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न्याय के भंवर में भंवरी

मंजुल भारद्वाज

25 सालों से रंगमंच में सक्रिय. फाउंडर थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस. संपर्क :09820391859

स्त्री-अधिकार की मुखर नायिका सावित्रीबाई फुले के स्मृति दिवस (10 मार्च) पर संघर्ष की नायिका भंवरी देवी के संघर्षों को याद करते हुए यह नाटक पढ़ें. 


कहाँ और कैसे शुरू करूँ , कोई नई बात तो है नहीं , बात तो सदियों पुरानी है , मर्द औरत की  है , मर्द जात , औरत जात की है ..जब दो ही जात होती थी एक औरत और एक मर्द …तब से लेकर आज तक इन जातों की खाई पट नहीं पाई ..बख्त ( वक्त) के हिसाब से बढती जाती है  … कभी पटती नहीं …ये खाई ..साथ साथ चलती है पर मिलती नहीं …

आदम जात बहुत खुश थी जब पेट भरना ही जीवन का मकसद था ..पेट भरना और जीवन का आनंद लेना …और पेट भरने के लिए कंद , फूल , फल  और शिकार , उसके बाद नाच , गाना , मौज मस्ती , नाच , नृत्य , कबीला , और खानाबदोशी …सारी धरती आपनी … समभवत वो औरत जात का स्वर्ण काल था ..जब उसकी इच्छा सबकी सर आँखों पर थी …और उसको मिली कुदरत की नियामत उसकी आज़ादी का सबब थी … वो किसके साथ घूमेगी , खेलेगी , नाचेगी , गाएगी और सोएगी ..ये उसका अख्तियार था … बरखुरदार ..आँख फाड़ ..फाड़ के क्या देखे है ..तेरे हिसाब से बस ..जन्नत थी ..जन्नत … इतना मान ..सम्मान की तिनका भी बहुत था खुले आसमान में अपनी आज़ादी के लिए .. व्यक्तिगत फ्रीडम के लिए ..जो आज तालों , प्राइवेट फ्लाटों , बंगलों में नहीं मिलती ….

शक , सुबाह, मैल, का कीड़ा नहीं था … मर्द सही में मर्द था ..उसमें न्यूनगंड… इन्फेरिरोरिटी काम्प्लेक्स नहीं था … होगा भी तो कहीं कोने में पडा होगा … तू किसका है …किसकी औलाद है …किसका खून है ..ये सवाल नहीं थे ..एक ही समान भाव था ..किस माँ की औलाद है ..सबको स्वीकार थी माता की सत्ता …मातृसत्ता… क्योंकि आज भी मातृत्व यकीन है और पितृत्व अनुमान …

उत्क्रांति ..एवोलुशन..बख्त की सबसे कुदरती नियामत है ..यानी जो चलता है वो बख्त ..जो ठहरा वो मौत … इस बख्त के साथ आदम भी बदला …और उसकी जात भी बदली और ऐसे बदली की औरत बदल गयी ..सृष्टि का चक्र बदल गया .. पैदा करने वाली गुलाम और पैदा होने वाला मालिक … मालक ..और यही वो काली शहाई थी जिससे आज भी औरत का आसमान काला है और मर्द का टिमटिमाते तारों सा …
आदम जात के दिमाग में ऐसा केमिकल लोचा हुआ की मेरा सारा व्यक्तित्व  काया , स्तन , कमर , कोख और योनी तक सीमित हो गया और अंतत एक ‘बस्तु’ की पहचान में सिमट गया … संस्कृतियों के महान दौर आये और गए ..बस ‘वस्तु’ और तथास्तु कायम है …

भंवरी का मंचन

बात है उस समय की जब हम ‘सभ्य’ बनाना शुरू हुए .. हमने अपने शुद्ध , सात्विक शरीर को जब ढकना शुरू किया .. सर्दी ..गर्मी से बचने के लिए तो हम ..अपने बचाव शुरू से करते आयें हैं … पर सभ्यता के नाम पर जब ..अपने तन को ढकना शुरू किया … पहले पत्तों, से ..फिर पशुओं के चरम से फिर वस्त्रों से ..और इतिहास गवाह है की सभ्यता के नाम पर हमने जितना तन ढका ..इंसानियत उतनी ही नंगी होती चली गयी … जिस्म पर वस्त्र बढ़ते गए और इंसानियत  के वस्त्र उतरते गए …निश्छल,पवित्र मन , भाव , लोभ , लालच बढ़ता गया .. भविष्य की भट्टी में वर्तमान जल गया ..और आज तक जल रहा है ..आज को जीने की बजाय कल की आग में सब जल रहे हैं … जैसे ..यहाँ बैठे बैठे आप ..मैं क्या कह रही हूँ ये समझने ..बुझने ..मनन करने की बजाय ..मैं आगे क्या बताने वाली हूँ ..उस अनुमान .. अंदाज़े के तवे पर अपने इस पल के सुख को भुन रहे हो … मतलब ..सुख चैन ..का स्वाद , आनंद सीखा ही नहीं ..हाँ भाई सभ्य जो हो ….

इस आगे की सोच ने उजाड़ दिया आदम जात को … खाने को अपार , रहने को प्रकृति की गोद … आदम और प्रकृति का संतुलन , बल्कि प्रकृति की श्रेष्ठता का ढंका बोलता था … पर आज तो सब मिल रहा है ..पूरी दुनिया का भ्रमण , कबीला , खानाबदोश जीवन .. पर नहीं कीड़ा घुस गया दिमाग में कल क्या होगा … फिर क्या .. जोड़ना , जमा करना शुरू , सामूहिक कबीला बंटा तेरे कबिले, मेरे कबिले में… तेरे भू भाग मेरे भू भाग में .. कबीला बंटा , ज़मीन बटी, जल जंगल बंट गए … पशु प्राणी बंट गए ..पहले पशु गुलाम हुए ..आदम ने पशुओं को गुलाम बनाया .. पशु पालन शुरू किया .. पशु पालन से खेती शुरू हुई . और खेती से सम्पति ..जायदाद का ख्याल आदम के दिमाग में आया … और हम सब अपना अपना बाँट के सभ्य हो गए … यानी पशु से इंसान ..सभ्य इंसान बन गए … ये बात और है की हम इंसान बनने की बजाय वस्त्रों से लदे पशु बन गए …

अरे हाँ पशुओं से याद आया की जब तक पशु पालन को मर्द जात ने करीब से नहीं देखा था तब तक ..मर्द जात को पता नहीं था की सन्तान के जन्मने में उसकी कोई भूमिका है … पशुओं के लैंगिक व्यवहार को देखकर .. समझ कर मर्द जात के दिमाग में बत्ती जली की सन्तान उत्पत्ति में उसकी अहम् भूमिका है … बच्चा ..औरत और मर्द के सम्भोग से पैदा होता है ..ये मर्द को पता चला ..उससे पहले मर्द को लगता था औरत में गजब की दैवीय ताकत है जिसके बल पर वो सन्तान पैदा करती है …

पशु पालन से मर्द को जो ब्रह्म ज्ञान मिला वो ये …१ अपने शरीर और दिमाग के बल पर वो पशुओं को पालतू बना सकता है २. सन्तान उत्पत्ति में उसकी भूमिका है ..बिना मर्द के औरत सन्तान पैदा नहीं कर सकती ३. खेती करना …4. खेती ने संपत्ति ..जायदाद का लालच ..लोभ मर्द में पैदा किया … पहले कबीलाई संपत्ति ..फिर कुनबे की ससंपत्ति और फिर निजी संपत्ति… और फिर संपत्ति..संपत्ति .. और सिर्फ़ संपत्ति…. पति..पति..पति ….
इस संपत्ति और  पति के नए अवतार में मर्द को एक ताक़त का अहसास हुआ ..मैं कर सकता हूँ ..मैं हूँ …ये मेरा है ….बस यही वो कीड़ा है जो मर्द के इन्सान को खा  गया …इसने ..मर्द के अन्दर ‘डर’ पैदा कर दिया …’डर’ खो जाने का … संपत्ति के छीन जाने का … और इस ‘डर’ का मुकाबला करने के लिए उसने ‘हिंसा’ का उपयोग किया .. मजे की बात ये ‘डर’  उसे कभी औरत जात से नहीं था …कोई मेरी संपत्तिछीन लेगा … ये ‘डर’ उसे अपने जैसे ‘मर्द’ से था ..और आज भी है .. इस ‘डर’ से पीछा नहीं छुड़ा पाया मर्द ..उसने दूसरों को डराने के लिए ..युद्ध किये ..इस ‘डर’ ने मर्दों में श्रेष्ठता की होड़ लगाईं ..और मर्दानगी को जन्म दिया … यानी शरीर बल , युद्ध कौशल  , हिंसा ..कब्ज़ा …ये इसके माप दंड बने ..और इसमें से वो मर्द जो इस  कसौटी पर खरे नहीं उतारे उनको इस मर्दानगी वाले मर्द ने …दास बनाया … कबिले से शुरू हुई ये दरिंदगी ..नस्ल तक पहुँच गयी … उस समय शुरू हुआ मर्दानगी का खेल आज भी बदस्तूर जारी है …. इतनी  हिंसा .. खून खराबे .. के बाद भी मर्द अपने अन्दर के ‘डर’ को नहीं जीत पाया ..उससे आज भी आतंकित है ..और वो हैसंपत्ति. के खो जाने का ‘डर’… इस संपत्तिके ..जायदाद के खेल ने मर्द से इंसानियत छीन ली और उसमें सदा सदा तक ये जंगली ‘पशु’ को पैदा कर दिया … जो हिंसा के बल पर दुनिया में काबिज़ होना चाहता है ..पर तब से लेकर आज तक हो नहीं पाया … मेरी संपत्ति मेरी रहे ..इस ‘डर’ ने इससे क्या क्या नहीं करवाया ..एक व्यवस्था बनवाई ..मर्द की चले ..कबिले में ..घर में ..गाव में .. मर्द याने पिता … पितृसत्ता … जिसमें ‘मर्दानगी’ वाले मापदंड वाले पुरुष ही श्रेष्ठ होते हैं ..उनकी सत्ता .. उसके लिए इस मर्द ने …हिंसा , और भेद का सहारा लिया …जो आज भी कायम है …
अब खेल देखिये … सन्तान पैदा करती है औरत और मर्द मिलकर ..दोनों की  साझा सन्तान ..इस मर्द ने कुदरत के इस नियम को अपने हाथ में लिया ..और कहा मेरा बच्चा ..यानी बच्चा पैदा करे औरत ..पर बच्चा मर्द का … इस मर्द ने अपना बच्चा पैदा करने के लिए क्या क्या नहीं किया ..पहले तो औरत जात को गुलाम बनाया ,उनको एक बाड़े में रखा , उनकी आज़ादी को खत्म किया … कहीं भी जाने की .. घुमने की ..किसी के बच्चे की माँ  बनने की ..अपने लैंगिक इच्छा और औरत के कुदरती स्वभाव  पर अंकुश लगाया ..उसके लिए ..इस मर्द ने युद्ध किये ..  समाज के नियम बनाये .. और एक पितृसत्ता व्यवस्था कायम की …पितृसत्ता व्यवस्था का मतलब ही है ‘मर्दानगी वाले मर्दों’ की सत्ता जिसका मूल है  शोषण  और भेद भाव … मर्दों, मर्दों में भेद भाव … औरत मर्द में भेद भाव … व्यवस्था में औरत को गुलाम बनाने के बाद ..’ इस मर्द ‘ ने औरत जात को पालतू बनाना शुरू किया ..उसके लिए इसने धर्म बनाया …और वो ‘मर्द’ वाला इजाद ‘धर्म’ आज भी मर्दानगी के उसूलों पर चलता है …चाहे वो कोई भी धर्म हो ..’वध’. क़त्ल .;; हिंसा .. उसका मूल है ..ऊपर से वो कितनी मिट्ठी बात करे … उस धर्म में पहला धर्म शुरू हुआ ..औरत के मासिक धर्म से ..हाँ भाई क्यों ‘मेरा बच्चा’ हो इस दुराग्रह से औरत के मासिक धर्म को नियंत्रित किया गया … इस समय वो कहाँ जायेगी ..क्या करेगी .. ये तय किया ‘मर्द’ ने ..उसमें छुत.. अछूत का खेल किया … पवित्र ..अपवित्र का ऐसा खेल शुरू किया की इस कुदरती प्रक्रिया को औरत एक बोझ समझती है …इस समय अपने आप को हीन समझती है ..जब की सृजन शक्ति के इस काल में उसे ‘आत्म विश्वास’ से लबालब होना चाहिए …. पर औरत इस सृजन शक्ति पर्व पर अपने को असहाय और पीड़ित समझती है ..दरअसल किसी से लड़ने का कारगर अस्त्र है उसको भीतर के स्तर पर  यानि मन के स्तर पर तोड़ दो …वो कभी स्वाभिमान से उठ नहीं पायेगा ..यही मर्द ने किया है उसके साथ … पहले उसके स्वाभिमान , फिर कुदरती सृजन प्रक्रिया और उसका इंसान होना ..स्वावलंबी होना इन  सब पक्षों पर षड्यंत्र वश कुठाराघात किया है …
अरे भाई क्या हो गया ..आप  क्यों उबल रहे हो …मैं आपकी नहीं उन मर्दों की बात कर रही हूँ ..आपकी नहीं ..या कहीं आप में भी वो मर्द तो नहीं जाग गया …बात बता रहीं हूँ मैं अपनी ..आप बीती … किसी को गलत या सहीं नहीं बता रही … और तुम जो उबल रहे हो … तुम भी इससे पीड़ित हो ..आज तुम्हा री बहन बेटी .. घर से देर सवेरे बाहर होती है तो किससे डर लगता है तुम्हें ..’इसी मर्द ‘ से ना ..तो तुम भी पीड़ित और मैं भी पीड़ित .. एक पीड़ित को दूसरे पीड़ित की बात सुननी चाहिए ..यही धर्म है …

भंवरी -मंचन के बाद

ये धर्म भी इस ‘मर्द’ ने अपनी हर बात जायज  ठहराने  के लिए किया .. औरत के मासिक श्राव पर कब्ज़ा करने  के लिए ..मासिक धर्म बना .. यानी औरत के बीज .. अंडाणु को कंट्रोल करने और ‘मेरी औलाद , हो इस औरत की कोख से’ यही है धर्म का मूल ..और आधार ये की सम्पत्ति के लिए क्लेश ना हो ..जो ‘मर्द’ का फ़ैसला हो वहीँ सबको मानना पड़ेगा ..यहीं है सभी धर्मो का मूल … ये बात कडवी है पर सोलह आन्ने सच है भाई ..
मर्द ने व्यवस्था और धर्म यानी .. पितृ सत्ता जो कहे वही धर्म ..से स्थापित करने के बाद पालतू औरत को अपनी भक्त बनाने के लिए संस्कारों का खेल शुरू किया … पहले तो औरत मेरी सम्पति, इसके लिए उसको बाड़े में बंद किया … और बाड़े से बाहर निकलने के लिए मर्द के कानून से वो व्यवहार करे ..इसको धर्म बनाया .. फिर मेरी संतान उत्पन्न हो उसके लिए औरत को ‘पत्नी’ बनाया यानी ..विवाह संस्कार की स्थापना की … पत्नी यानी पति की सम्पति .. इसके लिए मर्द ने .. बाकायदा .. औरत विवाह के बाद उसकी है उसको चिन्हित करने के लिये उसके गले में अपना पट्टा डाला उसको क्या कहते हैं आप ‘मंगल सूत्र’ ..उसके माथे पर बिंदी ..मांग में सिंदूर … पावं में पायल ..यानी वो जब भी कभी बाहर निकले ..वो अपना स्वयं विज्ञापन करती हुई निकले ..मैं उस मर्द की सम्पति हूँ ..माल हूँ … उसकी वस्तु हूँ …वो मेरा मालिक है .. मैं उसकी पराधीनता स्वीकार करती हूँ ..और मैं ये संस्कारों को मानती हूँ ..नहीं मानूगी तो मैं मर्द द्वारा निर्धारित दंड की भागीदार हूँ …

इतना करने पर भी ‘मर्द’ का डर गया नहीं ..शक का कीड़ा उसे हर पल सताता है …सता रहा इसलिए औरत के शरीर पर बल पूर्वक कब्जा करने के बाद उसके दिमाग पर कब्ज़ा करने के लिए उसने ..धर्म , पुरोहित ..संस्कार ..त्यौहार ..उपबास .. व्रत ..के तन्त्र ..मन्त्र की स्थापना की … यानि बाड़े में कैद औरत को संस्कारित किया गया ..पतिव्रत ….बनाने के लिए ..मर्द  के मन में एक ही मन्त्र चलता है ..तू मेरी हो .. मेरी रहे ..मैं सबका हूँ ..सब मेरी हों …उसके लिए ..संस्कार ..रचे गए ..वो परम्पराएं बन गयी … बाड़े के अंदर ,,मेरी बन कर रह .. मेरे लिए ..प्रार्थना कर ..मैं तेरा भगवान तू मेरी भोग्या.. जब चाहूँ ..जैसे चाहूँ ..हर समय उपलब्ध रह …तेरा धर्म है बस मर्द को खुश रखना और ..मेरी ही ‘ औलाद’ को जन्म देना … तू माँ बनेगी तो  सिर्फ़ मेरे बच्चों की ये तेरा धर्म हैं और मैं कितने ही बच्चों का बाप बन सकता हूँ ये मेरा यानी मर्द का धर्म है ..आखिर यही तो है असल मर्दानगी … और इन्हीं संस्कारों को तू  ऐ औरत आगे बढ़ा… इतना मैं तुझे  अधिकार देता हूँ पर कभी मेरे रास्ते मैं मत आना ..तब से लेकर औरत ..संस्कार , परम्परा और संस्कृति की खेवनहार है और वो है ..भोग्या वस्तु ..की संस्कृति .. संस्कार और परम्पराएं … जिसका पालन औरत आज भी कर रही है ..एक औरत दूसरी औरत को यही बताती है तू मर भी रही हो पर मर्द को मना मत करना …

इतना करने पर भी ‘मर्द’ का डर खत्म नहीं हुआ ... संपत्ति का रोग .. अब सन्तान पैदा होगी तो वो मोटी मोटी औरत और मर्द जात होगी या कभी कभी तृतीय पंथी भी  होगी .. अब औरत को सम्पति में हिस्सा देना नहीं .. और तृतीय पंथी को हाशिये से बाहर रखा … औरत को विवाह संस्था से बाँध दिया … और संपत्ति से बेदखल करने के लिए संस्कार बनाया ..कन्या दान और ये पुरोहित से मन्त्र चलवाया कन्या दान महादान … ये कोई पुन्य का काम नहीं है … इसकी असली वजह है ये  पक्का करना है , सुनिश्चित करना है की हर औरत  की पहचान एक ‘वस्तु’ है और उस वस्तु का दान हुआ की नहीं ..और उस दान वस्तु का मर्द ने भोग लगाया या नहीं … दान वस्तु का किसी सम्पति पर हक्क नहीं बनता …इसलिए .. अपनी नस्ल .. गोत्र विवाह ..वर्ण व्यवस्था को कायम रखने के लिए ये संस्कार और संस्कृति प्रस्थापित और प्रचलित की गयी और आज भी है ..आज भी मर्द तय करता है की वो  अपनी ‘कन्या वस्तु ‘ किसे दान करे .. वस्तु की राय मायने नहीं रखती …. उसको पितृ सत्ता  की संस्कृति   का निर्वहन करना होता है …

इस संस्कृति का हर संस्कार संपत्तिसे जुडा  है … औरत सन्तान पैदा करेगी और हर बार मर्द पैदा होगा… ये …प्रकृति नहीं स्वीकार करती ..इसलिए ..मर्द पैदा करने वाली औरत श्रेष्ठ ..औरत में श्रेष्ठ औरत वो जो मर्द पैदा करे .. एक भोग्या वस्तु के रूप में रहे और मर्द को खुश रखे … भोग्या के सारे गुण ..नाजुक , सुन्दर . ह्यावान , अब आप सब जानते हो …उसका बखान करने के लिए कवि कालिदास से ग़ालिब तक हैं ..मय..मदिरा ..शराब और शबाब से भरा पड़ा है मर्द साहित्य …जिसमें भोग्या..दबी ..कुचली ..शोषित जात है औरत ….
मर्द ही होगा मर्द की संपत्तिका वारस… और वारिश देने वाली … वंश ..कुल दीपक को जनने वाली ही इस पितृ सता में स्वीकार्य है .. ये है सम्पति का सच ..और संस्कारों का ढ़कोसला… सम्पति का डर यहीं खत्म नहीं हुआ मर्द का ..विवाह पश्चात . मर्द की मृत्यु … मर्द की मृत्यु के बाद औरत स्वीकार नहीं ..वो संपत्ति में हक्क मांगेगी ..इसलिए उसके पति प्रेम को महिमा मंडित करवाया गया और उसे जिंदा जलाया गया ..सती प्रथा, यही प्रथा है ..और आज भी हमारे समाज में ये महिमा मण्डन है …. मतलब संपत्तिको पाने के चक्कर में ये मर्द क्या क्या कर रहा है … पर संपत्तिहै की इसके कब्जे से बाहर चली जाती है …

ये कबीले के सरदार से लेकर  राजा, पुजारी , व्यापारी , सब बन गया , वर्ण व्यवस्था से वर्ग व्यवस्था , सामन्तवाद से समतावाद तक .. धर्मान्धता से विज्ञान तक .. तानाशाह से लोकतंत्र तक .. साम्यवाद से पूंजीवाद तक ..अनपढ़ से पढ़े  लिखे तक … असभ्य से सभ्य होने तक ये मर्द , मर्द रहा और इसने सब कर लिया ..पर संपत्ति कैसे इसकी हो इसका तोड़ नहीं निकाल पाया ये मर्द … आदम जात से हिंसक बना , शोषक बना .. अत्याचारी , व्यभिचारी या क्या क्या बन गया इस सम्पति के खेल में बस … इन्सान नहीं बन पाया ये मर्द ..जो बाहर से मज़बूत पर अन्दर से खोखला … बाहर निडर ..निर्भीक शेर ..अन्दर कायर ..डरपोक चूहा है ये रक्त पिपासु मर्द ….

फुट ..फुट ..और फुट .. डालो और राज करो ये मर्द का मन्त्र है ..इसलिए वर्ण व्यवस्था ..जात व्यवस्था में बदल गयी .. हर जात का अपना ..अपना मर्द … यानि कुदरत ने बनाई जात  में मर्द ने और जात बना दी … सवर्ण और बिना वर्ण … पर कमाल देखिये .. एक जात दूसरे से श्रेष्ठ ..यानी सवर्ण जात का मर्द श्रेष्ठ .. उसकी श्रेष्ठता सभी वर्णों को स्वीकार ..पर औरत के उपर सब शेर …वो सबकी संपत्ति … क्या सवर्ण और क्या अवर्ण … यानी मर्द तो मर्द है जी ..क्या हुआ अगर सवर्ण जाति के मर्द की लात खाया है अवर्ण जाति का मर्द ..पर औरत ..पर कब्जा सभी का ..जात की जात ..की जात की जात यानी औरत जात ..वो बस वही  काम आती है ..और वहीं सजती है ..यानी यौन संतुष्टि और पैर की जूती… ये हैं हमारे संस्कार और संस्कृति … मंगल से मांगलिक .. सौ भाग्यवती से अभागन , सर्प दोष से योनी दोष सब मर्द के द्वारा स्थापित पुरोहित की भोग्या पिपाशु पशुता का …. योनी में लिंग फंसाकर …लिंग  ध्वज को पूजा अर्चना की जगह स्थापित करने को ..की हर पल तू ..ऐ औरत मत भूलना तेरी  योनी पर  पहला और अंतिम कब्जा लिंग का है सिर्फ़ मर्द का लिंग ही जीवन और आराधना है तेरी .. मर्द का लिंग ही तेरा कल्याण है .. और ये मर्द द्वारा बनाई गयी चार दीवारी तेरी दुनिया है …इसके बाहर तूने कदम रखा तो मर्द का लिंग तेरी योनी का भोग लगाने के लिए तैयार है … इसलिये खबरदार ..तू किसकी है उसका मंगल सूत्र लटका कर आना ..किसी मर्द को साथ लेकर आना चाहे वो ३ साल का पिद्धा ही क्यों ना हो .. और मर्द ही जनना … और मर्द जब चाहे उसके लिए तैयार रहना ..फिर वो मर्द सवर्ण हो या अवर्ण … यही ज्ञान है …और यही विज्ञान है मर्द का ..मर्दों के लिए …कडवा है ..पर सच है …

औरत के बाहरी यौनांग यानी भग्नासा से यह  मर्द और इसकी पितृसत्ता डरती है … कांपती है .. पसीने छूट जाते हैं पितृसत्ता के …क्यों बात जमी नहीं क्या? पर सच्च है क्योंकि यह अंग … बाहरी यौनांग यानि भग्नासा औरत को उन्मुक्त यौनाचरण के लिए प्रेरित करता है . जिससे पितृसत्ता के खोखले समाज के स्थायित्व को खतरा है . नैतिकता ..नैतिकता का ढोल तब बजता है जब औरत के यौनाचरण पर पुरुषों की पाबंदी हो …ये औरत की देह के प्रति देखने का पितृसत्तात्मक नजरिया है ..जिसका मतलब है औरत केवल प्रजनन के लिए है … यानी उसका गर्भ तो पुरुषों को चाहिए ..परन्तु औरत का यौनानंद उन्हें स्वीकार नहीं … इस व्यवस्था में और को यौनानंद प्राप्त करने का अधिकार नहीं … यानी औरत की सारी देह का पुरुष जैसे चाहे आनंद ले … पर औरत नहीं ले सकती और ना ही ..ना कह सकती है … औरत की देह के वही  हिस्से इस व्यवस्था को स्वीकार हैं जिससे इनका फायदा है … इसलिए औरत के G स्पॉट और C स्पॉट ..कलितोरिउस … की संवेदन तंत्रियों को देह से अलग कर दिया जाता है ..यानी औरतों का खतना किया जाता है … उसको सी ..यानी तालेबंद किया जाता है .. यही वो दम्भी सोच है जो औरत के यौनानंद के  कुदरती हक़ को छीन कर उसे ‘यौन’ दासी बनकर रखती है … जिसकी वजह से औरत को अतिचारी अमानवीय प्रक्रियाओं को सहना पड़ता है … और ये मर्द जहाँ औरत दिखी नहीं … कि इसका लिंग ध्वज फडफड करने लगता है ..यही है मर्द के लिंग ध्वज का पराक्रम..शर्म आयी ना इस सच्चाई को जानकर ..पर ये तो आपके आसपास हमेशा होता है की ये औरत को देखा नहीं की मर्द का लिंग ध्वज फड फाड़ने लगता है और शर्म कहीं कोसों दूर भाग जाती है और सारे मर्द सामूहिक भोग लगा ..अपने लिंग ध्वज को फहराते हैं …

यही मेरे  साथ इन मर्दों ने किया … मेरा दोष ये था की मैं मान बैठी थी की मैं १९४७ में आज़ाद हो गयी थी ..मैं मान बैठी थी की लोकतंत्र में संविधान ने मुझे बराबरी का हक्क दिया है .. मैं मान बैठी थी की मुझे वोट देने का मर्द के बराबर अधिकार है .. मैं इस नई आज़ाद फ़िजा मैं एक इंसान हूँ ..मेरे हक्क ..हुकुक हैं ..मैं भारत सरकार के जन उत्थान योजना की एक कार्यकर्ती हूँ .मैं संविधान सम्मत ..नीतियाँ लागू करने में ..सक्षम हूँ … कानून सम्मत नहीं है बाल विवाह … वो एक बुराई है ..वो एक अभिशाप है और ग़ैर क़ानूनी है ….बस यही तो मेरा कर्म था … पर मर्द के बनाये दायरों ..कानूनों …मर्द की सत्ता में दखल था मेरा ये कर्म … ये मर्द को बर्दास्त नहीं हुआ … उसने सबक सीखाया .. अपना लिंग ध्वज ..सामूहिक .. रूप से सरे आम ..आज़ाद देश के आज़ाद परचम के नीचे फहराया अपना लिंग ध्वज और पूरी दरिंदगी के साथ … जानवरों से भी बदतर ..अपनी मर्द की सत्ता को स्थापित करने के लिए … मेरी योनी को सबक सीखाने के लिए ..मुझे ये बताने के लिए की मैं औरत हूँ ..औरत मर्द की एक वस्तु एक भोग्या …

अपने लिंग ध्वज उपक्रम में इस मर्द ने वहशीपन की हद्दें तोड़ दी ..समाज , परिवार , संस्कृति , रिश्ते नाते ..सारे संस्कृति के ढकोसले सामने आ गए .. क्या बुड्ढा, क्या जवान ..क्या बालिग़ ..क्या ना बालिग़ … सब मर्द उस दिन मेरी योनी का भोग लगाकर ..अपना ..अपनी मर्दानगी साबित करने के लिए  सामूहिक और सरेआम अपना लिंग ध्वज फ़हरा रहे थे …

मैं चूर ..चूर .. बेहाल … इनकी दरिंदगी की शिकार … मेरे शरीर को तोड़ा.. मेरी आत्मा को नश्तर .. मेरे रोयें रोंयें में बसी इनकी हवस … मेरी चीख ..पुकार ..पीड़ा ..मेरा मान, सम्मान , स्वाभिमान ..सब खंडित ..विखंडित … चूर ..चूर ..जज़्बा.. इसांनियत का चूर  चूर ..सिर्फ़ औरत ..औरत का शरीर ..अपने आप को कोसता हुआ ..घिन घिनौना ..रूप … बस एक जिंदा लाश ..अपने आप को ढोती हुई .. अपने व्यक्तित्व , अस्तित्व , स्वाभिमान और इंसानियत की लाश अपने कन्धों पर लेकर चलती हुई ..एक जिंदा लाश … और अपनी मर्दानगी का लिंग ध्वज फहराते मर्द …

भंवरी का अभिनय करती बावली रावत

पर मैं उठी … अपने जिस्म के घावों को भरा , रूह के नश्तरों को सीया, और अस्तित्व के एक एक टुकड़े को जोड़ा , अपनी अस्मिता की राख से अपनी स्वाभिमान के लौ को जलाया और न्याय के लिए निकली .. मैंने  अपने आप को कहा मैं वस्तु नहीं हूँ ..इंसान हूँ ..जिन्दा हूँ ..आज़ाद देश में हूँ … कानून है , न्याय व्यवस्था है … कोई सनक नहीं है किसी की … की जो जब चाहे, जो चाहे करे .. अदालत गयी .. अपने उपर हुए अन्याय के लिए न्याय मांगने … मेरा मेरे जीवन साथी ने साथ दिया , पूरे देश की औरतों ने साथ दिया .. देश में औरत के ह्क्कों की लड़ाई का सिलसिला तेज़ हुआ .. अदालतें जागी … ये भरोसा हुआ मुझे न्याय मिलेगा … पर अदालत की दहलीज़ में जाति व्यवस्था ने पैर ..पसार लिए .. विज्ञान के युग में चाँद से आये एक मर्द न्यायधीश ने जाति वादी व्यवस्था में सवर्ण और अवर्ण के छुआ छुत के भेद को मानते हुए … पूरी घटना को असम्भव करार दिया …  क्योंकि जज साहब के घर चाँद में जो पुस्तक पढाई जाती है .. उसको ही उन्होंने सच माना और इस देश की धरती पर आकर देख लेते कैसे सदियों से सवर्ण मर्दों की लार टपकती है अवर्ण औरतों पर .. वो खेत हो .. खलियान हों , घर हो ,  में चौबारा हो … सुबह , हो ,,दिन हो .. रात हो … उनकी सेज सजाने के लिए  अवर्ण महिलाओं को अपनी सम्पति समझ कर उपभोग किया जाता है … काश की जजये समझ पाते ..अपने जन्म के संयोग और मर्द होने के दभ को छोड़ एक न्याय व्यक्तित्व के रूप में घटना को देख पाते … ये अफ़सोस है मेरे मन में ..काश …
“जब तक औरत पुरुष की ज़रूरत पूरा करे …पैदा करे तब तक संस्कारी ..और जब औरत अपनी ‘इच्छा’ जाहिर करे तो चरित्रहीन… वाह रे वाह ..क्या मापदंड है  ये पुरुषों का .. पुरुषों के लिए .. पुरुषों द्वारा बनाया समाज का”.. इतिहास में ..धर्म में कौन सा ऐसा पुरुष है जिसने ‘औरत’ का  अपनी ज़रूरत के लिए उपयोग ना किया हो ..जिसने उसकी देह के अतिरिक्त उसे व्यक्ति समझा हो ..उसे इंसान माना हो .. कहाँ हैं वो मर्यादा पुरुषोत्तम जो सिर्फ़  ‘अग्नि परीक्षा’ लेना जानते हैं ..और  अपनी ‘परीक्षा’ के समय औरत के साथ खड़े होने की बजाए उसे ‘वनवास’ भिजवा देते हैं .. धिकारती हूँ मैं ऐसे ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ पुरुषों को .. धिकारती हूँ ऐसे समाज और उसकी मान्यताओं को .. धर्म , सामन्तवादी ,तानशाही  लोकतान्त्रिक , और उदारीकरण वाली सत्ता और उसकी व्यवस्थाओं को जो सिर्फ औरत की देह का उपयोग और उपभोग करना जानती हैं और मानव इतिहास के आरम्भ तक करती आईं हैं ..नकारती हूँ ऐसी व्यवस्थाओं को..

भंवरी देवी

पर मैं तो लोहे की बनी हूँ ..पक्की दृढ इच्छा शक्ति की हूँ ..जो टूटना था, वो टूट चूका ..ये मेरा युद्ध है न्याय संगत व्यवस्था के निर्माण के लिए ..अब बनना ही बनना है और बनाना है ..एक न्याय संगत समाज… मैं औरतों से पूछती हूँ अपनी कोख में मर्द को पालने की बजाय आओ इंसान पालें … मर्दवादी , मनुवादी , पितृ सत्ता , उपभोग वाद , शोषण कारी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लडें.. अपने घरों में मर्द बच्चा नहीं ..इंसान बच्चे की परवरिश करें , अपनी कुदरती रचना को विषमता का आधार ना बनने दें … हम भिन्न हैं ..विषम नहीं ..वस्तु नहीं ..इन्सान हैं ..शरीर से परे ..एक व्यक्तित्व के रूप में पहचान बनाएं ..औरतों के काम से मुक्ति पाएं और काम का कोई लिंग नहीं होता ये मर्दों को समझा दें .. हिंसा मुक्त एक समता वादी , नारीवादी,  शांतिप्रिय, इंसान का समाज बनाएं ….

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जहां ईश्वर है और अन्य कविताएं (वीरू सोनकर)

वीरू सोनकर

कविता एवं कहानी लेखन, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं व ब्लाग्स पर रचनाएं प्रकाशित . संपर्क :veeru_sonker@yahoo.com, 7275302077

जहाँ ईश्वर है 

प्रार्थना के पीछे पहले आत्मा गयी
फिर देह

दोनों ने इच्छाओं के आकाश तक अपने हाथ बढ़ाये
और संयुक्त रूप से एक नाम वहाँ टांक दिया.

देह की दृष्टि बार-बार आकाश को देखती.
वहाँ अपना नाम देखती और आश्वस्ति से भर उठती

आत्मा कहीं न जाती
रोज एक अंध-कूप खोदती
भर देती उसे तमाम व्याकुल प्रश्नों से.

देह और आत्मा दोनों को चाहिए था एक ईश्वर
जो एक निशान लगाता, आकाश पर लगातार जल रही एक प्रार्थना पर
प्रतीक्षा-सूची से घटा देता एक नाम
प्रश्नों के भरे एक पतीले को वही पलटा सकता था!

एक वही था
जो एक मौसम की तरह पृथ्वी पर गिरता.
एक वही था, जिसे हर प्रार्थना मोक्ष की तरह तलाशती.

बहुत बार वह मिलता था देह और आत्मा के एक अनुपातिक संतुलन में

देह और उसकी प्रार्थना,
ईश्वर के हो सकने पर दोनों ही शंकालु थे.

आत्मा अंधकूप में रोती कि देह ने अपवित्र किया है प्रार्थना को
वह सोचती थी और प्रश्नों से कूप भरती थी.

आत्मा ईश्वर की परछाई को एकदम साफ देखती थी
अपना पांव बढ़ाती थी उस तक

देह पीछे छूटती थी.
शंकाओं का भार सिर्फ देह उठाती थी.

नींद


1.
एक आदमी

हर दिन कपड़े की तरह पहनता है नई सुबह को
और रात को याद करता है कि वह आदमी होने से पहले एक बादल था.

एक थका हुआ बादल फिर बदलता है ओस में
जिसे रात ओढ़ कर सो जाती है.

2. 
एक स्त्री

नींद की प्रतीक्षा में गोल-गोल घुमाती है पृथ्वी.

घूमने से थकी पृथ्वी के पास नही है कोई शिकायत
उसके पास मौसम है.

स्त्री सोचती है वह मांग लेगी एक दिन पृथ्वी से उसके मौसम.

स्त्री कई सदी से थकान में चूर है पर उसके पास भी नही है शिकायतें

पृथ्वी और स्त्री अनंत चाहनाओं की देह है.

पृथ्वी और स्त्री एक दिन सो जाएंगी एक साथ.

एक मौसमी नदी का हाथ पकड़ कर जाएंगी वह
एक बहु-प्रतीक्षित नींद की ओर

3

एक बच्चा

हवा की आवाज सुनता है
और चला जाता है नींद की ओर

नींद बड़े होने के सपनो से भरी एक आकाशगंगा है.

वह उस आकाशगंगा को लोरी गाते सुनता है
कुनमुना कर कहता है अभी और सोऊँगा.

आकाशगंगा
उसकी इस नींद से इतना खुश है
कि अगली सुबह वह चुपके से काट देगी
बड़े होने की प्रतीक्षा का एक और दिन.

4

हवा के हाथों में है
उस एक आदमी, स्त्री और बच्चे की शिकायतें.

वह स्वांस बन कर रोज गिनती है प्रतिक्षाओ से भरे एक दिन को
और चाहनाओं से भरी एक नींद रोपती है उनके माथे पर

रात, पृथ्वी पर रोज फैलने वाला एक मौसम है.

नींद एक सुरंग है जो रात को खुलती है
और इन तीनो को एक साथ आवाज देती है.

ओ धरती के सबसे जिंदा मौसमों, ओ अथक दौड़ती घड़ियों, ओ प्रतीक्षित प्रेमिल नदियों

आओ, इस मखमल पर एक साथ गिरो.
आओ, अपने इस बहुत भारी दिन को मेरे हाथो में दे दो.

एक बादल बनो और सो जाओ!

स्त्री

वह संसार देख रहे थे
वह यात्री हुए.

उन्होंने दुख देखा तो कई बार बुद्ध बने.

आकाश देख साधु हुए.
पहाड़ देख कर वह पुरुष हुए.

वह कौतूहल से भरे थे वह बच्चे हुए.
अब एक पूरी पृथ्वी उनके मुँह में समा सकती थी

जब उनकी जिज्ञासा का भूत उतरा
तो उन्होंने इन सभी को फिर से देखा.

उन्होंने फिर से देखा, क्योंकि वह उनके प्रेम में पड़ गए थे.

वह अब चुप हुए
वह इस बार स्त्री हुए!

टिके रहने का सौंदर्य-शास्त्र 

वह बदसूरत होंगे.
रुकी हुई एक बासी झील के बगल से
एक नदी की लज्जा ओढ़ कर निकल जाएंगे!

वह धीमे चलेंगे
पर मुक्त होंगे ठहरे होने के अपराध-बोध से.

समझौते की पाप संधि से बाहर
एक अराजक दृश्य रचेंगे.

पुरानी होती देह पर घाव खाएंगे
और अपने वक्त की सबसे निष्पाप स्वांस लेंगे

वह एक लुप्तप्राय प्रजाति हैं उनकी भाषा मे समा जाती है एक पूरी पृथ्वी.

‘रुकने’ और ‘टिकने’ को बार-बार परिभाषित करते हुए
वह लगातार नए की ओर चलेंगे.

वह बदसूरत होंगे
पर दृश्य में सबसे सुंदर होंगे!

उसने जाना था 

जामुन से अपने हिस्से की रात उधार लेकर
उसने आंखों में दो बूंद इच्छा रोपी थी
एक स्वप्न उगा था फिर

देह में, दुख की एक रिस रही कोख भी है
उसने जाना था

आवाज में कोई अनंत प्रतीक्षा छुपी थी
पुकार से जाना उसने

उसने जाना, आकाश के भीतर बैठी है समस्त प्रार्थनाएं

वह समुद्र के मौन-शोर में पनाह मांग रही थी
कि उसके चेहरे पर टपक पड़ी
एक नवजात नदी!

उसने जाना कि एक नदी का साथ होना भर ही काफी है

उसने जाना कि कितना सुंदर है
नमक घुली मुस्कुराहट के साथ आईने के भीतर जाना

वह नही गयी फिर कहीं!

उसने शाम होते ही एक चुटकी सिंदूर हवा में उड़ा दिया
और उसकी सभी स्मृतियों के चेहरे चमक उठे

यह पहली बार था
कि एक उदास नदी से समुद्र ने उसकी गहराई मांग ली!

तस्वीरें गूगल से साभार 

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पेरियार: महिलाओं की आजादी का पक्षधर मसीहा

ललिता धारा 


महिला दिवस पर विशेष 


पेरियार की मूर्ति को नुकसान पहुंचना समतावादी आंदोलन और विचार के प्रति प्रतिगामियों के गुस्से की बानगी है. आइये आज महिला दिवस पर समझते हैं कि पेरियार किस तरह जेंडर-स्वतन्त्रता के बड़े पक्षधर थे. 

तमिलनाडू में २०वीं सदी के गैर-ब्राह्मण द्रविड़ आन्दोलन का लम्बा और उथल-पुथल से भरा इतिहास था. इसकी शुरुआत १९१६ में जारी गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र से मानी जा सकती है. इस अवधि में महिलाओं की स्थिति और जाति व्यवस्था से सम्बंधित सुधार हुए तो परन्तु वे बहुत सीमित थे. सन १९१७ में गैर-ब्राह्मणों की राजनीतिक और शैक्षणिक बेहतरी के लिए ‘जस्टिस पार्टी’ का गठन किया गया. सन १९२० के प्रांतीय चुनावों में यह पार्टी सत्ता में आयी और तमिलनाडू में पहली बार गैर-ब्राह्मण सरकार बनी. ईव्ही रामासामी, जिन्हें पेरियार के नाम से जाना जाता है, इतिहास के इसी दौर के प्रमुख पात्र थे.

पेरियार की नेतृत्व क्षमता सन १९२५ में शुरू हुए आत्माभिमान आन्दोलन में सामने आयी. इस आन्दोलन का लक्ष्य था गैर-ब्राह्मण जातियों को उनके द्रविड़ मूल पर गर्व करना सिखाकर उन्हें एक सूत्र में पिरोना. आन्दोलन के मूल सिद्धांत थे – ईश्वर, धर्म, कर्मकांडों व जाति का नकार. पेरियार ने इसमें एक और सूत्र जोड़ा – पितृसत्तामकता का नकार! आत्माभिमान आन्दोलन का अंतिम लक्ष्य था जाति-मुक्त समाज का निर्माण. इसके लिए उसे जाति व्यवस्था की सभी संरचनाओं से मुकाबला करना पड़ा. इनमें शामिल थीं ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवादी पितृसत्तामकता. पेरियार के संघर्ष की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि अपने जीवन में उन्होंने इन सभी संस्थाओं से अलग-अलग समय पर व्यक्तिगत स्तर पर लोहा लिया. हर लड़ाई अलग-अलग तरीकों से लड़ी गयी. पेरियार ने जहाँ ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म के विरुद्ध लड़ाई में तार्किकता को अपना हथियार बनाया वहीं पितृसत्तामकता का विरोध उन्होंने इस अपने इस दृढ विश्वास के आधार पर किया कि महिलाएं अपने आप में स्वतंत्र है और किसी के अधीन नहीं हैं.

मनिअम्मै के साथ पेरियार

अपने पूर्ववर्ती उच्च जातियों के समाज सुधारकों – जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर पितृसत्तामकता के मूल ढ़ांचे को चुनौती दिए बगैर विचार करते थे – के विपरीत, पेरियार ने एकपत्निक परिवार और सतीत्व के मानकों को चुनौती दी, जो महिलाओं को गुलाम बनाते थे. चूँकि विवाह, महिलाओं के दासत्व का प्रतीक था, इसलिए उन्होंने जोर देकर कहा कि विवाह की संस्था को ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए.

पेरियार ने १९२९ में आत्माभिमान विवाह (सेल्फ-रिस्पेक्ट मैरिज या एसआरएम) की जिस अवधारणा का विकास और प्रतिपादन किया, वह एक अनूठा मास्टर स्ट्रोक था. यह अवधारणा विवाह को दो व्यक्तियों के बीच एक ऐसे समझौते के रूप में देखती थी, जिसमें जाति, वर्ग या धर्म के लिए कोई जगह नहीं थी और जिसके लिए न तो पुरोहितों की आवश्कता थी और ना ही अभिवावकों की सहमति की. इसमें विवाह सदा के लिए पवित्र बंधन न होकर दो समकक्ष व्यक्तियों के बीच समझौता था, जिसे दोनों में से कोई भी पक्ष जब चाहे समाप्त कर सकता था. विवाह स्वर्ग में ईश्वर द्वारा नहीं वरन धरती पर दो व्यक्तियों द्वारा परस्पर समझौते से निर्धारित किये जाते थे. आत्माभिमान विवाहों के मूल में थी लैंगिक समानता और अपने निर्णय स्वयं लेने का अधिकार. यह विचार और सोच के क्षेत्र में एक क्रांति और जागरूकता व आत्म-चेतना की एक लम्बी छलांग थी. कुल मिलाकर, पेरियार ने एक नयी महिला और एक नए पुरुष का सृजन किया.

पेरियार के जन्म के चार दशक पूर्व, फुले दम्पती ने महाराष्ट्र के पुणे में ‘सत्यशोधक विवाह संस्कार’ के नाम से एक क्रंतिकारी सोच प्रस्तुत की थी. इन विवाहों में कोई पंडित नहीं होता था और हिन्दू धार्मिक मंत्रों की जगह, वर और वधु, अपने लिए निर्धारित धर्मनिरपेक्ष मंत्रों का स्वयं जाप करते थे. इन मंत्रों में कोई लैंगिक भेदभाव नहीं था. यद्यपि पेरियार ने फुले का नाम भी नहीं सुना था, तथापि उन्होंने फुले के काम को ही आगे बढ़ाया.

आत्माभिमान विवाह समारोहों की अध्यक्षता पेरियार स्वयं करते थे और इससे उन्हें अपने स्त्रीवादी विचारों का प्रसार करने का मौका मिलता था. स्त्री-पुरुष संबंधों का कोई ऐसा पक्ष नहीं था जो उनकी नज़रों से छूटा हो. वे महिलाओं को सेक्स व प्रजनन के मामलों में असीमित व बिना शर्त स्वतंत्रता दिए जाने के हामी थे.  उन्होंने पित्रसत्तामकता के ध्वंस के लिए वह सब कुछ किया जो वे कर सकते थे. सोये हुए समाज को झकझोर कर उठाने के लिए उत्तेजक बयान देने में उन्हें विशेषज्ञता हासिल थी. एक बानगी देखिये: “अगर इससे उनकी स्वतंत्रता में बाधा पड़ती हो तो महिलाओं को बच्चों को जन्म देना बंद कर देना चाहिए”. वे बिना लागलपेट के कहते थे कि जब तक ‘पितृसत्तात्मक पुरुषत्व’ है तब तक महिलाएं स्वतंत्र नहीं हो सकतीं. वे चाहते थे कि ‘सतीत्व’ और ‘चरित्र’ जैसे मानक या तो महिला और पुरुष दोनों पर लागू होने चाहिए या किसी पर भी नहीं.

उनका कहना था कि माता-पिता को अपनी लड़कियों का पालनपोषण उसी तरह करना चाहिए जैसा कि वे लड़कों का करते हैं. यहाँ तक कि लड़कों और लड़कियों के नाम और उनका पहनावा भी एक जैसे होने चाहिये और लड़कियों को मुक्केबाजी और कुश्ती जैसों खेलों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए.

जहाँ तक महिलाओं के लिए गर्भनिरोधकों  के इस्तेमाल का सवाल है, उनकी मान्यता थी ये महिलाओं को स्वतंत्रता और उनके जीवन पर अधिकार देने के उपकरण हैं. पेरियार की यह सोच, उनके समकालीन अन्य सुधारकों से एकदम अलग थी जो यह मानते थे कि महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक उपायों का इस्तेमाल परिवार, समुदाय और राष्ट्र के हित में होना चाहिए. पेरियार का यह मानना था कि केवल और केवल महिलाओं को यह तय करने का अधिकार है कि वे बच्चे चाहतीं हैं या नहीं, यदि हां तो कब और विवाह बंधन के अन्दर या उसके बाहर. उन्होंने अपने ये विचार अलग-अलग भाषणों और लेखों में व्यक्त किये और इन्हें संकलित कर एक पुस्तिका की शक्ल में प्रकाशित किया गया, जिसका शीर्षक था, ‘व्हाई द वुमन वाज एनस्लेव्ड’ (महिला क्यों गुलाम बनी).

वे उस काल में क्रांतिकारी स्त्रीवाद की भाषा में बात करते थे, जब पश्चिम के स्त्रीवादियों की दूसरी लहर ने इस शब्द को गढ़ा ही नहीं था.

आत्माभिमान विवाहों के अतिरिक्त, आत्माभिमान सम्मेलनों और युवा सम्मेलनों में भी पेरियार ने  लैंगिक मुद्दों पर अपने विचार रखे. इन आयोजनों में पारित प्रस्ताव, महिला-समर्थक और लैंगिक न्याय पर आधारित हुआ करते थे.

पेरियार और मनिअम्मै बच्चों के साथ

इस आन्दोलन का एक अनूठा पक्ष यह था कि महिलाएं केवल महिला सम्मेलनों में ही नहीं, बल्कि सामान्य आत्माभिमान सम्मेलनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं. उनकी आयोजन में तो भूमिका होती ही थी, वे सम्मेलनों की अध्यक्षता भी करती थीं और प्रस्ताव भी प्रस्तुत करती थीं. आन्दोलन की महिला कार्यकर्ता, जाति और पितृसत्तामकता के परस्पर अन्योन्याश्रित संबंधों से अनभिज्ञ नहीं थीं. वे ब्राह्मणों के जातिगत दमन और पुरुषों के लैंगिक दमन को सदृश पाती थीं. वे यह मानती थीं कि धर्म, जातिगत और लैगिक असमानताओं को वैध व औचित्यपूर्ण ठहरता है. आन्दोलन के साहित्य में उन्होंने अपने इन विचारों को स्वर दिया. ईवी रामासामी को ‘पेरियार’ या महान की उपाधि मद्रास में १९३८ में आयोजित तमिलनाडू विमेंस कांफ्रेंस में दी गयी.

पेरियार घर और सार्वजनिक जीवन दोनों में महिलाओं को किसी घेरे में बंद रखने के हामी नहीं थे. वे जो कहते थे, वह करते भी थे. उन्होंने अपनी १३ वर्षीय नवविवाहिता पत्नी नगम्मल को उसकी ‘थाली’ या मंगलसूत्र का त्याग करने के लिए राजी किया. वे अपनी पत्नी से कहते थे कि वे उन्हें कामरेड कहकर संबोधित करें और जिन भी सभा-सम्मेलनों में वे जाते, उनकी पत्नी उनकी साथ होतीं थीं. उन्होंने ठीक यही व्यवहार अपनी बहन कन्नामल के साथ भी किया. यहाँ तक कि जब गांधीजी ने सन १९२१ में शराबबंदी के समर्थन में ताड़ी की दुकानों पर धरना देने का आव्हान किया, तब इरोड में आन्दोलन का नेतृत्व नगम्मल और कन्नामल ने किया. इस सबके के बावजूद, सन १९३३ में अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने इस बात पर गहन खेद व्यक्त किया कि वे अपने वैवाहिक जीवन में अपनी स्त्रीवादी विचारों का एक छोटा सा अंश भी लागू नहीं कर सके.

पेरियार के जीवन की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना थी सन १९४९ में ७० वर्ष की आयु में अपने से चालीस वर्ष छोटी मनिअम्मै से उनका पुनर्विवाह. मनिअम्मै छह वर्ष से उनकी निजी सचिव थीं. इस विवाह के लिए उनकी घोर निंदा और भर्त्सना हुई. परन्तु वे अविचलित रहे. पेरियार ने कहा कि उन्होंने यौन सुख के लिए विवाह नहीं किया है और यह भी कि यौन सुख प्राप्त करने के लिए विवाह करना आवश्यक भी नहीं है. उन्होंने कहा कि विवाह के पीछे उनका उद्देश्य अपनी वैचारिक, सांगठनिक और भौतिक विरासत को सुरक्षित हाथों में सौंपना है ताकि उनका काम आगे बढ़ सके. उन्होंने रूढ़ीवाद के खिलाफ अपनी लम्बी और अथक लड़ाई की विरासत एक युवा महिला को सौंपी. यह स्त्रीवाद के प्रति उनकी आचरणगत प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा प्रमाण था.

ललिता धारा मुंबई के डॉ आंबेडकर कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स के सांख्यिकी विभाग की अध्यक्ष रही हैं। उन्होंने कई शोधपूर्ण पुस्तकों का लेखन किया है, जिनमें ‘फुलेज एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘भारत रत्न डॉ बाबासाहेब आंबेडकर एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘छत्रपति शाहू एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘पेरियार एंड विमेंस क्वेश्चन’ व ‘लोहिया एंड वीमेनस क्वेश्चन’ शामिल हैं। इसके अतिरिक्‍त सावित्रीबाई फुले के पहले काव्य संग्रह का उनका अनुवाद भी “काव्य फुले” शीर्षक से प्रकाशित है।

फॉरवर्डप्रेस से साभार 
स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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दलित स्त्रीवाद किताब ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से खरीदने पर विद्यार्थियों के लिए 200 रूपये में उपलब्ध कराई जायेगी.विद्यार्थियों को अपने शिक्षण संस्थान के आईकार्ड की कॉपी आर्डर के साथ उपलब्ध करानी होगी. अन्य किताबें भी ‘द मार्जिनलाइज्ड’ से संपर्क कर खरीदी जा सकती हैं. 

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हमें अपना आसमान खुद नापना होगा

अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

अनुपमा तिवाड़ी

जीवन की वहीं तक सीमाएँ होतीहैं, जहाँ तक आप उन्हें तय करते हैं ! यहवक्तव्यसारे आसमान को आपके सामने खोल कर रख देता है और कहता है कि “सारा आसमान तुम्हारा है,तुमइसमें चाहे जितने पंख फैला सकते हो”.तो अब ये आसमान महिलाओं के लिए खुला है.  इस वर्ष भी पिछले वर्षों की तरह हीआ रहा है8 मार्च, यानि महिला दिवस !

क्या है महिला दिवस ?
पिछली कई शताब्दियों से दुनिया भर के अधिकतर समाजों में पुरुष वर्चस्व रहा है. इसी के चलते महिलाएं, अनेक प्रकार से विकास के दौर में पिछड़ती चलीजा रही थीं. जबदुनिया भर की लगभग आधी आबादी समानता के अधिकार से वंचित हो तो कैसेदुनिया, किसी देशऔर समाज में न्याय और खुशहाली की कल्पना की जा सकती है ? इसी स्थिति को देखते हुए 1908 मेंसबसे पहले 10 से 15 हजार महिलाओं ने न्यूयॉर्क में वोट देने की मांग को ले कर मार्च निकाला. जिसके एक वर्ष बाद 1909 में प्रथम राष्ट्रीय महिला दिवस 28 फरवरी को मनाया गया. 1910 में अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने मांग रखी गई और 19 मार्च 1911 को पहली बार ऑस्ट्रिया, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया. 1913 मेंइसकीतिथि बदल कर 8 मार्च रखी गई. तब से आजतकयह दिन महिलाओं के हक़ और बराबरी के अधिकार के समर्थन में दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय  महिलादिवसके रूप में मनाया जाता है.

सिर्फ दिवस ही नहीं उसके अनुरूप क्रियान्विति की भी ज़रुरत
अनेक देशों ने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कुछ कानून बनाए हैं लेकिन उन कानूनों की हम आज सरेआम धज्जियाँ उड़ती देख सकते हैं. हर दिन नन्हीं बच्चियों से होते बलात्कार और फिर उनकी हत्या किसी से छुपी नहीं है.दुनिया भर में हर दिन अनेक स्तरों पर महिलाओं के साथ हो रही यौन हिंसा क्यामहिलाओं को इस उत्सव को मनानेके लिए उत्साहित कर पाती है ?अब महिलाएं इस दिन घूम – फिर लेने, एक दूसरे को बधाईयाँ दे- देने भर से बहलने वाली नहीं हैं. अब उन्हें उड़ने के लिए एक पूरा आसमान चाहिए जिसमें वो अपने पंख फैला सकें और मनचाही उड़ान भर सकें.

अब महिलाएं असली आज़ादी चाहती हैं. वे चाहती हैं जन्म के साथ इन्सान होने के वो सभी अधिकार जो प्रकृति ने उन्हें समान रूप से दिए हैं.जो कानून ने दिए हैं उनकी पूर्ण रूप से क्रियान्विति और जो नहीं दिए हैं उन्हेंमांगने की आज़ादी.महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति अबऔर अधिक सजग हो रही हैं. अब वोआज़ादीचाहती हैं. पढ़ने – लिखने की, स्वास्थ्य में बराबरी की सुविधा, घूमने – फिरने की पूरी आज़ादी, पेशा चुनने की आज़ादी, विवाह सम्बन्धी निर्णयों की आज़ादी. अपनी पहचान की आज़ादी, कार्यस्थल पर समान भागीदारी और अधिकार की आज़ादी.अब वो सवाल करने लगी हैं कि ऐसा क्यों है कि हमें एक पुरुष सेअपने को बचाकर रखना पड़े. हमारी इज्ज़त एक पुरुष के हाथ में हो. वे अब अपनी इज्ज़त के नए मापदंड गढ़ना चाहती हैं, जिसमें उनकी इज्ज़त उनकीस्वयं की मुट्ठी में हो और उस पर हमला करने वाले पर इन्सान कोअपने किए कुकृत्य पर उचित दंड मिले.वर्तमान स्थितियों के चलते अब दुनिया भर में महिलाएं अनेक मोर्चों पर खुल कर बाहर आ रही हैं.

सुरक्षा और समान जीने का अधिकार, हर महिला की अस्मिता का मुद्दा 


हाल ही में हॉलीवुड की 300एक्टर, एजेंट्स, डायरेक्टर्स, राइटर्स, प्रोड्यूर्स, एक्सीक्युटिव्ज़ने टाइम्सअप केम्पेन,न्यूयॉर्क की शुरुआत की है. जिसमें उन्होंनेपुरुष वर्चस्व वाले कार्यस्थलों पर संघर्ष कर अपने अधिकार को ले कर चुनौती दी है. इस केम्पेन में वे खुल कर अपने साथ हुए और हो रहे गैरबराबरी वाले व्यवहारों और यौन हिंसा से जुड़े अनुभवों को साझा कर रही हैं और दोषियों के खिलाफ खुल कर कार्यवाहियों की मांग कर रही हैं. इस केम्पेन में इन महिलाओं ने 13 मिलियन का फंड भी बनाया है. जिससे नर्स, मजदूर, किसान, फेक्ट्री में काम करने वाली और रेस्टोरेंट जैसी जगहों पर काम करने वाली महिलाएं भी धनाभाव में कानूनी मदद प्राप्त कर  सकें. इसमें ऐसा कानून लाने का भी प्रस्ताव रखा जा रहा है जिसमें महिलाओं के साथ हो रहा गैरबराबरी पूर्ण व्यवहार और यौन हिंसा पर एक्शन नहीं लिए जाने पर उस संगठन/ फेक्ट्रीको दण्डित / फाइन करने का प्रावधान होगा. एकजेंडर पैरिटी बनाई जा रही है जो कि महिलाओं के साथ समान अधिकार को ले कर कार्य करेगी. इस अभियान की पहल करने वाली महिलाओं की अपील है कि जब भी कोई महिलागोल्डन / ब्ल्यू एवार्ड लेने जाएँ तब कालाकपड़ा पहनें या हाथ पर काली पट्टी बाँधें जो कि इस बात का प्रतीक है कि वे समान अधिकार के विचार को समर्थन देती हैं.  अब ट्वीटर पर महिलाएं ‘मी- टू’हैश टेग के साथ अपने बचपन, किशोर उम्र में हुए यौनिक दुर्व्यवहारों और अब भी वे किस – किस प्रकार से यौन हिंसा का शिकार हो रही हैं इस पर खुल कर अपनी बात सबके बीच साझा कर रही हैं.

इस वर्ष इन महिलाओं ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की थीम को ‘प्रेस फॉर प्रोग्रेस 2018’ नाम दिया है. जिसमें वे प्रेस के माध्यम से भी अपनी बात जन – जन तक पहुँचाना चाहती हैं. वर्तमान स्थितियों को देखते हुए एक अनुमान है कि इस गति से यदि इस मुद्दे पर काम होता है तो भी एक संतोषजनक स्थिति प्राप्त करने में कम से कम 200 वर्ष लग जाएंगे. ‘प्रेस फॉर प्रोग्रेस 2018’ थीम के अंतर्गत महिलाओं के समान अधिकारों को ले कर किसी देश विशेष की ही नहीं बल्कि दुनिया भर की महिलाओं के लिए यह मुद्दा उठाया जा रहा है.

अपनी कमान अब अपने हाथ में रखनी होगी
अब हर एक महिला को अपनी जगह से उठना होगा.1928में सेंट लुईस, मिसौरी अमेरिका में जन्मीं माया एंजलो अश्वेत कवियित्री, उपन्यासकार, निबंधकार, चलचित्र कथानक, लेखिका, अभिनेत्री, व्याख्याता और सिविल राइट्स एक्टिविस्ट थीं. उन्हें 50 से अधिक मानद उपाधियाँ और अनेक राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय पुरुस्कारप्राप्त हुए.वर्ष 2011 मेंउन्हेंअमेरिका का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘प्रेसिडेंशियल मैडल ऑफ़ फ्रीडम’ प्रदान किया गया.वे दुनिया भर में  एक संघर्षशील और जुझारू महिला के रूप में याद की जाती हैं. एक अश्वेत लड़की जिसके सौतेले पिता ने उसका यौन शोषण किया और जिसे अपने जीवन में देह व्यापार तक करना पड़ा उसकी जिंदगी की राह भी क्याकोई कम मुश्किल भरी होगी ? उनके जीवन से हमएक औरत की ताकत का हम अंदाज़ा लगा सकते हैं.वे स्वयं आगे बढ़ीं,उन्होंने स्वयंजीवनसे जूझकरएक सम्मानजनक मुकाम हासिल किया.

ये जो रूकावट की जंजीरें हमारे पैरों में पड़ी हैं वे कुछ तो समाज नेहमारे पैरों में डाली हैं और कुछ हमने स्वयं ही सामाजिक स्वीकारोक्ति के चलते अपने पैरों में डाल रखी हैं.लेकिनअब इन बेड़ियों को खोलने की पहल हमें स्वयं ही करनी होगी. जिस दिन हमने यह तय लिया उस दिन हम इन बेड़ियों से स्वयं ही मुक्त हो जाएँगी.
हाँ, इसकी शुरुआत छोटे – छोटे समूहों से की जा सकती है. गुजरात में लगभग 40 वर्ष पहले महिलाओं ने एक संगठन बनाया था ‘सेवा’. जो कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कार्यरत है. अभी हाल ही में जयपुर के गाँधी नगर रेल्वे स्टेशन की पूरी कमान महिलाओं ने संभाली है. येशुरुआत है लेकिन अंततः हमें मिलकर काम करना होगा क्योंकि पुरुष और महिलाएँ दो धुरी नहीं हैं वे एकदूसरे के पूरक हैं. किसी भी पुरुष या स्त्रीविहीन समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. एक समान अधिकार और सम्मान का रिश्ता ही सबसे न्यायपूर्ण और सुखद रिश्ता होता है जिसकी अभी दरकार है. तोबहनोंउठो! तोड़ दो / गुलामी की जंजीरों को / बाहर आओ/ खुली हवा में/ फेफड़े भर कर सांस लो और उड़ चलो/उस हवा के साथ/जो जाती है/उन्मुक्त आकाश तक !

तस्वीरें गूगल से साभार 

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स्त्रीवाद की ` रिले रेस `में रमणिका गुप्ता का बेटन

नीलम कुलश्रेष्ठ


जिंदगी की तनी डोर, ये स्त्रियाँ, परत दर परत स्त्री सहित कई किताबें प्रकाशित हैं.
सम्पर्क:  .kneeli@rediffmail.com,



स्त्रियों की जागृति  का इतिहास सवा सौ साल पुराना है जिस पर कुछ ना कुछ लिखा जाता रहा है लेकिन एक कलमकार स्त्री इस इतिहास को सही ढंग से अभिव्यक्त कर सकती है .वड़ोदरा[गुजरात ] की भूतपूर्व महारानी  चिमणाबाई गायकवाड़ ने लंदन के भारतीय मूल के एक सहयोगी लेखक श्री एस. एम. मित्र  के साथ सवा सौ वर्ष पूर्व एक पुस्तक लिखी थी “द पोज़ीशन ऑफ़ वीमन इन इंडियन लाइफ़ “ सम्भवत; ये भारत का  पहला स्त्री लिखित दस्तावेज होगा जिसने खुली आँखों से  स्त्री को पंगु बनाने वाला सामाजिक ढाँचा देखा .वो भी उस महारानी ने जिसने भारत के सभी राजघरानो में से प्रथम बार पति महाराजा सयाँ जीराव गायकवाड़  तृतीय के कहने पर घूँघट हटा दिया था .तो इन सवा सौ वर्षो में ये स्त्री जागृति संघर्ष करती , टूटती , हाँफती ,कभी जीतती कहाँ तक पहुँची है ?भारत के अलग -अलग प्रदेश की कलमकार स्त्री किस तरह  इसका दस्तावेज तैयार कर रही है ?हिन्दी की ये आइकन स्त्रियां लगभग जानी पहचानी है लेकिन अन्य  भाषाओं की  कौन सी आइकन स्त्रियां हैं जिनकी कलम से स्त्रियों की व्यथा कथा रिस रही है ? इन आइकन की  तलाश में दिल्ली की रमणिका   गुप्ता वर्षो से अपनी टीम के साथ जुटी हुई हैं .वे  दृढप्रतिज्ञ हैं कि चालीस भाषाओं की रचनाकारों  को हिन्दी  में प्रस्तुत करके बतायेगी कि अपने को कैद करती चारों  ओर की अग्निरेखा को किस तरह स्त्रियां उलांघ रही हैं .

रमणिका  खुद एक सुविख्यात साहित्यकार  हैं . वे 43  पुस्तकों की लेखिका है व उन्होंने 34 पुस्तकें संपादित की हैं . उन्होंने बिहार के कोलियरी के मज़दूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करके उन्हें अधिकार दिलवाये  हैं आदिवासियों व दलितों के लिये उनका कलम से संघर्ष जारी है याँ नि कि वे ऐसा व्यक्तितव नहीं  है कि खयालो में ही क्रांति  की बात करती रहे .एक पत्रिका का वर्षो से संपादन कर रही है “युद्धरत आम आदमी`.

वे  लेखिकओ से किस तरह से   स्नेह् से व्यवहार करती हैं ,मेरे स्वयम के अनुभव हैं -मैंने बिना पूर्व परिचय के उनसे पत्र डालकर “धर्म की बेडि़याँ  खोल रही है औरत `के लिए किसी पौराणिक स्त्री चरित्र पर कहानी माँगी तो उसी शाम उन्होने  फ़ोन  पर अपनी कहानी  `मेनका` का सारांश सुना दिया  था.“हाशिये उलांघती औरत `के लिए `रिले रेस` ई-मेल की तो उसी शाम उन्होंने फ़ोन  करके शाबासी दी व कहा कि इस कहानी को सबसे पहले हम प्रकाशित करेंगे .

उनका अटूट विश्वास है कि समाज का लेखा -जोखा इतिहास के अलावा सहित्य ही रखता है और अब स्त्री विमर्श मुख्य धारा में स्थान पा चुका है तो अलग अलग स्थानों की स्त्री मुक्ति  किस दौर से गुजर रही है ,ये वहा की साहित्यकारों की रचनाओं से ही जाना जा सकता है .  वे बताती हैं ,“हमने  तीस भाषाओं की 334 कवियित्रिओ का काव्य संकलन प्रकाशित कियाँ  है . लेकिन अब हमने कहानी अंक  निकालने का इसलिए निर्णय लियाँ  है कि कहानी में घटनाक्रम ,परिस्थितियां, क्षेत्र ,  व भूगोल सिलसिलेवार ढंग से स्पष्ट होता है जिससे मुक्ति की अवधारणा,उसका इतिहास ,विकास व स्तर स्थूल व सूक्ष्म रुप से प्रतिबिंबित हो सकता है . “

इस कठिन मुहिम पर उनके साथ हैं सुप्रसिद्ध संपादक व लेखिका  अर्चना  वर्मा  व संपादन सहयोग दे रहे हैं अनामिका ,हेमलता महिश्वर व विपिन चौधरी .व अन्य  भाषाओं के अनेक सहयोगी जो अनुवाद  कार्य में जुटे  हुए हैं .` युद्धरत आम आदमी` के तीन अंकों में हिन्दी कहानी  के  तीन खंडों में देश की 112 समर्थ कहानी लेखिकाओ की कहानियाँ  प्रकाशित की गई हैं  .प्रथम  खंड का बहुत दिलचस्प है नाम “कोठी में धान“जिसमे महादेवी  वर्मा .सुभद्रा कुमारी चौहान .सुमित्रा कुमारी सिन्हा . शिवरानी  प्रेमचंद   ,चंदकिरण  सौनरेक्सा ,मँजुल भगत व लवलीन .दूसरे खंड में “खड़ी  फ़सल `में  सन् 1948 में व उसके बाद जन्म लेने वाली लेखिकओ की कहानियाँ  हैं.खंड -3 `नई पौध `में 1964 व उसके बाद जन्मी लेखिकाओ की कहानियाँ  हैं . अब तक उनकी पास 25 भाषाओं की कहानियाँ  आ चुकी हैं बाकी भाषाओं की कहानियो को अनुवादित करने में उनकी टीम जुटी हुई है .पेश है उनसे संक्षित्प्त बातचीत 

आपने चालीस भाषाओं  की कहानियों के संकलन का बीड़ा क्यो उठाया  है ?“

विभिन्न दार्शनिकों ने कभी स्त्री को स्वतंत्र इकाई नहीं माना. यहूदी ये मानते रहे कि स्त्रियाँ पुरुष की पसली की  हड्डी  से निर्मित हुई है .ईसाइयों ने कहा कि ये पुरुष के मांसल  अंग से .निर्मित है .प्लेटो व अरिसटोटल ने तो स्त्री को ही नकार दिया  .कबीर ने इसे नरक का कुंड कहा .सृष्टि ने तो स्त्री पुरुष को समान पैदा किया  है किन्तु इन दो मनुष्य प्रजाति के बीच पुरुष ने भेद पैदा किया  यानि स्त्री की गुलामी पुरुष समाज की नियामत है . इन सभी मतों का प्रतिरोध है नारीवादी लेखन .स्त्री अपना भोगा  हुआ  यथार्थ अभिव्यक्त करती है  तो वह् अधिक प्रामाणिक बन जाता है .मैंने अपने सहयोगियों सहित इसलिए चालीस भाषाओं की स्त्रियों की रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद का बीड़ा उठाया  है जिससे वह् समाज के विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा फैलाये भ्रम के पार स्त्री को एक मनुष्य  रुप में देख सके .“

`इस विभेद को सहित्य किस तरह चुनौती दे रहा है ?

 “सवा सौ वर्षो में इस गुलामी से मुक्ति का अभियान ही नारीवाद है .जिसे नजरअंदाज नहीं  कियाँ  जा सकता है .स्त्री विमर्श का सहित्य स्त्री को वस्तु से व्यक्ति बनाने की मुहिम चला रहा है .इस मुहिम में कुछ पुरुष भी साथ हैं .ये अभिव्यक्ति की हर विधा व साहित्य की हर विधा में उभर रहा है . ये समाज के दोहरे मापदंड को चुनौती दे रहा है .ये मेरा व मेरी टीम का शोध अभियान है कि देखे किस प्रदेश की कौन सी स्त्री  अपनी कहानी में इस चुनौती को किस तरह अभिव्यक्त कर रही है क्या स्त्री मुक्ति की मुहिम याँ  आंदोलन के लिए उसे प्रभावकारी बनाने के लिये नए आइकन की खोज ज़रूरी नहीं    है ? “..

 “क्या इन खंडों में स्त्री मुक्ति का स्वर जनसाधारण से जुड़ पायेगा ?“

“धीरे-धीरे कही ये सब तो हो ही रहा है .स्त्री मुक्ति की पीड़ा की अवधारणा के तहत मात्र भोगी हुई पीड़ा का एहसास होना ही पर्याप्त नहीं  है .जिस पीड़ा से प्रतिरोध का स्वर न उभरे तो वह पीड़ा निरर्थक हो जाती है .कोई भी प्रतिरोध जब पूरे समाज का प्रतिरोध बन जाता है -तो ही बदलाव संभव हो पाता है .16 दिसंबर 2012 को सामूहिक बलात्कार की घटना ,इसका सटीक उदाहरण है  .“  दुर्भाग्य ये है कि इस आंदोलन के बावजूद सामूहिक बलात्कार नहीं  रुक रहे लेकिन उनकी ये बात भी सही है स्त्री को हिम्मत दी है कि वह बलात्कारियों के खिलाफ़ आवाज़ उठा रही है .

 “आप इन संकलन से क्या संदेश देना चाहती है?“
“अनेक माध्यमों से पुरुषों ने स्त्री को ऎसे अनुकूलित किया  है कि वह भी अपनी गुलामी का उत्सव मनाने लगी है .स्त्री जब तक स्व्यं को यौन का साधन समझती रहेगी तब तक मुक्त नहीं     हो पायेगी .स्त्री को स्वयम को प्यार करना ,इज़्ज़त देना सीखना होगा .

“क्या आपको लगता है कि ये संकलन स्त्री मुक्ति में कोई अहम् भूमिका अदा करेंगे ?`

स्त्री का अपनी यौन  शुचिता के लिए  अपराध बोध हो ,चाहे शुचिता बोध हो या  पवित्रता के प्रति नकार का आग्रह  .मुझे पूरा विश्वास है कि ये कहनियाँ  स्त्री में आत्म सम्मान व अस्मिता का बोध जगाने में सक्षम हैं . आज स्त्री केवल पुरुष की आँखों में प्यार या  अपने सौंदर्य के बखान के प्रति आग्रही नहीं  है बल्कि वह अपने मन में आदर व सम्मान देखना चाहती है जो कि उसे मालिक नहीं    एक साथी दे सकता है.

इन खंडों में कुछ स्त्री  देह के इर्द गिर्द कहानियाँ  है ,इसके विषय में आप क्या कहेंगी ?
इनमें सबसे अधिक तीव्र बोध देह को लेकर है क्योंकि स्त्री को देह से इतर देखा नहीं  जाता .  दक्षिण की मुस्लिम स्त्रियां अपने समाज की रुढ़ियो ,और परंपराओं की विकृतियों पर खुलकर प्रहार करती हैं .मेरे खयाल से ये स्त्रियों के लिए प्रेरणादायक है .स्त्री  आज मर्द बनने की इच्छा नहीं पालती.वह धर्म ,चमत्कार व अंधविश्वासों के इस बोझ को ढोने से इनकार कर रही है .वह जानना चाह रही है जिस कोख से पुरुष ने जन्म लिया  है उसी कोख को वर्जित कहने का राज़ ,उसके सौंदर्य को मोहमाया का जंजाल क्यो कहने लगा है , उसी अंग को गाली बना देने का राज़ .
क्या इस सन्दर्भ में पुरुष अहम आड़े नहीं आयेगा ?

आता तो है ही, बदलाव भी दिखाई दे रहा है.भारतीय स्त्रियां हजारों ग्रंथियों से ग्रस्त हैं लेकिन उससे बड़ा सच है कि पुरुष का अहम  हीन  भावना से उत्पन्न है .खंड -2 में अनेक कहानियों में भी स्त्री की हीन भावना  पुरुष दंभ की व्याख्या करने की कोशिश की है .

सोनी सिंह की कहानी एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने वर्जित कर दी थी आपने उसे खंड तीन में प्रकाशित किया  है .
“हां,वह् सोनी सिंह की `योनि कथा `है व वोल्गा की तेलुगु कहानी `अयोनि `है जिसमे कहानी की नायिका बचपन में सामूहिक बलात्कार से गुजरती है  .वह् कातर होकर प्रश्न करती है कि क्या स्त्री सिर्फ़ योनि है .  दोनों कहनियाँ  चौंकाने वाली है व स्त्री सोच को नई ज़मीन प्रदान करती  है   .अयोनि .`कहानी की नायिका का एक और प्रश्न है ,“`क्या योनि  रोटी है ?

अंत में फिर पुस्तक `पोज़ीशान ऑफ़ विमान इन इंडियन सोसायटीज “की बात कर रही हूँ    .मैंने इसे वड़ोदरा के गायकवाड़ राजघराने के इन्दुमति महल, वड़ोदरा के पुस्तकालय में  धूंढ़ने की कोशिश की .आश्चर्य अपनी ही महारानी की पुस्तक ये सम्भाल कर रख  नहीं पाया  था.ये पुस्तक मुझे मिली महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय  के पुस्तकालय में .इससे क्या समझा जाए स्त्रियों का लेखन भूतकाल में एक निरर्थक  उपेक्षित  काम था लेकिन आज के समय में क्या कोई पुस्तकालय होगा जिसमे स्त्री विमर्श की पुस्तक ना हो ? साहित्य में अब तक मान्यता रही है कि स्त्री लेखन का आरंभ विश्व में पंद्रहवी या  सोलहवीं शताब्दी से हुआ था लेकिन मुझे इस पुस्तक से ही पता लगा कि ग्यारहवीं शताब्दी में दो जापानी स्त्रियों मुरास्की दो शिकिबु ने एक उपन्यास `जेजी मोनोगावरी ` व शोनेगौन ने सामाजिक विषय पर एक अभूतपूर्व  पुस्तक लिखी थी` मकुरानो जोशी `ये जानकारी इसलिए भी प्रामाणिक है क्योंकि महाराजा साल में अधिकतर विदेश घूमते रहते थे .तो ग्यारहवीं शताब्दी से आरंभ हुए स्त्री लेखन का मुकाम कहाँ   तक पहुँचा है ?रमणिका जी व उनकी टीम को एक बार फिर बधाई उनके  प्रयास से औरत कितने हाशिये उलांघती मुख्य धारा में अपने पैर जमाये खड़ी हो सकेगी क्योंकि  तक इनके प्रयास से बाईस भाषाओं की स्त्री विमर्श कथाकारों की कहानियां हिंदी में अनुवादित होकर प्रकाशित  हो चुकीं हैं जिनमें छ;भाषाएँ उत्तरी पूर्व की शामिल हैं। उर्द वह  अपना विकास ,अपनी सोच  स्त्रीवाद की ` रिले रेस `में पुस्तक के रुप में अपना `बेटन `अगली पीढ़ी  को सौपती जा रही है .

तस्वीरें गूगल से साभार 

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“मैना का ख़ून” और ज़ूबी मंसूर की अन्य कविताएं

ज़ूबी मंसूर


पेशे से पत्रकार. वॉइस ऑफ़ इंडिया, महुआ न्यूज़ बिहार और p7 न्यूज़ में अस्सिटेंट प्रोड्यूसर रही हैं.

“मैना का ख़ून”

13 बरस का साल था
सफ़ेद पहनने की
उकताहट से भरा
कुछ टूट कर गिरा था
योनि से
लाल थक्के सा
बारीक कत्थई सा
छुपाने की होड़
ऐसी उमड़ी
अगले महीने तक
बासी महकती रही मैं
जो कुछ भी बह रहा था
उन सात दिनों में
नाखूनों के पोरों में
एक इंच की भीगी उंगली तक
मरे मूस सी महकी थी
मेरी नाक
माहवारी है या मैना का ख़ून !
तब नहीं समझी थी
अब ख़ूब समझती हूं
क्योंकि अब
उन दिनों में
जांघों के बीच
‘दो पर’ मैं ख़ूब
भलीभांति लगाती हूँ
और, मैना की तरह

लाल नदी के ऊपर
मोनो-पॉज़ तक
उड़ना चाहती हूं!

“आस्तित्व”

फिर मुझे रचना होगा
पहले प्रेम रचा था
फिर गर्भ
अब बीज रचूंगी।


“झूठा-सच्चा पुरुषार्थ”

मुझे पुरुष बनने के लिये
क्या करना होगा?
योनि की दो फांको को
जोड़ कर उसकी नाक लंबी
करनी होगी।
स्तन काटने होंगे।
और तुम…
‘शिवलिंग’ को तोड़ पाओगे!
या फिर
अल्लाह का ‘अलिफ़’!

(2)
ईश्वर भी तो
पुरुष है
ये अभिमान
से अति भी है
कुछ तुम्हारे भीतर
तुम सब छोड़ सकते हो
अपना पुरुषार्थ नहीं!

(3)
हमारे बीच
बस जिव्हा रहने दो
यह आदि है और
सत्य का औजार भी।

“ख़ुश-फ़हमी का बिस्तर”

हमें ये ख़ुशफहमी
हो चुकी है कि
हम इश्क़ के मक़ाम पर हैं
और ये मक़ाम ही
हमारा बिस्तर है!



“नज़्म नहीं लिखती”

सोचती हूं
साइंटिफ़िक सी एक नज़्म लिखूं
जिसे वो काट ना पाए…
क्लासिक सी भी एक नज़्म
जिसमे उलझ सा जाए…
फिर सोचती हूं
नज़्म की जगह
क्यों ना लिख दूं सुरंग
जिसमे वो खो जाए…
फिर सोचती हूं
कुछ भी लिख दूं
बन जाएगी ख़ुद-ब-ख़ुद नज़्म
उसका आना नज़्म से कम थोड़ी है
अपने आप कहां आता है वो
नुज़ूल होता है
हद शिकवा.., कितनी शिक़ायत
सुनकर सुनता तो
इस बार नज़्म नहीं विसाल लिखती..!

“प्रेम ढूंढने का आलस्य”

तुम्हारा…
प्रेम ढूंढने का आलस
मुझे निस्तेज
कर रहा है
निःस्वाद
कर रहा है।
शब्दों की धुरी
पर घूमता
तुम्हारा अतीत
उचित व्यवस्था के
नियम तोड़ रहा है।

तस्वीरें: साभार गूगल


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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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कॉ. कुंती देवी : जन-संघर्ष का पर्यायवाची नाम

संतोष सहर

भाकपा-माले के दिवंगत महासचिव कामरेड विनोद मिश्र अक्सर कहा करते थे – “दिल्ली का रास्ता जहानाबाद से होकर जाता है।”

पिछले साल मई माह के आखिरी हफ्ते मैं जहानाबाद में ही था। इस दौरान मैंने नोन्ही-नगवां, दमुहाँ-खगड़ी और इस्से बिगहा नाम के गांव-टोलों की यात्रा की, मगही-उर्दू के शायर वसी अहमद ‘तालिब’ की रचनाओं को हासिल किया और साथ ही का. कुंती देवी से एक संक्षिप्त बातचीत भी की।

का. कुंती देवी अभी हो रहे जहानाबाद विधान सभा उपचुनाव में भाकपा-माले की प्रत्याशी हैं। वे इस जिले में पिछले 40-42 वर्षों से जारी भूमिहीन दलित गरीबोँ के आंदोलन का एक मजबूत स्तंभ भी हैं। कुंती बिहार में महिलाओं के आंदोलन का वह चेहरा हैं जो इस आंदोलन की कई विशिष्टताओं को उजागर करता है।
जहानाबाद शहर से पश्चिम करीब 3 मील की दूरी पर है इस्से बिगहा गांव। गांव के प्रवेश मार्ग पर एक स्मारक है। एक शहीद स्तंभ जिसकी पृष्ठभूमि में ताड़ का एक खूबसूरत पेड़ है। बच्चा पेड़ हर साल लपकते हुए बड़ा होता जाता है। स्तंभ पर करीब दो दर्जन से अधिक शहीदों के नाम दर्ज हैं। बिंद व कहार अतिपिछड़ी जातियों की आबादी वाले इसी टोले में शिवकुमारी (कुंती) का
जन्म हुआ। साल 1967 में यानी जिस वर्ष नक्सलबाड़ी में ‘वसन्त का वज्रनाद’ सुनायी पड़ा था।

तस्वीर निकोलस जौल

अपने समय में भाकपा के जुझारू नेता बुद्धदेव बिंद और सोमरिया देवी की सात संतानों में सबसे बड़ी हैं कुंती। दो छोटे भाई, चार छोटी बहनें। पिता भाकपा के प्रखंड नेता थे, मैट्रिक पास थे और अपनी थोड़ी-बहुत जमीन पर खेती करते थे।

पढ़ने की लगन और पिता की दी हुई जमीन पर ही गांव का स्कूल होने के बाद भी उन्हें स्कूल नहीं भेजा गया। तब उस टोले में इसका चलन नहीं था। पांच बेटियों को निबटाना था इसलिए पिता ने बचपन में ही उनकी शादी भी कर दी, पटना जिले के भरतपुरा के नजदीक सरकंडा गांव में।

पढ़ें: बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

विस्टौल और कुम्हवां दो पड़ोसी गांव हैं जहां राजपूतों की आबादी है। इन लोगों का दबदबा व क्रूर दमन चलता था। इन गांवों समेत आसपास के गांवों के गरीब इसके शिकार होते थे। इस्से बिगहा के गरीब लोगों के बीच इसके खिलाफ एकता रहती थी। लेकिन भाकपा इस दबदबे व दमन के खिलाफ कारगर लड़ाई लड़ने से हिचकती रही। 80 दशक के उत्तरार्ध में कुंती के पिता समेत अन्य गरीबोँ का भाकपा से मतभेद व मोहभंग शुरू हुआ।
कुंती बताती हैं ‘1979 से मेरे गांव में कुछ दूसरे लोगों का आना-जाना शुरू हुआ। वे लोग अक्सर रात में आते। गांव-घर में बैठकेँ होने लगी। मैंने जब पिता से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये नक्सलाइट लोग हैं। जमींदारों से यही लोग लड़ते हैं। हमें तंग-तबाह करनेवाले बिस्टौल-कुम्हवां के राजपूत लोगों से यही लड़ेंगे। उनके आने-जाने से गांव में नई सरगर्मी शुरू हुई। मैं भी बाहर से आनेवाले लोगों के लिए खाना जुटाने-बनाने का काम करने लगी। बैठकों में महिलाओं को नहीं बुलाया जाता। लेकिन, मैं लुक-छिपकर बैठकों की बातें सुनने लगीं। तब ज्वाला और सुधीर जी जो पटना जिला के थे, नक्सलाइट पार्टी के नेता थे। वे ही हमारे गांव में आते थे।

जल्दी ही सिकरिया और बिस्टौल गांवों में मजदूरी की लड़ाई छिड़ गयी। पुलिस भी रोज-रोज आने लगी। गांव में लगातार बैठकें होने लगी और महिलाओं की भी बैठक बुलायी जाने लगी। मैंने यह काम अपने हाथ में ले लिया। गांव की नेता बन गयी।

इसी बीच एक दिन, तीन बजे दिन में ही गुंडों और नक्सलाइट दस्ता के बीच भिड़ंत हो गयी। दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं। देर-सबेर पुलिस पहुंचेगी यह हम सबको पता था। सो, मैंने महिलाओं को संगठित कर लड़ाई में उतारने का जिम्मा लिया। मैंने रातों-रात बिस्टौल, रामदेवचक, मखदुमपुर आदि गांवों में गरीब टोलों में महिलाओं की बैठक की। उन्हें बताया कि पुलिस जब आएगी तो उसका प्रतिरोध कैसे करना है। पुलिस 3 बजे भोर में आयी, दर्जन भर गाड़ियों में लद कर और 20 गरीब लोगों को पकड़ कर ले जाने लगी। एक हजार से भी अधिक महिलाओं ने तुरत जुटकर चारों तरफ से पुलिस की गाड़ियों को घेर लिया। दो-तीन घण्टों तक यह संघर्ष चला। अंततः महिलाओं की ही जीत हुई। पुलिस को बैरंग वापस होना पड़ा। इस इलाके में ऐसा पहली बार हुआ था। इसका शोर चारों तरफ फैल गया।


सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

इसके बाद तो जहां कहीं भी सामंती धाक के खिलाफ और जमीन और मजदूरी के लिए संघर्ष छिड़ता या सभा-जुलूस होता में जाती। महिलाओं की बैठक कर उन्हें गोलबंद करती। लहसुना, पिरही (पटना) और कराय (नालंदा) में थाने के घेराव में भी शामिल रही। पिता ने तो कभी मना नहीं किया, लेकिन माँ डांट-फटकार और कभी-कभी पिटाई भी कर देतीं।’

1980 में बिस्टौल में 15-16 बीघा गैरमजरूआ जमीन दखल हुआ। उसके बाद कुंती ‘होलटाइमर’ हो गयीं – ‘महिला होलटाइमर!’ उनके गांव-घर के कई युवकों ने भी ऐसा किया। लेकिन, उनका ऐसा करना सहज नहीं रहा।

कुंती बताती हैं ‘तब गांव-घर में महिलाओं के पार्टी में काम करने को लेकर अच्छा माहौल नहीं था। अपने ही भाइयों, सगे-संबंधियों ने विरोध शुरू कर दिया। वापस घर में लौट आने के लिए पार्टी और मुझ पर दबाव डालने लगे। मेरी ससुराल व पति का भी विरोध सामने आया। गांव-जवार की महिलायें भी इसे अच्छी नजर से नहीं देखती थीं। पार्टी में काम करने वाले पुरुष तो योद्धा समझे जाते थे, लेकिन मैं?

मैंने हिम्मत नहीँ हारी और अपनी राह पर आगे बढ़ती रही। मेरी पहली शादी खत्म हो गयी। इस बीच 1981 में दिल्ली में आइपीएफ का स्थापना सम्मेलन हुआ। मैं उसकी तैयारी में भी लगी और शरीक भी हुई। बगाही गांव में मजदूरी की लड़ाई में जीत हासिल हुई। नोआवां, सरता, नौगढ़, इक्किल, सलेमपुर, सरैयां (रतनी प्रखंड) आदि गांवों में सामंती धाक को तोड़ते हुए जमीन-मजदूरी की लड़ाई जीती गई। सरता गांव में तो जिलाधिकारी को आकर गरीबों से माफी तक मांगनी पड़ी। शकुराबाद थाना पुलिस को भी झुकना पड़ा। गरीबों का साहस बढ़ा। शासन-प्रशासन का भय दूर हुआ।’

1983 में वे अरवल लोकल कमेटी में काम करती थीं। चर्चित अरवल जनसंहार के वक्त कुंती अरवल में ही थीं और इसके खिलाफ हुए जनांदोलन का नेतृत्व कर रही थीं। 1986 में टेकारी (गया) गयीं जहां एमसीसी का आतंक फैला हुआ था। दमुहाँ-खगड़ी में जब कॉ. विद्रोही ने भागवत झा आजाद के मुंह में कालिख पोती, वह उनके साथ थीं। गिरफ्तार भी हुईं लेकिन थाना हाजत से ही रिहा हो गईं। 1989 में वह फिर सेअरवल में काम करने लगीं।

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1985 में जब ‘ जनवादी महिला मंच’ (आज ऐपवा) का निर्माण हुआ, कुंती इसका जिला सचिव बनीं। मगध क्षेत्र में मीना, महेन्द्री, सावित्री, शीला, सामफूल, शांति, कलावती और सर्वोपरि शहीद कॉ. मंजू आदि समेत माले की जो महिला कतार बनी, वे उसकी अगुआ रहीं।

1987 में कुंती और ज्वाला ने अपनी मर्जी की शादी की। वे दोनों लम्बे समय से साथ ही काम कर रहे थे। जहानाबाद के बदहर गांव में जहां उन्हें पार्टी द्वारा दखल की गई जमीन का एक हिस्सा मिला था, उन्होंने अपना आशियाना बनाया।

कुंती देवी का घर

1990 में मखदुमपुर, 2005 फरवरी में घोषी व अक्टूबर में जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र से वे आइपीएफ-माले का प्रत्याशी रहीं। आइपीएफ व ऐपवा की राज्य कमेटियों में भी रहीं।1992 के बाद कुछ वर्षों तक उलझन व ठहराव का दौर भी आया। लेकिन, वे फिर से सक्रिय हुयीं। कुछ दिनों बाद कॉ. विनोद मिश्र नहीं रहे। उनके निधन के शोक को संकल्प में ढालते हुए उन्होंने फिर वही पुराना तेवर हासिल कर लिया। 2003 में जहानाबाद-भाग 2 से जिला पार्षद निर्वाचित हुयीं। 2004 में माले की राज्य कमेटी सदस्य बनीं।

जेल, मुकदमें और जानलेवा धमकियां – कॉ. कुंती बिहार में क्रांतिकारी महिला आंदोलन का वह ताकतवर चेहरा है, जिनको इनकी जरा भी परवाह नहीं रही।1967 में जन्मी कुंती ‘वसंत के वज्रनाद’ को सच्चे अर्थों में प्रतीकित करती हैं। वह बिहार के गरीबों व महिलाओं का एक खरा स्वर हैं। उनके सपनों, संघर्षों व उपलब्धियों  की वास्तविक छवि हैं।

संतोष सहर भाकपा-माले से जुड़े र्हैं. 

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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दिमाग की सलाखों में कैद स्त्री

किरण मिश्रा


प्राचार्या डिग्री कॉलेज कानपुर सम्पर्क: kiranpmg@gmail.com

किरण मिश्रा 


 उन्नीस सौ साठ के दशक से या यूं कहें कि उत्तर-आधुनिकता के आगमन से विश्व के सामाजिक,राजनितिक चिंतन और व्यवहार में कुछ नए आयाम जुड़े है। परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष से मानव समाज के सामाजिक जीवन एवं व्यवहार में बदलाव होता जा रहा है। सामाजिक व्यवहार तथा मूल्यों में हो रहे बदलाव अच्छे भी है और नहीं भी । इसका निर्णय जितना अच्छा भविष्य देगा उतना वर्तमान नहीं।

इस बदलते हुए समय का सबसे ज्यादा अगर किसी पर प्रभाव पढ़ा है तो वो है स्त्री। आज स्त्री आधुनिकता के बाहरी परिवेश में ढली है परन्तु अपने दिमाग की सलाखों में वो आज भी कैद है इसलिए वह सहज और शांत नहीं है.  वो अपनी स्वतंत्रता को अपना आत्मविश्वास नहीं बना पा रही है। स्त्री – सशक्तिकरण के नारे सिर्फ जुमले बन हवा में तैर रहे है और कुछ प्रश्न अनुत्तरित हैं कि स्त्री समाज के लिए क्या है?  समाज उसे कैसे देखता है? क्या स्त्री -पुरुष समान हैं ? या समाज स्त्री को द्धितीयक मानता है या आज भी गुलाम या दासी मानता है। क्या समाज स्त्री को लेकर आज भी कुंठित है ?ये यक्ष प्रश्न है इन सवालों के उत्तर के साथ ही समाज में मनुष्यता स्थापित हो जाएगी । इसलिए यह जरुरी है कि समाज इन सवालों को हल करे और स्त्री पुरुष संतुलन को कायम करे।

स्त्री सृजनकर्ता रही है । हमेशा से उसने जीवन को रचा है उसे सवारा है। सभ्यता का मानवीय विकास स्त्री की ही देन है । उसने गुलामी और प्रताड़ना से हमेशा समाज को मुक्त कराया है, उसने मानव जीवन का रूपांतरण कर समाज को सभ्य बनाया है।(सम्राट अशोक कलिंग युद्ध और गोप)।

आज बदलते हुए समय में सारे समाज की जिम्मेदारी बदल रही है इस बदलते समाज में स्त्री की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है उसका अपने प्रति जिम्मेदार होना ऐसा जिम्मेदार होना जिसमे भ्रम न हो । उसे संतुष्टिकारण का शिकार नहीं होना है उसे अपने दोषों और कमजोरियों पर भी नजर रखनी होगी और अपना आंकलन खुद ही करना होगा। उसे खबरदार भी रहना होगा कि वह  प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल  तो नहीं हो रही है। समाज में अपने स्थान बनाने के लिए अपने संघर्ष को  देह के संघर्ष में नहीं बदल देना है और उन स्त्रियों से भी सावधान रहना है जो देह-विमर्श के नाम पर स्त्रियों की जिन्दगी को और कठिन बना रही हैं.

विभिन्न सम्प्रदाय,धर्म,जाति में फैले हमारे देश में स्त्रियों के संघर्ष बहुत अलग-अलग हैं. उनके शोषण की जड़ें गहरे तक हैं. बेशर्म जड़ो को निकाल कर समाज को अपने लिए उपयोगी बनाना है ताकि उस पर संस्कृति, मानवता, नैतिकता का पौधा लहलहा सके और स्त्री स्वतंत्रता के फल उस पर आ सके। अगर स्त्री हमारे देश में फैली समस्याओं, यथा जाति,धर्म आदि को नजरंदाज करती है तो उनकी मुक्ति की आस बेमानी होगी।

स्त्री को अपने संघर्ष में चाहे घर हो या बाहर स्वावलंबी  होना होगा। उसे चाहे पारिवारिक शोषण को तोडना हो या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना हो,  दोनो ही सूरत में परिवार में पारिवारिक लोकतंत्र व कार्य स्थल में अपने हुनर का इस्तेमाल करना होगा ।

स्त्री का सवतंत्रता के संघर्ष का लक्ष्य उसके चरित्र की दृढ़ता से मिलेगा, वह तभी अपने साथ तभी न्याय कर पाएगी जब  अपने स्त्री होने को पीछे कर मनुष्य होने के बोध को जगाएगी।अन्तत: इस संकटग्रस्त मानवीय संबंधो के समय जबकि रिश्ते पल-पल बदल रहे हैं,  लोग भ्रमित हैं, उलझे हैं,   परेशान हो मशीन बन भाव और संवेदना खो रहे हैं. विगत की भूल ने रिश्तो की नीव कमजोर की है ऐसी दशा में स्त्रियों को मानवीय संबंधो को पुन:स्थापित करने में अहम् भूमिका निभानी होगी उसे अपनी अंतरात्मा की कसौटी  पर खुद अपने को, पुरुष को और उन बच्चों को कसना होगा जो कल पुरुष बन स्त्री-पुरुष के संबंधो को जीयेंगे।लेकिन जीवन मूल्य को चलने के लिए गति को लय में चलन ही होगा.  पुरुष गति है शिव है और स्त्री लय है, शक्ति है.  शिव बिना गति के शव है और स्त्री बिना लय के शक्तिहीन अर्धनारीश्वर के रूप में पुरुष समानताओं और विपरीतताओं से परे सृष्टि को  गति और लय देते है तभी सुन्दर और शांत स्रष्टि की रचना हो सकती है।

ये सम्बन्ध संतुलित हो,  जीवन में गुणवता बनी रहे समाज में सकारात्मकता और सृजनात्मकता बनी रहे इसलिये ये जरुरी है कि स्त्री हर बार नए सिरे से खुद को और पुरुष  के साथ उसके रिश्ते को परिभाषित करती रहे। आने वाली सदी में स्त्री-पुरुष के संबंधो में उर्वरता बनी रहे और बुद्ध के दर्शन, सम्यक जीवन का आधार, स्त्री-पुरुष जीवन का आधार हो हम ये कामना तो कर ही सकते है।
तस्वीरें: साभार गूगल

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मर्दोत्सव और स्त्रीविलाप बीच होलिका का लोकमिथ

सुशील मानव


स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन तथा एक्टिविज्म. सम्पर्क: susheel.manav@gmail.com
फोन- 6393491351

अवध वह क्षेत्र है जहाँ से राम की कट्टर मर्यादा पुरुषोत्तम छवि के साथ साथ आर्य संस्कृति का पुंसवाद न सिर्फ खड़ा होता है बल्कि फैलते फूलते संपूर्ण भारत एवं श्री लंका तक छा जाता है। ये आर्य पुंसवादन न सिर्फ सभी स्थानीय व मूल संस्कृतियों को छल-बल-बर्बरता से लील लेता है अपितु उनके विनाश के उत्सव का रूपक भी रचता जाता है। ये पुरुषवादी उत्सव क्रूरता बर्बरता और रक्तपात के अपने मूल भावों को समेटे हुए अपनी सदियों की यात्रा में रुपांतरित होकर, धार्मिक रूप धरकर न सिर्फ लोगों के अवचेतन में रच बस गए अपितु उनकी चेतना व विवेक को कुंठित करके, हिंसा वबर्बरता को ग्लोरीफाई करते हुए उनकी चेतना में बैठकर उनके भावबोध को परपीड़क आनंदमयता में अनुकूलित किए हुए हैं।

होलिका, ढूढा, पूतना, सूपर्णखा और ताड़का जैसी तमाम असुर संस्कृति की वीर योद्धा नायिकाओं की बर्बरतापूर्वक हत्या करके इन्हें खलनायिका और मनुष्य शिशुओं को खाने वाली राक्षसी के तौर पर पुरुष संस्कृति द्वारा दुष्प्रचारित करके जनमानस में स्थापित कर दिया गया। होलिका दहन के उत्सवधर्मिता के मूल में असुर संस्कृति की रक्षक वीरांगना होलिका की छलपूर्वक हत्या की पुरुषवादी कथा छद्म का महिमामंडित पाठ है। जबकि पूर्ण तर्क और तथ्य के साथ मूल सत्य इसके ठीक उलट संवेदनशील और मानवीय है। यहाँ एक बात ध्यान देने की है कि आर्य मर्द-संस्कृति के अलावा दुनिया की किसी भी संस्कृति में जिंदा या मुर्दा व्यक्तियों को आग में जलाने की किसी भी प्रथा का कोई जिक्र नहीं मिलता है। अतः हिरण्यकश्यप द्वारा अपने पुत्र प्रहलाद को लेकर बहिन होलिका को आग में प्रवेश करने की आज्ञा देने का पौराणिक दावा एक गल्प मात्र है।

होलिका दहन का सबसे सटीक व तार्किक व्याख्या ज्योतिबा फुले करते हैं। वो“गुलामगीरी”  किताब में लिखते हैं, ‘वराह के मरने के बाद द्विजों का मुखिया नरसिंह बना। सबसे पहले उसके मन में हिरण्यकशिपु की हत्या करने का विचार आया। उसने अपने एक द्विज शिक्षक नारद के माध्यम से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के अबोध मन पर अपना धर्म-सिद्धांत थोपना शुरू किया। इसकी वजह से प्रह्लाद ने अपने हरहर नाम के कुलस्वामी की पूजा करनी बंद कर दी। प्रह्लाद पर द्विज रंग ऐसा चढ़ा कि हिरण्यकशिपु की उसे समझाने की सारी कोशिशें बेकार गयीं। तब नरसिंह ने प्रह्लाद को अपने पिता की हत्या करने को उकसाया। पर ऐसा करने की प्रह्लाद की हिम्मत नहीं हुई। अंत में नरसिंह ने अपने शरीर को रंगवाकर मुंह में नकली शेर का मुखौटा लगाकर अपने शरीर को साड़ी से ढँककर प्रह्लाद की मदद से हिरण्यकशिपु के महल में एक खम्बे की आंड़ में छिपकर खड़ा हो गया और जब हिरण्यकशिपु आराम के लिए पलंग पर लेटा, तो शेर रूप धरे नरसिंह उस पर टूट पड़ा, और बखनखा से उसका पेट फाड़कर उसकी हत्या कर दी।हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद नरसिंह सभी द्विजों को साथ लेकर अपने मुल्क भाग गया। जब क्षत्रियों को पता चला तो वे आर्यों को द्विज कहना छोड़कर ‘विप्रिय’ (अप्रिय, धोखेबाज़, दुष्ट) कहना शुरू कर दिया। बाद में इसी ‘विप्रिय’ शब्द से उनका नाम ‘विप्र’ पड़ा।
हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद उसकी बहिन होलिका ने आर्य देवों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया साथ ही प्रह्लाद को भी चेताया कि ब्राह्मण संस्कृति समस्त असुर संस्कृति के विनाश का दर्शन है। होलिका देवों और ब्राह्मणों के रास्ते की अंतिम बाधा थी, जिसे हटाकर ही वे प्रह्लाद के मुखौटे से ब्राह्मण-राज्य कायम कर सकते थे। अत: एक दिन अवसर पाकर लाठी-डंडों से लैस ब्राह्मणों ने होलिका को जिन्दा जलाकर मार डाला। उसकी मौत पर ढोल-नगाड़े बजाए गए। आज उसी तर्ज पर हिंदू हर वर्ष होलिका के रूप में होली जलाकर ब्राह्मणवाद की विजय का जश्न मनाते हैं।

मैं अवध क्षेत्र के एक छोटे से गाँव से ताल्लुक़ रखता हूँ जो फूलपुर तहसील के अंतर्गत आती है। बचपन में होलिका दहन के दिन पूरे गाँव में होलिका लगाने वाले लोगों को हर घर से उपली, लकड़ी सरपट, पुआल, ऊख के पाती बटोरते माँगते देखते आया हूँ। उनकी ऊर्जा और तल्लीनता देख देखकर मेरा मन रोमांचित और उत्सवधर्मी हो उठता। उस दौरान कई बार घर में जिद करता कि मुझे भी होलिका दहन देखना और उसमें शामिल होना है लेकिन माँ या दादी मुझेकभी भी इसमें शामिल नहीं होने देती थी। हाँ, होलिका दहन के अगली सुबह माँ के साथ होलई जुड़वाने की रस्म में शामिल होने ज़रूर जाना होता था। दादी हमेशा जाने से पहले ही हम बच्चों को समझा देती थी कि होलई से बुझी हुई उपली ही ले आना, भूलकर भी होलई की जलती आग घर में मत लाना वर्ना सालभर वो आग जिलाए रखनी होगी। दादी के कहे उस वाक्य का अर्थ आज मैं ये पाता हूं कि शायद जलती आग बदले की आग का रूपक रही होगी जिसे पूरे साल जिंदा रखना पड़ता हो शायद। ख़ैर वहाँ गाँव की तमाम दूसरी स्त्रियों के साथ माँ परिक्रमा कर करके होलई जुड़वाती, साथ ही स्त्रियाँ कोई गीत भी गाती थी जिसमें होलई माई या होलई बहिनी का बार बार टेक होता। मैं इसे होलई जुड़ावन गीत कहता।

कहते हैं ना जहाँ से दमन का सबसे क्रूर आयोजन होता हैं उसका प्रतिरोध भी वहीं से आकार लेता है। होलिका दहन की बर्बर मर्दोत्सव के बाद सुबह गाँव की बड़ी बूढ़ी स्त्रियां मातम मनाकर प्रतिरोध रचती हैं। पुरुष जहाँ होलिका को आग के हवाले कर क्रूरता को खुशी में तब्दील कर गाते बजाते नाचते जश्न मनाते हैं वहीं सुबह स्त्रियाँ करुणा दया संवेदना से सराबोर होकर सूप और गेडुआमें पानी लेकरहोलिका को जुड़वाती हैं हमारे यहाँ इसे होलिका बुझाना या होलका जुड़वाना कहते हैं इस तरह स्त्रियां दया करुणा संवेदना का भाव उपजाती हुई मनुष्यता के भावबोध की रक्षा करती हैं और लौटते हुए रास्ते में जो भी पुरुष मिलता है उसका नामले लेकर बहुत कच्ची गालियाँ देती हुई घर लौटती हैं। फिर उस पुरुष का उनसे चाहे कोई भी रिश्ता हो वो उसकी परवाह उस पल नहीं करतीं। ये गारी एक तरह से स्त्रियों का हथियार होता है जिसके सहारे वो श्रेष्ठता का दंभ भरने वाली पुरुष संस्कृति को ज़लील करती हैं। होलई जुड़वाने के बाद स्त्रियां घर जाती हैं (विशेषकर पिछड़ी और दलित समुदाय की महिलाएं) और फिर अपने अपने घरों से पोतनउरी (जिसमें पीली चिकनी मिट्टी जिसे पिरोड़ कहा जाता का घोल होता है जिससे कच्ची मिट्टी के चूल्हे पोते जाते हैं) लिए गाँव भर के मर्दों को खदेड़ खदेड़ कर उनपर करिखा,गोबर,कचड़ा, चँहटा फेंक फेंककर उन्हें कुरूपित करती हुई गरियाती हैं। कह सकते हैं एक तरह से अप्रिय चीजों को फेंककर पुरुषों को अपमानित करती हैं। आखिर में थक हारकर मिट्टी की पोतनउरी फोड़ फोड़कर अपने अपने घरों को लौट जाती हैं और घर पहुँचकर लट खोलकर नहाती हैं। अमूमन पोतनउरी किसी अपने की मौत होने पर ही फोड़ी जाती है। इस तरह पोतनउरी फोड़कर स्त्रियाँ होलिका से अपने बहनापे के संबंध का रूपक रचती हैं।

होलिका एक लोकमिथ है और समूचे भारत में होलिका से संबद्ध अनेक मानवीय प्रथाएं मूलनिवासियों से जुड़ती हैं होलिका दहन के बाद होली का भाडू, ढूंढ़, गैर नृत्य (युध्द नृत्य ) और जमराबिज,तीन दिन बाद उठावना, 12 दिन का शोक, शोक तोड़ने के रूप में रंग तेरस ये सब रस्मे अपने पीछे एक लोक-इतिहास समेटे हुए है। होली के एक माह पूर्व से ही होलिका विवाह के गीत कई आदिवासी गांवो में गाए जाते है तीये की बैठक की तरह होली जलने के तीसरे दिन उठावना किया जाता है!होलई जलने के बाद ठंडा किया जाता है! कहीं-कहीं होलई की आग ले जाकर बदले की आग के रूपक के तौर पर वर्षभर सम्हाल कर रखा जाता है ! बच्चो को जन्म बाद इसी दिन ढ़ूढा जाता है!हत्या का बदला लेने के प्रतीक हथियारो के साथ होली पर गैर नृत्य (एक तरह से युध्द की तैयारी का नृत्य) खेला जाता है!दरअसल होलिका दहन की पृष्ठभूमि में दो संस्कृतियों आर्य (पितृ) और अनार्य (मार्तृ)) का संघर्ष है। दरअसल हिरण्यकश्यप की हत्या हो जाने के पश्चात उनकी बहन होलिका अपने भाई के मौत का बदला लेने और प्रहलाद को दूर ले जाने के उद्देश्य से आई थी, जिसे आर्य देवताओं ने पकड़कर आग के हवाले कर दिया। यहाँ ध्यान देने की बात ये है कि प्रहलाद विष्णु का पुत्र था। इंद्र द्वारा रानी कयादु (हिरष्यकश्यप की पत्नी) का अपहरण करके विष्णु के पास ले जाने के बाद से ही दोनों केविवाहेत्तर संबंध थे। इस तरह प्रहलाद असुर राज्यमें विष्णु की संस्कृति का रिप्रेजेंटेटिव था और उसी के मिलीभगत के दम पर विष्णुने हिरण्यकश्यप की हत्या की थी।

इसके अलावा होलिकादहन से एक और मूल निवासी असुर स्त्री योद्धा की हत्या का ब्राह्मणवादी प्रसंग जुड़ता है। इस प्रसंग में असुर स्त्री ढूढा की हत्या के लिए उसके साथ अश्लीलता, उसका शीलाघात और हैवानियत को पुरोहिती उपाय बताया गया है ! कहानी यूँ है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पूर्वज राजा रघुके समयकाल में’ढूढा’ नामक एक राक्षसी  हैजोकि माली नामक राक्षस की कन्या है और बड़ी मायाविनी है तथा अपनी इच्छानुसार रूप बदलने में शातिर है। वह बच्चों का मांस खाने की आदी है। जिसे शिव ने वरदान दिया है कि उसे देव, मानव आदि नहीं मार सकते हैं और न वह अस्त्र शस्त्रया जाड़ा गर्मी या बारिश से मर सकती है। पुरोहित वशिष्ठ द्वारा राजा रघु को ढूढा की हत्या का उपाय बताया गया कि फाल्गुन की पूर्णिमा को जाड़े की ऋतु समाप्त होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है, तब लोग हँसें एवं आनन्द मनायें, बच्चे लकड़ी के टुकड़े लेकर बाहर प्रसन्नतापूर्वक निकल पड़ें, लकड़ियाँ एवं घास एकत्र करें, रक्षोघ्न मन्त्रों के साथ उसमें आग लगायें, तालियाँ बजायें, अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा करें, अट्ठहास करें और प्रचलित भाषा में भद्दे एवं अश्लील गाने गायें, इसी शोरगुल एवं अट्टहास और अश्लीलता तथा होम से वह राक्षसी मरेगी। जब राजा रघु ने यह सब किया तो राक्षसी मर गयी और वह दिन ‘अडाडा’ या ‘होलिका’ कहा गया।

होलिका दहन के मूल में जो एक बात प्रमुख है वो ये कि, जो पुरुषों के लिए उत्सव है वही स्त्री के लिए दुख है मातमहै, विलाप का सबब है। पुरुष जहाँ होलिका जलाकर नाचते गाते हैं वहीं स्त्रिया विलाप करती हैं, गारी गाती हैं और होलिका को जुड़वाती हैं। पुरुषोत्सव आर्य ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिनिधित्व हैं जबकि स्त्रियों का मातमसदियों से उपेक्षित असुर संस्कृति का पीड़ित आख्यान है।
तस्वीरें: साभार गूगल

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होलिका जुड़वाती स्त्रियाँ

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सुशील मानव


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क्या आपको पता है कि एक इलाके में स्त्रियाँ होलिका जलाये जाने पर विलाप करती हैं. मर्दानी संस्कृति को धिक्कारती हैं. और मर्दाने जोश के साथ उसे जलाने वाले हर साल जलाते हैं, स्त्रियाँ हर साल विलाप करती हैं. सुशील मानव की ये कवितायें आपको स्त्रियों के इस धिक्कार और मर्दों के लम्पट उत्साह का दृश्य बुनती हैं. 
    
  (1)
आधी रात जमावड़ा लगाए पुरुषों ने फूँकी थी जहाँ होलई
और मनाते रहे उत्सव झाँझ-मजीरा-ढोल बजाते पूरी रात
वहाँ भोर भए छाती पीट विलाप रहीं स्त्रियां
मना रहीं हैं मातम गाँव भर की औरतें
जुड़वा रहीं होलिका कारन कर-करके

हाय! हाय! होलिका, हा! बहिनी हा! होलिका हो!
हाय! बहिनी फूँके तापे घेरकर तुमको हत्तियारे!
आग लगे इनके बल में यश में पौरुष में
आग में झोंके जैसे तुमको होलई बहिनी ये
जरि-बरि जाए ऐसे सत्ता इनकी, इनकर गुरूर

फिर दोनों आँखों और लोटे में भरे हुए जल
परिक्रमा कर करके जल गिराती होलई जुड़वाती हैं स्त्रियाँ
जुड़आ जुड़आ हे होलिका बहिनी जुड़आ
जुड़आ जुड़आ हे होलिका बहिनी जुड़आ
शिश्नित वजूद ढोतीं हम विक्षिप्त स्त्रियाँ
तुम्हें जुड़वातीं हैं, हे बहिनी जुड़ाओ
कि अकेली तुमहीं नहीं जली हे बहिनी होलिका
सदियों के दाहकाल में संग तुम्हारे जलती रहीं हम स्त्रियां भी
हमारी उम्मीद, हमारा संघर्ष सब-कुछ तो जला था संग तुम्हारे
कि उस रोज अकेली तुम नहीं जलाई गई थे घेरकर
राक्षसी करार करके इतिहास के ढूँठ पर टाँग दी गई
तुम्हारे प्रतिरोध के पराक्रम को सींचती
जुड़वातीं हम बहिनियाँ हे होलिका, हे बहिनी जुड़ाओं

फिर छल-बल से मात खाए योद्धा की भांति
अपने दुःख को गा-गाकर शरापती हैं स्त्रियाँ
हे होलई बहिन तुम्हरे दहन की ई ऊँची लपटें झौंसें झौंसे
झौंस दें उनका पुरुषापा आपा, हे होलई बहिनी जुड़आ
जलन की पीड़ा अथाह में झोंक दए तुम्हें जो बलबलाए पौरुष बल में
हे बहिनी भभाकर भंभाभूत हो जाए एक दिन वो पौरुष, पुरुष वे
जुड़आ जुड़आ हे होलिका बहिनी जुड़आ
विलाप रहीं हम स्त्रियाँ छतियाँ पीट जैसे
होइ जाए उच्छिन्न ऐसे एक दिन
एक दिन उनकी संस्कृति शिश्नोदरी, हे बहिनी जुड़आ

   (2)
फिर हुड़दंग मचाते पुरुषों के जोश पर उड़ेलते हुए पानी
होलई की परिक्रमा करती धिक्कारती हैं औरतें हाथ दिखा दिखाकर
धिक! धिक! धिक
हाय! धिक!  धिक!
धिक धिक ये उन्माद
धिक धिक ये मर्दोल्लास
परपीड़क आनंद के भोगी ओ अमानुषों धिक्कार
हत्या की बर्बरता का ज़श्न मनाते ओ दुष्टों, मुँहझौंसों धिक्कार
हर घर से माँग ले आए, घर घर से बटोर ले आए
एक स्त्री की हत्या में हर घर का अवदान है,
ये लकड़ी उपली कड़सा रँहठा,
सरसोंता झाँखर झलांसी चइला, उफ्फ़!
हरे भरे जवान पेड़ों को काट काट यूँ दाहते
कि ये धरती का दुःख विराट, और ताज़्जुब
नहीं शिक़न नहीं, दर्प लोटता तुम्हारे चेहरों पर
हरे हरे हमारे दुख सा
हरा चना हरी मटर हरी जई
उखाड़कर भूनते हुए होरहा
तुम अपनी बर्बरता का ज़श्न मना रहे हो
हरे हरे मन से हम मना रहीं मातम
वीरांगना बहिनी की हत्या का
होलिका बहिनी की हत्या का

(3)
हा! होलिका, हा! बहिनी करती स्त्रियाँ वापिस लौटती हैं घर
फिर घर से पोतनउरी लिए बाहर निकलती हैं स्त्रियाँ
उन्हें आता देख खुद को बचाते पराते हैं पुरुष
और छिड़कती हुई पिरोड़ी चँहटा
दूर तक पहँटती हैं स्त्रियाँ, गारी गाते हुए
जिसके भावार्थ कुछ यूँ कि
हे, देवताओं दुराचारियों
गिर जाए कटकर वो शिश्न
कमजोर नसों पर है जिसकी टिकी संस्कृति तुम्हारी
वृंदा की योनि को तलवार बनाकर अंधक की हत्या करने वाले

ओ दुराचारी, ओ हत्यारे
क्या तनिक भी न धिक्कारा तुझे
तेरी महान संस्कृति ने!
शिश्नोदरी संस्कृति ने!
याचक प्रेमी बनकर रानी कयादु की मन-साखों पर कूँकने वाले ओ धूर्त
क्या तनिक भी न लाज़ आई तुझे
कयादु की योनि पर अपनी संस्कृति का तंबू गाड़ते?
किसी कौए का घोंसला नहीं थी कयादु की कोख
जो तू छोड़ गया उसमें अपनी संस्कृति का वजूद
किसी नर कोयल की माफिक़ बड़ी मक्कारी से
ओ हत्यारे, ओ दुराचारी देवताओं
हमारी ही योनियों पर हो खड़े लड़े तुमने धर्मयुद्ध सारे
शिश्न ही तुम्हारा विष्णवास्त्र, शिश्न ही इंद्रास्त्र ब्रह्मास्त्र
जानती हैं हम स्त्रियां

रुको रुको ओ शिश्नोदरी के जनों रुको
कि तुम्हारी कायरता के बदले हम
मलने आईं हैं तुम्हारी मुखों पे अवीर
मुँह छुपाए भागते ओ कायरों रुको रुको
जैसे फोड़तीं हम पोतनउरी ऐसे
फूटे अंडाशय तुम्हारे ओ रुको रुको
और फिर पोतनउरी फोड़ वापिस लौटती हैं स्त्रियाँ।
नहाती हैं लट खोलकर।

तस्वीरें: साभार गूगल

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