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सवाल-दर सवाल स्त्री की चिंता (रेखा कस्तवार की किताब ‘किरदार ज़िंदा है’)

धनंजय वर्मा

प्रख्यात आलोचक संपर्क: 9425019863



कोई भी रचना-खासकर कहानी और उपन्यास-एक ऐसी खुली संरचना होती है (होनी चाहिए) जिसमें पाठक, चाहे तो, कहीं से भी प्रवेश कर सके। पाठक के लिए रचना का पाठ ही महत्वपूर्ण होता है। इधर आलोचना में पाठ की सत्ता और महत्ता को नये से परिभाषित किया जा रहा है-खासकर विसंरचनावाद में। जैक डेरिडा के प्रभाव से ‘पाठ‘ का पठन न केवल महत्वपूर्ण हो गया हेै वरन यह भी माना जा रहा हेै कि रचना का अर्थ ‘पाठ‘ में पहले से विद्यमान या अवस्थित नहीं होता, वह तो ‘पठन‘ से उत्पन्न होता है और लगभग हर पाठक के लिए एकाधिक अर्थ की सम्भावनायें अन्तर्निहित होती हैं। आखिरकार हर पाठक किसी रचना को ‘अपने लिए‘ और ‘अपनी नज़र‘ से ही पढ़ता है। बकौल एफ.आर.लीविस ‘आलोचक का काम यह है कि वह ‘पाठ‘ पर अपना ध्यान केंद्रित करे  और उससे महज अपनी सहानभूति के प्राप्त अनुक्रिया या प्रतिक्रिया व्यक्त करने की बजाय कृति की भाषिक संरचना के गहन अध्ययन से, उसे एक जीवित माध्यम की तरह अनुभूत करे और अपने परिपक्व प्रतिबोध से उसकी ‘पुनर्रचना करे‘। हिलिस मिलर ‘पाठ‘ के रूप और संरचना तक सीमित न रह कर ‘अनु-भव‘ से ‘अर्थ ‘ तक पहुँचने और फिर उसकी पुनर्रचना की वकालत करता है तो ज्योफ हार्टमैन शेक्सपीयर के हेमलेट के संवाद से अपनी बात कहता है-’पाठ उस भूत की तरह होता है जो पाठक को चुनौती देता है कि वह उसे समझे’।….

इस पसमंजर में रेखा कस्तवार की पुस्तक-’किरदार ज़िन्दा है’ का पाठ-प्रक्रिया और  कथाआलोचना दोनों-दृष्टियों से एक खास महत्व है। यह अड़तीस कथाकारों की चालीस रचनाओं के किरदारों को सम्भावना के नाम से लिखे गए ऐसे आत्मीय पत्रो का संकलन है, जिन्हें सही पतों की तलाश है।’सम्भवना’ और ’तलाश’ दोनों ऐसे अल्फाज़ है जिनमें खुले दिलो दिमाग के नुकूश हैं। रेखा चर्चित कहानी या उपन्यास में किरदार के दरीचे से दाखिल होती हैं और उन्हीं के निगाहे-ओ-नजरिए कहानी, उपन्यास के मूल कथ्य और सार से आत्मीय साक्षात्कार करती-करवाती हैं।

रेखा कस्तवार

कथा में किरदार की अहमियत पर हम अपनी कथा-आलोचना की पुस्तक-त्रयी की पहली पुस्तक कहानी का रचना शास्त्र में विस्तार से लिख चुके हैं। यहाॅं प्रसंग वश संक्षेप मेंः हमने देखा है कि किसी भी कहानी (या उपन्यास में भी) उसके परिवेश और अनुभव संसार और फिर दोनो की अंतर्क्रिया से जो भावबोध रूपायित होता है उसकी अभिव्यक्ति के मूर्तरूप होते हैं-वे मनुष्य, वे चरित्र, जिनके जीवन और संघर्ष में हमारी आपकी दिलचस्पी होती है। उन्हीं में हम अपने और व्यापक मनुष्य के जीवन और संघर्ष की छाया देखते हैं। इस दुनिया की कोई भी स्थिति घटना इसलिए महत्वपूर्ण होती है कि उसके केन्द्र में मनुष्य होता है, वह मनुष्य से सम्बद्ध होती है या मनुष्य पर उसका असर होता है। आप गौर करें तो अन्तर्बाबाह्य  जीवन और जगत से व्यक्ति की अन्तःक्रिया के नतीजतन जो अनुभव होते है, वही रचना के मानव बिम्बों में रूपायित होते हैं, और मुख़्तलिफ किरदारों  में ढ़लकर रचनाकार के अनुभव-संसार की समृद्धि और विविधता के प्रतीक और प्रतिनिधि हो जाते हैं। हम देखना चाहते हैं कि कहानी और उपन्यास में-से उभरने वाला किरदार, उसके क्रिया-कलाप, उसकी गतिविधियाॅं, उसका सोच विचार, उसका आचरण-व्यवहार कितना यथार्थ, वास्तविक और आश्वस्तकारी है। अपनी सामाजिक परिवेश और स्थिति, भावबोध और अनुभव संसार से वह कितना संगत या असंगत है। वह हमारे जीवन जगत, देश-काल के केन्द्रीय मनुष्य से कितना समरस है। वह अपने युग-समाज-वर्ग और स्तर  का कैसा-कितना प्रतिनिधि है। जिस वर्ग और स्तर से वह आता है उससे वह किस हद तक , कितनी प्रमाणिकता से रूपायित  और कितना प्रासंगिक है?

 इन पत्रालेखों में रेखा चर्चित क़हानियों और उन्यासों के स्त्रीपात्रों से ही मुखातिब हैं। उनकी शोधपरक पुस्तक -‘स्त्री चिंतन की चुनौतियों’ के बाद स्त्री से संवाद केंन्द्रित इस पुस्तक के पत्रालेख एक दैनिक समाचार पत्र में धारावाहिक प्रकाशित हुए थे। वे सीधे आम आदमियों से सम्प्रेषित हैं-उनकी सक्रिय भागीदारी के साथ। उनका सही पता वे कथाकार भी हैं जिन्होंने इन किरदारों की रचना की है। चूंकि बकौल एफ.आर.लीविस ’एक सच्ची साहित्यक रूचि’मनुष्य, समाज, सभ्यता और संस्कृतिक रूचि’ होती है, चुनांचे ये पत्रालेख हमारी पूरी सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था से कर्णधारों और बुद्धिजीवियों को भी सम्प्रेषित हैं।

इन पत्रालेखों में रेखा की चिंता का केन्द्र है-‘पूर्ण व्यक्ति की तरह निश्शंक कैसे जिए स्त्री ?….‘माइ लाइफ’ की इज़ाडोरा डंकन से वे कहती हैं-‘इज़ाडोरा तुम्हारे जीवन मेें कीमत थी जीने के ललक की, जिसे तुमने नृत्य,इतिहास, दर्शन, अध्ययन, पर्यटन, मित्रता, पे्रम के माध्यम से पाने की कोशिश की (लेकिन) लोगों को याद रहे तुम्हारे प्रेम प्रसंग। तुम्हारे देश (अमेरिका) और तुम्हारे काल (1878-1927)के तुम्हारे प्रश्न तब भी वक्त के आगे के प्रश्न थे, आज वक्त के आगे के प्रश्न हैं।’और ठीक वज़ह है कि यह पूरी पुस्तक ही प्रश्नों का एक अन्तहीन सिलसिला बन जाती है-प्रश्न जो वेदव्यास के ‘महाभारत’ की द्रोपदी से शुरू होकर सोना चैधरी की ‘पायदान’ की कशिश उर्फ आॅंचल तक अनवरत पूछे जा रहे हैं और कदाचित पूछे जाते रहेंगे। प्रतिभा राय की ‘याज्ञसेनी’ में द्रौपदी के चीर हरण पर रेखा पूछती हैं-‘एक जिज्ञासा और है द्रौपदी ! जुए में दाॅव पर लगाने क्या उस वक़्त युधिष्ठिर के पास कोई और भी पत्नी थी जिसे दाॅव  पर लगाना ‘प्रतिष्ठा का विषय था युधिष्ठिर के लिए ?…(याद करें पाॅंचों पाण्डवों की द्रौपदी के अलावा भी अपनी-अपनी पत्नी बल्कि पत्नियाॅं और उनसे संतानें भी थीं-जिनका कुछ व्यौरा रेखा ने दिया भी है) फिर तुम्हीं क्यों? और परिणाम में तुम्हें मिला चीर हरण!… राज्य सभा में बैठे -बिके हुए-सत्ता से डरे हुए नपुंसक! द्रौपदी! तुम्हें आश्चर्य होगा, उनमें से आज तक एक भी मरा नहीं है। सब जीवित हैं द्रोपदी ! मैं शर्मिन्दा हूॅं और बहुत दुखी भी बावजूद इसके कि तुम्हारा प्रतिरोध और नकार भारतीय साहि़त्य में औरत की पहली चीख की तरह दर्ज है।.”.. यह पवित्र क्रोध, यह शर्मिन्दगी और इतनाऽऽऽ दुख अकेली रेखा का नहीं है, हम सबका है (होना चाहिए)और द्रौपदी की चीख के पहले हमें रामराज्य की सीता की चीख भी याद करनी चाहिए जो उसने धरती में समाते हुए लगायी थी। ..”फिर महाप्रयाण के समय जब तुम धराशायी हो गईं थीं, युधिष्ठिर स्थिर स्वर मे(कैसे) कह सके-”द्रौपदी अपने पतन के लिए स्वयं(उत्तर)दायी है। अर्जुन को वह अधिक चाहती थी। यही उसका पाप था।?…यह कैसा अनर्थ द्रौपदी! तुम पत्नी तो वस्तुतः अर्जुन की ही थीं। और फिर अध्यादेश-पीछे मुड़कर मत देखो”।..पितृ सत्ता के एजेन्ट की शक्ल क्या इससे भिन्न होगी?” और रेखा का फिर यह प्रश्न-(मिर्जाहादी रुस्वा के ‘उमराव जान अदा’ की अमीरन के सन्दर्भ में)” परिवारों की प्रतिस्पर्धा, प्रतिष्ठा, और प्रतिरोध के दंगल में दाॅव पर बेटियाॅं ही क्यों लगती हैं ?”…प्रभा खेतान की ‘छिन्न मस्ता’ में ‘प्रिया’ से वे पूछती हैं-”परिवार को बनाने, सॅवारने का महती उद्देश्य क्या स्त्री के हार जाने, रुक जाने की कीमत पर ही सम्भव है?”

विवाह संस्था पर भी उनका प्रश्न उतना ही पुराना है, जितनी यह संस्था!-”द्रौपदी ! तुमसे मिलकर जाना कि तुम उनके लिए थीं, वे तुम्हारे लिए नहीं ! फिर जो सबकी होती उसका कौन होता है?” या हमारे जमाने में भी ” विवाह संस्था के बाहर खड़ी स्त्री आज भी प्रश्नचिह्न और असम्मानजनक क्यों है ?”..”स्त्री के पुनर्विवाह का प्रश्न (यदि उसके बच्चे भी हैं तब) पुरुष के पुनर्विवाह सा सहज क्यों नहीं होता ?इससे भी आगे-”पुरुष के विवाहेतर सम्बन्धों में जितनी सरलता और दम्भ होता है उतनी ही सहजता स्त्री के लिए क्यों वर्जित है?”या ”पति द्वारा परित्यक्ता स्त्री समाज के कानून को रद्द करे यह कैसे सम्भव है?”या अविवाहित दैहिक सम्बन्धों की जैसी आज़ादी पुरुष को है, वही स्त्री के लिए ‘पाप’क्यों है ?”प्रश्न विकराल हो जाता है जब ”ज़िन्दा रहना और ‘सतीत्व’बचाना (में से)कोई एक विकल्प चुनना ज़िन्दगी की शर्त बन जाए तब किस पगडंडी को पकड़े स्त्री ?”और सर्वाेपरि इस पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था में ‘स्त्री का घर’ कहाॅं है ?”बचपन में ‘पिता का घर’ और विवाह के बाद ‘पति का घर’ और बुढ़ापे में ‘बेटे-बहू’ का घर। मायके में भी स्त्री का घर कहाॅं बचा रहता है ?रेखा की शदीद तकलीफ है-”जन्म जात ‘बेघर स्त्री’ बेघर होने का संताप झेलती रहती है और बेघर कर दिए जाने के डर में ही जीती  हैं।” वर्जीनिया वुल्फ का ‘अपने कमरे का प्रश्न आज भी जिन्दा है-मेरा घर कहाॅं है?या स्त्री का अपना घर क्यों होना चाहिए।”

 हमारे मौज़ूदा पुरुष प्रधान समाज में स्त्री भी ज़र और ज़मीन की तरह एक ‘ सम्पत्ति’ है जिस पर पुरुष का अधिपत्य और एकाधिकार है। उसके ‘मेलशावनीज्म’ की शुरूआत होती है स्त्री की यौन शुचिता से। विवाह के तुरन्त बाद ‘स्त्री कौमार्य’के मिथक और ग्रन्थि की जड़ें कितनी गहरी हैं और फिर ‘हनीमून की प्रथा ताकि ‘अपने बच्चों ’के बारे में निश्चिन्त हुआ जा सके। रेखा का प्रश्न है कि ”निष्ठा क्यों यौन शुचिता” से निर्धारित होती है?फिर हमारी व्यवस्था में नपंुसक होकर भी पुरुष मर्द बना रहता है और सारे लांछन स्त्री के हिस्से में क्यांे आते हैं? ”क्यों कुल की सरदारी बेटियों को नहीं जाती?” इससे भी आगे-”अतिथि के शयन कक्ष में जाने का यदि पत्नी का मन न होता हो या पति से मन न लगे, मन में परझाईं-सा कोई झांकता हो तो क्या करती होगी स्त्री ?” या ”पति बाहर के रिश्तों के बाद घर में स्फूर्ति क्यों महसूस करता है” और मंजुल भगत की ‘अनारो’से एक सवाल -‘फिर क्या हुआ अनारेा! कि तुम्हारे अंदर यह आकांक्षा जागी रही कि गंजी का बाप तुम्हारे बराबर आकर खड़ा भी हो जाय? क्या औरों की तरह ही पति को परमेश्वर समझती हो?”..बजरिए सआदत हसन मंटो की इनायत उर्फ नीति-‘तुमने फिर मनमर्जी की । किसी मर्द से आसरा मांगने से इंकार किया। अपने जीवन की बागडोर खुद अपने हाथों में थाम ली। नकेल अपने हाथों में रखनं वाले (मर्द) कैसे बरदाश्त करते ? औरत की पहचान मर्द से उसके रिश्ते के अनुपात से तय होती है। ख़ुदमुख़्तार औरत (किसी केा) नहीं चाहिए। ’’अरुण प्रकाश की अच्छी लड़़की/बहुत अच्छी लड़की की ‘अनिता राव’ के बारे में यह फबती कितना कुछ कहती है-”यार मुझे तो इस कन्या पर तरस आता है। अरे यहाॅं बैठकर कुर्सी तोड़ती रहती है, बेकार दफतर दफतर जाकर खून सुखाती है। मिसेज राव कुछ भी कर ले -जींस की पेेन्ट पहन ले, सिगरेट पी ले लेकिन मर्द कैसे बन सकेगी? ”इसी से जुड़ा है सोना चैधरी के ‘पायदान’की कशिश उर्फ आॅचल का यह प्रश्न-”बाहर के मर्द से असुरक्षा और घर के मर्द से अपमान जनक में कम दमघोंटू क्या है?”

औरत के नुक्त -ए-नजरिए से देखिये तो ये पूरी समाज व्यवस्था कितनी इंसानी और बराबरी पर टिकी है। बकौल रेखा ”क्यों दोहरा-तिहरा अभिशाप झेलती हैं स्त्रियाॅं ? कभी नस्ल, कभी जाति, कभी वर्ग और अक्सर लिंग भेद के कारण?” या फिर औरतें जो कभी तन के कपड़े, कभी स्तन के दूध, कभी वापस घर लौटने के लिए ट्रेन के टिकट के लिए बार-बार भोगी जाती हैं, उनकी अपनी कितनी मर्जी होती होगी वहाॅं ?”यही नहीं रेखा की चिंता यह भी है -”सुबह से शाम तक हाड़ तोड़ मेहतन और बदले में पेट की आग के लिए कुछ समिधा। इतना मुश्किल जीवन क्यो है? नींद भर सो लेना या थोड़ी देर सुस्ता लेना जहाँ अपराध हो जाता है, ऐसे अन्तहीन अनंन्त  श्रम में जीवन धॅसाती पहाड़ी स्त्रियों के जीवन मेें कैसे कुछ बदलाव आए?”

मौजूदा लगातार विकराल होती जा रही हमारी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में रेखा का मौज़ू प्रश्न है-”चीजों का बाहुल्य, फिर भी मोहताजी ! जब खाना इतना मौजूद है  तो लोग भूखे क्यों मरते हैं?जब ज्ञान इतना मौजूद है तो वे जाहिल क्यों रहते हैं?” इसीलिए रेखा का जे़हनी सरोकार यह भी है-”कामकाजी स्त्री जगत की ‘फिगर’, वक्त ओर कैरियर’ के बहाने निर्धन लड़कियों की कोख की तलाशें जाने (हमें) किस गंतव्य तक पहुँचायेगी?”या ”बिना शिक्षा, हुनर और पैसे वाली स्त्री के लिए ज़िन्दा रहने की लड़ाई इतना मुश्किल क्यों है?”उस पर धर्म की वह व्यवस्था जिसकी आधार शिला ‘अहिंसा’ कही जाती है लेकिन जो स्त्री से उसका बचपन भी छीन लेती है। ”साढ़े पाॅंच बरस की उम्र में साध्वी बनने का निर्णय! क्या तुम सक्षम थीं?” सारी दुनिया का कानून आत्मनिर्णय के अधिकार की बात करता है। यहाॅं धर्म की जय जयकार के नीचे कितनी सिसकियाॅं दबी पड़ी हैं ? दीक्षा के इस संसार में पुरुषों के अनुपात में स्त्रियाॅं इतनी अधिक क्यों हैं?”

इसी से लगा-लिपटा सवाल हमारी न्याय व्यवस्था का है-”उबाऊ, थकाऊ और बिकाऊ  न्याय व्यवस्था क्यों जीवन के कितने ही महत्वपूर्ण वर्ष खा जाती है?…”कवि लीलाधर मण्डलोई ’की दो कविताएॅं बेेसाख्ता याद आ गईं ”मेहर की प्रथा/क्रांतिकारी विचार है/कहा-उन्होंने/आह!यहनहीं लौटाता बीती हुई जवानी/अम्मी ने कहा।” और ”रोने की वजह तलाक़ नहीें/इसमें लग गया इतना समय/ कि शुरु न हो सका दूसरा जीवन।”इसीलिए रेखा का सवाल है-”यह न्याय इतना बर्बर क्यों है? औरत को रोंदने वाले दहाइयों में होते हैं, दर्शक सैकड़ों में, विचारक हजारों में, पाठक लाखों में पर गवाह एक भी  क्यों नहीं होता?” रेखा को हैरत है कि ”ये पढ़ी लिखी पैसा कमाती लड़कियाॅं घर में हिंसा का शिकार होने से बच क्यों नहीं पातीं? ” माॅं की घुट्टी में मिले संस्कार जिस मानस का निर्माण करते हैं- क्या वह कोई विकल्प सौंप सकता है?” उनकी यह टिप्पणी कितनी सटीक है-”धरती और स्त्री एक साथ रौंदते-भोगते हैे।-सत्ताधीश।”

यह कितनी बड़ी विडम्बनाा है कि रिश्तों की सारी त्रासदियाॅं भी स्त्री के हिससे मेें ही आती हैं। अरुण प्रकाश की ‘नीलम’ से रेखा कहती है -”तुम उनके (माता-पिता-भाई) रोजी रोटी, ब्रेड-बटर कमाने की अच्छी मशीन (क्यों) बनी रहो?” सवाल सिर्फ रिश्तों के दोहन का भर नहीं है उससे भी अधिक विचलित कर देने वाला सवाल है-”प्रिया ! कैसे झेल पाईं तुम अपने किशोर होते शरीर पर सगे भाई की नोंच-खसोट”? और कितनी बड़़ी बदकारी से जुड़ा यह सवाल -”बचपन का साथ, बाप-बेटी का रिश्ता गोश्त गर्म होते ही बदल क्यों जाता है” सच कहती हैं रेखा कि ”बचपन से बलात्कार सिर्फ हादसा ही नहीं, वह स्त्री के व्यक्तित्व को निर्धारित करने वाला हो जाता है” ”इसलिए उनका सवाल है-”हादसों की हालात का शिकार औरतों को क्या सजा ही मिलती रहेगी? जिस वक्त उन्हें मानसिक संबल की ज़रूरत होती है क्या उस वक़्त उन्हें निहत्था छोड़ा जाता रहेगा?”

 लगभग पूरा समकालीन स्त्री विमर्श स्त्री की देह पर एकाग्र है। रेखा का सवाल भी है-”कामनाओं का केन्द्र क्या देह होती है ? क्या सारा आनंन्द, आनन्द की कामना देह की ही है ”? और ‘देह का प्रश्न पेट के प्रश्न से कितना बड़ा है”? या कि कैसे ”औरत का चारा बड़े-बड़े काम साधता है?” फिर स्त्री स्वातंत्र्य  की चर्चा अक्सर देह की स्वतंत्रता से शुरू होती है, यहीं आकर रुक जाती है। स्त्री के हित में कितनी दूर तक साथ दे पाती है यह?” सितम तो यह की ”यह देह भी समूची देह-सी कहाॅं स्वीकारी जाती है? स्त्री सिर्फ दो-तीन अंगो से ही परिभाषित क्यों होती है? क्यों छली जाती है” इस हद तक कि आसरा देनेवाला देह का मालिक क्यों  है? पनाह देने वालों के एहसान का मुआवजा स्त्री देह की शक्ल मेें क्यों लिया जाता है? पाकिस्तान की युवा शायरा सारा शगुफ़्ता शायद इसीलिए कहती हैं-”औरत का बदन ही उसका वतन नहीं होता। वह कुछ और भी है।” इन हालात में एक ‘स्वतंत्र स्त्री’ क्या इतनी ही नामुमकिन है? मन्नूभंडारी (आपका बंटी) की शकुन से रेखा का प्रश्न है-” विवाह से इतर भी ज़िन्दगी हो सकती है क्या विचार करना चाहोगी? कुछ कहोगी शकुन?” दूसरा सवाल-”माॅ, बेटी, बहन पत्नी के अलावा ‘स्त्री’ के रूप में पहचाने जाने की कामना हर बार गाली की भाषा में परिभाषित क्यों होती है?”या ”स्त्री की जिजिविषा की परिणति (हमेशा त्रासद) क्यों होती है? क्यों उसकी महत्वाकांक्षा गाली होती है?” और ‘शिखर तलाशती लड़की (समाज को) क्यों खतरनाक लगती है” ? व्यवस्था को-हमें-आपको?” अरविन्द जैन की ‘मर्यादा’ के प्रसंग में रेखा का सवाल है-”घर से बाहर निकली, अपने लिए जगह बनाती, संघर्ष करती स्त्री को आवारा, बदचलन, लफंगी, बेलगाम घोड़़ी, कुलटा जाने कैसी-कैसी उपाधियोेेें से क्यों नवाज़ा जाता है?”फिर सफलता अभिमुख हमारे मौजूदा समाज मे खुद स्त्री से भी रेखा का सवाल है-”सफल औरत और ज्यादा सफल होने में ही अपनी मुक्ति की तलाश क्यों करती है?.”..

प्रश्न और प्रश्न ही नहीं हैं, इस स्त्री चिंता में। अब तक की चर्चा से लग सकता है कि रेखा ने स्त्री के प्रसंग मे सिर्फ ऋणात्मक-नकारात्मक पहलुओं को ही उभारा है। …नहीं, उन्होंने उन किरदारों को भी रौशन किया है जो स्त्री के सकारात्मक आयामों को उजागार करते हैं मसलन विद्यासागर नौटियाल की ‘रूपसा’ से वे कहती हैं -”तुमने जीवन का विकल्प स्वीकार किया। तुम्हें सलाम करती हूॅं-उस जिजिविषा को भी जिसके लिए नियम-कानून बनते- बिगड़ते हैं।” ”चन्द्रधर शर्मा” गुलेरी की (उसने कहा था की)  सूबेदारनी की तारीफ में उनके वक्तव्य से तथाकथित स्त्री विमर्श के प्रायोजक-सम्पादक का नक़ाब ही उलट जाता है-ऐेसे समय  में राजेन्द्र यादव हर नारी कथा को अन्ततः सेक्स कथा ही मानते हैं, तुम्हारा रिश्ता उनके वक्तव्य पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। देह में लिथड़े हमारे वक्त पर ओस का फाहा रखता है।” रांगेय राघव की ‘गदल’ उन्हें ”हठ इंकार का सिरतान आत्मनिर्णय की ताकत से लैस” लगती है। उनका निष्कर्ष है कि ”निर्णय का विवेक जागृत हो जाय तो सही-ग़लत का विवेक भी देर-सबेर आ ही जाता है। अमरबेल-सी परोपजीविता में बंधी औरतों को संवाद के लिए बुलाती” लगती है गदल। वे उसे ”औरत की खुद्दारी की मिसाल” मानती हैं। प्रेमचंद के ‘गबन’ की ‘जालपा’ से तो ”स्त्री अधिकारों के प्रति सजग स्त्री” उनके भीतर जागती है। वह उन्हें ”विकट व्यक्तित्व की स्वामिनी” लगती है, जबकि ”विकट बहुएॅं लोक में आज भी जालपा के नाम से जानी जाती हैं”.।…मैत्रेयी पुष्पा की ‘झूलानट’ की शीलो उन्हें  इस नतीजे तक ले जाती है कि ”देह, परिवार पर सम्पूर्ण स्वामित्व और नियंत्रण ताकतवर बनाता है” स्त्री को। वह उन्हें  ”ठूंठ  सी जि़न्दगी को लहलहाते पेड़ में बदलने की ताकत” लगती है। गीतांजली  श्री की ‘माई उन्हें-”आजादी के बाद भी औपनिवेशिक मूल्यों के तहत पनपते मध्यवर्गीय जीवन, उसके सुख-दुख और सबसे अधिक औरत की ज़िन्दगी में परम्परा और नैतिकता के मध्य स्त्री की तलाश” लगती है। उसे वे ”अफवाहों के बादलों में घिरी, अपनी मीठी यादों में मस्त मुक्त स्त्री की जीती जागती प्रतिमा कहती हैं”। मदन दीक्षित की ‘मंगिया’, अनामिका की ‘रमाबाई पंडिता’ सुरेन्द्र वर्मा की ‘वर्षा वशिष्ठ’ और अरविन्द जैन की ‘मर्यादा’ भी उन्हें स्त्री की सकारात्मक सो और सशक्त व्यक्तित्व की धनी लगतीं हैं।

दरअसल रेखा ने इन किरदारों का,(कहनी और उपन्यास के ‘कल्पना – संसार’ तक सीमित न रखकर उन्हें ज़िन्दा और स्पन्दित इंसान की तरह) स्वात्मीकरण किया है। उनसे सहानुभूति और समानुभूति ही नहीं, अन्तरानुभूति (‘फीलिंग विद के साथ फीलिंग इन द कैरेक्टर) के धरातल पर संवाद किया है। वे यहॅंा न केवल रचनाकारों की सहयात्री हैं वरन उनके द्वारा रचे गए किरदारों की संगिनी, सहयोगी और सहभोगी भी हैं। ठीक उसी तरह उन्होंने उनकी काया में प्रवेश किया है, उनके स्पन्दित हृदय का संवेदन महसूस किया है जैसे उनके, रचनाकारों ने उनकी रचना के दौरान महसूस किया होगा।

चूंकि रेखा स्वयं एक जागरूक रचनाकार हैं इसलिए उन्होनें किरदारों के बारे में उभरते सवालों और स्त्रीवाद के नारों, वायदों पर फिर से गौर करने की ज़रूरत के साथ रचनाकारों से भी कुछ सवाल किए हैं। मसलन् मन्नूभंडारी (‘आपका बंटी’) की ‘शकुन’ के साथ प्रभा खेतान(‘पीली आॅंधी) की सोमा के प्रसंग में यह सवाल-”क्या इन रचनाकारों को स्त्री के ‘सुनहरे सालों ’के व्यर्थ हो जाने का  भय है, इसलिए यह ‘शुतुमुर्गी चाल’?या कानूनी सलाह का अभाव।” उन्हें अचरज होता है कि ”आवाॅं(चित्रा मुदगल) की मां, पति को मुखाग्निी देने के लिए बेटे जनने का गर्व मनाती है और ‘त्रिशंकु’(मन्नूभण्डारी )की आधुनिका मां (जो व्यवस्था से लड़कर अपने लिए युवावस्था में रास्ते निकाल पाई थी) युवा बेटी की मां बनते ही जाने कैसे अपने पिता की भाषा बोलने लग गई।” मैत्रेयी पुष्पा से वे पूछती हैं -”इन््नमम की मंदा ग्राम सुधार का लक्ष्य  अपने दम प्राप्त करके भी प्रतीक्षा अपने ‘प्रिय’ की क्यों करती है?”या चाक’ में वे क्यों कहती हैं-”स्त्री के पास एहसान चुकाने के लिए देह के अलावा और कुछ नहीं होता”?….हम समझ सकते हैं कि मैत्रेयी पुष्पा द्वारा ‘लुगाइयों के लंहगों की चैकीदारी’ के प्रयोग पर उन्हें माफी माॅगने की जरूरत क्यों पड़ी!…भगवती चरण वर्मा की ‘रेखा’के प्रसंग में उनका यह वक्तव्य कितना कुछ उजागर करता है-”तुम्हारे रचनाकार का मंेटल मेकअप तुम्हारे दिनों में जैसा था आज का सर्जक भी वही जमीन पकड़े रुका है। पढ़ लो -‘मित्रो मरजानी (कृष्णा सोबती) ‘माॅडर्न गर्ल’(बलवंत गार्गी) या ‘नदी को याद नहीं’(सत्येन कुमार)।”..उन्हें उचित ही लगता है कि मंजूल भगत ने तुम्हें(‘अनारो को ) इतना ताकतवर बनने ही नहीं दिया कि तुम स्वीकार कर सको कि पति के बिना तुमने ज़िन्दगी की, गृहस्थी की गाड़ी खींची है?” ‘सुनीता’ से उनका यह सवाल भी काबिले गौर है -”क्या तुम्हें माल्ूाम  है कि तुम्हारे सृष्टा जैनेन्द्र कुमार से प्रेरणा लेकर यशपाल ने ‘दादा कामरेड़्’ मं हरीश की मुक्ति को शैल के अनावृत देह के दर्शन में खोजा है” असंख्य लोगों की तरह रेखा तो जैनेन्द्र कुमार की इस मान्यता -”स्त्री की सार्थकता मातृत्व में है” पर भी प्रश्न चिन्ह लगाती हैं  यही  नहीं ”टालस्टाय” की ‘अन्ना कारेनिना’, डी.एच लारेंस की ‘लेडी चैटरलीज़ लव्हर’, फ्लावेयर की ‘मेडम बोवेरी’, टेैगोर की ‘घरे बाहिरे’, कृष्णा सोबती की ‘मित्रो मरजानी’ क प्रसंग में उनका सवाल काबिले एहतिराम है-”घर से निकली स्त्री की नियति, दाने-दाने की मोहताजी़, भय, आतंक, कलंक और मृत्यु के अतिरिक्त (क्यों) कुछ नहीं सोचते इनके रचनाकार?”

देवीलाल पाटीदार, विनोद कुमार शुक्ल, मंज़ूर एहतेशाम, रेखा कस्तवार

सवाल-दर-सवाल इस फ़िक्रे-निसवाॅं की अहमियत इसलिए भी है कि यह एक स्त्री का, स्त्री के लिए, स्त्री के बारे में ऐसा विचार विमर्श है जो प्रासंगिक ही नहीं प्रमाणिक भी है। यही विमर्श यदि एक पुरुष (लेखक) के द्वारा किया गया होता तो मुमकिन है उस पर ‘पुरुष अहं’ और पूर्वग्रह की तोहमत लग जाती। एक निरपेक्ष और निद्र्वन्द्व वक्तव्य का खतरा उठा कर भी कहा जा सकता है और सच भी यही है कि स्त्री की व्यथा और त्रासदी एक स्त्री से बेहतर कोई नहीं जान सकता और न महसूस कर सकता। वह तुलसीदास हों या कालिदास, वेदव्यास हों या बाल्मीकि, स्त्री की तकलीफ महज़ उनकी कल्पना, उद्भावना या अधिक-से-अधिक करुणा हो सकती है, भोगा हुआ यथार्थ और प्रमाणिक अनुभूति नहीं। रेखा ने समकालीन स्त्री विमर्श के लगभग सभी मुद्दों पर अपनी बेबाक, बेलाग और दो टूक बातें कहीं हैं- साथ ही उसके छद्म को भी निर्भीक साहस के साथ बेपर्दा किया है। यहाॅं वे न तो बड़े-से-बड़े रचनाकार तक को बख्शती हैं और न नये-से-नये का वे वजह बचाव करती हैं। यह किसी सम्पादक द्वारा प्रायोजित स्त्री विमर्श भी नहीं है और न आत्ममुग्ध, सम्पादक द्वारा पैम्पर्ड, देहराग आलापती ऐसी बिन्दास लेखिकाआंे और कवयित्रियांे का स्त्री विमर्श है जो रचनाओं में और स्वच्छन्दता के नाम पर सेक्स परोसने पर भरोसा करती हैं। इसमें रचना के मर्म को समझने और उसे उजागर करने वाली आलोचना-दृष्टि भी है जो एक बेहतर रचना और उच्चतर मानवीय संस्कृति के रूपायन की प्रेरणा से उद्दीप्त है।

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
प्रकाशित वर्ष : 2010
आईएसबीएन : 9788126718979 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :172

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
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क्या केजरीवाल लेंगे ऐक्शन: साहित्य कला परिषद के उपसचिव द्वारा पत्नी से मारपीट का मामला थाने पहुंचा

दिल्ली सरकार की साहित्य कला परिषद के प्रमुख अधिकारी और नाटककार जे.पी. सिंह (जयवर्धन) के ऊपर उनकी  पत्नी और दिल्ली की रंग-निर्देशक चित्रा सिंह ने मारपीट का आरोप लगाया है. उन्होंने फेसबुक के अपने वॉल पर दो स्टेटस लिखे, जिसमें उन्होंने अपने पति जे.पी. सिंह पर ‘दरिन्दग़ी’ का आरोप लगाया तथा यह भी सूचित किया कि  उनके घर पुलिस भी आयी थी। रंगकर्मी मंजरी श्रीवास्तव के अनुसार चित्रा ने उन्हें पहले भी जेपी द्वारा मारपीट की बात बतलायी थी. लेकिन तब उनके परिचितों ने आपस में सुलह का मशविरा दिया था. लेकिन ८ जुलाई को फिर से मारपीट करने के बाद चित्रा सिंह ने सोशल मीडिया में स्टेट्स लिखे और पुलिस को सूचना दी. उन्होंने जख्मों के साथ अपनी तस्वीर भी जारी की है.

चित्रा सिंह की जख्मी तस्वीर, उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर शेयर की थी

चित्रा सिंह की जेपी सिंह से दोस्ती भारतेंदु नाट्य अकादमी में हुई थी, प्रशिक्षण के दिनों में.  बाद में उन्होंने शादी कर ली थी. स्त्रीकाल द्वारा सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया कि वे इंदिरापुरम थाने में बैठी हैं और रिपोर्ट दर्ज करवा रही हैं. जबकि जे पी सिंह ने फोन और मेसेज का जवाब नहीं दिया. चित्रा थिएटर  का एक समूह ‘रंगभूमि’ की संचालिका भी हैं.

आलोचक तथा समकालीन रंगमंच के संपादक राजेश चन्द्र  के अनुसार, ‘यह मसला अत्यधिक संवेदनशील और तत्काल ध्यान दिये जाने की मांग करने वाला लगता है। जे.पी. सिंह साहित्य कला परिषद में अपने राजनीतिक संबंधों के चलते लंबे समय से जमे हुए हैं।’ राजेश यह भी आरोप करते हैं कि दिल्ली के सांस्कृतिक महकमें में उनसे अधिक भ्रष्ट कोई अधिकारी मिलना मुश्किल है। अपने फेसबुक पेज पर उन्होंने लिखा ‘दिल्ली का कोई भी रंगकर्मी जे.पी. सिंह के ख़िलाफ़ कुछ भी बोलने का साहस नहीं कर पाता, जो बोलता है, उसके लिये रंगमंच में रह पाना संभव नहीं। नयी सरकार बनने पर यह चर्चा आम थी कि जे.पी. सिंह के विरुद्ध विभागीय जांच में उन्हें करोड़ों की वित्तीय अनियमितताओं का दोषी पाया गया, पर दिल्ली के एक बहुत शक्तिशाली निर्देशक के कहने पर उनको अभयदान दे दिया गया। अब जब उनकी पत्नी ने भी जे.पी. सिंह की असलियत ज़ाहिर कर दी है, तो ऐसे ख़तरनाक व्यक्ति को परिषद के महत्वपूर्ण पद पर रहना चाहिये या नहीं, इसका फ़ैसला दिल्ली सरकार को करना ही होगा।’

देश में रेप कल्चर- एक हकीकत

गिरीश चंद्र लोहनी

पिथौरागढ़, उत्तराखंड में मानविकी के विषयों को पढ़ाते हैं संपर्क:Email-Id glohani1@gmail.com
मो. 999005798

स्त्रीकाल कॉलम 
बलात्कार को अपराध नियंत्रण कार्यक्रम के तहत नहीं रोका जा सकता है. यह संस्कृति का हिस्सा है और उसे सांस्कृतिक तौर पर ही निपटा जा सकता है, अपराध नियंत्रण की धाराएं और सख्ती एक समाधान है आख़िरी नहीं. बता रहे हैं गिरीश सबलोग (जुलाई अंक)के स्त्रीकाल  कॉलम में 

पिछले  कुछ सालों में दुनिया भर में बलात्कार की घटनाओं में भयानक रुप से वृद्धि हुई है अगर आँकड़ों की मानें तो कथित ‘स्वप्न देश’ अमेरिका में प्रत्येक पाँच मिनट में या तो एक यौन हिंसा घटती है या यौन हिंसा की कोशिश की जाती है. जिस रेप-कल्चर को लगातार हमारे समाज में बढ़ावा मिल रहा है उसे स्त्रीवादी लेखकों की दिमागी उपज करार कर सिरे से ही नकार दिया गया है.

आखिर ये रेप कल्चर किस उड़ती चिड़िया का नाम है. किसी बलात्कार पीड़ित को उसके कपड़े, बलात्कार के समय, उसके रहन-सहन या किसी भी आधार पर दोषी ठहराना, लगातार पुरुषत्व को प्रधान व लैंगिक दॄष्टि से आक्रमक और स्त्रीत्व को विनम्र और लैंगिक दॄष्टि से निष्क्रिय के रुप में  घोषित करना, मान कर चलना की बेकायदा महिलाओं का ही बलात्कार होता है, महिलाओं को बलात्कार से बचने के नुस्खे देना, यौन शोषण को सहनकर अपनी नियति मान लेना आदि. ये सभी रेप कल्चर के उदाहरण हैं.

बलात्कार से बचने के लिए ह्त्या अपराध नहीं 

एक नजर अब हमारे बालीवुड के अस्सी के दशक की फिल्मों पर. फिल्म में मुख्य विलेन का भाई या बेटा हीरो की बहिन का बलात्कार करता था और फिर बहन स्वयं को दोषी मान आत्महत्या कर लेती थी. कहानी आगे कुछ ऐसे बढती थी कि हीरो विलेन के बेटे या भाई की हत्या कर बदला लेता था बदले में मुख्य विलेन हीरो की हीरोईन को बलात्कार के लिये उठा ले जाता था और फिर हीरोईन को बलात्कार से बचाकर हीरो की हीरोगिरी पर मुहर लग जाती थी. हीरोईन पर बलात्कार की कोशिश विलेन का अधिकार, बलात्कार से हीरोईन को बचाना हीरो का धर्म और बलात्कार में पीड़िता का रुप हीरोईन की नियति दर्शाने वाले लेखक और निर्देशक किस मानसिकता के होंगे आप अंदाजा लगा सकते है. और उस समाज की मानसिकता के बारे में भी सोचिये जो इस सिनेमा को देखता है.

अस्सी के दशक को छोड़ आज के को भी देखा जा सकता है. एक दृश्य और संवाद भारत के चहेते हीरो सलमान खान की सुपर-हिट फिल्म वांटेड का. फिल्म की हीरोईन किसी जिम क्लास में एक्साइज कर रही है और निर्देशक निहायती घटिया अंदाज से कैमरा हिरोईन के पिछले हिस्से पर बड़ी बारीकी से घुमाकर दिखाता है जिसे देख हीरो सलमान खान भी उसी अंदाज में कमर बड़े ही अश्लील अंदाज में घुमाकर अपने दोस्तों को बड़े चुटीले अंदाज में बताते हैं कि लड़कियां ये सब करती ही लड़कों के लिये हैं.

राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त अभिनेता अक्षय कुमार की अधिकांश फिल्मों में हीरोईन का काम बस इनको आकर्षित करने का रहता है. एक पूरी फिल्म में तो ये हीरोईन की बिना ढकी कमर देखकर इतने बेकाबू हो जाते हैं की बिना चिंगोटी काटे नहीं रह पाते. गली में लड़कियों को छेड़ने के लिये प्रयोग की जाने वाली एक घटिया आवाज को ये अपनी एक्टिंग का नमूना मानते हैं. ये हाल केवल मुख्य धारा के सिनेमा का है. यदि क्षेत्रीय सिनेमा की बात की जाय तो जिस तरीके से डायलॉग से लेकर लिरिक्स तक में यौन-हिंसा को परोसकर पेश किया जाता है और जिस प्रकार से हाथों-हाथ दर्शकों द्वारा भी लिया जाता है वह भयावह है.

सिनेमा के अलावा जिसने  इस रेप कल्चर को बढ़ावा दिया है वो है विज्ञापन बाजार. आज पुरुषों के कच्छे से लेकर गुटखा तक महिलाओं को आकर्षित करने के नाम पर विज्ञापन बनाकर बेचे जा रहे हैं. इनमें बड़ी कंपनियों का योगदान ज्यादा है. क्रियेटिवीटी के नाम पर अपने आपको आपके घर की दुकान कहने वाली कम्पनी अमेजन इन दिनों महिला के जननांगो पर सिगरेट बुझाने वाली ऐस्ट्रे को लेकर विवादों में नजर आयी. इसे बनाने वाले के मन की कुंठा छोड़िये आप इसे खरीदने और बेचने वाले के बारे में सोचिये. क्या महिला जननांगो में सरिया और रॉड घुसाने वालों और इनमें कोई अंतर है? हाँ एक अंतर तो ये है कि इन्हें मौका नहीं मिला.अमेजन ने अब इसे अपने प्रोडक्ट लिस्ट से हटा दिया है.

मैन विल बी मैन, हँसी तो फंसी, साली आधी घरवाली वाले जुमले क्या संदेश देते हैं? बाजार में एक महिला के स्तनों के आकार का बना सिगरेट बुझाने वाला ऐस्ट्रे कैसे फनी क्रियेटिवटी के नाम पर बेचा जा सकता है? हमारे लिये बुरा ये है कि ऐसे प्रोडक्ट हाथों-हाथ बिक भी जाते हैं? एक अन्य हालिया घटना केरल के एक स्कूल द्वारा अपने स्कूल के बच्चों की ड्रेस को लेकर भी है. स्कूल की ड्रेस की यह कह कर आलोचना की गयी की यह अश्लील है जो न केवल बच्चों की मानसिकता को प्रभावित करेगी बल्कि पुरुषों को उकसाने का काम भी करेगी. ये कैसी मानसिकता वाले लोंगो का समाज में बोल-बाला है जिन्हें बच्चों के कपड़े तक उकसा सकते हैं. आलोचना के इन आधारों को कैसे इतनी आसानी से हमारे समाज में जगह मिल जाती है.

पिछ्ले दिनों बैंगलोर जैसे शिक्षित क्षेत्र में मेट्रो में एक चालीस पार कर चुके एक अच्छे खासे व्यक्ति द्वारा सामने की सीट पर बैठी लड़की के पैरों का विडियो बनाने वाला विडियो सच में घिनौना और दिल दहलाने वाला था. बैगलूर में इसी साल वर्ष की शुरुआत में न्यू ईयर पार्टी में हुई घटना के विषय में  कई लोग यह कहते हुये आरोपियो की आलोचना करते दिखे की अंधेरी रात में लड़कियों को भी अपने बचाव के साथ चलना चाहिये था. क्या आप अब भी मानते हैं रेप कल्चर मात्र स्त्रीवादी लेखकों के दिमाग की उपज मात्र है.

अब अपना मोबाईल खोल अपने स्कूल, कालेज या आफिस का कोई भी ऐसा ग्रुप खोलिये जहाँ केवल लड़के हों. इनमें धडल्ले से भेजे विडियो और अधनंगी तस्वीरों पर नजर डालिये. अधिकांश आपको एमएमएस के नाम से मिलेंगे जो कि महिला की जानकारी के बिना बने रहते हैं. महिलाओं के शरीर पर किये जाने वाले भद्दे मेम्स और जोक्स बनाकर या आगे बढाकर क्या आप भी एक तरह से रेप कल्चर को बढ़ावा नहीं दे रहें हैं.

शर्म-हया-विनम्रता-सुंदरता आदि के फूलों से बनी एक माला महिलाओं को पहनाई जाती है. ये फूल इज्जत,आबरु और समाज की मान-मर्याद के वृक्षों से केवल महिलाओं के लिये चुने जाते हैं. ताकि उन्हें नियंत्रित किया जा सके.

बलात्कार के मामलों के संबन्ध में संकुचित ज्ञान और संकुचित मानसिकता लगातार विश्व भर में बलात्कार के मामलों में बढोतरी कर रही हैं. एक बात तो यह बलात्कार केवल सेक्स से जुड़ा मुद्दा नहीं है. यह शक्ति और वर्चस्व से जुड़ा अधिक है. पुरुष प्रधान समाज में पुरुष कई वर्षों से शासन कर रहा है. ऐसे में उसे अपनी सत्ता पर एक स्त्री रुपी खतरा नजर आ रहा हैं. ऐसा नहीं है कि केवल पुरुषों द्वारा बलात्कार किये जाते है अफ्रीका के कई ऐसे देश जहाँ मातृसतात्मक शासन व्यवस्था कई वर्षों से थी वहां पुरुषों के साथ बलात्कार की घटनाएं काफी आम हैं.


कुल मिलाकर बलात्कार एक हिंसक प्रवृति है. सामान्यतः समाज में 90 प्रतिशत व्यक्ति हिंसक नहीं होते. लेकिन समय के आधार पर हिंसा एक विकल्प के रुप में चुनते जरुर हैं. पारिवार में, दोस्तों के बीच, आफिस में लगातार दमन से व्यक्ति के मन में जन्मी कुंठा उसे बलात्कारी बनाती है. क्योंकि हमारे द्वारा बनाया गया और परोसा गया यह रेप कल्चर उसे यकीन दिला देता है कि यह कुंठा वह समाज द्वारा उससे भी ज्यादा दमित व्यक्ति पर निकालने के बाद बच निकलेगा.
यौन हिंसा और न्याय की मर्दवादी भाषा 

उदाहरण के तौर पर हाल ही में गुडगाँव में एक ऑटो-चालक और दो अन्य व्यक्तियों द्वारा एक महिला के बलात्कार की घटना घटी. क्या आप मान सकते हैं कि वे तीनों घर से ही बलात्कार के मन से निकले होंगे. क्या आप मान सकते हैं कि महिला द्वारा ऑटो में ऐसा कुछ किया होगा जो तीनों को अचानक बलात्कार के लिए प्रेरित कर दे. नहीं. तीनों को ही जब ये यकीन हो गया होगा कि वे महिला पर काबू पा सकते है. तीनों को यकीन हो गया होगा कि वे बलात्कार के बाद बच निकल सकते है तो ही उन्होंने इस हिंसा का विकल्प चुना होगा. सवाल है ये यकीन आया कहां से?

टीवी कार्यक्रम में सावधानी और सतर्कता से रहने की सलाह तो बखूबी दी जाती है लेकिन उससे पहले एक घण्टे का कार्यक्रम कुंठित व्यक्ति को अपराध करने के सौ उपाय और साधन दे चुका होता है. निष्कर्ष के रुप में एक बात साफ है यदि एक अपराध नियंत्रण के रुप में बलात्कार की समस्याओं को रोकना चाहेंगे तो बलात्कार के मामले अधिक दर्ज जरुर होंगे लेकिन बलात्कार कम नहीं होंगे. वर्चस्व और शक्ति से जुड़े इस हिंसक-अपराध के प्रति सेक्स के अलावा अन्य सभी पहलुओं पर भी चिंतन आवश्यक है.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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गांधी के गाँव से छात्राओं ने भेजा प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड: जारी किया वीडियो

स्त्रीकाल डेस्क 
महात्मा गांधी के गाँव से छात्राओं ने भेजा प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड, कहा आप भी फील करें लग्जरी.  जारी किया वीडियो, जिसमें ‘ वनश्री कहती हैं कि ‘यह सरकार की असंवेदनशीलता है कि जहां 50% से अधिक महिलायें अस्वच्छ कपड़े का इस्तेमाल करती हैं, वहाँ  स्वच्छता के लिए सेनेटरी पैड लेने का अभियान चलाने की जगह उसपर 12% टैक्स लगा रही है.

प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सेनेटरी पैड के पैकेट भेजने के पहले छात्रायें

महात्मा गांधी के गाँव वर्धा से एक छात्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली को सेनेटरी पैड भेजकर सेनेटरी पैड पर 12% जीएसटी लगाने का विरोध किया है. युवा नामक संगठन की कनवेनर वनश्री वनकर और उनकी साथी प्रणाली धावर्दे, रवीना सोनवने, श्वेता पांगुल, प्रिया नागराले और अपेक्षा नागराले ने पैड भेजते हुए अपने वीडियो सन्देश में कहा है कि ‘सरकार ने श्रृंगार के सामान सिन्दूर आदि पर तो जीएसटी नहीं लगाया, लेकिन माहवारी के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े सेनेटरी पैड पर 12% जीएसटी लगा दिया. वित्त मंत्री और प्रधान मंत्री यदि प्राकृतिक रूप से अनिवार्य माहवारी के दौरान स्वच्छता को विलासिता वस्तु, लग्जरी आइटम समझते हैं तो उन्हें भी इसका आनंद लेना चाहिए.’

वनश्री कहती हैं कि ‘यह सरकार की असंवेदनशीलता है कि जहां 50% से अधिक महिलायें अस्वच्छ कपड़े का इस्तेमाल करती हैं, वहाँ स्वच्छता के लिए सेनेटरी पैड लेने का अभियान चलाने की जगह उसपर 12% टैक्स लगा रही है.

अपने कैबिनेट मंत्री मेनका गांधी और कई महिला सांसदों के विरोध के बावजूद अरुण जेटली ने जब 30 जून के मध्य रात्रि में जीएसटी लागू होने की घोषणा की तो उनमें जीएसटी लागू वस्तुओं में लग्जरी आयटम के तहत 12% तक का टैक्स सेनेटरी पैड पर लगा दिया गया. सेनेटरी पैड पर जीएसटी के खिलाफ पर देश भर की महिलाओं ने ‘लहू पर लगान’ हैश टैग के साथ सोशल मीडिया पर मुहीम चला रखी थी, जिसमें कई सेलिब्रिटीज भी शामिल थीं, लेकिन सरकार ने किसी की नहीं सुनी.

स्त्रीकाल ने सेनेटरी पैड पर लगाये गये टैक्स को जजिया कर से ज्यादा तानाशाह निर्णय बताते हुए लिखा था, ‘ वस्था पुरुषों के द्वारा पुरुषों के लिए संचालन के अधोषित दर्शन से संचालित होती है. स्त्री उसके लिए एक अलग-‘अदर’ पहचान है. न सिर्फ सैनिटरी पैड के सन्दर्भ में बल्कि में अन्य मामलों में भी ‘अलग पहचान’ का यह भाव सामने आता रहता है.

मराठी में सन्देश का वीडियो

अभी नीट की परीक्षा में लड़कियों के अन्तःवस्त्र निकलवाने का प्रसंग भी प्रायः इसी भाव से प्रेरित है, जिसमें लम्बी अभ्यस्तता के कारण महिलायें भी शामिल हो जाती हैं- यानी महिलाओं के खिलाफ महिला एजेंट हो जाती है. जब व्यवस्था एक ख़ास समूह के प्रति उत्तरदायी हो जाती है, तो इस तरह की घटनाएँ होती हैं. कभी तीर्थ यात्रा के लिए हिन्दू यात्रियों पर लगने वाला जजिया कर, जिसे अकबर ने हटाया था, की तरह ही है हिन्दू-हित की बात करने वाली सरकार के द्वारा महिलओं के लिए अनिवार्य सैनिटरी पैड पर कर लगना या बढाना.’

गौरतलब है कि कथित सुहाग के प्रतीक ‘सिन्दूर, चूड़ी’ आदि पर सांस्कृतिक राष्टवाद’ की समर्थक एनडीए सरकार ने जीएसटी नहीं लगाया है, और महिलाओं के स्वास्थय से जुड़े पैड को इस दायरे में रखा है. कंडोम और कंट्रासेप्टीव् पर भी कोई टैक्स नहीं है, जो कि सरकार के राष्ट्रवाद के अपने ढंग और जनसंख्या नियंत्रण के कारण लिया गया निर्णय है, न कि महिलाओं के प्रजनन अधिकार से जुड़कर. सवाल है कि क्या यह मुहीम गांधी के गाँव से शुरू होकर पूरे देश में फ़ैल जायेगा तब सरकार अपने निर्णय पर विचार करेगी?

उस पेड़ पर दर्जनो सैनिटरी पैड लटके होते थे

संजीव चंदन 


स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया न सिर्फ स्त्रियों के मानस को नियंत्रित और संचालित करती है, बल्कि पुरुषों का भी ख़ास मानसिक अनुकूलन करती है. माहवारी को लेकर पुरुषों के बीच की धारणा को समझने के लिए यह एक सीरीज है, जिसमें पुरुष अपने अनुभव इस विषय पर लिख सकते हैं.

वह मुझसे साढ़े चार-पांच  चाल साल बड़ी थी, रिश्ते में एक पीढ़ी ऊपर. अभी भी दृश्य सा याद है, 7-8 साल का रहा होउंगा मैं. आँगन में बैठकर मैं खाना खा रहा था और वे आँगन से लगे कुएं के पास रो रही थीं. बगल के घर से एक नानी आयीं, उन्होंने पूछा ‘क्यों रो रही है वो’  कोई जवाब देता उसके पहले मैं बोल उठा, ‘ महीना हुआ है.’ मेरा बोलना था कि घर की महिलायें समवेत रूप से हंस पड़ी. हालांकि मुझे क्या पता था कि महीना क्या होता है, शायद नानी के पूछने के पहले किसी से मैंने सुना होगा कि उन्हें क्या हुआ था, इसलिए मैं बोल पड़ा और सबको हँसते देखकर रुआंसा सा हो गया था.



लेकिन ठीक-ठीक मुझे याद नहीं  कब जान पाया कि यह महिलाओं की योनि से होने वाला मासिक रक्तस्राव है, संभवतः किशोर अवस्था के दोस्तों ने रहस्य भाव में बताया होगा या पहली बार विज्ञान के क्लास में लड़कियों के अंगों के बारे में बताया गया होगा तब. हालांकि वह कोई एक-आध शब्द की जानकारी ही होती थी-‘रजस्वला.’, जिसका सम्पूर्ण ज्ञान निश्चित तौर पर मुझसे ज्यादा ज्ञानी लड़कों ने दिया होगा. मैं टी मॉडल का विद्यार्थी था, जहां लडकियां नहीं पढ़ती थीं.

जब मैंने स्त्रियों की माहवारी को पहली बार जाना

घर में यह जरूर होता था, कि छोटी बहू होने के बावजूद महीने के कुछ दिनों में मां खाना नहीं बनाती थीं, और अधिक पूजा-पाठी होने के बावजूद पूजा नहीं करती थीं, उन दिनों कभी-कभी फिर वही शब्द टकरा जाता ‘महीना.’ घर में कभी न पैड दिखा और न सूखता हुआ कपड़ा.


लडकियां लड़कों के लिए रहस्यलोक की प्राणी तो होती ही थीं,  गाँव के स्कूल में पढ़ते वक्त छेड़-छाड़ की पात्र भी. हालांकि मैं बहुत दिन तक गाँव के स्कूल में नहीं पढ़ा, लेकिन सीनियर लड़कों का लड़कियों को छेड़ना आज भी याद है, उनके चक्कर में एक दो बार शिकायत मेरे घर भी आ चुकी थी. शिकायत का कारण बने थे खेल,  जिसमें लड़के किसी लडकी को समवेत चिढ़ाते. उसके नाम का द्विअर्थ बना कर. कॉलेज तक आते-आते लडकियां जब दोस्त बनीं, बेतकल्लुफ बातें करने लगीं, तो माहवारी क्या होता है वह भी जान गया और यह भी कि यह दर्द , शर्म और अछूतपन का कोई मासिक रूटीन है, जिसे हर लडकी को नियमित जीना पड़ता है-भोगना पड़ता है और हो सके तो इस नियमित मासिक चक्र को गुप्त रखना पड़ता है, ख़ासकर पुरुषों से.

मैं  एमए करने महाराष्ट्र के वर्धा पहुंचा स्त्री-अध्ययन का विद्यार्थी होकर. यद्यपि क्लास में हम यौन अंगों का नाम लेते हुए उनपर आरोपित भावों से मुक्ति की फिल्म देख चुके थे, जेंडर का सैद्धांतिक अधययन कर चुके थे, कर रहे थे, लेकिन ऐसा नहीं था वहाँ कि जेंडर का असर पूरी तरह समाप्त हो गया हो. लडकियां काली पन्नी में ही खरीदती थी सैनिटरी पैड. वहां होस्टल के पास एक पेड़ था, काँटों वाला. उसपर दर्जनो इस्तेमाल किये हुए सैनिटरी पैड लटके हुए होते थे . उसके काटे जाने के पहले तक हम उस ओर से गुजरते तो पेड़ पर अतिरिक्त भाव में नजर जाती ही जाती.

माहवारी पर बात की झिझक हुई खत्म 

आप पर आरोपित भाव और विचार से मुक्त होने में समय लगता है. यह हमारे परवरिश और माहौल का ही असर है कि अभी कुछ सालों पहले तक कंडोम और पैड दोनो ही खरीदने में एक अतिरिक्त बोध तो हुआ ही करता रहा है. उस बोध से, झिझक से आज मुक्त तो जरूर हूँ, लेकिन मध्यवर्गीय परिवेश के लिए मुक्ति  एक अभियान का हिस्सा होना चाहिए.  यह सांस्कृतिक अनुकूलन से मुक्ति का प्रसंग है, जिससे पुरुष और स्त्री, दोनो को जरूर मुक्त होना चाहिए.

क्या महिलायें भेजेंगी प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री को सैनिटरी पैड

संजीव चंदन स्त्रीकाल के संपादक हैं .
संपर्क:8130284314


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युवाओं के गायक संभाजी समाज बदलने के गीत गाते हैं

कुसुम त्रिपाठी

स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें
प्रकाशित हैं , जिनमें ‘ औरत इतिहास रचा है तुमने’,’  स्त्री संघर्ष  के सौ
वर्ष ‘ आदि चर्चित हैं. संपर्क: kusumtripathi@ymail.com

संभाजी भगत के क्रांतिकारी पोवाड़े के श्रोता-दर्शक चंद बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि विशाल व्यापक जनता है जो आज अपने अधिकारों के हनन के लिए तत्पर तंत्र के खिलाफ प्रतिरोध की संस्कृति के समर्थन में लड़ रही है। उनका पोवाड़ा दर्शकों को आनन्दित नहीं करता बल्कि एक मुद्दे को लेकर झकझोरता है और उसे सार्थक दिशा की ओर उन्मुख करता है। उस दिशा की ओर जहां बदलाव और संघर्ष की ताकतें एक जुट हो रही हैं। संभाजी के पोवाड़ा जिसके वे गायक, गीतकार, संगीतकार हैं,  तमाम शोषित, पीड़ित जनता के अन्याय अत्याचार के विरूद्ध उन्हें उकसाने, उन्हें समाज को बदलने के लिए प्रेरित करते हैं। कला और संस्कृति की दुनिया मे लोकशाहिर संभाजी भगत यह कहते हुए अपने पोवाड़ा प्रस्तुत करते हैं.मैं आपका यहां मनोरंजन करने नहीं आया हूँ, बल्कि मैं आपकों अस्वस्थ करने आया हूँ, जो लोग यहां मनोरंजन के उद्देश्य से आए हैं, वे कृपया यहां से चले जायें। संभाजी भगत की आंखों में व्यवस्था विरोधी आग है, उनकी आवाज में सहयाद्री की सिंह गर्जना है। दस से पचास हजार की भीड़ उनका पोवाड़ा सुनने के लिए इकट्ठा हो जाती है।

संभाजी का जन्म 1 जून 1959 को महाराष्ट्र के सातारा जिला के जावली तहसील के महू नामक गांव में हुआ। जो पंचगनी के पास है। वे एक भूमिहीन दलित परिवार में पैदा हुए. उनकी माता का नाम गीता तथा पिता का नाम भीमा था। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने महात्मा फुले हाई स्कूल, पंचगनी में की। संगीत का शौक उनको बचपन से ही था। उन्होनें बताया कि गांव के उनके एक शिक्षक थे, जिनका नाम देवधर गुरू जी था। वे सभी बच्चों को नहलाते, तैयार करते और स्कूल ले जाते थे। मुझे कंधे पर बिठाकर स्कूल ले जाते थे। वे गुरू जी कलापथक चलाते थे। उन दिनों महाराष्ट्र में लोग शाहिर अण्णाभाउ साठे और शाहिर अमर शेख से प्रभावित थे। देवधरे गुरू जी हम लोगों को इनके गाने सीखाते थे और जगह-जगह कला-पथक में गवाते थे। इससे संगीत में रूचि बढ़ी। इसके बाद संभा जी जब 8 वीं कक्षा में आए तब हाईस्कूल में जाने के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों को पार कर जाना पड़ता था । जिससे वे और उनके साथी रोज देर से स्कूल पहॅुंचते थे। देर से स्कूल पहुंचने पर क्लास टीचर इन छात्रों की पिटाई करते थे। एक दिन स्कूल के कार्यक्रम में संभाजी ने इस मार-पिटाई के खिलाफ प्रोटेस्ट कविता लिखी और उसे गाकर सुनाया। उसके बाद प्रिसिंपल ने तुरन्त बुलाया। संभाजी को लगा, अब तो खैर नहीं मुझे जरूर स्कूल से निकाला जायेगा, पर उल्टा हुआ । प्रिंसिपल ने संभाजी को शाबासी दी, गाने की तारीफ की और क्लास टीचर की मार-पिटाई बन्द करवाई। तब से संभाजी सहयाद्री की पर्वत श्रृंखलाओं में कविता लगातार लिखते और गाते रहे जो अब तक जारी है। घोर गरीबी और दरिद्रता में उनका बचपन बीता।


12 वीं कक्षा की पढ़ाई खत्म करके वे उच्च शिक्षा की चाहत लिए मुम्बई महानगर में  4 जून 1980 को आए। वे बड़ा-पाव के ठेले पर काम करने लगे और वहीं रास्ते पर सो जाया करते थे। बड़ा -पाव बेचने वाले मालिक ने संभाजी में पढ़ाई के प्रति आतुरता देखी। उन्होंनें संभाजी का नाम वडाला स्थित आम्बेडकर कालेज ऑफ़ कामर्स एण्ड इकोनाम्किस में बी-कॉम में लिखवा दिया। वहीं सिद्धार्थ विहार हॉस्टल में उनके रहने का प्रबंध भी हो गया। यह वही हॉस्टल था जहां पर दलित पैंथर आंदोलन का जन्म हुआ था ।

जूलाई 1980 में संभाजी भगत एप्लायमेंट एक्सचेंज से घर लौट रहे थे। उन्होंने चर्च गेट स्टेशन के पास कुछ कालेज के विद्यार्थियों को नुक्कड़ नाटक करते हुए देखा। वे रूककर नाटक देखने लगे। उन्होंने देखा कि थोड़ी – ही देर में पुलिस इन छात्र -छात्राओं को उठाकर ले जा रही थी। संभाजी को लगा इतना अच्छा नाटक चल रहा था, पुलिस इन लोगों को क्यों उठा ले गई! तब उन्हें एहसास हुआ कि नाटक सत्ता विरोधी है। ये विद्यार्थी सच्चाई बता रहे थे। ये सभी साहसी थे। उन्हें सच्चाई बताने से रोका गया। संभाजी इस समूह से बहुत प्रभावित हुए। फिर उन्होंने पता किया कि ये कौन लोग थे। उन्हें पता चला कि ये विद्यार्थी प्रगति संगठन से जुड़े विद्यार्थी थे और उनकी नाट्य मण्डली का नाम आह्वान नाट्य मंच है। मेरी पहली पहचान संभाजी से इसी वर्ष हुई। मैं विद्यार्थी प्रगति संगठन और  आह्वान नाट्य मंच से जुड़ी थी। संभाजी आह्वान नाट्य मंच से जुड़ गये। वे सनोबर आंस्पीन्डर को अपना गुरू मानते हैं जो आ आह्वान नाट्य मंच की संस्थापकों में से एक थी ।

1980 का दशक एक ऐसा दशक था जब मुम्बई में छात्र आन्दोलन, महिला आन्दोलन, गिरणी कामगार के साथ – साथ अन्य ट्रेड युनियन आन्दोलन अपने उभार पर थे। ये सभी आन्दोलन एक- दूसरे से जुड़े थे। संभा जी भगत इन सभी आन्दोलनों से जुड़े थे। उन्होंनें आह्वान नाट्य मंच में आने के बाद मार्क्स और अम्बेडकर को पढ़ा । वे अपने छात्र-जीवन में ही प्रसिद्धी पा चुके थे । कालेज के विद्यार्थी पिकनिक पर जाते समय रास्ते में ट्रेन व बसों में उनका पौवाड़ा गाया करते थे । आह्वान नाट्य मंच में वैसे तो सामूहिक नाटय लिखे जाने की परम्परा थी, पर मुझे याद है संभा जी ने नाटकों में लोकधर्मी परम्परा गौंधड, बारूड, पोवडा शैली का प्रयोग नुक्कड़ नाटकों में शुरू किया। ज्यादातर नुक्कड़ नाटकों में गीत-संगीत संभाजी के होते थे हालांकि उन्होनें कभी भी शास्त्रीय संगीत या गीत व्यावसायिक तरीके से किसी संस्था में जाकर प्रशिक्षण नहीं लिया था। अभी भी मुझे याद है जब वे मेरे घर पर दकली या ढ़ोलकी लेकर गानों की धुन बनाते थे। वे स्वयंभू हैं। उस समय आह्वान नाट्य मंच के जो चर्चित नुक्कड़ नाटक थे- शिक्षा का सर्कस (1980) यूनिवर्सिटी का तमाशा देखो (1980), दमन का विरोध (1981) गिरनी कामगार का संघर्ष (दो भागों में 1982 – 83) रोटी का खेल (1984),  झोपडवासियों को गुस्सा क्यों आता है (1985) चुनाव बहिष्कार करो इत्यादि। 1980 – 95 के बीच संभा जी भगत विलास घोगरे और गदर के संपर्क में आए। ये तीनों लोक संगीत की परम्परा की तलाश में गांव-गांव घूमते थे । संभा जी ने इन्हीं लोगों के साथ रहकर देश की जातिवादी, धार्मिक क्रूरता, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक विषमता, सांस्कृतिक तौर पर साम्राज्यवादी हमला जैसे मसलों पर जानना शुरू किया। ये तीनों आदिवासी इलाकों से लेकर गांव-गांव, बस्ती-बस्ती घुमते और लोक -सांस्कृतिक परम्पराओं को  लेकर क्रांतिकारी गाने लिखते। संभा जी गदर को अपना बड़ा भाई मानते है। क्रांतिकारी गाना गाने के कारण दोनों गढ़चिरोली में एक साथ जेल गये। जेल आना-जाना गिरफ्तारियां आम बात थीं।

संभा जी भगत ने पहली बार अर्धसत्य फिल्म में काम किया । 1992 – 93 दंगों के समय संभा जी स्तब्ध रह गये थे। कामरेड पांसारे की सलाह पर उन्होनें 2012 में शिवाजी अंडरग्राउण्ड इन भीमनगर मोहल्ला नाटक लिखा। संगीत निर्देशन भी उन्हीं का है। इस नाटक ने मराठी नाटकों की परम्परा में तहलका मचा दिया । इससे पहले गिरणी कामगारों के जीवन पर आधारित चिठाटया गिरणी वग नामक नृत्य- नाट्क लिखा था । इसका निर्देशन सुनील श्यानबाग ने किया था ।

2004 में संभाजी ने विद्रोही शाहिरी जलसा की स्थापना की। संध-परिवार शिवसेना तथा धार्मिक कट्टरवादियों के खिलाफ विद्रोही साहित्य सम्मेलन शुरू किया। 2011 में विद्रोही शाहिरी जलसा के माध्यम से गरीब बस्तियों के नवयुवकों को ट्रेनिंग देना शुरू किया । वे फासिस्टवादी, जातिवादी, पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ गाने गाते हैं साथ ही फूले आम्बेडकर और भगत सिवंह के गाने गाते हैं. ऐसी ही संभा जी से ट्रेनिंग प्राप्त कबीर कला मंच के युवक – युवतियों को 2012 में माववादी से सहानुभुति रखने वाला कहकर गिरफ्तार कर लिया और साढे तीन वर्ष बाद उन्हें जमानत पर छोड़ा । 2000 में संभाजी की आत्मकथा कातल खलचा वाणी (पत्थर के नीचे का पानी) छपी । 2004 से 2008 तक उन्होनें मराठी समाचार पत्र महानगर और सम्राट पेपर में कालम लिखें ।
अप्रैल 2015 में कोर्ट फिल्म आई। जिसे राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुल 24 पुरूस्कार मिले। आस्कर में फिल्म भेजी गई। इस फिल्म के गीतकार, संगीतकार और गायक संभाजी हैं। जून 2015 में नागरिक फिल्म में भी उन्होनें गाना गाया तथा संगीतकार गीतकार भी वे ही हैं । इस फिल्म के लिए संभाजी को महाराष्ट्र सरकार का राज्य पुरस्कार मिला, जिसे उन्होनें दाम्भोलकर, पानसारे और कलबुर्गी की हत्या के विरोध में पुरस्कार लौटा दिया । सरपंच भगीरथी फिल्म में भी गीतकार, संगीतकार संभाजी भगत हैं. इन दिनों उनका नाटक स्टैचु ऑफ़ लिबर्टी हाउस फूल जा रहा है ।

संभा जी भगत ने 2016 में ‘द वॉर बीट’ नाम से इन्टरनेट पर गाने लोड करना शुरू किया है। वे कहते है। द वॉर बीट’ इसलिए शुरू किया क्योंकि आज मीडिया के सभी साधनों पर फासिस्ट ताकतों का कब्जा है। लोकतांत्रिक स्थानों पर हमें हमारी बात प्रेषित करने का साधन खत्म हो गया है। सइबर – टेकनालांजी में थोड़ा बहुत स्पेस बचा है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी इन्टरनेट का प्रयोग होने लगा है। इसलिए हमने अपनी बात अपनी भाषा में कहने के लिए इस साधन को अपनाया और हम सफल भी हो रहे हैं।

3 जून 6 जून 2017 को संभाजी ने कला- संगिनी के बैनर तले 150 युवा कलाकारों को इकट्ठा किया। साने-गुरूजी स्मारक के मानगांव जो रायगड़, जिला महाराष्ट्र में है, वहां ट्रेनिंग कार्यक्रम लिया। इसमें कलाकारों को वैचारिक व सैद्धान्तिक आधार पर आज फासिस्ट ताकतों से विभिन्न माध्यमों का तकनीक  का प्रयोग करते हुए कैसे लड़ा जाये पहले सिखाया गया। इस ट्रेनिंग में 15 समूह के लोगों ने भाग लिया। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हेतु कला – संगिनी की स्थापना की गई। इन युवकों ने चार दिन में 12 लघु फिल्में और 14 गाने बनाये।

संभाजी कहते हैं जहां आन्दोलन की जरूरत होती है, मैं वही होता हूँ । मैं अपना जलसा झोपड़ियों, बस्तियों, गांवों में करता हूँ। मेरा एक सपना है – मैं दलित संशोधन केन्द्र की स्थापना करूं, जहां गरीब, दलित बच्चों के लिए मैं रेडियो, टी.वी. सेन्टर खेल सकूं। उन्हें साउन्ड रिकार्डिगं, गीत-संगीत, फिल्म बनाना सीखा सकूं, ताकि अपनी बात करने के लिए हमें किसी और के पास न जाना पड़े। हम अपने माध्यमों से फासिस्ट ताकतों, ब्राहमणवाद, जातिवाद व पूंजीपतियों के खिलाफ आन्दोलन खड़ा कर सकें। उनकी मान्यता है कि आने वाली युवा पीढ़ी की नारियां स्वयं अपना इतिहास रचेगीं। स्त्रियों की भूमिका के बिना समाज में कोई क्रांति नहीं लाई जा सकती ।

संभाजी के पोवाडा में सत्ताविरोधी आक्रोश साफ दिखाई देता है । वे पूंजीपतियों, सामांतवादी, साम्राज्यवादी शक्तियों के विरूद्ध हुंकार भरते हैं। मनुवादियों, ब्राहमणविादियों तथा फासिस्ट संस्कृति के खिलाफ युवकों को लामबन्द होने की प्रेरणा देते हैं।

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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मुस्लिम महिलाओं की निर्णय स्वतंत्रता: प्रतिरोध का एक स्वरूप

आरिफा खातून

पी-एच.डी शोधार्थी,मानवविज्ञान विभाग.संपर्क: arifakhatoon08@gmail.com

इस्लाम में विश्वास रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति मुसलमान कहलाता है और मुसलमानों को नियंत्रित या शासित करने वाली विधि को मुसलमान विधि या शरीयत कहा जाता है। मुस्लिम धार्मिक किताब कुरआन वह प्रथम धार्मिक किताब है जिसमें आज से 1400 वर्ष पूर्व ही औरतों को पुरुष के बराबर मान लिया गया (सिंह,2008)। लेकिन मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था में औरतों को मर्दों के मुकाबले दोयम दर्जे का माना जाता है, औरत के सामाजिक स्तर का सम्बन्ध सामाजिक मूल्यों से ताल्लुक रखने वाली समस्याओं से है। औरत के दर्जे से अर्थ यह है कि एक समाज विशेष में औरत को मर्द से ऊँचा, नीचा या बराबर क्यों माना जाता है।परिवार, विवाह, शिक्षा, राज्य आदि सामाजिक और राजनैतिक संस्थाएं इस तरह की होनी चाहिए कि वह मनुष्य के स्वभाविक विकास को कुंठित ना करें बल्कि उसे आजादी के साथ अधिक विश्वास का मौका दे। यही संस्थाएं जोकि मनुष्य को  संतुष्ट करने के लिए बनाई थी, उनको कुंठित कर रही हैं। अगर हम स्त्री के अधिकार की बात करते हैं तो उसके निर्णय लेने की स्वतंत्रता के अधिकार को कैसे नजरंदाज कर सकते हैं। निर्णयन स्वतंत्रता ही स्त्री का सबसे बड़ा मानवाधिकार है। मूलतः समाज पितृसत्तात्मक है, निर्णय प्रक्रिया से व्यवस्थित इस पितृसत्तात्मक समाज में अभी भी उच्च स्तर पर लैंगिक असमानता व्याप्त है। सामाजिक और आर्थिक रूप में महिलाओं में निर्णय के विकल्प बहुत सीमित होते हैं। निर्णय लेने का अधिकार सभी व्यक्ति को होता है। इसमें महिलाओं का भी अहम स्थान है जो कि हमारे देश कि कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं। निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं कि भूमिका उनकी स्वायत्तता या स्वतंत्रता को दर्शाती है निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं कि भूमिका प्राकृतिक और सीमित होती है। महिलाओं का निर्णय कई सामाजिक संस्थाओं से प्रभावित रहता है जैसे परिवार,विवाह, नातेदारी इत्यादि। जिसके कारण मूलतः उन्हें ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं जो कि उनके स्वयं के नहीं होते मतलब कि उनमें उनकी पसंद शामिल नहीं होती है। निर्णय लेने में महिलाओं कि भूमिका कमजोर उजागर होती है और संसाधनों पर उनका बहुत ही कम नियंत्रण होता है। निर्णय प्रक्रिया में शिक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।“शिक्षा महिलाओं की पारंपरिक पारिवारिक भूमिका से अलग नहीं करती लेकिन एक माँ और पत्नी के रूप में उनके सामाजिक मूल्यों को बेहतर और सशक्त बनाती है। बेहतर स्थिति में होने का प्रभाव उनके निर्णयन क्षमता पर भी आवश्यक रूप से दिखाई पड़ता है (Srinivas1977)”।

सुधार नहीं पूर्ण बदलाव चाहेंगी महिलायें

अगर हम एक स्त्री को उसके समस्त निर्णय का अधिकार देते हैं तो इसका मतलब है की हम उसे स्वतंत्र जीवन का उपहार दे रहे होते हैं और उसके व्यक्तित्व को बढ़ावा दे रहे होते हैं, क्योंकि अपने जीवन के फैसले स्वयं करने से व्यक्तित्व का विकास होता है। मुस्लिम समाज में महिलाओं को अपने अस्तित्व को लेकर अधिक संघर्षरत होना पड़ता है क्योंकि उनके स्वतंत्र अधिकारों को अकसर शरीयत और धर्म का हवाला देकर मारा जाता रहा है। आमतौर पर महिलाओं के संबंध में देखा जाता है कि उन्हें केवल कुछ घरेलू निर्णय लेने का ही अधिकार प्राप्त होता है और यह निर्णय उनके खुद के नहीं बल्कि पारिवारिक होते हैं। महिला अपने बच्चे का पालन पोषण करती है लेकिन उस बच्चे के बारे में फैसला लेने का हक उनको बहुत कम ही मिलता है। ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां महिलाओं को अभी भी स्वतन्त्रता नहीं मिली है। मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति और भी गंभीर है। मुस्लिम समाज में महिलाओं को और अधिक नियमों और प्रथाओं का पालन करना पड़ता है। अगर हम महिलाओं के व्यक्तिगत जीवन को देखें तो वहाँ भी उनको अपनी स्वतन्त्रता के लिए अभी भी संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्हें किससे शादी करनी है? कितने बच्चे पैदा करने हैं? किस प्रकार के कपड़े पहनने हैं? कहाँ पढ़ाई करनी है? समाज के किन लोगों से ही व्यवहार रखना है? महिलाओं के व्यक्तिगत जीवन के सम्पूर्ण निर्णय का संचालन अप्रत्यक्ष रूप से उनके पारिवारिक सदस्य और समाज के ठेकेदारों द्वारा नियंत्रित होता है। यदि महिलाओं के पास स्वायत्ता और सामाजिक आर्थिक स्वतंत्रता हो तो वह अपनी निर्णय क्षमता का भरपूर उपयोग कर सकती हैं। उनकी स्वतंत्रता का क्षेत्र जितना बढ़ता जाएगा निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी उसी क्रमानुपात में बढ़ेगी।

कुछ मुस्लिम महिलाओं के रचनात्मक प्रतिरोध की दास्तान 


1.भारत का पहला कन्या स्कूल खोलने में फातिमा शेख ने सावित्रीबाई फुले की मदद की थी। फातिमा शेख सावित्रीबाई फुले की सहयोगी थीं। जब ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने का बीड़ा उठाया, तब फातिमा शेख ने भी इस मुहिम में उनका साथ दिया।उस जमाने में अध्यापक मिलने मुश्किल थे। फातिमा शेख ने सावित्रीबाई के स्कूल में पढ़ाने की जिम्मेदारी भी संभाली। इसके लिए उन्हें समाज के विरोध का भी सामना करना पड़ा। फातिमा शेख पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका थीं। हालांकि इतिहास ने उन्हें नजरंदाज कर दिया। फातिमा के बड़े भाई उस्मान शेख ने भी महिलाओं की शिक्षा को समर्थन दिया।

नादिया अली का सेक्सुअल क्रूसेड

2.“मसीह अलीनेजाद” जो कि एक इरानी पत्रकार एवं नारीवादी महिला है, कहती हैं कि मैंने हमेशा से माँ, बहनों व चाचियों को हिजाब पहने देखा। यह सामान्य सी बात थी, पर जब वह सात साल की हुईं, तो उन्हें अहसास कराया गया कि हिजाब पहनना नियम है। उन्हें हिदायत दी गई की वह बिना स्कार्फ पहने घर से बाहर न निकलें। उन्हें अपने काले घुँघराले बालों को हवा में लहराना बहुत पसंद था, मगर उन पर हिजाब का नियम थोप दिया गया। इस बार उन्होंने सवाल उठाये, पर सबने डांट दिया। स्कूल की खेल प्रतियोगिताओं में लड़कों को हिस्सा लेते देख मसीह ने कहा किवह भी खेलना चाहती हैं, पर शिक्षक ने मन कर दिया। मसीह कहती हैं की तब मैं आजादी के मायने नहीं जानती थी, ना ही तब मैं महिला अधिकारों को समझती थी। पर मुझे हर दिन यह अहसास होता था की भाई और मेरे बीच भेदभाव हो रहा है। बड़ी हुई तो पता चला कि पूरे देश में महिलाओं के साथ भेदभाव हो रहा है। तमाम पाबंदियों के बावजूद मसीह की पढाई जारी रही। कालेज के दौरान वह छात्र राजनीति में आ गईं। यह बात पुरुषों को पसंद नहीं आई। 1994 में एक छात्र प्रदर्शन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके मन में ढेरों सवाल थे। वह अपने देश की हुकूमत से सवाल पूछना चाहती थीं कि महिलाओं पर पाबंदियां क्यों थोपी गई हैं? कालेज  से निकलने के बाद उन्होंने पत्रकारिता करने का फैसला किया। वह ईरान लेबर न्यूज एजेंसी में काम करने लगीं, यहाँ उन्हें पार्लियामेंट कवर करने का मौका मिला। साल 2005 में उन्होंने एक खबर लिखी, जिसमें सांसदों के भ्रष्टाचार का खुलासा था। खबर पर भारी हंगामा हुआ, उन्हें पार्लियामेंट की रिपोर्टिंग से बाहर कर दिया गया। मसीह कहती हैं, जब मैं सांसदों से सवाल पूछती थी, तब वह जवाब देने की बजाय मुझसे कहते थे, पहले आप हिजाब पहनकर आइये, तब बात करेंगे। वे मर्द पत्रकारों से बात करते थे और मुझे जानबूझ कर नजर अंदाज करते थे। उनका मकसद मुझे अपमानित करना था। साल 2014 में उन्होंने फेसबुक पर माई स्टीलथी फ्रीडम पेज बनाया। इसका मकसद ईरान की महिलाओं को एक फोरम मुहैय्या कराना था, जहाँ वे हिजाब के खिलाफ  अपनी आवाज उठा सकें। बस चाँद दिनों में ही यह पेज पूरी दुनियां में मशहूर हो गया। ईरान की लाखों महिलाओं ने इस पेज पर अपने सन्देश पोस्ट किए। तमाम महिलाओं ने बिना हिजाब के अपनी तस्वीरें पोस्ट कीं और इच्छा जाहिर की कि उन्हें बिना हिजाब के बाहर निकलने की इजाजत दी जाए। मसीह कहती हैं कि मैंने कभी सोंचा भी नहीं था कि इतनी महिलाएं मेरे अभियान से जुड़ेंगी। पेज पर महिलाओं के फोटो और सन्देश देखकर लगता है कि वे अपनी आजादी के लिए किस कदर बेताब हैं। उनके जज्बे को सलाम!  आज पूरी दुनियां में इस अभियान की चर्चा है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने इसे स्कार्फ क्रांति का नाम दिया।

3. मलाला युसुफजई है जिसने शिक्षा के अधिकार के लिए आतंकियों से टक्कर ली। मलाला ने तालिबान के कट्टर फरमानों से जुड़ी दर्दनाक दास्तानों को महज 11 साल की उम्र में अपनी कलम के जरिए लोगों के सामने लाने का काम किया। 2008 में तालिबान ने स्वात घाटी पर अपना नियंत्रण कर लिया। वहां उन्होंने डीवीडी, डांस और ब्यूटी पार्लर पर बैन लगा दिया। साल के अंत तक वहां करीब 400 स्कूल बंद हो गए। इसके बाद मलाल के पिता उसे पेशावर ले गए जहां उन्होंने नेशनल प्रेस के सामने वो मशहूर भाषण दिया जिसका शीर्षक था- हाउ डेयर द तालिबान टेक अवे माय बेसिक राइट टू एजुकेशन? तब वो महज 11 साल की थीं। साल 2009 में उसने अपने छद्म नाम श्गुल मकईश् से बीबीसी के लिए एक डायरी लिखी। इसमें उसने स्वात में तालिबान के कुकृत्यों का वर्णन किया था। 2012 को तालिबानी आतंकी उस बस पर सवार हो गए जिसमें मलाला अपने साथियों के साथ स्कूल जाती थीं। उन्होंने मलाला पर एक गोली चलाई जो उसके सिर में जा लगी। मलाला पर यह हमला 9 अक्टूबर 2012 को खैबर  पख्तूनख्वा प्रांत के स्वात घाटी में किया था। जब वह स्वस्थ हुई तो अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार, पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार (2011) के अलावा कई बड़े सम्मान मलाला के नाम दर्ज होने लगे। 2012 में सबसे अधिक प्रचलित शख्सियतों में पाकिस्तान की इस बहादुर बाला मलाला युसूफजई के नाम रहा। लड़कियों की शिक्षा के अधिकार की लड़ाई लड़ने वाली साहसी मलाला यूसुफजई की बहादुरी के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा मलाला के 16वें जन्मदिन पर 12 जुलाई को मलाला दिवस घोषित किया गया। बच्चों और युवाओं के दमन के ख़िलाफ और सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले भारतीय समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी के साथ संयुक्त रूप से उन्हें 10 दिसंबर 2014 को नार्वे में आयोजित एक कार्यक्रम मे शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। 17 वर्ष की आयु में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली मलाला दुनिया की सबसे कम उम्र वाली नोबेल विजेती बन गयी।

मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड

4. बेनजीर भुट्टो 2 दिसंबर 1988 को मुस्लिम दुनियां की पहली मुस्लिम महिला प्रधानमंत्री बनीं। उस देश (पाकिस्तान) की प्रधानमंत्री जहाँ सत्तारूढ़ कट्टरपंथियों का मानना था कि मुस्लिम औरतें शासन नहीं कर सकतीं यह इस्लाम के खिलाफ है। बेनजीर औरतों की ताकत बनकर उभरीं। वह मात्र ३५ बरस की सबसे कम उम्र की प्रधानमंत्री  बनीं। बेनजीर लोकतंत्र के अधिकार में तथा तानाशाही के खिलाफ लडती रहीं , वह पाकिस्तान में इस्लामी कानून लागू करने के सख्त खिलाफ थीं। बेनजीर पाकिस्तान को लोकतान्त्रिक देश बनाने के पक्ष में थीं जिसमें सभी को समान अधिकार मिले। वह महिलाओं के अधिकारों को लेकर लड़ती रहीं। इसी कारण रावलपिंडी  में  27 दिसंबर  2007 को बेनजीर भुट्टो की निर्मम हत्या कर दी गई। अपनी हत्या से पहले बेनजीर ने अपनी जीवनी  “मेरी आपबीती” लिखी। सन्डे टाइम्स लिखता है कि “यह आपबीती एक बहुत बहादुर औरत कि आपबीती है जिसने अनेक चुनौतियाँ स्वीकार कीं, जिसके परिवार के अनेक लोग शहीद हुए, जिसके परिवार के अनेक लोग शहीद हुए, जिसने पाकिस्तान की आजादी की मशाल जलाये रखी, बावजूद तानाशाही के विरोध के।”

मलाला की कहानी बी बी सी के जुबानी

5. महिलाओं को हर जगह अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष करना पड़ा है। चाहे वह धार्मिक स्थल में प्रवेश को लेकर ही क्यों न हो। मजारों  और मंदिरों में प्रवेश का अधिकार अभी भी पूरी तरह से महिलाओं को नहीं मिल पाया है। हाल ही में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने हाजी अली दरगाह में प्रवेश की इजाजत पा कर ऐतिहासिक जीत हासिल की। हाजी अली दरगाह में 2012 से पहले महिलाएं जाती थीं मगर उसके बाद हाजी अली दरगाह ट्रस्ट ने परम्पराओं का हवाला देते हुए औरतों के भीतरी हिस्से तक जाने पर पाबन्दी लगा दी। मजार में प्रवेश पर पाबन्दी को जाकिया सोमन, नूरजहाँ एवं  साफिज नियाज ने चुनौती दी। 24 अक्टूबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने पुरुषों की तरह महिलाओं को भी दरगाह में प्रवेश देने का फैसला सुनाया। जो संस्था इसकी लड़ाई लड़ रही है उसके कुछ और भी सवाल हैं, जो हाजी अली दरगाह में प्रवेश से कहीं ज्यादा तल्ख और मुस्लिम समाज के भीतर मर्दों के वर्चस्व को चुनौती देते हैं। इस संस्था के उभार से खास तौर से उन मौलानाओं की दुनिया में हड़कंप तो मची ही होगी जो रस्मो रिवाज की व्याख्या करते समय मुस्लिम औरतों के हक के सवाल को टाल जाते हैं। इसलिए एक बड़े टकराव के लिए तैयार रहना चाहिए। 2007 में यह संस्था बनी थी और संविधान के फ्रेम के तहत मुस्लिम महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने का इरादा रखती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में कानूनी सुधार की बात करती है। धर्म की सकारात्मक और उदार व्याख्या में यकीन रखती है। मुस्लिम औरतों के आर्थिक और धार्मिक अधिकारो में बराबरी लाना चाहती है। मुस्लिम समाज के भीतर जातिगत भेदभाव के प्रति समझ पैदा करना चाहती है। दलित मुस्लिमों के सवाल उठाना चाहती है। पूंजीवाद, सांप्रदायिकता, फांसीवाद और साम्राज्यवाद का विरोध करती है। यह संस्था मुस्लिम समाज के भीतर एक वैकल्पिक प्रगतिशील आवाज बनना चाहती है।

इनके अतिरिक्त और भी मुस्लिम महिलाओं ने समय-2 पर अपने साहस का परिचय दिया है। जिनमें रजिया सुल्तान का नाम उल्लेखनीय है। रजिया सुल्तान मुस्लिम एवं तुर्की इतिहास कि पहली महिला शासक थीं।
इन सभी महिलाओं के संघर्ष की दास्तान को जानकार लगता है कि जब बंदिशों में यह इतने साहसी कार्य कर सकती हैं जोकि ना सिर्फ खुद के लिए बल्कि समाज के लिए भी थे। तो यदि इन्हें अपना जीवन जीने की स्वतंत्र छुट दे दी जाए तो निश्चित ही महिलाएं समाज में व्याप्त कुरीतियों और रुढियों को तोड़कर समाज का एक नया ढांचा प्रस्तुत करेंगी।


सन्दर्भ सूचि
1.सिंह, निशांत (2008). मानवाधिकार और महिलाएं. राधा पब्लिकेशन, नईदिल्ली
2.Srinivas,M. N.  (1977). The Changing Position of Indian Women.  Man, New Series
3.भुट्टो, बेनजीर (2012). मेरी आपबीती. राजपाल एंड सन्ज. नई दिल्ली
4.हिंदुस्तान अखबार, 22 मार्च 2015

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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अस्तित्व के प्रश्न खड़े करती दलित स्त्री पात्र

शिप्रा किरण

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग.बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय
लखनऊ,
संपर्क: kiran.shipra@gmail.com



अभिव्यक्ति के तमाम सशक्त माध्यमों में से एक है- सिनेमा. जिसके बहुत गहरे और गंभीर सरोकार हैं. आमतौर पर समझा जाता रहा है कि सिनेमा मात्र मनोरंजन का ही एक साधन है. यह मात्र मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि अपने विभिन्न टूल्स के साथ प्रतिरोध का एक जरिया भी है. इसने अपने अन्दर तमाम सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को समेटा है. लगभग सभी आधुनिक-उत्तर आधुनिक विमर्श फिल्मों का हिस्सा बने हैं. उन्हीं अस्मितामूलक विमर्शों में एक  है- स्त्री विमर्श. साहित्य या समाजविज्ञान की तरह हिन्दी सिनेमा ने स्त्री से सम्बंधित विषयों को विमर्श की तरह तो प्रस्तुत नहीं किया क्योंकि सिनेमा एक उद्योग है और उसके बाजार की अपनी एक सीमा है परन्तु यह अवश्य हुआ है कि विमर्श के तमाम पहलुओं को सिनेमा ने अपना विषय जरूर बनाया. स्त्री मुक्ति और उसकी अस्मिता की पहचान करना या उसे रेखांकित करने का कार्य हिंदी सिनेमा ने जरूर किया है. ध्यान देने वाली बात यह है कि आज स्त्री विमर्श के भीतर भी एक नई धारा की शुरुआत हो चुकी है जिसे ‘दलित स्त्रीवाद या अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म’ कहा जाता है. साहित्य और सामजिक विज्ञानों के अंतर्गत दलित स्त्रीवाद, दलित स्त्रियों के अधिकारों और संघर्षों को मुखर आवाज देने वाला माध्यम है. खासकर दलित स्त्रियों का लेखन उनकी अभिव्यक्ति का एक औजार बन कर सामने आया है. सिनेमा ने भी समय≤ पर दलित स्त्री की विभिन्न छवियों को उनकी समस्याओं के साथ अभिव्यक्त किया है. साहित्य और सिनेमा दोनों ही कला के दो मजबूत स्तम्भ हैं साहित्य की तरह ही सिनेमा भी अपने दृश्य रूप में समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ता है. कहीं न कहीं सिनेमा और साहित्य दोनों ही कला रूपों की यह जिम्मेवारी है कि वह समाज के हाशिये को केंद्र में लाने का प्रयास करे. दलित विमर्श के इस दौर में जब दलित स्त्रीवाद उस विमर्श की एक जरूरी शाखा बन कर हमारे सामने है साहित्य के क्षेत्र में अधिकांश दलित स्त्रियों का कहना है कि उनको अब भी दलित सहित्य में वह स्थान नहीं मिला है जबकि उनका शोषण सर्वाधिक और दोहरा-तिहरा है. इसी सन्दर्भ में प्रख्यात मराठी लेखक और अम्बेडकरवादी चिन्तक यशवंत मनोहर अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म के एक स्वतंत्र श्रेणी में हो रहे साहित्यिक विकास के विषय में उसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं- “यह फेमिनिज्म स्त्री को गुलाम करने वाली पूरी समाज व्यवस्था बदलना चाहता है…जिन जिन अविष्कारों ने स्त्रियों को पुरुषों की दासी बनाया है उन सब अविष्कारों को अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म नकारता है…अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म का पुरुष से विरोध नहीं है. उसकी लड़ाई पुरुष के अहंकार से है, उसके अन्दर की वर्चस्व भावना से है…स्त्री किसी की गुलाम नहीं होगी. वह स्वतंत्र, समंजस, बुद्धिवादी और सम्पूर्ण मानव होगी.”1 इधर के कुछेक वर्षों में दलित स्त्रीवाद विमर्श की एक नई शाखा बन कर भले ही उभरा है लेकिन दलित स्त्री के दोहरे शोषण को, उसकी अस्मिता पर आए संकटों को, उस पर हो रहे चैतरफा अत्याचारों को हिंदी सिनेमा अपने तरीके और अपने स्तर पर न जाने कितने वर्षों से चित्रित करता आ रहा है.

समाज और कलाएँ खासकर साहित्य और सिनेमा हमेशा से एक दूसरे के पूरक रहे हैं. 1936 में आई अशोक कुमार-देविका रानी अभिनीत तथा हिमांशु राय द्वारा निर्मित ‘अछूत कन्या’ एक दलित स्त्री को केन्द्रीय पात्र के रूप में रखकर बनाई गई फिल्म है. जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है फिल्म एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अछूत बिरादरी या दलित समुदाय से सम्बन्ध रखती है. पूरी फिल्म दलित स्त्री पात्र कस्तूरी (देविका रानी) के इर्द-गिर्द ही रची-बसी है. एक दलित स्त्री और ब्राह्मण युवक प्रताप (अशोक कुमार) के प्रेम की कहानी कहती यह फिल्म उस सामंतवादी-जातिवादी समाज में एक साहसी उपस्थिति दर्ज कराती है. “फिल्मों की लगातार उपेक्षा के दौर में जमींदारी समाज को चुनौती देने वाली फिल्में आईं. अछूत कन्या 1936 में आयी थी. ब्राह्मण और हरिजन युवती के अंतरजातीय संबंधों पर बनी यह फिल्म स्त्री की स्वतंत्र इच्छा शक्ति को बिना लाग लपेट के रेखांकित कर सकी थी.”2 और यह सिर्फ एक युवा दलित स्त्री और युवा ब्राह्मण पुरुष के बीच के सहज आकर्षण और प्रेम की ही अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि इन दोनों के पिता और परिवारों के बीच के मानवीय प्रेम और भाईचारे की कहानी भी बयान करती है. दलित कस्तूरी का पिता दुखिया, प्रताप के ब्राह्मण पिता मोहनलाल के शरीर से सांप का जहर चूस कर उसकी जान बचाता है वहीं से दोनों के दोस्ती की शुरुआत होती है. यह दोस्ती किसी भी जाति-धर्म के बंधन से बहुत परे थी. इसी दोस्ती के मजबूत दरख्त के साए में कस्तूरी और प्रताप का बचपन बीतता है. दोनों दो दोस्तों के प्रेम को देखते हुए जवान होते हैं. वही प्रेम उन्हें विरासत में मिलता है जो उम्र के साथ धीरे-धीरे विस्तार पा रहा होता है. दोनों के पिता अपने बच्चों कस्तूरी और प्रताप के प्रेम समबन्ध और उनके आपसी स्नेह से वाकिफ भी रहते हैं लेकिन उन्हें इस बात का अंदाजा भी अच्छी तरह रहता है कि इस सम्बन्ध की कोई अंतिम व सुखद परिणति नहीं हो सकती. प्रताप का पिता मोहनलाल एक जगह अपनी पत्नी अर्थात प्रताप की माँ से कहता है- “कस्तूरी हमारी जात की रहती तो प्रताप के लिए कैसी अच्छी थी? माँ जवाब देती है, कहती है- “होती तब न? पर वह तो अछूत की बेटी है.” दोनों का आपसी लगाव देख माता-पिता कुछ सशंकित भी हैं. प्रताप के माँ-बाप का यह संवाद उनकी शंका को अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करता है- “अब भी कुछ नहीं बिगड़ा. हम प्रताप के लिए कन्या खोजते हैं उधर दुखिया से कहते हैं कि कस्तूरी के लिए भी वर ढूंढें.” दोनों का अपनी अपनी जाति में जल्द से जल्द विवाह कर देना ही उन्हें एक दूसरे से दूर करने का एकमात्र उपाय लगता है. प्रताप के माता-पिता को भी कस्तूरी से बहुत स्नेह है लेकिन जाति की श्रेष्ठता का अहसास भी उनके भीतर लगातार बना रहता है यह अलग बात है कि वह अहसास कभी अहंकार या झूठे गर्व में तब्दील नही हो पाता क्योंकि उनकी मनुष्यता उस जातिवादी श्रेष्ठता पर कहीं अधिक भारी पड़ती है. छुआछूत और जातिवाद मनुष्य के चेतन-अवचेतन पर इस तरह हावी है कि कस्तूरी के प्रति अगाध स्नेह रखने के बावजूद प्रताप की माँ जब यह जानती है कि प्रताप कस्तूरी के हाथ का बना खाना खाया करता है. माँ की त्योरियां चढ़ जाती हैं- “बाम्हन का पूत होके इसके हाथ का खाता है?” प्रताप की माँ के स्नेहिल रूप का अचानक इस तरह कठोर हो जाना कस्तूरी को असहज कर देता है. जो कस्तूरी थोड़ी देर पहले प्रताप को खाना खिलाकर इतरा रही थी अब डर सी जाती है. जल्दी जल्दी कहने लगती है- “माँ, गुस्सा न हो अब मैं इसे कभी न खाने दूंगी. माँ, मैं कसम खाती हूँ अब कभी न खाने दूंगी.” कस्तूरी दुखी तो होती है पर अधिक देर नहीं क्योंकि उसे अपनी अछूत स्थिति स्वीकार्य है. उस रुढ़िवादी समाज में किसी दलित कन्या के लिए इतना ही काफी था कि उसका किसी ब्राह्मण परिवार से सहज सम्बन्ध है. वह एक ब्राह्मण युवक के साथ खेलती और घूमती है. तब वहाँ जाति चेतना, वर्ग चेतना या जातीय अस्मिता का तो प्रश्न ही नहीं था. अपने जातिवादी-सामंती समाज और इस मेल-मिलाप के परिणामों का भान भी इन दोनों परिवारों को बखूबी है और अपने भाईचारे और दोस्ती को रिश्ते या पारिवारिक सम्बन्ध में न बदल पाने का दुःख भी दोनों तरफ है. जब प्रताप की माँ दोनों को ना मिलने का आदेश देती है. प्रताप का पिता कस्तूरी के पिता से कहता है- “दुखिया, हम एक जात के होते तो कैसा अच्छा था!” तब कस्तूरी का पिता कहता है- “हाँ भैया, ये दोनों एक दूसरे पर जान देते हैं.” यह संवाद दोनों की ही विवशता और व्यथा की तीव्रता बताता है. निश्छल और सच्चे-एकनिष्ठ प्रेम के बावजूद जाति की दीवार उन्हें मिलने नहीं देती. प्रताप का विवाह एक ब्राह्मण लड़की से कर दिया जाता है. कस्तूरी अकेली रह जाती है. हमेशा की हंसती-चहकती कस्तूरी अब उदास सी हो जाती है. पिता के समझाने पर कहती है- “बचपन में खेलना बुरा नहीं था तो अब कैसे हो गया? पिता कहता है- “अब तुझसे कौन दलील करे? वह जवाब देती है- मैं दलील नहीं करती बापू मैं तो बस जानना चाहती हूँ….बोलो जवाब दो” पिता उसके सवाल को अनसुना करने का प्रयास करता है “अगर वह बाम्हन है और मैं अछूत तो इससे हमारा साथ क्यों छूटे?” वह बार-बार यही प्रश्न करती है. तब तक जब तक कि पिता उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दे देता. इसलिए उस समय और सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए प्रमोद भारद्वाज ने इस फिल्म की रीलीज को उस समाज में ‘पहला उपद्रव’ कहा है- “पहला उपद्रव ‘अछूत कन्या’ (1936) से हुआ. यह एक वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक और ईमानदार अभिव्यक्ति थी. यह उपद्रव किसी खास दर्शक समूह में नहीं हुआ, क्योंकि इस फिल्म का मकसद किसी को सताना या चिढ़ाना कतई नहीं था. आजादी का आन्दोलन था. समाज शुद्धिकरण की प्रक्रिया में था. मनुष्य को हमेशा दूसरा नागरिक बनाने बताने वाली मान्यताओं की सीवनें उधड रही थीं.”3  सन1936 में अपने परिवार, उस समाज से सहज और आवश्यक प्रश्न करती, जवाब मांगती दलित स्त्री है अछूत कन्या की कस्तूरी. जिस समाज में स्त्री होने का अर्थ मुंह बंद कर हर तरह के अत्याचार को सहना, पुरुष सत्ता को सिर झुका कर स्वीकार करना, ना हँसना और न ही कुछ बोलना हो उस समाज में एक दलित लड़की कस्तूरी का एक ब्राह्मण युवक के साथ खूब घूमना, खुल कर हँसना, उछलना कूदना और गाने गाना, अन्य स्त्री पात्रों की तरह सिर पर आँचल ना रखना पूरी सामंती और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को चुनौती है. यह ठीक है कि दोनों विवाह बंधन में नहीं बंध सके लेकिन उनका प्रेम अंत तक उस समाज को बेचैन किये रहा और पितृसत्ताक समाज के आँख की किरकिरी बना रहा. कस्तूरी का विवाह एक दलित युवक मन्नू से कर दिया जाता है. वह अपने पति के प्रति समर्पित रहने का हरसंभव प्रयास करती है लेकिन प्रताप को नहीं भूल पाती. कस्तूरी के मन में अपने पति की पहली पत्नी के लिए भी कोई दुर्भावना नहीं रहती किन्तु पहली पत्नी कजरी प्रताप की पत्नी मीरा के साथ मिलकर कस्तूरी के खिलाफ उसे बदनाम करने की एक साजिश रचती है. एक दलित स्त्री ही यहाँ दलित स्त्री के खिलाफ खड़ी हो जाती है. जहां प्रताप की पत्नी को अपने अधिकारों के प्रति कोई चेतना नहीं थी वहीं मन्नू की पहली पत्नी अपने पति से मिलने वाले अधिकारों के प्रति सजग थी. लेकिन इसी सजगता में वह अनजाने ही नकारात्मक भूमिका में आ जाती है. जबकि वह अपने पिता और पति दोनों की ही ज्यादती का शिकार थी. वह अपने पति के साथ रहना चाहती थी लेकिन उसके पिता को यह मंजूर नहीं था. जब वह अपने पिता का विरोध कर पति के साथ रहने आती है तो पति उसे स्वीकार नहीं करता. दलित स्त्री अपनी जाति में भी पुरुषवादी मानसिकता और शोषण का शिकार है. दलित स्त्रियों पर होने वाले दोहरे शोषण के विषय में मोहनदास नैमिषराय लिखते हैं- “वैसे तो पूरे भारतीय समाज की स्त्रियाँ पितृसत्ता के बोझ के नीचे कराह रही थीं लेकिन दलित स्त्रियों को न केवल अपने समाज की पितृसत्ता को झेलना पड़ता था बल्कि सवर्ण समाज की पितृसत्ता भी उनका शोषण और दमन करती थी.”4 यह ठीक है की फिल्म में कस्तूरी किसी विद्रोही भूमिका में नजर नहीं आती किन्तु उस दौर में जब लोग इश्क का नाम जबान पर लाने से डरते हों, एक स्त्री का खुलकर प्रेम करना वह भी एक दलित स्त्री का किसी ब्राह्मण युवक से प्रेम करना. प्रेम को छुपाने की जगह खुलकर उसे अभिव्यक्त करना, अपने विवाह, अपने प्रेम सम्बन्ध, जातियों के अंतर जैसे मसलों से जुड़े सवाल उठाना, भयानक रुढियों में जकड़े उस गुलाम-सामंती समाज में एक दलित स्त्री के लिए इससे बड़ा विद्रोह और क्या होगा. 1936 में ही प्रकाशित प्रेमचंद के गोदान की दलित पात्र सिलिया और मातादीन के प्रेमसंबंध वाले प्रकरण को भी इस सन्दर्भ में याद किया जा सकता है. अंतर यह है कि वहां विद्रोह का तीव्र और अधिक मुखर रूप था. और यह अंतर विधाओं के बीच के अंतर के कारण था. उनके दर्शक और पाठक वर्ग के अंतर के कारण था. इसी सन्दर्भ में अरुण कुमार ने लिखा है- “हिन्दी के कथा साहित्य में ऐसे उदाहरण तो थे. फिल्मों में इसे जगह मिल जाने को सामाजिक ढाँचे के लिए चुनौती भी समझा गया. संयोग या दुर्योग से राजनैतिक आन्दोलन के उस दौर में कुछ ऐसे अंतरजातीय दाम्पत्य सम्बन्ध भी हुए जिन्हें कांग्रेस के कई नेताओं ने अच्छा नहीं समझा. इसे राजनैतिक सरगर्मी का सामाजिक प्रभाव भी मना जा सकता है…बिहार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के एक नेता कुलानंद झा ‘वैदिक’ एक हरिजन युवती से परिणय सूत्र में बंधे थे. दरभंगा के विप्र समाज ने उनका बहिष्कार किया.”5  हिंदी सिनेमा और उससे जुड़े लगे कहीं न कहीं इन सब बातों के साक्षी थे, उन्हें भी खबर थी. और उन्हें ऐसे मुद्दों से अपनी फिल्म के लिए विषय भी मिले. लेकिन सभी जातिगत और स्त्री मुद्दे के भी कुछ पक्षों को उठाने के बावजूद यह हमारे समाज की विडम्बना ही थी कि निर्देशक एक दलित स्त्री और ब्राह्मण पुरुष का विवाह करा पाने का साहस नही कर पाता और फिल्म के अंत में कस्तूरी एक तेज गति से आती ट्रेन को दुर्घटना से बचाने के प्रयास में अपने प्राण गँवा देती है. अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद अछूत कन्या हिन्दी सिनेमा के इतिहास की पहली साहसिक फिल्म कही जा सकती है जो दलित स्त्री की आवाज बन कर हमारे सामने आती है. इसी फिल्म के बारे में फिल्म आलोचक प्रहलाद अग्रवाल लिखते हैं- “अछूत कन्या में अछूत नायिका को छोड़ने की दुर्बलता उस समय की भीषणतम सच्चाई थी…अछूत कन्या में छुआछूत के अमानवीय कृत्य को बड़ी तीव्रता से उकेर कर उसकी भर्त्सना की गई थी. यह उस समय आसान बात नहीं थी. यह बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध था और राष्ट्र इस समस्या से गहराई तक ग्रस्त था.”6

अछूत कन्या के 23 वर्ष बाद अर्थात 1959 में एक फिल्म आती है- सुजाता. कुछ समानताओं और असमानताओं के साथ यह फिल्म भी दलित युवती और ब्राह्मण युवक के प्रेम की कहानी है. नूतन और सुनील दत्त के अतिरिक्त तरुण बोस-सुलोचना के अभिनय से सजी विमल राय की यह फिल्म हिन्दी सिनेमा के इतिहास में अपनी खास जगह बना चुकी है. सुजाता एक दलित परिवार की लड़की है जिसके माता-पिता हैजे की महामारी का शिकार हो चुके हैं. उनकी दुधमुंही बच्ची को बस्ती के लोग वहाँ के इंजीनियर उपेन्द्रनाथ चैधरी (तरुण बोस) के घर लेकर आते हैं और उस बच्ची को सँभालने की गुहार लगाते हैं. पहले तो इंजीनियर बच्ची को सँभालने के लिए राजी नहीं होता लेकिन पत्नी चारू (सुलोचना) के कहने पर वह इस शर्त पर उसे रखने को तैयार हो जाता है कि जल्द ही उसके बिरादरी वाले आकर उसे ले जाएंगे. लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसे बनती हैं कि वह बच्ची वहीं उस ब्राह्मण इंजीनियर के परिवार में पलती और बड़ी होती है. चारू और उपेन्द्र नाथ सुजाता को अपनी सगी बेटी रमा (शशिकला) के साथ पालते हैं. पत्नी चारू सुजाता की व्यवस्था अपने घर से कहीं अलग करने का हरसंभव प्रयास करती है लेकिन चारू का सहज मातृत्व उसकी जातिवादी सामजिक बुद्धि के आड़े आ जाता है. व्यवहारिक बुद्धि पर भावना की जीत होती है और अंततः सुजाता उनकी सगी बेटी रमा के साथ ही खेलते-खेलते युवा होती है. विवशता में बना यह सम्बन्ध अब एक गहरे मानवीय सम्बन्ध में बदल जाता है. यही मानवीय स्नेह और सरोकार ‘अछूत कन्या’ के मोहनलाल और सुजाता के उपेंद्रानाथ को एक समान स्तर पर लाकर खड़ा करता है. “सुजाता (1959) विमल राय की यह बहुचर्चित फिल्म, दलित विमर्श पर बनी पूर्व की अछूत कन्या का परिष्कृत रूप है…यहाँ भी अछूत कन्या की तरह दलित युवती (नूतन) और ब्राह्मण युवक (सुनील दत्त) है.”7 कुछ अर्थों में तो यह अछूत कन्या का परिष्कृत रूप कही जा सकती है लेकिन ‘अछूत कन्या’ में प्रताप की माँ और ‘सुजाता’ में भी रमा की माँ चारू की लगभग एक सी ही स्थिति है. पिताओं या पुरुषों से अधिक माओं या स्त्रियों में जातिवाद और छुआछूत की भावना अधिक प्रबल रूप में दिखाई देती है. इसके कारण भी हैं. हजारों वर्षों से स्त्रियाँ एक खास तरह से प्रायोजित, योजनाबद्ध और खतरनाक मानसिक कंडिशनिंग का शिकार रही हैं. ये कंडिशनिंग इतनी बारीकी से की गई है कि उन्हें स्वयं इसका रत्ती भर भी अहसास नहीं होता. उन्हें पता ही नहीं होता कि दूसरी स्त्री से किया गया उनका दुर्व्यवहार जाने-अनजाने ही उन्हें पूरी स्त्री जाति का शत्रु बनाता जा रहा है. उन्हें जरा भी समझ नहीं कि वह पितृसत्तात्मक समाज द्वारा किस तरह सदियों से इस्तेमाल की जा रही हैं. उन्हें इसी तरह अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर, स्त्रियों को ही स्त्रियों के खिलाफ खड़ा कर ‘स्त्री ही स्त्री की शत्रु’ जैसे पुरुषवादी जुमले फेंकती पितृसत्ताक मानसिकता ऐसे गढ़े गए जुमलों को भी अपने लाभ में इस्तेमाल कर ले जाती है. स्त्रियाँ भी इस तरह के ‘अस्मिता-विरोधी’ जुमले धड़ल्ले से प्रयोग करती हुई धीरे-धीरे उसी पुरुषवादी मानसिकता का शिकार होती जाती हैं. दोनों फिल्मों की माँओं को वर्तमान सन्दर्भों में इस तरह भी देखे जाने की जरूरत है. यह जरूर है कि ‘अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ के समय और सन्दर्भ वर्तमान से बहुत हद तक भिन्न हैं लेकिन पूरी तरह भिन्न भी नहीं. उन्हें वर्तमान से पूरी तरह काटकर न देखा जा सकता है ना ही समझा जा सकता है. वह भी कहीं न कहीं पुरुषवाद के भवन को मजबूत करने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा हैं. माँ चारू जब-जब सुजाता को मेहमानों के सामने “यह हमारी बेटी जैसी है” कहती है सुजाता का दिल चाक-चाक हो जाता है. माँ का ममतामयी मन तो उसे अपनी बेटी स्वीकार करता है लेकिन वर्णवादी बुद्धि उससे बार-बार यही कहलाती है. एक  माँ और एक ब्राह्मण स्त्री के द्वंद्व को चारू के चरित्र में स्पष्ट देखा जा सकता है. किन्तु पिता जिसे वह बापू कहती थी का बराबरी वाला स्नेह उसे बुरी स्थितियों में भी सांत्वना देता है. एक दिन जब सुजाता की अम्मी चारू उसे मेहमानों के लिए चाय लाने से मन करती है तो सुजाता हैरान रह जाती है. वह अम्मी से पूछती है- “मैं कौन हूँ? मैं ये जानना चाहती हूँ कि मैं हूँ कौन?…मेरे हाथ की चाय वो क्यों न पीते? क्या मेरे हाथ से छू जाने से चाय जहर बन जाती?” लेकिन अम्मी उसके सवालों को टाल जाना चाहती हैं. सुजाता जिद करती है- “बिना जाने नहीं छोडूंगी? बताओ.” ‘अछूत कन्या’ की कस्तूरी की तरह यहाँ भी दलित स्त्री प्रश्न करती है. वहां प्रश्न कुछ भोले थे. वो जाति और वर्ण की सीमा के भीतर थे लेकिन यहाँ सुजाता का प्रश्न जाति-वर्ण से आगे जाकर स्त्री-प्रश्न और दलित स्त्री के प्रश्न का प्रतिनिधित्व करता है. यह उसकी पहचान, उसके व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने वाला और उन तमाम संकटों से जूझने के बाद पूछा जाने वाला स्वाभाविक प्रश्न है जो किसी भी स्त्री-दलित स्त्री द्वारा पूछा ही जाना चाहिए. वर्तमान समय में जब स्त्री विमर्श में स्त्री और दलित स्त्रीवाद के अंतर्गत दलित स्त्री पहचान के संकटों से लगातार जूझ रही1959 में सुजाता यदि ऐसे ज्वलंत प्रश्न खड़े कर रही थी तो सहज ही यह समझा जा सकता है यह फिल्म क्यों हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित होती है. इसके माध्यम से हम स्त्री के विशेषकर दलित महिलाओं के दोहरे दमन की स्थितियों से भी रूबरू होते हैं. जो आज का एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन कर हमारे सामने है. आज जब दलित स्त्रीवाद एक आन्दोलन के रूप में हमारे सामने है. इस विषय पर मोहनदास नैमिषराय ने लिखा है- “दलित समाज जहां एक ओर अपने अन्दर एक मध्यवर्ग के उदय से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है वहीं उसे दलित आन्दोलन के भीतर एक और आन्दोलन की आहटें भी सुननी पड़ रही हैं. यह है दलित महिलाओं का आन्दोलन जो समग्र महिला समुदाय के मुक्ति आन्दोलन का हिस्सा होने के साथ-साथ दलित समाज में पितृसत्ता का प्रश्न उठाता है. दलित महिलाओं की त्रासदी यह है कि उन्हें एक गाल पर ब्राह्मणवाद का तो दूसरे गाल पर पितृसत्ता का थप्पड़ खाना पड़ता है.”8 अपने अछूत होने की सच्चाई जानकर और यह जानकर कि वह इस ब्राह्मण परिवार पर एक बोझ है सुजाता को आघात पहुंचता है. वह आत्महत्या करने निकल पड़ती है पर नदी किनारे गांधीजी की मूर्ती और उनका यह सन्देश कि “मरें कैसे? आत्महत्या करके? कभी नहीं. आवश्यकता हो तो जिंदा रहने के लिए मरें.” देख आत्महत्या का विचार त्याग घर लौट आती है. जबरीमल पारिख सुजाता में दिखाए गए आत्महत्या के दृश्य और गाँधी जी के उस सन्देश को केंद्र में रखकर लिखते हैं- “यह फिल्म गांधी और रवीन्द्र के इसी सन्देश को आधार बनाती है.”9 इन्हीं ऊहापोहों और अलग-अलग घटनाओं के बीच एक दिन अधीर (सुनील दत्त) नामक ब्राह्मण युवक का सुजाता के जीवन में प्रवेश होता है. दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं. अधीर एक आधुनिक युवक है वह जाति को नहीं मानता. सुजाता को विवाह के लिए मना लेना चाहता है. उसे महात्मा बुद्ध के शिष्य आनन्द को एक चांडाल कन्या चांडालिका द्वारा पानी पिलाने की कथा सुना  कर आत्मनिंदा व आत्महत्या को पाप बताते हुए सुजाता के मन में बसे हीनभाव और द्वन्द्व को दूर कर देना चाहता है. लेकिन सुजाता असमंजस में है. वह कहानी सुन कर कहती है- “वह तो पुराने जमाने की बात है. आजकल ऐसा हो सकता है?” तब अधीर कहता है- “हमारे जमाने में भी ऐसा महापुरुष हुआ है जिसने अपना सारा जीवन छुआछूत को मिटाने में लगा दिया. गांधीजी.” फिर वह सुजाता को अछूत लड़की लक्ष्मी की कहानी बताता है जिसे गांधीजी ने अहमदाबाद के आश्रम में रखा था. जिससे आश्रम को चंदे मिलने बंद हो गए थे किन्तु गांधीजी अपने निर्णय पर अटल रहे थे. सुजाता इन कहानियों को सुनकर उत्साहित हो जाती है लेकिन वह विवाह के लिए फिर भी तैयार नहीं है वह नहीं चाहती कि उसके कारण अधीर उसकी बहन रमा से विवाह करने से इनकार कर दे. किन्तु अधीर सिर्फ और सिर्फ सुजाता से ही विवाह करना चाहता है वह अपनी नानी (ललिता पवार) से कहता है कि- “मैं सुजाता के अलावा और किसी से ब्याह नहीं करूंगा.” और घर छोड़ कर जाने लगता है तब उसकी नानी बुझे मन से यह सम्बन्ध स्वीकार कर लेती है. और इस रिश्ते की बात करने सुजाता के घर जाती है. पूरी बात जानकर रमा की माँ तथा सुजाता की अम्मी अर्थात चारू सुजाता को भला-बुरा कहती है और इसी दौरान सीढियों से फिसल कर गिर जाती है. अंत में सुजाता के रक्त दान से ही चारू की जान बचती है. होश में आने पर जब चारू को यह पता चलता है कि उसकी जान किसी और ने नहीं सुजाता ने बचाई है और उसका खून सिर्फ सुजाता के खून से ही मिल सका तो वह अपने अपराधों का पश्चाताप करती है. तब वह पहली बार कहती है- “तू भी तो हमारी ही बेटी है.” इस तरह सर्वसम्मति से अधीर और सुजाता का विवाह हो जाता है. फिल्म का सुखद अंत होता है. “यह फिल्म यह सन्देश भी देती है कि सवर्ण और दलितों के बीच सिर्फ छुआछूत का मिटना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके बीच हर तरह की दूरी का मिटना भी जरूरी है…बिना किसी तरह की उग्र मुद्रा अपनाए और किसी को खलनायक बनाए फिल्म सही और गलत का विवेक प्रस्तुत करती है.”10 ‘अछूत कन्या’ में जो दलित नायिका कस्तूरी एक ब्राह्मण युवक के प्रेम में होने के बावजूद उसके साथ विवाह बंधन में नहीं बंध पाती और ब्राह्मण-दलित दोनों समुदाय के सामने अपनी पवित्रता और सच्चाई का सबूत देते हुए अपनी जान गवां देती है, ‘सुजाता’ तक आते-आते वही दलित नायिका अपने प्रेमी के साथ विवाह कर लेने की स्थिति में अवश्य आ गई है. यह घटना 1936 और 1959 के मध्य के लम्बे अंतराल को तो चिन्हित करती ही है समय के साथ बदलती सामजिक परिस्थितियों की भी पहचान कराती है. कहानी के प्लाट और विषय की समानता के बावजूद दोनों के ही दलित स्त्री पात्रों में कुछ बड़े अंतर भी हैं. सुजाता से लगभग 23 साल पहले बनी अछूत कन्या की कस्तूरी कई जगहों पर सुजाता से आगे निकल जाती है. एक सबसे जरूरी अंतर तो यह है वह विपरीत परिस्थितियों में भी आत्महत्या का मार्ग नहीं चुनती बल्कि उसका विचार भी दिमाग में नहीं लाती. वह जिजीविषा से भरपूर है. एक जातिवादी-मर्दवादी समाज के आगे वह अपने घुटने नहीं टेकती. वह जब तक जीती है चुनौती बनकर. मरने के बाद भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सन्देश बनकर जीवित रहती है. अछूत कन्या की कस्तूरी सुजाता की तुलना में अधिक स्वतंत्र है. लेकिन सुजाता का स्त्री अस्मिता से जुड़ा ‘मैं कौन हूँ’ जैसा गंभीर सवाल उसे उत्तर-आधुनिक विमर्श के बहुत करीब ले आता है. दोनों ही फिल्मों ने कुछ सीमाओं के बाद भी अपने-अपने स्तरों पर अपने समय से कहीं आगे जाकर स्त्री स्वतंत्रता, स्त्री अस्मिता और दलित स्त्री की समस्याओं को मजबूती से चित्रित किया है. हिन्दी सिनेमा जगत में आरम्भ से ही कुछ ऐसे कलाकार रहे हैं जिन्होंने विषयों को चुनने के जोखिम उठाए- “खतरा भी था उन फिल्मों से जिनके जरिये स्त्री की स्वतंत्रता का पक्ष प्रबल हो रहा था. जमींदारी समाज के लिए यह शुभ संकेत नहीं था. एक दौर में प्रेमचंद को भी अपने सामंत विरोधी रुझान के कारण आलोचना झेलनी पड़ी थी. अब विमल राय की सुजाता ब्राह्मण से विवाह करने के ख्वाब देखने लगी थी.”11  इस तरह दोनों ही फिल्में अपने साहसी विषयों और अपने मुख्य स्त्री किरदारों के माध्यम से हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ सार्थक अध्याय जोड़ने में सफल रहीं.


सन्दर्भ सूची
1.अनभै साँचा, सं-द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, अक्टूबर-दिसंबर 2008, पृ. 205
2.सिनेमा और हिंदी सिनेमा, अरुण कुमार, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 2007, पृ. 102
3.सदी का विवादास्पद सिनेमा, प्रमोद भारद्वाज, दैनिक जागरण नवरंग, 18 दिसंबर 1999, पृ. 02.
4.आधुनिकता के आईने में दलित, अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, पहला संस्करण 2002, पृ. 233
5.सिनेमा और हिंदी सिनेमा, अरुण कुमार, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 2007, पृ. 102
6.सदी का विवादास्पद सिनेमा, प्रमोद भारद्वाज, दैनिक जागरण नवरंग, 18 दिसंबर 1999, पृ. 02
7.समसामयिक सृजन, सं- महेंद्र प्रजापति, अक्टूबर-मार्च 2012-13, पृ. 49
8.आधुनिकता के आईने में दलित, अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, पहला संस्करण 2002, पृ. 230
9.अनभै सांचा, अक्टूबर-दिसंबर, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, 2008, पृ. 199
10.अनभै सांचा, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, अक्टूबर-दिसंबर, 2008, पृ. 199
11.सिनेमा और हिंदी सिनेमा, अरुण कुमार, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 2007, पृ.            103

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स्त्री के लिए एकांत, आज अभी भी ‘लक्जरी’ माना जाता है

विपिन चौधरी


विपिन चौधरी युवा कविता की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं.विश्व की दूसरी भाषाओं से अपनी रुचि के साहित्य का अनुवाद भी करती रही हैं.संपर्क: vipin.choudhary7@gmail.com

हमारे प्राचीन शास्त्रों ने इंसान के अकेलेपन से जन्म और मृत्यु को जोड़ते हुए कहा गया है कि इंसान का अकेलापन, जीवन का शाश्वत  सत्य है. तमाम तरह के रिश्ते-नाते और बंधनों के बावजूद इंसान अकेला हैं. दूसरी ओर  ‘एकांत’ इंसान द्वारा अर्जित एक ऐसी वृहत  मानसिक अवस्था भी है, जहाँ एकांत सिर्फ उसे पाने वाले की दिशा- निर्देश के अनुसार ही काम करता है. पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष अपने लिए ‘एकांत’ रचता आया है, लेकिन स्त्री के लिए  ‘एकांत’ तक पहुँचने का रास्ता आज भी बीहड़ बना हुआ है. स्त्री के जीवन के ढेरों पेचों-ख़म ही, एकांत तक उसकी पहुँच को दूर कर कर  देते हैं.यही कारण है कि समाज के परंपरागत ढांचे में रची-बसी एक भारतीय स्त्री के लिए आज के आधुनिक  दौर में भी  ‘ एकांत’ बहुत दूर की चीज़ है. इसका एक कारण यह भी है कि स्त्री और समाज के एक बड़े वर्ग  का एकांत की परिभाषा से सहज परिचय नहीं हो पाया है.  अक्सर एकांत को अकेलेपन का ही दूसरा रूप मान लिया जाता है जिसका सीधा अर्थ ही  चुप्पी,अवसाद और समाजिक दूरी है. इसी तरह जब एक स्त्री के  सम्पूर्ण  व्यक्तित्व को लेकर बात की जाती है तो  ‘एकांत तक पहुँचने से पहले  ‘अकेलापन’ आ धमकता है। एक चेतना-संपन्न स्त्री के संदर्भ में जिस ‘एकांत’ की बात कही जाती है, उस एकांत के लिए अभी तक स्त्री के एक बड़े वर्ग ने मानसिक रूप से तैयारी नहीं की है.  इसके पीछे स्त्री का सामाजिक सेट-अप और घर-परिवार से उसके घनिष्ट सरोकार हैं.

सदियों से हमारा स्त्री-वर्ग,  इसी परिवार के वायुमंडल में रच-बस कर खुद को धन्य मानता आया है. कुदरत ने स्त्री को उसके परिवेश  ने उसे इसी मानसिक समझ के साथ ही रचा है जिस पर समाज ने ठप्पा लगा कर उसे मज़बूत कर दिया.  सच है कि पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार के लिए खुद को भुला देना ही स्त्री को सदियों से भाता आया है.  तभी उसने अपने लिए कभी भी एकांत नहीं चुना या इस दिशा में कभी सोचा ही नहीं। दरअसल विवाह के बाद बच्चे होने की प्रक्रिया में फिर स्त्री बच्चे की परवरिश में लग जाती है और अपनी सभी रुचियों को भूल जाती है. भारत में  सामूहिकता को प्राथमिकता दी जाती रही है.  आज एकल परिवार का ज़माना है. एकल परिवार की नौकरीपेशा स्त्री के कंधों पर दोहरा भार है । यदि उसे ‘एकांत’ का संज्ञान हो भी तो परिवार से छिटक कर, अपने लिए किसी भी तरह के ‘एकांत’ में प्रवेश करना, उसे अपराध-बोध के गिरफ्त में ले जाने के लिए  काफी है. आज की स्त्री, चाहे आर्थिक रूप से  आत्मनिर्भर हो गयी हो और समाज को उसकी अलग पहचान के लिए बाध्य भी होना पड़ा हो  लेकिन अपने लिए उस ‘एकांत’ की  बात करना, जिसमें वह अपमें मन-मुताबिक सर्जन कर सके, अपने मन का अलहदा संसार रच सके, वैसा एकांत आज भी उसे दुर्लभ जान पड़ता है.

आखिर क्या है ‘स्त्री का एकांत’

एकांत की अवधारणा को कई तरह से समझा जा सकता है. ‘एकांत’ का सेवन एक सजग  इंसान के भीतर ईंधन का काम करता है.   जैसे एक अकेला पेड़ अपने जड़ों को दूर-दूर तक फैला कर अपने अस्तित्व को विस्तृत करता है, बस वैसे ही  ‘एकांत’ स्त्री के  समूचे व्यक्तित्व में फ़ैल कर पुख्ता  बनाता है. एकांत ऐसा टॉनिक है जिसके जरिये कोई भी स्त्री अपने मानस की सेहत को और अधिक दुरुस्त कर सकती है. सर्जनात्मक स्तर पर काम करने के लिए जरुरी  ‘एकांत’ को हांसिल करने के लिए अपने समय की कई प्रसिद्ध स्त्री रचनाकारों को घरेलू और सामाजिक स्तर पर काफी जद्दोजहद करनी  पड़ी।  इन लेखिकाओं को घर-बाहर के ढेरों काम-काज निपटा कर देर रात को  ही लिखने के लिए उन्हें मनवांछित’ एकांत’ मिलता था. एकांत स्त्री की अपनी व्यक्तिगत नागरिकता का नाम है। इस एकांत में स्त्री के मन की स्वतंत्रता सम्माहित है. संसार भर के कलात्मक व्यक्तित्व  वाले लोगों को स्वतन्त्रता बेहद प्रिय होती है वे बेरोकटोक जीवन का रसास्वादन करना चाहते हैं। किसी भी बंधन में बंधते ही वे बंदी पक्षी की  तरह फड़फड़ाने लगते हैं.  स्वतंत्रता ही उनकी जीवनी शक्ति होती है और एकांत ही उनको स्वतंत्रता मुहैया करवाता है.

स्त्री- सशक्तिकरण के लिए जरुरी है ” एकांत “


एकांत की चाह रखना ही स्त्री अधिकारों की सबसे पहली कड़ी है. 1960-70 पश्चिम में चल रहे नारीवादी आंदोलनों द्वारा स्त्री के लिये  एकांत की चाह ने ही संसार भर की स्त्रियों को इस दिशा में सोचने की आँख दी. तब स्त्रियों ने यह जाना कि  एकांत का आशय स्त्री की उस सकारात्मक आज़ादी से है जहाँ वह अपना मनचाहा रच सके. तब तक जागरूक स्त्रियां जान ही गयी थी कि किसी भी  स्त्री के लिए एकांत को पाना  महत्वपूर्ण के साथ-साथ कठिन भी है. आज तक किसी भी स्त्री को रेडीमेड एकांत नहीं मिला,  जिस तरह अपने नाखूनों से खुरच कर जानवर अपने लिए एक सुरक्षित जगह बनाता है उसी तरह स्त्री को अपने हाथों से अपना एकांत बनाना पड़ता है. एक सजग स्त्री के सशक्तिकरण में ‘एकांत’ सबसे सशक्त  टूल के रूप में  काम करता है. उसके जरिये स्त्री अपने विचारों की धार को तेज़ कर सकती है और अपने  बौद्धिक संसार को और अधिक विस्तृत कर सकती है. इसके लिए उसे सबसे पहले अपने घर और  समाज से लड़ना पड़ता है.आज भी देखने को मिलता है कि यदि कोई स्त्री स्वेच्छा से अपने लिए एकांत का वरण करती है तो भी समाज  उसे ‘बेचारी ‘ की संज्ञा देता है. क्योंकि समाज, स्त्री को उसके  इस एकांत के साथ देखने में अभ्यस्त नहीं है. एकांत में जाने वाली  स्त्री अपने जीवन के सभी जोखिम खुद उठाती हैं  और साथ ही वह अपने सुख दुःख की खुद ही जिम्मेवार होती है.

DINA TSYPINA

एकांत के भीतरी सुख


एकांत में इंसान की अंदरूनी आवाज़ सबसे मुखर होती है. वह बिना किसी शोर- शराबे के आप लगभग ‘ध्यान’ की अवस्था  में  चला जाता हैं. हर स्त्री को अपने एकांत की अलहदगी को ‘अकेलापन’ बनाने से बचना चाहिए।    एकांत में बार- बार सोचने से चीज़ें साफ होती जाती हैं और जिन चीज़ों को आप दूर की अलभ्य चीज़ समझते हैं वह आपके करीब आती दिखती हैं. अपने जीवन की  समस्याओ पर बार बार सोचना और उसपर अपनी राय बनाना एकांत के बाई- प्रोडक्टस हैं. एकांत को ध्यान की संज्ञा इसलिए भी दी जाती है क्योंकि धुंधली आकृतियां इसी एकांत के आलोक में स्पष्ट  हो जाती हैं. रचनात्मक काम के लिए  एकांत  बहुत जरुरी है, ऐसा एकांत, जिसका समूचा आकाश खाली हो और सिर्फ स्त्री विशेष का मन ही वहां पंछी की तरह मुक्त होकर विचरण कर सके.

 जिन्होंने गढ़ा अपना ‘एकांत’

मीराबाई का जन्म, सोलहवी सदी में जोधपुर के चोंकड़ी नामक गाँव में हुआ था. वे एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और सजग  स्त्री थी. विवाह के पश्चात पति के निधन होने के बाद  घर वालो के व्यावहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृन्दावन चली गयी. उस समय उन्होंने अपने एकांत को खोजा जो  उन्हें कृष्ण भक्ति में मिला और उसी दौरान उन्होंने तुलसीदास को ख़त लिखा. इसी तरह छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा, जिन्हें आधुनिक मीरा भी कहा जाता है, ने अपने लिये एक सुद्रढ़ एकांत रचा और उसके भीतर भरपूर सृजनात्मक जीवन जिया. देश-दुनिया में हर दौर में कुछ स्त्रियाँ ऐसी रहीजो अपने एकांत को गढ़ने में पूरी तरह से सफल रही। चाहे संसार भर की आधी-आबादी के हिसाब से उनकी संख्या नगण्य रही हो मगर उन्होंने अपने एकांत को पुष्ट करते हुये,अपने समय की दूसरी स्त्रियों के ह्रदयों को भी झंकृत किया और इतिहास में दर्ज हो गयी.    1815 को न्यूयॉर्क में जन्मी एक अमेरिकी नारी-मताधिकारवादी, सामाजिक कार्यकर्ता एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन, ने 76 वर्ष की उम्र में  राष्ट्रीय अमेरिकी महिला मताधिकार एसोसिएशन के अध्यक्ष के पद से  इस्तीफा देते हुए ‘ द solitudeसोलिट्युड ऑफ़ सेल्फ’ शीर्षक से  एक बहुत महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। जिसमें स्त्री की व्यक्तिगत खुशी, मानसिक विकास और स्व-संप्रभुता के बारे में महत्वपूर्ण  बातें दर्ज थी। इसी तरह से स्त्री-अधिकार कार्यकर्ता सुसन बी. अंथोनी ने स्त्री के पक्ष में कहा कि ‘स्वतंत्रता में ही असली खुशी है’

और असली स्वतंत्रता का अर्थ ‘स्त्री का एकांत’ से है. स्त्री के लिए बंधन के सभी रूप,परंपरा, निर्भरता, अंधविश्वास से पूरी तरह से मुक्ति पाकर‘एकांत’ ही उसके स्वयं के व्यक्तिगत जीवन की जिम्मेदारी उठाता है।

1929, को  वर्जीनिया वूल्फ ने अपने निबंध ‘ए रूम ऑफ़ वन’स ओन’ में स्त्री के इसी एकांत की अवधारणा को विस्तृत किया है.  अंग्रेजी उपन्यासकार और कवि  ऐमिली ब्रोंटे, जो अपने एकमात्र  क्लासिक उपन्यास,’ वुदरिंग हाइट्स’ के लिए जानी जाती हैं. ऐमिली  ब्रोंटे की शांत और एकांतिक जीवन शैली इसी ‘एकांत’ का परिचायक थी. ऐमिली की दिनचर्या बहुत ही शांत और नियमित थी। वह हर-रोज़ सुबह- सवेरे उठती, घर में बिछें कालीनों को झाड़ती, प्रतिदिन सिलाई-बुनाई करती, फिर ऊपर जाकर अपनी मौसी के  बताये पाठ को पढ़ती। फिर अपने भाई-बहनों के साथ घर के सामने वाले बंजर मैदान पर खिले जंगली फूलों के बीच सैर करने  निकल जाती।   चौदह साल की उम्र में घर के काम-काज में दक्ष और घर पर रह कर  अपनी पढ़ाई  करने वाली ऐमिली नन्हें पक्षियों को अपने हाथों में लेकर कहानियां सुनाती। बहुत बचपन में ही ऐमिली ने अपना एकांत रच  लिया था जिसे उसने ताउम्र संजोये रखा. ऐमिली ने अपनी पसंदीदा जर्मन भाषा सीखी, फ्रेंच भाषा के साहित्य और व्याकरण  का भी बराबर अध्ययन किया. संगीत की पढाई और रियाज किया.  इसी तरह ऐमिली की बड़ी बहन और ‘जेन आयर’ उपन्यास की लेखिका चार्लोट ब्रोंटे का कहना था,
” सबसे अधिक मैं खुद की परवाह करती हूँ । मैं एकान्त और मित्रहीन होने की वजह से खुश हूँ और इस अवस्था में, मैं अपने आप का अधिक सम्मान करती हूँ । “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लेखिका व नाटककार, ईव एंस्लर कहती हैं, स्त्रियों को अपने एकांत का आनंद उठाना चाहिए। जिन जगह पर आप कभी नहीं गए हो वहां घूमना चाहिए और अकेले ही तारों की छांव में  सो जाना चाहिए और लंबे समय तक  एकांत में रहने के आशातीत लाभ हैं।

सुसन संटोंग, जोसेपहिन बौर्गिस जैसी बौद्धिक दुनिया की प्रसिद्ध स्त्रियों ने अपने एकांत की रक्षा करते हुए खूब काम किया और  अपने विचारों से लोगों को प्रभावित किया. इस तरह 1889 को यूक्रेन में जन्मी रूस की आधुनिक कवयित्री, अन्ना अख्मातोवा ‘सोलिट्युड’ शीर्षक की अपनी कविता में कहती हैं,
मुझपर ढेरों पत्थर फेंके गए,
कि अब उनसे नहीं लगता है डर
पत्थरों का गड्ढे से
बन गयी है लंबी ठोस मीनार,
सबसे लंबी मीनारों से भी अधिक लंबी
मैं भवन-निर्माताओं  का शुक्रिया अदा करती हूँ कि ,
उनके पास से चिंता और उदासी गुजर जाती होगी
यहाँ से मैं पहले- पहले सूर्य के आने  को  देखूंगी ,
सूर्य की आखिरी किरण यहाँ आनंद में भर उठती है
और मेरे कमरे की खिड़कियों में
अक्सर प्रवेश करती हैं  उत्तरी हवाएं
और कबूतर मेरे हाथ से गेहूं के दाने खाता है
मेरे अधूरा पन्ने से संबंधित
प्रेरक शक्ति के दैवीय शांत और नाजुक
गहरे पीले हाथ,
यह खत्म हो जाएगा।

हर स्त्री को एकांत के लिए समय निकालना चाहिये। दुनिया की लगातार शोर-शराबा से दूर, अपनी शक्ति के साथ जुड़ने के लिए, और अपनी स्वतंत्रता और साहस का परीक्षण करने के लिए एकांत आज की स्त्री के लिये बेहद जरुरी है वहीँ हर हाल में  समाज  को एकांत का सम्मान करना चाहिये क्योंकि इसी एकांत के भीतर आपको एक सजग स्त्री  विचरण करती हुए मिलेगी.

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

अमेजन पर ऑनलाइन महिषासुर,बहुजन साहित्य,पेरियार के प्रतिनिधि विचार और चिंतन के जनसरोकार सहित अन्य 
सभी  किताबें  उपलब्ध हैं. फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं.

दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

सेक्स के दौरान जयश्रीराम: मोदी और हिन्दुत्वादियों पर तंज ‘#SextInTheTimeofNDA’

#SextInTheTimeofNDA.फेसबुक पर इस हैश टैग की धूम है.  काउंसिल फॉर सोशल डेवललमेंट में रीसर्च असोसिएट द्युति सुदीप्ता ने सरकार की शिक्षा और शोध विरोधी नीतियों, जेंडर स्टडीज केन्द्रों पर हो रहे हमलों के खिलाफ या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णयों पर तंज का एक नायाब सिलसिला चला रखा है अपने फेसबुक पेज पर. इस कड़ी में उन्होंने समाज में बनते बनाये जा रहे हिन्दुत्ववादी वर्चस्व और उसे मिल रहे संरक्षण पर तंज किया है. 


इसके समर्थन और विरोध में लोग अपने कमेन्ट कर रहे हैं. पिछले 24 घंटे में द्युति ने ऐसे कई तंज भरे पोस्ट लिखे हैं. 

कुछ चुनींदा  #SextInTheTimeofNDA पोस्ट: 




जेंडर स्टडीज के ऊपर सरकार की नीति पर चोट 




शोध-ग्रांट पर रोक



सरकार और अंबानी-अडानी का  रिश्ता 


डिमनीटाइजेशन
मोदी जी के वादे
सेक्स के दौरान जयश्रीराम, हिन्दू वर्चस्ववादियों पर तंज
इन पोस्ट पर पक्ष-विपक्ष के कई कमेन्ट हैं. सामान विचार वालों के लिए तो यह नायाब तंज हैं लेकिन विरोधी भी कहाँ रुकने वाले. एक विरोधी कमेन्ट द्युति के पोस्ट पर: