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इस्लाम में हराम परिवार-नियोजन: एक मिथक

हुस्न  तबस्सुम निंहां

शोध-सारांश

अब तक के समय में जहां भारत ने विभिन्न  क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है वहीं कुछ समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। जिसमें सबसे महत्‍वपूर्ण समस्या  है अनियंत्रित जनसंख्या। देश के सम्पूर्ण विकास में जहां मृत्यु दर का ह्रास हुआ है वहीं जन्म दर पूर्ववत बना हुआ  है। बेहतर स्वाथ्य  और भोजन प्राप्ति से लोगों की प्रजनन क्षमता बढ् गई है इस प्रकार उच्च जन्म दर व निम्न  मृत्यु‍दर के कारण जनसंख्या विस्फोट की समस्या सम्मुख  आ खड़ी हुई है। इस जनसंख्या‍ विस्फोट ने कई अन्य समस्यााओं को जन्म‍ दिया, जैसे- निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, आवास, कुपोषण आदि। जनसंख्या‍ वृद्धि को मानवीय समाज के सम्मुख प्रस्तुत सभी समस्याओं जैसे तापमान में असंतुलन, पर्यावरणीय गिरावट, जातीय प्रतिस्पर्धा, व्यासपक स्तर पर फैल रही गरीबी और भुखमरी आदि के अलावा आर्थिक विकास दर में कमी, राजकीय समाज कल्याण क्षमता में कमी, तथा लोगों का जीवन स्तर सुधरने की दिशा में मुख्य बाधा के रूप में मना जाता है।

काहिरा सम्मेमलन में विश्व  के 180 देश शामिल हुए थे। इन सभी ने मिल कर इस पर चिंता जताई थी कि प्रतिवर्ष 9 करोड़  लोग दुनिया में बढ़ रहे हैं। इसकी रोक-थाम के लिए परिवार-नियोजन को अपनाने पर जोर दिया गया था। दुनिया की आबादी ना बढ़े इसके लिए जिन साधनों का उपयोग किया जाएगा उन पर 17 अरब डॉलर खर्च किए जाने की घोषणा की गई थी। रॉयल सोसायटी द्वारा प्रकाशित एक अन्य रपट में कहा गया है कि इस पृथ्वी पर लम्बे  समय तक जीवन बनाए रखने के लिए जितनी आबादी होनी चाहिए उससे हमारी आबादी इस समय हजार गुना ज्यादा है।

प्रस्ताावना

उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर दादरी में मोहम्मद उमर अपनी पत्नी आसिया के साथ रहते हैं। सरकार द्वारा या गैरसरकारी एजेंसियों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के संदेशेा की इन्होंने बारहाअनदेखी की या गमभीरता से नहीं लिया। इनके 24 बच्चे हैं। आसिया बेगम को जहां तक याद है उन्होंने  29 बच्चों को जन्म  दिया। जिसमें से चार बच्चे चल बसे। पिता उमर का कहना है कि मेरे सारे बच्चे कामकाज में लगे हैं। परिवार चलाने में भी कोई परेशानी नहीं होती। वहीं आसिया बेगम कहती हैं कि ‘’ हमारे इस्लाप में जनसंख्या निंयंत्रण के साधनों का इस्त माल करने की मनाही है।‘’ वह कहती हैं ‘’ऑपरेशन करना पाप है। यदि मैं ऑपरेशन कराती हूं तो मरने के बाद मेरी कब्र पर कोई प्रार्थना नहीं की जाएगी।‘’

यह अकेला ऐसा उदाहरण नहीं है, ऐसे लाखों उदाहरण हमें मिल जाएंगे जहां आम मुसलमान आंध-आस्‍‍था ग्रस्त है। इसका निवारण तभी हो सकता है जब मुस्लिम समुदायों में परिवार-नियोजन के प्रति जागरूकता फैलाई जाए। यही भ्रांतियां मुसलमानों की तरक्की में अवरोधक साबित होती हैं।

वास्तव में अरबियन समाज को कभी बर्बर समाज की संज्ञा दी जाती थी। यहां तमाम छोटे-छोटे कबीले थे, जिनकी स्थिति काफी चिंताजनक थी। वहां ऐसी प्रथा थी कि गरीब अरब कबीलों में लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था। चूंकि लड़के कमाने वाले होते थे इसलिए  उनकी रक्षा की जाती थी। इन कबीलों में लड़कियों को बचाना भी एक कठिन समस्या  थी। उसी युग में ये आयत उतरी—‘’ कत्ल न करो, हम उसको भी रोजी देते हैं, तुमको भी देते हैं’’ यह आयत संतान के कत्ल’ यानि लड़की को कत्ल  करने के संबंध में उतरी थी न कि गर्भ-निरोध के बारे में।

विभिन्न धर्मों में परिवार-नियोजन 
परिवार की नैतिकता को लेकर सभी धर्मों में भिन्न– भिन्न विचार हैं। रोमन कैथोलिक चर्च कुछ मामलों में केवल प्रकृतिक परिवार नियोजन को स्वीाकार करता है। हालांकि कैथेलिकों की एक बड़ी संख्या जो विकसित देशों में निवास करती है परिवार नियोजन के नए साधनों को स्वीकार करती है। प्रोटेस्टेंट में कई तरह के विचार हैं। यहूदी धर्म के विचार कठोर रूढि़वादी सम्प्रदाय  से अधिक शिथिल सुधारवादी सांम्प्रदाय तक विविधतापूर्ण हैं। हिंदू सांम्प्रदाय में दोनो प्रकार के उपायों को माना जाता है। वहीं इस्लाम में गर्भनिरोधक को तभी तक समर्थन है जब तक उसमें स्वास्थय  के लिए खतरा ना हो। कुरान गर्भ-निरोध की नैतिकता के बारे में कोई विशिष्ट  कथन प्रस्तुत नहीं करता। प्राय: इसमें ऐसे कथन शामिल हैं जो बच्चे पैदा करने को प्रोत्साहन देते हैं।

हालांकि इसके पीछे कारण कुछ और ही थे। कहीं न कहीं ये विचार ही पूर्णतः: स्वांर्थपरक था। अध्ययनों से  ऐसा लगता कि इसके पीछे कुछ राजनीतिक कारण भी शामिल थे। जो इस प्रकार थे-

राजनीतिक कारण
चूंकि उस दौर में इस्लाकम का विस्ताकर कम या न के बराबर था इस्लािम अपने निर्माण के दौर में था, अत: अपनी संख्याे बढ़ाने के लिए या अपनी उम्म त को बहुमत में लाने के लिए मोहम्मंद ने जनसंख्या: बढ़ाने का अहवान किया और अधिक संतान जनने की अपील की। यही कारण है कि इस्लामी देशों में भी परिवार-नियोजन का बहिष्कारर किया जा रहा है। मसलन पिछले दिनों ईरान के इमाम खुमैनी एवं राष्टवपति अहमद नियाज ने एक वक्तव्य  जारी कर कहा कि ‘ईरान में मुस्लिम जनसंख्या तेजी से घट रही है। इसलिए ईरानियों को चाहिए कि कम से कम 9 से 10 बच्चे पैदा करें। इतना ही नहीं मौका पड़ने पर बहु-विवाह भी करें। जीवन स्तर बनाए रखने के लिए जो रिवाज चल निकला है उसे तुरंत समाप्त  करें और इस बात की चिंता छोड़ दें कि उनका लालन-पालन कैसे होगा। आने वाली संतानों की चिंता मां-बाप को नहीं बल्कि उस ईश्वर को करनी है जिसकी आज्ञा से उन्होंने धरती पर जन्मा लिया है।’

हालांकि ईरान में शाह के शासन में इस बात की मान्यता थी और प्रचार-प्रसार किया जाता था कि अपना जीवन स्तर उंचा बनाए रखने के लिए छोटा परिवार अत्यंत आवश्यक है किंतु अब ईरानी नेताओं का कहना है कि यह सिद्धांत भ्रामक और इस्लाम विरोधी है। यहां तक कि विश्वा स्तर का मुस्लिम संगठन ‘’उम्माल’’ भी इस विचार को प्रचारित कर रहा है कि मुसलमानों की संख्या घट रही है जो अपने आपमें एक खतरनाक संकेत है। यदि ईश्व रीय संदेश जो कुरान का संदेश है, की अवहेलना की गई तो इस्लाम के साथ-साथ मुस्लिम साम्राज्य भी खतरे में पड़ जाएगा। अत: वर्तमान में परिवार-नियोजन की जो संकल्पना है वो हदीस व कुरान विरोधी है।’

पाकिस्तान की स्थिति भी इससे मिलती-जुलती है। पाकिस्तान के एक कंडोम ‘’जोश’’ को अनैतिक घोषित कर दिया गया। ‘’जोश’’ को पाकिस्तांन में अमरीका का एक गैर-लाभकारी संगठन चलाता था। यह संगठन परिवार-नियोजन और एड्स से बचने के बारे में जागरूकता का काम करता था। देश के इलेक्टरानिक मीडिया नियामक प्रधिकरण पी एम आर (पेमरा) ने सभी टेलिविजिन के चैनलों केा यह निर्देश दिया गया कि वह ‘’जोश’’ का प्रचार-प्रसार बंद करें। पेमरा के प्रवक्ता  फखरूददीन मुगल के ब्रॉडकास्टाटर्स एसोसिएशन को भेजे गए पत्र में कहा गया कि ‘’ यह विज्ञापन अश्लील है। अनैतिक है। यह हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक मान्य ताओं के पक्ष में नहीं है।

इसी प्रकार फिलिस्तीन में यासर अराफात ने 12 बच्चों को जन्म  देने का आग्रह किया। जिसमें दो पर परिवार का दायित्व हो तथा दस इस्राईल के विरूद्ध संघर्ष करें। आज भी एक फिलिस्तीनी महिला औसतन चार बच्चों को जन्म देती है। वहीं यहूदी परिवार में 7 से 8 बच्चे् जन्म लेते हैं। फिर भी मुस्लिम विद्वानों का मत है कि सारी दुनिया में मुसलमानों की संख्या  कम हो रही है। यदि विशाल क्षेत्र वाले हिस्से पर मुसलमानों का अपना अधिकार ही न होगा और अधिकतम भाग पर बाहर वाला आ कर उस पर काम करेगा तो उसकी मिल्कियत कितने समय तक रहेगी। इस्लाामी विद्वान मानते हैं कि इनकी जमीन पर इनका ही कब्जा होना चाहिए। क्योंकि उनकी जमीन अगर किसी और के हाथों में चली जाएगी तो उनका अस्तित्वत कहां रह जाएगा।

इन्हीं का अनुसरण करते हुए भारतीय मुसलमानों में भी परिवार-नियोजन के प्रति कोई रूचि नहीं है। हालांकि तरक्की  पसंद मुस्लिम समाज का नजरिया अलहदा है। प्रतिष्ठित साहित्यीकार हसन जमाल कहते हैं कि ‘’ कुदरत का उसूल है कि ताकत का मुकाबला  ताकत से  किया जाए, चाहे वो किरदार की ही ताकत क्यों  न हो।‘’ महात्मा गांधी ने सूरज न डूबने होने वाली ब्रितानी ताकत का मुकाबला अहिंसा से किया। मुसलमानों को उनसे सबक लेना चाहिए। आबादियों की वृद्धि से ताकतों का मुकाबला नहीं किया जा सकता। उसके लिए दूसरे स्तरों पर मजबूत होना पडे़गा। कभी मुसलमान इल्मा, हिकमत, सांईस हर मामले में गोरी कौमों से आगे बढ़ रहे थे किंतु आज वे काफी पिछड़ चुके हैं। दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी देश हैं जहां परिवार-नियोजन को लेकर सकारात्मक अवधारणएं भी हैं। इजिपट में हर शुक्रवार को नमाज के बाद इमाम को परिवार-नियोजन के लाभ पर अपना व्या्ख्यान देना होता है। मलेशिया में परिवार-नियोजन का उलंघन करने वाले को फौजदारी कानून के अंतर्गत दण्डित करने का प्रावधान है। बंगलादेश, इंडोनेशिया, थाईलैण्ड, और ईरान में परिवार-नियोजन की मुहिम एशियाई बैंक के माध्यम से चलाई जाती है। इंडोनेशिया में राष्टीय परिवार-नियोजन बोर्ड परिवार-नियोजन के कार्यक्रमों का संचालन करता है।

असम में गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में सर्जरी के प्रो. इलियास अली ने मुसलमानों के जेहन से परिवार-नियोजन निषेध की जो धारणा है उसे बदलने की मुहिम छेड. रखी है। इसके लिए वह बाकायदा कुरान की आयतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि परिवार-नियोजन इस्लाहम में हराम नहीं है या कुरान परिवार नियोजन के खिलाफ नहीं है। डॉ. इलियास गांव-गांव जाकर मुसलमानों केा इसके प्रति जागरूक बना रहे हैं और बता रहे हैं कि इस्लाम एक अनूठा धर्म है जिसमें आबादी पर काबू पाने के तौर तरीकों का ब्योरा भी है जिसे ‘’अजाल’’ कहा जाता है। इसी के आधार पर ईरान में परिवार-नियोजन अपनाया जा रहा है और इसकी जवाबदेही धर्मगुरूओं को सौंपी गई है। ये ईरानी दम्पितयों के बीच कुरान की आयतों की सही व्याख्या कर लोगों को परिवार-नियोजन के लिए प्रेरित करते हैं।

इस प्रकार ये स्पष्ट है कि परिवार-नियोजन के खिलाफ फैलाई जाने वाली धारणा नितांत व्यक्तिगत और स्वार्थ परक है। इसका धार्मिकता से कोई लेना-देना नहीं है। हां धर्म के आधार पर इस विचार को आम-जन तक पहुंचाना तथा उन पर लागू करना काफी आसान है इसी लिए इसे धर्म से जोड़ दिया गया है। इस अवधारणा को मुस्लिम धर्म गुरू, मुस्लिम नेता आदि अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करते रहते हैं। अत: परिवार-नियोजन इस्लाम के खिलाफ है ये पूरी तरह मिथकीय और भ्रामक अवधारणा है।

इस्लामी साहित्य  में परिवार-नियोजन की परिकल्पना


ऐसा माना जाता है कि कुरान के सिवा पैगम्बर मोहम्मद साहब के जीवन में भी ऐसी कुछ घटनाएं घटीं जिससे प्रतीत होता है कि वह परिवार-नियोजन के समर्थक थे। दाएमुल इस्लाम भाग दो के पृष्ठ 88 और 89 पर इब्नए ए अब्बाास का जिक्र करते हुए कहा गया है कि बडा कुटुम्ब गरीबी का प्रतीक होता है जबकि छोटा पविार सुखी होता है। काहिरा विश्वविद्यालय के कानून विभाग के अध्यक्ष शेख मो. इब्राहीम का कहना है कि यदि प्राचीन समय में गर्भ रोकने के लिए दवाएं और चीराफाडी होती थी तो फिर आज के समय में परिवार नियोजन पर किस तरह प्रश्न उठाया जा सकता है। शेख मोहम्मद अलमुबारिक अल अब्दुिल्ला  अपने निबंध में लिखते हैं—“वास्तव में परिवार-नियोजन आज की दुनिया में धार्मिक समस्या न हो कर सामाजिक समस्या है”। इस लिए इस पूरे मामले पर सामाजिक दृष्टि से विचार करना चाहिए। इस्लाम के चार इमामों में एक इमाम गजाली ने अपनी पुस्तक “अहयाउल उलूम’’ को सिर्फ गर्भ-निरोधक पर ही केद्रित कर लिखा है।

इस्लाम में प्रतिबंधित परिवार नियोजन एक मिथकीय परम्परा है। इसका यथार्थ से कोई लेना-देना   नहीं है। मुस्लिम समाज में परिवार नियोजन को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं। इसी कारण यह समाज काफी पिछडा तो है ही, जनसंख्या घनत्व का भी इस पर विपरीत असर पडता है।यही परिकल्पना इस अध्ययन का आधार है।

प्रस्तुयत शेाध अध्ययन के लिए 300 लोगों का चुनाव किया गया है। अध्य यन क्षेत्र वर्धा है। इन लोगों की औसत आयु 35 से 50 वर्ष तक है। इस शोध के अंतर्गत निम्न वर्ग, निम्न मध्ययम वर्ग तथा उच्च वर्ग के परिवारों का चयन किया गया है।

प्रस्तुत शोध में प्रथमिक तथा द्वितीय स्रोतों का प्रयोग किया गया है। प्रथमिक स्रोत के अंतर्गत प्रश्नावली का निर्माण किया गया है जिसमें परिवार नियोजन तथा जनसंख्या  से सम्बंधित प्रश्न पूछे गए हैं। द्वितीय स्रोत के अंतर्गत लिखित पुस्त्कों, समाचार  पत्रों, शेाध प्रबंध इत्याबदि  का  अवलोकन किया गया  है।

अनुसूची का विश्लेषण

1. आपके कितने बच्चे  हैं ?

300 उत्तरदाताओं से पूछे गए प्रश्नों  से ज्ञात हुआ कि  24 प्रतिशत के 1 से 2, 47 प्रतिशत के 3 से 4, 27  प्रतिशत के 5 से 6, 15 प्रतिशत के  7 से 8 तथा  5 प्रतिशत  के 9 से अधिक बच्चे हैं। अत:  स्पष्ट होता है कि सबसे अधिक 47 उत्तरदाताओं के 3 से 4 बच्चे हैं, तथा  यह भी स्पष्ट होता है कि 300 उत्तरदाताओं में 15 प्रतिशत के 7 से 8 तथा 5 प्रतिशत लोगों के 9 से अधिक बच्चे हैं।  इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मुस्लिम परिवार ज्याादा बच्चे करते हैं।

2. आपकी राय में कितने बच्चे होने चाहिए ?
300 उत्त‍रदाताओं में से  21 प्रतिशत का जवाब  2 बच्चेे,  13 प्रतिशत का 3 बच्चे,  25 प्रतिशत का 4 बच्चे तथा   41 प्रतिशत का जवाब था जितने खुदा दे दे, होने चाहिए।

3. आप बच्चों के भविष्य के बारे में किस तरह सोचते हैं ?
300 उत्त रदाताओं से पूछे गए प्रश्न  आप बच्चें के भविष्य के बारे में किस तरह सोचते है से ज्ञात हुआ कि  16 प्रतिशत सब अल्लाह सोचता है एवं  77 प्रतिशत बच्चोंं का भविष्य अच्छा हो तथा  7 प्रतिशत जो किस्मत बना दे के फॉर्म में सोचते हैं।

4. क्या आप परिवार नियोजन के विषय में जानते हैं ?
300 उत्त‍रदाताओं में से   90 प्रतिशत परिवार नियोजन के बारे में जानते हैं तथा  10 प्रतिशत लोग परिवार नियोजन के बारे में अनभिज्ञ हैं। अत: स्पष्ट होता है कि परिवार नियोजन के बारे में लगभग सभी लोग जानते हैं।  परंतु अन्य प्रश्नों  से ज्ञात मतों से यह भी साफ तौर पर स्पष्ट होता है कि परिवार नियोजन के बारे में जानते तो हैं परंतु उसे अपनाने में कोताही बरतते दिखाई प्रतीत होते हैं।

5. क्या परिवार नियोजन लाभदायक है ?
51 प्रतिशत उत्तरदाता परिवार नियोजन को लाभदायक समझते हैं एवं  5 प्रतिशत परिवार नियोजन को लाभदायक नहीं मानते तथा 44 प्रतिशत लोगों ने कह नहीं सकते के पक्ष में अपने मत दिए।

6. परिवार नियोजन से क्या जीवन स्तर में बदलाव आता है. 
42 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मत है कि परिवार नियोजन अपनाने से मुस्लिम समुदाय के जीवन स्तर में बदलाव आ सकता है एवं 30 प्रतिशत लोगों ने कहा नहीं कोई बदलाव नहीं आएगा तथा 28 प्रतिशत  लोगों ने पता नहीं के पक्ष में अपना मत दिया।

7.क्या आपको लगता है कि परिवार नियोजन अपनाना गुनाह या हराम है ?
300 उत्त रदाताओं में से 49 प्रतिशत लोगों का मानना है कि परिवार नियोजन अपनाना गुनाह या हराम है एवं30 प्रतिशत लोगों ने कहा कि नहीं परिवार नियोजन अपनाना हराम या गुनाह नहीं है, यह वक्त की मांग है तथा 21 प्रतिशत लोगों ने पता नहीं के पक्ष में अपना मत दिया। अत: स्पष्ट  होता है कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को परिवार नियोजन अपनाना हराम या गुनाह लगता है।

निष्कर्ष
निष्किर्ष के अंतर्गत यही कहा जा सकता है कि परिवार-नियोजन की अवधारणा पूरी तरह से राजनीतिक व अन्य  निजी स्वावर्थों के कारणों से प्रेरित है । इस अवधारणा की महत्ता देश व काल व क्षेत्रियता के लिहाज से घटती व बढ़ती रही है। वास्तव में ये एक मिथकीय परम्परा है जिसे पूरी तरह से आम सहमति भी नहीं है।

संदर्भ-ग्रंथ सूची
1- मौदूदी, सैयद अबुल आला, पु. इस्लाम और बर्थ कंट्रोल, (2003) प्र. मर्कजी मक्त-बा इस्लाीमी पब्लिशर्स, नई दिल्ली
2- आजाद, फरजाना अमीन, पु. मुसलमान पुरूष: शोषक व पोषक ( 2005 ) प्र.संघ प्रकाशन, नागपुर
3- हुसैन, मुजफ़्फर,  पु. जनगणना, इस्लाम और परिवार-नियोजन (2005) प्र.विश्व। संवाद केंद्, मुंबई

लेखिका  अहिंसा एवं शांति अध्यनयन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्री य हिंदी विश्वाविद्यालय में शोध छात्रा हैं. संपर्क:  Email :-nihan073@gmail.com

तस्वीरें गूगल से साभार 

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बीजेपी, आरएसएस में भगदड़, उबरने के लिए वे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करेंगे: अरुंधती रॉय

स्त्रीकाल डेस्क 

लेखक और एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय ने कहा है कि देश की पूरी बुनियाद को ही तोड़ा जा रहा है और सत्ता के साथ एक समानांतर राज्य काम करना शुरू कर दिया है। जिसका मकसद? “संविधान को बदलने की वैचारिक तैयारी” है।” अरुंधति ने ये बातें आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कही। इस साक्षात्कार में उन्होंने मौजूदा शासन को लेकर अपनी अनेक चिंतायें ज़ाहिर कीं।

उन्होंने देश के भविष्य को लेकर सुनायी पड़ने वाली बुरी आहट को लेकर कहा,”एक ऐसी आहट है जो मुझे लगता है कि बहुत से लोग सुन नहीं पा रहे हैं और कुछ बहुत गंभीर रूप से चुप कराया जा रहा है और वह यह है कि हम ऐसे हालात में जी रहे हैं, जिसमें आपका संपूर्ण ध्यान तात्कालिक आपराधिक घटनाओं पर होगा- किसका गला काटा जा रहा है, किसको मारा जा रहा है और अन्य इसी तरह की घटनाओं पर – आपको नहीं पता है कि उन सभी चीजों के पीछे, भय और आतंक की एक बड़ी मात्रा है और बहुत से समुदायों को इनमें धकेल दिया जा रहा है। मुझे नहीं लगता कि शहरी भारत के लोग कृषि संकट और उसकी हद तक को जानते हैं”।

अरुंधति ने स्थापित की जा रही समानांतर सत्ता को लेकर आशंका जताते हुए कहा कि “जब मैं स्थायी राज्य की बात करती हूं तो मैं उन शक्तियों का जिक्र कर रही होती हूं जो चुनावों से नहीं बदलती हैं। वह वैसी ही रहती हैं। इसलिए अगर वे चुनाव हारती भी हैं, तो वे जीवन के स्तरों में प्रवेश कर जाती हैं। आरएसएस, ज़ाहिर है कि, एक अलग मामला है। यह स्थायी राज्य नहीं है, यह समानांतर राज्य है”।

बातचीत में आगे उन्होंने कहा “मुझे नहीं लगता कि देश कभी भी इस तरह की स्थिति में रहा है,” उन्होंने विस्तार से इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि यह अब वैसी ही बात क्यों नहीं है जहां कोई कहता है ​​कि कांग्रेस पार्टी ने भी तो ऐसा ही किया था जब वह सत्ता में थी। “वो सब (पिछली सरकारों की ग़लतिया) सही है, लेकिन अभी तो, संविधान को ही बदलने की एक वैचारिक तैयारी है।”

उन्होंने कहा कि “यह सिर्फ इस बारे में नहीं है कि सरकार में कौन है बल्कि स्थायी राज्य के बारे में है – जो अपरिवर्तनीय हैं: न्यायपालिका, नौकरशाही, विश्वविद्यालय, इंटेलिजेंस ब्यूरो और इसी तरह की अन्य शक्तियां – बहुसंख्यक लोगों के लोगों द्वारा यह सब भरी जा रही हैं (अगर बहुसंख्यक समुदाय के रूप में एक चीज है तो वरना, मुझे लगता है कि हम अल्पसंख्यकों के देश हैं)। वे क्या नहीं समझ पा रहे हैं कि यह हमें उसी जगह में वापस ले जाने की कोशिश है जहां हम जाने की कभी उम्मीद ही नहीं कर रहे थे। सभी को एक बिल में धकेल दिया जा रहा है।”

उन्होंने सरकार की लोकतांत्रिक आईक्यू पर सवाल उठाते हुए कहा,”आईक्यू या बौद्धिक स्तर में इस सरकार में बहुत कमी आई है” और जब न्यायाधीश लोया या सोहराबुद्दीन मामलों के बारे में पढ़ते हैं तो “लोगों पर बहुत निराशाजनक प्रभाव” होता है।”

साक्षात्कार में वो आगे कहती हैं,”आप देखिये कि सुप्रीम कोर्ट में क्या हो रहा है और तुरन्त आप मीडिया में डर महसूस करते हैं। क्या होता है कि नौकरशाह भी डरने लगते हैं, मंत्रियों को डर लगता है। आप सभी की पहल करने की क्षमता को दूर कर रहे हैं, हर निर्णय दो लोगों द्वारा नहीं लिया जा सकता, लेकिन अन्य लोग फैसले लेने से डर रहे हैं, वे कुछ भी कहने से डर रहे हैं। तो जो कुछ तुम देख रहे हो वह किसी चीज को चीरना फाड़ना नहीं है, वास्तव में हर गाँठ खुल रही है, इसलिए आप केवल अंत में मुट्ठी भर धागा पाएंगे। ये सचमुच बेहद डरावना है।”

अरुंधति देश को आने वाले दिनों में एक अनचाहे हालात से दो-चार होने की आशंका पर कहती हैं, “मैं सच में इस बात से डरी हुई हूं कि इस समय बदलाव की एक भावना काम कर रही है और इसके चलते बीजेपी और आरएसएस में एक तरह की भगदड़ है। इसलिए एक बार फिर से ध्रुवीकरण के लिए वो कुछ भी करेंगे। हम सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या के फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जो भी फैसला होता है,उसका इस्तेमाल लोगों के बीच फूट पैदा करने में किया जा सकता है। यह मायने नहीं रखता कि कोर्ट क्या कहता है। फैसले को लोगों को आपस में बांटने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। और चुनाव के लिहाज से फैसले का समय बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए भी मैं बहुत डरी हुई हूं।” उन्होंने ये भी कहा कि चुनाव के मूड के लिहाज़ से अगर सही बैठता है,तो यहां “एक सीमित युद्ध भी हो सकता है।”

रॉय ने कहा कि “वो इस साल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के शोर को और बढ़ाने जा रहे हैं। मुझे नहीं पता कि वो कामयाब होंगे या नहीं,लेकिन उसका बिगुल पहले ही बज चुका है।”

पीएम मोदी के नोटबंदी के महत्वाकांक्षी फैसले पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, “ये बेहद तानाशाही भरा और अलोकतांत्रिक फैसला था। जैसा कि हम जानते हैं करेंसी एक स्टेट और उसकी जनता के बीच सामाजिक करार होती है।”

उन्होंने पीएनबी संकट को एक व्यापक आर्थिक संकट बताया, “पहले तो आप लोगों को अपने पैसे बैंक में रखने के लिए मजबूर करते हैं और उसके बाद ये लोग हजारों करोड़ लेकर भाग जा रहे हैं। मुझे यकीन है कि नीरव मोदी ने सिर्फ गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां प्राप्त की हैं। वह सारा धन उन पूजीपतियों को दे दिया गया जो इसे वापस नहीं करते हैं, ऐसा लगता है, कि इसे वापस भुगतान करने की उन्हें ज़रूरत भी नहीं है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि हम उस समय को पूरी तरह से समझ रहे हैं जिसमें हम रह रहे हैं। यहां तक ​​कि सतह पर आप दरारें देख रहे हैं लेकिन उस सतह के नीचे, चीजें बहुत ज्यादा नष्ट होने की कगार पर हैं।”

राय के मुताबिक सत्तारूढ़ पार्टी की कार्रवाइयों को केवल वही प्रसन्नता भरी नज़रों से देख सकता है,जो देश का भला नहीं चाहता है। उन्होंने कहा कि “क्योंकि वे इसे कमजोर होते और बिखरते देख रहे हैं, वह भी शीर्ष पर नहीं बल्कि पूरी बुनियाद ही खत्म कर दी जा रही है। लोकतंत्र की संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है।”

अपने ऊपर लगाए जाने वाले राष्ट्रद्रोह के आरोप को लेकर उनका जवाब था,“जो कोई अन्याय की आलोचना करता है, जो नीति के साथ तर्क करता है, या जो सबसे गरीब लोगों या सबसे निराश्रित लोगों को कुचलने के तरीकों का विरोध करता है अगर वह एक राष्ट्र विरोधी है तो यह आपको बताता है कि उनके राष्ट्रवाद पर उनके विचार क्या हैं।”

उन्होंने खेद व्यक्त किया कि “हम जो कुछ यहां तलाशते हैं (मौजूदा समय में) वह है साथी होने की भावना, आप राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को वास्तविक चिंता या प्रेम के साथ बोलते नहीं पाते हैं। हर कोई सिर्फ अपने सिर में किसी विचार के साथ लोगों के सिर पर हथौड़ा मारना चाहता है। मुझे उनकी बातचीत में किसी के प्रति भी दया और प्यार नहीं दिखता है- यहां तक ​​कि अस्पतालों में मरने वाले बच्चों के लिए भी नहीं।”

www.janchowk.com से साभार

तस्वीरें गूगल से साभार 

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चारपाई (रजनी दिसोदिया की कहानी)

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रजनी दिसोदिया

साहित्यकार , आलोचक रजनी दिसोदिया मिरांडा हाउस मे हिन्दी की प्राध्यापिका हैं. संपर्क : ई -मेल : rajni.disodia@gmail.com,मोबाईल , मोबाईल : 9910019108 

सारा सामान ट्रक में लादा जा रहा था और वह टूटी चारपाई अभी बॉलकनी में ही खड़ी थी।बूढ़े रामस्वरूप बाहर, नीचे  कुर्सी पर बैठे, वहीं से बॉलकनी में खड़ी चारपाई को देख रहे थे। ऊपर से नीचे  सामान लाने वाले मजदूरों को वे बार-बार हिदायत दे रहे थे कि वह बॉलकनी में रखी चारपाई  भी ट्रक में रखनी है।उस चारपाई की हालत देख कर मजदूर यह अनुमान नहीं लगा पा रहे थे कि क्या सचमुच उसे ट्रक में लादा जाना है। उनका अनुमान था कि ये लोग इस कबाड़ को यहीं छोड़ जाएंगे तो हम इसे यहाँ से ले जाएंगे गर्मियों में झुग्गी  के बाहर एक चारपाई पड़ी रहे तो आए गए को ठहराने में कुछ आराम रहेगा। किन्तु हर बार के चक्कर में रामस्वरूप उन्हें वह चारपाई भी नीचे उतार लाने की जो हिदायत  दे रहे थे उससे उनका मन डोलने लगता था। सीढ़ीयों पर आते जाते एक दूसरे को मजाक में ठेलते हुए कह बैठते ” कंजूस बुड्ढा खाट के पीछे पड़ा है , इस टूटी खाट को क्या अपनी अर्थी के साथ ले जाएगा।”  रामस्वरूप उन सबकी इस बातचीत को सुनकर भी अनसुना कर रहे थे। उनकी नज़रें उस चारपाई पर ऐसे अटकी पड़ी थी कि जैसे परियों की कहानी में राक्षस की जान पिं‍जरे के तोते में अटकी पड़ी रहती है। जैसे- जैसे सामान नीचे आ रहा था और वह चारपाई ऊपर वॉलकनी में ज्यों की त्यों रखी दिखाई दे रही थी वैसे -वैसे रामस्वरूप का पारा भी ऊपर चढ़ने लगा था। वे मन ही मन तय कर रहे  थे कि यदि यह चारपाई साथ नहीं ले जाई गई तो वे भी बहू-बेटे के साथ नए घर में नहीं जाएंगे , अकेले यहीं रह लेंगे। रामस्वरूप अपने जमाने के कम जिद्दी इंसान नहीं रहे। एक बार जो ठान लिया बस ठान लिया फिर समझाने वाला लाख समझाता रहे कि उनका निर्णय उन्हीं के लिए नुकसानदायक है तो भी अंगद का पांव अपनी जगह से हटे तो रामस्वरूप अपनी जिद से टलें।

रामस्वरूप बखूबी जानते थे कि यह सरकारी मकान है और उनके बेटे को अब इससे बड़ा मकान मिल गया है तो इसे तो छोड़ना ही होगा, पर उनकी जिद के सामने कभी उनके बाप की नहीं चली तो फिर ओमप्रकाश तो वैसे भी बेटा है।   एक मजदूर जो रामस्वरूप की ताजा झिड़की से तिलमिला गया था। ” ले जाने दो साले बुड्ढे को, इस टूटी खाट के लिए इतनी घुड़कियाँ क्यों खाए।”   उसने बूढ़े के बेटे ओमप्रकाश से पूछा -” साहब बाबाजी कह रहे हैं वह बालकनी में खड़ी खाट भी ट्रक में रखनी है।”  उसने इस तरह पूछा था जैसे कह रहा हो आप लोगों को क्या शरम नहीं आती इतने बड़े आदमी होकर इस कबाड़ को भी बांधकर ले जा रहे हो। ऐसा नहीं थ कि ओमप्रकाश के कानों में अपने पिता का शोर , उनकी सख्त से सख्त होती आवाज़ नहीं पहुँच रही थी पर उस चारपाई को देखते ही उनकी हिम्मत पस्त हो जाती थी।चारपाई  क्या थी  बिलकुल ऐन्टिक पीस था।उसकी एक बाई आगे बढ़ रही थी तो दूसरी उससे बंधी होने के कारण उसके पीछे घिसट रही थी क्योंकि दोनों की उम्र में दस बरस का अन्तर तो जरूर था। उसके चारों पाए तक एक डिजाइन के नहीं थे। साफ़ पता चलता था कि  जरूरत के हिसाब से जब जो मिल गया उसे ठोक कर काम चलाया गया है। रस्सी भी पुरानी होते होते काली पड़ चुकी थी और बीच से टूट-टूतकर लटक रही थी।  कुल मिलाकर वह ओमप्रकाश को अपनी उस बेचारगी व मुफ़लिसी का प्रतीक नज़र आती थी जिससे  कड़े संघर्ष के बाद उन्होंने पीछा छुड़ाया था और उनके पिता थे कि वे अब भी उससे चिपटे हुए थे।  वे खुद मन में ठाने बैठे थे कि नए घर में तो इस कबाड़ को वह बिल्कुल नहीं ले जाएंगे। वसन्त कुंज इलाके में उन्हें टाईप फोर का बड़ा मकान मिला था। और मिलता भी क्यों ना , भारत सरकार के संस्कृति विभाग में वे उच्चपदाधिकारी थे। ऐसी जगह में उन्हें अपनी भद्द नहीं पिटानी थी कि वे इस कबाड़ को उठा कर वहाँ ले जाते। वे पूरी तौर पर जानते थे कि एक बार यह चारपाई वहाँ पहुँची तो पिताजी को इसे बाहर आँगन में बिछा कर बैठने से कोई रोक नहीं पाएगा। मजदूर ने साहब को ध्यानमग्न देखा तो फिर से पूछा- “ साहब बताएं क्या करना है।” ओमप्रकाश को कुछ समझ नहीं आया , अभी उन्होंने बला टालने की गरज से कहा कि उसे उठा कर कमरे में रख दो। उनका अनुमान था कि जब नीचे से बॉलकनी में चारपाई खड़ी नज़र नहीं आएगी तो पिताजी के ध्यान से भी उतर जाएगी और वहाँ पहूँच कर वे कह देंगे कि गलती से कमरे में रखी रह गई।

ट्रक में जब सारा सामान लद चुका तो ओमप्रकाश पत्नी बेटी और पिता सहित अपनी कार में नए घर की ओर निकल पड़े। बेटा पीछे ट्रक के साथ अपनी बाईक पर आ रहा था। नया घर यूँ कोई बहुत दूर नहीं था। बस सरोजिनी नगर से निकलकर वसंतकुंज की ओर जाना था। पर कोई साथ ना हो तो मजदूर बीच रास्ते में कुछ सामान गायब कर देते हैं। पिछली बार आज से आठ साल पहले जब उन्होंने उत्तम नगर से सरोजिनी नगर शिफ़्ट किया था तो रास्ते से उनका एकमात्र ट्रांजिस्टर गायब हो गया था। इस बार इसीलिए उन्होंने बेटे को ट्रक के साथ  कर दिया था। उधर जब रामस्वरूप को वह चारपाई बालकनी में खड़ी नहीं दिखाई दी थी तो उन्होंने उसी मजदूर से पूछ लिया था कि वह चारपाई रख दी क्या? , जिसका जवाब — ” हाँ रख दी।” ,उसने कुछ उसी प्रकार दिया जैसे ” अश्वथामा मारा गया नरो वा कुंजरो वा’ का आधा वाक्य श्री कृष्ण के शंख की गूँज में छिप गया था। इसीलिए तसल्ली कर लेने के लिए उन्होंने  अब बराबर बैठे बेटे से पूछा–” वा खाट धर ली थी के ना।” उसी समय ओमप्रकाश का फोन बज गया जिसका फ़ायदा उठाते हुए ओमप्रकाश ने स्वीकृति में  सिर इस तरह हिलाया जिसका अर्थ हाँ भी हो सकता था और ना भी। ओमप्रकाश फोन पर अपने किसी मित्र से बतियाने लगे और इधर रामस्वरूप को ना जाने क्यों किसी षड़यन्र की बू आने लगी । इस अनुमान मात्र से कि वह चारपाई वहीं छोड़ दी गई है वे आपे से बाहर हो गए।

–” तू ठीक-ठीक जवाब क्यूँ ना देता , साहब होगा तू अपणे घर का, उरै( यहीं) ही डाट (रोक) गाड्डी नै, मन्नै कोन्या( नहीं) जाणा थारे साथ, मैं तो ओड़ेही( वहीं) एकला पड़ा रहूँगा।” ससुर की ऊँची आवाज़ से विद्या ( ओमप्रकाश की पत्नी) के कान खड़े हो गए। उसने पिछली सीट से उचककर पूछा।
–” के होया बाऊजी।”
“ अरै मनै थारा दोनुआँ से न्युँ कह राख्खी थी कि वा खाट भी लेय के चालणी सै।” रानस्वरूप की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि विद्या बोली–
–“ तो खाट तो ट्रक मैं गेर( डाल) राक्खी सै।”
विद्या की बात से रामस्वरूप को कुछ राहत मिली फिर भी जब तक घर पहुँचकर वे वह चारपाई  अपनी आँखों से नहीं देख लेंगे तब तक उनके प्राण उनके शरीर में किराये पर ही रहेंगे। अब वे घर पहुँचने का इन्तजार करने के लिए खिड़की से बाहर झाँकने  लगे। अभी पिता के गुस्से के डर से ओमप्रकाश का चेहरा पीला पड़ गया था तो अब विद्या की बात से वह सफ़ेद हो गया। उनकी कनपटियाँ गर्म होने लगी। उन्हें लगा वह चारपाई  भूत की तरह उनके पीछा कर रही है।

ओमप्रकाश को याद है कि अभी पिछले छह दिसम्बर को जब कुछ मित्र लोग उनके घर में इकट्ठा हुए तो उस दिन भी पिताजी इसी चारपाई पर बड़े डठोरे से (गर्वित भाव से ) बैठे थे। उनके लिए वह चारपाई उनका वजूद थी जिसे शहर से गाँव आकर भी उन्होंने संजो कर रखा था। जबकि ओमप्रकाश के लिए वह उनके पिताजी की वह जिद थी जिसके द्वारा वे उनकी सारी उपलब्धियों  को धता बताते थे। उस समय पिताजी  अपनी ऊँची आवाज़ में लोगों को अपने जमाने के किस्से सुना रहे थे कि हफ़्ते भर तक ना नहाने वाली वो बामणियाँ जिनके घाघरों से सिड़ांध आती थी वो भी जब आस पास से गुजरती तो घाघरों को यूँ उकसा( उठाकर समेट लेना) लेती कहीं किसी से भिड़ ( छू) ना जाए। वे बता रहे थे कि अब तो क्या छूआछात है वो तो उनके जमाने में हुआ करती थी। उस समय मि० रंगा जो ओमप्रकाश के परम प्रिय मित्र है ने उन्हे एक कोने में ले जाकर कहा था– “ क्या यार, कम से कम पिताजी को एक ढंग की चारपाई या फोल्डिंग तो ला दे।”  उसका भाव भी यही था कि  ” साले ढेढ पढ़-लिख तो गए पर ढंग से रहना नहीं आया। उनका मानना था कि दलितों को समझना चाहिए कि क्यों बाबा साहब थ्री पीस सूट पहनते थे।  उस समय ओमप्रकाश के लिए अपने मित्र को यह समझाना भारी हो गया था कि समस्या नए फोल्डिंग की नहीं है बल्कि………… खैर रंगा तो फिर भी उनका दोस्त था जिसके मन में बात आई तो जबान पर भी आ गई, पर उनका क्या जो इशारों से एक दूसरे को वह खाट दिखाते  और ओमप्रकाश को यह लगता कि जैसे सरे आम किसी ने उनके कपड़े उतार लिए हों। उन्हें यह चारपाई  एक ऐसा लैंस मालूम पड़ती जिसके भीतर से उनका आज कल सब दिख जाता था जिसे वे बड़े जतन से ढके थे। उन्होंने सोचा था कि अब नया घर तो मिलने ही वाला है तो वहाँ इस चारपाई को लेकर ही नहीं जाएंगे और इधर विद्या ने उनकी सारी योजना पर पानी फेर दिया।

नए घर में आए एक हफ़्ता निकल चुका था।  लगभग सारा सामान अपनी – अपनी जगह ले चुका था पर वह चारपाई कभी इधर तो कभी उधर खड़ी होती पूरे घर में भटक रही थी, और उसके साथ रामस्वरूप भी। आज शनिवार था ओमप्रकाश ने सोचा था कि आज सभी छोटे बड़े काम निपटा देंगे। इतनी तैयारी के बावजूद रोज -रोज  सुनने को मिल ही जाता था कि बाथरूम मे टॉयलेट का सिसटर्न खराब है, कभी रसोई के पीछे की खिड़की का काँच टूटा पड़ा है। छत पर पानी इकट्ठा है। आज उन सबका इन्तजाम करना था।उधर रामस्वरूप भी आज का ही इन्तजार कर रहे थे। दिन चढ़ते ही उन्होंने ओमप्रकाश को घेर लिया।
— रै ओमप्रकाश उरै सुण।( यहाँ आकर सुन )
— हाँ , पिताजी। ” उनके दिमाग के एन्टिना खड़े हो गए। वे पिताजी की आवाज के रूप को पहचानते थे।
— ऐं घर मैं कितणा कमरा सैं।
— चार।” उन्होंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
— इन चार कमरा मैं उस चारपाई  खातर (के लिए ) कोई जगह नहीं।
— ओमप्रकाश का अनुमान ठीक था , मुँह से कोई शब्द न निकला। जवाब ना सुनकर रामस्वरूप का स्वर ओर ऊँचा हो गया।
— तनै बेरा( पता) भी सै वा कित ( कहाँ ) पटक राखी सै।
— “………..”
— सबेरा की धूप साम तक खाट पै ही र्हवै सै,( रहती है ) थमनै वा कंडम ( बेकार ) करकै बगाणी( फेकनी) हो तो साफ़ बता दो।
— तो पिताजी अब उसमैं बच भी के रह्या सै।” ओमप्रकाश ने हिम्मत करके कह तो दिया पर..।
— तो भाई न्यूँ ( ऐसे )तो मेरा मैं के बच रह्या सै तम ( तुम ) मनै भी बगा ( फेंक ) दो।” अब रामस्वरूप भावुक होकर लगभग काँपने लगे थे। ओमप्रकाश यूं ही पिता के सामने ज्यादा बहस नहीं करते थे और अब तो वह असम्भव थी। यह रामस्वरूप का वह ब्रह्मास्त्र था जिससे वे जब तब ओमप्रकाश को निहत्था कर देते थे। अपने बेटे विवेक को यह हिदायत देकर की दादाजी जहाँ कहें उनकी चारपाई वहीं डाल दी जाए, ओमप्रकाश वहाँ से निकल आए। उधर पीछे से विवेक ने दादाजी को कन्धों से पकड़कर कुर्सी पर बिठाया और अन्तत: पूछ ही डाला –” क्या बात है दादाजी आप क्यों उस चारपाई के पीछे पड़े हो, आपके कमरे में लेटने को दीवान है बैठने को कुर्सियाँ हैं………..।” वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि डबडबाई  आँखों से रामस्वरूप ने उसकी ओर देखा–” पर भाई लेट -बैठ कै जिन्दगी कोन्या ( नहीं ) कटती…. फिर वे उठे और उन्होंने अपनी लाठी सम्भाली।, थम अभी क्यान्हैं (क्यों ) समझोगा…।” कह कर धीरे-धीरे बाहर निकल गए। विवेक ने भी समझ लिया कि कुछ बातों के तर्क तीर की तरह सीधे नहीं जाते बल्कि  अनेक तहों के नीचे  आड़े टेड़े चलते है कि ऊपर से दिखाई नहीं देता कि निशाना कहाँ है। उसने पिता के कहे अनुसार वह चारपाई  दादाजी के कमरे में लगा दी।

विद्या रसोई सम्भाल रही थी। पिछले घर की अपेक्षा इस घर की रसोई काफ़ी बड़ी थी। पिछवाड़े की खिड़की से इतनी रोशनी और हवा अन्दर आती थी कि गर्मी में भी वहाँ काम करना अच्छा लगता था। बेटी सुमन भी माँ के साथ लगी कुछ मदद करा रही थी। ओमप्रकाश पिता के हाथों परास्त होकर इधर ही आ निकले।अब उनका सारा आक्रोश विद्या पर उतर जाने को उतारु हो रहा था। वह ही उस चारपाई को इस घर में लेकर आई थी। इसी कारण जो ओमप्रकाश पिता के आगे जो नहीं बोल पाए वह सब उसे सुनाने को आए थे।
— हो गई तसल्ली। उन्होंने आते ही तीर सा छोड़ा।
— किस बात की?” विद्या पूरे एक हफ़्ते से घर की सैटिंग में लगी थी। बच्चे और पति अपने अपने काम पर चले जाते थे दिनभर वह अकेली खट रही थी। उस पर यह ईनाम उसे मंजूर न था। इसलिए उसने उस तीर को वहीं तोड़- मरोड़कर फेंक दिया।
— तुम्हें आखिर किसने कहा था , वो चारपाई  ट्रक में रखवाने के लिए ?” वे सीधा मतलब की बात पर आए।
— अब इस चालीस  बरस की उम्र में भी हर काम आपसे पूछ-पूछकर करूँगी क्या ? “ विद्या सीधा उत्तर देने को तैयार ही नहीं थी।

विद्या के स्वर की तेजी और तल्खी से ओमप्रकाश कुछ मद्दिम पड़े। जानते थे कि आखिर उसी के पिता का मन रखने को विद्या उस चारपाई को यहाँ लेकर आई है। पर यह घर उनका भी तो है कम से कम उनकी इच्छा भी जान ली जाती। पति को चुप देखकर विद्या को भी अपने ऊपर अफ़सोस हुआ। वह रसोई से दूध उठाकर बाहर डाइनिंग टेबुल पर रखने आई और बोली। ” शान्ति रखो सब ठीक हो जाएगा।”  ओमप्रकाश चुपचाप घर के पीछे वाले पिछवाड़े की ओर चले गए।अपना ध्यान बंटाने को वे सोचने लगे कि यदि इस पूरे स्थान पर घास लगवा दी जाए तो चार लोगों के बैठने लायक जगह बन जाएगी। उधर सुमन ने अपनी माँ से पूछा।-” माँ दादाजी को उस चारपाई से इतना अटैचमैन्ट क्यों है ?  पापा इतने बड़े अफ़सर हैं कितने लोग हमारे घर आते है वे सब क्या सोचेंगे ?” सुमन ने वही सब कुछ उगल दिया जो अक्सर जब तब अपने पिछले घर में इस उस से सुनती रहती थी। विद्या ने इस प्रश्न के जवाब में दूसरा प्रश्न किया।” तुम क्यों अपने सारे टूटे फूटे खिलौने बटोर कर यहाँ ले आई जबकि अब तो तुम उनसे खेलती नहीं।” सुमन बाहर साल की वह बच्ची जो बचपन की पकड़ से छूट कर किशोरावस्था की दहलीज पर खड़ी थी, यह समझ ही ना पाई कि माँ क्या कहना या समझाना चाहती है और रूठ गई। ” आप तो जब देखो मेरे खिलौनों के पीछे पड़ी रहती हो। कहीं रखो दादाजी की चारपाई पर मेरे खिलौनों की ओर देखना भी मत।” कहकर वह पाँव पटकती हुई बाहर चली गई।पर विद्या का उद्देश्य पूरा हो गया।

जुलाई का महीना था। बारिश एक या दो बार तो हुई पर उसके बाद बादल ना जाने किस ट्रैफ़िक जाम में फंस गए। दिन भर उमस बनी रहती। पसीना एक बार जो आता फिर सूखने का नाम ना लेता। घर में केवल एक ही ए०सी० था वो भी मास्टर बेडरूम में जिसमें आजकल मेला सा लगा रहता था। बच्चे स्कूल -कॉलेज से आकर वहीं धमक जाते। विद्या भी फ़टाफ़ट बाहर काम निपटाकर अन्दर आ जाती। ऐसा नहीं था कि रामस्वरूप को उमस परेशान नहीं करती थी। पर क्या करते ए०सी० उनकी सेहत को रास नहीं आता था। दिनभर चारपाई पर करवटें बदलते पर कोई चैन नहीं पड़ता। आज उन्होंने अपनी चारपाई घर के बाहर वाले छोटे से खुले आँगन में लगवा ली थी। यहाँ चार बजे के बाद से ही छाया आ जाती थी और सात बजे तक अच्छा बैठने लायक माहौल बन जाता था।उस पर आस पास के पेड़ों से कुछ हवा निकल आती तो जैसे मजा ही आ जाता। बाहर चारपाई की खटर-खटर सुन कर सुमन ने गर्दन बाहर निकाली और दादाजी को बाहर बैठा देख कर वह भी उनके पास आ गई और मचककर उनके साथ बैठ गई।पर यह क्या चारपाई तो एक दम झूला हो रखी थी। उसने वापस उठते हुए दादाजी से पूछा।–” दादाजी आप इस पर सोते कैसे हो, ये तो बीच में से बिल्कुल लटकी पड़ी है।” रामस्वरूप आज अच्छे मूड में थे। हँस कर बोले–” तूने वो बाणिये वाळी बात ( कहानी ) कोन्या सुणी।” दादाजी के किस्से कहानियाँ सुमन की कमजोरी थे वह तपाक से बोली। – “ सुनाओ ना वो कहानी।” अगर कोई सुनने को तैयार होता तो रामस्वरूप घण्टों ऐसी कितनी ही कहानियाँ कितने ही अलग- अलग अंदाज में सुना सकते थे। पर इस नई दुनिया में समय किसके पास था। टी० वी० के सामने बैठकर लोग दूसरों के घरों की कहानियाँ जानना पसंद करते थे अपनो की कहानियाँ उन्हें पसंद न थी। वे झट से तैयार हो गए। ” एक बाणिया ( गाँव का दुकानदार ) था। उसकै धोरै (पास ) भी इसी ही खाट थी। उसके छोरा नै भी एक दिन इसी तरहियाँ ( तरह ) पूछी – ‘ बापू यो खाट तो कतई झूला बरगी ( जैसी ) हो रही सै। तू इसनै परै गेर( दूर फेंक ) दे।’ तो बाणिया बोला – ‘ तनै ना बेरा ( मालूम ) यो खास बात सै इस खाट मैं, गर कोई रात बिरात घर मैं चोर बड़ जाँ ( घुंस जाए ) ओर मेरे सुत्ता कै ( सोते हुए पर) ऊपर लट्ठ ( मोटा मजबूर डण्डा ) मारैं तो मेरे लागै क्यों ना लट्ठ बाईंया पै ही टिक के रह जा।’ ( मझे चोट नहीं लगेगी डण्डे की चोट चारपाई की दोनों  तरफ़ की लकड़ी पर लगेगी।) तो फेर बाणिये का छोरा फेर बोला — ‘ ओर बापू गर चोर तेरे खाट कै निच्चा सै ही मारैं तो ?’ बाणिया गुसा मैं भर गया – ‘ साळा तू जायकै बताया , उननै ना बेरा हो तो।” ( बेवकूफ़ तू जाकर बता आ यदि उन्हें ना पता हो तो।) सुमन हँसते-हँसते लोट-पोट हो गई। उसकी और दादाजी की मिश्रित हँसी सुनकर विद्या और विवेक भी बाहर आ गए। दो कुर्सियाँ लाकर वहाँ रख ली गई। विवेक को वहाँ खड़ा देखकर रामस्वरूप ने कहा — “ रै विवेक इस खाट की पंगात ( जिस ओर पैर रहते हैं।) ही खींच दे। तेक ठीक-ठाक हह ज्यागी ( हो जाएगी ) नहीं तो हाँ म्हारी सुमन भी इसका मजाक उड़ावै सै।” सुमन वहाँ कुर्सी पर बैठी-बैठी अपने पाँव हिलाने लगी। विवेक ने सुमन के सिर पर एक चपत लगाई और बोला– “ आप बता दो कैसे खींचनी है।”

विद्या को याद है कि ये चारपाई ओमप्रकाश के उस पुराने मकान मालिक के यहाँ पड़ी थी जिसके यहाँ वे कभी अपनी पढ़ाई के दौरान किराये पर रहा करते थे। नौकरी लगी , ब्याह हुआ, और एक के बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा किराये का मकान बदलते कभी इस चारपाई का किसी को कभी ध्यान ही नहीं आया। वो तो जब आठ साल पहले उन्हे सरोजिनी नगर में सरकारी मकान मिला और वे लोग गाँव जाकर माँ बाऊजी को भी अपने साथ रहने के लिए ले आए तो माँ ने ही एक दिन कहा – “ अरै ओम तेरी वा चारपाई कित ( कहाँ )सै जो हम घराँ से तेरे खातर लाया था।” और फिर ढूँढ ढाँढ कर इस चारपाई को घर लाया गया। अभी पिछले दो साल पहले जब इसकी रस्सी इतनी पुरानी पड़ गई  कि उसकी फाँस भी जब तब हाथ में चुभने लगी तो माँ बाऊजी की नाराजगी की परवाह न करते हुए उसे छत पर वहाँ रखवा दिया गया जहाँ से धूप – पानी से बचकर वह अपनी जिन्दगी के बाकी दिन निकाल सके। दुबारा वह चारपाई छत से उतर कर कब घर में दाखिल हो गई इसके बारे में कोई ठीक -ठीक नहीं जान सका पर विद्या को पता है कि माँ के जाने के कोई दो तीन दिन बाद बाऊजी बालकनी में उसी चारपाई पर बैठे रूमाल से अपने आँसू पौंछ रहे थे। विद्या ने कुछ नहीं पूछा और न किसी को कुछ पूछने दिया। आज विद्या का मन हुआ कि बाऊजी से इस चारपाई के बारे में बात की जाए। वह उठ कर चारपाई की पंगात कसने में बेटे की मदद करने लगी। पंगात कपड़े की रस्सी की बनी थी। उसे छूते हुए विवेक ने कहा।” दादाजी ये रस्सी तो कपड़े की बनी है।” रामस्वरूप ऊपर आसमान की ओर देखने लगे जैसे वह आसमान उनकी पलकों पर टिका हो फिर वहीं उसके अपनी पलकों पर टिकाए बोले —” हाँ भई इसी रस्सी तो गाम्मा ( गाँवों ) में ही बणा करें…. “ फिर थोड़ा उत्साहित होकर बोले की ” या रस्सी तेरी दादी नै बणाई थी जब तेरा पापा खात्तर हम इसनै गाम से ठायकै दिल्ली लाये थे। तेरी दादी नै उरै ( यहाँ ) आयके इसकी नई पंगात  भरी कदै छोरा का पावाँ मै फाँस ना चाल जाँ।” ( पाँव में रस्सी की फांस ना चुभ जाए।)
— क्या…………? आप इस चारपाई को गाँव से यहाँ लाए थे ? अमेजिंग दादाजी, विवेक के मुहँ से निकला। ” सचमुच  आप तो कमाल हो।

सचमुच यह अचम्भा था। विद्या ने भी नहीं सोचा थे कि इस चारपाई ने इतना लम्बा सफ़र तय किया होगा। भले ही उनका गाँव हरियाणा में था पर चार पाँच घण्टे का रास्ता तो था ही। उस पर बस या गाड़ी में उसने किसी को चारपाई लेकर सफ़र करते नहीं देखा था।तो किस तरह इस चारपाई को उठाकर ये लोग गाँव से यहाँ लाए होंगे इसे जानने के लिए  उसने पूछा –
— “ पर बाऊजी आप इसने उठा के किस तरह लाए।”

रामस्वरूप की आँखे चमक उठी, इस चमक में साकार हो उठी वह यात्रा जिसमें वह चारपाई  जिसके चारों पाए निकाल कर बाँध दिए गए थे और जिसकी चारों बाईंयों को उसकी रस्सी समेत इस तरह समेटा गया था कि वह कम से कम जगह घेरे। पर इसके बावजूद ट्रेन में चढ़ने वाली हरेक सवारी उससे ठोकर खाती और रामस्वरूप और उनकी पत्नी की ओर हिकारत से देखती हुई ‘ कि ना जाने कहाँ – कहाँ से आ जाते हैं ‘ , आगे बढ़ जाती। और वो टी०टी० जो रामस्वरूप की भाषा में बिल्कुल गैल ( पीछे पड़ जाना) ही हो लिया था। उसे कैसे चकमा दिया गया , यह बताते – बताते रामस्वरूप की आँखों में हँसते- हँसते आँसू आ गए थे। इस उम्र में इतना हँसने से उनकी साँस फूलने लगती थी। बीच-बीच में वे अपनी उखड़ती साँस को भी सम्भालते जाते।  आज पिछले साल भर के बाद रामस्वरूप पहली बार इतना हँसे थे।  दोनों बच्चों के साथ विद्या वर्षों की दूरियाँ पार करके वहाँ जा पहुँची थी जहाँ से इस चारपाई की जीवन यात्रा शुरू होती थी। रामस्वरूप ने बताया कि उन्हें पत्नी का गौना कराने जाना ही था कि उससे कुछ दिन पहले उनके पिता ने किसी तकरार के बाद उन्हें न्यारा ( परिवार से अलग ) कर दिया पर बाँटे ( बँटवारे )में एक मटका अनाज तक नहीं दिया। नई नवेली दुल्हन को कहाँ बैठाऊँगा , क्या  खिलाऊँगा , यह सोच कर उनके हाथ पाँव फूल गए। कहीं से पाँच रुपये उधार लेकर  उन्होंने  थोड़े आटे , चावल और इस खाट का इन्तजाम किया।इसके साथ ही पति पत्नी ने अपनी गृहस्थी शुरू की। फिर इसी चारपाई पर उनके एक के बाद एक सात बच्चे  गरीबी और अज्ञान के चलते , आते रहे – जाते रहे।  केवल एक यह ओमप्रकाश ही बचा जिसने भी इसी चारपाई की बाई पकड़ कर चलना सीखा। विवेक ने हिसाब लगाया कि इस हिसाब से इस चारपाई की उम्र कोई साठ साल के करीब ठहरती है। अब वह खूब कस – कस कर पंगात को खींच रहा था। कुर्सी पर बैठे रामस्वरूप उसे मुग्ध भाव से देख रहे थे।   चारपाई में आया झोल भरने लगा था। वह फिर से बैठने लायक हो रही थी। चारपाई की उम्र का अंदाजा लगा कर विवेक ने कुछ सन्देह पूर्वक पूछा।– “ दादाजी जब आपने यह चारपाई खरीदी….”   उसकी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि रामस्वरूप ने बीच में ही टोका– “ रै बेकूप खरीदी कोन्या सिरफ  रस्सी खरीदी थी। यो चारपाई तो अपना हाथा सै बणाई थी। विवेक और सुमन की आँखों में प्रश्नवाचक चिह्न देखकर उन्होंने  खुलासा किया। ” खेत मैं दो किक्कर खड़े थे। कुल्हाड़ी से उसकी लकड़ी काटी और समारकै ( संवार कर ) पाए और बाई बणाई और फेर तेरी दादी और मैन्नै दोनुआँ ने यो रस्सियाँ सै बण (बुन ) दी।” रामस्वरूप के स्वर में गर्व और दर्प की द्वाभा सी तैर गई। उन्होंने पास खड़ी सुमन की पीठ पर धौल देकर कहा–” तैनै बेरा है तेरी दादी की उमर उस बखत कुल जमा पन्द्रहाँ साल थी और के चटाचट भाज भाज ( भाग – भाग कर ) के काम करा करती। और थम बाळक ,  पाणी गिलास भी ठाता थारे जोर पड़ै सै।” ( पानी गिलास उठाना भी तुम्हें भारी पड़ता है। )
— “ फिर भी दादाजी तब से अब तक यह चारपाई टूटी नहीं ? ” विवेक ने अपनी जिज्ञासा पुन: प्रकट की।
— “ टूटती तो जब भाई जब हम टूटण दाँ… , जब जो बाई टूटती नई घाल ( डाल ) देता।या देख , उन्होंने चारपाई की एक बाई की ओर इशारा किया।, इस उरली ( इस तरफ़ वाली) बाई कै नीचे हमनै सरिया बाँध राख्या सै। कहते कहते रामस्वरूप यूँ जी उठे जैसे कल की ही तो बात हो और वे अपने हाथों को इस तरह देखने लगे कि उनके हाथों में लोहे की तार को खींच खींच बाँधने के निशान फिर से उभर आए हों। विवेक ने नीचे झुक कर उस बाई के नीचे बँधे तीन पतले सरियों को देखा जो लोहे की तार से इस तरह बँधे थे कि उपर से देखने पर पता ही नहीं चलता था कि यह चारपाई इतनी मजबूत है।
–” वाह दादाजी आप तो पढ़े नहीं अगर आप को मौका मिलता तो आप जरूर इंजीनियर होते।” विवेक ने उस बाई पर हाथ फिराते हुए कहा। विवेक इंजीनियरिंग  कर रहा था और अब अपने भीतर इंजीनियर बनने के पुश्तैनी गुण तलाश रहा था।विवेक की बात से रामस्वरूप की आँखों में एक तड़प सी उठी। अनपढ़ होने के कारण फैक्टरी में उनकी कभी कोई तरक्की नहीं हुई जबकि साहब लोगों का मानना था कि यदि एक कागज का टुकड़ा उनके पास भी होता तो रामस्वरूप भी किसी ठीक-ठाक ओहदे पर होता। इसके बावजूद उन्हेँ आज भी अपने उस निर्णय पर कोई अफ़सोस नहीं है जिसकी वजह से उन्हें अनपढ़ रहना पड़ा। हुआ यह  कि दस साल की उम्र में उनका दाखिला स्कूल में कराया गया तो उन्होंने सारी नीच जात के लड़कों के साथ संडास के साथ बैठना मञ्जूर नहीं किया। वे पहले ही दिन उस साळे मास्टर के माथे में पत्थर मार कर भाग आए।इसके बाद उन्होंने  गाय चराना मञ्जूर किया , पत्थर फोड़ना मञ्जूर किया पर पिता के लाख डराने -धमकाने के बावजूद स्कूल जाना मञ्जूर नहीं किया।

यूँ गर्मियों के दिन थे और आठ बजते- बजते अन्धेरा दस्तक देने लगता था। चारों प्राणी उस समय इस देश और काल से परे अपना नया देश -काल गढ़ रहे थे कि उसी समय ओमप्रकाश ने अपने दो सहकर्मियों के साथ प्रवेश किया।नज़र सीधी चारपाई पर पड़ी॥ हल्के धुँधुलके का फायदा उठाकर वे दोनों आगन्तुकों को सीधे अन्दर कमरे में ले गए। पीछे- पीछे विद्या भी चाय पानी का इन्तजाम करने के लिए रसोई की ओर चली गई। उसने  भीतर जाकर चाय का पानी चढ़ाया ही था की पीछे से तीर की तरह एक बाक्य आया —
— “ सही जुलुस निकाल रखा है।”
— “ आप भूल जाते हैं कि आप कल्चरल डिपार्टमेंट में हैं।”  इस मामले में विद्या उस दीवार की तरह थी जिस पर जितने वेग से बॉल फेंकी जाती वह उसी वेग से उसे लौटा देती। ओमप्रकाश उसके व्यंग्य को समझ गए थे।
— “ तुम्हें तो कहीं लेक्चरर होना चाहिए  था। अच्छा भाषण दे लेती हो।
— “ बन ही जाती अगर तुमने बीच में टाँग न अड़ाई होती।”
ओमप्रकाश वास्तव में अन्दर से बड़े दुखी थे  और उन्हें आशा थी कि विद्या उनकी पीड़ा को जरूर समझेगी। पर उनका प्रयास ही सही नहीं था तो अंजाम तो बुरा होना ही था। इसलिए  अपनी बात को वे बाद में शान्ति के साथ समझाएंगे ऐसा सोच कर वे पुन: ड्राइंग रूम में आ गए।

रात का सारा काम निपटाते- निपटाते साढ़े  दस बज गए थे। यह समय ओमप्रकाश और विद्या का था जिसमें दिन भर के थके पथिकों की भाँति वे एक दूसरे को सारे दिन का हाल-चाल सुनाते थे। कमरे में ए०सी० चल रहा था । थोड़ी देर बाद दोनों का दिल और दिमाग ठण्डक से भर गया। साथ के फ़ोल्डिंग पर सुमन सो रही थी। उसकी बस सुबह सात बजे तक आ जाती है।  अचानक से ओमप्रकाश को लगा कि आज बाऊजी के कमरे से कोई आवाज नहीं आ रही । अभी वे वहाँ से गुजर कर आए थे तो  वहाँ की छोटी बत्ती भी नहीं जल रही थी।विवेक अपने कमरे में था वहाँ की लाइट भी जल रही थी।  ए० सी० की आवाज के बावजूद पिताजी के कमरे में होने की आहट उन्हें मिलती रहती है। उन्होंने  विद्या से पूछा ” क्या बात है पिताजी की कोई खाँसने तक की आवाज नहीं आ रही।”
— “ कहीं बाहर ही तो नहीं सो गए।”  विद्या को अफ़सोस हुआ कि आज मेहमानों के चक्कर में वह बाऊजी को भूल ही गई।

— क्यूँ , बाहर क्यों सो गए , बाहर तो बिना पंखे और मच्छरदानी के मच्छर जान खा जाएंगे।” उन्होंने जल्दी से उठकर अपने पैरों में चप्पल डाली। उनके दिमाग में अगले ही पल यह ख्याल आया कि आज वह चारपाई क्योंकि बाहर ही थी तो कहीं उसी पर तो वे नहीं सो गए। जब सुबह लोग उठेंगे तो क्या सोचेंगे । यही ना कि इतने बड़े घर में इस बूढ़े बाप के लिए कोई जगह नहीं। उनके दिमाग में गर्म पानी के बुलबुले उठने लगे। बाहर आकर देखा तो उसी टूटी चारपाई पर बैठे रामस्वरूप अपने कुर्ते से मच्छरों को उड़ा रहे हैं।चारों ओर घुप्प अन्धेरा है और कोई पत्ता तक नहीं खड़क रहा जैसे तूफ़ान के आने के पहले का सन्नाटा हो। ओमप्रकाश के दिल के किसी कौने में एक टीस सी हुई। —
— “ क्या पिताजी आप अभी तक बाहर ही बैठे हैं , इतने मच्छरों में आप सो ही नहीं पाओगे।”

बाहर मच्छरों और गर्मी से रामस्वरूप भी परेशान थे। वे भी अन्दर जाना चाहते थे पर क्या करते चारपाई तो बाहर थी और उसे उठाना उनके बस में ना था। ओमप्रकाश ने बिना कुछ आगे पूछे , कहा –” आप अन्दर चलो मैं चारपाई  लेकर आता हूँ।” रामस्वरूप भी बिना कुछ कहे उठ खड़े हुए और अन्दर की ओर चले दिये। जब पिताजी की चारपाई उनके कमरे में लगाकर ओमप्रकाश वापिस अपने कमरे में आए तो उनके दिमाग में गर्म पानी के बुलबुले फिर से बनने और फुटने लगे।
— “ पता नहीं क्या बताना चाहते हैं इस चारपाई से चिपटे रहकर।”
— “ वे माँ को भूल नहीं पाते।” विद्या ने समझाने की गरज से कहा।
–” माँ तो कमरे में है।” ओमप्रकाश ने चिढ़ कर कहा। उन का इशारा उस बड़ी तस्वीर की ओर था जिसे उन्होंने माँ की मृत्यु के बाद पिताजी के लिए ही बनवाया और उन्हीं के कमरे में लगा दिया।
— “ वो माँ की तस्वीर है , चारपाई में माँ खुद मौजूद है।” विद्या का आर्द्र स्वर जैसे ही बाहर आया घर के  बाहर जोर से बिजली चमकी और  खिड़की से इतनी रोशनी अन्दर फेंक गई की एक बार को घर के अन्दर का सारा अन्धेरा दूर हो गया। उसके बाद उस चमक का पीछा करती हुई बिजली की जोर दार कड़क सुनाई दी। शायद बारिश आने वाली है। इतनी उमस के बाद उसे आना ही था।

तस्वीरें गूगल से साभार 

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नीच (रज़िया सज्जाद ज़हीर की कहानी)

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रज़िया सज्जाद ज़हीर


महिला लेखन की एक प्रमुख हस्ताक्षर रज़िया  ज़हीर का यह जन्मशताब्दी वर्ष है. नाटक,कहानी और उपन्यास लेखन के साथ-साथ वे एक बेहतरीन अनुवादक भी थीं. भारत में स्त्रीवादी और प्रगतिशील लेखन का इतिहास रज़िया  ज़हीर के लेखन से वाबस्ता होगा ही होगा. पढ़ते हैं उनकी एक नायाब कहानी, जो दलित स्त्रीविमर्श और स्त्रीविमर्श की दृष्टि से पढी जानी चाहिए. 

शामली को देख कर सुलताना को लकड़ी के उन बेढंगे टुकड़ों का ख़याल आ जाता था जिन को अलग अलग देखो तो आड़े तिरछे और बेडौल, लेकिन ठीक से मिलकर बनाओ तो ऐसे नमूने, ऐसी तस्वीरें निकले कि क्या कहने!

उसके नक़्शे में कोई ख़ास बात नहीं थी। रंग भी गहरा साँवला था; लेकिन पहले ही दिन जब सुलताना रिक्शे से उतर कर अपने दरवाज़े में दाखिल हो रही थी और उसने शागिर्द पेशे की एक कोठरी के सामने शामली को बैठे देखा था, तो उसे अहसास हुआ था कि यह चीज़ बार बार देखने के क़ाबिल है। शामली ने भी सुलताना को देखा, मगर हाथ जोड़ कर नमस्ते करने के बजाये वह नज़रे उठाकर सिर्फ ज़रा सा मुस्कुराई थी, फिर सर झुककर पीतल की चमकती थाली में चावल से धान, कंकड़ बीनने लगी।

उसकी यह अदा सुलताना को भा गई;क्योंकि उसे ख़याल था कि वह अवाम से मोहब्बत करती है और जब किसी ग़रीब को किसी अमीर आदमी के सामने हाथ जोड़ते या उसे माई बाप कहते सुनती तो उसे उस ग़रीब पर बहुत गुस्सा आता; जभी तो उसे शामली पर बेहद प्यार आया था।

बाहरी दरवाज़े से अन्दर आते-आते उसे अपने बचपन की सुनी बहुत सी बातें याद आने लगीं —-नीच ज़ात की औरतों का कुछ ठीक नहीं होता; दादी और नानी के बताये हुए वाक्यात, काल से जो छोकरियों खरीदी गई उनको जब रोटियाँ लग गईं तो किसी न किसी के साथ भाग गई, उन लोगों को खसम करते या छोड़ते कुछ नहीं लगता, वगैरह। न जाने शामली कौन थी? अकेली कैसे कोठरी में रह रही थी? सुलताना ने जल्दी से घडी उतारी और गुसलखाने में जाकर नहाने के लिए नल खोला—पानी नदारद! भन्नाकर उसने खिड़की खोली, “अरे भई नल बंद करो!” देखा तो शामली नल पर चावल धो रही थी। सुलताना को देखकर जैसे वह समझ गई कि क्या मामला है। नल बंद करते हुए बोली, “बीबी जी हम कल ही यहाँ आये हैं। हमको खबर नहीं थी कि बाहर नल खोलने से अन्दर पानी बंद हो जाता है।”

“कोई बात नहीं!” सुलतानाका सारा गुस्सा हवा हो गया था। शामली की आवाज़ उसे बहुत ही अच्छी लगी थी, बात करने का अंदाज़ भी पसंद आया था।

अगले हफ्ते बाहर वाली कोठी में एक सरकारी दफ्तर किराए पर आ गया। बीच वाला बड़ा हॉल और बड़े कमरे दफ्तर को मिले, छोटे छोटे कमरों के सेटों में उसी दफ्तर के सेक्रेटरी, हेड क्लर्क वगैरह और शागिर्द पेशे की दो तीन कोठरियों के इलावा सब अर्दलियों, चपरासियों, चौकिदारोंसफाई करने वालों से भर गई. शामली की, और एक और कोठरी सुलताना के आउट हाउस के साथ थीं।

तीन चार रोज़ बाद, सुलताना कॉलेज से आकर डाक देख रही थी कि उसने बाहर हंसने की आवाज़ सुनी जो शामली की सी लग रही थी। धीरे से उसने वही गुसलखाने वाली खिड़की खोली। सुलताना की छोटी बच्ची शामली को दौड़ा रही थी। दौड़ते दौड़ते शामली अपनी कोठरी में घुस गई और चीख चीख कर बोली, “बस भई हमने हार मान ली ! हमको खाना पकाना है न बेटा! अब कल खेलेंगे।” चारों तरफ शागिर्द पेशे के बहुत-से नौकर वगैरह खड़े हंस रहे थे।
छोटी बच्ची अपने हठ पर अड़ी थी —-“हम नहीं जानते, हमारा दाव दो! दो!”

शामली ने हँसते हँसते किवाड़ खोले और हँसते हुए निकलकर एक दूसरी चाल चली—“आइये आग जलाए बेटा! आप आटा लेगीं” चिड़िया बनाएगी? फिर हम उसको आग में सेंक देंगे और आप खूब खेलिएगा मज़े से।”
बच्ची वहीँ बैठ गई एक ईंट पर और शामली ने चूल्हे में उपले लकड़ियाँ रखकर फूंक मार मारकर आग जलानी शुरू कर दी। सुलताना ने खिड़की बंद कर ली। उसे शामली का इस तरह दिल खोलकर मासूमियत से हँसना बहुत अच्छा लगा था, लेकिन …..लेकिन अगर वह चपरासी और चौकीदार वहां न खड़े होते तो बहुत अच्छा होता! इतने मर्दों के बीच इस तरह….लेकिन शामली ने तो उनमे से किसी की तरफ देखा तक नहीं था। फिर भी, बेगैरती तो है ही!लेकिन बेगैरती क्यों है? उसने नज़र उठाकर देखा तो शामली सामने खड़ी थी और वह सुलताना से आँखे चार होते ही ऐसे शरमाई कि सुलताना को यकीन नहीं आया की यह वही शामली है जो कुछ देर पहले ऐसे ठट्टे लगा रही थी, ऐसे हंस रही थी जैसे उसका सारा वजूद पंखुड़िया बनकर बिखर जायेगा। तो क्या वह सुलताना के सामने हँसना नहीं चाहती थी? अहिस्ता से बोली, “बीबी जी, एक दो मिर्च चाहिए। अँधेरा हो गया है न, तो दूकान तक जाते ज़रा वैसा सा लग रहा है।”
“नहीं नहीं, दूकान तक जाने की कोई ज़रूरत नहीं, बैठो, अभी मंगवा देते हैं।” उसने खानसामा को आवाज़ दी और फिर शामली से बातें करने लगी।

रज़िया ज़हीर

शामली बैठ गई और सुलताना के सवालों के जवाब में उसने बताया कि उसका शौहर मर चुका है और वह खुद पास वाली पीली कोठी में, मेजर साहब के बच्चों को खिलाने पर नौकर है। फिर उनके  छोटे बच्चे का ज़िक्र करते हुए वह एक आध बार बड़े प्यार से हंसी जिससे मालूम होता था कि उसे बच्चे से बेहद मोहब्बत हो गई है।
खानसामा मिर्च लेकर आया तो उसने नज़र भरकर शामली को देखा, मगर शामली ने उसकी तरफ देखा भी नहीं; मिर्च ली, सुलताना की तरफ मुस्कुराई और चुपचाप चली गई। जब वह बाहर निकल गई तो खानसामा बोला, “बेगम साहब, इस औरत को घर में मत आने दिया कीजिये.”
“क्यों भई?” सुलताना ने ज़रा गुस्से से पूछा, फिर ज़रा खिसियाकर बोली “तुमसे क्या मतलब? जाओ अपना काम करो!”
मगर बूढ़े खानसामा ने बरसों इस घर में गुज़ार कर जो अपनी हैसियत क़ायम की थी, वह उसे आसानी से छोड़ने पर तैयार न था; बोला, “यह अपने मियां को छोड़कर आई है, अपने घर से भागकर! और यहाँ रामोतार से फंसी है, ठीक नहीं है यह औरत!”
सुलताना को जैसे किसी ने ढेला खेंच कर मारा। उसने भड़क कर पूछा “ कौन राम अवतार?”
“वही, सरकारी दफ्तर का रात का चौकीदार!”

और राम अवतार जैसे सुलताना के सामने आकर खड़ा हो गया—-खाकी वर्दी पहने जो उसे सरकार की तरफ से मिली थी, हाथ में मोटा सा डंडा और टोर्च, पैरों में बड़े बड़े जूते। कभी कभी जब रात में रामावतार की खांसी या पहरे की आवाज़ आती—-“हुनक हा हा, होशियार, हा हा—-हुनक हुनक आहाक आहाक!” तो वह भी आवाज़ दे लिया करती थी “राम अवतार!”

दीवार के उधर से वह फ़ौरन जवाब देता, “घबराइए नहीं सरकार, हम जाग रहे हैं!” वह सुलताना का चौकीदार नहीं था, फिर भी वह कितना भला था जो हमेशा उसे इस तरह इत्मिनान दिला देता था। फिर जैसे वह चौंक पड़ी, खानसामा कह रहा था, “यह अपने आदमी को छोड़ कर भाग आई है। रामोतार ऊंची जात का है, राजपूत ठाकुर है वह और यह नीच जात है। न जाने इसने उसे क्या खिला दिया है, तभी तो नीच जात के साथ…..”
“ख्वामख्वाह की बकवास करते हो!” सुलताना चिढ गई, “सच देखो न झूठ जानो, तुम लोगों को सुनी सुनाई गप उड़ाने से मतलब है बस! जाओ, रात का खाना देखो, बेकार के लिए…..”
खानसामा मिर्च का डिब्बा लिए बडबडाता हुआ चला गया।

सुलताना ने खानसामा को तो चले जाने का हुक्म दे दिया, लेकिन उसके अपने दिमाग़  में जो लगातार खयालात चले आ रहे थे उनको निकल जाने का हुक्म देना उसके बस की बात न थी और उसे अपने आपसे यह बात कुबूलनी ही पड़ रही थी कि खानसामा की बातों से उसे धक्का सा लगा था। शामली ने ऐसा क्यों किया? उसने अपने शौहर को छोड़ा, घर से भागी और यहाँ राम अवतार से ताल्लुक किये थी। और वह तो जो खैर था सो था उसने सुलताना से भी तो झूठ बोला कि उसका आदमी मर गया है। आखिर झूठ बोलने की क्या ज़रूरत थी? उसे सुलताना पर भरोसा करना चाहिए था कि वह समझ जाएगी। शायद यह नीच जात की औरतें…..अरे नहीं, नीच और ऊंच जात क्या होती हैं भला? जात कुछ नहीं होती, वह तो यही मानती है न?….उफ़ !

दूसरे दिन शाम को मग़रिब के वक़्त वह औरतों के किसी जलसे से लौटी। अँधेरा तकरीबन छा  गया था, दोनों वक़्त एक दुसरे से गले मिल रहे थे। शामली की कोठरी से धुआं निकल रहा था लेकिन चराग नहीं जला था।चूल्हे के सामने आग की रौशनी में शामली के दोनों हाथ रोटियां पकाते हुए दिखाई दे रहे थे। सर पर ओढ़ी हुई हरी साडी के लाल किनारे में से उसकी नाक का सिरा भी दिखाई दे रहा था। रोटी पकाते पकाते वह बार बार पल्लू से आंसू पोछती जाती थी, पास ही दो तीन ईंटें एक के ऊपर एक रखकर राम अवतार बैठा था। उस वक़्त वह खाकी वर्दी के बजाय सफ़ेद धोती और कुर्ता पहने हुए बहुत अच्छा लग रहा था। सुलताना को एकदम से खयाल आया कि राम अवतार और शामली की जोड़ी बहुत अच्छी लगेगी।

राम अवतार उसे देखकर खड़ा हो गया और सलाम करके दूसरी तरफ चला गया। सुलताना धीरे धीरे शामली के नज़दीक आकर खड़ी हो गई। कुछ मिनट उसे ख़ामोशी से देखती रही फिर अहिस्ता से बोली, “ शामली हमारा खानसामा कहता है तेरा आदमी जिंदा है; तू तो कहती थी की वह मर गया?”
सुलताना को पूरी उम्मीद थी कि शामली कहेगी, “नहीं बीबी जी, खानसामा को भला क्या पता? वह तो मर चुका!” फिर वह अन्दर जाकर खानसामा को खूब डांटेगी कि ख्वामख्वाह तुम लोग एक मासूम पर इलज़ाम लगाते हो, बेचारी विधवा—-वगैरह वगैरह! लेकिन शामली ने नज़रे उठाकर बड़े तंजिया अंदाज़ में सुलताना को देखा और अहिस्ता से बोली, “अगर वह जिंदा है, तो भी क्या हुआ? मेरे लिए तो वह मर ही गया है!”
सुलताना को जैसे एकदम बिजली का करंट मार गया—हाय रे, अपने शौहर के बारे में ऐसी बात!

सुलताना को चुप देखकर शामली मुस्कुराई, “वह समझता था कि रोटी कपडा देगा और हुकुम चलाएगा। हमारे हाथ पाँव चलते हैं, हम काम करते हैं, उस जैसे दस को खिलाने की हिम्मत रखते हैं हम!” और फिर वह आटे के बर्तन में पानी लेकर जोर जोर से अपने हाथ मरोड़ मरोड़ कर धोने लगी जैसे अपने शौहर के काम उमेठ रही हो!
सुलताना ख़ामोशी से अपने दरवाज़े की तरफ बढ़ गई, लेकिन उसके ज़हन में एक तूफ़ान बरपा था। बेशक शामली बड़ी हिम्मत रखती थी जो उसने ऐसा सोचा, लेकिन हाय, उसने अपने शौहर के बारे में किस दिल से यह बात कही? शौहर, कितनी प्यारी चीज़, उसका सुहाग, शौहर इस दुनिया में औरत का सबकुछ….! मगर यह नीच जात, इसीलिए तो…..! उसने अपने सर को जोर से झटका—–फिर उसे नीच जात का ख़याल आया? वह तो इस बात को उसूल की हैसियत से मान चुकी थी न कि इस समाज की शादी कानूनी जकडन थी, और कुछ नहीं। लेकिन आज जब यह उसूल नंगा होकर सामने आ गया तो वह डर गई;  उसका दिल, दिमाग़,उसके वर्ग के मकड़ी के जालों में उलझ कर रह गए। तो क्या यह उसूल उसने सिर्फ दूसरों को कायल करने के लिए अपना लिए थे? बगैर समझे हुए बस रटलिए थे? लेकिन दादी और अम्मी जो कहा करती थीं न—-और यहाँ तो रोटी कपडे को ठुकरा देने का मामला था। लेकिन शौहर? औरत की इज्ज़त, विकार—मुहब्बत? मगर….मगर…. उसने घबराकर खानसामा को चाय लाने को के लिए आवाज़ दी।

सज्जाद ज़हीर

 कुछ हफ़्तों बाद होली थी। उसकी बच्चियां, शागिर्द पेशे में होली खेले निकल गईं; खानसामा सबसे छुपकर अपनी कोठरी में बैठा था। वह अकेली बैठी इम्तिहान के पर्चे जांच रही थी। पहले गैलरी में कदमों की आहट सी हुई, फिर झंझरों की मौसूकी सुनाई दी, फिर शामली का साया दरवाज़े में दिखाई दिया। उसने बड़े बड़े लाल और नीले फूलोंवाली नकली रेशम की साडी पहन रखी थी, ज़र्द चमकदार साटन का ब्लाउज, दांतों में मिस्सी, मुहं में पान, आँखों में गहरा काजल और घनी भंवों के बीचो बीच एक बड़ी सी सुनहरी टिकली जो गर्दन के हर घुमाओं के साथ यूँ रह रहकर तड़पती जैसे सुरमई बादलों में कभी कभी कौंधा लपक जाता है। हाथ में पीतल की एक थाली लिए वह यूँ सुलताना के सामने आकर खड़ी हो गई जैसे अजंता की सांवली शहजादी में जान पड गई हो। थाली में कई तरह के रंग थे जिनमे अबरक के नन्हे नन्हे ज़र्रे दमक रहे थे। एक किनारे पर गुलाबी काग़ज़ पर कुछ लड्डू थे। उसने बगैर कोई नोटिस दिए एक चुटकी भरकर रंग उठाया और पीछे हटती हुई घबराई सुलताना के माथे पर मॉल दिया। फिर उसने एक लड्डू उठाया और सुलताना के मुहं में देने लगी।. सुलताना की आँखों में आंसू आ गए; मुहं पर हाथ रखकर धीरे से बोली, “शामली! मैं मिठाई नहीं कहूंगी. मैंने….एक मन्नत रखी है न! मैं अभी मिठाई नहीं खा सकती! जब साहब…”

शामली जैसे यकलख्त सब समझ गई। लड्डू को फिर थाली में रखते हुए, हाथ उठाकर बहुत संजीदगी से बोली, “बीबी जी, आप दिल छोटा न कीजिये, भगवान् ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा। साहब जेल से छूट जायेंगे और आपके पास लौट आएंगे!” फिर हंसकर बोली, “तब हम सब आपको मिठाई खिलाएंगे, मगर….” उसकी आँखों में प्यार और शरारत एक साथ झलकने लगे, “फिर यह है कि तब आप हमारे हाथ से क्यों खाएगी? आपको तो तब साहब खिलाएंगे।”
सुलताना झेंप गई और बात बदलने के लिए उसने अपने बैग में हाथ डाला। पांच का नोट उसकी हथेली में आकर बाहर निकलने ही वाला था कि शामली ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली “देखिये हमको कुछ दीजिये विजियेगा नहीं!”
जब उसने जाने के लिए पीठ मोडी तो सुलताना ने बड़ी हिम्मत करके गला साफ़ किया और अटकते हुए लहजे में बोली, “शामली, तू इतनी अच्छी है, मगर तूने अपने आदमी को क्यों छोड़ दिया?”
शामली ने नज़रे नीची कर लीं और पाँव के अंगूठे से ज़मीन रगड़ने लगी। चाँदी की चमकदार झांझर में उसके पाँव में लगा हुआ सुर्ख महावर परछाईयां बनकर डोलने लगा।दूसरे लम्हे उसने नज़रे उठाई, उनमे कुछ मायूसी, कुछ तंज़ था।धीरे से बोली, “जाने दीजिये बीबीजी, आप नहीं समझेंगी।” और फिर वह झाँझरें बजाती, बिछुए झंकाती चली गई।
शामली के जाते ही खानसामा आ गया और सीनी में खाना पकाने का सामान उसके सामने रखते हुए बोला, “बड़े साहब का चपरासी कहता था—-राम अवतार को नौकरी से जवाब मिलने वाला है।”
“अरे क्यों ? “ वह उछल पड़ी।
“बात यह है कि चपरासी, फराश, माली और कई एक छोटे बाबुओं ने शिकायत की है कि यहाँ क्वाटरों में बदमाशी होती है। हम लोग बाल बच्चेदार हैं, घरों में सयानी बहू बेटियां है और यह औरत आवारा है। बड़े बाबु भी कहते थे की राम अवतार की हरकते ठीक नहीं हैं। कल शाम को सुना नहीं था आपने?”
“हाँ हाँ, कल शाम हमने कुछ झगडे की आवाजें सुनी तो थीं। क्या बात थी?” सुलताना को याद आया कि कल झुटपुटे के वक़्त उसने कुछ झगडे की आवाज़े सुनकर चुपके से खिड़की खोली थी तो इतना दिखाई दिया कि कुछ लोग पलंग पर बैठे जोर जोर से बातें कर रहे हैं, इतनी तेज़ और जल्दी जल्दी कि कुछ समझ में नहीं आ रहा था। राम अवतार मुजरिम सा खड़ा था और उसके पास एक आदमी बाईसिकल पर टिका खड़ा था और एक आदमी, कोट पाजामा पहने, बड़े रोब से धमकी देने के अंदाज़ में बातें कर रहा था। शामली कहीं नहीं थी हालाँकि यह सारा झगडा उसी की कोठरी के सामने हो रहा था। फिर सुलताना ने खिड़की बंद कर ली।
“वह राम अवतार के बिरादरी के लोग थे बेगम साहब। उसके चाचा का बेटा भी था। वे ऊंची जात के लोग हैं; रामोतार के माँ बाप ने बिरादरी में इसकी बात पक्की कर दी है, मगर अब यह यहाँ इसके चक्कर में फंस गया है, और—.” वह रुक गया क्योंकि उसे अहसास हुआ कि सुलताना उसकी बात सुन ही नहीं रही है।खिसियाकर बोला, “गोशत में क्या लौकी पड़ेगी बेगम साहब?”
सुलताना जैसे ख्वाब से चौंकी—-“ऐ? —हाँ, ठीक है।”
खानसामा ने चुपचाप सीनी उठाई और निकल गया।

सुलताना ने एक नज़र उसे जाते हुए देखा, फिर अपने कागज़ इकट्ठे कर ही रही थी कि दस्तक हुई। उसने दरवाज़ा खोला और रामअवतार को देखकर हैरान रह गई। वैसे तो कभी कभार सुलताना के ख़त जब ग़लती से सरकारी दफ्तर में चले जाते थे तो रामअवतार ही देने आता था, मगर आज उसे राम अवतार को देख कर अजीब सा लगा। तो यही था शामली का वह महबूब जिसपर इतना किस्सा हो रहा था। शामली उसे चाहती थी, शामली जो कह गई थी —-“आप नहीं समझेंगी!”
“बीबी जी यह आपका ख़त आया था, बड़े बाबूजी ने मुझे अभी दिया है।”
सुलताना ने हाथ बढ़ा कर ख़त ले लिया और बोली, “राम अवतार! यह…यह तुम्हारी नौकरी के बारे में क्या सुनने में आ रहा है?”
राम अवतार ने नज़रे नीची कर ली। चुप रहा।
सुलताना उसकी इस चुप्पी से रुआंसी हो गई। जी चाह चिल्लाकर राम अवतार से कहे—-“खुदा के लिए तुम लोग मुझे अपना दोस्त समझो। यह दीवार जो मेरे और तुम्हारे बीच खड़ी है इसे गिरा दो! राम अवतार शामली से कहो, मुझसे इतना दूर न रहे। मुझे समझने का मौक़ा भी तो दे! तुम दोनों शागिर्द पेशे में पैदा हुए और मैं एक कोठी में, तो इसमें मेरा क्या कुसूर है?” मुश्किल से बोली, “क्या शामली की वजह से? क्या किसी ने तुम दोनों की शिकायत की है?”
राम अवतार ने धीरे से बस इतना कहा, “कुछ नहीं सरकार, अब क्या आपसे कहूँ!” और फिर वह सलाम करके चल दिया, जैसे उसका भी यही खयाल हो कि आपसे क्या कहूँ, आप नहीं समझेंगी।

सुलताना का खून खौलने लगा; गुस्से से नहीं, इरादे की शिद्दत से। उसने शामली और राम अवतार की चुनैती क़ुबूल कर ली। कल वह बड़े साहब से जाकर लड़ेगी और उनसे पूछेगी कि दो मासूम,नेक,मेहनतकश इंसानों की मोहब्बत में रोड़ा अटकाने का उनको क्या हक है? किसी को भी क्या हकहै? अगर राम अवतार की नौकरी चली जायेगी तो वह उन दोनों को अपने घर में पनाह देगी, राम अवतार के लिए खुद नौकरी ढूंढेगी। बड़े आये बिरादरी वाले, मारपीट करने वाले—-देखेंगे! कितनी ही देर तक वह बड़े साहब और राम अवतार की बिरादरी वालों से बहस करने के लिए अच्छे अच्छे ज़ोरदार जुमले दिल ही दिल में बनाती और उनकी रिहर्सल करती रही। वह राम अवतार और शामली पर यह बात साबित करके रहेगी कि वह उनकी दोस्त है,कि वह सबकुछ समझती है। कल सुबह ही सुबह जाएगी वह!

अगले दिन वह बहुत जल्दी तैयार हो गई और कॉलेज के वक़्त से कोई एक घंटा पहले बाहर निकल आई। इस वक़्त बड़े साहब कोठी पर ही मिल जायेंगे। उसे यह भी उम्मीद थी कि शामली अपनी कोठरी के सामने ही मेजर साहब के बच्चे को प्रैम में घुमाती मिल जाएगी क्यों कि वह अक्सर बच्चे को घंटो सड़क पर घुमाती और पास के पार्क में ले जाती। और उसे यह सोचकर एक बड़ी पुरिस्रार सी ख़ुशी हुई कि शामली को तो गुमान भी न होगा की वह उसी की खातिर बड़े साहब से लड़ने जा रही है।
दरवाज़े से बाहर क़दम रखते ही उसने शामली का दरवाज़ा चौपट खुला देखा। न वहां उसका पलंग था, न बिस्तर, न बर्तन न कोई और सामान। चूल्हा बुझा पड़ा था और ताक पर रखा चिराथा औंधा पड़ा हुआ था। वह सन्नाटे में आ गई। दफ्तर में पानी पिलाने और झाड पोंछ करने वाली वहीँ खाट बिछाए अपनी लड़की की जुएँ देख रही थी। उसने फ़ौरन सूचना दी, “सरकार, शामली भाग गई!”
सुलताना के मुहं पर जैसे किसी ने तडाक से एक तमाचा मारा! “कब?”
“पता नहीं सरकार। रात तक तो थी।”
“और राम अवतार?”
चप्रासन हंसी, “रामौतार हैंगे। रो रहे हैं अपने लिखे को। ऐसी नीच ज़ात रांडों का क्या है बीबी जी, आज एक किया, कल दूसरा, परसों तीसरा…..नीच जात हैं न!” और उसने जोर से अपने नाखूनों के बीच एक जूं धरके पीस दी जैसे शामली का ही कचूमर निकाल दिया हो।
सुलताना के कदम लडखडाने लगे। अब बड़े साहब के पास जाना बेकार था; किस मुहं से जाती और क्या कहती! धीरे धीरे चलती हुई सदर फाटक की तरफ बढ़ी। फाटक के पास स्टूल पर रामावतार बैठा था। उसने रोज़ की तरह सुलताना को सलाम भी किया और बढ़कर अधखुला फाटक खोला भी, मगर मुस्कुराया नहीं और फिर जाकर स्टूल पर बैठ गया—-गुमसुम, उदास, अकेला।

सुलताना ने सिर झुका लिया और आगे बढ़ गई। दरअसल उसे खुद ही राम अवतार से आँखे चार करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। आखिर वह भी औरत थी; और एक वह भी औरत थी जो आज राम अवतार को दगा देकर भाग गई थी। अलबत्ता सुलताना ने इतना ज़रूर महसूस किया कि चपरासी, अर्दली, माली वगैरह जो राम अवतार से खींचे खिंचे रहने लगे थे आज उसके करीब बैठे थे और उनके चेहरे किसी नामालूम सी ख़ुशी से खिले जा रहे थे। वे राम अवतार को बहलाने की कोशिश कर रहे थे।

सड़क तक पहुँचते पहुँचते सुलताना को शामली से नफरत सी महसूस होने लगी। बेचारा राम अवतार! तो यह ठीक ही था की नीच जात —उफ़! फिर उसे जात की ऊंच नीच का ख़याल आया!—-चलते चलते रास्ते में उसे जितनी औरतें मिली, सबके बारे में वह यह अंदाज़ा लगाने की कोशिश करती रही की क्या यह भी नीच ज़ात हैं? और अगर हैं तो क्या यह भी अपने चाहने वालों को दगा देकर भागी हैं? नाहक उसने शामली से इतना प्यार किया, फजूल उसको इतना सिर चढ़ाया, सचमुच ही कम औकात निकली—नीच जात! उसने जोर से ज़मीन पर थूका और आगे बढ़ गई!

भला इतने दिन बाद और इतनी दूर से वह शामली को कैसे पहचान लेती? लेकिन शक उसे पहली ही नज़र में हो गया था कि सिर पर अमरूदों की झापड़ी रखे, पीली साडी बांधे, जो यह औरत सिकंदर बाग़ के फाटक में मुड़ी है, यह शामली ही है। उसने अपने रिक्शेवाले से कहा कि उसका पीछा करे और उसके बराबर से रिक्शा निकाले ताकि वह अच्छी तरह से देख सके। अपने बिलकुल पीछे रिक्शे की खड़बड़ाहट सुनकर औरत ने मुड़कर देखा और एक मर्तबा फिर सुरमई बादलों में कौंधा सा लपक गया— तो वह शामली ही थी!

रिक्शा बढाते वक़्त सुलताना ने सोचा था कि अगर वह शामली निकली तो वह उसकी ऐसी खबर लेगी कि वह सात जन्म तक याद करेगी। चुनांचे उसने रिक्शा रुकवाया, उतरी और फ़ौरन ही शामली को फटकारना शुरू कर दिया, “शामली तू कितनी बुरी है! तू भाग क्यों आई? बेचारा राम अवतार इतना रोता है तेरे लिए, आधा भी नहीं रह गया है, सब उसकी हंसी उड़ाते हैं. तूने बहुत बुरा किया; भला ऐसा करना था तुझे?”
सुलताना के इस तूफ़ान का जवाब शामली ने सिर्फ एक जुमले से दिया, “मगर वह अपनी सरकारी नौकरी से तो अलग नहीं हुआ न बीबी जी?”
सुलताना की समझ में कुछ नहीं आया; शामली जब टोकरी सिर पर ठीक करती हुई जाने को मुड़ने लगी तो वह बोली, “मगर शामली, यह क्या बात हुई?”
शामली रुकी, मुड़ी, उसने टोकरा उतारकर ज़मीन पर रख दिया और कमर पर दोनों हाथ रखे, जैसे उसे सुलताना की चुनौती क़ुबूल कर ली हो। गुस्से से बोली, “मगर क्या बीबी जी ? मगर यह कि वह बार बार मुझसे कहता था की तेरे कारण मेरी सरकारी नौकरी छूटने वाली है। मुझपर एहसान धरता था। आप बताइए, क्या मैंने उससे कहा था कि तू सरकारी नौकरी कर या मत कर? मुझे उसकी नौकरी से प्यार था क्या? जाने अपने को क्या समझता था। बार बार यही बात ‘नौकरी छूट जाएगी, तेरे कारण बदनाम हो रहा हूँ; तू मेरे लिए अपशकुन है; और कहता ‘अगर नौकरी छूट जाएगी तो तुझे खिलाऊंगा क्या?’ अगर उसके घर बैठ जाती न, तो उम्र भर यही ताने देता—-और खाना खिलाने का क्या है बीबी जी, उस जैसे दस को कमा कर खिलाने की हिम्मत रखते हैं हम।”
इतना कहकर वह झुकी और टोकरा उठाकर सिर पर रख लिया ; एक पल खामोश रही, फिर सुलताना की तरफ देखा। उसकी बड़ी बड़ी कटीली आँखों में लबालब आंसू भरे थे; धीरे से बोली, “रामोतार ठीक तो है न बीबी जी? उससे मेरा…..मेरा नमस्ते कह दीजियेगा।”

सुलताना ने सिर झुका लिया और उतनी ही अहिस्ते से बोली, “कह दूँगी, ज़रूर कह दूंगी।”
आंसुओं के बीच से शामली मुस्कुराई जैसे कहती हो, “हाँ, ठीक है, अबकी बार शायद आप समझ गईं।”

तस्वीरें गूगल से साभार 

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अमानवीय सौन्दर्यधारणाओं से मुक्ति श्रीदेवी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी!

नीलिमा चौहान 


श्रीदेवी के देहावसान के साथ ही एक सिने युग का  भी आज अवसान हो गया । आज व्यक्त किये गये  सम्वेदना संदेशों को पढकर  यह साफ जाना जा सकता है कि सुंदर और नयनाभिराम के भी नश्वर होने के यथार्थ को जाहिर करती इस दुर्घट्ना ने उनके प्रशंसकों  की पीड़ा को द्विगुणित किया  । क्या ही सितम  है  कि सुनहले पर्दे के मायावी रूप से अतिप्रभावित भारतीय दर्शक नायिका -सौंदर्य के भी अतिमानवीय रूप का उपासक है ।   दर्शकों के लिए ग्राह्य होने की कसौटी पर खरे उतरने के लिए नायिकाओं को जिन पीड़क प्रकियाओं और कृत्रिम जीवन शैली का पालन करना होता है उसके प्रति अज्ञानता और उदासीनता भारतीय दर्शक का पसंदीदा शगल है । अभी श्रीदेवी के जाने की ताज़ा पीड़ा के  ताज़ा पलों के कारुण्य में  रसाघात करने की धृष्टता करना  अपेक्षित नहीं होगा । किन्तु इतना तो कहा ही जा सकता है कि र्सौन्दर्योपासना करने वाली भारतीय रसना को अपने टेस्ट बड्स को बदलने की घोर ज़रूरत को भी इस अवसान से जोड़कर देखना शुरू करना होगा ।

अभी बीते दो रोज़ से सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर सोनम कपूर के द्वारा सुंदरता के मिथक का सच बताते हुए टीनेज लड़कियों को लिखे गए पत्र और तस्वीर की खूब चर्चा हुई है। लेकिन वहीं दूसरी ओर उनके इस कदम को सोशल मीडिया पर फॉलोअर की बाढ़ को न्योतने का स्टंट कहकर नज़रअंदाज़ किये जाने की पहल भी की गई ।  इसे पब्लिसिटी का एक तरीका कहकर कमतर साबित करना ,अपेक्षाकृत प्रबुद्धों की सहज और जायज़ प्रतिक्रिया हो सकती है ।लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सेलेब्रिटीज़ के द्वारा जन-जागरूकता पैदा करना शुष्क उपदेशात्मक लेखकीय कर्म की तुलना में अधिक असरकारक होता ही है । प्लेसिबो इफेक्ट है यह । जिन तमाम लड़कियों ने ब्यूटी के इस आदर्श को पहले प्राप्य मानकर सपने देखे और फिर असफल मानकर कुंठाग्रस्त हुईं उनके लिए ।

परिणिति चोपड़ा द्वारा स्ट्रेच मार्क्स को पब्लिकली फ्लॉन्ट किया जाना और सोनम का यह स्टंट अगर उनके फैन क्लब में इजाफा करता है तो यह एक अलग और ग़ैरहानिकारक मसला है । जिन आम साधारण लड़कियों ने सुनहले पर्दे की रूपसियों के सौंदर्य  को अंतिम पैमाना और आखिरी लक्ष्य समझकर यह  मान लिया था कि ” हमारा कुछ नहीं हो सकता ” उनके लिए ब्यूटी मिथ को तोड़ने का यह कारगर तरीका हो सकता है । सोनम के इस कृत्य से ब्यूटी बाज़ार की मजबूत दीवार पर एक डेंट तक न पड़ने का तर्क इसलिए भी नज़रअंदाज़ किया जा सकता है क्योंकि बाज़ार तो उपभोक्ता के जेहन के भरोसे टिकता है । चोट और बदलाव वहीं किया भी जाना है और इस बाबत किसी फिल्म तारिका के द्वारा इस मिथ को छिन्न भिन्न किया जाना स्वागत योग्य पहल ही कही जानी चाहिए । विद्या बालन ने स्त्री के आदर्श फिगर के मिथ को जिस खूबसूरती के साथ खारिज कर दिखाया है उसी कड़ी में सोनम और परिणिति का यह कदम भी शामिल कर कम से कम हम उदाहरण सहित यह जतला सकेंगे कि सौंदर्य के तथाकथित मानदंडों पर खरे उतरने की पीड़ा उठाना बेमानी भी है और अव्यावहारिक भी । अनिवार्य तो कतई भी नहीं ।

सुनहले पर्दे की सुंदरता के आतंक का भंडाफोड़ होने की परिघटनाएं स्त्रियों के सामने जितनी ज्यादा पेश होंगी अपनी देह के लिए उतना ही सहज होना सीख पाएंगी । कल को इतना तो अवश्य होगा कि जब आदर्श सुंदरता के मिथ को भुनाकर ये सितारे हमारे मन व जेब को आतंकित करने की कोशिश में रत होंगे तो हमको जन्नत की हकीकत मालूम होगी । और तब यह किसी स्त्री की अपनी फ्री च्वाइस होगी कि वह बाज़ार के ज़रिए उस खोखले ब्यूटी मिथ को साकार करने को कितनी लालायित हो या न भी हो ।

अबतक हमने स्त्री -मन को एक लाज़मी लेकिन नामुमकिन और नाहासिल किस्म की सुंदरता  के पाने के लिए झोंके रखा था । क्या ही सुंदर बात है कि लड़्कियों को इस जालसाज़ी को पहचानने की सलाहियत  उन्हीं ब्यूटी आइकॉन्स के ज़रिए  मिल पाने  का मौका बन पड़ रहा है । जब वर्जीनिया कहती हैं कि सुंदरता स्त्री का राजदण्ड है तब उनका आशय स्त्री को उसकी ही देह की कैद में तड़पने देने की साजिश का पर्दाफाश करना होता है । कैद,  जिसकी सुंदरता को बनाए रखना अपने आप में दुष्कर कर्म है । सुंदरता जिसे सय्याद की नजर से देखा और परखा जाना है । कैद जिसको अन्य तमाम कैदों से बेहतर और ध्यानाकर्षण योग्य बनाए रखना है ।  देह की उपेक्षा स्त्री के लिए सर्वाधिक असहनीय है तो देह की तुलना स्त्री को प्रताड़ित करने का अचूक अस्त्र । देह से  परे और देह से ऊपर उठने का विचार स्त्री का भीषण राजद्रोह है । सुनहले पर्दे की तारिकाएँ इस सज़ा के लिए आत्मसमर्पण करने के उपरांत ही अपने पेशे में प्रवेश करने के बाबत सोच भी सकती हैं । विमान परिचारिकाओं और मीडिया के तमाम माध्यमों में पेश होने के लिए तथाकथित सुंदरता को पैमाना बनाकर स्त्री- देह की स्केलिंग करने वाली जमात में सोनम का यह कदम आंखें खोलने वाला कदम कहाया जाना चाहिए । जिस जमात में बारह -पन्द्रह साल की लड़कियां कम खाकर और आईने से दिन भर अपने सुंदर होने का आश्वासन पाकर अपनी ऊर्जा को ज़ाया और आत्मविश्वास को आहत होने दे  रही हों वहाँ एक फिल्म तारिका का अपने सुंदर दिखने के बनावटी तरीकों और आयातित राज़ों को खोलना किसी को क्योंकर खलना चाहिए ।

सोनम कपूर

सिस्टरहुड जाहिर करने के अचूक मौके को हाथ से जाने दिए बिना सोनम कपूर के इस खूब शाया किये जा रहे लेख व तस्वीर को और प्रचारित होने की कामना सहित यह भी अर्ज़ करना चाहती हूं कि रोग नहीं रोग के लक्षणों को लक्षित करने से भी लाइलाज़ मर्ज़ के प्रति इम्यूनिटी में इज़ाफ़ा होता है। तो  जी तो आन दो न और ऐसे फिल्मी स्टंट। श्रीदेवी को उनके मुरीदों की सच्ची श्रद्धांजलि भी यही होगी कि स्त्री – सुंदरता को अपनी अमानवीय पूर्वधारणाओं से आज़ाद कर दिया जाए ।

पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, ‘बेदाद ए इश्क’ (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.
 
तस्वीरें गूगल से साभार 

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‘विजय संकेत’ के रूप में स्त्री शरीर

आकांक्षा 

स्त्री अध्ययन के शोधार्थी ।
संपर्क : ई मेल-akanksha3105@gmail.com

मनुष्य के विकास क्रम का इतिहास काफी परिवर्तनशील रहा है । आदिम युग से आगे बढ़ने पर मनुष्य ने जब सांगठनिक स्तर पर अपना जीवन यापन शुरू किया तभी से वास्तविक रूप में समाज का निर्माण शुरू होना माना जा सकता है । पूर्व में हम यह जान चुके हैं कि मनुष्य ने सांगठनिक स्तर पर कबीलों में रहना शुरू किया था और इस समाज को कबीलाई समाज के नाम से जाना जाता था । इस समाज का अस्तित्व काफी लंबे समय तक था और इतिहास में इसे कबीलाई युग के नाम से भी जाना गया ।

इस समाज की विशिष्टता यह थी कि इसमें स्त्री को केवल इस रूप में महत्त्व प्राप्त था कि वह एक ऐसा साधन थी जिस पर उस पूरे समाज का अस्तित्व टिका हुआ था । चूँकि कबीलाई समाज में श्रम करने के लिए अधिक से अधिक व्यक्तियों की संख्या ही उस समाज की संपत्ति समझी जाती थी । छोटे-छोटे कबीले अपनी संख्या में वृद्धि करने के लिए प्रयास करते रहते थे और कई बार कई छोटे-छोटे कबीले एक बड़े कबीले द्वारा जीत लिए जाते थे । इस प्रक्रिया में छोटे कबीलों की स्त्रियों को ही सबसे पहले निशाना बनाया जाता था । जब स्त्रियाँ बड़े कबीलों में आकार रहने लग जाती थीं तब उन कबीलों के पुरुष भी स्वयं ही हार स्वीकार कर उस बड़े कबीले में शामिल हो जाते थे और उनके अनुसार कार्य करने लग जाते थे । कबीले के स्त्री-पुरुष के बीच किस तरह के संबंध होते थे, इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह है कि किस प्रकार पुरुष पर आधिपत्य जमाने के लिए स्त्री और स्त्री शरीर का उपयोग किया जाता था ।
प्रसिद्ध विदुषी लीला दुबे ने अपने महत्त्वपूर्ण आलेख ‘धरती और बीज’ में स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार व्यक्ति द्वारा खेती करने के लिए खेत में बीज बोया जाता है तथा उसकी फसल और जमीन पर उसका ही अधिकार होता है, ठीक वैसी ही स्थिति स्त्री शरीर की भी है । स्त्री शरीर की स्थिति खेती करने योग्य भूमि के जैसे ही है और उस पर उस पुरुष का अधिकार हो जाता है जिसका बच्चा पैदा करके वह उसके वंश को आगे बढ़ाती है । भारतीय समाज में माँ को सबसे ऊँचा दर्जा प्राप्त है । इसीलिए धरती और स्त्री की तुलना की जाती रही है और धरती को माँ के रूप में स्थापित किया जाता रहा है, क्योंकि धरती अनाज पैदा करती है और स्त्री, बच्चे । सीमा क्षेत्र पर भी सैनिकों को माँ (धरती) की रक्षा के लिए तैनात किया जाता है और यह प्रशिक्षित भी किया जाता है कि उन्हें माँ की रक्षा के लिए हर प्रकार से सदैव तत्पर रहना चाहिए । एक तरह से इस काम की जिम्मेदारी केवल पुरुषों पर ही होती है क्योंकि अभी सेना में महिलाओं के प्रवेश के बावजूद यह जिम्मेदारी पुरुष ही निभाते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि पुरुष ही स्त्री (धरती रूपी स्त्री या माँ) की रक्षा कर सकता है ।

जिस प्रकार धरती (क्षेत्र) किसी राष्ट्र की इज्जत का प्रतीक मानी जाती है उसी प्रकार स्त्री किसी एक समुदाय, परिवार, जाति और धर्म की इज्जत से जोड़कर देखी जाती है । जिस प्रकार किसी राष्ट्र की सेना या व्यक्ति द्वारा दूसरे राष्ट्र की धरती पर कब्जा या वर्चस्व स्थापित करने के जरिए उसे परास्त किया जाता है ठीक उसी प्रकार किसी समुदाय, जाति, परिवार और धर्म की स्त्री को अपहृत, प्रताड़ित, बलात्कार और अन्य तरह की हिंसा करके उस पूरे समुदाय को परास्त करने का प्रयास किया जाता है । इस प्रकार स्त्री शरीर युद्ध भूमि का वह क्षेत्र बना दिया गया है जहाँ समुदायों, जातियों, परिवारों और धर्मों के बीच युद्ध लड़ा जाता है । इस तरह के युद्ध में सबसे ज्यादा पीड़ित और प्रभावित स्त्री ही होती है ।

जहां तक कबीलाई समाज की बात है तो इस समाज में स्त्री का इस्तेमाल तो किया ही जाता था लेकिन, स्त्री शरीर पर हिंसा नहीं की जाती थी । पुरुषों को अपने वश में करने के लिए स्त्री को अपने अधीन करने की प्रथा थी ताकि उस स्त्री से जुड़े हुए पुरुष स्वतः ही उनके अधीन आ जाएँ । ऐसे में धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती जाती थी और कबीला बड़ा रूप धारण करता चला जाता था । कबीले को श्रम के लिए पुरुष और घरेलू कार्यों के लिए स्त्रियाँ दोनों ही मिल जाते थे । स्त्री को अपने अधीन करने का प्रमुख कारण यह भी था क्योंकि वे ही बच्चे पैदा कर सकती थीं । उनका मानना था कि यदि स्त्री की संख्या अधिक रहेगी और वे बच्चे पैदा करती रहेंगी तो काम करने के लिए आवश्यक मजदूरों की पूर्ति होती रहेगी ।  इसके इतर सामंती समाज में भी ज्यादातर पुरुष को ही बँधुआ मजदूर की तरह रखने का चलन था । जमींदार निचले तबके के पुरुषों से कठोर काम लिया करते थे और बदले में उसके घर-परिवार के भरण-पोषण के लिए अनाज इत्यादि दिया करते थे । इस व्यवस्था में भी सीधे स्त्री पर हिंसा जैसा कोई स्वरुप नहीं दिखाई देता है । सामंत वर्ग स्वयं इतना सक्षम हुआ करता था कि उसे दूसरे वर्ग के लोगों पर अधिकार और वर्चस्व हासिल करने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होती थी ।

जमींदारी और साहूकारी व्यवस्था में स्त्री को भी निशाना बनाया जाता था । किसान और निम्न तबके के लोग विभिन्न कार्यों के लिए जमीदारों और साहूकारों से क़र्ज़ लिया करते थे । बदले में वे अपनी जमीन या कीमती वस्तुएँ जैसे जेवर इत्यादि गिरवी रखा करते थे । मजदूर तबके के वे लोग जिनके पास गिरवी रखने के लिए कोई वस्तु नहीं होती थी उन्हें भी ऊँचे ब्याज पर क़र्ज़ दे दिया जाता था । कई बार क़र्ज़ इसलिए आसानी से मिल जाता था क्योंकि क़र्ज़ माँगने वाले मजदूर या किसान के घर की स्त्रियों पर सीधी नज़र रहती थी । जिन मजदूरों-किसानों के घरों की स्त्रियों पर साहूकारों-जमीदारों की नज़र रहती थी उन्हें बिना वजह क़र्ज़ लेने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता था और कहा जाता था कि वे “ब्याज भी नहीं लेंगे और जब मर्जी हो लौटा देना” । लेकिन जब मिला हुआ पैसा खर्च हो जाता और किसान या मजदूर लंबे समय तक क़र्ज़ नहीं चुका पाता तब उस पर पैसे वापस करने का तरह-तरह से दबाव बनाया जाता था । ऐसी स्थिति में वे मजदूर-किसान के घरों की स्त्रियों को अपने घरों में काम करने के लिए बुलाते थे । वे काम तो करवाते ही थे और साथ ही उसका शारीरिक शोषण भी किया करते थे । यह प्रक्रिया काफी लंबे समय तक चलती रहती और मजदूर-किसान सब कुछ जानकार भी चुप रहते । न उनके पास कभी पैसा जुटता और न ही वे क़र्ज़ से मुक्त हो पाते । आज भी बहुत पिछड़े इलाकों में इस तरह की घटनाएँ होती रहती हैं जो सामने नहीं आ पाती । इस तरह की घटनाओं पर आधारित कई हिंदी फ़िल्में भी बनीं है जो साहूकारी और जमींदारी  प्रथा में व्याप्त अनेकों प्रकार के शोषण और उत्पीड़न को बयान करते हैं ।
आधुनिक समाज में जैसे-जैसे शिक्षा, समाज-सुधार, जागरूकता, अधिकार और इसी तरह के अन्य उपायों के जरिए समाज में चेतना फैलनी शुरू हुई तो लोगों पर वर्चस्व और अधिकार बनाए रखना कठिन सा होने लगा । इस कारण से नए-नए तौर तरीके खोजे जाने लगे । जातीय संघर्ष इसका एक बड़ा उदाहरण है । जाति के आधार पर पहले समाज को बाँटना और फिर उस जातीय पहचान के वर्चस्व को स्थापित करने के लिए विभिन्न जातियों के बीच हिंसा को जन्म देना और हिंसा करना शुरू कर दिया गया । लेकिन यह तरीका बेहद जटिल और कठिन होता है । वर्चस्व के लिए धर्म को भी एक बड़े आवरण की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है । सांप्रदायिक हिंसा भी उसी का प्रतिफल है । अलग-अलग संस्कृतियों को मानने वाले समुदायों के बीच भी हिंसा अक्सर जन्म लेती रहती है और कई बार भयानक स्वरुप में हमारे सामने उपस्थित होती है ।

इन सारी स्थितियों में एक प्रवृत्ति जो समान रूप से मौजूद है वह है हिंसा । हिंसा की मौजूदगी तो है लेकिन उसके स्वरुप में कई स्तरों पर विभिन्नताएँ भी हैं । वर्तमान में हो रही हिंसा पर यदि दृष्टिपात की जाए तो हम पाते हैं कि पहले के समाजों में स्त्री पर बिना हिंसा किए वर्चस्व बनाए रखने की प्रवृत्ति थी वहीं आज स्त्री शरीर पर हिंसा करते हुए उस समाज पर वर्चस्व कायम करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । यह स्थिति आज इतना विकराल रूप ले चुकी है कि स्त्री शरीर को निशाना बनाए बगैर किसी भी तरह की हिंसा को अंजाम नहीं दिया जा रहा है और स्त्री शरीर के जरिए स्त्री से जुड़े समाज पर वर्चस्व प्राप्त किया जा रहा है । इस प्रकार स्त्री शरीर न केवल वर्चस्व प्राप्त करने का एक साधन या जरिया है बल्कि ‘विजय संकेत’ के रूप में स्थापित होती जा रही है ।

आम तौर पर जब भी दो गुटों, जातियों, समुदायों के बीच तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है तब सबसे ज्यादा ख़तरा स्त्री के लिए पैदा हो उठता है । कारण यह है कि कोई भी गुट, समुदाय या जाति समूह हो, उसकी नजर में स्त्री एक ऐसे साधन के रूप में दिखाई देती है जिसको प्रताड़ित या अपमानित करके उस गुट, समुदाय या जाति को नीचा दिखाया जा सकता है । यह एक सामाजिक मानसिकता को दृश्यांकित करता है । स्त्री का शरीर एक ऐसा संकेत है जो जीत और वर्चस्व को स्थापित करता है जबकि उस वर्चस्व को हासिल करने की प्रक्रिया में स्त्री की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती है । उसे तो यह पता भी नहीं होता है कि गुटों, जातियों और समुदायों के बीच के तनाव में उसका भी इस्तेमाल किया जा सकता है ।  यह कार्य कई बार तब किया जाता है जब किसी एक पक्ष को या दोनों पक्ष को प्रतीत होने लगता है कि अब उनके पास एक दूसरे को नीचा दिखाने, उस पर अपना वर्चस्व कायम करने, उसको अपमानित करने आदि को लेकर कोई और तरीका नहीं बचा है । स्त्री को प्रताड़ित करना और उस पर हिंसा करना एक आसान तरीके के रूप में दिखाई देने लगता है और उसे निशाना बनाया जाता है ।

हिंदू महाकाव्यों में भी इस तरह के उदाहरण मौजूद हैं । जैसे, महाभारत में द्रोपदी का चीरहरण होना और रामचरित मानस में सीता का हरण लगभग इसी तरह के कृत्य को उजागर करता है । कई बार वर्चस्व प्राप्त करने के क्रम में यदि स्त्री को निशाना नहीं भी बनाया गया होता है लेकिन वर्चस्व प्राप्त हो चुका हो, उसके बावजूद इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है । कई बार इसे ‘सबक’ के रूप में स्थापित किया जाता है कि ताकि इसके बाद दूसरा पक्ष अपने शक्ति प्रदर्शन की कभी हिम्मत भी न कर सके । कई बार तनाव शांत हो चुकने के काफी लंबे समय बाद एक दूसरे पक्ष की स्त्री को निशाना बनाया जाता है ताकि पूर्व में हुई घटनाओं का बदला लिया जा सके । समाज में इस तरह की घटनाएँ आम हो चुकी हैं जिनकी ख़बरों से अखबार अटे पड़े रहते हैं ।
भारतीय समाज में विवाह एक ‘पवित्र संस्था’ के रूप में स्थापित है । आम तौर पर सजातीय विवाहों का चलन उत्तर भारतीय समाजों में है और दहेज प्रथा भी किसी न किसी रूप में विद्यमान है । विवाह होने से पहले लड़की अपने पिता के घर की संपत्ति और इज्जत के रूप में देखी जाती है और विवाह होने के बाद वह ससुराल पक्ष की संपत्ति और इज्जत के रूप में देखी जाती है । सामान्य तौर पर यह एक आदर्श स्थिति दिखाई देती है लेकिन वास्तविक और व्यावहारिक तौर पर यह स्थिति समग्रता में एक व्यक्ति के मानवाधिकारों का हनन है । क्योंकि इन सबके इतर स्त्री के अपने अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित होता है । दोनों पक्षों की संपत्ति और इज्जत को संजोने की भूमिका के अलावा एक मनुष्य के नाते उसकी अपनी कोई इच्छा या भूमिका नहीं दिखाई देती है । विवाह को एक आदर्श स्थिति, बराबरी पर आधारित रिश्ता, पवित्र बंधन इत्यादि मानने का चलन होने के बावजूद वर पक्ष हमेशा स्त्री पक्ष पर अपना वर्चस्व बनाए रखता है । यह वर्चस्व आम तौर पर स्त्री पक्ष द्वारा मौन स्वीकार्य भी होता है । अलग-अलग तरीकों से जैसे दहेज, विवाह के बाद ससुराल में लड़की की सुविधाओं के नाम पर माँगी जाने वाली महँगी वस्तुएँ, ससुराल से मायके ले जाने और ‘सुरक्षित’ पहुँचाने की जिम्मेदारी आदि के तले स्त्री पक्ष हमेशा दबी स्थिति में होता है । इसके इतर यदि स्त्री की कोख से बेटी का जन्म लेना भी एक बहुत बड़े वर्चस्व संकेत के रूप में उपस्थित होता है जबकि बेटी या बेटा पैदा करना स्त्री पर निर्भर नहीं करता ।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार बेटा या बेटी पैदा होना पुरुषों पर निर्भर करता है क्योंकि स्त्री के शरीर में केवल X क्रोमोजोम ही होता है वहीं पुरुष शरीर में X और Y दो क्रोमोजोम होते हैं । पुरुष के Y क्रोमोजोम कमजोर होने की स्थिति में ही बेटी पैदा होती है और इसकी जिम्मेदारी पुरुषों को लेनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता है । बेटी पैदा होने पर सारी जिम्मेदारी स्त्रियों पर थोप दी जाती है और उसे और उसके मायके वालों को इस बात को लेकर हमेशा प्रताड़ित, शोषित और अपमानित किया जाता है । समाज सब कुछ जानते हुए भी इस स्थिति पर मौन रहता है ।विवाह संबंधों में एक पक्ष यह भी है कि कई बार दो परिवारों के बीच आपसी रंजिश होने के बावजूद यह कहकर दोनों पक्षों के बीच विवाह संबंध कर लिए जाते हैं ताकि दोनों पक्षों के बीच के तनाव को खत्म किया जा सके । पर वास्तविकता इससे अलग होती है । एक राजनीतिक/रणनीतिक प्रक्रिया के तहत ऐसे विवाह संबंध इसलिए स्थापित किए जाते हैं ताकि स्त्री पक्ष पर वर्चस्व स्थापित हो सके । यहाँ पर भी स्त्री का इस्तेमाल ‘विजय संकेत’ के रूप में किया जाता है ।

वर्तमान में अंतरजातीय और  अंतर्धार्मिक विवाहों का चलन तेजी से बढ़ा है ।  यह कई मायनों में प्रगतिशीलता और जागरूकता का परिचायक है क्योंकि इससे धार्मिक और जातीय जकड़न टूटते हैं । यह लड़के और लड़कियों में आत्मनिर्णय लेने की क्षमता को प्रदर्शित करता है, साथ ही लड़के-लड़कियों में आपसी तालमेल और आत्मनिर्भरता जैसे आवश्यक व्यवहारों को बल मिलता है । लेकिन वहीं पर कई बार ऐसे संबंध स्त्री के अनुकूल नहीं होते । अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों में सामाजिक रूप से जिस धर्म एवं जाति को ऊँचा दर्ज़ा प्राप्त होता है, वह कहीं न कहीं वर्चस्व की स्थिति में होता है । यदि लड़का ‘निम्न’ जाति  का है और लड़की ‘उच्च’ जाति की होती है तब लड़के के जाति समूह में यह भावना बैठ जाती है कि उसने ‘उच्च’ जाति की ‘इज्जत’ को अपने कब्जे में कर लिया है । दूसरी तरफ यदि लड़की ‘निम्न’ जाति की है तो यह माना ही जाता है कि लड़की तो उसकी संपत्ति है ही, साथ ही उसका पूरा समुदाय ही लड़के के जाति समूह के अधीन है । ऐसे में वर्चस्व की स्थिति को निर्धारित करने में केंद्र में स्त्री ही होती है और जिस तरफ स्त्री होती है वह उसी का ‘विजय संकेत’ होती है । यही स्थिति बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक धर्मों के बीच बने वैवाहिक संबंधों के मामले में देखी जा सकती है । ऐसे ज्यादातर मामले इसलिए होते हैं क्योंकि हर जाति/धर्म अपनी पहचान और वजूद को बनाए रखना चाहती है । केवल इतना ही नहीं, वह स्वयं को श्रेष्ठ भी साबित करना चाहती है और इसे बनाए रखने का एकमात्र आसान जरिया स्त्री को बनना पड़ता है ।

विवाह संबंधों के इतर भी स्त्रियों पर हिंसा के जरिए वर्चस्व और जीत हासिल करने की कोशिश की जाती है । भारत के कई राज्यों (विशेष रूप से उत्तर भारत) में समय-समय पर जातीय संघर्ष होते रहे हैं जिनमे उच्च और निम्न जातियों के बीच अपने वर्चस्व की स्थापना को लेकर लंबे समय से संघर्ष होता चला आ रहा है । इसका संबंध राजनीति से भी है । जब-जब ऐसे राज्यों में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ती है, इस तरह की हिंसाओं में तेजी से इज़ाफा होता है और तमाम खूनी संघर्ष होते हैं । ऐसी जातीय हिंसाओं का शिकार पुरुष वर्ग तो होता ही है लेकिन निर्णायक स्थिति स्त्रियों पर हिंसा करने के बाद ही तय होती है । आम तौर पर जातीय संघर्ष में जब हिंसा अपने चरम पर होती है और दोनों पक्षों के पुरुष हिंसा के जरिए एक दूसरे को हराने के लिए प्रयास करते हैं तो कई बार दोनों पक्ष बुरी तरह प्रभावित होते हैं लेकिन यह फैसला नहीं हो पाता कि किस जाति को जीत हासिल हुई । ऐसे में एक दूसरे पक्ष की स्त्री या स्त्रियों पर जघन्यतम हिंसा (बलात्कार, छेड़छाड़) के जरिए यह साबित करने का प्रयास किया जाता है कि जिस पक्ष ने स्त्री को अपमानित किया है वह विजयी हुआ क्योंकि स्त्री पर हिंसा करके स्त्री के पूरे समूह को अपमानित किया जाता है ताकि वह फिर से दूसरे पक्ष पर हिंसा करने की सोच भी न सके । ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि यह माना जाता है कि जिस पक्ष की स्त्री के साथ हिंसा की गई है, वह पूरा समूह ही अपने आप अशुद्ध हो गया है ।

ऐसी ही स्थिति धर्म आधारित हिंसा में देखने को मिलती है । १९९० ई. के बाद से धर्म आधारित हिंसा में स्त्रियों को निशाना बनाने का चलन बढ़ा है । धर्म के नाम पर स्त्री का शोषण तो पहले से ही होता आ रहा है लेकिन दो धर्मों और संप्रदायों के बीच होने वाले तनाव और उससे पनपी हिंसा में भी स्त्री शरीर को निशाना बनाए जाने की प्रक्रिया होती रहती है । सांप्रदायिक दंगों के इतिहास पर यदि हम गौर करें तो हम पाते हैं कि पूर्व में जो सांप्रदायिक हिंसा होती थी उसमे स्त्री प्रभावित तो होती थी लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर नहीं । हिंसा के निशाने पर पुरुष वर्ग ही हुआ करते थे क्योंकि यह आम तौर पर सामाजिक मान्यता थी कि लड़ाई पुरुष-पुरुष के बीच की कार्यवाही है । आज भी जब गाँवों में दो गुटों/ संयुक्त परिवार के सदस्यों के बीच छोटे-मोटे झगड़े होते हैं तो उनसे स्त्रियों को दूर रखा जाता है । उसे किसी भी तरह बीच में बोलने तक का अधिकार नहीं होता चाहे उसके बोलने आदि से झगड़ा तुरंत ही शांत क्यों न हो जाए । यदि उसके बोलने से तुरंत झगड़ा शांत भी हो गया तो भी पुरुष वर्ग शांत नहीं बैठते । उन्हें लगता है कि झगड़ा शांत कैसे हो गया ? उन्हें यह आभास होने लगता है कि उनकी ‘मर्दानगी’ को ठेस पहुँच गई । यह एक तरह से पितृसत्तात्मक मानसिकता की झलक दिखाती है ।

उक्त सभी स्थितियों में केवल स्त्री शरीर ही एक ऐसे ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में सामने आती है जो  प्रत्यक्ष तौर पर हिंसा का शिकार होती है लेकिन आम तौर पर घटना के बाद की स्थितियों में इस तरह के विश्लेषण और आंकड़े नहीं के बराबर प्रस्तुत किए जाते हैं बल्कि ऐसे तथ्यों को छिपाए जाने का भरसक प्रयास किया जाता है ।
संदर्भ-
• सिंह, कंवलजीत (२००८)  जीतेंद्र गुप्ता (अनु.), वैश्वीकरण, संवाद प्रकाशन, मेरठ.
• खेतान, प्रभा (२००४ )  बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली.
• जोशी, रामशरण (संपा.) (२०१०)  मीडिया और बाजारवाद, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली.
• चक्रवर्ती, उमा (२०११) विजय कुमार झा (अनु.), जाति समाज में पितृसत्ता, ग्रंथ शिल्पी प्रकाशन, नई दिल्ली.
• जान, ई. मेरी (२००८) अभय कुमार दुबे (अनु.), कामसूत्र से कामसूत्र तक,  वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली.
• जोशी, गोपा (२००६) भारत में स्त्री असमानता, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिली.
• पांडे, ज्ञानेंद्र एवं अमीम, शहीद (२००४) निम्नवर्गीय प्रसंग- भाग दो, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.

तस्वीरें गूगल से साभार 

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तुलसीराम की बेटी ने लिखा राधादेवी को खत , एक शोधार्थी पर उठाई उंगली



पिछले कुछ दिनों से लेखक, चिंतक दिवंगत तुलसीराम के बाल-विवाह, और उससे उनकी पत्नी के हक को लेकर सोशल मीडिया पर हंगामा बरपा है. उनकी बेटी अंगिरा चौधरी को भी कठघरे में खड़ा किया जा रहा है. कहा यह भी जा रहा है कि वे फोन नहीं उठा रही हैं. स्त्रीकाल ने उनसे संपर्क किया तो उन्होंने अपना पक्ष रखा और राधादेवी को एक खत लिखकर कथित षड्यंत्रकारियों से सावधान रहने का आग्रह करते हुए उन्हें मदद की पेशकश की. पढ़ें यह लंबा खत…

इन आठ दिनों में जब से फेसबुक और दूसरे खुले प्लेटफॉर्म पर मेरे परिवार के खिलाफ दुष्प्रचार चलाना शुरू हुआ है , एक दो मेरे बहुत करीबी लोगों को छोड़कर अपने-पराये किसी ने भी इस सन्दर्भ में मुझसे संपर्क नहीं किया है।  कल स्त्रीकाल की तरफ से पहली बार इसपर मुझसे चर्चा की गई है।  इसलिए जब सारी चीजें खुले में चलाई ही जा रही है , मैं राधा देवी को लिखी अपनी चिट्ठी स्त्रीकाल से शेयर कर रही हूँ।  अगर वो उचित समझें तो इसे सार्वजनिक कर सकते हैं। इस खुले पत्र के लिए मैं अपना संपर्क पता इसमें से हटा रही हूँ।

अंगिरा, राधादेवी और तुलसीराम



आदरणीय राधादेवी जी

ठीक दो साल पहले आपसे आजमगढ़ में आपसे पहली बार मुलाकात हुई थी।  आज फिर दो सालों के बाद आपको चिट्ठी लिख रही हूँ। मैं तो अपने पिता के याद में कराए जा रहे एक कार्यकर्म का हिस्सा होने इस उत्साह के साथ आजमगढ़ गई थी कि पहली बार 28 सालों में अपने पिता के पैतृक गांव देखूंगी लेकिन वहां जाकर तमाम चीजों के साथ साथ आपसे भी मुलाकात हुई। सब कुछ लगभग जस का तस था जैसा मेरे पिता ने उस जगह के बारे में दसियों बार बताया था सिवा आपके।  आपका तो जीवन में कभी उन्होंने कोई जिक्र ही नहीं किया था।  आपका अपना परिचय बताने पर मैं हतप्रभ सी आपके सामने खड़ी रही और आप मेरा हाथ पकड़ मुझसे बात करती रही।  उस किंकर्तव्यविमूढ़ता के बावजूद आपके आशीर्वाद के शब्द मुझे याद हैं।  “जा बेटी जहें रहिय, खुश रहिय” या ऐसे ही कुछ शब्द।  मैं एकदम नहीं कह सकती कि आपने मुझसे कोई कटु शब्द कहे।

फिर भी मेरी दुनिया बदल गई थी। जब तक आजमगढ़ रही, इस बारे में उसके बाद किसी से कोई भी बात नहीं हुई।  जैसे या तो कोई कुछ जानता ही न हो या कि सब लोग सब कुछ जानते हों। या तो सब हतप्रभ थे या किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें। मेरे साथ में कुछ जेएनयू के प्रोफेसरों और मेरे कुछ दोस्तों में धर्मवीर गगन भी थे।  वे भले कुछ न बोले हों लेकिन मेरे लिए ये दुनिया बदल गई थी।

वापस आने के बाद मेरी भी हिम्मत नहीं हुई कि मैं अपनी माँ को यह बता सकूँ कि आजमगढ़ में एक महिला मिलीं जो अपने आप को मेरे पापा की पत्नी कह रही थी।  दोनों तरफ एक महिला  थी जिसके बीच में मैं एक बेटी। खैर, अगले कुछ दिनों में मेरी माँ तक भी ये ख़बर पहुंच ही गई। मेरी मां पर क्या गुजरी होगी इसकी कल्पना आप भी कर ही सकती हैं।  इतने बड़ी बात को न बताने का अपराधी मान मेरी मां ने मेरे एकमात्र चाचा जिनका मेरे घर आना जाना था उनसे भी संबंध विच्छेद कर लिया।  फिर जीवन चलता रहा और इस बीच दो साल गुजर गए।  पिता के तरफ से सारे संबंध ख़त्म ही हो गए थे और माँ के तरफ से सारी मौसियां और मामा भी पिछले महीने तक गुजर गए।

इन दो सालों में भी आपकी तरफ से कोई संवाद नहीं हुआ और हमारी तरफ से किसी संवाद की कोई वजह नहीं थी।  लेकिन पिछले 6 दिनों से एक बार फिर मैं भौचक हतप्रभ आपको अपने सामने पा रही हूँ।  फ़ेसबुक नाम का एक तरीका है जिसमे लोग कम्प्यूटर के माध्यम से लोग दुनिया के सामने खुलेआम अपनी बात रखते हैं , वहां आपकी कही हुई बातों का वीडियो बनाकर आपके लिए न्याय माँगा जा रहा है।  ये वीडियो तो 24 नवम्बर 2017 को ही कंप्यूटर पर यूट्यूब नाम की जगह पर आ गया था लेकिन आपके न्याय के लिए ठीक मेरे पापा की बरसी वाले दिन 13 फ़रवरी को ही चुना गया।  जीतेन्द्र विसारिया जिनका कहना है कि असल में वो राधादेवी के न्याय के लिए मुहीम चला रहे हैं , उन्होंने आपके न्याय के लिए 13 फ़रवरी आने का इंतज़ार किया या फिर एक और इत्तेफ़ाक़ ये है कि 13 फ़रवरी के दिन धर्मवीर गगन जिन्होंने पापा के ऊपर तुलसी राम विशेषांक निकाला और दो साल पहले मेरे साथ आपसे मिले थे, जीतेन्द्र विसारिया के साथ दीखते हैं।  तुलसी राम विशेषांक की वजह से धर्मवीर गगन तो हमारे बहुत करीबी थे, पचासो बार उसके सन्दर्भ में हमारे घर आये हैं , अपने जीवन की हर एक तस्वीर उनको दिखाई जिसमे से वो अपनी पत्रिका के लिए छांट सकें।  पापा से मिलने और उनके इंटरव्यू के लिए न जाने कितनी बार वो हॉस्पिटल भी आए, यहाँ तक कि जब मैं पहली बार आजमगढ़ आई तो वो मेरे साथ आये थे। खुद मेरी मां ने कइयों को उनकी पत्रिका में लिखने और कुछ आर्थिक मदद देने के लिए कहा था।  बस एक बार ही ऐसा हुआ कि उन्होंने हॉस्पिटल में आखिरी दिनों में बेड पर जर्जर स्थिति में लेटे पापा के बगल मुझे जबरदस्ती खड़ा करके फोटो लेने की बात कही थी तो मैं झल्ला पड़ी थी , लेकिन उसके बाद भी उन्होंने वैसी फोटो ली ही थी जो आज उनके विशेषांक में लगी हुई है।

जीतेन्द्र विसारिया को मैं निजी रूप से नहीं जानती लेकिन फेसबुक के माध्यम से मुझसे जुड़े हैं। पापा की वजह से कई लोगों से जुड़ी हूँ इस वजह से सबके लिखी बातें नहीं देख पाती, लेकिन राधा देवी को न्याय दिलाने की मुहीम में उन्हें प्रभा चौधरी और अंगिरा चौधरी के बारे में झूठ कहते यह शर्म नहीं आई कि हम दोनों का फ़ोन नेटवर्क से बाहर बता रहा है और सपर्क करने में वो असमर्थ हैं जैसे हमने अपना मोबाइल बंद कर कहीं छिप गए हों। जबकि सच है कि मैं लगातार इन दिनों अपने पढाई और अपने दोस्तों की वजह से सार्वजनिक स्थानों पर पायी गई हूँ जो मेरे फेसबुक पर भी देखा जा सकता है । मेरे पास ये सुविधा ही नहीं है कि मेरी माँ मौजूदा हालत में  घर में अकेली रहें और मैं घर के बाहर अपना मोबाइल बंद कर सकूँ। मोबाइल में एक व्यवस्था होती है कि अगर कभी किसी हालत में फोन न लगे तो आपको मिस्ड कॉल की जानकारी के साथ मैसेज आता है। मुझे आज तक एक भी ऐसा मैसेज नहीं मिला है। हालाँकि विसारिया मुझे मैसेज भेज ही सकते थे बजाय इसके कि हम माँ बेटी की ईमानदारी पर झूठे सवाल उठाने वाले पोस्ट में मुझे टैग करेंगे तो मुझे कम से कम उनकी ईमानदारी का एहसास हो ही जायेगा। मैंने चुपचाप वहां से अपने को अलग करना ही बेहतर समझा।

लेकिन अगर ये लोग पूरी दुनिया को यह कहते रहें कि प्रभा चौधरी और अंगिरा चौधरी ने राधा देवी का हक़ मार रखा है, बिना हमसे संपर्क करने की कोशिश किये हमें भगोड़ा भी साबित करेंगे और मेरे कई दोस्तों को भी चुपके से मेसेज में वीडियो भेजेंगे तो ये राधा देवी के न्याय को लेकर कितने ईमानदार हैं वो समझ सकती हूँ। दुआ करुँगी कि कम से कम अंगिरा चौधरी और प्रभा चौधरी को ऐसे न्याय के ठेकेदारों की जरूरत न पड़े।  जिस विडिओ को धर्मवीर गगन सभी को चुपके से मेसेज में भेज रहे हैं , उसमे विसारिया लिखते हैं कि ” प्रोफ़ेसर बनने के उपरांत तुलसीरामजी ने राधादेवी को बिना तलाक दिए अपने से उच्चजाति की शिक्षित युवती से विवाह कर लिया” क्या धर्मवीर गगन को  नहीं पता कि वह युवती और मेरी मां उच्चजाति की नहीं हैं।  सभी दलित पुरुष थोड़ा विकास करते ही अपनी जाति से नफ़रत करने लगते हैं वाला जातीय तर्क साबित करके किसके लिए न्याय ढूंढ़ने निकले हैं गगन! क्या धर्मवीर गगन को नहीं पता है कि तुलसी राम के मरणोपरांत प्रभा चौधरी को कोई भी पेंशन नहीं मिलती है।  क्या धर्मवीर गगन को नहीं पता है कि राजकमल वालों की तरफ से साल में कितनी रॉयल्टी मिलती है ? क्या धर्मवीर गगन ये भी भूल गए कि घर में आमदनी का मासिक जरिया केवल मेरा स्कालरशिप है।

अगर ऐसा है तो आज दुःख है मुझे कि मरते वक़्त मेरे पापा ने गगन को अच्छा स्टूडेंट मान भरोसा किया था।  वो साल भर जुड़े रहकर एक तुलसी राम विशेषांक निकालते हैं , उसके एक साल तक फिर पच्चीसों बार उस पत्रिका का विमोचन करवाने के सिलसिले में आप हमारे घर से जुड़े रहते हैं और उनको घर की बेसिक सी बात पता नहीं चलती  या फिर उन्हें इसमें मजा आ रहा है कि दो महिलाएं कैसे किसी पुरुष के अभाव में घर चला रही हैं उसकी छीछालेदर हो। कितना आसान है झूठ कह देना कि हमारा फोन नेटवर्क से बाहर है या हमने अपना मोबाइल बंद कर रखा है या कभी कि हम इनका फोन उठा ही नहीं रहे।  जबकि अगर ये तनिक भी ईमानदार होते, हमसे व्यक्तिगत तौर पर मिलते , या फोन करते , नहीं उठाने की अवस्था में मैसेज करते , मैसेज का जवाब नहीं मिलने पर ईमेल करते , फिर उस ईमेल का जवाब भी नहीं मिलने पर उस ईमेल को सार्वजनिक करते।  लेकिन मैं पूरी ईमानदारी के साथ कह रही हूँ कि इन्होने  कुछ नहीं किया बल्कि जवाब न देने और फोन बंद करने का बेबुनियाद आरोप लगाकर हम माँ बेटी का भी चरित्र हनन किया है।  प्रोफ़ेसर तुलसीराम के ऊपर कीचड उछालने और उनके समाज के लिए दिए साहित्यिक योगदान को कमतर साबित करने की कोशिश की है।

अभी दौर है।  लोग कहीं का दीखते दीखते कहीं का हो ले रहे हैं। 52 सालों के बाद जब कोई कहने वाला ही नहीं रहा कि 52 साल पहले क्या हुआ, धर्मवीर गगन और उनके मित्र आपको न्याय दिलाने निकले हैं तो जिसे भी अन्यायी साबित करना हो कर लें।  अंगिरा चौधरी भी अन्यायी हैं और प्रभा चौधरी भी।  तुलसी राम को साबित करना तो सबसे जरूरी है।  इससे आपको न्याय मिले न मिले लेकिन शायद इनको नौकरियां मिल जाए।  आज के दौर में ऐसे भी हम दलितों पिछड़ों को नौकरियां मिलनी कठिन हो गई हैं।  सुन रही थी कि मुर्दहिया और मणिकर्णिका को कॉलेज की किताबों में शामिल करने की बात चल रही थी, ऐसे में उम्मीद है कि इन्हे जल्दी ही नौकरी मिल जाएगी और फिर कभी किसी और का विशेषांक निकालने की नौबत नहीं आएगी।

खैर, अब बात कह दी ही गई है कि मेरी मां और मैं अपने पिता द्वारा छोड़ी अकूत सम्पति पर जो सिर्फ आपका हक़ है पर जबरदस्ती गैरकानूनी ढंग से कब्ज़ा जमाए बैठे हैं, तो बता ही दूँ कि मेरे पिता के मरने के बाद रिटायरमेंट के पैसे से हम दोनों के रहने के लिए छत की व्यवस्था हो सके। लेकिन आत्मविश्वास और ईमानदारी इतनी दी है कि बिना बिके और बेईमान हुए जीवन जी सकूँ।  मेरे लिए यही उनकी विरासत है।  आज भी मुझे गर्व है कि मेरे पिता ने कभी मुझसे झूठ नहीं कहा।  बेटी तो केवल मैं ही हूँ जिसके जन्म से लेकर उनके मरने तक वे हमेशा साथ रहे और यह तथ्य अब तक तो अविवादित है। मुर्दहिया और मणिकर्णिका की कितनी ही बातें उन्होंने मुझसे ढेरों बार बताई थी।  जो नहीं बताई वो उन्होंने नहीं लिखा।  क्या वजह रही ये वही बेहतर बता सकते थे लेकिन सामाजिक शास्त्र के लोग इसके मतलब निकाल ही सकते हैं।  आज आपके वीडियो के बाद और जीतेन्द्र विसारिया की फेसबुक वाले कम्प्यूटर को देखकर अपने पिता के जीवन का महत्वपूर्ण घटनाक्रम बनाती हूँ तो समझ आता है कि

65 साल की उम्र में मेरे पिता 2014 में रिटायर होते हैं।

1949 के लगभग में मेरे पिता का जन्म होता है।

01 जुलाई 1964 को पंद्रह साल की उम्र में मेरे पिता ने गांव हमेशा के लिए छोड़ दिया. खुद मुर्दहिया में मेरे पिता ने ये लिखा है।  मैं उनके कहे को झूठ नहीं मान सकती वैसे ही जैसे मैं आपके कहे को नकार नहीं रही। मेरे पापा ने खुद कहीं किसी से कहा है कि घर छोड़ने पर भी मेरे दादा मौरी विधि द्वारा आपका गौना कराकर लाते हैं। खुद इस विडिओ में आपका कहा सुना जा सकता है कि जब साथे रहबे नहीं किये तो बच्चा कैसे होता।

17 (मध्य अप्रेल 1966) की उम्र में वो आजमगढ़ बारहवीं पास करते हैं और घर हमेशा के लिए छोड़ देते हैं।

21 जनवरी 1976 को पापा बनारस हमेशा के लिए छोड़ दिल्ली आ जाते हैं।

21 मार्च 1988 को मेरे पिता की प्रभा चौधरी यानि कि मेरी माँ से शादी होती है जिसके बाद मेरा जन्म होता है।

05 दिसंबर 2008 में उनकी दोनों किडनियां फेल हो जाती हैं और तब से नियमित रूप से डायलिसिस शुरू हो जाता है. इसकी जानकारी वहां गांव में पापा के भाई को भी रहती है।

अक्टूबर 2010 में पापा के मरने की अफवाह फैलती है।  दलितों की एक साहित्यिक सभा में उनको श्रद्धांजलि भी दे दी जाती है। अंततः लम्बे समय की बिमारी के बाद 13 फ़रवरी 2015 को मेरे पिता की मृत्यु होती है।

13 फ़रवरी 2016 को आपसे मुलाकात होती है जहाँ मुझे आपका परिचय पता चलता है जो दो चार दिनों के बाद माँ को भी पता लगता है।

13 फ़रवरी 2018 को एकाएक एक वीडियो के माध्यम से सबको बताया जाता है कि “बतौर हक़ या मानवीय आधार पर ही सही आधा अंश या कुछ राशि, गुज़ारा भत्ता के रूप में प्रभा चौधरी की ओर से राधादेवीजी को अवश्य पहुँचानी चाहिए, जिससे वे जीवन रहते परवश और भुखमरी की शिकार न हों!! दिल्ली स्थित बुद्धिजीवी साथी और प्रोफ़ेसर तुलसीरामजी की पुत्री कॉमरेड Angira को भी इस हेतु आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए। …आदरणीय राधादेवी भयंकर गरीबी और भुखमरी की शिकार हैं!”

जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि आपके न्याय के पुरोधाओं ने सबको ये बात बताई लेकिन जब तक मुझे पता चलती , तब तक बात मेरी माँ को आपके हक़ मारने वालों के रूप में स्थापित करने की कोशिश शुरू हो जाती है।  जो औरत लगातार 30 साल तक मेरे पापा के साथ रहती है , हर सुख दुःख में साथ रहती है वो एकाएक “दूसरी औरत” बना दी जाती है। कितने न्यायप्रिय लोग हैं कि दो पूर्णतः व्यस्क प्रबुद्ध लोगों की साथ जीने के सचेत निर्णय को एक अबोध बच्चों की शादी से एक पल में धराशायी कर दे रहे हैं। उनके जीवन भर के संघर्ष को एक पल में इसलिए ख़ारिज कर दिया जाय कि उन्होंने समाज के बकवास नियमों से विद्रोह करने का निर्णय लिया! लोगों को आज लिगालिटी-इलिगालिटी दिख रहा है वो भी आज 2018 की नज़रों से।  क्या वो भूल रहे हैं कि 1965-1970 तो क्या मोटा मोटी मानिये तो 1991 के पहले क्या सरकारी क़ानून इतना मजबूत था कि सरकार और समाज के बीच के अन्तर्सम्बन्ध आज जैसे थे?  सामाजिक नियम ही सर्वोपरि थे।  मेरे पापा के समाज में तो पुनर्विवाह का भी प्रचलन था। आपके अनुसार दो साल की उम्र में हुयी शादी को उन्होंने नहीं माना।  एक बार छोड़ दिया तो कभी पीछे मुड़ के भी नहीं देखे।  इस सन्दर्भ में भी उन्होंने कुछ नहीं लिखा तो शायद इधर मेरी माँ और मैं थी तो दूसरी तरफ आपकी निजता की चिंता भी हो ही सकती है।  वो क्यों लिखते! आजमगढ़ छोड़ने के बाद 47 साल वो जीवित रहे। जो एक आरोप लग रहा है कि “बड़ा आदमी ” बनने के बाद वो बदल गए तो आजमगढ़ छोड़ने से लेकर उनके “बड़ा आदमी” बनने में 22 साल का समय है। उन 22  सालों के बाद भी 27 -28 साल के करीब तो केवल हम उनके साथ थे।  मैं बिलकुल समझ सकती हूँ कि इस समाज में खासकर हमारे समाज में महिलाओं की जो स्थिति है शायद आप पापा को अकेले नहीं ढूंढ पातीं।  लेकिन आपके तो 5 भाई थे। विसारिया जी की ही बातों से पता चलता है कि ऐसी स्थिति तो थी ही कि भाई आपकी मदद करते।  उनके लिए तो ढूँढना मुश्किल न था अगर उन्हें नहीं पता रहा होगा तो।  धर्मवीर गगन जैसे समाजसेवकों की भी कभी कमी नहीं रही समाज में जो आपको खबर देता अगर आपने कोशिश की होती।  बचपन से ही मैंने घर में आजमगढ़ से कइयों को कभी किसी काम के लिए तो कभी ऐसे ही मिलने के लिए आते देखा है। लेकिन आप कभी नहीं आयीं। न ही आपके तरफ से कोई आया।  मुझे भी तभी पता लगा जब मैं वहां गयी।  अभी भी आपने किसी को हमें कोई खबर पहुंचाने नहीं कहा बल्कि जब कोई समाजसेवी आपके पास पहुंच रहा है तो आप उससे अपनी बात कह रही हैं जिसका कि वीडियो बनाकर लोग समाजसेवा कर रहे हैं। वजह सोचने की मैंने भी बहुत कोशिस की है।  हो सकता है कि आपका आत्मसम्मान आपको पापा से दूर करता हो।  लेकिन एक तरफ आपका आत्मसम्मान आप पर इतना हावी हो कि मेरे पापा मरते रहे लेकिन आप एक बार भी नहीं आयीं और दूसरी तरफ आज उनके मरने के बाद लोग आपके लिए बतौर हक़ और मानवीय आधार की बात करते करते मुझे और मेरी माँ को पलक झपकते मेरे पापा की जिंदगी में ग़ैरकानूनी करार दिए जा रहे हैं।  अगर क़ानून ऐसा है तो ऐसे क़ानून को मैं तो नहीं मानती।  मैं तुलसी राम की बेटी हूँ और प्रभा चौधरी मेरी माँ हैं।  यही अंतिम सच है।  मेरा बाप एक दिन में नहीं मरा, 8 साल तो हमारे हर तीसरे दिन हॉस्पिटल में डायलिसिस करवाते ही गुजरे हैं अगर बाकी दिनों को छोड़ भी दिया जाय तो।  उस समय मेरे बाप के पास जो महिला थी वो गंभीर आर्थराइटिस के बावजूद उनके साथ हॉस्पिटल आती जाती थी तो वो मेरी माँ प्रभा चौधरी थी। मेरे बाप की दवाइयों से लेकर खाने तक का हिसाब जिस महिला ने रखा वो प्रभा चौधरी थी।  कितना बताऊँ , सोचियेगा कभी।  शादी के पहले का तो कोई गवाह नहीं हमारे पास, लेकिन पिछले तीस सालों में अगर मेरे बाप ने एक पन्ने की रद्दी भी तैयार की तो उसके उत्पादन में प्रभा चौधरी का श्रम भी शामिल है।  और अगर इन तीस सालों में आप एक बार भी उनके रहते आयी होतीं तो आज मैं इतना व्यथित नहीं होती।  आप राधादेवी जो समाज की सतायी हुयी हैं हो सकती हैं लेकिन आप मेरी माँ नहीं हो सकतीं।  मैं कैसे मान लूँ कि जिस महिला के लिए मेरा मरता हुआ बाप भी कुछ न था आज वो एकाएक मेरी रिश्तेदार हो जाय।

समाज का सताए हुए तो मेरे पापा भी हैं। आज राधादेवी और प्रभा चौधरी में भले एक फर्जी विवाद हो लेकिन जैसा पहले भी मैंने कहा कि अंगिरा चौधरी निर्विवाद है जब तक कम से कम कोई और समाजसेवी आगे न आए। अपनी उम्र के साथ मेरा दावा है कि मुझसे ज्यादा तो इस दुनिया में किसी इंसान को तो प्रेम नहीं ही किया होगा।  लेकिन उस इंसान की मजबूरी को समझिये कि वो मुझसे भी ये बात नहीं कह पाए।  आज सोचती हूँ कि आखिरी दिनों में हॉस्पिटल के बेड पर लेटे वो क्या सोचते होंगे।  इस दुनिया की समझदारी तो उन्हें रही ही होगी कि आज न कल ये बात मुझे पता चलेगी। लेकिन जब तक हो सका तब तक उन्होंने छिपाकर रखा।  एक विद्रोह भी है जिसको छिपाने का संघर्ष भी है।  हमारी भलाई, उनकी अपनी भलाई या फिर शायद आपकी भलाई। जिस महिला से उन्होंने 50 साल के लगभग से  कोई संबंध न रहा हो, और वह महिला भी उनके सामने दोबारा नहीं आई हो उसको अपने संस्मरण में ज़िक्र करते भी तो क्या करते। जो भी हो लेकिन इस समाज ने उनसे उनका आजमगढ़ छीन लिया।  और उसी समाज की साजिश है कि जिसने उनसे उनका अतीत छीन लिया आज वर्त्तमान और भविष्य भी छीनने की कोशिश में हैं।

तुलसीराम एक कार्यक्रम में बोलते हुए

लेकिन चाहे जैसे भी हो, उनका अतीत आज हमारे सामने है।  समाज ने आपके साथ अन्याय कर  असल में जो मेरे पिता के पूरे ही अतीत को एक रंग से रंगने की कोशिश की है उसे मैं समझ सकती हूँ।  आपके साथ न्याय होना असल में मेरे पिता के साथ न्याय होना भी होता। लेकिन ये तब नहीं हो सका और एक ख़ास मानवीय संवेदना के तहत ही सही लेकिन मुझे ऐसा  तो लगता ही है कि आज आप वक़्त के ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ हर किसी को किसी न किसी की जरूरत तो होती है। पर दूसरी संवेदनाएं भी हैं।  मैं तुलसी राम की बेटी के साथ साथ प्रभा चौधरी की भी बेटी हूँ।  मेरी जिम्मेवारियां मेरी मां प्रभा चौधरी के साथ भी हैं लेकिन फिर भी मुझसे जितना बन पाएगा आपके जीवन-यापन के लिए करने की कोशिश कर ही सकती हूँ। इस समाज में तो हक़ पत्नी और बेटी दोनों को ही है।  आपके पत्नी के हक़ वाले मामले में नैतिक रूप से तो मुझे इतना ही समझ आता है जो मैं बिलकुल करना चाहूंगी और विधिक रूप से तय करने की क्षमता न तो मुझमे है न ही ये उतना सरल है।  लेकिन हाँ , एक बेटी के रूप में मैं अपना और आपका दोनों का हक़ समझती हूँ।  जैसा कि आपने वीडियो में बताया कि 1965 आपके पिता ने भाइयों को 150 रूपये बैल खरीदने के लिए दिए थे।  जो निश्चित ही उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी राशि है।  और जोड़ी बैल रखने वाले किसानों की स्थिति से समझ आता ही है आपके पिता की हालत सुदृढ़ थी।  मैं बिलकुल चाहूंगी कि आप और आपके लिए न्याय मांगने वाले लोग एकतरफा हक़ की लड़ाई न लड़ें और पिता से भी न्याय की मांग करें। आपका अपने पिता की भी संपत्ति में आपका हक़ है जिसे आपके भाइयों ने दबा रखा है। मायका और ससुराल के बीच झूलने की बात पर इतना तो कह ही सकती हूँ कि मायका तो आपका अपना है।  वहां के आपके निर्विवादित अधिकार हैं। अगर आपके लिए न्याय मांगने वाले लोग आपकी इस लड़ाई में आपका साथ न दें तो समझ लीजिये कि ये बहुत ही षड्यंत्रकारी किस्म के इंसान हैं जो महज अपने फायदे के लिए शोर कर रहे हैं।  पिता पर हक़ के मामले में मैं तो खुद खड़ा होने को तैयार ही हूँ।  वादा करती हूँ कि आप और हम दोनों जब अपने अपने पिता पर हक़ की लड़ाई के लिए खड़ी होंगे, आप मुझे अपने साथ पाएंगी। मैं आपको अपने घर का पता और अपना मोबाइल नंबर भेज रही हूँ। कभी कोई जरूरत हो तो आप सीधे मुझसे संपर्क कीजिये।  तुलसी राम और प्रभा चौधरी की बेटी होने के नाते मुझसे जितना बन सकेगा वो मैं जरूर करुँगी.

एक वादा आपसे और करती हूँ। महिला होने के नाते जो समाज ने आपके साथ किया वो मैं अपने साथ तो नहीं ही होने दूंगी।  आज मेरे घर में कोई पुरुष नहीं है।  नजदीकी रिश्तेदारों में भी नहीं।  लेकिन जो मंसूबे लोगों ने बनाये हैं उसमे सफ़ल नहीं होंगे।  मैं तुलसी राम के विरासत को चंद षड्यंत्रकारी लोगों के हाथों नीलाम नहीं होने दूंगी।  अगर मूर्खता मेरे पिता की विरासत थी तो मेरी विरासत में तो मुझे संघर्ष मिले हैं।

अंगिरा चौधरी 

तस्वीरें गूगल, फेसबुक  से साभार 

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समानांतर इतिहास और अन्य कवितायें (नीरा परमार की)

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नीरा परमार

 कविता, कहानी और शोध -आलोचना के क्षेत्र में योगदान. एक कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित . संपर्क : parmarn08@gmail.com

तब बाबूजी बूढ़े होने लगते हैं !

तब
बाबूजी बूढ़े होने लगते हैं –
जब
दरवाजे की ओट से
कानों से टकराने लगती हैं
जीवन भर की
जमा-जथा की
हिसाब करती
फुसफुसाहटें !
जब बेटे-बहुओं की
हिसाबी उँगलियाँ  जोड़ने लगती हैं
बची-खुची बीती उमर के साथ
गाँव में छूटे
पुरखों के खेत, बगीचे,
घर-आँगन की भूली हुई गिनती !
तब
बाबूजी के झुक जाते हैं कंधे
सूनी आँखें
मृत्यु-लोक की राह खोजती
आकाश को तकने लगती हैं
जब
लाचार
जीवन-संगिनी को
बूढ़े हाथों से झाडू थामे
आँगन बुहारते
देखते भर रहते हैं !

समानान्तर इतिहास

इतिहास
राजपथ का होता है
पगडंडियों का नहीं!
सभ्यताएँ / बनती हैं इतिहास
और सभ्य / इतिहास पुरुष !
समय उस बेनाम
क़दमों का क़ायल नहीं
जो अनजान
दर्रों जंगलों कछारों पर
पगडंडियों की आदिम लिपि —
रचते हैं
ये कीचड़-सने कंकड़-पत्थर से लहूलुहान
बोझिल थके क़दम
अन्त तक क़दम ही रहते हैं
उन अग्रगामी पूजित चरणों के समान
किसी राजपथ को
सुशोभित नहीं कर पाते

शताब्दियाँ —
पगडंडियों से
पगडंडियों का सफ़र तय करते
भीड़ में खो जाने वाले / ये अनगिनत क़दम
किसी मंज़िल तक नहीं जाते
लौट आते हैं
बरसों से ठहरी हुई उन्हीं
अँधेरी गलियों में
जो गलियाँ —
रद्दी बटोरते छीना-छपटी करते कंकालों
कचरों के अम्बारों
झुग्गी-झोपड़ियों के झुके छप्परों से निकलते
सूअरों-मुर्गियों के झुंड में से
होकर गुज़रती है !

रौशन सच

कभी हमारे
करोड़ों करोड़ नन्हे हाथों ने
छुआ था उजाले को !

हमें खबर भी नहीं हुई –
कब किसी ढाबे
किसी ठेले
किसी गलियाती मालकिन की
रसोई में
जूठन धोते–धोते
उम्र के संग वह रौशन सच
मटमैला पड़ गया

कभी ताजा छीले भुट्टे–सी सुगंध बन
जगमगाहट आती थी सपने में
किस्सा था, बीत गया –

अब तो
साँचों में मोम ढालते
बीड़ियाँ लपटते
चूड़ियाँ बनाते
छप्पर के
किसी कोने में
सूरज को खोंस दिया है

 बाल मजदूर

बरसों से –
बोझा ढोती पीठ
क्या तू भी कभी
किताबों का बस्ता
उठाएगी ?

फूटे करम से
गिट्टी-पत्थर कूटते हाथ
क्या तुम भी कभी
कापी-किताब थामोगे ?

भूखमरी की आग से
झुलसी उंगलियाँ
कभी क्या तुम भी
कलम को
सूरज की दवात में डुबो
किसी दिन को
अपने नाम दस्तखत करोगी ?

अन्तहीन पगडंडियाँ 

जंगल-नदी
झाड़ी-झाँखर से गुजरती
सदियों सी लम्बी
अन्तहीन,
दुर्गम पगडंडियों पर
चलते चले जा रहे थके क़दम !

माथे पर
पहाड़ सा बोझा ढोते
काले सूरज सा काला नसीब लिए
नंगे-भूखे
पशुओं से बदतर
जलालत झेलते
ये मानव
ठिठके भकुआए से तकते
दूर दीखते चौड़े-चिकने पथ पर
फर्राटे से उड़,
अदृश्य होते
उत्तेजक संगीत के शोर में डूबे
वाहनों के काफलों को

प्रतिरोध

तुम्हारे माथे पर / यह
भारी डगमगाती विष्ठा की बाल्टी नहीं
तुम्हारी हैसियत है
जो सदियों से
मनुष्य को समाज ने
अपने और तुममें —
अन्तर याद दिलाने के लिए रखा है

उनके लिए
यही है तुम्हारा वजूद जो तुम्हें अपने और —
इस विष्ठा-सने झाड़ू
अस्पृश्य बाल्टी / भिनकती मक्खी में
कोई फ़र्क़ महसूस करने नहीं देता
उन सबके लिए
क्या यह कम राहत नहीं
कि तुम
पीढ़ियों से उनके और
उनके पिताओं-दादाओं-परदादाओं के लिए
बिना व्यवधान प्रतिरोध के
रोज़ तड़के आती रही हो
बिना सवाल किये
जुगुप्सित बाल्टी कसकर हाथों से भींचे
उस नरक की ओर
बेझिझक बढ़ जाती रही हो
जिसके छुआ जाने भर से
चमड़ी जूठी पड़ जाती है
माथे पर तुम्हारे जब तक यह सनद है
तब तक उनकी व्यवस्था को राहत है कि
तुम्हें किसी
नाम-पहचान-अधिकार की
परवाह न होगी !
याद रखो माथे पर जब तक
यह भरी डगमगाती विष्ठा की बाल्टी है
तुम्हें अपने और इस विष्ठा-सने झाड़ू —
अस्पृश्य बाल्टी, भिनकती मक्खी में
कोई फ़र्क़ महसूस नहीं होगा !

 अन्तर्सजा

बहुत देख लिया
नून-तेल आटा-दाल
बटलोई-कड़छुलवाली
रसोईघर की खिड़की से
बादल का छूटता
कोना
यह सोफा कुर्सियां मेज पलंग फूलदान
उधर धर दो

कैलेण्डर में सुबह-शाम बंधे
गलियारे में पूरब-पश्चिम कैद
उस कोने में वह स्नान कोठरी
घिरा बरामदा इधर हटाकर

तारों का कद छूती
पहाड़ों की ये चोटियां
इस खिड़की पर गिरते
झरने की धारा
यहां टिका दो !

चन्द्र ज्योत्स्ना पीकर उफनाया
समुद्र टंगेगा
हवाओं में धुलती बदलती ऋतुएं
जंगलों की बनघास की सुगन्ध
आकाशगंगा में नहाए
ग्रह-उपग्रह नक्षत्र निहारिकाएं
करवट बदलने को करतीं विवश

ये से इस तरह रख दो
इस आले और उस तख्ते पर
बीच दहलीज़
पश्चिम के दरवाजे़ और पूरब के चौरे पर
तुम्हारी व्यवस्था में
अपनी धरती पर बिछाना है मुझे
उत्तरी ध्रुव तक फैला
नीले झूमर-सा झिलमिलाता
… आकाश… !


तस्वीरें गूगल से साभार 

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‘राष्ट्रवादी’ इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल: एक स्त्रीवादी अवलोकन

रतन लाल

 एसोसिएट प्रोफेसर हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, ‘रोहित के बहाने’ सहित 5 किताबें प्रकाशित.संपर्क : 9818426159

राष्ट्रवादी आंदोलन और राष्ट्रवादी इतिहास लेखन के दौर में भारत में जब भी स्त्रियों पर चर्चा होती है, अमूमन दो बातें प्रमुखता से रखी जाती हैं: पहली, प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति अच्छी थी, वे घर की ‘मालकिन’ थीं. उन्हें अर्द्धांगिनी, गृहलक्ष्मी और धर्मपत्नी के रूप में सम्मान प्राप्त था. दूसरी, विदेशी आक्रमण, विशेष रूप से आठवीं सदी में मुसलमानों के आगमन के बाद महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन आया, वे घर में कैद होने लगीं और धीरे-धीरे पुरुषों पर निर्भर हो गईं. उस दौर में और अब भी ऐसे ‘विद्वान’, राजनेता और सामाजिक संगठन हैं, जो प्राचीन काल में महिलाओं की स्थिति की पुनरावृति करना चाहते हैं. स्त्रियों के सम्बन्ध में ऐसे विचार यथा-स्थितिवादी होने के साथ-साथ इतिहास का अति-सरलीकरण भी करते है.

महिलाओं की स्थिति पर चर्चा 19 वीं सदी में अर्थात् औपनिवेशिक काल में शुरू हुई. अँगरेज़ शासकों का मानना था कि वे भारतीयों के हित में ही काम कर रहे हैं और उनका लक्ष्य भारतीयों को ‘सभ्य’ बनाना और अंततः बाल विवाह और सती प्रथा जैसे सामाजिक कुरीतियों को ख़त्म करना है. इस तरह महिलाओं की स्थिति को सभ्यता के इंडेक्स की तरह समझा जाने लगा.

इतिहास की इस औपनिवेशिक समझ की भारतीय प्रतिक्रिया अलग-अलग थी, परन्तु यह मुख्य रूप से दो बिन्दुओं पर केन्द्रित थी – एक राममोहन राय, विद्यासागर जैसे समाज-सुधारकों द्वारा सुधार आन्दोलन के रूप में और दूसरे या तो महिलाओं की स्थिति को न्यायसंगत ठहराना या महिलाओं की ख़राब अवस्था से इंकार करना. इस तरह से अतीत पर सेलेक्टिव अप्रोच पर बल दिया गया.
काशी प्रसाद जायसवाल (1881-1837) बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के बहुयायामी विद्वान थे, जिन्होंने अपने लेखन में अद्भूत बौद्धिक कौशल का परिचय दिया है. जायसवाल का जीवन एक विविध-वांग्मय की तरह रहा, कई घटनाओं से परिपूर्ण – पढ़ाई से व्यवसाय, व्यवसाय से पढ़ाई, मिर्ज़ापुर सेलन्दन, लन्दन से पटना वाया कलकत्ता. जायसवाल सिर्फ 56 वर्ष ही जीवित रहे और मुश्किलसे25 वर्ष गंभीर शोध और लेखन कर पाए. पेशे से तो वे सफल वकील थे, लेकिन बाद के इतिहासकारों ने उनपर ‘राष्ट्रवादी’ इतिहासकार का लेबल चस्पाँ किया, हालाँकि अपने लेखन में उन्होंने ऐसा कोई दावा नहीं किया. उनकी लेखनी की व्यापकता को देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि कौन-सा जायसवाल पहले है – इतिहासकार, साहित्यकार, मुद्राशास्त्री, पुरातत्त्वविद, भाषाविद, वकील या पत्रकार. जायसवाल बहु-भाषी विद्वान थे और कई भाषाओं – संस्कृत, हिंदी, इंग्लिश, चीनी, फ़्रांसीसी, जर्मन और संभवतः बंगाली जानते थे. लेकिन अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार वे दो भाषाओं मेंही लिखते थे – हिंदी और अंग्रेज़ी.  अंग्रेज़ी बाह्य जगत के पाठकों और व्यावसायिक इतिहासकारों के लिए तथा हिंदी स्थानीय पाठक और साहित्यकारों के लिए.

अपने जीवन काल में जायसवाल ने हिंदी प्रदीप, सरस्वती, नागरी प्रचारिणी पत्रिका जैसी लब्ध-प्रतिष्ठ पत्रिकाओं में दर्ज़नों लेख लिखे. 1905 में मिर्ज़ापुर से प्रकाशित हिंदी मासिक पत्रिका कलवार गज़ट और 1914 में पटना से प्रकाशित हिंदी साप्ताहिक पाटलिपुत्र और बिहार ऐन्ड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी से प्रकाशित होने वाले जर्नल ऑफ़ द बिहार एंड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी का आजीवन संपादन भी किया. लेकिन उनका मौलिक कार्य इतिहास लेखन के क्षेत्र में रहा – उन्होंने दर्ज़नों मौलिक पुस्तकें लिखीं और सम्पादित कीं और तक़रीबन दो सौ मौलिक शोध पत्र प्रकाशित किए. इसके अलावा पटना म्यूज़ियम, बिहार ऐन्ड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी और पटना यूनिवर्सिटी में विभिन्न रूपों में अपना योगदान भी दिया.1

यह लेख अकादमिक, व्यवसायिक, निजी, और पत्रकारी जीवन में महिला प्रश्न पर जायसवाल के विचारों की पड़ताल करने का एक छोटा-सा प्रयास है.

आरंभिक दिनों से ही स्त्री-प्रश्न पर जायसवाल के विचार उभरने लगे थे. 1906 में इंग्लैंड जाने से पूर्व जायसवाल ने अपने स्वजातीय संगठन ‘कलवार सभा’ में काम किया.इस संगठन की स्थापना जायसवाल के पिता साहू महादेव प्रसाद ने की थी और इसका उद्देश्य सामाजिक सुधार करना था. इस समय तक कलवार जाति व्यवसायिक रूप से एक बड़े समूह के रूप में उभर रही थी और अन्य समुदायों की तरह अपने समुदाय को आधुनिक बनाने का प्रयत्न कर रही थी. कलवार सभा के झंडे तले जायसवाल ने व्यसन और बाल-विवाह, दहेज़ जैसी सामाजिक बुराइयों का विरोध किया और विधवा विवाह की वकालत की. इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त करने (1906-10) के बाद वे भारत लौटे और पहले कलकत्ता और फिर पटना में बसे. जायसवाल के जीवन-काल में स्त्री-प्रश्न पर उनके विचारों में परिवर्तन को रेखांकित किया जा सकता है.

जायसवाल के ‘अनुज’ और मित्र राहुल संकृत्यायन ने अपने संस्मरण में लिखा है, “उस समय जायसवाल जी अपने बड़े लडके के लिए परेशानी में थे. चेतसिंह की शादी हो चुकी थी, वे बैरिस्टरी पढ़ने इंग्लैंड गए. पहिली पत्नी में शिक्षा और संस्कृति का आभाव सा था. चेतसिंह का प्रेम एक अंग्रेज़ युवती से हो गया. दोनों पति-पत्नी बनकर भारत आये. जायसवालजी ने सोचा था, विवाहित तरुण वहां जाने पर प्रेमपाश में नहीं बंधेगा, पर यह बात बहुधा गलत साबित हुई. जायसवालजी स्वयं विवाहित थे, और वह भी बैरिस्टर होकर आते समय एक अंग्रेज़ महिला के प्रणय सूत्र में बद्ध हो गये थे. हाँ, वह उसे भारत नहीं ले आये. चेतसिंह सबसे लायक पुत्र थे. उनके इस आचरण से पिता को बहुत दुःख था. उन्होंने अपने पुत्र की किसी प्रकार की सहायता करने से इंकार कर दिया था.”2 लेकिन काशी प्रसाद जायसवाल के इंग्लैंड में शादी किए जाने की पुष्टि किसी अन्य स्रोत से नहीं हुई है.

इसी तरह अपने जीवन के आरंभिक दिनों का स्मरण करते हुए जायसवाल की पुत्री सुशीला जायसवाल ने लिखा, “मेरे दादा जी पुराने समय के विचार के थे. अतः जब मैं आठवें में गर्ल्स हाई स्कूल बांकीपुर में पढ़ रही थी. तभी उन्होंने मुझे मिर्ज़ापुर बुला लिया. उनका कहना था, लड़की सयानी हो गई है, नौकर-चाकर घर में आता है, वहां नहीं रहेगी, उसे यहाँ भेजो. पिता जी बिना एक शब्द भी व्यय किए मेरी पढ़ाई छुड़ाकर मिर्ज़ापुर भेज दिए. यह तो बाद में शादी के बाद मेरी माँ जी की इच्छानुसार पुनः घर पर ही संस्कृत के धुरंधर विद्वान पंडित रंगनाथ जी से मैंने शिक्षा प्राप्त की.3

सुशीला जायसवाल ने एक और दिलचस्प घटना का ज़िक्र किया है, “कभी भी मेरी माँ की इच्छा के विपरीत कोई भी शब्द उन्होंने नहीं निकाला. परिवार की प्रतिष्ठा उनके लिए बहुत महत्त्व की चीज़ थी. बात मेरे सबसे छोटे चाचा के ब्याह की है. 1930 की. बारात लखनऊ गई थी. फेरे पर चुकने के बाद ज्ञात हुआ कि लड़की वालों ने धोखा दिया है. जो लड़की दिखाई गई थी, उससे शादी नहीं किए हैं. मेरे चाचा लोग बारात वापस लाने पर अमादा थे. पिता जी को पता चला, तो वे सख्त नाराज़ हुए. कहा कि “जैसी भी लड़की है, मेरे घर की बहु हो गई, अब वह घर में रहेगी”, और सम्मानपूर्वक बहु को घर लाए.”4

उपरोक्त तीन संस्मरणों से प्रतीत होता है स्त्री-प्रश्न पर जायसवाल पर तर्क और वैज्ञानिकता पर लोक-मर्यादा और परम्पराएँ ज्यादा हावी थीं.

भाषा और साहित्य काशी प्रसाद जायसवाल के लेखन का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है. जिस समय से जायसवाल ने हिंदी में लिखना शुरू किया, उसे पश्चिमोत्तर प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में ‘हिंदी नवजागरण’ के काल के रूप में जाना जाता है. इस अवधि में भारतेंदु हरिश्चंद्र और पंडित बालकृष्ण भट्ट के नेतृत्व में हिंदी भाषा और नागरी लिपि को आधिकारिक दर्ज़ा दिलाने का प्रयास चल रहा था. यह काल भाषा के ‘साम्प्रदायीकरण’ का भी काल था. नागरी प्रचारिणी सभा और हिंदी साहित्य सम्मलेन के नेतृत्व में हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाए जाने और हिंदी से फ़ारसी और उर्दू शब्दों को बाहर निकाले जाने का आन्दोलन चल रहा था. हालांकि वैसे विचारक भी थे, जो हिन्दुस्तानी ज़बान की वकालत कर रहे थे. जायसवाल भी इस विमर्श के अभिन्न अंग थे और उनके लेखों में भाषा के सम्बन्ध में उनके विचारों का रूपांतरण/विकास भी देखा जा सकता है. लेकिन भाषा के प्रश्न को जायसवाल ने महिलाओं के प्रश्न से भी जोड़ा. बिहार के प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मलेन में भागलपुर अधिवेशन (1933) के अध्यक्षीय व्याख्यान में इस प्रश्न को गंभीरता से उठाते हुए जायसवाल ने कहा, “भाषा बहुत संस्कृतग्राही हो रही है, जिससे जनता और स्त्रियों को समझने में कठिनाई पड़ती है. निछ्क्की हिंदी का शब्द-कलाप बहुत बड़ा है. अपने खजाने को छोड़ना नहीं चाहिए.”5

इसी संबंध में जायसवाल के मित्रवर शिष्य मोहनलाल महतो वियोगी ने लिखा, “जब-जब भाषा के सम्बन्ध में जायसवालजी से बातें करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उन्हें सदा ‘घराऊ हिंदी’ की वकालत करते सुना. यद्धपि वे पंडित जवाहरलाल जी की तरह हिंदी में उर्दू फ़ारसी शब्द घुसेड़ने के विरोधी थे, तथापि भाषा का रूप घराऊ बनाने के ही पक्ष में थे. साफ़-सुथरी और सीधी-सादी भाषा के इतने प्रेमी थे कि ऐसी भाषा के लेखक को तहे दिल से दाद देते थे. हरिऔध अभिनन्दन ग्रन्थ में उन्होंने सीधी भाषा के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किए हैं. देवकीनंदन जी खत्री, श्री बालमुकुन्द गुप्त और पंडित पद्मसिंह जी की भाषा के बहुत ही प्रशंसक थे. इन्हें घराऊ हिंदी के आचार्य मानते थे.”6

मैथिलीशरण गुप्त ने भी जायसवाल द्वारा घराऊ हिंदी के उपयोग पर एक दिलचस्प हास्य-संस्मरण लिखा, “सन 1919 में हमलोग मसूरी में थे. श्री एस. पी. शाह, आई. सी. एस. भी अपनी धर्मपत्नी के साथ आये थे. कुछ ही दिनों में स्वर्गीय काशीप्रसाद जायसवाल भी अचानक आ पहुँचे. वातावरण विशेष मुखरित हो उठा. एक दिन वार्तालाप में शाह ने उनके एक शब्द पर कहा – “यह ऐसा नहीं, ऐसा होना चाहिए.” जायसवाल ने कहा – “क्यों होना चाहिए?” शाह अधीत पुरुष थे. बोले – “ग्रियर्सन के मत से.” जायसवाल ने कहा – “अजी, हम उस ग्रियर्सनवा को प्रमाण मानें अथवा हमारी माँ-बहनें जो नित्य बोला करती हैं उसे माने?” शाह ने मुस्कुरा कर कहा – “इस पर मैं क्या कह सकता हूँ?”7

भाषा के सम्बन्ध में जायसवाल के उपरोक्त विचारों से स्पष्ट है जायसवाल वैसी साधारण/घराऊ भाषा की वकालत कर रहे थे, जो स्त्रियों, बच्चों और आमजन को आसानी से समझ में आ सके.


उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जायसवाल 1906 में इंग्लैंड गए. इंगलैंड में अध्ययन करते समय उन्होंने हिंदी में कई महत्वपूर्ण लेख लिखे, जो लगातार सरस्वती में प्रकाशित होते रहे. इन प्रकाशित लेखों का एक महत्वपूर्ण अंग यात्रा-वृत्तांत था – कुछ इंग्लैंड की यात्राओं का और कुछ इंग्लैंड से वापसी की यात्राओं का. 8 इन यात्रा-वृत्तांतों में कई मुद्दों पर जायसवाल भारतीय इतिहास से बार-बार सामांतर तुलनाएँ खींचने का प्रयास करते रहे. भारत के प्राचीन इतिहास को याद करते हुए जायसवाल प्राचीन भारत में स्त्रियों की स्थिति का भी यदा-कदा चित्रण करते रहे. अपने लेख ‘इंग्लैंड की जातीय चित्रशाला’ में प्राचीन भारत के बौद्धिक संस्मरणों को याद करते हुए लिखा, “जब हमारी हिन्दू जाति पूर्ण रूप से सजीव थी, तब हमें चित्रण पर बहुत प्रेम था, हमारे राजकुलों में बड़ी-बड़ी चित्रशालाएँ थीं जिसका साक्ष्य हमारे संस्कृत के नाटक दे रहे हैं. थोड़े दिन हुए, मैं यहाँ एक गाँव में गया. देखा लेफ्टिनेंट की गौर-पत्नी बैठी वहाँ के स्वाभाविक दृश्य का चित्रण खिंच रही हैं. चट रत्नावली नाटिका के समय की अपनी सभ्यता का मुझे स्मरण हो गया. सागरिका ने देखते-देखते वत्सराज का चित्र उरेह दिया, उसकी सखी, महिषी और पार्श्ववर्तिनी, ने भी उसी चित्र के पास सागरिका का चित्र खींच दिया अर्थात् प्रत्येक युवती चित्रण कला जानती थी! पर अब कितने हम में हैं जो चित्रशाला के नाम से परिचित हैं – कितनी हमारी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने चित्रकारी की लेखनी देखी है! हमारी सजीवता के ह्रास के साथ परतंत्रता के स्पर्श के साथ – हमारा चित्र प्रेम मिट सा गया!”9

जायसवाल पटना से निकलने वाले हिंदी साप्ताहिक पाटलिपुत्र के संस्थापक-संपादक रहे (जून 1914-अप्रैल 1915). प्राप्त 40 संपादकीयों में से सिर्फ एक स्त्री-आधारित लेख है – लेडी हार्डिंग! यह लेख लेडी हार्डिंग10 के निधन का मृत्यु-संवाद है, ज़ाहिर है प्रशंसात्मक शैली में लिखा हुआ है. हालाँकि एक अन्य सम्पादकीय ‘गाहा-सत्तसइ’ 11 में जायसवाल ने उन्नीस सौ वर्ष पहले स्त्री कवियों के योगदानों का उल्लेख करते हुए लिखा, “सबसे अपूर्व बात यह है कि गाथा-सत्तसई में स्त्री-कवियों की भी कविता संगृहीत है. पोथियों में कवियों के नाम गल गए हैं पर जो बचे उनमें ये नाम हमने छाटें हैं: रेवा, प्रहता (पहई), रोद्दा, अणुलच्छी, माधवी.” इन संपादकीयों के अलावा स्त्री-विमर्श आधारित कुछ ही लेख पाटलिपुत्र में प्रकाशित हुए – सरोजवासिनी गुप्ता लिखित ‘हिन्दू जाति में नारी का सम्मान और स्वाधीनता’12 , पंडित लक्ष्मीश्वर शर्मा लिखित ‘परदे की प्रथा’13  और गोपाल राम लिखित ‘दंपत्ति कलह’.14  यह लेख सावधानीपूर्वक चुने गए हैं, जो संपादक की व्यक्तिगत रूचि को भी दर्शाता है. तीनो लेख अमूमन ‘स्त्री-मर्यादा’, ‘स्त्री-संस्कार’ इत्यादि के इर्द-गिर्द घूमते हैं. पहले लेख में जायसवाल की बेहद महत्वपूर्ण सम्पादकीय टिप्पणी है: हिन्दुस्तान में गत पच्चीस तीस वर्षों से एक प्रकार का नया युग सा आ गया है। हर तरह की उन्नति की चर्चा चारों ओर से सुनाई देती है। कहीं राजनीतिक आंदोलन है तो कहीं समाज सुधार है, कहीं धार्मिक समारोह है तो कहीं साहित्य-सेवियों का सुखद सम्मलेन है। इन सभी प्रकार के आन्दोलनों के अतिरिक्त स्त्री-जाति की वर्त्तमान दुरावस्था को दूर कर समाज में उनकी मान मर्यादा बढ़ाने के लिए भी आंदोलन जारी है। इस आंदोलन में हमारी अनेक सुशिक्षिता भगिनियों का हाथ है और हमारे कुछ उत्साही स्त्री शिक्षा प्रेमी और नारी-जाति के उन्नति-कामी भाई भी शामिल हैं। इस लक्षण को हम देश के कल्याण का कारण समझते हैं, किन्तु कुछ हमारे भाई नारी जाति को पूर्वीय आदर्श के अनुसार शिक्षित न कर उन्हें पाश्चात्य आदर्श पर ले जाना चाहते हैं जिससे हमें भय होता है कि हिन्दू स्त्रियां भी कहीं कालान्तर में वैसी ही उच्छृंखल न हो जायें जैसी इंगलैंड की मतभिलषिणी स्त्रियां हो गयी हैं।

अस्तु, दोष गुण या अपनी अभाव-आवश्यकताएं जितना हम समझ सकते हैं उतना और कोई नहीं।हिंदुस्तान के पुरुषों की वर्त्तमान अवस्था और उनके भविष्य के कल्याण के लिए जो कुछ कर्त्तव्य है उसपर जितनी अच्छी तरह से हम विचार कर सकते हैं उतना और कोई नहीं। इसी प्रकार हमारी महिलाएं स्त्री-जाति के हिताहित की बातों को जिस तरह ठीक ठिकाने के साथ कह सकती हैं उस तरह हमलोग कभी नहीं कह सकते। इसीलिए हम उपर्युक्त विषय पर स्वयं कुछ अधिक न कहकर एक पढ़ी लिखी बंग महिला के विचारों का सारांश नीचे देते हैं और आशा करते हैं कि पाठक इसे ध्यानपूर्वक देखेंगे और प्राच्य तथा पाश्चात्य भावों का मिलान करेंगे। वास्तव में जिस शिक्षा से हिन्दू नारी आदर्श हिन्दू नारी न बनकर सुशिक्षिता होते ही आधी पूरब की और आधी पश्चिम की हो जाय हम उस शिक्षा को दूर से नमस्कार करते हैं।”15

दिलचस्प है, यद्यपि जायसवाल ने अपने आरंभिक दिनों में मिर्ज़ापुर में कलवार सभा से जुड़कर दहेज़,बाल-विवाह के विरुद्ध और विधवा विवाह के पक्ष में आन्दोलन चलाया था और वे खुद भी पाश्चत्य शिक्षा में शिक्षित थे. परन्तु बाद के दिनों में हिन्दू संस्कार उनपर प्रभावी होता दिखा और वे स्त्रियों की सीमित स्वतंत्रता अर्थात् ‘मर्यादा’ के साथ स्वतंत्रता के पक्ष में दिखे!16

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के समाज-सुधारकों और हिंदी विद्वत जगत का एक महत्वपूर्ण मुद्दा स्त्री शिक्षा का प्रश्न भी था. यह मसला उसी तरह निजी था जैसे धर्म. अर्थात् किसी को भी इसमें हस्तक्षेप की इजाज़त नहीं थी. अंग्रेजों के आने के पूर्व उन्हें लोक भाषाओं में भी शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था. कट्टर वैष्णव सुधारक हिंदी भाषा और नागरी लिपि के लिए आंदोलनकर्ताओं में से एक मदन मोहन मालवीय विधवा विवाह और महिलाओं के मताधिकार के विरुद्ध थे और उनके हिन्दू विश्वविद्यालय में बीसवीं सदी के कई दशक तक स्त्रियों को वैदिक शास्त्र पढ़ने का अधिकार नहीं था. वीर भारत तलवार ने दर्शाया है कि कैसे पश्चिम में शिक्षित समाज-सुधारकों का एक बड़ा वर्ग स्त्रियों को धर्म का वाहक और सभ्यता का इंडेक्स समझता था और उन्हें पश्चिमी शिक्षा से दूर रखता था.17

धर्म और सभ्यता का वाहक होने की वजह से ही स्त्रियों को आधुनिक पश्चिमी शिक्षा से दूर रखा जाता था और धार्मिक और नैतिक शिक्षा तक सीमित रखा जाता था. वैज्ञानिक शिक्षा को वे पुरुषों के लिए ज़रुरी मानते थे, स्त्रियों के लिए नहीं. अर्थात् पुरुषों के लिए पश्चिमी और स्त्रियों के लिए पूर्वी शिक्षा!

स्त्रियों को आदर्शीकृत ‘पूर्वी गुणों’ – त्याग, समर्पण, शुद्धता, मर्यादा इत्यादि – के साथ जायसवाल जेंडर संबंधों में शक्ति-सम्बन्ध की संरचना की पहचान शायद नहीं करते. यह दिलचस्प है कि बाल विवाह, दहेज़ का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन करने वाले और स्वयं पश्चिम में शिक्षित होने के बावजूद जायसवाल स्त्रियों के सिमित शिक्षा का समर्थन करते हैं. अर्थात् स्त्रियों के लिए पश्चिमी शिक्षा का विरोध करते हैं. संभव है कि इस तरह से स्त्रीवाद का आदर्शीकरण आज के नारीवादी अतार्किक और अस्वीकृत समझें. पाटलिपुत्र में स्त्रियों से सम्बंधित जितने सन्दर्भ हैं, उनमें शास्त्रों का सन्दर्भ फिर केंद्रबिंदु है.

जायसवाल मूलतः प्राचीन भारतीय इतिहास के इतिहासकार थे. बतौर इतिहासकार जायसवाल ने दर्ज़नों मौलिक पुस्तकें और सैकड़ों लेख प्रकाशित किए. लेकिन दीगर स्थानों की तरह उनके इतिहास-लेखन में भी स्त्रियों की उपस्थिति लगभग नगण्य ही है. हालाँकि उनकी चर्चित शोध-पुस्तक मनु ऐन्ड याज्ञवल्क्य  में उन्होंने लिखा कि बुद्धिज़्म ने स्त्रियों की स्थिति को पहले बेहतर कर दिया था, याज्ञवल्क्य ने स्त्रियों की स्थिति को और अधिक समानता के स्तर तक लाया. इस सन्दर्भ में याज्ञवल्क्य ने मनु के विधान को पूरे आर्यावर्त से हटा दिया. याज्ञवल्क्य को सदैव स्त्रियों के उत्तराधिकार (right of inheritance) के लिए याद किया जायेगा.18
जायसवाल बिहार के विभिन्न आधुनिक संस्थानों – बिहार ऐन्ड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी, पटना म्यूजियम, पटना विश्वविद्यालय – से उनके जन्म के समय से ही विभिन्न रूपों में जुड़े रहे. पटना म्यूजियम के अध्यक्ष की हैसियत से जायसवाल ने पहली बार हेल्थ म्यूजियम19 की स्थापना की. यद्यपि इस हेल्थ म्यूजियम के सभी साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, परन्तु इसका उद्देश्य दर्शकों और खास तौर पर महिला दर्शकों को आकर्षित करना और महिलाओं में उनके स्वाथ्य के बारे में चेतना का प्रसार/प्रचार करना था. इसी तरह से पटना विश्वविद्यालय की विधि निर्मात्री संस्थाओं के सदस्य के रूप में जायसवाल लगातार मीटिंग में भाग लेते रहे. जब महिलाओं के लिए अलग पाठ्यक्रम का प्रस्ताव हाउस में पेश हुआ, जायसवाल एकमात्र सदस्य थे जिन्होंने इसका विरोध किया और यह प्रस्ताव 34:1 से पास हुआ.20  अर्थात् जायसवाल को छोड़कर सभी सदस्यों ने स्त्रियों के लिए अलग पाठ्यक्रम का समर्थन किया.

दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि सार्वजानिक संस्थानों में स्त्रियों के प्रतिनिधित्व के लिए विमर्श कब शुरू हुआ और कब से लागू हुआ. पटना विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य के हैसियत से जायसवाल ने सीनेट में स्त्रियों के लिए आरक्षण का मुद्दा उठाया. जायसवाल ने प्रस्ताव पेश किया कि सीनेट सरकार को यह प्रस्ताव भेजे कि सरकार सीनेट में जितने भी सदस्य नॉमिनेट करे उसमें कम-से-कम तीन स्त्रियाँ ऐसी हों जो प्रान्त की निवासी हों. अपने प्रस्ताव के पक्ष में उन्होंने कहा कि प्रान्त में छात्राओं के लिए स्कूल हैं और उनके उच्च शिक्षा पर भी सकारात्मक प्रतिक्रिया है, इसलिए आवश्यक है कि सीनेट में शिक्षित स्त्रियों को प्रतिनिधित्व दिया जाय. सरकार, 25 सदस्यीय सीनेट में 3 अ-आधिकारिक स्त्रियों (non-official) को प्रतिनिधित्व दे सकती है. सीनेट में इस मुद्दे पर बहस हुई. कुछ सदस्यों ने डोमिसाइल शब्द हटाने की अनुशंसा की, पर इसे स्वीकार नहीं किया गया. जायसवाल ने अपने प्रस्ताव के समर्थन में आगे कहा कि इस प्रस्ताव में वैसी महिलाओं को जो अधिकारिक (official) या जो इस प्रान्त की निवासी नहीं हैं, छोड़े जाने की बात नहीं है. आशय यह है कि प्रान्त की अ-अधिकारिक स्त्रियाँ भी इसमें हों. ज्यादा से ज्यादा स्त्रियों को प्रतिनिधित्व मिले. सीनेट के कुछ सदस्य इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे, इसलिए अगले मुद्दे पर बहस के लिए इस विषय को टाल दिया गया.21

काशी प्रसाद जायसवाल एक सूक्ष्म शोधार्थी थे और खूब लिखते थे. लेकिन हिंदी साहित्य, पत्रकारी, और प्राचीन भारत में इतिहास-पर उनके स्थूल और व्यापक लेखन स्त्री विमर्श न के बराबर है. शायद यह राष्ट्रवादी विमर्श और राष्ट्रवादी आन्दोलन का प्रभाव था, जिसमें राष्ट्र और जाति के अन्दर ही स्त्रियों के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया था. उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जो भी सूचनाएं प्राप्त हैं, स्त्री-प्रश्न पर जायसवाल के निजी और व्यवसायिक जीवन में द्वन्द उभर कर आता है. यद्धपि पटना विश्वविद्यालय के सीनेट में जायसवाल ने महिला आरक्षण की बात की और सामान्य रूप से वे महिलाओं का सम्मान करते थे. लेकिन इंग्लैंड में कई विधाओं में आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद जायसवाल अमूमन ‘पूर्वी आदर्श वाली महिला’के ही पक्षधर थे.

1. . देखें, रतन लाल, काशी प्रसाद जायसवाल: द मेकिंग ऑफ़ अ ‘नैशनलिस्ट’ हिस्टोरियन, आकार बुक्स, दिल्ली 2018, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन(तीन खण्डों में), सस्ता साहित्य मंडल दिल्ली, 2018.
2. देखें, कमला संकृत्यायन, राहुल वांग्मय, खंड 2, जिल्द 1, नई दिल्ली, 1994, पृष्ठ 673.
3.   सुशीला जायसवाल, ‘मेरे पूज्य पिता श्री काशी प्रसाद जायसवाल’, काशी प्रसाद जायसवाल कॉमोमेरेशन वॉल्यूम, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना, 1981, पृष्ठ 57.

4.  वही, पृष्ठ 58
5. सम्पूर्ण व्याख्यान के लिए देखें, बिहार की साहित्यिक प्रगति, बिहार हिंदी साहित्य सम्मलेन, पटना, 1956, पृष्ठ 245-56/ रतन लाल, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 2, नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ 207-15.
6. मोहनलाल महतो, ‘डाक्टर जायसवाल’, सरस्वती, भाग 38, संख्या 4, अक्टूबर 1937, पृ. 337.
7. देखें, मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली, खंड 12,  पृ. 344-45.
8. देखें, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 1, पृष्ठ 139-98.
9.  देखें, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 1, पृष्ठ 151.
10. देखें, काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 2, पृष्ठ  58-59.
11. काशी प्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 2, पृष्ठ  79-82.

12. पाटलिपुत्र, 18.7.1914, पृष्ठ 1.
13.  पाटलिपुत्र, 5.9.1914, पृष्ठ 6.
14. वही.
15.  पाटलिपुत्र, 18.7.1914, पृष्ठ 1.

16. इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए देखें, F. Orisini, see Women and the Hindi Public Sphere, in Hindi Public Sphere, pp. 241-308
17. विस्तृत चर्चा के लिए देखें, वीर भारत तलवार,रस्साकशी, 19वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रांत,  Partha Chatterjee, The Nation and its Fragments, especially chapter The Nation and its women.

18. देखें, काशी प्रसाद जायसवाल, मनु एंड याज्ञवल्क्य, पृष्ठ 61-62, 233.
19. एनुअल रिपोर्ट ऑफ़ पटना म्यूजियम, 1933, पृष्ठ 2.
20. एनुअल रिपोर्ट ऑफ़ पटना यूनिवर्सिटी, पृष्ठ 24-25.
21. वही, पृष्ठ 26-27.

तस्वीरें गूगल से साभार 

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स्त्रीकाल द्विमासिक ई जर्नल (शोध), अंक 27-28 ( दिसम्बर मार्च )

स्त्रीकाल शोध द्विमासिक का यह दिसम्बर-मार्च अंक है. अंक 27-28. इस अंक में .दीनानाथ मौर्य,  अनिता शुक्ल, अंजली पटेल, रतन लाल,विकल सिंह, सीमा मिश्रा, हंसराज त्रिपाठी, आकांक्षा, सोनिया माला, अंसारी मोहम्मद इकराम,  मकेश्वर रजक, मोनिका शर्मा, हुश्न तबस्सुम निहां, आलोक कुमार सिंह, सोनिका जसरोटिया,प्रद्युम्न सिंह, रणजीत जाधव, हेना के शोध-आलेख प्रकाशित हैं. इस अंक को लिंक के जरिये नॉटनल पर पढ़ा जा सकता है. आवरण चित्र: प्रवेश सोनी

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