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‘विजय संकेत’ के रूप में स्त्री शरीर

आकांक्षा 

स्त्री अध्ययन के शोधार्थी ।
संपर्क : ई मेल-akanksha3105@gmail.com

मनुष्य के विकास क्रम का इतिहास काफी परिवर्तनशील रहा है । आदिम युग से आगे बढ़ने पर मनुष्य ने जब सांगठनिक स्तर पर अपना जीवन यापन शुरू किया तभी से वास्तविक रूप में समाज का निर्माण शुरू होना माना जा सकता है । पूर्व में हम यह जान चुके हैं कि मनुष्य ने सांगठनिक स्तर पर कबीलों में रहना शुरू किया था और इस समाज को कबीलाई समाज के नाम से जाना जाता था । इस समाज का अस्तित्व काफी लंबे समय तक था और इतिहास में इसे कबीलाई युग के नाम से भी जाना गया ।

इस समाज की विशिष्टता यह थी कि इसमें स्त्री को केवल इस रूप में महत्त्व प्राप्त था कि वह एक ऐसा साधन थी जिस पर उस पूरे समाज का अस्तित्व टिका हुआ था । चूँकि कबीलाई समाज में श्रम करने के लिए अधिक से अधिक व्यक्तियों की संख्या ही उस समाज की संपत्ति समझी जाती थी । छोटे-छोटे कबीले अपनी संख्या में वृद्धि करने के लिए प्रयास करते रहते थे और कई बार कई छोटे-छोटे कबीले एक बड़े कबीले द्वारा जीत लिए जाते थे । इस प्रक्रिया में छोटे कबीलों की स्त्रियों को ही सबसे पहले निशाना बनाया जाता था । जब स्त्रियाँ बड़े कबीलों में आकार रहने लग जाती थीं तब उन कबीलों के पुरुष भी स्वयं ही हार स्वीकार कर उस बड़े कबीले में शामिल हो जाते थे और उनके अनुसार कार्य करने लग जाते थे । कबीले के स्त्री-पुरुष के बीच किस तरह के संबंध होते थे, इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह है कि किस प्रकार पुरुष पर आधिपत्य जमाने के लिए स्त्री और स्त्री शरीर का उपयोग किया जाता था ।
प्रसिद्ध विदुषी लीला दुबे ने अपने महत्त्वपूर्ण आलेख ‘धरती और बीज’ में स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार व्यक्ति द्वारा खेती करने के लिए खेत में बीज बोया जाता है तथा उसकी फसल और जमीन पर उसका ही अधिकार होता है, ठीक वैसी ही स्थिति स्त्री शरीर की भी है । स्त्री शरीर की स्थिति खेती करने योग्य भूमि के जैसे ही है और उस पर उस पुरुष का अधिकार हो जाता है जिसका बच्चा पैदा करके वह उसके वंश को आगे बढ़ाती है । भारतीय समाज में माँ को सबसे ऊँचा दर्जा प्राप्त है । इसीलिए धरती और स्त्री की तुलना की जाती रही है और धरती को माँ के रूप में स्थापित किया जाता रहा है, क्योंकि धरती अनाज पैदा करती है और स्त्री, बच्चे । सीमा क्षेत्र पर भी सैनिकों को माँ (धरती) की रक्षा के लिए तैनात किया जाता है और यह प्रशिक्षित भी किया जाता है कि उन्हें माँ की रक्षा के लिए हर प्रकार से सदैव तत्पर रहना चाहिए । एक तरह से इस काम की जिम्मेदारी केवल पुरुषों पर ही होती है क्योंकि अभी सेना में महिलाओं के प्रवेश के बावजूद यह जिम्मेदारी पुरुष ही निभाते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि पुरुष ही स्त्री (धरती रूपी स्त्री या माँ) की रक्षा कर सकता है ।

जिस प्रकार धरती (क्षेत्र) किसी राष्ट्र की इज्जत का प्रतीक मानी जाती है उसी प्रकार स्त्री किसी एक समुदाय, परिवार, जाति और धर्म की इज्जत से जोड़कर देखी जाती है । जिस प्रकार किसी राष्ट्र की सेना या व्यक्ति द्वारा दूसरे राष्ट्र की धरती पर कब्जा या वर्चस्व स्थापित करने के जरिए उसे परास्त किया जाता है ठीक उसी प्रकार किसी समुदाय, जाति, परिवार और धर्म की स्त्री को अपहृत, प्रताड़ित, बलात्कार और अन्य तरह की हिंसा करके उस पूरे समुदाय को परास्त करने का प्रयास किया जाता है । इस प्रकार स्त्री शरीर युद्ध भूमि का वह क्षेत्र बना दिया गया है जहाँ समुदायों, जातियों, परिवारों और धर्मों के बीच युद्ध लड़ा जाता है । इस तरह के युद्ध में सबसे ज्यादा पीड़ित और प्रभावित स्त्री ही होती है ।

जहां तक कबीलाई समाज की बात है तो इस समाज में स्त्री का इस्तेमाल तो किया ही जाता था लेकिन, स्त्री शरीर पर हिंसा नहीं की जाती थी । पुरुषों को अपने वश में करने के लिए स्त्री को अपने अधीन करने की प्रथा थी ताकि उस स्त्री से जुड़े हुए पुरुष स्वतः ही उनके अधीन आ जाएँ । ऐसे में धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती जाती थी और कबीला बड़ा रूप धारण करता चला जाता था । कबीले को श्रम के लिए पुरुष और घरेलू कार्यों के लिए स्त्रियाँ दोनों ही मिल जाते थे । स्त्री को अपने अधीन करने का प्रमुख कारण यह भी था क्योंकि वे ही बच्चे पैदा कर सकती थीं । उनका मानना था कि यदि स्त्री की संख्या अधिक रहेगी और वे बच्चे पैदा करती रहेंगी तो काम करने के लिए आवश्यक मजदूरों की पूर्ति होती रहेगी ।  इसके इतर सामंती समाज में भी ज्यादातर पुरुष को ही बँधुआ मजदूर की तरह रखने का चलन था । जमींदार निचले तबके के पुरुषों से कठोर काम लिया करते थे और बदले में उसके घर-परिवार के भरण-पोषण के लिए अनाज इत्यादि दिया करते थे । इस व्यवस्था में भी सीधे स्त्री पर हिंसा जैसा कोई स्वरुप नहीं दिखाई देता है । सामंत वर्ग स्वयं इतना सक्षम हुआ करता था कि उसे दूसरे वर्ग के लोगों पर अधिकार और वर्चस्व हासिल करने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होती थी ।

जमींदारी और साहूकारी व्यवस्था में स्त्री को भी निशाना बनाया जाता था । किसान और निम्न तबके के लोग विभिन्न कार्यों के लिए जमीदारों और साहूकारों से क़र्ज़ लिया करते थे । बदले में वे अपनी जमीन या कीमती वस्तुएँ जैसे जेवर इत्यादि गिरवी रखा करते थे । मजदूर तबके के वे लोग जिनके पास गिरवी रखने के लिए कोई वस्तु नहीं होती थी उन्हें भी ऊँचे ब्याज पर क़र्ज़ दे दिया जाता था । कई बार क़र्ज़ इसलिए आसानी से मिल जाता था क्योंकि क़र्ज़ माँगने वाले मजदूर या किसान के घर की स्त्रियों पर सीधी नज़र रहती थी । जिन मजदूरों-किसानों के घरों की स्त्रियों पर साहूकारों-जमीदारों की नज़र रहती थी उन्हें बिना वजह क़र्ज़ लेने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता था और कहा जाता था कि वे “ब्याज भी नहीं लेंगे और जब मर्जी हो लौटा देना” । लेकिन जब मिला हुआ पैसा खर्च हो जाता और किसान या मजदूर लंबे समय तक क़र्ज़ नहीं चुका पाता तब उस पर पैसे वापस करने का तरह-तरह से दबाव बनाया जाता था । ऐसी स्थिति में वे मजदूर-किसान के घरों की स्त्रियों को अपने घरों में काम करने के लिए बुलाते थे । वे काम तो करवाते ही थे और साथ ही उसका शारीरिक शोषण भी किया करते थे । यह प्रक्रिया काफी लंबे समय तक चलती रहती और मजदूर-किसान सब कुछ जानकार भी चुप रहते । न उनके पास कभी पैसा जुटता और न ही वे क़र्ज़ से मुक्त हो पाते । आज भी बहुत पिछड़े इलाकों में इस तरह की घटनाएँ होती रहती हैं जो सामने नहीं आ पाती । इस तरह की घटनाओं पर आधारित कई हिंदी फ़िल्में भी बनीं है जो साहूकारी और जमींदारी  प्रथा में व्याप्त अनेकों प्रकार के शोषण और उत्पीड़न को बयान करते हैं ।
आधुनिक समाज में जैसे-जैसे शिक्षा, समाज-सुधार, जागरूकता, अधिकार और इसी तरह के अन्य उपायों के जरिए समाज में चेतना फैलनी शुरू हुई तो लोगों पर वर्चस्व और अधिकार बनाए रखना कठिन सा होने लगा । इस कारण से नए-नए तौर तरीके खोजे जाने लगे । जातीय संघर्ष इसका एक बड़ा उदाहरण है । जाति के आधार पर पहले समाज को बाँटना और फिर उस जातीय पहचान के वर्चस्व को स्थापित करने के लिए विभिन्न जातियों के बीच हिंसा को जन्म देना और हिंसा करना शुरू कर दिया गया । लेकिन यह तरीका बेहद जटिल और कठिन होता है । वर्चस्व के लिए धर्म को भी एक बड़े आवरण की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है । सांप्रदायिक हिंसा भी उसी का प्रतिफल है । अलग-अलग संस्कृतियों को मानने वाले समुदायों के बीच भी हिंसा अक्सर जन्म लेती रहती है और कई बार भयानक स्वरुप में हमारे सामने उपस्थित होती है ।

इन सारी स्थितियों में एक प्रवृत्ति जो समान रूप से मौजूद है वह है हिंसा । हिंसा की मौजूदगी तो है लेकिन उसके स्वरुप में कई स्तरों पर विभिन्नताएँ भी हैं । वर्तमान में हो रही हिंसा पर यदि दृष्टिपात की जाए तो हम पाते हैं कि पहले के समाजों में स्त्री पर बिना हिंसा किए वर्चस्व बनाए रखने की प्रवृत्ति थी वहीं आज स्त्री शरीर पर हिंसा करते हुए उस समाज पर वर्चस्व कायम करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । यह स्थिति आज इतना विकराल रूप ले चुकी है कि स्त्री शरीर को निशाना बनाए बगैर किसी भी तरह की हिंसा को अंजाम नहीं दिया जा रहा है और स्त्री शरीर के जरिए स्त्री से जुड़े समाज पर वर्चस्व प्राप्त किया जा रहा है । इस प्रकार स्त्री शरीर न केवल वर्चस्व प्राप्त करने का एक साधन या जरिया है बल्कि ‘विजय संकेत’ के रूप में स्थापित होती जा रही है ।

आम तौर पर जब भी दो गुटों, जातियों, समुदायों के बीच तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है तब सबसे ज्यादा ख़तरा स्त्री के लिए पैदा हो उठता है । कारण यह है कि कोई भी गुट, समुदाय या जाति समूह हो, उसकी नजर में स्त्री एक ऐसे साधन के रूप में दिखाई देती है जिसको प्रताड़ित या अपमानित करके उस गुट, समुदाय या जाति को नीचा दिखाया जा सकता है । यह एक सामाजिक मानसिकता को दृश्यांकित करता है । स्त्री का शरीर एक ऐसा संकेत है जो जीत और वर्चस्व को स्थापित करता है जबकि उस वर्चस्व को हासिल करने की प्रक्रिया में स्त्री की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती है । उसे तो यह पता भी नहीं होता है कि गुटों, जातियों और समुदायों के बीच के तनाव में उसका भी इस्तेमाल किया जा सकता है ।  यह कार्य कई बार तब किया जाता है जब किसी एक पक्ष को या दोनों पक्ष को प्रतीत होने लगता है कि अब उनके पास एक दूसरे को नीचा दिखाने, उस पर अपना वर्चस्व कायम करने, उसको अपमानित करने आदि को लेकर कोई और तरीका नहीं बचा है । स्त्री को प्रताड़ित करना और उस पर हिंसा करना एक आसान तरीके के रूप में दिखाई देने लगता है और उसे निशाना बनाया जाता है ।

हिंदू महाकाव्यों में भी इस तरह के उदाहरण मौजूद हैं । जैसे, महाभारत में द्रोपदी का चीरहरण होना और रामचरित मानस में सीता का हरण लगभग इसी तरह के कृत्य को उजागर करता है । कई बार वर्चस्व प्राप्त करने के क्रम में यदि स्त्री को निशाना नहीं भी बनाया गया होता है लेकिन वर्चस्व प्राप्त हो चुका हो, उसके बावजूद इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है । कई बार इसे ‘सबक’ के रूप में स्थापित किया जाता है कि ताकि इसके बाद दूसरा पक्ष अपने शक्ति प्रदर्शन की कभी हिम्मत भी न कर सके । कई बार तनाव शांत हो चुकने के काफी लंबे समय बाद एक दूसरे पक्ष की स्त्री को निशाना बनाया जाता है ताकि पूर्व में हुई घटनाओं का बदला लिया जा सके । समाज में इस तरह की घटनाएँ आम हो चुकी हैं जिनकी ख़बरों से अखबार अटे पड़े रहते हैं ।
भारतीय समाज में विवाह एक ‘पवित्र संस्था’ के रूप में स्थापित है । आम तौर पर सजातीय विवाहों का चलन उत्तर भारतीय समाजों में है और दहेज प्रथा भी किसी न किसी रूप में विद्यमान है । विवाह होने से पहले लड़की अपने पिता के घर की संपत्ति और इज्जत के रूप में देखी जाती है और विवाह होने के बाद वह ससुराल पक्ष की संपत्ति और इज्जत के रूप में देखी जाती है । सामान्य तौर पर यह एक आदर्श स्थिति दिखाई देती है लेकिन वास्तविक और व्यावहारिक तौर पर यह स्थिति समग्रता में एक व्यक्ति के मानवाधिकारों का हनन है । क्योंकि इन सबके इतर स्त्री के अपने अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित होता है । दोनों पक्षों की संपत्ति और इज्जत को संजोने की भूमिका के अलावा एक मनुष्य के नाते उसकी अपनी कोई इच्छा या भूमिका नहीं दिखाई देती है । विवाह को एक आदर्श स्थिति, बराबरी पर आधारित रिश्ता, पवित्र बंधन इत्यादि मानने का चलन होने के बावजूद वर पक्ष हमेशा स्त्री पक्ष पर अपना वर्चस्व बनाए रखता है । यह वर्चस्व आम तौर पर स्त्री पक्ष द्वारा मौन स्वीकार्य भी होता है । अलग-अलग तरीकों से जैसे दहेज, विवाह के बाद ससुराल में लड़की की सुविधाओं के नाम पर माँगी जाने वाली महँगी वस्तुएँ, ससुराल से मायके ले जाने और ‘सुरक्षित’ पहुँचाने की जिम्मेदारी आदि के तले स्त्री पक्ष हमेशा दबी स्थिति में होता है । इसके इतर यदि स्त्री की कोख से बेटी का जन्म लेना भी एक बहुत बड़े वर्चस्व संकेत के रूप में उपस्थित होता है जबकि बेटी या बेटा पैदा करना स्त्री पर निर्भर नहीं करता ।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार बेटा या बेटी पैदा होना पुरुषों पर निर्भर करता है क्योंकि स्त्री के शरीर में केवल X क्रोमोजोम ही होता है वहीं पुरुष शरीर में X और Y दो क्रोमोजोम होते हैं । पुरुष के Y क्रोमोजोम कमजोर होने की स्थिति में ही बेटी पैदा होती है और इसकी जिम्मेदारी पुरुषों को लेनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता है । बेटी पैदा होने पर सारी जिम्मेदारी स्त्रियों पर थोप दी जाती है और उसे और उसके मायके वालों को इस बात को लेकर हमेशा प्रताड़ित, शोषित और अपमानित किया जाता है । समाज सब कुछ जानते हुए भी इस स्थिति पर मौन रहता है ।विवाह संबंधों में एक पक्ष यह भी है कि कई बार दो परिवारों के बीच आपसी रंजिश होने के बावजूद यह कहकर दोनों पक्षों के बीच विवाह संबंध कर लिए जाते हैं ताकि दोनों पक्षों के बीच के तनाव को खत्म किया जा सके । पर वास्तविकता इससे अलग होती है । एक राजनीतिक/रणनीतिक प्रक्रिया के तहत ऐसे विवाह संबंध इसलिए स्थापित किए जाते हैं ताकि स्त्री पक्ष पर वर्चस्व स्थापित हो सके । यहाँ पर भी स्त्री का इस्तेमाल ‘विजय संकेत’ के रूप में किया जाता है ।

वर्तमान में अंतरजातीय और  अंतर्धार्मिक विवाहों का चलन तेजी से बढ़ा है ।  यह कई मायनों में प्रगतिशीलता और जागरूकता का परिचायक है क्योंकि इससे धार्मिक और जातीय जकड़न टूटते हैं । यह लड़के और लड़कियों में आत्मनिर्णय लेने की क्षमता को प्रदर्शित करता है, साथ ही लड़के-लड़कियों में आपसी तालमेल और आत्मनिर्भरता जैसे आवश्यक व्यवहारों को बल मिलता है । लेकिन वहीं पर कई बार ऐसे संबंध स्त्री के अनुकूल नहीं होते । अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों में सामाजिक रूप से जिस धर्म एवं जाति को ऊँचा दर्ज़ा प्राप्त होता है, वह कहीं न कहीं वर्चस्व की स्थिति में होता है । यदि लड़का ‘निम्न’ जाति  का है और लड़की ‘उच्च’ जाति की होती है तब लड़के के जाति समूह में यह भावना बैठ जाती है कि उसने ‘उच्च’ जाति की ‘इज्जत’ को अपने कब्जे में कर लिया है । दूसरी तरफ यदि लड़की ‘निम्न’ जाति की है तो यह माना ही जाता है कि लड़की तो उसकी संपत्ति है ही, साथ ही उसका पूरा समुदाय ही लड़के के जाति समूह के अधीन है । ऐसे में वर्चस्व की स्थिति को निर्धारित करने में केंद्र में स्त्री ही होती है और जिस तरफ स्त्री होती है वह उसी का ‘विजय संकेत’ होती है । यही स्थिति बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक धर्मों के बीच बने वैवाहिक संबंधों के मामले में देखी जा सकती है । ऐसे ज्यादातर मामले इसलिए होते हैं क्योंकि हर जाति/धर्म अपनी पहचान और वजूद को बनाए रखना चाहती है । केवल इतना ही नहीं, वह स्वयं को श्रेष्ठ भी साबित करना चाहती है और इसे बनाए रखने का एकमात्र आसान जरिया स्त्री को बनना पड़ता है ।

विवाह संबंधों के इतर भी स्त्रियों पर हिंसा के जरिए वर्चस्व और जीत हासिल करने की कोशिश की जाती है । भारत के कई राज्यों (विशेष रूप से उत्तर भारत) में समय-समय पर जातीय संघर्ष होते रहे हैं जिनमे उच्च और निम्न जातियों के बीच अपने वर्चस्व की स्थापना को लेकर लंबे समय से संघर्ष होता चला आ रहा है । इसका संबंध राजनीति से भी है । जब-जब ऐसे राज्यों में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ती है, इस तरह की हिंसाओं में तेजी से इज़ाफा होता है और तमाम खूनी संघर्ष होते हैं । ऐसी जातीय हिंसाओं का शिकार पुरुष वर्ग तो होता ही है लेकिन निर्णायक स्थिति स्त्रियों पर हिंसा करने के बाद ही तय होती है । आम तौर पर जातीय संघर्ष में जब हिंसा अपने चरम पर होती है और दोनों पक्षों के पुरुष हिंसा के जरिए एक दूसरे को हराने के लिए प्रयास करते हैं तो कई बार दोनों पक्ष बुरी तरह प्रभावित होते हैं लेकिन यह फैसला नहीं हो पाता कि किस जाति को जीत हासिल हुई । ऐसे में एक दूसरे पक्ष की स्त्री या स्त्रियों पर जघन्यतम हिंसा (बलात्कार, छेड़छाड़) के जरिए यह साबित करने का प्रयास किया जाता है कि जिस पक्ष ने स्त्री को अपमानित किया है वह विजयी हुआ क्योंकि स्त्री पर हिंसा करके स्त्री के पूरे समूह को अपमानित किया जाता है ताकि वह फिर से दूसरे पक्ष पर हिंसा करने की सोच भी न सके । ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि यह माना जाता है कि जिस पक्ष की स्त्री के साथ हिंसा की गई है, वह पूरा समूह ही अपने आप अशुद्ध हो गया है ।

ऐसी ही स्थिति धर्म आधारित हिंसा में देखने को मिलती है । १९९० ई. के बाद से धर्म आधारित हिंसा में स्त्रियों को निशाना बनाने का चलन बढ़ा है । धर्म के नाम पर स्त्री का शोषण तो पहले से ही होता आ रहा है लेकिन दो धर्मों और संप्रदायों के बीच होने वाले तनाव और उससे पनपी हिंसा में भी स्त्री शरीर को निशाना बनाए जाने की प्रक्रिया होती रहती है । सांप्रदायिक दंगों के इतिहास पर यदि हम गौर करें तो हम पाते हैं कि पूर्व में जो सांप्रदायिक हिंसा होती थी उसमे स्त्री प्रभावित तो होती थी लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर नहीं । हिंसा के निशाने पर पुरुष वर्ग ही हुआ करते थे क्योंकि यह आम तौर पर सामाजिक मान्यता थी कि लड़ाई पुरुष-पुरुष के बीच की कार्यवाही है । आज भी जब गाँवों में दो गुटों/ संयुक्त परिवार के सदस्यों के बीच छोटे-मोटे झगड़े होते हैं तो उनसे स्त्रियों को दूर रखा जाता है । उसे किसी भी तरह बीच में बोलने तक का अधिकार नहीं होता चाहे उसके बोलने आदि से झगड़ा तुरंत ही शांत क्यों न हो जाए । यदि उसके बोलने से तुरंत झगड़ा शांत भी हो गया तो भी पुरुष वर्ग शांत नहीं बैठते । उन्हें लगता है कि झगड़ा शांत कैसे हो गया ? उन्हें यह आभास होने लगता है कि उनकी ‘मर्दानगी’ को ठेस पहुँच गई । यह एक तरह से पितृसत्तात्मक मानसिकता की झलक दिखाती है ।

उक्त सभी स्थितियों में केवल स्त्री शरीर ही एक ऐसे ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में सामने आती है जो  प्रत्यक्ष तौर पर हिंसा का शिकार होती है लेकिन आम तौर पर घटना के बाद की स्थितियों में इस तरह के विश्लेषण और आंकड़े नहीं के बराबर प्रस्तुत किए जाते हैं बल्कि ऐसे तथ्यों को छिपाए जाने का भरसक प्रयास किया जाता है ।
संदर्भ-
• सिंह, कंवलजीत (२००८)  जीतेंद्र गुप्ता (अनु.), वैश्वीकरण, संवाद प्रकाशन, मेरठ.
• खेतान, प्रभा (२००४ )  बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली.
• जोशी, रामशरण (संपा.) (२०१०)  मीडिया और बाजारवाद, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली.
• चक्रवर्ती, उमा (२०११) विजय कुमार झा (अनु.), जाति समाज में पितृसत्ता, ग्रंथ शिल्पी प्रकाशन, नई दिल्ली.
• जान, ई. मेरी (२००८) अभय कुमार दुबे (अनु.), कामसूत्र से कामसूत्र तक,  वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली.
• जोशी, गोपा (२००६) भारत में स्त्री असमानता, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिली.
• पांडे, ज्ञानेंद्र एवं अमीम, शहीद (२००४) निम्नवर्गीय प्रसंग- भाग दो, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.

तस्वीरें गूगल से साभार 

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तुलसीराम की बेटी ने लिखा राधादेवी को खत , एक शोधार्थी पर उठाई उंगली



पिछले कुछ दिनों से लेखक, चिंतक दिवंगत तुलसीराम के बाल-विवाह, और उससे उनकी पत्नी के हक को लेकर सोशल मीडिया पर हंगामा बरपा है. उनकी बेटी अंगिरा चौधरी को भी कठघरे में खड़ा किया जा रहा है. कहा यह भी जा रहा है कि वे फोन नहीं उठा रही हैं. स्त्रीकाल ने उनसे संपर्क किया तो उन्होंने अपना पक्ष रखा और राधादेवी को एक खत लिखकर कथित षड्यंत्रकारियों से सावधान रहने का आग्रह करते हुए उन्हें मदद की पेशकश की. पढ़ें यह लंबा खत…

इन आठ दिनों में जब से फेसबुक और दूसरे खुले प्लेटफॉर्म पर मेरे परिवार के खिलाफ दुष्प्रचार चलाना शुरू हुआ है , एक दो मेरे बहुत करीबी लोगों को छोड़कर अपने-पराये किसी ने भी इस सन्दर्भ में मुझसे संपर्क नहीं किया है।  कल स्त्रीकाल की तरफ से पहली बार इसपर मुझसे चर्चा की गई है।  इसलिए जब सारी चीजें खुले में चलाई ही जा रही है , मैं राधा देवी को लिखी अपनी चिट्ठी स्त्रीकाल से शेयर कर रही हूँ।  अगर वो उचित समझें तो इसे सार्वजनिक कर सकते हैं। इस खुले पत्र के लिए मैं अपना संपर्क पता इसमें से हटा रही हूँ।

अंगिरा, राधादेवी और तुलसीराम



आदरणीय राधादेवी जी

ठीक दो साल पहले आपसे आजमगढ़ में आपसे पहली बार मुलाकात हुई थी।  आज फिर दो सालों के बाद आपको चिट्ठी लिख रही हूँ। मैं तो अपने पिता के याद में कराए जा रहे एक कार्यकर्म का हिस्सा होने इस उत्साह के साथ आजमगढ़ गई थी कि पहली बार 28 सालों में अपने पिता के पैतृक गांव देखूंगी लेकिन वहां जाकर तमाम चीजों के साथ साथ आपसे भी मुलाकात हुई। सब कुछ लगभग जस का तस था जैसा मेरे पिता ने उस जगह के बारे में दसियों बार बताया था सिवा आपके।  आपका तो जीवन में कभी उन्होंने कोई जिक्र ही नहीं किया था।  आपका अपना परिचय बताने पर मैं हतप्रभ सी आपके सामने खड़ी रही और आप मेरा हाथ पकड़ मुझसे बात करती रही।  उस किंकर्तव्यविमूढ़ता के बावजूद आपके आशीर्वाद के शब्द मुझे याद हैं।  “जा बेटी जहें रहिय, खुश रहिय” या ऐसे ही कुछ शब्द।  मैं एकदम नहीं कह सकती कि आपने मुझसे कोई कटु शब्द कहे।

फिर भी मेरी दुनिया बदल गई थी। जब तक आजमगढ़ रही, इस बारे में उसके बाद किसी से कोई भी बात नहीं हुई।  जैसे या तो कोई कुछ जानता ही न हो या कि सब लोग सब कुछ जानते हों। या तो सब हतप्रभ थे या किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें। मेरे साथ में कुछ जेएनयू के प्रोफेसरों और मेरे कुछ दोस्तों में धर्मवीर गगन भी थे।  वे भले कुछ न बोले हों लेकिन मेरे लिए ये दुनिया बदल गई थी।

वापस आने के बाद मेरी भी हिम्मत नहीं हुई कि मैं अपनी माँ को यह बता सकूँ कि आजमगढ़ में एक महिला मिलीं जो अपने आप को मेरे पापा की पत्नी कह रही थी।  दोनों तरफ एक महिला  थी जिसके बीच में मैं एक बेटी। खैर, अगले कुछ दिनों में मेरी माँ तक भी ये ख़बर पहुंच ही गई। मेरी मां पर क्या गुजरी होगी इसकी कल्पना आप भी कर ही सकती हैं।  इतने बड़ी बात को न बताने का अपराधी मान मेरी मां ने मेरे एकमात्र चाचा जिनका मेरे घर आना जाना था उनसे भी संबंध विच्छेद कर लिया।  फिर जीवन चलता रहा और इस बीच दो साल गुजर गए।  पिता के तरफ से सारे संबंध ख़त्म ही हो गए थे और माँ के तरफ से सारी मौसियां और मामा भी पिछले महीने तक गुजर गए।

इन दो सालों में भी आपकी तरफ से कोई संवाद नहीं हुआ और हमारी तरफ से किसी संवाद की कोई वजह नहीं थी।  लेकिन पिछले 6 दिनों से एक बार फिर मैं भौचक हतप्रभ आपको अपने सामने पा रही हूँ।  फ़ेसबुक नाम का एक तरीका है जिसमे लोग कम्प्यूटर के माध्यम से लोग दुनिया के सामने खुलेआम अपनी बात रखते हैं , वहां आपकी कही हुई बातों का वीडियो बनाकर आपके लिए न्याय माँगा जा रहा है।  ये वीडियो तो 24 नवम्बर 2017 को ही कंप्यूटर पर यूट्यूब नाम की जगह पर आ गया था लेकिन आपके न्याय के लिए ठीक मेरे पापा की बरसी वाले दिन 13 फ़रवरी को ही चुना गया।  जीतेन्द्र विसारिया जिनका कहना है कि असल में वो राधादेवी के न्याय के लिए मुहीम चला रहे हैं , उन्होंने आपके न्याय के लिए 13 फ़रवरी आने का इंतज़ार किया या फिर एक और इत्तेफ़ाक़ ये है कि 13 फ़रवरी के दिन धर्मवीर गगन जिन्होंने पापा के ऊपर तुलसी राम विशेषांक निकाला और दो साल पहले मेरे साथ आपसे मिले थे, जीतेन्द्र विसारिया के साथ दीखते हैं।  तुलसी राम विशेषांक की वजह से धर्मवीर गगन तो हमारे बहुत करीबी थे, पचासो बार उसके सन्दर्भ में हमारे घर आये हैं , अपने जीवन की हर एक तस्वीर उनको दिखाई जिसमे से वो अपनी पत्रिका के लिए छांट सकें।  पापा से मिलने और उनके इंटरव्यू के लिए न जाने कितनी बार वो हॉस्पिटल भी आए, यहाँ तक कि जब मैं पहली बार आजमगढ़ आई तो वो मेरे साथ आये थे। खुद मेरी मां ने कइयों को उनकी पत्रिका में लिखने और कुछ आर्थिक मदद देने के लिए कहा था।  बस एक बार ही ऐसा हुआ कि उन्होंने हॉस्पिटल में आखिरी दिनों में बेड पर जर्जर स्थिति में लेटे पापा के बगल मुझे जबरदस्ती खड़ा करके फोटो लेने की बात कही थी तो मैं झल्ला पड़ी थी , लेकिन उसके बाद भी उन्होंने वैसी फोटो ली ही थी जो आज उनके विशेषांक में लगी हुई है।

जीतेन्द्र विसारिया को मैं निजी रूप से नहीं जानती लेकिन फेसबुक के माध्यम से मुझसे जुड़े हैं। पापा की वजह से कई लोगों से जुड़ी हूँ इस वजह से सबके लिखी बातें नहीं देख पाती, लेकिन राधा देवी को न्याय दिलाने की मुहीम में उन्हें प्रभा चौधरी और अंगिरा चौधरी के बारे में झूठ कहते यह शर्म नहीं आई कि हम दोनों का फ़ोन नेटवर्क से बाहर बता रहा है और सपर्क करने में वो असमर्थ हैं जैसे हमने अपना मोबाइल बंद कर कहीं छिप गए हों। जबकि सच है कि मैं लगातार इन दिनों अपने पढाई और अपने दोस्तों की वजह से सार्वजनिक स्थानों पर पायी गई हूँ जो मेरे फेसबुक पर भी देखा जा सकता है । मेरे पास ये सुविधा ही नहीं है कि मेरी माँ मौजूदा हालत में  घर में अकेली रहें और मैं घर के बाहर अपना मोबाइल बंद कर सकूँ। मोबाइल में एक व्यवस्था होती है कि अगर कभी किसी हालत में फोन न लगे तो आपको मिस्ड कॉल की जानकारी के साथ मैसेज आता है। मुझे आज तक एक भी ऐसा मैसेज नहीं मिला है। हालाँकि विसारिया मुझे मैसेज भेज ही सकते थे बजाय इसके कि हम माँ बेटी की ईमानदारी पर झूठे सवाल उठाने वाले पोस्ट में मुझे टैग करेंगे तो मुझे कम से कम उनकी ईमानदारी का एहसास हो ही जायेगा। मैंने चुपचाप वहां से अपने को अलग करना ही बेहतर समझा।

लेकिन अगर ये लोग पूरी दुनिया को यह कहते रहें कि प्रभा चौधरी और अंगिरा चौधरी ने राधा देवी का हक़ मार रखा है, बिना हमसे संपर्क करने की कोशिश किये हमें भगोड़ा भी साबित करेंगे और मेरे कई दोस्तों को भी चुपके से मेसेज में वीडियो भेजेंगे तो ये राधा देवी के न्याय को लेकर कितने ईमानदार हैं वो समझ सकती हूँ। दुआ करुँगी कि कम से कम अंगिरा चौधरी और प्रभा चौधरी को ऐसे न्याय के ठेकेदारों की जरूरत न पड़े।  जिस विडिओ को धर्मवीर गगन सभी को चुपके से मेसेज में भेज रहे हैं , उसमे विसारिया लिखते हैं कि ” प्रोफ़ेसर बनने के उपरांत तुलसीरामजी ने राधादेवी को बिना तलाक दिए अपने से उच्चजाति की शिक्षित युवती से विवाह कर लिया” क्या धर्मवीर गगन को  नहीं पता कि वह युवती और मेरी मां उच्चजाति की नहीं हैं।  सभी दलित पुरुष थोड़ा विकास करते ही अपनी जाति से नफ़रत करने लगते हैं वाला जातीय तर्क साबित करके किसके लिए न्याय ढूंढ़ने निकले हैं गगन! क्या धर्मवीर गगन को नहीं पता है कि तुलसी राम के मरणोपरांत प्रभा चौधरी को कोई भी पेंशन नहीं मिलती है।  क्या धर्मवीर गगन को नहीं पता है कि राजकमल वालों की तरफ से साल में कितनी रॉयल्टी मिलती है ? क्या धर्मवीर गगन ये भी भूल गए कि घर में आमदनी का मासिक जरिया केवल मेरा स्कालरशिप है।

अगर ऐसा है तो आज दुःख है मुझे कि मरते वक़्त मेरे पापा ने गगन को अच्छा स्टूडेंट मान भरोसा किया था।  वो साल भर जुड़े रहकर एक तुलसी राम विशेषांक निकालते हैं , उसके एक साल तक फिर पच्चीसों बार उस पत्रिका का विमोचन करवाने के सिलसिले में आप हमारे घर से जुड़े रहते हैं और उनको घर की बेसिक सी बात पता नहीं चलती  या फिर उन्हें इसमें मजा आ रहा है कि दो महिलाएं कैसे किसी पुरुष के अभाव में घर चला रही हैं उसकी छीछालेदर हो। कितना आसान है झूठ कह देना कि हमारा फोन नेटवर्क से बाहर है या हमने अपना मोबाइल बंद कर रखा है या कभी कि हम इनका फोन उठा ही नहीं रहे।  जबकि अगर ये तनिक भी ईमानदार होते, हमसे व्यक्तिगत तौर पर मिलते , या फोन करते , नहीं उठाने की अवस्था में मैसेज करते , मैसेज का जवाब नहीं मिलने पर ईमेल करते , फिर उस ईमेल का जवाब भी नहीं मिलने पर उस ईमेल को सार्वजनिक करते।  लेकिन मैं पूरी ईमानदारी के साथ कह रही हूँ कि इन्होने  कुछ नहीं किया बल्कि जवाब न देने और फोन बंद करने का बेबुनियाद आरोप लगाकर हम माँ बेटी का भी चरित्र हनन किया है।  प्रोफ़ेसर तुलसीराम के ऊपर कीचड उछालने और उनके समाज के लिए दिए साहित्यिक योगदान को कमतर साबित करने की कोशिश की है।

अभी दौर है।  लोग कहीं का दीखते दीखते कहीं का हो ले रहे हैं। 52 सालों के बाद जब कोई कहने वाला ही नहीं रहा कि 52 साल पहले क्या हुआ, धर्मवीर गगन और उनके मित्र आपको न्याय दिलाने निकले हैं तो जिसे भी अन्यायी साबित करना हो कर लें।  अंगिरा चौधरी भी अन्यायी हैं और प्रभा चौधरी भी।  तुलसी राम को साबित करना तो सबसे जरूरी है।  इससे आपको न्याय मिले न मिले लेकिन शायद इनको नौकरियां मिल जाए।  आज के दौर में ऐसे भी हम दलितों पिछड़ों को नौकरियां मिलनी कठिन हो गई हैं।  सुन रही थी कि मुर्दहिया और मणिकर्णिका को कॉलेज की किताबों में शामिल करने की बात चल रही थी, ऐसे में उम्मीद है कि इन्हे जल्दी ही नौकरी मिल जाएगी और फिर कभी किसी और का विशेषांक निकालने की नौबत नहीं आएगी।

खैर, अब बात कह दी ही गई है कि मेरी मां और मैं अपने पिता द्वारा छोड़ी अकूत सम्पति पर जो सिर्फ आपका हक़ है पर जबरदस्ती गैरकानूनी ढंग से कब्ज़ा जमाए बैठे हैं, तो बता ही दूँ कि मेरे पिता के मरने के बाद रिटायरमेंट के पैसे से हम दोनों के रहने के लिए छत की व्यवस्था हो सके। लेकिन आत्मविश्वास और ईमानदारी इतनी दी है कि बिना बिके और बेईमान हुए जीवन जी सकूँ।  मेरे लिए यही उनकी विरासत है।  आज भी मुझे गर्व है कि मेरे पिता ने कभी मुझसे झूठ नहीं कहा।  बेटी तो केवल मैं ही हूँ जिसके जन्म से लेकर उनके मरने तक वे हमेशा साथ रहे और यह तथ्य अब तक तो अविवादित है। मुर्दहिया और मणिकर्णिका की कितनी ही बातें उन्होंने मुझसे ढेरों बार बताई थी।  जो नहीं बताई वो उन्होंने नहीं लिखा।  क्या वजह रही ये वही बेहतर बता सकते थे लेकिन सामाजिक शास्त्र के लोग इसके मतलब निकाल ही सकते हैं।  आज आपके वीडियो के बाद और जीतेन्द्र विसारिया की फेसबुक वाले कम्प्यूटर को देखकर अपने पिता के जीवन का महत्वपूर्ण घटनाक्रम बनाती हूँ तो समझ आता है कि

65 साल की उम्र में मेरे पिता 2014 में रिटायर होते हैं।

1949 के लगभग में मेरे पिता का जन्म होता है।

01 जुलाई 1964 को पंद्रह साल की उम्र में मेरे पिता ने गांव हमेशा के लिए छोड़ दिया. खुद मुर्दहिया में मेरे पिता ने ये लिखा है।  मैं उनके कहे को झूठ नहीं मान सकती वैसे ही जैसे मैं आपके कहे को नकार नहीं रही। मेरे पापा ने खुद कहीं किसी से कहा है कि घर छोड़ने पर भी मेरे दादा मौरी विधि द्वारा आपका गौना कराकर लाते हैं। खुद इस विडिओ में आपका कहा सुना जा सकता है कि जब साथे रहबे नहीं किये तो बच्चा कैसे होता।

17 (मध्य अप्रेल 1966) की उम्र में वो आजमगढ़ बारहवीं पास करते हैं और घर हमेशा के लिए छोड़ देते हैं।

21 जनवरी 1976 को पापा बनारस हमेशा के लिए छोड़ दिल्ली आ जाते हैं।

21 मार्च 1988 को मेरे पिता की प्रभा चौधरी यानि कि मेरी माँ से शादी होती है जिसके बाद मेरा जन्म होता है।

05 दिसंबर 2008 में उनकी दोनों किडनियां फेल हो जाती हैं और तब से नियमित रूप से डायलिसिस शुरू हो जाता है. इसकी जानकारी वहां गांव में पापा के भाई को भी रहती है।

अक्टूबर 2010 में पापा के मरने की अफवाह फैलती है।  दलितों की एक साहित्यिक सभा में उनको श्रद्धांजलि भी दे दी जाती है। अंततः लम्बे समय की बिमारी के बाद 13 फ़रवरी 2015 को मेरे पिता की मृत्यु होती है।

13 फ़रवरी 2016 को आपसे मुलाकात होती है जहाँ मुझे आपका परिचय पता चलता है जो दो चार दिनों के बाद माँ को भी पता लगता है।

13 फ़रवरी 2018 को एकाएक एक वीडियो के माध्यम से सबको बताया जाता है कि “बतौर हक़ या मानवीय आधार पर ही सही आधा अंश या कुछ राशि, गुज़ारा भत्ता के रूप में प्रभा चौधरी की ओर से राधादेवीजी को अवश्य पहुँचानी चाहिए, जिससे वे जीवन रहते परवश और भुखमरी की शिकार न हों!! दिल्ली स्थित बुद्धिजीवी साथी और प्रोफ़ेसर तुलसीरामजी की पुत्री कॉमरेड Angira को भी इस हेतु आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए। …आदरणीय राधादेवी भयंकर गरीबी और भुखमरी की शिकार हैं!”

जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि आपके न्याय के पुरोधाओं ने सबको ये बात बताई लेकिन जब तक मुझे पता चलती , तब तक बात मेरी माँ को आपके हक़ मारने वालों के रूप में स्थापित करने की कोशिश शुरू हो जाती है।  जो औरत लगातार 30 साल तक मेरे पापा के साथ रहती है , हर सुख दुःख में साथ रहती है वो एकाएक “दूसरी औरत” बना दी जाती है। कितने न्यायप्रिय लोग हैं कि दो पूर्णतः व्यस्क प्रबुद्ध लोगों की साथ जीने के सचेत निर्णय को एक अबोध बच्चों की शादी से एक पल में धराशायी कर दे रहे हैं। उनके जीवन भर के संघर्ष को एक पल में इसलिए ख़ारिज कर दिया जाय कि उन्होंने समाज के बकवास नियमों से विद्रोह करने का निर्णय लिया! लोगों को आज लिगालिटी-इलिगालिटी दिख रहा है वो भी आज 2018 की नज़रों से।  क्या वो भूल रहे हैं कि 1965-1970 तो क्या मोटा मोटी मानिये तो 1991 के पहले क्या सरकारी क़ानून इतना मजबूत था कि सरकार और समाज के बीच के अन्तर्सम्बन्ध आज जैसे थे?  सामाजिक नियम ही सर्वोपरि थे।  मेरे पापा के समाज में तो पुनर्विवाह का भी प्रचलन था। आपके अनुसार दो साल की उम्र में हुयी शादी को उन्होंने नहीं माना।  एक बार छोड़ दिया तो कभी पीछे मुड़ के भी नहीं देखे।  इस सन्दर्भ में भी उन्होंने कुछ नहीं लिखा तो शायद इधर मेरी माँ और मैं थी तो दूसरी तरफ आपकी निजता की चिंता भी हो ही सकती है।  वो क्यों लिखते! आजमगढ़ छोड़ने के बाद 47 साल वो जीवित रहे। जो एक आरोप लग रहा है कि “बड़ा आदमी ” बनने के बाद वो बदल गए तो आजमगढ़ छोड़ने से लेकर उनके “बड़ा आदमी” बनने में 22 साल का समय है। उन 22  सालों के बाद भी 27 -28 साल के करीब तो केवल हम उनके साथ थे।  मैं बिलकुल समझ सकती हूँ कि इस समाज में खासकर हमारे समाज में महिलाओं की जो स्थिति है शायद आप पापा को अकेले नहीं ढूंढ पातीं।  लेकिन आपके तो 5 भाई थे। विसारिया जी की ही बातों से पता चलता है कि ऐसी स्थिति तो थी ही कि भाई आपकी मदद करते।  उनके लिए तो ढूँढना मुश्किल न था अगर उन्हें नहीं पता रहा होगा तो।  धर्मवीर गगन जैसे समाजसेवकों की भी कभी कमी नहीं रही समाज में जो आपको खबर देता अगर आपने कोशिश की होती।  बचपन से ही मैंने घर में आजमगढ़ से कइयों को कभी किसी काम के लिए तो कभी ऐसे ही मिलने के लिए आते देखा है। लेकिन आप कभी नहीं आयीं। न ही आपके तरफ से कोई आया।  मुझे भी तभी पता लगा जब मैं वहां गयी।  अभी भी आपने किसी को हमें कोई खबर पहुंचाने नहीं कहा बल्कि जब कोई समाजसेवी आपके पास पहुंच रहा है तो आप उससे अपनी बात कह रही हैं जिसका कि वीडियो बनाकर लोग समाजसेवा कर रहे हैं। वजह सोचने की मैंने भी बहुत कोशिस की है।  हो सकता है कि आपका आत्मसम्मान आपको पापा से दूर करता हो।  लेकिन एक तरफ आपका आत्मसम्मान आप पर इतना हावी हो कि मेरे पापा मरते रहे लेकिन आप एक बार भी नहीं आयीं और दूसरी तरफ आज उनके मरने के बाद लोग आपके लिए बतौर हक़ और मानवीय आधार की बात करते करते मुझे और मेरी माँ को पलक झपकते मेरे पापा की जिंदगी में ग़ैरकानूनी करार दिए जा रहे हैं।  अगर क़ानून ऐसा है तो ऐसे क़ानून को मैं तो नहीं मानती।  मैं तुलसी राम की बेटी हूँ और प्रभा चौधरी मेरी माँ हैं।  यही अंतिम सच है।  मेरा बाप एक दिन में नहीं मरा, 8 साल तो हमारे हर तीसरे दिन हॉस्पिटल में डायलिसिस करवाते ही गुजरे हैं अगर बाकी दिनों को छोड़ भी दिया जाय तो।  उस समय मेरे बाप के पास जो महिला थी वो गंभीर आर्थराइटिस के बावजूद उनके साथ हॉस्पिटल आती जाती थी तो वो मेरी माँ प्रभा चौधरी थी। मेरे बाप की दवाइयों से लेकर खाने तक का हिसाब जिस महिला ने रखा वो प्रभा चौधरी थी।  कितना बताऊँ , सोचियेगा कभी।  शादी के पहले का तो कोई गवाह नहीं हमारे पास, लेकिन पिछले तीस सालों में अगर मेरे बाप ने एक पन्ने की रद्दी भी तैयार की तो उसके उत्पादन में प्रभा चौधरी का श्रम भी शामिल है।  और अगर इन तीस सालों में आप एक बार भी उनके रहते आयी होतीं तो आज मैं इतना व्यथित नहीं होती।  आप राधादेवी जो समाज की सतायी हुयी हैं हो सकती हैं लेकिन आप मेरी माँ नहीं हो सकतीं।  मैं कैसे मान लूँ कि जिस महिला के लिए मेरा मरता हुआ बाप भी कुछ न था आज वो एकाएक मेरी रिश्तेदार हो जाय।

समाज का सताए हुए तो मेरे पापा भी हैं। आज राधादेवी और प्रभा चौधरी में भले एक फर्जी विवाद हो लेकिन जैसा पहले भी मैंने कहा कि अंगिरा चौधरी निर्विवाद है जब तक कम से कम कोई और समाजसेवी आगे न आए। अपनी उम्र के साथ मेरा दावा है कि मुझसे ज्यादा तो इस दुनिया में किसी इंसान को तो प्रेम नहीं ही किया होगा।  लेकिन उस इंसान की मजबूरी को समझिये कि वो मुझसे भी ये बात नहीं कह पाए।  आज सोचती हूँ कि आखिरी दिनों में हॉस्पिटल के बेड पर लेटे वो क्या सोचते होंगे।  इस दुनिया की समझदारी तो उन्हें रही ही होगी कि आज न कल ये बात मुझे पता चलेगी। लेकिन जब तक हो सका तब तक उन्होंने छिपाकर रखा।  एक विद्रोह भी है जिसको छिपाने का संघर्ष भी है।  हमारी भलाई, उनकी अपनी भलाई या फिर शायद आपकी भलाई। जिस महिला से उन्होंने 50 साल के लगभग से  कोई संबंध न रहा हो, और वह महिला भी उनके सामने दोबारा नहीं आई हो उसको अपने संस्मरण में ज़िक्र करते भी तो क्या करते। जो भी हो लेकिन इस समाज ने उनसे उनका आजमगढ़ छीन लिया।  और उसी समाज की साजिश है कि जिसने उनसे उनका अतीत छीन लिया आज वर्त्तमान और भविष्य भी छीनने की कोशिश में हैं।

तुलसीराम एक कार्यक्रम में बोलते हुए

लेकिन चाहे जैसे भी हो, उनका अतीत आज हमारे सामने है।  समाज ने आपके साथ अन्याय कर  असल में जो मेरे पिता के पूरे ही अतीत को एक रंग से रंगने की कोशिश की है उसे मैं समझ सकती हूँ।  आपके साथ न्याय होना असल में मेरे पिता के साथ न्याय होना भी होता। लेकिन ये तब नहीं हो सका और एक ख़ास मानवीय संवेदना के तहत ही सही लेकिन मुझे ऐसा  तो लगता ही है कि आज आप वक़्त के ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ हर किसी को किसी न किसी की जरूरत तो होती है। पर दूसरी संवेदनाएं भी हैं।  मैं तुलसी राम की बेटी के साथ साथ प्रभा चौधरी की भी बेटी हूँ।  मेरी जिम्मेवारियां मेरी मां प्रभा चौधरी के साथ भी हैं लेकिन फिर भी मुझसे जितना बन पाएगा आपके जीवन-यापन के लिए करने की कोशिश कर ही सकती हूँ। इस समाज में तो हक़ पत्नी और बेटी दोनों को ही है।  आपके पत्नी के हक़ वाले मामले में नैतिक रूप से तो मुझे इतना ही समझ आता है जो मैं बिलकुल करना चाहूंगी और विधिक रूप से तय करने की क्षमता न तो मुझमे है न ही ये उतना सरल है।  लेकिन हाँ , एक बेटी के रूप में मैं अपना और आपका दोनों का हक़ समझती हूँ।  जैसा कि आपने वीडियो में बताया कि 1965 आपके पिता ने भाइयों को 150 रूपये बैल खरीदने के लिए दिए थे।  जो निश्चित ही उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी राशि है।  और जोड़ी बैल रखने वाले किसानों की स्थिति से समझ आता ही है आपके पिता की हालत सुदृढ़ थी।  मैं बिलकुल चाहूंगी कि आप और आपके लिए न्याय मांगने वाले लोग एकतरफा हक़ की लड़ाई न लड़ें और पिता से भी न्याय की मांग करें। आपका अपने पिता की भी संपत्ति में आपका हक़ है जिसे आपके भाइयों ने दबा रखा है। मायका और ससुराल के बीच झूलने की बात पर इतना तो कह ही सकती हूँ कि मायका तो आपका अपना है।  वहां के आपके निर्विवादित अधिकार हैं। अगर आपके लिए न्याय मांगने वाले लोग आपकी इस लड़ाई में आपका साथ न दें तो समझ लीजिये कि ये बहुत ही षड्यंत्रकारी किस्म के इंसान हैं जो महज अपने फायदे के लिए शोर कर रहे हैं।  पिता पर हक़ के मामले में मैं तो खुद खड़ा होने को तैयार ही हूँ।  वादा करती हूँ कि आप और हम दोनों जब अपने अपने पिता पर हक़ की लड़ाई के लिए खड़ी होंगे, आप मुझे अपने साथ पाएंगी। मैं आपको अपने घर का पता और अपना मोबाइल नंबर भेज रही हूँ। कभी कोई जरूरत हो तो आप सीधे मुझसे संपर्क कीजिये।  तुलसी राम और प्रभा चौधरी की बेटी होने के नाते मुझसे जितना बन सकेगा वो मैं जरूर करुँगी.

एक वादा आपसे और करती हूँ। महिला होने के नाते जो समाज ने आपके साथ किया वो मैं अपने साथ तो नहीं ही होने दूंगी।  आज मेरे घर में कोई पुरुष नहीं है।  नजदीकी रिश्तेदारों में भी नहीं।  लेकिन जो मंसूबे लोगों ने बनाये हैं उसमे सफ़ल नहीं होंगे।  मैं तुलसी राम के विरासत को चंद षड्यंत्रकारी लोगों के हाथों नीलाम नहीं होने दूंगी।  अगर मूर्खता मेरे पिता की विरासत थी तो मेरी विरासत में तो मुझे संघर्ष मिले हैं।

अंगिरा चौधरी 

तस्वीरें गूगल, फेसबुक  से साभार 

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समानांतर इतिहास और अन्य कवितायें (नीरा परमार की)

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नीरा परमार

 कविता, कहानी और शोध -आलोचना के क्षेत्र में योगदान. एक कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित . संपर्क : parmarn08@gmail.com

तब बाबूजी बूढ़े होने लगते हैं !

तब
बाबूजी बूढ़े होने लगते हैं –
जब
दरवाजे की ओट से
कानों से टकराने लगती हैं
जीवन भर की
जमा-जथा की
हिसाब करती
फुसफुसाहटें !
जब बेटे-बहुओं की
हिसाबी उँगलियाँ  जोड़ने लगती हैं
बची-खुची बीती उमर के साथ
गाँव में छूटे
पुरखों के खेत, बगीचे,
घर-आँगन की भूली हुई गिनती !
तब
बाबूजी के झुक जाते हैं कंधे
सूनी आँखें
मृत्यु-लोक की राह खोजती
आकाश को तकने लगती हैं
जब
लाचार
जीवन-संगिनी को
बूढ़े हाथों से झाडू थामे
आँगन बुहारते
देखते भर रहते हैं !

समानान्तर इतिहास

इतिहास
राजपथ का होता है
पगडंडियों का नहीं!
सभ्यताएँ / बनती हैं इतिहास
और सभ्य / इतिहास पुरुष !
समय उस बेनाम
क़दमों का क़ायल नहीं
जो अनजान
दर्रों जंगलों कछारों पर
पगडंडियों की आदिम लिपि —
रचते हैं
ये कीचड़-सने कंकड़-पत्थर से लहूलुहान
बोझिल थके क़दम
अन्त तक क़दम ही रहते हैं
उन अग्रगामी पूजित चरणों के समान
किसी राजपथ को
सुशोभित नहीं कर पाते

शताब्दियाँ —
पगडंडियों से
पगडंडियों का सफ़र तय करते
भीड़ में खो जाने वाले / ये अनगिनत क़दम
किसी मंज़िल तक नहीं जाते
लौट आते हैं
बरसों से ठहरी हुई उन्हीं
अँधेरी गलियों में
जो गलियाँ —
रद्दी बटोरते छीना-छपटी करते कंकालों
कचरों के अम्बारों
झुग्गी-झोपड़ियों के झुके छप्परों से निकलते
सूअरों-मुर्गियों के झुंड में से
होकर गुज़रती है !

रौशन सच

कभी हमारे
करोड़ों करोड़ नन्हे हाथों ने
छुआ था उजाले को !

हमें खबर भी नहीं हुई –
कब किसी ढाबे
किसी ठेले
किसी गलियाती मालकिन की
रसोई में
जूठन धोते–धोते
उम्र के संग वह रौशन सच
मटमैला पड़ गया

कभी ताजा छीले भुट्टे–सी सुगंध बन
जगमगाहट आती थी सपने में
किस्सा था, बीत गया –

अब तो
साँचों में मोम ढालते
बीड़ियाँ लपटते
चूड़ियाँ बनाते
छप्पर के
किसी कोने में
सूरज को खोंस दिया है

 बाल मजदूर

बरसों से –
बोझा ढोती पीठ
क्या तू भी कभी
किताबों का बस्ता
उठाएगी ?

फूटे करम से
गिट्टी-पत्थर कूटते हाथ
क्या तुम भी कभी
कापी-किताब थामोगे ?

भूखमरी की आग से
झुलसी उंगलियाँ
कभी क्या तुम भी
कलम को
सूरज की दवात में डुबो
किसी दिन को
अपने नाम दस्तखत करोगी ?

अन्तहीन पगडंडियाँ 

जंगल-नदी
झाड़ी-झाँखर से गुजरती
सदियों सी लम्बी
अन्तहीन,
दुर्गम पगडंडियों पर
चलते चले जा रहे थके क़दम !

माथे पर
पहाड़ सा बोझा ढोते
काले सूरज सा काला नसीब लिए
नंगे-भूखे
पशुओं से बदतर
जलालत झेलते
ये मानव
ठिठके भकुआए से तकते
दूर दीखते चौड़े-चिकने पथ पर
फर्राटे से उड़,
अदृश्य होते
उत्तेजक संगीत के शोर में डूबे
वाहनों के काफलों को

प्रतिरोध

तुम्हारे माथे पर / यह
भारी डगमगाती विष्ठा की बाल्टी नहीं
तुम्हारी हैसियत है
जो सदियों से
मनुष्य को समाज ने
अपने और तुममें —
अन्तर याद दिलाने के लिए रखा है

उनके लिए
यही है तुम्हारा वजूद जो तुम्हें अपने और —
इस विष्ठा-सने झाड़ू
अस्पृश्य बाल्टी / भिनकती मक्खी में
कोई फ़र्क़ महसूस करने नहीं देता
उन सबके लिए
क्या यह कम राहत नहीं
कि तुम
पीढ़ियों से उनके और
उनके पिताओं-दादाओं-परदादाओं के लिए
बिना व्यवधान प्रतिरोध के
रोज़ तड़के आती रही हो
बिना सवाल किये
जुगुप्सित बाल्टी कसकर हाथों से भींचे
उस नरक की ओर
बेझिझक बढ़ जाती रही हो
जिसके छुआ जाने भर से
चमड़ी जूठी पड़ जाती है
माथे पर तुम्हारे जब तक यह सनद है
तब तक उनकी व्यवस्था को राहत है कि
तुम्हें किसी
नाम-पहचान-अधिकार की
परवाह न होगी !
याद रखो माथे पर जब तक
यह भरी डगमगाती विष्ठा की बाल्टी है
तुम्हें अपने और इस विष्ठा-सने झाड़ू —
अस्पृश्य बाल्टी, भिनकती मक्खी में
कोई फ़र्क़ महसूस नहीं होगा !

 अन्तर्सजा

बहुत देख लिया
नून-तेल आटा-दाल
बटलोई-कड़छुलवाली
रसोईघर की खिड़की से
बादल का छूटता
कोना
यह सोफा कुर्सियां मेज पलंग फूलदान
उधर धर दो

कैलेण्डर में सुबह-शाम बंधे
गलियारे में पूरब-पश्चिम कैद
उस कोने में वह स्नान कोठरी
घिरा बरामदा इधर हटाकर

तारों का कद छूती
पहाड़ों की ये चोटियां
इस खिड़की पर गिरते
झरने की धारा
यहां टिका दो !

चन्द्र ज्योत्स्ना पीकर उफनाया
समुद्र टंगेगा
हवाओं में धुलती बदलती ऋतुएं
जंगलों की बनघास की सुगन्ध
आकाशगंगा में नहाए
ग्रह-उपग्रह नक्षत्र निहारिकाएं
करवट बदलने को करतीं विवश

ये से इस तरह रख दो
इस आले और उस तख्ते पर
बीच दहलीज़
पश्चिम के दरवाजे़ और पूरब के चौरे पर
तुम्हारी व्यवस्था में
अपनी धरती पर बिछाना है मुझे
उत्तरी ध्रुव तक फैला
नीले झूमर-सा झिलमिलाता
… आकाश… !


तस्वीरें गूगल से साभार 

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‘राष्ट्रवादी’ इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल: एक स्त्रीवादी अवलोकन

रतन लाल

 एसोसिएट प्रोफेसर हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, ‘रोहित के बहाने’ सहित 5 किताबें प्रकाशित.संपर्क : 9818426159

राष्ट्रवादी आंदोलन और राष्ट्रवादी इतिहास लेखन के दौर में भारत में जब भी स्त्रियों पर चर्चा होती है, अमूमन दो बातें प्रमुखता से रखी जाती हैं: पहली, प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति अच्छी थी, वे घर की ‘मालकिन’ थीं. उन्हें अर्द्धांगिनी, गृहलक्ष्मी और धर्मपत्नी के रूप में सम्मान प्राप्त था. दूसरी, विदेशी आक्रमण, विशेष रूप से आठवीं सदी में मुसलमानों के आगमन के बाद महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन आया, वे घर में कैद होने लगीं और धीरे-धीरे पुरुषों पर निर्भर हो गईं. उस दौर में और अब भी ऐसे ‘विद्वान’, राजनेता और सामाजिक संगठन हैं, जो प्राचीन काल में महिलाओं की स्थिति की पुनरावृति करना चाहते हैं. स्त्रियों के सम्बन्ध में ऐसे विचार यथा-स्थितिवादी होने के साथ-साथ इतिहास का अति-सरलीकरण भी करते है.

महिलाओं की स्थिति पर चर्चा 19 वीं सदी में अर्थात् औपनिवेशिक काल में शुरू हुई. अँगरेज़ शासकों का मानना था कि वे भारतीयों के हित में ही काम कर रहे हैं और उनका लक्ष्य भारतीयों को ‘सभ्य’ बनाना और अंततः बाल विवाह और सती प्रथा जैसे सामाजिक कुरीतियों को ख़त्म करना है. इस तरह महिलाओं की स्थिति को सभ्यता के इंडेक्स की तरह समझा जाने लगा.

इतिहास की इस औपनिवेशिक समझ की भारतीय प्रतिक्रिया अलग-अलग थी, परन्तु यह मुख्य रूप से दो बिन्दुओं पर केन्द्रित थी – एक राममोहन राय, विद्यासागर जैसे समाज-सुधारकों द्वारा सुधार आन्दोलन के रूप में और दूसरे या तो महिलाओं की स्थिति को न्यायसंगत ठहराना या महिलाओं की ख़राब अवस्था से इंकार करना. इस तरह से अतीत पर सेलेक्टिव अप्रोच पर बल दिया गया.
काशी प्रसाद जायसवाल (1881-1837) बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के बहुयायामी विद्वान थे, जिन्होंने अपने लेखन में अद्भूत बौद्धिक कौशल का परिचय दिया है. जायसवाल का जीवन एक विविध-वांग्मय की तरह रहा, कई घटनाओं से परिपूर्ण – पढ़ाई से व्यवसाय, व्यवसाय से पढ़ाई, मिर्ज़ापुर सेलन्दन, लन्दन से पटना वाया कलकत्ता. जायसवाल सिर्फ 56 वर्ष ही जीवित रहे और मुश्किलसे25 वर्ष गंभीर शोध और लेखन कर पाए. पेशे से तो वे सफल वकील थे, लेकिन बाद के इतिहासकारों ने उनपर ‘राष्ट्रवादी’ इतिहासकार का लेबल चस्पाँ किया, हालाँकि अपने लेखन में उन्होंने ऐसा कोई दावा नहीं किया. उनकी लेखनी की व्यापकता को देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि कौन-सा जायसवाल पहले है – इतिहासकार, साहित्यकार, मुद्राशास्त्री, पुरातत्त्वविद, भाषाविद, वकील या पत्रकार. जायसवाल बहु-भाषी विद्वान थे और कई भाषाओं – संस्कृत, हिंदी, इंग्लिश, चीनी, फ़्रांसीसी, जर्मन और संभवतः बंगाली जानते थे. लेकिन अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार वे दो भाषाओं मेंही लिखते थे – हिंदी और अंग्रेज़ी.  अंग्रेज़ी बाह्य जगत के पाठकों और व्यावसायिक इतिहासकारों के लिए तथा हिंदी स्थानीय पाठक और साहित्यकारों के लिए.

अपने जीवन काल में जायसवाल ने हिंदी प्रदीप, सरस्वती, नागरी प्रचारिणी पत्रिका जैसी लब्ध-प्रतिष्ठ पत्रिकाओं में दर्ज़नों लेख लिखे. 1905 में मिर्ज़ापुर से प्रकाशित हिंदी मासिक पत्रिका कलवार गज़ट और 1914 में पटना से प्रकाशित हिंदी साप्ताहिक पाटलिपुत्र और बिहार ऐन्ड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी से प्रकाशित होने वाले जर्नल ऑफ़ द बिहार एंड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी का आजीवन संपादन भी किया. लेकिन उनका मौलिक कार्य इतिहास लेखन के क्षेत्र में रहा – उन्होंने दर्ज़नों मौलिक पुस्तकें लिखीं और सम्पादित कीं और तक़रीबन दो सौ मौलिक शोध पत्र प्रकाशित किए. इसके अलावा पटना म्यूज़ियम, बिहार ऐन्ड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी और पटना यूनिवर्सिटी में विभिन्न रूपों में अपना योगदान भी दिया.1

यह लेख अकादमिक, व्यवसायिक, निजी, और पत्रकारी जीवन में महिला प्रश्न पर जायसवाल के विचारों की पड़ताल करने का एक छोटा-सा प्रयास है.

आरंभिक दिनों से ही स्त्री-प्रश्न पर जायसवाल के विचार उभरने लगे थे. 1906 में इंग्लैंड जाने से पूर्व जायसवाल ने अपने स्वजातीय संगठन ‘कलवार सभा’ में काम किया.इस संगठन की स्थापना जायसवाल के पिता साहू महादेव प्रसाद ने की थी और इसका उद्देश्य सामाजिक सुधार करना था. इस समय तक कलवार जाति व्यवसायिक रूप से एक बड़े समूह के रूप में उभर रही थी और अन्य समुदायों की तरह अपने समुदाय को आधुनिक बनाने का प्रयत्न कर रही थी. कलवार सभा के झंडे तले जायसवाल ने व्यसन और बाल-विवाह, दहेज़ जैसी सामाजिक बुराइयों का विरोध किया और विधवा विवाह की वकालत की. इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त करने (1906-10) के बाद वे भारत लौटे और पहले कलकत्ता और फिर पटना में बसे. जायसवाल के जीवन-काल में स्त्री-प्रश्न पर उनके विचारों में परिवर्तन को रेखांकित किया जा सकता है.

जायसवाल के ‘अनुज’ और मित्र राहुल संकृत्यायन ने अपने संस्मरण में लिखा है, “उस समय जायसवाल जी अपने बड़े लडके के लिए परेशानी में थे. चेतसिंह की शादी हो चुकी थी, वे बैरिस्टरी पढ़ने इंग्लैंड गए. पहिली पत्नी में शिक्षा और संस्कृति का आभाव सा था. चेतसिंह का प्रेम एक अंग्रेज़ युवती से हो गया. दोनों पति-पत्नी बनकर भारत आये. जायसवालजी ने सोचा था, विवाहित तरुण वहां जाने पर प्रेमपाश में नहीं बंधेगा, पर यह बात बहुधा गलत साबित हुई. जायसवालजी स्वयं विवाहित थे, और वह भी बैरिस्टर होकर आते समय एक अंग्रेज़ महिला के प्रणय सूत्र में बद्ध हो गये थे. हाँ, वह उसे भारत नहीं ले आये. चेतसिंह सबसे लायक पुत्र थे. उनके इस आचरण से पिता को बहुत दुःख था. उन्होंने अपने पुत्र की किसी प्रकार की सहायता करने से इंकार कर दिया था.”2 लेकिन काशी प्रसाद जायसवाल के इंग्लैंड में शादी किए जाने की पुष्टि किसी अन्य स्रोत से नहीं हुई है.

इसी तरह अपने जीवन के आरंभिक दिनों का स्मरण करते हुए जायसवाल की पुत्री सुशीला जायसवाल ने लिखा, “मेरे दादा जी पुराने समय के विचार के थे. अतः जब मैं आठवें में गर्ल्स हाई स्कूल बांकीपुर में पढ़ रही थी. तभी उन्होंने मुझे मिर्ज़ापुर बुला लिया. उनका कहना था, लड़की सयानी हो गई है, नौकर-चाकर घर में आता है, वहां नहीं रहेगी, उसे यहाँ भेजो. पिता जी बिना एक शब्द भी व्यय किए मेरी पढ़ाई छुड़ाकर मिर्ज़ापुर भेज दिए. यह तो बाद में शादी के बाद मेरी माँ जी की इच्छानुसार पुनः घर पर ही संस्कृत के धुरंधर विद्वान पंडित रंगनाथ जी से मैंने शिक्षा प्राप्त की.3

सुशीला जायसवाल ने एक और दिलचस्प घटना का ज़िक्र किया है, “कभी भी मेरी माँ की इच्छा के विपरीत कोई भी शब्द उन्होंने नहीं निकाला. परिवार की प्रतिष्ठा उनके लिए बहुत महत्त्व की चीज़ थी. बात मेरे सबसे छोटे चाचा के ब्याह की है. 1930 की. बारात लखनऊ गई थी. फेरे पर चुकने के बाद ज्ञात हुआ कि लड़की वालों ने धोखा दिया है. जो लड़की दिखाई गई थी, उससे शादी नहीं किए हैं. मेरे चाचा लोग बारात वापस लाने पर अमादा थे. पिता जी को पता चला, तो वे सख्त नाराज़ हुए. कहा कि “जैसी भी लड़की है, मेरे घर की बहु हो गई, अब वह घर में रहेगी”, और सम्मानपूर्वक बहु को घर लाए.”4

उपरोक्त तीन संस्मरणों से प्रतीत होता है स्त्री-प्रश्न पर जायसवाल पर तर्क और वैज्ञानिकता पर लोक-मर्यादा और परम्पराएँ ज्यादा हावी थीं.

भाषा और साहित्य काशी प्रसाद जायसवाल के लेखन का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है. जिस समय से जायसवाल ने हिंदी में लिखना शुरू किया, उसे पश्चिमोत्तर प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में ‘हिंदी नवजागरण’ के काल के रूप में जाना जाता है. इस अवधि में भारतेंदु हरिश्चंद्र और पंडित बालकृष्ण भट्ट के नेतृत्व में हिंदी भाषा और नागरी लिपि को आधिकारिक दर्ज़ा दिलाने का प्रयास चल रहा था. यह काल भाषा के ‘साम्प्रदायीकरण’ का भी काल था. नागरी प्रचारिणी सभा और हिंदी साहित्य सम्मलेन के नेतृत्व में हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाए जाने और हिंदी से फ़ारसी और उर्दू शब्दों को बाहर निकाले जाने का आन्दोलन चल रहा था. हालांकि वैसे विचारक भी थे, जो हिन्दुस्तानी ज़बान की वकालत कर रहे थे. जायसवाल भी इस विमर्श के अभिन्न अंग थे और उनके लेखों में भाषा के सम्बन्ध में उनके विचारों का रूपांतरण/विकास भी देखा जा सकता है. लेकिन भाषा के प्रश्न को जायसवाल ने महिलाओं के प्रश्न से भी जोड़ा. बिहार के प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मलेन में भागलपुर अधिवेशन (1933) के अध्यक्षीय व्याख्यान में इस प्रश्न को गंभीरता से उठाते हुए जायसवाल ने कहा, “भाषा बहुत संस्कृतग्राही हो रही है, जिससे जनता और स्त्रियों को समझने में कठिनाई पड़ती है. निछ्क्की हिंदी का शब्द-कलाप बहुत बड़ा है. अपने खजाने को छोड़ना नहीं चाहिए.”5

इसी संबंध में जायसवाल के मित्रवर शिष्य मोहनलाल महतो वियोगी ने लिखा, “जब-जब भाषा के सम्बन्ध में जायसवालजी से बातें करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उन्हें सदा ‘घराऊ हिंदी’ की वकालत करते सुना. यद्धपि वे पंडित जवाहरलाल जी की तरह हिंदी में उर्दू फ़ारसी शब्द घुसेड़ने के विरोधी थे, तथापि भाषा का रूप घराऊ बनाने के ही पक्ष में थे. साफ़-सुथरी और सीधी-सादी भाषा के इतने प्रेमी थे कि ऐसी भाषा के लेखक को तहे दिल से दाद देते थे. हरिऔध अभिनन्दन ग्रन्थ में उन्होंने सीधी भाषा के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किए हैं. देवकीनंदन जी खत्री, श्री बालमुकुन्द गुप्त और पंडित पद्मसिंह जी की भाषा के बहुत ही प्रशंसक थे. इन्हें घराऊ हिंदी के आचार्य मानते थे.”6

मैथिलीशरण गुप्त ने भी जायसवाल द्वारा घराऊ हिंदी के उपयोग पर एक दिलचस्प हास्य-संस्मरण लिखा, “सन 1919 में हमलोग मसूरी में थे. श्री एस. पी. शाह, आई. सी. एस. भी अपनी धर्मपत्नी के साथ आये थे. कुछ ही दिनों में स्वर्गीय काशीप्रसाद जायसवाल भी अचानक आ पहुँचे. वातावरण विशेष मुखरित हो उठा. एक दिन वार्तालाप में शाह ने उनके एक शब्द पर कहा – “यह ऐसा नहीं, ऐसा होना चाहिए.” जायसवाल ने कहा – “क्यों होना चाहिए?” शाह अधीत पुरुष थे. बोले – “ग्रियर्सन के मत से.” जायसवाल ने कहा – “अजी, हम उस ग्रियर्सनवा को प्रमाण मानें अथवा हमारी माँ-बहनें जो नित्य बोला करती हैं उसे माने?” शाह ने मुस्कुरा कर कहा – “इस पर मैं क्या कह सकता हूँ?”7

भाषा के सम्बन्ध में जायसवाल के उपरोक्त विचारों से स्पष्ट है जायसवाल वैसी साधारण/घराऊ भाषा की वकालत कर रहे थे, जो स्त्रियों, बच्चों और आमजन को आसानी से समझ में आ सके.


उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जायसवाल 1906 में इंग्लैंड गए. इंगलैंड में अध्ययन करते समय उन्होंने हिंदी में कई महत्वपूर्ण लेख लिखे, जो लगातार सरस्वती में प्रकाशित होते रहे. इन प्रकाशित लेखों का एक महत्वपूर्ण अंग यात्रा-वृत्तांत था – कुछ इंग्लैंड की यात्राओं का और कुछ इंग्लैंड से वापसी की यात्राओं का. 8 इन यात्रा-वृत्तांतों में कई मुद्दों पर जायसवाल भारतीय इतिहास से बार-बार सामांतर तुलनाएँ खींचने का प्रयास करते रहे. भारत के प्राचीन इतिहास को याद करते हुए जायसवाल प्राचीन भारत में स्त्रियों की स्थिति का भी यदा-कदा चित्रण करते रहे. अपने लेख ‘इंग्लैंड की जातीय चित्रशाला’ में प्राचीन भारत के बौद्धिक संस्मरणों को याद करते हुए लिखा, “जब हमारी हिन्दू जाति पूर्ण रूप से सजीव थी, तब हमें चित्रण पर बहुत प्रेम था, हमारे राजकुलों में बड़ी-बड़ी चित्रशालाएँ थीं जिसका साक्ष्य हमारे संस्कृत के नाटक दे रहे हैं. थोड़े दिन हुए, मैं यहाँ एक गाँव में गया. देखा लेफ्टिनेंट की गौर-पत्नी बैठी वहाँ के स्वाभाविक दृश्य का चित्रण खिंच रही हैं. चट रत्नावली नाटिका के समय की अपनी सभ्यता का मुझे स्मरण हो गया. सागरिका ने देखते-देखते वत्सराज का चित्र उरेह दिया, उसकी सखी, महिषी और पार्श्ववर्तिनी, ने भी उसी चित्र के पास सागरिका का चित्र खींच दिया अर्थात् प्रत्येक युवती चित्रण कला जानती थी! पर अब कितने हम में हैं जो चित्रशाला के नाम से परिचित हैं – कितनी हमारी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने चित्रकारी की लेखनी देखी है! हमारी सजीवता के ह्रास के साथ परतंत्रता के स्पर्श के साथ – हमारा चित्र प्रेम मिट सा गया!”9

जायसवाल पटना से निकलने वाले हिंदी साप्ताहिक पाटलिपुत्र के संस्थापक-संपादक रहे (जून 1914-अप्रैल 1915). प्राप्त 40 संपादकीयों में से सिर्फ एक स्त्री-आधारित लेख है – लेडी हार्डिंग! यह लेख लेडी हार्डिंग10 के निधन का मृत्यु-संवाद है, ज़ाहिर है प्रशंसात्मक शैली में लिखा हुआ है. हालाँकि एक अन्य सम्पादकीय ‘गाहा-सत्तसइ’ 11 में जायसवाल ने उन्नीस सौ वर्ष पहले स्त्री कवियों के योगदानों का उल्लेख करते हुए लिखा, “सबसे अपूर्व बात यह है कि गाथा-सत्तसई में स्त्री-कवियों की भी कविता संगृहीत है. पोथियों में कवियों के नाम गल गए हैं पर जो बचे उनमें ये नाम हमने छाटें हैं: रेवा, प्रहता (पहई), रोद्दा, अणुलच्छी, माधवी.” इन संपादकीयों के अलावा स्त्री-विमर्श आधारित कुछ ही लेख पाटलिपुत्र में प्रकाशित हुए – सरोजवासिनी गुप्ता लिखित ‘हिन्दू जाति में नारी का सम्मान और स्वाधीनता’12 , पंडित लक्ष्मीश्वर शर्मा लिखित ‘परदे की प्रथा’13  और गोपाल राम लिखित ‘दंपत्ति कलह’.14  यह लेख सावधानीपूर्वक चुने गए हैं, जो संपादक की व्यक्तिगत रूचि को भी दर्शाता है. तीनो लेख अमूमन ‘स्त्री-मर्यादा’, ‘स्त्री-संस्कार’ इत्यादि के इर्द-गिर्द घूमते हैं. पहले लेख में जायसवाल की बेहद महत्वपूर्ण सम्पादकीय टिप्पणी है: हिन्दुस्तान में गत पच्चीस तीस वर्षों से एक प्रकार का नया युग सा आ गया है। हर तरह की उन्नति की चर्चा चारों ओर से सुनाई देती है। कहीं राजनीतिक आंदोलन है तो कहीं समाज सुधार है, कहीं धार्मिक समारोह है तो कहीं साहित्य-सेवियों का सुखद सम्मलेन है। इन सभी प्रकार के आन्दोलनों के अतिरिक्त स्त्री-जाति की वर्त्तमान दुरावस्था को दूर कर समाज में उनकी मान मर्यादा बढ़ाने के लिए भी आंदोलन जारी है। इस आंदोलन में हमारी अनेक सुशिक्षिता भगिनियों का हाथ है और हमारे कुछ उत्साही स्त्री शिक्षा प्रेमी और नारी-जाति के उन्नति-कामी भाई भी शामिल हैं। इस लक्षण को हम देश के कल्याण का कारण समझते हैं, किन्तु कुछ हमारे भाई नारी जाति को पूर्वीय आदर्श के अनुसार शिक्षित न कर उन्हें पाश्चात्य आदर्श पर ले जाना चाहते हैं जिससे हमें भय होता है कि हिन्दू स्त्रियां भी कहीं कालान्तर में वैसी ही उच्छृंखल न हो जायें जैसी इंगलैंड की मतभिलषिणी स्त्रियां हो गयी हैं।

अस्तु, दोष गुण या अपनी अभाव-आवश्यकताएं जितना हम समझ सकते हैं उतना और कोई नहीं।हिंदुस्तान के पुरुषों की वर्त्तमान अवस्था और उनके भविष्य के कल्याण के लिए जो कुछ कर्त्तव्य है उसपर जितनी अच्छी तरह से हम विचार कर सकते हैं उतना और कोई नहीं। इसी प्रकार हमारी महिलाएं स्त्री-जाति के हिताहित की बातों को जिस तरह ठीक ठिकाने के साथ कह सकती हैं उस तरह हमलोग कभी नहीं कह सकते। इसीलिए हम उपर्युक्त विषय पर स्वयं कुछ अधिक न कहकर एक पढ़ी लिखी बंग महिला के विचारों का सारांश नीचे देते हैं और आशा करते हैं कि पाठक इसे ध्यानपूर्वक देखेंगे और प्राच्य तथा पाश्चात्य भावों का मिलान करेंगे। वास्तव में जिस शिक्षा से हिन्दू नारी आदर्श हिन्दू नारी न बनकर सुशिक्षिता होते ही आधी पूरब की और आधी पश्चिम की हो जाय हम उस शिक्षा को दूर से नमस्कार करते हैं।”15

दिलचस्प है, यद्यपि जायसवाल ने अपने आरंभिक दिनों में मिर्ज़ापुर में कलवार सभा से जुड़कर दहेज़,बाल-विवाह के विरुद्ध और विधवा विवाह के पक्ष में आन्दोलन चलाया था और वे खुद भी पाश्चत्य शिक्षा में शिक्षित थे. परन्तु बाद के दिनों में हिन्दू संस्कार उनपर प्रभावी होता दिखा और वे स्त्रियों की सीमित स्वतंत्रता अर्थात् ‘मर्यादा’ के साथ स्वतंत्रता के पक्ष में दिखे!16

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के समाज-सुधारकों और हिंदी विद्वत जगत का एक महत्वपूर्ण मुद्दा स्त्री शिक्षा का प्रश्न भी था. यह मसला उसी तरह निजी था जैसे धर्म. अर्थात् किसी को भी इसमें हस्तक्षेप की इजाज़त नहीं थी. अंग्रेजों के आने के पूर्व उन्हें लोक भाषाओं में भी शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था. कट्टर वैष्णव सुधारक हिंदी भाषा और नागरी लिपि के लिए आंदोलनकर्ताओं में से एक मदन मोहन मालवीय विधवा विवाह और महिलाओं के मताधिकार के विरुद्ध थे और उनके हिन्दू विश्वविद्यालय में बीसवीं सदी के कई दशक तक स्त्रियों को वैदिक शास्त्र पढ़ने का अधिकार नहीं था. वीर भारत तलवार ने दर्शाया है कि कैसे पश्चिम में शिक्षित समाज-सुधारकों का एक बड़ा वर्ग स्त्रियों को धर्म का वाहक और सभ्यता का इंडेक्स समझता था और उन्हें पश्चिमी शिक्षा से दूर रखता था.17

धर्म और सभ्यता का वाहक होने की वजह से ही स्त्रियों को आधुनिक पश्चिमी शिक्षा से दूर रखा जाता था और धार्मिक और नैतिक शिक्षा तक सीमित रखा जाता था. वैज्ञानिक शिक्षा को वे पुरुषों के लिए ज़रुरी मानते थे, स्त्रियों के लिए नहीं. अर्थात् पुरुषों के लिए पश्चिमी और स्त्रियों के लिए पूर्वी शिक्षा!

स्त्रियों को आदर्शीकृत ‘पूर्वी गुणों’ – त्याग, समर्पण, शुद्धता, मर्यादा इत्यादि – के साथ जायसवाल जेंडर संबंधों में शक्ति-सम्बन्ध की संरचना की पहचान शायद नहीं करते. यह दिलचस्प है कि बाल विवाह, दहेज़ का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन करने वाले और स्वयं पश्चिम में शिक्षित होने के बावजूद जायसवाल स्त्रियों के सिमित शिक्षा का समर्थन करते हैं. अर्थात् स्त्रियों के लिए पश्चिमी शिक्षा का विरोध करते हैं. संभव है कि इस तरह से स्त्रीवाद का आदर्शीकरण आज के नारीवादी अतार्किक और अस्वीकृत समझें. पाटलिपुत्र में स्त्रियों से सम्बंधित जितने सन्दर्भ हैं, उनमें शास्त्रों का सन्दर्भ फिर केंद्रबिंदु है.

जायसवाल मूलतः प्राचीन भारतीय इतिहास के इतिहासकार थे. बतौर इतिहासकार जायसवाल ने दर्ज़नों मौलिक पुस्तकें और सैकड़ों लेख प्रकाशित किए. लेकिन दीगर स्थानों की तरह उनके इतिहास-लेखन में भी स्त्रियों की उपस्थिति लगभग नगण्य ही है. हालाँकि उनकी चर्चित शोध-पुस्तक मनु ऐन्ड याज्ञवल्क्य  में उन्होंने लिखा कि बुद्धिज़्म ने स्त्रियों की स्थिति को पहले बेहतर कर दिया था, याज्ञवल्क्य ने स्त्रियों की स्थिति को और अधिक समानता के स्तर तक लाया. इस सन्दर्भ में याज्ञवल्क्य ने मनु के विधान को पूरे आर्यावर्त से हटा दिया. याज्ञवल्क्य को सदैव स्त्रियों के उत्तराधिकार (right of inheritance) के लिए याद किया जायेगा.18
जायसवाल बिहार के विभिन्न आधुनिक संस्थानों – बिहार ऐन्ड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी, पटना म्यूजियम, पटना विश्वविद्यालय – से उनके जन्म के समय से ही विभिन्न रूपों में जुड़े रहे. पटना म्यूजियम के अध्यक्ष की हैसियत से जायसवाल ने पहली बार हेल्थ म्यूजियम19 की स्थापना की. यद्यपि इस हेल्थ म्यूजियम के सभी साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, परन्तु इसका उद्देश्य दर्शकों और खास तौर पर महिला दर्शकों को आकर्षित करना और महिलाओं में उनके स्वाथ्य के बारे में चेतना का प्रसार/प्रचार करना था. इसी तरह से पटना विश्वविद्यालय की विधि निर्मात्री संस्थाओं के सदस्य के रूप में जायसवाल लगातार मीटिंग में भाग लेते रहे. जब महिलाओं के लिए अलग पाठ्यक्रम का प्रस्ताव हाउस में पेश हुआ, जायसवाल एकमात्र सदस्य थे जिन्होंने इसका विरोध किया और यह प्रस्ताव 34:1 से पास हुआ.20  अर्थात् जायसवाल को छोड़कर सभी सदस्यों ने स्त्रियों के लिए अलग पाठ्यक्रम का समर्थन किया.

दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि सार्वजानिक संस्थानों में स्त्रियों के प्रतिनिधित्व के लिए विमर्श कब शुरू हुआ और कब से लागू हुआ. पटना विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य के हैसियत से जायसवाल ने सीनेट में स्त्रियों के लिए आरक्षण का मुद्दा उठाया. जायसवाल ने प्रस्ताव पेश किया कि सीनेट सरकार को यह प्रस्ताव भेजे कि सरकार सीनेट में जितने भी सदस्य नॉमिनेट करे उसमें कम-से-कम तीन स्त्रियाँ ऐसी हों जो प्रान्त की निवासी हों. अपने प्रस्ताव के पक्ष में उन्होंने कहा कि प्रान्त में छात्राओं के लिए स्कूल हैं और उनके उच्च शिक्षा पर भी सकारात्मक प्रतिक्रिया है, इसलिए आवश्यक है कि सीनेट में शिक्षित स्त्रियों को प्रतिनिधित्व दिया जाय. सरकार, 25 सदस्यीय सीनेट में 3 अ-आधिकारिक स्त्रियों (non-official) को प्रतिनिधित्व दे सकती है. सीनेट में इस मुद्दे पर बहस हुई. कुछ सदस्यों ने डोमिसाइल शब्द हटाने की अनुशंसा की, पर इसे स्वीकार नहीं किया गया. जायसवाल ने अपने प्रस्ताव के समर्थन में आगे कहा कि इस प्रस्ताव में वैसी महिलाओं को जो अधिकारिक (official) या जो इस प्रान्त की निवासी नहीं हैं, छोड़े जाने की बात नहीं है. आशय यह है कि प्रान्त की अ-अधिकारिक स्त्रियाँ भी इसमें हों. ज्यादा से ज्यादा स्त्रियों को प्रतिनिधित्व मिले. सीनेट के कुछ सदस्य इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे, इसलिए अगले मुद्दे पर बहस के लिए इस विषय को टाल दिया गया.21

काशी प्रसाद जायसवाल एक सूक्ष्म शोधार्थी थे और खूब लिखते थे. लेकिन हिंदी साहित्य, पत्रकारी, और प्राचीन भारत में इतिहास-पर उनके स्थूल और व्यापक लेखन स्त्री विमर्श न के बराबर है. शायद यह राष्ट्रवादी विमर्श और राष्ट्रवादी आन्दोलन का प्रभाव था, जिसमें राष्ट्र और जाति के अन्दर ही स्त्रियों के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया था. उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जो भी सूचनाएं प्राप्त हैं, स्त्री-प्रश्न पर जायसवाल के निजी और व्यवसायिक जीवन में द्वन्द उभर कर आता है. यद्धपि पटना विश्वविद्यालय के सीनेट में जायसवाल ने महिला आरक्षण की बात की और सामान्य रूप से वे महिलाओं का सम्मान करते थे. लेकिन इंग्लैंड में कई विधाओं में आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद जायसवाल अमूमन ‘पूर्वी आदर्श वाली महिला’के ही पक्षधर थे.

1. . देखें, रतन लाल, काशी प्रसाद जायसवाल: द मेकिंग ऑफ़ अ ‘नैशनलिस्ट’ हिस्टोरियन, आकार बुक्स, दिल्ली 2018, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन(तीन खण्डों में), सस्ता साहित्य मंडल दिल्ली, 2018.
2. देखें, कमला संकृत्यायन, राहुल वांग्मय, खंड 2, जिल्द 1, नई दिल्ली, 1994, पृष्ठ 673.
3.   सुशीला जायसवाल, ‘मेरे पूज्य पिता श्री काशी प्रसाद जायसवाल’, काशी प्रसाद जायसवाल कॉमोमेरेशन वॉल्यूम, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना, 1981, पृष्ठ 57.

4.  वही, पृष्ठ 58
5. सम्पूर्ण व्याख्यान के लिए देखें, बिहार की साहित्यिक प्रगति, बिहार हिंदी साहित्य सम्मलेन, पटना, 1956, पृष्ठ 245-56/ रतन लाल, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 2, नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ 207-15.
6. मोहनलाल महतो, ‘डाक्टर जायसवाल’, सरस्वती, भाग 38, संख्या 4, अक्टूबर 1937, पृ. 337.
7. देखें, मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली, खंड 12,  पृ. 344-45.
8. देखें, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 1, पृष्ठ 139-98.
9.  देखें, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 1, पृष्ठ 151.
10. देखें, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 2, पृष्ठ  58-59.
11. काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 2, पृष्ठ  79-82.

12. पाटलिपुत्र, 18.7.1914, पृष्ठ 1.
13.  पाटलिपुत्र, 5.9.1914, पृष्ठ 6.
14. वही.
15.  पाटलिपुत्र, 18.7.1914, पृष्ठ 1.

16. इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए देखें, F. Orisini, see Women and the Hindi Public Sphere, in Hindi Public Sphere, pp. 241-308
17. विस्तृत चर्चा के लिए देखें, वीर भारत तलवार,रस्साकशी, 19वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत,  Partha Chatterjee, The Nation and its Fragments, especially chapter The Nation and its women.

18. देखें, काशी प्रसाद जायसवाल, मनु एंड याज्ञवल्क्य, पृष्ठ 61-62, 233.
19. एनुअल रिपोर्ट ऑफ़ पटना म्यूजियम, 1933, पृष्ठ 2.
20. एनुअल रिपोर्ट ऑफ़ पटना यूनिवर्सिटी, पृष्ठ 24-25.
21. वही, पृष्ठ 26-27.

तस्वीरें गूगल से साभार 

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स्त्रीकाल द्विमासिक ई जर्नल (शोध), अंक 27-28 ( दिसम्बर मार्च )

स्त्रीकाल शोध द्विमासिक का यह दिसम्बर-मार्च अंक है. अंक 27-28. इस अंक में .दीनानाथ मौर्य,  अनिता शुक्ल, अंजली पटेल, रतन लाल,विकल सिंह, सीमा मिश्रा, हंसराज त्रिपाठी, आकांक्षा, सोनिया माला, अंसारी मोहम्मद इकराम,  मकेश्वर रजक, मोनिका शर्मा, हुश्न तबस्सुम निहां, आलोक कुमार सिंह, सोनिका जसरोटिया,प्रद्युम्न सिंह, रणजीत जाधव, हेना के शोध-आलेख प्रकाशित हैं. इस अंक को लिंक के जरिये नॉटनल पर पढ़ा जा सकता है. आवरण चित्र: प्रवेश सोनी

स्त्रीकाल शोध द्विमासिक अंक 27-28 ( दिसम्बर मार्च )

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दलित स्त्री-लेखन का पहला दस्तावेज: मांग महारों का दुःख (1855)

मुक्ता सालवे/अनुवाद: संदीप मधुकर सपकाले 


फुले-दम्पति (महात्मा फुले-सावित्री बाई फुले) द्वारा स्थापित देश के पहले बालिका-विद्यालय में मात्र 3 सालों की पढ़ाई के बाद मांग जाति की 14 लड़की मुक्ता सालवे  ने यह लेख 1855 में लिखा था, जो पहला दलित-स्त्री लेखन माना जाता है. यह लेख तत्कालीन समाज में व्याप्त ब्राह्मणवाद का दस्तावेज है और उसपर करारा प्रहार. हिन्दी के पाठकों के लिए अनुवाद किया है संदीप मधुकर सपकाले ने. 

ज्ञानोदय के कर्ता से
विशेष बिनती के साथ | यह निबंध मांग  जाति की एक लड़की ने लिखा है | कुछ दिन पहले मैं पुणे गया था | पुणे में अतिशूद्र विद्यार्थियों की पाठशाला के संस्थापक राजश्री जोतिबा माली  ने उस लड़की से यह निबंध हमारे सामने पढ़वाया था | उसी समय हमारी आँखों के सामने रा.जोतिबा द्वारा किए गए श्रमका फल साक्षात् दिखाई दिया |अभी उनकी पाठशाला के विषय में बताने का अवकाश नहीं हैं किंतु हमारे सुधि पाठकों को यह निबंध पढ़कर उनकी पाठशाला की प्रगति का अहसास हो जाएगा | इस निबंध की भाषा और उसकी विषयवस्तु के पहले छह बिन्दुओं में थोड़े बहुत सुधार किए गए थे लेकिन जब इस निबंध को दुनियाके सामने लाने को हुआ तब जिसे उसने अपनी स्वबुद्धि से लिखा हैं वही लोगों द्वारा पढ़कर समझा जाए जिसपर उसके अध्ययन और बुद्धिमानी का अनुमान लगाया जा सकें इसीलिए इस निबंध में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं करते हुए उसे जस के तस प्रस्तुत किया गया हैं |

चित्रकार राजा कांबले द्वारा निर्मित मुक्ता सालवे का चित्र

सिर्फ चौदह वर्ष की उम्र और तीन वर्ष की पढ़ाई में इस लड़की ने यह निबंध लिखा हैं | इस निबंध की कुछ बातें और विचार जैसे अत्यंत शुद्ध होने चाहिए वैसे नहीं हैं | इसके कारण को समझा जाए तो हिन्दू  राज्यऔर हिन्दू धर्म की सत्ता के आधिपत्य में नीच माने गए इन लोगों को पराकाष्ठा तक दुःखों को भोगना पड़ा हैं और आज भी वे उन दुःखों को भोग रहे हैं | इस लड़की ने अपने माँ-पिता से अपनी जाति की जिन बदत्तर स्थितियों को सुना हैं उससे उसके भीतर एक सच्ची वेदना पैदा हुई है जिसे उसने बड़ी निर्भयता और निष्पक्ष ढंग से दिखाया हैं |

पहले मांग और महार जाति को कितने दुःख भोगने पड़ते थे | इस विषय का वृत्तांत इस लड़की के पिता ने हमसे बताया था | आगे किसी अवकाश में ज्ञानोदय के माध्यम से वह प्रकट किया जाएगा | लेकिन अब उस लड़की को उसके स्वयं के विषय में बोलने दे रहा हूँ |
सम्पादक ज्ञानोदय

निबंध
ईश्वर ने मुझ जैसी दीन-दुर्बल के अंतःकरण में हम दुर्दैवी, पशु से भी नीच माने गए दरिद्र मांग-महारों के दुःखों के विषय में वेदना भरी हैं | उस परमपिता परमेश्वर का चिंतन करते हुए मैंने इस निबंध के विषय में अपनी शक्तिनुसार इस विषय पर लिखने का काम अपने हाथों लिया हैं | परंतु बुद्धिदाता और इस निबंध को फल देने वाले मांग, महार और ब्राह्मणों के उत्पन्नकर्ता वे एकमात्र जगन्नाथ हैं |

2. महाराज, वेदों को आधार बनाकर हमारा द्वेष करनेवाले इन लोगों के मतों का खंडन करने पर हमसे ऊँचे माने जानेवाले ये लड्डूखोर पेटू ब्राह्मण लोग कहते हैं कि वेद सिर्फ हमारी बपौती हैं जिसे सिर्फ हम ही देख सकते हैं | इस बात को देखने से स्पष्ट हो जाता हैं कि हम अछूत लोगों की कोई धर्म पुस्तक नहीं हैं | यदि वेद ब्राह्मणों के लिए हैं वेदों के अनुरूप जीवन जीना ब्राह्मणों का धर्म हैं |इन धर्म पुस्तकों को देखने मात्र की छूट  भी हमें नहीं हैं तब ये साफ़ हो जाता हैं कि हम धर्मरहित हैं | ब्राह्मणों के मतानुसार वेदों को हमारे द्वारा पढ़े जानेपर महापातक घटित होता हैं फिर उसके अनुसार आचरण किए जानेपर तो हमारे पास कितने दोष पैदा हो जाएँगे ? मुसलमान लोग कुरआन को, अंग्रेज लोग बाइबल को और ब्राह्मण लोग वेदों को आधार बनाकर चलते हैं इसलिए वे अपने अपने सच्चे-झूठे धर्म के नाते हमसे कुछ कम-अधिक सुखी है ऐसा लगता हैं | तब हे भगवान, तेरी ओर से आया हुआ ऐसा कौन सा धर्म है हमें बता यानी हम सब उसकी रीति से अनुभव लेंगें | लेकिन जिस धर्म का केवल किसी एक ने अनुभव लेना और बाकि के पेटू लोगों के मुहँ तांकते रहने वाले जैसे दूसरे धर्म इस पृथ्वी से नष्ट हो जाए | बल्कि इन जैसे धर्म के अभिमान का लेश मात्र भी हमारे मन में कभी न आए |
3. उदक ईश्वर की देन हैं उसका उपभोग गरीब से लेकर अमीरों तक एक समान सभी कर सकते हैं | परंतु कहा जाए कि वेद यदि देवों की ओर से आए हुए हैं तब उनका अनुभव ईश्वर से उत्पन्न हुए मनुष्य भला क्यों नहीं कर सकते | हैं ना ये आश्चर्य की बात ! इस विषय में बोलनेपर भी शर्म महसूस होती हैं | देखिए एक पिता से चार पुत्रों का जन्म हुआ | सभी के धर्मशास्त्रों का ऐसा सुझाव हैं कि उस पिता की संपत्ति को चारों में एक समान बाँट दिया जाए || लेकिन किसी एक को ही यह संपत्ति मिलें और बाकि बचे हुए लोग पशुवत अपनी बुद्धि और चातुर्य के उपयोग के बिना ही अपना जीवन जीते रहें यह सबसे बड़ी अन्याय की बात हैं | अब जिन वेदों के योग पर ईश्वर के विषय में और मनुष्यों के विषय में कैसा बर्ताव किया जाए और शास्त्र, और कला कौशल के योग से अपने जीवन के क्रम को उत्तम रीति से इस जगत में जिए जानेवाली इस प्रणाली को हमसे दबावपूर्वक छीन बैठना कितना बड़ा क्रूर कर्म हैं ?

4. लेकिन इतना ही नहीं हम महारमांग लोगों को हांककर इन लोगों ने बड़ी-बड़ी इमारतें बना ली और उसमें बैठ गए हैं |और इन इमारतों की नींव में हमें तेल पीलाकर और सिंदूर लगाकर दफन करते हुए हमारे वंश के नाश करने का क्रम भी चलाया हैं इन लोगों ने | सुनो बता रही हूँ कि हम मनुष्यों को गाय भैंसों से भी नीच माना हैं इन लोगों ने | जिस समय बाजीराव का राज्य था उस समय हमें गधों के बराबर ही माना जाता था | आप देखिए, लंगड़े गधे को भी मारने पर उसका मालिक भी आपकी खबर लिए  बिना नहीं रहेगा लेकिन मांग-महारों को मत मारो ऐसा कहने वाला भला एक भी नहीं था |उस समय मांग या महार गलती से भी तालिमखाने के सामने से यदि गुजर जाए तो गुल-पहाड़ी के मैदान में उनके सिर को काटकर उसकी गेंद बनाकर और तलवार से बल्ला बनाकर खेल खेला जाता था | जब ऐसे पवित्र राजा के द्वार से गुजरने कि भी पाबंदी हो तब विद्या अध्ययन की आजादी भला कैसे मिलेगी ?कदाचित किसी मांग-महार ने पढ़ना सीख भी लिया और ये बात बाजीराव को पता चल जाए तो वह कहता “तुम महार-मांग होकर भी पढ़ने लगे हों तब क्या ब्राह्मणों के दफ्तर का काम तुम्हें सौप दिया जाए और ये ब्राह्मणक्याबगल में थैला दबाएँ विधवा स्त्रियों की हजामत बनाते फिरे?” ऐसा फरमान देकर वह उन्हें दण्डित करता था |

5. दूसरी बात यह कि लिखाई-पढ़ाई की पाबंदी मात्र से इनका समाधान नहीं हुआ| बाजीराव साहब तो काशी में जाकर धूल-मिट्टी में तद्रूप हो गए लेकिन उनके साथ रहकर प्राप्त गुणों (!) से यहाँ का महार भी मांग जाति की छाँव पड़ जाने की छूत से दूर रहने की कोशिश कर रहा है |सोवळे  अंगवस्त्र को परिधान कर नाचने वालें इन लोगों का हेतु मात्र इतना ही हैं कि अन्य लोगों से पवित्र एकमात्र वे हैं | ऐसा मानकर वे चरम सुख की अनुभूति भी करते हैं लेकिन वही हमसे बरते जानेवाली छुआछुत से हमपर बरसने वाले दुखों से इन निर्दय लोगों के अंतःकरण भी नहीं पिघलते | इस अस्पृश्यता के कारण हमें नौकरी करने पर भी पाबंदी लगी हुई हैं | नौकरी की इस बंदी से हम धन भी भला कहाँ कमा पाएँगे ?इससे यह खुलासा भी होता हैं कि हमारा दमन और शोषण चरम तक किया जाता हैं | पंडितों तुम्हारें स्वार्थी, और पेटभरु पांडित्य को एक कोने में गठरी बांधकर धर दो और जो मैं कह रही हूँ उसे कान खोलकर ध्यान से सुनों |जिस समय हमारी स्त्रियाँ जचकी हो रही होती हैं उस समय उन्हें छत भी नसीब नहीं होती इसीलिए उन्हें धूप, बरसात और शीत लहर के उपद्रव से होनेवाले दुःख तकलीफों का अहसास खुद के अनुभवों से जरा करके देखोंयदि ऐसे में उन्हें जचकी से जुड़ा कोई रोग हो जाए तब उसकी दवा और वैद्य के लिए पैसा कहाँ से आएगा ! आप लोगों में ऐसा कौन सा संभावित वैद्य था जिसने लोगों का इलाज भी किया हो और मुफ्त में दवाएँ भी बाँटी हों ?

6. ब्राहमणों के लड़के पत्थर मारकर जब किसी मांग-महार के बच्चों का सिर फोड़ देते हैं तब भी ये मांग-महार सरकार में शिकायत लेकर नहीं जाते क्योंकि उनका कहना हैं कि उन्हें जूठन उठाने के लिए इन्हीं लोगों के घूरे पर  जाना पड़ता हैं | हाय हाय, हे भगवन ये दुःखों का हिमालय ! इस जुल्म की दास्ताँ को विस्तार से लिखूं तो रोना आता हैं | इसी कारण भगवान ने हमपर कृपा करते हुए दयालु अंग्रेज सरकार को यहाँ भेज दिया जिस कारण हमारे दुःखों का निवारण शुरू हो गया हैं जिसे अनुक्रम से आगे भी लिखती रहूंगी |(पुढें चालू होईल / आगे जारी होगा)

ज्ञानोदय,DNYANODAYA,(RISE OF KNOWLEDGE)मुंबई, 1 मार्चसन1855,पुस्तक-14,अंक-5

वीरता दिखाने का दंभ भरने वाले  और घर में चूहा मारनेवाले ऐसे गोखले, आपटे, त्रिमकजी,आंधळा, पानसरा, काळे, बेहरे इत्यादि लोगों ने निरर्थक ही मांगमहारों पर चढ़ाई करते हुए अपने कुँए भर रहे थे उसपर और गर्भवती औरतों पर किए जानेवाले देहांत अत्याचार पर भी बंदी आयी |पुणे प्रांत में मांग- महारों के कल्याणकारी दयालू बाजीराव महाराज के राज्य में ऐसी अंधाधुंध थी कि जिसके भी मन जब आए तब वह मांग महारों पर किसी आसमानी तूफान और  टिड्डीदल सिपाहियों की तरह टूट पड़ते और जुल्म करते थे वह भी बंद हुआ | (किले की) नींव में दफना दिए जाने की प्रथा भी बंद हुई | हमारा वंश भी बढ़ रहा हैं | मांगमहारों में यदि कोई बढ़िया से ओढ़कर चलता था तब भी इनकी आँखों फूटे नहीं सुहाता “ये तो चोरी का है ये इसने चुराया होगा” ऐसा बढ़िया ओढ़ना तो सिर्फ ब्राह्मण ही ओढ़ सकते हैं | यदि मांगमहार ओढ़ लेंगें तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा ऐसा कहकर वे उसे खंबे से बाँधकर पीटते थे लेकिन अब अंग्रेजी राज में जिसके पास भी पैसा होगा वह खरीदेगा| ऊँचे वर्ण के लोगों द्वारा किए गए अपराध का दंड मांग और महारों के सिर मढ़ दिया जाता था वह भी बंद हुआ | जुल्म से भरी बेगारी को भी बंद किया गया | कहीं-कहीं पर छू जाने,स्पर्श हो जाने का खुलापन भी आया हैं |
अब इस निःपक्षपाती दयालु अंग्रेज सरकार के राज्य बन जाने से एक ऐसी चमत्कारिक बात हुई है जिसे लिखते हुए मुझे बड़ा आश्चर्य होता हैं वह यह कि जो ब्राह्मण पहले उपर कही गयी बातों के अनुसार हमें दुःख दे रहे थे आज वही स्वदेशीय-प्रिय-मित्र-बंधु हमें इन दुःखों से उबारने में रात-दिन सतत मेहनत कर रहे हैंलेकिन सभी ब्राह्मण ऐसा कर रहे है ऐसा भी नहीं | उनमें से भी जिनके विचार शैतान ले गया हैं वे पहले जैसा ही हमारा द्वेष करते हैं | और ये जो मेरे प्रिय बंधु जब हमें इस व्यवस्था से उबारने में प्रयासरत हैं उन्हें जाति से निकालने की धमकी दी जा रही है |

सावित्रीबाई फुले की तस्वीर

हमारे प्रिय बंधुओं ने मांगमहारों के बच्चों के लिए पाठशालायें लगाई हैं और इन पाठशालाओं को दयालू अंग्रेज सरकार मदद करती हैं | इसीलिए इन पाठशालाओं का बहुत सहाय है | दरिद्रता और दुःखों से पीड़ित,हे मांग महार लोगों,तुम रोगी हो,तब अपनी बुद्धि के लिए ज्ञानरुपी औषधि लो, यानी तुम अच्छे ज्ञानी बनोगे जिससे तुम्हारे मन की कुकल्पनाएँ जाएंगी और तुम नीतिवान बनोगे तब तुम्हारी जिस जानवरों जैसी रातदिन की हाजरी लगायी जाती हैं वह भी बंद होगी | अब पढ़ाई करने के लिए अपनी कमर कस लो | यानी तुम ज्ञानी बनकर कुकल्पनाएँ नहीं करोगे; लेकिन तब भी मुझसे यह सिद्ध नहीं किया जा सकता क्योंकि इसके लिए उदाहरण हैं, जो शुद्ध पाठशालाओं में पढ़कर निपुण हुआ हैं और अपने आप को सुधरा हुआ मानता हैं वह भी किसी समय शरीर पर रोमटे खड़े कर देने जितने बुरे कर्म करता है फिर तुम तो मांग-महारहो|

अनुवादक का नोट 
(15 फरवरी 1855 और 1 मार्च 1855 में मुंबई से ‘ज्ञानोदय’ पत्रिका की पुस्तक-14 के अंतर्गत क्रमशः अंक-4 और अंक-5 में  प्रकाशित मुक्ता सालवे के इस मराठी निबंध को दिनांक 15 फरवरी और 1 मार्च 2018 को 163 वर्ष पुरे हो जाएँगे | इस निबंध के हिंदी अनुवाद के लिए ज्ञानोदय में प्रकाशित मूल निबंध की प्रति प्रो.डॉ.दिलीप चव्हाण, अंग्रेजी विभाग, स्वा.रा.तीर्थ विश्वविद्यालय, नांदेड द्वारा अनुवादक को उपलब्ध कराने के लिए हार्दिक आभार साथ ही हमेशा की तरह स्त्री प्रश्नों में हाशिए के स्त्री लेखन को प्रकाशित करनेवाले और इस निबंध का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने के लिए प्रिय मित्र और संपादक,स्त्रीकाल का शब्दों में आभार व्यक्त नहीं किया जा सकता | इस अनुवाद पर किसी सुझाव के लिए अनुवादक को sandeepmadhukarsapkale@gmail.com पर मेल कर सकते हैं | अनुवादक-  संदीप मधुकर सपकाले, सहायक प्रोफेसर, दूर शिक्षा निदेशालय,म.गां.अं.हिं.वि., वर्धा) 

फोटो: गूगल से साभार 
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सिगरेट और खाली डिबिया

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सुशील मानव


स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन तथा एक्टिविज्म. सम्पर्क: susheel.manav@gmail.com
फोन- 0639349135

सिगरेट और खाली डिबिया

1
लड़की की स्कर्ट से
कितना मेल खाती है ये शाम
आसमान भी घूमने निकला है
लड़के के शर्ट सा शर्ट पहनकर
कि पिछले ही हफ्ते खरीदी है दोनों ने
आज के दिन पहनकर एक-दूजे को रिझाने के लिए
एक दूजे की नजरों में सिगरेट सा फँसे
अंगार हो रहे दोनों राख भी
कि सिगरेट की एक खाली डिब्बी आज इनकी तलाश में है

2
मैक्डोनाल्ड के रेस्टोरेंट में
आमने सामने की सीट पर बैठ
एकदूजे को खिला रहे हैं आइसक्रीम
जुठार जुठारकर
बीच बीच में जुड़ जाते हैं दोनों के होंठ
मेज के ऊपर से
मेज के नीचे
पाँवों में पाँवों की लंगी लगी है
बीच में फँसा है बेचारा मेज
दुनियादारी की तरह
कि उनके करतूतों से खिसियाया रेस्टोरेंट मैनेजर
देता है वार्निंग बीच में फँसे टेबल की तरह
कि बंद करो ये लपर-झपर
कि अब फिर किए ये सब तो
फौरन बुलाऊँगा पुलिस
और फिर निकल जाते हैं दोनों

बाहर, जलते हुए सिगरेट की मानिंद
पीछे रह गया रेस्टोरेंट
सिगरेट के खाली डिब्बे की तरह
मेज पर रखी कटोरी में पिघल रही है आइसक्रीम
एक दूजे में लिपटे
नंगे पड़े हैं दो जूंठे चम्मच
बाकी रह गए अरमानों की तरह

3
बिल्कुल सँटकर बैठे हैं दोनो
रिक्शे पे जाँघ पे जाँघ चढ़ाए
लड़के का हाथ लड़की के कंधे से होते हुए पहुंच रहा है स्तनों तक
नैतिकता के पेंचोख़म से खीझा लड़का
दबा रहा पुरजोर उसका स्तन
ज्यों मर्यादा की जान बसी हो उसमें
लड़की कुरेद रही है लड़के की जाँघ
दुनिया की जख़्मों पर पड़ी पपड़ी की मानिंद
लड़का उठाता है अपनी नज़र
भरनज़र लड़की को देखने के लिए
ठीक तभी लड़की मारती है आँख और शरमाकर नजरें झुका लेता है लड़का
लड़की लपककर भिड़ा देती है लड़के के होठों से होठ
और मूँद लेते हैं दोनों अपनी -अपनी आखें
रिक्शे वाला साइड मिरर से देखता जाता है चुपचाप सब
कि चौराहे की ट्रैफिक रोक देती ही रिक्शे की गति
रिक्शेवाला कहता है बाबूजी लोग देख रहे हैं
चौराहे पर बाबस्ता सैंकड़ों नज़रें
उन्हें रोक रहीं घूर घूरकर वैसा करने से
अधजले सिगरेट सा दोनों फिर समेट लेते हैं अपने होंठ
खंजरी नज़रे छूट जाती हैं पीछे सिगरेट के खाली डिब्बे की तरह

4

बैठे हैं दोनों मंदिर में
हाथ जोड़े, शीश नवाए, घुटनों पे
प्रार्थना के ताईं जब जब मूँदते हैं वो आँखें
बंद आंखों में एक दूजे का ही चेहरा दिखाई देता है
पुजारी देता है जब दोनों के हाथों में प्रसाद के फूल
चूमकर वो फूल खोंस देता है लड़का लड़की के जूड़े में
लड़की चूमकर अपने हाथ का फूल रख देती है लड़के की मुट्ठी में
लड़का याचक नजरों से देखता है लड़की की ओर
जल उठती है प्रेम ज्योति
यूं बाती सी बरर जाती है लड़की लड़के संग आलिंगन में
प्रेम के प्रकाश में काँपने लगते हैं क्रुद्ध पुजारी
हटो, भागो ओ पापियों
कि अपवित्र कर दिया तुम दोनों ने भगवान का घर
आस्था के चैनस्मोकरों ने उठा फेंका मंदिर के बाहर
दोनों को, बुझे हुए सिगरेट की तरफ
पीछे रह गए भगवान और उनका मंदिर
सिगरेट की खाली पैकेट की तरह

5

लड़का लड़की बैठें हैं
एक पार्क में झाड़ियों के पीछे
एक लंबी कश की तरह एक दूजे को अपने भीतर ज़ज़्ब कर लेने की खातिर
कि हिल उठती हैं तभी मदमस्त हुई झाड़ियां
हर फूँक में दहक उठता लड़का
धुएं के छल्ले सा सीत्कार छोड़ती लड़की
कि लाज लिहाज तक न किए संस्कृति की दुहाई देने वाले
और संस्कृति का दुईहथा शिश्न लिए
दनदनाते जा घुसे झाड़ियों में
और खींच लाए दोनों को झाड़ियों के बाहर
वहां क्योंकर न कोई बाल्मीकि हुआ
जो शरापता प्रेमीजोडों को विलगाने वाले उन शिकारियों को
कि कितनी बेदर्दी से फेंककर कुचल दिया उन्होंने
खत्म हुए सिगरेट की तरह
पीछे छूटी रही संस्कृति
बेकार की खाली डिबिया की तरह

6
ये हवा जो इतनी थकान लिए भटक रही
शायद ये उन दो साँसों की कैद से भागी है
किसी सिगरेट की डिब्बी में बैठकर तनिक सुस्ता तो ले ये
कि दो जवाँ साँसें फिर इनकी तलाश में हैं
उनके पास माचिस नहीं है शायद
कि फिर रखे हैं लड़की ने लड़के के होठों पे होंठ
सिगरेट पे रख जलाते सिगरेट की तरह

7
एक काली बाइक आ रुकी गली के मुहाने पे
पीछे सीट से उतरी लड़की
लड़के ने बाइक पे बैठे बैठे ही उतारा सिर से हेलमेट
फिर एंड़ी उठाकर बिल्कुल पंजो पर तनेन होकर
लड़की ने उसके होंठों की बोसागोई की
और फिर एक बार भी बिना पलटे देखे
बेतहासा बदहवास सी भागी गली में
लड़के ने बाइक स्टार्ट की और रात के हरे पत्तों में तोता हो गया
पीछे छूट गया समाज और उसकी कुत्सित मर्यादाएं
फ्लैटों के बार्जे से उँगली दिखाते हुए
खाली और नंगे
सिगरेट के खाली डब्बे की तरह

तस्वीरें: साभार गूगल

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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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प्रिया वरियर तुमने ऐसा क्या किया कि मशहूर हो गई!

सुधा सिंह

 मलयाली फिल्म ‘ओरु आडार लव’ की नई अदाकारा प्रिया वरियर का दो दिन पहले जारी वीडियो आज तक का सबसे बड़ा हिट रहा है। इसने कई देशी विदेशी मशहूर हस्तियों के रिकॉर्ड्स को तोड़ा है। वीडियो मात्र 36 सेकेंड्स का है। फेसबुक और सोशल मीडिया की ताक़त को भी यह दर्शाता है कि यहां क्लिप अपलोड किया गया और वह रातों रात वायरल हो गया। नेताओं और राजनेताओं के साथ प्रिया प्रकाश के इस वीडियों क्लिप के मेम्स बनाए जा रहे हैं। प्रिया और उसके सहअभिनेता रोशन अब्दुल रउफ की चुलबुली अदाएं देखनेवाले का मन मोह रही हैं और मीडिया की भाषा में ‘नेशनल क्रश’ बन गई है।

 इस वीडियो को देखनेवाले दर्शक से कोई नहीं पूछ रहा कि उसे इस वीडियो में क्या अच्छा लग रहा है। प्रिया के साक्षात्कार से धन्य होनेवाले चैनल नहीं पूछ रहे या बता रहे कि इस वीडियो में ऐसा क्या दिख रहा है कि वह सबका पसंदीदा बन गया। मोहब्बत और शरारत की अदाएं पहले भी आईं हैं, देखी गईं हैं लेकिन इतने लाइक्स दो दिन में मिलना, इतना देखा जाना और पसंद किया जाना , शायद पहली बार हो रहा है। यह भी ध्यान रखिए कि वीडियो क्लीपिंग 14 फरवरी 2018 के दो दिन पहले जारी किया गया। जिस देश में 14 फरवरी 2018 की शिवरात्रि की ऑफिसियल छुट्टी का प्रयोग, 14 फरवरी 2018 को पूरी दुनिया में मनाए जानेवाले ‘वैलेंटाइन डे’ पर बात न करने के एक बहाने के रूप में चालाकी किया जाता हो, वहां स्कूली जीवन की पृष्ठभूमि में किशोर प्रेम का यह वीडियो पसंद किया जा रहा है, तो यह सोचने वाली बात है कि आखिर इसमें पसंद की जाने वाली बात कौन सी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान समय में प्रेम और प्रेम को लेकर समझ के भिन्न भिन्न आयाम मौजूद हैं। एक ही समय और समाज में लखनऊ विश्वविद्यालय की ख़बर भी आती है कि वहां प्रशासनिक आदेश से विश्वविद्यालय के गेट पर ‘वैलेंटाइन डे’ पर विद्यार्थी विश्वविद्यालय परिसर में न आ सकें, इस हेतु ताला जड़ दिया गया है। उच्चशिक्षा संस्थान में पढ़नेवाले विद्यार्थियों के माता-पिता को चेताया गया है कि वे 14 फरवरी, वैलेंटाइन डे पर अपने बच्चों को विश्वविद्यालय न आने दें, घर में रखें। इस तरह की अभिभावकीय निगरानी स्कूलों में हुआ करती थी, अब वह उच्चशिक्षा प्राप्त कर रहे वयस्क विद्यार्थियों के जीवन में भी घुसी चली आ रही है। ऐसा समाज हम बना चुके हैं कि जिसमें विद्यार्थी कब ‘बच्चा-बच्ची’ बन जाते हैं , पता नहीं चलता। ऐसे में स्कूल की पृष्ठभूमि पर बनी इस प्रेमकहानी का हिट होना ग़ौरतलब है। अचानक संदेह होने लगता है, हम बदल तो नहीं गए। सामाजिक समझदारी और परिपक्वता बढ़ने तो नहीं लगी। पर यह ध्यान करते ही कि यह खाप पंचायतों वाला समाज है, धार्मिक और जातिगत कट्टरता वाला समाज है, संदेह को काफूर होते समय नहीं लगता।

 टेलीविजन और सिनेमा माध्यम, जिसके विस्तार के रूप में यू-ट्यूब और फेसबुक लाइव तथा अन्य दृश्य प्रसारणों को रख सकते हैं, की खूबी है कि वह सबसे बड़ा स्टोरी टेलर है। लेखक, कहानीकार, कलाकार , सब उसके आगे बौने हैं। यह बांधे रखता है। बांधता है अपनी स्टोरी के जरिए। टेलीविज़न पर स्टोरी चलती है, जीवन में स्टोरी चलती है, रस बनता है फिर रस सामाजिक संरचना में घुलकर समरस बन जाता है, स्टोरी का यह हश्र या अंत है। किसी ने ग़लत प्रचलित नहीं किया है कि ‘कहानी खत्म पैसा हजम’ ! स्टोरी को पैसा वसूल करने वाला होना चाहिए। पैसा तभी वसूल होगा जब सामाजिक-रसिक उसमें आनंद लेगा। लेकिन प्रेम के लिए एक निरंतर क्रूर और असहिष्णु बनता जा रहा समाज, एक विशेष दृश्य में बन रहे प्रेम को कैसे स्वीकार कर रहा है ! क्या यह समाज बदल गया या टेलीविजन और सिनेमा के दृश्य-प्रतीक परिवर्तन के वाहक बन गए। यही वह दृश्य माध्यम है जिसमें एक बांग्ला फिल्म के गाने के जरिए, पॉपुलर संगीतकार और गायक बप्पी लाहड़ी ने कहा था, ‘प्रेम करॉर जायगा नाइ’ ! इस समाज में प्रेम के लिए जगह नहीं है !

याद कीजिए सिनेमा में लड़की ने पहली बार आंख नहीं मारी है। यानि दृश्य प्रतीकों में आंख मारने के सीन रहे हैं, गाने भी बने हैं, पर कोई इतना हिट नहीं हुआ ! इतना पसंद नहीं किया गया, इतनी त्वरित प्रतिक्रिया सिर्फ एक 36 सेकेंड के दृश्य पर नहीं आई।  क्यों ? ‘अंखियों से गोली मारे, लड़की कमाल रे कि अंखियों से..’ गीत याद है न। यह गीत बहुत हिट हुआ था लेकिन इसकी अदाकारा के नाज-नखरों की वैसी चर्चा नहीं हुई जैसी प्रिया प्रकाश की हो रही है। कारण एक तो यह है कि तब यह गीत सीधे सिनेमा के पर्दे पर आया था ; यानि सिनेमा, सिनेमा के मीडियम में ही संप्रेषित हुआ था। वह दृश्य विशेष के रूप में सोशल मीडिया के जरिए वायरल नहीं हुआ, इतनी जल्दी उसके ‘मेम्स’ अन्य नेताओं और अभिनेताओं के साथ बनाकर सोशल मीडिया और व्हाट्सअप पर भेजे नहीं गए। ये नए प्रचार माध्यम हैं, इनकी गति तीव्र है, इनका दखल सीधे वर्तमान समय में है। ये रियल टाइम कम्युनिकेशन का हिस्सा हैं। प्रभाव में फर्क का एक बड़ा कारण स्वंय मीडियम है, इसमें संदेह नहीं।

लेकिन यह नया मीडियम जो रियल टाइम और स्पेस में संप्रेषित कर रहा है, 36 सेकेंड में एक कंप्लीट स्टोरी की तरह नज़र आ रहा है, स्वतंत्र और अन्य से असम्बद्ध नज़र आ रहा है, इसलिए उतने क्षण में रस वर्षा कर आनंद की सृष्टि कर रहा है। इसमें कहीं तनाव या द्वन्द्व नज़र नहीं आ रहा बल्कि उल्टा एक चिर सनातन भाव – ‘प्रेम’ के साथ जोड़कर कुछ नए भावों को पेश किया गया है। आधुनिक लड़की और आधुनिक लड़का प्रेम कर रहे हैं, शरारत और हंसी कर रहे हैं, लुभा रहे हैं और समझ लिए जाने पर शर्मा रहे हैं। सब कुछ संतुलन में है। यहां तक कि लड़की का आंख मारना भी संतुलन में है। साथ ही वह एक नए भाव को भी संप्रेषित कर रहा है कि लड़की केवल ‘बोल्ड’, ‘ब्यूटीफुल’ भर नहीं है बराबरी और स्वतंत्रता के भाव से भी भरी है। लडके ने आंख मारी तो लड़की ने भी आंख मारी ! बात बराबर। ये ‘निर्भया कांड’ और ‘निर्भया क़ानून’ के बाद की लड़की है, आज के जमाने की है। शाबास। लेकिन याद कीजिए रीतिकालीन श्रृंगारी कवियों की पूरी परंपरा को, नायक-नायिका के प्रेम वर्णन को और हमारे प्रसिद्ध कवि सात सौ दोहे वाले बिहारीलाल को- ‘कहत नटत रीझत खिजत’ या ‘भरे भौन में करत है नैनन ही सों बात’ । नैनों से बात करने की यह श्रृंगारी परंपरा बहुत पुरानी और समाज स्वीकृत है। देखा यह जाना चाहिए कि यह 36 सेकेंड का वायरल दृश्य, अपने प्रतीकों और चिह्नों में उस समाज स्वीकृत दायरे से आगे बढ़ा है, कुछ नई बात ‘कोडिफाई’ हुई है या यह श्रृंगार के परंपरित हाव-भाव की स्टीरियोटाइप प्रस्तुति भर है।

यह दृश्य जिन प्रतीकों से निर्मित हो रहा है , वे प्रतीक बहुत सहज और सामान्य नज़र आ रहे हैं। एक लड़का लड़की को देखकर उसकी तरफ भौंहें नचाता है, आंख मारता है। लड़की भी उसके जवाब में तुर्की-ब-तुर्की वही भंगिमाएं करती हैं और इस चुहल से आनंद पैदा होता है। लेकिन अगर सतह के नीचे पढ़ने की कोशिश करें तो यह सहज पाठ अपनी संरचना में बहुत जटिल है। इसमें सामाजिक शक्ति संरचना के उस मिथ की रक्षा की गई है, जिसमें कामुक पहलक़दमी का अधिकार पुरुष को है। प्रेम में पहल करने वाला पुरुष साहसी और स्त्री बदचलन होती है। यह दृश्य, इस सामाजिक रूढ़ि के इर्द-गिर्द ही बुना गया है। स्त्री के हाव-भाव पुरुष की कामुक इच्छाओं को जगाने में सहयोगी होने चाहिए, यह दृश्य इस धारणा के भी अनुकूल है। यानि आंख मारती स्त्री सिर्फ उस पुरुष को सहमति का संकेत दे रही है, इससे ज़्यादा नहीं। हां, अपनी वेशभूषा और हाव-भाव के लिहाज से वह आज की युवा-भाषा में बिंदास भी लग रही है। लेकिन यह स्वतंत्र स्त्री का प्रतीक न होकर स्त्री की रूढ़ छवि है। इस छवि को तोड़ना मीडिया के वश की नहीं।

सुधा सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापिका हैं.  सम्पर्क: singhsudha.singh66@gmail.com

सभी तस्वीरें गूगल से साभार

स्त्रीकाल का संचालन ‘द मार्जिनलाइज्ड’ , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

बसंत के विदा होने से पहले

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अमृता सिन्हा


स्वतंत्र लेखन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित संपर्क: a.sinhamaxnewyorklife@ymail.com



बसंत के विदा होने से पहले 

सुनो
थोड़ी सी धूप
थोड़ी सी कोयल की कूक
थोड़ी उजास फूलों की
थोड़ा सा इत्र इश्क़ का
अँजुरी भर हसीन यादें
शर्मीले से एक बोसे का चिराग़
भेजा है मैंने
हवाओं के साथ
तितलियों की कोमल पंखों के साथ
फुदकती गिलहरियों के साथ
और
थोड़ा इस जाते हुए
बसंत के साथ
तुम
महसूस करना
आँखें मूँद कर
मन के हर कोने में
पाओगे पहरा, मेरी यादों का
मेरी मुस्कुराहटों का
क्योंकि ये दिन तुम्हारे नाम का है
ओ ! प्यारे बसंत मेरे !

अस्तित्व

तुम्हारा प्रेम उस आधार- कार्ड
की तरह है
जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं
जिसे रखती हूँ मैं ख़ूब संभाल कर
किसी प्रेम-पत्र की तरह
हर पल इस क़दर
जैसे मेरा वजूद
सिमटा हो इस अदने से काग़ज़
के टुकड़े में ।
जैसे,
मेरी पूरी पहचान, मेरा परिचय
मेरे होने का सच ,,,, हो सिर्फ इतना ही
यह वही काग़ज़ का टुकड़ा है
जो दिखाता है समय समय पर
हमें हमारी औक़ात
कि इसका छूट जाना , गुम हो जाना
कितना ख़तरनाक हो सकता है
यह उस प्रसूता से पूछो
जिसकी इच्छाओं पर ताला जड़ गया था
और उम्मीदें संदूकों में दम तोड़ रही थीं
जिसका प्रसव इस आधार – कार्ड के
आगे छोटा पड़ गया था
सचमुच ,आधार-कार्ड के जेब में ना होने
का अहसास भी
कितना भयावह है,
ठीक उसी तरह ,जैसे
भूलने की सोचना तुम्हें
आज के बदलते परिवेश में
इसकी उपस्थिति उतनी ही प्रासंगिक है
जितना कि
सपने देखने से
सपने उगने तक
आवश्यक है
आँखों से झरे आँसू में बरक़रार रहे
नमक का स्वाद ।

सपनों के उगने तक

सुबह हो रही थी
पर बिटिया
अब तक सो रही थी
स्कूल जाना था उसे
सो ज़ोर से झिंझोड़कर
जगाया
तकिये में मुँह छुपाते हुए
कहा उसने
सोने दो न माँ
अभी देख रही हूँ सपने
सपना पूरा होनेतक
सोना चाहती हूँ मैं ।
मैं किंकर्तव्यविमूढ़
खड़ी रही
कुछ देर
बिटिया के सपने में
ख़लल नहीं बनना चाहती थी
सो देखने दिया उसे सपना
एक दिन जागती आँखों से
भी ज़रूर देखेगी सपने
इसी उम्मीद के साथ
दिया उसे सपनों की सौग़ात ।
क्योंकि
उसका हर सपना पूरा हो
यही तो मेरा भी सपना है ।

फ़ितरत इंसानों की       

परिंदे भयभीत थे
वे चीख़ रहे थे समवेत स्वरों में
भाग रहे थे इन्सानों से
उनका चौकन्ना रहना जायज़ था
क्योंकि वे जानते थे फ़ितरत इन्सानों कीं
उनको डर था
उन बहेलियों से जो न जाने
कब से ताक़ लगाये बैठे थे
जाल बिछाये पेड़ों के पीछे
पंखों के दुश्मन हैं ये

बाज़ नहीं आते पंख कतरने से
उनकी वहशियाना हरकतें
तो तब भी बेपर्दा होती हैं जब
जब बिना पंखों वाली चिड़िया
आज़ाद की जाती है और वे भागती हैं
सरसराती हुई, निकाली जाती हैं ज़बरन
कभी
मंदिरों के तहख़ाने से
कभी मस्जिद से सटे गंधाते कमरों से
कभी पाकिस्तान की बख्तरबंद  गाड़ियों में मिलती हैं ठूँसी हुई
कभी निकाली जाती हैं अफ़ग़ानिस्तान में सफ़ेदपोश
घरों के अंडरग्राउंड कमरों से
कभी भेजी जाती हैं इराक़
कभी साऊदी अरब
होती हैं ये शिकार कबूतर बाज़ों की
कुछ ही नसीबों वाली होती हैं
जिनकी होती है रिहाई
उन मासूमों की चीख़ें
दहशत से भरी, ख़रगोश सी सहमी
ख़ामोश हो जाती हैं
और
उनकी मौन चीख़े
नहीं पहुँच पाती
देश के किसी कोने में
यहाँ तक कि
संसद के अतिसुरक्षित
बंद ,वातानुकूलित कमरों तक भी नहीं
जहाँ सियासतदां
मसरूफ होते हैं
अपने मुख़्तसर
अट्टाहासों में, अनर्गल बहसों में
और
ग़ैरज़रूरी कहकहों में ।

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फिल्म तो हिट होती रहेंगी, माहवारी स्वच्छता को हिट करें

क्वीलिन काकोती

आज मैं अपना सैनिटरी पैड खरीदने एक फार्मेसी गयी. दुकानदार के अलावा तीन अन्य पुरुष और एक महिला वहां खड़े थे। मैंने पैड देखे और मेरी पसंद के दो पैड देने के लिए कहा. दुकानदार ने मेरे सामने उन्हें मेज पर रखा. वह दुकान मेरे घर के पास है. मैं अक्सर खरीदने के पहले उसे देखती हूँ कि यह मेरे अनुरूप है कि नहीं. मैं हमेशा उसके कॉटन और साइज़ को लेकर सजग रहती हूँ, ताकि यह किसी अन्य आंतरिक समस्या का कारण नहीं बन सके। मेरे पीछे खड़े पुरुष बहुत अजीब महसूस कर रहे थे वे मेरी ओर और मुझे देखने में भी झिझक रहे थे. फिर हमेशा की तरह दुकानदार ने इसे एक काले पॉलीथिन बैग में डाल दिया था. मैं खुद को नियंत्रित नहीं कर सकी और आखिरकार बोल ही पड़ी कि “भैया (एक व्यक्ति को संबोधित करने के लिए दिल्ली का सबसे सामान्य शब्द) अब मासिक धर्म की स्वच्छता पर फिल्म आ रही है,  जहां सबसे लोकप्रिय अभिनेता मुख्य भूमिका में है और आप लोगों को अब भी एक पारदर्शी पैकेट में या कागज के बिना इसे देने में शर्मिंदा महसूस करते हैं।



उसने और वहां खड़े अन्य पुरुषों ने मुझे देखा कि जैसे मैंने कुछ अपराध किया है। फिर दुकानदार ने कहा, “मैडम आप सही हैं लेकिन हम अभी भी भारत में रहते हैं और हमारे पास कुछ मर्यादा बनाएये रखना है। हम विदेश में नहीं रहते और हर कोई आप जैसा आधुनिक भी नहीं है। “मैं उसके जवाब पर चकित नहीं थी, मैंने कहा कि हमारी स्वच्छता के लिए है, इसमें छिपाने जैसी क्या बात है? वे मुझे जवाब नहीं दे सकते थे लेकिन मुझे यकीन है कि फार्मेसी छोड़ने के बाद वहाँ मेरी निंदा की गयी होगी. यह पहली बार नहीं है कि मैं ऐसी स्थिति का सामना कर रही हूं। यह हमेशा मेरे साथ होता है और मैंने हमेशा सभी दुकानदारों से पूछा कि वे अखबारों को लपेटे बिना इसे एक पारदर्शी पॉलीथिन में दे सकते हैं। मुझे लगता है कि हर लड़की को अलग-अलग जगहों में इस तरह का सामना करना पड़ता है, जिस तरह से मैं यहां राजधानी में कर रही हूं। इसलिए स्पष्ट रूप से एक दूरदराज के स्थान की स्थिति की कल्पना की जा सकती है। भारत के सबसे सफल और लोकप्रिय नायक अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘Pad man’ सभी टेलीविजन चैनलों और रेडियो पर छाया हुआ है. हम बॉलीवुड, टीवी उद्योग और खेल बिरादरी के हर बड़े चेहरे को अक्षय कुमार की स्वीकार करते हुए पेड को हाथ या छाती पर प्रदर्शित करते देख रहे हैं. भारत में अचानक हर कोई मासिक धर्म की स्वच्छता के बारे में चिंतित है।

यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगनथम की वास्तविक जीवन की कहानी पर आधारित है। यद्यपि मुझे अभिनेता के रूप में अक्षय कुमार पसंद नहीं है, भले ही वह फिल्म को बढ़ावा देने के लिए एबीवीपी का मंच चुन रहे हैं फिर भी मैं उनका इस समय का समर्थन करती  हूं क्योंकि कम से कम एक प्रतिशत लोग वास्तव में इस फिल्म से शिक्षित होंगे। मैं जानता हूं कि बहुत से लोग फिल्म देखने आएंगे और थियेटर में सीटियाँ बजायेंगे. वे अक्षय के गंभीर प्रयासों की सराहना करेंगे इसे ब्लॉकबस्टर बना देने के लिए। लेकिन थिएटर से आने के बाद लडकियां अपने सैनिटरी पैड को दुनिया से छुपाए हुए एक ब्लैक लेयर बैग में ले जाने को विवश होंगी, दुकानदार इसे अखबार और एक ब्लैक बैग में लपेट कर देगा और आदमी अपनी बहन या पत्नी को एक पैकेट लाने का अनुरोध अस्वीकार कर देगा. यही वास्तविकता है. अचानक मीडिया और मशहूर हस्तियां मासिक धर्म की स्वच्छता के प्रति जागरूक हो गये हैं, लेकिन क्या वे एक नए सुपर हिट को देने के बाद एक महीने बाद भी समान रूप से चिंतित होंगे. भारतीय महिलाओं में ओवरी के कैंसर और सर्वायकल कैंसर की दर बहुत अधिक .है अधिकांश भारतीय महिलाये माहवारी के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं क्योंकि वे पैड नहीं खरीद सकती हैं. ये महिलायें नहीं जानतीं कि मासिक धर्म की स्वच्छता क्या है.  तो क्या हमारा कर्तव्य फिल्म बनाने और कुछ महीनों के लिए प्रचार करने में समाप्त होता है? इसलिए मैं केवल कह सकता हूँ कि स्वच्छता को एक हिट दें  फिल्म को नहीं.

तस्वीरें गूगल से साभार

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