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सामाजिक क्रांति के लिए आवश्यक सावित्रीबाई फुले के महत्वपूर्ण दस्तावेज

विद्याभूषण रावत 


सावित्री बाई जोतिबा  फुले भारतीय इतिहास में सर्वोत्तम युगल के तौर पर कहे जा सकते है. भारतीय समाज में यदि फुले दम्पति के कार्यो को भली प्रकार से समझ लिया और अपना लिया तो अहिंसात्मक  क्रांति अवस्यम्भावी है. पिछले कुछ वर्षो में ज्योति बा फुले के विचारो के विषय में विभिन्न लोगो ने लिखा है लेकिन सावित्री बाई फुले के विचारो और कार्यो के बारे में बहुत कम जानकारी है. अधिकांशतः लोग उन्हें जोतिबा फुले की पत्नी के तौर पर जानते है हालाँकि ये उनके विशाल व्यक्तित्व के साथ अन्याय है.


सामाजिक आन्दोलनों को समर्पित रही हमारी अम्बेडकरवादी साथी रजनी तिलक को इस बात के लिए धन्यवाद देना पड़ेगा के उन्होंने सावित्री बाई फुले की रचनाओं, लेखो और जोतिबा  फुले को लिखे उनके पत्रों को संकलित कर ‘सावित्रीबाई फुले रचना समग्र’ नमक पुस्तक के तौर पर प्रकाशित की है जो हिंदी के पाठको के लिए बहुत ही अनमोल है. इस संकलन में सावित्रीबाई फुले द्वारा रचित कवितायें है, फिर उनके जोतिबा  को लिखे तीन पत्र और उनके पांच महत्वपूर्ण भाषणों की शामिल किया गया है.

इस संकलन को पढ़कर सावित्रीबाई फुले की बहादुरी और उनकी सैधान्तिक ताकत की जिसने उन्हें भारत की सबसे क्रन्तिकारी सामाजिक कार्यकर्त्ता बनाया. उनकी कविताएं हमें उनके विचारो की विशालता का दर्शन कराते है जिनमे न केवल अन्धविश्वास के विरुद्ध उनकी लड़ाई है अपितु लोगो से उसको मुक्त करने हेतु उनके सुझाव भी हैं. शुद्रो को अन्धविश्वास छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए और उसके लिए आवश्यक है अंग्रेजी भाषा का ज्ञान . उस ज़माने में भी एक साधारण शिक्षा प्राप्त महिला ये समझ चुकी थी के भारतीय शिक्षा शुद्रो को शोषित रखने का एक षड़यंत्र है. उनकी कविताओं को पढ़कर हम उनकी वैचारिक क्षमता और उनके चिंतन की दिशा को समझ सकते है . अपनी कविता अज्ञानता में वह कहती है:

‘ एक ही दुश्मन अपना,
खदेड़ दे उसे हम, सब मिल कर,
उससे ज्यादा खतरनाक न कोई,
खोजो खोजो मन की भीतर झांको,

बताओ तो खोजा क्या अपना दुश्मन,
खोजो तो कहाँ है वह हमारा दुश्मन,
सोचो सोचो बताओ बच्चो,
क्या नाम है उसका ?
नहीं पता कौन है दुश्मन ?
क्या तुमने प्रयास किया,
क्या तुम्हारा प्रयास विफल हुआ,
क्या तुमने खुद ही मान ली हार,

चलो चलो मैं बताती हूँ,
उस दुष्ट खतरनाक दुश्मन की पहचान,
ध्यान से सुनो उस दुश्मन का नाम,
उस दुश्मन को कहते हैं अज्ञान’

मैं समझता हूँ को आज के दौर में जब दुश्मन शब्द पर इतना जोर है, जब दुश्मन के माने पाकिस्तान, मुसलमान, दलित, आदिवासी बना दिए गए हो तो सावित्रीबाई फुले ये शब्द क्रांति से कम नहीं है और आज भी इसको दोबारा से हमारे बच्चो और बुजुर्गो के दिमाग में डालने की जरुरत है. ऐसी कितनी ही कविताएं इस संकलन में हैं जो आज के समाज को दिशा देने में बहुत सहायंक हो सकती है और शायद फुले दम्पति को भी भली प्रकार से समझने में काम आये.

अपने पति, मित्र, गुरु ज्योति बा फुले को सावित्री बाई के तीन पत्र इस संग्रह में शामिल किये गए है उनको प्रेम के अप्रतिम भेंट कह सकता हूँ. उनके पत्रों में केवल और केवल समाज की चर्चा है. वो इतने भावविभोर कर देने वाले है के आप अंदाजा लगा सकते है के दोनों के मध्य कितना मधुर सम्बन्ध था और कैसे सावित्री बाई ने अपने पति का कर कदम पर साथ दिया और कैसे ज्योति बा उनके साथ खड़े रहे. दूसरो को बदलने से पहले अपने घर में वो परिवर्तन नज़र आना चाहिए और वो कार्य ज्योतिबा फुले ने किया और सावित्री बाई फुले ने उस महान कार्य को आगे बढ़ाया. बेहद की खुबसूरत इन पत्रों में आप उन भावनाओं को समझिये जो सावित्रीबाई व्यक्त कर रही है.

जोतिबा और सावित्रीबाई फुले



29 अगस्त १८६८ को नाथ् गाँव खंडाला, जिला सतारा से ज्योतिबा को लिखे अपने पत्र में सावित्री बाई गाँव की एक घटना का जिक्र करते हुए कहती है :

गांव में गणेश नाम का पुरोहित अक्सर आता था. वह गाँव गाँव क़स्बा कस्बा घूम घूम कर ग्रामीणों को पंचांग पढ़ कर सुनाता था, भविश्यवाणी करता था, नक्षत्र देखकर अनपढ़ लोगो को उनकी किस्मत देखता था और अच्छे बुरे बता कर दक्षिणा लेकर, पूजा पाठ करके उनसे पैसे लेकर अपना पेट पालन का काम करता था.


हमारे गाँव की हाल ही में युवा अवस्था में कदम रखने वाली सारजा नाम की युवती उससे आकर्षित हो गयी और उसकी बातो में आकर उससे प्रेम कर बैठी. न केवल दोनों प्रेम कर बैठे बल्कि उन दोनों ने शारीरिक सम्बन्ध बना लिए जिसके चलते लड़की छः माह की गर्भवती हो गयी.  सारजा के शारीरिक बदलाव को देखकर लोगो के बीच कानाफूसी होने लगी. दोनों के बीच सम्बन्ध का आभास होते ही गाँव के दुष्ट किस्म के मनचलों ने दोनों पर हमला बोल दिया. सरे आम दोनों को घेर कर उनकी अव्नामानना की उनकी निर्दयता से पिटाई की. गाँव की सडको पर दौड़ा दौड़ा कर उनकी दुर्गति कर डाली यहाँ तक कि उन लोगो ने जान से मार डालने की कोशिश की. जैसे ही मुझे इस घटना का पता चला मैं सब काम छोड़ कर उधर ही दौड़ कर पहुंची. मार काट पर उतारू लोगो के बीच मैं खड़ी हो गयी और उन्हें अंग्रेजो के शासन और कानून के बारे में बताया . मैंने उन्हें डराया के इनकी हत्या करने पर तुम्हे सजा मिलेगी. तरह तरह से समझाते हुए  मैंने क्रूर भीड़ को हत्या करने से रोका. इस कुक्र्त्य से उनका मन शांत करके उधर से ध्यान हटाया . मेरे  बीच बचाव के बाद गाव के सदु भाई ने दोनों को धमकाते हुए अपना फैसला सुनाया के , ‘ सरजा ने इस पुरोहित वामन की बातो में आकर ने केवल अपनी इज्जत मिटटी में मिला दी बल्कि इसने गाँव की इज्जत भी  मिटटी में मिला दी. अतः हमारा ये फैसला है के दोनों हमारा गाँव छोड़ कही भी चले जाएँ . उसके इस फैसले को स्वीकार कर लिया गया . हालाँकि गाँव वालो ने उन दोनों की जान बचा लेने के मेरे प्रयास पर हैरानी जताई.

सरजा और पुरोहित अपनी रक्षक, काल के मुंह से निकालने वाली आदि माता समझ कर मेरे पांवो पर गिर कर बहुत रोये. उनका रुदन थम नहीं रहा था. मेरे समझाने पर दोनों थोड़े संयत हुए. मैंने दोनों को आपकी शरण में भेज दिया है.उम्मीद है इस घटना की जानकारी मिलने के बाद आप उनकी कही रहने की व्यवस्था कर देंगे. अंत में बस इतना ही मैं आपको बताना चाहती थी.”


ये पत्र पढ़ कर आप अंदाज लगा सकते हैं के सावित्री बाई और जोतिबा  का रिश्ता कैसा था और किस प्रकार से दोनों की इंसानी रिश्तो और उनके मानवाधिकारों के प्रति गहन निष्ठां थी. सावित्रीबाई और जोतिबा  बा ने ब्राह्मणवाद के पुरे तंत्र का पर्दाफाश  किया लेकिन अपनी मानवीय मर्यादाओं में उन्होंने गरीब और उत्पीडित ब्राह्मणों की रक्षा करने में कोई कोताही नहीं की. इस पत्र में ब्राह्मण युवक के खिलाफ वह कोई जहर नहीं उगलती अपितु उसकी करतूतों की आलोचना करते हुए भी दोनों लोगो को  भेज देती है. आज से करीब  150 वर्ष पूर्व एक महिला दो व्यक्तियों के चाहत के लिए समाज के सामने खड़ी हो गयी और उसके पति ने उसका पूरा साथ दिया, ये दिखाता है के दोनों के मध्य कितना प्रेम और विश्वास था तथा भीड़ के न्याय देने की कोशिश का सावित्रीबाई ने कैसे विरोध किया . आज जब प्रेम विवाहों पर हमारी खाप पंचायतो के फतवे चल जाते है और लोग अपने ही बच्चो को जान से मार देने में कोई शर्म और अपराध नहीं महसूस करते, उन्हें सावित्री बाई से सीखना चाहिए के लोगो का जीवन बचाने के लिए क्या किया जाए. ऐसा विश्वास केवल उन लोगो में हो सकता है जो ईमानदारी से अपने कार्य कर रहे है और जिन पर लोगो का भरोषा होता है. आज समाज में ऐसे कार्यकर्ताओं की कमी है क्योंकि वैचारिक ताकत नहीं है और छोटे छोटे पद, पैसे के लालच में हम वो ताकत नहीं ला सकते जो सावित्रीबाई ने दिखाई. इस महत्वपूर्ण प्रत्र से ये भी पता चलता है के सावित्री बाई मात्र गाँव में स्कूल नहीं चलाती थी अपितु समाज को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थे और उनकी राजनैतिक और सामाजिक समझ बहुत परिपक्व थी.

राजनीतिलक



एक अन्य पत्र में सावित्री बाई अपने मायके का जिक्र करती है के कैसे उनका भाई ज्योति बा की आलोचना करता रहता है और बताता है के अछूतों के लिए कार्य करने का कारण समाज ने आपका बहिष्कार किया क्योंकि आप पाप कर्म कर रहे हो.’ साधारणतः ऐसे वाकये हमारे घरो में आते है जब हमारे नाते रिश्तेदार हमारी सोच का विरोध करते है लेकिन आपका अपना भाई या पिता विरोध करे तो बेहद दुःख होता है. सावित्री बाई इस पत्र में ज्योति बा को बता रही है कैसे उन्होंने अपने भाई को बदला. अपने भाई के लिए वो लिखती है , ‘ आपकी मति ब्राह्मणों की चाल की शिकार हो गयी है . उनकी घुट्टी पी पी कर, उनके पाखंडी उपदेश सुन कर आपकी बुद्धि दुर्बल हो गयी है और इसी करान आपके स्वयं के विवेक ने काम करना बंद कर दिया है, एक तरफ आप इतने दयालु बनते है के बकरी गाय को खूब प्यार करते है, उन्हें दुलारते है, नागपंचमी के त्यौहार में विषैले सांपो को दूध पिलाते है, ये कृत्य आपके लिए धर्म सम्मत है और महार मांग अपने जैसे इंसानों को तुम इंसान नहीं समझते. उनसे तुम परहेज करते हो, उन्हें अछूत, अस्पर्श्य समझ कर दुत्कारते हो. क्यों करते हो ऐसा. क्या तुम नहीं जानते के ब्राह्मण लोग तुम्हे भी अछूत ही समझते है. हमारे स्पर्श से भी उन्हें नफरत है.’


ये पत्र पढ़कर आप समझ जाईये के ज्योतिबा की एक एक बात सावित्री बाई ने अपने मनमस्तिष्क में रख ली और उन्हें अपने पति को अपने कार्य को बताते हुए असीमित ख़ुशी और कौतुहल है . कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इन पत्रों के अन्दर छुपी भावनाओ को समझेगा तो बदलाव आएगा. और ये सब पूरे १५० वर्ष पूर्व और वह महिला जिसने ने विद्यालय देखा था न कुछ और.

इस पत्र में वह आगे लिखती है :  ‘ मैंने अपने भाई से यह भी कहा के मेरा पति तुम्हारे जैसे लोगो में से नहीं है, जो धर्म यात्रा के नाम पर पंढरपुर तक पैदल हरी नाम जपते हुए चलता जाए और अपने लिए पुण्य कमाने का ढोंग करे. वे असली और सच्चा काम करते है, मानवता को जिन्दा रखते है, अनपढो को पढ़ा लिखाकर, उन्हें ज्ञान देकर उनके जीवन में रौशनी भरते है, उनमे स्वाभिमान जगा कर जीने की राह दिखाते है . यही सच्चा रास्ता है. उनका ध्येय अब मेरा भी ध्येय बन गया है . लोगो को शिक्षित करने में मुझे बहुत शांति मिलती है, स्त्रियों को पढ़ाने से मुझे खुद को प्रेरणा, प्रोत्साहन और उर्जा मिलती है . यह काम मुझे ख़ुशी देता है . इससे मुझे सुख शांति, आत्मतृप्ति मिलती है . ये ही वो काम है जिसमे इंसानियत और मानवता दीख पड़ती है’.


इस पत्र से साफ़ दीखता है के सावित्री बाई पर ज्योतिबा का कितना प्रभाव है और विश्वास है. ये भरोसा  सबसे बड़ी चीज है किसी रिश्ते को मज़बूत करने में जब आपके रिश्तेदार, आपका अपना भाई भी आपका विरोधी हो जाए और आपके सामाजिक सरोकारों का मजाक उडाये लेकिन अगर सावित्री बाई के उत्तर देखे तो वो हरेक को निरुत्तर कर देती है. उनके में ज्ञान देने के लिए बड़ी बड़ी बाते नहीं है अपितु नैतिकता, ईमानदारी की वो बाते है जो हम सब जानते है लेकिन करते नहीं है. दूसरी बड़ी बात ये के दोनों आन्दोलन के साथी है इसलिए वो जो देखे उसी आधार पर बात रख रहे है. जिस प्रेम पूर्वक वह अपनी पूरी बातो को ज्योति बा के सामने रख रही है वो दिखाता है उन्हें अपने पति पर कितना गर्व है और उससे भी जरुरी के उनकी समझ कितनी पैनी और साफ़ हो चुकी है. आज अगर हर परिवार में पहले स्वयं को बदलने की चाहत होती तो हमारा समाज बहुत बदल गया होता.

इस पुस्तक में सावित्री बाई फुले के पांच भाषणों को भी शामिल किया गया है जो नितांत जरुरी है. ये बहुत साधारण भाषा में, जो गाँव के किसान, मजदुर, महिलाओं की समझ आ सकती है. अगर हम उनकी पूरी सोच को देखे तो वह निहायत ही व्यवहारिक है. उनके विचारो में ब्राह्मणवाद पर कुठारघात है तो अपने समाज को बदलने के लिए भी तैयार कर रही है. वो लोगो की पूजा विधि पर हमला नहीं करती लेकिन अन्धविश्वास को लेकर लोगो को समझाती है और धर्म के नाम पर पाखंड को वह बहुत साधारण भाषा में लोगो को समझा देते है. वह लोगो को मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है :

“काम धंधे, उद्यमशीलता ज्ञान व् प्रगति का प्रतीक है. इस कार्य में सामूहिक श्रम का महत्व है तो आलस्य, भाग्य विधाता, किस्मत, प्रारब्ध का निशेध उद्योगी इन्सान अपने सुख सुविधा  में बढ़ोतरी करते हुए, अन्य लोगो को भी सुखी करने का प्रयास करता है. ठीक इसके विपरीत देव देवतावादी, भाग्यवादी, किस्मत और भगवान के भरोसे जीने वाला व्यक्ति आलसी व् मुफ्तखोर होने के कारण हमेशा के लिए दुखी रहता है तथा वह अन्य लोगो की सुख शांति को मिटटी में मिलाने का काम करता है. आलस्य ही गरीबी का पर्याय है. ज्ञान, धन, सम्मान का आलस्य दुश्मन होता है. आलसी आदमी को कभी भी  धन, ज्ञान और सम्मान नहीं मिलता. लगातार परिश्रम, इच्छा शक्ति, सकारात्मक सोच बल पर ही सफलता मिलेगी, निश्चित रूप से मिलेगी, ऐसा मेरा यकीन है .


अपने एक भाषण विद्या दान में वह  कहती है :
परम्पराओं और पुरखो से मिले ज्ञान को अर्जित कर जिन कारीगरों ने श्रमजीवी मेहनतकश जनता ने, अपने कार्य में महारत हासिल कर भारत देश को समृद्ध बनाया है, उन लोगो की कुशलता, वास्तु निर्माण का ज्ञान एवं कलात्मकता आदि गुणों की अनदेखी कर  राजाओं ने राज किया, अपनी तिजोरी भरी किन्तु शुद्र अतिशुद्र जनता की उन्नति की और कतई ध्यान नहीं दिया.  शुद्र अतिशुद्र जाति के लोग स्वाभाव से सीधे सादे एवं अनपढ़ होने की वजह से  वे निहायत मुर्ख बने हुए है. उन्हें यदि न समझाया जाए और उपदेश न दिया जाए तो  वे आप होकर आगे बढ़कर खुद के दिमाग, हिम्मत एवं होसले से कोई भी उद्योग करने से कतराते है. उनका स्वाभाव भी मिलनसार न होकर बुरा होता है. . उन्हें अपने व्यक्तित्व में किस प्रकार सकारात्मक सुधार किया जाये, किस तरह अपनी प्रगति एवं विकास योजना बनाकर उस पर अमल करे , इस बात का ज्ञान जानकारी एवं प्रशिक्षण न होने के कारणों से  वे अज्ञानता की वजह से आधे भूखे रहने हेतु तो कभी कभी पूर्ण रूप से  भूखे रहने के लिए विवश है.  शुद्र अति शुद्र जनता हेतु सम्मानजनक आजीविका का रास्ता सरकार को पहल लेकर खोजना होगा.

विद्याभूषण रावत



सावित्री बाई फुले ने ज्ञान, उद्योग, कर्म, व्यसन, नेक आचरण आदि सभी बातो पर लोगो को आगाह किया. जहाँ उन्होंने सरकार से अपने अधिकारों को लेने की बात कही वही समाज में भी बदलाव की बात की. किसानो को वो कर्जदारी से दूर रहने की सलाह देती है और कहती है के कर्ज लेना सभी अनर्थो का मूल है और कर्ज अच्छे भले इंसान को समग्र रूप से दिवालिया बना देता है.’


क्या हम कभी सोच सकते है के ग्रामीण परिवेश में बढ़ी हुई महिला जिसने स्कूल भी न देखा हो इतनी परिपक्वता से बात करते हो और वो भी आज से पूरे १५० वर्ष पूर्व. फूले दम्पति हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा आदर्श है के कैसे पति पत्नी मिलकर समाज बदलाव में सबसे बड़ा योगदान दे सकते है. मैं समझता हूँ सावित्री-ज्योति बा के प्रेम की कहानी शायद किसी भी सीरी-फरहाद या लैला मजनूँ से बड़ी प्रेम कहानी है क्योंकि उनकी प्रेम कहानी में रोमांस सामाजिक क्रांति से है. वो किसी सरकार का तख्ता उलट देने की कहानी नहीं कह रहे, वो किसी के प्रति घृणा और नफ़रत नहीं फैला रहे अपितु वो अज्ञानता को दूर करने के लिए साथ मिलकर लड़ रहे है. दोनों आपस में इतने बड़े विश्वास और प्रेम से जुड़े है के समाज के हर कटाक्ष या चुनौती को सीधे से झेलने को तैयार है.

फुले दम्पति ने समाज के हर तबके तो छुआ क्योंकि वे जानते है के समाज का विकास सबके बदले विना हो नहीं सकता. जहाँ सावित्री बाई फुले ने उस्मान शेख की बहिन् फातिमा शेख को शिक्षा प्रचार प्रसार में शामिल किया वही काशीबाई नामक एक ब्राह्मण विधवा महिला के बच्चे को गोद लिया और बड़ा कर समाज में सम्मान दिलवाया. इन सभी कार्यो में जो महत्वपूर्ण बात है वह है सकारात्मक सोच और समाज से जुड़ने के लिए रचनात्मक कार्यो में पहल. आज के दौर में रचानात्मक कार्यो को भुलाकर जो जुमलेवाजी चल रही है वो समाज को कही भी आगे नहीं ले जायेगी. लोग समाज तक नहीं पहुँच रहे है और केवल इवेंट मैनेजमेंट से प्रसिधी पाने का जरिया ढूंढ रहे है. समाज बदलाव से प्रसिधी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है. सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले की जिंदगी हम सब के लिए एक बहुत बड़ा उदहारण है.

रजनी तिलक ने सावित्रीबाई फुले के जीवन के इन उनछुये पहलुओ को हमारे सामने लाकर एक बहुत बड़ा काम किया है. बहुत सी बाते केवल मराठी तक सीमित थी और उनका हिंदी अनुवाद श्री शेखर पवार ने किया है इसलिए उनका बहुत आभार. पुस्तक को द मर्जिनलाइज्द पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है. सामाजिक आन्दोलनों के सभी साथियो को जिनकी सामाजिक न्याय और बदलाव में गहन निष्ठां है उन्हें ये पुस्तक पढनी चाहिए क्योंकि ये बहुत विशाल काय ग्रन्थ नहीं है अपितु बहुत ठोस है और सावित्री बाई की कविताएं, उनके पत्र और उनके भाषण आपके दिलो को छू जाते है. ये सभी दस्तावेज हमारी बहुत बड़ी धरोहर है जिनका इस्तेमाल हमें अपने सामाजिक आन्दोलनों में लोगो में चेतना जगाने हेतु करना चाहिए. पुनः पुस्तक प्रकाशन से जुड़े सभी साथियो को बहुत शुभकामनायें .

पुस्तक का नाम : सावित्रीबाई फुले रचना समग्र
संपादक : रजनी तिलक
प्रकाशक : द मर्जिनलाइजद पब्लिकेशन, वर्धा
मूल्य :रुपैया 160
संपर्क : themarginalised@gmail.com

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में दलित, लैंड एंड डिग्निटी, प्रेस एंड प्रेजुडिस, अम्बेडकर अयोध्या और दलित आंदोलन, इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया और तर्क के यौद्धा शामिल हैं। उनकी फिल्में, द साईलेंस आॅफ सुनामी, द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल, अयोध्या : विरासत की जंग, बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तरप्रदेश व लिविंग आॅन द ऐजिज़, समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया से साभार 

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अभी तो बहुत कुछ शेष था ! (रजनी तिलक का असमय जाना)

संजीव चंदन


अलग-अलग सरोकारों के लोग, वामपंथी लेखक और एक्टिविस्ट, अम्बेडकरवादी लेखक और एक्टिविस्ट, सामाजिक संस्थाओं के लोग, महिला अधिकार के कार्यकर्ता, एलजीबीटी समूह की एक्टिविस्ट, विश्विद्यालयों के विद्यार्थी/शोधार्थी बड़ी संख्या में कल निगमबोध घाट पर राजनीतिलक को अलविदा देने आये, आख़िरी विदाई का यह दृश्य बहुत कम ही होता है. बड़ी संख्या में महिलाओं की उपस्थिति, पुरुषों से ज्यादा, बता रही थी कि किसी महिला-अधिकार की पुरोधा ने आख़िरी सांस ली है. अम्बेडकरवादी लेखकों के आँखों के आंसू बता रहे थे कि दलित लेखन और आन्दोलन की अपूरणीय क्षति हुई है. बिलखते लोग, विद्यार्थी इस बात की गवाही थे कि लोगों का कोई आत्मीय गया है, अपना गया है.

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हाँ, रजनी तिलक का असमय निर्वाण मेरे लिए व्यक्तिगत भावनात्मक आघात सा है, हम सबकी अपनी भूमिकाओं में एक साथी के जाने से खालीपन की हकीकत की तरह है. उनसे अंतिम बातचीत फोन पर हुई थी. उनका फोन आया था, किसी महिला साथी का मुद्दा स्त्रीकाल पर उठाना चाहती थीं. चाहती थीं कि उसकी बात स्त्रीकाल पर आये. मेरी बात भी उन्होंने उससे कराई. मैंने उससे खुद लिखने का आग्रह किया. इसके दो-तीन दिन पहले उन्हें मैंने फोन किया था, दलित स्त्रीवाद पर सबलोग के लिए लिखने के लिए. तब वे अस्वस्थ थीं, उन्होंने अपनी बेटी ज्योति से लिखवाने को कहा, ज्योति से बात करवाई, वह अंग्रेजी में ही लिख सकती थी. पिछले दो-तीन सालों से उनके साथ बातचीत और काम का हमारा नियमित सिलसिला था. कितना कुछ करना चाहती थीं वे, कितनी बेचैन थीं वे उन कुछ सालों में, हर मोर्चे पर हस्तक्षेप के लिए! बहुत सी योजनायें थीं, और बहुत सी योजनओं पर काम कर रही थीं- साहित्य, संस्कृति और बदलाव के हर मोर्चे पर. साहित्य उनके लिए सिर्फ साहित्यिककर्म भर नहीं था, परिवर्तन का एक माध्यम था और सामाजिक सरोकारों के साथ सक्रियता से रहित साहित्यकार को वे साहित्यकार मानने से इनकार करती थीं.

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राजनीतिलक की आख़िरी विदाई

इन दो-तीन सालों में हमने कुछ सामूहिक गोष्ठियां आयोजित की, एक साथ कुछ घटनाओं की फैक्ट फाइंडिंग की, कई धरने-प्रदर्शनों में शिरकत किया और कुछ आयोजनों में साथ-साथ मंच पर रहे. पहली बार उन्होंने 2013 में फोन किया था स्त्रीकाल के ‘दलित स्त्रीवाद’ अंक के प्रकाशन के बाद. वे चाहती थीं कि इस कड़ी में और अंक आयें, क्योंकि एक अंक में बहुत कुछ शामिल कर पाना संभव नहीं है- वे चाहती थीं दलित स्त्रीवाद का एक रचनात्मकता का अंक आये. एनएफआईडव्ल्यू के साथ स्त्रीकाल की एक बैठक में आईं तो ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ की पुरजोर वकालत की उन्होंने. उन्होंने बताया कि ‘महिला आरक्षण के भीतर दलित-आदिवासी  महिलाओं को तो स्वतः ही आरक्षण मिल जा रहा है, हमारी लड़ाई ओबीसी महिलाओं के लिए उसमें कोटा निर्धारित करवाने की है.’ उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण के भीतर आरक्षण की दलील लेकर ओबीसी-दलित नेताओं से महिलाओं का संगठन मिला था, जिसमें वे खुद भी शामिल थीं. वे चाहती थीं कि महिला आरक्षण की मांग बहुजन महिलायें अपने नेतृत्व में करें ताकि आरक्षण के भीतर आरक्षण का मुद्दा कमजोर न पड़े. उनकी दलील थी कि यदि यह आन्दोलन नीचे से, ग्रामसभाओं से शुरू हो तो, उनकी सहभागिता से शुरू हो तो हम महिला आरक्षण जल्द हासिल कर सकेंगे, क्योंकि वहाँ बड़ी संख्या में आरक्षित वर्ग की महिलायें हैं.
पढ़ें: सावित्रीबाई फुले रचना समग्र

रजनीतिलक की आत्मकथा अपनी जमीं अपना आसमां के विमोचन अवसर पर  बाएं से दाये, हेमलता माहिश्वर, प्रोफेसर अभय मौर्या,  संजीव चंदन , रजनीतिलक, बजरंग बिहारी तिवारी

वैचारिक रूप से स्पष्ट होने के कारण ही वे अपनी बात पूरी ताकत से रखती थीं, इसकी परवाह किये बिना कि कोई इससे नाराज भी हो रहा है या नहीं. मतभिन्नताओं को बेबाकी से रखना, एक हद तक लड़ लेना और रिश्तों में पुनः सहज रहना कोई उनसे सीख सकता था. यही कारण था कि जिस स्त्रीवादी आन्दोलन के भीतर वे सवर्ण तत्व देखते हुए उसकी आलोचना करती थीं, उसके कई अग्रणी कार्यकर्ता कल उन्हें अंतिम विदाई देने आये. वे सबकी सीमाएं सिर्फ पहचानने में यकीन नहीं करती थी, बल्कि सीमाओं से उसे अवगत कराने में भी यकीन करती थीं. वे 1942 में डा.अम्बेडकर की अगुआई में हुए महिला सम्मेलन के 75वें साल स्त्रीकाल द्वारा जेएनयू में आयोजित बातचीत में पहुँचीं और फिर नागपुर में भी इस सम्मेलन की 75वीं जयन्ती पर देश भर से महिलाओं का सम्मेलन आयोजित करने में अगुआई की. वहाँ वेश्यावृत्ति के ऊपर हुए विवाद को वे सम्यक दृष्टि से देख सकने की क्षमता रखती थीं. वहाँ कुछ स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं ने वेश्यावृत्ति को यौनकर्म का दर्जा देते हुए उसे कानूनी बनाने की मांग रखी तो स्वाभाविक रूप से दलित महिलाओं ने ऐतराज किया. रजनीतिलक भी इस ऐतराज से इत्तेफाक रखती थीं, लेकिन उसी वक्त वे यह कह पाने की क्षमता भी रखती थीं कि ‘ वेश्यावृत्ति में पीड़ित महिलाओं के साथ, उनके लिए जितना काम वामपंथी महिलायें अथवा वे महिलायें करती रही हैं, जो कानूनी बनाने की मांग कर रही हैं, उतना दलित महिलाओं का संगठन नहीं कर पाता, हमारा जुडाव उनसे नहीं है, हम अपने मुद्दों में उन्हें शामिल नहीं करते.’

रजनी तिलक होने के कई मायने थे. वे दलित साहित्यकारों के भीतर पितृसत्ता को बार-बार चिह्नित करती थीं, उनसे लड़ भी लेती थीं. उन्होंने डा. धर्मवीर के विरुद्ध भी स्त्रीवादी स्टैंड लिया था. यह कविता राजनीतिलक ही लिख सकती थीं, ‘ कथित दलित साहित्यकारों/ तुम्हारी ओछी नजर में/ स्त्री का सुंदर होना/ उसका मैरिट, सुंदर न होना उसका डिमैरिट!/ सवर्णों की नजर में/ वे ही है मैरिट वाले/ तुम हो डिमैरिट/ मैरिट का पहाडा जैसा उनका/वैसा ही तुम्हारा/ फिर तुम्हारा विचार नया क्या?/ कौन सा सामाजिक न्याय कौन सा तुम्हारा? इस बेवाकी के बावजूद वे दलित साहित्यकारों को प्रिय थीं, वैसे ही जैसे आलोचना के बावजूद सवर्ण स्त्रीवादियों को या फिर अपनी साथी दलित स्त्री लेखिकाओं और कार्यकर्ताओं को. वे स्पष्ट वक्ता थीं. कई बार मुझसे भी तीखी असहमति जतायी उन्होंने, मुझे खरी-खरी सुनाया भी, लेकिन वह उनका स्वाभाविक उदगार भर होता था, व्यवहार नहीं- हमारे स्नेह के रिश्ते कभी खंडित नहीं हुए.

पढ़ें : कौन काट रहा उनकी चोटियाँ: एक तथ्यपरक पड़ताल

सोचता हूँ कि क्या उन्हें दुनिया से जाने का अहसास हो गया था, थोड़ी बीमारी तो कुछ महीनों से थी उन्हें, लेकिन उसकी परवाह कभी नहीं की. वे देश भर में महिला आरक्षण के लिए घूमना चाहती थीं, दिल्ली से बाहर. उन्होंने इन्हीं दिनों अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच बनाया. इस मंच को लेखन और जमीन पर सक्रियता दिलाने की कोशिश की. बनते ही कई यात्राएं उन्होंने दिल्ली के आस-पास की, जहां दलित महिलाओं का उत्पीड़न हुआ हो. वे दलित महिला कथाकारों का संग्रह लाना चाहती थीं, उर्मिला पवार की किताब का अनुवाद मराठी से अनुवाद करवा रही थीं, अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लगभग लिख चुकी थीं-कितना कुछ, उनके पाँव में सच में पहिया लगा था और हृदय में अभिव्यक्ति की बेचैनी थी. दिसम्बर में हमने द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन से उनके द्वारा संपादित किताब ‘सावित्रीबाई फुले समग्र’ प्रकाशित की.

कितना कुछ याद करूं! इन सब मोर्चों पर सक्रिय थीं और निजी स्तर पर उतनी ही बेचैन. अपनी इकलौती संतान ज्योति के लिए उनकी चिंतायें, उनकी चाहत उन्हें बेचैन किये था. पता नहीं क्यों उन्हें ज्योति का जीवन अनिश्चित लगता था- नहीं, नहीं वे पारम्परिक माँ नहीं थीं, वे उसके जीने के, उसके निर्णय के अधिकार पर काबिज होना नहीं चाहती थीं, वे बस उसे खुश देखना चाहती थीं. चाहती थीं कि लेखन और शोध के क्षेत्र में वह बड़ा काम करे. उन्हें लगता था कि दलित स्त्रीवाद के क्षेत्र में कितना कुछ काम करना शेष है, ज्योति वह करे. उन्होंने कोशिश की कि ज्योति और अपराजिता (जेएनयू की शोधार्थी, जिसने प्रोफेसर गोपालगुरू के साथ दलित महिला लेखन पर शोध किया है) मिलकर इस क्षेत्र में काम करें. उन्होंने अपराजिता को चंडीगढ़ में ज्योति के पास बुलाया भी. मुझसे वे काफी कुछ शेयर करतीं- मैं एक प्रगतिशील बेचैन माँ को देख रहा था, उन्हें समझता ज्योति नयी पीढी की है, वह अपने बेहतर मार्ग तय कर लेगी!


पढ़ें: युग नायिका सावित्री बाई फुले

स्त्रीकाल और राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन के कार्यक्रम में

रजनी दी किसी के जाने पर मैं अमूमन रोता नहीं, लेकिन आप, आप मुझे रुलाने के लिए, हम सबको उदास करने के लिए क्यों छोड़ गयीं,असमय ! अभी तो बहुत कुछ शेष था!!
लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं. सम्पर्क: 8130284314

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एनएच-91 ( राजेश मलिक की कहानी)

राजेश मलिक


विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित. . कहानियों पर फिल्म निर्माण और नाट्य प्रस्तुति सम्पर्क:  malikraj2508@gmail.com. मो.9935827672,  790544623

 खट-खट-खट-खटऽऽऽऽऽऽ बूटों के उठते स्वरों से जेल के सारे कैदी इस तरह सतर्क हो गए जैसे  क्लास में अध्यापक के आते ही बच्चे सतर्क हो जाते हैं. हर होंठ जैसे सिल गए हों. लेकिन यह सब जेलर के गश्त तक ही सीमित था. गश्त खत्म होते ही बाँध फट पड़ता. फिर चारों तरफ ही-हूँ-हे-मेरी-तेरी-था-थी-हैं का स्वर गूँजने लगता. कुछ मुलाकाती कैदियों को ऐसे देख रहे थे जैसे चिड़ियाघर में लोग जानवरों को देखते हैं.


‘‘चल उठ, तुझसे कोई मिलाई करने आया हैं.’’ सिपाही का लहजा सख्त था.
बजरंगी सिर झुकाये उकुड़ू बैठा था जैसे उसने कुछ सुना ही न हो.
‘‘ओए लगड़े, मैं तुझसे ही कह रहा हूँ…..सुनता क्यों नहीं.’’
बजरंगी निःशब्द, एकटक ज़मीन को ताके जा रहा था. कान मानो संज्ञाविहीन हो गए हों. उसने धीरे से किसी तरह गर्दन उठायी. सुलगती आँँखें सिपाही के चेहरे से जा चिपकीं.
‘‘क्यों बे! मुझे क्यों घूर रहा हैं?’’ सिपाही उसे हड़काता हुआ चला गया.
बजरंगी उठा. पोलियो से पतली पड़ी अपनी एक टाँग को झुलाता, भचकता हुआ चल पड़ा और सलाखों तक आकर रूक गया.
‘‘बजरंगी भैय्या! मैं एक बुरी खबर लाया हूँ.’’
इतना सुनते ही उसकी कुन्द हो चुकी चेतना में कुछ हरकत-सी आयी और उसकी उचटती निगाह उस खबर देने वाले की तरफ उठी.


‘‘भैय्या! हमने बचाने की बहुत कोशिश की फिर भी ना बचा सके तुम्हारी अम्मा को…..’’ बात पूरी करते-करते वह रोआँसा हो गया.
बजरंगी अभी भी एकटक उसे देखे ही जा रहा था. फिर भचकता हुआ पलटा. वह व्यक्ति उसे पुकारता रहा. बजरंगी चलता रहा और उसे मुड़-मुड़ कर देखता रहा. जैसे उसके लिए शब्द अपना अर्थ खो चुके हों. वह कूल्हे उचकाता अपनी काल-कोठरी में जा समाया.

‘मर गयी….अम्मा भी मर गयी….दिदिया भी मर गयी….सब के सब मर गए…….’’ वह गर्दन तिरछी किए बड़बड़ाता रहा. एकाएक उसके चेहरे पर सूर्य की किरणें पसर गयी तो आँखें किचमिचा उठीं. बजरंगी बुत-सा उन किरनों को निहारने लगा और तब तक निहारता रहा जब तक कि गीली आँखें सूख न गयी. पलकें उठाकर सामने देखा तो अम्मा का धुंधला बिम्ब आँखों में तैर गया और फिर तैरता ही गया………………………

‘‘बेटा! मत जाओं शहर, हम जैसे-तैसे मेंहनत-मजूरी करके जी लेंगे पर तुम्हारे बिना हम नहीं जी पायेगे.’’
‘‘मैं कोई ज़िंदगी भर के लिए थोड़े ही जा रहा हूँ बस कुछ ही दिनों की तो बात हैं वापस आते ही तुम्हें और दिदिया को साथ शहर ले जाऊँगा.’’
‘‘फिर भी बेटा, मेरा मन नहीं कहता कि तुम मुझसे दूर जाओं.’’
‘‘तुम समझती क्यों नहीं अब तुम्हारी वो उमर नहीं रही कि  इतनी मेहनत-मजूरी कर सको, बप्पा के न रहने बाद तुमने ही तो हम दोनों को संभाला हैं और वैसे भी आज नहीं तो कल दिदिया का ब्याह करना हैं, क्या ऐसे बैठे-बैठे कुछ हो पायेगा? अम्मा! तुम मेरी नहीं दिदिया की सोचो?’’
‘‘ठीक है बेटा! तुम जो ठीक समझो पर तुम्हारे खाने और रहने का क्या होगा?’’
‘‘तुम उसकी चिंता क्यों करती हो, भोलेनाथ! हैं ना वह सब ठीक कर देगें..’’

 जेल की काल-कोठरी में बैठा बजरंगी बीती बातों को सोचते ही सिहर उठा. उसे लगा अम्मा ने पहले उसके सिर को सहलाया फिर उसके बहते हुए अश्कों को पोछा. वह कुछ पलों तक खामोश रहा. फिर रूधे गले से बुदबुदाया, ‘‘तुम कहाँँ चली गयी अम्मा मुझे अकेला छोड़कर…….तुम्हारे बिना कैसे जी पाऊँगा मैं…..’’ वह अनायास फफक पड़ा. उसकी आँँखों के सामने अधेरा छाने लगा. उसी अन्धकार में दिदिया का चेहरा कौंध गया. वह जब अन्तिम बार आयी थी उससे मिलने…………..

‘‘तुम फिर आ गयी, कितनी बार कहा हैं दिदिया कि यहाँ मत न आया करो…….यह जगह भले लोगों की नहीं हैं.’’
‘‘ना आऊँ तो क्या करूँँ, तुम जब महीने-महीने भर घर की कोई खोज-खबर नहीं लोगे तो मुझे आना ही पड़ेगा….अगर तुम इतने ही भले होते तो मुझे गली-गली ताले-चाकू ना बेचने पड़ते. मगर तुम्हें क्या,बहिन मरे या जिये चाहे लोगों की उल्टी-सीधी बात सुने पर तुम्हें तो पीने के लिए बस अपनी दारू चाहिए.’’
‘‘कौन साला कहता हैं कि मैं दारू पीता हूँ, रही बात गली-गली फिरने की तो तुम अपने मन से फिरती हो.’’ बजरंगी की भौहें सिकुड़ने लगीं.
‘‘मैं कोई शौक से नहीं फिरती जो तुम मुझ पर आँख चियारते हो, अम्मा की दवा और इस पेट के खातिर…..’’ उसने अपने पिचके पेट पर हाथ रखते हुए कहा.
‘‘क्या यहाँ नोटों का पेड़ लगा हैं….कई-कई दिन गुजर जाते है तब कहीं एक ल्हाश आती हैं हाथ में……..अब मैं उससे अपना पेट भरूँ कि तुम…..’’

‘‘हाँ-हाँ! और भी कुछ कह लो…..चुप क्यों हो गए? अब यही सब सुनना तो बाकी रह गया हैं. अरे मेरा नही तो अम्मा का कुछ ख़्याल किया होता वह बेचारी कितनी आस लगाये तुम्हारी राह ताकती रहती है.’’ कहते-कहते उसकी आँखें छलक आयी थीं.
‘‘तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे अम्मा का सारा ध्यान तुम ही रखती हो, मैं तो कुछ करता ही नहीं.’’ बजरंगी की पलकें नीची हो आयी थीं.
‘‘यह तो तुम खुद ही जानते होगे… और हाँ! मैं तुम्हें यह याद दिलाने आयी थी कि नरसों रक्षा-बंधन है मैं और अम्मा तुम्हारी राह देखेगें.’’ दिदिया भड़ास निकालती हुई सड़क के उस पार चली गई.
मोटी मूँछ वाला मोटा मुंशी हर बार की तरह उसे भूखी नज़रों से सड़क पर जाते हुए घूरता रहा. जब तक कि वह उसकी आँखों से ओझल ना हो गयी.
बजरंगी-मुंशी की ललचाई निगाहों को ताड़ गया था. उसका मन हुआ था, कि जाकर उस मुंशी के बच्चे की आँँखें नोच ले. और उसे यह बता दे कि गरीब हैं तो क्या हुआ उसकी भी मान-मर्यादा हैं. पर क्या करता वह गरीब ही नहीं, लाचार भी था.

दिदिया के जाते ही बजरंगी को अपनी गलती का अहसास हुआ. उसने प्रण किया कि वह कभी शराब नहीं पियेगा. ना ही थाने के किसी सिपाही का अब वह काम करेगा. सिर्फ वह काम करेगा जिससे चार पैसा उसके हाथ में आये.
‘‘दिदियाऽऽऽऽऽ.’’ बजरंगी एकाएक चीख़ पड़ा. मानो नींद से जागा हो.
‘‘ऐ बे, गला क्यों फाड़ रहा हैं? जब देखो दिदिया-अम्मा-दिदिया-अम्मा…साला रटा करता हैं…. कितनी बार कहा हैं कि तेरी दिदिया-अम्मा मर गयी, मगर साले की समझ में नहीं आता.’’
बजरंगी पलकें नीचे किये मूक-सा सुनता रहा. यह लफ़्ज एक नहीं कई बार उसके चैतन्य पर गूँजें. फिर गूँजते गए. गूँजते गए-‘कितनी बार कहा हैं कि तेरी दिदिया-अम्मा मर गयी मगर साले की समझ में नहीं आता…….’
बजरंगी की आँखें अंगार की तरह चमक रही थीं, किसी को नहीं छोड़ूगाँ सब को मार डालूगाँ….सब को………….’

कबूतरों की फड़फड़ाहटों से उसकी सोच टूट गयी. उसने देखा छत के आलें में दो कबूतर अपने बच्चों के साथ गुटर-गूं-गूटर-गूं कर रहे थे. वह देखता रहा एकटक. एकाएक उसकी पलकें नीचे हो आयी थीं. हाथ-पैरों के नाखूनों से लगता था जैसे बरसों से नाखुन काटे ही ना गए हो. वह नाखुनों को देखता ना जाने कहा खो गया था……………………….



‘‘इतना बड़ा हो गया हैं और नाखुन नहीं काट पाता……अगर कल मैं न रही तो तब कौन काटेगा तेरे यह नाखुन?’’
‘‘ऐसा कभी मत कहना अम्मा, तुम हो तो सब कुछ हैं.’’
‘‘बस तुम दोनों के घर बस जाये और हमें क्या चाहिए.’’

 ‘‘नहीं अम्मा! नहींऽऽऽ.’’ उसकी चीत्कार से जेल की कोठरी कांप उठी थी. उसने अपनी हथेलियों से चेहरे को ढक लिया और सिसक-सिसक कर रोने लगा. फिर कुछ सोचते हुए उसने झट से उँगालियों के सारे नाखुन कुतर डाले. और विक्षिप्त-सा हाथ फैलाकर अनाप-शनाप बकने लगा- ‘‘देख अम्मा! देख, मैंने सारे नाखुन काट डाले…..सारे……अब तो तुम खुश हो न…… तो लौट आओं अम्मा…..लौट आओंऽऽऽऽऽ’’

‘‘उठ बे बजरंगीया, उठ.’’
‘‘ज…..जी……..ह…..जूर…….’
‘‘जा जल्दी जा, दरोगा जी ने तुझे चीर घर बुलाया हैं.’’ सिपाही कहकर बरामदे की तरफ बढ़ गया. चीर घर का नाम सुनते ही बजरंगी का मन खुशी से नाच उठा. उसने पहले ईश्वर का धन्यवाद किया. फिर गुनगुनाता हुआ रिक्शा लेकर चल पड़ा. वह रिक्शा ऐसे भगाये जा रहा था जैसे कोई खजाना मिल गया हो. कई मोड़ों के पश्चात् वह चीर घर जा पहुँचा.
‘‘कहाँँ मर गया था बे? हम तेरे बाप के नौकर है जो बैठे है इतनी देर से..’’
दरोगा आँखें तरेरकर गरजा, ‘‘जा भाग यहाँ से कोई लाश-वाश नहीं हैं.’’ बजरंगी के साँवले चेहरे पर खौफ की रेखाएँ उतर आयी थीं. शब्द टूट गए थे, ‘‘ह….जू…..र….व…वो…..म….मैं……’’
‘‘भागता है कि लगाऊँ दो-चार…….’’
बजरंगी को लगा जैसे किसी ने उसे ऊँचे पर्वत से नीचे फेंक दिया हो. उसे लगा अगर यह लाश ना मिली तो उसके सारे सपने ख़ाक हो जायेंगे. उसने पुनः गुहार लगायी, ‘‘हजूर! भगवान के लिए ऐसा जुल्म मत करिये आप बड़े लौगन की किरपा से हमार पेट चलत है, हो सके तो क्षमा कर दीजिए.’’ कहकर बजरंगी पैरो से जा लगा.
‘‘चल उठ, बहुत नौंटकी हो गई……अब खड़ा-खड़ा मुँह क्या ताक रहा है…. यह ले बीस का नोट और जाकर दो ठंड़ी बोतल ले आ.’’

बजरंगी के जाते ही दरोगा-सिपाही की तरफ मुख़ातिब हुआ, ‘‘यह बताओ इस वक्त तुम्हारे पास कितने पैसे है?’’
‘‘सर!पचास रूपये.’’
‘‘क्यों? क्या कल जीप स्टैण्ड से पैसे नहीं मिले थे?’’
‘‘जो मिले थे उससे तो कल रात बिरयानी और दारू आयी थीं.’’
‘‘हूँ.’’ दरोगा ने सिर हिलाया, ‘‘ऐसा करो तुम अस्पताल के सामने जाकर ठेले वालों से आज के पैसे ले आओं.’’
बोतल आ गयी थी. दरोगा ने हाथ लगाकर बोतल का स्पर्श किया और आश्वस्त होकर पीने लगा. दूसरी बोतल बजरंगी ने सिपाही की तरफ बढ़ा दी. सिपाही गट-गट करता एक ही साँस में बोतल डकार गया. फिर अनायास बोल पड़ा, ‘‘सर! सरकार के डेढ़ रूपये से कही दाह संस्कार होता हैं?’’
दरोगा को खामोश होता देख सिपाही चला गया.
मगर उसकी छोड़ी चिंगारी अभी भी दरोगा के सीने में दहक रही थी,‘सर! सरकार के डेढ़ रूपये में कहीं दाह संस्कार होता हैं?’



दरोगा सोचने पर विवश था,‘सरकार का क्या उसने तो सिर्फ निर्देश दे दिए कि डेढ़ रूपये में लावारिस लाशों का दाह संस्कार करो, पर कोई सरकार से यह पूछे कि डेढ़ रूपये में कितनी लकड़ियाँ आती हैं?’
‘‘मैं जाऊँ हजूर?’’ बजरंगी के पूछते ही दरोगा की तन्द्रा भंग हुई.
‘‘अबे जा……’’
बजरंगी ने सिपाही की मदद से लाश को रिक्शे पर लिटाया. तभी मुंशी ने उसकी हथेली पर सौ-सौ के दो नोट रख दिए.
लाश से उठती सड़ाँध बजरंगी के नथुने को फाडे़ दे रही थी. झट से उसने गमछे को मुँह पर लपेटा और गद्दी पर जा बैठा. उसका बायाँ पैर पैडिल पर घूमने लगा. लेकिन दायाँ पैर पैडिल के ऊपर ही झूल रहा था. किर्र-किर्र करता रिक्शा खड़न्जे से उतर कर पक्की सड़क को रौंदने लगा.
आग उगलती हुई धूप में बजरंगी के ज़िस्म से पसीने की बूँदें इस तरह टपक रही थी जैसे जलती हुई मोमबती से मोम. हवा मूक थी पेड़ गुमसुम.


लाश देखकर एक ने हाथ जोड़े तो दूसरे ने सिर पर हाथ रख लिया और तीसरे ने सिर झुका दिया. बजरंगी जल्दी से जल्दी गाँँव पहुचना चाहता था. इसलिए वह रिक्शा भगाये जा रहा था. उड़ते हुए आवारा बादल कभी-कभी सूर्य के समझ आ जाते तो बजरंगी को कुछ राहत महसूस होती. एक ही धुन थी कि गाँव पहुँँचना है, अपनों के पास.


‘‘दो सौ में दो शूट का कपड़ा……..’’
आवाज सुनते ही बजरंगी की निगाहें ठेले की तरफ घूम गयी. कपड़े रंग-बिरंगें थे. उसने सोच लिया था कि जब वह लाश फेंक कर वापस आएगा तो इसी में से एक जोड़ा कपड़ा दिदिया के लिए ले लेगा.
बजरंगी को अहसास हुआ जैसे दिदिया उसके सम्मुख आ खड़ी हुई हो और कह रही हो, ‘‘इस जनम में तो कपड़ा मिलेगा नहीं मुझे…….मगर हाँ, अगर मैं मर गई तो कफ़न जरूर मिल जाएगा….’’
ट्रक की ध्वनि उसके विचारों को रौदती हुई चली गयी थी. कई रिक्शे, मोटर साइकिल उसके अगल-बगल हो गए.

अचानक एक मोटर साइकिल वृद्धा को रौंदती हुई चली गई. उसने झट से रिक्शा रोका और चिल्लाता हुआ मोटर साइकिल के पीछे भागा, ‘‘अरे उसे कोई रोको……पकड़ोंऽऽऽ.’’ बजरंगी हाँफता-हाँफता गिरता हुआ बचा.
लोग अनदेखा करते हुए चले जा रहे थे. बजरंगी भचकता हुआ वृद्धा के निकट आया. वृद्धा का सिर एक तरफ लुढ़का था. खून ऐसे फैला था जैसे किसी ने सड़क के माथे पर बिंदिया लगा दी हो.
इतने में क्षणिक कौतुहलवश लोगों की भीड़ लाश के चारों ओर थोड़ा दूरी बनाए हुए जमा होने लगी थी. कि तभी संयोग वश पुलिस का एक दल भी वहाँ आ धमका.
बजरंगी रिक्शा लेकर चला ही था कि कानों में आवाज चुभी, ‘‘पहले पोस्टमार्टम होगा फिर कोई लाश को हाथ लगायेगा.’’


बेचारी कौन थी? कहाँ की थी, कुछ पता नहीं…..चीर घर में सड़ेगी बेचारी…..रंगीले तो बिना पैसे के हाथ भी नहीं लगायेगा…….’ बजरंगी मन ही मन में बुदबुदाये जा रहा था. इसी उधेड़बुन में वह त्रिवेणी घाट जा पहुँचा. उसने देखा, नदी सिकुड़ी हुई थी.

‘‘क्यों न इधर से ही रिक्शे को नीचे ले जाऊँ.’’बजरंगी बुदबुदाया. उसकी उँगलियाँँ ब्रेक पर कस गई. वह हौले-हौले ब्रेक में ढ़ील देकर रिक्शा आगे सरकाने लगा. एकाएक रिक्शे का तारतम्य टूट गया. और कई पलटी के बाद वह रिक्शे के साथ ही औधे मुँह जा गिरा.
उसकी देह कई जगहों से रगड़ गयी थी पर उसे अपनी तनिक चिंता नहीं थी. चिंता तो थी उस किराये के रिक्शे की जो क्षत-विक्षत था.


बजरंगी तहमद झारते हुए उठा और शिकायत भरी नजरों से आसमान की तरफ देखा, ‘‘हे भगवान! यह तूने क्या किया?’’ बजरंगी बड़बड़ाता हुआ रिक्शा लेकर सड़क पर आ गया.
चारों तरफ देखने के बाद उसे एक रिपेयरिंग की दुकान दिखी जो एक गुमटी में सिमटी थी. उसने रिक्शे के एक-एक भाग के बारे में मिस्त्री को अवगत कराया. सारी बात सुनने के बाद मिस्त्री ने अपनी मजूरी बता दी.


बजरंगी ने एक नहीं कई बार जेब को टटोला. मगर बटुवे का कहीं अता-पता नहीं था. वह वापस घाट की ओर भागा. गाँव पहुँचने की शीघ्रता उसके मस्तिष्क को कुतरती जा रही थी. वह भचकता हुआ पुल के नीचे जा पहुँचा. और विक्षिप्त-सा बटुवा इधर-उधर खोजने लगा. बटुवे की तलाश में वह लाश को भी उलट-पुलट कर देख लेना चाहता था. लाश का  कफ़न कई जगहों से तार-तार हो गया था. लाश पेट के बल थी उसका आधा भाग पानी में था.

बजरंगी ने सहमे-सहमे लाश की तरफ हाथ बढ़ाया. मारे सड़ाँध के उसे उबकाई आने लगी. उसने झटके से मुँह पर गमछा बाँधा. और लाश को बाहर खींच लिया और उसके एक-एक भाग को टटोलने लगा पर समस्या अभी भी वहीं थी.


झाड़ी में खड़ा एक कुत्ता जवान लपलपा रहा था. जिसकी लार ज़मीन पर टपक रही थी. कुत्ता इस इंतजार में था कि वह हटे और वह अपनी भूख शांत कर सके. तभी कुत्ता आसमान की तरफ मुँह उठाकर गुर्रा पड़ा, ‘‘ऊँ….ऊँ…ऊँऽऽऽऽऽ.’’ जैसे उस पेट भरने वाले को धन्यवाद दे रहा हो या इंसान की हैवानियत पर गुर्रा रहा हो.
अचानक हवा के तीव्र झोंके से पूरा वातावरण काँप-सा गया. दैत्यों के भाँँति एक साथ कई पेड़ झूमने लगे. हाहाकार का डरावना संगीत चारों तरफ चीत्कारने लगा.

बजरंगी आँख बंद किये एक तरफ दुबका खड़ा था. जैसे ही आँख खोली कि उसकी निगाहें तीर की भाँति लाश से जा चुभी. चेहरा देखते ही बजरंगी सन्न रह गया. जैसे पछाड़ खाकर गिर पड़ेगा. मुँह खुला का खुला रह गया. पूरे ज़िस्म में एक कंपकपी-सी दौड़ गयी, ‘‘दिदियाऽऽऽऽऽ.’’
वह चीखता हुआ घुटनों के बल बैठ गया. धीरे-धीरे उसकी चीख़ घुटती गयी. शब्द मारे भय के अंदर ही अंदर जैसे दुबक गए हों. मन-मस्तिष्क जैसेे दोनों फ्यूज हो गए हों. तभी रंगीले के एक-एक शब्द बजरंगी के कानों में चुभने लगे, ‘मैंने इतनी लाशें देखी मगर इस लाश को देख ना सका…….’
यह वाक्य एक नही कई बार बजरंगी के ज़ेहन में गूँजा. फिर मुंशी की घूरती आँखें, ललचायी आँखें दिदिया को जाता हुआ देख रही थी. यह दृश्य अनगिनत बार बजरंगी की आँखों पर चलता रहा. आँँखें इस कदर लाल हो गई थी जैसे पूरी देह का रक्त उसकी आँखों में उतर आया हो.
वह भचकता हुआ थाने की तरफ चल पड़ा. मुंशी की आकृति के आगे सारी आकृतियाँ, सारी खुशिया, सारे सपने धुल गए थे.
रह-रहकर दिदिया के वाक्य मन में उबल रहे थे, ‘भैय्या! तुम तो कपड़ा दे ना सके मुझे, पर देखों समाज ने मुझे कैसा कपड़ा दे दिया हैं….कैसा कपड़ा देऽऽऽऽऽऽ’
बजरंगी ने दोनों हाथों से कान बंद कर लिया था. लग रहा था जैसे कान फट जायेंगे. उसके दाँत किटकिटाने लगे. बजरंगी चलता रहा. आँसू पोेछता रहा. सोचता रहा, ‘मैं कोई शौक से नहीं फिरती हूँ जो तुम मुझ पर आँख चियारते हो…..अम्माँ की दवा और इस पेट के खतिर…..’
बजरंगी पागलो की तरह बड़बड़ाता हुआ चलता जा रहा था, ‘‘दिदिया…..कपड़ा….रक्षाबंधन……सब कुछ खत्म हो चुका था.


बिजली का कहीं अता-पता नहीं था. बजरंगी दबे पाँव बरामदे में जाकर लेट गया आधी रात के इंतजार में कि कब, कैसे, किस वक्त मुंशी को मारना हैं.
आख़िरकार वह क्षण आ गया. उसने इधर-उधर देखा दोनो बंदूकधारी गहरी निद्रा में विलीन थे. बजरंगी दबे पाँव चलता जा रहा था.
पीठ घुमाये मुंशी लिखने में इस कदर मशगुल था, कि उसे बजरंगी के आने का आभास तक नहीं था हुआ. मुंशी को देखते ही गुस्से की चिंगारी भभक उठी. जैसे-जैसे उसके कदम मुंशी की तरफ उठ रहे थे. वैसे-वैसे दिदिया का चेहरा उसकी आँखों में डूबने-उतरने लगा था. वह सारे दृश्य-अदृश्य उसकी आँखों के सामने नाच उठे. लपक कर उसने मुंशी की गर्दन को कस लिया.
‘‘छोड़ो मुझे…..छोड़ोऽऽऽऽ.’’
‘‘तुझे छोड़ दू कमीने……तुझे…….’’ बजरंगी की आँँखों पर दिदिया का चेहरा उतर आया था जैसे वह कह रही हो, ‘इस कमीने को मत छोड़ना भैय्या , मत छोड़नाऽऽऽ’
बजरंगी की उँगलियाँ मुंशी के गर्दन पर धसती जा रही थी.
‘‘ब……चाओं…बचाओंऽऽऽ’’ मुंशी ऐसे फड़फडा रहा था जैसे कोई चिड़िया शिकारी के पंजे में फड़फड़ाती हैं.
दो बंदूकधारी आए और बजरंगी को घसीटते हुए ले गए. वह चीखता-चिल्लाता रहा पर उसकी एक नहीं सुनी गयी.
‘‘बंद कर दो साले को.’’ मुंशी फुफकार पड़ा, ‘‘साला! हरामजादा, मुझे मारने आया था….मुझे….ऐसा केस बनाऊँगा कि साला ज़िंदगी भर जेल में सड़ता रहेगा…….’’

‘‘यह ले.’’ सरकती हुई थाली सामने से आयी. सिपाही के वाक्य ने बजरंगी के ध्यान को तार-तार कर दिया. कच्ची-पक्की जली रोटियां, पानी जैसी दाल उसकी आँखों के सामने थी.
तभी कुछ आवाज़ उसके कानों में उतरी, ‘‘जानते हो दो दिन से मुंशी की लड़की लापता थी….कल उसकी लाश एनएच-91 के किनारे  मिली. सुनने में आया हैं कि पहले बलात्कार हुआ हैं फिर उसकी हत्या…..’’
‘‘जब दूसरों की बहु-बेटियों की इज्जत से खेलोंगे तो यही सब होगा…..’’ सिपाही का स्वर नम था.
बजरंगी घुटने के बल सिर पकड़ कर बैठ गया और फिर सवालिया निगाहों से आसमान की तरफ ताकने लगा.

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पितृसत्ता का छल और जे.एन.यू. छात्राएं

चैताली सिन्हा 


शोधार्थी – जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, भारतीय भाषा केंद्र
(हिंदी विभाग) . सम्पर्क:  .chaitalisinha4u@gmail.com

 “मात्र वर्ग – संघर्ष के द्वारा ही
  स्त्री – मुक्ति के महान लक्ष्य को
  हासिल नहीं किया जा सकता…
  चाहे साम्यवादी हों, माओवादी हों या ट्राटस्कीवादी, 
 औरत हर जगह, हर खेमे में अधीनस्थ की स्थिति में है,
  सबसे निचले पायदानों पर खड़ी है l”
                                     सिमोन द बउआर

जब भी हम पितृसत्ता के संदर्भ में बात करते हैं तो सबसे पहले हमें उस शब्द के अर्थ को जानना नितांत आवश्यक हो जाता है.अर्थात् ‘पितृसत्ता’ ! क्या है पितृसत्ता की व्याख्या ?, क्या करती है ये पितृसत्ता ?, यहाँ यह भी बताना उचित होगा कि पितृसत्ता का अर्थ किसी एक पुरुष या किसी एक व्यक्ति से लड़ाई नहीं है बल्कि पूरी व्यवस्था से है.यानि पितृसत्ता – “वह विचार है, सिद्धांत है, आदर्श है जो अपने से या अपने समूह से भिन्न प्रत्येक व्यक्ति पर नियंत्रण चाहती है l”

हालांकि पितृसत्ता शब्द की आज अपनी समस्याएं हैं और अंतर्विरोध हैं.पितृसत्ता दलन के उन वैश्विक और ऐतिहासिक तरीकों का इस्तेमाल करती रही है, जो स्त्री को उसकी जैविक, अधीनस्थ स्थिति से बार – बार परिचित कराती है.पितृसत्ता के नियमित ढाँचे और आकार हैं जिसमें किसी भी प्रकार का वैरिएशन (बदलाव) स्वीकृत नहीं और न ही इनसे अलग रहने वाला शान्ति से रहने ही दिया जाता है.पितृसत्ताक समाज स्त्री के मुद्दे पर सोचना ही नहीं चाहता.न यह स्वीकारना चाहता है कि ऐतिहासिक विकास के दौरान आधुनिक स्त्री ने अपने लिए अलग से कुछ भी हासिल किया है.वह स्त्री की चुनौती को महज एक बचकाना हरकत मानकर कभी उसे मारता है तो कभी उसे भुलाता – फुसलाता है.मगर पितृसत्ता की आंतरिक इच्छा यही है कि समर्पण एकतरफ़ा हो.
 
यदि क़ानून स्त्री को बराबरी का आधार दे भी तो सामाजिकता, नैतिकता और लोक-व्यवहार उसके आड़े आ जाते हैं.स्त्री की स्वतंत्र सत्ता और स्वाधीनता पुरुषों की आँखों की किरकिरी बन गई.उसको वापस घर के दायरे में लौटने के लिए कहा गया.यहाँ तक कि मज़दूर वर्ग के पुरुषों ने भी स्त्री की स्वाधीनता पर बंधन लगाने शुरू किए क्योंकि वे स्त्री को अपना एक खतरनाक प्रतियोगी समझने लगे.

अपने अस्तित्व को स्थापित करना चाहने वाला व्यक्ति अपनी दी हुई परिस्थितियों से परे जाकर स्वतंत्र परियोजनाओं में प्रतिबद्ध होकर ही अपने आपको पुनः वापस पा सकता है.औरत भी अन्य मानव प्राणियों की तरह एक स्वतंत्र और स्वायत्त जीव है, लेकिन यही जीव ऐसे जगत में रहता है जो उसकी अतिक्रमण की क्षमता को कुंद करके उसको हमेशा के लिए अंतरवर्ती-अवस्था में रख देना चाहता है.

कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय भूखंड में घटित स्त्री – केंद्रित आंदोलनों के बारे में एक बात दिलचस्प है कि वे प्रेम के से भोलेपन में घटित हो गए : कोई योजना नहीं बनी, कोई मैनिफेस्टो तैयार नहीं हुआ, यहाँ तक कि कोई प्रकट तथा सचेतन पूर्वपीठिका भी नहीं बनी….और हो गया जो होना था : बहुत सार्थक, बहुत क्रांतिकारी, पर दूरगामी प्रभावों की ओर प्रायः अचेत.हमारे देश में और हमारे आसपास घट रही घटनाओं पे यदि गौर किया जाए तो पितृसत्तात्मक औपनिवेश का प्रभाव चारों तरफ़ फैला हुआ है और इसके उदाहरण के लिए हमें बहुत अधिक प्रयास करने की ज़रूरत नहीं है.कहने को तो हमारा समाज आधुनिक है परंतु स्त्री के संदर्भ में हमारा दृष्टिकोण अभी भी रूढ़िवादी है, सामंती है और जड़ है.वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाए तो देश के कई विश्वविद्यालय इस फेहरिस्त में शामिल नज़र आते हैं जहाँ पितृसत्ता की जड़ें बहुत गहरी धंसी हुई दिखाई देती है.जहाँ की छात्राओं को अभी भी अपने अधिकार के लिए सड़कों, चौराहों पे उतरना पड़ रहा है, स्त्री शुचिता का प्रमाण देना पड़ रहा है, अपने होने का बोध कराना पड़ रहा है.इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति इस देश की छात्राओं के लिए और क्या हो सकती है कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर क्रांति करने की आवश्यकता पड़ रही है.जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में घट रही घटनाएं इन रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक दृष्टिकोणों का ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ यौन शोषण के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में छात्राएं अपने आपको अकेली और असहाय महसूस करती दिखाई दे रही है, इस गलियारे में उनके खुद के पुरुष सहयोगी भी, प्रशासन और समाज के समान ही उनसे किनारा करते नज़र आ रहे हैं.ऐसे में क्या उनको निष्पक्ष न्याय मिलने की आशा की जा सकती है.



बीच सड़क पर कोई छात्रा निर्वस्त्र होती है तो उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि उसके मुद्दे या उस आंदोलन का परिणाम क्या होगा ? बल्कि उसे ये चिंता और खौफ सताने लगती है कि वो कहीं सरेआम बदनाम न हो जाए शायद तभी उन्हीं में से एक ने कहा कि ‘ये वीडियो ज्यादा फैलाओ मत क्योंकि इसमें मेरी छाती दिख रही है’l  कहने का तात्पर्य ये है कि उस छात्रा को इस पितृसत्ताक समाज का कितना डर है कि वह अपने हक़ की लड़ाई को छोड़कर अपनी आबरू के बेपर्दा हो जाने के डर से सहम गई, वहीं यदि किसी पुरुष के वस्त्रों को सरेआम कोई खींच-फाड़ देता तो शायद उसे उतना फर्क नहीं पड़ता जितना कि उस छात्रा को.ये जो पवित्रता और देह पर आधारित सो कॉल्ड लज्जा का परिधान स्त्री के माथे मढ़ दिया गया है उससे मुक्त होने में अभी जे.एन.यू. तो क्या देश की हर स्त्री एवं छात्राओं को और कितना वक़्त लगेगा कोई नहीं जानता.


वहीं यदि उनके अपने पुरुष सहयोगियों के तटस्थ होने और उन्हें अपनी लड़ाई लड़ने के लिए अकेला छोड़ने की नीति की बात की जाए तो कहीं यह जे.एन.यू. में एक नए अध्याय की शुरुआत भी हो सकती है, जहाँ कि छात्राओं को यह आत्मज्ञान हो कि स्त्री चाहे जे.एन.यू. जैसे किसी बड़ी संस्था से जुडी हो या दूर बहुल आदिवासी या अनपढ़ समाज से हो वह अभी भी अकेली है एवं उन्हें अपनी लड़ाई उन्हें खुद ही लड़नी है.इस पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण की छाया यहाँ या वहां समान रूप से व्याप्त है.यहाँ की छात्राओं की इस लड़ाई में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की वह कविता अनायास ही याद हो आती है कि –
“जोदि तोर डाक शुने केयो ना आशे
तबे एकला चोलो रे……….!”

आज हम जिस संक्रमण काल में जी रहे हैं वहां स्त्री का बोलना ही जोखिम उठाने के समान है.स्त्री जब अपने को अभिव्यक्त करना आरम्भ करती है, अपने निजी अधिकारों की बात करना शुरू करती है तो उसे रोकने के हर संभव प्रयास ‘ग्रासरूट’ से आरंभ हो जाता है फिर चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या अन्य कार्य का, फ़िल्मी जगत का हो या पत्रकारिता का….! हर क्षेत्र में उस पर पितृसत्ता हावी होने की कोशिश में रहती है.इस प्रकरण में जे.एन.यू. छात्राओं द्वारा किये गए सत्याग्रहपूर्ण आंदोलन को देखा जा सकता है.अपने अधिकारों की मांगों को लेकर जिस तरह उनपर हमला बोला गया वह साफ़ तौर पर यह दिखाता है कि किस कदर ‘पेट्रीयार्की’ सबसे पहले स्त्री देह को टार्गेट करती है ताकि उसे पहले जिस्मानी तौर पर   कमज़ोर कर दिया जाए.शायद इसीलिए सबसे पहले उन छात्राओं को शारीरिक रूप से क्षति पहुंचाने की चेष्टा की गई, उन्हें नीचे गिरा दिया गया फिर उनके कैमरे तोड़ दिए गए, उन्हें छेड़ा गया और न जाने क्या – क्या.स्त्री आज जो जोखिम उठा रही है, अपने अधिकार के लिए जिस तरह सड़कों पर उतर आई है उसका बोलना ही राजनीति का हिस्सा बन जा रहा है.‘पर्सनल इज़ पोलिटिकल’ हो जा रहा है, बस यही पितृसत्तात्मक समाज को चुभ रही है, उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है.एक तरफ़ तो हमारा भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है तो वहीं दूसरी तरफ़ उस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अभिव्यक्त करने से पहले ही दबा दिया जाता है, उसके लब सिल दिए जाते हैं – ‘बोल कि तेरे लब आज़ाद हैं’…..! क्या वाकई में हैं ? यानि आवाज़ उठाओगे तो मार दिए जाओगे.
 


दूसरी जो सबसे बड़ी बात है वह ये कि आज जहाँ हर तरफ गांधीवादी विचारधारा को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी जा रही है, सत्याग्रह करने की बात की जा रही है, ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ के नारे लगाए जा रहे हैं वहीं इन सारे वादों-इरादों को ध्वस्त करने की नीति पहले से ही तैयार कर दी जाती है.आज गांधी जी का सत्याग्रह कहीं भी फलीभूत नहीं हो सकता जब तक पितृसत्ता के खम्भे मज़बूती से खड़े रहेंगे.उनके गढ़ तोड़े नहीं जायेंगे.किस बेटी को बचाने और किस बेटी को पढ़ाने की बात की जाती है इस देश में ! जहाँ आठ माह से लेकर आठ साल की बेटी और उससे भी आगे अस्सी साल की वृद्धा तक का यौन घर्षण किया जाता हो ? जिसके योनी में मोमबत्ती से लेकर बोतल तक, रॉड से लेकर लकड़ी तक ठूंस दिया जाता हो उस बेटी को बचाने की और पढ़ने की बात की जाती है ? बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है स्त्री जीवन में समाज का ये क्रूरतम चेहरा.


जे.एन.यू. छात्र – छात्राओं द्वारा किया गया आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण और सत्याग्रहपूर्ण था फिर ऐसा क्या हो गया जिसे बीच रास्ते में ही रोक दिया गया, उस शांतिपूर्ण आंदोलन को पूरी तरह से लहूलुहान कर दिया गया, उसे हिंसा में बदल दिया गया, छात्राओं को पीटा गया उनके कपड़े फाड़े गए, उन्हें डराने का प्रयास किया गया.ऐसे में सत्याग्रह और गांधीवादी विचारधारा एवं शांतिपूर्ण आंदोलन करने की बात करना ही बेमानी सी लगती है.हमारा समाज और प्रशासन स्त्री के प्रति कितना उदार है ये इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है.सच्चाई तो यह है कि हमारा समाज कभी बेटियों के प्रति उदार रहा ही नहीं. इतिहास इस बात की गवाह है कि जहाँ एक बेटी को इसलिए अपनी आहुति देनी पड़ी क्योंकि उसने पितृसत्ता के विरुद्ध अपना निर्णय लिया, एक स्त्री की ह्त्या इसलिए कर दी गई क्योंकि उसने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले लिया.ऐसे में इतिहास में घटित स्त्री जीवन की घटनाएँ आज वर्तमान में भी प्रासंगिक होती दिखाई देती है.
                   
मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) में बालिका वध-प्रथा (female infantcide) का अध्ययन करने से भी हमें यह पता चलता है कि किस प्रकार अपनी पेट की क्षुधा को मिटाने के लिए शिशु कन्याओं का भक्षण किया जाता था.शिशु कन्या ही क्यों ? उदाहरण देखें
– “आरंभ में मानव समूह अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था और इस अस्तित्व अभिमुख अवस्था में लड़की को बोझ समझा जाने लगा क्योंकि एक समूह दूसरे समूह पर आक्रमण करके लड़कियों एवं स्त्रियों का अपहरण करता था.इस कारण बालिका वध – प्रथा (फीमेल इफेंटिसाईड) प्रकाश में आई.जब किसी प्रकार का भोजन नहीं मिल पाता था तब बालिकाओं को वध करके जठराग्नि शांत की जाती थी.इस प्रथा के कारण स्त्री – पुरुष सम्बन्ध प्रभावित हुआ.जब स्त्री की संख्या कम हो गई तब इस समस्या का समाधान बहुपति प्रथा द्वारा किया गया l”  (‘सामाजिक सांस्कृतिक मानवशास्त्र’, विजय शंकर उपाध्याय, गया पाण्डेय, क्राउन पब्लिकेशन, मैकई रोड, उप्पर बाज़ार, रांची – 834001, झारखण्ड, संस्करण: 2005, पृ.सं.77)

इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है कि स्त्री तब भी बोझ समझी जाती थी स्त्री आज भी बोझ समझी जाती है. इतिहास आज भी अपने आपको दोहरा रही है, कभी ऑनर किलिंग के रूप में, तो कभी दहेज़ हत्या के रूप में और कभी बलात्कार के रूप में.

तमाम परिघटनाओं के बाद हम जिस विषय को सबसे अधिक संवेदनशीलता के दाएरे में रखते हैं वो है गुरु – शिष्य परंपरा को.हमारी परंपरा ने हमें शुरू से यही सिखाया है कि हमारे जीवन में गुरु का क्या और कितना महत्त्व है.इसी महत्त्व को ध्यान में रखते हुए यद्धपि कबीर ने कहा था कि –
“गुरु गोविन्द दौऊ खड़े, काके लागूं पाए
बलिहारी गुरु आपने जो गोविन्द दियो बताए”

आज ये संबंध ताड़ – ताड़ होती दिखाई पड़ती है.इस पवित्र संबंध की शाख को धूमिल करती नज़र आती है.गुरु से बड़ा सच्चा मार्गदर्शक कोई नहीं, इश्वर भी नहीं.अंत में…..? वैसे तो इस विषय का तब तक अंत नहीं होगा जब तक स्त्री समानता के दाएरे में नहीं आती, जब तक ‘पितृसत्ता के उलट इकुएलिटी’ स्थापित नहीं होती.अर्थात् संघर्ष जारी है और जारी रहेगा…..!
“तुम मुझे अपने तीखे और विकृत झूठों के साथ 
इतिहास में शामिल कर सकते हो 
 अपनी चाल से मुझे गंदगी में धकेल सकते हो 
 लेकिन फिर भी मैं 
 धूल की तरह उड़ती जाउंगी l”
 – (‘स्टील आई राइज़’, माया एंजेलो).




 गूगल से साभार 
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महिला पत्रकारों पर बढ़ रहे हमले, जेएनयू प्रदर्शन के दौरान भी पुलिस की बदसुलूकी

श्वेता यादव

सामाजिक कार्यकर्ता, समसामयिक विषयों पर लिखती हैं. संपर्क :yasweta@gmail.com



पिछले दिनों जेएनएयू प्रोटेस्ट के दौरान दिल्ली पुलिस ने न सिर्फ विद्यार्थियों को बुरी तरह से पीटा अपितु पत्रकारों के साथ भी बुरा बर्ताव किया जिसमें से दो महिला पत्रकार हैं, उनमें से एक ने अपने साथ शारीरिक रूप से भी दुर्व्यवहार का आरोप दिल्ली पुलिस पर लगाया है| दिल्ली पुलिस ने एक महिला फोटोपत्रकार को न सिर्फ पीटा बल्कि उसका कैमरा भी तोड़ दिया जबकि वह बार-बार कहती रहीं कि वह पत्रकार है, स्टूडेंट नहीं| इन सबके खिलाफ प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस ने सफाई दी कि यह सब धोखे से हुआ सवाल उठाता है कि जब पत्रकार चीख-चीख कर कह रही थी कि वह जनर्लिस्ट हैं तो पुलिसकर्मियों ने उन्हें सुनकर भी अनसुना क्यों किया?

देश दुनिया में दिलचस्पी है तो अखबार उठाइये और देखिये सारे अखबार, मीडिया घराने, वेब पोर्टल्स आपको इस खबर से भरे पड़े मिलेंगे कि जेएनयू के छात्रों द्वारा किये जा रहे आन्दोलन पर पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया सिर्फ लाठी ही चार्ज नहीं किया है, सोशल मीडिया पर तैरती तस्वीरों को नज़्म करें तो पुलिस वालों ने छात्रों को इतनी बुरी तरीके से मारा है जैसे वे छात्र नहीं अपराधी हों! सवाल है क्यों? आखिर वह छात्र किस बात के लिए लड़ रहे हैं कि फीस कम हो जाए? कि एक ऐसा व्यक्ति जो यौनिकता को लेकर कुंठित हो वह एक प्रतिष्ठित संस्थान में प्रोफेसर के पद पर न रहे? इससे नुकसान किसका है? इसमें गलत क्या है? और अगर इसे कोई पत्रकार कवर कर रहा है तो गलत क्या है आखिर वह तो अपना काम कर रहा है? वह तो अपनी ड्यूटी ही कर रहा या रही है न… ठीक उसी तरह जैसे पुलिस वाले कर रहे हैं| फिर पत्रकारों के प्रति इतना बुरा व्यवहार क्यों?


यूँ तो पिछले कुछ दिनों में पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं जिसके तमाम डेटा भी हैं हमारे पास| लेकिन आज हम सिर्फ महिला पत्रकारों पर हुए हमले पर बात करेंगे और समझने की कोशिश करेंगे कि अगर यह रूका नहीं तो इसका क्या प्रभाव पड़ेगा| बात शुरू करने से पहले नीचे कुछ आंकड़े जो यह दर्शाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में कितने पत्रकारों पर हमले हुए हैं और उनमें महिला पत्रकारों का प्रतिशत क्या है?

साल-         पीड़ित पत्रकारों की संख्या –      महिला पत्रकारों का प्रतिशत
2011-             86                                             2%
2012-           106                                             4%
1013-           141                                             7%
2014-             92                                             8%
2015-             99                                         10%
Source – कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों की (NCRB) की माने तो 2015 से लेकर पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या तक लगभग 142 पत्रकारों पर हमले हुए हैं इससे भी मजेदार बात यह है कि इनमें अभी भी लगभग सारे केस अनसुलझे ही हैं|
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में भारत पत्रकारों के लिए दुनिया का तीसरा सबसे खतरनाक देश था।
नीचे कुछ आंकड़ें हैं जिनमें पहला आंकड़ा 2014 -2015 का है कि किस राज्य में कितने पत्रकारों पर हमले हुए हैं और दूसरा मामलों में एफआई आर  रेट को दर्शाता है|

सोर्स- इण्डिया स्पेंड


पिछले दिनों मध्यप्रदेश में एक ही दिन तीन पत्रकारों की हत्या हुई| आइए कुछ  केस देखते हैं जिनमें महिला पत्रकारों पर हमले हुए हैं|

फरवरी 2016 लगभग 20 आदमियों की भीड़ स्क्रॉल.इन की पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम के घर के सामने अचानक ही जमा होती है और भीड़ मालिनी सुब्रमण्यम मुर्दाबाद, ‘नक्सली समर्थक बस्तर छोड़ो’ के नारे लगाते हुए उनके घर और गाड़ी पर पत्थर मारती है| आप कुछ भी कहिए लेकिन भीड़ का भी अपना  एक समाजशास्त्र होता है इस पर बात थोड़ी देर बाद पहले महिला पत्रकारों पर हुए हमले और कारणों की कुछ छोटी-छोटी कहानियां .. सच्ची कहानियाँ .. मनोहर कहानियाँ नहीं .. अप्रैल 2017 शाम के समय, जगह दिल्ली का अशोक विहार पार्क 45 वर्षीय महिला पत्रकार अपर्णा कालरा खून से लथपथ बेहोशी की हालत में मिली| डॉ. ने अपर्णा की हालत को गंभीर बताते हुए यह भी साफ़ किया था कि  अपर्णा के दिमाग की नसों को काफी नुकसान पहुंचा था.. पुलिस की जांच से यह बात साफ़ हुई कि अपर्णा पर हमला उनका यौन शोषण करने के इरादे से हुई थी|
जगह असम माना जाता है कि सेवन सिस्टर्स राज्य में महिलाओं की स्थिति सबसे अच्छी है वहां की नामी पत्रकार और महिला कार्यकर्ता बोंदिता आचार्य पर हमला सिर्फ इसलिए हुआ कि उन्होंने अपनी राय दर्ज की। बोंदिता ने अपने फेसबुक पर ये कहा कि असम राज्य में गाय का मांस खाना आम बात है। इसके बाद ही उनको बलात्कार, तेज़ाब से हमले, और मौत की धमकियाँ मिलने लगी। यह स्पष्ट है कि धमकियां देने वाले लोग कट्टर हिन्दुत्व विचारधारा वाले संगठनों से जुड़े हुए थे। यहां तक कि बजरंग दल ने एक प्रेसज्ञापन भी जारी किया था जिसमें उन्होंने बोंदिता से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने के लिए कहा।


5 सितंबर 2017 जगह बंगलूरू में वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या उनके अपने ही घर में गोली मारकर कर दी गई| वजह वह खुल कर उन चीजों के खिलाफ लिख रही थी जो समाज के विरूद्ध हैं| और जिनके नाम पर समाज को बांटने का काम तेजी से किया जा रहा है| विरोध की कीमत गौरी लंकेश को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी|



फरवरी 2017 जगह रामजस कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में एक सेमीनार के दौरान दक्षिणपंथी समर्थकों ने हंगामा कर दिया उन्होंने न सिर्फ स्टूडेंट्स को मारा अपितु पत्रकार भी उनके निशाने पर रहे उस हंगामें में कई पत्रकारों पर हमला हुआ जिनमें तीन महिला पत्रकार भी थी जिसमें दो पत्रकारों ने अपने नाम सहित अपने ऊपर हुए हमले को लेकर मीडिया के सामने अपनी बात रखी तो एक पत्रकार ने अपना नाम नहीं लेने की शर्त पर बात की| द क्विंट की रिपोर्टर तरुणि कुमार के ऊपर उस वक्त हमला हुआ जब वो पूरे मामले की क्विंट के हैंडल पर फेसबुक लाइव कर रही थीं जो अचानक बंद हो गया| फेसबुक लाइव के दौरान ही एक महिला बीच में आ गईं और उन्होंने बाल खींचना शुरू कर दिया| तरुणी के अनुसार ‘मेरा सिर झुका हुआ था और मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं कि कितने लोग मुझे पंच कर रहे थे| मुझे पुलिस ने आकर बचाया, तब तक मेरा लेपल माइक और चश्मा टूट चुका था| हमलावरों ने मेरा फोन छीन लिया था, जो मुझे महिला कांस्टेबल के ज़रिए मिला लेकिन उसकी स्क्रीन टूटी हुई थी| इस मारपीट में मेरा चश्मा गुम हो गया|’


वेबसाइट न्यूज़ क्लिक की कैमरामैन अपूर्वा चौधरी भी हमले का शिकार हुईं| उनकी पिटाई हुई और कैमरे का लेंस खींचने की वजह से वह टूटकर अलग हो गया|


पिछले दिनों एबीपी की रिपोर्टर निधी श्री ने न्यू इयर के समय शिमला में रिपोर्टिंग के वक्त लाइव कैमरे के सामने अपने साथ हुई बदतमीजी का वीडियो शेयर किया हालांकि निधी ने उस व्यक्ति को उसी समय थप्पड़ खींच कर जवाब दे दिया जब वह बदतमीजी कर रहा था लेकिन वहां का क्या जब आप बेकाबू हो रही भीड़ से घिरे हुए हों? अपना एक वाकया शेयर करती हूँ| पिछले साल नोटबंदी के दौरान नोयडा में एटीएम के बाहर रिपोर्टिंग करते वक्त ऐसा ही वाकया हुआ| मैं और मेरे तब के कैमरामैन गौतम जी को अचानक ही भीड़ ने घेर लिया| सरल शब्दों में समझाऊं तो ट्रोल्स थे वे लोग| मुझसे बात करते -करते अचानक ही उनमें से कुछ लोग बदसलूकी पर उतर आये और नौबत मारपीट तक पहुँच गई| मेरे पास वहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं था सिवाय इसके कि मैं उनका सामना पूरी मजबूती से करूँ| मैंने बहुत ही गुस्से में उनसे कहा कि “इस गलतफहमी में कत्तई मत रहना कि लड़की हूँ तो डर जाउंगी, ऑन कैमरा अभी यहीं पहले पटक के मारूंगी फिर रिपोर्टिंग भी करुँगी| बेहतर होगा कि हमें शान्ति से हमारा काम करने दो” हालांकि इसके अपने खतरे थे कुछ भी हो सकता था लेकिन इसके अलावा मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था अन्दर का डर दिखाने का मतलब था पता नहीं क्या होता| पर दिन अच्छा था ट्रिक काम कर गई और हमलोगों को रास्ता दिया गया| मैं और गौतम जी वहां से निकल आये, थोड़ी देर शांत रहे फिर गौतम जी ने हंस कर कहा वैसे श्वेता जी डायलॉग अच्छा था …  ‘ऑन कैमरा पटक के मारूंगी’….. मुझे भी सोच कर हंसी आ गई| पर अब जबकि इस तरह की घटनाओं को आम होते हुए देख रही हूँ तो मन में एक अजीब सा डर बैठ रहा है कितना मुश्किल हो गया है रिपोर्टिंग करना पता नहीं कब आपके साथ छेड़खानी हो जायेगी, कब आप पीट दिए जायेंगे कुछ पता नहीं| सड़क पर स्टेट मशीनरी दौड़ा कर आपके कपड़े फाड़ेगी| आपके लगातार चिल्ला चिल्ला कर बताने के बावजूद कि हमें छोड़ों हम पत्रकार हैं स्टूडेंट्स या आन्दोलनकारी नहीं| आपका इंस्ट्रूमेंट तोड़ कर फेंक दिया जाएगा महिला पुलिस की छोड़िये पुरुष पुलिसकर्मी आपको पकड़ेगा, कभी अनजाने तो अधिकतर जानबूझ कर यहाँ वहां हाथ लगाएगा| आपको क्या लगता है भीड़ से भरी जगह पर रिपोर्टिंग करना आसान होता है?  बिलकुल नहीं.. और यह खतरा तब कई गुना और बढ़ जाता है जब रिपोर्टर महिला हो| भीड़ की अपनी एक मानसिकता होती है जिसे आप बदल नहीं सकते वह कब क्या करेगी अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल होता है| लेकिन काम तो काम है अगर डर गए तो काम कैसे करेंगे? फिर तो सबका कहना मानो और घर बैठो बस यही रास्ता बचा है ले देकर|



इन सभी घटनाओं को ध्यान से देखे तो सभी महिला पत्रकारों पर अलग-अलग कारणों से हमले हुए हैं किसी की वही राजनीति रही तो किसी कि यौनिकता पर सवाल यह है कि आखिर क्यों? एक पत्रकार कि यह ड्यूटी है कि वह लोगों तक ख़बरें पहुंचाए लेकिन अगर इसी तरह पत्रकारों पर हमले होते रहे तो फिर काम करना कैसे संभव होगा|

इन सब में सबसे ज्यादा जरूरी बात की एक महिला पत्रकार होने के नाते बहुत सारे डर एक साथ आते हैं| पहला डर तो परिवार से ही होता है आज के समय में भले ही माँ-बाप अपनी बच्चियों को पत्रकारिता को कैरियर के रूप में अपनाने की सलाह देने लगे हैं लेकिन हमारे समय तक भी यह थोड़ा मुश्किल था| सबको लगता था कि एक तो पत्रकारिता दूसरे लड़की| कहाँ गली-गली दौड़ती फिरोगी| मेरी एकाध बैचमेट को छोड़ दूँ तो किसी ने भी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद भी इसे कैरियर के रूप में नहीं अपनाया… ज्यादातर टीचिंग में हैं वह भी दुबारा बीएड करके| सारे हमले छोड़ कर जेएनयू प्रोटेस्ट के दौरान हुए हमले की बात करें तो यह हमला एक फोटो जर्नलिस्ट पर हुआ है| कंधे पर भारी कैमरे का बोझ उठाए फिल्ड में निकलने वाली फोटो जर्नलिस्ट की संख्या आप उँगलियों पर गिन सकते हैं मतलब साफ़ है कि इस फिल्ड में महिलाओं की धनक अभी हो ही रही है ऐसे में अगर शुरुआती दौर में ही उन पर इस तरह के हमले शुरू हो जाएंगे वह भी स्टेट मशीनरी की तरफ से तो आप अंदाजा लगाइए कि क्या इस फिल्ड की तरफ महिलाएं बढ़ेंगी शायद नहीं… मीडिया में वैसे भी ज्यादातर टेक्निकल और नॉन टेक्निकल पदों पर अभी भी पुरुषों का ही वर्चस्व है और अगर हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले समय में इसे तोड़ना लगभग मुश्किल ही होगा| आज भी मीडिया में महिलाओं को लेने से लोग हिचकते हैं इसका एक कारण शिफ्टों में काम भी है अक्सर लोग कहते हैं कि अगर महिला हुई तो वह नाईट शिफ्ट में काम नहीं करेगी .. कारण फिर वही महिला सुरक्षा| देश की राजधानी में एक महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी वह भी स्टेट रिप्रजेंटेटिव के द्वारा सोच कर देखिये कि यह कितना भयावह है| आप मार रहे हैं, कथित तौर पर  मालेस्ट कर रहे हैं.. वीडियों में साफ़ दिखाई दे रहा की पुलिसकर्मियों ने खिंच कर कपड़े फाड़ दिए| यह कैसा विद्वेष है सिर्फ इसलिए कि आपकी कारगुजारी लोगों के सामने न आ जाए? अगर देश की राजधानी का यह हाल है तो बाकी जगहों का क्या हाल होगा?

मिडिया स्टडीज ग्रुप द्वारा किये गए एक शोध की माने तो मीडिया में महिलाओं का प्रतिशत बहुत ही कम है यह लगभग 2.7 है जो कि वास्तव में बेहद कम है इसमें भी अगर ध्यान देंगे तो फिल्ड रिपोर्टिंग में तो बहुत ही कम है|



पिछले कुछ दिनों में पत्रकारों पर हमले बहुत तेजी से बढ़े हैं और उनमें भी अगर हम ऊपर दिए गए आंकड़ों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि महिला पत्रकारों के प्रति होने वाले हमले में साल दर साल बढ़ोत्तरी हुई है| अगर इसी तरह से महिला पत्रकारों पर हमले होते रहे तो यह प्रतिशत बढ़ने की बजाय और घट ही जाएगा|

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स्लिम रहने से ज्यादा जरूरी है स्वस्थ रहना

नीवा सिंह


राष्ट्रीय कैडेट कोर,दिल्ली,  की गर्ल्स कैडेट इंस्ट्रक्टर नीवा सिंह से मासिक फिटनेस, पोषण और टीन एजर लडकियों को लेकर रंजना ने किया संवाद. संवाद पर आधारित यह आलेख.

अंशा कपूर ने बड़े ही उत्साह से खेलो में हिस्सा लेना शुरू किया ,स्कूल की तरफ से एनसीसी के कैंप में भी चली गयी ,लेकिन वहां जाते ही उसे उल्टियां–चक्कर आने शुरू हो गये,अब क्या था कैंप में एक दिन भी रहना मुश्किल हुआ-घर वापस हो गयी|

नारायणी दसवीं में पढ़ती है| उसके दोस्तों में लड़कों की संख्या ही ज्यादा है, जिनके साथ सिगरेट और बियर पीना नार्मल है लेकिन घर में खाना बहुत सोच समझ कर खाती है|कहीं मोटी न हो जाऊं,आये दिन माँ –बाप को उसे लेकर डॉ. के पास भागना पड़ रहा है|

अनिका बैडमिंटन की अच्छी ख़िलाड़ी है ,खाने को लेकर बहुत चूजी भी, उसके माँ बाप परेशान है कि हर एक बात पर हाथो का नस काट कर तैयार हो जाती है|

प्रियंसी बहुत खुबसूरत भी है और स्लिम भी इसके लिए मेहनत  भी करती है| अभी बारहवीं का पेपर देने गयी और हॉल में ही चक्कर  खा कर गिर पड़ी,हॉस्पिटल ले जाना पड़ा,डॉ ने बताया कुपोषण के कारण ऐसा हुआ है| उसे खाना देख कर ही डर लगता था|

ये कुछ उदाहरण हैं, जिनसे इस उम्र की लड़कियों की स्वास्थ्य समस्या को समझा जा सकता है.
टीन ऐज लडकियां 
फिल्म  अभिनेत्री  की तरह  सुंदर  दिखने की चाहत इसी उम्र से शुरू हो जाती है| इसमें कोई बुराई भी नहीं है| जिंदगी का सबसे खुबसूरत और मदमस्त उम्र होता है यह ,उत्साह उमंग और मस्ती अपने सर्वोत्तम पड़ाव पर होता है| इस उम्र में हर कोई द बेस्ट बनना चाहता है| मुश्किल तब होगी शुरू हो जाती है जब खुबसूरत, स्लिम और सेक्सी दिखने की चाह में खाना –पीना कम करके दिन रात खुद को सवारने में लगी रहती है| उन्हें  नहीं समझ की खाना छोड़ने से चेहरे का ग्लो कम हो जायेगा| इसमें उनकी भी कोई गलती नहीं ,उम्र में जितनी समझ , वैसे दोस्त ऊपर से शारीरिक बदलाव.

मातृ-मृत्यु का नियंत्रण महिला -स्वास्थ्य का जरूरी पहलू : चार्म
लेकिन इस उम्र की लडकियां जिस मानसिक और शारीरिक बदलाव से गुजर रही होती है ,उसका ध्यान रखना जरुरी है ,उनके भीतर हो रहे हार्मोनल परिवर्तन का असर पढाई के साथ साथ व्यवहार पर भी पड़ता है| इसका ध्यान रख कर ही समाज में बढ़ रही विकृतियों से बच सकते हैं.

व्यक्तित्व विश्लेषण, शिक्षा, फर्स्ट क्रश, डेटिंग ,सेक्स शिक्षा ,अपने ही शरीर में हो रहे ग्रोथ,आत्म सम्मान, माहवारी,और दोस्त. ये कुछ ऐसी बाते होती हैं जो हर टीन एजर फेस करती है| हमलोगों की सामाजिक संरचना में खुल कर बाते भी नहीं समझाई जाती है| नतीजतन गूगल और दोस्तों की संगत कुछ भी करवा लेती है|ऐसे में बहुत जरुरी होता है की उनका ध्यान पढाई के साथ साथ की अतिरिक्त गतिविधि में रहे,फिटनेश का पूरा ध्यान रखे ,संतुलित भोजन ले .

अक्सर लोग कहते है ,मासिक धर्म में ज्यादा काम न करो व्यायाम न करो ..लेकिन यह गलत सोच है ,बल्कि इन दिनों में व्यायाम जरुर करे ,इसके बहुत से फायेदे हैं. जैसे —इस टाइम बॉडी फ्लैसिबल ज्यादा होता है, तो आप बॉडी शेप बहुत आसानी से बना सकती है दिन भर हाय –हाय दर्द के नाम पर मूड खराब करने से बेहतर है की व्यायाम करके ,हारमोंस को बैलेंस कर ले,इससे दर्द में आराम मिलेगा और मूड भी फ्रेश होगा | व्यायाम से इंडोर्फिन नामक हारमोंस संचालित होता है ,जो थकान और सिरदर्द से मुक्ति दिलाता है, हारमोंस के नियमित रहने से बहुत शारीरिक विकृतियों से बचा जा सकता है मासिक के समय सफाई का विशेष ध्यान रखना होगा .
हो सकता है कई बार मासिक के समय व्यायाम करते वक्त बहाव ज्यादा हो,तो यह घबराने की बात नहीं बल्कि शरीर के लिए और सही है.मासिक में खाने में विशेष ध्यान रखना होगा ,दूध ,दही ,पनीर फल हर हाल में ले ,वरना एनेमिक भी हो सकती है. इस उम्र में विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षित होना भी स्वस्थ होने की ही निशानी है.पर यह सीख देना भी बहुत आवश्यक है की दोस्ती और उससे अधिक में कितना  अंतर है. देश का भविष्य स्वस्थ रखना है तो लडकियों को स्वस्थ रखना होगा.

फिटनेस का सम्बन्ध केवल शारीरिक व्यायाम से नही है. यह विषय काफी गूढ़तम विषय में से है जहाँ पर मानसिक और शारीरिक स्वास्थय जैसे हर पहलू पर ध्यान देना फिटनेस है. जिम में कठिन व्यायाम तथा वेट ट्रेनिंग से आप शारीरिक तौर पर सुडौल तो नज़र आ सकते है लेकिन इसके प्रतिकूल परिणामों पर हम कभी ध्यान नहीं देते जो आगे चलकर गंभीर बिमारी व चोट को जन्म देती है.

फिटनेस में ध्यान रखने वाली बातें:

क –फिटनेस  के  मूल आधार उत्तम खान-पान, श्वसन प्रक्रिया तथा सूक्ष्म व्यायाम, ये तीन आधार स्तम्भ हैं.

ख) सबसे पहले अपने शरीर को देखें, उसकी क्षमता को देखे फिर व्यायाम करना शुरू करे.

ग) फिटनेस  के प्रति जागरूक होना अच्छी बात है,लेकिन अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक या जो खुद के लिए उपयोगी न हो उसे भी करना ठीक नहीं है-दर्द को,शारीरिक तकलीफों को नज़र अंदाज़ करना भी उचित नहीं है

घ) व्यायाम रूटीन से करें, हमेशा कुछ रोचक तथा नयेपन के साथ करें तब मानसिक और शारीरिक दोनों का संतुलन बना रहता है. मसलन आप रनिंग करते हैं रोज, तो कभी-कभी जॉगिंग या तेज चाल के साथ कॉम्बो कर ले, व्यायाम के साथ डांस को भी शामिल कर लें ,इससे बोरियत नहीं होगी,और संतुलन भी बना रहेगा.

च) तन –मन को स्वस्थ रखने के लिए बॉडी को पूरी तरह रेस्ट और नींद मिलना बहुत जरुरी है ,कम से कम सप्ताह में एक दिन आराम करें,कोशिश करे की रिलेक्स मूड में रहें.

वैसे तो आजकल अपने फिगर को लेकर हर उम्र की महिलायें बड़े जतन करती रहती हैं  ,छोटी छोटी लड़कियां भी कैलोरी माप कर खाने लगी है, जिम में घंटो प्रैक्टिस करती रहती है ,फल –सब्जी से ज्यादा पाउडर सप्लीमेंट पर रहने की कोशिश करती है,ऐसे में खुद के साथ क्या बुरा कर रही है उन्हें नहीं पता. मूलतः फिटनेस के लिए जिम जाना और घंटो पागल की तरह लगे रहना कम उम्र लड़कियों के लिए सही नहीं है,जिम का हार्ड वर्क,कई बार मांसपेशियों को डैमेज कर देता है,किशोरावस्था में जिम की आदत से शारीरिक विकास भी रुक जाता है,कद भी छोटा रह सकता है,घुटने कमजोर हो जाते है. खाने पर कण्ट्रोल और जिम का भरी भरकम वर्कआउट से शरीर के विकास रुक जायेंगे. जिम की ओर रुख तब करें जब परिपक्व हो जायें, मसलन बीस से पच्चीस साल के बीच

1.बच्चो के लिए हेवी वेट ट्रेनिंग कभी नहीं होना चाहिए /ग्यारह से बीस साल के बच्चो को खेलने की आदत           डाले,कुछ भी रनिंग ,साइक्लिंग ,तैराकी या फिर डांस /जिससे उन्हें आनंद भी आये और फिटनेस भी बनी          रहे   के प्रति अभ्यस्त करें.

  आप बच्चो को कुछ इस तरह भी करवा सकते है:


2. स्ट्रेंथ एक्सेरसाइज़, जिसमे अपने ही शरीर का प्रयोग होता है और मांसपेशियां, हड्डियां मजबूत होती हैं.

3.खानपान –फिटनेस का सीधा सम्बन्ध खानपान से है,बढती उम्र में शरीर को सभी तरह के मिनरल्स ,प्रोटीन,   वसा लेनी चाहिए ,ऐसा नहीं है की घी –मक्खन हमेशा नुकसानदायक है ,अति कुछ भी नुकसान करता है /बस  अल्कोहल ,ड्रग्स ,सिगरेट और जंक फ़ूड से दूरी बना कर रखें.

प्रस्तुति: रंजना, सम्पर्क:8802868068

तस्वीरें गूगल से साभार 

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रूद्र मोहम्मद शहिदुल्लाह की कविताएँ

 सुलोचना वर्मा


विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित. छायाचित्रण और चित्रकारी में रुचि. सम्पर्क:  verma.sulochana@gmail.com

प्रेम और क्रांति के कवि रूद्र मोहम्मद शहिदुल्लाह की कविताओं का अनुवाद सुलोचना वर्मा ने किया है. बांग्लादेश के इस बड़े कवि की कविताएं जनता के बीच लोकप्रिय रही हैं. तसलीमा नसरीन से विवाह विच्छेद के बाद 45 साल की उम्र में वे दुनिया से रुखसत हो गये. 


 दूर हो दूर 


नहीं छू पाया तुम्हें, तुम्हारी तुम्हें
उष्ण देह गूँथ-गूँथ कर इकठ्ठा किया सुख
परस्पर खनन कर-करके ढूँढ ली घनिष्ठता,
तुम्हारे तुम को मैं छू नहीं पाया .

जिस प्रकार सीप खोलकर मोती ढूँढते हैं लोग
मुझे खोलते ही तुमने पायी बीमारी
पायी तुमने किनारा हीन आग की नदी .

शरीर के तीव्रतम गहरे उल्लास में
तुम्हारी आँखों की भाषा पढ़ी है सविस्मय
तुम्हारे तुम को मैं छू नहीं पाया .
जीवन के ऊपर रखा विश्वास का हाथ
कब शिथिल होकर तूफ़ान में उड़ गया पत्ते सा
कब ह्रदय फेंककर ह्रदयपिंड को छूकर
बैठा हूँ उदासीन आनन्द के मेले में

नहीं छू पाया तुम्हें, मेरी तुम्हें,
पागल गिरीबाज कबूतर जैसे नीली पृष्ठभूमि
तहस-नहस कर गया शांत आकाश का .
अविराम बारिश में मैंने भिगोया है हिया

तुम्हारे तुम को मैं नहीं छू पाया .

एक गिलास अंधकार हाथ में 

एक गिलास अंधकार हाथ में लिए बैठा हूँ .
शून्यता की ओर कर आँख, शून्यता आँखों के भीतर भी
एक गिलास अंधकार हाथ में लिए बैठा हूँ .
विलुप्त वनस्पति की छाया, विलुप्त हिरण .
प्रवासी पक्षियों का झुण्ड पंखों के अन्तराल में
तुषार का गहन सौरभ ढ़ोकर नहीं लाता अब .

 रूद्र मोहम्मद शहिदुल्लाह

दृश्यमान प्रौद्योगिकी की जटाओं में अवरूध्द काल,
पूर्णिमा के चाँद से झड़कर गिरती सोने सी बीमारी .
पुकार सुन देखता हूँ पीछे – नहीं है कोई .
एक गिलास अंधकार हाथ में लिए बैठा हूँ अकेला….
समकालीन सुन्दरीगण उठकर जा रही हैं अतिद्रुत
कुलीन शयनकक्ष में,
मूल्यवान असबाब की तरह निर्विकार .
सभ्यता देख रही है उसके अंतर्गत क्षय
और प्रशंसित विकृति की ओर .

उज्जवलता की ओर कर आँख, देख रहा हूँ-
डीप फ्रीज में हिमायित कष्ट के पास ही प्रलोभन,
अतृप्त शरीर ढूँढ ले रहे हैं चोरदरवाज़ा – सेक्सड्रेन .

रुग्णता के काँधे पर रख हाथ सांत्वना बाँट रहा है अपशिष्ट-
मायावी प्रकाश के नीचे गजब का शोरगुल, नीला रक्त, नीली छवि

पढ़ें: वो खौफ़ खा गया और अन्य कविताएँ

जग उठता है एक खंड धारदार चमचमाता इस्पात,
खोपड़ी के अंदर उसकी हलचल महसूस कर पाता हूँ सिर्फ .

इसी बीच कॉकटेल से बिखरा परिचय, संपर्क, पदवी –
उज्जवलता के भीतर उठाता है फन एक अलग अंधकार .
भरा गिलास अंधकार उलट देता हूँ इस अंधकार में .



 बतास में लाश की गंध 


आज भी मैं पाता हूँ बतास में लाश की गंध
आज भी मैं देखता हूँ माटी में मृत्यु का नग्ननृत्य,
बलत्कृता की कातर चीत्कार सुनता हूँ आज भी तन्द्रा के भीतर….
यह देश क्या भूल गया वह दुस्वप्न की रात, वह रक्ताक्त समय ?
बतास में तैरती है लाश की गंध
माटी में लगा हुआ है रक्त का दाग .
इस रक्तरंजित माटी के ललाट को छूकर एकदिन जिन लोगों ने बाँधी थी उम्मीद
जीर्ण जीवन के मवाद में वो ढूँढ लेते हैं निषिद्ध अन्धकार,
आज वो प्रकाश विहीन पिंजड़े के प्रेम में जगे रहते हैं रात्रि की गुहा में .
मानो जैसे नष्ट जन्म की लज्जा से जड़ कुँवारी जननी
स्वाधीनता – क्या यह जन्म होगा नष्ट ?
यह क्या तब पिताहीन जननी की लज्जा का है फसल ?

जाति की पताका को आज नाखूनों से जकड़ लिया है पुराने गिद्ध ने  .

दो चोटी वाली लड़की और अन्य कविताएं

बतास में है लाश की गंध
निऑन प्रकाश में फिर भी नर्तकी की देह में मचता है मांस का तूफ़ान .
माटी में है रक्त का दाग –
चावल के गोदाम में फिर भी होती है जमा अनाहारी मनुष्य की अस्थियाँ
इन आँखों में नींद नहीं आती . पूरी रात मुझे नींद नहीं आती –
तन्द्रा में मैं सुनता हूँ बलत्कृता की करुण चीत्कार,
नदी में कुम्भी की तरह तैरती रहती है इंसान की सड़ी हुई लाश
मुंडहीन बालिका का कुत्तों द्वारा खाया हुआ वीभत्स शरीर
तैर उठता है आँखों के भीतर . मैं नहीं सो पाता, मैं नहीं सो पाता….
रक्त के कफ़न में मुड़ा – कुत्ते ने खाया है जिसे , गिद्ध ने खाया है जिसे
वह मेरा भाई है, वह मेरी माँ है, वह हैं मेरे प्रियतम पिता .
स्वाधीनता, वह मेरी स्वजन, खोकर मिली एकमात्र स्वजन –
स्वाधीनता – मेरे प्रिय मनुष्यों के रक्त से खरीदी गयी अमूल्य फसल .
बलत्कृता बहन की साड़ी ही है मेरी रक्ताक्त जाति की पताका .


खतियान


हाथ पसारते ही मुठ्ठी भर जाती है ऋण से
जबकि मेरे खेत में भरा है अनाज .
धूप ढूँढे नहीं मिलता है कभी दिन में,
प्रकाश में बहाती है रात की वसुंधरा .

हल्के से झाड़ते ही झड़ती है सड़ी हुई ऊँगली की घाम,
ध्वस्त होता है तब दिमाग का मस्तूल
नाविक लोग भूलते हैं अपना पुकारनाम
आँखों में खिलता है रक्तजवा का फूल .
पुकार उठो यदि स्मृति सिक्त फीके स्वर में,
उड़ाओ नीरव में गोपनीय रुमाल को
पंछी लौटेंगे पथ चीन्ह चीन्ह कर घर में
मेरा ही केवल नहीं रहेगा चीन्हा हुआ पथ –
हल्के से झाड़ते ही झड़ जाएगी पुरानी धूल
आँखों के किनारे जमा एक बूँद जल .
कपास फटकर बतास में तैरेगी रुई
नहीं रहेगा सिर्फ निवेदित तरुतल
नहीं जागेगा वनभूमि के सिरहाने चाँद
रेत के शरीर पर सफेद झाग की छुअन
नहीं आएगी याद अमीमांसित जाल
अविकल रह जाएगा, रहता आया है जैसे लेटना
हाथ पसारते ही मुठ्ठी भर जाता है प्रेम से
जबकि मेरी विरहभूमि है व्यापक
भाग जाना चाहता हूँ – पथ थम जाता है पाँव में
ढक दो आँखें ऊँगली के नख से तुम .

 यह कैसी भ्रान्ति मेरी 


यह कैसी भ्रान्ति मेरी !
आती हो तो लगता है दूर हो गई हो, बहुत दूर,
दूरत्व की परिधि क्रमशः बढ़ा जा रहा है आकाश .
आती हो तो अलग तरह की लगती है आबोहवा, प्रकृति,
अन्य भूगोल, विषुवत रेखा सब अन्य अर्थ-वाहक
तुम आती हो तो लगता है आकाश में है जल का घ्राण  .

हाथ रखती हो तो लगता है स्पर्शहीन करतल रखा है बालों में,
स्नेह- पलातक बेहद कठोर उँगलियाँ .
देखती हो तो लगता है देख रही हो विपरीत आँखों को,
लौट रहा है समर्पण नंगे पैरों से एकाकी विषाद – क्लांत होकर
करुण छाया की तरह छाया से प्रतिछाया में .
आती हो तो लगता है तुम कभी आ ही नहीं पायी …

कुशल क्षेम पूछती हो तो लगता है तुम नहीं आयी
पास बैठती हो, तो भी लगता है तुम नहीं आयी .
दस्तक सुनकर लगता है कि तुम आयी हो,
दरवाजा खोलते ही लगता है तुम नहीं आयी .
आओगी जानकर समझता हूँ अग्रिम विपदवार्ता,
आबोहवा संकेत, आठ, नौ , अवसाद, उत्तर, पश्चिम
आती हो तो लगता है तुम कभी आ ही नहीं पायी .

चली जाती हो तो लगता है तुम आयी थी,
चली जाती हो तो लगता है तुम हो पूरी पृथ्वी पर.

तस्वीरें गूगल से साभार 

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पेशेवर महिलाएं : बदलती पीढ़ी की अभिव्यक्ति

 शरद जयसवाल


असिस्टेंट प्रोफेसर, स्त्री अध्ययन विभाग,महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय. सम्पर्क:  .sharadjaiswal2008@gmail.com

 भारतीय समाज में पिछले सत्तर सालों में स्त्री-पुरुष के बीच के संबंधों में काफी बदलाव आये हैं. इसे किसी न किसी अर्थ में भारतीय लोकतंत्र की उपलब्धियों में शुमार किया जा सकता है. लोकतांत्रिक मूल्य  अब सिर्फ सार्वजनिक विमर्श हिस्सा नहीं हैं, इसकी अनुगूँज को निजी यानी परिवार के दायरे में भी सुना जा सकता है. इन सत्तर सालों में बहुत कुछ बदला है. देश, समाज, शहर, ग्रामीण भारत, परिवार, विवाह, धर्म, लोकतांत्रिक संस्थाएं, राजनीति और पितृसत्तात्मक ढाँचे में इस बदलाव को आसानी से तलाशा जा सकता है. बेशक इस बदलाव ने महिलाओं के एक बड़े हिस्से को सजग किया है.


आज़ादी के बाद सार्वभौमिक मताधिकार, हिन्दू कोड बिल आदि के माध्यम से भारतीय राज्य के द्वारा महिलाओं को बराबरी का एहसास कराया गया. इसके साथ ही साथ समाज के एक हिस्से में बेटियों को लेकर परम्परागत धारणा में बदलाव आना शुरू हो गया था. आज़ादी के बाद चली औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया ने एक नए मध्यम वर्ग के लिए मार्ग प्रशस्त किया. 1980 के बाद शुरू हुई वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने बहुलतावादी भारतीय समाज के अलग-अलग तबकों को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया है. जहां एक तरफ तो वैश्वीकरण की इस प्रक्रिया ने समाज में वंचित तबकों के हाशियाकरण की प्रक्रिया को और मजबूत किया तो वहीँ दूसरी तरफ महिलाओं के एक तबके की श्रमशक्ति के लिए बाज़ार ने अपने रास्ते खोले हैं.


पिछले तीन-चार दशकों में महिलाओं की एक नई पीढ़ी आत्मनिर्भर हुई है. यह नई पीढ़ी समाज में अपनी पेशेवर भूमिका के लिए सजग है. शिक्षा के अवसरों ने इस नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को बदलने की दिशा में बड़ी भूमिका अदा की है. 2016 में एलिस डब्लू क्लार्क की पुस्तक ‘वैल्यूड डाटर्स: फर्स्ट जेनरेशन कैरियर वीमेन’ प्रकाशित हुई. किताब का हिंदी तर्जुमा 2017 में ‘अनमोल बेटियां: पहली पीढ़ी की पेशेवर महिलाएं’ के नाम से प्रकाशित हुआ. इस किताब के शीर्षक से ही लेखिका किताब की अंतर्वस्तु के बारे में स्पष्ट कर देना चाहती है कि बेटियों को लेकर भारतीय समाज में जो परम्परागत सोच थी, उसमें बदलाव आ रहा है. समाज के एक तबके के लिए वे सिर्फ बेटियां नहीं हैं बल्कि वे भी एक लड़के की ही तरह अनमोल हैं. इस किताब में लेखिका ने महिलाओं की अलग-अलग पीढ़ियों की सोच व आकांक्षाओं में आ रहे बदलावों को समझने की ईमानदाराना कोशिश की है. इस किताब में महिलाओं की आकांक्षाओं में आ रहे बदलावों को समझने के लिए पुरानी पीढ़ी की महिलाओं के साथ-साथ महिलाओं की समकालीन पीढ़ी से भी बात-चीत की गई है. किताब का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें देश के अलग-अलग महानगरों में पेशेवर भूमिका में आ चुकी महिलाओं से साक्षात्कार लिए गए हैं. यह साक्षात्कार महिलाओं की चेतना में आ रहे बदलावों को परिलक्षित करते हैं.

उन्नीसवीं शताब्दी में शुरू हुए समाज सुधार आन्दोलन ने महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाने का काम किया था. सती प्रथा का विरोध, विधवा पुनर्विवाह के साथ महिलाओं की शिक्षा इस आन्दोलन के केंद्र में थी. बीसवीं शताब्दी में गाँधी के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रभाव में बड़े पैमाने पर पहली बार महिलाओं ने घर की दहलीज़ को पार किया था. आन्दोलन में कई सारी महिलाओं का घर से बाहर निकलना और उनकी नेतृत्वकारी भूमिका ने महिलाओं की अगली पीढ़ियों को काफी प्रभावित किया था. लेखिका लिखती हैं कि महिलाओं ने राष्ट्रीय आन्दोलन में अपने परिवार की रजामंदी से भाग लिया था. न कि पुरुष प्रधान समाज में व्याप्त पुरुष वर्चस्व के खिलाफ… स्वतंत्रता संघर्ष की प्रतिध्वनि उन महिलाओं के बीच भी पहुंची जो राजनीतिक आन्दोलन का भाग बनने के लिए बहुत ‘छोटी’ थीं. इस गूँज ने कुलीन परिवारों की कुछ युवा महिलाओं के मन में शिक्षित होने की इच्छा का रूप लिया. ताकि सार्वजनिक क्षेत्र में उपयोगी कार्य करने के लिए सुसज्ज हो सकें… वे केवल राजनैतिक या सामाजिक सक्रियता में लिप्त होने के लिए नहीं, न ही निजी बनाम सार्वजनिक रोजगार तलाशने के लिए, बल्कि व्यापक रूप से कई क्षेत्रों में अपनी आदर्शवादी पेशेवर उम्मीदें पूरी करना चाहती थीं. उनकी यह इच्छाएं केवल नौकरी या आजीविका के लिए नहीं थीं. बल्कि सेवा, कार्य और आत्म अभिव्यक्ति की पूर्णता के लिए थीं. जो केवल घर बैठकर नहीं मिल सकती. ऐसी पूर्णता जिसके लिए उच्च शिक्षा की आवश्यकता नहीं थी, बल्कि उस शिक्षा को घर के दायरे से बाहर निकालकर अच्छे उपयोग में भी लाना था.



आज़ादी के बाद महिलाओं की एक नई पीढ़ी जब खुद माँ बनी तो उन्हें यह लगा कि उनकी खुद की बेटियों के लिए महाविद्यालय की डिग्री प्राप्त करना विवाह के लिए एक बीमा पालिसी की तरह है. पुरुषों की शिक्षा में बढ़ोतरी का भी प्रभाव पड़ा क्योंकि शिक्षित पुरुष शिक्षित महिलाओं से ही विवाह करने की उम्मीद रखते थे. आज़ादी के बाद महिला आन्दोलन की सक्रियता ने भी महिला शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. महिला आन्दोलन की गति को तेज़ करने में 1974 में प्रकाशित ‘टूवर्ड्स इक्व्यल्टी’ नामक रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. आज के समय में महिलाओं के बीच शिक्षा के प्रचार, प्रसार और कैरियर को लेकर आकांक्षाओं में आ रहे बदलावों के पीछे जनसांख्यिकी संक्रमण की बड़ी भूमिका रही है.
महिलाओं के द्वारा कम बच्चों को जन्म देना, उनकी सेहत के लिए बेहतर है तथा इसके साथ बच रहे समय ने उनके द्वारा काम करने की संभावनाओं को भी बढ़ा दिया. लेखिका ने कहा है कि अतीत में महिलाओं के जीवन में जो बात स्पष्ट थी, वह यह कि वे अपने स्वास्थ्य पर बहुत बोझ डालती थीं और बहुत ही डरावने ढंग से खुद को वक़्त से पहले ही मृत्यु के अधीन कर देती थीं. वे अपने जीवन के शिखर वर्षों के दौरान वांछित, अवांछित, जीवित, मृत बच्चों को जन्म देती थीं और दुर्भाग्यवश इस बोझ को खुद ही उठाती थीं.


धीरे-धीरे मेडिकल साइंस के विकास की वजह से बाल मृत्युदर में कमी आनी शुरू हुई. 1981 की जनगणना ने सबसे पहले प्रजनन क्षमता में गिरावट का संकेत दिया था. मृत्युदर में गिरावट का मुख्य श्रेय उन सभी आविष्कारों को जाता है जिनकी वजह से मलेरिया, तपेदिक, चेचक और हैजा जैसी बीमारियों पर नियंत्रण पा लिया गया था. इसके साथ-साथ महिला मृत्यु दर पर नियंत्रण ने भी महिलाओं की उम्र लम्बी करने में मदद की. महिला शिक्षा में बढ़ोत्तरी के कारण विवाह योग्य आयु व लम्बे समय तक अकेले रहने के अनुपात में बढ़ोत्तरी होती है. लेकिन लेखिका का यह मानना है कि भारत में प्रजनन क्षमता में संक्रमण मुख्य रूप से गर्भनिरोधकों के कारण और विशेष रूप से महिला नसबंदी के कारण हुआ है. इसके साथ-साथ यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि 1981 से 1991 के बीच प्रजनन क्षमता में हुई गिरावट का 65 फीसदी हिस्सा उन महिलाओं का है जिन्होंने कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की है. इसके साथ-साथ परिवार में सिर्फ बेटों की चाहत से भी प्रजनन क्षमता में गिरावट आ सकती है. आज के समय में लिंग चयनात्मक गर्भपात को संभव बनाने वाली प्रौद्योगिकी व्यापक रूप से उपलब्द्ध होने लग गई है और अवांछित बेटियों से छुटकारा पाने के लिए लिंग चयनात्मक गर्भपात ने कन्या भ्रूण हत्या की पुरानी प्रथा को प्रतिस्थापित कर दिया है. इसके साथ ही कल्याणकारी राज्य के अभाव ने भी बुढ़ापे के समय लड़कों की जरूरत को और ज्यादा बढ़ा दिया है.


इस किताब में लेखिका ने कई सारी पेशेवर लड़कियों के साक्षात्कार लिए हैं. इन साक्षात्कारों के माध्यम से उनकी आकांक्षाओं को समझा जा सकता है. जैसे इलाहाबाद की तनिका कहती हैं कि ‘विवाह के लिए मैं किसी से मिलने के लिए बहुत लालायित नहीं हूँ. मेरे माता-पिता एक अच्छे परिवार का, समान जाति-धर्म का अच्छा कमाने वाला लड़का चाहते हैं. मेरे विचार से वह स्वतंत्र और अच्छा व्यक्ति होना चाहिए और उसे मेरी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए…. महिलाओं को महसूस होता है कि उन्हें आर्थिक तौर पर भाग लेना चाहिए, हम निर्माण के लिए बने हैं न कि केवल प्रजनन के लिए. सतत विकास केवल पुरुषों के साथ नहीं हो सकता. देश तभी विकसित होगा जब महिलाऐं भी श्रम शक्ति में भागीदारी करेंगी. विचारधारा और क्रांतिकारी आदर्शों में एक बदलाव आया है. हमें केवल उनके हाथ की कठपुतली नहीं होना है. बात केवल पैसे की नहीं है बल्कि व्यक्तिगत दृश्यता की भी है. हम अभी अदृश्य हैं. पुरुष और महिला को समान होना चाहिए. सारा जोर शिक्षा पर होना चाहिए.’ इसी के साथ-साथ कई और युवा पेशवर महिलाओं के साक्षात्कार में भी इसी तरह की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है. लेखिका का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ युवा महिलाओं में ही नहीं आये हैं बल्कि उनके माता पिता की सोच में भी इस तरह के बदलाव परिलक्षित होते हैं. तनिका के पिता कहते हैं कि ‘हम चाहते हैं कि वह अपनी आजीविका खुद कमाए. पहले परिवार में एक कमाने वाला सदस्य होता था, लेकिन अब दोनों को कमाना जरुरी है…पहले उसे अपना लक्ष्य प्राप्त करने दीजिये और फिर हम उससे विवाह के बारे में बात करेंगे.

समान जाति हमारी पहली प्राथमिकता होगी.’ इन साक्षात्कारों के माध्यम से लेखिका कहती हैं कि बेटियों की आजीविका की महत्वाकांक्षा की स्वीकृति छोटे शहरों में भी बढ़ रही है और उन परिवारों में भी जो पहले इन योजनाओं की स्वीकृति नहीं देते थे. इस किताब में जितनी पेशेवर महिलाओं के साक्षात्कार लिए गए हैं उन सभी ने जाति के अन्दर माता-पिता के द्वारा तय किया हुआ विवाह करने से इनकार नहीं किया है. ये सभी महिलाऐं सामाजिक रूप से प्रगतिशील न होते हुए भी एक प्रकार से ‘नारीवादी’ हैं.


लेखिका लिखती हैं कि जो साक्षात्कार मैंने लिए हैं उसमें कुछ महिलायें खुद को मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अन्तर्गत आने वाले सभी अधिकारों पर दावा करते हुए देखी जा सकती हैं. उदहारण के लिए अनुछेद 17 अपनी स्वयं की संपत्ति पर अधिकार सुनिश्चित करता है और उससे किसी को मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जा सकता है. इस किताब के अनुवाद ने इसकी अंतर्वस्तु को काफी जटिल बना दिया है इसके साथ-साथ भाषा की त्रुटियाँ भी शोध की गंभीरता को कम कर रही हैं. फिर भी इस किताब में स्थापित तथ्यों के आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि आज के समय में महिलाओं का एक पेशेवर तबका अपनी आकांक्षाओं को खुलकर समाज के सामने अभिव्यक्त कर रहा है और अपेक्षा कर रहा है कि समाज भी उन सपनों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़े.

पुस्तक- अनमोल बेटियां : पहली पीढ़ी की पेशेवर महिलाएं- एलिस डब्लू क्लार्क 
पृष्ठ संख्या: 183, मूल्य: 250, सेज पब्लिकेशन, ISBN 978-93-864-4664-0 

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कामकाज़ी औरतें और अन्य कविताएँ

 मंजू शर्मा


हिन्दी की शिक्षिका,  सोशल मीडिया में सक्रिय. सम्पर्क:  manjubksc@gmail.com


मध्यम वय की औरतें


मध्यम वय की औरतें
कुछ ज्यादा जागती और कम नींद सोती है.
हार्मोनल बदलाव से जूझती हैं
मेनोपॉज की वज़ह से भीतर-ही-भीतर दरकती हैं.
किशोरियों की तरह अल्हड़ बिंदास वो
छोटी-सी बात पर कभी-कभी खूब खिलखिलाती हैं.
मोम की तरह का इनका कुछ गुस्सा
भी ऐसा कि वो जल्द ही पिघल जाती हैं.
कई बार अतीत की बातों पर भीतर-ही-भीतर
झुंझलाती है और अन्तर्मन मेँ खूब चिल्लाती हैं.
घर में रखे सामान की तरह होकर वो
बिखरे हुए बालों में कई बार आधी रात में घबराती हैं.
अपने लिए अच्छे दोस्त भी तलाशती हैं.
ये मध्यम वय की औरतें
कुछ-कुछ अज़ीबोगरीब होती हैं.
कभी-कभी अपनी तन्हाइयों से उबकर सच्चे प्रेमी की आस में
लक्ष्मण-रेखा लाँघकर बाहर की दुनिया में उसे तलाशती हैं.

कामकाज़ी औरतें


कामकाज़ी औरतें
रविवार के दिन का इंतज़ार बड़े बेसब्री से करती हैं.
जैसे रविवार का दिन न होकर एक करिश्माई दिन है
और इस एक रविवार के दिन जी लेगी वह सप्ताह के सातों दिन.
बेवकूफ़ हैँ वे कामकाज़ी औरतें!
बाकी के दिन उसके पास पेश की जाती हैं
कुछ कम ख्वाहिशों की फ़ाइलें
कुछ कम उम्मीदों की चॉक
कुछ कम अपेक्षाओं की गठरी.
बेहतर होते हैं ये सप्ताह के बाकी के छ: दिन
जब सबकी सहानुभूति भरी निगाहें तो उठती है उसकी ओर.

तुम सुनती तो होगी
थकी हुई है बेचारी,अभी ही तो लौटी है काम-से
तनिक सोने दो उसे और देर शाम तक.
और इस मुए रविवार के दिन तुम देखना!
कपड़ों का बड़ा-सा ढ़ेर तुम्हें बड़े प्यार-से देखता है
जिसे तुम रेशे के हिसाब-से मशीन में भिगोती हो
रसोई में सबके खास फ़रमाइशों के साथ समाती हो
बेतरतीब हो रखे घर के सामान को तन्मयता-से सजाती हो.
और खुद का क्या!
ज़रूरत-से ज्यादा बेतरतीब हो जाती हो.
फिर पसीने-से तर होकर खुद में ही बुदबुदाती हो.
कि इससे भले तो मेरे काम वाले सप्ताह के वो छ: दिन!!!!!
वहाँ तो रोज़ फिर भी अपने सहकर्मियोँ से कुछ हँसती और बतियाती हो.
रविवार का दिन तो निहायत ही बेशर्म-सा निष्ठुर एक दिन है!
कोई रहमो-करम की उम्मीद इस दिन घरवालों से नहीं करती हो
फिर क्योंकर इस मुए रविवार का इंतज़ार करती हो?
पसीने-से तरबतर कई बार तो एकदम-से गंधाती हो.
जब खुद को एकदम-से बदरंग हल्दी लगी नाईटी में बेतरतीब छोड़ देती हो.

वो उदास-सी स्त्री


चन्द्रग्रहण के बाद वह उदास-सी स्त्री 
अक्सर उदास हो जाती थी
कुछ था जो उसे उदास कर जाता था
स्याह अँधियारे उसे अब नहीं भाते थे
बस चंद्रमा की दूधिया रौशनी में नहाई हुई दुनिया
और उजाले को वह पसन्द करती थी.

वज़ह कुछ अतीत के साये में दफ़न थे.
कई बार इन्हीं स्याह अँधेरों में कोई था
जो उसे प्रेम करने की सुखद कहानियाँ सुनाया करता था.
उसे बस याद आती उसी बेईमान की
और वही सुखद-सी रैन बतिया
जो उससे अँधेरे में की जाती थी.
चंद रोज़ पहले उसे इंतज़ार होता था स्याह अँधियारे
और अमावस की रात का.
इन्हीं अँधेरे रैनों में वो घनघोर बरसता था
और उसके प्रेम की मधुमास में वह मगन हो जाती थी.
उसकी खिलखिलाती हुई हँसी
हरसिंगार की फूलों की तरह धरा से गगन तक पसर जाते थे
दूर तलक बस होती वह और उसके मुखर प्रेम की बात
और महक उठती थी उसकी वह अकेली -सी रात
उसके साथ
तब!!
क्या हुआ,कोई इंद्र बनकर छल तो नहीं गया उसे?
कि वह चन्द्रग्रहण के बाद इतनी उदासियों की बातें करती है
और सघन अँधियारे में समेट लेती है
खुद को कहीं ऐसी जगह जहाँ
प्रेमी बनकर कोई छलिया प्रेम से उसे न छल सके.
हर अँधेरी रात अब रिसती रहती है
और उसे याद आने लगता है वही
उसका जो नहीं था शायद कभी भी
अब हँसती नहीं है वह
हरसिंगार के फूल की तरह
वह अब बरसती है हर बार
और ओंस की तरह फैल जाती है
गहराई हुई वह कहीं भीतर ही भीतर.
और लग गया है एक चन्द्रग्रहण
हमेशा के लिए उसके सुंदर-सी लगती खिलखिलाहट पर

अनवरत जारी तुम्हारा यह सफ़र


इल्लियों से तितलियाँ बनने की क़वायद अनवरत जारी तुम्हारा यह सफ़र आसान नहीं है.
कोकून तो कब की तोड़ चुकी हैं ये तितलियाँ
और तुम हो कि अब भी वही घिसे-पिटे सवाल करते हो!
क्या कर रही हो?
कहाँ जा रही हो?
किसके साथ जा रही हो?
कैसे कर सकती हो?
काँच की किरचियों की तरह चुभने लगे हैं अब ये घिसे-पीटे सवाल!
सभ्यताओं का वहन
अपनी कोख़ में करने वालों से भी पूछा जाता है क्या कोई सवाल?

प्रकृति को सरजती हैं
और सँवारती हैं हर बेतरतीब कोने को
तुमसे तो न होगा इतना कुछ!
हाँ तुम्हें अपनी शक्ति-प्रदर्शन का शौक चढ़ आया है
और बेहयाई से
जब-तब अपनी शक्तियों का नपुंसक प्रदर्शन करते रहते हो.
पौराणिक कथाओं और वेदों की ऋचाएँ पढ़कर भी
तुम निरे मूर्ख हो!
गार्गी और अपाला तक तुम्हें याद नहीं !
पर तुम नहीं भूलना चाहते,सीता,सावित्री और उर्मिला की कथाओं को.
लाँघ चुकी हैं वे लक्ष्मण की खींची हुई देहरी की पुरानी उस रेखा को.
बन्द करो अब कूढ़मगज की तरह घिसे-पिटे पुराने सवाल करना!!!
वह अब भी कहीं रंग ले रही होगी किसी फूल से
कि भर सके अपने पंखों में सुंदर-सुंदर रंग
और इस बदरंग दुनिया को वह रंगीन बना देगी.

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वो खौफ़ खा गया और अन्य कविताएँ

साँझ

साँझ नाम से कविताएं लिखने वाली सौम्या गुलिया दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं.नाटक के एक समूह ‘अनुकृति’ से जुड़ी हैं. संपर्क : ई मेल-worldpeace241993@gmail.com

वो खौफ़ खा गया

बस इतनी सी बात थी
और वो खौफ़ खा गया
मैंने रंग दिए सफे जो कुछ
स्याह काली रात से
जुबाँ तो खामोश थी
चीख़ें जो मेरे हर्फ़ कुछ
तो वो खौफ़ खा गया

मैंने जो बाँहें खौल कर
बादलों से थोड़ी बात की
और बात को सुनके मेरी
बादल बरसने की जगह
खिलखिला के हँस दिए
अब ऐसा भी क्या गज़ब हुआ
कि वो खौफ़ खा गया

घरदारी की चारदीवारी से
थोड़ा जो झाँका मैंने बाहर
सूरज की किरणों की तरह
जो मैने अपने सर का पल्लू उतार
हर दिशा में फैला दिया
अब ये भी भला क्या बात थी
जो वो खौफ़ खा गया

करते थे बहुत ही शोर जो
वो पायल, कंगन और बालियाँ
एक रोज़ यूँही जी किया
तो मैंने उनको उतार रख दिया
अब ऐसा भी मैंने क्या किया
जो वो खौफ़ खा गया

वो डरा रहा था रात को अंधेरे से
वो डरा रहा था नदी को लड़खड़ाने से
वो डरा रहा था मुझे मर्दों के इस ज़माने से
फिर जो मैंने नज़रे उठाके
थोड़ा-सा मुस्कुरा दिया
कमाल ही हुआ बड़ा
कि मुझको डरा रहा था जो
वो खुद ही खौफ़ खा गया

तो तुम उससे उलझना नहीं

जब वो हर खौफ़ से आज़ाद होकर
घूम रही हो अँधेरी रात में
सुनसान सड़क पर
अपनी आँखों मे
बग़ावत की बात लेकर
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब वो झील से नदी
और नदी से दरिया बन जाए
और बगावत उसकी
रोज़मर्रा की आदत बन जाए
फ़ितरत बन जाए
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब उसकी आँखों में
नज़ाकत न दिखे
उसकी बातों में तुम जिसे कहते हो शराफ़त
वो शराफत न रहे
जब उसकी आँखों में काजल की जगह
खौलता लाल रंग ले ले
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब सदियों से ताला लगे
जंग खाए
उसके लब
खामोशी का दामन छोड़
तुम्हारी आँखों में आंखें डालकर
तुम्हें पुचकारने की बजाय
ललकारने लगे
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब वो तुम क्या चाहते हो से ज्यादा
खुद की चाहत को चाहने लगे
तुम्हारे मर्दाना रौब की
खिल्ली उड़ाने लगे
तुम्हारी ख्वाहिशों, फरमाइशों को
को पूरा करने से इनकार करने लगे
और तुम से ज्यादा
अपनी बात करने लगे
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब वो तुम्हारे बनाए खाँचों में
ढलने से इनकार करने लगे
अपने हर अंग हर एहसास से
मोहब्बत करने लगे
उनकी खुलकर बात करने लगे
जब अपनी जाँघों के बीच बहते
लाल रंग को
अपने माथे पर सजाने लगे

तो देखो,  तुम उससे उलझना नहीं

लड़की की तरह हँस
.
सुन! ऐ पगली! यूँ न खिलखिला के हँस
नज़रें झुका, होंठों को दबा
ज़रा ख़ामोश रहके हँस

अपना नहीं
तो ज़रा मआशरे का सोच
बड़े अदब-ए-पसंद है लोग
ज़रा मुँह छुपा के हँस

वड़े-वढ़ेरों अक्लमंदों ने
क़ायदे कानूनों की
लिखी हैं एक किताब
ख़ास लड़कियों के नाम
पहले जाके उसको पढ़
और हँसना ही है फिर भी
तो ज़रा लड़की की तरह हँस

ठहाके लगाना तो मर्दाना तौर है
ख़ातूनों की हँसी ऐसी हो
जो न बेहया लगे
न कानों में ही चुभे
जिसकी तासीर हो शकर
जो मर्दों के दिल छुए
मेरी सलाह है ये
तू नज़ाकत का पाठ पढ़
दुनिया-ए-अदब सीख
और ज़रा शर्मों हया से हँस

लड़की है तू
ज़रा लड़की की तरह हँस
ख़ामोश रहके हँस
मुह छुपा के हँस
और शर्मों -हया से हँस
ज़रा लड़की की तरह हँस
ख़ामोश रहके हँस
मुह छुपा के हँस
और शर्मों-हया से हँस

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