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“मैना का ख़ून” और ज़ूबी मंसूर की अन्य कविताएं

ज़ूबी मंसूर


पेशे से पत्रकार. वॉइस ऑफ़ इंडिया, महुआ न्यूज़ बिहार और p7 न्यूज़ में अस्सिटेंट प्रोड्यूसर रही हैं.

“मैना का ख़ून”

13 बरस का साल था
सफ़ेद पहनने की
उकताहट से भरा
कुछ टूट कर गिरा था
योनि से
लाल थक्के सा
बारीक कत्थई सा
छुपाने की होड़
ऐसी उमड़ी
अगले महीने तक
बासी महकती रही मैं
जो कुछ भी बह रहा था
उन सात दिनों में
नाखूनों के पोरों में
एक इंच की भीगी उंगली तक
मरे मूस सी महकी थी
मेरी नाक
माहवारी है या मैना का ख़ून !
तब नहीं समझी थी
अब ख़ूब समझती हूं
क्योंकि अब
उन दिनों में
जांघों के बीच
‘दो पर’ मैं ख़ूब
भलीभांति लगाती हूँ
और, मैना की तरह

लाल नदी के ऊपर
मोनो-पॉज़ तक
उड़ना चाहती हूं!

“आस्तित्व”

फिर मुझे रचना होगा
पहले प्रेम रचा था
फिर गर्भ
अब बीज रचूंगी।


“झूठा-सच्चा पुरुषार्थ”

मुझे पुरुष बनने के लिये
क्या करना होगा?
योनि की दो फांको को
जोड़ कर उसकी नाक लंबी
करनी होगी।
स्तन काटने होंगे।
और तुम…
‘शिवलिंग’ को तोड़ पाओगे!
या फिर
अल्लाह का ‘अलिफ़’!

(2)
ईश्वर भी तो
पुरुष है
ये अभिमान
से अति भी है
कुछ तुम्हारे भीतर
तुम सब छोड़ सकते हो
अपना पुरुषार्थ नहीं!

(3)
हमारे बीच
बस जिव्हा रहने दो
यह आदि है और
सत्य का औजार भी।

“ख़ुश-फ़हमी का बिस्तर”

हमें ये ख़ुशफहमी
हो चुकी है कि
हम इश्क़ के मक़ाम पर हैं
और ये मक़ाम ही
हमारा बिस्तर है!



“नज़्म नहीं लिखती”

सोचती हूं
साइंटिफ़िक सी एक नज़्म लिखूं
जिसे वो काट ना पाए…
क्लासिक सी भी एक नज़्म
जिसमे उलझ सा जाए…
फिर सोचती हूं
नज़्म की जगह
क्यों ना लिख दूं सुरंग
जिसमे वो खो जाए…
फिर सोचती हूं
कुछ भी लिख दूं
बन जाएगी ख़ुद-ब-ख़ुद नज़्म
उसका आना नज़्म से कम थोड़ी है
अपने आप कहां आता है वो
नुज़ूल होता है
हद शिकवा.., कितनी शिक़ायत
सुनकर सुनता तो
इस बार नज़्म नहीं विसाल लिखती..!

“प्रेम ढूंढने का आलस्य”

तुम्हारा…
प्रेम ढूंढने का आलस
मुझे निस्तेज
कर रहा है
निःस्वाद
कर रहा है।
शब्दों की धुरी
पर घूमता
तुम्हारा अतीत
उचित व्यवस्था के
नियम तोड़ रहा है।

तस्वीरें: साभार गूगल


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कॉ. कुंती देवी : जन-संघर्ष का पर्यायवाची नाम

संतोष सहर

भाकपा-माले के दिवंगत महासचिव कामरेड विनोद मिश्र अक्सर कहा करते थे – “दिल्ली का रास्ता जहानाबाद से होकर जाता है।”

पिछले साल मई माह के आखिरी हफ्ते मैं जहानाबाद में ही था। इस दौरान मैंने नोन्ही-नगवां, दमुहाँ-खगड़ी और इस्से बिगहा नाम के गांव-टोलों की यात्रा की, मगही-उर्दू के शायर वसी अहमद ‘तालिब’ की रचनाओं को हासिल किया और साथ ही का. कुंती देवी से एक संक्षिप्त बातचीत भी की।

का. कुंती देवी अभी हो रहे जहानाबाद विधान सभा उपचुनाव में भाकपा-माले की प्रत्याशी हैं। वे इस जिले में पिछले 40-42 वर्षों से जारी भूमिहीन दलित गरीबोँ के आंदोलन का एक मजबूत स्तंभ भी हैं। कुंती बिहार में महिलाओं के आंदोलन का वह चेहरा हैं जो इस आंदोलन की कई विशिष्टताओं को उजागर करता है।
जहानाबाद शहर से पश्चिम करीब 3 मील की दूरी पर है इस्से बिगहा गांव। गांव के प्रवेश मार्ग पर एक स्मारक है। एक शहीद स्तंभ जिसकी पृष्ठभूमि में ताड़ का एक खूबसूरत पेड़ है। बच्चा पेड़ हर साल लपकते हुए बड़ा होता जाता है। स्तंभ पर करीब दो दर्जन से अधिक शहीदों के नाम दर्ज हैं। बिंद व कहार अतिपिछड़ी जातियों की आबादी वाले इसी टोले में शिवकुमारी (कुंती) का
जन्म हुआ। साल 1967 में यानी जिस वर्ष नक्सलबाड़ी में ‘वसन्त का वज्रनाद’ सुनायी पड़ा था।

तस्वीर निकोलस जौल

अपने समय में भाकपा के जुझारू नेता बुद्धदेव बिंद और सोमरिया देवी की सात संतानों में सबसे बड़ी हैं कुंती। दो छोटे भाई, चार छोटी बहनें। पिता भाकपा के प्रखंड नेता थे, मैट्रिक पास थे और अपनी थोड़ी-बहुत जमीन पर खेती करते थे।

पढ़ने की लगन और पिता की दी हुई जमीन पर ही गांव का स्कूल होने के बाद भी उन्हें स्कूल नहीं भेजा गया। तब उस टोले में इसका चलन नहीं था। पांच बेटियों को निबटाना था इसलिए पिता ने बचपन में ही उनकी शादी भी कर दी, पटना जिले के भरतपुरा के नजदीक सरकंडा गांव में।

पढ़ें: बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

विस्टौल और कुम्हवां दो पड़ोसी गांव हैं जहां राजपूतों की आबादी है। इन लोगों का दबदबा व क्रूर दमन चलता था। इन गांवों समेत आसपास के गांवों के गरीब इसके शिकार होते थे। इस्से बिगहा के गरीब लोगों के बीच इसके खिलाफ एकता रहती थी। लेकिन भाकपा इस दबदबे व दमन के खिलाफ कारगर लड़ाई लड़ने से हिचकती रही। 80 दशक के उत्तरार्ध में कुंती के पिता समेत अन्य गरीबोँ का भाकपा से मतभेद व मोहभंग शुरू हुआ।
कुंती बताती हैं ‘1979 से मेरे गांव में कुछ दूसरे लोगों का आना-जाना शुरू हुआ। वे लोग अक्सर रात में आते। गांव-घर में बैठकेँ होने लगी। मैंने जब पिता से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये नक्सलाइट लोग हैं। जमींदारों से यही लोग लड़ते हैं। हमें तंग-तबाह करनेवाले बिस्टौल-कुम्हवां के राजपूत लोगों से यही लड़ेंगे। उनके आने-जाने से गांव में नई सरगर्मी शुरू हुई। मैं भी बाहर से आनेवाले लोगों के लिए खाना जुटाने-बनाने का काम करने लगी। बैठकों में महिलाओं को नहीं बुलाया जाता। लेकिन, मैं लुक-छिपकर बैठकों की बातें सुनने लगीं। तब ज्वाला और सुधीर जी जो पटना जिला के थे, नक्सलाइट पार्टी के नेता थे। वे ही हमारे गांव में आते थे।

जल्दी ही सिकरिया और बिस्टौल गांवों में मजदूरी की लड़ाई छिड़ गयी। पुलिस भी रोज-रोज आने लगी। गांव में लगातार बैठकें होने लगी और महिलाओं की भी बैठक बुलायी जाने लगी। मैंने यह काम अपने हाथ में ले लिया। गांव की नेता बन गयी।

इसी बीच एक दिन, तीन बजे दिन में ही गुंडों और नक्सलाइट दस्ता के बीच भिड़ंत हो गयी। दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं। देर-सबेर पुलिस पहुंचेगी यह हम सबको पता था। सो, मैंने महिलाओं को संगठित कर लड़ाई में उतारने का जिम्मा लिया। मैंने रातों-रात बिस्टौल, रामदेवचक, मखदुमपुर आदि गांवों में गरीब टोलों में महिलाओं की बैठक की। उन्हें बताया कि पुलिस जब आएगी तो उसका प्रतिरोध कैसे करना है। पुलिस 3 बजे भोर में आयी, दर्जन भर गाड़ियों में लद कर और 20 गरीब लोगों को पकड़ कर ले जाने लगी। एक हजार से भी अधिक महिलाओं ने तुरत जुटकर चारों तरफ से पुलिस की गाड़ियों को घेर लिया। दो-तीन घण्टों तक यह संघर्ष चला। अंततः महिलाओं की ही जीत हुई। पुलिस को बैरंग वापस होना पड़ा। इस इलाके में ऐसा पहली बार हुआ था। इसका शोर चारों तरफ फैल गया।


सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

इसके बाद तो जहां कहीं भी सामंती धाक के खिलाफ और जमीन और मजदूरी के लिए संघर्ष छिड़ता या सभा-जुलूस होता में जाती। महिलाओं की बैठक कर उन्हें गोलबंद करती। लहसुना, पिरही (पटना) और कराय (नालंदा) में थाने के घेराव में भी शामिल रही। पिता ने तो कभी मना नहीं किया, लेकिन माँ डांट-फटकार और कभी-कभी पिटाई भी कर देतीं।’

1980 में बिस्टौल में 15-16 बीघा गैरमजरूआ जमीन दखल हुआ। उसके बाद कुंती ‘होलटाइमर’ हो गयीं – ‘महिला होलटाइमर!’ उनके गांव-घर के कई युवकों ने भी ऐसा किया। लेकिन, उनका ऐसा करना सहज नहीं रहा।

कुंती बताती हैं ‘तब गांव-घर में महिलाओं के पार्टी में काम करने को लेकर अच्छा माहौल नहीं था। अपने ही भाइयों, सगे-संबंधियों ने विरोध शुरू कर दिया। वापस घर में लौट आने के लिए पार्टी और मुझ पर दबाव डालने लगे। मेरी ससुराल व पति का भी विरोध सामने आया। गांव-जवार की महिलायें भी इसे अच्छी नजर से नहीं देखती थीं। पार्टी में काम करने वाले पुरुष तो योद्धा समझे जाते थे, लेकिन मैं?

मैंने हिम्मत नहीँ हारी और अपनी राह पर आगे बढ़ती रही। मेरी पहली शादी खत्म हो गयी। इस बीच 1981 में दिल्ली में आइपीएफ का स्थापना सम्मेलन हुआ। मैं उसकी तैयारी में भी लगी और शरीक भी हुई। बगाही गांव में मजदूरी की लड़ाई में जीत हासिल हुई। नोआवां, सरता, नौगढ़, इक्किल, सलेमपुर, सरैयां (रतनी प्रखंड) आदि गांवों में सामंती धाक को तोड़ते हुए जमीन-मजदूरी की लड़ाई जीती गई। सरता गांव में तो जिलाधिकारी को आकर गरीबों से माफी तक मांगनी पड़ी। शकुराबाद थाना पुलिस को भी झुकना पड़ा। गरीबों का साहस बढ़ा। शासन-प्रशासन का भय दूर हुआ।’

1983 में वे अरवल लोकल कमेटी में काम करती थीं। चर्चित अरवल जनसंहार के वक्त कुंती अरवल में ही थीं और इसके खिलाफ हुए जनांदोलन का नेतृत्व कर रही थीं। 1986 में टेकारी (गया) गयीं जहां एमसीसी का आतंक फैला हुआ था। दमुहाँ-खगड़ी में जब कॉ. विद्रोही ने भागवत झा आजाद के मुंह में कालिख पोती, वह उनके साथ थीं। गिरफ्तार भी हुईं लेकिन थाना हाजत से ही रिहा हो गईं। 1989 में वह फिर सेअरवल में काम करने लगीं।

पढ़ें: वह आईएएस की पत्नी नहीं निर्वाचित मुखिया हैं, महिला-नेतृत्व की मिसाल

1985 में जब ‘ जनवादी महिला मंच’ (आज ऐपवा) का निर्माण हुआ, कुंती इसका जिला सचिव बनीं। मगध क्षेत्र में मीना, महेन्द्री, सावित्री, शीला, सामफूल, शांति, कलावती और सर्वोपरि शहीद कॉ. मंजू आदि समेत माले की जो महिला कतार बनी, वे उसकी अगुआ रहीं।

1987 में कुंती और ज्वाला ने अपनी मर्जी की शादी की। वे दोनों लम्बे समय से साथ ही काम कर रहे थे। जहानाबाद के बदहर गांव में जहां उन्हें पार्टी द्वारा दखल की गई जमीन का एक हिस्सा मिला था, उन्होंने अपना आशियाना बनाया।

कुंती देवी का घर

1990 में मखदुमपुर, 2005 फरवरी में घोषी व अक्टूबर में जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र से वे आइपीएफ-माले का प्रत्याशी रहीं। आइपीएफ व ऐपवा की राज्य कमेटियों में भी रहीं।1992 के बाद कुछ वर्षों तक उलझन व ठहराव का दौर भी आया। लेकिन, वे फिर से सक्रिय हुयीं। कुछ दिनों बाद कॉ. विनोद मिश्र नहीं रहे। उनके निधन के शोक को संकल्प में ढालते हुए उन्होंने फिर वही पुराना तेवर हासिल कर लिया। 2003 में जहानाबाद-भाग 2 से जिला पार्षद निर्वाचित हुयीं। 2004 में माले की राज्य कमेटी सदस्य बनीं।

जेल, मुकदमें और जानलेवा धमकियां – कॉ. कुंती बिहार में क्रांतिकारी महिला आंदोलन का वह ताकतवर चेहरा है, जिनको इनकी जरा भी परवाह नहीं रही।1967 में जन्मी कुंती ‘वसंत के वज्रनाद’ को सच्चे अर्थों में प्रतीकित करती हैं। वह बिहार के गरीबों व महिलाओं का एक खरा स्वर हैं। उनके सपनों, संघर्षों व उपलब्धियों  की वास्तविक छवि हैं।

संतोष सहर भाकपा-माले से जुड़े र्हैं. 

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दिमाग की सलाखों में कैद स्त्री

किरण मिश्रा


प्राचार्या डिग्री कॉलेज कानपुर सम्पर्क: kiranpmg@gmail.com

किरण मिश्रा 


 उन्नीस सौ साठ के दशक से या यूं कहें कि उत्तर-आधुनिकता के आगमन से विश्व के सामाजिक,राजनितिक चिंतन और व्यवहार में कुछ नए आयाम जुड़े है। परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष से मानव समाज के सामाजिक जीवन एवं व्यवहार में बदलाव होता जा रहा है। सामाजिक व्यवहार तथा मूल्यों में हो रहे बदलाव अच्छे भी है और नहीं भी । इसका निर्णय जितना अच्छा भविष्य देगा उतना वर्तमान नहीं।

इस बदलते हुए समय का सबसे ज्यादा अगर किसी पर प्रभाव पढ़ा है तो वो है स्त्री। आज स्त्री आधुनिकता के बाहरी परिवेश में ढली है परन्तु अपने दिमाग की सलाखों में वो आज भी कैद है इसलिए वह सहज और शांत नहीं है.  वो अपनी स्वतंत्रता को अपना आत्मविश्वास नहीं बना पा रही है। स्त्री – सशक्तिकरण के नारे सिर्फ जुमले बन हवा में तैर रहे है और कुछ प्रश्न अनुत्तरित हैं कि स्त्री समाज के लिए क्या है?  समाज उसे कैसे देखता है? क्या स्त्री -पुरुष समान हैं ? या समाज स्त्री को द्धितीयक मानता है या आज भी गुलाम या दासी मानता है। क्या समाज स्त्री को लेकर आज भी कुंठित है ?ये यक्ष प्रश्न है इन सवालों के उत्तर के साथ ही समाज में मनुष्यता स्थापित हो जाएगी । इसलिए यह जरुरी है कि समाज इन सवालों को हल करे और स्त्री पुरुष संतुलन को कायम करे।

स्त्री सृजनकर्ता रही है । हमेशा से उसने जीवन को रचा है उसे सवारा है। सभ्यता का मानवीय विकास स्त्री की ही देन है । उसने गुलामी और प्रताड़ना से हमेशा समाज को मुक्त कराया है, उसने मानव जीवन का रूपांतरण कर समाज को सभ्य बनाया है।(सम्राट अशोक कलिंग युद्ध और गोप)।

आज बदलते हुए समय में सारे समाज की जिम्मेदारी बदल रही है इस बदलते समाज में स्त्री की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है उसका अपने प्रति जिम्मेदार होना ऐसा जिम्मेदार होना जिसमे भ्रम न हो । उसे संतुष्टिकारण का शिकार नहीं होना है उसे अपने दोषों और कमजोरियों पर भी नजर रखनी होगी और अपना आंकलन खुद ही करना होगा। उसे खबरदार भी रहना होगा कि वह  प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल  तो नहीं हो रही है। समाज में अपने स्थान बनाने के लिए अपने संघर्ष को  देह के संघर्ष में नहीं बदल देना है और उन स्त्रियों से भी सावधान रहना है जो देह-विमर्श के नाम पर स्त्रियों की जिन्दगी को और कठिन बना रही हैं.

विभिन्न सम्प्रदाय,धर्म,जाति में फैले हमारे देश में स्त्रियों के संघर्ष बहुत अलग-अलग हैं. उनके शोषण की जड़ें गहरे तक हैं. बेशर्म जड़ो को निकाल कर समाज को अपने लिए उपयोगी बनाना है ताकि उस पर संस्कृति, मानवता, नैतिकता का पौधा लहलहा सके और स्त्री स्वतंत्रता के फल उस पर आ सके। अगर स्त्री हमारे देश में फैली समस्याओं, यथा जाति,धर्म आदि को नजरंदाज करती है तो उनकी मुक्ति की आस बेमानी होगी।

स्त्री को अपने संघर्ष में चाहे घर हो या बाहर स्वावलंबी  होना होगा। उसे चाहे पारिवारिक शोषण को तोडना हो या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना हो,  दोनो ही सूरत में परिवार में पारिवारिक लोकतंत्र व कार्य स्थल में अपने हुनर का इस्तेमाल करना होगा ।

स्त्री का सवतंत्रता के संघर्ष का लक्ष्य उसके चरित्र की दृढ़ता से मिलेगा, वह तभी अपने साथ तभी न्याय कर पाएगी जब  अपने स्त्री होने को पीछे कर मनुष्य होने के बोध को जगाएगी।अन्तत: इस संकटग्रस्त मानवीय संबंधो के समय जबकि रिश्ते पल-पल बदल रहे हैं,  लोग भ्रमित हैं, उलझे हैं,   परेशान हो मशीन बन भाव और संवेदना खो रहे हैं. विगत की भूल ने रिश्तो की नीव कमजोर की है ऐसी दशा में स्त्रियों को मानवीय संबंधो को पुन:स्थापित करने में अहम् भूमिका निभानी होगी उसे अपनी अंतरात्मा की कसौटी  पर खुद अपने को, पुरुष को और उन बच्चों को कसना होगा जो कल पुरुष बन स्त्री-पुरुष के संबंधो को जीयेंगे।लेकिन जीवन मूल्य को चलने के लिए गति को लय में चलन ही होगा.  पुरुष गति है शिव है और स्त्री लय है, शक्ति है.  शिव बिना गति के शव है और स्त्री बिना लय के शक्तिहीन अर्धनारीश्वर के रूप में पुरुष समानताओं और विपरीतताओं से परे सृष्टि को  गति और लय देते है तभी सुन्दर और शांत स्रष्टि की रचना हो सकती है।

ये सम्बन्ध संतुलित हो,  जीवन में गुणवता बनी रहे समाज में सकारात्मकता और सृजनात्मकता बनी रहे इसलिये ये जरुरी है कि स्त्री हर बार नए सिरे से खुद को और पुरुष  के साथ उसके रिश्ते को परिभाषित करती रहे। आने वाली सदी में स्त्री-पुरुष के संबंधो में उर्वरता बनी रहे और बुद्ध के दर्शन, सम्यक जीवन का आधार, स्त्री-पुरुष जीवन का आधार हो हम ये कामना तो कर ही सकते है।
तस्वीरें: साभार गूगल

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मर्दोत्सव और स्त्रीविलाप बीच होलिका का लोकमिथ

सुशील मानव


स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन तथा एक्टिविज्म. सम्पर्क: susheel.manav@gmail.com
फोन- 6393491351

अवध वह क्षेत्र है जहाँ से राम की कट्टर मर्यादा पुरुषोत्तम छवि के साथ साथ आर्य संस्कृति का पुंसवाद न सिर्फ खड़ा होता है बल्कि फैलते फूलते संपूर्ण भारत एवं श्री लंका तक छा जाता है। ये आर्य पुंसवादन न सिर्फ सभी स्थानीय व मूल संस्कृतियों को छल-बल-बर्बरता से लील लेता है अपितु उनके विनाश के उत्सव का रूपक भी रचता जाता है। ये पुरुषवादी उत्सव क्रूरता बर्बरता और रक्तपात के अपने मूल भावों को समेटे हुए अपनी सदियों की यात्रा में रुपांतरित होकर, धार्मिक रूप धरकर न सिर्फ लोगों के अवचेतन में रच बस गए अपितु उनकी चेतना व विवेक को कुंठित करके, हिंसा वबर्बरता को ग्लोरीफाई करते हुए उनकी चेतना में बैठकर उनके भावबोध को परपीड़क आनंदमयता में अनुकूलित किए हुए हैं।

होलिका, ढूढा, पूतना, सूपर्णखा और ताड़का जैसी तमाम असुर संस्कृति की वीर योद्धा नायिकाओं की बर्बरतापूर्वक हत्या करके इन्हें खलनायिका और मनुष्य शिशुओं को खाने वाली राक्षसी के तौर पर पुरुष संस्कृति द्वारा दुष्प्रचारित करके जनमानस में स्थापित कर दिया गया। होलिका दहन के उत्सवधर्मिता के मूल में असुर संस्कृति की रक्षक वीरांगना होलिका की छलपूर्वक हत्या की पुरुषवादी कथा छद्म का महिमामंडित पाठ है। जबकि पूर्ण तर्क और तथ्य के साथ मूल सत्य इसके ठीक उलट संवेदनशील और मानवीय है। यहाँ एक बात ध्यान देने की है कि आर्य मर्द-संस्कृति के अलावा दुनिया की किसी भी संस्कृति में जिंदा या मुर्दा व्यक्तियों को आग में जलाने की किसी भी प्रथा का कोई जिक्र नहीं मिलता है। अतः हिरण्यकश्यप द्वारा अपने पुत्र प्रहलाद को लेकर बहिन होलिका को आग में प्रवेश करने की आज्ञा देने का पौराणिक दावा एक गल्प मात्र है।

होलिका दहन का सबसे सटीक व तार्किक व्याख्या ज्योतिबा फुले करते हैं। वो“गुलामगीरी”  किताब में लिखते हैं, ‘वराह के मरने के बाद द्विजों का मुखिया नरसिंह बना। सबसे पहले उसके मन में हिरण्यकशिपु की हत्या करने का विचार आया। उसने अपने एक द्विज शिक्षक नारद के माध्यम से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के अबोध मन पर अपना धर्म-सिद्धांत थोपना शुरू किया। इसकी वजह से प्रह्लाद ने अपने हरहर नाम के कुलस्वामी की पूजा करनी बंद कर दी। प्रह्लाद पर द्विज रंग ऐसा चढ़ा कि हिरण्यकशिपु की उसे समझाने की सारी कोशिशें बेकार गयीं। तब नरसिंह ने प्रह्लाद को अपने पिता की हत्या करने को उकसाया। पर ऐसा करने की प्रह्लाद की हिम्मत नहीं हुई। अंत में नरसिंह ने अपने शरीर को रंगवाकर मुंह में नकली शेर का मुखौटा लगाकर अपने शरीर को साड़ी से ढँककर प्रह्लाद की मदद से हिरण्यकशिपु के महल में एक खम्बे की आंड़ में छिपकर खड़ा हो गया और जब हिरण्यकशिपु आराम के लिए पलंग पर लेटा, तो शेर रूप धरे नरसिंह उस पर टूट पड़ा, और बखनखा से उसका पेट फाड़कर उसकी हत्या कर दी।हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद नरसिंह सभी द्विजों को साथ लेकर अपने मुल्क भाग गया। जब क्षत्रियों को पता चला तो वे आर्यों को द्विज कहना छोड़कर ‘विप्रिय’ (अप्रिय, धोखेबाज़, दुष्ट) कहना शुरू कर दिया। बाद में इसी ‘विप्रिय’ शब्द से उनका नाम ‘विप्र’ पड़ा।
हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद उसकी बहिन होलिका ने आर्य देवों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया साथ ही प्रह्लाद को भी चेताया कि ब्राह्मण संस्कृति समस्त असुर संस्कृति के विनाश का दर्शन है। होलिका देवों और ब्राह्मणों के रास्ते की अंतिम बाधा थी, जिसे हटाकर ही वे प्रह्लाद के मुखौटे से ब्राह्मण-राज्य कायम कर सकते थे। अत: एक दिन अवसर पाकर लाठी-डंडों से लैस ब्राह्मणों ने होलिका को जिन्दा जलाकर मार डाला। उसकी मौत पर ढोल-नगाड़े बजाए गए। आज उसी तर्ज पर हिंदू हर वर्ष होलिका के रूप में होली जलाकर ब्राह्मणवाद की विजय का जश्न मनाते हैं।

मैं अवध क्षेत्र के एक छोटे से गाँव से ताल्लुक़ रखता हूँ जो फूलपुर तहसील के अंतर्गत आती है। बचपन में होलिका दहन के दिन पूरे गाँव में होलिका लगाने वाले लोगों को हर घर से उपली, लकड़ी सरपट, पुआल, ऊख के पाती बटोरते माँगते देखते आया हूँ। उनकी ऊर्जा और तल्लीनता देख देखकर मेरा मन रोमांचित और उत्सवधर्मी हो उठता। उस दौरान कई बार घर में जिद करता कि मुझे भी होलिका दहन देखना और उसमें शामिल होना है लेकिन माँ या दादी मुझेकभी भी इसमें शामिल नहीं होने देती थी। हाँ, होलिका दहन के अगली सुबह माँ के साथ होलई जुड़वाने की रस्म में शामिल होने ज़रूर जाना होता था। दादी हमेशा जाने से पहले ही हम बच्चों को समझा देती थी कि होलई से बुझी हुई उपली ही ले आना, भूलकर भी होलई की जलती आग घर में मत लाना वर्ना सालभर वो आग जिलाए रखनी होगी। दादी के कहे उस वाक्य का अर्थ आज मैं ये पाता हूं कि शायद जलती आग बदले की आग का रूपक रही होगी जिसे पूरे साल जिंदा रखना पड़ता हो शायद। ख़ैर वहाँ गाँव की तमाम दूसरी स्त्रियों के साथ माँ परिक्रमा कर करके होलई जुड़वाती, साथ ही स्त्रियाँ कोई गीत भी गाती थी जिसमें होलई माई या होलई बहिनी का बार बार टेक होता। मैं इसे होलई जुड़ावन गीत कहता।

कहते हैं ना जहाँ से दमन का सबसे क्रूर आयोजन होता हैं उसका प्रतिरोध भी वहीं से आकार लेता है। होलिका दहन की बर्बर मर्दोत्सव के बाद सुबह गाँव की बड़ी बूढ़ी स्त्रियां मातम मनाकर प्रतिरोध रचती हैं। पुरुष जहाँ होलिका को आग के हवाले कर क्रूरता को खुशी में तब्दील कर गाते बजाते नाचते जश्न मनाते हैं वहीं सुबह स्त्रियाँ करुणा दया संवेदना से सराबोर होकर सूप और गेडुआमें पानी लेकरहोलिका को जुड़वाती हैं हमारे यहाँ इसे होलिका बुझाना या होलका जुड़वाना कहते हैं इस तरह स्त्रियां दया करुणा संवेदना का भाव उपजाती हुई मनुष्यता के भावबोध की रक्षा करती हैं और लौटते हुए रास्ते में जो भी पुरुष मिलता है उसका नामले लेकर बहुत कच्ची गालियाँ देती हुई घर लौटती हैं। फिर उस पुरुष का उनसे चाहे कोई भी रिश्ता हो वो उसकी परवाह उस पल नहीं करतीं। ये गारी एक तरह से स्त्रियों का हथियार होता है जिसके सहारे वो श्रेष्ठता का दंभ भरने वाली पुरुष संस्कृति को ज़लील करती हैं। होलई जुड़वाने के बाद स्त्रियां घर जाती हैं (विशेषकर पिछड़ी और दलित समुदाय की महिलाएं) और फिर अपने अपने घरों से पोतनउरी (जिसमें पीली चिकनी मिट्टी जिसे पिरोड़ कहा जाता का घोल होता है जिससे कच्ची मिट्टी के चूल्हे पोते जाते हैं) लिए गाँव भर के मर्दों को खदेड़ खदेड़ कर उनपर करिखा,गोबर,कचड़ा, चँहटा फेंक फेंककर उन्हें कुरूपित करती हुई गरियाती हैं। कह सकते हैं एक तरह से अप्रिय चीजों को फेंककर पुरुषों को अपमानित करती हैं। आखिर में थक हारकर मिट्टी की पोतनउरी फोड़ फोड़कर अपने अपने घरों को लौट जाती हैं और घर पहुँचकर लट खोलकर नहाती हैं। अमूमन पोतनउरी किसी अपने की मौत होने पर ही फोड़ी जाती है। इस तरह पोतनउरी फोड़कर स्त्रियाँ होलिका से अपने बहनापे के संबंध का रूपक रचती हैं।

होलिका एक लोकमिथ है और समूचे भारत में होलिका से संबद्ध अनेक मानवीय प्रथाएं मूलनिवासियों से जुड़ती हैं होलिका दहन के बाद होली का भाडू, ढूंढ़, गैर नृत्य (युध्द नृत्य ) और जमराबिज,तीन दिन बाद उठावना, 12 दिन का शोक, शोक तोड़ने के रूप में रंग तेरस ये सब रस्मे अपने पीछे एक लोक-इतिहास समेटे हुए है। होली के एक माह पूर्व से ही होलिका विवाह के गीत कई आदिवासी गांवो में गाए जाते है तीये की बैठक की तरह होली जलने के तीसरे दिन उठावना किया जाता है!होलई जलने के बाद ठंडा किया जाता है! कहीं-कहीं होलई की आग ले जाकर बदले की आग के रूपक के तौर पर वर्षभर सम्हाल कर रखा जाता है ! बच्चो को जन्म बाद इसी दिन ढ़ूढा जाता है!हत्या का बदला लेने के प्रतीक हथियारो के साथ होली पर गैर नृत्य (एक तरह से युध्द की तैयारी का नृत्य) खेला जाता है!दरअसल होलिका दहन की पृष्ठभूमि में दो संस्कृतियों आर्य (पितृ) और अनार्य (मार्तृ)) का संघर्ष है। दरअसल हिरण्यकश्यप की हत्या हो जाने के पश्चात उनकी बहन होलिका अपने भाई के मौत का बदला लेने और प्रहलाद को दूर ले जाने के उद्देश्य से आई थी, जिसे आर्य देवताओं ने पकड़कर आग के हवाले कर दिया। यहाँ ध्यान देने की बात ये है कि प्रहलाद विष्णु का पुत्र था। इंद्र द्वारा रानी कयादु (हिरष्यकश्यप की पत्नी) का अपहरण करके विष्णु के पास ले जाने के बाद से ही दोनों केविवाहेत्तर संबंध थे। इस तरह प्रहलाद असुर राज्यमें विष्णु की संस्कृति का रिप्रेजेंटेटिव था और उसी के मिलीभगत के दम पर विष्णुने हिरण्यकश्यप की हत्या की थी।

इसके अलावा होलिकादहन से एक और मूल निवासी असुर स्त्री योद्धा की हत्या का ब्राह्मणवादी प्रसंग जुड़ता है। इस प्रसंग में असुर स्त्री ढूढा की हत्या के लिए उसके साथ अश्लीलता, उसका शीलाघात और हैवानियत को पुरोहिती उपाय बताया गया है ! कहानी यूँ है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पूर्वज राजा रघुके समयकाल में’ढूढा’ नामक एक राक्षसी  हैजोकि माली नामक राक्षस की कन्या है और बड़ी मायाविनी है तथा अपनी इच्छानुसार रूप बदलने में शातिर है। वह बच्चों का मांस खाने की आदी है। जिसे शिव ने वरदान दिया है कि उसे देव, मानव आदि नहीं मार सकते हैं और न वह अस्त्र शस्त्रया जाड़ा गर्मी या बारिश से मर सकती है। पुरोहित वशिष्ठ द्वारा राजा रघु को ढूढा की हत्या का उपाय बताया गया कि फाल्गुन की पूर्णिमा को जाड़े की ऋतु समाप्त होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है, तब लोग हँसें एवं आनन्द मनायें, बच्चे लकड़ी के टुकड़े लेकर बाहर प्रसन्नतापूर्वक निकल पड़ें, लकड़ियाँ एवं घास एकत्र करें, रक्षोघ्न मन्त्रों के साथ उसमें आग लगायें, तालियाँ बजायें, अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा करें, अट्ठहास करें और प्रचलित भाषा में भद्दे एवं अश्लील गाने गायें, इसी शोरगुल एवं अट्टहास और अश्लीलता तथा होम से वह राक्षसी मरेगी। जब राजा रघु ने यह सब किया तो राक्षसी मर गयी और वह दिन ‘अडाडा’ या ‘होलिका’ कहा गया।

होलिका दहन के मूल में जो एक बात प्रमुख है वो ये कि, जो पुरुषों के लिए उत्सव है वही स्त्री के लिए दुख है मातमहै, विलाप का सबब है। पुरुष जहाँ होलिका जलाकर नाचते गाते हैं वहीं स्त्रिया विलाप करती हैं, गारी गाती हैं और होलिका को जुड़वाती हैं। पुरुषोत्सव आर्य ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिनिधित्व हैं जबकि स्त्रियों का मातमसदियों से उपेक्षित असुर संस्कृति का पीड़ित आख्यान है।
तस्वीरें: साभार गूगल

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होलिका जुड़वाती स्त्रियाँ

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सुशील मानव


स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन तथा एक्टिविज्म. सम्पर्क: susheel.manav@gmail.com
फोन- 0639349135

क्या आपको पता है कि एक इलाके में स्त्रियाँ होलिका जलाये जाने पर विलाप करती हैं. मर्दानी संस्कृति को धिक्कारती हैं. और मर्दाने जोश के साथ उसे जलाने वाले हर साल जलाते हैं, स्त्रियाँ हर साल विलाप करती हैं. सुशील मानव की ये कवितायें आपको स्त्रियों के इस धिक्कार और मर्दों के लम्पट उत्साह का दृश्य बुनती हैं. 
    
  (1)
आधी रात जमावड़ा लगाए पुरुषों ने फूँकी थी जहाँ होलई
और मनाते रहे उत्सव झाँझ-मजीरा-ढोल बजाते पूरी रात
वहाँ भोर भए छाती पीट विलाप रहीं स्त्रियां
मना रहीं हैं मातम गाँव भर की औरतें
जुड़वा रहीं होलिका कारन कर-करके

हाय! हाय! होलिका, हा! बहिनी हा! होलिका हो!
हाय! बहिनी फूँके तापे घेरकर तुमको हत्तियारे!
आग लगे इनके बल में यश में पौरुष में
आग में झोंके जैसे तुमको होलई बहिनी ये
जरि-बरि जाए ऐसे सत्ता इनकी, इनकर गुरूर

फिर दोनों आँखों और लोटे में भरे हुए जल
परिक्रमा कर करके जल गिराती होलई जुड़वाती हैं स्त्रियाँ
जुड़आ जुड़आ हे होलिका बहिनी जुड़आ
जुड़आ जुड़आ हे होलिका बहिनी जुड़आ
शिश्नित वजूद ढोतीं हम विक्षिप्त स्त्रियाँ
तुम्हें जुड़वातीं हैं, हे बहिनी जुड़ाओ
कि अकेली तुमहीं नहीं जली हे बहिनी होलिका
सदियों के दाहकाल में संग तुम्हारे जलती रहीं हम स्त्रियां भी
हमारी उम्मीद, हमारा संघर्ष सब-कुछ तो जला था संग तुम्हारे
कि उस रोज अकेली तुम नहीं जलाई गई थे घेरकर
राक्षसी करार करके इतिहास के ढूँठ पर टाँग दी गई
तुम्हारे प्रतिरोध के पराक्रम को सींचती
जुड़वातीं हम बहिनियाँ हे होलिका, हे बहिनी जुड़ाओं

फिर छल-बल से मात खाए योद्धा की भांति
अपने दुःख को गा-गाकर शरापती हैं स्त्रियाँ
हे होलई बहिन तुम्हरे दहन की ई ऊँची लपटें झौंसें झौंसे
झौंस दें उनका पुरुषापा आपा, हे होलई बहिनी जुड़आ
जलन की पीड़ा अथाह में झोंक दए तुम्हें जो बलबलाए पौरुष बल में
हे बहिनी भभाकर भंभाभूत हो जाए एक दिन वो पौरुष, पुरुष वे
जुड़आ जुड़आ हे होलिका बहिनी जुड़आ
विलाप रहीं हम स्त्रियाँ छतियाँ पीट जैसे
होइ जाए उच्छिन्न ऐसे एक दिन
एक दिन उनकी संस्कृति शिश्नोदरी, हे बहिनी जुड़आ

   (2)
फिर हुड़दंग मचाते पुरुषों के जोश पर उड़ेलते हुए पानी
होलई की परिक्रमा करती धिक्कारती हैं औरतें हाथ दिखा दिखाकर
धिक! धिक! धिक
हाय! धिक!  धिक!
धिक धिक ये उन्माद
धिक धिक ये मर्दोल्लास
परपीड़क आनंद के भोगी ओ अमानुषों धिक्कार
हत्या की बर्बरता का ज़श्न मनाते ओ दुष्टों, मुँहझौंसों धिक्कार
हर घर से माँग ले आए, घर घर से बटोर ले आए
एक स्त्री की हत्या में हर घर का अवदान है,
ये लकड़ी उपली कड़सा रँहठा,
सरसोंता झाँखर झलांसी चइला, उफ्फ़!
हरे भरे जवान पेड़ों को काट काट यूँ दाहते
कि ये धरती का दुःख विराट, और ताज़्जुब
नहीं शिक़न नहीं, दर्प लोटता तुम्हारे चेहरों पर
हरे हरे हमारे दुख सा
हरा चना हरी मटर हरी जई
उखाड़कर भूनते हुए होरहा
तुम अपनी बर्बरता का ज़श्न मना रहे हो
हरे हरे मन से हम मना रहीं मातम
वीरांगना बहिनी की हत्या का
होलिका बहिनी की हत्या का

(3)
हा! होलिका, हा! बहिनी करती स्त्रियाँ वापिस लौटती हैं घर
फिर घर से पोतनउरी लिए बाहर निकलती हैं स्त्रियाँ
उन्हें आता देख खुद को बचाते पराते हैं पुरुष
और छिड़कती हुई पिरोड़ी चँहटा
दूर तक पहँटती हैं स्त्रियाँ, गारी गाते हुए
जिसके भावार्थ कुछ यूँ कि
हे, देवताओं दुराचारियों
गिर जाए कटकर वो शिश्न
कमजोर नसों पर है जिसकी टिकी संस्कृति तुम्हारी
वृंदा की योनि को तलवार बनाकर अंधक की हत्या करने वाले

ओ दुराचारी, ओ हत्यारे
क्या तनिक भी न धिक्कारा तुझे
तेरी महान संस्कृति ने!
शिश्नोदरी संस्कृति ने!
याचक प्रेमी बनकर रानी कयादु की मन-साखों पर कूँकने वाले ओ धूर्त
क्या तनिक भी न लाज़ आई तुझे
कयादु की योनि पर अपनी संस्कृति का तंबू गाड़ते?
किसी कौए का घोंसला नहीं थी कयादु की कोख
जो तू छोड़ गया उसमें अपनी संस्कृति का वजूद
किसी नर कोयल की माफिक़ बड़ी मक्कारी से
ओ हत्यारे, ओ दुराचारी देवताओं
हमारी ही योनियों पर हो खड़े लड़े तुमने धर्मयुद्ध सारे
शिश्न ही तुम्हारा विष्णवास्त्र, शिश्न ही इंद्रास्त्र ब्रह्मास्त्र
जानती हैं हम स्त्रियां

रुको रुको ओ शिश्नोदरी के जनों रुको
कि तुम्हारी कायरता के बदले हम
मलने आईं हैं तुम्हारी मुखों पे अवीर
मुँह छुपाए भागते ओ कायरों रुको रुको
जैसे फोड़तीं हम पोतनउरी ऐसे
फूटे अंडाशय तुम्हारे ओ रुको रुको
और फिर पोतनउरी फोड़ वापिस लौटती हैं स्त्रियाँ।
नहाती हैं लट खोलकर।

तस्वीरें: साभार गूगल

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इस्लाम में हराम परिवार-नियोजन: एक मिथक

हुस्न  तबस्सुम निंहां

शोध-सारांश

अब तक के समय में जहां भारत ने विभिन्न  क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है वहीं कुछ समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। जिसमें सबसे महत्‍वपूर्ण समस्या  है अनियंत्रित जनसंख्या। देश के सम्पूर्ण विकास में जहां मृत्यु दर का ह्रास हुआ है वहीं जन्म दर पूर्ववत बना हुआ  है। बेहतर स्वाथ्य  और भोजन प्राप्ति से लोगों की प्रजनन क्षमता बढ् गई है इस प्रकार उच्च जन्म दर व निम्न  मृत्यु‍दर के कारण जनसंख्या विस्फोट की समस्या सम्मुख  आ खड़ी हुई है। इस जनसंख्या‍ विस्फोट ने कई अन्य समस्यााओं को जन्म‍ दिया, जैसे- निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, आवास, कुपोषण आदि। जनसंख्या‍ वृद्धि को मानवीय समाज के सम्मुख प्रस्तुत सभी समस्याओं जैसे तापमान में असंतुलन, पर्यावरणीय गिरावट, जातीय प्रतिस्पर्धा, व्यासपक स्तर पर फैल रही गरीबी और भुखमरी आदि के अलावा आर्थिक विकास दर में कमी, राजकीय समाज कल्याण क्षमता में कमी, तथा लोगों का जीवन स्तर सुधरने की दिशा में मुख्य बाधा के रूप में मना जाता है।

काहिरा सम्मेमलन में विश्व  के 180 देश शामिल हुए थे। इन सभी ने मिल कर इस पर चिंता जताई थी कि प्रतिवर्ष 9 करोड़  लोग दुनिया में बढ़ रहे हैं। इसकी रोक-थाम के लिए परिवार-नियोजन को अपनाने पर जोर दिया गया था। दुनिया की आबादी ना बढ़े इसके लिए जिन साधनों का उपयोग किया जाएगा उन पर 17 अरब डॉलर खर्च किए जाने की घोषणा की गई थी। रॉयल सोसायटी द्वारा प्रकाशित एक अन्य रपट में कहा गया है कि इस पृथ्वी पर लम्बे  समय तक जीवन बनाए रखने के लिए जितनी आबादी होनी चाहिए उससे हमारी आबादी इस समय हजार गुना ज्यादा है।

प्रस्ताावना

उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर दादरी में मोहम्मद उमर अपनी पत्नी आसिया के साथ रहते हैं। सरकार द्वारा या गैरसरकारी एजेंसियों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के संदेशेा की इन्होंने बारहाअनदेखी की या गमभीरता से नहीं लिया। इनके 24 बच्चे हैं। आसिया बेगम को जहां तक याद है उन्होंने  29 बच्चों को जन्म  दिया। जिसमें से चार बच्चे चल बसे। पिता उमर का कहना है कि मेरे सारे बच्चे कामकाज में लगे हैं। परिवार चलाने में भी कोई परेशानी नहीं होती। वहीं आसिया बेगम कहती हैं कि ‘’ हमारे इस्लाप में जनसंख्या निंयंत्रण के साधनों का इस्त माल करने की मनाही है।‘’ वह कहती हैं ‘’ऑपरेशन करना पाप है। यदि मैं ऑपरेशन कराती हूं तो मरने के बाद मेरी कब्र पर कोई प्रार्थना नहीं की जाएगी।‘’

यह अकेला ऐसा उदाहरण नहीं है, ऐसे लाखों उदाहरण हमें मिल जाएंगे जहां आम मुसलमान आंध-आस्‍‍था ग्रस्त है। इसका निवारण तभी हो सकता है जब मुस्लिम समुदायों में परिवार-नियोजन के प्रति जागरूकता फैलाई जाए। यही भ्रांतियां मुसलमानों की तरक्की में अवरोधक साबित होती हैं।

वास्तव में अरबियन समाज को कभी बर्बर समाज की संज्ञा दी जाती थी। यहां तमाम छोटे-छोटे कबीले थे, जिनकी स्थिति काफी चिंताजनक थी। वहां ऐसी प्रथा थी कि गरीब अरब कबीलों में लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था। चूंकि लड़के कमाने वाले होते थे इसलिए  उनकी रक्षा की जाती थी। इन कबीलों में लड़कियों को बचाना भी एक कठिन समस्या  थी। उसी युग में ये आयत उतरी—‘’ कत्ल न करो, हम उसको भी रोजी देते हैं, तुमको भी देते हैं’’ यह आयत संतान के कत्ल’ यानि लड़की को कत्ल  करने के संबंध में उतरी थी न कि गर्भ-निरोध के बारे में।

विभिन्न धर्मों में परिवार-नियोजन 
परिवार की नैतिकता को लेकर सभी धर्मों में भिन्न– भिन्न विचार हैं। रोमन कैथोलिक चर्च कुछ मामलों में केवल प्रकृतिक परिवार नियोजन को स्वीाकार करता है। हालांकि कैथेलिकों की एक बड़ी संख्या जो विकसित देशों में निवास करती है परिवार नियोजन के नए साधनों को स्वीकार करती है। प्रोटेस्टेंट में कई तरह के विचार हैं। यहूदी धर्म के विचार कठोर रूढि़वादी सम्प्रदाय  से अधिक शिथिल सुधारवादी सांम्प्रदाय तक विविधतापूर्ण हैं। हिंदू सांम्प्रदाय में दोनो प्रकार के उपायों को माना जाता है। वहीं इस्लाम में गर्भनिरोधक को तभी तक समर्थन है जब तक उसमें स्वास्थय  के लिए खतरा ना हो। कुरान गर्भ-निरोध की नैतिकता के बारे में कोई विशिष्ट  कथन प्रस्तुत नहीं करता। प्राय: इसमें ऐसे कथन शामिल हैं जो बच्चे पैदा करने को प्रोत्साहन देते हैं।

हालांकि इसके पीछे कारण कुछ और ही थे। कहीं न कहीं ये विचार ही पूर्णतः: स्वांर्थपरक था। अध्ययनों से  ऐसा लगता कि इसके पीछे कुछ राजनीतिक कारण भी शामिल थे। जो इस प्रकार थे-

राजनीतिक कारण
चूंकि उस दौर में इस्लाकम का विस्ताकर कम या न के बराबर था इस्लािम अपने निर्माण के दौर में था, अत: अपनी संख्याे बढ़ाने के लिए या अपनी उम्म त को बहुमत में लाने के लिए मोहम्मंद ने जनसंख्या: बढ़ाने का अहवान किया और अधिक संतान जनने की अपील की। यही कारण है कि इस्लामी देशों में भी परिवार-नियोजन का बहिष्कारर किया जा रहा है। मसलन पिछले दिनों ईरान के इमाम खुमैनी एवं राष्टवपति अहमद नियाज ने एक वक्तव्य  जारी कर कहा कि ‘ईरान में मुस्लिम जनसंख्या तेजी से घट रही है। इसलिए ईरानियों को चाहिए कि कम से कम 9 से 10 बच्चे पैदा करें। इतना ही नहीं मौका पड़ने पर बहु-विवाह भी करें। जीवन स्तर बनाए रखने के लिए जो रिवाज चल निकला है उसे तुरंत समाप्त  करें और इस बात की चिंता छोड़ दें कि उनका लालन-पालन कैसे होगा। आने वाली संतानों की चिंता मां-बाप को नहीं बल्कि उस ईश्वर को करनी है जिसकी आज्ञा से उन्होंने धरती पर जन्मा लिया है।’

हालांकि ईरान में शाह के शासन में इस बात की मान्यता थी और प्रचार-प्रसार किया जाता था कि अपना जीवन स्तर उंचा बनाए रखने के लिए छोटा परिवार अत्यंत आवश्यक है किंतु अब ईरानी नेताओं का कहना है कि यह सिद्धांत भ्रामक और इस्लाम विरोधी है। यहां तक कि विश्वा स्तर का मुस्लिम संगठन ‘’उम्माल’’ भी इस विचार को प्रचारित कर रहा है कि मुसलमानों की संख्या घट रही है जो अपने आपमें एक खतरनाक संकेत है। यदि ईश्व रीय संदेश जो कुरान का संदेश है, की अवहेलना की गई तो इस्लाम के साथ-साथ मुस्लिम साम्राज्य भी खतरे में पड़ जाएगा। अत: वर्तमान में परिवार-नियोजन की जो संकल्पना है वो हदीस व कुरान विरोधी है।’

पाकिस्तान की स्थिति भी इससे मिलती-जुलती है। पाकिस्तान के एक कंडोम ‘’जोश’’ को अनैतिक घोषित कर दिया गया। ‘’जोश’’ को पाकिस्तांन में अमरीका का एक गैर-लाभकारी संगठन चलाता था। यह संगठन परिवार-नियोजन और एड्स से बचने के बारे में जागरूकता का काम करता था। देश के इलेक्टरानिक मीडिया नियामक प्रधिकरण पी एम आर (पेमरा) ने सभी टेलिविजिन के चैनलों केा यह निर्देश दिया गया कि वह ‘’जोश’’ का प्रचार-प्रसार बंद करें। पेमरा के प्रवक्ता  फखरूददीन मुगल के ब्रॉडकास्टाटर्स एसोसिएशन को भेजे गए पत्र में कहा गया कि ‘’ यह विज्ञापन अश्लील है। अनैतिक है। यह हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक मान्य ताओं के पक्ष में नहीं है।

इसी प्रकार फिलिस्तीन में यासर अराफात ने 12 बच्चों को जन्म  देने का आग्रह किया। जिसमें दो पर परिवार का दायित्व हो तथा दस इस्राईल के विरूद्ध संघर्ष करें। आज भी एक फिलिस्तीनी महिला औसतन चार बच्चों को जन्म देती है। वहीं यहूदी परिवार में 7 से 8 बच्चे् जन्म लेते हैं। फिर भी मुस्लिम विद्वानों का मत है कि सारी दुनिया में मुसलमानों की संख्या  कम हो रही है। यदि विशाल क्षेत्र वाले हिस्से पर मुसलमानों का अपना अधिकार ही न होगा और अधिकतम भाग पर बाहर वाला आ कर उस पर काम करेगा तो उसकी मिल्कियत कितने समय तक रहेगी। इस्लाामी विद्वान मानते हैं कि इनकी जमीन पर इनका ही कब्जा होना चाहिए। क्योंकि उनकी जमीन अगर किसी और के हाथों में चली जाएगी तो उनका अस्तित्वत कहां रह जाएगा।

इन्हीं का अनुसरण करते हुए भारतीय मुसलमानों में भी परिवार-नियोजन के प्रति कोई रूचि नहीं है। हालांकि तरक्की  पसंद मुस्लिम समाज का नजरिया अलहदा है। प्रतिष्ठित साहित्यीकार हसन जमाल कहते हैं कि ‘’ कुदरत का उसूल है कि ताकत का मुकाबला  ताकत से  किया जाए, चाहे वो किरदार की ही ताकत क्यों  न हो।‘’ महात्मा गांधी ने सूरज न डूबने होने वाली ब्रितानी ताकत का मुकाबला अहिंसा से किया। मुसलमानों को उनसे सबक लेना चाहिए। आबादियों की वृद्धि से ताकतों का मुकाबला नहीं किया जा सकता। उसके लिए दूसरे स्तरों पर मजबूत होना पडे़गा। कभी मुसलमान इल्मा, हिकमत, सांईस हर मामले में गोरी कौमों से आगे बढ़ रहे थे किंतु आज वे काफी पिछड़ चुके हैं। दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी देश हैं जहां परिवार-नियोजन को लेकर सकारात्मक अवधारणएं भी हैं। इजिपट में हर शुक्रवार को नमाज के बाद इमाम को परिवार-नियोजन के लाभ पर अपना व्या्ख्यान देना होता है। मलेशिया में परिवार-नियोजन का उलंघन करने वाले को फौजदारी कानून के अंतर्गत दण्डित करने का प्रावधान है। बंगलादेश, इंडोनेशिया, थाईलैण्ड, और ईरान में परिवार-नियोजन की मुहिम एशियाई बैंक के माध्यम से चलाई जाती है। इंडोनेशिया में राष्टीय परिवार-नियोजन बोर्ड परिवार-नियोजन के कार्यक्रमों का संचालन करता है।

असम में गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में सर्जरी के प्रो. इलियास अली ने मुसलमानों के जेहन से परिवार-नियोजन निषेध की जो धारणा है उसे बदलने की मुहिम छेड. रखी है। इसके लिए वह बाकायदा कुरान की आयतों का हवाला देते हुए कहते हैं कि परिवार-नियोजन इस्लाहम में हराम नहीं है या कुरान परिवार नियोजन के खिलाफ नहीं है। डॉ. इलियास गांव-गांव जाकर मुसलमानों केा इसके प्रति जागरूक बना रहे हैं और बता रहे हैं कि इस्लाम एक अनूठा धर्म है जिसमें आबादी पर काबू पाने के तौर तरीकों का ब्योरा भी है जिसे ‘’अजाल’’ कहा जाता है। इसी के आधार पर ईरान में परिवार-नियोजन अपनाया जा रहा है और इसकी जवाबदेही धर्मगुरूओं को सौंपी गई है। ये ईरानी दम्पितयों के बीच कुरान की आयतों की सही व्याख्या कर लोगों को परिवार-नियोजन के लिए प्रेरित करते हैं।

इस प्रकार ये स्पष्ट है कि परिवार-नियोजन के खिलाफ फैलाई जाने वाली धारणा नितांत व्यक्तिगत और स्वार्थ परक है। इसका धार्मिकता से कोई लेना-देना नहीं है। हां धर्म के आधार पर इस विचार को आम-जन तक पहुंचाना तथा उन पर लागू करना काफी आसान है इसी लिए इसे धर्म से जोड़ दिया गया है। इस अवधारणा को मुस्लिम धर्म गुरू, मुस्लिम नेता आदि अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करते रहते हैं। अत: परिवार-नियोजन इस्लाम के खिलाफ है ये पूरी तरह मिथकीय और भ्रामक अवधारणा है।

इस्लामी साहित्य  में परिवार-नियोजन की परिकल्पना


ऐसा माना जाता है कि कुरान के सिवा पैगम्बर मोहम्मद साहब के जीवन में भी ऐसी कुछ घटनाएं घटीं जिससे प्रतीत होता है कि वह परिवार-नियोजन के समर्थक थे। दाएमुल इस्लाम भाग दो के पृष्ठ 88 और 89 पर इब्नए ए अब्बाास का जिक्र करते हुए कहा गया है कि बडा कुटुम्ब गरीबी का प्रतीक होता है जबकि छोटा पविार सुखी होता है। काहिरा विश्वविद्यालय के कानून विभाग के अध्यक्ष शेख मो. इब्राहीम का कहना है कि यदि प्राचीन समय में गर्भ रोकने के लिए दवाएं और चीराफाडी होती थी तो फिर आज के समय में परिवार नियोजन पर किस तरह प्रश्न उठाया जा सकता है। शेख मोहम्मद अलमुबारिक अल अब्दुिल्ला  अपने निबंध में लिखते हैं—“वास्तव में परिवार-नियोजन आज की दुनिया में धार्मिक समस्या न हो कर सामाजिक समस्या है”। इस लिए इस पूरे मामले पर सामाजिक दृष्टि से विचार करना चाहिए। इस्लाम के चार इमामों में एक इमाम गजाली ने अपनी पुस्तक “अहयाउल उलूम’’ को सिर्फ गर्भ-निरोधक पर ही केद्रित कर लिखा है।

इस्लाम में प्रतिबंधित परिवार नियोजन एक मिथकीय परम्परा है। इसका यथार्थ से कोई लेना-देना   नहीं है। मुस्लिम समाज में परिवार नियोजन को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं। इसी कारण यह समाज काफी पिछडा तो है ही, जनसंख्या घनत्व का भी इस पर विपरीत असर पडता है।यही परिकल्पना इस अध्ययन का आधार है।

प्रस्तुयत शेाध अध्ययन के लिए 300 लोगों का चुनाव किया गया है। अध्य यन क्षेत्र वर्धा है। इन लोगों की औसत आयु 35 से 50 वर्ष तक है। इस शोध के अंतर्गत निम्न वर्ग, निम्न मध्ययम वर्ग तथा उच्च वर्ग के परिवारों का चयन किया गया है।

प्रस्तुत शोध में प्रथमिक तथा द्वितीय स्रोतों का प्रयोग किया गया है। प्रथमिक स्रोत के अंतर्गत प्रश्नावली का निर्माण किया गया है जिसमें परिवार नियोजन तथा जनसंख्या  से सम्बंधित प्रश्न पूछे गए हैं। द्वितीय स्रोत के अंतर्गत लिखित पुस्त्कों, समाचार  पत्रों, शेाध प्रबंध इत्याबदि  का  अवलोकन किया गया  है।

अनुसूची का विश्लेषण

1. आपके कितने बच्चे  हैं ?

300 उत्तरदाताओं से पूछे गए प्रश्नों  से ज्ञात हुआ कि  24 प्रतिशत के 1 से 2, 47 प्रतिशत के 3 से 4, 27  प्रतिशत के 5 से 6, 15 प्रतिशत के  7 से 8 तथा  5 प्रतिशत  के 9 से अधिक बच्चे हैं। अत:  स्पष्ट होता है कि सबसे अधिक 47 उत्तरदाताओं के 3 से 4 बच्चे हैं, तथा  यह भी स्पष्ट होता है कि 300 उत्तरदाताओं में 15 प्रतिशत के 7 से 8 तथा 5 प्रतिशत लोगों के 9 से अधिक बच्चे हैं।  इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मुस्लिम परिवार ज्याादा बच्चे करते हैं।

2. आपकी राय में कितने बच्चे होने चाहिए ?
300 उत्त‍रदाताओं में से  21 प्रतिशत का जवाब  2 बच्चेे,  13 प्रतिशत का 3 बच्चे,  25 प्रतिशत का 4 बच्चे तथा   41 प्रतिशत का जवाब था जितने खुदा दे दे, होने चाहिए।

3. आप बच्चों के भविष्य के बारे में किस तरह सोचते हैं ?
300 उत्त रदाताओं से पूछे गए प्रश्न  आप बच्चें के भविष्य के बारे में किस तरह सोचते है से ज्ञात हुआ कि  16 प्रतिशत सब अल्लाह सोचता है एवं  77 प्रतिशत बच्चोंं का भविष्य अच्छा हो तथा  7 प्रतिशत जो किस्मत बना दे के फॉर्म में सोचते हैं।

4. क्या आप परिवार नियोजन के विषय में जानते हैं ?
300 उत्त‍रदाताओं में से   90 प्रतिशत परिवार नियोजन के बारे में जानते हैं तथा  10 प्रतिशत लोग परिवार नियोजन के बारे में अनभिज्ञ हैं। अत: स्पष्ट होता है कि परिवार नियोजन के बारे में लगभग सभी लोग जानते हैं।  परंतु अन्य प्रश्नों  से ज्ञात मतों से यह भी साफ तौर पर स्पष्ट होता है कि परिवार नियोजन के बारे में जानते तो हैं परंतु उसे अपनाने में कोताही बरतते दिखाई प्रतीत होते हैं।

5. क्या परिवार नियोजन लाभदायक है ?
51 प्रतिशत उत्तरदाता परिवार नियोजन को लाभदायक समझते हैं एवं  5 प्रतिशत परिवार नियोजन को लाभदायक नहीं मानते तथा 44 प्रतिशत लोगों ने कह नहीं सकते के पक्ष में अपने मत दिए।

6. परिवार नियोजन से क्या जीवन स्तर में बदलाव आता है. 
42 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मत है कि परिवार नियोजन अपनाने से मुस्लिम समुदाय के जीवन स्तर में बदलाव आ सकता है एवं 30 प्रतिशत लोगों ने कहा नहीं कोई बदलाव नहीं आएगा तथा 28 प्रतिशत  लोगों ने पता नहीं के पक्ष में अपना मत दिया।

7.क्या आपको लगता है कि परिवार नियोजन अपनाना गुनाह या हराम है ?
300 उत्त रदाताओं में से 49 प्रतिशत लोगों का मानना है कि परिवार नियोजन अपनाना गुनाह या हराम है एवं30 प्रतिशत लोगों ने कहा कि नहीं परिवार नियोजन अपनाना हराम या गुनाह नहीं है, यह वक्त की मांग है तथा 21 प्रतिशत लोगों ने पता नहीं के पक्ष में अपना मत दिया। अत: स्पष्ट  होता है कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को परिवार नियोजन अपनाना हराम या गुनाह लगता है।

निष्कर्ष
निष्किर्ष के अंतर्गत यही कहा जा सकता है कि परिवार-नियोजन की अवधारणा पूरी तरह से राजनीतिक व अन्य  निजी स्वावर्थों के कारणों से प्रेरित है । इस अवधारणा की महत्ता देश व काल व क्षेत्रियता के लिहाज से घटती व बढ़ती रही है। वास्तव में ये एक मिथकीय परम्परा है जिसे पूरी तरह से आम सहमति भी नहीं है।

संदर्भ-ग्रंथ सूची
1- मौदूदी, सैयद अबुल आला, पु. इस्लाम और बर्थ कंट्रोल, (2003) प्र. मर्कजी मक्त-बा इस्लाीमी पब्लिशर्स, नई दिल्ली
2- आजाद, फरजाना अमीन, पु. मुसलमान पुरूष: शोषक व पोषक ( 2005 ) प्र.संघ प्रकाशन, नागपुर
3- हुसैन, मुजफ़्फर,  पु. जनगणना, इस्लाम और परिवार-नियोजन (2005) प्र.विश्व। संवाद केंद्, मुंबई

लेखिका  अहिंसा एवं शांति अध्यनयन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्री य हिंदी विश्वाविद्यालय में शोध छात्रा हैं. संपर्क:  Email :-nihan073@gmail.com

तस्वीरें गूगल से साभार 

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बीजेपी, आरएसएस में भगदड़, उबरने के लिए वे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करेंगे: अरुंधती रॉय

स्त्रीकाल डेस्क 

लेखक और एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय ने कहा है कि देश की पूरी बुनियाद को ही तोड़ा जा रहा है और सत्ता के साथ एक समानांतर राज्य काम करना शुरू कर दिया है। जिसका मकसद? “संविधान को बदलने की वैचारिक तैयारी” है।” अरुंधति ने ये बातें आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कही। इस साक्षात्कार में उन्होंने मौजूदा शासन को लेकर अपनी अनेक चिंतायें ज़ाहिर कीं।

उन्होंने देश के भविष्य को लेकर सुनायी पड़ने वाली बुरी आहट को लेकर कहा,”एक ऐसी आहट है जो मुझे लगता है कि बहुत से लोग सुन नहीं पा रहे हैं और कुछ बहुत गंभीर रूप से चुप कराया जा रहा है और वह यह है कि हम ऐसे हालात में जी रहे हैं, जिसमें आपका संपूर्ण ध्यान तात्कालिक आपराधिक घटनाओं पर होगा- किसका गला काटा जा रहा है, किसको मारा जा रहा है और अन्य इसी तरह की घटनाओं पर – आपको नहीं पता है कि उन सभी चीजों के पीछे, भय और आतंक की एक बड़ी मात्रा है और बहुत से समुदायों को इनमें धकेल दिया जा रहा है। मुझे नहीं लगता कि शहरी भारत के लोग कृषि संकट और उसकी हद तक को जानते हैं”।

अरुंधति ने स्थापित की जा रही समानांतर सत्ता को लेकर आशंका जताते हुए कहा कि “जब मैं स्थायी राज्य की बात करती हूं तो मैं उन शक्तियों का जिक्र कर रही होती हूं जो चुनावों से नहीं बदलती हैं। वह वैसी ही रहती हैं। इसलिए अगर वे चुनाव हारती भी हैं, तो वे जीवन के स्तरों में प्रवेश कर जाती हैं। आरएसएस, ज़ाहिर है कि, एक अलग मामला है। यह स्थायी राज्य नहीं है, यह समानांतर राज्य है”।

बातचीत में आगे उन्होंने कहा “मुझे नहीं लगता कि देश कभी भी इस तरह की स्थिति में रहा है,” उन्होंने विस्तार से इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि यह अब वैसी ही बात क्यों नहीं है जहां कोई कहता है ​​कि कांग्रेस पार्टी ने भी तो ऐसा ही किया था जब वह सत्ता में थी। “वो सब (पिछली सरकारों की ग़लतिया) सही है, लेकिन अभी तो, संविधान को ही बदलने की एक वैचारिक तैयारी है।”

उन्होंने कहा कि “यह सिर्फ इस बारे में नहीं है कि सरकार में कौन है बल्कि स्थायी राज्य के बारे में है – जो अपरिवर्तनीय हैं: न्यायपालिका, नौकरशाही, विश्वविद्यालय, इंटेलिजेंस ब्यूरो और इसी तरह की अन्य शक्तियां – बहुसंख्यक लोगों के लोगों द्वारा यह सब भरी जा रही हैं (अगर बहुसंख्यक समुदाय के रूप में एक चीज है तो वरना, मुझे लगता है कि हम अल्पसंख्यकों के देश हैं)। वे क्या नहीं समझ पा रहे हैं कि यह हमें उसी जगह में वापस ले जाने की कोशिश है जहां हम जाने की कभी उम्मीद ही नहीं कर रहे थे। सभी को एक बिल में धकेल दिया जा रहा है।”

उन्होंने सरकार की लोकतांत्रिक आईक्यू पर सवाल उठाते हुए कहा,”आईक्यू या बौद्धिक स्तर में इस सरकार में बहुत कमी आई है” और जब न्यायाधीश लोया या सोहराबुद्दीन मामलों के बारे में पढ़ते हैं तो “लोगों पर बहुत निराशाजनक प्रभाव” होता है।”

साक्षात्कार में वो आगे कहती हैं,”आप देखिये कि सुप्रीम कोर्ट में क्या हो रहा है और तुरन्त आप मीडिया में डर महसूस करते हैं। क्या होता है कि नौकरशाह भी डरने लगते हैं, मंत्रियों को डर लगता है। आप सभी की पहल करने की क्षमता को दूर कर रहे हैं, हर निर्णय दो लोगों द्वारा नहीं लिया जा सकता, लेकिन अन्य लोग फैसले लेने से डर रहे हैं, वे कुछ भी कहने से डर रहे हैं। तो जो कुछ तुम देख रहे हो वह किसी चीज को चीरना फाड़ना नहीं है, वास्तव में हर गाँठ खुल रही है, इसलिए आप केवल अंत में मुट्ठी भर धागा पाएंगे। ये सचमुच बेहद डरावना है।”

अरुंधति देश को आने वाले दिनों में एक अनचाहे हालात से दो-चार होने की आशंका पर कहती हैं, “मैं सच में इस बात से डरी हुई हूं कि इस समय बदलाव की एक भावना काम कर रही है और इसके चलते बीजेपी और आरएसएस में एक तरह की भगदड़ है। इसलिए एक बार फिर से ध्रुवीकरण के लिए वो कुछ भी करेंगे। हम सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या के फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जो भी फैसला होता है,उसका इस्तेमाल लोगों के बीच फूट पैदा करने में किया जा सकता है। यह मायने नहीं रखता कि कोर्ट क्या कहता है। फैसले को लोगों को आपस में बांटने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। और चुनाव के लिहाज से फैसले का समय बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए भी मैं बहुत डरी हुई हूं।” उन्होंने ये भी कहा कि चुनाव के मूड के लिहाज़ से अगर सही बैठता है,तो यहां “एक सीमित युद्ध भी हो सकता है।”

रॉय ने कहा कि “वो इस साल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के शोर को और बढ़ाने जा रहे हैं। मुझे नहीं पता कि वो कामयाब होंगे या नहीं,लेकिन उसका बिगुल पहले ही बज चुका है।”

पीएम मोदी के नोटबंदी के महत्वाकांक्षी फैसले पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, “ये बेहद तानाशाही भरा और अलोकतांत्रिक फैसला था। जैसा कि हम जानते हैं करेंसी एक स्टेट और उसकी जनता के बीच सामाजिक करार होती है।”

उन्होंने पीएनबी संकट को एक व्यापक आर्थिक संकट बताया, “पहले तो आप लोगों को अपने पैसे बैंक में रखने के लिए मजबूर करते हैं और उसके बाद ये लोग हजारों करोड़ लेकर भाग जा रहे हैं। मुझे यकीन है कि नीरव मोदी ने सिर्फ गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां प्राप्त की हैं। वह सारा धन उन पूजीपतियों को दे दिया गया जो इसे वापस नहीं करते हैं, ऐसा लगता है, कि इसे वापस भुगतान करने की उन्हें ज़रूरत भी नहीं है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि हम उस समय को पूरी तरह से समझ रहे हैं जिसमें हम रह रहे हैं। यहां तक ​​कि सतह पर आप दरारें देख रहे हैं लेकिन उस सतह के नीचे, चीजें बहुत ज्यादा नष्ट होने की कगार पर हैं।”

राय के मुताबिक सत्तारूढ़ पार्टी की कार्रवाइयों को केवल वही प्रसन्नता भरी नज़रों से देख सकता है,जो देश का भला नहीं चाहता है। उन्होंने कहा कि “क्योंकि वे इसे कमजोर होते और बिखरते देख रहे हैं, वह भी शीर्ष पर नहीं बल्कि पूरी बुनियाद ही खत्म कर दी जा रही है। लोकतंत्र की संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है।”

अपने ऊपर लगाए जाने वाले राष्ट्रद्रोह के आरोप को लेकर उनका जवाब था,“जो कोई अन्याय की आलोचना करता है, जो नीति के साथ तर्क करता है, या जो सबसे गरीब लोगों या सबसे निराश्रित लोगों को कुचलने के तरीकों का विरोध करता है अगर वह एक राष्ट्र विरोधी है तो यह आपको बताता है कि उनके राष्ट्रवाद पर उनके विचार क्या हैं।”

उन्होंने खेद व्यक्त किया कि “हम जो कुछ यहां तलाशते हैं (मौजूदा समय में) वह है साथी होने की भावना, आप राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को वास्तविक चिंता या प्रेम के साथ बोलते नहीं पाते हैं। हर कोई सिर्फ अपने सिर में किसी विचार के साथ लोगों के सिर पर हथौड़ा मारना चाहता है। मुझे उनकी बातचीत में किसी के प्रति भी दया और प्यार नहीं दिखता है- यहां तक ​​कि अस्पतालों में मरने वाले बच्चों के लिए भी नहीं।”

www.janchowk.com से साभार

तस्वीरें गूगल से साभार 

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चारपाई (रजनी दिसोदिया की कहानी)

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रजनी दिसोदिया

साहित्यकार , आलोचक रजनी दिसोदिया मिरांडा हाउस मे हिन्दी की प्राध्यापिका हैं. संपर्क : ई -मेल : rajni.disodia@gmail.com,मोबाईल , मोबाईल : 9910019108 

सारा सामान ट्रक में लादा जा रहा था और वह टूटी चारपाई अभी बॉलकनी में ही खड़ी थी।बूढ़े रामस्वरूप बाहर, नीचे  कुर्सी पर बैठे, वहीं से बॉलकनी में खड़ी चारपाई को देख रहे थे। ऊपर से नीचे  सामान लाने वाले मजदूरों को वे बार-बार हिदायत दे रहे थे कि वह बॉलकनी में रखी चारपाई  भी ट्रक में रखनी है।उस चारपाई की हालत देख कर मजदूर यह अनुमान नहीं लगा पा रहे थे कि क्या सचमुच उसे ट्रक में लादा जाना है। उनका अनुमान था कि ये लोग इस कबाड़ को यहीं छोड़ जाएंगे तो हम इसे यहाँ से ले जाएंगे गर्मियों में झुग्गी  के बाहर एक चारपाई पड़ी रहे तो आए गए को ठहराने में कुछ आराम रहेगा। किन्तु हर बार के चक्कर में रामस्वरूप उन्हें वह चारपाई भी नीचे उतार लाने की जो हिदायत  दे रहे थे उससे उनका मन डोलने लगता था। सीढ़ीयों पर आते जाते एक दूसरे को मजाक में ठेलते हुए कह बैठते ” कंजूस बुड्ढा खाट के पीछे पड़ा है , इस टूटी खाट को क्या अपनी अर्थी के साथ ले जाएगा।”  रामस्वरूप उन सबकी इस बातचीत को सुनकर भी अनसुना कर रहे थे। उनकी नज़रें उस चारपाई पर ऐसे अटकी पड़ी थी कि जैसे परियों की कहानी में राक्षस की जान पिं‍जरे के तोते में अटकी पड़ी रहती है। जैसे- जैसे सामान नीचे आ रहा था और वह चारपाई ऊपर वॉलकनी में ज्यों की त्यों रखी दिखाई दे रही थी वैसे -वैसे रामस्वरूप का पारा भी ऊपर चढ़ने लगा था। वे मन ही मन तय कर रहे  थे कि यदि यह चारपाई साथ नहीं ले जाई गई तो वे भी बहू-बेटे के साथ नए घर में नहीं जाएंगे , अकेले यहीं रह लेंगे। रामस्वरूप अपने जमाने के कम जिद्दी इंसान नहीं रहे। एक बार जो ठान लिया बस ठान लिया फिर समझाने वाला लाख समझाता रहे कि उनका निर्णय उन्हीं के लिए नुकसानदायक है तो भी अंगद का पांव अपनी जगह से हटे तो रामस्वरूप अपनी जिद से टलें।

रामस्वरूप बखूबी जानते थे कि यह सरकारी मकान है और उनके बेटे को अब इससे बड़ा मकान मिल गया है तो इसे तो छोड़ना ही होगा, पर उनकी जिद के सामने कभी उनके बाप की नहीं चली तो फिर ओमप्रकाश तो वैसे भी बेटा है।   एक मजदूर जो रामस्वरूप की ताजा झिड़की से तिलमिला गया था। ” ले जाने दो साले बुड्ढे को, इस टूटी खाट के लिए इतनी घुड़कियाँ क्यों खाए।”   उसने बूढ़े के बेटे ओमप्रकाश से पूछा -” साहब बाबाजी कह रहे हैं वह बालकनी में खड़ी खाट भी ट्रक में रखनी है।”  उसने इस तरह पूछा था जैसे कह रहा हो आप लोगों को क्या शरम नहीं आती इतने बड़े आदमी होकर इस कबाड़ को भी बांधकर ले जा रहे हो। ऐसा नहीं थ कि ओमप्रकाश के कानों में अपने पिता का शोर , उनकी सख्त से सख्त होती आवाज़ नहीं पहुँच रही थी पर उस चारपाई को देखते ही उनकी हिम्मत पस्त हो जाती थी।चारपाई  क्या थी  बिलकुल ऐन्टिक पीस था।उसकी एक बाई आगे बढ़ रही थी तो दूसरी उससे बंधी होने के कारण उसके पीछे घिसट रही थी क्योंकि दोनों की उम्र में दस बरस का अन्तर तो जरूर था। उसके चारों पाए तक एक डिजाइन के नहीं थे। साफ़ पता चलता था कि  जरूरत के हिसाब से जब जो मिल गया उसे ठोक कर काम चलाया गया है। रस्सी भी पुरानी होते होते काली पड़ चुकी थी और बीच से टूट-टूतकर लटक रही थी।  कुल मिलाकर वह ओमप्रकाश को अपनी उस बेचारगी व मुफ़लिसी का प्रतीक नज़र आती थी जिससे  कड़े संघर्ष के बाद उन्होंने पीछा छुड़ाया था और उनके पिता थे कि वे अब भी उससे चिपटे हुए थे।  वे खुद मन में ठाने बैठे थे कि नए घर में तो इस कबाड़ को वह बिल्कुल नहीं ले जाएंगे। वसन्त कुंज इलाके में उन्हें टाईप फोर का बड़ा मकान मिला था। और मिलता भी क्यों ना , भारत सरकार के संस्कृति विभाग में वे उच्चपदाधिकारी थे। ऐसी जगह में उन्हें अपनी भद्द नहीं पिटानी थी कि वे इस कबाड़ को उठा कर वहाँ ले जाते। वे पूरी तौर पर जानते थे कि एक बार यह चारपाई वहाँ पहुँची तो पिताजी को इसे बाहर आँगन में बिछा कर बैठने से कोई रोक नहीं पाएगा। मजदूर ने साहब को ध्यानमग्न देखा तो फिर से पूछा- “ साहब बताएं क्या करना है।” ओमप्रकाश को कुछ समझ नहीं आया , अभी उन्होंने बला टालने की गरज से कहा कि उसे उठा कर कमरे में रख दो। उनका अनुमान था कि जब नीचे से बॉलकनी में चारपाई खड़ी नज़र नहीं आएगी तो पिताजी के ध्यान से भी उतर जाएगी और वहाँ पहूँच कर वे कह देंगे कि गलती से कमरे में रखी रह गई।

ट्रक में जब सारा सामान लद चुका तो ओमप्रकाश पत्नी बेटी और पिता सहित अपनी कार में नए घर की ओर निकल पड़े। बेटा पीछे ट्रक के साथ अपनी बाईक पर आ रहा था। नया घर यूँ कोई बहुत दूर नहीं था। बस सरोजिनी नगर से निकलकर वसंतकुंज की ओर जाना था। पर कोई साथ ना हो तो मजदूर बीच रास्ते में कुछ सामान गायब कर देते हैं। पिछली बार आज से आठ साल पहले जब उन्होंने उत्तम नगर से सरोजिनी नगर शिफ़्ट किया था तो रास्ते से उनका एकमात्र ट्रांजिस्टर गायब हो गया था। इस बार इसीलिए उन्होंने बेटे को ट्रक के साथ  कर दिया था। उधर जब रामस्वरूप को वह चारपाई बालकनी में खड़ी नहीं दिखाई दी थी तो उन्होंने उसी मजदूर से पूछ लिया था कि वह चारपाई रख दी क्या? , जिसका जवाब — ” हाँ रख दी।” ,उसने कुछ उसी प्रकार दिया जैसे ” अश्वथामा मारा गया नरो वा कुंजरो वा’ का आधा वाक्य श्री कृष्ण के शंख की गूँज में छिप गया था। इसीलिए तसल्ली कर लेने के लिए उन्होंने  अब बराबर बैठे बेटे से पूछा–” वा खाट धर ली थी के ना।” उसी समय ओमप्रकाश का फोन बज गया जिसका फ़ायदा उठाते हुए ओमप्रकाश ने स्वीकृति में  सिर इस तरह हिलाया जिसका अर्थ हाँ भी हो सकता था और ना भी। ओमप्रकाश फोन पर अपने किसी मित्र से बतियाने लगे और इधर रामस्वरूप को ना जाने क्यों किसी षड़यन्र की बू आने लगी । इस अनुमान मात्र से कि वह चारपाई वहीं छोड़ दी गई है वे आपे से बाहर हो गए।

–” तू ठीक-ठीक जवाब क्यूँ ना देता , साहब होगा तू अपणे घर का, उरै( यहीं) ही डाट (रोक) गाड्डी नै, मन्नै कोन्या( नहीं) जाणा थारे साथ, मैं तो ओड़ेही( वहीं) एकला पड़ा रहूँगा।” ससुर की ऊँची आवाज़ से विद्या ( ओमप्रकाश की पत्नी) के कान खड़े हो गए। उसने पिछली सीट से उचककर पूछा।
–” के होया बाऊजी।”
“ अरै मनै थारा दोनुआँ से न्युँ कह राख्खी थी कि वा खाट भी लेय के चालणी सै।” रानस्वरूप की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि विद्या बोली–
–“ तो खाट तो ट्रक मैं गेर( डाल) राक्खी सै।”
विद्या की बात से रामस्वरूप को कुछ राहत मिली फिर भी जब तक घर पहुँचकर वे वह चारपाई  अपनी आँखों से नहीं देख लेंगे तब तक उनके प्राण उनके शरीर में किराये पर ही रहेंगे। अब वे घर पहुँचने का इन्तजार करने के लिए खिड़की से बाहर झाँकने  लगे। अभी पिता के गुस्से के डर से ओमप्रकाश का चेहरा पीला पड़ गया था तो अब विद्या की बात से वह सफ़ेद हो गया। उनकी कनपटियाँ गर्म होने लगी। उन्हें लगा वह चारपाई  भूत की तरह उनके पीछा कर रही है।

ओमप्रकाश को याद है कि अभी पिछले छह दिसम्बर को जब कुछ मित्र लोग उनके घर में इकट्ठा हुए तो उस दिन भी पिताजी इसी चारपाई पर बड़े डठोरे से (गर्वित भाव से ) बैठे थे। उनके लिए वह चारपाई उनका वजूद थी जिसे शहर से गाँव आकर भी उन्होंने संजो कर रखा था। जबकि ओमप्रकाश के लिए वह उनके पिताजी की वह जिद थी जिसके द्वारा वे उनकी सारी उपलब्धियों  को धता बताते थे। उस समय पिताजी  अपनी ऊँची आवाज़ में लोगों को अपने जमाने के किस्से सुना रहे थे कि हफ़्ते भर तक ना नहाने वाली वो बामणियाँ जिनके घाघरों से सिड़ांध आती थी वो भी जब आस पास से गुजरती तो घाघरों को यूँ उकसा( उठाकर समेट लेना) लेती कहीं किसी से भिड़ ( छू) ना जाए। वे बता रहे थे कि अब तो क्या छूआछात है वो तो उनके जमाने में हुआ करती थी। उस समय मि० रंगा जो ओमप्रकाश के परम प्रिय मित्र है ने उन्हे एक कोने में ले जाकर कहा था– “ क्या यार, कम से कम पिताजी को एक ढंग की चारपाई या फोल्डिंग तो ला दे।”  उसका भाव भी यही था कि  ” साले ढेढ पढ़-लिख तो गए पर ढंग से रहना नहीं आया। उनका मानना था कि दलितों को समझना चाहिए कि क्यों बाबा साहब थ्री पीस सूट पहनते थे।  उस समय ओमप्रकाश के लिए अपने मित्र को यह समझाना भारी हो गया था कि समस्या नए फोल्डिंग की नहीं है बल्कि………… खैर रंगा तो फिर भी उनका दोस्त था जिसके मन में बात आई तो जबान पर भी आ गई, पर उनका क्या जो इशारों से एक दूसरे को वह खाट दिखाते  और ओमप्रकाश को यह लगता कि जैसे सरे आम किसी ने उनके कपड़े उतार लिए हों। उन्हें यह चारपाई  एक ऐसा लैंस मालूम पड़ती जिसके भीतर से उनका आज कल सब दिख जाता था जिसे वे बड़े जतन से ढके थे। उन्होंने सोचा था कि अब नया घर तो मिलने ही वाला है तो वहाँ इस चारपाई को लेकर ही नहीं जाएंगे और इधर विद्या ने उनकी सारी योजना पर पानी फेर दिया।

नए घर में आए एक हफ़्ता निकल चुका था।  लगभग सारा सामान अपनी – अपनी जगह ले चुका था पर वह चारपाई कभी इधर तो कभी उधर खड़ी होती पूरे घर में भटक रही थी, और उसके साथ रामस्वरूप भी। आज शनिवार था ओमप्रकाश ने सोचा था कि आज सभी छोटे बड़े काम निपटा देंगे। इतनी तैयारी के बावजूद रोज -रोज  सुनने को मिल ही जाता था कि बाथरूम मे टॉयलेट का सिसटर्न खराब है, कभी रसोई के पीछे की खिड़की का काँच टूटा पड़ा है। छत पर पानी इकट्ठा है। आज उन सबका इन्तजाम करना था।उधर रामस्वरूप भी आज का ही इन्तजार कर रहे थे। दिन चढ़ते ही उन्होंने ओमप्रकाश को घेर लिया।
— रै ओमप्रकाश उरै सुण।( यहाँ आकर सुन )
— हाँ , पिताजी। ” उनके दिमाग के एन्टिना खड़े हो गए। वे पिताजी की आवाज के रूप को पहचानते थे।
— ऐं घर मैं कितणा कमरा सैं।
— चार।” उन्होंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
— इन चार कमरा मैं उस चारपाई  खातर (के लिए ) कोई जगह नहीं।
— ओमप्रकाश का अनुमान ठीक था , मुँह से कोई शब्द न निकला। जवाब ना सुनकर रामस्वरूप का स्वर ओर ऊँचा हो गया।
— तनै बेरा( पता) भी सै वा कित ( कहाँ ) पटक राखी सै।
— “………..”
— सबेरा की धूप साम तक खाट पै ही र्हवै सै,( रहती है ) थमनै वा कंडम ( बेकार ) करकै बगाणी( फेकनी) हो तो साफ़ बता दो।
— तो पिताजी अब उसमैं बच भी के रह्या सै।” ओमप्रकाश ने हिम्मत करके कह तो दिया पर..।
— तो भाई न्यूँ ( ऐसे )तो मेरा मैं के बच रह्या सै तम ( तुम ) मनै भी बगा ( फेंक ) दो।” अब रामस्वरूप भावुक होकर लगभग काँपने लगे थे। ओमप्रकाश यूं ही पिता के सामने ज्यादा बहस नहीं करते थे और अब तो वह असम्भव थी। यह रामस्वरूप का वह ब्रह्मास्त्र था जिससे वे जब तब ओमप्रकाश को निहत्था कर देते थे। अपने बेटे विवेक को यह हिदायत देकर की दादाजी जहाँ कहें उनकी चारपाई वहीं डाल दी जाए, ओमप्रकाश वहाँ से निकल आए। उधर पीछे से विवेक ने दादाजी को कन्धों से पकड़कर कुर्सी पर बिठाया और अन्तत: पूछ ही डाला –” क्या बात है दादाजी आप क्यों उस चारपाई के पीछे पड़े हो, आपके कमरे में लेटने को दीवान है बैठने को कुर्सियाँ हैं………..।” वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि डबडबाई  आँखों से रामस्वरूप ने उसकी ओर देखा–” पर भाई लेट -बैठ कै जिन्दगी कोन्या ( नहीं ) कटती…. फिर वे उठे और उन्होंने अपनी लाठी सम्भाली।, थम अभी क्यान्हैं (क्यों ) समझोगा…।” कह कर धीरे-धीरे बाहर निकल गए। विवेक ने भी समझ लिया कि कुछ बातों के तर्क तीर की तरह सीधे नहीं जाते बल्कि  अनेक तहों के नीचे  आड़े टेड़े चलते है कि ऊपर से दिखाई नहीं देता कि निशाना कहाँ है। उसने पिता के कहे अनुसार वह चारपाई  दादाजी के कमरे में लगा दी।

विद्या रसोई सम्भाल रही थी। पिछले घर की अपेक्षा इस घर की रसोई काफ़ी बड़ी थी। पिछवाड़े की खिड़की से इतनी रोशनी और हवा अन्दर आती थी कि गर्मी में भी वहाँ काम करना अच्छा लगता था। बेटी सुमन भी माँ के साथ लगी कुछ मदद करा रही थी। ओमप्रकाश पिता के हाथों परास्त होकर इधर ही आ निकले।अब उनका सारा आक्रोश विद्या पर उतर जाने को उतारु हो रहा था। वह ही उस चारपाई को इस घर में लेकर आई थी। इसी कारण जो ओमप्रकाश पिता के आगे जो नहीं बोल पाए वह सब उसे सुनाने को आए थे।
— हो गई तसल्ली। उन्होंने आते ही तीर सा छोड़ा।
— किस बात की?” विद्या पूरे एक हफ़्ते से घर की सैटिंग में लगी थी। बच्चे और पति अपने अपने काम पर चले जाते थे दिनभर वह अकेली खट रही थी। उस पर यह ईनाम उसे मंजूर न था। इसलिए उसने उस तीर को वहीं तोड़- मरोड़कर फेंक दिया।
— तुम्हें आखिर किसने कहा था , वो चारपाई  ट्रक में रखवाने के लिए ?” वे सीधा मतलब की बात पर आए।
— अब इस चालीस  बरस की उम्र में भी हर काम आपसे पूछ-पूछकर करूँगी क्या ? “ विद्या सीधा उत्तर देने को तैयार ही नहीं थी।

विद्या के स्वर की तेजी और तल्खी से ओमप्रकाश कुछ मद्दिम पड़े। जानते थे कि आखिर उसी के पिता का मन रखने को विद्या उस चारपाई को यहाँ लेकर आई है। पर यह घर उनका भी तो है कम से कम उनकी इच्छा भी जान ली जाती। पति को चुप देखकर विद्या को भी अपने ऊपर अफ़सोस हुआ। वह रसोई से दूध उठाकर बाहर डाइनिंग टेबुल पर रखने आई और बोली। ” शान्ति रखो सब ठीक हो जाएगा।”  ओमप्रकाश चुपचाप घर के पीछे वाले पिछवाड़े की ओर चले गए।अपना ध्यान बंटाने को वे सोचने लगे कि यदि इस पूरे स्थान पर घास लगवा दी जाए तो चार लोगों के बैठने लायक जगह बन जाएगी। उधर सुमन ने अपनी माँ से पूछा।-” माँ दादाजी को उस चारपाई से इतना अटैचमैन्ट क्यों है ?  पापा इतने बड़े अफ़सर हैं कितने लोग हमारे घर आते है वे सब क्या सोचेंगे ?” सुमन ने वही सब कुछ उगल दिया जो अक्सर जब तब अपने पिछले घर में इस उस से सुनती रहती थी। विद्या ने इस प्रश्न के जवाब में दूसरा प्रश्न किया।” तुम क्यों अपने सारे टूटे फूटे खिलौने बटोर कर यहाँ ले आई जबकि अब तो तुम उनसे खेलती नहीं।” सुमन बाहर साल की वह बच्ची जो बचपन की पकड़ से छूट कर किशोरावस्था की दहलीज पर खड़ी थी, यह समझ ही ना पाई कि माँ क्या कहना या समझाना चाहती है और रूठ गई। ” आप तो जब देखो मेरे खिलौनों के पीछे पड़ी रहती हो। कहीं रखो दादाजी की चारपाई पर मेरे खिलौनों की ओर देखना भी मत।” कहकर वह पाँव पटकती हुई बाहर चली गई।पर विद्या का उद्देश्य पूरा हो गया।

जुलाई का महीना था। बारिश एक या दो बार तो हुई पर उसके बाद बादल ना जाने किस ट्रैफ़िक जाम में फंस गए। दिन भर उमस बनी रहती। पसीना एक बार जो आता फिर सूखने का नाम ना लेता। घर में केवल एक ही ए०सी० था वो भी मास्टर बेडरूम में जिसमें आजकल मेला सा लगा रहता था। बच्चे स्कूल -कॉलेज से आकर वहीं धमक जाते। विद्या भी फ़टाफ़ट बाहर काम निपटाकर अन्दर आ जाती। ऐसा नहीं था कि रामस्वरूप को उमस परेशान नहीं करती थी। पर क्या करते ए०सी० उनकी सेहत को रास नहीं आता था। दिनभर चारपाई पर करवटें बदलते पर कोई चैन नहीं पड़ता। आज उन्होंने अपनी चारपाई घर के बाहर वाले छोटे से खुले आँगन में लगवा ली थी। यहाँ चार बजे के बाद से ही छाया आ जाती थी और सात बजे तक अच्छा बैठने लायक माहौल बन जाता था।उस पर आस पास के पेड़ों से कुछ हवा निकल आती तो जैसे मजा ही आ जाता। बाहर चारपाई की खटर-खटर सुन कर सुमन ने गर्दन बाहर निकाली और दादाजी को बाहर बैठा देख कर वह भी उनके पास आ गई और मचककर उनके साथ बैठ गई।पर यह क्या चारपाई तो एक दम झूला हो रखी थी। उसने वापस उठते हुए दादाजी से पूछा।–” दादाजी आप इस पर सोते कैसे हो, ये तो बीच में से बिल्कुल लटकी पड़ी है।” रामस्वरूप आज अच्छे मूड में थे। हँस कर बोले–” तूने वो बाणिये वाळी बात ( कहानी ) कोन्या सुणी।” दादाजी के किस्से कहानियाँ सुमन की कमजोरी थे वह तपाक से बोली। – “ सुनाओ ना वो कहानी।” अगर कोई सुनने को तैयार होता तो रामस्वरूप घण्टों ऐसी कितनी ही कहानियाँ कितने ही अलग- अलग अंदाज में सुना सकते थे। पर इस नई दुनिया में समय किसके पास था। टी० वी० के सामने बैठकर लोग दूसरों के घरों की कहानियाँ जानना पसंद करते थे अपनो की कहानियाँ उन्हें पसंद न थी। वे झट से तैयार हो गए। ” एक बाणिया ( गाँव का दुकानदार ) था। उसकै धोरै (पास ) भी इसी ही खाट थी। उसके छोरा नै भी एक दिन इसी तरहियाँ ( तरह ) पूछी – ‘ बापू यो खाट तो कतई झूला बरगी ( जैसी ) हो रही सै। तू इसनै परै गेर( दूर फेंक ) दे।’ तो बाणिया बोला – ‘ तनै ना बेरा ( मालूम ) यो खास बात सै इस खाट मैं, गर कोई रात बिरात घर मैं चोर बड़ जाँ ( घुंस जाए ) ओर मेरे सुत्ता कै ( सोते हुए पर) ऊपर लट्ठ ( मोटा मजबूर डण्डा ) मारैं तो मेरे लागै क्यों ना लट्ठ बाईंया पै ही टिक के रह जा।’ ( मझे चोट नहीं लगेगी डण्डे की चोट चारपाई की दोनों  तरफ़ की लकड़ी पर लगेगी।) तो फेर बाणिये का छोरा फेर बोला — ‘ ओर बापू गर चोर तेरे खाट कै निच्चा सै ही मारैं तो ?’ बाणिया गुसा मैं भर गया – ‘ साळा तू जायकै बताया , उननै ना बेरा हो तो।” ( बेवकूफ़ तू जाकर बता आ यदि उन्हें ना पता हो तो।) सुमन हँसते-हँसते लोट-पोट हो गई। उसकी और दादाजी की मिश्रित हँसी सुनकर विद्या और विवेक भी बाहर आ गए। दो कुर्सियाँ लाकर वहाँ रख ली गई। विवेक को वहाँ खड़ा देखकर रामस्वरूप ने कहा — “ रै विवेक इस खाट की पंगात ( जिस ओर पैर रहते हैं।) ही खींच दे। तेक ठीक-ठाक हह ज्यागी ( हो जाएगी ) नहीं तो हाँ म्हारी सुमन भी इसका मजाक उड़ावै सै।” सुमन वहाँ कुर्सी पर बैठी-बैठी अपने पाँव हिलाने लगी। विवेक ने सुमन के सिर पर एक चपत लगाई और बोला– “ आप बता दो कैसे खींचनी है।”

विद्या को याद है कि ये चारपाई ओमप्रकाश के उस पुराने मकान मालिक के यहाँ पड़ी थी जिसके यहाँ वे कभी अपनी पढ़ाई के दौरान किराये पर रहा करते थे। नौकरी लगी , ब्याह हुआ, और एक के बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा किराये का मकान बदलते कभी इस चारपाई का किसी को कभी ध्यान ही नहीं आया। वो तो जब आठ साल पहले उन्हे सरोजिनी नगर में सरकारी मकान मिला और वे लोग गाँव जाकर माँ बाऊजी को भी अपने साथ रहने के लिए ले आए तो माँ ने ही एक दिन कहा – “ अरै ओम तेरी वा चारपाई कित ( कहाँ )सै जो हम घराँ से तेरे खातर लाया था।” और फिर ढूँढ ढाँढ कर इस चारपाई को घर लाया गया। अभी पिछले दो साल पहले जब इसकी रस्सी इतनी पुरानी पड़ गई  कि उसकी फाँस भी जब तब हाथ में चुभने लगी तो माँ बाऊजी की नाराजगी की परवाह न करते हुए उसे छत पर वहाँ रखवा दिया गया जहाँ से धूप – पानी से बचकर वह अपनी जिन्दगी के बाकी दिन निकाल सके। दुबारा वह चारपाई छत से उतर कर कब घर में दाखिल हो गई इसके बारे में कोई ठीक -ठीक नहीं जान सका पर विद्या को पता है कि माँ के जाने के कोई दो तीन दिन बाद बाऊजी बालकनी में उसी चारपाई पर बैठे रूमाल से अपने आँसू पौंछ रहे थे। विद्या ने कुछ नहीं पूछा और न किसी को कुछ पूछने दिया। आज विद्या का मन हुआ कि बाऊजी से इस चारपाई के बारे में बात की जाए। वह उठ कर चारपाई की पंगात कसने में बेटे की मदद करने लगी। पंगात कपड़े की रस्सी की बनी थी। उसे छूते हुए विवेक ने कहा।” दादाजी ये रस्सी तो कपड़े की बनी है।” रामस्वरूप ऊपर आसमान की ओर देखने लगे जैसे वह आसमान उनकी पलकों पर टिका हो फिर वहीं उसके अपनी पलकों पर टिकाए बोले —” हाँ भई इसी रस्सी तो गाम्मा ( गाँवों ) में ही बणा करें…. “ फिर थोड़ा उत्साहित होकर बोले की ” या रस्सी तेरी दादी नै बणाई थी जब तेरा पापा खात्तर हम इसनै गाम से ठायकै दिल्ली लाये थे। तेरी दादी नै उरै ( यहाँ ) आयके इसकी नई पंगात  भरी कदै छोरा का पावाँ मै फाँस ना चाल जाँ।” ( पाँव में रस्सी की फांस ना चुभ जाए।)
— क्या…………? आप इस चारपाई को गाँव से यहाँ लाए थे ? अमेजिंग दादाजी, विवेक के मुहँ से निकला। ” सचमुच  आप तो कमाल हो।

सचमुच यह अचम्भा था। विद्या ने भी नहीं सोचा थे कि इस चारपाई ने इतना लम्बा सफ़र तय किया होगा। भले ही उनका गाँव हरियाणा में था पर चार पाँच घण्टे का रास्ता तो था ही। उस पर बस या गाड़ी में उसने किसी को चारपाई लेकर सफ़र करते नहीं देखा था।तो किस तरह इस चारपाई को उठाकर ये लोग गाँव से यहाँ लाए होंगे इसे जानने के लिए  उसने पूछा –
— “ पर बाऊजी आप इसने उठा के किस तरह लाए।”

रामस्वरूप की आँखे चमक उठी, इस चमक में साकार हो उठी वह यात्रा जिसमें वह चारपाई  जिसके चारों पाए निकाल कर बाँध दिए गए थे और जिसकी चारों बाईंयों को उसकी रस्सी समेत इस तरह समेटा गया था कि वह कम से कम जगह घेरे। पर इसके बावजूद ट्रेन में चढ़ने वाली हरेक सवारी उससे ठोकर खाती और रामस्वरूप और उनकी पत्नी की ओर हिकारत से देखती हुई ‘ कि ना जाने कहाँ – कहाँ से आ जाते हैं ‘ , आगे बढ़ जाती। और वो टी०टी० जो रामस्वरूप की भाषा में बिल्कुल गैल ( पीछे पड़ जाना) ही हो लिया था। उसे कैसे चकमा दिया गया , यह बताते – बताते रामस्वरूप की आँखों में हँसते- हँसते आँसू आ गए थे। इस उम्र में इतना हँसने से उनकी साँस फूलने लगती थी। बीच-बीच में वे अपनी उखड़ती साँस को भी सम्भालते जाते।  आज पिछले साल भर के बाद रामस्वरूप पहली बार इतना हँसे थे।  दोनों बच्चों के साथ विद्या वर्षों की दूरियाँ पार करके वहाँ जा पहुँची थी जहाँ से इस चारपाई की जीवन यात्रा शुरू होती थी। रामस्वरूप ने बताया कि उन्हें पत्नी का गौना कराने जाना ही था कि उससे कुछ दिन पहले उनके पिता ने किसी तकरार के बाद उन्हें न्यारा ( परिवार से अलग ) कर दिया पर बाँटे ( बँटवारे )में एक मटका अनाज तक नहीं दिया। नई नवेली दुल्हन को कहाँ बैठाऊँगा , क्या  खिलाऊँगा , यह सोच कर उनके हाथ पाँव फूल गए। कहीं से पाँच रुपये उधार लेकर  उन्होंने  थोड़े आटे , चावल और इस खाट का इन्तजाम किया।इसके साथ ही पति पत्नी ने अपनी गृहस्थी शुरू की। फिर इसी चारपाई पर उनके एक के बाद एक सात बच्चे  गरीबी और अज्ञान के चलते , आते रहे – जाते रहे।  केवल एक यह ओमप्रकाश ही बचा जिसने भी इसी चारपाई की बाई पकड़ कर चलना सीखा। विवेक ने हिसाब लगाया कि इस हिसाब से इस चारपाई की उम्र कोई साठ साल के करीब ठहरती है। अब वह खूब कस – कस कर पंगात को खींच रहा था। कुर्सी पर बैठे रामस्वरूप उसे मुग्ध भाव से देख रहे थे।   चारपाई में आया झोल भरने लगा था। वह फिर से बैठने लायक हो रही थी। चारपाई की उम्र का अंदाजा लगा कर विवेक ने कुछ सन्देह पूर्वक पूछा।– “ दादाजी जब आपने यह चारपाई खरीदी….”   उसकी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि रामस्वरूप ने बीच में ही टोका– “ रै बेकूप खरीदी कोन्या सिरफ  रस्सी खरीदी थी। यो चारपाई तो अपना हाथा सै बणाई थी। विवेक और सुमन की आँखों में प्रश्नवाचक चिह्न देखकर उन्होंने  खुलासा किया। ” खेत मैं दो किक्कर खड़े थे। कुल्हाड़ी से उसकी लकड़ी काटी और समारकै ( संवार कर ) पाए और बाई बणाई और फेर तेरी दादी और मैन्नै दोनुआँ ने यो रस्सियाँ सै बण (बुन ) दी।” रामस्वरूप के स्वर में गर्व और दर्प की द्वाभा सी तैर गई। उन्होंने पास खड़ी सुमन की पीठ पर धौल देकर कहा–” तैनै बेरा है तेरी दादी की उमर उस बखत कुल जमा पन्द्रहाँ साल थी और के चटाचट भाज भाज ( भाग – भाग कर ) के काम करा करती। और थम बाळक ,  पाणी गिलास भी ठाता थारे जोर पड़ै सै।” ( पानी गिलास उठाना भी तुम्हें भारी पड़ता है। )
— “ फिर भी दादाजी तब से अब तक यह चारपाई टूटी नहीं ? ” विवेक ने अपनी जिज्ञासा पुन: प्रकट की।
— “ टूटती तो जब भाई जब हम टूटण दाँ… , जब जो बाई टूटती नई घाल ( डाल ) देता।या देख , उन्होंने चारपाई की एक बाई की ओर इशारा किया।, इस उरली ( इस तरफ़ वाली) बाई कै नीचे हमनै सरिया बाँध राख्या सै। कहते कहते रामस्वरूप यूँ जी उठे जैसे कल की ही तो बात हो और वे अपने हाथों को इस तरह देखने लगे कि उनके हाथों में लोहे की तार को खींच खींच बाँधने के निशान फिर से उभर आए हों। विवेक ने नीचे झुक कर उस बाई के नीचे बँधे तीन पतले सरियों को देखा जो लोहे की तार से इस तरह बँधे थे कि उपर से देखने पर पता ही नहीं चलता था कि यह चारपाई इतनी मजबूत है।
–” वाह दादाजी आप तो पढ़े नहीं अगर आप को मौका मिलता तो आप जरूर इंजीनियर होते।” विवेक ने उस बाई पर हाथ फिराते हुए कहा। विवेक इंजीनियरिंग  कर रहा था और अब अपने भीतर इंजीनियर बनने के पुश्तैनी गुण तलाश रहा था।विवेक की बात से रामस्वरूप की आँखों में एक तड़प सी उठी। अनपढ़ होने के कारण फैक्टरी में उनकी कभी कोई तरक्की नहीं हुई जबकि साहब लोगों का मानना था कि यदि एक कागज का टुकड़ा उनके पास भी होता तो रामस्वरूप भी किसी ठीक-ठाक ओहदे पर होता। इसके बावजूद उन्हेँ आज भी अपने उस निर्णय पर कोई अफ़सोस नहीं है जिसकी वजह से उन्हें अनपढ़ रहना पड़ा। हुआ यह  कि दस साल की उम्र में उनका दाखिला स्कूल में कराया गया तो उन्होंने सारी नीच जात के लड़कों के साथ संडास के साथ बैठना मञ्जूर नहीं किया। वे पहले ही दिन उस साळे मास्टर के माथे में पत्थर मार कर भाग आए।इसके बाद उन्होंने  गाय चराना मञ्जूर किया , पत्थर फोड़ना मञ्जूर किया पर पिता के लाख डराने -धमकाने के बावजूद स्कूल जाना मञ्जूर नहीं किया।

यूँ गर्मियों के दिन थे और आठ बजते- बजते अन्धेरा दस्तक देने लगता था। चारों प्राणी उस समय इस देश और काल से परे अपना नया देश -काल गढ़ रहे थे कि उसी समय ओमप्रकाश ने अपने दो सहकर्मियों के साथ प्रवेश किया।नज़र सीधी चारपाई पर पड़ी॥ हल्के धुँधुलके का फायदा उठाकर वे दोनों आगन्तुकों को सीधे अन्दर कमरे में ले गए। पीछे- पीछे विद्या भी चाय पानी का इन्तजाम करने के लिए रसोई की ओर चली गई। उसने  भीतर जाकर चाय का पानी चढ़ाया ही था की पीछे से तीर की तरह एक बाक्य आया —
— “ सही जुलुस निकाल रखा है।”
— “ आप भूल जाते हैं कि आप कल्चरल डिपार्टमेंट में हैं।”  इस मामले में विद्या उस दीवार की तरह थी जिस पर जितने वेग से बॉल फेंकी जाती वह उसी वेग से उसे लौटा देती। ओमप्रकाश उसके व्यंग्य को समझ गए थे।
— “ तुम्हें तो कहीं लेक्चरर होना चाहिए  था। अच्छा भाषण दे लेती हो।
— “ बन ही जाती अगर तुमने बीच में टाँग न अड़ाई होती।”
ओमप्रकाश वास्तव में अन्दर से बड़े दुखी थे  और उन्हें आशा थी कि विद्या उनकी पीड़ा को जरूर समझेगी। पर उनका प्रयास ही सही नहीं था तो अंजाम तो बुरा होना ही था। इसलिए  अपनी बात को वे बाद में शान्ति के साथ समझाएंगे ऐसा सोच कर वे पुन: ड्राइंग रूम में आ गए।

रात का सारा काम निपटाते- निपटाते साढ़े  दस बज गए थे। यह समय ओमप्रकाश और विद्या का था जिसमें दिन भर के थके पथिकों की भाँति वे एक दूसरे को सारे दिन का हाल-चाल सुनाते थे। कमरे में ए०सी० चल रहा था । थोड़ी देर बाद दोनों का दिल और दिमाग ठण्डक से भर गया। साथ के फ़ोल्डिंग पर सुमन सो रही थी। उसकी बस सुबह सात बजे तक आ जाती है।  अचानक से ओमप्रकाश को लगा कि आज बाऊजी के कमरे से कोई आवाज नहीं आ रही । अभी वे वहाँ से गुजर कर आए थे तो  वहाँ की छोटी बत्ती भी नहीं जल रही थी।विवेक अपने कमरे में था वहाँ की लाइट भी जल रही थी।  ए० सी० की आवाज के बावजूद पिताजी के कमरे में होने की आहट उन्हें मिलती रहती है। उन्होंने  विद्या से पूछा ” क्या बात है पिताजी की कोई खाँसने तक की आवाज नहीं आ रही।”
— “ कहीं बाहर ही तो नहीं सो गए।”  विद्या को अफ़सोस हुआ कि आज मेहमानों के चक्कर में वह बाऊजी को भूल ही गई।

— क्यूँ , बाहर क्यों सो गए , बाहर तो बिना पंखे और मच्छरदानी के मच्छर जान खा जाएंगे।” उन्होंने जल्दी से उठकर अपने पैरों में चप्पल डाली। उनके दिमाग में अगले ही पल यह ख्याल आया कि आज वह चारपाई क्योंकि बाहर ही थी तो कहीं उसी पर तो वे नहीं सो गए। जब सुबह लोग उठेंगे तो क्या सोचेंगे । यही ना कि इतने बड़े घर में इस बूढ़े बाप के लिए कोई जगह नहीं। उनके दिमाग में गर्म पानी के बुलबुले उठने लगे। बाहर आकर देखा तो उसी टूटी चारपाई पर बैठे रामस्वरूप अपने कुर्ते से मच्छरों को उड़ा रहे हैं।चारों ओर घुप्प अन्धेरा है और कोई पत्ता तक नहीं खड़क रहा जैसे तूफ़ान के आने के पहले का सन्नाटा हो। ओमप्रकाश के दिल के किसी कौने में एक टीस सी हुई। —
— “ क्या पिताजी आप अभी तक बाहर ही बैठे हैं , इतने मच्छरों में आप सो ही नहीं पाओगे।”

बाहर मच्छरों और गर्मी से रामस्वरूप भी परेशान थे। वे भी अन्दर जाना चाहते थे पर क्या करते चारपाई तो बाहर थी और उसे उठाना उनके बस में ना था। ओमप्रकाश ने बिना कुछ आगे पूछे , कहा –” आप अन्दर चलो मैं चारपाई  लेकर आता हूँ।” रामस्वरूप भी बिना कुछ कहे उठ खड़े हुए और अन्दर की ओर चले दिये। जब पिताजी की चारपाई उनके कमरे में लगाकर ओमप्रकाश वापिस अपने कमरे में आए तो उनके दिमाग में गर्म पानी के बुलबुले फिर से बनने और फुटने लगे।
— “ पता नहीं क्या बताना चाहते हैं इस चारपाई से चिपटे रहकर।”
— “ वे माँ को भूल नहीं पाते।” विद्या ने समझाने की गरज से कहा।
–” माँ तो कमरे में है।” ओमप्रकाश ने चिढ़ कर कहा। उन का इशारा उस बड़ी तस्वीर की ओर था जिसे उन्होंने माँ की मृत्यु के बाद पिताजी के लिए ही बनवाया और उन्हीं के कमरे में लगा दिया।
— “ वो माँ की तस्वीर है , चारपाई में माँ खुद मौजूद है।” विद्या का आर्द्र स्वर जैसे ही बाहर आया घर के  बाहर जोर से बिजली चमकी और  खिड़की से इतनी रोशनी अन्दर फेंक गई की एक बार को घर के अन्दर का सारा अन्धेरा दूर हो गया। उसके बाद उस चमक का पीछा करती हुई बिजली की जोर दार कड़क सुनाई दी। शायद बारिश आने वाली है। इतनी उमस के बाद उसे आना ही था।

तस्वीरें गूगल से साभार 

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नीच (रज़िया सज्जाद ज़हीर की कहानी)

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रज़िया सज्जाद ज़हीर


महिला लेखन की एक प्रमुख हस्ताक्षर रज़िया  ज़हीर का यह जन्मशताब्दी वर्ष है. नाटक,कहानी और उपन्यास लेखन के साथ-साथ वे एक बेहतरीन अनुवादक भी थीं. भारत में स्त्रीवादी और प्रगतिशील लेखन का इतिहास रज़िया  ज़हीर के लेखन से वाबस्ता होगा ही होगा. पढ़ते हैं उनकी एक नायाब कहानी, जो दलित स्त्रीविमर्श और स्त्रीविमर्श की दृष्टि से पढी जानी चाहिए. 

शामली को देख कर सुलताना को लकड़ी के उन बेढंगे टुकड़ों का ख़याल आ जाता था जिन को अलग अलग देखो तो आड़े तिरछे और बेडौल, लेकिन ठीक से मिलकर बनाओ तो ऐसे नमूने, ऐसी तस्वीरें निकले कि क्या कहने!

उसके नक़्शे में कोई ख़ास बात नहीं थी। रंग भी गहरा साँवला था; लेकिन पहले ही दिन जब सुलताना रिक्शे से उतर कर अपने दरवाज़े में दाखिल हो रही थी और उसने शागिर्द पेशे की एक कोठरी के सामने शामली को बैठे देखा था, तो उसे अहसास हुआ था कि यह चीज़ बार बार देखने के क़ाबिल है। शामली ने भी सुलताना को देखा, मगर हाथ जोड़ कर नमस्ते करने के बजाये वह नज़रे उठाकर सिर्फ ज़रा सा मुस्कुराई थी, फिर सर झुककर पीतल की चमकती थाली में चावल से धान, कंकड़ बीनने लगी।

उसकी यह अदा सुलताना को भा गई;क्योंकि उसे ख़याल था कि वह अवाम से मोहब्बत करती है और जब किसी ग़रीब को किसी अमीर आदमी के सामने हाथ जोड़ते या उसे माई बाप कहते सुनती तो उसे उस ग़रीब पर बहुत गुस्सा आता; जभी तो उसे शामली पर बेहद प्यार आया था।

बाहरी दरवाज़े से अन्दर आते-आते उसे अपने बचपन की सुनी बहुत सी बातें याद आने लगीं —-नीच ज़ात की औरतों का कुछ ठीक नहीं होता; दादी और नानी के बताये हुए वाक्यात, काल से जो छोकरियों खरीदी गई उनको जब रोटियाँ लग गईं तो किसी न किसी के साथ भाग गई, उन लोगों को खसम करते या छोड़ते कुछ नहीं लगता, वगैरह। न जाने शामली कौन थी? अकेली कैसे कोठरी में रह रही थी? सुलताना ने जल्दी से घडी उतारी और गुसलखाने में जाकर नहाने के लिए नल खोला—पानी नदारद! भन्नाकर उसने खिड़की खोली, “अरे भई नल बंद करो!” देखा तो शामली नल पर चावल धो रही थी। सुलताना को देखकर जैसे वह समझ गई कि क्या मामला है। नल बंद करते हुए बोली, “बीबी जी हम कल ही यहाँ आये हैं। हमको खबर नहीं थी कि बाहर नल खोलने से अन्दर पानी बंद हो जाता है।”

“कोई बात नहीं!” सुलतानाका सारा गुस्सा हवा हो गया था। शामली की आवाज़ उसे बहुत ही अच्छी लगी थी, बात करने का अंदाज़ भी पसंद आया था।

अगले हफ्ते बाहर वाली कोठी में एक सरकारी दफ्तर किराए पर आ गया। बीच वाला बड़ा हॉल और बड़े कमरे दफ्तर को मिले, छोटे छोटे कमरों के सेटों में उसी दफ्तर के सेक्रेटरी, हेड क्लर्क वगैरह और शागिर्द पेशे की दो तीन कोठरियों के इलावा सब अर्दलियों, चपरासियों, चौकिदारोंसफाई करने वालों से भर गई. शामली की, और एक और कोठरी सुलताना के आउट हाउस के साथ थीं।

तीन चार रोज़ बाद, सुलताना कॉलेज से आकर डाक देख रही थी कि उसने बाहर हंसने की आवाज़ सुनी जो शामली की सी लग रही थी। धीरे से उसने वही गुसलखाने वाली खिड़की खोली। सुलताना की छोटी बच्ची शामली को दौड़ा रही थी। दौड़ते दौड़ते शामली अपनी कोठरी में घुस गई और चीख चीख कर बोली, “बस भई हमने हार मान ली ! हमको खाना पकाना है न बेटा! अब कल खेलेंगे।” चारों तरफ शागिर्द पेशे के बहुत-से नौकर वगैरह खड़े हंस रहे थे।
छोटी बच्ची अपने हठ पर अड़ी थी —-“हम नहीं जानते, हमारा दाव दो! दो!”

शामली ने हँसते हँसते किवाड़ खोले और हँसते हुए निकलकर एक दूसरी चाल चली—“आइये आग जलाए बेटा! आप आटा लेगीं” चिड़िया बनाएगी? फिर हम उसको आग में सेंक देंगे और आप खूब खेलिएगा मज़े से।”
बच्ची वहीँ बैठ गई एक ईंट पर और शामली ने चूल्हे में उपले लकड़ियाँ रखकर फूंक मार मारकर आग जलानी शुरू कर दी। सुलताना ने खिड़की बंद कर ली। उसे शामली का इस तरह दिल खोलकर मासूमियत से हँसना बहुत अच्छा लगा था, लेकिन …..लेकिन अगर वह चपरासी और चौकीदार वहां न खड़े होते तो बहुत अच्छा होता! इतने मर्दों के बीच इस तरह….लेकिन शामली ने तो उनमे से किसी की तरफ देखा तक नहीं था। फिर भी, बेगैरती तो है ही!लेकिन बेगैरती क्यों है? उसने नज़र उठाकर देखा तो शामली सामने खड़ी थी और वह सुलताना से आँखे चार होते ही ऐसे शरमाई कि सुलताना को यकीन नहीं आया की यह वही शामली है जो कुछ देर पहले ऐसे ठट्टे लगा रही थी, ऐसे हंस रही थी जैसे उसका सारा वजूद पंखुड़िया बनकर बिखर जायेगा। तो क्या वह सुलताना के सामने हँसना नहीं चाहती थी? अहिस्ता से बोली, “बीबी जी, एक दो मिर्च चाहिए। अँधेरा हो गया है न, तो दूकान तक जाते ज़रा वैसा सा लग रहा है।”
“नहीं नहीं, दूकान तक जाने की कोई ज़रूरत नहीं, बैठो, अभी मंगवा देते हैं।” उसने खानसामा को आवाज़ दी और फिर शामली से बातें करने लगी।

रज़िया ज़हीर

शामली बैठ गई और सुलताना के सवालों के जवाब में उसने बताया कि उसका शौहर मर चुका है और वह खुद पास वाली पीली कोठी में, मेजर साहब के बच्चों को खिलाने पर नौकर है। फिर उनके  छोटे बच्चे का ज़िक्र करते हुए वह एक आध बार बड़े प्यार से हंसी जिससे मालूम होता था कि उसे बच्चे से बेहद मोहब्बत हो गई है।
खानसामा मिर्च लेकर आया तो उसने नज़र भरकर शामली को देखा, मगर शामली ने उसकी तरफ देखा भी नहीं; मिर्च ली, सुलताना की तरफ मुस्कुराई और चुपचाप चली गई। जब वह बाहर निकल गई तो खानसामा बोला, “बेगम साहब, इस औरत को घर में मत आने दिया कीजिये.”
“क्यों भई?” सुलताना ने ज़रा गुस्से से पूछा, फिर ज़रा खिसियाकर बोली “तुमसे क्या मतलब? जाओ अपना काम करो!”
मगर बूढ़े खानसामा ने बरसों इस घर में गुज़ार कर जो अपनी हैसियत क़ायम की थी, वह उसे आसानी से छोड़ने पर तैयार न था; बोला, “यह अपने मियां को छोड़कर आई है, अपने घर से भागकर! और यहाँ रामोतार से फंसी है, ठीक नहीं है यह औरत!”
सुलताना को जैसे किसी ने ढेला खेंच कर मारा। उसने भड़क कर पूछा “ कौन राम अवतार?”
“वही, सरकारी दफ्तर का रात का चौकीदार!”

और राम अवतार जैसे सुलताना के सामने आकर खड़ा हो गया—-खाकी वर्दी पहने जो उसे सरकार की तरफ से मिली थी, हाथ में मोटा सा डंडा और टोर्च, पैरों में बड़े बड़े जूते। कभी कभी जब रात में रामावतार की खांसी या पहरे की आवाज़ आती—-“हुनक हा हा, होशियार, हा हा—-हुनक हुनक आहाक आहाक!” तो वह भी आवाज़ दे लिया करती थी “राम अवतार!”

दीवार के उधर से वह फ़ौरन जवाब देता, “घबराइए नहीं सरकार, हम जाग रहे हैं!” वह सुलताना का चौकीदार नहीं था, फिर भी वह कितना भला था जो हमेशा उसे इस तरह इत्मिनान दिला देता था। फिर जैसे वह चौंक पड़ी, खानसामा कह रहा था, “यह अपने आदमी को छोड़ कर भाग आई है। रामोतार ऊंची जात का है, राजपूत ठाकुर है वह और यह नीच जात है। न जाने इसने उसे क्या खिला दिया है, तभी तो नीच जात के साथ…..”
“ख्वामख्वाह की बकवास करते हो!” सुलताना चिढ गई, “सच देखो न झूठ जानो, तुम लोगों को सुनी सुनाई गप उड़ाने से मतलब है बस! जाओ, रात का खाना देखो, बेकार के लिए…..”
खानसामा मिर्च का डिब्बा लिए बडबडाता हुआ चला गया।

सुलताना ने खानसामा को तो चले जाने का हुक्म दे दिया, लेकिन उसके अपने दिमाग़  में जो लगातार खयालात चले आ रहे थे उनको निकल जाने का हुक्म देना उसके बस की बात न थी और उसे अपने आपसे यह बात कुबूलनी ही पड़ रही थी कि खानसामा की बातों से उसे धक्का सा लगा था। शामली ने ऐसा क्यों किया? उसने अपने शौहर को छोड़ा, घर से भागी और यहाँ राम अवतार से ताल्लुक किये थी। और वह तो जो खैर था सो था उसने सुलताना से भी तो झूठ बोला कि उसका आदमी मर गया है। आखिर झूठ बोलने की क्या ज़रूरत थी? उसे सुलताना पर भरोसा करना चाहिए था कि वह समझ जाएगी। शायद यह नीच जात की औरतें…..अरे नहीं, नीच और ऊंच जात क्या होती हैं भला? जात कुछ नहीं होती, वह तो यही मानती है न?….उफ़ !

दूसरे दिन शाम को मग़रिब के वक़्त वह औरतों के किसी जलसे से लौटी। अँधेरा तकरीबन छा  गया था, दोनों वक़्त एक दुसरे से गले मिल रहे थे। शामली की कोठरी से धुआं निकल रहा था लेकिन चराग नहीं जला था।चूल्हे के सामने आग की रौशनी में शामली के दोनों हाथ रोटियां पकाते हुए दिखाई दे रहे थे। सर पर ओढ़ी हुई हरी साडी के लाल किनारे में से उसकी नाक का सिरा भी दिखाई दे रहा था। रोटी पकाते पकाते वह बार बार पल्लू से आंसू पोछती जाती थी, पास ही दो तीन ईंटें एक के ऊपर एक रखकर राम अवतार बैठा था। उस वक़्त वह खाकी वर्दी के बजाय सफ़ेद धोती और कुर्ता पहने हुए बहुत अच्छा लग रहा था। सुलताना को एकदम से खयाल आया कि राम अवतार और शामली की जोड़ी बहुत अच्छी लगेगी।

राम अवतार उसे देखकर खड़ा हो गया और सलाम करके दूसरी तरफ चला गया। सुलताना धीरे धीरे शामली के नज़दीक आकर खड़ी हो गई। कुछ मिनट उसे ख़ामोशी से देखती रही फिर अहिस्ता से बोली, “ शामली हमारा खानसामा कहता है तेरा आदमी जिंदा है; तू तो कहती थी की वह मर गया?”
सुलताना को पूरी उम्मीद थी कि शामली कहेगी, “नहीं बीबी जी, खानसामा को भला क्या पता? वह तो मर चुका!” फिर वह अन्दर जाकर खानसामा को खूब डांटेगी कि ख्वामख्वाह तुम लोग एक मासूम पर इलज़ाम लगाते हो, बेचारी विधवा—-वगैरह वगैरह! लेकिन शामली ने नज़रे उठाकर बड़े तंजिया अंदाज़ में सुलताना को देखा और अहिस्ता से बोली, “अगर वह जिंदा है, तो भी क्या हुआ? मेरे लिए तो वह मर ही गया है!”
सुलताना को जैसे एकदम बिजली का करंट मार गया—हाय रे, अपने शौहर के बारे में ऐसी बात!

सुलताना को चुप देखकर शामली मुस्कुराई, “वह समझता था कि रोटी कपडा देगा और हुकुम चलाएगा। हमारे हाथ पाँव चलते हैं, हम काम करते हैं, उस जैसे दस को खिलाने की हिम्मत रखते हैं हम!” और फिर वह आटे के बर्तन में पानी लेकर जोर जोर से अपने हाथ मरोड़ मरोड़ कर धोने लगी जैसे अपने शौहर के काम उमेठ रही हो!
सुलताना ख़ामोशी से अपने दरवाज़े की तरफ बढ़ गई, लेकिन उसके ज़हन में एक तूफ़ान बरपा था। बेशक शामली बड़ी हिम्मत रखती थी जो उसने ऐसा सोचा, लेकिन हाय, उसने अपने शौहर के बारे में किस दिल से यह बात कही? शौहर, कितनी प्यारी चीज़, उसका सुहाग, शौहर इस दुनिया में औरत का सबकुछ….! मगर यह नीच जात, इसीलिए तो…..! उसने अपने सर को जोर से झटका—–फिर उसे नीच जात का ख़याल आया? वह तो इस बात को उसूल की हैसियत से मान चुकी थी न कि इस समाज की शादी कानूनी जकडन थी, और कुछ नहीं। लेकिन आज जब यह उसूल नंगा होकर सामने आ गया तो वह डर गई;  उसका दिल, दिमाग़,उसके वर्ग के मकड़ी के जालों में उलझ कर रह गए। तो क्या यह उसूल उसने सिर्फ दूसरों को कायल करने के लिए अपना लिए थे? बगैर समझे हुए बस रटलिए थे? लेकिन दादी और अम्मी जो कहा करती थीं न—-और यहाँ तो रोटी कपडे को ठुकरा देने का मामला था। लेकिन शौहर? औरत की इज्ज़त, विकार—मुहब्बत? मगर….मगर…. उसने घबराकर खानसामा को चाय लाने को के लिए आवाज़ दी।

सज्जाद ज़हीर

 कुछ हफ़्तों बाद होली थी। उसकी बच्चियां, शागिर्द पेशे में होली खेले निकल गईं; खानसामा सबसे छुपकर अपनी कोठरी में बैठा था। वह अकेली बैठी इम्तिहान के पर्चे जांच रही थी। पहले गैलरी में कदमों की आहट सी हुई, फिर झंझरों की मौसूकी सुनाई दी, फिर शामली का साया दरवाज़े में दिखाई दिया। उसने बड़े बड़े लाल और नीले फूलोंवाली नकली रेशम की साडी पहन रखी थी, ज़र्द चमकदार साटन का ब्लाउज, दांतों में मिस्सी, मुहं में पान, आँखों में गहरा काजल और घनी भंवों के बीचो बीच एक बड़ी सी सुनहरी टिकली जो गर्दन के हर घुमाओं के साथ यूँ रह रहकर तड़पती जैसे सुरमई बादलों में कभी कभी कौंधा लपक जाता है। हाथ में पीतल की एक थाली लिए वह यूँ सुलताना के सामने आकर खड़ी हो गई जैसे अजंता की सांवली शहजादी में जान पड गई हो। थाली में कई तरह के रंग थे जिनमे अबरक के नन्हे नन्हे ज़र्रे दमक रहे थे। एक किनारे पर गुलाबी काग़ज़ पर कुछ लड्डू थे। उसने बगैर कोई नोटिस दिए एक चुटकी भरकर रंग उठाया और पीछे हटती हुई घबराई सुलताना के माथे पर मॉल दिया। फिर उसने एक लड्डू उठाया और सुलताना के मुहं में देने लगी।. सुलताना की आँखों में आंसू आ गए; मुहं पर हाथ रखकर धीरे से बोली, “शामली! मैं मिठाई नहीं कहूंगी. मैंने….एक मन्नत रखी है न! मैं अभी मिठाई नहीं खा सकती! जब साहब…”

शामली जैसे यकलख्त सब समझ गई। लड्डू को फिर थाली में रखते हुए, हाथ उठाकर बहुत संजीदगी से बोली, “बीबी जी, आप दिल छोटा न कीजिये, भगवान् ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा। साहब जेल से छूट जायेंगे और आपके पास लौट आएंगे!” फिर हंसकर बोली, “तब हम सब आपको मिठाई खिलाएंगे, मगर….” उसकी आँखों में प्यार और शरारत एक साथ झलकने लगे, “फिर यह है कि तब आप हमारे हाथ से क्यों खाएगी? आपको तो तब साहब खिलाएंगे।”
सुलताना झेंप गई और बात बदलने के लिए उसने अपने बैग में हाथ डाला। पांच का नोट उसकी हथेली में आकर बाहर निकलने ही वाला था कि शामली ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली “देखिये हमको कुछ दीजिये विजियेगा नहीं!”
जब उसने जाने के लिए पीठ मोडी तो सुलताना ने बड़ी हिम्मत करके गला साफ़ किया और अटकते हुए लहजे में बोली, “शामली, तू इतनी अच्छी है, मगर तूने अपने आदमी को क्यों छोड़ दिया?”
शामली ने नज़रे नीची कर लीं और पाँव के अंगूठे से ज़मीन रगड़ने लगी। चाँदी की चमकदार झांझर में उसके पाँव में लगा हुआ सुर्ख महावर परछाईयां बनकर डोलने लगा।दूसरे लम्हे उसने नज़रे उठाई, उनमे कुछ मायूसी, कुछ तंज़ था।धीरे से बोली, “जाने दीजिये बीबीजी, आप नहीं समझेंगी।” और फिर वह झाँझरें बजाती, बिछुए झंकाती चली गई।
शामली के जाते ही खानसामा आ गया और सीनी में खाना पकाने का सामान उसके सामने रखते हुए बोला, “बड़े साहब का चपरासी कहता था—-राम अवतार को नौकरी से जवाब मिलने वाला है।”
“अरे क्यों ? “ वह उछल पड़ी।
“बात यह है कि चपरासी, फराश, माली और कई एक छोटे बाबुओं ने शिकायत की है कि यहाँ क्वाटरों में बदमाशी होती है। हम लोग बाल बच्चेदार हैं, घरों में सयानी बहू बेटियां है और यह औरत आवारा है। बड़े बाबु भी कहते थे की राम अवतार की हरकते ठीक नहीं हैं। कल शाम को सुना नहीं था आपने?”
“हाँ हाँ, कल शाम हमने कुछ झगडे की आवाजें सुनी तो थीं। क्या बात थी?” सुलताना को याद आया कि कल झुटपुटे के वक़्त उसने कुछ झगडे की आवाज़े सुनकर चुपके से खिड़की खोली थी तो इतना दिखाई दिया कि कुछ लोग पलंग पर बैठे जोर जोर से बातें कर रहे हैं, इतनी तेज़ और जल्दी जल्दी कि कुछ समझ में नहीं आ रहा था। राम अवतार मुजरिम सा खड़ा था और उसके पास एक आदमी बाईसिकल पर टिका खड़ा था और एक आदमी, कोट पाजामा पहने, बड़े रोब से धमकी देने के अंदाज़ में बातें कर रहा था। शामली कहीं नहीं थी हालाँकि यह सारा झगडा उसी की कोठरी के सामने हो रहा था। फिर सुलताना ने खिड़की बंद कर ली।
“वह राम अवतार के बिरादरी के लोग थे बेगम साहब। उसके चाचा का बेटा भी था। वे ऊंची जात के लोग हैं; रामोतार के माँ बाप ने बिरादरी में इसकी बात पक्की कर दी है, मगर अब यह यहाँ इसके चक्कर में फंस गया है, और—.” वह रुक गया क्योंकि उसे अहसास हुआ कि सुलताना उसकी बात सुन ही नहीं रही है।खिसियाकर बोला, “गोशत में क्या लौकी पड़ेगी बेगम साहब?”
सुलताना जैसे ख्वाब से चौंकी—-“ऐ? —हाँ, ठीक है।”
खानसामा ने चुपचाप सीनी उठाई और निकल गया।

सुलताना ने एक नज़र उसे जाते हुए देखा, फिर अपने कागज़ इकट्ठे कर ही रही थी कि दस्तक हुई। उसने दरवाज़ा खोला और रामअवतार को देखकर हैरान रह गई। वैसे तो कभी कभार सुलताना के ख़त जब ग़लती से सरकारी दफ्तर में चले जाते थे तो रामअवतार ही देने आता था, मगर आज उसे राम अवतार को देख कर अजीब सा लगा। तो यही था शामली का वह महबूब जिसपर इतना किस्सा हो रहा था। शामली उसे चाहती थी, शामली जो कह गई थी —-“आप नहीं समझेंगी!”
“बीबी जी यह आपका ख़त आया था, बड़े बाबूजी ने मुझे अभी दिया है।”
सुलताना ने हाथ बढ़ा कर ख़त ले लिया और बोली, “राम अवतार! यह…यह तुम्हारी नौकरी के बारे में क्या सुनने में आ रहा है?”
राम अवतार ने नज़रे नीची कर ली। चुप रहा।
सुलताना उसकी इस चुप्पी से रुआंसी हो गई। जी चाह चिल्लाकर राम अवतार से कहे—-“खुदा के लिए तुम लोग मुझे अपना दोस्त समझो। यह दीवार जो मेरे और तुम्हारे बीच खड़ी है इसे गिरा दो! राम अवतार शामली से कहो, मुझसे इतना दूर न रहे। मुझे समझने का मौक़ा भी तो दे! तुम दोनों शागिर्द पेशे में पैदा हुए और मैं एक कोठी में, तो इसमें मेरा क्या कुसूर है?” मुश्किल से बोली, “क्या शामली की वजह से? क्या किसी ने तुम दोनों की शिकायत की है?”
राम अवतार ने धीरे से बस इतना कहा, “कुछ नहीं सरकार, अब क्या आपसे कहूँ!” और फिर वह सलाम करके चल दिया, जैसे उसका भी यही खयाल हो कि आपसे क्या कहूँ, आप नहीं समझेंगी।

सुलताना का खून खौलने लगा; गुस्से से नहीं, इरादे की शिद्दत से। उसने शामली और राम अवतार की चुनैती क़ुबूल कर ली। कल वह बड़े साहब से जाकर लड़ेगी और उनसे पूछेगी कि दो मासूम,नेक,मेहनतकश इंसानों की मोहब्बत में रोड़ा अटकाने का उनको क्या हक है? किसी को भी क्या हकहै? अगर राम अवतार की नौकरी चली जायेगी तो वह उन दोनों को अपने घर में पनाह देगी, राम अवतार के लिए खुद नौकरी ढूंढेगी। बड़े आये बिरादरी वाले, मारपीट करने वाले—-देखेंगे! कितनी ही देर तक वह बड़े साहब और राम अवतार की बिरादरी वालों से बहस करने के लिए अच्छे अच्छे ज़ोरदार जुमले दिल ही दिल में बनाती और उनकी रिहर्सल करती रही। वह राम अवतार और शामली पर यह बात साबित करके रहेगी कि वह उनकी दोस्त है,कि वह सबकुछ समझती है। कल सुबह ही सुबह जाएगी वह!

अगले दिन वह बहुत जल्दी तैयार हो गई और कॉलेज के वक़्त से कोई एक घंटा पहले बाहर निकल आई। इस वक़्त बड़े साहब कोठी पर ही मिल जायेंगे। उसे यह भी उम्मीद थी कि शामली अपनी कोठरी के सामने ही मेजर साहब के बच्चे को प्रैम में घुमाती मिल जाएगी क्यों कि वह अक्सर बच्चे को घंटो सड़क पर घुमाती और पास के पार्क में ले जाती। और उसे यह सोचकर एक बड़ी पुरिस्रार सी ख़ुशी हुई कि शामली को तो गुमान भी न होगा की वह उसी की खातिर बड़े साहब से लड़ने जा रही है।
दरवाज़े से बाहर क़दम रखते ही उसने शामली का दरवाज़ा चौपट खुला देखा। न वहां उसका पलंग था, न बिस्तर, न बर्तन न कोई और सामान। चूल्हा बुझा पड़ा था और ताक पर रखा चिराथा औंधा पड़ा हुआ था। वह सन्नाटे में आ गई। दफ्तर में पानी पिलाने और झाड पोंछ करने वाली वहीँ खाट बिछाए अपनी लड़की की जुएँ देख रही थी। उसने फ़ौरन सूचना दी, “सरकार, शामली भाग गई!”
सुलताना के मुहं पर जैसे किसी ने तडाक से एक तमाचा मारा! “कब?”
“पता नहीं सरकार। रात तक तो थी।”
“और राम अवतार?”
चप्रासन हंसी, “रामौतार हैंगे। रो रहे हैं अपने लिखे को। ऐसी नीच ज़ात रांडों का क्या है बीबी जी, आज एक किया, कल दूसरा, परसों तीसरा…..नीच जात हैं न!” और उसने जोर से अपने नाखूनों के बीच एक जूं धरके पीस दी जैसे शामली का ही कचूमर निकाल दिया हो।
सुलताना के कदम लडखडाने लगे। अब बड़े साहब के पास जाना बेकार था; किस मुहं से जाती और क्या कहती! धीरे धीरे चलती हुई सदर फाटक की तरफ बढ़ी। फाटक के पास स्टूल पर रामावतार बैठा था। उसने रोज़ की तरह सुलताना को सलाम भी किया और बढ़कर अधखुला फाटक खोला भी, मगर मुस्कुराया नहीं और फिर जाकर स्टूल पर बैठ गया—-गुमसुम, उदास, अकेला।

सुलताना ने सिर झुका लिया और आगे बढ़ गई। दरअसल उसे खुद ही राम अवतार से आँखे चार करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। आखिर वह भी औरत थी; और एक वह भी औरत थी जो आज राम अवतार को दगा देकर भाग गई थी। अलबत्ता सुलताना ने इतना ज़रूर महसूस किया कि चपरासी, अर्दली, माली वगैरह जो राम अवतार से खींचे खिंचे रहने लगे थे आज उसके करीब बैठे थे और उनके चेहरे किसी नामालूम सी ख़ुशी से खिले जा रहे थे। वे राम अवतार को बहलाने की कोशिश कर रहे थे।

सड़क तक पहुँचते पहुँचते सुलताना को शामली से नफरत सी महसूस होने लगी। बेचारा राम अवतार! तो यह ठीक ही था की नीच जात —उफ़! फिर उसे जात की ऊंच नीच का ख़याल आया!—-चलते चलते रास्ते में उसे जितनी औरतें मिली, सबके बारे में वह यह अंदाज़ा लगाने की कोशिश करती रही की क्या यह भी नीच ज़ात हैं? और अगर हैं तो क्या यह भी अपने चाहने वालों को दगा देकर भागी हैं? नाहक उसने शामली से इतना प्यार किया, फजूल उसको इतना सिर चढ़ाया, सचमुच ही कम औकात निकली—नीच जात! उसने जोर से ज़मीन पर थूका और आगे बढ़ गई!

भला इतने दिन बाद और इतनी दूर से वह शामली को कैसे पहचान लेती? लेकिन शक उसे पहली ही नज़र में हो गया था कि सिर पर अमरूदों की झापड़ी रखे, पीली साडी बांधे, जो यह औरत सिकंदर बाग़ के फाटक में मुड़ी है, यह शामली ही है। उसने अपने रिक्शेवाले से कहा कि उसका पीछा करे और उसके बराबर से रिक्शा निकाले ताकि वह अच्छी तरह से देख सके। अपने बिलकुल पीछे रिक्शे की खड़बड़ाहट सुनकर औरत ने मुड़कर देखा और एक मर्तबा फिर सुरमई बादलों में कौंधा सा लपक गया— तो वह शामली ही थी!

रिक्शा बढाते वक़्त सुलताना ने सोचा था कि अगर वह शामली निकली तो वह उसकी ऐसी खबर लेगी कि वह सात जन्म तक याद करेगी। चुनांचे उसने रिक्शा रुकवाया, उतरी और फ़ौरन ही शामली को फटकारना शुरू कर दिया, “शामली तू कितनी बुरी है! तू भाग क्यों आई? बेचारा राम अवतार इतना रोता है तेरे लिए, आधा भी नहीं रह गया है, सब उसकी हंसी उड़ाते हैं. तूने बहुत बुरा किया; भला ऐसा करना था तुझे?”
सुलताना के इस तूफ़ान का जवाब शामली ने सिर्फ एक जुमले से दिया, “मगर वह अपनी सरकारी नौकरी से तो अलग नहीं हुआ न बीबी जी?”
सुलताना की समझ में कुछ नहीं आया; शामली जब टोकरी सिर पर ठीक करती हुई जाने को मुड़ने लगी तो वह बोली, “मगर शामली, यह क्या बात हुई?”
शामली रुकी, मुड़ी, उसने टोकरा उतारकर ज़मीन पर रख दिया और कमर पर दोनों हाथ रखे, जैसे उसे सुलताना की चुनौती क़ुबूल कर ली हो। गुस्से से बोली, “मगर क्या बीबी जी ? मगर यह कि वह बार बार मुझसे कहता था की तेरे कारण मेरी सरकारी नौकरी छूटने वाली है। मुझपर एहसान धरता था। आप बताइए, क्या मैंने उससे कहा था कि तू सरकारी नौकरी कर या मत कर? मुझे उसकी नौकरी से प्यार था क्या? जाने अपने को क्या समझता था। बार बार यही बात ‘नौकरी छूट जाएगी, तेरे कारण बदनाम हो रहा हूँ; तू मेरे लिए अपशकुन है; और कहता ‘अगर नौकरी छूट जाएगी तो तुझे खिलाऊंगा क्या?’ अगर उसके घर बैठ जाती न, तो उम्र भर यही ताने देता—-और खाना खिलाने का क्या है बीबी जी, उस जैसे दस को कमा कर खिलाने की हिम्मत रखते हैं हम।”
इतना कहकर वह झुकी और टोकरा उठाकर सिर पर रख लिया ; एक पल खामोश रही, फिर सुलताना की तरफ देखा। उसकी बड़ी बड़ी कटीली आँखों में लबालब आंसू भरे थे; धीरे से बोली, “रामोतार ठीक तो है न बीबी जी? उससे मेरा…..मेरा नमस्ते कह दीजियेगा।”

सुलताना ने सिर झुका लिया और उतनी ही अहिस्ते से बोली, “कह दूँगी, ज़रूर कह दूंगी।”
आंसुओं के बीच से शामली मुस्कुराई जैसे कहती हो, “हाँ, ठीक है, अबकी बार शायद आप समझ गईं।”

तस्वीरें गूगल से साभार 

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अमानवीय सौन्दर्यधारणाओं से मुक्ति श्रीदेवी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी!

नीलिमा चौहान 


श्रीदेवी के देहावसान के साथ ही एक सिने युग का  भी आज अवसान हो गया । आज व्यक्त किये गये  सम्वेदना संदेशों को पढकर  यह साफ जाना जा सकता है कि सुंदर और नयनाभिराम के भी नश्वर होने के यथार्थ को जाहिर करती इस दुर्घट्ना ने उनके प्रशंसकों  की पीड़ा को द्विगुणित किया  । क्या ही सितम  है  कि सुनहले पर्दे के मायावी रूप से अतिप्रभावित भारतीय दर्शक नायिका -सौंदर्य के भी अतिमानवीय रूप का उपासक है ।   दर्शकों के लिए ग्राह्य होने की कसौटी पर खरे उतरने के लिए नायिकाओं को जिन पीड़क प्रकियाओं और कृत्रिम जीवन शैली का पालन करना होता है उसके प्रति अज्ञानता और उदासीनता भारतीय दर्शक का पसंदीदा शगल है । अभी श्रीदेवी के जाने की ताज़ा पीड़ा के  ताज़ा पलों के कारुण्य में  रसाघात करने की धृष्टता करना  अपेक्षित नहीं होगा । किन्तु इतना तो कहा ही जा सकता है कि र्सौन्दर्योपासना करने वाली भारतीय रसना को अपने टेस्ट बड्स को बदलने की घोर ज़रूरत को भी इस अवसान से जोड़कर देखना शुरू करना होगा ।

अभी बीते दो रोज़ से सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर सोनम कपूर के द्वारा सुंदरता के मिथक का सच बताते हुए टीनेज लड़कियों को लिखे गए पत्र और तस्वीर की खूब चर्चा हुई है। लेकिन वहीं दूसरी ओर उनके इस कदम को सोशल मीडिया पर फॉलोअर की बाढ़ को न्योतने का स्टंट कहकर नज़रअंदाज़ किये जाने की पहल भी की गई ।  इसे पब्लिसिटी का एक तरीका कहकर कमतर साबित करना ,अपेक्षाकृत प्रबुद्धों की सहज और जायज़ प्रतिक्रिया हो सकती है ।लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सेलेब्रिटीज़ के द्वारा जन-जागरूकता पैदा करना शुष्क उपदेशात्मक लेखकीय कर्म की तुलना में अधिक असरकारक होता ही है । प्लेसिबो इफेक्ट है यह । जिन तमाम लड़कियों ने ब्यूटी के इस आदर्श को पहले प्राप्य मानकर सपने देखे और फिर असफल मानकर कुंठाग्रस्त हुईं उनके लिए ।

परिणिति चोपड़ा द्वारा स्ट्रेच मार्क्स को पब्लिकली फ्लॉन्ट किया जाना और सोनम का यह स्टंट अगर उनके फैन क्लब में इजाफा करता है तो यह एक अलग और ग़ैरहानिकारक मसला है । जिन आम साधारण लड़कियों ने सुनहले पर्दे की रूपसियों के सौंदर्य  को अंतिम पैमाना और आखिरी लक्ष्य समझकर यह  मान लिया था कि ” हमारा कुछ नहीं हो सकता ” उनके लिए ब्यूटी मिथ को तोड़ने का यह कारगर तरीका हो सकता है । सोनम के इस कृत्य से ब्यूटी बाज़ार की मजबूत दीवार पर एक डेंट तक न पड़ने का तर्क इसलिए भी नज़रअंदाज़ किया जा सकता है क्योंकि बाज़ार तो उपभोक्ता के जेहन के भरोसे टिकता है । चोट और बदलाव वहीं किया भी जाना है और इस बाबत किसी फिल्म तारिका के द्वारा इस मिथ को छिन्न भिन्न किया जाना स्वागत योग्य पहल ही कही जानी चाहिए । विद्या बालन ने स्त्री के आदर्श फिगर के मिथ को जिस खूबसूरती के साथ खारिज कर दिखाया है उसी कड़ी में सोनम और परिणिति का यह कदम भी शामिल कर कम से कम हम उदाहरण सहित यह जतला सकेंगे कि सौंदर्य के तथाकथित मानदंडों पर खरे उतरने की पीड़ा उठाना बेमानी भी है और अव्यावहारिक भी । अनिवार्य तो कतई भी नहीं ।

सुनहले पर्दे की सुंदरता के आतंक का भंडाफोड़ होने की परिघटनाएं स्त्रियों के सामने जितनी ज्यादा पेश होंगी अपनी देह के लिए उतना ही सहज होना सीख पाएंगी । कल को इतना तो अवश्य होगा कि जब आदर्श सुंदरता के मिथ को भुनाकर ये सितारे हमारे मन व जेब को आतंकित करने की कोशिश में रत होंगे तो हमको जन्नत की हकीकत मालूम होगी । और तब यह किसी स्त्री की अपनी फ्री च्वाइस होगी कि वह बाज़ार के ज़रिए उस खोखले ब्यूटी मिथ को साकार करने को कितनी लालायित हो या न भी हो ।

अबतक हमने स्त्री -मन को एक लाज़मी लेकिन नामुमकिन और नाहासिल किस्म की सुंदरता  के पाने के लिए झोंके रखा था । क्या ही सुंदर बात है कि लड़्कियों को इस जालसाज़ी को पहचानने की सलाहियत  उन्हीं ब्यूटी आइकॉन्स के ज़रिए  मिल पाने  का मौका बन पड़ रहा है । जब वर्जीनिया कहती हैं कि सुंदरता स्त्री का राजदण्ड है तब उनका आशय स्त्री को उसकी ही देह की कैद में तड़पने देने की साजिश का पर्दाफाश करना होता है । कैद,  जिसकी सुंदरता को बनाए रखना अपने आप में दुष्कर कर्म है । सुंदरता जिसे सय्याद की नजर से देखा और परखा जाना है । कैद जिसको अन्य तमाम कैदों से बेहतर और ध्यानाकर्षण योग्य बनाए रखना है ।  देह की उपेक्षा स्त्री के लिए सर्वाधिक असहनीय है तो देह की तुलना स्त्री को प्रताड़ित करने का अचूक अस्त्र । देह से  परे और देह से ऊपर उठने का विचार स्त्री का भीषण राजद्रोह है । सुनहले पर्दे की तारिकाएँ इस सज़ा के लिए आत्मसमर्पण करने के उपरांत ही अपने पेशे में प्रवेश करने के बाबत सोच भी सकती हैं । विमान परिचारिकाओं और मीडिया के तमाम माध्यमों में पेश होने के लिए तथाकथित सुंदरता को पैमाना बनाकर स्त्री- देह की स्केलिंग करने वाली जमात में सोनम का यह कदम आंखें खोलने वाला कदम कहाया जाना चाहिए । जिस जमात में बारह -पन्द्रह साल की लड़कियां कम खाकर और आईने से दिन भर अपने सुंदर होने का आश्वासन पाकर अपनी ऊर्जा को ज़ाया और आत्मविश्वास को आहत होने दे  रही हों वहाँ एक फिल्म तारिका का अपने सुंदर दिखने के बनावटी तरीकों और आयातित राज़ों को खोलना किसी को क्योंकर खलना चाहिए ।

सोनम कपूर

सिस्टरहुड जाहिर करने के अचूक मौके को हाथ से जाने दिए बिना सोनम कपूर के इस खूब शाया किये जा रहे लेख व तस्वीर को और प्रचारित होने की कामना सहित यह भी अर्ज़ करना चाहती हूं कि रोग नहीं रोग के लक्षणों को लक्षित करने से भी लाइलाज़ मर्ज़ के प्रति इम्यूनिटी में इज़ाफ़ा होता है। तो  जी तो आन दो न और ऐसे फिल्मी स्टंट। श्रीदेवी को उनके मुरीदों की सच्ची श्रद्धांजलि भी यही होगी कि स्त्री – सुंदरता को अपनी अमानवीय पूर्वधारणाओं से आज़ाद कर दिया जाए ।

पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, ‘बेदाद ए इश्क’ (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.
 
तस्वीरें गूगल से साभार 

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