जाज़िम

सोनी पांडेय
कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :pandeysoni.azh@gmail.com
अन्धेरा घिरने लगा तो कनिया ताड़ का झांडू लिए छत की ओर चलीं....कमर झुक गयी थी ....एक आँख का मोतियाबिन्द पक गया था ,किसी को सुध नहीं. झुकी कमर पर दाहिना हाथ धरे ,एक हाथ में झांडू उठाए कनिया  को जाते देख कलक्ते वाली ने ताली पीटा ...इ लो  मुल्ला चला मस्ज़ीद की ओर.हा ..हा...हा...ए  इया !सुनिये तो ,यहाँ बैठिए, हल्दी वाली जगत बो ने हाथ पकड़ कर खटिया की ओर खींचते हुए कहा.हट....हट ...हट ,कहते बुढ़िया पिनपिना उठी. जरा और बोलती ,झाडू उठ जाता....बुढ़ापा था कि घर भर की औरतों -बच्चों के मनोरंजन का साधन ...दिन भर बेना की तरह ड़ोलती बुढ़िया पूरे कुटुंब को शीतल मन्द बयार बन जेठ की दोपहरी में सुख देना चाहती. चाहती बटोर लाए ज़माने भर  को ,कि देखो हमारी वंश बेली कैसे छितर कर फैली है देश भर में और कैसे लौटती है हर जेठ में अपनी जड़ों की ओर. पिछवाड़े दो पेड़ आम ,एक नीम,बेल,नींबू ,पपिते ,केले की सघन छाया में खटिया डाल घर की नयी बहूँऐं बैठी दम भर अपने -अपने शहरी वैभव का बखान करने में मगन. प्रौढ़ाऐं आँगन में ...लड़कियाँ तितली की तरह घर से दुवार तक मंडराती ,मुस्कुराती ...कुछ कथ -अकथ गाथाओं के सूत्र सहेजते अपनी दुनिया में रंग भरतीं. बच्चों का झुण्ड चिड़ियों की तरह चहचहाता -गाता जब घर,आँगन,दुवार चारों ओर दौड़ता -भागता गुजरता तो कनिया का कलेजा लहलहाती खेती देख झूम उठता.

कनिया  बिना वक्त गवाऐं छत बुहार देना चाहती थीं ... पुन -पुन सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही थीं. नीचे आँगन में एक कोने में बुधिया की माई कढ़ाई में सब्जी छौंकने की तैयारी कर रही थी. ब्याह का घर,....घर भर की औरतों की चाँदी, इन दिनों खाना बनाने के लिए बुधिया की माई पच्छिम टोले से बुला ली जाती थी ....औरतें सब्जी काट भर देतीं ,बाकि का काम वह अपनी दोनों बेटियों संग करती ,बदले में रोज का पचास रुपये...एक बहू की झांपी की साड़ी ....एक- दो घर की औरतों की पुरानी साड़ी और नेग -जोग मिलता. बेवा औरत बेटियों संग पूरे लगन घर -घर घूम कर रसोई बना कर गुजारा करती.



मिर्चे की तेज झौंस से कलकतेवाली तुनक उठीं  ....इतना मिर्चा झोंकती है कि कलेजा झौंस जाए ....खों -खों करती वह भी छत की ओर चलीं. बुढ़िया अब तक आधा छत धीरे-धीरे झाड़ चुकी थी. लेहाज में कलकतेवाली ने झांडू हाथ से लेना चाहा तो जोर से कलाई पकड़ ठेलते हुए चुपचाप आगे बुहारने लगीं. एक कोने में तहा कर रखे जाज़िम के बड़े से बंडल पर कलकतेवाली बैठ गयी ....नीम की सघन छाया और मन्द हवा के झोंके ने राहत दी तो गुनगुनाने लगीं.....हेssरी काली री कोइलिया बताउssss ....कब मिलिहें सवरियाssssssssss
मधुर आवाज की तान का असर हो या मौसम की फितरत, आम पर कोयल कूं -कूं  कूहुकने लगी...अनायास दोनों औरतें मुस्कुरा उठीं. छत का कूड़ा किनारे लगा ,दौरी में उठा कनिया कलकतेवाली  के पास आईं....लम्बी साँस छोड़ते हुए...हाथ हिला कर गट्ठर पर से उठने का इशारा किया....वह अविलम्ब उठ गयीं. दोनों औरतें खोलकर बिस्से भर के छत पर जाज़िम बिछाने लगीं ....लगभग एक तिहाई छत ढ़क गया...कनिया बैठ कर माथे का पसीना पोंछने लगीं....काहें रउवां एतना परेशान होती हैं....अरे बिछाएगीं न कुल. आँगन की ओर हाथ लहराकर...देखिए सब मजलिस लगाए हैं नीचे एक्के खटिया पर अडस कर. अब्बे भागे आएगा ज़माना....जान गयीं कुल की बिछौना बिछ गया.कलकते वाली को सत्तर साल की कनिया का यह श्रमसाध्य कार्य बिल्कुल रास नहीं आता था,वह झनझना रहीं थीं ..जैसे झन से थरिया कोठे से आँगन में गिर झनकता हो. पर कनिया भी बेहया की जड़ ...रोज चारों देवरानियों,तीनों ननदों से डांट -ड़पट सुनतीं  और फिर उसी क्रिया को रोज परिवार जुटने पर दुहरातीं. कलकतेवाली उनके बाद उतरी घर की दूसरी बहू थीं. उम्र कोई साठ से पैंसठ, लम्बी -गोरी -चिट्टी कलकतेवाली पर कनिया का विशेष स्नेह था. कलकतेवाली  नियम से जब तक गाँव ठहरतीं,जिठानी के पैर शाम को दबातीं और पूरे गाँव भर की कथा साल भर की सुनतीं. पैर जबरन खींच कर दबाने लगीं .....आज कनिया कुछ उदास थी .....नई बहू उतर चुकी थी, कल से धीरे- धीरे परिवार शहर की ओर लौटने लगेगा, सोच कर ,आँखें बन्द कर वह जो खोंईं अतीत में कि आँसू झर -झर लुढ़क कर कानों में समाने लगे. चित्त लेटी कनिया ने झक उजली साड़ी से मुँह ढ़क लिया. अन्धेरा सघन होने लगा था ....कुछ तारे रह -रह कर आसमान से झांकते और कहते कि धीर धरो अभी चन्द्रमा का लालटेन जलाते हैं. सोलहवें साल में कनिया ब्याह कर जो नगरा से दलछपरा आई कि नैहर का मुँह पलट कर नहीं देखा. ब्याह के कुल चार महीने गुजरे थे जब पति को बरखा में खेत के मेढ़ पर बैठी काली नागिन डस छीन ले गयी .......सास छाती पीट-पीट डेकरती......अरे रमवा हो रमवाsss उतरत मोर पूत खइलस रे रमवाsss. कनिया पर वज्र गिरा ......सामने पहाड़ जैसी जिन्दगी......बस एक रहम किया विधाता ने,गर्भ रह गया. सास ने चैन की साँस ली.....गीता ....पुराण....मानस पढ़वातीं. कठोर जप-तप करती कनिया रात-दिन एक ही प्रार्थना करतीं कि किसी की किरपा हो और बेटा हो जाए.... पर नियती को कुछ और मंजूर था .... सात महीने बीते और सौरी में बेटी का तीव्र रुदन सुन सास लहकने लगीं.जैसे बरसात में भींगी लकड़ी सुलग- सुलग लहकती है..मायके भेजने की जुगत भिड़ाने लगीं..... वह उनसे भी नौ जौ आगे निकले. संदेशा ले जाने वाले नाउ को मार -पीट कर भगा दिया. जानते थे सास दुबारा नहीं बुलाएगी. इधर क्रान्तिकारी देवर बनारस से लौटे और पूरा हाल जाना तो भावज से ब्याह को अड़ गये......सास को काटो तो खून नहीं. कनिया पर अत्याचार बढ़ गया.....सास माथा पीट- पीट आँगन में चिल्लाती.....हम रहतीं त माहूर घोर पी लेतीं.....इ राsढ़ ,घर दहनी,कुल बोरनी,गू खौकी हमार घर नसलस रे रमवाssssss

गोद में फूल सी सुकोमल पति की एक मात्र निशानी बच्ची का मुँह देख कनिया सब सह रही थीं.एक दिन देवर का पैर पकड़  रोने लगीं.....बबुआ जी sssss रंs उवा बेटा नियर बांडी...जिद छोड देईं. जइसन माई त इसन हमके बूझीं.  देवर की सारी जिद धरी रह गयी ....कोई चारा नहीं.....भावज ने बेटा मान लिया. सास ने सारे देवता -पित्तर की पूजा की, कि बला टली. झट-पट बिना दान -दहेज के बड़ी से सुन्दर बहू दूसरे नम्बर के बेटे के लिए उतारा और साले- साल कर दोनों छोटे बेटों को भी ब्याह दिया. कनिया चुकी घर की बडी बहू थीं ,सो जीवन भर सास के लिए कनिया ही रहीं. सफेद काली किनारी की मोटी खादी की धोती पर मोटा चद्दर डाल कर गंगा नहाने ले जातीं ...घर से पैर केवल देवता पूजने को निकलता. घर आँगन में भटके पंक्षी की तरह फड़फडा कर सपनों के सारे सुनहरे पंख झड़ गये......जब शरीर की उष्मा भाप बन सिर पर मंडराने लगती ,आधी रात को उठ कर मन भर नहातीं .....सास तरह - तरह के साधना करातीं. कतकी नहाना...पचकोसी जाना,हर मास की निर्जला एकादसी की कठोर साधना सिर झुकाए करते- करते न केवल भरे यौवन में गर्दन झुकी ,कमर भी धनुषाकार मुड़ गयी. कनिया को थोड़ी राहत मिलती तो बड़ी देवरानी से.....बड़े देवर पढ़ -लिख कर कलक्ते में कालेज के मास्टर हुए तो देवरानी कलकतेवाली  हो गयी. देवर शिक्षा पर विशेष बल देते .....पत्नी को भी उच्च शिक्षा दिलाया,देखा देखी पूरा परिवार शिक्षा की ओर भागा. दोनों छोटे देवर भी क्रमश:चण्डीगढ़ और दिल्ली में कालेज के मास्टर बने ....सबसे छोटी देवरानी भी. गाँव समाज कहने लगा ....कनिया के पैर लक्ष्मी और विद्या साथ लाया पर अपना करम नास कर.

महानगरों की आबो हवा में नयी पीढ़ी पलने -बढ़ने लगी ......जब तक ससुर जीते रहे सभी तीज त्योहार में नियम से गाँव आते रहे. बड़े देवर की पहल पर मिट्टी का घर गिरा कर भाईयों ने चौखण्ड गहरे आँगन वाला बीस कमरों का बड़ा सा मकान बनवाया. ....सबके दो - दो बेटे ,दो -दो बेटियों , कनिया की बेटी को मिलाकर कुल तेरह बच्चे ... देवर -देवरानियों ,सास -ससुर को लेकर नौ.तीनों ननदों को जोड़ दें तो कुल पचास का कुटुंब. घर में सालों साल रंगोत्सव सा माहौल रहता. सास बहुओं को नियन्त्रण में रखना जानती थीं. मजाल नहीं कि दिन में बेटे आँगन में पैर रख दें. दुवार पर कुछ सालों बाद एक मर्दानी बखरी और बैठका अलग से बन गया. सब जानते थे ये पहरेदारी अकेले कनिया पर थी. बड़ी ननद पिछले सावन में काशी ले गयी थीं ....वहाँ आश्रम में कनिया ने विधवाओं को केश मुड़वाए देखा तो रेशम जैसे कमर तक घने बाल विश्वनाथ जी को सौंप आईं. बड़े देवर दरवाजे पर बैठे थे जब कार से कनिया उतरीं ....खूब कुहराम मचाया .....सास को छोड़ सबने कनिया के इस कृत्य का बहिष्कार किया, नतीजा दुबारा कनिया के सर पर उस्तरा नहीं चला .....त्योहारों में देवरानियाँ हरी चूड़ियाँ जबरन कलाईयों में ड़ाल देतीं. कलकतेवाली नाउन को डांट कर आलता पैर में लगवातीं. सास ने खासा विरोध किया....बेटे की माँ होती तो आधी सुहागन होती ....करमदलिद्दर..बेटी बिया के बैठ गयी ...आदि -आदि चिल्लातीं. छोटे देवर से एक बार भावज का कूहुक कर रोना, माँ के ताने सुनाना देखा नहीं गया.अपना तीन महीने का छोटा बेटा भाभी की गोद में डाल भरे आँगन में घोषणा की ......आज से भाभी एक बेटे की भी माँ हुईं.....माँ को सख्ती से समझाया कि अब निपुती मत कहना कभी. और उस दिन से सिन्दूर -बिन्दी छोड़ कनिया के जीवन से सफेद रंग उतर गया. लोग तरह-तरह की कहानियाँ बनाते .....कनिया घर की चाहरदिवारी में कैद बेखबर बेटी का लालन- पालन और सास -ससुर की सेवा करतीं......बचे हुए समय में धार्मिक किताबें पढ़तीं. पाँचवीं पास कनिया को पढ़ने में गहरी रुचि थी ....पूरे दलछपरा का एक मात्र परिवार था कनिया का जहाँ उस ज़माने में अखबार आता था. दिन बीतते रहे .....बेटी इण्टर पास कर गयी ......आगे की पढ़ाई के लिए बड़े देवर कलकते ले गये. कनिया उदास रहने लगीं तो ससुर चरखा ले आए. चरखा कातने का ऐसा धुन चढ़ा कनिया को कि महीने में चार-पाँच किलो सूत कात ड़ालतीं. पूरा घर खादीमय हो गया.....बदले में गाँधी आश्रम से चद्दर,साल ....साड़ी ....धोती, अगरबत्ती आदि आने लगा. घर में पहला आघात तब गिरा जब ससुर हार्ट-अटैक से चल बसे.लगाम ढ़ीली पड़ गयी. गर्मी का दिन होने के कारण औरतों को आँगन में खटिया ड़ाल सोने में दिक्कत होने लगी. भुनभुनाहट बढ़ी तो कलकतेवाली बलिया से पति संग जाकर छत भर की ज़ाजिम ले आईं. रात को छत पर बिछी और सबकी बैठकी जम गयी ......कनिया की खोई हँसी परिवार को खुश देख लौटी. नियम से जब तक परिवार रहता,रोज छत बुहार कर अन्धेरा घिरते बिछा देंती .....जाने के बाद सहेज कर खाद की बोरी में भर भण्डारे की छत से लटकती हुण्डी में लटका देतीं की मूस -मुसड़ी से बचा रहे.

ससुर के मरते दोनों छोटे देवरों का त्योहारों पर आना बढ़ती मंहगाई के गान के साथ बन्द हो गया. अब केवल गर्मियों में आने लगे या ब्याह आदि पड़ने पर. हाँ बड़े देवर ने घर आना जरुर बढ़ा दिया ताकि माँ को खले  बेटों का न आना. कनिया का मन त्योहारों में बुझा रहता .....सास छिप कर रो लेतीं तो कलकतेवाली ने मोर्चा सम्हाला. ननदों को बुला लेतीं .कथा-वरत रख लेतीं कि रज-गज बना रहे. चालीसा में कनिया दामादवाली बनीं .....घर में इस पीढ़ी की पहली शादी ,तीनों देवरों ने मिलकर खूब धूम -धाम से शादी की. दामाद भी कालेज के मास्टर निकले कनिया के ....गनीमत इतना था कि अपने ही जिले में थे वरना कनिया बेटी की दूरी सोच-सोच मर जाती. बड़े देवर ने घर की औरतों के बदलते मिज़ाज देख आगे भी सारी शादियाँ लड़के -लड़कियों की अपने गाँव के आस-पास खोज- पीट कर की कि बच्चे जड़ों से चाहे-अनचाहे जुड़े रहे. कनिया की सास ने जीवन की लम्बी पारी खेली .....नब्बे की उम्र में छड़ी ले दरवाजे पर डंटी रहतीं. आँगन में मालिकाना कनिया का चलता. एक मार्सल गाड़ी घर के रुतबे के अनुसार परमानेण्ट दरवाजे पर खड़ी रहती,एक चौकीदार और खेती के देख -भाल के लिए अच्छे वेतन पर नौकर रख बड़े देवर कुल मर्यादा को बचाए रखने की पुरजोर कोशिश करते रहे. चण्डीगढ़ वाली कांख में चद्दर जांते ..हाथ में बेना लिए छत पर आ पहुँची....पीछे दिल्लीवाली भी. चारों शान्त पड़ी कनिया का मर्मभेदी मौन रुदन जानती थीं. चण्डीगढ़वाली ने उठा कर बिठा दिया, यह तीसरे नम्बर पर थीं .....बुधिया चार कप में चाय छत पर पहुँचा गयी. देखते -देखते  बहुएं भी हाथ में चाय की कप लिए आ पहुँचीं.


ज़ाजिम ना जाने कब खुद ब खुद चार हिस्सों में बंट गया जैसे चौखण्ड घर के पाँच- पाँच कमरे बंटे .....कलकतेवाली  बायीं तरफ अपने परिवार संग ....दायीं तरफ चण्डीगढ़वाली ....पूरब में दिल्लीवाली और नीचे पश्चिम की ओर कनिया के हिस्से में ननदें, बेटी और बुधिया की माई बेटियों संग घुसड़ -पुसड़ कर सो लेतीं. दुवार पर पुरुषों की सभा बैठी थी ....रह -रह कर ठहाकों की आवाज छत से टकराकर लौट जाती. चण्डीगढ़वाली की दोनों बहुऐं पूरी तरह गव ई,पर शहर जाते गाँव के अनुभवों को ऐसे त्याग चुकी थीं जैसे लोग बुरे अनुभव त्यागते हैं. उनकी बड़ी बहू तो पूरी अंग्रेजन हो चुकी थी ....बात बे बात थैंक्यू -सॉरी कहना नहीं भूलती...आई लाईक दिस तो उसका तकिया कलाम था. देवरानी के चार साल के बेटे की बहती नाक देख बड़ी अदा से कहा...बिट्टू बेटा!वेरी बैड मैनर ....जाओ नोजी वॉश करके आओ. दिल्लीवाली ने अपनी बड़ी बहू से कहा .....विमला !जरा लालटेन जलाकर रख आओ आँगन में , बिजली कभी भी कट सकती है. इनके नखरे और भारी ......मम्मी जी ....मेरे हाथ में कालिख लग जाएगी .....आप तो जानती ही हैं मुझे धूल मिट्टी से कितनी एलर्जी है. दिल्लीवाली जल -भून गयीं....उनके छोटे बेटे के ब्याह में ही सबका बटोर था. इनवर्टर कनेक्श मर्दाने बखरी और बैठका में हर कमरे में था किन्तु जनानी घर में एक आँगन में और न ई बहू के कमरे में भर....आज न ई बहू का कोहबर था.रात के आठ बजते बिजली कटती थी ...इस हफ्ते दिन में लाईट का शिफ्ट था ,सो दिल्लीवाली चिन्तीत थीं कि न ई नवेली बहू को कोई असुविधा न हो .....इन्वर्टर बाहर जम कर इस्तेमाल होने से कभी भी बोल सकता था.भनभनाते हुए उठीं......"माई-बाप जिनगी भर सिवाल मठिया में गू -गोबर काछते रहे और इ दिल्ले जाते धूल -माटी से बेराम होने लगीं. " बहू के लिए यह अपमान असह्य था .....किन्तु सबको देख चुप रही .....पी लिया हलाहल. शादी उसकी शिक्षा और सुन्दरता पर हुई थी.पति उसके गाँव बारात में गये थे....देखते जिद करके बैठ गये.....जब ब्याह करुँगा उसी लड़की से करुँगा जो पसन्द है. सब हार गये ....माँ रो -धो कर यजमानिक बाभन की बेटी न चाहते जमींदरिहा बाभन घर में ले आई पर वक्त -बे वक्त ताने देने से बाज नहीं आती थी. आठ बजते बिजली कटी तो कनिया की सास ने दुवार फर हल्ला मचाना शुरु किया .....खाए क बेरा हो ग इल बबुआ लोग.मर्द खटिया छोड़ ,हाथ पैर धो अन्दर चले. कनिया और कलकतेवाली  नीचे उतर आईं....कुछ लड़कियाँ भी लेहाज में आ गयीं. मर्दों -बच्चों की पंगत आँगन में चारों तरफ टांट पट्टी बिछा कर बैठ गयी .....लड़कियाँ बुधिया के साथ खाना परोसने लगीं. मर्दों के बाद औरतों की बारी आई ,बुधिया से कनिया ने व्यंग्य के लहजे में कहा .......जो रे बुचिया ...सबके अइगा दे आव. बुधिया कह आई. औरतों ....लड़कियों का झुण्ड आकर बैठ गया ......हँसी - ठिठोली के बीच औरतें खाती रहीं. कनिया को औरतों का बतिया-बतिया के खाना तनिको पसन्द नहीं था ........हे ! तनी फटा-फट खाइए लोग.....मुँह चमका कर कलकतेवाली  से.....औरत का खाए ,मर्द का नहाए,कोई देखे कोई देखबे न करे. आज ज़माना का बस चले तो पूरी रात मज़लिस इहें चलें. कनिया के शब्द कान में पड़ते बहुऐं सिर झुका कर खानें लगीं. दस मिनट में पंगत उठ गयी तो बुधिया टांट पट्टी लपेट कनिया से पूछी .....ए ssइया !भितरी ध देईं न? कनिया के कान में उसके शब्द उबलते अदहन की तरह पड़े ....वह दहल गयीं .....मौन कण्ठ में शब्द अटक गये. सिर पर हाथ धर कर एक टक उसे देखने लगीं. सोचने लगीं.....उफ्फ! तो बिहाने से घर खाली होने लगेगा. .....कनिया ने आँचल से मुँह ढ़क लिया .....चण्डीगढ़वाली ने धीरे से कहा .....ध दे रे बुचिया .....भोरे से जनता भागेगी.



अचानक बल्ब बुझ गये.....चारों तरफ घुप्प अन्धेरा छितर गया .....पिछली शादी में कलकतेवाली  ने जनानी घर में अलग इन्वर्टर लगाने की मांग की ,पर देवरानियाँ मुकर गयीं. उनको गाँव में रुपया खपाना गोंईठा में घी सोखाने जैसा लगता था. यहाँ जो था सब साझे का....जानतीं थीं आज नहीं कल बटना ही है,इस लिए वह पतियों पर लगाम कसे थीं .....चण्डीगढ़वाली ने साफ -साफ पति से कह दिया था....."बड़के भ ईया विश्वविद्यालय में मास्टर ...बेटे साहब -सुब्बा,रुपये से कोठरी भरी है. हमारे मास्टरी में घर चलाना मुश्किल ....अभी एक बेटी भी ब्याहनी है....यदि एक रुपया लगाया घर पर ,मैं गाँव में लात नहीं डालूँगी." पति जानता था पत्नी की वृत्ती ....इस लिए चुप लगा गये....एक चुप हजार चुप. गनीमत था कि लालटेन जल रहा था ......चारों दयादिनें अन्त में खानें बैठीं....कनिया ने थाली में एक रोटी छोड़ सब निकाल दिया ......गले से निवाला निगलना मुश्किल हुआ जा रहा था. इधर न ई बहूँऐं गाँव के नाम से बिदकने लगीं थीं ....परोजन बितते अटैची उठ जाता.जैसे कैद से छूटीं हों ,शहर भागतीं. ऊपर छत पर फिरसे हँसी ठिठोली शुरु हो चुका था ....लड़कियों के बीच नातेदारों के युवा लड़के भी गुड़ की चाहत में माटा की तरह खींचे चले आए थे. बुधिया की माई ऊपर की ठिठोली सुन हँस कर कही .....जहाँ बुढ़ियन क संग उहां खरची क तंग,जहाँ ल ईकन क संग उहाँ बाजे मिरदंग.चारों औरतें बेमन से मुस्कुराईं.कलकतेवाली  की बड़ी बहू हल्दीवाली की आवाज सबसे बुलन्द आ रही थी .......उनके कान में उसके व्यंग्य बोल ज़हर की तरह घुलने लगे.....आते वक्त सास -बहू में जल्दी लौटने पर तगड़ी बहस हुई थी ....तर्क कमजोर पड़ने पर उसने भी दुनिया का सबसे सस्ता और मारक अस्त्र उठाया ....पता नहीं कैसे माँ आप अपनी छाती पर सौत सहतीं हैं .....देखिए सम्हल के कहीं बुढ़ापे में पापा की आसक्ति बढ़ गयी तो कहीं की नहीं रहेंगीं......... छोटी दो कदम और आगे बढ़ी .....इससे अच्छा तो कनिया अम्मा ब्याह ही कर ली होंतीं....गुड़ खाऐं ,गुलगुलों से परहेज....और दोनों बहूँऐं देर तक हँसतीं रहीं थीं. ऊपर किसी बात पर वैसी ही समवेत हँसी गूंजी और कलकतेवाली  चिंहुक कर कनिया की तरफ देखने लगीं. देखा था कनिया का कठोर तप ....कभी देवरों के सामने सिर से आँचल नहीं सरका ....बराबरी में नहीं बैठीं ....नज़र तो गलती से भी नहीं उठी पर लोग ......लोग तो उड़ती चिर ई की गांड़ी हरदी पोतने में माहीर .....बात उड़ी तो उड़ी ....लोग दो में दस जोड़ते रहे.अब तो घर की बहूँऐं भी कहने लगीं थीं.

 रात के बारह बजे हल्दीवाली देवर को दरवाजे से बुलाकर कोहबर में ले गयी. अन्दर लालटेन की मद्धिम रोशनी में न ई दुल्हन पियरी में सजी -धजी सिकुड़ कर सास की पलंग पर बैठी थी. कोने में एक छोटे से टेबल पर दो गिलासों में दूध ,कटोरियों में मेवे और मिठाई रखा था. हल्दीवाली ने झांपी में से निकाल तेज गुलाब की खुशबूवाला इत्र भी छिड़क दिया था. कमरे में घूसते लड़के का सिर गर्मी और इत्र की गन्ध से चकराने लगा....हल्दीवाली आकर छत पर लेट गयी.बुधिया की माई भी बेटियों को लेकर एक कोने में दुबक गयी. बार -बार बेटियों को टो लेती ....इधर इस घर के किशोर लड़कों को रात में प्यास ज्यादा लगने लगी थी.अक्सर रात को सीधे छत पर आकर सिराहने खड़े हो जाते थे.विधवा औरत जवान हो रही बेटियों की प्रहरी बनी रात भर जागती.धीरे -धीरे सन्नाटा हो गया .....झिंगुरों की झन-झन की आवाज के बीच रह-रह कर नीम पर टिटीहरी टिटियाती तो रात डरावनी हो उठती.इधर बहूँओं को बड़के बाबूजी रात को सफेद धोती में दिखने लगे थें..आए दिन कहानियाँ बनातीं. कनिया अभी भी देवरानियों संग भण्डारे में परजा -पसारी का लेन देन धर -निकाल रही थीं. भोरे दोनों छोटी देवरानियों का मयपरिवार टिकट था. रात के एक बजे वह चारों भी छत पर काम निबटा कर आगयीं. हल्दीवाली कान लगाए ......... नीचे अचानक खट से दरवाजे की कुण्डी गिरी और लड़का कोहबर छोड़कर दुवार पर चला गया.हल्दीवाली को दाव मिला "लगता है बबुआ जी को लड़की पसन्द नहीं". अगली सुबह फुसफुसाहट होने लगी. लड़का कोहबर छोड़ कर भाग गया. हो गया अर्थ का अनर्थ. दिल्लीवाली के प्रान सूख गये,क्यों कि लड़की अबकी उनके पसन्द की थी....जब्कि हुआ यह था कि अत्यधिक गर्मी के कारण लड़का पत्नी को समझा-बुझा बाहर निकल गया था. पूरब में शुक्र ग्रह उग गया और कनिया की बेचैनी औरत की प्रसव वेदना सी बढ़ने लगी. बाहर भी हलचल बढ़ने लगी....दोनों छोटे देवर आँगन में आकर पत्नियों को आवाज दे बुला रहे थे........बाहर गाड़ियों के हार्न सुन छत पर सोई बहूँऐं उठ बैठीं....बुधिया की माई भी झट नीचे भाग चाय चढ़ा सफर के खाने की तैयारी में जुट गयी. कनिया को छोड़ हर चेहरे पर राहत के भाव थे.....वह एक टक आसमान में उगे दूज के पतले चन्द्रमा को निहार रही थी.....उस दिन भी दूज थी ,जब वह छोड़ कर गया .....आज भी दूज. सुनापन उसकी नियति थी या लोगों द्वारा मिला अभिशाप ,वह कभी खुल कर सोच नहीं पाई....पर अब खलने लगा था.एक छुअन भर का साथ भी कितना सन्तोष दे जाता है उसने गंगा नहान से लौटते बड़के बबुआ के बगल में बैठ कर पहली बार महसूसा था और जम कर मन को धिक्कारा था कि सोचना भी महापाप है. पाप -पुण्य की गठरी में कैद विधवा औरत की जिन्दगी की पीढ़ादायक यात्रा उसके आँखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगे.


बहुएं बच्चों को गरम दूध पिला जबरन लैट्रीन में बिठा रही थीं.....कोई नहा रहा था ....कोई कपड़े समेट रहा था. उजाला फैला तो कनिया बेमन से उठ कर बैठ गयी. बाहर चाय का दौर चल रहा था. देवरों के ससुराल से गाड़ियाँ स्टेशन छोड़ने के लिए आ गयी थीं. देखते -देखते ननदों के लड़के-पति भी तैयार होने लगे. वह मौन बैठी थी....बगल में लेटी बेटी भी उठ कर बैठ गयी. माँ से कहते उठी .....आठ बजे तक तैयार हो जाना अम्मा.....ये आऐंगे. वह बेटी को सजल आँखों से देखती रही.....क्या सोच रही हो अम्मा!.....यहाँ किसी को तुमसे मतलब नहीं.....आँख का मोतियाबिन्द फूट गया तो एक आँख से आन्हर हो जाओगी. माँ के सिर पर हाथ रख स्नेह और अपार धैर्य को सहेज कर.....जीवन सबको दिया तुमने,बुढ़ापा मेरे ही हिस्से आएगा लाख जतन कर लो. खाली छत देख कर.....किसको सुध है यहाँ तुम्हारी? कनिया की आँख से ढ़र से दो बूंद लोर ढ़रका.....आँचल से पोंछने लगी. बेटी सीढ़ियाँ उतरते चेताती गयी ....समय से तैयार हो जाना. नीचे लगभग सभी तैयार हो चुके थे....सबकी आगे -पीछे ट्रेन थी. अटैंची निकलने लगी. बुधिया सबका खाना बाँध -बाँध कर कमरे में पहुँचा रही थी. कनिया रोज की तरह उठ कर जाज़िम तहाने लगीं. तहा कर बंडल बना सूत की रस्सी से बाँध सीढ़ियों से लुढ़का दिया.....जानती थीं आज रात से इसकी जरुरत नहीं थी. आगे -आगे बंड़ल लुढ़क रहा था पीछे -पीछे कनिया सीढ़ी पकड़ कर उतर रही थीं. जाज़िम धम से आँगन में जाकर गिरा ,कलकतेवाली  पोते को चौकी पर बैठ तैयार कर रही थीं....हल्दीवाली ने कनिया को देख कर मुस्कुराते हुए देवरानी से कहा.....अगली बार से ब्याह के दिन आना और अगले दिन जाना होगा मेरा तो नैना....वैसे भी शहर छोड़ पापाजी ये सब जिसके लिए करते हैं करते रहें ....अब ढ़ोना हमारे बस का नहीं.वह बोल कम रही थी मुँह चार कोने का दिवरानियों को दिखा ज्यादा चमका रही थी. अक्सर चुप रहने वाली इन मामलों में दिल्लीवाली से बहू का यह परिहास सहा नहीं गया. हद करती हो बहू......औरत हो कर औरत की व्यथा तुम समझ नहीं सकती. बोलने से पहले सौ बार सोचा करो जरा कि कह क्या रही हो. तुम्हारा पढ़ना -लिखना सब व्यर्थ है. बड़ी घटिया सोच है तुम्हारी.....वह क्रोध से हाँफ रही थी.....कनिया आवाक वहीं सीढ़ी पर बैठी कभी बहू को कभी देवरानी को देख रही थी. कनिया की बेटी ब्रश करना छोड़ माँ को पकड़ जोर -जोर से रोने लगी.बहुत दिनों से सुनती आ रही थी,आज फट पड़ी. कलकतेवाली  भी आज धैर्य खो चित्कार उठीं.....दुनिया के ताने अकेले आज तक सहती आई थीं. दरवाजे से बड़े देवर भागे आए.पीछे -पीछे भाई- भतिजे. बहूँऐं सहम गयीं. क्या हुआ?....रुदन के कोलाहल के बीच एक विराट मौन.....कुछ नहीं चाचा....बस ऐसे ही कह कनिया की बेटी चाचा को देख मुस्कुराकर आँसू पोंछने लगी. वह नम आँखें पोछते बाहर लौट गये. औरतें यहाँ शिव की तरह हलाहल कण्ठ में रोकने में सिद्धहस्त होती हैं.....सबने मौन हलाहल पी लिया कि परिवार में शान्ति बनी रहे.

सब एक -एक कर बुधिया की माई और उसकी बेटियों को नेग के रुपये दे निकलने लगीं. लड़के सामान पहले ही गाड़ियों में रख चुके थे. बुधिया दुपट्टे के कोर में रुपया गठियाते कनिया से पूछी....इया जज़िमिया त अब धराई न?. उन्होने सहमति में सिर हिलाया. बुधिया भण्डारे से बोरा लाकर बहन संग मिलकर जाज़िम बोरे में रख मुँह बाँध लेकर चली.....पीछे-पीछे कनिया. बुधिया बड़ी फरहर थी....झट बन्दरिया की तरह पटनी पर चढ़ हुण्ड़ी में रस्सी बाँध बहन से बँधवा कर ऊपर खीचने लगी. कनिया चौखट पर बैठ देख रही थीं.....अचानक बिट्टू पीछे से गला पकड़ झूल गया.....दादी हम नहीं दाऐंगे आपको छोड़कर......कनिया की लुप्त हँसी लौट आई. कलेजे से लगा दुलारने लगीं. बाहर बिट्टू की खोजाई मची थी.....पैर पटकते हल्दीवाली दनदनाते आई और एक थप्पड़ मार खींच कर ले जाने लगी.....साथ -साथ बड़बडाती भी जा रही थी......अभी घर का मुखिया कम था जो अगली पीढ़ी भी फांसने पर उतारु है ..... बुढ़िया.....कनिया एक साथ सैकड़ों ज़हर बुझे तीरों से बीध गयीं. बुधिया ने आवाज दी.....हो ग ईल इया. कनिया ने मुड़ ठर देखा...हुण्ड़ी में बोरे में बँधी जाज़िम ऐसे लटक रही थी जैसे किसी ने फाँसी लगा लिया हो. घबड़ा कर आँख बन्द कर लिया......बाहर गाड़ियों के घरघरा कर जाने की आवाज आ रही थी. आज कुछ ने जाते पैर छुए ,कुछ ने नहीं कनिया के. जिस सच पर कलकतेवाली  परदा डालती आ रही थी ,एक झटके में आज उठ गया था. कनिया आहत थी आत्मा के अन्तिम कोर तक, समझ रही थी कि अब और वह जाज़िम को नहीं सहेज पाएगी. जाज़िम अभी तक रौशनदान से आ रही हवा का झोंका पा झूल रहा था.....समय की करवट यही थी कि आज वह शायद आखिरी बार बँधा था. शायद ही फिर उतरे. चण्डीगढ़वाली जाते सुना गयीं थीं बेटी की शादी उधर ही तय है...शादी भी वहीं से होगी. गाँव आने-जाने में बहुत खर्च हो जाता है. घर खाली हो गया......कनिया चौखट पर आँचल से मुँह ढ़ांप कर बैठी रो रही थीं कि कलकतेवाली  बाहर से आँगन में आईं......स्नेह से हाथ पकड़ कनिया को दुवार पर लेकर चलीं.....अन्दर गहन सन्नाटा पसर चुका था. बरामदे में चौकी पर बूढ़ी सास और बड़े देवर बैठे थे. दोनों औरतें भी कुर्सी खींच बैठ गयीं. सूने घर के दरवाजे को पर मातमी सन्नाटा फैल चुका था.  .....अन्दर अब भी जाज़िम बेतहाशा झूल रहा था. सबके कानों में जाते हुए परिवार का पदचाप धप्प -धप्प सुनाई  पड़ रहा था जैसे छाती पर पैर रख कर युद्ध भूमि में शत्रु जातें हैं लहूलुहान लाशों को रौंद कर.....सब चले गये,जबकि सब अपने थे.
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