क्या आप जानते हैं गांधी की पहली जीवनी लेखिका कौन थीं, कब और किस भाषा की थीं ?


संदीप मधुकर सपकाले 

महात्मा गांधी की किसी भी भाषा में  पहली जीवनी मराठी में 1918 में लिखी गयी थी. अवंतिकाबाई गोखले द्वारा लिखी गयी इस जीवनी  की प्रस्तावना उस समय के सबसे बड़े नेता लोकमान्य तिलक ने लिखी थी. सबसे रोचक है यह जानना कि तिलक गांधी के बारे में 1918 में किन शब्दों में लिख रहे हैं. संदीप मधुकर सपकाले प्रथम जीवनी और जीवनी लेखिका के बारे में बता रहे हैं. एक जरूर पठनीय लेख.  इस आत्मकथा को संदीप हिन्दी में अनूदित भी कर रहे हैं.

नोआखाली  में महात्मा गांधी

महात्मा गाँधी का जीवन चरित्र विशेष परिचय, लेख और व्याख्यान, 1918 
(जीवनी लेखिका सौ.अवंतिकाबाई गोखले के कार्यों के सन्दर्भ में )

अवंतिकाबाई गोखले का जन्म महाराष्ट्र के तासगांव (पुराना सतारा जिला) में चितपावन ब्राह्मण परिवार में विष्णुपंत जोशी और सत्यभामाबाई के यहाँ हुआ था| उनके पिता विष्णुपंत जोशी एक रुढ़िवादी गृहस्थ थे किंतु रेलवे की नौकरी के चलते उन्हें अपना पैतृक निवास स्थान छोड़कर इंदौर में बसना पड़ा था | इंदौर में ही अवंतिकाबाई के पडोसी और साथी रेल-कर्मी नागपुर निवासी गोपालराव गोखले के पुत्र बबनराव गोखले के साथ उनका विवाह नौं वर्ष की आयु में सन 1891 में हुआ था | अपने पिता की रुढ़िवादी सोच के कारण अवंतिकाबाई को अपने ही घर से प्रारंभिक शिक्षा नहीं मिल पायी थी लेकिन विवाह के उपरांत उनके पति बबनराव गोखले ने उन्हें घर से ही पढ़ना प्रारंभ किया | बबनराव गोखले पेशे से इंजीनियर थे और मशीनरी पर काम सीखने के उद्देश्य से सन 1895 में नागपुर से लन्दन और चीन की यात्रा पर चले गए थे | गोपालराव गोखले ने अपनी पुत्रवधू अवंतिकाबाई की पढाई को रुकने नहीं दिया बल्कि उन्हें मिडवाईफरी (Midwifery)/नर्सिंग के डिप्लोमा की पढाई करवाई, जिसमें अवंतिकाबाई ने प्रथम श्रेणी में 1901 में उत्तीर्ण किया था | 1898 और 1903 में मशीन पर हुए किसी हादसे में बबनराव के हाथ क्षतिग्रस्त हो गएथे जिसके बाद उन्होंने विदेश छोड़कर 1904 से लेकर बाद का पूरा समय भारत में बिताया था | पति पर आए इस संकट के बावजूद अवंतिकाबाई ने अपने सवास्थ्य सेवाओं और सामाजिक कार्यों को प्रारंभ रखा था |सन 1904 से 1912 तक अवंतिकाबाई देशभर में नर्सिंग सेवाओं के लिए प्रसिद्ध हो चुकी थी | 1913 में उन्होंने सोशल सर्विस लीग के लिए काम करना शुरू किया था जिसमें कई सामाजिक कार्यकर्ताओं से उनकी भेंट हुई थी | रानी इचलकरंजी के साथ उन्होंने लंदन की यात्रा की थी | इस यात्रा में उन्होंने लंदन के अस्पताल एवं स्वास्थ्य सेवाओं का अध्ययन भी किया था | इस यात्रा में उन्हें गोपालकृष्ण गोखले और सरोजिनी नायडू से मिलने का अवसर भी प्राप्त हुआ था जिसके चलते राष्ट्रीय आंदोलन से आनेवाले समय में जुड़ना संभव हुआ था |

 गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में चम्पारण के अपने सहयोगियों के कार्यों का वर्णन करते हुए अवंतिकाबाई गोखले की भूमिका को इस तरह प्रस्तुत किया है-
“साथियों से सलाह करके पहले तो छह गाँवो में बालको के लिए पाठशाला खोलने का निश्चय किया । शर्त यह थी कि उन गाँवो के मुखिया मकान और शिक्षक का भोजन व्यय दे , उसके दूसरे खर्च की व्यवस्था हम करे । यहाँ के गाँवो मे पैसे की विपुलता नही थी, पर अनाज वगैरा देने की शक्ति लोगों मे थी । इसलिए लोग कच्चा अनाज देने को तैयार हो गये थे| महान प्रश्न यह था कि शिक्षक कहाँ से लाये जायें ? बिहार मे थोड़ा वेतन लेने वाले अथवा कुछ न लेनेवाले अच्छे शिक्षको का मिलना कठिन था । मेरी कल्पना यह थी कि साधारण शिक्षको के हाथ मे बच्चो को कभी न छोडना चाहिये । शिक्षक को अक्षर-ज्ञान चाहे थोड़ा हो , पर उसमे चरित्र बल तो होना ही चाहिये । इस काम के लिए मैने सार्वजनिक रूप से स्वयंसेवको की माँग की । उसके उत्तर मे गंगाधरराव देशपांडे ने बाबासाहब सोमण और पुंडलीक को भेजा । बम्बई से अवन्तिकाबाई गोखले आयी । दक्षिण से आनन्दीबाई आयी । मैने छोटेलाल, सुरेन्द्रनाथ तथा अपने लड़के देवदास को बुला लिया । इसी बीच महादेव देसाई और नरहरि परीख मुझे मिल गये थे । महादेव देसाई की पत्नी दुर्गाबहन और नरहरि परीख की पत्नी मणिबहन भी आयी । मैने कस्तूरबाई को भी बुला लिया था । शिक्षको और शिक्षिकाओ का इतना संघ काफी था । श्रीमती  अवन्तिकाबाई और आनन्दीबाई की गिनती तो शिक्षितो में हो सकती थी, पर मणिबहन परीख और दुर्गाबहन को सिर्फ थोडी-सी गुजराती आती थी । कस्तूरबाई की पढाई तो नहीं के बराबर ही थी । ये बहनें हिन्दी-भाषी बच्चो को किसी प्रकार पढ़ाती ?चर्चा करके मैंने बहनों को समझाया कि उन्हें बच्चों को व्याकरण नहीं,  बल्कि रहन-सहन का तौर-तरीका सिखाना है । पढना-लिखना सिखाने की अपेक्षा उन्हें स्वच्छता के नियम सिखाने हैं । उन्हें यह भी बताया कि हिन्दी, गुजराती, मराठी के बीच कोई बड़ा भेद नही है , और पहले दर्जे मे तो मुश्किल से अंक लिखना सिखाना है । अतएव उन्हें कोई कठिनाई होगी ही नहीं । परिणाम यह निकला कि बहनों की कक्षायें  बहुत अच्छी तरह चली । बहनों मे आत्मविश्वास उत्पन्न हो गया और उन्हें अपने काम मे रस भी आने लगा । अवन्तिकाबाई की पाठशाला आदर्श पाठशाला बन गयी । उन्होने अपनी पाठशाला मे प्राण फूँक दिये । इन बहनों द्वारा गाँवो के स्त्री-समाज मे भी हमारा प्रवेश हो सका था”1 


पुणे पैक्ट के पूर्व गांधी का अनशन 


1927 में प्रकाशित आत्मकथा अथवा सत्य के प्रयोग से पहले गांधीजी के व्यक्तित्व और जीवन कार्यों की प्रेरणा से अवंतिकाबाई गोखले ने ‘महात्मा गांधी यांचे चरित्र- विशेष परिचय, लेख व व्याख्यान’ (महात्मा गांधी का जीवन चरित्र- विशेष परिचय, लेख एवं व्याख्यान)इस प्रथम मराठी जीवनी का प्रकाशन सन 1918 में  हुआ था | गांधीजी की इस सर्वप्रथम मराठी जीवनी की विशेषता यह है कि इस जीवनी की प्रस्तावना लोकमान्य तिलक द्वारा लिखी गयी है |

अवंतिकाबाई जीवनी की शुरुआत में लिखती हैं - “चंपारण में महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में स्वयंसेविका का काम करते हुए उनके जीवन चरित्र को लिखने का विचार मेरे मन में आया था | इसी दौरान उनके भाषणों की अंग्रेजी किताबें पढ़ते हुए यह विचार और भी दृढ़ हो गया था | इस जीवनी को लिखते हुए थोडा-बहुत ही सही लेकिन उनके सान्निध्य में रहने का मौका मिला था | उसपर भी प्रभु रामचंद्र और भगवान बुद्ध के चरणों से पुनीत और महात्मा गांधी के सत्याग्रह से फिर चर्चा में आयी बिहार की इस भूमि पर ही इस काम को करने का अवसर मुझे मिला | जीवन चरित्र लिखने की शुरुआत तो हो चुकी थी | लेकिन इसकी भूमिका किससे लिखवाई जाए इसका रहस्य भी बना रहा उसी समय लोकमान्य तिलक ने भूमिका लिखने की मेरी विनती को स्वीकार कर लिया था | अपने बहुत से कार्यों की व्यस्तताओं के बावजूद मेरी निराशा न हो इसलिए उन्होंने इस जीवन चरित्र की प्रस्तावना के दो शब्द लिखकर दिए जिसके लिए उनका जितना भी आभार माना जाए कम है | महात्माजी से मुझसे अधिक परिचय है ऐसे मित्रों ने ‘विशेष परिचय’ और उनके अंग्रेजी भाषणों के मराठी अनुवाद सहर्ष करके दिए थे जिस कारण यह पुस्तक अपने इस मूर्त स्वरुप में बाहर आ सकी | अकारण ही संदर्भ प्राप्त नहीं होने की अवस्था में (स्थलसंकोच)कई लेख और व्याख्यान प्रकाशित नहीं हो पाएं | जिस किसी भी लेख अथवा भाषण के संदर्भ नहीं दिए गए हैं उन्हें मान लें कि वे ‘इंडियन ओपिनियन’ से लिए गए हैं | पुस्तक की तयारी में जिन लोगों ने सहायता की उन सभी का हृदयपूर्वक आभार मानते हुए पाठक वर्ग से बिनती करती हूँ कि इस पुस्तक को सिर्फ उपरी तौर पर न पढ़कर छोड़ें बल्कि उसका मनन करते हुए महात्माजी के उपदेशों के समान जीवन जीने का संभव हो, उतनी खटपट जरुर करें” (आत्माराम मेन्शन, गिरगांव, मुंबई, 1 जून 1918)2

मराठी पाठक वर्ग को इस जीवनी को पढने और गहराई से गांधी जीवन दर्शन को समझने का आग्रह अवंतिकाबाई करती हैं तो उसी तरह जीवनी की प्रस्तावना में लोकमान्य तिलक लिखते हैं- “बीते साल यानी 1917 के दिसंबर महीने में कलकत्ता कांग्रेस की सभा में गया था वहां सौ.अवंतिकाबाई गोखले ने बताया था कि वे महात्मा गांधी का चरित्र लिख रही हैं जिसकी प्रस्तावना लिखने की बिनती उन्होंने मुझसे की | यह बिनती अर्थात ही मुझसे अमान्य नहीं हो पायी | लेकिन उस समय मुझे इस बात की कल्पना तक नहीं थी कि इतनी जल्दी ये पुस्तक तैयार हो जाएगी | विशेषतः जब विदेश जाने के लिए निकला तब इस प्रस्तावना को इतनी जल्दबाजी में पूरा करना होगा इस बात को तब तक नहीं सोच पाया था | परंतु अब वैसी परिस्थिति बन चुकी हैं | अब जैसे-तैसे यह प्रस्तावना लिखनी पड़ रही है | महात्मा गांधी के जीवन चरित्र की प्रस्तावना लिखने के लिए थोड़ा अच्छा समय और फुर्सत मिलनी चाहिए थी वह मुझे मिल नहीं सकी | मुझे बुरा लग रहा हैं कि समय और फुर्सत के अभाव में मैं यह प्रस्तावना लिख पाया तथापि “अकारणान्मंदकरणं श्रेयः” इस न्याय से मैंने यह काम किया हैं | पुस्तक के पाठकऊपर व्यक्त वास्तविकता को ध्यान में रखकर मुझे माफ़ करेंगें ऐसी आशा करता हूँ”3 (पूणे शहर, 16 मार्च 1918, बाल गंगाधर तिलक) लोकमान्य तिलक ने दस पृष्ठों की अपनी प्रस्तावना में गांधीजी के उदार और शील चरित्र को पाठकों में बोधप्रिय और अनुकरणीय बनें इसी उद्देश्य से अवंतिकाबाई के द्वारा लिखी इस जीवनी को महत्वपूर्ण माना है |

सत्याग्रही महिलाओं के साथ गांधी 


आगे तत्कालीन सन्दर्भ में गांधीजी के परिवेश को समझाते हुए तिलक लिखते हैं कि “महात्मा गांधी का नाम हिंदुस्तान में कोई नहीं जानता हो ऐसा नहीं हैं अर्थात उनके विषय में थोड़ी बहुत जानकारी प्राप्त करने की इच्छा भी सभी लोगों को हुई है, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं लेकिन इस इच्छा को पूरा करने में मराठी भाषा में आज तक कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं हैं सौ.अवंतिकाबाई ने इस सहज सरल जीवनी को लिखकर इस कमी को पूरा किया है| तब भी अवंतिकाबाई का कहती हैं कि महात्मा गाँधी का चरित्र अभी और भी आगे बढ़ने को हैं और आनेवाले भविष्य के जीवनी लेखकों के लिए यह पुस्तक दिशा दर्शक का काम करेगी”4 

सहज और सरल मराठी भाषा में लिखकर मराठी-पाठकों तक महात्मा गांधी की जीवनी को पहुँचाने के लिए तिलक ने स्वयं अवंतिकाबाई गोखले की सराहना की है | गांधी चरित्र की सादगी और वैचारिक उदात्त से प्रभावित जीवनी लेखिका ने जीवनी के आरंभ में ही लिखा है कि “इतने महान महात्मा के चरित्र को लिखने का काम मुझ जैसी अल्पमति स्त्री द्वारा किया जाना यानी छोटे मुंह बड़ी बात जैसा हुआ हैं | जिस तरह प्रभु के गुणगान की भक्ति का अधिकार सभी को हैं उसी तरह महात्मा के गुणों के गुणगान और भक्ति का अधिकार भी सभी के पास समान हैं | इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने इस बिकट काम को हाथ में लिया हैं | दूसरा प्रमुख कारण ये कि मराठी में पाठक वर्ग के बीच ऐसे असाधारण व्यक्तित्व के चरित्र का फैलाव हो ऐसी मेरी दिली इच्छा हैं | मुझ जैसी अल्पमति स्त्री से जितना बन पड़ा उतना मैंने लिखने का विचार किया” 5

गांधीजी के प्रति उनके आंदोलन से जुडी आश्रमवासी स्त्रियों में कमोबेश यही भावना देखने को मिलती हैं जिसमें गांधीजी के प्रति भक्ति और समर्पण का भाव उन्हें राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ-साथ अपनी स्वतंत्रता के प्रति भी आश्वस्त करता हैं | गांधीजी के अहिंसक सत्याग्रह में अवंतिकाबाई जैसी स्त्रियों की भूमिका दृढ़ सत्याग्रही की थी | ये स्त्रियाँ शहरी और ग्रामीण दोनों स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका में थी | परम्परागत हिंदू स्त्री की मानसिक संरचना में वर्ण की अपनी निजी समझ के अनुसार अवंतिकाबाई गांधी के जन्म के वर्णन में वे लिखती हैं कि “वैश्य कुल में जन्म लेने के बावजूद उनमें ब्राह्मणों के दैवीय शक्ति का वास है और क्षत्रियों में विद्यमान धैर्य भी उनमें पूरी तरह दिखाई पड़ता हैं”6

गांधी के परिवार की प्रारंभिक शिक्षा के बाद इंग्लैण्ड में उनकी शिक्षा, कस्तूरबा से विवाह और क्रमशः गांधीजी के सार्वजनिक राष्ट्रीय जीवन में प्रवेश जिसमें साउथ अफ्रीका, बोअर युद्ध आदि से जीवन चरित्र की आधार पृष्ठभूमि तैयार होती है | इन सबसे आगे बढ़कर भी अवंतिकाबाई कहती हैं कि “मोहनदास की हर-एक बात इतनी प्रशंसनीय हैं कि मुझ जैसी नई लेखिका के लिए इसका वर्णन कर पाना भी असंभव सा हैं प्लेग जैसी असाध्य और दुष्ट बीमारी से ग्रसित व्यक्ति के रिश्तेदार भी अंतसमय में उसके पास जाने से कतराते हैं जबकि मोहनदास ने प्लेग के रोगियों की सेवा खुद अपने हाथों से की”7

सन 1912 के यूनियन कानून के अंतर्गत अफ्रीका में जिन मुद्दों पर सत्याग्रह की स्थिति बनी थी उसपर गोखले की अफ्रीका यात्रा और अफ्रीका में गोखले-गांधी गुरुशिष्य संबंध को बताते हुए लिखती हैं कि “अपने गुरु के प्रेम के वश में होकर थोड़े समय के लिए अपने मत को वे किनारे कर लेते थे इसपर से देखा जा सकता हैं कि मि.गोखले पर उनका कितना निस्सीम प्रेम हैं”8

गांधी के साथ सत्याग्रह में स्त्रियों के आने की कहानी, जीवनी में इस प्रकार व्यक्त की गयी हैं “यूनियन सरकार ने विधी कौंसिल में एक नया कानून लाया | इस कानून का स्वरुप गंदा और अपमानजनक था कि हिंदी स्त्रियों तक को सत्याग्रही बनना पड़ा | इस कानून से हिंदू या मुसलमानी पद्धति से किए गए विवाह अवैधानिक माने जाएंगे इस कानून से हिंदी स्त्रियों को रखैल बनाकर उनकी संतति को संपत्ति का स्वाभाविक अधिकार न देते हुए सरकार द्वारा हड़प लेने की अद्भुत व्यवस्था इस कानून में सरकार ने अपने लिए कर ली हैं........हिंदी राष्ट्र की पवित्रता पर आए इस संकट में सभी स्त्रियों ने अपने पातिव्रत्य की रक्षा के लिए, खुद की और अपने कुल की मर्यादाओं की रक्षा के लिए सत्याग्रह रूपि अग्नि में कूदने के लिए तैयार हो चुकी थी अच्छा हुआ कि महात्मा गांधी जैसे बुद्धिमान और सच्छील नेता इस समय अफ्रीका में मार्गदर्शक थे | अन्यथा हिंदी लोगों को शांत रख पाना इतना सरल भी नहीं था”9





ट्रांसवाल में कस्तूरबा और स्त्रियों के सत्याग्रह को अवंतिकाबाई ने विशेष प्रस्तुत किया हैं  “पहले सत्याग्रह के लिए पुरुषों को स्त्रियों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता था लेकिन आज जब खुद स्त्रियों ने जेल जाने की ठानी है तब इन स्त्रियों का जेल जाना भी सत्याग्रह की शोभा बढ़ा रहा हैं | कई स्त्रियों ने गर्भवती होने के बावजूद भी जेल जाना स्वीकार किया है | कईयों ने अपने दूध पीते बच्चों को तक घर छोड़ दिया हैं | ट्रांसवाल के इस बंदिवास में जाने का एकमात्र कारण यह भी है कि आज तक किसी अश्वेत को यहाँ जाने नहीं दिया गया है | इन स्त्रियों के आंदोलन में उतरने की इस बातको  हमेशा ध्यान में रखना होगा की जेल में जानेवाला यह स्त्री समुदाय किसी भी बड़ी राजनीति में जाने का इच्छुक नहीं था और न ही वह बहुत शिक्षित भी था | लेकिन स्वाभिमान के इस दिव्य तेज को देखकर पुरुष सत्याग्रहियों में विशेष उत्साह का संचार हुआ था ऐसे में यूनियन गवर्मेंट के लोगों को एक धक्का भी लगा था | पश्चिमी लोगों की कल्पनाएँ और धारणाएं हम हिंदी स्त्रियों के प्रति अक्सर ऐसी रही है कि हिंदुस्तानी स्त्री यानी किसी सोने के पिंजरे में जकड़ा हुआ सुंदर पक्षी हो जिसे अपने खुद की बुद्धि भी न हो लेकिन अफ्रीका में सत्याग्रही इन स्त्रियों ने अपने अलौकिक धैर्य से इन धारणाओं को ध्वस्त कर दिया | इन सत्याग्रही स्त्रियों के बीच हमारी मिसेस गाँधी किसी सितारे की तरह चमक रही थी” 10
चंपारण सत्याग्रह 


गांधीजी पर लिखी इस पहली मराठी जीवनी में गाँधी आंदोलन और उससे जुडी महिलाओं के विषय में कस्तूरबा पर अपने विचार रखते हुए लिखती हैं “यहाँ मिसेस गाँधी के बारे में लिखे बिना मेरा मन नहीं मान रहा हैं और इसमें कुछ गैर भी नहीं | वह सचमुच एक साध्वी स्त्री हैं | स्वभाव से ममतामयी, साधारणसा रहन सहन, लोकसेवा के लिए हमेशा तत्पर रहनेवाली, किसी भी परिश्रम के कार्यों को करने के लिए सजग रहनेवाली, हमेशा आनंद-वृत्ति में रहनेवाली, पति सेवा में तत्पर और पति की आज्ञा का पालन करनेवाली मिसेस गाँधी के इन सदगुणों पर महात्माजी को भी अभिमान होना चाहिए क्योंकि उनकी समस्त देश सेवा में इस सद्गुणी स्त्री का साथ हैं” 11


मुंबई के गिरगाव में 27 नवंबर 1918 को ‘हिंद महिला समाज’ बनाकर उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर स्त्री सशक्तिकरण में प्रमुख भूमिका निभाई थी |लगभग 38 वर्षों तक वे इस संगठन की अध्यक्ष रही | हिंदी महिला समाज के माध्यम से उन्होंने स्त्रियों को स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से सिलाई, कढ़ाई जैसे लघु उपक्रम सिखाने का काम किया जिसके माध्यम से शहरी स्त्रियों के लिए राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर रोजगार की एक जमीन भी तैयार हुई | सन 1926 से कुछ वर्षों तक के लिए वे मुंबई महानगर पालिका की सदस्या भी रही जिसके दौरान उन्होंने म्युनिसिपल अस्पतालों की सेवा सुविधाओं को बेहतर बनाने के साथ-साथ म्युनिसिपल कर्मचारियों की सुविधाओं के लिए भी अनेक कार्य किए | कांग्रेस की गतिविधियों में सहभागी होते हुए उन्हें 1920 से 1946 तक कई बार जेल जाना पड़ा था | गांधीजी द्वारा चलाए गए अस्पृश्यता निवारण कार्यक्रम में वे 1932 से सक्रीय सहभागी बनी रही | 24.09.1932 को गांधीजी और डॉ.बाबासाहब आंबेडकर के बीच हुए ऐतिहासिक पुणे पैक्ट के दूसरे दिन के हिंदू सम्मलेन में इस पैक्ट के समर्थन में हस्ताक्षर करनेवाली महिलाओं में हंसा मेहता और अवंतिकाबाई गोखले थी |12

‘भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों की सहभागिता और कार्यक्रमों में अपनी क्षेत्रीय विविधिता होने के बावजूद वे राष्ट्रीय आंदोलन में एकसाथ मिलकर सत्याग्रह की भूमिका की नींव रख रही थी | असहयोग आंदोलन में बंगाल और महाराष्ट्र की भूमिका इसमें और भी मुखर स्वरुप की थी | मुंबई की डिस्ट्रिक्ट कांग्रेस कमिटी ने डिस्ट्रिक्ट वोलेंटियर बोर्ड का गठन किया हुआ था | डीसीसी या डीवीबी के अतिरिक्त स्त्रियों ने अपने राजनीतिक संगठन राष्ट्रीय स्त्री सभा (Independent Women’s Organisation ) का गठन सरोजिनी नायडू की अध्यक्षता में किया था | राष्ट्रीय स्त्री सभा की उपाध्यक्ष घोशिबेन नौरोजी और अवंतिकाबाई गोखले थी'|13 1930 के सत्याग्रह में समुद्र के पानी से नमक बनानेवाली स्त्रियों में अवंतिकाबाई गोखले और कमला देवी चट्टोपाध्याय का नाम प्रमुखता से आता हैं | मराठी में गाँधी चरित्र लिखने का अवन्तिकाबाई गोखले का उद्देश्य बहुत स्पष्ट था कि गाँधीजी के राष्ट्रीय आंदोलन में उपस्थित सादगीपूर्ण कर्मशील आदर्श जीवन को मराठी मानसमें प्रस्तुत करना था जिसे तिलक ने इस चरित्र कीभूमिका में भी प्रस्तुत किया हैं | अवन्तिकाबाई गोखले ने अपने से पूर्व गाँधी के एक और जीवनी लेखक मिस्टर डोक का स्मरण आद्य चरित्रकार के रूप में किया हैं | इस मराठी जीवनी के अंत में में वे लिखती हैं “ फ़िलहाल मैं चंपारण में स्वयंसेविका के अपने कामों में स्कूल की पढाई में अधिक व्यस्त हूँ जिस कारण लिखने के लिए बहुत कम ही समय मिलता हैं और यदि मिल भी जाए तो जल्दबाजी में किसी तरह कुछ लिख पाती हूँ लिखने का मेरा कोई अभ्यास भी नहीं हैं क्योंकि मैं कोई लेखिका भी नहीं हूँ, इसी कारण इस जीवनी में काफी दोष भी रह गए होंगे आनेवाले लेखक इन कमियों और दोषों को जरुर पूरा करेंगे क्योंकि गाँधी चरित्र का विकास दिनों दिन बढ़ने वाला हैं | जो भी कमियां या दोष रह गए होंगे उसके लिए आप मुझे माफ़ करेंगें लेकिन मेरे गुणग्राही बंधु भगिनी मेरे इस प्रयास की सराहना भी करेंगे ऐसी आशा करती हूँ”14 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा गाँधीजी की हत्या के समाचार के बाद से अवन्तिकाबाई गोखले अस्वस्थ रहने लगी थी गाँधीजी की हत्या से आहत अवन्तिकाबाई गोखले का देहांत 26 मार्च 1949 को मुंबई में हुआ था | अवन्तिकाबाई पहली पीढ़ी की ऐसी गांधीवादी स्त्री थी जिन्होंने शहरी मध्यवर्गीयआधुनिक जीवनशैली को त्यागकर गाँधीजी के साथ राष्ट्रीय आंदोलन से जुडी थी |

संदर्भ सूची: 
1. गांधी, मोहनदास (1925) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा, हिंदी अनुवाद, त्रिवेदी काशीनाथ(1957) नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद, पृष्ठ संख्या 382-383
 2.  गोखले, अवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति मंडळ, मुंबई, पृष्ठ संख्या- 2
 3. गोखले, अवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति   मंडळ, मुंबई, पृष्ठ संख्या 7
 4. वही, पृष्ठ संख्या 8
 5. वही,  पृष्ठ संख्या 18
 6. वही, पृष्ठ संख्या 19
 7.  वही, पृष्ठ संख्या 33
 8. वही, पृष्ठ संख्या 44
 9.वही,  पृष्ठ संख्या45
 10. वही, पृष्ठ संख्या 45
 11. वही, पृष्ठ संख्या 95
 12. Busi, S.N. BAWS, Vol. 17, Part 1, p. 202
 13. Thapar, Bjorkert, Suruchi, Women in the Indian National Movement: Unseen Faces and Unheard Voices 14. (1930-1942)  Page No. 54-55 Sage Publication New Delhi
 गोखले, अवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति   मंडळ, मुंबई, पृष्ठ संख्या 96

सन्दर्भ ग्रन्थ–

गांधी, मोहनदास (1925) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा, हिंदी अनुवाद, त्रिवेदी काशीनाथ(1957) नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद

गोखलेअवंतिकाबाई,(1918) (द्वितीय आवृत्ति 1972) महात्मा गांधी यांचे चरित्र : विशेष लेख व व्याख्याने, महाराष्ट्र राज्य साहित्य व संस्कृति मंडळ, मुंबई

Busi, S.N. BabasahebAmbedkarWriting and Speeches, Vol. 17, Part-1

Thapar, Bjorkert, (1966) Women in the Indian National Movement: Unseen Faces and Unheard Voices (1930-1942) Sage Publication New Delhi

स्त्रीकाल के संस्थापक सदस्यों में रहे संदीप मधुकर सपकाले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. संपर्क: 8668784132

फोटो: गूगल से साभार 
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