Home Blog Page 63

आप योनि को किस निगाह से देखते हैं, यह सवाल मेरे लिए बेमानी है…

कल्पना पटोवारी

मुझे नहीं पता कि खलनायक फिल्म का वह गीत आपको कैसा लगता है जिसके बोल हैं – ‘चोली के पीछे क्या है, चुनरी के नीचे क्या है।’ मैं आपसे यह सवाल भी नहीं करने जा रही कि ‘लागल जोबनवा में चोट’और ‘लागल करेजवा में चोट’ के बीच आप क्या अंतर समझते हैं। मेरे लिए यह सवाल भी बेमानी है कि आप योनि को किस निगाह से देखते हैं। मेरा सवाल समाज से है जो देश की राजधानी दिल्ली में आठ माह की बच्ची के साथ उसके चाचा द्वारा दुष्कर्म के बावजूद मौन है।

कोई भी साहित्य व संस्कृति बिना महिलाओं के अधूरी है। फिर चाहे वह लोक संगीत ही क्यों न हो, स्त्री अलग-अलग रूपों में, बिम्बों में नजर आती है। मसलन एक बिम्ब सीता का है तो दूसरा बिम्ब शक्ति का। एक तीसरा बिम्ब भी है जिसका वर्णन न तो पौराणिक गाथाओं में मिलता है और न ही इतिहास में। यह बिम्ब है अनगिनत महिलाओं का जो पुरूष प्रधान समाज में बंद दरवाजों में अपना जीवन कब जी लेती हैं, पता भी नहीं चलता है। बंद दरवाजों में उनके साथ हुए जुल्म कभी-कभार सिसकियों के रूप में बाहर आती भी है तो यह पुरूष प्रधान समाज किसी दूसरे के घर का मामला कह अपने कान बंद कर लेता है। यह तो एक पक्ष है। दूसरे पक्ष तो और भी भयावह हैं। इस भयावह पक्ष को समाज चोली और योनि का पर्याय बता पुरूष प्रधान समाज अपनी सहुलियत के हिसाब से महिलाओं की यौन कुंठा तक करार देता है। लेकिन जाहिर तौर पर यह सच नहीं है।

लोक संगीत की सबसे खुबसूरती यही है कि वह महिलाओं को कहने की आजादी देती है। वह उन्हें जीने का हौसला देती है तो अपने अरमानों को अभिव्यक्त करने का तरीका भी सिखाती है। एक कलाकार के रूप में मेरा संबंध लोकगीतों से है। मेरा जन्म आसाम में हुआ और संगीत मुझे विरासत में मिली। साथ ही यह भी कहना चाहती हूं कि मेरा जन्म कौड़ी-कामख्या की धरती पर हुआ, जिन्हें योनि की देवी भी कहा जाता है। उस समय बहुत छोटी थी जब सार्वजनिक तौर पर मैंने गाना शुरू किया। पिताजी मुझे कार्यक्रमों में ले जाते और मुझे एक एक ऊंचे टेबल पर बिठा देते। उन दिनों एक कलाकार के रूप में मेरी परिवरिश भूपेन हजारिका के गीत-संगीत के साथ हुई, जिसकी बुनियाद ही प्रगतिशीलता थी। साहित्य और संस्कृति मेरे प्रिय विषय रहे। यहां तक कि स्नातक में भी मेरा यही विषय बना रहा। बाद के दिनों में जब मैं मुंबई आयी तब जाना कि लोक संगीत के दूसरे आयाम क्या हैं।

प्रारंभ में टी-सीरीज जैसी बड़ी म्यूजिक कंपनी से जुड़ने का मौका मिला। भोजपुरी में गीत गाने के लिए कहा गया। उन दिनों भोजपुरी मेरे लिए एक अजनबी भाषा थी। गीत के बोल अंग्रेजी में लिखे जाते और मुझे गाने के लिए कहा जाता था। तब हिन्दी भी मुझे नहीं आती थी। उन दिनों भी कई शब्द असमिया भाषा में भी थे। भोजपुरी से नजदीकियां बढ़ने लगीं। लेकिन उन दिनों ही मुझसे एक सोलो एलबम गवनवा ले जा राजा जी गवाया गया। यह एलबम बहुत हिट हुआ। इसके पहले भोजपुरी भाषियों के बीच मेरी पहचान भक्ति गीतों को गाने वाली एक गायिका के रूप में ही थी। लेकिन तब मेरी पहचान में बड़ा बदलाव आया।

अपने अतीत के कुछ पहलु आपके समक्ष रखने का मेरा एक आशय यह है कि आप मेरे और भोजपुरी के बीच के रिश्ते को समझ सकें। मैंने हिन्दी बोलना और लिखना सीखा। भोजपुरी बोली को सीखा। मेरे सामने संगीत की दो धारायें थीं। एक जिसके हर सुर में भूपेन हजारिका थे तो दूसरी और भोजुपरी में एक रिक्त धारा थाी। रिक्त कहने का मेरा आशय यह कि उस समय तक मैं भोजपुरी में भूपेन हजारिका को तलाश रही थी। यही तलाश मुझे भिखारी ठाकुर के पास ले गयी। मैंने बिहार राजभाषा परिषद द्वारा प्रकाशित भिखारी ठाकुर रचनावली को पढ़ा। उसमें उद्धृत नाटकों और उसके पात्रों की सहायता से भोजपुरी संस्कृति के उस पक्ष को समझने का प्रयास कर रही थी जिसकी चर्चा ही नहीं की गई।

मसलन बेटीबेचवा नाटक को ही उदाहरण के रूप में लें। उस नाटक में नायिका अपने पिता से शिकायत करती है कि क्यों उसे एक बुढ़े के हाथों बेच दिया गया। गबरघिचोर की नायिका यौन स्वतंत्रता की बात करती है और अपने बच्चे पर अपना दावा ठोंकती है। वह तर्क देती है कि उसका बच्चा नाजायज नहीं है। ऐसी ही नारी स्वतंत्रता की झलक बिदेसिया में मिलती है। पलायन का दर्द झेलने वाली सुन्दरी उस समय भी पुरूष प्रधान समाज में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती है।

भिखारी ठाकुर पर केंद्रित ‘द लीगेशी ऑफ भिखारी ठाकुर’ एलबम लांच करने के बाद मेरा हौसला बढ़ा। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। मैंने अपने आपको रोका नहीं। मेरी जिज्ञासा भोजपुरी गीत-संगीत के विभिन्न पहलुओं के प्रति बढ़ती रही। उदाहरणस्वरूप एक पुरबी है – देवरा तुड़ी किल्ली। पिछले वर्ष पैडी फेस्टिवल के दौरान जब मैं इस गीत काे गायी तब यह बात समझ में आयी कि यह गीत भारत के विभिन्न राज्यों में रहने वाली महिलाओं की पीड़ा को संबोधित करती है जो किसी न किसी रूप में पलायन के कारण होने वाली परेशानियों से जुझ रही हैं। जाहिर तौर पर उनकी परेशानियों में घर की चाहरदीवारी के अंदर होने वाले यौनिक जुल्म भी शामिल हैं।

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े भी कहते हैं कि महिलाओं के साथ सबसे अधिक अत्याचार करीब 85 फीसदी उनके परिजन करते हैं। यौनिक हिंसा के मामले में भी अपराधी अधिसंख्य अपने ही होते हैं। ‘देवरा तुड़ी किल्ली’ भी एक प्रलाप है। इस गीत के माध्यम से एक महिला अपने पति से शिकायत करती है कि वह तो स्वयं परदेस कमाने गया है लेकिन घर में उसका छोटा भाई उसपर बुरी नीयत रखता है। इस गीत का एक पक्ष यह भी है कि वह अपने उपर हो रही हिंसा की शिकायत अपने गांव-समाज में भी नहीं कर सकती है। गांव-समाज उसे इसकी इजाजत नहीं देता है। मुंह खोलने पर मुमकिन है कि गांव-जवार के लोग उसे ही बदनाम कर दें।
]

असल में मेरे हिसाब से भोजपुरी लोक गीत के रूपों में  श्रृंगार और प्रलाप का है। जब मैं श्रृंगार की बात कर रही हूं तो उसमें कई पहलू हैं। अब मेरी ही एलबम गवनवा ले जा राजा जी को देख लिजीये। एक नवविवाहिता अपने पति से अनुरोध करती है कि वह उसे मायके से ले जाय। वह उसके साथ जीना चाहती है। हिन्दी साहित्य में यौन इच्छा की अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों पर नजर दौड़ायें, भोजपुरी लोक संगीत आपको सबसे अधिक स्वतंत्रता प्रदान करने वाला और उदार साबित होगा। अब इसकी आलोचना के कई बिंदू हो सकते हैं। लेकिन आलोचना के क्रम में इसका भी ख्याल रखा जाना चाहिए कि भोजपुरी अंचल में महिलाओं को हक ही कितना दिया गया है। वे किस तरह अपनी बात समाज के सामने रख सकती हैं। गांव की एक महिला यदि खड़ी हिन्दी में बात करे तो संभव है कि उसे कई तरह के लांछन सुनने पडे गोया उसने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो।

इसी प्रकार भोजपुरी गीत का एक रूप प्रलाप का है। समाज का वंचित तबका रोजी-रोटी और इज्जत के साथ जीने के लिए प्रलाप करता है। सोचिए कि हिन्दी में इस तरह प्रलाप क्यों सामने नहीं आता? यह केवल लोकगीतों में ही क्यों प्रत्यक्ष होता है।

बहरहाल आप जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे तो जवाब मिलेंगे भी। लोक संस्कृति कोई पेंडुलम नहीं है जो तत्समता और तद्भवता के बीच डोलती रहे। यह जनता की संस्कृति है जिसकी अपनी परिभाषायें हैं और अपने शब्द और सुर भी। इसमें महिलायें स्वतंत्र हो जीती हैं और मरती भी हैं। यही सकारात्मकता है लोक संस्कृति की। यहां योनि का भी गरिमामय अस्तित्व है और चोली भी भीख में दिया हुआ वस्त्र नहीं।

लेखिका भारत की सुप्रसिद्ध लोक गायिका हैं। मूल रूप से आसाम में जन्मीं कल्पना ने अबतक 30 से अधिक भाषाओं में गीत गाये हैं। साहित्य से उनका गहरा लगाव है। वे अंग्रेजी साहित्य से स्नातक हैं।


तस्वीरें गूगल से साभार

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

राष्ट्रीय आंदोलन में महिलायें और गांधीजी की भूमिका पर सवाल

कुसुम त्रिपाठी

स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें
प्रकाशित हैं , जिनमें ‘ औरत इतिहास रचा है तुमने’,’  स्त्री संघर्ष  के सौ
वर्ष ‘ आदि चर्चित हैं. संपर्क: kusumtripathi@ymail.com

कुसुम त्रिपाठी


सामंती प्रथा की जकड़न जिन प्रदेशों में आज भी अंगद के पैर की तरह जमाए हुए है। पर्दा प्रथा की दीवारों को लाँघना जिन प्रदेशों में आज भी मुश्किल है, उस उत्तर भारत में गांधीजी के आवाहन पर हजारों की संख्या में औरतें सड़कों पर उतरीं। इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली, पंजाब, बिहार, लाहौर और पेशावर की महिलाएँ सार्वजनिक प्रदर्शन, जुलूसों में शामिल होने लगीं। भले घर की औरतों को बिना घूँघट-बुर्का, पर्दा के सड़कों गलियों में इससे पहले कभी न उतरते देखने वाली जनता इस परिवर्तन और उत्साह से चकित थी।
गांधीजी के योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता, किन्तु इस तथ्य को भी ध्यान में रखना जरुरी है कि जब गांधीजी ने महिलाओं संबंधी अपने विचार रखें, तब महिलाएँ स्वयं भी अपने गुणों को पहचानने लगी थीं। ऐसा केवल उनकी व्यवसायिक जिंदगी-डॉक्टर, शिक्षिका और सामाजिक कार्यकर्ता की तरह ही नहीं वरन् सार्वजनिक, राजनीतिक जीवन में भी, राष्ट्रीय और सुधारवादी आंदोलन में, श्रमिक और किसान आंदोलन में उनकी भूमिकाको देखा जा सकता है।

राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी गांधीजी के प्रभाव से हुई। 1920 तक गांधीजी एक गाथापुरुष बन चुके थे। गांधीजी महिलाओं को इसलिए भी जूटा सके क्योंकि उन्हें पुरुषों के रवैये का भी ध्यान था। गांधीजी के व्यक्तित्व की खासियत थी कि वे न केवल महिलाओं में विश्वास जगाने में सफल थे, वरन् महिलाओं के पुरुष संरक्षकों पति, पिता, पुत्र, भाइयों का भी विश्वास उन्हें प्राप्त था। उनके नैतिक आदर्श इतने ऊँचे थे कि जब महिलाएँ बाहर आकर राजनीति के क्षेत्र में काम करती थी, तो उसके परिवार के सदस्य उनकी सुरक्षा के बारे में निश्चिंत रहते थे। इसका कारण था कि गांधीजी का ध्यान महिलाओं की जुझारू क्षमता पर पहली बार दक्षिण अफ्रीका में खिंचा था। वहाँ उन्होंने देखा कि भारी संख्या में महिलाएँ उनके राजनीतिक विचारों से प्रभावित होती है। उनके नेतृत्व में हुए कई आंदालनों में महिलाएँ जेल गई, बिना किसी शिकायत के जेल की कठोर सजा झेली और खदान श्रमिकों की हड़ताल में शामिल हुई। दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आंदोलन से उन्होंने महिलाओं में आत्मत्याग और पीड़ा सहने की अद्भुत क्षमता देखी।

महिलाओं के आत्मत्यागी एवं बलिदानी स्वभाव के हिमायती गांधीजी पहले व्यक्ति नहीं थे, इससे पहले भी समाज सुधारकों और पुनरुद्धारकों ने इस पर कम जोर नहीं दिया था। समाज सुधारकों ने महिला के आत्मत्याग को एक जबरदस्ती थोपे कर्मकाण्ड की तरह देखा।पुनरुद्धारकों की सोच थी कि इन कर्मकांडों से हिन्दू महिलाओं की गौरवमयी छवि बनती है। गांधीजी ने नारी के इन गुणों को हिन्दू कर्मकांड से अलग परिभाषित किया। गांधीजी ने कहा कि यह भारतीय नारीत्व का स्वाभाविक गुण है क्योंकि उनकी अहम भूमिका माँ की है। गांधीजी की सोच थी कि गर्भधारण और मातृत्व के अनुभवों से गुजरने के कारण महिलाएँ शांति और अहिंसा का संदेश फ़ैलाने में ज्यादा उपयुक्त है। गांधीजी के अनुसार स्त्री-पुरुष में जैविक गुणों के अंतर के कारण उनकी अलग-अलग भूमिकाएँ है और दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। पुरुष कमाकर लाता है और स्त्री घर और बच्चों की देखभाल करती है। यहाँ भी गांधीजी ने स्त्री की मातृत्व गुणों और स्त्रियों की भूमिका को अलग परिभाषित किया है। गांधीजी को लगता था कि उनकी अहिंसा की लड़ाई में महिलाएँ उनकी विचारधारा के ज्यादा नजदीक है क्योंकि उसमें काफी पीड़ा सहना शामिल है और महिलाओं से ज्यादा बेहतर कुलीन और श्रेष्ठ ढंग से पीड़ा कौन सह सकता है। गांधीजी की नज़रों में पीड़ा सहने का गुण होना बहुत जरुरी है। उनकी नजरों में “स्वैच्छिक विधवा” आदर्श एक्टिविस्ट थी क्योंकि उसमें पीड़ा में सुख का रास्ता खोज लिया। उनकी नज़रों में वह सच्ची सती थी न कि वह जो पति की चिंता में जलकर प्राणों की आहुति दे देती थी।

गांधीजी की व्यक्तिगत छवि संत महात्मा की होने के कारण उनके नेतृत्व में शुरू हुए देशभक्ति आंदोलन की राजनीतिक और धार्मिक मिली-जुली छवि बनी। उसका क्षेत्र राजनीति से ऊपर उठकर धार्मिक हो गया। देशभक्ति को धर्म माना गया, देश को देवी माँ की संज्ञा दी गई, जिसके लिए बड़े से बड़ा बलिदान कम ही था। गांधीजी आंदोलन में महिला भागीदारी के पूर्ण पक्षधर थे। वे महिलाओं की सभाओं में, अपने भाषणों में, आंदोलनों में उनकी भागीदारी अनिवार्य मानते थे और साथ ही यह कहकर प्रेरित करते थे कि देवियों और वीरांगनाओं की तरह आंदोलन में उनकी अपनी अलग भूमिका है और उसमें इस भूमिका को निभाने की शक्ति और हिम्मत भी है। उन्होंने महिलाओं को विश्वास दिलाया कि आंदोलन को उनके महत्त्वपूर्ण योगदान की जरूरत है। वे कहते थे कि जब महिलाएँ सत्याग्रह आंदोलन में शामिल होगी, तभी पुरुष भी आंदोलन में पूरा सहयोग देगा। ८५ प्रतिशत भारतीय महिलाएँ निर्धनता और अज्ञान के अंधकार में डूबी हुई है। उन्होंने महिला नेताओं से कहा कि उन्हें सामाजिक सुधार, महिला शिक्षा एवं महिला अधिकार के लिए कानून बनाने के लिए काम करना चाहिए, ताकि उन्हें एक बुनियादी अधिकार मिल सके! उन्होंने कहाकि महिला नेताओं को सीता, द्रोपदी और दमयंती की तरह सात्विक दृढ़ और नियंत्रित होना चाहिए तभी वह स्त्रियों के भीतर पुरुषों के साथ बराबरी का भाव जगा सकेगी और अपने अधिकारों के प्रति सचेत तथा स्वतंत्रता के प्रति जाग्रत कर सकेगी।
गांधीजी के अनुसार बराबरी का यह अर्थ कदापि नहीं था कि महिलाएँ वे सब काम करें, जो पुरुष करते है। गांधीजी की आदर्श दुनियाँ में स्त्रियों और पुरुषों के अपने स्वभाव व क्षमतानुसार काम के अलग-अलग क्षेत्र निश्चित थे। उन्होंने महिलाओं को “स्वदेशी व्रत” लेने को कहा। वे सारी विदेशी वस्तुओं का परित्याग करे और प्रतिदिन थोड़े समय सूत कातने और खादी पहनने की प्रतिज्ञा करें।

खादी का प्रचार करते हुए उन्होंने कहाकि महिलाओं की धार्मिक और नैतिक जिम्मेदारी है कि वे देश को समृद्ध बनाए। वे कहते थे – “हमें देश को पुराने समय की तरह फिर से समृद्ध बनाना है। यह तभी संभव है जब संपन्न घरानों की महिलाएँ भी अपने वस्त्रों के लिए सूत काते।” खादी द्वारा गांधीजी महिलाओं को श्रम प्रक्रिया में लाना चाहते थे। उनका कहना था भारत इसलिए गरीब हो गया है क्योंकि उसने स्वदेशी हस्तकलाओं का परित्याग करके विदेशी वस्तुओं पर निर्भर रहना शुरू कर दिया है। महिलाएँ गृह निर्माता और पोषक हैं तथा भारत के पुनरुत्थान में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वे घर में रहकर भी खादी उद्योग चला सकती हैं। इस तरह आंदोलन में भाग लेने के लिए घर से बाहर जाना या परिवार छोड़ना जरुरी नहीं था। सन १९२०-२२ में जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ, पहली बार महिलाएँ भारी संख्या में आंदोलन से जुड़ी। सैकड़ों महिलाएँ खादी और चरखा बेचने गली-गली गई। विदेशी कपड़ों की होली जलाई। मुंबई में महिलाओं ने ‘राष्ट्रीय स्त्री सभा” का गठन किया।यह पहला महिला संगठन था, जो कि बिना पुरुषों की मदद से चलाया जा रहा था। यह संस्था १९२१-३० तक चली। जब तिलक कोष की स्थापना हुई, इन्होंने ४४, ५१९ रु. इकट्ठा कर गांधीजी को दिया। ३०० निर्धन लड़कियाँ वस्त्रों की कटाई कर रही थी, उन्होंने स्कूल खोले और सड़कों पर खादी बेचीं।

1920 के अंतिम दशक में गाँधी ने अपने स्वर में परिवर्तन करते हुए महिलाओं को घर से निकालकर ‘नागरिक अवज्ञा आंदोलन’ में शामिल होने की अपील की, किन्तु उन्होंने उनकी सहभागिता को विदेशी दवाओं, शराब की दुकानों की घेराबंदी करने तक सीमित कर दिया क्योंकि गांधीजी की नज़रों में स्त्रियों का यह कार्य स्वाभाविक रूप से खबता था, इसलिए नहीं कि शराब की दुकानों की वजह से महिला अपने पतियों की नशाखोरी से त्रस्त थी बल्कि इसलिए भी कि वह निजी जीवन में नैतिकता एवं शुचिता का मुद्दा था। सविनय अवज्ञा आंदोलन से राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का नया चरण शुरु हुआ। १९३० को इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी संख्यात्मक और गुणात्मक दोनों दृष्टियों से भिन्न था। मार्च १९३० में अहमदाबाद में दाण्डी तक २४० मील की दांडी यात्रा से शुरू हुई। इस यात्रा में किसी भी महिला को शामिल नहीं किया गया था। डब्लू.आई.ए. ने तथा मार्गरेट बहनों, दादाभाई नौरोजी की पौत्री खुर्शीद नौरोजी व कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने गांधीजी से अनुरोध किया कि उन्हें भी दांडी यात्रा में शामिल किया जायें। गांधीजी ने यह कहकर आग्रह ठुकरा दिया कि अंग्रेज उन्हें औरतों की आड़ में छिपनेवाला कायर कहेंगे, पर अन्त में गांधीजी मान गये।नमक सत्याग्रह में गिरफ्तार होने वाली पहली महिला सरोजिनी नायडू थी। इस सत्याग्रह में कुल ८०,००० लोग गिरफ्तार हुए, जिसमें १७,००० महिलाएँ थी।

इस बीच देशसेविका संघ, नारी सत्याग्रह समिति, महिला राष्ट्रीय मंच, लेडीज पिकेंटिग बोर्ड, स्त्री स्वराज्य संघ और स्वयंसेविका संघ आदि बनें। इन सबने महिलाओं की लामबंदी, जुलूस व प्रभात फेरी निकाले, धरने आदि का आयोजन करने के साथ खादी का प्रचार प्रसार, चरखा चलने का प्रशिक्षण, खादी बेचना, शराब बन्दी, देश की स्वाधीनता का प्रचार, सभाएँ करना, छुआछूत मिटाने संबंधी उपदेश देना, कांग्रेस की सदस्यता बढ़ाना।
१९२८ में लतिका ने बंगाल में महिला राष्ट्रीय संघ की स्थापना की। बंगाल का पहला महिला संगठन, जो राजनीतिक क्षेत्र में काम करता था। लतिका का महिलाओं के लिए संदेश था “उठो, जागो, अपने देश को अच्छी तरह देखो!” चूँकि महिलाएँ आंदोलन में तभी सक्रिय हो सकती थी, जब उन्हें घर के पुरुष सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो। इसके लिए जरुरी था उनके पति, पिता या भाई कांग्रेस या क्रान्तिकारी आंदोलन में हों। उनके केंद्र का नाम था – “शांति मंदिर”। उनका नेटवर्क था। यहाँ महिलाओं को पढ़ना, लिखना, घरेलु हस्त-कलाएँ, प्राथमिक चिकित्सा, स्वयं-रक्षा करने के साथ स्वाधीनता के महत्त्व को बताया जाता था।लतिका तथा अन्य महिला नेताओं को यह स्पष्ट हो गया था कि महिलाएँ देश के सभी मामले से कटी हुई है।

1930 तक आते-आते भारतीय स्त्रियों ने परदा उठाकर फेंक दिया और राष्ट्र के काम के लिए भारी संख्या में बाहर आई। गांधीजी ने सार्वजनिक गतिविधियों की सहभागिता के औचित्य को सिद्ध करते हुए उसे विस्तार दिया ताकि वे वर्ग एवं सांस्कृतिक बंधनों को तोड़कर आगे बढ़े। १९३० के दशक में हजारों की संख्या में महिलाएँ सविनय अवज्ञा और असहयोग आंदोलन में भाग ले रही थी। ऑल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस को भी अपने उच्चवर्गीय दायरे से बाहर आना पड़ा। उन्होंने ग्रामीण किसान और गरीब महिलाओं के बीच काम करना शुरू किया। अब यह संस्था एक एक्टिविस्ट संस्था बन गई थी, और इसकी १९३१ में अध्यक्षा सरोजनी नायडू बनी। इसके पहले तक अध्यक्षा महारानियाँ होती थी।

सन् 1940 के दशक में क्षितिज पर स्वाधीनता का इंद्रधनुष दिखाई दे रहा था और शायद यही कारण है कि स्त्रियों का आंदोलन पूरी तरह स्वाधीनता संग्राम में तब्दील हो गया और नारी मुक्ति के मुद्दे को भारत की स्वाधीनता के साथ जोड़कर देखा जाने लगा। माना जाने लगा कि स्वाधीनता के साथ ही पुरुष एवं स्त्री के मध्य मौजूदा असमानताएँ दूर हो जायेंगी तथा स्वतंत्र भारत में सबकुछ ठीक हो जाएगा। सन १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हजारों की संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। हजारों महिलाएँ भूमिगत हुई, समानान्तर सरकारें बनाने में सहायक रही, रेल की पटरी उखाड़ने से लेकर कचहरियों पर झण्डा फहराने में अग्रणी रही। इस दौरान लाठी-गोली, बलात्कार तक की भारी संख्या में औरतें शिकार हुई। कईयों की हत्याएँ की गई। अरुणा आसक अली ने ग्वालिया टैंक मुंबई में झण्डा फहराते हुए “अंग्रेजों भारत छोड़ो” तथा “करो या मरो’ की उद्घोषणा की, तो डॉ. उषा मेहता तथा उनके साथियों ने मुंबई में समानान्तर रेडियो स्टेशन चलाया। भारी संख्या में किसान महिलाओं ने भूमिकारों और भूस्वामियों के अधिकारों के खिलाफ आवाज उठाई। उस आंदोलन में “जेल भरो आंदोलन” भी शामिल था।’वर्धा’ सेवाग्राम में महिला आश्रम की संचालिका रमाबेन रुइया का कहना था कि – “सन् १९४२ में सेवाग्राम में गांधीजी ने उन सभी महिलाओं को जो जेल जाने वाली थी, उन्हें अपने पिता, पतिया भाई से लिखित सहमति-पत्र मंगवाया था।“जिन लोगों के पास सहमति पत्र था, वे ही जेल भरो आंदोलन में शामिल हो सकती थीं।”

इसी तरह कमला देसिकन, जो १५ वर्ष की आयु में आंध्र प्रदेश से भागकर वर्धा सेवाग्राम गांधीजी के स्वाधीनता आंदोलन में शामिल होने के लिए आई थी, जो बाद में डॉ. सुशीला नैय्यर (प्रथम स्वास्थ मंत्री) की सेक्रेटरी बनी और आजीवन कस्तूरबा हॉस्पिटल से जुड़ी रही। उनका कहना था – गांधीजी ने मुझे सेवाग्राम आश्रम में रहने के लिए मेरे पिता से अनुमति-पत्र लिखवाया था। पिता की आज्ञा के बाद ही मैं सेवाग्राम आश्रम में रह सकी।
इस तरह गांधीजी ने महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के बारे में स्पष्ट रूप से कभी कुछ नहीं कहा। गाँधी के अनुसार स्त्री त्याग और पीड़ा की प्रतिमा है। सूत कातना और वस्त्र बिनना उसके लिए धार्मिक कार्य थे और महिलाओं के स्वभाव के अनुकूल थे। इस तरह राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं को नई पितृसत्ता तले बाध्य रहने को मान्यता मिली। राष्ट्रवादियों को महिलाओं की मुक्ति तथा उत्थान से कोई सरोकार नहीं था। इसके विपरीत महिलाओं की पत्नी, पुत्री और माँ की भूमिकाओं की पुष्टि हुई। केवल राष्ट्रीय आंदोलन की आवश्यकताओं को देखते हुए उसे थोड़ा बहुत विस्तार मिल गया। इस तरह पारंपरिक इतिहास में महिलाओं की संख्या थोड़ी और बढ़ गई।’राष्ट्रीयता के इतिहास में महिलाओं का योगदानकेवल उनकी पारम्परिक भूमिका का विस्तार मात्र है। राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं का कहीं कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं दिखता।

तस्वीरें गूगल से साभार 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

सजर्नर ट्रुथ : क्या पश्चिम की इस सावित्रीबाई को आप जानते हैं?

 प्रेमकुमार मणि

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com

प्रेमकुमार मणि

भारतीय उपमहाद्वीप के समाज में जात-पात की अवस्थिति के कारण कुछ लोगों को लगता है कि गैरबराबरी और शोषण की जटिलताएं केवल हमारे यहां है और बाकि दुनिया में केवल अमीरी -गरीबी का भेद है . ऐसा वही लोग कहते हैं ,जिन्होंने दुनिया के सामाजिक इतिहास को नहीं जाना है ,या कम जाना है . गैरबराबरी की जटिलताएं दुनिया भर में अपने -अपने तरीके से रही हैं .शोषण भी कई जगह बहशी ढंग के रहे हैं . दुनिया भर के उत्पीड़ित इंसानों ने अपने -अपने तरीके से ; बराबरी और मानवता की स्थापना केलिए अपने -अपने समाजों में संघर्ष किये हैं . इनके ब्योरे दिलचस्प और शिक्षाप्रद हैं .

आज हम संयुक्त राज्य अमेरिका की उस महिला के बारे में बात करना चाहेंगे जिन्हे Sojourner Truth के नाम से जाना गया ; – जिसने रंगभेद के खिलाफ और महिलाओं की आज़ादी केलिए उन्नीसवीं सदी में यादगार संघर्ष किया . उनके संघर्ष हमे आज भी उत्साहित करते हैं . सोजॉर्नर ट्रुथ का पूर्व नाम Isabella Van Wagener था , अपने उम्र के अट्ठाईसवें साल में उन ने अपना नामान्तर किया . दरअसल यह भी उनका एक विद्रोह ही था .
Isabella का जन्म 1797 में न्यूयोर्क के अल्स्टर काउंटी में एक गुलामं परिवार में हुआ . माँ का नाम एलिज़ाबेथ था -जिन्हे लोग माउ-माउ बेट के नाम से पुकारते थे . पिता का नाम था जेम्स बौम्फ्री . माता -पिता उन्हें प्यार करते थे ,लेकिन गुलामों का बचपन क्या हो सकता था . बाद में अपने उदासी भरे बचपन का ब्यौरा त्रुथ ने बेबाकी के साथ अपनी आत्मकथा में व्यक्त किया है .

अमेरिका में गुलामी का विचित्र इतिहास रहा है . पुराना अमेरिका वहां के आदिवासियों का था . समुद्री रास्तों की खोज का जनून जब यूरोप में गहराया ;तब नए -नए देशों और द्वीपों की तलाश होने लगी . पंद्रहवी सदी के आखिर में कोलम्बस ने भारत की खोज करते -करते अमेरिका की खोज कर ली थी . जिस हिस्से में वह पहुंचा था उसे आज भी वेस्ट इंडीज (पश्चिम का भारत ) कहते हैं . यूरोपियनों के वहां पहुँचते ही आदिवासियों के दुर्दिन की शुरुआत हो गयी . हमारे देश में भी यह हुआ . लेकिन वहां जो हुआ वह अवर्णनीय है . जो विवरण लेखन के माध्यम से उपलब्ध है वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं .

गुलाम प्रथा का केंद्र न्यूयार्क  था . यह न्यूयार्क  पहले न्यू एमस्टर्डम कहा जाता था . 1664 में इंग्लैंड ने डचों से इसे छीन लिया और इसका नाम न्यूयार्क कर दिया . अंग्रेजों ने यहां अपने उपनिवेश बनाने शुरू किये . वे अफ्रीका से काले नीग्रो लोगों को जहाज में भर -भर कर लाते और जानवरों की तरह नीलामी लगाते . जो लोग इन्हे खरीदते उनके ये गुलाम या दास होते थे . इसे ही गुलामगिरी या दासप्रथा कहा जाता है . 1720 ई. तक न्यूयार्क की कुल इकतीस हज़ार की आबादी में चार हज़ार दास थे . इनकी सामाजिक स्थिति भारत के दलितों से भी बदतर थी . जानवरों की तरह इनकी खरीद -बिक्री होती और इसके लिए मंडियां लगती . नीलामी की बोलियां लगती ,जिनमे पुरुषों की शारीरिक ताकत और स्त्रियों की ताकत के साथ उनकी प्रजनन क्षमता का हवाला दिया जाता . स्त्री के होने पर अधिक कीमत मिलती ,जैसे बैल के मुकाबले गाय की कीमत अधिक होती है .यह इसलिए कि गुलाम औरतों से हुए बच्चों पर मालिकाना हक इनके मालिक का होता था . ये मालिक इन बच्चों को बेच कर धन कमाते थे . इन गुलामों को कोई नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं थे .

अन्य गुलामों की तरह इसाबेल्ला को भी बचपन में ही इनके मालिक ने बेच दिया . वह माँ -पिता से दूर हो गई . यही गुलामी का रिवाज़ था . जब वह तेरह साल की हुई ,तब उसे एक दूसरे मालिक ने खरीद लिया . इस नए मालिक का नाम था जॉन डूमोंट . यह मालिक पहले वाले की अपेक्षा उदार था .इसके साथ इसाबेल्ला सत्रह साल रहीं . जॉन डूमोंट ने जिस दिन इसाबेल्ला को ख़रीदा ,उस ने अपनी डायरी में लिखा -” She was about thirteen , but stands nearly six feet tall ” मनुष्य के मापने का तब यही रिवाज़ था .

ट्रुथ

इसाबेल्ला बचपन से जुझारू थीं .अन्याय का संभव विरोध वह करतीं . एक गुलाम साथी थॉमस ,जिसे वह टॉम कहती थीं ,से उन्होंने एक जद्दोजहद के उपरांत विवाह किया और पांच बच्चों की माँ बनीं . जैसा की गुलामी का दस्तूर था , सभी बच्चे बचपन में ही बेच दिए गए . लेकिन जितना संभव हुआ , इसाबेल्ला ने उन्हें पढ़ाया था .

अट्ठाइस साल की उम्र में इसाबेल्ला ने अपना नाम बदलकर सोजॉर्नर ट्रुथ कर लिया ,क्योंकि वह गुलामी के नाम से मुक्ति चाहती थीं . इस बीच अमेरिका में सामाजिक क्रांति धीरे धीरे ही सही ,लेकिन हो रही थी . बुद्धिजीवियों का ध्यान इस अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के खात्मे पर था ,लेकिन यथास्थिवादी लोग , जैसे कि हमारे भारत में भी ताकतवर हैं , वहां भी थे और वे परिवर्तन के विरोधी थे . 4 जुलाई 1776 को अमेरिका आज़ाद हुआ और वहां डेमोक्रेसी स्थापित हुई .लेकिन डेमोक्रेसी तो बहुमत का होता है और कम संख्या वाले लोगों का शोषण होने की सम्भावना यहां ज्यादा हो जाती है; यदि इसपर नैतिकता या वैचारिकता की नकेल न हो . 1799 में वहां एक कानून बना कि 4 जुलाई 1799 के बाद जन्मे हुए गुलाम बच्चे पच्चीस (मर्द ) और अट्ठाइस (स्त्री ) की उम्र में गुलामी से मुक्त हो जायेंगे . इस कानून के पास होते वक्त Truth केवल दो साल की थी . उन्हें इसका लाभ नहीं मिलने वाला था . बाद में , 1817 में 1799 के पूर्व जन्मे बच्चों पर भी यह कानून लागू हुआ और इसके अनुसार अपने अट्ठाईसवें साल में वह गुलामी से मुक्त हुईं .

गुलामी से मुक्त होते ही सोजॉर्नर त्रुथ सक्रिय हो गईं . वह न तो पढ़ना जानती थीं ,न लिखना . लेकिन उनकी चेतना जाग्रत थी . वह मनुष्य की गरिमा को समझती थीं . ईसाइयत में उनकी आस्था थी और वह कहती थीं कि ईश्वर की नज़र में सब बराबर हैं . जैसे भारत में भक्तिकाल के कवियों ने राम या हरि के नाम लेकर ब्राह्मणशाही पर जोरदार हमला किया था और बराबरी का शंखनाद किया था ; वैसे ही सोजॉर्नर ट्रुथ  ने गोरे वर्चस्ववाद के खिलाफ हल्ला बोल दिया . यह अमेरिकी वर्चस्ववाद भारतीय वर्चस्ववाद से कहीं अधिक क्रूर और अमानवीय था .Truth ने पहले स्वयं को तैयार किया ,अपने परिवार को व्यवस्थित किया और फिर सामाजिक क्रांति केलिए कूद गईं . गुलाम बस्तियों में वह दौरा करने लगीं . वह लोगों से बातें करतीं और विश्वास दिलातीं कि ईश्वर उनके साथ है .उनकी नज़र में काले -गोरे सब बराबर हैं . यह गैर बराबरी चाहे वह काळा -गोरा का हो या मर्द -औरत का ;शैतानों की कारस्तानी है . वह पढ़ना -लिखना बिलकुल नहीं जानती थी ,लेकिन अपनी आध्यात्मिकता के आधार पर वह लोगों से कहतीं कि ईश्वर से उनकी बातें होती हैं . लोग उन्हें ध्यान से सुनते थे .उन्हें सुनने केलिए भीड़ जुटने लगी और वह दूर -दूर जाने लगीं .पूरे अमेरिका के गुलामों को उन्होंने शोषण के खिलाफ जाग्रत किया . सम्मान से लोग उन्हें आंटी त्रुथ कहने लगे .

1850 में ओलिव गिल्बर्ट के साथ मिलकर उन्होंने अपने जीवन की कहानी लिखवाई – Narrative of Sojourner Truth . जब किताब छपी तब खूब बिकी . इसकी आमदनी से त्रुथ ने बेंटले क्रिक में घर बनवाया और जमीन का टुकड़ा ख़रीदा . जब अमेरिका में दासप्रथा की समाप्ति के सवाल पर गृहयुद्ध हुआ ,तब उन्होंने उस में बढ़ -चढ़ कर हिस्सा लिया .वह गुलाम बस्तियों में घूम घूम कर लोगों को जाग्रत करती रहीं . 1864 में वह अब्राहम लिंकन से मिलीं और उन्हें अपना समर्थन दिया . लिंकन ट्रुथ का बहुत सम्मान करते थे और उन्हें आंटी कहते थे . जैसा कि सब जानते हैं गुलामी की प्रथा दूर करने के फैसले के के कारण लिंकन को 1865 में गोली मार दी गई थी .

26 नवम्बर 1883 को 86 साल की उम्र में ट्रुथ का निधन मिचिगन के बैटल क्रीक में हुआ .

किसी की तुलना दूसरे से ठीक -ठीक तो नहीं हो सकती ,लेकिन भारतीय सन्दर्भ में सावित्री बाई फुले को हम उनके साथ रख सकते हैं . निसंदेह ट्रुथ का काम और संघर्ष कठिन था ,लेकिन उनकी ही तरह विपरीत स्थितियों में सावित्रीबाई ने भी स्त्रियों और शूद्रों की मुक्ति केलिए संघर्ष किया . जोतिबा फुले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गुलामगिरी ‘ उन अमेरिकी लोगों को समर्पित किया है , जिन्होंने दासप्रथा के खिलाफ संघर्ष किया है . निश्चय ही टूथ  उसमे शामिल हैं . यह किताब 1873 में लिखी गई है . ट्रुथ  तब जीवित थीं . यह दो देशों के संघर्ष के आत्मीय सूत्र हैं .

तस्वीरें गूगल से साभार

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

असमा जहाँगीर, तुम्हे सलाम !

नूर जहीर 

तुम्हारा कद बहुत ऊँचा नहीं, बल्कि देखा जाए तो दरमियाने से कम ही था; भीड़ में होती तो तुम अक्सर नज़र न आती . जब तक जलूस उस जगह तक नहीं पहुँच जाता जहाँ पुलिस या रेंजेर्स(पाकिस्तन की पैरा-मिलिट्री फ़ोर्स) उसे रोकते. तब तुम सबसे आगे होती, पुलिस अफसर से हाथ भर छोटी, मगर उसकी लाठी को दोनों हाथ से पकडे, साथियों पर बरसने से रोके, हमकदम कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाती, शासकों की ताकत को ललकारती, मार खाने को उपस्थित, मार खाने वालों की तरफ से लड़ने के लिए तत्पर, छोटे कद और बुलंद ख्यालों की असमा जहाँगीर ; नामी वकील, ह्यूमन राइट्स के लिए लड़ने वाली इंसान, औरतों की बराबरी की लड़ाई की मज़बूत सिपाही.

तुमसे एक बार की ही मुलाक़ात है. वैसे दो बार और भी मिलना तय हुआ था, लेकिन आखिरी लम्हे में तुमने फोन करके बताया कि तुम्हे कहीं और जाना है. कहाँ जाना है, जब यह सुना तब विशवास हो गया की तुम्हारा वहां रहना ज्यादा ज़रूरी है; किसी निरपराध की बेल की कोशिश या ‘ब्लासफेमी ‘ में फंस गए मासूम के लिए उपस्थित रहकर, जनगन की आवाज़ बनना ज्यादा ज़रूरी काम तो है ही. न मिल पाने का दुःख तुम्हारी हिम्मत पर गर्व में दब गया. तीसरी बार मिली भी तो बस बीस एक मिनट के लिए, मुस्कुराती हुई, थोड़ी थकी क्योंकि दिनभर कोर्ट में लग गया था,ज़रा अस्त व्यस्त खिचड़ी बाल ठीक करने की कोशिश करती, क्षणों में सामने वाले का जायजा ले लेने वाली,मोटे चश्मे के पीछे से तेज़, बहुत ज़हीन आँखे. धीमी आवाज़ में बात करती, जो कचेहरी में शेरनी की दहाड़ की तरह गूंजती.

कब तय किया था तुमने की जीवन जाएगा तुम्हारा संघर्ष में? छात्र जीवन में तुमने जिया-उल-हक का समय झेला और महिलाओं को सिर ढँक कर रहना होगा जैसे फरमान के खिलाफ खड़ी हुई; बेहया कहलाई क्योंकि तुमने लाहौर शहर के मुख्य चौराहे पर दुपट्टों के अम्बार लगाकर आग लगाईं थी. क्या तब तुम्हे मालूम था कि तुम जद्दोजहद का वह सिपाही बनोगी जो कभी मोर्चा छोड़ नहीं पायेगा?

कहते हैं कि तुम्हारा उस कबीले से तालुक है जो कुकेज़ी कहलाते हैं और जिनका काम चट्टानों को काट कर, पत्थर की सिले ढोने से लेकर, मूर्तियाँ तराशने तक होता है. देखने वाले तो शायद यही कहे की तुमने अपने खानदानी काम से कोई तालुक़ नहीं रखा. लेकिन समझने वाले जानते हैं की तुमने बिलकुल वही किया; जिंदिगी भर तुम समाज और कानून नाम के कठोर पत्थर को तराशकर जिंदिगी की खूबसूरती को उकेरती रही. नहीं, न छैनी न हथोडा कोई औजार कोई साधन नहीं था तुम्हारे हाथ, बस एक जिद थी की जो बेजान है, नीरस है उसमे जान फूंकनी है; जो अन्याय तले कुचला है, शासकों का दमन सह रहा है, उसके साथ खड़ा होना है.

लोग यह भी कहेंगे की तुम्हे भला यह सब करने की ज़रूरत ही क्या थी? अच्छे, खाते पीते घर में जन्म लिया, वकील बनी, ज़मीन जायदाद के झगडे निपटाती, खुद कमाती, आराम की जिंदिगी जीती, क्यों बेकार उन लोगों के लिए लड़ने की ठानी जो तुम्हारी फीस तो दूर, तुम्हारी टैक्सी का भाड़ा भी नहीं दे सकते थे. कुछ लोग यह भी कहेंगे की अपने देश के मजलूमों की लड़ाई लडती वहां तक भी ठीक था. सरहद पार से अमन हो, शान्ति रहे इसकी कोशिश करने की तो बिलकुल तुम्हे ज़रूरत नहीं थी. भला इस सब में औरत का क्या काम, जो करेगा सो शासक वर्ग करेगा. लेकिन तुम्हारा यकीन की महिलायें ही सबसे ज्यादा अमनपसंद होती हैं, क्योंकि ‘युद्ध में लडे चाहे कोई भी हारती केवल औरत है.’ यह वाक्य तुम्हारा उस छोटी सी मुलाक़ात में दिल में आजतक गूंजता है.
इतने पर भी तुमने बस कहाँ किया; उठी लड़ने के लिए उनके लिए  जिन्हें उनका देश ही भेजकर कहाँ याद रखता है? भला भेजे हुए जासूस भी कोई देश अपनाता या स्वीकारता है? तुम्हारा हठ की जासूस हो या मुखबिर, सबसे पहले तो इंसान है.

कितने मोर्चे पर मौजूद रहती थीं तुम, कितने लाम पर लड़ रही थीं? सवाल यह भी करते लोग, की क्या जीत रही हो? मज़ाक उड़ाते ‘कभी तो जीता भी करो कोई मुक़दमा!’ शायद सौ में से 2-3 % जीत नसीब होती हो, या शायद उतनी भी नहीं. लेकिन अपने संघर्ष इंसान इसलिए भी चुनता है कि वह अपने ज़मीर का कैदी होता है, वह अन्याय देख नहीं सकता, दमन सह नहीं सकता. जीत मिले या न मिले, दुनिया को यह दिखाना और जताना ज़रूरी होता है की हम अभी मोर्चे पर मौजूद हैं, हम अभी हारे नहीं हैं, हम बाकी हैं; और जब तक हमारा यह जज्बा बाकी है तुम अन्यायी इस ग़लतफ़हमी में न रहना की तुम जीत गए हो !
नहीं, तुम कहीं गई नहीं हो, इसलिए तुम्हे अलविदा नहीं कहा जा सकता!

असमा जहाँगीर, तुम्हे सलाम !
लड़ाई जारी है साथी!


नूर जहीर लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

तस्वीरें गूगल से साभार

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

दुश्मनी से परे जन की बात: पाकिस्तानी जनांदोलन की किताब

 “पीपल्स  मूवमेंट्स इन पाकिस्तान’” पर एक चर्चा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कांफ्रेंस हॉल में, आठ फरवरी को रखी गई. पुस्तक पाकिस्तान के जाने माने वामपंथी विचारक और सामाजिक कार्यकर्त्ता की लिखी हुई है जिसे नूर ज़हीर के प्राक्कथन के साथ द मर्जिनलाइज्ड ने प्रकाशित किया है.

लेखिका और एक्टिविस्ट तथा योजना आयोग की पूर्व सदस्य डॉ. सईदा हमीद की अध्यक्षता में इस कार्यक्रम में अन्य वक्ता थे  वायर के एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन,  सांसद डी राजा और अली  अनवर तथा वार्ता का संचालन  नूर ज़हीर ने किया.  सभी वक्ताओं ने पुस्तक की प्रशंसा की और ख़ास करके इस बात की सराहना की लेखक ने इतना समय आर्काइव्ज में बिताया, सामग्री जमा की, उसका सम्पादित कर, वर्ग और समय के अनुसार उसका सूचीकरण किया और तथ्यों की जांच पड़ताल और शोध करके एक पुस्तक तैयार की. सिद्धार्थ वरदराजन  ने अपने वक्तव्य में कहा कि  वृतान्त इतिहास के हिसाब से नहीं बल्कि विषय और प्रसंग के अनुकूल विभाजित किया गया है. यह एक तरह से पुस्तक को और रोचक बनाता है और पाठक को पूरे माहौल, समय और घटना क्रम को समझने में सहायक होता है. वरदराजन   ने बताया कि असलम ख्वाजा ने अपने विश्लेषण में पूर्ण रूप से निष्पक्ष रह कर तथ्यों को रखा है, जिसमे उन्होंने नामी वामपंथी कवि  फैज़ अहमद फैज़ को भी बक्शा नहीं है, और प्रमाणित किया है कि इतना बड़ा क्रांतिकारी शायर भी राष्ट्रवादिता की अंधभक्ति का शिकार हो सकता है, जैसे फैज़ हुए थे 1971  में पूर्वी पाकिस्तान के भाषा आन्दोलन के समय. वरदराजन  के अनुसार अपने समय और सोच के  आइकॉन पर ऊँगली उठाना बहुत ही साहस का काम है .

सिद्धार्थ वरदराजन  ने पूरी पुस्तक का एक ब्यौरा पेश किया और खासकरके बलोचिस्तान वाले अध्याय की बहुत प्रशंसा की. लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि यह अध्याय राष्ट्रपति मुशर्रफ के समय पर आकर समाप्त हो जाता है जबकि बोलिचिस्तान के सन्दर्भ  में बहुत कुछ उसके बाद घटित हुआ है, जिसकी जानकारी ज़रूरी है. उनका सुझाव था की इस अध्याय को अपडेट किया जाना चाहिए. उन्होंने इस बात पर भी श्रोताओं का ध्यान दिलवाया कि भारत में पाकिस्तान के बारे में रूचि तो है लेकिन उसके जानकार एक भी नहीं; मसलन बलोच भाषा का जानकार विरले ही कोई हो भारत में; उसी तरह जब वर्तमान सिन्धी जाने वालों को पीढ़ी नहीं रहेगी तब कितने लोग निजी रूचि से सिन्धी सीखेंगे. उन्होंने इस और भी ध्यान दिलाया कि पाकिस्तान में पहले भारतीय अख़बारों और भारत में पाकिस्तान के अख़बारों के तीन तीन संवादाता थे लेकिन आज दोनों देशों में एक भी नहीं है.

डॉ. सईदा हमीद ने अपनी बात महिलाओं वाले अध्याय पर रखी. महिलाओं के संघर्ष ज़्यादातर नकार दिये जाते है जबकि उनका योगदान हस आन्दोलन में होता है और अपने मुद्दे तो केवल वही उठाती हैं. सईदा  ने इस बात की सराहना  करते हुए कहा कि लेखक ने महला आंदोलनों को भी दर्ज किया है और जिन क्षेत्रों में महिलायें शामिल रही वहां भी उन्हें स्थान देकर उनकी मौजूदगी दर्ज की है. सईदा  ने कहा कि यह एक अफसोसनाक हालात है कि पाकिस्तान में हुए अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और धर्मपरिवर्तन की बात तो भारत में मीडिया बहुत उछालता है लेकिन वहां ऐसी घटनाओं के विरोध में कितने जलूस निकले, कितना लिखा गया और न्यायपालिका को आदेश देने पर मजबूर किया गया कि उन लड़कियों की वापसी हो इसकी कोई खबर नहीं छपती. उनके शब्दों में ‘भयानक है वहां पर विद्रोही महिला होना’ क्योंकि ज़मीनी स्तर पर बहुत ख़ामोशी से काम करने वाली परवीन रहमान को भी इसलिए मार दिया जाता है क्योंकि वह ज़मीन के नाजायज़ दखल के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रही थीं. सईदा ने नूर ज़हीर की किताब में छपी भूमिका की भी तारीफ करते हुए कहा कि उसे पढने के कारण वह सो नहीं पाई और उसी से किताब कि गति निर्धारित होती है.

डी. राजा ने कहा कि  इस पुस्तक से उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आये क्योंकि वह भी छात्र आन्दोलनों से निकले हुए कार्यकर्ता हैं और अखिल भारतीय छात्र संगठन के सदस्य रहे हैं. उन्हें इस बात की ख़ुशी थी की छात्र आन्दोलन पर एक अध्याय इस पुस्तक में शामिल है क्यों छात्र समुदाय का संघर्ष अपनी गतिशीलता के चलते कम ही दर्ज होता है; अक्सर इन संघर्षों से हासिल किये हुए बदलाव भी जल्दी ही प्रशासन मिटा देता है. इस किताब द्वारा उन्हें याद आये वे सब कामरेड जो मूलतः उस हिस्से के थे जो आज पाकिस्तान है और जिनके भारत आजाने पर उन्होंने खुद उनके साथ काम किया है जैसे कामरेड पेरिन बरुचा, कामरेड रोमेश चन्द्र और बेगम हाजरा . डी राजा ने कहा कि इस पुस्तक से भारत के लोगों के दिमाग में पनप रही पाकिस्तानियों के बारे में गलतफहमियां कम हो जाएँगी.

राज्य सभा सदस्य अली अनवर ने प्रकाशकों की सराहना करते हुए कहा की द मार्जिनलाइज्ड ने इस किताब को छापकर बड़े साहस का काम किया है और उन्हें उम्मीद थी की इससे  भारत और पाकिस्तान दोनों के बीच  बेहतर समझदारी बनेगी.

बातचीत की शुरुआत करते हुए नूर ज़हीर ने कहा की भारतवासियों के पास पाकिस्तान का केवल वही चेहरा है जो भारतीय सरकार पेश करना चाहती है. इसका मूल आधार उसकी अपनी सुरक्षा और शासन में बने रहने की इच्छा होती है. इसलिए गाली गलौज, सीमा पर गोलीबारी, जनता में डर उकसाया जाता है ताकि मतदानों में विजय पाई जा सके. उन्होंने यह भी कहा कि किसान और मजदूर आन्दोलन तो दर्ज किये जाते हैं लेकिन कलाकारों, लेखकों, महिलाओं, मीडिया और प्रेस, छात्रों के जलूस, आन्दोलन, और प्रशासकों से मुठभेड़ कभी दर्ज नहीं होते.  उन्होंने यह भी कहा की कश्मीर और बलूचिस्तान में चल रही जद्दोजहद को तुलनात्मक दृष्टि से देखने की ज़रूरत है और बलोचिस्तान वाले अध्याय से बहुत कुछ सीखा और समझा जा सकता है .

चर्चा के दो बहुत ही महत्वपूर्ण हासिल रहे और कुछ सुझाव भी आये; 1. किताब का हिंदी और उर्दू में अनुवाद होना चाहिए; श्रोताओं में से ही दो ने अपनी रूचि जताई इस कार्य को फ़ौरन करने में. 2.इस पुस्तक को अंग्रेजी में और फिर अनुवाद को भी इतनी बड़ी पुस्तक के रूप में छपने के बजाये, हर अध्याय को अलग पुस्तिका की शक्ल में छापा जाना चाहिए. इससे पाठक का ध्यान हर विषय पर केन्द्रित रहेगा और शोध की भी संभावना बढ़ेगी.

चर्चा के दौरान ही नूर ज़हीर के पास कन्नड़ के प्रकाशक ‘नव कर्नाटका’ का सन्देश आया कि वे महिला आन्दोलन और लेखक, कलाकारों वाले अध्यायों को पुस्तिकाओं के रूप में अनुवाद करके छापना चाहते हैं.

PEOPLE’S MOVEMENTS IN PAKISTAN

A discussion on the book PEOPLE’S MOVEMENTS IN PAKISTAN was held at the Conference Hall 1, of India International Centre. The book has been written by Aslam Khwaja, senior journalist, leftist thinker and activist based in Karachi, Pakistan and published in India by THE MARGINALISED PUBLICATION, with an introduction by Noor Zaheer.

The Conference Hall was full with a responsive audience that had a number of young people and scholars. Dr. Syeda Hameed chaired the discussion and the speakers were (chair), Siddharth Vardhrajan (speaker),D.Raja, MP, Rajya Sabha, Ali Anwar, MP, Rajya Sabha and Noor Zaheer moderated the discussion.

The book was appreciated by one and all, and especially admired was the way author must have spent time in the archives, gathering material and sources, cataloguing and categorizing it, sorting and editing and rechecking the facts and then finally putting it together in eight chapters. Equally well received was the fact that even though the account is not chronological, the author has made it a theme-based divisions.

SidhharthVardarajan’s observed that this makes the reading both interesting and it also helps the reader in many ways to understand and visualize the complete scenario. Mr. Vardarajan also made a pointed reference to the way Aslam Khwaja has brought out the well-known poet Faiz Ahmed Faiz’s weakness, at a couple of times in terms of his pro-Statist stance and thus taken an objective view of the most revolutionary poet Pakistan has produced. Vardhrajan appreciated the unbiased position taken by the author who had the courage to take a stand and point out the flaws in one of icons of our times.

Aslam Khwaja and Noor Zaheer

Siddharth Vardrajan who had thoroughly read the book gave a good ‘tour’ of the whole book, almost a bird’s eye view and was especially all praise for the Balochistan chapter. However, he pointed out that this chapter ends at the President Musharraf’s period, though a lot has happened since then which has focused International attention on the Baloch movement. He also expressed anguish at the fact that even though Pakistan is an immediate neighbor, there is no serious research being conducted on any area that falls within Pakistan; he was doubtful that after the present generation of Sindhis had passed on, knowledge of Sindhi would also recede.He also pointed out that earlier there were three representative journalists of India in Pakistan and three of Pakistan in India, but now there were none.

 Dr. Sayeeda Hameed concentrated on the chapter on the women’s struggles. She pointed out that this is one aspect that often gets ignored when movements or struggles are documented. She elaborated how the media ignores news from Pakistan and often sensationalizes issues like the kidnapping and forced conversions of girls from minority communities but does not highlight the protests and demonstrations undertaken by women’s organizations which often force the judiciary to recover these girls. She also mentioned the low key activists like Parveen Rehman who documented land and land reforms and legally contested the forced occupancy of land from its rightful dwelled and was killed for that. SyedaHameed  was also all praise for Noor Zaheer’s Introduction to the book which she said sets the pace for the book and had kept her awake through the night.

Comrade D.Raja said that the book reminded him of his own student days and the student movements, because he was himself a product of the All India Students Federation. He was also happy that a chapter had been included on the students movements since the students are a mobile population and hence the movements they undertake are often not documented or recorded; often the changes that they bring about are also nullified by the management once a set of students passes out. The account he said made him remember and recall many comrades under whom he had worked like Perinbaricha, Ramesh Chandra and Begum Hajra. He also said that this book would help to remove the misconception in the minds of the Indians about the people of Pakistan.

Rajya Sabha MP, Ali Anwar said that he thought it was extremely brave of the Publishers to bring out this book at a time when war rhetoric was considered as a form of nationalism. He said he was sure that the book would pave the way for better understanding between the Indian and Pakistani people.

Opening the discussion Noor Zaheer said that people in India have only the Indian States version of what Pakistan is. This version is often based on the governments own need for survival; so it often indulges in war jingoism, which leads to border skirmishes, which leads to a fear in the public that tranforms itself in the ballot victory. She also introduced the book pointing out that often workers and peasant movements are documented but not the movements of writers, artistes and performers, or movements launched by the media and press or women’s movements. She elaborated that comparison can be drawn between what is happening in Balochistan in Pakistan and Kashmir in India and in the chapter on Balochistan there are lessons to be learnt for both the people and the governments.
But perhaps the best result were two suggestions – (i) the book should be translated into Hindi and Urdu – for Hindi, a couple of people volunteered immediately, publicly announcing their desire to be involved in this. (ii) The second suggestion was that these translations can be brought out not as a complete book but in parts – for example, one chapter could form one booklet. This would focus the interest on one subject at a time and open up room for even more in-depth research.
While the discussion was in process, a message was received by Noor Zaheer, from
NAVAKARNATAKA, a leading, leftist Publishing House of Kannada to publish two chapters: Women’s Movements and Art and Literature in Kannada as separate books.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

प्रेम के भीतर देह ने केंद्रीय विमर्श खड़ा किया है: अनामिका

रानी कुमारी 

“स्त्री क्या है? क्या स्त्री, पुरुष का अन्य है/ अदर है। जो पुरुष को पूरा करते हुए निस्तेज हो जाती है। क्या स्त्री एक कोरी स्लेट है कि कोई भी उस पर, कोई भी इबारत लिख दे! साहित्य में स्त्री का चित्रण कैसे हुआ है?’ ये सवाल वरिष्ठ आलोचक रोहिणी अग्रवाल ने दिल्ली विश्वविद्यालय में संजीव चन्दन के कहानी संग्रह के विमोचन समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए किये.

जनवरी माह में सर्दियों के आगमन के साथ ही साहित्य के मौसम में अनेक पुस्तकें आई। बहुत-सी किताबों का लोकार्पण हुआ और परिचर्चा हुई। इसी समय ‘स्त्रीकाल’ पत्रिका के संपादक और स्त्रीवादी कार्यकर्ता संजीव चंदन के पहले कहानी संग्रह ‘546 वीं सीट की स्त्री’ का लोकार्पण 17 जनवरी 2018 को पी. जी. मेंस हॉस्टल दिल्ली विश्वविद्यालय में हुआ तथा इस अवसर पर ‘कथा में स्त्री’ विषय पर परिचर्चा भी हुई। कार्यक्रम के शुरुआत में दूधनाथ सिंह और रोहित वेमुला (17 जनवरी को ही रोहित ने आत्महत्या की थी ) की स्मृति में 2 मिनट का मौन रखा गया। परिचर्चा की अध्यक्षता कवयित्री अनामिका जी ने की।

रोहिणी अग्रवाल ने आगे कहा कि हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ को हम एक प्रेम कहानी के रूप में पढ़ते हैं इस कहानी को सोचकर लहनासिंह याद आता है और सूबेदारनी याद आती है। इस कहानी में सूबेदारनी प्रेम का प्रतिदान मांगती है ना कि प्रतिदान देती है। लेकिन शायद आज ऐसा नहीं होता। उन्होंने कहा कि स्त्री लेखन मिथकों को रचता है। स्त्री लेखन उसके तलघर की दमित आकांक्षाओं और सपनों को कुरेदता है। हालांकि स्त्री लेखन के एक हिस्से में दिखता है कि पुरुष कितना खलनायक है। जबकि पुरुष लेखन करता है तो स्त्री को हीन और दोयम दर्जे के रूप में चित्रित करता है। स्त्री और पुरुष दोनों प्रतिपक्ष के दो पाले में ही रहेंगे? पुरुषों के लेखन से स्त्री गायब होती जा रही है । स्त्रियों में प्रेम का कुचला हुआ और दमन का रुप ही क्यों आता है! लेखक स्त्री में आत्मविश्वास क्यों नहीं भरता ? संजीव मेरे प्रिय कथाकार है। उनके उपन्यास मुझे छूते हैं, झकझोरते हैं पर उनके यहां एक भी अविस्मरणीय स्त्री पात्र नहीं मिलता। उदय प्रकाश की कहानियों में स्त्री पितृसत्ता, वर्ण-व्यवस्था को मजबूत करती नजर आती है। उनके यहां भी स्त्री के निजता का सवाल नहीं मिलता। ऐसे दो लेखक हैं जिनके यहां पर स्त्री लड़ती हुई दिखाई देती है एक शिव मूर्ति और दूसरे भगवानदास मोरवाल। लेकिन जब मैं संजीव चंदन की कहानियां पढ़ती हूं तो लगता है कि वह सार्थक हस्तक्षेप कर रही हैं. संजीव चंदन के इस कहानी संग्रह की कहानियों में स्त्रियों से जुड़े विविध पहलू और मुद्दे, उसकी सच्चाइयां व्यक्त होती हैं। स्त्री का व्यक्तित्व समग्रता में आकार लेता है इन कहानियों में। इस संग्रह को आज के समय की बहुत बड़ी दस्तक के रूप में याद किया जाना चाहिये।

रोहिणी ने कहा कि संजीव चंदन की कहानियों में बार-बार आता है कि ये वो समय था जब ये हुआ, जब वो हुआ। हम भूमंडलीकरण के दौर में जी रहे हैं।आधुनिक समाज में जी रहे हैं जहां सूचनाओं पर अधिकार का दंभ हम भरते हैं। दुनिया नहीं सिकुड़ी हमारी सोच सिकुड़ी है, वापस हम कबीलाई हो गए हैं। इस विडंबना को ये कहानियां व्यक्त करती हैं. ‘तुम्हीं से जनमूं तो पनाह मिले’  की नायिका कह रही है कि मैं अब बेटी को जन्म ही नहीं दूंगी बल्कि मेरे रौंदे हुए, कुचले हुए सपनों, ऊर्जा, अरमानों को उसमें उकेर दूंगी।आर्ची की कहानी यौन शोषण से उत्पन्न उत्पीड़न की कहानी भर नहीं है. इसके खिलाफ मोर्चाबंदी रूमी ले रही है।

इन कहानियों में लेखक पात्र भी है, कथावाचक भी है और कथा पाठक के रूप में आनंद भी लेता है। तीनों रूपों में वह अपने आप को बांटकर चल रहा है। शिल्प में कथा का आनंद भी ले रहा है। कथा के ताने-बाने में परंपरागत ढांचे को तोड़-फोड़ करके स्त्री के मन में घुसता ही इस तरह से है कि स्त्री का त्रिआयामी चित्रण कर सके। यह कहानी संग्रह कोई समाधान नहीं दे रहा है। यह कहानी संग्रह एक डिबेट का आह्वान करता है। इस डिबेट के लिए दूसरे की आवश्यकता नहीं बल्कि अपने अंदर विचार विमर्श करने की जरूरत है। यह जो पुरुषों की लेखनी में जो चुप्पी पसरी हुई है स्त्रियों को लेकर। उसको यह कहानी संग्रह बहुत ही सृजनात्मक और बहुत ही अविस्मरणीय ढंग से तोड़ने वाली धमक है।

पैनल के पहले वक्ता और युवा आलोचक कवितेंद्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि अभी तक मैं संजीव को स्त्रीवादी कार्यकर्ता के रूप में ही जानता था। संजीव चंदन ने 22 साल में 11 कहानियां लिखी। इससे ऐसा लगता है कि बहुत कम लिखते हैं ,या जम कर लिखते हैं। ‘546 वीं सीट की स्त्री’ कहानी में ऋचा, भविष्य की स्त्री नहीं है। अपने जीवन में दमन झेलती हुई आखिरकार राजनीति में सत्ता पा लेती है। लेकिन एक स्त्री की राजनीति सत्ता, पितृसत्ता के मुकाबले हार जाती है और कहानी बखूबी यह चीज दिखाती है। संजीव चंदन की कहानी स्त्रीवादी लेखन में उपलब्धि है।’इनबॉक्स में रानी सारंगा : धइले मरदवा के भेस हो’ और ‘प्रेमकथा में हाड़ा रानी की पुनर्वापसी बनाम बैताल…’ कहानियों में विवाहेतर प्रेम को दर्शाया गया है। शादी के बाद भी प्रेम की क्या आवश्यकता पड़ती है। अभी तक हमारा समाज प्रेम को ही स्वीकार नहीं कर पाया है! अब तक विवाहेत्तर प्रेम में पति खलनायक चित्रित होता रहा है लेकिन संजीव की कहानियों में विवाहेतर प्रेम में पति खलनायक नहीं है। यह ख़ास बात है. संजीव की कहानियां हल नहीं सूझा पाती, वह हम पाठकों पर छोड़ देते है। तबस्सुम सवाल पूछती है कि रूमी का पात्र ऐसे क्यों गढ़ा? ऐंगल्स ने कहा है यौन प्रेम स्वभावत: एकांतिक होता है। संजीव चंदन की कहानियां मुक्ति का सवाल उठाती है।

आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘कथा में स्त्री’ पद काफी मानीखेज है। बाणभट्ट से ही ‘कथा’ की शुरुआत होती है। दंडी ने दो भेद बताए है कथा (काल्पनिक) और आख्यान। आख्यायिका में स्त्रियां नहीं है। लेकिन वास्तविकता में स्त्रियां गायब होती है काल्पनिक कथाओं में स्त्रियां होती है।संजीव चंदन अपनी कहानियों में मिथकों का बहुत इस्तेमाल करते हैं। हमारे यहां पुरुष, स्त्रियों को गढ़ते हैं। संजीव चंदन भी इस कहानी संग्रह को वास्तविक और आभासी स्त्रियों को समर्पित करते हैं। आर्ची नाम के पात्र की कहानी, आगे की कहानियों में भी मिलती है। इनकी कहानियों में अंतः सूत्र और डिटेल्स अधिक है। जो कई बार बेमतलब की लगती है।अधिकांश कहानियों में स्त्रियां सुनती है वह पैसिव है, जो एक्टिव हैं वे हाइपर एक्टिव हैं।

लेखिका रजनी दिसोदिया ने अपने वक्तव्य में कहा कि संजीव चंदन उस युवा पीढ़ी के रचनाकार है। जिनका बचपन भूमंडलीकरण से पहले वाले दौर में बीता और उनकी युवावस्था बाद वाले  की है। युग परिवर्तन के इस दौर को युवा होते खुली आंखों से देखा है.  यह पूरा दौर मीडिया, सिनेमा, कला यहां तक कि प्रत्येक क्षेत्र में भूमंडलीकरण के असर का दौर है। संजीव की कहानियों के कथानक कहीं पीछे छूट जाता है वह अनायास आता है। डिटेल्स खूब हैं, जबकि इसके प्रति लेखक सजग है। भूमंडलीय दौर में जो परिवर्तन हो रहे हैं तो  चरित्र ऐसे आ रहे हैं इसलिए डिटेल्स भी जरूरी है। यहाँ स्त्री दृष्टि की कहानी को  पुरुष देख रहा है स्त्री की तरह। स्त्रियां, प्यार में बंधन नहीं चाहती इसी संदर्भ में सारंगा वाली कहानी डिस्टर्ब करती है। यह कहानी सोशल मीडिया पर आधारित  है। पहला पुरुष थोपा हुआ होता था, लेकिन रूमी के साथ ऐसा नहीं है। रूमी बंधनहीन प्रेम की मांग करती है। तमाम प्रेम उसे अकेला कर रहे हैं, यह यात्रा उसे अकेला ही बनाती है। इस मायने में दलित स्त्री अलग है वह समझती है कि अकेले होते ही शिकार बन सकती है इसलिए वह सामूहिक रहना पसंद करती है। इस मुक्ति की कोई सामाजिकता नहीं है।’वह ट्रेन निरंजना को जाती है’ कहानी में नायिका को मुंबई जाना था लेकिन वह निरंजना चली जाती है। मां की दो आंखें उसे निरंतर देखती रहती है, पिता का विश्वास नजर रखता है। यह एक खूबसूरत कहानी है, भूमंडलीकरण के प्रवाह को थामने की कहानी।

कथाकार टेकचंद ने अपने वक्तव्य में कहा कि संजीव चंदन की कहानियां आज की जिस स्त्री को केंद्र में लेकर आती है उसकी मानसिक संरचना बेहद जटिल और संश्लिष्ट है। जिसका प्रमाण इन कहानियों में मिलता है। हिंदी कथा -साहित्य में स्त्री कैसी है? जब हम प्रेमचंद के लेखन को देखते है तो सचेत स्त्रियां दिखायी देती हैं, आजादी के बाद महानगर की स्त्रियां, और उसके बाद मोहन राकेश की ‘सावित्री’। संजीव की कहानियों में मिथक आज के जीवन को भी व्याख्यायित करते हैं।

कथाकार अल्पना मिश्रा ने अपने वक्तव्य में कहा कि हम संजीव चंदन को स्त्री के संघर्ष में एक साथी, एक्टिविस्ट के रूप में देखने को अभ्यस्त रहे हैं। मैंने यह कहानियां वैज्ञानिक दृष्टि से देखी और पढी है। इनकी कहानियां औपन्यासिक क्लेवर की है। जब इनकी कहानियों को पढ़ती हूं तो देखती हूं कि 70 से लेकर आज तक की राजनीति पर बात की गई है। इतना बड़ा क्लेवर है। पात्र सुदृढ़ है। क्लेवर और मार्मिकता साहित्य का प्राण है। हर विधा में मार्मिकता की जगह है। संजीव चंदन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और चेतना को लेकर आते हैं कहानियों में। परकाया प्रवेश हिन्दी की कहानियों में पहले भी हुआ है. जैनेंद्र की पत्नी कहानी, अज्ञेय की रोज़। जब हम अज्ञेय की रोज़ कहानी के उस घंटे की आवाज को आज भी महसूस करते हैं, वह आवाज कितनी तकलीफदेह है.

अल्पना मिश्र ने हिन्दी आलोचना में स्त्रियों के प्रति दोयम व्यवहार को चिह्नित किया. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास में बंग महिला और महादेवी वर्मा पर 3 लाइनें लिखी। बंग महिला के लेखन के बारे में कुछ नहीं लिखा, उनका कुल-खानदान खूब लिखा.  कथा में स्त्रियों ने हस्तक्षेप करना शुरू किया, तो उन्हें जगह नहीं मिली।क्या शिवरानी देवी को कभी कथाकार शिवरानी कहा गया? अल्पना ने कहा कि स्त्रियों का संघर्ष निरंतर जारी है. सावित्रीबाई फुले के साथ क्या-क्या हुआ। जब उनका साथ रानाडे ने दिया। हम केरल के चान्नार विद्रोह को भी देख सकते हैं। तब स्त्रियां कमीज नहीं पहन सकती थीं.  मिशनरियों आने के बाद उन्होंने विश्वास दिलाया कि ऐसा हो सकता है। ऊपरी वस्त्र पहनने का लंबा आन्दोलन चला. दबाया कुचला हुआ व्यक्ति जब बोलता है तो वह प्रतिरोध की भाषा ही होती है। आज नई चुनौतियां भी हमारे सामने हैं, जिसमें मुख्य रूप से बाजार का दबाव है और दूसरी ओर  पितृसत्ता है।

रंगकर्मी और लेखिका नूर जहीर ने अपने वक्तव्य में कहा कि परिकथा में से परी, रूपकथा से रूप, लोक कथा से लोक और मिथक से उसका छुपा हुआ चेहरा लेकर जब दास्तानगोई की मिटटी की हंडिया में धीमी आंच पर देर तक दम दिया जाए तो जो सोंधी महक लिए बनके सामने आएगा वह “पांचसौ छियालिस्वीं सीट की स्त्री” होगी —-मेरी मुराद सिर्फ इस नाम की कहानी से नहीं इस पूरे मजमुए से है।इनकी कहानियाँ  चलती हुई कहानी किसी निर्धारित अंत तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं। संजीव की कहानी चलती हुई तो महसूस होती है। वह एक ही डगर या पात्र के सहारे नहीं चलती है। एक कहानी कई सवाल खड़े करती हैं।

नूर ने कहा कि कहीं न कहीं हर कहानी सवाल खड़े करती है, एक प्रश्न नहीं, एक साथ कई सवाल—–समय को, अपने समय को, बीते वक़्त को हम कैसे याद करेंगे? क्या उस समय में पड़ा अकाल, जेल भरो आन्दोलन, बढ़ते बलात्कार, छिछली,भ्रष्ट राजनीति, समय को परिभाषित और रेखांकित नहीं करेंगे? किस खांचे में किस केटेगरी में हम डालेंगे एक समय को? क्या मुद्दे हैं जो हमें उस वक़्त की याद दिलाएंगे? प्रचलित रीती  रिवाज? जिसमे बट सावित्री व्रत तो रख रही हैं स्त्रियाँ और साथ ही पंखों का भी ढेर लगता जा रहा हो, या प्रधान मंत्री के इस वाक्य से “कुंवारा हूँ, ब्रह्मचारी नहीं,” स्त्री के बढ़ते हुए आत्मविशवास से या उनपर बढ़ते हुई हिंसा और यौन उत्पीडन से या इस समझ से कि राजनीति में आने वाली स्त्रियाँ,  हाँ, वामपंथी राजनीति से जुडी हुई स्त्रियाँ भी किसी की पत्नी, बहु, बेटी होती हैं?

अध्यक्षीय वक्तव्य में अनामिका ने कहा कि नये लड़के और लड़कियां स्त्रीवाद के गर्भ से जन्मे हुए हैं। ‘तुम्हीं से जनमूं तो पनाह मिले’ कहानी स्त्रीवाद से जन्मे लेखक की दृष्टि की कहानी है. स्त्री को बहुत सारी खिड़कियों से देखने की कोशिश की है संजीव चंदन ने। और बहुत सफल कोशिश की है । संजीव को मैं दो दशक से जानती हूँ. 20-22 के उम्र के वह होंगे, तब से जानती हूं। स्त्री अध्ययन की कक्षा में बैठकर जिस तरह के प्रश्न उठाते थे। उसी समय लगा था कि यह प्रश्न इन्हें कहीं ले जाएंगे। लंबी उड़ान और लंबी थकान का सिलसिला पैदा करेंगे। इन 20 वर्षों में जो इन पर गुजरी है मैं उसकी साक्षी रही हूं। जब मैं ये कहानियां पढ़ती हूं तो एक तरह से भूमिगत, जैसे गर्भ गत 9 महीने होते हैं, वहाँ से लिखी कहानियां दिखती हैं। जो भी राजनीति में सक्रिय रहता हैप्रतिरोध की राजनीति में, उसके लिए एक गर्भ और हो जाता है.  भूमिगत जब मनुष्य रहता है, कई तरह की परिस्थितियों में, तो एक नए तरह का गर्भ  समय भी बन जाता है। आप सब के जीवन में वह समय जरूर आता होगा। आप सबसे छुपकर अपने भीतर, अपने को ही दोबारा जन्म देने की कोशिश में एक गर्भ की संरचना कर लेते हैं। वह जो एकांत होता है अंग्रेजी में उसके लिए एक शब्द है ऑल -अलोन। कच्ची पक्की नौकरियां करते हुए, कच्चे-पक्के संबंध जीने का यह समय एकांत पैदा करता है। त्रास पैदा करता है। कितने सवाल उठाता है इसका प्रबल साक्ष्य इस संग्रह में मिलेगा। सभी वक्तव्यों में एक सवाल उठा है प्रेम क्या है? जब हम अन्ना कैरेनिना के बरक्स रुमी को रखते हैं या चेखव की कहानी डार्लिंग को लेते हैं।तो देखते हैं यह कहानी 19वी शताब्दी की लड़की की है, जो अकेली हैं। जब हम इसके बरक्स संजीव चंदन की रुमी को रखते हैं तो समझ आता है कितना पानी बहा. यह भी मुझे लगता है हर व्यक्ति अपने आप में विशिष्ट है उसका वैशिष्ट्य अंदर ही अंदर को कुम्हला रहा है ,उसकी पत्तियां गिर रही हैं। प्रेम ही वह संभावना है जो उसके भीतर छिपे वैशिष्ट्य को, उसकी संभावना को मुकुलित करने का आभास देता है। आपके भीतर जो था वह पूरी तरह खिल गया है। ऐसे समय में प्रेम श्रृंखलाओं से कैसे निपटा जाए क्योंकि प्रेम श्रृंखलाएं फिर अपमान की उस राजनीति से हमें रूबरू करती है, जिसको हम सामाजिक संदर्भ में समझ चुके हैं, लेकिन निजी संदर्भ पर इतनी चर्चा नहीं की।

अनामिका ने कहा कि  बुद्ध ने मैत्री की चर्चा की है, स्त्री -आंदोलन ने सिस्टरहुड की बात कही। हम सब बंधुता की बात करते हैं। तो कैसे प्रेम करें कि बंधुता क्षरित ना हो या मैत्रीभाव क्षरित ना हो। प्रेम की क्षमता का शुभ पक्ष, सबसे प्यारा पक्ष है। ऐसा प्रेम कैसे करें एक बार वह खिलकर मुरझाए ना, हमेशा खिला रहे यह बहुत बड़ी चुनौती है हमारे सामने। कच्ची पक्की नौकरियों के चलते कच्चे-पक्के संबंध बना रहे हैं कहीं छोड़ा कहीं पकड़ा, कभी यहां कभी वहां हम एक विराट घूर्णन जैसे भंवर के शिकार हो गए हैं और मक्खन कहीं ऊपर नहीं आ रहा। यह जिस समय की आहट है उसे बेहतर ढंग से इस लड़के (संजीव चंदन) ने पकड़ी है जिसे मैं 20 साल की उम्र से जानती हूं।

पिछले 10 साल में जब एक व्यक्ति किशोर से युवा हो रहा है। उसके समय के विडंबनात्मक पक्ष सूचना के माध्यम से आ रहे हैं। हम एक आतंक विह्वल समय में रह रहे हैं। प्रेम की तलाश नैसर्गिक है। प्रेम अब दिखाई नहीं देता। इन कहानियों में प्रेम श्रृंखलाएं हैं एक से दूसरी, दूसरे से तीसरी। प्रेम के भीतर देह ने केंद्रीय विमर्श खड़ा किया है। इस कहानी संग्रह में भी छोटे शहरों से बड़े शहरों में आई लड़कियां है। एक नए तरह का संबंध जीती स्त्रियां है। संजीव चंदन की कहानियों के चरित्रों में पारस्परिकता है, कोई भी पात्र विक्टिम नहीं है। साथी पुरुष से स्त्रियां खुल कर बात करती है, साथी पुरुष भी उनकी बात सुनते हैं। सहजीवन की कल्पना है, यूटोपिया है। जहां दोनों अपने मन की बात कह सकते हैं। इस तरह की कल्पना के लिए संजीव चंदन ने अपने समय के द्वंद, नई तकनीक और शिल्प का प्रयोग किया है। मंच संचालन धर्मवीर ने किया। शिक्षकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों से पी. जी. मेंस सभागार खचाखच भरा हुआ था। जो स्त्रीवादी मुद्दों की संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। धन्यवाद ज्ञापन रानी कुमारी ने किया ।

रानी कुमारी दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज में तदर्थ प्राध्यापिका हैं. 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

महिलाओं को संसद में होना ही चाहिए : वेंकैया नायडू

नवल कुमार

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने  को कहा कि महिलाओं को अवसर दीजिये और देखिये कि वे किस तरह खुद को साबित करती हैं. वे जहां भी चुनी गई हैं, जहाँ भी उन्हें आरक्षण मिला है उन सदनों में उन्होंने साबित किया है कि  वे महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं. उन्हें उच्च सदनों में भी आरक्षण मिलना चाहिए। ये बातें नायडू ने 3 जनवरी को द  मार्जिनलाइज्ड  प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भारत के राजनेता सीरीज की किताब ‘रामदास आठवले’ का स्पीकर हॉल, कांस्टीट्यूशन क्लब में विमोचन करते हुए कही. उन्होंने समाजिक न्याय मंत्री ‘रामदास  आठवले’ की राजनीति को समाज में समता और शान्ति स्थापित करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि इस सीरीज में यह दूसरी किताब है और अन्य राजनेताओं पर भी किताब आ रही है, यह महत्वपूर्ण है कि जनता तक राजनेताओं की बात जाये।

इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने कहा कि दुनिया में शान्ति और समन्वय से ही समता स्थापित हो सकती है संघर्ष जरूरी है लेकिन अहिंसक रास्ते से. पैनल डिस्कसन में बोलते हुए सीपीआई के सांसद डी  राजा ने रामदास आठवले द्वारा क्रिकेट में भी आरक्षण की मांग किये जाने को याद दिलाया। राजा ने कहा कि समता का सन्देश देने वाले नेताओं में डा.  अम्बेकडर के योगदान को कम करके देखा जाता है अभी उनका अर्थशास्त्री के रूप में मूल्यांकन होना बाकी है. प्रकाशक संजीव चंदन ने कहा कि  किताब की श्रृंखला जारी रहेगी। यह इस सीरीज की दूसरी किताब है, पहली किताब ‘अली अनवर’ थी.  कार्यक्रम में पूर्व सांसद अली अनवर भी उपस्थित थे तथा बड़ी संख्या में रामदास आठवले के समर्थक भी शामिल हुए. सञ्चालन सामाजिक कार्यकर्ता मनीष गवई ने किया। स्वागत भाषण सर्व समाज संघर्ष समिति के अध्यक्ष वेदपाल तंवर ने किया।
 इस श्रृंखला  के तहत देश 30 प्रमुख समाज-राजनीति कर्मियों पर किताबें प्रकाशित की जानी हैं। इसमें ऐसे  सामाजिक-राजनीतिक नेताओं को जगह दी गई है, जिनका न सिर्फ समाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान रहा हो, बल्कि जिनकी वैचारिकी मौलिक और भारतीय समाज और  राजनीति की गतिकी की दिशा मोड़ने वाली रही हो।

किताब से कुछ कोट : 
1. मैंने अटल जी की बीजेपी सरकार गिरायी थी. 1999 में 13 महीनों के बाद अटल जी सरकार एक वोट से गिर गयी थी. तब हमारे पीछे प्रमोद महाजन और दूसरे भाजपा नेता लगे थे कि सरकार को समर्थन दीजिये. वे हम चारो को मंत्री बनने के लिए तैयार थे, प्रकाश अम्बेडकर उनसे सहमत भी थे, लेकिन हम तीन- गवई साहेब, योगेन्द्र कबाड़े और मैं तैयार नहीं थे. (पृष्ठ 25)
2. मुझे लगता है कि यदि सिर्फ राम मंदिर की बात करती रहेगी तो मुझे लगता है कि सत्ता में रहना या बाद में आना मुश्किल है. लेकिन नरेंद्र मोदी आरएसएस को बदल देंगे. मुझे लगता है कि अभी तक वे अपना लाइन नहीं छोड़ रहे हैं ‘ सबका साथ-सबका विकास .’ पृष्ठ 29
3. नानकचंद रत्तू और सोहनलाल शास्त्री ने माई साहब ( बाबा साहेब की दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर)को बदनाम करने की कोशिश की. ( पृष्ठ 36-3
4. शिक्षा और जमीन का सराकारीकरन जरूरी
किताब के बारे में
किताब का नाम : ‘रामदास आठवले’
पुस्तक श्रृंखला : भारत के राजनेता
संपादक : राजीव सुमन
श्रृंखला संपादक : प्रमोद रंजन
प्रकाशन : द मार्जिनलाइज्ड, दिल्ली
पृष्ठ : 122
मूल्य : 200 रूपए (पेपर बैक), 400 रूपए (हार्डबाऊंड)
संपर्क : 8130284314,9968527911 (प्रकाशक)

‘रामदास आठवले’ शीर्षक श्रृंखला की इस दूसरी किताब में केन्द्रीय मंत्री रामदास आठवले का एक लंबा साक्षात्कार व उनके भाषणों को संकलित किया गया है, ताकि राजनीति विज्ञान के अध्येता उनके मूल विचारों को समझ सकें। श्रृंखला के तहत आठवले का चयन मुख्य रूप से दलित पैंथर से उनके आरंभिक जुड़ाव तथा दलित राजनीति के लिए शहरी जमीन में उगाने की रचनात्मक कोशिशों के कारण किया गया है। उन्होंने अपने आंदोलनों से मुम्बई जैसे महानगर में दलित राजनीति के लिए ठोस संभावनाएँ पैदा कीं।

इस किताब में निम्नांकित मामलों की जानकारी पाठकों को मिलती है : 
सविता आंबेडकर को दिलाया सम्मान
रामदास आठवले के लिए आंबेडकर महत्वपूर्ण रहे हैं। इसी किताब में संकलित एक साक्षात्कार में वे बताते हैं कि ब्राह्मण परिवार में पैदा हुईं सविता आंबेडकर(जिन्हें वे सम्मान से माई साहब कहते हैं) लंबे समय तक दलित कार्यकर्ताओं द्वारा बहिष्कृत रहीं। कुछ नेताओं ने  उन्हें बाबा साहब का हत्यारा बता दिया। वे महाराष्ट्र नहीं जाती थीं, दिल्ली के महरौली में रहती थीं। आठवले जी बताते हैं कि उन्होंने एक अभियान चलाकर उन्हें दलित समाज में स्थापित किया।

                                                               
दलित पैंथर कार्यकर्ता से शुरू हुई संघर्ष की कहानी
रामदास आठवले ने अपनी राजनीतिक यात्रा कैसे शुरू की, यह उनके लिए समझना और जानना रूचिकर होगा जो दलित आंदोलन से सरोकार रखते हैं। नामदेव ढसाल, जे बी पवार,राजा ढाले आदि द्वारा शुरू किया गया दलित पैंथर आंदोलन दलित युवाओं के बीच जंगल में लगी आग की तरह फैला। आठवले भी इस आंदोलन में सक्रिय हुए। लेकिन बाद के दिनों में अनेक कारणों से यह आंदोलन अपेक्षित लक्ष्य हासिल नहीं कर सका और राजनीतिक मोर्चे पर बिखर गया। आठवले सक्रिय रहे। उन्होंने पहल करते हुए पैंथर्स पार्टी आफ इंडिया का गठन किया।

महाराष्ट्र में दलित आंदोलन के चेहरा बने आठवले
बाबा साहब के निधन के बाद महाराष्ट्र में दलित आंदोलन की गति धीमी पड़ गई थी। दलित पैंथर्स के कारण आग तो लगी लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर बिखराव के बाद संकट गहराने लगा था। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया जिसकी स्थापना बाबा साहब ने की थी वह नेतृत्वहीनता का शिकार थी। रामदास आठवले ने महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया को शिवसेना और कांग्रेस के समानांतर खड़ा करने की कोशिश की। वह सफल भी रहे। यह किताब उस कालखंड के बारे में बकौल रामदास अठावले राजनीतिक संघर्ष की गाथा कहती है जिसकी बुनियाद बाबा साहब ने डाली थी।
यह किताब रामदास आठवले की राजनीतिक यात्रा के बारे में बताती है। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से उनका जुड़ाव का प्रसंग इसकी बानगी है। लेकिन स्वयं आठवले कहते हैं कि शिवसेना के साथ चुनाव में जाने से पहले उन्होंने अपने दल के नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ करीब 6 महीने तक बैठकें की। सबके विचार जान तब उन्होंने यह फैसला लिया था। यह किसी एक व्यक्ति का फैसला नहीं था। हालांकि आठवले स्वीकार करते हैं कि यह एक राजनैतिक जुड़ाव था। वैचारिक मतभेद बने रहे।
आरपीआई की राजनीति का इतिहास 
आठवले ने इस किताब में संकलित अपने साक्षात्कार में महाराष्ट्र में आरपीआई की भूमिका, उसके अपने इतिहास और अंदरुनी राजनीति की चर्चा की है. उन्होंने कई अवसरों पर आरपीआई के सभी धड़ों के साथ आने और बिखरने के अंदरखाने की दिलचस्प बातें इस किताब में बतायी हैं
नवल कुमार फॉरवर्ड प्रेस के हिन्दी संपादक हैं.


स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

शोधार्थियों ने मनाई सावित्रीबाई फुले जयंती

डेस्क 



किसी भी समाज में क्रांतिकारी बदलाव तब ही आ सकता है जब प्रत्येक स्वाभिमानी व्यक्ति एक ईकाई के रूप में स्वतंत्र एवं व्यापक समाज के हित में चिंतन तथा कार्य करे. यह कार्य निश्चित रूप से शोषण एवं शोषक वर्ग के खिलाफ जाने वाला साबित होगा.  3 जनवरी को भारत की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्री बाई फुले की 187वीं जयंती के अवसर पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के विश्वनाथ मंदिर परिसर एक संगोष्ठी का आयोजन में किया गया. इस कार्यक्रम में सभी उपस्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ एवं अन्य शैक्षणिक संस्थाओं से सम्बंधित शोध छात्राओं, शोध छात्रों एवं स्नातक, परास्नातक कक्षाओं के विद्यार्थियों ने आपस में एक सामाजिक-शैक्षणिक संवाद किया. इस संवाद का केंद्र माता सावित्री के जीवन संघर्ष एवं उनके समय की सामाजिक-धार्मिक ठेकेदारों की कुटिल नीतियों की चर्चा की गयी. प्रतिभागियों ने अपने निजी अनुभव भी इसमें साझा किये.

इस सघन संवाद का परिणाम निकल कर आया कि आज सावित्री माता के समय जैसी स्थितियां और चुनौतियाँ तो हमारे सम्मुख नहीं हैं किन्तु युवा पीढ़ी में वो चेतना नहीं है जिसकी जरुरत आज भारत के नब्बे फीसदी समाज को है. बंगाल तथा महाराष्ट्र में हुए सामाजिक आंदोलनों की चर्चा करते हुए विकाश सिंह मौर्य ने कहा कि बंगाल के आन्दोलन जहाँ समाज के उच्च तबकों के नेतृत्व में था वहीं महाराष्ट्र का लगभग समूचा आन्दोलन किसान एवं अन्य सहायक जातियों के नेतृत्व में किया गया. भारत की प्रथम मुस्लिम शिक्षिका फ़ातिमा शेख़ और उनके भाई उस्मान शेख़ के बारे में बताया कि किस तरीके से उन्होंने सर्व समाज विशेषकर महिला शिक्षा के लिए सर्वस्व योगदान किया था. सुनील कश्यप ने इस अवसर पर जयपाल सिंह मुंडा एवं एकलव्य को भी प्रासंगिक बताया. शिवेंद्र कुमार मौर्य ने सावित्री माता का जीवन परिचय बताया. शुभम जायसवाल ने आधुनिक शिक्षा खासतौर पर लड़कियों की शिक्षा के पुरुष सत्ता के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण पर व्यंग करते हुए कहा कि इसलिए बच्चियों को पढ़ाया जाता है कि बी.ए. कर लेने पर शादी ठीक से हो जाएगी.
निर्मला वर्मा ने अपना अनुभव सुनाते हुए बताया कि ‘समाज में किस तरह से बेटियों के साथ भेदभाव किया जाता है?’ उन्होंने अब तक की अपनी सफलता का श्रेय अपने भाई को दिया. राहुल सिंह राजभर ने देश की वर्तमान राजनीतिक स्थितियों के बारे में बताया कि किस तरह से देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाने की संभावना दिख रही है. सभी अपनी ढपली अपना राग लिए हुए अपने-अपने राष्ट्र की लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने इतिहास लेखन पर भी सवाल उठाये एवं इतिहास के पुनर्लेखन की जरुरत पर बल दिया.

अध्यक्षता करते हुए रामायण पटेल ने चेतना निर्माण एवं सम्यक इतिहास बोध पर बल दिया. उन्होंने 1920 के दशक को आधुनिक भारतीय इतिहास का निर्णायक दशक बताया. इस दौरान राजर्षि शाहूजी महाराज की हत्या, गीता प्रेस एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना, साइमन कमीशन का आगमन आदि घटनाएँ घटी, जिसका निर्णायक प्रभाव स्वतंत्रता पश्चात् के भारत पर सर्वाधिक पड़ा है. इस संगोष्ठी में अनीता, विनय पटेल, अनुराग पटेल, योगेश राज, सोनिया कुमारी, उदय भान सिंह, राजू पटेल, चन्दन सागर और राम करन सहित तीन दर्जन से अधिक लोग उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संयोजन विकाश सिंह मौर्य ने किया.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com



सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायमूर्तियों की संविधान-पीठ द्वारा 22 अगस्त, 2017 को मुस्लिम समाज में प्रचलित ‘तीन तलाक’ को निरस्त करने के आदेश के बाद, केंद्र सरकार ‘तीन तलाक’ संबंधी ‘मुस्लिम महिला विवाह का अधिकार संरक्षण विधेयक, 2017’ शीतकालीन अधिवेशन में पेश करने के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। हालाँकि, फैसले के तत्काल बाद केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा था कि फैसले के क्रियान्वयन के लिए अलग से कानून बनाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उस समय केंद्र सरकार, कानून बनाए जाने के पक्ष में नहीं दीख रही थी। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर ‘तीन तलाक़’ की प्रथा जारी रही और कोई आमूल-चूल बदलाव दिखाई नहीं दे रहा था। लगता है कि सरकार इस विधेयक के माध्यम से, 2019 के चुनावी बेड़े को पार ले जाना चाहती है।


सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायमूर्ति- जस्टिस जे.एस. खेहर, जस्टिस कूरियन जोसेफ, जस्टिस यू.यू. ललित, जस्टिस आर.एफ. नरीमन और जस्टिस अब्दुल नजीर की संविधान-पीठ ने, ‘तीन तलाक’ को निरस्त करने का आदेश दिया था। इस फैसले के बाद, पूरे देश में ऐसा लगा कि मुस्लिम महिलाओं की आजादी का नया युग शुरू हो गया है। अब मुस्लिम स्त्रियों पर दमन, अत्याचार या अनाचार का सिलसिला एकदम खत्म जाएगा। केंद्र सरकार ने इसका भरपूर श्रेय लिया और  विपक्षी दल फैसले का विरोध भी नहीं कर पाए, शायद इस डर से कि विरोध कहीं उनके ‘वोट बैंक’ में सेंध न लगा दे।

 तीन तलाक़ पर, उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायधीशों की संविधान पीठ के ‘ऐतिहासिक फैसले’ को, आने वाली पीढ़ीयाँ किस रूप में देखेंगी- क्रांतिकारी फैसला या मील का ‘पत्थर’। अभी कहना कठिन है। 1400 साल पुरानी प्रथा की वैधानिकता-संवैधानिकता पर, न्यायविद सालों बहस करते रहे हैं, करते रहेंगे. क्या निर्णय से औरत की गरिमा बढ़ेगी, महिलाओं का सशक्तिकरण होगा और लैंगिक समानता की दिशा में सार्थक शुरुआत हो पाएगी? सवाल यह भी है कि महिला याचिकाकर्ताओं को क्या ‘हासिल’ हुआ. उसी पति के रहने का आदेश, जो उसे रोज़ तरह-तरह से प्रताड़ित करता रहा है। क्या ज़मीनी स्तर पर आमूल-चूल बदलाव से स्त्रियों की ज़िन्दगी खुशहाल होगी? बहुत से सवाल, संदेह और आशंकाएं तब तक रहेंगी, जब तक आधी-आबादी को सामान न्याय और सम्मान से जीने-मरने के अधिकार नहीं मिलते। ‘आधी-दुनिया’ बहुत आशा और विश्वास के साथ, न्यायपालिका कि तरफ देखती (रही) हैं.

395 पेज के फैसले में तीन तलाक को निरस्त करने का फैसला 3-2 के बहुमत से लिखा गया। 1937 के शरियत लॉ में तीन तलाक का प्रावधान सेक्शन 2 में था, जिसे पांच जजों की बेंच ने निरस्त कर दिया। जस्टिस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर तीन तलाक को निरस्त करने के पक्ष में नहीं थे। दोनों ने इस प्रावधान को असंवैधानिक नहीं माना। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि चूंकि यह महिलाओं के हितों के खिलाफ है, इसलिए इस पर सरकार और संसद को कानून बनाना चाहिए। यानी केवल दो जजों ने कानून बनाये जाने की बात कही थी। इसका सीधा सा अर्थ है कि सरकार के लिए कानून बनाए जाने की को बाध्यता नहीं थी। तीन तलाक का प्रावधान खत्म हो गया और नया कानून बनने तक, यदि कोई अपनी पत्नी को तीन तलाक दे देता है, तो उसे सजा या ज़ुर्माना नहीं! पति पत्नी से कहेगा कि वह नहीं मानता सुप्रीम कोर्ट के फैसले को, जाओ अदालत। ऐसे में मुस्लिम महिलाएं (जिनमें से अधिसंख्य अशिक्षित-गरीब और गांव कस्बों में रहने वाली हैं) अदालतों के चक्कर काटती रहती।

तीन तलाक को निरस्त करने के फैसले को, महिलाओं की ‘विजयघोष’ के रूप में प्रचारित किया गया। कहा जाता  रहा कि दुनिया के लगभग 22देशों ने पहले ही तीन तलाक को निरस्त कर दिया है। भारत ने महिलाओं को ‘यह आजादी’ देने में 70 बरस लगा दिये। पाकिस्तान जैसे देश में 1961 में तीन तलाक को रद्द किया जा चुका है। जिन देशों में तीन तलाक की यह असंवैधानिक परंपरा नहीं है, वहां तो महिलाएं सशक्त होनी ही चाहिए। लेकिन क्या ऐसा है? अन्य देशों को छोड़ दीजिए, सिर्फ पाकिस्तान और बांगला देश में ही महिलाओं के सामजिक-आर्थिक स्थिति से अंदाजा लगाया जा सकता है।

तीन तलाक अंसवैधानिक है, तो बहुविवाह, करेवा, बाल विवाह, वैवाहिक बलात्कार, लैंगिक असमानता, भ्रूण हत्या को आप क्या कहेंगे-मानेंगे? विवाह संस्था में हिंदू महिलाओं के साथ भी हिंसा-हत्या, दमन-अत्याचार, अनाचार-दुराचार कम नहीं। तलाकशुदाओं में 68 प्रतिशत हिन्दू, 22 प्रतिशत मुस्लमान और दस फीसदी अन्य मजहबों के हैं। मुस्लमानों में तीन तलाक के महज 0.01 प्रतिशत मामले ही तो पाये जाते हैं। तो क्या हमारे सरोकार सिर्फ इन 0.01फीसदी महिलाओं से जुड़े हैं, बहुमत की महिलाओं के अधिकारों की संवैधानिकता और असंवैधानिकता पर हमें कुछ नहीं कहना है? एक दबा-ढका-छिपा सच यह है कि मर्दवादी समाज स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं देना चाहता. पंचायत (संसद-अदालत) में मर्द ही, स्त्रियों के भाग्य का फैसला करते रहे हैं। महिलाओं के विषय में इतना बड़ा फैसला करते समय, कोई महिला न्यायाधीश नहीं दिखती-मिलती? ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ।

1955 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जब हिंदू कानून के तहत महिलाओं के अधिकारों को लेकर प्रयास किया, तो उन्हें भी भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। आज नारी स्वतंत्रा की वकालत करने वाले, उस समय विरोध में खड़े थे। लेकिन राजनीतिक दृढ़ता के कारण ही कुछ कानून पास हो सके । उस समय तमाम हिंदुवादी नेताओं ने घोर विरोध किया था। वे नहीं चाहते थे कि हिंदू कानून के अंतर्गत महिलाओं को मर्दों के सामान अधिकार मिलें। हिंदू कानून के तहत महिलाओं को जो भी अधिकार मिले हैं, वे तब कि राजनीतिक इच्छा और मजबूती के कारण ही मिल पायें हैं।

 सरला मुद्गल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ही समान नागरिक संहिता बनाने के लिए कहा था। उसे बनाने की पहल कोई नहीं कर रहा। भाजपा ने तो अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी, समान नागरिक संहिता बनाने का वादा किया था। एक देश, एक कानून की वकालत करने वाली सरकार, महिला सामान अधिकारों के लिए एक कानून क्यों नहीं बनाती या बना सकती। समान नागरिक संहिता में तलाक, विवाह, मेंटनेंस,संपत्ति आदि के अधिकार, सभी महिलाओं-हिंदू मुस्लिम,सिख, ईसाई, जैन के लिए समान होने चाहिए। तब समान न्याय-क़ानून होंगे भी और दिखाई भी पड़ेंगे। समान नागरिक संहिता के साथ-साथ, यदि महिला आरक्षण बिल भी पास कर-करवा दें, तो सचमुच महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन ऐसा कब हो पायेगा, कौन कह सकता है। महिलाओं को भी सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक इंसाफ, सामान न्याय, संवैधानिक बराबरी देने के लिए, एक ही कानून होना चाहिए…क्यों नहीं होना चाहिए। अगर सरकार सचमुच महिला सशक्तिकरण की पक्षधर है, तो महिला आरक्षण बिल पास करे-करवाए, सामान नागरिक संहिता लाए….पता चल जाएगा।

आप-हम सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के लिए, तीन तलाक को निरस्त किये जाने पर खुश होते रहेंगे लेकिन अगर उनके पति ने सोच लिया कि पत्नी को छोड़ना है या तंग करना है, तो बिना कानून समाज-अदालत के पास क्या विकल्प है/होगा। आज भी अदालतों में रोजना ऐसे मामले आते हैं (अधिकांश हिंदू लड़कियों के) जिनमें पति पत्नियों को उत्पीड़ित-प्रताड़ित करते रहते हैं और आजादी से घूमते रहते हैं। हम कहते हैं ‘दहेज़ मामलों में गिरफ्तारी मत करो’। किसी से छिपा नहीं है कि किसी भी अदालती मामले को निपटाने में, सालों का समय-पैसा लगता है। अलग रहने के लिए ही नहीं, साथ रहने के लिए भी। उदाहरण के लिए, 1955 में सरोज रानी ने, हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 9 के तहत पति के साथ दोबारा रहने के लिए याचिका दाखिल की। इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 1983-84 में सुनाया। यानी साथ रहने के लिए भी फैसला देने में अदालत को 28-29 साल का समय लग गया। ऐसे में तलाक से पीडि़त महिलाओं की अदालतों में क्या स्थिति होगी या हो सकती है, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। तीन तलाक को निरस्त करके मुस्लिम महिलाओं को, कोर्ट-कचहरी के उन्ही गलियारों में धकेल रहे हैं, जहां जाने के रास्ते तो कठिन हैं ही, वहां से बाहर निकलने के रास्ते कमोबेश बंद या अंतहीन ही हैं।

तीन तलाक को निरस्त करने का फैसला और प्रस्तावित विधेयक कुछ और सवाल मन में पैदा करता है। आखिर हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं। एक तरफ हम महिलाओं को सहजीवन, सिंगल वुमन, बिना विवाह पैदा किये बच्चा पैदा करने का अधिकार, सेक्स का अधिकार दे रहे हैं और दूसरी तरफ समाज के एक बहुत ही छोटे तबके को तलाक से रोकने के आदेश पर उत्सव मान रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि जब देश आजाद हुआ, तो सिंगल वुमन की संख्या महज चार फीसदी थी, जो आज बढ़ कर 21 फीसदी हो गई हैं।

 विश्व इतिहास और सामजिक अनुभव साक्षी है कि एक समय पूरे यूरोप में तलाक के पक्ष में स्त्री आंदोलन हुए और वहां की संसद-सरकार-अदालतों ने तलाक को कानून बना कर आसान बनाया। यूरोप में महिलाएं इसलिए सशक्त हुईं कि वे पढ़ी लिखीं थीं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थीं, विवाह को सात जन्मों का बंधन नहीं मानती-समझती थीं, अपने फैसले खुद लेती थीं। इसलिए धार्मिक आस्थाओं का यह अभियान भी खत्म होना चाहिए . महिलाओं को भी खुले मन से यह सोचना होगा कि क्या सचमुच (तीन) तलाक रुकने से उनका जीवन जन्नत बन जाएगा? क्या उनके जीवन की एकमात्र त्रासदी यही है कि उनके पति उन्हें एक साथ तीन तलाक दे रहे हैं?  तीन तलाक को निरस्त किये जाने के परिणाम, दिखाई देने लगें हैं और यह भी साफ है कि ऐसे फैसले या कानून से कितनी महिलाओं का उद्धार, कल्याण या सशक्तिकरण हो सकेगा। स्त्री-पुरुष को विवाह बंधन में बांध कर रखना, पितृसत्ता के हितों को पोषित करती विवाह संस्था को ही बनाए-बचाए रखना है…होता है. यह रास्ता ‘स्त्री मुक्ति’ या ‘सशक्तिकरण’ का रास्ता तो नहीं! वास्तव में दमित-उत्पीड़ित-शोषित स्त्री के लिए मुक्ति का मार्ग तो, तलाक के बाद…आत्मनिर्भर होना है। लाखों मुकदमें अदालतों में तलाक के लिए लंबित पड़े हैं, अगर इन लोगों को तलाक मिल जाए..न्याय मिल जाए..थोड़ा जल्द और आसानी से मिल जाए तो, ये सब अपना जीवन अपनी शर्तों और निर्णयों के साथ या अपने तरीके से जी सकेंगी/सकेंगे। निश्चित रूप से असली मुक्ति यहां से आरम्भ होगी।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें(अंतिम किस्त)

रोहिणी अग्रवाल

रोहिणी अग्रवाल स्त्रीवादी आलोचक हैं , महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं . ई मेल- rohini1959@gmail.com



मैं मर्द नहीं, सर्जक होना चाहती हूँ


गौरतलब है कि आत्मसाक्षात्कार आयु एवं अनुभव के साथ मानव जीवन में स्वाभाविक रूप से आने वाली नैसर्गिक स्थिति नहीं है। यह एक दुर्गम-दुष्कर यात्रा है जिसके लिए पहले पात्रता हासिल करनी पड़ती है। इसके लिए जरूरी है स्व एवं अहं का विसर्जन जो सभी तामसी प्रवृत्ति का उद्गम òोत है। दूसरे, अपने भीतर संवेदन, सकारात्मक दृष्टि एवं सृजन की आकांक्षाओं से अंतर्गुम्फित व्याकुलता पैदा करना जो जड़ता को चेतना, चेतना को प्रेरणा और प्रेरणा को पुनर्निर्माण में बदलने का माद्दा रखती हो। इनके बिना आत्मसाक्षात्कार की कोशिश प्रतिशोध के लिए तैयार की गई सुविचारित रणनीति का पर्याय बन कर रह जाती है। प्रतिशोध चूंकि सृजनात्मक सम्भावनाओं को मार कर खुद को नकारना है, अतः यहाँ टारगेट के रूप में व्यक्ति प्रमुख हो जाता है, समाज, इतिहास और परम्परा में मौजूद वे रूढ़ियां और विसंगतियां नहीं जो रुग्ण व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। जाहिर है आत्मसाक्षात्कार जहाँ अंतिम परिणति में सामाजिक निवेश ;ेवबपंस पदअमेजउमदजद्धका उपक्रम बन जाता है, वहीं प्रतिशोध तात्कालिक बाध्यताओं से उपजा आत्मपरक उपभोग। इसलिए ऊर्जा का क्षय करने के बावजूद अतृप्ति एवं भूख को कायम रखना इसका स्वभाव है। आश्चर्य है कि जहाँ अधिकांश भारतीय स्त्री लेखन अपने नारी पात्रों को प्रतिशोध की व्यूहधर्मी संरचनाओं से बचा कर निर्माण की चिंताओं में संलिप्त करता है, वहीं तसलीमा नसरीन और विशेष रूप से तहमीना दुर्रानी प्रतिशोध में अपनी नायिकाओं की हीरॉइक उपलब्धि दर्ज कराती हैं। पीर साईं की हत्या में शरीक होकर ‘कुफ्र’ की हीर देर तक इस गफ़लत में रहती है कि उसने शैतान को मार कर ‘धर्म’ को आज़ाद करा लिया है। लेकिन पीर साईं द्वारा तवायफ के रूप में हीर की अन्य पुरुषों के साथ बनाई गई ब्लू फिल्मों को उन्हीं रसूख वाले पुरुषों को दिखा कर मकबरे के प्रति अनास्था व्यक्त करने का जो मार्ग उसने चुना है, वह अंततः उसे कहीं नहीं ले जाता। सवाल उठता है कि पीर साईं के पाप में भागी व्यक्ति जो स्वयं मकबरे के संरक्षण में अपनी ताकत का दुरुपयोग करते रहे है।, अब हीर का साथ क्यों देंगे? क्यों नहीं राजाजी के रूप में वे नए पीर साईं की बुतपरस्ती का समर्थन करेंगे? दूसरे, शक्ति का केन्द्रीकरण भले ही कुछेक हाथों में हो, आस्था और समर्थन के जरिए उसे अवाम ही ताकतवर बनाता है। इसलिए क्या बेहतर नहीं था कि अम्मा साईं के हजूर में आने वाली स्त्रियों को वह मकबरे के भीतर पलने वाली सच्चाइयों से वाकिफ कराती? तब उसका यह कदम पहला न होकर सखी बीवी के कुचल दिए गए प्रचार की अगली कड़ी बन कर शायद व्यापक जनाधार जुटा पाता। तहमीना मानती हैं कि मकबरे के वर्चस्व में जी रहे बंद कबीलाई समाज में औरत के लिए ”ज़िंदगी या तो ठहरी हुई है, या सब कुछ तबाह करता तूफान।” (पृ0 133) इसलिए दो अतिरेकों में निरंतर दोलायमान वह किसी दीर्घकालिक विकल्प पर विचार नहीं कर सकती। लेकिन तालिबानी शासन के दौरान अफगानिस्तान में अंडरग्राउंड ‘रावा’ संस्था के अस्तित्व और योगदान तथा हाल ही में ‘ऑनर किलिंग’ के विरोध में पाकिस्तानी महिलाओं के आंदोलन  को देखते हुए यह वक्तव्य क्या वैवाहिक अमानुषिकताओं से खौफजदा हीर उर्फ तहमीना दुर्रानी उर्फ बेगम मुस्तफा खार की संकुचित आवेगपूर्ण दृष्टि का स्वीकार नहीं? खास कर तब जब ‘कुफ्र’ में ही तहमीना जादुई यथार्थवाद का सहारा लेकर तोती के रूप में गढ़ी गई प्रेरणा और फौलादी जीवन की स्वामिनी चील के रूप में मिशन को निरंतर पुष्टतर कर स्त्री सशक्तीकरण का महाख्यान रचने का सर्जनात्मक दायित्व भी बखूबी निभती हैं?

पहली किस्त :- भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें

प्रतिशोध का स्वर तसलीमा नसरीन के
यहाँ भी है, लेकिन महज इस तथ्य को रेखांकित करने के लिए कि प्रतिशोध के मूल में है अपने को कमतर मानने की गं्रथि जिसे ईदुल (मेरे बचपन के दिन) के असंतोष, द्वंद्व, असुरक्षा और दिशाहीनता में बेहतर समझा जा सकता है। लेकिन प्रतिशोध के साथ सु-प्रयोजन जुड़ जाए तो यह नकारात्मक न रह कर सकारात्मक विकल्पों के संधान का प्रयास बन जाता है। जाहिर है लड़कियों की खरीदफरोख्त के घृणित व्यापार को देखते हुए स्वयं लड़का खरीद कर उसका मनमाना भोग करने  तथा पुरुषों की तरह चार ब्याह रचाने की लालसा में दरअसल नियमों को उलटाने की अपेक्षा उनकी खामियां दिखा कर लोगों में चेतना पैदा करने का जज्बा है – ”नियम को जब बेहतर बातों से नहीं बदला जा सकता तो उसकी खामियां भी विपरीत नियम के सहारे ही समझनी पड़ेंगी।” (तसलीमा नसरीन, नष्ट लड़की नष्ट गद्य, पृ0 88)
‘मता-ए-दर्द’ में पाकिस्तानी लेखिका रज़िया फसीह अहमद तथा ‘कठगुलाब’ में मृदुला गर्ग प्रतिशोध को सशक्तीकरण में ढालने वाली मानसिकताओं का बखान करती हैं। तसलीमा के विश्लेषण को कथा में विन्यस्त कर रज़िया और मृदुला निष्फल प्रतिशोध के भीतर सिमटी सर्जनात्मक संभावनाओं को उघाड़ कर बेचारगी से फूट कर सशक्तीकरण की ओर बढ़ने वाली दिशाओं का संकेत करती हैं। ‘मता-ए-दर्द की निम्नवर्गीय बेसहारा अशिक्षित गुल ने संघर्ष (अर्थोपार्जन के लिए छोटी-छोटी नौकरियां करके तालीम के जरिए समाज में अपनी जगह बनाने की लालसा)  और प्रवंचना (प्रेमी द्वारा झूठी शादी का प्रपंच रचा कर गर्भावस्था के दौरान छोड़ कर सूडान चले जाना)    के परस्पर विरोधी अनुभवों को झेलने के बाद डॉ0 शहनाज की मदद से नर्स के रूप में बेशक एक नया नाम और शख्सियत पाई है, लेकिन गरीबी और सतीत्व के अपमान से पीड़ित गुंचा आज भी उसके भीतर जी रही है। फलतः अधेड़ ब्रिगेडियर शम्सी से विवाह करके अभिजात वर्ग में शामिल होना और पति की चाहतजन्य अतिशय निर्भरता का लाभ उठा कर पिकनिक और सैर सपाटे के बहाने होटल के एकांत में पुरुषों की कामवासना को भड़का कर अतृप्त छोड़ देना उसके प्रतिशोधात्मक अस्त्र हैं। यदि कुलीनता, सम्पन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा ही व्यक्ति जीवन की सफलता के मापदंड हैं तो गुल संतुष्ट क्यों नहीं? क्या संतुष्टि तक पहुँचने की दिशाएं और द्वार अलग हैं – लौकिक आकर्षण-विकर्षण से परे नितांत निगूढ़ और निस्सीम? प्रतिशोध की ज्वाला से अपमान के अग्निदाह को बुझाने में तल्लीन बेवकूफी को दृष्टिगत करते ही गुल जिन बुनियादी सवालों से जूझती है, दरअसल वे आत्मसाक्षात्कार के लिए अनिवार्य त्रिक् के तीसरे तत्व – सृजन की आकांक्षा – को रेखांकित करते हैं। तब पति (छद्म आवरण) को छोड़ कर कौमार्यावस्था में जन्म देने के तुरंत बाद विलगे पुत्र को अपना कर अपनी निजता को खूबियों-खामियों सहित सम्पूर्णता में पाना जितना अनिवार्य हो जाता है, उतना ही अपरिहार्य हो जाता है बेसहारा गरीब रोगियों की सहायता के लिए खोले गए अस्पताल से जुड़ना। उल्लेखनीय है कि अपने होने के मर्म को  समझे बिना खुद अपनी ज़िंदगी का नियंता बनना कठिन है। हालांकि ऐसे किसी फलसफे को सिरे से नकारते हुए असीमा हरामी मर्दों की पिटाई में ”नारीसुलभ कोमलता और करुणा” से मोक्ष प्राप्ति का कारगर नुस्खा तलाशती है और स्मिता ‘जलील, गलीज, घिनौने’ जिम जारविस के चेहरे पर पडे नकाब को तार-तार कर देने में, लेकिन शून्य और हताशा के अतिरिक्त उनकी उपलब्धियां कुछ नहीं। असीमा कराटे किक की तमाम चामत्कारिक शक्तियों के बावजूद महज ”एक जलूस, एक अभियान या विचार” (कठगुलाब, पृ0 220) बन कर रह गई है, और स्मिता बंजर धरती। मारियान को सम्बोधित स्मिता का सवाल – ‘तू मर्द होना चाहती है? -प्रतिशोध की गिरफ्त मे जकड़े विवेक को आज़ाद करने की लेखकीय कोशिश है जहाँ एक तटस्थ दर्शक की तरह अपनी स्थिति और संभावित नियति को आमने-सामने रख कर उलटने-पलटने की युक्तिसंगत तार्किकता है। स्मिता के बहाने मृदुला दो बातों की ओर विशेष ध्यान दिलाना चाहती हैं। एक, प्यार बांटे बिना दर्द नही छंटता और प्यार बांटने की उदारता प्रकृति ने सिर्फ स्त्री को दी है। दूसरे, अमूमन साइकोपैथ की तरह आत्मकेन्द्रित पुरुष ”अपने लिए जितना संवेदनशील होता है, दूसरों के लिए उतना ही संवेदनशून्य।” (पृ0 31) लेकिन नारी पक्ष प्रधान होने के कारण यदि वह संवेदनशील है तो दर्द को पीते रहने की ‘पुरुष छवि’ में कैद वह अपनी पीड़ाओं का विस्तार ही कर सकता है – विराट अकेलापन और गहन शून्य। यानी संवाद, सहयोग और सृजन -यही है सार्थक मानव जीवन का रहस्य और स्त्रीत्व की सटीक परिभाषा। ”मैं मर्द नहीं, सर्जक होना चाहती हूँ। . . .यही मेरा प्रतिशोध होगा और यही मेरी क्षमा।” (पृ0 107) अपने को भीतर तक खंगाल कर पाया गया मूलमंत्र जो मारियान को डाहभरी आत्मपीड़ा से मुक्त कर लेखन के सहारे ‘आधी दुनिया’ के प्यार का  पात्र बनाता है तो स्मिता और असीमा को ‘कुटुम्ब’ का आत्मीय संरक्षण देता है जहाँ स्मिता सहिष्णु मां है और असीमा कार्यदक्ष बड़ा भाई।



पितृसत्ताक व्यवस्था की संरचनात्मक जटिलताओं की तटस्थ समझ और आत्मविश्लेषण से तीनों देशों का स्त्री लेखन इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि पुरुष समाज द्वारा अपनी सुविधा के लिए गढ़े गए मिथ ‘औरत ही औरत की दुश्मन है’ को तोड़ कर स्त्री वैश्विक भगिनीवाद का प्रसार करते हुए समूची मनुष्यता को आत्मीयता के घेरे में ले आना चाहती है। ‘कुफ्र’ में हीर की सहायता के लिए तोती, चील और तारा का समय-असमय प्रस्तुत होना, ‘मता-ए-दर्द’ में डॉक्टर शहनाज द्वारा पुरुष प्रवंचिता कुंवारी मांओं की लोकलाज और मर्यादा की रक्षा हेतु अस्पताल चलाना, ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ की सदफ़ आरा द्वारा रश्के कमर और जमीलुन बी की भरसक सहायता करना, ‘चाक’ की सारंग की लड़ाई में समूची स्त्री जाति का एकजुट होना, ‘ठीकरे की मंगनी’ में महरूख के साथ पसरता सखी भाव विस्तार, ‘कठगुलाब’ में इमीग्रंट स्त्रियों की एक सी सार्वकालिक-सार्वदेशिक नियति के आख्यान के साथ संस्था के रूप में खड़ी दर्जिन बीबी के स्वावलम्बी प्रयासों को जोड़ना इसके उदाहरण हैं। कुंदनिका कापड़ीआ भगिनीवाद को स्त्री धर्म की नई व्याख्या के रूप में प्रस्तुत करती हैं -”हर एक पीड़ित स्त्री हमारी बहन है और उसके कंधे से कंध लगा कर खड़े रहना हमारा स्त्री धर्म है।” (दीवारों से पार आकाश, पृ0 253) निस्संदेह भगिनीवाद पुरुष/व्यवस्था के खिलाफ स्त्री का शक्ति प्रदर्शन नहीं, वरन् स्त्री सशक्तीकरण का सृजनात्मक आयाम है जो उसकी मिशनबद्ध ऊर्जा को समाज कल्याण के रास्ते सभ्यता के स्वस्थ विकास और पुनर्निर्माण के संकल्प के साथ जोड़ता है।


उल्लेखनीय है कि तसलीमा की नायिकाएं – ‘फेरा’ की शरीफा और ‘मेरे बचपन के दिन’ की ईदुल -जहाँ उन्मुक्त उदार दृष्टि के अभाव में आत्मसाक्षात्कार नहीं कर पातीं (जिसकी क्षतिपूर्ति वे निश्चय ही अपनी कविताओं और टिप्पणियों मे करती हैं) और तहमीना की हीर एवं तारा स्वस्थ विकल्पों के अभाव में अपने विद्रोह को रचनात्मक बाना नहीं दे पातीं, वहीं भारतीय स्त्री लेखन आत्मसार्थकता की तलाश में स्त्री सशक्तीकरण की दुर्लभ मिसाल प्रस्तुत करता है। ‘कठगुलाब’ की दर्जिन बीबी अशिक्षित/अर्धशिक्षित निम्न एवं मध्यवर्गीय स्त्रियों में स्वाभिमान एवं स्वावलम्बन की चेतना का प्रसार कर रही हैं -”मेरा काम संभालेगी तो कितने ज़रूरतमंद बच्चों को काम सिखला कर, अपने पैरों पर खड़ा कर सकेगी। . . . मुझे देख, बीसियों बच्चे हैं मेरे। तभी इतने विश्वास के साथ कह सकती हूँ, एक बच्ची मेरा काम संभालेगी, एक चिता को आग देगी, बाकी सम्मानजनक जीवन जिएंगी। किसी एक की खातिर मुझे कलपने की जरूरत नहीं है।” (पृ0 186) तो ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया के चमड़े के निर्यात व्यवसाय में उसकी अस्मिता के साथ उस जैसी हाशिए पर फेंकी गई बहुतेरी स्त्रियों की अस्मिता जुड़ी है। ग्राम प्रधान द्वारा अपनी शक्तियों के दुरुपयोग से ग्राम समाज को दिन-ब-दिन खोखला करने वाली प्रधान पद की दावेदार ताकतों के खिलाफ सारंग से परचा भरवा कर मैत्रेयी पुष्पा न केवल राजनीति में स्त्रियों की भागीदारी की वकालत करती हैं, बल्कि उसकी निष्ठा, निर्भीकता और रचनात्मकता को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर समाज द्वारा स्त्री शक्ति के अधिकाधिक उपयोग (नजपसपेंजपवद) पर बल भी देती हैं, तो कुंदनिका कापड़ीआ स्त्री की जद्दोजहद के क्षेत्र का विस्तार करते हुए बलात्कार जैसे घिनौने सामाजिक अपराध के विरोध में समूची स्त्री शक्ति को संगठित कर व्यवस्था का चक्का जाम कर देने की संभावनाओं को रेखांकित करना नहीं भूलतीं। बेशक बलात्कार से उपजे सदमे का महिमामंडन प्रकारांतर से पुरुष द्वारा स्त्री की यौन शुचिता की मांग का पुरजोर समर्थन है, लेकिन डकैती-हत्या जैसे संज्ञेय अपराधों की कोटि में रख कर प्रत्येक विकृति के खिलाफ आवाज़ उठाने का दायित्व क्या स्त्री का नहीं?


नहीं। घनघोर असहमति – मृदुला गर्ग, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा और कुंदनिका कापड़ीआ की। स्त्री को ‘आधी दुनिया’ कह देने का अर्थ यह नहीं कि समाज में पुरुष की इयत्ता के बरअक्स अपनी स्वतंत्र सत्ता प्रतिष्ठित कर वे ताउम्र रेल की पटरियों की तरह दौड़ते रहें – समानान्तर और साथ-साथ। ”मर्द न हमारा दुश्मन है, न हरीफ़ – वह हमारी तरह इंसान है” (ठीकरे के मंगनी, पृ0 179) . . . ”औरत की ज़िंदगी के सारे करीबी व जज़बाती रिश्ते मर्द से ही होते हैं। बाप, भाई, शौहर, महबूब, बेटा जैसी अहमियत को नकार कर औरत कहाँ जाएगी?” (वही, पृ0 126) -नासिरा शर्मा बेहद आग्रहपूर्वक इस बुनियादी सच्चाई को रेखांकित कर देना चाहती हैं। परस्पर सहयोग और पूरकता के बिना चूंकि कोई भी साझा मिशन संभव नहीं, अतः जरूरी है स्त्रीसुलभ गुणों से सम्पन्न अर्धनारीश्वर पुरुष (कठगुलाब, पृ0 205) क्योंकि आदर्श मनुष्य व आदर्श सम्बन्ध तभी संभव है जब स्वतंत्रता और दायित्व बोध दोनों हों व्यक्ति के पास। मान लो, समाज में रंजीत, पीर साईं, व्योमकेश, जिम जारविस, इर्विंग, नरेन्द्र, अनिर्वाण, डॉक्टर रजब अली जैसे पुरुषों की बजाय विपिन, फिलिप, श्रीधर, स्वरूप, आदित्य, गगनेन्द्र, विनोद जैसे नारीवादी पुरुषों की तादाद बढ़ जाए, तो? तो यकीनन पूरी सृष्टि में सत् शिव और सौन्दर्य के प्रतिरूप आनंदग्राम का विस्तार हो जाएगा – कुंदनिका कापड़ीआ का विश्वास। आनंदग्राम जो एक बृहद् परिवार है, लेकिन परिवार संस्था के बुनियादी स्वरूप के ठीक विपरीत जहाँ ”साथ रहने से आत्मीयता और बल मिलते हैं”; जहाँ ”किसी का किसी पर वर्चस्व नहीं” (पृ0 156); जहाँ ऐसे प्रेम का साम्राज्य है जो ”शक्ति दे किंतु पराश्रयी न बनाए” (पृ0 165); जहाँ पूर्वाग्रहों को छोड़ कर सत्यान्वेषण जीवन की पहली शर्त बन जाता है” (पृ0 177)। उल्लेखनीय है कि इस आनंदग्राम को बाहर नहीं, ”अपने भीतर से प्रकट करना है”। पृ0 165) -एक यूटोपियन स्थिति कि ”पूर्ण में से पूर्ण निकल भी जाए तो भी जो बाकी रहता है, वह पूर्ण ही है।” (पृ0 276) असंभव, अविश्वसनीय लेकिन बेहद काम्य! मृदुला गर्ग यूटोपिया की बात नहीं करतीं (क्या इसलिए कि उनके पास एक ही अर्धनारीश्वर पुरुष है-विपिन?) , यूटापिया की पूर्वपीठिका हेतु जिस दुर्धर्ष संघर्ष, अनंत श्रम और अपराजेय सामंजस्य की आवश्यकता होती है, उसे गुजरात के सूखाग्रस्त बंजर गोधड़ इलाके में रोप-सींच कर नई फसल का इंतजार करती हैं। लेकिन स्थिति की इस विडम्बना की ओर संकेत करना भी नहीं भूलतीं कि ”एकांत में स्मिता कठगुलाब जी रही थी और कुटुम्ब में लहसुन उगा रही थी।” (पृ0 241) स्मिता की इस विडम्बना में हर उस स्त्री की त्रासदी छिपी है जो परस्पर पूरकता और सम्पूर्णता की तलाश में सहचर पुरुष का स्नेहसिक्त सान्निध्य भर पाना चाहती है। सौन्दर्य और सुवास की निधि उसके पास है, भरपूर और अद्वितीय! जरूरत पानी के तरल स्पर्श की है, फिर वह भी खिल उठेगी कठगुलाब की तरह – झनन हुम्म! झनन हुम्म!

मृदुला गर्ग स्त्री सशक्तीकरण को नारे से अलगा कर आत्म-संज्ञान की एक स्थिति मानती हैं। इसलिए एक ओर वे पुरुषवादी स्त्री संगठनों की तथाकथित कल्याणकारी भूमिका के पुनरीक्षण की मांग करती हैं, वहीं इक्कीसवीं सदी की स्वतंत्र प्रबुद्ध कैलकुलेटिंग स्त्री के रूप में उभरी नीरजा की यंत्र-मानवी मूर्ति का स्वयं अपने हाथों खंडन करती हैं। ”इस जन्म में, अगले जन्म में, पूर्व-पश्चिम में, किसी देशकाल में, हम औरत ही रहना चाहती हैं। दर्द और पीड़ा से घबरातीं तो मर्द क्यों, मशीन न होना चाहतीं?” (कठगुलाब, पृ0 107) वे अपनी इस कामना को नीरजा के मां न बन पाने की असफलता मंे खारिज नहीं कर सकतीं, क्योंकि मातृत्व अपने हाड़-मांस से अपना प्रतिरूप पैदा करना नहीं, अपनी वैचारिक विरासत को जर्रे-ज़र्रे तक फैलाना भी है। इसलिए किसी भी मानवीय उद्वेग से शून्य नीरजा को एक टुकड़ा भर ज़मीन भी नहीं देतीं। मशीन यदि कभी अपना विस्तार करना भी चाहे तो मशीन के अतिरिक्त क्या देगी?

भारतीय उपमहाद्वीप का स्त्री लेखन: स्त्री सशक्तीकरण की अनुगूंजें(दूसरी किस्त)

भारतीय स्त्री लेखन की तुलना में पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के स्त्री लेखन के प्रतिशोधात्मक एवं आवेशपूर्ण स्वर को देखते हुए दो बातें जेहन में कौंधती हैं। एक, धार्मिक कट्टरता का आतंक और अशिक्षा का घुप्प अंधकार बहुत देर तक चेतना की टिमटिमाती रोशनियों को नहीं लील सकता। दूसरे, दमघोंटू प्रतिबंधों एवं वर्जनाओं के खिलाफ लड़ाई में मुक्ति की कामना जिस अनुपात में जीवन का आत्यंतिक लक्ष्य बन जाती है, उसी अनुपात में गौण होता चलता है मुक्ति की दिशा और स्वरूप पर विचार। हालांकि यह बात भी उतनी ही सत्य है कि दोनों देशों की एक-एक लेखिका के लेखन के आधार पर वहाँ के समूचे स्त्री लेखन पर ऐसी कोई टिप्पणी करना अपने ही अल्प ज्ञान से उपजे निष्कर्षों का सामान्यीकरण है। अतः स्त्री सशक्तीकरण की मुकम्मल तस्वीर पेश करने के लिए बेहद ज़रूरी है भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधि स्त्री लेखन की भाँति दोनों देशों के विभिन्न प्रान्तों, कबीलों, समाजों, संस्कृतियों की तस्वीर प्रस्तुत करने वाले स्त्री लेखन का गहन विश्लेषण।


पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के स्त्री लेखन के बरअक्स भारतीय स्त्री लेखन में कुछ न्यूनताएं साफ तौर पर दिखाई देती हैं। एक, जोखिम उठा कर भी जिस बेबाकी से दोनों देशों की लेखिकाओं ने स्त्री जीवन को पंगु कर देने वाली इस्लामी रिवायतों के खिलाफ आवाज बुलंद की है, वह भारतीय स्त्री लेखन में नहीं। पिछले कुछ वर्षों से हिंदू राष्ट्रवाद के उठान ने धर्मनिरपेक्ष भारतीय मानस में धार्मिक आडम्बरों और कर्मकांडों की प्रतिष्ठा करते हुए जिस प्रकार धीरे-धीरे सती प्रथा का महिमामंडन किया है , वह निस्संदेह स्त्री नियति को पराधीन करने की सुविचारित साजिश है जिसे लेकर भारतीय लेखिकाओं की चुप्पी न केवल चौंकाती है, बल्कि उनके सरोकारों की सघनता पर सवालिया निशान भी लगाती है, खासकर तब जब तसलीमा नसरीन ‘नष्ट लड़की नष्ट गद्य’ में इसके खिलाफ व्यापक आंदोलन छेड़ने की बात करती हैं। (पृ0 171)

भारतीय स्त्री लेखन की दूसरी दुर्बलता है अपने आसपास के खुरदरे यथार्थ को अनदेखा कर वर्चुअल रिएलिटी का निर्माण करने की प्रवृत्ति। सामाजिक संस्थाओं का सर्वेक्षण करना आत्म पड़ताल का पहला चरण है जो रणनीति बनाने हेतु आधारभूमि और दृष्टि देता है, लेकिन वह लेखन और जीवन की कुल उपलब्धि नहीं हो सकता। विडम्बना है कि भारतीय लेखिकाओं ने इसे वांछित गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया। घरेलू हिंसा समाज के प्रत्येक तबके में फैली ऐसी बुराई है जो अमूमन प्रत्येक गंभीर साहित्यिक रचना में अपनी पूरी भयावहता के साथ उपस्थित है लेकिन साथ ही यह तथ्य भी काबिले-गौर है कि घरेलू हिंसा के मुखर विरोध को केन्द्रीय विषय बना कर सोद्देश्यपूर्ण ढंग से कोई रचना नहीं रची गई। धैर्यपूर्वक कुटते-पिटते रहना या तंग आकर सम्बन्धविच्छेद करना – यकीनन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ठीक यही बात कन्या भ्रूण हत्या, परिवार में लड़कियों के दोयम दर्जे की व्यापक स्वीकृति और जातिगत विषमता के कारण प्रेमी युगल की हत्या जैसे समस्याओं को लेकर भी कही जा सकती है जो प्रखर विरोध के सकारात्मक हस्तक्षेप के अभाव में अंततः अरण्य रोदन बन कर ही रह जाती हैं। यह ठीक है कि आग उगलने के बावजूद साहित्य समाज में क्रांति नहीं ला सकता, लेकिन क्रांतिधर्मी सेच का संस्कार तो देता ही है। अतः पहले चरण पर स्थिति के प्रतिकार के लिए हीर की तरह फुंफकार जरूरी हो जाती है।



तीसरे, स्त्री की ‘भोग्या’ छवि का विरोध करते हुए भी उसकी लैंगिक पहचान बनाए रखने का आग्रह जो स्त्री द्वारा अर्जित देह सम्बन्धों की स्वतंत्रता को एक उपलब्धि के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहता है। सवाल उठता है कि बाजार की नव-उपनिवेशवादी ताकतें ‘ब्यूटी विद ब्रेन’ के नाम से उत्तर आधुनिक स्त्री के रूप में जिस मिथ को गढ़ रही हैं, और साहित्य वर्षा वसिष्ठ (मुझे चांद चाहिए) तथा मीडिया नित्यप्रति होने वाली सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के जरिए जिसे पुष्टतर कर रहा है, क्या वह नखशिख वर्णन के लिए लालायित रीतिकालीन रमणी की छवि का पोषण नहीं? क्या दाम्पत्येतर सम्बन्धों में दैहिक तृप्ति के लिए उत्कंठित स्त्री अंततः पुरुष की सामंती रुचि और भोग विलास की सामग्री बन कर नहीं रह जाएगी? जो स्वाधीनता पराधीनता की प्रच्छन्न हदबंदियों का तत्परतापूर्वक निर्माण कर रही हो, उसे प्रश्नचिन्हित न करने में स्त्री लेखन की किस प्रवृत्ति को जिम्मेदार माना जाए – लापरवाही या दूरदृष्टि का अभाव? उल्लेखनीय है कि तसलीमा नसरीन ताल ठोंक कर ऐलान कर चुकी हैं कि ”स्त्री के नाम पर प्रचलित गृहिणी, रमणी, अंगना आदि अश्लील शब्दों को प्रतिबंधित करने की हिमायत करती हूँ” (नष्ट लड़की नष्ट गद्य, पृ0 97) और जर्मेन ग्रीयर ‘विद्रोही स्त्री’ में फीमेल यूनक के रूप में स्त्री की लैंगिक पहचान से मुक्ति का विकल्प भी प्रस्तत कर चुकी हैं।


फिर भी, भारतीय उपमहाद्वीप के तीनों देशों की स्त्री में निष्क्रिय भूमिका त्याग कर जीवन की बागडोर खुद अपने हाथ में लेने का बोध एवं साहस आया है, वह सुखद है। साथ ही इस अहम सच्चाई का रेखांकन भी कि आर्थिक स्वावलम्बन के बावजूद स्त्री तब तक स्वतंत्र नहीं जब तक परंपरागत संस्कारों से मुक्ति का नैतिक एवं मानसिक साहस अपने भीतर न जुटा ले। इसी ‘नष्ट’ लड़की के कंधे पर है इक्कीसवीं सदी के समाज के गठन का गुरु दायित्व जिसकी चारित्रिक विशेषताओं को गढ़ कर भासमान व्यक्तित्व दिया है तसलीमा नसरीन ने – ”यदि कोई स्त्री अपने दुख, दैन्य, दुर्दशा को दूर करना चाहती है, धर्म, समाज और राष्ट्र के अभद्र नियमों के खिलाफ डट कर खड़ी होना चाहती है; हेय ठहराने वाली प्रथाओं-व्यवस्थाओं का विरोध करके अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगती है तो समाज के ‘भद्र पुरुष’ उसे ‘नष्ट लड़की’ करार देते हैं। ठीक भी है, स्त्री के ‘मुक्त’ होने की पहली शर्त ही है, नष्ट होना। ‘नष्ट’ हुए बिना इस समाज के नागपाश से किसी भी स्त्री को मुक्ति नहीं मिल सकती।” हाँ, वक्तव्य में इतना क्षेपक और कि ‘नागपाश’ से मुक्ति की दरकार स्त्री और पुरुष दोनों को है – स्वस्थ मानसिकता और नई ऊर्जा के साथ नई राहों के अन्वेषण में रत एक अनुकरणीय युगल!

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com