यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा:- आख़िरी क़िस्त

अरविंद जैन
स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब 'औरत होने की सजा' हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com
न्याधाशीशों ने फिर से अपनी मर्दवादी जुबान खोली. खबर है कि गुजरात के जज महोदय ने गुलबर्ग सोसायटी में हुए हत्याकांड, आगजनी और बलात्कार पर अपना न्याय देते हुए कहा कि 'आगजनी और हत्याकांड के बीच बलात्कार नहीं हो सकता है.' उन्हीं जज साहब ने अभियुक्तों से यह भी कहा कि हम आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं.'जजसाहबों का मर्दवादी मिजाज न्याय नहीं है, ऐसे अनेक निर्णय हैं, जिनमें वे बलात्कार पर निर्णय देते हुए खासे कवित्वपूर्ण हो जाते रहे हैं. इसके पहले भी भंवरी देवी बलात्कार काण्ड में निर्णय देते हुए जज साहब ने कहा था कि ' जो पुरुष  किसी नीची जाति की महिला का जूठा नहीं खा सकता  वह उसका बलात्कार कैसे कर सकता है?' यह विचित्र देश है. कल ही नायक का तमगा लिए सलमान खान साहब ने भी बलात्कार के दर्द की तुलना अपने काम के थकान से पैदा दर्द से करते पाये गये. यह एक मानसिकता है. न्यायालयों की इसी सोच और भाषा पर स्त्रीवादी ऐडवोकेट अरविंद जैन ने काफी विस्तार से लिखा था कभी, काफी चर्चित लेख. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उसे धारवाहिक प्रकाशित कर रहे हैं हम.

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महान भारतीय संस्कृति :आठवी  क़िस्त 


इस सन्दर्भ में सिर्फ इतना और कि प्राचीन भारत में समान जाति की स्त्री के साथ बलात्कार करने पर पुरुष की सम्पूर्ण सम्पत्ति छीनकर, उसके गुप्तांग काटकर उसे गधे पर चढ़ाकर घुमाया जाता था. मगर हीन-जाति की स्त्री के साथ बलात्कार में उपर्युक्त दंड का आधा दंड ही दिया जाता था. यदि स्त्री उच्च वर्ग की होती थी तो अपराधी के लिए मृत्युदंड था और सम्पत्ति छीन ली जाती थी. स्त्री के साथ धोखे से सम्भोग करने पर पुरुष को सम्पूर्ण सम्पत्ति से वंचित करके उसके मस्तक पर स्त्री का गुप्तांग चिह्नित करके नगर से निष्कासित कर दिया जाता था....बृहस्पति ने नीची जाति के पुरुष द्वारा उपभोग की गई उच्च जाति की निर्दाेष स्त्री को भी मृत्युदंड देने की व्यवस्था दी है. याज्ञवल्क्य और नारद के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी अविवाहित कन्या की इच्छा के विरुद्ध उससे सम्बन्ध रखता था तो उस व्यक्ति की दो अँगुलियाँ काट ली जाती थीं, किन्तु कन्या के उच्चवर्णी होने की स्थिति में उस व्यक्ति की सम्पत्ति छीनकर उसे मृत्युदंड दिया जाता था. कौटिल्य ने इस सन्दर्भ में कुछ भेद किए हैं. जो पुरुष स्वजाति की अरजस्वला कन्या को दूषित करे, उसका हाथ कटवा दिया जाए अथवा चार सौ पण दंड दिया जाए. यदि कन्या मर जाए तो पुरुष को प्राणदंड दिया जाए. रजस्वला हो चुकी कन्या की स्थिति में पुरुष की मध्यमा व तर्जनी अँगुलियाँ काट दी जाएँ अथवा दो सौ पण दंड दिया जाए और कन्या का पिता, जो भी क्षतिपूर्ति चाहे, उसे प्राप्त कराई जाए...वेश्या से बलात्कार का दंड बारह पण व दंड से सोलह गुना शुल्क गणिका को देने का नियम था. माता, मौसी, सास, भाभी, बुआ, चाची, ताई, मित्र-पत्नी, बहन, बहन-सी मित्र, पुत्रवधू, पुत्री, गुरु-पत्नी, सगोत्र, शरणागत, रानी, संन्यासिनी, धाय, ईमानदार स्त्री एवं उच्चवर्गी स्त्री के साथ सम्भोग करनेवाले पुरुष का गुप्तांग काट दिया जाता था.81

बलात्कारी को मृत्युदंड

कुछ माह पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी 'हवाई घोषणा' की थी कि उनकी सरकार बलात्कार के अपराधियों को मृत्युदंड देने का कानून बनाएगी. इस बयान की गम्भीरता, राजनीतिक भाषा और सम्भावना को समझने के लिए सिर्फ यह जान लेना काफी होगा कि सर्वोच्च न्यायालय कई बार यह कह चुका है कि मृत्युदंड सिर्फ हत्या के 'दुर्लभतम में दुर्लभ' मामलों में ही दिया जाना है. परिणामस्वरूप आज तक दहेज हत्या या वधूदहन के एक भी मामले में फाँसी नहीं दी गई है. ऐसे जिन मामलों में फाँसी की सजा सुनाई भी गई थी, उन्हें उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायमूर्तियों ने आजन्म कैद में बदल दिया. इसी प्रकार बच्चों से बलात्कार और हत्या के मामलों में भी (सिवा जुम्मन खान (1991) अपराधी को फाँसी की बजाय) उम्रकैद की सजा ही सुनाई गई है. ऐसी स्थिति में (सिर्फ) बलात्कार के अपराधी को मृत्युदंड कैसे दिया जा सकेगा ? अगर बलात्कारी के लिए मृत्युदंड का प्रावधान भी बन जाए, तो क्या वैधानिक और न्यायिक दृष्टिकोण भी बदला जाएगा ? संसद में बैठे पुरुष प्रतिनिधि क्या ऐसा कानून बनने देंगे ? 'सहमति' और 'बदचलनी' के कानूनी हथियारों का क्या होगा ? दहेज हत्याओं में मृत्युदंड का प्रावधान समाप्त करके, उम्रकैद का कानून (धारा 304-बी) बनाने वाली 'पुरुष पंचायत' बलात्कार के अपराधियों को सजा-ए-मौत देने का कानून बनाएगी  ? कैसे ? कब ? विशेषकर जब दुनिया भर में मृत्युदंड समाप्त करने की बहस और मानवाधिकारों का शोर हो.


जीने का मौलिक अधिकार

''बलात्कार एक ऐसा अनुभव है, जो पीडि़ता के जीवन की बुनियाद को हिला देता है. बहुत सी स्त्रियों के लिए इसका दुष्परिणाम लम्बे समय तक बना रहता है, व्यक्तिगत सम्बन्धों की क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित करता है, व्यवहार और मूल्यों को बदल आतंक पैदा करता है. (डब्ल्यू यंग, रेप स्टडी, 1983) सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति श्री एस. सगीर अहमद और आर.पी. सेठी ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय (दिनांक 28 जनवरी, 2000) में कहा है कि किसी भी स्त्री के साथ बलात्कार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए दुष्कर्ष के लिए केन्द्र सरकार को भी जिम्मेवार ठहराया जा सकता है. विशेषकर हर्जाना अदा करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत भारतीय ही नहीं, विदेशी नागरिकों को भी जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है. सर्वोच्च न्यायालय के इस अभूतपूर्व निर्णय के निश्चित रूप से बहुत दूरगामी परिणाम होंगे. यौन हिंसा की शिकार स्त्रियों के मुकदमों में, अतीत के अनेक विवादास्पद फैसलों को देखते हुए, इसे सचमुच 'न्यायिक प्रायश्चित्तÓ या 'भूल सुधार' भी कहा जा सकता है. पुलिस हिरासत में पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार के विचाराधीन मामलों में यह निर्णय अनेक नए आयाम जोडऩे की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. हालाँकि कुछ संविधान विशेषज्ञ अधिवक्ताओं का कहना है कि हर्जाने के आदेशों से पहले, अपराध प्रमाणित होना अनिवार्य है. यदि इस तर्क को सही मानें तो समस्या वहीं की वहीं अटकी रह जाएगी. अपराध प्रमाणित होने में तो लम्बा समय लगेगा और सम्भव है कानूनी तकनीकियों के जाल में उलझ जाए.

संक्षेप में उपरोक्त मुकदमे के तथ्यों के अनुसार बांग्लादेश की नागरिक हनुफा खातून के साथ हावड़ा रेलवे स्टेशन के यात्री निवास में कुछ रेलवे कर्मचारियों ने सामूहिक बलात्कार किया. हनुफा खातून को 26 फरवरी, 1998 को हावड़ा से अजमेर जाना था।.बलात्कार की दुर्घटना के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय की एक वकील चन्द्रिमा दास ने रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष से लेकर पुलिस अफसरों और केन्द्र सरकार तक के विरुद्ध एक याचिका उच्च न्यायालय में दायर की, जिसमें हर्जाने के अलावा कुछ आवश्यक दिशा-निर्देश देने की माँग भी की गई थी. सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को आदेश दिया कि पीडि़ता को दस लाख रुपया बतौर हर्जाना अदा करे. उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अध्यक्ष रेलवे बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की, जिसे बहस सुनने के बाद खारिज कर दिया गया. सर्वोच्च न्यायालय में सरकारी वकीलों द्वारा प्रस्तुत तर्कों में मुख्य तर्क यह था कि हनुफा खातून भारतीय नागरिक नहीं, बल्कि विदेशी है, इसलिए रेलवे हर्जाना देने के लिए जिम्मेवार नहीं है. यह भी कहा गया कि कर्मचारियों द्वारा किए गए अपराध के लिए रेलवे या केन्द्र सरकार को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता. बहस के दौरान सरकारी वकीलों ने दलील दी कि यह कुछ व्यक्तियों द्वारा किया गया अपराध है, जिसके लिए उन पर मुकदमा चलाया जाएगा और उन्हें दोषी पाए जाने पर दंडित भी किया जा सकता है और जुर्माना भी वसूला जा सकता है, लेकिन रेलवे या केन्द्र सरकार को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता. विद्वान वकीलों ने चन्द्रिमा दास द्वारा दायर याचिका की वैधता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वकील साहिबा को ऐसी याचिका दायर करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं, परन्तु सरकारी महाधिवक्ता के तमाम तर्कों को रद्द करते हुए माननीय न्यायमूर्तियों ने विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी.


विद्वान न्यायमूर्तियों ने सरकारी अफसरों और पुलिसकर्मियों द्वारा किए गए दुष्कर्मों के मामलों में पीडि़तों को हर्जाना देने सम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण नजीरों का हवाला दिया है. इनमें रुदुल शाह (1983), भीमसिंह (1985), सहेली (1980), इन्द्र सिंह (1995) डी.के. बसु (1997), कौशल्या (1998) से लेकर मंजू भाटिया (1998) तक शामिल हैं. जनहित याचिकाओं और उनमें प्रबुद्ध समाजसेवी वकीलों की भूमिका को रेखांकित करते हुए निर्णय में बहुत से उदाहरण दिए गए है. मौलिक अधिकार और विदेशी नागरिकता के सवाल पर न्यायमूर्तियों ने मानवाधिकारों से लेकर स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय प्रस्तावों तक का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायाधीशों और वकीलों को मानवाधिकरों के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायशास्त्र के प्रति जागरूक और सचेत रहना चाहिए, विशेषकर महिलाओं के सुरक्षा सम्बन्धी मानवाधिकारों से. न्यायमूर्तियों ने अपने निर्णय में अनवर बनाम जम्मू-कश्मीर (1971) का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20, 21 और 22 में प्रदत्त मौलिक अधिकार सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही उपलब्ध नहीं, बल्कि विदेशी नागरिकों को भी उपलब्ध हैं. बलात्कार को मौलिक अधिकार का उल्लंघन घोषित करनेवाले निर्णय (बौद्धिसत्व बनाम सुभद्रा चक्रवर्ती, 1996) को सही ठहराते हुए निर्णय में कहा गया है. ''बलात्कार सिर्फ एक स्त्री के विरुद्ध अपराध नहीं बल्कि समस्त समाज के विरुद्ध अपराध है. यह स्त्री की सम्पूर्ण मनोभावना को ध्वस्त कर देता है और उसे भयंकर भावनात्मक संकट में धकेलता है, इसलिए बलात्कार सबसे अधिक घृणित अपराध है. यह मूल मानवाधिकारों के विरुद्ध अपराध है और पीडि़ता के सबसे अधिक प्रिय अधिकार का उल्लंघन है, उदाहरण के लिए जीने का अधिकार जिसमें सम्मान से जीने का अधिकार शामिल है.

माननीय न्यायमूर्तियों ने अपने फैसले में लिखा कि हनुफा खातून इस देश की नागरिक नहीं है लेकिन फिर भी उसे संविधान द्वारा प्रदत्त जीने के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं. सम्मान से जीने का उसे भी उतना ही अधिकार है, जितना किसी भारतीय नागरिक को. विदेशी नागरिक होने के कारण उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जा सकता जो मानवीय गरिमा के नीचे हो और न ही उन सरकारी कर्मचारियों द्वारा शारीरिक हिंसा की जा सकती है, जिन्होंने उसके साथ बलात्कार किया. यह उसके मौलिक अधिकार का हनन है. परिणामस्वरूप यह राज्य की संवैधानिक जिम्मेवारी है कि उसे हर्जाना अदा करे. उच्च न्यायालय के निर्णय में कोई कानूनी खामी नजर नहीं आती. रेलवे बोर्ड और केन्द्र सरकार के बचाव में विद्वान महाधिवक्ता ने एक और दलील यह दी कि कर्मचारियों के कार्यों के लिए राज्य को केवल तभी जिम्मेवार माना जा सकता है, जब उन्होंने यह कार्य आधिकारिक उत्तरदायित्व निभाते हुए किया हो. चूँकि बलात्कार को उनका आधिकारिक दायित्व नहीं कहा जा सकता, इसलिए केन्द्रीय सरकार हर्जाना अदा करने के लिए जिम्मेवार नहीं, लेकिन न्यायमूर्तियों ने जवाब में लिखा, ''यह तर्क पूर्णतया गलत है और इस न्यायालय द्वारा सुनाए फैसलों के विपरीत. सरकारी वकीलों ने अपने पक्ष में जिस विवादास्पद नजीर (कस्तूरी लाल रुलिया राम जैन बनाम उत्तर प्रदेश, 1965) का हवाला दिया. उसके बारे में न्यायमूर्तियों ने कहा कि न्यायालय ने अपने बाद के फैसलों में उस निर्णय को कभी सही नहीं माना. हम भी उसे मानने के लिए बाध्य नहीं। वह एक अर्थहीन (व्यर्थ) नजीर सिद्ध हो चुकी है.


2000 एपैक्स डिसीजन (खंड एक) सुप्रीम कोर्ट, पृ. 401-21 में प्रकाशित, चेयरमैन रेलवे बोर्ड एंड अदर्स बनाम श्रीमती चन्द्रिमा दास के फैसले को पढ़ते हुए महसूस होता है कि राज्य (रेलवे बोर्ड या केन्द्र सरकार) के विद्वान वकील भी ठीक उसी तरह सरकार का बचाव कर रहे हैं, जैसे बचाव पक्ष का कोई वकील अपने किसी खूँखार अपराधी को बचाने के लिए करता है. सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सरकारी वकीलों के प्राय: सभी तर्क (कुतर्क) बेहद हास्यास्पद नजर आते हैं. वर्षों से स्पष्ट कानूनी प्रस्थापनाओं से बेखबर और 'ओवर रूल्ड' नजीरें पेश करते हुए इन या ऐसे सरकारी अधिवक्ताओं से मानवाधिकारों और लैंगिक न्याय की अवधारणाओं से सचेत होने की अपेक्षा करना व्यर्थ है. आश्चर्यजनक है कि राजसत्ता भी अदालत में पेशेवर अपराधी की तरह मुकदमेबाजी करती दिखाई पड़ती है. समझ नहीं आता कि आखिर केन्द्रीय सरकार किसे बचाना चाहती है/थी ? अपराधी कर्मचारियों को दस लाख रुपया हर्जाना ? बलात्कार के गम्भीर मामले में पीडि़त स्त्री (और वह भी विदेशी नागरिक) के साथ, केन्द्र सरकार का पूरा व्यवहार एकदम अवांछनीय प्रतीत होता है. महिला कल्याण के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च करने और स्त्री हितैषी बननेवाली सरकार अदालत में इतनी असंवेदनशील और अतार्कि क कैसे हो जाती है ?  क्यों ?  क्या यही है 'राष्ट्रीय गरिमा' और 'नारी सम्मान' का ढिंढोरा पीटनेवाले नायकों का असली चेहरा.

 इन प्रश्नों को सिर्फ अदालती, कानूनी या न्यायिक दृष्टि से पढऩा-समझना काफी नहीं. राज्य के स्तर पर एक व्यापक परिप्रेक्ष्य और सत्ता और आम नागरिक (विशेषत: स्त्री) के बीच अन्तर्सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए विचार करना होगा. ऐसे मामलों में सरकार की प्रतिष्ठा का कम, राष्ट्र की न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा का ध्यान अधिक है.
कहना न होगा कि सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय से न्यायिक संस्थाओं के प्रति शेष-अशेष जन आस्थाएँ खंडित होने से तो बची रहीं, साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के कानून और न्यायिक विवेक का भी प्रतिबिम्ब सामने आया। यह अलग बात है कि यौन हिंसा के अन्य मामलों में इससे स्त्रियों को कितना लाभ मिलता है। इतना अवश्य कहा जा सक ता है कि यह निर्णय लैंगिक न्याय की दिशा में एक प्रगतिशील कदम ही नहीं बल्कि मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। मानवाधिकार सिर्फ 'मुठभेड़' में मारे गए आतंकवादियों के लिए ही नहीं, यौन हिंसा का शिकार स्त्रियों के पक्ष में भी परिभाषित होना जरूरी ह.। अगर सरकारी संस्थाओं में भी जीवन सुरक्षा उपलब्ध नहीं, तो हजारों विदेशी पर्यटक 'भारत भ्रमण' पर क्यों आएँगे ?


और अन्त में...आत्मरक्षा

यशवन्त राव बनाम मध्य प्रदेश राज्य82 में अभियुक्त पर आरोप था कि उसने 5 अप्रैल, 1985 को लखन सिंह नाम के व्यक्ति की कुदाली से हत्या की है. सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को हत्या का अपराधी तो नहीं माना लेकिन गम्भीर चोट पहुँचाने के अपराध में एक साल कैद की सजा सुनाई. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपील में यह सजा अब तक भुगती जेल की सजा में बदल दी, जिसके विरुद्ध अभियुक्त ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री कुलदीप सिंह और योगेश्वर दयाल ने 4 मई, 1992 को अपने अभूतपूर्व ऐतिहासिक फैसले में लिखा है कि अभियुक्त को अपने बचाव का अधिकार है, जो इस मामले में भी लागू होता है, जब अभियुक्त की पन्द्रह वर्षीया बेटी के साथ मृतक बलात्कार कर रहा था. न्यायमूर्तियों ने कहा कि अभियुक्त के बचाव में सबसे पहले पुलिस में दर्ज रपट है, जिसमें अभियुक्त ने शिकायत की है कि उसकी नाबालिग बेटी छाया घर के पिछवाड़े शौच के लिए गई थी, जहाँ मृतक ने उसे पकड़ लिया और शोर सुनकर वह वहाँ पहुँचा तो मृतक अपने बचाव में भाग खड़ा हुआ था. इस तरह वह दीवार के टकराया और पथरीली जमीन पर गिरकर जख्मी हो गया. सत्र न्यायाधीश का विचार था कि नाबालिग लडक़ी, जिसकी उम्र पन्द्रह साल है, अपनी सहमति से जब लखन सिंह के साथ सम्भोग कर रही थी तब अभियुक्त ने उसे चोट पहुँचाई है. लडक़ी खुद लखन सिंह को घर से बुलाकर लाई थी. अभियुक्त ने अपनी बेटी को लखन सिंह के साथ सम्भोग करते देखा तो उसने उत्तेजना व गुस्से में मृतक पर हमला कर दिया.

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में उल्लेख किया है कि अभियुक्त ने अपने बचाव के अधिकार का तर्क सत्र न्यायाधीश के सामने भी रखा था. लेकिन सत्र न्यायाधीश ने सिर्फ इतना ही ध्यान दिया कि अभियुक्त ने चोट उत्तेजना और गुस्से में पहुँचाई है. इससे आगे मामले की जाँच नहीं की. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सम्भोग सहमति से हो रहा था या बिना सहमति के।. तथ्य यह है कि छाया की उम्र पन्द्रह साल थी और लखन सिंह द्वारा किया कृत्य भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 उपधारा 6 के अन्तर्गत बलात्कार ही माना जाएगा. पंचनामे से स्पष्ट है कि बलात्कार का प्रयास या सम्भोग पूरा नहीं हुआ था और इसी बीच अभियुक्त ने मृतक पर वार किया था. मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार भी मृत्यु कुदाली से चोट लगने की वजह से नहीं हुई है, बल्कि 'लीवर' फटने से हुई है. कारण कुछ भी हो, बचाव का अधिकार अभियुक्त को तब भी है जब कोई उसकी बेटी के साथ बलात्कार कर रहा हो. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि कानूनी अधिकारों के बारे में अनभिज्ञ माँ-बाप अक्सर ऐसे मौके पर बलात्कारी को खुद कुछ कहने-सुनने या मारने-पीटने की बजाय थाने में जाकर शिकायत करते हैं. शायद डर भी लगता है कि कहीं खुद ही कानून के जंजाल में न फँस जाएँ. परन्तु इस निर्णय से स्पष्ट है कि बेटी, बहू या बहन या किसी रिश्तेदार के साथ बलात्कार होता देखकर, बलात्कारी की हत्या तक कर देने में भी 'बचाव का अधिकार' (राइट ऑफ प्राइवेट डिफेंस) एक कानूनी अधिकार भी है और बलात्कारियों से निपटने का हथियार भी.


स्त्रियाँ स्वयं अपने बचाव में हथियार उठाने के कानूनी अधिकार का प्रयोग कर सकती हैं. दिल्ली में अभी कुछ दिन पहले एक चौदह वर्षीया लडक़ी ने बलात्कार का प्रयास करनेवाले व्यक्ति की हत्या कर दी थी. नि:सन्देह उसे अपने बचाव में हत्या करने का अधिकार मिलेगा. बलात्कारी कानूनी प्रक्रिया में सजा से बच सकता है. लेकिन जिस दिन औरतें खुद हथियार उठा लेंगी, उसे कोई नहीं बचा सकता. दरअसल भेडिय़ों के समाज में बच्चियों को असुरक्षित और निहत्था छोडऩे के बजाय उन्हें जूड़ों कर्राटे और गोली, गँड़ासा, दराँती चलाना सीखने या सिखाने की जरूरत है और यह भी बताने की जरूरत है कि अपनी सुरक्षा में, अपने बचाव में की गई हत्या भी कोई अपराध नहीं है.

सन्दर्भ

1. महावीर बनाम राज्य 55 (1994) दिल्ली लॉ टाइम्स 428
2. सिद्धेश्वर गांगुली बनाम पश्चिम बंगाल, ए. आई. आर. 1958 सुप्रीम कोर्ट, 143
3. ए. आई. आर. 1927 लाहौर 858
4. ए. आई. आर. 1928 पटना 326
5. ए. आई. आर. 1963 पंजाब 443
6. 1963 क्रिमिनल लॉ जर्नल 391
7. 4 ऑल इंडिया क्रिमिनल डिवीजन 469
8. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 939
9. वही, पृ. 942
10. रफीक बनाम उत्तर प्रदेश (1980) सुप्रीम कोर्ट केसस 262
11. ए. आई. आर. 1923 लाहौर 297
12. ए. आई. आर. 1980 सुप्रीम कोर्ट 559
13. 23 क्रिमिनल लॉ जर्नल 475
14. ए. आई. आर. 1924 लाहौर 669
15. ए. आई. आर. 1927 रंगून 67
16. ए. आई. आर. 1934 कलकत्ता 7
17. ए. आई. आर. 1935 लाहौर 8
18. ए. आई. आर. 1939 रंगून 128
19. ए. आई. आर. 1944 नागपुर 363
20. ए. आई. आर. 1947 इलाहाबाद 393
21. ए. आई. आर. 1949 कलकत्ता 613
22. ए. आई. आर. 1949 इलाहाबाद 710
23. ए. आई. आर. 1950 लाहौर 151
24. ए. आई. आर. 1950 नागपुर 9
25. ए. आई. आर. 1952 सुप्रीम कोर्ट 54
26. ए. आई. आर. 1955 पटना 3245
27. पडरिया बलात्कार कांड में न्यायाधीश ओ.पी. सिन्हा का फैसला
28. ए. आई. आर. 1977 सुप्रीम कोर्ट 1307
29. ए. आई. आर. 1970 सुप्रीम कोर्ट 1029
30. ए. आई. आर. 1973 सुप्रीम कोर्ट 343
31. तुकाराम बनाम महाराष्ट्र (ए. आई. आर. 1979 सुप्रीम कोर्ट 185)
32. फूलसिंह बनाम हरियाणा (ए. आई. आर. 1980 सुप्रीम कोर्ट 249)
33. भोगिन भाई हिरजी भाई बनाम गुजरात (ए. आई. आर. 1983 सुप्रीम कोर्ट 753)
34. ए. आई. आर. 1989 सुप्रीम कोर्ट 937
35. ए. आई. आर. 1990 सुप्रीम कोर्ट 538
36. ए. आई. आर. 1981 सुप्रीम कोर्ट 361
37. महाराष्ट्र बनाम चन्द्रप्रकाश केवलचन्द जैन ए.आई.आर. 1990 सुप्रीम कोर्ट 658
38. ए. आई. आर. 1927 लाहौर 772
39. छिद्दा राम बनाम दिल्ली प्रशासन, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 4073
40. ए. आई.आर. सुप्रीम कोर्ट 658
41. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 715
42. ए. आई. आर. 1962 मद्रास 31, ए. आई. आर. 1991 सुप्रीम कोर्ट 207
43. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1666
44. 1988 क्र्रिमिनल लॉ जर्नल 3044
45. 1988 (4) आर. सी. आर. (क्रिमिनल) 600
46. 1988 (4) आर. सी. आर. (क्रिमिनल) 207
47. 1988 (3) आर. सी. आर. (क्रिमिनल) 692
48. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2859
49. 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 248
50. 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1529
51. 1983 (2) ऑल क्रिमिनल लॉ रिपोर्ट 844
52. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 439
53. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 852
54. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2834
55. विनोद कुमार बनाम राज्य, 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2360,
55ए. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2919
55बी. जहरलाल दास बनाम उड़ीसा राज्य 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1809
55सी. कुमुदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1999) एस.एल.टी. 636
56. ए. आई. आर. 1929 लाहौर 584
57. 1977 क्रिमिनल लॉ जर्नल 556
58. 1987 क्रिमिनल लॉ जर्नल 557
59. रामरूपदास बनाम राज्य, 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1000
60. जगदीश प्रसाद बनाम राज्य, 58 (1995) दिल्ली लॉ टाइम्स 740
61. बलवान सिंह बनाम हरियाणा राज्य, 1994, क्रिमिनल लॉ जर्नल 2810
62. रामचित राजभर बनाम पश्चिम बंगाल, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 372
63. नाला रामबाबू बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 324
64. वी. लक्ष्मी नारायण बनाम पुलिस निरीक्षक, 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 334
65. ओमी उर्फ ओमप्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1994 क्रिमिनल लॉ जर्नल 155
66. 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 835
67. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 3786
68. 1993 क्रिमिनल लॉ जर्नल 977
68 ए. 63 (1996) दिल्ली लॉ टाइम्स 563
68 बी. 1994 क्रिमिनल केसस 56
69. फूलसिंह चंडीगढ़ क्रिमिनल केस 163
70. 1979 राजस्थान क्रिमिनल केस 234
71. 1979 राजस्थान क्रिमिनल केस 234
72. 1979 राजस्थान क्रिमिनल केस 56
73. 1978 राजस्थान क्रिमिनल केस 426
74. 1977 (2) राजस्थान क्रिमिनल केस 157
75. 1976 (1) राजस्थान क्रिमिनल केस 310
76. 1976 राजस्थान क्रिमिनल केस 258
77. काकू बनाम हिमाचल प्रदेश ए. आई. आर. 1976 सुप्रीम कोर्ट 1991
78. रीपिक रविन्द्र बनाम आन्ध्र प्रदेश, 1991 क्रिमिनल लॉ जर्नल 595
79. इप्पिती श्रीनाथ राव बनाम आन्ध्र प्रदेश 1984 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1294
80. जगदीश बनाम दिल्ली राज्य 57 (1955) दिल्ली लॉ टाइम्स 761
81. प्राचीन भारत में न्याय व्यवस्था, नताशा अरोड़ा
82. 1992 क्रिमिनल लॉ जर्नल 2779
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