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अनागत का भविष्य

योगेश गुप्त 
योगेश गुप्त की कहानियों के बारे में जैनेंद्र कुमार ने कहा था, “योगेश की कहानियां निश्चय ही हिंदी साहित्य की उपलब्धि हैं…लीक से हटकर…इनकी विशेषता यह है कि इनके कथ्य का सम्प्रेषण वाक्यों से नहीं, पूरे वातावरण में से होता है…इसे डायरेकट कम्यूनिकेशन कहा जाता है…कहानियां व्यक्ति को बेहद डिस्टर्ब करती हैं…और इनकी निशब्द कराह पाठक को अपने में समेत लेती है”…अनागत का भविष्य ऐसी ही एक कहानी है, जिसमें नायिका विवाह से पहले गर्भवती हो जाती है…. प्रेमी में स्वीकार के साहस का अभाव है… ….तब नायिका एक क्रूर फैसला करती है….उसका फैसला, अकारण, अनायास, उपसंहार, छविनाथ जैसे अनेक उपन्यास लिखने वाले योगेश गुप्त की यह लम्बी कहानी बहुत कुछ सोचने पर बाध्य  करती है….



आधी रात निकल चुकी है। रेल तेज चाल से चली जा रही है। लक्सर का स्टेशन आने वाला है। यहां काफी देर गाड़ी रुकेगी। फर्स्ट क्लास के डिब्बे में एक बर्थ पर सिल्क की चादर ओढ़े छाया लेटी है। उसकी बर्थ पर की रोशनी बुझी है। पास ही शैलेन्द्र बैठा कोई किताब पढ़ रहा है। रोशनी की कमी में किताब उसने बिल्कुल आंखों से लगा रखी है। पता नहीं वह पढ़ भी रहा है या नहीं। पर काफी देर से वह कुछ बोला नहीं, न ही किताब पर से नजर हटाई है। छाया जाग रही है, इस बात का उसे पता है.

पूरे डिब्बे में उन दिनों के सिवाय कोई नहीं है

रेल बहुत तेज चाल से बढ़ी जा रही है। काफी देर उसे चलते हो गए हैं। हवा में हल्की सर्दी महसूस हो रही है। कुछ देर पहले शैलेन्द्र ने आसपास की सब खिड़कियों को बंद करना चाहा था, पर छाया ने मना कर दिया। उसे नींद नहीं आ रही है, रोशनी बुरी लग रही है। वह नहीं चाहती कि शैलेन्द्र इस समय पढ़े। उसकी इच्छा थी कि कुछ बातचीत हो जाए। शैलेन्द्र बातें नहीं कर पा रहा है। इसीलिए वह चुपचाप बत्ती बुझाकर लेट गई है। लेटकर वह एक खास तरह का आनन्द ले रही है। शैलेन्द्र के किताब में दुबके चेहरे को देखकर उसे मजा आ रहा है। बोलना लेकिन वह भी नहीं चाहती।

छाया के ऊपर की खिड़की खुली है। वह उठकर बैठ गई। अपनी पूरी बांह खिड़की में फंसा ली और अपना सिर बांह पर टिका लिया। छाया के काले लम्बे बाल एकदम खुले हैं। धोती के पल्लू में सिमटे बाल पूरी तरह उड़ नहीं पा रहे हैं। हवा में ठण्ड की कुनक बढ़ रही है। छाया ने सिल्कन चादर बदन पर उतार कर पैरों पर रोक ली है। वह एकदम बाहर फैले अंधेरे को देख रही है।

‘‘कितना अंधेरा है।’’
शैलेन्द्र ने किताब रख दी। कुछ देर वह चुपचाप छाया को देखता रहा। फिर बत्ती बुझाकर अपनी बर्थ पर लेट गया। उसके पास ओढ़ने को कोई भी चादर नहीं रखी है।
‘‘कितन अंधेरा है’’, छाया फिर कह रही है।

खिड़की मे टिकी बांह पर थमा उसका सिर जरा ढीला हो गया है। वह बाहर अंधेरे में देख रही है। कहीं जरा भी रोशनी नहीं है। बाहर जरूर पेड़, पौधे, मकान, जानवर होंगे। कुछ नहीं दीख रहा है। रेल के सैकड़ों पहियों की आवाज अंधेरे को और गाढ़ा कर रही है। हवा में चिल और बढ़ गई है। छाया की रह-रहकर धुरधुरी आ रही है, पर बाहर देखना बंद नहीं किया है।
शैलेन्द्र पास आकर खड़ा हो गया।
‘‘सर्दी लग जाएगी, खिड़की बंद कर लो’’
‘‘अच्छा। तुम भी सो जाओ।’’


खिड़की बंद कर छाया भी लेट गई। अंदर डिब्बे में भी अंधेरा है। सिर्फ एक छोटी बत्ती चल रही है। छाया ने आंखें मूंद लीं चादर ऊपर तक खिसका ली। रेल के पहियों की आवाज सुनाई दे रही है। हवा के रूख के हिसाब से आवाज कभी तेज हो जाती है, कभी बिल्कुल मंदी। छाया को एहसास है कि शैलेन्द्र पास ही लेटा है। वह चुप है, एकदम चुप।

छाया और शैलेन्द्र देहरादून जा रहे हैं। वहां दो-तीन महीने रहेंगे। छाया गर्भवती है। आठवां महीना है। एक-डेढ़ महीने में वह निपट जाएगी। एक-डेढ़ महीना सेहत पाने में लगेगा। फिर दोनों अपने-अपने घर चले जाएंगे। छाया और शैलेन्द्र दोनों दोस्त हैं।

रीत को रेल का चलना बहुत अच्छा लगता है। वह वक्त की लम्बी डोरी को कट्-कट् खट्-खट् काटते हुए रेल के पहिये मन में न जाने क्या-क्या जगा रहे हैं। छाया शायद सो गई है। पर रह-रहकर वह करवट ले रही है, उसे शायद गर्मी महसूस हो रही है। शैलेन्द्र भी सोया है और वह करवटें ले रहा है। बाहर चारों तरफ गहरा अंधेरा है। उस अंधेरे में से यह डिब्बा कैसा लग रहा होगा। बिल्कुल अंधेरा डिब्बा कैसा लग रहा होगा। बिल्कुल अंधेरा डिब्बा जिसमें सिर्फ एक छोटी-सी बत्ती जल रही है और बाहर हवा की चिल खूब चढ़ गई है। तेज ठण्डी हवा और उस पर गीदड़ों की आवाजें, तैरती हुई। गीदड़ रो रहे हैं । रेल उस  आवाज को चीरती हुई बढ़ती जा रही है।
लक्सर आया, गाड़ी ने अपनी दिषा बदली और फिर चल दी। छाया और शैलेन्द्र दोनों पड़े सोते रहे और करवटें बदलते रहे।

देहरादून में छाया ने जो मकान किराये पर लिया है वह शहर से काफी दूर है। चारों तरफ घना जंगल है। कोई फर्लांग की दूरी पर एक और कोठी है। उस कोठी की रोशनी तक यहां से दिखाई नहीं देती। मकान के चारों तरफ मजबूत चहारदीवारी है। एक नौकर है। एक कुत्ता है। छाया खाना खुद नहीं बनाती, नौकर बनाता है। शैलेन्द्र को इस सबसे बड़ा संकोच होता है पर छाया हंसकर टाल देती है। छाया को पैसे की कोई चिंता नहीं है।

शैलेन्द्र ज्यादातर चुप रहता है। लम्बा, चौड़ा और खूबसूरत शैलेन्द्र चुप बैठा बहुत अच्छा लगता है। वह हर तरह की कुर्सी पर एक ही तरह से बैठता है और चुप होता है तो उसके होंठ बड़ी नरमी से जुड़े रहते हैं। जो हो चुका है उसको लेकर वह छाया की तरह निश्चिन्त  नहीं है। उसमें बहुत संकोच है। विशेष तौर से इस तरह छाया के साथ आने पर। छाया उसे देखकर हंसती रहती है। ‘‘अरे तो क्या हुआ? तुम तो ऐसे हो रहे हो जैसे जाने क्या हो गया। आदमी के कपड़े क्या मैले नहीं होते। वह धोता है और फिर पहन लेता है। तुम्हारी तरह हीनता से मर थोड़े ही जाता है कोई।’’


शैलेन्द्र बड़े कमरे की खिड़की पर खड़ा चुपचाप यह सब सुनता रहता है। सुनकर वह बाहर देखने लगता है। बाहर शाम होती है। आसमान में धूल-ही-धूल छाई है। एकदम किरकरी रूखी धूल। लाल-लाल। बादल, हों तो मन नम हो। पर यह धूल तो जैसे शरीर के भीतर-बाहर की सब नमी सुखा देती है। खिड़की के नीचे यह गहरी खाई है। सामने मन्सूरी के पहाड़ हैं। मन्सूरी में रोशनी होने लगी है। धूल में से रोशनी कैसी लग रही है। नीचे की खाई में बहुत गहरे जाकर एक छोटी-सा झरना है। उस पर धोबी और एक धोबन अब भी कपड़े धो रहे हैं। धूल उन्हें शायद परेशान नहीं कर रही। नीचे से ऊपर पगडण्डी पर से कई बकरियाँ भागी आ रही हैं।
सूरज डूब रहा है।

शैलेन्द्र खिड़की पर से हट आया है। कमरे में बिछे कीमती सोफा सेट पर आकर बैठ गया है। छाया बाहर कारीडोर में बिछी एक इंजी-चेयर में बैठी है। वह एकदम स्वस्थ है। धीरे-धीरे गुनगुना रही है। अपने ठीक सामने के लॉन पर उसकी दृष्टि है। लॉन मे कुत्ता भाग-भागकर किलोल कर रहा है। नौकर खाना  बना रहा है। कोठी के दरवाजे पर न जाने कौन बैठा सुस्ता रहा है। जाने कौन है?

शैलेन्द्र बहुत देर चुप बैठा रहा है। वह उतावला-सा दीखता है। उठकर बाहर छाया के पास आ गया है। कुछ देर उसकी कुर्सी के पीछे खड़ा उसके कुर्सी में धंसे शरीर को देखता रहता है। फिर एकदम उसके बालों में उंगलियां डालकर कहता है, ‘‘चलो छाया, अंदर चलो।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘बाहर सर्दी बढ़ेगी।’’
‘‘मुझे अच्छा लग रहा है। अभी बढ़ी नहीं है।’’
‘‘जिद बहुत करती हो।’’
‘‘कहां जिद करती हूँ । मैं तो कभी जिद नहीं करती। मुझे जिद करना अच्छा ही नहीं लगता। पर अब तो…’’
छाया जोर-जोर से हंसने लगी है। कुत्ता अब खेल नहीं रहा। चुपचाप एक किनारे खड़ा हो गया है। अंधेरा एकदम घुट गया है। हवा में तेजी आ गई है। ठण्ड भी है। आसमान में अब धूल नहीं है। सामने मन्सूरी के सब चिराग जल गए हैं। सपनों के लोक की तरह दीखती मन्सूरी को देखना छोड़ दोनों अंदर कमरे में आ गए हैं।
‘‘छाया तुम्हें डर नहीं लगता ?’’
‘‘तुमसे ? लगता है । उहं, नहीं लगता।’’


कमरे की तमाम खिड़कियां खुली हैं। छाया एक-एक करके सब बंद कर देती है। ‘‘लो,  अब तो ठण्ड नहीं लगेगी ना। कितनी चिंता करते हो तुम मेरी। सुनो, शैलेन्द्र! चलो यहां से कहीं और चलें। यह जगह खास अच्छी नहीं है। तुम्हारा यहां शायद मन नहीं लगा। है ना ?’’
शैलेन्द्र सिर्फ छाया की तरफ देख रहा है।
‘‘आज तुम्हारा किसी चीज में मन नहीं है ?’’
शैलेन्द्र चुप है।
‘‘मैं कुछ बुरी लगने लगी हूं।’’
शैलेन्द्र उठता है और दोनों हथेलियों में छाया का मुंह दबा लेता है। कहता है, ‘‘तुम बहुत ‘क्रुएल’ हो छाया। खाना आए तो मुझे बुला लेना है।’’
कहकर वह अपने कमरे में अपने पलंग पर जाकर लेट गया है।

छाया बहुत खूबसूरत लड़की है। कॉलिज में वह अकेली लड़की थी जो प्रोफेसरों से लेकर लड़कों में समान रूप से चर्चित रहती। उसकी बेनियाजी पर लोगों को आश्चर्य होता रहा है। उसकी चिकनी सफेद मखमली खाल पर वक्त की कोई बूंद रूक नहीं सकी। उसने किसी को गिनती में नहीं लिया। वह सबकी तरफ मुग्ध दृष्टि से देखती और भूल जाती। उचटती नजरों से देखती तो भी भूल जाती। बातें करती तो कहीं दुविधा न होती। चलती-फिरती तो स्वच्छन्द भाव से। पढ़ती तो जमकर और हमेशा ऊपर की पांच-सात लड़कियों में से एक रही।
शैलेन्द्र हमेशा टॉप करता था।

छाया शैलेन्द में अटक गई। पर निर्द्वन्द्व वह तब भी रही। कोई यह सोच भी नहीं पाया कि वह शैलेन्द्र से प्यार करने लगी है। उससे कोई पूछता तो वह झूठ नहीं बोलती। कहती, ‘‘हां, वह मुझे अच्छा लगता है।’’ पर कार पर एक सैकिण्ड उसका इंतजार नहीं कर सकती थी। वह कहता, ‘‘मैं तो जरा… ‘‘और कार खिसकर आगे चल देती। दोनों घूमने जाते, पिक्चर जाते, शॉपिंग करते और यों ही घूमते। पर छाया ने किसी दिन शैलेन्द्र की घेरलू स्थिति जाननी नहीं चाही। वह कहता, ‘‘मेरे पास तो सुविधा नहीं है कि वहां चलूँ ।’’ वह कहती, ‘‘मेरे पास है, चलो।’’ शैलेन्द्र चल पड़ता। छाया ने कभी अपने अमीर होने का भार शैलेन्द्र पर नहीं डाला। उसका तमाम संकोच भाव वह ऐसे हंस-हंसकर उड़ा देती कि आश्चर्य होता और कभी-कभी तो शैलेन्द्र स्वयं चकित रह जाता। छाया के सामने उसके जन्मजात गुण न जाने कहां चले जाते थे।

एक दिन छाया ने सूचना दी, ‘‘अरे कमाल हो गया। मैंने अपने डॉक्टर को दिखाया था। वह कहता है – यू हैव कन्सीव्ड।’’
शैलेन्द्र छाया के कहने के ढंग में अटककर रह गया था। वह खबर पर स्तम्भित हो ही नहीं पाया था। कहने का ढंग इतना सहज था।

छाया आकर कुर्सी पर बैठ जाती है। हल्की-हल्की बूंदें गिरने लगी हैं । छाया को अच्छा लग रहा है। हवा में सर्दी आ गई है। अभी घंटा भर पहले काफी उमस थी। उमस से घबराकर ही शैलेन्द्र शायद कहीं बाहर निकल गया है। जाने कहां चला गया। तेज बारिश आने वाली है। भीग जाएगा।

छाया चिंतित होते-होते हंस पड़ती है। सोचती है पत्नी की तरह चिंता करने लगी हूँ। पर यह क्या उसका साथ निभा पाएगा ? डरता है। मैं जो इतनी साफ-सुथरी हूँ-उससे डरता है।
बारिश तेज आ गई है। छाया चली गई है।
छाया का मन आज अनमना है।

वह खिड़की के पास आकर खड़ी हो जाती है। नीचे वही गहरी खाई। ऊपर से तेज बारिश की बंूदंे खाई में समा रही हैं। दूर-दूर कोई पंछी तक दिखाई नहीं देता। नीचे न धोबी है, न धोबिन । झरना जरा तेज होकर बह रहा है। कीकर, आक, नीम और बबूल के पेड़ों के पत्ते पानी की बंूदों के दबाव से झुके जा रहे हैं। खिड़की से होकर पानी की बंूदें छाया पर पड़ रही हैं। खिड़की उसे बंद कर लेनी चाहिए। पर वह बाहर देखे जा रही है। आसमान में कुछ दिखाई नहीं दे रहा। सामने भी खूब ध्यान देने से ही कुछ दिखाई देता है। पर खूब ध्यान देने से भी उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा। सामने भी खूब ध्यान देने से ही कुछ दिखाई देता है। पर खूब ध्यान देने से उसे कुछ दिखाई दिया है और एकदम चौंक उठी है। वह वहां क्यों गया ? इतने गहरे में ? मेरे से अलग उसके लिए ‘एडवेन्चर’ के तौर पर कुछ भी क्यों हो? तो क्या मुझसे इतना डरने लगा है? मैं तो उससे नहीं डरती, किसी से नहीं डरती। यह जो है से निपट जाए तो उससे कहूँगी कि घर जाए, आराम करे। मेरे लिए चिंता की जरूरत नहीं है।


कुछ मिनटों को छाया उदास दीखी, पर तत्काल ही उसने अपनी सब उदासी झटककर फेंक दी और स्वस्थ होकर कमरे में घूमने लगी। नौकर को आवाज दी और कॉफी बनाने को कहा। कहा कि कॉफी गर्म रखे और उसकी किसी समय भी जरूरत पड़ सकती है।


वह फिर आकर खिड़की के पास खड़ी हो गई। बारिश अब ढीली पड़ गई है। शैलेन्द्र पेड़ के नीचे से निकल आया है और संभल-संभलकर ऊपर चढ़ रहा है। उसकी कमीज और पैंट उसके ऊंचे सुडौल बदन से चिपट गई है। छाया ने दोनों कुहनियों को खिड़की में फंसा लिया है फिर दोनों हथेलियों में अपना हलका पीला चेहरा टिकाकर वह शैलेन्द्र का संभल-संभलकर ऊपर चढ़ना देख रही है। बारिश बिलकुल रुक गई है। पगडण्डी पर जरूर फिसलन होगी तभी शैलेन्द्र इतना रुक-रुककर चढ़ रहा है।


छाया भीतर आकर फिर कुर्सी पर बैठ गई है। उसने सामने रखी कुर्सी पर अपनी टांगे पसार ली हैं और गर्दन पीछे टिका ली हैं। शैलेन्द्र का इंतजार कर रही है। नौकर को बुलाकर उसने एक बार फिर पूछ लिया है कि कॉफी तैयार है या नहीं। शैलेन्द्र आ रहा होगा।

शैलेन्द्र आ रहा है। उसने डरते-डरते मेनगेट खोला है। वह एकदम भीगा है। कोठी की सपाट सड़क पर भी वह ऐसे ही चल रहा है जैसे पगडण्डी पर चढ़ रहा हो। छाया की आंखों में एक काली छाया तैर गई है। वह चुप होकर बैठ गई है।
शैलेन्द्र कमरे के दरवाजे पर दीखा है।
छाया ने जोर से आवाज दी है, ‘‘कपड़े बदल लो, कॉफी तैयार है।’’
शैलेन्द्र के लिए यह अप्रत्याशित था।
छाया तो कभी किसी की चिंता नहीं करती।
कॉफी पर शैलेन्द्र बताता रहा है कि वह कहां गया था और छाया चुपचाप बैठी सुनती रही। शुरू से आखिर तक कुछ नहीं बोली।
‘‘तुम सुन नहीं रही ?’’
‘‘क्यों, सुन तो रही हूँ ।’’
‘‘कोई ‘रिएक्शन’ नहीं ?
छाया सिर्फ मुस्कुरा दी। कॉफी ‘सिप’ करती रही।

वह कोठी जिसमें छाया और शैलेन्द्र रह रहे हैं काफी बड़ी है। मसूरी के रास्ते पर शहर से कोई दो मील दूर सड़क की दायीं तरफ वह खड़ी है। सड़क छोड़कर कोई आधा फर्लांग पथरीली ऊबड़-खाबड़ पगडण्डी पर चलना पड़ता है। तब कोठी का बाहर का लकड़ी से बना गेट आता है। कोठी के चारों तरफ जंगल है। कीकर की गहरी झाडि़यां। उन झाडि़यों में कोठी बिल्कुल छिप जाती है। लॉन में कुर्सी पर बैठी छाया को उन सब झाडि़यों को चीरकर सड़क पर से गुजरती ट्रक, बस, कार साइकिल और आदमी की एक फटी-सी शक्ल दिखाई देती है। वह कभी-कभी उसे देखती रहती है। देखकर खूब खुश होती है। वह देखकर नहीं पहचान पाती कि सड़क पर क्या जा रहा है तो ध्यान से आवाज सुनने की कोशिश करती है। इसी तरह आवाजों की अब उसे खूब पहचान हो गई है। पहले वह पहचान लेती है। फिर ध्यान से सड़क की तरफ देखती है। लॉन में वह कभी कहीं बैठती है, कभी कहीं बैठती है। इसीलिए आदमी का कभी उसे सिर चलता हुआ दीखता है, कभी खाली टांगें। मोटर का पहिया अकेला सड़क पर भाग रहा है और साइकिल तो है पर ऊपर कोई नहीं है। वह शैलेन्द्र को बुलाती और यह सब दिखाती। शैलेन्द्र अनमना हो उठता। कुत्ते के साथ खेलने लगता।
‘‘तुम्हें यह सब अच्छा नहीं लगता ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘चीजें पूरी अच्छी लगती है।’’
‘‘अरे वाह, जो दीखता है सो दीखता है। झाडि़यों के पीछे का हम अंदाजा क्यों करें? अच्छा छोड़ो। चलो, उधर चलकर खड़े होंगे। छत पर से चारों तरफ देखेंगे। वह तो ठीक है ना ? शैलेन्द्र, तुम उदास रहते हो। तुम्हें शायद यहां अच्छा नहीं लगता। तुम चाहो तो वापस घर चले जाओ। मैं निपटकर आ जाऊंगी।’’
‘‘चलो, ऊपर चलें।’’
‘‘वापस नहीं जाओगे ?’’
‘‘मुझे मालूम है तुम बहुत निडर हो। तभी तो मुझे डर लगता है।’’

छाया ने एकदम ठण्डी आवाज में कहा, ‘‘डरना नहीं चाहिए शैलेन्द्र! जाने कैसा महसूस होता है! चलो।’
दोनों चल दिए। शैलेन्द्र ने छाया का हाथ पकड़ लिया। हाथ कुछ रोज से अधिक ठण्डा था। वह बोला तो कुछ नहीं, हाथ को धीरे-धीरे मसलने लगा। शैलेन्द्र की मुट्ठी में छाया का पूरा हाथ आ जाता है। उसने उसे दबोच लिया है। लॉन पार हो गया है। कोठी का कारीडोर पार करके दोनों सीढि़यों की तरफ जा रहे हैं। कोई पन्द्रह-बीस गोल सीढि़यां। दोनों धीरे-धीरे चल रहे हैं। चुपचाप। चुप्पी वक्त पर बोझ डाल रही है। शाम का वक्त है। सूरज डूब चुका है। धरती बचे-खुचे उजाले को उफक-उफककर पकड़ने की चेष्टा कर रही है। पर हाथ उसके अंधेरा ही आता है। वह शांत हो जाती है। अंधेरा बढ़ रहा है। वक्त की डोर खिंच रही है। छाया और शैलेन्द्र सीढि़यों पर चढ़ रहे हैं। शैलेन्द्र ने छाया का हाथ पकड़ रखा है।
‘‘तुम्हारा हाथ बहुत छोटा है छाया।’’
‘‘शैलेन्द्र, तुम्हें पछतावा हो रहा है।’’
‘‘नहीं तो।’’
‘‘अच्छा।’’

छत की हवा में हल्की ठण्ड है। अगस्त का महीना है। बारिशें हो रही हैं। दिन में धूप निकलती है तो गर्मी महसूस होती है। कभी-कभी बहुत तेज भी होती है। दमघोंट देने वाली। बादल आते हैं तो हल्की ठण्ड महसूस होने लगती है। शाम के वक्त हल्की ठण्ड होती है। इस समय भी ठण्ड है। आसमान में बादलों के छोटे-छोटे टुकडे़ हैं। छत के चारों तरफ का सब दीखता है। दूर तक फैला हुआ देहरादून। चारों तरफ पहाड़। देहरादून में सूरज के डूबने से अंधेरा नहीं होता है। पहाड़ों की छाया से अंधेरा होता है। सूरज तो बहुत देर बाद डूबता। डूबते हुए उसकी किरणें पहाड़ों की चोटियों को और आसमान को रोशन किए रखती हैं। तमाम शहर अंधेरे में डूब जाता है।
कोठी के पीछे की खाई में बिल्कुल अंधेरा छा गया है। धोबी और धोबिन पगडण्डी से ऊपर चढ़ रहे हैं।
‘‘उस दिन मैं वहां तक गया था।’’

शैलेन्द्र ने छाया को अपने से सटा लिया है। उसका हाथ कसकर पकड़ लिया है।
छाया खड़ी है। चुपचाप सामने देख रही है। उसने साड़ी पहन रखी है। अंधेरे में उसका चेहरे कुछ अधिक पीला लग रहा है। उसकी साड़ी रेशमी। खिसककर नीचे गिर रही हैै। उसके पेट का उभार बड़ा स्पष्ट होकर दीख रहा है।
सामने मसूरी में रोशनियां जल रही हैं।
चारों तरफ का अंधेरा गहरा हो गया है।
‘‘छाया!’’
छाया चुप है।
‘‘छाया, बच्चे का क्या करोगी ’’
छाया अब भी चुप है और पूर्ववत् खड़ी है। वह सामने ही देख रही है। सूरज भी डूब चुका है। अंधेरे ने सबको एकदम एकाएक कर दिया है। नौकर ने नीचे कोठी की बत्तियां जला दी हैं। मसूरी खूबसूरत लगने लगी है। पहाड़ पर बसी है मसूरी। पर पहाड़ अंधेरे में छिप गया है। मसूरी की तमाम बत्तियां जगमगा उठी हैं। आसमान में टंका एक परीलोक।
शैलेन्द्र के हाथ की पकड़ ढीली हो गई है।
दोनों के बीच में जरा-सी दूरी आ गई है।
‘‘छाया, हम दोनों कुछ अपरिचिति-से-होते जा रहे हैं । पहले…’’
‘‘छोड़ो, चलो नीचे चलें।’’
रात के जानवरों ने सुर बांधकर पहली आवाज दी है।

दोनों के कॉफी ली और आमने-सामने कोच पर बैठे गए। शैलेन्द्र ने एक सिलकन कमीज और समर की नीले रंग की पैंट पहन रखी है। छाया जामुनी रंग की साड़ी में लिपटी है। दोनों के बीच में एक गोल मेज है जिस पर पानी के दो गिलास आधे खाली रखे हैं। नौकर कॉफी के बर्तन ले गया है और किसी काम में लग गया है। पर गिलास रखे हुए अच्छे लग रहे हैं। शैलेन्द्र ‘फैमिना’ देख रहा है और छाया के हाथ में कोई भारी-सा नॉवल है। कोठी में उस कमरे के सिवाय चारों तरफ अंधेरा है। रसोई में खाना बनाने की आवाज इस कमरे में नहीं आ रही। बाहर से तेज हवा, किसी जंगली जानवर या पेड़ की डालियों के आपस में टकराने की आवाजें आ रही हैं। खाई की तरफ की खिड़की खुली है।
‘‘यह खिड़की बंद कर दें।’’
‘‘हां, ठीक है।’’

योगेश गुप्त



दोनों में से उठकर खिड़की बंद करने कोई नहीं जाता। नौकर आता है। गिलास उठाकर चला जाता है। खिड़की बंद करने का उससे भी जिक्र नहीं आता। खिड़की से तेज ठण्डी हवा भीतर आ रही है।
‘‘ठण्ड कुछ बढ़ती जा रही है।’’
‘‘शॉल ले लो।’’
‘‘हाँ।’’
शैलेन्द्र ने फैमिना रख दिया है। छाया नॉवल में बहुत तत्लीन हो गई है। उसने टांगें जरा फैला ली हैं। शैलेन्द्र की कुर्सी से पैर छू रहे हैं। लम्बा खिंचने से टांगें घुटने से जरा नीचे तक नंगी हो गई हैं। शैलेन्द्र की टांगें उन टांगों के ऊपर से होकर जमीन पर टिकी हैं। छाया का रंग कितना गोरा है।
‘‘तुम्हें इस तरह फैलाकर बैठने में तकलीफ नहीं होती ?’’
‘‘नहीं तो।’’
शैलेन्द्र हंस पड़ता है, ‘‘कितनी भारी हो गई हो। पहले इस तरह टांगे फैलाकर बैठती थी तब भी धोती पैरों तक पहुंचती थी।’’
छाया नजर उठाकर शैलेन्द्र की तरफ देखती है।
‘‘नहीं ?’’
‘‘ठीक तो है, पर क्या करूं ?’’
रात के शायद नौ या दस बज गए हैं… शायद इससे भी ज्यादा हों। बाहर अंधेरा बहुत गहरा हो गया है। छाया बाहर देख रही है। खिड़की में से सारा अंधेरा एक प्रोजेक्शन में कटा हुआ दीख रहा हैं वह ऊपर से गिर रहा है। खिड़की से ऊपर कुछ दिखाई नहीं देता। खिड़की से नीचे देखना भी मुश्किल है। अंधेरा गिर ऊपर से ही रहा है। है भी बहुत गहरा अंधेरा।
‘‘खिड़की बंद कर दो ना?’’
‘‘एकदम ‘पिनड्रॉप साइलेन्स’ अच्छी नहीं लगती।’’
‘‘हां, लगती तो नहीं। रहने दो।’’
छाया कहकर चुप ही रही। कुछ देर बाद फिर बोली, ‘‘तुम्हारा नाम बहुत खूबसूरत है शैलेन्द्र। सॉरी, शैलेन। जी करता है तुम्हें शैल कहा करूं। बुरा तो नहीं मानोगे ?’’
‘‘यह तो लड़कियां का नाम है ?’’
छाया हंस पड़ी। बोली, ‘‘छोड़ो, यह भी कोई बात हुई! बात अच्छा लगने की थी….खाना नहीं आया ? बाहर तो शायद बादल घिर आए हैं। अंधेरे में भी दिखाई देते हैं। बादल अंधेरे से कुछ कम काले होते हैं। तुम्हारी सेहत शैल कुछ गिर नहीं गई है?… लो, खाना आ गया।’’
छाया ने खुद उठकर खान लगा दिया। खिड़की बंद कर आई। नौकर को घंटी देकर बुला लिया, ‘‘यहीं बैठो, किसी चीज की जरूरत पड़े। यहीं बैठना चाहिए… आज मोहन, कोई डाक नहीं आई ? मोहन खाना बहुत अच्छा बनाता है। शैल, कुछ चाहिए? मोहन को छुट्टी दे दें। आज तुम शैल, यहीं सोना, इसी कमरे में।’’
‘‘अच्छा।’’

न जाने कै बजे हैं कि छाया बिस्तरे में से निकलकर ऊपर छत पर आ गई है। शैलेन्द्र पास ही बिस्तरे पर सो रहा था। गहरी नींद में या शायद गहरे सपनों में। उसके दायें पैर का अंगूठा बिस्तर से निकलकर छाया के पलंग को छू रहा था। पर छाया ने कुछ देखा नहीं और अकेली छत पर आकर खड़ी हो गयी है। आसमान साफ है। बादल शायद निकलकर जा चुके हैं। दूर-दूर तक अंधेरा हैं। अंधेरे में भी पहाडि़यों की छायाएँ साफ दिखाई दे रही हैं। क्यों इतना अंधेरा नहीं होता कि दूर का, पास का कुछ भी दिखाई न दे। यह मटमैलापन बुरा लगता है। कई चीजें जिन्हें दीखना नहीं चाहिए, दीखती हैं और रूप बदल-बदलकर दीखती हैं। रूप बदलता हुआ आदमी भयावना होता है। यह मिलावट न हो तो कोई क्यों रूप बदले। पर शायद वह अनिवार्य है। यों ही कभी कोई चीज कैसी, कभी कैसी और सब गड्डमड्ड।
छाया ने अपनी रेशमी साड़ी को पेट पर जरा खिसका लिया। नीचे के पेटीकोट का नाड़ा जरा ढीला किया और अपने बढ़े पेट पर हाथ फेरकर उसे महसूस करने लगी। कितना बढ़ गया है। कितनी अजीब शक्ल है, यह जब खाली हो जायेगा तो इस खाल में बारीक-बारीक सिलवटें पड़ जाएंगी। उन सिलवटों से भय लगने लगेगा। पेट फिर तनेगा फिर खाली होगा। फिर… सिलवटें लम्बी-लम्बी धारियां बन जाएंगी और फिर एक दिन पेट तनना भी बंद हो जायेगा। और ये धारियां सारे शरीर में फैल जाएंगी। तो कैसी लगेंगी ? कैसी क्या लगेंगी? आनन्द रहेगा। एक झुर्रियों बाला बदन पलंग पर लेटा होगा। फिर भी कोई आएगा और पल को उनको टालकर उसमें यौवन भर देगा। उसे छाती से लगा लेगा।
वह कौन होगा ?
शैलेन्द्र ?
नहीं। वह तो अभी से मेरे शरीर से डरता है। वह तो डरता है। सबसे डरता है- वह निकम्मा है। नपुन्सक और किसे कहते हैं? जो उसका है, उसे ही स्वीकृति नहीं दे पाता। पहले तुम कैसी थीं, इसी तरह बैठती थीं तो भी तुम्हारी टांगें नहीं उघड़ती थीं। उसका बस चले तो उघड़ी टांगों को गंड़ासे से तराश कर फेंक दे। अगली दफा थोड़ी और, अगली दफा थोड़ी और। फिर सिर्फ जांघें रहे जाएंगी और फूला पेट और दूध पिलाने को ये दो लम्बी मछलियां, लटकी हुई, थुल-थुल, और हड्डियों वाला मुह। कोई चूमे तो लगे कुत्ता हड्डी चूस रहा है। नहीं, शैलेन्द्र से नहीं चल सकेगा। मैं मरने तक पहुंचने के लिए खुलकर जीना चाहती हूँ । हर समय जीने की लालसा में पल-छिन मृत्यु-सुख का उपयोग करना नहीं।

छाया छत की मुंडेर के पास आ गई है। नीचे की खाई में देख रही है। सामने का विस्तार देख रही है। अंधेरे में उभरी पेड़-पौधों और पहाड़ों की गहरी काली छायाओं को देख रही है। कीकर की झाडि़यों की ओट में बनी मोहन की झोंपड़ी में अब तक चिराग जल रहा है। मसूरी उतनी ही खूबसूरत लग रही है। आसमान में बादल नहीं हैं। यह मोहन की झोंपड़ी में चिराग कैसे जल रहा है। मोहन शादीशुदा है? या कोई आया है ? रंगीन तो लगता है। जाने कोई कितनी दूर से आया होगा। क्या मौसम है, क्या अंधेरा है, और क्या जंगल है। फिर भी चिराग जल रहा है। आने वाले को जरा डर नहीं लगा। जरा डर…

छाया का हाथ मुंडेर पर रखे एक पत्थर पर छू गया है। उसने उसे हाथ में उठा लिया है और धीरे से नीचे छोड़ दिया है। पत्थर खाई में लुढ़कता जा रहा है। जाने-किस-किस चीज़ से टकराता, तेजी से, अनाश्वस्त भाव से, और अंधेरे के भार से दबी छाया खड़ी हुई उस पत्थर के सफर को महसूस कर रही है।
‘‘ओहो, कहीं कोई उस पगडण्डी से ऊपर न चढ़ रहा हो, वह धोबी-धोबिन या कोई बकरी या शैलेन।’’
‘‘मैं ऊपर आयी हूँ और वह कहीं नीचे उतर गया हो।’’
आशंका के बावजूद छाया धीरे-धीरे नीचे उतर रही है। दबे पांव कमरे में आयी है। चुपके से अपने बिस्तर से खिसक गई है। शैलेन्द्र सो रहा है। उसका दायें पैर का अंगूठा अब भी छाया के बिस्तर पर पड़ा है।
छाया को अच्छा महसूस नहीं हो रहा।

अगले दिन सुबह उठकर छाया ने घूमने चलने की बात चलाई।
‘‘कहीं चलें?’’
‘‘सहस्र-धारा चलो, या चलो मसूरी ही चलें।’’
शैलेन्द्र पल भर चुप रहा। बोला, ‘‘तुम्हें कष्ट नहीं होगा ?’’
‘‘नही ंतो’’
‘‘डॉक्टर कहता था, तुम्हें आराम करना चाहिए।’’
‘‘हां, कहता तो था। चलो रहने दो यहीं खिड़की के किनारे बैठेंगे। पूरी पिकनिक का मजा आता है। नीचे घाटी में देखना बहुत अच्छा लगता है। शैलेन्द्र, तुम्हें तो इस जगह बड़ा बोर लग रहा होगा?’’
‘‘नहीं तो, बोर क्यों लगेगा ?’’
‘‘अकेला, सुनसान जंगल!’’
‘‘अकेला कहां हंू, तुम जो हो।’’
‘‘मैं तुम्हारा मन कहां बहला पाती हंू।’’
शैलेन्द्र जाने क्या सोचता हुआ चुप हो रहा।
छाया कोच पर शैलेन्द्र के पास आकर बैठ गई। उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। पल भर को रखा। फिर वही हाथ अपनी गोद में रख लिया और बांह के घने काले बालों को अपनी सफेद कोमल उंगलियों से सहलाने लगी। सहलाती रही। फिर बोली, ‘‘शहर अच्छा होता है। मोटर, टांगे, साईकिल, पैदल, ऊंचे घरों और रेस्ट्रांओं को शोर। आदमी अकेला महसूस करते ही भीड़ में डूब सकता है। भीड़ उसे शांति नहीं देती पर इस तरह सूने-सूने रहने से वह कम भयानक है। मैं तुम्हारे साथ रहते हुए भी साथ नहीं हूँ । हम दोनों के बीच में यह न जाने क्या आ गया। मैं सोचती रही, चलो क्या है, कोई बात भी तो हो, परेशान होने की, सब ठीक हो जाएगा। पर तुम परेशान हो। मुझसे परेशान हो। मैं अकेली तुम्हें भीड़ भी लग रही हंू और तुम्हारा सूनापन भी दूर नहीं कर पा रही हूँ ।’’
शैलेन्द्र छाया की तरफ देखता रहा और चुप बैठा रहा।
‘‘तुम वापस चले जाओ, शैल।’’
‘‘नहीं, वापस नहीं जाऊंगा।’’
‘‘तुम किस कदर दुखी हो!’’
‘‘हूँ वापस नहीं आऊंगा।’’

छाया ने हाथ छोड़ दिया। उठ खड़ी हुई और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। उसकी साड़ी की सलवटें बहुत गहरी दीख रही हैं। आदत के अनुसार उसने पीठ पर से साड़ी को झटका नहीं है। शैलेन्द्र उसकी पीठ पर देख रहा है। उसे वे सलवटें बहुत ऊब दे रही हैं। छाया का फूला पेट उसे दिखाई नहीं दे रहा पर इन सलवटों में इतना फूहड़पन है कि उसे मितली आ रही है। पर वह बैठा है और पूरे जोर से बैठा रहना चाहता है। उठकर जाना उसे जैसे अपना अपमान लग रहा है। चुप रहना और भी घुटन दे रहा है।
‘‘वहां क्यों खड़ी हो गई ?’’
छाया ने पीछे मुड़कर देखा और हल्के-से मुसकुरा दी।
शैलेन्द्र को धुरधुरी-सी उठी। सारा शरीर एकदम कांटों से भर उठा। उसे लगा जैसे अभी उसे उल्टी हो जाएगी। उसने मुसकराते चेहरे पर से नजर हटा ली।
‘‘हंस क्यों रही हो?’’
छाया जोर से खिलखिकर हंस पड़ी।
शैलेन्द्र के शरीर में से रोमांच खत्म हो गया। वह धीरे से कोच पर से उठा और छाया के पास खिसकर आया।
‘‘डॉक्टर कहती थी, अब खास देर नहीं।’’
‘‘अच्छा ही तो है।’’
‘‘तुम्हारा इस तरह उछलना-कूदना ठीक नहीं है।’’
‘‘अच्छा जी, अच्छा।’’
शैलेन्द्र फिर छोटा होकर रह गया।
कई मिनट दोनों चुपचाप खड़े रहे। मोहन आकर इधर-उधर से कमरे को झाड़ने लगा। बाहर घाटी में खूब धूल फैल गई। सारे पेड़-पौधे पत्थर अभी तक भीगे हैं। धूप ने उन्हें उजला कर दिया। दोनों ने यह सब देखा। मोहन का निर्द्वन्द्व चेहरा देखा। अचानक छाया ने शैलेन्द्र की बांह में बांह डाल ली और उसे घसीटकर कोच पर बैठा दिया। मोहन से कहा, ‘‘मोहन, आज नाश्ता जल्दी ले आओ।’’
फिर शैलेन्द्र से कहा, ‘‘पूछो।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘जो तुम पूछना चाहते हो ?’’
शैलेन्द्र एकदम कुछ बोल नहीं सका। छाया भी चुप रही। मोहन नाश्ते का सामान लाकर रखने लगा।
कितनी ही देर बाद शैलेन्द्र ने कहा, ‘‘बच्चे का क्या करोगी?’’
‘‘तुम बताओ, क्या करूं ?’’
‘‘कुछ तो करना होगा।’’
‘‘हां।’’
‘‘यहां किसी आरफेनेज में दें देंगे।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘तो….?’’
दोनों चुप रहे। मोहन कॉफी ले आया था। बनाकर उसने एक-एक कप दोनों के सामने रख दिया और चला गया।
छाया ने कहा, ‘‘शैलेन्द्र, तुम मानते हो हमसे गलती हुई है, इसलिए इतनी दुविधा में हो।’’
‘‘नहीं हुई।’’
‘‘ना।’’
‘‘तो बच्चे को पास रखें।’’
‘‘रखना चाहिए था, पर उस हालत में तुम्हें भी पास रहना पड़ेगा। पर वह मैं नहीं चाहती। तुम मुझसे डरते हो, इसलिए उम्र भर डर-डरकर क्यों जिओगे। मैं चाहती हूँ शैलेन्द्र कि बच्चे को एकदम नष्ट कर दो।’’
शैलेन्द्र सिहर उठा। उसने विह्वल भाव से छाया को तरफ देखा।
छाया ने कॉफी का एक सिप लेकर कहा, ‘‘कुंआ-जंगल में छोड़ जाना, आरफेनेज, मुझे बड़े ‘क्रुएल’, बड़े ‘इनह्यूमन’ लगते हैं।’’
‘‘फिर ?’’
‘‘मेरा ख्याल है, हम उसकी अन्त्येष्टि करें, जला दें।’’
‘‘छाया!’’
छाया कॉफी पीती रही और सोचती रही। फिर बोली, ‘‘कुछ दुविधा, कोई डर बाकी नहीं बचेगा। नही तो आदमी जिंदगी भर कुत्ते, बिल्लियों के मुंह की हड्डियों को पहचानता फिरता है। यह कहीं ‘उसकी’ न हो। यह ‘उसकी’ न हो, यह…’’ शैलेन्द्र के सारे शरीर में आग-सी लग उठी। वह एकदम चुप बैठा रहा।
छाया ने घूँट घूँट भरके कॉफी खत्म की। मुंह में नाश्ते में से कुछ डाला। फिर मुंह चलाते-चलाते बोली, ‘‘कितना अमानवीय है कि एक आदमी उम्र भर यही सोचता रहे कि मेरी मां कौन है, बाप कौन है… तो ठीक रहा न शैल ?’’
शैलेन्द्र का शरीर कांपने लगा।
‘‘ऐसा करना, पहले मार देना, फिर सब गंदे रद्दी कपड़ों में रखकर जला देंगे।’’
‘‘ब्रूट, ऐनिमल।’’
छाया खिलखिलाकर हंस पड़ी। बोली, ‘‘तुम मुझसे डरते हो, तुम जानवर नहीं हो ?’’
‘‘तुमसे तो डरना ही चाहिए।’’
‘‘मैं अकेले यह सब नहीं कर सकंूगी शैल, तुम्हें कुछ दिन ठहरना ही पड़ेगा। और कॉफी नहीं पिओगे ?’’
पर शैलेन्द्र कॉफी नहीं पी सका। एक बिल्ली मुंह में चूहा दबाये कूदकर मेज पर से निकलते हुए खून की कुछ बुँदे कॉफी में टपका गई।
छाया पल को सहमी पर फिर हंसने लगी, ‘‘तुम जानवरों से बहुत डरते हो शैलेन्द्र। क्या बात है ?’’

शैलेन्द्र चकित रह गया है। वह जानता है कि छाया जो भी कहती है वही करती है। इसीलिए उसे बहुत डर है। वह छाया से और भी डरने लगा है। छाया कितनी खूबसूरत है। इन दिनों में उसने रह-रहकर उसे बहुत पास से बहुत ध्यान से देखा है। वह उसे अधिक से अधिक खूबसूरत लगी है। अब छाया विशेष इधर-उधर घूमती नहीं है। या तो दिनभर पलंग पर लेटी कोई किताब, पत्र-पत्रिका पढ़ती रहती है। या फिर शाम को खुली छत पर हल्के-हल्के कदम लेती हुई घूमती रहती है। धोती का पल्लू कटि-प्रदेश पर ही लपेट कसकर बांधकर और जम्फर को जरा ढीला छोड़, बाल खोलकर वह छत पर घूमती रहती है। पैरों में हल्की चप्पल। आवाज बिल्कुल नहीं। पूरी बांहें असम्पृकत, लटकी, झूलती हुई और अपनी अवस्था से पूर्णरूपेण निर्विकार। शैलेन्द्र घूमने नीचे घाटी में या उधर पहाड़ों पर निकल  जाता है। जाने कितनी-कितनी रात तक लौटता है। मोहन भी चला जाता है। उनकी झोपड़ी के बाहर रोज एक चिराग जलता है। कभी-कभी सोते-सोते छाया उस चिराग को देखने आती है, और पलंग पर लेटकर, सिरहाने की बत्ती जलाकर वह कोई किताब पढ़ने लगती है। शैलेन्द्र अब दूसरे कमरे में ही सोता है।
छाया ने मोहन से पूछा, ‘‘रात-भर तुम्हारी झोपड़ी का चिराग जलता रहता है।’’
मोहन ने छाया की तरफ देखा। हंसकर बोला, ‘‘आप…!’’
और चला गया।
छाया हल्के-से संकुचित हो गई। मोहन दोनों की मानसिक स्थिति को समझता है। शैलेन्द्र को घर चले जाना चाहिए। जाने क्यों वह अपने आपको यहां रोके है। उसे मुझसे सहानूभूति है। सहानूभूति क्यों है ? छाया ने मोहन को फिर बुलाया, कहा ‘‘मोहन, अच्छा एक टैक्सी तो बुला दो।’’
‘‘जी, अच्छा।’’
‘‘और सुनो, एक बात बताओ।’’
‘‘जी।’’
‘‘तुम हत्या कर सकते हो?’’
मेहन हंस पड़ा।
‘‘किसकी?’’
‘‘किसी की भी?’’
मेहन फिर हंस पड़ा। बोला, ‘‘शैलेन्द्र बाबू की?’’
पल भर के लिए छाया दमित रह गई।
फिर रुककर बोली, ‘‘हां, मान लो।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘वे आपसे बहुत लगाव रखते हैैं।’’
‘‘तूने कैसे जाना?’’
‘‘मुझे कहते थे।’’
‘‘क्या कहते थे कि मैं…’’
‘‘कहते थे, उनका ध्यान रखा कर, कहीं इधर-उधर जाएं, या छत पर अकेले घूमें तो साथ ही रहा कर, कहीं चोट-फोंट न लग जाए। वह आजकल जरा…’’
‘‘रुक क्यों गया?’’
‘‘कहते थे, वह आजकल जरा मुझसे नाराज है।’’
‘‘तू जा मोहन। टैक्सी रहने दे। एक कप कॉफी ले आ।’’
‘‘अच्छा।’’

छाया बाहर आकर लॉन में बैठ गई। उसे कुछ अजीब-सा महसूस हो रहा है। घास-फूस, फूल-पत्ती कुत्ता और झाड़ी के पार सड़क पर चलते लोग नजर में टिक नहीं रहे, तिरमिरा रहे हैं। कभी-कभी हल्की-सी एक तसवीर हिल जाती है तो लॉन में दो कुत्ते दिखने लगते हैं। यही अनुभूति उसके लिए नई है। उसका कारण उसके लिए अस्पष्ट है। क्या उसकी नजरें खराब हो चुकी हैं, या मन बहुत खराब है? शैलेन्द्र से काफी प्रेम किया है। वह धारणा अब टूट गई है। क्यों टूट गई है? कोई जरूरी है कि कोई उसी तरह सोचे जैसे वह सोचती है। उसका निर्णय निर्मम नहीं है? और निर्णय हो ही नहीं सकता। कम से कम इससे कम निर्मम कुछ भी नहीं है। हम फैसले से डरते क्यों हैं? उसे नजरों से बचाकर अपने आपको ‘ग्लोरिफाइड’ क्यों महसूस करते हैं ? निकम्मे, नपुन्सक! ईश्वर के भरोसे छोड़ा। क्यों किसी को किसी के भरोसे छोड़ा। नहीं, ऐसे ही करना होगा।
…यही उचित है, यही सबसे अधिक मानवीय है।
शैलेन्द्र आकर पास खड़ा हो गया।
मेहन ने कुर्सी लाकर रख दी।
शैलेन्द्र बैठ गया।
बहुत देर दोनों चुप बैठे रहे।
आखिर छाया ही बोली, ‘‘कहां गए थे शैलेन्द्र?’’
‘‘डाक्टर की तरफ।’’
‘‘क्या कहती है?’’
‘‘इसी हफ्ते में सब निपट जाएगा।’’
छाया ने सुना और ध्यान से शैलेन्द्र को देखा।
‘‘तो बच्चे के बारे में तो वही फैसला रहा न?’’
‘‘हां… मैं जानता हंू, तुम बदलोगी नहीं।’’
‘‘ऐसा नहीं है, पर कुछ सुझाओ शैल। तुम मेरे पास रह सकते तो मैं उसे लेकर ही पहुंचती। पर उसे मैं किसी के भरोसे छोड़ना नहीं चाहती, वह चाहे जानवर हो, या आदमी हो, या भगवान हो।’’
‘‘तो… यही अंतिम…
‘‘हां।’’
‘‘अच्छा, मैं चाहता था चला जाऊं। पर एक हफ्ते की तो बात है। फिर…।’’
‘‘फिर तुम चले जाना। मैं तो एक महीना बाद जाऊंगी।’’
‘‘हां, तुम्हें तो रहना चाहिए।’’

छाया अब रसोई में बहुत जाने लगी है। रसोई कोठी के एकदम कोने में है। पूरे कारीडोर को पार करके जाना होता है। छाया काफी टाइम खाना बनाने में लगाने लगी है। मोहन को साथ लेकर वह तरह-तरह के खाने बनाती और उन्हें खूब स्वाद से बैठकर खाती है। शैलेन्द्र होता तो बार-बार उससे उस खाने का प्रशंसा कराती। फिर शैलेन्द्र को वहीं छोड़कर दोबारा रसोई में चली जाती और कुछ ही देर में एक और खाने की चीज बनाकर ले आती और पूरे आयोजन से उसे खाना शुरू कर देती।

शैलेन्द्र इस सब आयोजन में थोड़ा हल्का हो आता। पर कुछ पल पश्चात् ही उसे भय लगने लगता। पहले दिन का छाया का स्वरूप याद हो आता। वह नीचे घाटी में था। आधी ही गहराई में। कोठी की छत वहां से साफ ही दिखाई दे रही थी। पगडण्डी पर एक पल को खड़े होकर उसने ऊपर आकाश में और छतों पर सुनहरा प्रकाश छाया था। छाया छत पर खड़ी थी। उसने धोती को पेटीकोट की तरह बांध रखा है। खाली कोटी पहन रखी है। बाल एकदम खुले हैं, बल्कि बिखरे हैं। उसने दोनों हाथ ऊपर कर रख हैं। उसके गोरे चेहरे पर सुनहरी धूप पड़कर चेहरे को प्रकाशमान कर रही है।
पता नहीं क्यों, शैलेन्द्र, एकदम सुन्न रह गया था। भयताडि़त।
छाया सामने बैठी है। अचानक शैलेन्द्र के मंुह से निकल गया, ‘‘छाया, पहले का जमाना भी खूब था।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘वह जो जादूगरिनयां होती थीं न…’’
‘‘हंू।’’
‘‘उन्हें जिंदा जला देते थे।’’
छाया खिलखिलाकर हंस पड़ी। बोली, ‘‘मैं जादूगरनी हंू। मुझे…।’’
‘‘नहीं, वह नहीं, मैं तो….।’’
‘‘यह खाओ शैल, देखो क्या चीज है।’’
दोनों फिर खाने में लग गए। कोई चार बजे होंगे। आज आसमान में बादल नहीं है। गहरी उमस में, शरीर की नसों में, एक खास किस्म का तनाव रहता है। वह अच्छा भी लगता है, बुरा भी। दिमाग की धुंध नशे का मजा देती है। चारों तरफ की चीजें या तो खूबसूरत दिखाई देती हैं या बदसूरत।
छाया और शैलेन्द्र दोनों बैठे अलग-अलग तरह की चीजें खा रहे हैं।
‘‘तुमने कभी गरीबी महसूस की है छाया।’’
‘‘हां, देखी है। भय का दूसरा नाम गरीबी है। मैं उससे बहुत नफरत करती हंू।’’
शैलेन्द्र से जवाब नहीं बन पड़ा।
‘‘चलो, तुम्हें एक तमाशा दिखऊं।’’
शैलेन्द्र ने उसकी तरफ देखा।
‘‘उठो।’’
छाया शैलेन्द्र को उठाकर रसोई में ले गई।
रसोई मंे मोहन काम कर रहा है। जो बनना था बन चुका है। बर्तन-भांडे़ निपटाये जा रहे हैं।
रसोई के एक कोने में टैप है और उसके ठीक नीचे टैप के पीछे से आकर चींटियों की एक कतार धीरे-धीरे बढ़ी चली जा रही है। छाया पल को रुकी फिर उसने अचानक ही टैंप खोल दिया।
पानी की एक धारा बही।
सैकड़ों चीटिंयां अनिच्छा से बह गई।
छाया ने टैप बंद कर दिया।
शैलेन्द्र की तरफ देखकर बोली, ‘‘कैसा रहा खेल?’’
‘‘अच्छा।’’
‘‘कल तुम तो थे नहीं, मैं सारा दिन यही खेल खेलती रही।’’
‘‘अच्छा किया।’’
‘‘चीटियां झिझकती हैं, घबराती हैं, कांपती है फिर डूब जाती हैं।’’
शैलेन्द्र चुप रहा और रसोई से बाहर निकल कमरे में आ कपड़े बदल नीचे घाटी में घूमने निकल गया।

लाल-लाल बादलों के गाले आसमान में छाए हैं। शैलेन्द्र कोठी में कम ही रहता है। इस समय भी नहीं हैं। नीचे घाटी में खड़ा बादलों के लाल कतलों को देख रहा है। छाया को दर्द शुरू हो गया है। वह चुपचाप अपने पलंग पर लेटी है। वही वैजंती रंग की साड़ी। छाती तक सिल्कन चादर और चेहरे पर विकृति। छाया चाहती है कि किसी को खबर न दे। पर यह दर्द उसे घबरा रहा है। वह चारों तरफ देख रही है। बहुत देर से उठा नहीं जा रहा है। वह खिड़की पर जाकर नीचे घाटी में शैलेन्द्र को देखना चाहती है।
मोहन भी घर में नहीं है शायद।
घाटी में शैलेन्द्र नीचे उतरा जा रहा है।
आसमान की गोट पर लाल रंग के धब्बे कुछ काले, कुछ कत्थई होते जा रहे हैं।
हवा बंद है। गर्मी ने तमाम दिन दिमाग को पिघलाए रखा है।
वह खड़ी, सुनसान कोठी इस समय एक ऐसे बड़े अस्पताल जैसी लग रही है, जिसमें सिर्फ एक मरता हुआ मरीज हो, न डॉक्टर हो, न नर्स, न कोई सगा-संबंधी।
छाया का दर्द बढ़ता जा रहा है।
वह उठती है। कारीडोर तक जाती है। मोहन को आवाज देती है। मोहन नहीं है। सामने लॉन में कुत्ता खेल रहा है। एक कुर्सी पड़ी है, सामने की झाडि़यां पार कर सड़क  पर से आदमियों का एक लम्बा काफिला गुजर रहा है। छाया कुत्ते को पास बुलाने की कोशिश कर रही है। शाम को कुत्ता घास पर खेलना बहुत पसंद करता है।
समय बीतता जा रहा है।
आसमान पर खून के धब्बे काले पड़ गए हैं।
घाटी में से जानवरों की आवाजें आने लगी हैं।
छाया कारीडोर में एक कुर्सी पर कराहती हुई बैठी है।
चरों तरफ पीला अंधेरा है।
घास के तिनके अंधेरे में उड़ते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं, सिर्फ आवाजें सुनाई दे रही हैं।
घाटी में मोर, गीदड़, झींगुर, मेंढ़क और गिरगिट बोल रहे हैं।
छाया की दबी कराह कोठी में गंूज रही है।
खट्-खट्, खट्-खट् कोई कोठी में धुस रहा है।
वक्त कभी बहुत तेजी से और कभी बहुत धीमे-धीमे बीत रहा है।
छाया चीख-चीख उठ रही है।
घाटी में से डालियों के एक-दूसरे से टकराने की आवाजें आ रही हैं।
झरने के बहने की घुटी-घुटी आवाजें आ रही हैं।

कोई मोहन को पुकार रहा है।
जानवरों की आवाजों में बहुत-सी आवाजें डूब रही हैं।
शैलेन्द्र छत की मुंडेर पर बैठा है।
उसने आंखे मंूद रखी हैं। चारों तरफ की आवाजें सुन रहा है। छाया के चीखने की आवाज से वह सिहर-सिहर उठ रहा है।
चारों तरफ घनघोर अंधेरा है।
शैलेन्द्र के भीतर कोई हूक देकर रो रहा है।
आवाज दसों दिशाओं में फैल रही है।
कोई रो रहा है।
शैलेन्द्र के भीतर कोई रो रहा है।
कौन रो रहा है। इतनी रात गए, इतने अंधेरे में, सुनसान में कौन, रो रहा है।
मोहन पास आकर खड़ा है।
‘‘चलिए, नीचे डॉक्टर आपको बुलाती हंू।’’
‘‘क्या हुआ?’’
‘‘छाया ठीक है?’’
‘‘चलो।’’
वक्त गुजर रहा है।

वक्त क्यों गुजर रहा है? कोई आवाज चलते वक्त को रोक नहीं पाती। एक आवाज हवा में गंूज रही है। रोने की आवाज में खुशी है। कोठी से उतरकर आवाज घाटी में उछलती-कूदती जा रही है। झरना क्या रुक गया है? झरना कब रुक सकता है? ढलान क्या नहीं रहेगा ? ‘‘सुनो छाया, तुम ठीक हो तो मैं घूम आऊं?’’ ‘‘मैं ठीक हूँ।’’ छाया क्यों ठीक है, वह हमेशा क्यों ठीक रह सकती है? वह यहां न रहे या वह नहीं ही रही रहे तो ठीक होगा…. प्यारा बच्चा है ? हां, वह तो है। है तो सही। शैलेन्द्र घाटी में एक बेल के नीचे बैठा है। बेल का चढ़ना देखना उसे अच्छा लग रहा है। बेल चढ़ रही है। शैलेन्द्र को हंसी आ रही है।
धोबी और धोबिन कपड़े धो रहे हैं।
शैलेन्द्र एक पत्थर पर बैठा मैले पानी की बूंदों  को अपने ऊपर सहन कर रहा है।
पानी पर एक छोटी सी नाव तैर रही है। उस पर कुछ बैठा है। कुछ छोटा सा।
छाया अपने पलंग पर चित्त लेटी है।
उसके पास बच्चा नहीं है। मोहन उसे रसाई में ले गया है।
छाया के पास एक छोटी सी शीशी है, स्टूल पर। एक सुराही है। सिरहाने। एक शीशे का गिलास है। पलंग के नीचे। छाया को प्यास लगी है। उसका सिर तकिये से हटकर टिका है। उसके होंठों पर पपड़ी जमी है। उसे प्यास लगी है।
‘‘मोहन, ओ मोहन!’’
मेहन सुन नहीं पा रहा है। बच्चा रो रहा है।

छाया कुछ देर आंखें मूंदे  लेटी रहती है। वह आंखें खोलती है। उसके पैरों के पास चादर नहीं है। वह अपने बदन को एक करवट देकर नीचे की चादर का आधा हिस्सा मोड़ लेती है। फिर तेजी से दूसरी तरफ करवट लेती है। दूसरा हिस्सा भी स्वतंत्र हो जाता है। वही चादर वह ओढ़ लेती है। सिर तक ओढ़ लेती है। सपाट बहुत देर तक पड़ी रहती है। उसका दम घुट रहा है। चादर से छनकर रोशनी उस तक पहुंच रही है। छाया को डर लग रहा है। वह आंखें खोल लेती है और चादर को उलट देती है। डर लगता है। गहरी शिथिलता है। वो प्यास से मरी जा रही है।
‘‘मोहन, ओ मोहन’’
मेहन नहीं सुन पा रहा। बच्चा रो रहा है।
पनी उसे खुद ही पीना पड़ेगा।
बच्चा रो रहा है।
वह झुककर गिलास उठाती है। उठकर सुराही से पानी उंडेलती है। सुराही से पानी के गिरने की आवाज तैरती हुई नीचे घाटी में चली गई है। छाया गिलास मुंह तक ले जाती है। खाली पानी कड़वा होता है।
दो गोलियां सटकने के लिए सिर्फ दो घूंट पानी पीती है। और वह नहीं पीती। प्यास से उसका दम निकला जा रहा है।
वह लेट जाती है।
‘‘मोहन, ओ मोहन।’’
मोहन सुन नहीं पा रहा है…. बच्चा रो रहा है।
हवा में रेत रमय होती है। तेज धूप में वह खूब चमकाती है। तेज धूप पड़ रही है। ऊपर छत पर से सारा देहरादून दीखता है। छत पर पानी छिड़क दिया गया है। एक कोने में छाया एक मूढ़े पर बैठी है। छत के चारों तरफ मुंडेर है। मुंडेर पर काफी मोटी काई जमी है। काई का रंग काला और हरा है।

छाया मूढे में बैठी है। उसने अपनी दोनों बांहें मूढ़े की बांहों पर टिका रखी हैं। छाया कमजोर हो गई है। इस समय उसका रंग गहरा पीला है। उसका शिथिल बदन सरकण्डों पर भारी बोझ की तरह पड़ा है।
आसमान में सूरज चमक रहा है। गर्म और उत्तेजित। सुबह बारिश बरसी है। सूरज नाराज है, दुखी है। तमाम घाटी के पेड़, पौधों, पत्थरों पर का सुबह का पानी सुन्त गया है। वह फिर प्यासे दीखने लगे हैं।
छाया के पैरों में पानी का एक गिलास रखा है।
‘‘मोहन, ओ मोहन।’’
मेहन सीढि़यां चढ़ रहा है।
पस आकर खड़ा हो जाता है।
‘‘उसे वह पिला दिया है।’’
मोहन शायद ‘हूँ ’ कहता है।
‘‘शैलेन्द कहां है ?
मोहन फिर कहता है, ‘‘हैं नहीं।’’
‘‘नपुंसक!’’
मोहन फिर कहता है, ‘‘पत्ता-पत्ता कांप रहा है।’’
‘‘नहीं मोहन, नहीं। मैं नपुंसक के पुत्र को नहीं बचा सकती। तुम उसे ले आओ।
मोहन चुप है।
‘‘मेरी…. वह शीशी और पानी भी।’’
मोहन चला जाता है।
छाया उठकर खड़ी हो जाती है। उसकी टांगे अभी कांपती हैं। चार ही दिन तो हुए हुए है। ब्लीडिंग अभी खूब हो रही है। आए आधा घंटे बाद कपड़े बदलने पड़ते हैं। छाया को वह सब घिनौना लता है। जुगुप्सा होती है। और औरतें जाने कैसे करती हैं। बड़ा घृणित है।
सभी कुछ घृणित है।
शैलेन्द्र नीचे घाटी में होगा। उस पर जाने क्या दबाव है कि नीचे घाटी में उतर जाता है। वह वहां बैठा होगा। नपुंसक ।
मेरा पुत्र नपुंसक का पुत्र है।
मैं उसे नष्ट कर दूंगी…
भागा फिरता है।

झुकने से छाया को तकलीफ होती है। वह फिर आकर कुर्सी पर बैठ जाती है। नीचे से उठाकर दो घूँट पानी पीती है। फिर बैठकर इंतजार करने लगती है। मोहन का, बच्चे का, अपनी दवा की शीशी का, पानी का।
उसके कान में कोई फुसफुसा रहा है, ‘तुमने नपुसंक के पुत्र को पैदा किया।’’
‘तुम नपुंसक की पत्नी हो।’
‘तुम नपुंसक के बेटे की मां हो।’
‘तुम्हारे शरीर से आज एक नपुंसक के कारण खून बह रहा है। तुम भी… चारों तरफ सब शांत है। मोहन की सीढि़यों पर चढ़ने की आवाज आ रही है। वह दबे पांव आ रहा है। छाया अपने मूढ़े में सतर्क हो गई है।
‘‘सो रहा है ?’’
‘‘हां।’’
‘‘वहां रख दो।’’
‘‘…’’
‘‘मेरी गोलियां नहीं लाएं?’’
‘‘…’’
‘‘उसे रख दो, पहले लेकर आओ, और सुनो, माचिस। वह सब कपड़े भी जो इससे सबंधित है।
मोहन दवे पांव नीचे चला गया है।

छाया को मोहन का यह दबे पांव चलना अच्छा नहीं लगता है। कोई चोरी कर रहे हैं? मैंने इसे पैदा किया है। नष्ट सिर्फ इसलिए कर रही हूँ कि स्वीकार नहीं कर सकती। फिर यह मोहन दवे पांव क्यों चल रहा है ? कहीं यह शैलेन्द्र को बुलाने तो नहीं गया? गया होगा। शैलेन्द्र आ जाए तो अच्छा है। पर जिसके रोंगेटे ही खड़े नहीं होते, उसे क्या…।
‘‘मोहन, ओ मोहन…’’
मोहन आ गया है और सब कुछ ले आया है।
‘‘मोहन देखना, घाटी में से कोई आ तो नहीं रहा ? आ रहा हो तो जरा आवाज देकर कहो कि जल्दी आए। कहीं उसके आने से पहले सब निपट न जाए।’’
मोहन घाटी की तरफ जाकर खड़ा हो जाता है।
‘‘नीचे का गेट बंद कर आए हो ना?’’
‘‘हां।’’
‘‘सुनो, नीचे जाकर डॉक्टर से कहो कि अब उसकी जरूरत नहीं हैं’’
‘‘…’’
‘जाओ..’
मोहन फिर दवे पांव नीचे जा रहा है।
छत के बीेचोबीच कपड़ों के एक ढेर पर बच्चा लेटा है…. वह सो रहा है। एक कोने में मूढे पऱ छाया बैठी है। उसने अभी-अभी शीशी में से निकालकर चार गोलियां एक साथ खाई हैं।
छाया उठती है और फिर छत के बीचोबीच आकर खड़ी हो गई है।
बच्चे के चारों तरफ के कपड़ों को संगवाती है।
बच्चे के कमीज का बटन बंद करती है। माथे पर लगे एक दाग को पोंछ देती है। छाया को कुछ नींद-सी आ रही है।
कोई दवे पांव आ रहा है।
मोहन है।
छाया फुर्ती से हट मूढ़े पर आ जाती है। खून से लथपथ एक कपड़ा अचानक उसकी धोती में से चू पड़ता है।
छाया उस कपड़े को देखकर डर रही है।
‘‘मोहन, तुम दबे पांव क्यों चलते हो?’’
‘‘मैं फोन कर आया।’’
‘‘मैं, मोहन, बच्चे तक इसलिए गई थी कि ये सूखे कपड़े…. मोहन एक बोतल मिट्टी का तेल ले आओ। और इस तरह दबे पांव न चलो। तुम्हारे चलने फिरने की खूब आवाज आनी चाहिए। हम कोई चोरी नहीं कर रहे हैं। अपना घर जला रहे हैं। इसलिए कि…. तुम जाओ, तेल लाओ।’’
मेहन फिर दवे पांव नीचे आता है।
छाया उठती है। खून से सने कपड़े को हाथ से उठाकर कपड़ों के ढेर के नीचे दबा देती है। पानी का एक गिलास पीती है। खाली पानी कड़वा होता है। इसलिए दो गोलियां और सटक जाती है।
डसकी पलकें झुकी जा रही हैं।
वह घाटी में देखती है।
पेड़ ही पेड़, पौधे ही पौधे, झरने ही झरने, पत्थर ही पत्थर और शैलेन्द्र ही शैलेन्द्र ! पर सब घाटी में उतरते हुए !… छाया निशिचंत भाव से फिर आकर मूढ़े पर बैठ जाती है।

कपड़ों के ढेर पर अब उसे कोई दिखाई नहीं दे रहा है। सिर्फ खून से लथपथ कपड़े दिखाई दे रहे हैं।
घाटी में शैलेन्द्र एक पत्थर पर चुपचाप बैठा है। बायीं तरफ की सड़क पर एक कटे-फटे लोगों का काफिला जा रहा है। लॉन में कुत्ता अकेला खेल रहा है। छत के एक कोने में मोहन घुटनों में सिर दिए बैठा है। कपड़ों के ढेर पर बच्चा लेटा है। सो रहा है। दोनों घुटने मुड़े हैं। मुंह छाया की तरफ है। एक हाथ सीधा खड़ा है। एक में कुछ करेव है। छाया अपने मूढ़े में बैठी है। उसने दो गोलियां और खा ली हैं। उसकी पलकें झुकी जा रही हैं। उसके हाथों में दियासलाई है। वह तीली जलाती है। लौ से डरती है और दूर फेंक देती है। दियासलाई खाली हुई जा रही है। छाया की पलकें झुकी जा रही है।
डसे गहरी नीं आ रही है।
सूरज ठण्डा है, बर्फ की तरह।
सब शांत है।


शैलेन्द्र नीचे घाटी में झरने के किनारे बैठा है और कोठी की तरफ देख रहा है। इतने नीचे से वह इतनी बड़ी कोठी एक पिंक रंग की गुडि़यां-सी लग रही है। बीच में कितने ही पेड़-पौधे आ रहे हैं। आदमी-जानवर आ रहे हैं। पर कोठी साफ दीख रही है।
शाम आने वाली है।
कोई रो रहा है।
शैलेन्द्र के खूब भीतर कोई रो रहा है।
डसका सारा शरीर एकदम शिथिल है।
चारों तरफ जाने कैसी बदबू फैल रही है।
…रो रहा है।
बदबू से आसमान ढंक गया है।
अंधेरा छाने लगा है।
शैलेन्द्र वहीं लेट गया है।
कोठी की छत पर कोई आया है। उसने पोटली भर राख हवा में बिखेर दी है।
अब सब चुप है, सब सुनसान है।
शैलेन्द्र लेटा है।
रात का जाने कौन-सा पहर है। छाया की नींद टूटी है। मोहन पास खड़ा है। उसके हाथ में खाली दियासलाई है।
‘‘उठिए। हवा में ठण्ड बढ़ गई है।’’
‘‘क्या हुआ?’’
‘‘सब समाप्त हो गया ।’’
‘‘बाबू नहीं आए।’’
छाया निढ़ाल हो गई है। उसके मुंह से कोई शब्द नहीं निकलता।
‘‘तुम जा रहे हो, शैल।’’
‘‘हां।’’
‘‘जाओ, मिलना।’’
‘‘अच्छा।’’
बाहर टैक्सी खड़ी है। शैलेन्द्र आज वापस जा रहा है। छाया अभी महीना भर ठहरेगी। एक नर्स उसने अपनी देखभाल के लिए तयकर ली है।
‘‘ठीक हो गया न शैल ?’’
शैलेन्द्र चुप है
‘‘तुम्हें मैंने सब भयों से बचा दिया।’’
शैलेन्द्र की आंखें खुश्क हैं।
‘‘तुम कुछ सोच रहे हो शायद।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘अच्छा, जाओ।’’
शैलेन्द्र टैक्सी में बैठ गया है।
‘‘तुम मन पर मैल क्यों लाते हो शैल, जो किया है मैंने किया है।’’
शैलेन्द्र पलभर को छाया को देखता है और नजरें झुका लेता है। टैक्सी चल देती है।
शैलेन्द्र चला गया।
छाया बुदबुदा रही है।
‘‘न स्वीकार… न हत्या!’’
मोहन रसोई में कुछ बना रहा है।

लॉन में पड़ी एक कुर्सी पर कुत्ता बैठा है। कारीडोर एकदम खाली पड़ा है। कोठी की सफेद दीवारों पर पीली रोशनी पड़ रही है। छाया छत की मुंडेर पर बैठी है झरने के पास बकरियां हैं, धोबी है, धोबिन है। एक तख्ता है, थोड़ी रेती है। और कपड़े पटक-पटककर साफ कर रहे हैं।
छाया ने अपनी छातियां में दूध निकालने की बोतल लगा रखी है। बोतल भर जाती है तो छाया उसे घाटी में उंडेल देती है।
हवा में कुछ राख के टुकड़े उड़ रहे हैं।
हवा में कुछ दूध के कतरे फैल जाते हैं।

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मृत्युशैया पर एक स्त्री का बयान

डॉ. आरती  

संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com



मृत्युशैया पर एक स्त्री का बयान


1.
सभी लोग जा चुके हैं
अपना अपना हिस्सा लेकर
फिर भी
इस महायुद्ध में कोई भी संतुष्ट नहीं है
ओ देव! बस तुम्हारा हिस्सा शेष है
तीन पग देह
तीन पग आत्मा
मैं तुम्हारा आवाहन करती हूँ

2.
ओ देव अब आओ
निसंकोच
किसी भी रंग की चादर ओढ़े
किसी भी वाहन पर सवार हो
मुझे आलिंगन में भींच लो
अब मैं अपनी तमाम छायाओं से मुँह फेर
निद्वंन्द हो चुकी हूँ

3.
धरती की गोद सिमटती जा रही
मैं किसी अतल लोक की ओर फिसलती जा रही हूँ
प्रियतम का घर
दोनों हाथ खालीकर
बचे खुचे प्रेम की एक मुट्ठी भर
लो पकड़ लो कसकर हाथ मेरा
जल्दी ले चलो अब कहीं भी
हाँ मुझे स्वर्ग के देवताओं के जिक्र से भी घृणा है

4.
अब कैसा शोक
कैसा अफसोस
कैसे आँसू
यह देह और आत्मा भी
आहुतियों का ढेर मात्र थी
एक तुम्हारे नाम की भी
स्वाहा!!

5.
ओह पहली बार, अप्रतिम सुख का साक्षात्कार
चिरमुंदी आँखों का मौन सुख
सभी मेरे आसपास हैं
सभी वापस कर रहे हैं
मेरी आहुतियाँ
अब तक की यादें
आँसू
वेदना
ग्लानि
बूँद बूँद स्तनपान

6.
अधूरी इच्छाओं की गागरें
हर कोने में अभी भी रखी हैं
सर उठातीं जब भी वे
एक एक मुट्ठी मिट्टी डालती रही
बाकायदा ढंकी मुंदी रहीं
उसी तरह जैसे चेहरे की झुर्रियाँ और मुस्कानें
आहों आँसुओं और सिसकियों पर भी रंग रोगन
आज सब मिलकर खाली कर रहे हैं
अंजुरी भर भर
आत्माएँ गिद्धों की मुर्दे के पास बैठते ही दिव्य हो गईं

7.
मेरी इच्छाओं का दान चल रहा है
वे पलों-क्षणों को भी वापस कर रहे हैं
तिल चावल
जौं घी दूध
सब वापस
सब स्वाहा
उनकी किताबों में यही लिखा है
यह समय मेरा नहीं है फिर भी
यह समय मेरा नहीं है
फिर भी मैं समय में हूँ
यह समय कुछ खास किस्म के बुद्धिजीवियों
का समय घोषित हो चुका है
फिलहाल छोटे से छोटा विश्लेषण जारी है
दरो-दीवारों के किसी भी कोने में लगे
मकड़ी के जालों पर भी शोधकार्य हो सकता है
बशर्ते मकडिय़ों की मौत की साजि़शों का जिक्र न आये
नाटक अभी भी जारी है
मंच पर मेरे प्रवेश का समय वह था जब
चारों ओर घुप्प अंधेरा
बेफिक्री से गहरी नींद फरमा रहा था
कुछ देर बाद थोड़ा-सा अँधेरा छँटा
एक हलके प्रकाशपुंज का प्रवेश हुआ कि
दबी घुटी एक चीख सुनाई पड़ी
प्रकाश गोलाकार वृत्त से होता हुआ समूचे मंच पर फैलने लगा
और चीखें भी
प्रकाश की आँख मिचौनी, फैलना-सिकुडऩा
वैसे तो तकनीकी कौशल का नमूना था
कुछ उंगलियाँ हरकतें करतीं और
अँधेरा उजाले में और
उजाला अँधेरे में कायांतरित हो जाता
इन दिनों इन कौशलों का विधिवत प्रशिक्षण दिया जाता है
तकनीक परदा उठाने-गिराने की जहमत से मुक्ति दिलाती है
फिर भी चीखें गले से ही निकलकर आ रही थीं
भरपूर साहस के बाद ही संभव हो पाता है
इस प्रकार चीख सकना
तरह तरह के बनते बिगड़ते चेहरे
मेरी आँखों के सामने से आ जा रहे थे
एक बदहवास लडक़ी चीख में सनी हँसी हँसती
दाएं अँधेरे कोने में जाकर गुम हो गई
कुछ औरतें
नकाब ढंके भयाक्रांत चेहरे
ऊपर की ओर हाथ फैलाए
चीख में लिपटी रुलाई रो रही थीं
थके हारे, बीमार से पुरुषों का एक दल
कोई अदृश्य रस्सी उन्हें खींचे जा रही थी
थामे हुए हाथ कहीं नजर न आ रहे थे
दृश्य निरंतर बदल रहे हैं
एक के बाद एक आ-जा रहे थे
कभी सडक़ तो कभी अस्पताल
कभी चौराहा तो कभी संसद भवन
स्कूल दफ्तर रसोई छत बरामदा
न्यायालयों के भीड़ भरे परिसर
नगरपालिका के नल के आगे लगे पीले डिब्बों की कतारें
सुपर बाजार

खेत खदान
फैक्ट्री मकान
अनगिनत जर्जर बूढ़े बीमार
टूटी चप्पलें हाथ में लिए चीख रहे थे
शायद पुकार रहे थे…
मेरे हाथों में एक डायरी थी अभी
वहाँ आखिरी पृष्ठ पर मेरे देश के साथ ही
तमाम देशों के नक्शे उकेरे थे
मैं वहीं कहीं उंगली रखने के लिए
कोई सुरक्षित जगह ढूँढऩे लगी
हर जगह रक्त के लाल-काले धब्बे दिखे
भयावह चीखों से भरी दास्तानें मिलीं
कर्ण की तरह भी नहीं मिली मुझे सुईभर सुरक्षित जमीन
इतनी चीखों सिसकियों और भयंकर अट्टहासों के बीच भी
ऐसा लग रहा है कि सब बहरे हो गए हैं
किसी के चेहरे पर बेचैनी और आक्रोश का कोई चिन्ह दिखाई नहीं दे रहा
अब तक की दबी घुटी चीखों का समवेत स्वर
मंच पर यूँ उभरा कि
वे संगीत की तरह ही कानों को सहन होने लगे
मंच के सामने पहली पंक्ति में बैठे लोग टेबिलों पर
और बाकी के अपनी जंघाओं पर
तीन तीन थापें दे रहे थे
यह तो पहला दृश्य था
दूसरा दृश्य- दर्शकों का एक दल चीखता हुआ दीर्घा के बाहर निकल गया
और दूसरा मंच की समवेत चीखों में शामिल हो गया
अब आप भी बताएं यह नाटक का सुखांत है या दुखांत
वैसे नाटक अभी जारी है

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वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजने की मुहीम: एसएफआई और कई संगठनों ने देश भर में आयोजित किया कैम्पेन

क्वीलिन  काकोती

आधी आबादी महिलाओं की है, लेकिन उन्हें अपने छोटे से हक के लिए भी पुरुष तंत्र से लड़ना पड़ता है. इस देश में महिलाओं के स्वास्थ्य से ज्यादा उनका कथित सुहाग, श्रृंगार जरूरी है. सरकार ने जहां सिन्दूर और पूजा पाठ की चीजों को टैक्स फ्री रखा है वहीं महिला-स्वास्थ्य से जुड़े सेनेटरी नैपकिन पर 12% का लक्जरी टैक्स लगाया गया है.

28 मई को माहवारी-स्वच्छता दिवस मनाया जाता है. लगभग तब से ही सरकार की मंत्री मेनका गांधी, कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव आदि ने वित्तमंत्री से अनुरोध किया है कि सेनेटरी नैपकिन पर जीएसटी नहीं लगाया जाये, लेकिन 1 जुलाई से जब जीएसटी लागू की गई तो इन अनुरोधों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. 1 जुलाई को जीएसटी लागू होने के बाद इस टैक्स के खिलाफ स्त्रीकाल में प्रकाशित एक खबर में महिलाओं ने प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजकर इसका विरोध जाताने की योजना बताई थी. इसके बाद देश के पश्चिमी हिस्से में वर्धा से, जो गांधी जी की कर्मभूमि रही है, कुछ छात्राओं ने 7 जुलाई को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली को सेनेटरी पैड भेजकर अपना विरोध जताया. वर्धा में संचालित युवा नामक संगठन की वनश्री वनकर ने न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली को सेनेटरी पैड भेजा बल्कि इस आशय का वीडियो जारी  कर अपील की कि देश भर से सेनेटरी पैड इन्हें भेजा जाये.

देखें वीडियो: देश भर से लड़कियों का अभियान

10 जुलाई को  दिल्ली विश्ववविद्यालय की राजनीति विज्ञान की छात्रा और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफआई) की सदस्य अनुराधा कुमारी ने इसे एक व्यवस्थित मुहीम की शक्ल देते हुए अपील जारी की कि ‘ब्लीड विदाउट फीअर, ब्लीड विदाउट टैक्स’ हैश टैग के साथ देश भर से वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड भेजकर टैक्स वापस लेने का दवाब बनाया जाना चाहिए.’

एसएफआई की विभिन्न शाखाओं ने इस मुहीम में 12 जुलाई को देश भर में हिस्सा लिया और उन्होंने स्कूल/ कॉलेज में फ्री सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की मांग करते हुए उसपर से 12% जीएसटी हटाने की मांग की.
तिरुवनंतपुरम में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफआई) के 300 से भी अधिक विद्यार्थियों ने सेनेटरी पैड पर ‘ब्लीड विदाउट फीअर ब्लीड विदाउट टैक्स’ लिखकर अरुण जेटली के ऑफिस में भेजा. एसएफआई और आल इंडिया डेमोक्रेटिक असोसिएशन (आयडवा) ने दिल्ली विश्ववविद्यालय में इसी प्रोटेस्ट को का आयोजन किया तो 12 जुलाई को ही एसएफआई की आसाम यूनिट ने गुवाहाटी के दिघली पुखुरी में ऐसा ही प्रोटेस्ट किया. आसाम से एसएफआई की स्टेट ज्वाइंट सेक्रेटरी संगीता दास ने कहा ‘सेनेटरी नैपकिन  इस्तेमाल करने से बीमारियाँ नहीं होती हैं. इसपर टैक्स लगाने से महिलाओं को एक स्वस्थ जीवन जीने से वंचित किया जा रहा है.’ संगीता ने कहा कि आसाम में गर्मी की छुट्टी खत्म होते ही मुहीम को और तेज करेंगे. अगस्त के पहले सप्ताह से शुरू होकर 17 अगस्त तक यह मुहीम चलेगी.’ कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के विद्यार्थी एवं महिला संगठनों ने ऐसे आंदोलन कई शहरों में किये हैं.

7 जुलाई को वनश्री वनकर द्वारा जारी की गई अपील

प्रियबंधु नामक एक संस्थान, जो आसाम में माहवारी-स्वच्छता अभियान चलाता है,  की सदस्य अर्चना बोरठाकुर ने भी सरकार के इस कदम को निराशा जनक बताया. उनकी संस्था फ्री में सेनेटरी पैड भी बांटती है. देखना यह है कि पश्चिम से पूरब तक बहाने वाली यह हवा क्या रंग लेकर आती है!

गांधी के गाँव से छात्राओं ने भेजा वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री को सेनेटरी पैड 

हालांकि इसी बीच इस मुहीम के खिलाफ प्रतिक्रियाएं भी आने लगी हैं. कन्नड़ की अभिनेत्री और भारतीय जनता पार्टी की सदस्य मालविका अविनाश ने जहां सेनेटरी पैड को भारत में पश्चिमी साजिश बताया वहीं सरकार भी अपना बयान जारी कर भ्रामक जानकारियाँ दे रही है.

सरकार के अनुसार इसपर 5% वित पहले से ही लागू था. हालांकि वैट सारे राज्य नहीं लगाते. सेनेटरी नैपकिन पर 12% जीएसटी के पक्षधर लोगों का कहना है कि इसमें उपयोग आने वाले कच्चे माल की श्रेणी हाई जीएसटी की है इसलिए इसपर भी जीएसटी लगनी चाहिए. इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सुपर ऐब्जोर्मेंट पोलिमर, पोली एथीलीन फिल्म, ग्लू , रिलीज पेपर और वुड पल्प पूरे कॉस्ट का 20% है, जो अपने आप में हाई जीएसटी की दायरे में है. 80% कॉटन इस्तेमाल होता है जो अपने आप में 5% जीएसटी के दायरे में है.

क्या महिलायें भेजेंगी वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री को सेनेटरी पैड 

आज भी ग्रामीण इलाके में महिलायें सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं करती हैं. सरकार को चाहिए था कि महिलाओं-स्वास्थय को देखते हुए वह इन्हें टैक्स फ्री करे, लेकिन वह इसे विलासिता कैटगरी में रखकर 12 % टैक्स लगा रही है.

क्वीलिन काकोती स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.  संपर्क: kakoty.quiline@gmail.com 

अनुवाद

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

यह महिला न्यायशास्त्र पर कागद कारे करने वाले वकील साहब की प्रेम कहानी है. ना, इसमें वकील साहब का अतीत न ढूंढें ……… !
संपादक

दफ्तर लौटा तो आंसरिंग मशीन बोली, “प्लीज कांटेक्ट संकट लाल…फौरन।” फोन मिलाया। घंटी बजती रही। मोबाइल पर डायल किया।
संकट गुर्राया, “तुम रखो मैं अभी मिलाता हूं।”
सिगरेट सुलगाई ही थी कि टर्न…टर्न…होने लगी। हैलो…हैलो….के बाद रहस्यमय स्वर में संकट ने कहा, “तुम्हें एक बात बताऊं?”


मैंने थोड़ी लापरवाही से कहा, “हां बताओ।” और मन ही मन सोचा पता नहीं क्या बताएगा? सब जानते हैं कि संकटलाल जी रोते से जाएंगे और मरो की खबर लाएंगे। चिट्ठी देकर भेजो तो नायिका की मम्मी को देकर चले आएँगे- हंसते-हंसते।
वह बोला,  “अरे वो दो चोटियों में सफेद रिबन वाली, ”बॉबी” सी एक लड़की हमारे साथ पढ़ती थी ना…भई। वही…छवि….” मैं तुमसे मिलने आई, मंदिर जाने के बहाने” गाने की तरह तुमसे मिला करती थी…याद आ गई या कुछ और बकना पड़ेगा?”
मैंने लंबा कश लेकर कहा, “हां!…हां!! मगर हुआ क्या?”

आंखों में पच्चीस साल पीछे छूटा कस्बा और कॉलेज की स्टाफ कालोनी घूमने लगी। कॉलेज कैंपस क्या पूरा विश्वविद्यालय था। नर्सरी स्कूल से इंजीनियरिंग कॉलेज तक। बैंक, डाकघर, हॉस्टल, हॉकी- फुटबाल-क्रिकेट ग्राउंड, स्टेडियम, ट्यूबवैल, बाग बगीचे और मीलों लंबी सड़क। मेन गेट से बाहर निकलते ही रेलवे स्टेशन “चाय गर्म”… “पूरी गर्म।” सुबह हजारों लोग कस्बे से शहर जाते और शाम को लौट आते। ऐसे ही एक दिन मैं भी कस्बा छोड़, राजधानी भाग आया था। सोचा था लौट जाऊंगा, लेकिन वो शाम कभी नहीं आई।


सिगरेट बुझाते-बुझाते लगा, “अब वहां है भी कौन? क्या? कस्बा…केवल स्मृतियों में ही आबाद है!”

कस्बे की इस “हवाई यात्रा” के दौरान संकट को फोन पर संदेशा- “मैं आ रहा हूं” के अलावा और कुछ भी तो याद नहीं। मैंने सोचा, बहुत सोचा, मगर समझ में कुछ भी नहीं आया। पीछे मुड़ कर देखा तो आंख भर आई। स्कूल, कॉलेज, जलसे, जुलूस, प्रदर्शन, घेराव, ह़ड़ताल, पथराव, लाठी-गोली-आंसूगैस, जलती बसें, ध्वस्त गाडि़यां, खंडहर, आग में जलकर राख हुआ ऑडिटोरियम, छात्र-शिक्षक-मजदूर आंदोलन, भयंकर असंतोष, हिंसा, आगजनी, लूटपाट, छावनी में बदलते कॉलेज और मुठभेड़” का आतंक। लगता है जैसे कल ही की बात है। मगर जमाना बीत गया।
मैंने सोचा और पानी का गिलास उठा गट्ट…गट्ट…पी गया।

सच तो यह है कि मैं और संकटलाल, यानी हम दोनों और वो सफेद रिबन वाली भी एक ऐसे प्रदेश के हैं, जहां सिर्फ ”डेढ़ आदमी” पढ़े लिखे हैं। होने को संकट के पिता डॉक्टर और मेरे दर्शनशास्त्र  के प्राध्यापक लेकिन पूरे प्रदेश में पढ़े लिखे तो ”डेढ़ लाल” ही माने जाते हैं। हालांकि कस्बा, प्रदेश की राजनीतिक ही नहीं सांस्कृतिक राजधानी भी माना जाता था, परन्तु यौन क्रांति की खबर तो उस समय यहां तक पहुंची ही नहीं थी। हां, ! गली-गली में कुछ लोग “हीरो” साइकिल चलाते हुए जरूर गाने लगे थे- “हम तुम इक कमरे में बंद हों और….”मगर गाना सुन स्कर्ट पहने कोई “छोरी”बाजार में से गुजरती तो सारे शहर में सायरन बजने लगते थे।

ऐसे समय की प्रेम कथा में  न “सेक्स और हिंसा” का कोई स्कोप है और न किसी “अमर प्रेम” की संभावना। हीराइन छोटे से कस्बे की सुंदर और सुशील कन्या है। हाथ लगाते ही मैली हो जाए। दिन-रात, चौबीस घंटे “चैस्टिटी बैल्ट” पहने रहती है। घर से बाहर निकलते ही अंगुली पकड़ “कमांडो” साथ हो लेता है। नींद में सारी रात भले ही, सपनों के राजकुमार के साथ “रोज गार्डन” घूमती रहे या “मॉड्ल टाउन” में पीपल के पेड़ तले बैठ बसाती रहे घर-गृहस्थी। यह एक “बोल्ड एंड ब्यूटीफुल” लड़की का कथादेश भले ही न हो, मगर एक कमजोर लड़की की कहानी भी नहीं है।

कस्बे की लड़की भी क्या करे? छोटे से कस्बे से बीसियों स्कूल कॉलेज और सात-सात सिनेमा घर परंतु मेडिकल और बी.एड.कॉलेजों के अलावा सह शिक्षा कहीं नहीं। फिल्म देखने का शौक हो तो “जय संतोषी मां” लगी है। हाउस फुल…। लड़के-लड़कियों के सब स्कूल कॉलेज अलग-अलग। सरकारी  हो या गैर सरकारी। यही नहीं, बनियों, ब्राह्मणों, जाटों, जैनियों और सैन्नियों से लेकर आर्यसमाजियों तक के अलग-अलग स्कूल कॉलेज।

जाटों के स्कूल या कॉलेज में आचार्य से प्रधानाचार्य तक अधिकांश जाट, ब्राह्मणों के यहां ब्राह्मण, बनियों के यहां बनिये और जैनियों के यहां जैन। लड़कों के स्कूल कॉलेज कस्बे से थोड़ा दूर मगर लड़कियां इतनी दूर कैसे जाएंगी? कुछ उल्टा सीधा हो गया तो? नहीं…नहीं…लड़कियों के स्कूल कॉलेज कस्बे के मुख्य बाजारों के बीच, मेन रोड़ पर ही रहेंगे और हर दुर्ग द्वार पर बड़ी-बड़ी मूछों वाले प्रहरी प्रायः सभी “गुरुकुलों” के “परधान जी” अंगूठा टेक और मंत्री मास्टर जी या वकील साब। प्रबंध कमेटी में नत्थू पंसारी, कालीचरण हलवाई, मंगल सुनार से लेकर लाल लखमी चंद तक चरित्र निर्माण और ब्रह्मचर्य पर विचार विमर्श करते रहते हैं। ब्राह्मणों, बनियों या जैनियों के “सरस्वती मंदिरों” में हरिजनों या पिछड़ों का क्या काम?

कभी स्कूल कॉलेज के प्रांगण में बैलों की जोडि़यां घूमती दिखाई देतीं, और कभी दीपक जगमगाने लगते। कभी क्रिकेट ग्राउंड में खाकी निक्करों का ढेर लगा होता और कभी सफेद टोपियों का। बाद में तो खैर आकाशवाणी केंद्र से लेकर विश्वविद्यालय तक की स्थापना हुई और प्रदेश के एक पढ़े लिखे “लाल” को कुलपति बनाया गया। धर्म, जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर न जाने कितने स्तरों पर विभाजित है छोटा सा कस्बा।

खैर इससे पहले कि संकटलाल जी पधारें, मैंने अपनी कंप्यूटर ऑपरेटर की छुट्टी कर दी। बेसिर-पैर के सवालों का कौन जवाब देगा? स्कूल के दिनों से अब तक संकटलाल हमेशा ऐसी ही परेशान करता रहा है। बिना शपथ उठाये भी “जो कहूंगा सच कहूंगा। सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा।” उससे पूछो दारू पी? जवाब-हां जी! मुर्गा खाया? हां जी! जुआ खेला? हां जी!…हां जी….! हां जी…दिल दिमाग से साफ मगर यारों का यार है-संकट लाल।
शादी के बाद आकांक्षा हुई तो अपंग। बहन, डॉक्टरनी ने कहा, ”सुई लगा देती हूं। क्या करेगा ऐसी बेटी का?”
भाई धीरे से बोला, ”हां ! लगा सकती हो तो लगा दो।” और लगा अपनी चप्पल ढूंढ़ने।
पूछा कि कहां जा रहे तो कहने लगा, ”थाने रिपोर्ट लिखवाने।”



संकट की अनंत गौरव गाथाएं हैं और दोस्ती के ढेरों किस्से। वो सब फिर कभी। वरना आप कहेंगे- “इधर -उधर भटक रहा है।” चलते-चलते इतना और बता दूं कि सारी मुसीबतों की शुरुआत का कारण होता था संकट लाल और जब पेशी होती तो हर बार खुद वायदा माफ गवाह बन जाता था।

दफ्तर में ही दस बज गये और संकट लाल का कुछ अता-पता ही नहीं चल रहा। हो सकता है पीने बैठ गया हो और जनता क्लब में ललिता, समता, सुषमा या मोनिका का भूत-भविष्य बता रहा हो। मुझे लगा कि वह अब नही आएगा। मैं घर के लिए चल पड़ा। रास्ते भर मेरे दिमाग में संकट, दो चोटियों में सफेद रिबन बांधे उछल कूद मचाता गाता रहा-
”छैल रंग डार गयौ री मेरी बीर
भीज गयौ मेरा अतलस लहंगा, हरित कुंचुक चीर
घायल कुंकुम डार कुचन पर, ऐसौ निपट बेपीर।”

मैं सचमुच नहीं जानता कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ? लाल बत्ती पर महसूस हुआ कि खद्दर का सफेद कुर्ता, चूड़ीदार पायजामा और काली अचकन पहने कुछ आदमी पूछ रहे थे ”रेसकोर्स” का रास्ता। फिर अचानक ध्यान आया कि छवि कहा करती थी, “मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे। यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है।”
मैं मन ही मन हंसता रहा। बहुत देर तक हंसता रहा।

चुपके से एक शरारती सहेली ने चुटकी ली, “लव लैटर्स और स्पेलिंग मिस्टेक वाली बात भूल गये?”
मैंने कहा,  “नहीं, नहीं…याद है। अच्छी तरह याद है कि हर बार संकट समझाता था-प्यार में स्पेलिंग मिस्टेक नहीं देखी जाती-पगले!”

उन दिनों मैं कॉलेज में पढ़ता था। अंतिम वर्ष में। ”युवा महोत्सव” में गया हुआ था। मैं वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने आया था। और छवि “आषाढ़ का एक दिन” देखने। मंच से ईनाम लेकर बाहर आया तो छवि, छाया की तरह पीछे-पीछे। छवि ने सिगरेट छीन कर एक तरफ फेंक दी और गले में लटके स्वर्ण पदक को चूमते हुए कहा, ”मुबारक हो!” मैं हैरान। “मिल्की व्हाईट गर्ल” सामने खड़ी मुस्करा रही थी।

तभी संकट आ गले से लिपट गया और बोला, “भई ! मैडल भी मुबारक हो और जन्म दिन भी। मगर कमीज पर लगी इस “लिपस्टिक” का क्या होगा?”
मृगनयनी ने एक बार संकट की तरफ देखा और फिर मेरी तरफ ठुनकते हुए कहने लगी , “आई एम सॉरी…मगर तुमने बताया क्यों नहीं?”
मैंने कहा,  “क्या बताता?”
”फेयर एंड लवली गर्ल” थोड़ा गंभीर हो बोली,  “चलो कोई बात नहीं ”गिफ्ट” उधार रहा।”

उसके बाद मैं और छवि अक्सर जब कैंटीन के कोने में बैठे चाय पीते रहते तो संकट चुपचाप “लव गेम” देखता रहता। दोस्त जब संकट से पत्ता मांग खेलने को कहते तो संकट जवाब देता , “नो, नो…आ प्ले फॉर लव।” दरअसल संकट बेहतरीन विकेटकीपर था।

कभी-कभार छोटी सी मुलाकात हो जाती-कभी संकट के घर और कभी किसी सुनसान गली के मोड़ पर। छवि संकट की बहन काजल की सहेली बन गयी थी, इसीलिए अक्सर मेरे पहुंचने से पहले ही वह वहां मेरी प्रतीक्षा कर रही होती। बहानों की कोई कमी नहीं थी। एकाध बार किसी और सहेली (अभिलाषा) को लेकर, मेरे घर भी आई थी-शायद कोई किताब लेने। उन दिनों उस पर विदुषी बनने का भूत सवार था। देखते-देखते सारा समय परीक्षाओं के बुखार में गुजर गया। रिजल्ट आने के बाद मैं, कस्बे से राजधानी भाग आया। पिता चाहते थे कि ”अर्थशास्त्र” पढ़े लेकिन मैं ”संविधान” पढ़ना चाहता था। संविधान।


दिन में नौकरी की तलाश में भटकता और शाम को पढ़ने जाता। रात को कमरे में आ खुद खाना बनाता, कुछ देर पढ़ता-लिखता और थक हार कर सो जाता। वो सचमुच बहुत ”गर्दिश के दिन” थे। महीनों घर नहीं गया। नौकरी मिली नहीं। ऊपर से आपातकाल शुरू होते ही “संपूर्ण क्रांति” की सारी योजनाएं स्थगित। एक-एक दिन जीना मुश्किल। मैं न किसी की हत्या कर सकता था और न आत्महत्या। अजीब मानसिक स्थिति थी। सारा आक्रोश, अंधेरे में अकेले या आदर्श और सिद्धांत के साथ घूमने, बीड़ी पीने, हवा में टीपी वालों का गालियां बकने, बौद्धिक बहस करने या किताबी कानून चाटने में निकलता….जीने की जिद में अपने बाप से “बाक्सिंग” करता और जानबूझ कर सबसे नाराज….जला-कटा सा घूमता रहता। रिंग रोड़ से रिंग रोड़ तक। कभी भीतरी घेरे में और कभी बाहरी घेरे में।

इस बीच छवि की कई चिट्ठियां आईं। हर बार “विद ग्रेट लव-यूअर्ज ओनली” के साथ चेतावनी ”तुम मेरे पास बिल्कुल भी चिट्ठी मत डालना। नहीं तो मैं बिल्कुल ही मर जाऊंगी। या मार दी जाऊंगी।” ”तुम पता नहीं मुझे कब मिलोगे” पढ़ कर परेशान होता और न मालूम क्या-क्या सोचता रहता। हां ! कुछ महीने पहले आखिरी खत में लिखा था, मैंने तुम्हारे और अपने लिए न जाने क्या क्या सोचा था, लेकिन सब कुछ एक हवा के झोंके की तरह उड़ गया। अंत में, “सचमुच तुम एक दिन बहुत बड़े आदमी बनोगे लेकिन उस एक दिन को कौन जानता है। तुम्हारे बड़े बनने के लिए अगर भगवान ने चाहा तो शायद मेरी शुभकामनाएं सदा तुम्हारे ही साथ होंगी।” अन्तर्देशीय पत्र के एक गोने में छोटे-छोटे अक्षरों में रेखांकित करके लिखा था-गिफ्ट उधार है।”

अगर-मगर पढ़ कर मैंने अनुमान लगाया, लगता है हो गई “कुड़माई (सगाई)।” मैं “ड्रीमहोल” ढूंढ़ता रहा और स्टोव पर रखी खिचड़ी जल कर कोयला हो गई। उठा तो दो गिलास टूट गए और तीन कपों के कान कोने में पड़े थे। मटका उठा कर पानी भरने लगा तो हाथ से फिसल गया…चलो इसकी उतनी ही उम्र थी।

मैं अक्सर झल्लाते हुए कहा करता था, “हमें नहीं बनना बड़ा आदमी….बन भी नहीं सकते…डी सी बनने के चक्कर में एल.डी.सी भी नहीं बन पाएंगे…हां…।” इसके कुछ दिन बाद दोस्तों ने मजाक उड़ाते हुए कहा, “सारी खबरें सच हैं।” नौकरी, महानगर और देस-परदेस की भागदौड़ में रोज नया हादसा। क्या भूलता, क्या याद करता।

अब तो इतना ही याद है या शेष सब भूल गया हूं कि एक शाम “टैलेक्स” पर संकट लाल ने समाचार भेजा था ”बहन को ब्लड कैंसर। स्टॉप। फौरन भारत आओ…स्टॉप।” उसी रात ब्रिटिश एअरवेज से राजधानी और सुबह राजधानी से कस्बे के अस्पताल पहुंचा था। अन्दर तक किसी अनहोनी से आतंकित। दो महीने घर से अस्पताल और अस्पताल से घर…कभी खून चढ़ेगा और कभी रेडियोथैरेपी। देशी-विदेशी सब दवाइयां बेकार। पहली बार जाना कि कितना भयावह है मौत का इंतजार। उन दिनों बहुत हंसता-मुस्कुराता और मजाक में छेड़-छाड़ करता रहता था। हंसता रहता था कि कहीं रो न पड़ूं।

मैंने उस साल की डायरी में हीं लिखा थाः “आज दोपहर अस्पताल से घर लौटते हुए, रास्ते में छवि मिल गई। दो चोटियों की जगह जूड़ा था और खरगोश के कानों जैसे सफेद रिबन गायब।” लाल पल्लू की सफेद साड़ी, मांग में गहरा सिंदूर, गले में मंगलसूत्र और होंठों पर “डीप, डार्क एंड डेंजर्स मैरून” लिप्स्टिक। गोदी में साल भर का प्यारा सा सुंदर बच्चा था। बढ़ी हुई दाढ़ी और चश्मे के बावजूद, उसने भी मुझे पहचान लिया था।

सड़क पर एक तरफ छांव में खड़े हो, उसने सबसे पहले पूछा, सिस्टर कैसी है? मैंने कहा, “ठीक ही है।” उसने फिर सवाल किया, “और तुम?”
मैंने दोहरा दिया, मैं भी।
कुछ देर बाद मैंने सन्नाटा तोड़ते हुए कहा,  “बेटा है ना !…कब हुआ?”
वह बोली,  “पिछले साल….पच्चीस दिसंबर को यह एक साल का हो जाएगा और…।”
मैं एकदम हैरान…परेशान। मगर फिर भी बच्चे के गाल थपथपाता पूछ ही बैठा, क्या नाम रखा है हीरो का?
उसने सिर उठा कर मेरी ओर देखा, निचला होंठ दांतों से दबाया और फिर गर्दन घुमाकर धीरे से बोली, हमनाम है तुम्हारा।

 मैंने चश्मा उतार, आंखें पोछने के बाद देखा तो वह बराबर की मंदिरवाली गली के उस पार जा चुकी थी।
सुबह फोन उठाते हुए डर सा लगा-कहीं संकट का न हो।

“हैल्लो ! हैल्लो!!” के बाद संकट ने उंघते हुए शुरू किया,  “सॉरी यार ! रात कहीं फंस गया था। सुनो ! वो मेरे बगल वाली सोसायटी में रहती है। अभी कुछ दिन पहले “फायर” फिल्म देखते हुए मिल गई। बहुत देर तक “पूछताछ” करती रही और फिर लगी तुम्हारा इतिहास पढ़ाने। अभी खरीदा है फ्लैट। पति अब ठेकेदारी करता है। एक बेटा और दो बेटियां हैं। बेटिया बी.ए. में पढ़ रही हैं। खुद किसी स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाती है। भया ! पार्टी वार्टी दो तो बात करवाऊं? ”

मैं चुपचाप सुनता, सोचता और सिगरेट फूंकता रहा। मेरे कुछ कहने से पहले ही संकट ने कहा, ”अच्छा…. एक मिनट बात करो….।”

मैंने कुछ देर बाद, “हैल्लो…हैल्लो” किया….तो एक अनजानी सी आवाज में किसी ने कहा, “नहीं पहचाना ना? कैसे पहचानोगे? बहुत समय हो गया। खैर…मैं छवि…तुम्हें लगातार पढ़ती-सुनती रही हूं…लिखा-अनलिखा…कहा-अनकहा एक-एक शब्द..पूरी किताब कई बार पढ़ चुकी हूं…चाहती हूं कि अनुवाद करूं।”
मैंने कहना चाहा “पगली कहीं की” मगर चुप रहा। फिर उसने कहा था, ”मुझे विश्वास था कि सचमुच एक दिन तुम…..”

और मैं सिर्फ लेकिन…कह कर खामोश हो गया। फोन रखने के बाद तक सफेद रिबन, रजनीगंधा से महकते रहे। और मैं सोचता रहा, ऐसे मूल जीवन का पता नहीं अनुवाद कैसा होगा?

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इस्मत आपा को पढ़ते हुए

निवेदिता

पेशे से पत्रकार. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय .एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’. भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamai



इस्मत आपा को पढ़ते हुए मैं आग, बारिश और तूफानों से घिर गयी हूँ.अचानक जैसे भीतर कोई बांध बिना सूचना दिए टूट गया और मैं बहने लगी,गहरे जल में. उनसे मेरी इस कदर दोस्ती हो गयी कि मैं  हाथ बढ़ाकर उनकी हरारत महसूस कर रही हूँ सारे अफसाने मेरे सिराहने बैठ गए हैं.मैंने मुस्कुराने की कोशिश की, मेरे हलख सूख गए जैसे किसी ने मेरे जबड़े और होठ भींचकर बंद कर दिए हों.कहानियों के सारे किरेदार बाहर निकल आये हैं और मुझ से पूछने लगे हलक में तीर क्यों मारा? मैंने हकलाते हुए कहा नहीं तो हमने तो तीर नहीं मारा. इस्मत आपा मुस्कुराने लगी, उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और हमदोनों उनके बचपन की यादों में डूबते उतरते रहे गुब्बारे.. कारवां..क्या लिखा है आपा ने. पाठकों की रूह में उतर गयीं हैं. मजाल है आपकी गिरफ्त से कोई अफसाना निकल जाये ! एक दिन एक मुहर्रम की शोकसभा में पहली बार  उन्हें मर्सिया और नौहें का मतलब समझ आया और जब अली असगर के हलक में तीर पैवस्त होने का जिक्र आया तो खौफ से उनकी घिग्धी बांध गयी. उन्होंने दहाड़े मारकर रोना शुरू किया. मातम करने वाली बीबियाँ एकदम चुप हो गयीं.बड़ी हैरत से उन्हें देखने लगी.वो थी कि जारो.कतार रोये  जा रही थीं. क्यों मारा हलक में तीर क्यों मारा मचल मचल कर पूछने लगीं.तीर क्यों मारा? हाथ में मार दिया होता. बेचारे के हलक में क्यों मारा. रोते हुए शेखानी बुआ की बगल में सिसककर पूछा?
“ऊ अजिद हरामी रहे !उन्होंने समझाया
‘तो उसके पास  बच्चे को क्यों ले गए?’
“बच्चा पियासा रहे”
“तो उसे दूध दिया होता?
“दूध माँ का  खुश्क होई गवा रहे”
“तो पानी ही दे दिया होता”
“पानी कहाँ रहे? नहर पे  तो ओकी फौज का पहरा रहे’
“क्यों” अब हम ई का जाने रहे. कुछ गडबड”
“फिर”
“बच्चा का पानी पियाय खातिर नाहर पा ले के गए तो उतार दिहिस तीर”
“हलक में”
“हाँ”
और मेरे हलक में बड़े बड़े काटेदार डोले फंसने लगे…..

ओह इस्मत आपा ! आपकी स्याही में ज़हर है और अमृत भी ! शब्द ऐसे जैसे आसमान पर सुलगते सितारे कहानियाँ जब हमारे दिलो में उतरती हैं तो नस्तर बन चुभती  हैं. आपा से  ज्यादा साफबयानी, गहरी तनकीदी और तहज़ीबी कौन हो सकता है. उनकी  बातें बड़ी वाजेह होती हैं. पूरे सब्र और तहम्मुल से बात करतीं हैं.किसी को बख्श नहीं देती अपनी माँ को भी नहीं… “हम इतने सारे बच्चे थे कि हमारी माँ को हमारी सूरत से कै आती थी, एक के बाद एक हम उनकी कोख को रौंदते – कुचलते चले आये थे उल्टियां सह.सह कर वह हमें एक सज़ा से ज्यादा अहमियत नहीं देती थीं. कम उम्र में ही फैलकर चबूतरा हो गयी थीं”मैं नहीं जानती उनको पढ़ते हुए कब मैंने उनके साथ यारी कर ली. उनके आजाद ख्याल और मेरी आवारागर्दी में कुछ तो ताल्लुक है सच को बिना किसी मिलावट के कहने की कला तो कोई आपा  से सीखे. रगों के भीतर कहानियां दौड़ने लगतीं हैं. मानवीय सच को पूरी प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं. उनकी कहानियों से हमारे दिमाग की नसें चटकने लगती हैं समाज के कितने फोड़े,मवाद,  पीप बहने लगते हैं.  उसके भीतर से  मुकम्मल कहानियां निकलती है. उन्होंने वैसी. वैसी जगह अपनी कलम चलायी जहाँ आज भी किसी लेखक को जाने की हिम्मत नहीं होती. उनकी कहानियों की तरह उनकी जिन्दगी भी कम दिलचस्प नहीं है. अपनी कहानियों पर लगे अश्लीलता के आरोप में आपा और मंटो मुकदमा के लिए लाहौर गये वहां भी उन्होंने किसी कि नहीं बक्शा शाहिद साहब के साथ मैं भी एम असलम साहब के यहाँ ठहरी थी. सलाम और दुआ भी ठीक से नहीं हुई थी कि उन्होंने झाड़ना शुरू कर दिया मेरे अश्लील लेखन पर बरसने लगे.मुझ पर भी भूत सवार शाहिद साहब ने बहुत रोका.मगर मैं उलझ पड़ी,और आपने जो गुनाह की रातें में इतनी गन्दी गन्दी पंक्तियाँ लिखी हैं. सेक्स एक्ट का वर्णन किया है. सिर्फ चटकारे के लिए  “मेरी बात और है मैं मर्द हूँ ” तो इसमें मेरा क्या कसूर क्या मतलब वह गुस्से से लाल हो गए. मतलब ये कि आपको खुदा ने मर्द बनाया है इसमें मेरा कोई दखल नहीं मुझे औरत बनाया है उसमें आपका कोई दखल नहीं. मैं आजादी से लिखने का हक़ आपसे मांगने कि जरुरत नहीं समझती. आप एक शरीफ मुसलमान खानदान की पढ़ी लिखी लड़की हैं और आप भी पढ़े. और शरीफ खानदान से हैं. इस्मत आपा को पढ़ती रहीं हूँ और उनपर मरती रही हूँ, मेरे जैसे लाखों.लाख पाठक उनके मुरीद रहे होंगे. मुझे लगता है वे लोग जो जिन्दगी से मुहब्बत करते हैं. जो अपनी आजादी से मुहब्बत  करते हैं जो पाठकों की नब्ज़ पर पकड़ रखते हैं. उनके बुखार में  तपते रहते हैं और ताप के ताए ये हुए दिन में जो  लिखते हुए कभी थकते नहीं वही तो हैं हमारी आपा. मेरे  हाथों में उनकी किताब है और बाहर आसमान सूर्ख है. जर्द तितलियाँ उड़ रहीं हैं.दूर दूर तक अमलताश के दहकते हुए फूल हवा में लहरा रहे हैं रंग बिरंगी कागजी चरखियां हवा में तेजी से घूम रही हैं मैंने कहा आपा नींद आ रही है अपनी कहानियों से कह दो मेरी नीद में आकर मुझे ६ डिग्री के बुखार का एहसास न कराएँ. आपा तुम और मंटो अफ़सानानिगारी के हर्फे आखिर हो !

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सुर बंजारन

भगवानदास
मोरवाल

 वरिष्ठ साहित्यकार. चर्चित उपन्यास: कला पहाड़, रेत आदि के रचनाकार. संपर्क : bdmorwal@gmail.com मो.  9971817173

काला पहाड़ और रेत जैसे चर्चित उपन्यासों के रचनाकार भगवानदास मोरवाल ने  कहन-शैली, व्यापक कथा फलक और आंचलिक बोध के साथ मेवाती यथार्थ के चित्रण से हिन्दी साहित्य में अपनी विशिष्ट जगह बनाई है. उनका शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास है, सुर बंजारन. हाथरस शैली की नौटंकी और उसकी एक मशहूर अदाकारा को केंद्र में रख कर लिखे गये उपन्यास ‘सुर बंजारन‘  का  एक अंश दो किस्तों में स्त्रीकाल के पाठकों के लिए .  


आखिरी क़िस्त/ बहरशिकिस्त


हवलदार नेमपाल ने सही कहा था.देखने वालों का सैलाब दिन-पर-दिन उमड़ता ही जा रहा है. तीसरे शो यानी स्याहपोश  तक आते-आते श्री दिगम्बर जैन एजूकेशन ट्रस्ट को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्यों न दो शो और बढ़ा दिये जाएँ . इसलिए इसका ज़िम्मा ट्रस्ट ने दिगम्बर दाल मिल के मालिक सेठ ताराचन्द और दूसरे ट्रस्टी मास्टर शौकत अली पर छोड़ दिया . सब जानते हैं कि रागिनी इन दोनों के कहे को कदापि नहीं टालेगी . तीसरे शो से एक दिन पहले सेठ ताराचन्द और मास्टर शौकत अली ने रागिनी के सामने दो अतिरिक्त शो का प्रस्ताव रखा, तो सुनते ही रागिनी ने इनकार कर दिया .

सेठ ताराचन्द ने मनुहार कर मनाने कि कोशिश करते हुए कहा,”रागिनी जी, आपकी इस छोटी-सी मदद से हमारे भावी स्कूल को बहुत सहारा मिल जायेगा !”
“भाई साब, बात तो आपकी ठीक है मगर मैं भी मजबूर हूँ . अगर छठे दिन नौचंदी मेले में मेरा शो नहीं होता, तो मैं आपको कहने का बिलकुल भी मौक़ा नहीं देती . पहले से तय हो चुके उस प्रोग्राम को मैं कैसे छोड़ सकती हूँ ?”
“देख लो रागिनी, उपकार और जन कल्याण का काम है .”
“मैं आपकी भावनाओं को समझ सकती हूँ . हाँ, इसके बाद का शो मुझे मन्जूर है . बस, दिक्कत है तो पहले वाले शो में .”
“हमें कुछ नहीं पता…आपको ही कोई रास्ता निकलना होगा . पब्लिक को सिर्फ़ रागिनी से मतलब है . ट्रस्ट ने बड़ी उम्मीद के साथ दो और शो कराने का फ़ैसला लिया है .” मास्टर शौकत अली ने सेठ ताराचन्द के इसरार को वज़नी बनाते हुए कहा .
सुर बंजारन
“फिर एक काम हो सकता है मास्टर जी, और वह यह कि नौचंदी मेले वाले शो के दिन कोई ऐसा खेल करवाते हैं जिसमें लेडी आर्टिस्ट का कोई ख़ास रोल ना हो . अगर कोई होगा तो उसे लता कर लेगी . हाँ, आख़िरी शो में मैं यहाँ के लोगों की सारी कसर पूरी कर दूँगी .”
“कुछ भी करो रागिनी . यह नैया तो अब आपको ही पार करानी है !” सेठ ताराचन्द ने उम्मीद की नज़र आती एक छोटी-सी किरन को पूरे उजाले में बदलने की आशा में कहा .
“ठीक है भाई साब, फिर ऐसा करते हैं कि पाँचवा शो सुल्ताना डाकू और आख़िरी शो  क़त्लजान आलम  का रख लेते हैं !”
“हमें कुछ नहीं मालूम . यह तय करना आपका काम है .” सेठ ताराचन्द ने पूरी तरह रागिनी पर छोड़ दिया .
“तय क्या करना, यही ठीक रहेगा .” रागिनी ने आख़िरी फ़ैसला ले अपना निर्णय सुना दिया .
“ठीक है, जैसा आपको अच्छा, लगे करिए . हमारी चिंता अब दूर हो गयी . अच्छा, अब हम चलते हैं…आप अपने आज के शो की तैयारी करिए !”

LEYLA KAYA KUTLU



अपने साज़िन्दों को अनुभवी नक्काड़ची अत्तन खां ने ताईद कर दिया कि स्याहपोश  में किसी तरह का ढीलापन नहीं रहना चाहिए . नगारी सेंकने वाले को तो सख्त लहज़े में कह दिया कि आज धधकते कोयलों की आँच धीमी नहीं पड़नी चाहिए . नगारियों को ऐसा सेंकना है कि लगे चोब उसकी झुलसती देह पर नहीं, वज़ीरज़ादी के दिल पर पड़ रही है . देखने वालों को लगना  चाहिए कि झील की खनक और नक्काड़े की धमक सीधे वज़ीरज़ादी और गबरू के गले से निकल रही है .

वंदना ख़त्म होते ही पहले दृश्य में महल के झरोखे में बैठी वज़ीरज़ादी अपने सामने रहल पर रखे क़ुरान की तिलावत शुरू करती, उससे पहले मंच के पार्श्व से सूत्रधार की खनकती आवाज़ दोहा, चौबोला और दौड़ में परिचय के रूप में फ़िज़ा में गूँजती है-

सिफ़त ख़ुदा के बाद में, हो सबको मालूम .
सिम्र मग़रबी एशिया, मुल्क ख़ुशनुमा रूम ..

मुल्क ख़ुशनुमा  रूम, तख्त वारिस महमूद तहाँ का .
बयाँ सिफ़त कर सकूँ न इतना रूतबा मेरी ज़बाँ का ..
था फ़ैयाज़ हुस्न युसुफ़ इंसाफ़ी शाह जहाँ का .
रय्यत रहै अमन में कुल अज़हद शौक़ीन कुराँ का ..

है अजब खुशनुमा हुस्न जबीं लखि माह निगाह चुराता है .
गबरू है नाम जात सैयद साक़िन हिरात कहलाता है ..

कुराँ के तीसों पारे . याद जिसको थे सारे ..
कहूँ एक सखुन लताफ़त .
हुआ खड़ा आ बाम तले सुनने कुरान की आयत ..

अभी सूत्रधार ने गबरू का तआरुफ़ ख़त्म किया ही था, कि महल के झरोखे से कुरान की तिलावत करती वज़ीरज़ादी का स्वर उभरा . इधर महल के नीचे खड़ा गबरू जैसे ही वज़ीरज़ादी द्वारा ग़लत तिलावत को सुनता है, तो वह उसे टोकता है . इस पर वज़ीरज़ादी पलट कर कहती है –

क्या मतलब है आपका, लीजै अपनी राह .
चाहे जैसे हम पढ़ें, कुराँ कलामुल्लाह ..

वज़ीरज़ादी का संवाद ख़त्म होते ही हारमोनियम ने जो सुर उठाया, और उसके साथ वज़ीरज़ादी की ओर मुख़ातिब हो गबरू ने ज्यों ही सुर बाँधा, सामने दर्शकों के मर्दाने हिस्से में जगह-जगह बैठे गबरू, असली गबरू के सुर में सुर मिलाने लगे-

ग़लत ना पढ़ना चाहिए, है ये कुरान शरीफ़
इसी वास्ते आपको, देता हूँ तकलीफ़
देता हूँ तकलीफ़ इनायत जो हुजूर फ़रमावे
दिलो जान हो शाद महल के ऊपर हमें बुलावे ..

MOHSEN DERAKHSHAN



नक्काड़ची अत्तन खां को चौबोले में वज़ीरज़ादी को दिए गये गबरू के जैसे इसी जवाब का इंतज़ार था . यानी इधर चौबोला ख़त्म हुआ और उधर अपने साथ ढोलक पर संगत करते ढोलकिया की तरफ़ देखते हुए, झील-नक्काड़े पर उसकी जो चोब पड़ी; लगा रात के पहले पहर में मानो तड़ातड़ ओस की मोटी-मोटी बूँदें गिर रही हैं . थानेदार एस.एस.मलिक यह देख कर हैरान-परेशान कि दो दिन पहले जो चेहरे तारामती के पुत्र-वियोग के चलते आँसुओं से तर थे, उन्हीं में से बहुत से कैसे झूमते हुए आज वज़ीरज़ादी जमालो द्वारा कुरान की ग़लत तिलावत करने पर, गबरू के सुर में सुर मिला रहे हैं ? और जैसे ही साज़ों का स्वर एकदम धीमा हुआ, गबरू दौड़ में एक बार फिर सुर बाँधता है-

आपकी होय इनायत . पढ़ावें कुरान आयत ..
सखुन मानौ अच्छा है .
रहै महरबाँ ख़ुदा कुराँ पढ़ना दुरुस्त अच्छा है ..

गबरू के इस दख़ल पर वज़ीरज़ादी ने तिलावत छोड़ पहले इधर-उधर देखा, और फिर गबरू से इल्तिज़ा करने लगी –

आओगे मेरे महल सर्वेकद दिलदार .
सुन पावें मादर-पिदर, करें आपको ख्वार ..
करें आपको ख्वार मती आओ मेरे महलन में .
पाक मुहब्बत करने से नहीं होय तसल्ली मन में ..
आफ़ताब सा लखि जलाल उठतीं हिलौर जोबन में .
कली-कली रसभरी खिल रही मेरे हुस्न गुलशन में ..


इसके बाद तो वज़ीरज़ादी जमाल व गबरू के संवादों और बादशाह, कोतवाल, नूरमहल, कमरुद्दीन समेत दूसरे किरदार निभाने वाले अदाकारों ने मिल कर, स्याहपोश उर्फ़ पाक मुहब्बत को जो रंग और ऊँचाई दी, उसकी छाप थानेदार एस.एस.मलिक के दिलो-दिमाग़ से अरसे तक नहीं मिटी . उसकी इस बला कहिए या आफ़त के प्रति लोगों की दीवानगी का रहस्य अब समझ में आया, जब वह ख़ुद इसके सुरों के धागों में बँधता चला गया . सही कहा था हवलदार नेमपाल ने कि जनाब इसके सुर का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोलता है .

इससे पहले कि गबरू के आख़िरी संवाद के साथ खेल ख़त्म होने का ऐलान होता, और लोग अपनी-अपनी जगह से खड़े होते, तभी मंच पर मास्टर शौकत अली नबूदार हुआ और माइक के सामने खड़ा हो ऐलान करते हुए बोला,”साहिबान एक मिनट…एक ज़रूरी ऐलान सुनते जाइये ! जैसाकि आप सब जानते हैं कल हमारे तमाशे का आख़िरी दिन है . इससे पहले कि मैं श्री दिगम्बर जैन एजूकेशन ट्रस्ट की तरफ़ से आपके जुनून, मोहब्बत और अमन बनाये रखने का आप सब का तहेदिल से शुक्रिया अदा करूँ, हमारे ट्रस्ट ने आख़िरी शो के बाद दो शो और कराने का फ़ैसला लिया है . हमें उम्मीद है कि आप इन दोनों  खेलों  का भी उसी तरह लुत्फ़ और मज़ा उठाएँगे जैसे बाकी के  खेलों  का उठाया है .”
मास्टर शौकत अली के इस ऐलान को सुनते ही पुरानी अनाज मंडी में नालीदार टीन की खड़ी चादरों से बनी विशाल रंगशाला किलक उठी .
“तो साहिबान, इस तरह परसों आप देखेंगे सुल्ताना डाकू उर्फ़ ग़रीबों का प्यारा और उसके बाद आख़िरी तमाशे के रूप में देखेंगे क़त्लजान आलम  उर्फ़ ख्वाबे हस्ती  .”
मास्टर शौकत अली की इस उद्घोषणा के साथ ही स्याहपोश के ख़त्म के होने घोषणा कर दी गयी .

LYDIA ALGER

थानेदार एस.एस.मलिक अब पूरी तरह बेफ़िक्र हो गया . क़स्बे की जिन बदरंगी दीवारों पर मुस्कराते विभिन्न रंगों के इश्तहारों में, उच्च रक्तचाप के चलते नसों से रक्त बाहर फूटने को हो रहा था, उसी नाम का मानो वह भी मुरीद हो गया . मारे बेचैनी और अवसाद के जो तनाव उस पर पहले दो दिन हावी रहा, वह चौथे शो तक आते-आते ख़त्म हो गया . इतना ही नहीं जिस अनहोनी के डर से उसका दिल बैठा जा रहा था, वह आशंका भी निर्मूल साबित हुई . थानेदार एस.एस.मलिक को सबसे ज़्यादा हैरत यह देख कर हो रही है कि देखने वालों में सबसे अधिक वे लोग हैं, जिनकी सांस्कृतिक निष्ठा और ईमानदारी पर सबसे ज़्यादा संदेह किया जाता है . काश, आने वाली रातें भी इसी तरह सुकून से बीत जाएँ, जैसी अभी तक की रातें बीती हैं . इसी दुआ में थानेदार की ऑंखें मुँदती चली गयीं . अभी उसे नींद के एक आवारा-से झोंके ने दबोचा ही था कि उसे लगा जैसे उसके सामने हाथ में ग़रीबों का प्यारा माफ़ करना सुल्ताना डाकू हाथ में बन्दूक ताने खड़ा है .

हड़बड़ा कर नींद से जागा वह . अपने चारों तरफ़ देखा, तो पाया कमरे में उसके अलावा और कोई नहीं है . लगता है अवचेतन के किसी कोने में रात के ऐलान की वजह से यह नाम अटका   रह गया . फिर अगले ही क्षण उसे यह सोचते हुए अपने आप पर हैरानी होने लगी कि उसके इस कोने में सुल्ताना डाकू की जगह क़त्लजान भी तो हो सकती थी ? सुल्ताना डाकू ही क्यों उसके अवचेतन में अटका रह गया ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसका कर्त्तव्यबोध इस नाम को सुन परेशान हो उठा हो ? वैसे थानेदार एस.एस.मलिक का पेशान होना एक हद तक सही भी है, क्योंकि क़ानून की नज़र में गुनाह , गुनाह होता है और इसे करने वाला मुजरिम .


थानेदार एस.एस.मलिक आज अन्य दिनों की अपेक्षा समय से पहले पुरानी अनाज मंडी पहुँच गया . वह आज किसी भी दृश्य को छोड़ना नहीं चाहेगा . कहीं ऐसा न हो कि उससे वही दृश्य  छूट जाए, जिसने एक डाकू को ग़रीबों और मजलूमों का प्यारा बनाया है .

JORGE MUNGUIA

वंदना समाप्त होते ही मंच पर दस्यु की पारम्परिक वेशभूषा में नज़र आने वाले अदाकार ने प्रवेश किया . मंद-मंद बजते हारमोनियम व झील-नक्काड़े के साथ, इधर से उधर गश्त लगाते पात्र का नेपथ्य से, पहले दोहा और फिर चौबोले में इस तरह परिचय कराया जाने लगा –

जिला एक बिजनौर है, यूपी के दरम्यान .
शहर नजीबाबाद को लो उसमें ही जान ..

पैदा हुआ उसी के अन्दर एक डाकू सुल्ताना .
बड़ा चुस्त चालाक बहादुर लाजवाब मरदाना ..
था उसका ये काम अमीरों का बस लूट ख़ज़ाना .
बेकस और गरीबों को आराम सदा पहुँचाना ..

इधर सूत्रधार ने सुल्ताना डाकू का परिचय ख़त्म किया, उधर थानेदार एस.एस.मलिक के भीतर छिपा हुआ थानेदार भीतर-ही-भीतर ऐंठने लगा . जबड़े खिंचने लगे . जब उससे नहीं रह गया, तो अपने मन की बात उसने बराबर में बैठे अपने हवलदार से कह ही दी .


“यार नेमपाल, इसका मतलब यह हुआ कि अमीरों को लूट कर ग़रीबों की मदद करो . यह क्या बात हुई . जुर्म तो आख़िर जुर्म है…चाहे अमीर को लूटो या गरीब को . ताक़तवर कमज़ोर को लूटे, या फिर कमज़ोर ताक़तवर को . क़ानून की नज़र में मुजरिम, मुजरिम होता है .”
“जनाब, नाटक-नौटंकियों में ऐसा ही होता है . असल ज़िन्दगी में थोड़ेई होता है .” हवलदार नेमपाल ने एक बेमानी-सा तर्क देकर, अपने जनाब के भीतर बैठे क़ानून के रखवाले को शान्त करना चाहा .
“असल ज़िन्दगी में क्यों नहीं होता . यह नौटंकी भी तो असल ज़िन्दगी पर ही लिखी गयी होगी ? कोई हवा में क़िस्सा थोड़े ही गढ़ा होगा…और फिर इससे समाज और लोगों के बीच क्या सन्देश देना चाह रहे हैं ? भले ही ऐसा कुछ लोगों को अच्छा लगता होगा, मगर है तो यह क़ानून का मखौल ही !” थानेदार एस.एस.मलिक के जबड़े की नसें खिंचने लगी .हवलदार नेमपाल ने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की .


इधर सूत्रधार का परिचय ख़त्म हुआ, उधर मंच पर चहलक़दमी करते खूँखार से नज़र आने वाले किरदार को देख कर, सारे दर्शक अब तक समझ चुके हैं कि यही सुल्ताना डाकू है . जो नहीं समझ पाए वे इसके इस फ़रमान को सुन समझ गये –

कान लगा कर सुनो सब मेरा फ़रमान .
भूल न हो इसमें ज़रा, रहे हमेशा ध्यान ..

मदद ग़रीबों की हरदम ऐ मेरे दोस्तों करना .
मगर दौलतमंदों की दहशत से कभी न डरना ..
लाना कुल ज़र लूट बेख़तर गले पै ख़ंजर रखना .
जहाँ तलक हो पेट यतीमों के उस ज़र से भरना ..

  “नेमपाल, यह क्या बात हुई ! यह तो सरासर क़ानून की धज्जियाँ उड़ाना हुआ . मैंने तो सुना है कि सुल्ताना अपने ज़माने का इतना ख़तरनाक डाकू था कि इससे अंग्रेज़ी हुकूमत भी हिल गयी थी . इसके लिए अंग्रेज़ों ने लन्दन से एक ख़ास अफ़सर जिम कार्बेट हिन्दुस्तान बुलाया था . इसे पकड़ने के लिए अंग्रेज़ों ने सिर्फ़ तीन सौ जवान ही नहीं लगाये थे, बल्कि उसी जिम कार्बेट को भी इस काम के लिए लगा दिया था, जिसके नाम पर एक जंगल भी है . ऐसा कर, तू देख अपने इस ग़रीबों के प्यारे को…मैं तो चला !” अपनी जगह से थानेदार एस.एस.मलिक उठते हुए बोला .
“जनाब बैठो तो सही ! अब आये हो तो देख कर ही जाओ !”
“क्या करूँ बैठ कर ? मैं यहाँ रागिनी को सुनने आया हूँ या इस वाहियात ड्रामे को देखने आया हूँ . ऐसा कर तू बैठ, मैं चला !” इसके बाद थानेदार एस.एस.मलिक सचमुच नौटंकी बीच में छोड़ बाहर चला आया . जैसे–जैसे वह अनाज मंडी से दूर होता गया उसके कानों में सुल्ताना डाकू कि गूँजती ललकार, और साज़ों के सुर-ताल मंद पड़ते चले गये .

MARI JIMENEZ

हवलदार नेमपाल ने दूर से ही देख लिया कि रात का उखड़ा उसके जनाब का मूड अब भी ठिकाने पर नहीं है . इसलिए उसने अपने आपको बचाने की बहुत कोशिश की कि वह उसके सामने न पड़े . मगर वह देर तक अपने आपको ज़्यादा देर तक नहीं बचा पाया .
“जय हिन्द जनाब !” अपने जनाब के सामने पड़ते ही नेमपाल ने सेल्यूट मारते हुए कहा .
“और कैसा रहा तेरा ग़रीबों का प्यारा ?” थानेदार एस.एस.मलिक ने अपने मातहत हवलदार नेमपाल से व्यंग्य करते हुए पूछा .
“जनाब, रात को तो बिलकुल भी मज़ा नहीं आया . अच्छा किया जो आप बीच में आ गये .”
“क्या हुआ ?” थानेदार मलिक ने हैरान होते हुए पूछा .
“रात को रागिनी नहीं थी, इसलिए लोग उखड़ गये .”
“क्याSSS, वह रात को नहीं थी ?”
“जी जनाब, यह तो बाद में पता चला कि सुल्ताना डाकू में उसका कोई रोल ही नहीं था…और जो छोटे-मोटे जैसे फूल कुँवरि रंडी और सुंदरी के रोल थे उन्हें लता और प्रभा ने निभा दिए . वैसे जनाब, कम लता भी नहीं है . सुल्ताना डाकू की फ़रमाइश पर फूल कुँवरि बनी लता ने जो दादरा सुनाया, उसे अगर आप भी सुनते तो सुनकर आप भी ग़ुस्सा भूल जाते . जबकि  सुंदरी बनी प्रभा का भी जवाब नहीं . एक से एक नग भर्ती कर रखें हैं रागिनी ने अपनी पार्टी में . लता ने जो दादरा सुनाया, सुन कर पूरी अनाज मंडी झूम उठी .” कहते-कहते हवलदार नेमपाल जैसे एक बार फिर सुल्ताना डाकू के मंच पर लौट गया,और कार्तिक की ओस से भीगी रात में फूल कुँवरि रंडी का किरदार निभाने वाली लता द्वारा गाये दादरा के ये बोल, शहद बन उसके कानों में घुलने लगे –

कान्हा तोरी तान, कलेजे मोरे कसकी
सुनती हूँ जभी होती है हालत बुरी मेरी
बैरिन है किसी जनम की ये बाँसुरी तेरी
ले लेगी मोरी जान, कलेजे मोरे कसकी .
यह बाँसुरी नहीं तेरी, आफ़त है बला है
आवाज़ जो इसकी सुनै, उसका न भला है
भुला दे सारा ज्ञान, कलेजे मोरे कसकी .
बजती है तो मैं भूलती हूँ घर के रास्ते
जब ना बजै दिल चलै, सुनने के वास्ते
तरसते दोनों कान, कलेजे मोरे कसकी .
उस्ताद इन्दरमन का तो, सुरपुर हुआ मुक़ाम
कहते हैं नथाराम जपौ, रूपराम श्याम
ये कहना जाओ मान, कलेजे मोरे कसकी .
कान्हा तोरी तान, कलेजे मोरे कसकी ..

ELKE DANIELS

थानेदार मलिक अपने मातहत के चेहरे पर आते-जाते भावों को पढ़ने की कोशिश करने लगा . पहली उसे अपने उस फ़ैसले पर रंज-सा हुआ, जिसके कारण वह बीती रात बीच शो से उठ कर चला आया था . मगर अपनी इस चूक या कहिए पछतावे को अपने मातहत के सामने कैसे स्वीकारे . इसलिए अपने इस फ़ैसले पर उसने यह कहते हुए गर्द डाल दी,”नेमपाल, वैसे यह बात तो तू भी मानता है कि सुल्ताना भले ही ग़रीबों का भला चाहने वाला रहा होगा, पर था तो एक डाकू ही न . तू ही बता कि क़ानून कि नज़र में एक मुजरिम कैसे किसी समाज का हीरो हो सकता है . अगर चोर-डकैत ही न्याय-अन्याय का फ़ैसला करने लग गये, तो इस पुलिस महकमे की क्या ज़रुरत है !”
”जनाब, ग़रीबी-गुरबत अच्छे-बुरे में फ़रक़ नहीं देखती है . उसे तो अपने भले से मतलब होता है . वैसे जनाब, सुल्ताना डाकू जैसी बहुत सारी मिसालें हमें देखने-सुनने को मिल जाएँगी . मैंने तो सुना है ही कि अपने यूपी, हरियाणा, राजस्थान में ही नहीं बिहार-उड़ीसा के कई इलाक़ों में इसे बहुत मानते हैं . यहाँ तक कि इसकी यह नौटंकी भी खेली जाती है .”
“नेमपाल, लगता है इस सुल्ताना ने बड़ी ग़रीबी देखी है…ग़रीबों पे होने वाले जुलम देखे हैं . क्या करूँ, इसमें हमारा भी क़सूर नहीं है . पुलिस वाले जो ठहरे . हमें सिर्फ़ बुराई-ही-बुराई दिखाई देती है .” थानेदार एस.एस.मलिक एकाएक दार्शनिक होता चला गया . यह बात दूसरी है कि इस देश में बहुत से महकमों की तरह हमारे पुलिस महकमे के लिए भी दार्शनिक होना उनकी सेहत के लिए फ़ायदेमंद नहीं है .

“आप सही कह रहे हो जनाब .” हवलदार नेमपाल भी थोड़ी देर के लिए अपने जनाब के दर्शन में जैसे आकंठ डूब गया .
“वैसे आज तो आख़िरी तमाशा है न ?” थानेदार ने अपनी दार्शनिकता से बाहर आते हुए पूछा .
“जी जनाब, क़त्लजान आलम है .”
“तुझे तो पता होगा इसका क़िस्सा क्या है ?”
“जनाब, ज़्यादा तो पता नहीं है . बस, इतना पता है कि पण्डित नथाराम शर्मा गौड़ ने इस नौटंकी या कहिए सांगीत को तीन भागों में लिखा है – क़त्लजान उर्फ़ ख्वाबे हस्ती, क़त्लजान उर्फ़ नक़ली फ़क़ीर और क़त्लजान उर्फ़ मुहब्बत का फूल  . इसका कुल-जमा क़िस्सा यह है जनाब कि ईरान का एक शाहज़ादा राहतजान सपने में एक सुंदर शाहज़ादी को देखता है . शाहज़ादा राहतजान इस शाहज़ादी को पाने के लिए परिस्तान तक चला जाता है . परिस्तान में स्याहदेव जादूगर इसे पत्थर का बना देता है . अब पूरा क़िस्सा तो जनाब तभी पता चलेगा जब आज रात को इस नौटंकी को ख़ुद अपनी आँखों से देखोगे !” हवलदार नेमपाल ने तीन हिस्सों में लिखे इस क़िस्से को बड़ी चतुराई से तीन पंक्तियों में निपटा कर, अपने जनाब से पीछा छुड़ा लिया .


थानेदार एस.एस.मलिक ने मन-ही-मन इसी समय तय कर लिया कि आज वह इस नौटंकी को बिलकुल नहीं छोड़ेगा . वरना ऐसा न हो कि वह सुल्ताना डाकू उर्फ़ ग़रीबों का प्यारा  की फूल कुँवरि रंडी द्वारा सुनाये गये दादरे की तरह, क़त्लजान आलम  के क़िस्से से भी वंचित रह जाए .

LEYLA KAYA KUTLU

पहले ही दृश्य ने थानेदार एस.एस.मलिक को एहसास करा दिया कि इस नौटंकी के बारे में हवलदार नेमपाल ने ग़लत नहीं कहा है . जैसे-जैसे क़त्लजान, ख्वाबे हस्ती और नक़ली फ़क़ीर से होते हुए मुहब्बत के फूल में दाख़िल हुआ, और रात के बढ़ते अँधेरे के साथ एक-एक कर राहतजान, जाँ निसार, जानजहाँ, मलिका, जान आलम, आफ़तजान, मुहब्बतजान, इल्लतजान, आरामजान, सलामतजान, दुश्मनजान, काले देव, लाल देव, शैतान देव, खोजा, धूमधूसर चन्द, महरंगरेज़ शाह व हंसा जैसे अजीबो-ग़रीब किरदारों की भूल-भुलैया में वह भटक गया .
राहतजान और आरामजान के बहरतबील में पगे संवादों के बीच तो मानो जंग-सी छिड़ गयी-

ये कटारी-सा कलमा तुम्हारा लगा, रहा दिल को तअम्मुल सबर ही नहीं .
होके बेदम अदम को रखै दम क़दम, तेरे देखे बिना हो गुज़र ही नहीं ..
सिवा तेरे सनम मेरे जीने का कुछ, कहीं आता सहारा नज़र ही नहीं .
तेरे सर की क़सम मेरा सर काट ले, तौ भी दिलबर मरूँगा उजर ही नहीं ..

राहतजान के इस सख्त अहद पर आरामजान उससे शिकायत करती है-

इस अमर की अगर मुझे होती ख़बर, यहाँ हरगिज़ न आती ख़ुदा की क़सम .
ऐसी मुझको परी ने करी बावली, मेरी दुनिया से सारी छुटाई शरम ..
ऐसी जवानी दिवानी जलै या ख़ुदा, तौबा-तौबा जो उलफ़त में रक्खा क़दम .
बेवफ़ा की मुहब्बत के फन्दे फँसी, हा सितम है सितम है सितम है सितम ..

आरामजान की इस शिकायत पर राहतजान लड़खड़ाते हुए जवाब देता है-

तेरी दूरी से मुझको सबूरी न हो, मैं जिऊँगा नहीं तेरे सर की क़सम .
छोड़ी शाही गदाई ली तेरे लिए, छाने कोहो  बियाबाँ उठाये अलम ..
तेरी उलफ़त में आफ़त हज़ारों सही, जब मयस्सर हुए ये मुबारिक क़दम .
होके दिलबर दिलोजाँ दुखाती हौ दिल, हा सितम है सितम है सितम है सितम ..


राहतजान और आरामजान के संवादों को, अत्तन खां द्वारा कोसी कलाँ (मथुरा) से लायी गयी ताज़ा-ताज़ा झील और उसके सामने रखे नक्काड़े पर पड़ती चोब की टंक, ढोलक की थाप और हारमोनियम से निकले ज़ख्मी सुरों ने और तीख़ा बना दिया . इससे पहले कि क़त्लजान आलम के तीसरे हिस्से यानी मुहब्बत के फूल के आख़िर में आरामजान राहतजान को उलाहना देती, तभी एक छत पर पर कुछ हलचल-सी हुई, जो देखते ही देखते चीखों में बदल गयी .

आख़िर वही हो गया जिसका थानेदार एस.एस.मलिक को पहले दिन से डर था . वह तुरन्त इधर-उधर तैनात सिपाहियों को लेकर अहाते से बाहर आया और उसी छत की तरफ़ दौड़ कर गया . वहाँ जाकर देखा तो पता चला कि इस मकान के छज्जे पर बैठी भीड़ के वज़न से उसका एक हिस्सा टूट गया . ग़नीमत यह है कि पूरा छज्जा नहीं टूटा और एक बड़ा हादसा होने से बच गया . दो-तीन दर्शकों को ही मामूली चोटें आयीं जिन्हें उपचार के बाद छुट्टी दे दी गयी .



थानेदार एस.एस.मलिक जब तक इस थाने में रहा, उसके कानों में रह-रह कर कभी पुत्र-वियोग में तड़पती तारामती का रुदन गूँजता, तो कभी शाहजहाँ के सिपहसालार अमरसिंह राठौर के धोखे से किये गये क़त्ल के बाद उसकी बेवा हाड़ी रानी का चीत्कार गूँजने लगता . कभी रात के सन्नाटे में आकर स्याहपोश की जमालो कानों में आकर कूकने लगती, तो कभी आरामजान का राहतजान से मनुहार आकर टकराता . अलग-अलग किरदारों में जब-जब रागिनी मंच पर आकर पंचम सुर में सुर उठाती, तब-तब मंत्रमुग्ध थानेदार एस.एस.मलिक भूल जाता कि यह सचमुच रागिनी के गले से निकली आवाज़ है, या इन सांगीत-नौटंकियों के पात्रों की आवाज़ है ? नौटंकी की टीपदार स्वर लहरी जब रात के सन्नाटे को बींधती हुई, किसी विशाल सदानीरा में ऊँचाई से गिरते असंख्य झरनों की तरह उसके कानों से टकराती, तब वह मानो सुधबुध खो बैठता . हर बंदिश और मुरकी पर रागिनी की देह जैसे एकाकार हो जाती . ऐसा लगता स्वर और सुर उसके कंठ से नहीं, बल्कि समूचे देह-प्राण से झर रहे हैं . सदाबहार सुरों की बारीक पच्चीकारी, बोलों की नफ़ासत, बंदिशों की रमणीयता और रेशमी लयात्मकता – सबकुछ लासानी .


इधर हवलदार नेमपाल, उसका तो हाल ही मत पूछो . उसके लिए तो पण्डित नथाराम शर्मा गौड़ की लिखी नौटंकियों के बोल मानो भजन-आरती बन गये . एक-एक दृश्य उसकी स्मृति में अमिट भित्ति चित्रों की तरह ऐसे छपे हुए हैं कि उनका वजूद मिटने के बजाय और गहरा होता जा रहा है . हाथरस और बल्लभगढ़ कि ज़र्द-सी मीठी यादें जब-तब स्मृतियों के झरोखों से ताक-झाँक करती हुई कब ठिठोली कर उसके पास से गुज़र जाती, नेमपाल को पता ही नहीं चलता . सुरों के इस हीरामन के सपनों में किसी हीराबाई का चेहरा नहीं बल्कि कानों में बस रागिनी की  खनकती आवाज़ गूँजती है .


जिन दिनों पूरा देश अपने एक पड़ोसी देश से युद्ध में मिली हार के बाद गहरे सदमे में डूबा हुआ था, उससे कुछ महीने पहले भागलपुर के हिन्दुस्तान थिएटर से शुरू हुई सुरों की यह  यात्रा, बांग्ला देश की मुक्ति के लिए लड़े गये भारत-पाक युद्ध के ख़त्म होते-होते एक आँधी में तब्दील हो गयी . यह आँधी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ब्रज से लेकर दक्षिण हरियाणा के मेवात, और दक्षिण हरियाणा से लेकर पूर्वी राजस्थान की स्कूल-कॉलेज प्रबंध समितियों व स्थानीय कमेटियों के लिए चंदा उगाहने की मानो टकसाल बन गयी .

MICHELLE GREEN



इन्हीं दिनों बाबू गंगा सहाय इंटर कॉलेज की बनी भव्य इमारत के सामने खड़ा होकर हवलदार नेमपाल इसे निहारता है, तो उसके फेफड़ों में ताज़ा हवा भरती चली जाती है . मगर साथ में उसे यह देख कर दुःख भी होता है कि विद्या के जिस मंदिर से दौड़, दुबोला, चौबोला, बहरतबील, दादरा, ठुमरी, लावनी, शिकिस्त, सोहनी, झूलना में लिपटे सुरों के अंकुर फूटने चाहिए थे . झील-नक्काड़े की खनक व धमक सुनाई देनी चाहिए थी . हारमोनियम से निकले कण, खटके, धुन, लय-बाँट, सुरों के संकोच व विस्तार की तरंगें फिज़ा में तैरती हुई महसूस होनी चाहिए थी . कहरवा, दीपचन्दी और खेमटा तालों में पगे यमन, भैरवी, कलिगंडा, आसावरी, जोगिया, देस जैसे राग-रागनियों के बोल सुनाई देने चाहिए थे, आज एक व्यावसायिक संस्थान में तब्दील हो चुके इस ग्लोबल स्कूल से साम्राज्यवादियों के लिए उच्च रक्तचाप व मधुमेह से ग्रस्त तथा नैराश्य व विषाद में डूबी अयोग्य पलटन निकल रही है . वह जब भी इस पुराने इंटर कॉलेज के बग़ल से गुज़रता है, और रुक कर इसकी दीवारों से कान सटा कर खड़ा होता है, तो लगता है बिजली कॉटन मिल के सुरुचि उद्यान में खोए सुरों के कण-खटके, शहद की बूँदों की मानिंद उसके कानों में टपक रहे हैं . नेमपाल जब भी इस कॉलेज की दीवारों को धीरे-धीरे सहलाता है, तो किसी शो में इसी रागिनी का कहा यह शे’र उसके कानों में सरगोशी-सी करके चुपचाप निकल जाता है-
सब ज़िन्दगी का हुस्न चुरा ले गया कोई .
यादों की कायनात मेरे पास रह गई ..

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दलित महिलाओं को मंदिर प्रवेश से रोका: महिलाओं ने की शिकायत

मुकेश कुमार 

बिहार के भागलपुर जिले के एक गांव में  दर्जनभर महादलित महिलाओं को मंदिर में घुसने से पिछले शुक्रवार को रोक दिया गया गया था.  इन महिलाओं को  200 साल पुराने काली मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया. इसके बाद इन महिलाओं ने प्रशासन के समक्ष एक लिखित शिकायत दर्ज कराई और उनसे मामले में हस्तक्षेप करते हुए न्याय दिलाने की मांग की. मंदिर तीन जातियों के लोगों की जमीन पर बना है, जिनमें एक दलित जाति के परिवार की जमीन भी शामिल है. मुकेश कुमार की रिपोर्ट आइये सुनें क्या कहती हैं महिलायें:

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यक्ष-प्रश्न और अन्य कविताएँ

अमृता सिन्हा


स्वतंत्र लेखन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित संपर्क: a.sinhamaxnewyorklife@ymail.com

अस्तित्व 
यायावर मन
भटकता, पहुँचा है
सुदूर , संभावनाओं के शहर में
बादलों से घिरा
ऊँचाईयों में तिरता, फिसलता सा
वर्षा की बूँदों को चीरता
उतर आया है मेरा इन्द्रधनुष
काली सर्पीली सड़कों पर
दौड़ता, भागता, बेतहाशा
नदी के बीचों- बीच सुनहरे
टापू को एकटक निहारता ।
करवटें लेती लहरों से खेलता
ऊँचे – ऊँचे दरख़्तों में समाता
जाने कहाँ-कहाँ विचर रहा
मेरा इन्द्रधनुष ।
तभी नन्हा सा छौना, बेटा मेरा
काटता है चिकोटी , बाँहों में मेरे
अनायास ही टूटती है तंद्रा मेरी
पूछता है मुझसे
माँ क्या बना  ?
जागती हूँ मैं स्वप्न से
कटे वृक्ष की तरह
और परोस देती हूँ, थाली में
हरे-भरे मायने और रंग- बिरंगे शब्द ।

     यक्ष-प्रश्न

हाँ, याद है उसे
माँ की दी हुई नसीहतें ।
कूदती-फाँदती, दरख़्तों की दरारों
से झाँकती, गिलहरियों सी,
कभी रंग – बिरंगी तितलियों सी
उड़ जाती हैं बेटियाँ ।
बात- बात में टोकती , आँखें तरेरती
माँ की हिदायतों के बीच
बचपन में ही बड़ी , बहुत बड़ी
होती जाती हैं , बेटियाँ ।
भूल ही नहीं पाती वो ,बचपन
की हँसी , बेबाक़ , बेसाख़्ता , बेमानी
रोक दिया था माँ ने तब, बतलाया था उसे
यूँ बेसाख़्ता हँसा नहीं करती हैं ,बेटियाँ ।
मालूम है , सीखना होगा उसे
हर सलीक़ा ज़िन्दगी का
रखना होगा ख़्याल हर सलवटों का
ढकना होगा दुपट्टे से बदन अपना
लगाना होगा चेहरे पर
दही बेसन का मिश्रण
बचना होगा धूप के तांबई रंग से
सहेजना होगा लंबे बालों को
क्योंकि पराया धन होती हैं , बेटियाँ ।
जुगनू से टिमटिमाते सपनों  को
भरना होगा काजल की डिबिया में ,
लपेटना होगा , चुपचाप ,पनीली आँखों से,
छितरे बचपन के ऊनी गोले को ।
एक देहरी अनजान सी,संकरी है गली जिसकी,
बेग़ाना है समूचा शहर, आँखों से झरता समंदर
विस्मृत सी , सोचती है वह अक्सर
कहीं अम्माँ  भूल तो नहीं गईं, भेजना
उसकी हँसी की गठरी ,छोड़ आई थी जिसे वहीं पर,
इसी ऊहापोह में तय करती जाती हैं ,
करछी और कढ़ाही के बीच का सफ़र , बेटियाँ ।

अहसास

उगा सूरज
रोज़ की तरह,
आसमान की सीढ़ी से उतरा
और, बिखर गया छम्म से
मन के हर कोने में ।
नख-शिख तैर गई ज्योति कोई
कौंध गई रोम रोम में,
उल्लास से भरी मैं
चुनती हूँ पलकों से ,फूलों के उजास,
साँसों से घुलती हवा में सुगंध,
त्वचा से मौसम की सिहरन,
सोचती हूँ,
क्यों सब बदला बदला
सा है , इस बार ?
खिड़की के पल्ले को
ज़बरन ठेलता हवा का
तेज़ झोंका,
बिना इजाज़त घुसती
वारिश की मदमस्त फुहारें !
भीगने लगी हूँ मैं, आँखें मींचे
बूँदें समेटती मेरी देह,
केवल त्वचा ही नहीं भीग रही,
भीगती तो थी हर बार
तो नया क्या है इस वारिश में ?
बूँदें नहीं हैं ये,केवल जल की

दावानल

क्षत-विक्षत अस्तित्व
रिश्तों की थकान,
खिड़की से झाँकता,
टुकड़ा भर आसमान ।
संपूर्णता को निगलता
आक्रोश का दावानल,
दीवारें अपराधी, छत मुजरिम
हवा में पसरा संशय का ज़हर ,
भयग्रस्त है ज़मीं, आतंकित मन
यातनाओं का अंतहीन सफ़र ।
समंदर को लीलता अंधेरा,
स्याह रातें, लहरें सोखती रेत ,
अब किसी खिड़की से
नहीं दिखेगा कोई आसमान,
अब किसी समंदर से नहीं
फूटेगी कोई हँसी ,
क्योंकि चुकता करना है
सब, पिछले क़र्ज़ों का हिसाब ।

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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