी निर्गुण भक्त कवियों ने हरि की भक्ति पितृसत्तात्मक ढांचे में की है- अपने को ‘हरि की बहुरिया’ मानकर लेकिन सहजो न तो हरि और न ही गुरू की भक्ति पातिव्रत्य के ढांचे में करती हैं। जबकि मीरा भी अलौकिक कृष्ण का वरण पति के रूप में ही करती हैं।


सहजोबाई स्त्री की रूढ़ छवि पर हर भांति प्रहार करती हैं। वह सामाजिक-संरचना के विरुद्ध जाती हैं। मध्यकालीन समाज में स्त्री के लिए संत होना अत्यंत मुश्किल दश सुन सकते थे, दे नहीं सकते थे। इसीलिए ‘निराला पंथ खड़ा करनेवाला’ कहकर कबीर पर व्यंग्य किया जाता रहा है। लेकिन सहजोबाई भक्ति के द्वारा संतत्व को प्राप्त करती हैं। इस तरह सहजोबाई गुरु की मध्यकालीन धारणा को उलट देती हैं। गुरू की मृत्यु के बाद उनकी गद्दी पर अधिकार के लिए संघर्ष करती हैं। न्याय नहीं मिलने की सूरत में अदालत तक जाती हैं और धार्मिक सत्ता हासिल करती हैं।

इस तरह सहजोबाई धर्मसत्ता और पितृसत्ता को एक साथ चुनौती देती हैं। और इस तरह उत्तर भक्तिकाल में उनकी उपस्थिति दरअसल उन्नीसवीं सदी में निर्मित नई पितृसंरचना द्वारा रचित ‘अखिल भारतीय स्त्री की छवि’ का अतिक्रमण करती हैं। और संभवतः इसी कारण अन्य भक्त कवियों की मानिन्द भावसंपन्न कविता रचने के बावजूद, विद्रोही जीवन जीने के बावजूद हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में उन्हें उचित स्थान नहीं दिया गया और इस तरह लोक और शास्त्र, किसी ने सहजोबाई को अपने यहां यथायोग्य स्थान नहीं दिया?

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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मीरा को ब्राह्मण सिद्ध करने वालों के पुरखों ने कबीर को भी बनाया था ब्राह्मण

प्रेमकुमार मणि 


भाजपा का असली चेहरा राष्ट्रपति चुनाव में एक बार फिर उजागर हुआ है . कुछ ही महीने पूर्व उत्तरप्रदेश चुनावों में दोनों हाथ उठाकर जात-पात से ऊपर उठकर वोट करने की अपील करने वाली पार्टी यह कहते फूले नहीं समा रही कि उसका उम्मीदवार दलित है. कहा जा रहा है कि यह मोदी का मास्टर स्ट्रोक है . लेकिन जैसे ही विपक्ष का भी उम्मीदवार दलित हुआ भाजपा परेशान हो गई. उसने अपनी पूरी ताकत दूसरे उम्मीदवार के चरित्र -हनन में झोंक दी है . कहा जा रहा है हमारा उमीदवार असल दलित है,तुम्हारा कम-असल. भारतीय संस्कृति के संरक्षक पूछने लगे हैं- मीरा कुमार तेरी जात क्या है ? आप समझ सकते हैं कि हम पतन के किस दौर में हैं .

पिता बाबू जगजीवनराम के साथ और परिवार में  मीरा कुमार 

भाजपा मीरा को नहीं जानती ऐसा नहीं है लेकिन  आज उन्हें अपने उम्मीदवार से कमतर बताना है . मुश्किल है कि मीरा पढाई -लिखाई और राजनयिक अनुभव में कोविंद से बीस पड़ती हैं . लेकिन हमारे यहाँ पढाई -लिखाई और योग्यता से चरित्र नहीं बनता .चरित्र बनता है जाति से . इसलिए जाति रूप में वह कितना वास्तविक है इसे सिद्ध कर दो . जो जाति की मर्यादा रखता है ,वर्णव्यवस्था की मर्यादा रखता है वह हमारे यहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है . जैसे राम . उन्होंने भी अयोनिजा ( जाति -गोत्र विहीन ) सीता से विवाह कर मर्यादा तोड़ी थी ,लेकिन वशिष्ठ के कहने पर सीता को वनवास दिया और मर्यादापुरुषोत्तम का विरुद हासिल किया .

मीरा ने भी जाति की मर्यादा तोड़ी है . प्रेम -विवाह किया और वह भी अंतरजातीय . यानि जाति की परवाह किये बिना . वह पक्की दलित कैसे हो सकती हैं . संघ वाले अभियान चलाकर उनका चरित्र -हनन कर रहे हैं . कोई उनके पति को ब्राह्मण बता रहा है ,कोई कुछ. यहाँ तक कि पतियों की संख्या बतलाने की भी बेशर्मी की गई है. यही लोग हैं जो नेहरू को मुसलमान सिद्ध कर चुके हैं .मीरा को ब्राह्मण सिद्ध कर दें तो क्याआश्चर्य ! ( इनके पुरखों ने ही तो कबीर को ब्राह्मण सिद्ध किया था .)

अपने पति मंजुल कुमार के साथ मीरा कुमार 

संयोग से मैं मीरा कुमार के पति परिवार से घनिष्ट रहा हूँ ,इसलिए मुझे यह सब देख -सुन कुछ ज्यादा आनंद आ रहा है .मीरा कुमार की सास बिहार की पहली महिला मंत्री रहीं और स्वसुर उर्दू -हिंदी के चुनिंदा विद्वान् , उर्दू समालोचना पर उनकी दो किताबें अभी भी मेरे पास हैं. चालीस के दशक में मानवेन्द्र नाथ राय के साथ मिलकर उन्होंने रेडिकल ह्यूमिनिस्ट का संघटन किया था. वह पिछड़े वर्गों के राजनीतिक -सांस्कृतिक संघटन त्रिवेणी संघ से भी जुड़े रहे . जात -पात और रूढ़ियों का इस परिवार ने हमेशा विरोध किया .

चुनाव जो जीते ,वह भारत का राष्ट्रपति होगा .हमारा राष्ट्रीय महामहिम . दोनों उम्मीदवार काबिल और गंभीर हैं . हमें अपनी राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक मर्यादा को हर हाल में बनाये रखना चाहिए . आलोचना की अगंभीर और कुत्सित प्रवृतियों को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए .

वायरल हुई योग और मोदी का मजाक उड़ाती यह कविता

मनीषा कुमारी 

21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर एक कविता  वायरल हो गई. सोशल मीडिया पर इसे खूब शेयर किया गया, पढ़ा गया. आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह सहित अनेक राजानीतिक, समाजिक एक्टिविस्टों ने इसे शेयर किया. व्हाट्स अप पर पिछले दो दिन से यह कविता घूमती रही है. नाट्य-आलोचक और समकालीन रंगमंच के संपादक राजेश चंद्र ने अपनी यह कविता 21 जून को अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट की. कुछ ही घंटों में इसका वायरल हो जाना यह बताता है कि राजनीतिक प्रहसनों के प्रति जनता क्या सोच रही है. जनता अभिव्यक्ति का माध्यम  तलाश रही है और मौक़ा और उचित माध्यम मिलते ही राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रहसनों के खिलाफ अभिव्यक्त हो रही है, उससे जुड़ जा रही है.  स्त्रीकाल के पाठकों के लिए राजेश चंद्र की कविता. तस्वीर फेसबुक यूजर एसके यादव की वाल से साभार:

भूख लगी है? योगा कर!
काम चाहिये? योगा कर!
क़र्ज़ बहुत है? योगा कर!
रोता क्यों है? योगा कर!

अनब्याही बेटी बैठी है?
घर में दरिद्रता पैठी है?
तेल नहीं है? नमक नहीं है?
दाल नहीं है? योगा कर!

दुर्दिन के बादल छाये हैं?
पन्द्रह लाख नहीं आये हैं?
जुमलों की बत्ती बनवा ले
डाल कान में! योगा कर!

किरकिट का बदला लेना है?
चीन-पाक को धो देना है?
गोमाता-भारतमाता का
जैकारा ले! योगा कर!

हर हर मोदी घर घर मोदी?
बैठा है अम्बानी गोदी?
बेच रहा है देश धड़ल्ले?
तेरा क्या बे? योगा कर!

राजेश चन्द्र, संपर्क: 9871223317, rajchandr@gmail.com

स्त्रीकाल के ‘स्त्री सत्ता: यथार्थ या विभ्रम’ अंक में मीरा कुमार

जनपथ से राजपथ तक 

मीरा कुमार जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष की संयुक्त उम्मीदवार हैं.  उनके लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए स्त्रीकाल का ‘स्त्री सत्ता: यथार्थ या विभ्रम’ अंक आया था. जब वे लोकसभा अध्यक्ष थीं तब देश की सबसे ताकतवर नेता और यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी होती थीं. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल थीं,  देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री मायावती थीं और तीन अन्य राज्यों में भी महिलायें मुख्यमंत्री और नेता विपक्ष थीं. इस अंक में मीरा कुमार पर की गई टिपण्णी ताकि सनद रहे:





मीरा कुमार: प्रथम महिला लोकसभा अध्यक्ष

राइफल शूटिंग में माहिर भारतीय विदेश सेवा से राजनीति में सफल मीरा कुमार यूपीए सरकार के वर्तमान सत्र में  प्रथम महिला लोकसभा अध्यक्ष बनीं. दलित नेता ‘बाबू जगजीवन राम (बाबूजी) की यह होनहार बेटी विदेशी दूतावासों  में सेवा देती हुई जब 1985 में “बिजनौर” लोकसभा में राजनीति में उतरी तो दो हैबिवेट दलित नेताओं को हराया, ‘रामविलास पासवान’ और ‘मायावती’ को.  यह बात अलग है कि विरोधी इस जीत में पूर्व उपप्रधानमंत्री ‘बाबूजी’ कि विरासत को खंगालें या  फिर इंदिरा जी के अवसान के बाद  सहानुभूति लहर को.

मीरा कुमार कांग्रेस की प्रखर नेता और मज़बूरी भी बनती गयीं. पिछले दो दशकों में दलित राजनीति के उभार ने भी कांग्रेस में उन्हें सम्मान दिलवाया और महत्वपूर्ण जिम्मेवारी भी. 1985 से अब तक 1999 में करोलबाग से एक हार को छोड़ कर मीरा कुमार ने अपनी राजनीतिक प्रतिभा सिद्ध की  है. 2004 के लोकसभा चुनावों से वे अभूतपूर्व मतों के साथ अपने पिता के निर्वाचन क्षेत्र सासाराम (बिहार) का प्रतिनिधित्व कर रही है.

मृदुभाषी मीरा कुमार लोकसभा में अपने साथियों को आदर अनुरोध और कई बार उद्धत साथियों को स्नेह, हल्की  फटकार के साथ सदन संचालित करती है. लोकसभा ने अपनी महिला अध्यक्ष के साथ महिला सांसदों के लिए आजादी के बाद पहली बार अलग प्रसाधन गृह कि व्यवस्था की. राजनीतिज्ञ पिता बाबू जगजीवन राम और स्वतंत्रता सेनानी माता इंद्राणी देवी की यह उत्तराधिकारी बेदाग राजनीति की  मिसाल भी हैं|

लायब्रेरी की सीढियों पर प्रेम और अन्य कविताएँ

आरती तिवारी

विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित
संपर्क:atti.twr@gmail.com

लायब्रेरी की सीढियों पर प्रेम

प्रेम के पल
जिन्हें लाइब्रेरी की सीढ़ियों पे बैठ हमने बो दिए थे
बंद-आँखों की नम ज़मीन पर उनका प्रस्फुटन
महसूस होता रहा
कॉलेज छोड़ने तक

संघर्ष की आपाधापी में
फिर जाने कैसे विस्मृत हो गए
रेशमी लिफाफों में तह किये वादे जिन्हें न बनाये रखने की
तुम नही थीं दोषी प्रिये
मैं ही कहाँ दे पाया
भावनाओं की थपकी
तुम्हारी उजली सुआपंखी आकांक्षाओं को
जो गुम हो गया
कैरियर के आकाश में
लापता विमान सा

तुम्हारी प्रतीक्षा की आँख
क्यों न बदलती आखिर
प्रतियोगी परीक्षाओं में
तुम्हें तो जीतना ही था!
हाँ तुम डिज़र्व जो करती थीं!

हम मिले क्षितिज पे
अपना अपना आकाश
हमने सहेज लिया

उपेक्षित कोंपलों को
वफ़ा के पानी का छिड़काव कर
हम दोनों उड़ेलने लगे
अंजुरियों भर भर कर
मोहब्बत की गुनगुनी धूप

अभी उस अलसाये पौधे ने
आँखे खोली ही थी कि
हमें फिर याद आ गए
गन्तव्य अपने अपने!
हम दौड़ते ही रहे
सुबह की चाय से
रात की नींद तक
पसरे ही रहे हमारे बीच काम
घर बाहर मोबाइल लैपटॉप

ARTIST-ANNA FONAREVA

फिट रहना
सुंदर दिखना
अपडेट रहने की दौड़
आखिर हम जीत ही गए
बस मुरझा गया
पर्याप्त प्रेम के अभाव में
लाल- लाल कोंपलों वाला
हमारे प्यार का पौधा
जो हमने रोपा था
लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर बैठ

प्रेम चटक गया बन के इंद्रधनुष

प्रेम चुपके से बिना किसी आहट के तैरने लगा आँखों की झील में
मैं देखता ही रह गया अपलक
प्रेम लेता गया अपनी गिरफ़्त में
मैं बेबस देखता ही रहा प्रेम
ऐसे टपक के आया हथेली में
जैसे आंसू समां गया हो सीपी में बनके सच्चा मोती

प्रेम हरसिंगार सा झरता रहा झुलसता रहा मैं चाँदनी रातों में हसरतों की धीमी आँच में तृषित चातक सा प्रेम ऊगता रहा
रिश्तों की बंज़र ज़मीन पर
उम्मीदों की फसल सा
लहलहाता रहा
मैं दूर खड़ा देखता रहा
यादों की वादियों से
प्रेम का ऐसे एकाएक ऊगना
ले लेना मुझे अपने आगोश में
प्रेम चटक गया बन के इंद्रधनुष

मैं चुपचाप खड़ा
रंगों के सतरंगी घेरे में
होता रहा कूची लिए हैरान

 एक उनींदी अलस दोपहर के सफे से

चौंक के खुल जाने वाली नींद में साँझ की ओर
धीरे से क़दम बढ़ाती दोपहर में
तुम्हारी यादों से सराबोर
भीगे मन को दिलासा देकर
मैं तकिये को भींच लेती हूँ

मेरी आब का मोती
जो बाँध दिया था
तुम्हारे विश्वाश की पोटली में
पीला पड़ गया है
खो कर अपनी आब

ARTIST-MOGNOLIA VILCHES

मैं इकठ्ठा करती हूँ
कतरा कतरा झाग
उम्मीदों के डिटर्जेंट का
कि धोकर चमका लूँ
फिर से एक बार
पर ये क्या
तुम उड़ेलते जाते हो
शंकाओ का पानी
हमारे मिलन की संभावनाओं को नकार कर

और बैठ जाता है झाग

आखिर इस तरह
कब तक बदलोगे
कामनाओं के लिबास
पकड़ना तो होगा ही एक सिरा
मन की मज़बूती से

सुनो प्रिय
हो न जाये इतनी देर
हम बूझ न पायें रास्ते
खो जाएँ भूलभुलैया में

इससे पहले कि
डर और आशंकाओं का कुहासा
दबोच ले हमें

करो उपचार
मेरे घायल स्वप्न का
रख दो मेरे अधरों पर
ज्योत्स्ना की शीतल नमी
समय के कागज़ पर
लिख दो हमारी मोहब्बत की दास्ताँ

इस तारों भरे आकाश के नीचे
जोश की बलिष्ठ  भुजायें फैला कर
ले लो मुझे अपने आगोश में

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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युवती की आत्महत्या की रिपोर्टिंग कर रहे दलित पत्रकार को ही पुलिस ने किया गिरफ्तार

स्त्रीकाल डेस्क 

महाराष्ट्र के अमरावती जिले के
पत्रकार प्रशांत कांबले को मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने अभी हाल में किया था सम्मानित, लेकिन फडनवीस की पुलिस ने उन्हें ही तब गिरफ्तार कर लिया, जब वह पिछले 17 तारीख को एक लड़की की आत्महत्या के बाद चांदूर रेलवे स्टेशन थाने पर विरोध-प्रदर्शन को कवर करने गए थे.  पुलिस ने उन्हें  और अन्य दो संवादाताओं को काम में बाधा डालने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया.

प्रशांत ने पत्रकारिता की शुरुआत मुम्बई में  जय महाराष्ट्र नामक एक चैनल से शुरू की।  प्रशांत ने मुंबई की सफाई कर्मचारियों पर एक बेहतरीन स्टोरी  की थी। इस रिपोर्ट के बाद प्रशांत एक संवेदनशील पत्रकार के रूप में  सामने आए। उन्हें राज्य सरकार का उत्कृष्ट पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है। मुंबई के बाद वे अमरावती में एक जिलाप्रतिनिधि के रूप में में वापस आए, कारण था गृह जिला में वापसी। पत्रकारिता करते समय वे अपने गांव के विकास के लिए प्रशासकीय विभाग पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे। जनता की समस्या छुडाने के लिए वे हमेशा तत्पर रह रहे थे। स्टिंग ऑपरेशन के जरिये उन्होने जिले के फर्जी चिकित्सकों का भी पर्दाफाश किया।



17 जून को प्रशांत के गांव की एक युवती ने आत्महत्या की। पूरे गांव को यह पता था कि युवती ने आत्महत्या क्यों। जिम्मेदार युवक को गिरफ्तार करने की मांग ग्रामवासियों ने उठाई थी . आत्महत्या चूकी ट्रेन  से कटकर हुई थी इसलिए जीआरपी और पुलिस के बाच खीचतान और एफआईआर दर्ज होने में विलम्ब से  जनसमुदाय भडक उठा.  पुलिस ने थाने के पास जमा भीड़ को शांत करने के लिए  लाठीचार्ज  आरंभ किया, जिसके बाद पत्थराव भी हुए । लाठीचार्ज  की रिपोर्टिंग कर रहे प्रशांत फस गए। पुलिस प्रशासन ने प्रशांत को ही भीड़ को उकसाने और सरकारी काम में बाधा डालने का आरोपी बना दिया और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.


प्रशांत स्त्रीकाल के लिए भी विदर्भ से इनपुट देते रहे हैं. पत्रकारों ने प्रशांत की गिरफ्तारी की निंदा की है और दोषियों पर कार्यवाई की मांग की है. प्रशांत की गिरफ्तारी तो हो गई लेकिन अभी तक युवती की आत्महत्या के दोषियों पर कार्यवाई नहीं हुई है.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

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