Home Blog Page 59

भाषा में भय के मनोविशेषज्ञ हैं मलखान सिंह

सुशील मानव


स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन तथा एक्टिविज्म. सम्पर्क: susheel.manav@gmail.com
फोन- 0639349135

‘यकीन मानिए/ इस आदमखोर गाँव में/ मुझे डर लगता है/  बहुत डर लगता है।’
किसी व्यक्ति या समुदाय को पूरा का पूरा गाँव आदमखोर लगने लगे तो ये उसके भय की पराकाष्ठा ही है,साथ ही तथाकथित सभ्य समाज की बर्बरता व अमानवीयता की हद भी।भय दरअसल मानस की प्राकृतिक रक्षात्मक प्रतिक्रिया है। जिसे कंडीशनिंग प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति और समुदाय के अंतर्मन में आरोपित किया जातारहा है।सदियों पूर्व मनुवादी व्यवस्था ने राजसत्ता के सहयोगसे मूलनिवासी समुदाय के भीतर लोगों के मन में भय की अनुक्रिया विकसित की। चूँकि इसमें सत्ता और व्यवस्था दोनों एकसाथ शामिल रहे थे अतः ये एक तरह की अनुबंधित अनुक्रिया थी। जिसके लिए सबसे पहले दलित समुदाय के लोगों के मन पर कब्जा किया गया उनके हौंसलों को तोड़ा-फोड़ा गया और धार्मिक-सामाजिक-राजनैतिक आचारसंहिता को सत्ता के साथ गठजोड़ कर उनपर थोपा गया फिर उन्हें सत्ता-व्यवस्था द्वारा तद्नुसार अनुकूलित किया गया। राम द्वारा शंबूक की हत्या का मिथकीय चित्रण प्रतीक है इस तथ्य का कि दलित समुदाय के लिए जो कुछ भी निषिद्ध था उसके उल्लंघन पर राजसत्ता के पास सज़ा-ए-मौत से कमतर तो कुछ था ही नहीं। इन रूह कँपा देनी वाले सज़ा-यातनाओं के कारण आतंक का मनोभाव और अधिक घनीभूत होकर समुदाय विशेष के मन में बैठ जाता। ये भय हिंदी के बेहद महत्वपूर्ण कवि मलखान सिंह की रचना प्रक्रिया का बहुत ही अहम् हिस्सा है जिसमें वो किसी दक्ष मनोवैज्ञानिक की तरह भय के निदान के ताईं अपने आसपास समुदाय,समाज व्यक्ति और स्थिति-परिस्थिति का बहुत ही सूक्ष्म अनुभूति व अध्ययन परीक्षण करते हैं तभी तो भय उनकी कविताओं में ज़रूरी तत्व की तरह बार बार आता है-
“चेहरे पर- / मरघट का रोना है/ आँखों में भय/ मुँह में लगाम/ गर्दन में रस्सा है/ जिसे हम तोड़ते हैं/ मुँह फटता है/ और/ बँधे रहने पर/ दम घुटता है।”

सत्ताधारी समाज ने भाषा और उत्तेजना को प्रबलक की तरह इस्तेमाल किया। सर्वप्रथम भाषा में जाति सूचक शब्दों को निर्मित किया गया फिर दलित समुदाय के लिए अपमान व हीनता को दर्शाने वाले कारक के रूप में स्थापित-प्रचारित किया गया।तत्पश्चात इन जाति-सूचक शब्दों के भाव-बोध को मुहावरों, लोकोक्तियों गालियों में तब्दील करके समुदाय का अपराधीकरण कर दिया गया। इसके अनंतरभाषा के अश्लील प्रयोग से दलित समुदाय को हतोत्साहित करने का अभियान चलाया जाता रहा, एक निश्चित आवृत्ति और टोन में बार बार लगातार। कवि मलखान सिंह किसी मनोविशेषज्ञ की तरह भाषा में इसकी शिनाख्त करते हुए कहते हैं-
“मैं आदमी नहीं हूँ स्साब / जानवर हूँ / दोपाया जानवर / जिसे बात-बात पर / मनुपुत्र-माँ चो-बहन चो-/ कमीन कौम कहता है।”

मनुवादी सत्ता व्यवस्था द्वारा पहले-पहल भय की अनुक्रिया विकसित की गई। फिर भयोत्पादक उत्तेजना की उपस्थिति में ऐसी भयंकर अनुक्रिया उत्पन्न हुई जिसने भय को इतना अधिक प्रबलित कर दिया कि इसकी तीव्रता और व्यापकता नेएक पूरे कौम की मनोवृत्ति एवं व्यवहार को भयानुबंधित कर दिया।इस भयोत्पादक उत्तेजना में सत्तावर्ग की घृणा, क्रोध,बर्बरता, जुगुप्सा पैदा करती अमानवीयता, उन्मादी अट्ठहास धारदार हथियार लंबे चौंड़े बलिष्ठ लठैत और….दलित समुदाय की चीख, रहम की गुहार लट्ठ और तलवार से कटा फूटा रक्तरंजित शरीर, बलत्कृत स्त्रियों की क्षत-विक्षत योनियाँ, आग में भूने हुए नवजात बच्चों के शव सब कुछ शामिल रहा होगा। जिसका परिणाम ये हुआ कि दलित वंचित समुदाय दूर से ही उनकी सत्ता एवं उपस्थिति के आभास करके भयभीत होने लगा।ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने बड़ी चालाकी से इनके भय और वंचना को अपमान घृणा व तिरस्कार केसाँचे में ढालकर रुपांतरित कर दिया। फिर चाहे वो सिर पर मैला रखकर ढोना हो या या गले में थूकने का पात्र टांगकर घूमना। बिना जूता चप्पल और पगड़ी के रहना हो या दलित स्त्रियों को स्तन खोलकर रहने का आदेश। मलखान सिंह भय की उस अनुक्रिया को न सिर्फ बहुत बारीकी से पकड़ते है अपितु इसका रचाव अपनी रचना ‘सफेद हाथी’ में बखूबी करते हैं –
“मदान्ध हाथी-/ लदमद भाग रहा है/ हमारे बदन/ गाँव की कंकरीली /गलियों में घिसटते हुए /लहूलुहान हो रहे हैं/ हम रो रहे हैं/ गिड़गिड़ा रहे हैं/ ज़िन्दा रहने की भीख माँग रहे हैं/ गाँव तमाशा देख रहा है/ और हाथी/ अपने खम्भे जैसे पैरों से/ हमारी पसलियाँ कुचल रहा है/ मवेशियों को रौंद रहा है/ झोपड़ियाँ जला रहा है/ गर्भवती स्त्रियों की नाभि पर/ बंदूक दाय रहा है और हमारे/ दुध-मुँहे बच्चों को/ लाल-लपलपाती लपटों में/ उछाल रहा है।”



लोग भय को अपने बचाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने लगे। ये भय की अनुक्रिया का सामान्यीकरण था। जिसे और भी कई सामाजिक-धार्मिक-राजनैतिक पाबंदियों को थोपकर चाक-चौबंद किया गया। संपत्ति तो उनसे पहले ही सब छीन ली गई थी। उनसे उनके देवता, उनके सारे अधिकार भी छीनकर ब्राह्मण व्यवस्था द्वारा दलित समुदाय को घोर वंचना से अभिशापित कर दिया गया। इस तरह अधिकारहीन वंचित समुदाय अपना पेट पालने के लिए उनके मरे हुए पशुओं उनके छोड़े हुए जूठन, उनके फेंके हुए सड़े-गले खाद्य-अपशिष्टों पर बहुत बुरी तरह आश्रितथा।ये अधिकारहीनता और वंचना ही थी जिसने एक पूरे कौम को सदियों तक बेहद अमानवीय तरीके से बेहद दुरूह,दुष्कर एवं विक्षिप्त जीवन जीने को बाध्य करता रहा। भय और वंचना के बीच पिसते दलित जीवन की उसी दुरूहता को बहुत ही सहज सरल भाषा में मलखान सिंह ने अभिव्यक्त करते हैं-
“मेरी माँ मैला कमाती थी / बाप बेगार करता था / और मैं मेहनताने में मिली जूठन को / इकट्ठा करता, खाता था/……/ मुझे गुस्सा आता है / कि पेट और पूँछ में / एक गहरा सम्बन्ध है/ कि पेट के लिए रोटी ज़रूरी है/ और रोटी के/ लिए पूँछ हिलाना/ उतना ही ज़रूरी है/ इसीलिए जब किसी बात पर बेटे को/ पूँछ तान गुर्राते देखता हूँ/ मुझे गुस्सा आता है/ साथ ही साथ डर भी लगता है/ क्योंकि गुर्राने का सीधा सपाट अर्थ / बगावत है।”


जब व्यक्ति भय के कारक के प्रति चिंतित रहता है तो वो खुद को भय से मुक्त नहीं रख पाता। उसकी ये चिंता ही अनुकूलित होकर उसके व्यक्तित्व से चिपक जाती है। धीरे धीरे स्थिति इतनी तीव्र हो जाती है कि ये अनुकूलित भय ही स्थायी भाव बनकर एक तर्कहीन फोबिया में तब्दील हो जाता है तथा व्यक्ति और समुदाय के पूरे मनोविज्ञान को प्रभावित करने लगता है। और फिर व्यक्तिऔर समुदाय अपनी चिंता से दूर होने या बचने के लिए भयोत्पादक समाज व स्थितियों से बचने का प्रयास करता है। और अपने इसी अर्जित भय को विरासत के रूप में अपनी भावी पीढ़ी को सुरक्षा के ढाल बताकर सौंपता है-
“मरते समय बाप ने/ डबडबाई आखों से कहा था कि बेटे/ इज्जत इंसाफ और बुनियादी हकूक/ सबके सब आदमी के आभूषण हैं/ हम गुलामों के नहीं/ मेरी बात मानो-/ अपने वंश के हित में/ आदमी बनने का ख्वाब छोड़ दो/ और चुप रहो।”

असुरक्षा एवं हीनता का भाव भय की व्युत्पत्ति है। जिसमें व्यक्ति और समुदाय सदैव एक अनहोनी की आशंका से घिरा रहता है। एक समय में जब भय सीमा से बढ़कर आतंक का रूप धर लेता है तो दूसरे रूप में उभरता है। भय को निकलने का कोई जरिया नहीं मिलता तो वो दूसरे रूप धर लेता है। क्या कारण है कि अधिकांश दिमागी बीमारियाँ दलित,दमनित, शोषित समुदाय में ही दिखती हैं। इन्हीं भय-जनित विक्षिप्तियों के चलते ही दलित स्त्रियों को डायन घोषित करके घेरकर उनकी हत्या कर दी जाती रही हैं। मानसिक संघर्ष के कारण उत्पन्न हुए तनाव की स्थिति में दुखद भावनाओं से अपनी रक्षा हेतु व्यक्ति किसी विचार प्रक्रिया को ही बार बार दोहराकर खुद को उलझाए रखता है।व्यक्ति जब हीनता की भावना से ग्रस्त होता है तो वहइसके कारण उत्पन्न तनाव को बाध्य क्रियाओं अथवा विचारों के माध्यम से अभिव्यक्ति यानी निष्कासन करता है। वो देवताओं को पूजकर ओझाई-सोखाई करने लगता है। ऐसा करने से न सिर्फ उसका तनाव कम होता है अपितु श्रेष्ठता का भाव उपजता है। श्रेष्ठता का ये भाव हीनता के भाव की प्रतिपूर्ति करता है। मलखान सिंह इस मनोदशा को डिकोड करते हुएलिखते हैं-
“यह ससुरी ओझाई ही तो है/ जिसके कारन जन आज भी/ उस खूँटे से बँधा हैं/ जिसका एक पाँव/ शैतान की आँत में/ दूसरा पाँव–/ धरती की काँख में धँसा है।”



हालाँकि पुरानी पीढ़ी जिसने हिंसा,बर्बरता और दमन की अनुभूति की है उनकी स्मृतियों में बसा वो भय उनके मन की आभासी कंडीशनिंग करती रहती है। इसका बहुत सा उदाहरण अभी गाँवों में बाकी है-जैसे किसी दलित के दरवाजे सवर्ण आए तो वो उठ खड़ा हो जाए। या सवर्ण के यहाँ चाय-पानी करने पर अपनी गिलास-कप धोकर वापिस रखना। सवर्णों के बच्चों तक से पालागी जयरमी करना। ये एक तरह की आभासी कंडीशनिंग है जो
दरअसल पूर्व अनुभूति की ही छाया है। इसकी झलक मलखान सिंह की कविता ‘हमारे गाँव में’ कवितामें मिलती है-
“हमारे गाँव में नम्रता/ जन की खास पहचान है/ और उद्दंडता हरि का बाँकपन/ तभी तो वह-बोहरे का लौंडा/ जो ढंग से नाड़ा भी नहीं खोल पाता/ को दूर से ही आता देख/ मेरा बाबा/ ‘कुँवरजी पाँव लागूं’ कहता है/ और वह अशिष्ट/ अपना हर सवाल/ तू से शुरू करता है/ तू पर ही खत्म करता है।”


भय का एक कारण प्रतिक्रिया के परिणामों का न पता चलना होना होता है। यदि आप अपनी भयकी घटनाओं के कारणों का पता लगा लेते हैं, तो लड़ना आसान हो जाता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ भय ही रचते हैं मलखान सिंह वो भय के मनोविज्ञान की शिनाख्त करके उसे तोड़ते भी हैं।
“हमें अन्धा/ हमें बहरा/  हमें गूँगा बना / गटर में धकेल दिया / ताकि चुनौती न दे सकें / तुम्हारी पाखण्डी सत्ता को।”
प्रबलक प्रतिक्रिय़ा का अनुसरण करता है, जिससे उसकी प्रतिक्रिया शक्ति प्रबल होती है। अर्थात प्रतिक्रिया पहले होती है और प्रबलन बाद में मिलता है जो प्रतिक्रिया की शक्ति में वृद्धि का साधन बनता है। यही अब तक भय के मनोविज्ञान में काम कर रहा था,अब इसे उलट दीजिए।एससी/एसटी एक्ट को प्रबलन के रूप में देखिए। इसने सदियों से भयभीत और अधिकार वंचित रहे मूलनिवासी दलित समुदाय के प्रतिरोध की प्रतिक्रिया शक्ति को महज कुछ दशकों में इतना संघर्षशील बना दिया कि सुप्रीमकोर्ट के माननीयों तक को इसकी शक्ति सीमित करनी पड़ी! ये कहकर कि सवर्ण समुदाय के प्रति इस एक्ट का बहुतायत दुरुपयोग किया जा रहा है! जबकि एससी/एसटी एक्ट ने रामायण के मिथक बाली को मिले वरदान की तरह काम किया। एक ओर जहाँ इस एक्ट ने दलित समुदाय को बल दिया वहीं वो सवर्ण समुदाय द्वारा अब तक किये जाते रहे भय की अनुक्रिया व इसके प्रबलन को निषिद्ध भी किया। साथ ही प्रशासनिक संस्था व सत्ता को मन-बेमन इस एक्ट के साथ खड़ा होना पड़ा। इससे न सिर्फ भयभीत दलित समुदाय को अन्याय के ख़िलाफ़ न्याय का भरोसा मिला अपितु प्रतिरोध का साहस और बल भी हासिल हुआ।

“अब! केवल यही सोच रहा हूँ मैं/ कि सामने बंद दरवाजे पर/ दस्तक नहीं, ठोकर दूँगा/ दीवालें चूल से उखाड़/ जमीं पर बिछा दूँगा/ चौरस जमीं पर / मकां ऐसा बनाऊँगा/ जहाँ हर होंठ पर/ बंधुत्व का संगीत होगा/ मेहनतकश हाथ में-/सब तंत्र होगा।”
बाद में लोकतांत्रिक सत्ता व्यवस्था के उत्तरोत्तर जातीय संगठनों एवं राजनैतिक दलों के बरअक्श जातीय चेतना का विकास हुआ और फिर अस्मितावादी राजनीतिक दलों के राज्य सत्ता में भागीदारी के चलते दलित समुदाय में अस्मिताबोध का विकास हुआ।संविधान ने वंचना के अभिशाप को तोड़ते हुए उन्हें शिक्षा रोज़गार औरसत्ता-संस्थानों में प्रतिनिधित्व का हक़ दिया।जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सत्ता को ब्राह्मणवादी विचार व्यवस्था के असंगत और परस्पर विरोधी भूमिका में लाकर खड़ा कर दिया। मतदान का अधिकार मिलने से भी उनमें बराबरी का बोध जन्मा। सत्ता में भागीदारी और एससी/एसटी एक्ट के पावर-कांबो-पैक ने दलित समुदाय में भय की अनुक्रिया के स्थान पर दूसरी अनुक्रिया विकसित की जो परस्पर विरोधी और अधिक प्रबल अनुक्रिया थी। ये काउटंर रिएक्शन यानी प्रतिरोध की अनुक्रिया थी। जिसने युवा दलित समुदाय के मन से भय की जड़ों को न सिर्फ ऊखाड़ फेंका अपितु उन्हें बहुत आक्रामक और लड़ाकू बनाया। ये अनुक्रिया अधिकारों के प्रति सकरात्मक संवेगात्मक प्रतिक्रिया है। ये संघर्ष से अनुबंधित होकर अर्जित की गई अनुक्रिया है। ये एक वंचित समाज केद्वारा भय पर विजय की अनुक्रिया का अनुगूँज है। मलखान सिंह की ‘आज़ादी’शीर्षक कविता में बदलाव की ये अनुगूँज पुरजोर सुनी जा सकती है-
“वहाँ वे तीनों मिले / धर्मराज ने कहा पहले से / दूर हटो — / तुम्हारी देह से बू आती है / सड़े मैले की / उसने उठाया झाड़ू / मुँह पर दे मारा ।/ वहाँ वे तीनों मिले / धर्मराज ने कहा दूसरे से / दूर बैठो —/ तुम्हारे हाथों से बू आती है / कच्चे चमड़े की / उसने निकाला चमरौधा / सिर पर दे मारा/ वहाँ वे तीनों मिले / धर्मराज ने कहा तीसरे से नीचे बैठो —/ तुम्हारे बाप-दादे / हमारे पुस्तैनी बेगार थे / उसने उठाई लाठी / पीठ को नाप दिया/ अरे पाखण्डी तो मर गया !/ तीनों ने पकड़ी टाँग / धरती पर पटक दिया / खिलखिलाकर हँसे तीनों/ कौली भर मिले / अब वे आज़ाद थे।”



मलखान सिंह अपनी रचनाओं में धर्मसत्ता को भी पुरजोर चुनौती देते हैं तो एक आस्तिक की तरह वेदना के स्वर में ही देते हैं। वो कहीं भी अपनी वैज्ञानिक विचारधारा के आधार पर भगवान के अस्तित्व को सीधे-सीधे नकारते नहीं बल्कि तथाकथित नियंता को कठघरे में खड़ा करके उनके पापकर्म, उनके अन्याय एवं पक्षपाती रवैये की मुखालिफ़त करते चलते हैं।ये बात इस तथ्य को और पुख्ता करती है कि उनकी कविताओं का यथार्थ और व्यथानुभूति भले उनकानिजी होपर उनका संघर्ष निजी नहीं बल्कि पूरे दलित समुदाय व समाज के लिए है।
“ओ परमेश्वर!/कितनी पशुता से रौंदा है हमें/ तेरे इतिहास ने/ देख, हमारे चेहरों को देख/ भूख की मार के निशान/ साफ दिखाई देंगे तुझे/ हमारी पीठ को सहलाने पर/ बबूल के काँटों से दोनों/ मुट्ठियाँ भर जाएगीं तेरी/ हमारे सूजे हुए कंधों को छू/ बैल के पके कंधे का दर्द भी/ हल्का लगेगा तुझे/ हमारी बस्ती में/ खाँसती-बोझा ढोती/लाशों को देख/ जिंदा रहने का साहस ही/ खो बैठेगा तू!/ हम फिर भी जिंदा हैं/ और तू!चुप है/ गूँगे की तरह चुप!”
उसी क्रम में वो ब्राह्मणवादीवर्चस्ववाद को भी चुनौती देते हैं। शुचिता के उनके सुविधावादी पाखंड को दलितों के बद्बूदार यथार्थ और दान-धर्म के नाम पर हरामखोरी के कला-कौशल को श्रम-मूल्यों के बरअक्श रखकर खारिज करते हैं। दलितों को भौंड़ा समझने वाली ब्राह्मणवादी मनोवृत्ति के सुवासित देहगंधों से इतर पसीने से सनी जीवन गंध के सौंदर्यबोध को रचते हैं।साथ ही साथ अवैज्ञानिक कर्मकांडों, वर्ग-योनि में जन्म की अवधारणा, एवं दलित होने के पिछले जन्म के पाप-कर्म जैसे अतार्किक बातों को खारिज कर देते हैं। ये शोषण की पीड़ा से उपजी वितृष्णा नहीं बल्कि उनकी वैचारिकता में वैज्ञानिक चेतना का विकास हैजो सीधे उनकेआत्मबोध से जुड़ती है।


“सुनो ब्राह्मण/ हमारी दासता का सफर / तुम्हारे जन्म से शुरु होता है/ और इसका अंत भी/ तुम्हारे अंत के साथ होगा”
लोकतांत्रिक सत्ता-व्यवस्था से ब्राह्मणवादी व्यवस्था खत्म न भी हुई हो तो कुछ कमजोर ज़रूर पड़ी। माने बदली हुई परिस्थितियों में समुदाय के भीतर वो भय को प्रबलित नहीं कर पाए।लेकिन इतनी सदियों तक शोषण और बर्बरता के बलबूते सत्ता के केंद्र में रहा सुविधाभोगी वर्ग इतनी आसानी से अपनी सत्ता भला क्यों छोड़ने लगा। तो इसी क्रम में एक आजाद और लोकतांत्रिक राज्य में भी कई कई बार वो ब्राह्मणवादी सामंती बर्बरता दोहराई गई । भय की मनोवृत्ति को फिर से खड़ा करने कीअमानवीय कोशिश में दलित समुदाय का जनसंहार किया गया। उनकी लड़कियों स्त्रियों से सामूहिक दुष्कर्म करके उनके यौनांगों में मनोविकृति की हद तक डंडा, रॉड सरिया ईंट पत्थर भरा गया स्तनों को काट दिया गया। घर-बार फूँक कर मवेशियों संग बड़े बूढ़ों को जिंदा जला दिया गया।


बरमेश्वर सिंह की रणवीर सेना जैसे बर्बर और अमानवीय सवर्ण संगठनों ने लक्ष्मण पुर बाथे, बथानी टोला शंकर बिगहा, मियांपुर, बेल्छी जनसंहार और भगाना कांड भय और आतंक के मनोविज्ञान को फिर से खड़ा करने की कोशिश करते दिखे जिन्हें सत्ता और प्रशासन का पूरा सहयोग हासिल था। आजादी एक छलावा सिद्ध हुई। प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष ही सही ब्राह्मणवाद ने सत्ता में अपनी पकड़ बनाए रखी। पहले दलित समुदाय का जनसंहार और फिर साक्ष्यों के अभाव में न्यायव्यवस्था से आरोपियों का बरी हो जाना यही दर्शाता है।ब्राह्मणवाद तले दबे इस लोकतांत्रिक सत्ता की  विरूपता को बहुत ही कुशलता से अभिव्यक्ति देते हैं मलखान सिंह-
“कलियर भैंसे की पीठ चढ़ यमराज/ लाशों का निरीक्षण कर रहे हैं/ शब्बीरा नमाज पढ़ रहा है/ देवताओं का प्रिया राजा/ मौत से बचे हम/ स्त्र-पुरुषों और बच्चों को/ रियायतें बाँट रहा है/ मुआवजा—दे रहा है।”


कह सकते हैं कि मलखान सिंह भय की वेदना लिखते हैं, अपमान पीड़ा तिरस्कार और वंचना लिखते हैं। इन रचनाओं का हासिल ये है कि इनमें वर्ग या जाति विशेष के प्रति प्रतिशोध नफ़रत या गाली नहीं है कि जिनका पाठक होकर एक सवर्ण उत्तेजित प्रतिक्रिया दे। इन कविताओं का अर्जित ये है कि इन्हें पढ़कर ब्राह्मण या सवर्ण पाठक के मन में आत्मग्लानि व अपराधबोध का भाव पैदा होता है। इन्हें पढ़कर वो अपने पुरखों के सामने गर्व से शीश नहीं नवाता बल्कि कई बार धिक्कारता है, लानत भेजता है उनकी बर्बरता एवं अमानवीयता भरे इतिहास पर। शर्मिदां होता है उनका वंशज होने पर। इन कविताओं की सार्थकता ये है किये सवर्ण पाठकों को भी उद्वेलित और आंदोलित करती हैं।सवर्ण से मनुष्यतर होने की भावनाजगाती हैं।
“सुनो ब्राह्मण/ हमारे पसीने से/ बू आती है तुम्हें/ फिर ऐसा करो/ एक दिन/ अपनी जनानी को/ हमारी जनानी के साथ/ मैला कमाने भेजो/ तुम! मेरे साथ आओ/ चमड़ा पकायेंगे/ दोनों मिल बैठ कर/ मेरे बेटे के साथ/ अपने बेटे को भेजो/ दिहाड़ी की खोज में/ और अपनी बिटिया को/ हमारी बिटिया के साथ/ भेजो कटाई करने/मुखिया के खेत में/”


सवर्ण सत्ता की भाषा में दलित पीड़ा की अभिव्यक्ति संभव ही नहीं है। सत्ता की भाषा में किया गया कोई भी रचाव क्रिया-प्रतिक्रिया तक ही सिमटकर रह जाती है। इसीलिए सत्ता की भाषा से अलगमलखान सिंह अपनी अलग काव्य भाषा विकसित करते हैं। ये भाषा का ही कमाल है कि सवर्ण सत्ता का प्रतिरोध करते हुए भी उनकी अपनी मनुष्यता का तनिक भी क्षरण नहीं होता। साथ ही अपने भाषा में वो सामाजिक दायित्वबोध वाले कवि नजर आते हैं। आवेग और दायित्वबोध का बेहद उम्दा संतुलन नई भाषा शैली के चलते ही उनकी रचनाओं में संभव हो पाया है।
“सामने अलाव पर/ मेरे लोग देह सेक रहे हैं / पास ही घुटनों तक कोट/ हाथ में छड़ी,/ मुँह में चुरट लगाए खड़ीं/ मूँछें बतिया रही हैं।/ मूँछें गुर्रा रही हैं/ मूँछें मुस्किया रही हैं/ मूँछें मार रही हैं डींग/ हमारी टूटी हुई किवाड़ों से/ लुच्चई कर रही हैं।/ शीत ढह रहा है/ मेरी कनपटियाँ/ आग–सी तप रही हैं।”

अपनी रचनाओं में दीनता हीनता वंचना के सटीक निरूपण के लिए उन्होंने जानवरों व मिथकों की उपमाओं प्रतीकों और रूपकों का प्रयोग किया है। उनकी रचनाओं के बिंब और रूपक तक दलित-बोध सवर्ण-बोध लिए हुए हैं। जैसे आदमखोर गाँव, ठकुराइसी मेड़, डोम टोला के लिए ठेठ मेढक और सुअर खुडारो, ब्राहम्णवादी व्यवस्था के लिए अजगर का जबड़ा, भरपेट भोजन से वंचना के लिए ‘पत्थर पेट बाँध सोते हैं’।धार्मिक समाजिक विडंबनाओं की अभिव्य़क्ति के लिए उन्होंने वक्रोक्ति का बहुत उम्दा प्रयोग किया है।
धर्मसत्ता के परम प्रतीक शिवलिंग को एकलब्य का अँगूठा बताते हुए वो कटाक्ष करते हैं-
“तेरा धरती में गड़ा स्थूल लिंग/ अग्रज एकलव्य का कटा अँगूठा/ प्रतीत होता है हमें।”  या फिर
“यदि कोई प्यासा जन/ भूल या मजबूरी बस/ हरि कुँए की जगत पर/ पाँव भी रख दे / तो कुँए का पानी/ मूत में बदल जाता है।”



भय की अनुक्रिया को राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से चालाकी पूर्वक जोड़ा-तोड़ा जाता रहा है। भय और बुराई हमेशा से ही एक दूसरे से संबंधित रहे हैं।मौजूदा सत्ता ब्राह्मणवादी व्यवस्था की पोषक और पैरवीकार हैं। जब लोकतंत्र के चारों स्तम्भों के भीतर ब्राह्मणवादी सवर्णों का वर्चस्व है। ऐसे में आज के समय में मलखान सिंह के कवि की आवश्यकता और प्रासंगिकता पहले से ज्यादा बढ़ गई है।यूँ कि वो दलित अस्मितावादी कवियों की तरह यातना के आवेश से प्रतिक्रिया के लिए उकसाते या उत्तेजित नहीं करते बल्कि अपनी वेदना से पाठक में संवेदना का विकास करते हैं। जो मनुष्य होने की सबसे ज़रूरी शर्त है।रोहित वेमुला, ऊना,और इलाहाबाद कटरा में दिन-दहाड़ें हुई कानून के छात्र की हत्या, सहारनपुर और भीमा कोरेगाँव के सवर्ण-अवर्ण संघर्ष मौजूदा समय की भयावहता की गवाही देते हैं। संविधान को ताक पर रखकर जिस तरह से एससी/ एसटी एक्ट को संघ सरकार के इशारे पर न्यायपालिका द्वारा कमजोर किया गया है वो भय को दलित समाज में फिर से खड़े करने के बुनियाद के तौर पर देखा-समझा जाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर शिक्षा स्वास्थ्य समेत तमाम दूसरे सरकारी अर्द्ध सरकारी संस्थानों का तेजी से निजीकरण करके आरक्षण को खत्म किया जा रहा ताकि दलित वंचित समुदाय के समाज को सत्ता के तमाम संस्थानों से प्रतिनिधित्वविहीन करके फिर से ब्राह्मणवादी सत्ताकायम किया जा सके।

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

दलित स्त्रीवाद अंतरजातीय विवाह को सामाजिक बदलाव का अस्त्र मानता है -रजनी तिलक



दलित स्त्रीवाद की सशक्त प्रवक्ता,  दलित और स्त्री सामाजिक आन्दोलन की प्रखर प्रतिनिधि एवं लेखिका रजनीतिलक से अरुण कुमार प्रियम की बातचीत. यह बातचीत उनके परिनिर्वाण के पूर्व की गयी थी. 

दलित और दलित साहित्य से आपका क्या आशय है?

दलित और दलित साहित्य से मेरा आशय दोनों की शाब्दिक पूरकता है.मैं दलित शब्द के लिए ‘दलित पैंथर’ द्वारा दी गयी परिभाषा को ही मानती हूँ. दलित शब्द दलित पैंथर द्वारा आत्मसात किया गया है, जिसका उद्देश्य अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, भूमिहीन किसान/मजदूर एवं शोषण की शिकार महिलाओं  के शोषण तथा तमाम जातिगत उत्पीड़न व वर्ण व्यवस्था को नष्ट करके वर्ण और वर्ग विहीन समाज की स्थापना है. दलित साहित्य का उद्भव इन्हीं संकल्पनाओं के मूर्त रूप में हुआ. सम्मान-स्वाभिमान हेतु अपनी सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की मुखर आवाज बनकर आत्मकथा, कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक, शोधपूर्ण लेखन, आलोचना और निबंध के रूप में दलित साहित्य आज हमारे सामने है. दलित साहित्य अनुभव आधारित लेखन बनकर व्यवस्था पर सवाल उठाता है. इसमें समता और समानता की दरकार है.


आपकी दृष्टि में दलित साहित्य की वैचारिकी में अंतर्विरोध है या इसका  दायरा सीमित है?हिंदी दलित लेखन में अब कुछ दलित चिंतक ‘दलित साहित्य’ पद की जगह ‘अम्बेडकरवादी साहित्य’ पद का प्रयोग करने लगे हैं. इस सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं?

दलित साहित्य की वैचारिकी अम्बेडकरवाद से ही निर्मित है. दलित साहित्य अम्बेडकरवादी विचारधारा का ही प्रवाह है.हिंदी में ये बहस डॉ. तेज सिंह ने शुरू की. इस पर बहस हो सकती है कि ‘दलित साहित्य’ को ‘अम्बेडकरवादी साहित्य’ कहा जाये या नहीं. लेकिन कुछ कथित दलित विद्वान तेजी सिंह जी की आलोचना करते हैं जबकि डॉ. तेज सिंह का वैचारिक लेखन दलित साहित्य को एक दिशा रहा है. अम्बेडकरवादी साहित्य के लिए अनिवार्य है कि वह पूर्णतः तार्किक हो, समावेशी हो और तथ्यात्मक हो. दलित साहित्य में इसकी डोर थोड़ी ढीली हो सकती है. क्योंकि दलित एक जाति नहीं अनेक जातियों का समुच्चय या समूह है, जिनमें विभिन्न उपजातियों में सांस्कृतिक दूरी है. कई जातियां पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से उन्नत परिवेश में प्रवेश कर गयी हैं तो कई जातियां अभी  पहली सीढ़ी पर ही नहीं चढ़ीं हैं. वे अपने पुश्तैनी धंधों में लिप्त हैं. शिक्षा और अवसरों की उपेक्षा की शिकार हैं. दलित वैचारिकी में एकरूपता नहीं आयी है. वहां अपने-अपने अनुभव समझ और संपर्कों के हिसाब से वैचारिकी के स्टैंड पॉइंट हैं. दलित शब्द सामूहिकता का आभास देता है. लेकिन दलित वैचारिकी पर चंद लोगों का स्टैंड पॉइंट है कि जन्मगत दलित ही दलित लेखन कर सकता है. वही दलित लेखक कहलायेगा. जबकि उत्तर भारत में जब दलित लेखन शुरू भी नहीं हुआ था तब दलित-स्त्री शोषण पर प्रेमचंद की कुछ कहानियां आयीं थीं. वर्तमान सन्दर्भ में देखें तो शिवशंकर पिल्लई, महाश्वेता देवी, रांगेय राघव, मन्नू भंडारी, रमणिका गुप्ता और बजरंग बिहारी तिवारी के लेखन में दलित आन्दोलन, आदिवासी, घुमंतू जातियों एवं एकल महिलाओं और दलितों के जीवन पर गहरे विमर्श संजीदगी से रखे गए हैं. दलित जाति में पैदा होकर मनुस्मृति के अनुगामी दलित लेखक नहीं हो सकते. अम्बेडकर केवल दलितों की संपत्ति नहीं हैं. वे सम्पूर्ण देश के आइकॉन हैं. जातीय दमन, जेंडर असंवेदनशीलता, मानवाधिकार हनन और मनुस्मृति के मूल्यों के पक्षधर अम्बेडकरवादी नहीं हो सकते हैं, बेशक वो जन्म से दलित हों. दलित की सीमाओं को तोड़कर उसमें प्रगतिशील, वामपंथ, जेंडर और थर्ड जेंडर जैसी  अस्मिताओं के साथ-साथ मजदूर, भूमिहीन किसान, आदिवासी, घुमंतू जातियों और अल्पसंख्यकों की आवाजों को समाहित करने से ही दलित साहित्य समृद्ध होगा.दलित साहित्य मध्यवर्गीय मूल्यों तक सीमित होकर रह गया है.यह गाँव-देहात, स्लम्स के जीवन और उपलब्धियों से कटा हुआ है. केवल और केवल जातीय शोषण के चित्रण तक सीमित हो गया है. इसके बरक्स महिलाओं के लेखन में विविधता है. उनके अनुभव और अभिव्यक्ति का विस्तार हुआ है.

आपकी दृष्टि में बाजारवाद दलित साहित्य को कैसे प्रभावित कर रहा है?

 बाजारवाद के प्रभाव से कोई साहित्य-समाज-संस्कृति अछूती नहीं है. इसके कारण उपभोक्तावादी वर्ग बड़ी तेजी से बढ़ा है. दलित साहित्य का पाठक वर्ग भी बढ़ा है,लेकिन दलित साहित्य को संपन्न प्रकाशक छाप रहे हैं जो साहित्य को मात्र पुस्तकालयों तक पहुंचा कर मुनाफा कमाते हैं. महंगी किताबें जनसाधारण की पहुँच से बाहर हैं. दलित साहित्य मध्य वर्ग तक ही सीमित होकर रह गया है.

दलित साहित्य में अक्सर कलाहीनता के आरोप लगते रहे हैं. आपकी दृष्टि में दलित साहित्य में रचनात्मकता और अंतर्वस्तु के स्तर पर कौन से मुख्य अंतर्विरोध हैं?

 दलित साहित्य को ललित साहित्य के मानदंडों पर आंक कर कलाहीनता की टिप्पणी की जाती है. दलित साहित्य में उसकी भाषा-व्याकरण को लेकर बीस वर्ष पूर्व  जो टिप्पणी की जाती थी. वह अब भाषा-व्याकरण लम्बी यात्रा कर चुकी है. दलित साहित्य और ललित साहित्य समानान्तर दो भिन्न धरातलों में रचा जा रहा है.दलित साहित्य अनुभव और  जिंदगी के कठोर सत्य एवं तर्क व ज्ञान के व्यावहारिक स्वरूप पर लेखन करता है, जो शोषण-अत्याचार, भेदभाव असमानता, उपेक्षा और वर्जनाओं को प्रश्नांकित करता है.जबकि ललित साहित्य कल्पना एवं भाषा-व्याकरण के श्रृंगार में डूब कर आत्मसंतुष्टि व प्रशंसा हेतु लेखन करता है. आजकल डॉ धर्मवीर और उनके अनुयायी, प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन, दिनेश राम, कैलाश दहिया, राजेंद्र बडगूजर आदि जैसे लोग डॉ. अम्बेडकर के बौद्ध धर्म अपनाये जाने को खारिज ही नहीं करते हैं, बल्कि उसे क्षत्रिय धर्म बताकर उपजातियों के नाम से साहित्य के नामकरण की पैरवी करते हैं. जिस दलित आन्दोलन के परिणामस्वरूप वे सम्मान से जिंदगी जी रहे हैं एवं अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं. उसी आन्दोलन के खिलाफ उपजातियों की खेमेबंदी में जुटे हुए हैं. हालांकि ये अंतर्द्वंद्व चंद लोगों का है. अकादमिक दुनिया के बाहरके  समाज में  इनके विचारों का कोई प्रभाव नहीं है.

दलित साहित्य आलोचना में अनेक अंतर्विरोध हैं.इस समय अंतर्विरोधों को देखते हुए दलित आलोचना के विकास की स्थिति क्या है?

दलित साहित्य आलोचना में उपजातिवाद, पितृसत्ता और सामन्तवाद के प्रश्नों पर आश्चर्यजनक मौन है. यहाँ अपने आपको श्रेष्ठ कहलाने की महत्वाकांक्षा सर्वोपरि है. एक मत दलित साहित्य को अम्बेडकरवादी विचारधारा का आइना मानता है तो दूसरा मत मंगूरामवाद, अछूतानंदवाद, कबीर-रैदास, भंगी-चमार और आजीवक मत को दलित साहित्य का स्रोत मानता है. पहला मत अम्बेडकर की शिक्षाओं और उनकी धम्म दीक्षा में विश्वास करता है. सांस्कृतिक क्रांति की बात करता है.स्त्री के लिए समानता और उसके प्रतिनिधित्व की बात करता है. सामंती मूल्यों एवं पितृसत्ता का खुलकर विरोध करता है. वहीँ दूसरा मत पुरुष वर्चस्व और सिर्फजातीय अस्मिता का खुलकर समर्थन करता है. यह ललित लेखकों का विरोध करता है लेकिन उन्हीं के साथ बैठकर मुख्यधारा के साहित्य और अख़बार-पत्रिकाओं में अपनी पैठ बनाने के लिए हमेशा जोड़-जुगाड़ में लगा रहता है. यह वर्ग दलित लेखिकाओं को भाषण देता है. उनको नैतिकता का पाठ पढ़ाता है और उन्हें सजातीय विवाह और  अपनी ही जाति में प्रेम करने एवं घरेलू गुलामी की नसीहत देता है. दलित लेखिकाएं इस मत को खारिज करती हैं. यह मत ईश्वर के अस्तित्व में यकीन करता है. स्त्री समानता इसके दर्शन के बाहर की वस्तु है. इसके आलोचनात्मक सन्दर्भ के लिए उमराव सिंह जाटव, मलखान सिंह, कँवल भारती, मोहनदास नैमिशराय,जयप्रकाश कर्दम, कुसुम वियोगी, ओमप्रकाश वाल्मीकि, मुकेश मानस के साथ-साथ प्रो. विमल थोरात डॉ. कुसुम मेघवाल, डॉ. सुशीला टाकभौरे, रजनी तिलक, पूनम तुषामड, रजनी अनुरागी, अनीता भारती, हेमलता महिश्वर, रजत रानी मीनू, कुंती, कौशल पंवार, कावेरी, नीरा परमार के साहित्य को देखा जा सकता है, जिसमें पितृसत्ता,वर्ग और जेंडर-विभेद के साहित्यिक सन्दर्भों को समझा जा सकता है. इधर नये उभरते आलोचकों में अरुण कुमार प्रियम की पुस्तक ‘पितृसत्ता और साहित्य’ से जाति, जेंडर और पितृसत्ता के बारीक़ तंतुवों को समझने की दृष्टि मिलती है. दलित आलोचना इस लिहाज से अभी शैशव अवस्था में है. आलोचना एक लंबी प्रक्रिया में विकसित होने वाला साहित्यिक रूप है.



 क्या दलित मुक्ति-संघर्ष का सम्बन्ध अन्य मुक्ति संघर्षों से होना चाहिये? यदि हाँ, तो क्या इस सम्बन्ध में दलित लेखन की रचनात्मकता और वैचारिकी में कोई फर्क पड़ेगा? 

 दलित मुक्ति अन्य मुक्ति संघर्षों से अलग होकर संभव नहीं हो सकती है.  दलितों की मुक्ति के लिए जरूरी है अपने जैसे सताये हुए समुदायों के साथ एका. सताये  हुए समुदायों की मुक्ति के लिए जरूरी है कि दलित-पिछड़े-मजदूर-आदिवासी-पसमांदा मुस्लिम, ट्रांसजेंडर और स्त्रियों के संघर्षों के साथ मिलकर ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद, पितृसत्ता और सामंतवाद के विरुद्ध सतत संघर्ष करें, तभी मुक्ति मिल सकती है. दलित मुक्ति से आशय आतंरिक जातिवाद, सांस्कृतिक गुलामी, पितृसत्तात्मक सोच से भी मुक्ति है. इसके साथ ही दलित मुक्ति का मतलब आर्थिक संसाधनों, सरकारी-अर्धसरकारी और निजी उपक्रमों में दलितों का प्रतिनिधित्व. मीडिया, न्यायालय, शासन-प्रशासन, राजनीति और व्यापार में उनकी सहभागिता भी है. सवा अरब की जनसंख्या वाले देश में छब्बीस करोड़दलित हैं. ये छब्बीस करोड़ लोग न केवल सामाजिक अलगाव के शिकार हैं, बल्कि वे तमाम संसाधनों में हिस्सेदारी से भी वंचित हैं.भूमिहीन हैं. अशिक्षित हैं. अपमानजनक कार्यों में लगे हैं. अनुसूचित जातियों के पढ़े-लिखे चंद लोगों को सरकारी नौकरियां तो मिली हैं, लेकिन सम्मान नहीं मिला है. वे सत्ता की चौखट में परावलंबित हैं. सर्वहारा हैं. पूंजीवादी शोषण की गिरफ्त में हैं. इनकी मुक्ति के बिना राष्ट्र-मुक्ति का कोई मतलब नहीं है.राष्ट्र की स्वतंत्रता, संप्रभुता, प्रजतान्त्रिकता और लोकशाही में अपनापन और इनकी हिस्सेदारी से ही राष्ट्रमुक्ति संभव है.

 आपकी दृष्टि में वर्ण, वर्ग और जाति में क्या अंतर्विरोध है?

वर्ण, वर्ग और जाति में गहरे अन्तर्विरोध हैं. वर्णाश्रम के अनुसार ब्राह्मण  श्रेष्ठ है और अधीनस्थ जातियों का कर्तव्यहै है उसकी सेवा करना. वर्णाश्रम की दूसरी विशेषता हैजातियों के आधार पर काम का बंटवारा. जो जिस जाति में पैदा होगा उसी के अनुरूप व्यवसाय करेगा. मसलन ब्राह्मण शिक्षा का काम करेगा. बुद्धिबल का विशेषज्ञ होगा. क्षत्रिय रक्षक होगा और बनिया व्यवसाय करेंगे. अर्थ पर नियंत्रण रखेंगे. शूद्र सिर्फ सेवा ही करेंगे. आज भी वर्णव्यवस्था हमारे समाज के ढांचे में समाई हुई है. उदहारण के तौर पर ब्राह्मण देश में 6 प्रतिशत हैं,लेकिन सरकारी नौकरियों में वे बहुसंख्यक है. सभी ऊपरी नीतिगत फैसले लेने वाले सचिव और अधिकारियों के रूप में काम कर रहे हैं. जमीनों पर, सेना में, पुलिस में, जाट, राजपूतो एवं मराठों का अधिपत्य है. देश के आर्थिक संस्थानों और उद्यमों पर वैश्य समाज का नियंत्रण है. और श्रम आधारित कामों   में शूद्रों को जोत दिया गया है. वर्णाश्रम मनुवादी व्यवस्था का मजबूत किला है, जिसने  सदियों से मनुष्य-मनुष्य  के बीच गहरी खाईयां  खोद दी हैं, जिन्हें न पाटा जा सकता है न छलांग लगा कर टापा जा सकता है. वर्णाश्रम में महिलाओं और शूद्रोंको कोई सम्मान नहीं, न ही आर्थिक आजादी है. न ही उन्हें सामाजिक सम्मान और न ही सामाजिक हैसियत ही दी गयी है. सामंती प्रवृति में लिप्त पितृसत्ता व जातिवादी जकडबंदी है. देश में हर जाति के अपने-अपने जातीय संगठन बने हुए हैं.गरीब- अमीर, नौकर- मालिक भी अपनी-अपनी जातियों के किले में कैद हैं. मजदूरों को संगठित  करके उनके लिए संघर्ष करनेवाले प्रगतिशील और  कम्युनिस्ट भी हमेश यही मानते रहे कि जब आर्थिक गैरबराबरी ख़तम होगी तभी मनुष्य को सामाजिक हैसियत मिलेगी, सम्मान मिलेगा और वो सबके समकक्ष हो जाएगा. परन्तु भारत जैसे देश में महिलाएं और शूद्र मतलब आज के दलित स्वावलंबी व सम्पन्न  होने के बावजूद  सम्मान व सामाजिक हैसियत से दोयम दर्जे के नागरिक ही समझे जाते हैं. सामाजिक एकता का सपना सच हो सकता था अगर वर्ग संघर्ष में जाति की लड़ाई के साथ-साथ जेंडर के सवालों को साथ-साथ उठाया गयाहोता. क्योंकि सभी जिम्मेदार पदों पर पुरुष और वो भी कथित उच्च जातियों के पुरुषों का वर्चस्व रहा. इसलिए महिलाओं ने उनके काम करने के तौर  तरीकों पर सवाल उठा कर खुद को उनसे अलग कर लिया और स्त्रीवादी सोच के साथ काम करना शुरू किया.
जाति के सवाल पर भी विभिन्न विचारधाराओं  के संगठनों  में पूर्वग्रह बने रहे और दलित  आन्दोलन को उन्होंने पृथकतावादी आन्दोलन कह कर अछूत बना दिया. यहाँ तक कि डॉ. आंबेडकर को भी इन आंदोलनों ने सहयोग नहीं दिया. वर्ग,जाति और जेंडर के सवालों में ऊच्च जातियों और उनके वर्गों की मोनोपोली रही है. चाहे वे किसी भी विचारधारा को मानने वाले रहे हों. स्त्रीवादी संगठनों में भी खास जाति और वर्ग का अधिपत्य रहा है. एलीट  क्लास (संभ्रांत वर्ग) की महिलाओ का दबदबा और नेतृत्व रहता है. उनकी भाषा (अंग्रेजी) और बॉडी लैंग्वेज से हाशिये की महिलाओं में इन्फ़ीरिआरिटी काम्प्लेक्स (कमतर होने का एहसास) आता है और वे मात्र भीड़ बन कर रह जाती हैं.

मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद का वैचारिक द्वंद्व क्या है?        

मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद का मुख्य अंतरद्वंद आर्थिक और सामाजिक सरोकार पर केन्द्रित है. मार्क्सवाद मानता है सब समस्याओं की जड़ पूंजीवाद और मुनाफाखोरी है. अंबेडकरवाद भारतीय मूल की समस्या, वर्ण व्यवस्था और उसके आधार पर श्रम विभाजन, जो जातिगत पेशों को स्थापित करता  है, को आधार मान कर जाति के उच्छेद की बात करता है. पूंजी और संसाधनों पर उच्च जातियों का कब्जा है. दलित, महिलाएं और हाशिये की महिलाएं अगर आत्म निर्भर भी हो गयी हैं या संसाधनों की मालिक भी हैं तो भी उनको उच्च जातियों के समक्ष बराबर नहीं समझा जाता. आर्थिक सम्पन्नता  भी उन्हें सामाजिक बराबरी नहीं दिला पाती. उदाहरण के तौर पर डॉ. अंबेडकर खूब पढ़े-लिखे व्यक्ति थे,लेकिन उनका चपरासी उन्हें पानी पिलाने में अपनी बेइज्जती समझता था. बाबू जगजीवन राम जब बनारस संपूर्णानंद की प्रतिमा का अनावरण करने गये और अनावरण किया तो वहां के ब्राह्मणों ने कहा, ‘जगुवा ने प्रतिमा को छू डाला. गंगाजल लाओ. प्रतिमा को पवित्र करो.’  प्रतिमा को गंगाजल से धोया गया. बाबू जगजीवन राम उस समय केंद्र सरकार में मंत्री थे और आर्थिक रूप से समृद्ध थे. आर्थिक सम्पन्नता ने भी उनको कोई बराबरी नहीं दी. हमारे देश में महिलाएं  कितना ही कमाएं परन्तु वे पति से नीचे ही समझी जाती हैं. पत्नी कितनी ही आत्मनिर्भर हो लेकिन वह पति की सबार्डीनेट(अधीनस्थ) ही मानी जाती है.

क्या स्त्रीवाद से प्रथक दलित स्त्रीवाद की अवधारणा विकसित हो रही है या विकसित हो गयी है?यदि दलित स्त्रीवाद की अवधारणा विकसित हो गयी है, तो वह पितृसत्ता के बहुस्तरीय शोषण और जेंडर-विभेद के किन-किन रूपों से किस प्रकार संघर्षरत है?




स्त्रीवाद से अलग दलित स्त्रीवाद विकसित हो रहा है. दलित स्त्रीवाद अफ्रीकन-अमेरिकनव्हाइट-फेमिनिज्म के समांनातर ब्लैक-फैमिनिज्म की तरह उच्च वर्गीय सवर्ण स्त्रीवाद के बरक्स भारत में अपनी जड़ें जमा रहा है. दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता और जाति के ढांचागत शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज उठाता है और  विवाह संस्था में लोकतांत्रिकता चाहता है. दलित स्त्रीवाद  राज्य–समाज-और परिवार में पितृसत्ता व सत्ता की जकड़न से मुक्ति चाहता है और सभी संस्थाओं में ढांचागत लोकशाही एवं व्यवहारिक बराबरी चाहता है. घरेलू  कामों और श्रमाधारित कर्यों के लिये सम्मान एवं सम्मानजनक वेतनमान चाहता है. दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता के बहुस्तरीय  शोषण और जेंडर-विभेद के विभिन्न रूपों से घर,कार्यस्थल, वर्ण आधारित समाज, सड़कों और ब्राह्मणवादी राज्यसत्ता के विभिन्न फलकों परसंघर्षरत है. उदाहरण के लिए घर में स्त्री के घरेलू कार्य का मान नहीं. विभिन्न परम्पराओं के कारण उसका स्थान दोयम दर्जे का है. मनुस्मृति के अनुसार स्त्री को कभी स्वतंत्र नहीं करना चाहिए. उसे हर अवस्था में किसी के अधीन रखना चाहिए. घर से बाहर निकलने पर उसे हर कदम जवाब देना होता है.घर में रहने की हिदायत दी जाती है. यदि रोजी-रोटी के लिए घर से बाहर निकले तो भी घर की देखभाल और भोजन बनाने से लेकर अन्य व्यवस्थाएं उसे ही देखनी होती हैं. पुरुषों की अपेक्षा उसका वेतन कम आँका गया है. शादी में कन्यादान, भाई दूज, रक्षा बंधन, शादी के बाद करवाचौथ इत्यादि त्यौहार उसे हर बात पर याद दिलाते हैं कि पुरुष के बगैरउसका कोई अस्तित्व नहीं. जेंडर विभेदीकरण का सबसे पुख्ता उदहारण है कि अनिवार्य रूप से लड़की माँ-बाप-भाई की पसंद से सजातीय विवाह करे ताकि समुदायों की शुचिता बनी रहे. वहअंतरजातीय विवाह न करे. इसके बरअक्स  दलित स्त्रीवाद अंतरजातीय-अंतरधार्मिक  विवाह को सामजिक बदलाव का अस्त्र मानता है, जो सामुदायिक पितृसत्ता को खंडित करता है. दलित स्त्री को अपने फैसले लेने की आजादी देता है. यह दलितों के आतंरिक जातिवाद का खंडन करता है और जाति,जेंडर, वर्ग, और योग्यता के ब्राह्मणवादी मापदंडों को खारिज करके समता-समानता, बंधुत्व और बहनापे की नींव पर प्रबुद्ध भारत के निर्माण का स्वप्न देखता है. दलित स्त्रीवाद परिवार में लोकतांत्रिक मूल्यों के सृजन का पक्षधर है. दलित साहित्यकारों में अंतरजातीय विवाह पर दो मत हैं. एक मत, जो पारम्परिक मनुवादी सोच पर अपना मत रखता है खासतौर से डॉ. धर्मवीर के चेले इस विचार का अनुशरण करते हैं कि हर लड़के लकड़ी की शादी अपनी जातियों में होनी चाहिये. यह मत ब्राह्मणवादी है जो स्त्री की यौनिकता पर पहरा लगाता है और उसकी गतिशीलता तथा चयन के अधिकार को नियंत्रित करना चाहता है. दूसरा,  अम्बेडकरवादी और दलित स्त्रीवादी मत स्त्री को अपनी मर्जी से किसी भी जाति-धर्म  में शादी करने व यौन सुचिता से आजादी देता है. दलित साहित्यकार स्त्रीलेखन को भी आसानी से सहर्ष स्वीकार नहीं करते क्योंकि दलित स्त्रियाँ जातिवाद के साथ-साथ पितृसत्ता एवं  मनुवाद की कट्टर आलोचक हैं.

 दलित साहित्यकारों/चिंतकों में दलित धर्म, दलित संस्कृति और दलित जीवनशैली पदों के प्रयोग पर मतभेद है. दलित वैचारिकी के आईने में आप इसे किस तरह देखती हैं?

 दलित साहित्यकारों/चिंतकों  का एक मत दलितों की श्रमण-आजीवक  परम्परा में यकीन करता है, जो नियतिवादी संप्रदाय था. तो दूसरा मत वैज्ञानिक जीवन शैली में. पहला मत मंगूराम, अछूतानंद ,रविदास,कबीरपंथ एवं अन्य संत परम्पराओं को जीवन शैली मानता है, परन्तु अम्बेडकरवादी बौद्ध जन-समाज के लोकतांत्रीकरण में विश्वास करता है. ये मत आत्मा-परमात्मा, भाग्य- दुर्भाग्य से पीछा छुड़ा  कर डॉ. आंबेडकर की २२ प्रतिज्ञाओं का अनुगामी हुआ. धम्म की शिक्षाओं, बुद्ध के विचारों और उनके समग्र जीवन से शांति, शील करुणा और सम्यक मूल्यों के अनुकरण में यकीन करता है. इसका लेखन इन्हीं के अनुरूप ढलता गया.दलित वैचारिकी के आईने में दलित लेखिकाएं दूसरे मत के करीब हैं. जहाँ  उनके अस्तित्व की स्वीकृति है और दार्शनिक बराबरी का भान है. हालांकि इन दोनों मतों में मौजूद पितृसत्ता की वे हमेशा आलोचक रही हैं और जब तक पितृसत्ता को समाप्त नहीं कर देतीं तब तक संघर्षरत रहेंगी.

अरुण कुमार प्रियम युवा एक्टिविस्ट और आलोचक हैं. सम्पर्क: 9560713852

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

सम्मान से नवाजे गए जमीन से जुड़े लेखक

साहित्य अकादेमी के सभागार में आज, 31 मार्च 2018 को ‘रमणिका फाउंडेशन सम्मान 7’ का आयोजन हुआ. ‘रमणिका फाउंडेशन सम्मान 7’ के अंतर्गत दो आदिवासी-विमर्श, दो दलित-विमर्श, एक स्त्री-विमर्श, एक साम्प्रदायिक सद्भाव व जनवादी लेखन तथा एक अनुवाद के लिए सात लेखकों को सम्मानित किया गया जिनके नाम निम्न हैं: विक्रम चौधरी (गुजरात), स्ट्रीमलैट डखार (मेघालय), मलखान सिंह (आगरा), सूरजपाल चौहान (नोएडा), गीताश्री (गाज़ियाबाद), सलाम बिन रज़्ज़ाक (महाराष्ट्र), सूर्य सिंह बेसरा (झारखंड).


इस आयोजन के मुख्य अतिथि, प्रसिद्ध कवि व लेखक, अशोक वाजपेयी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि बड़ा लेखक वह है, जो मृत्यु के बाद भी लिखता रहे और ऐसा तभी होता है जब उसकी रचनाएं मृत्युपर्यंत भी अलग-अलग पाठकों द्वारा पढ़ी जाएं और अलग-अलग तेवर में उसका निष्कर्ष निकाला जाता रहे. उन्होंने यह भी कहा कि लेखक को संस्कति, परम्परा बचाते हुए साहित्य लिखने से विरत नहीं होना है. भाषा पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा पर अत्याचार करने में– सरकार, मीडिया और जातिप्रथा सभी शामिल हैं. हमारा सार्वजनिक संवाद आजतक इतना झगड़ालू और असत्य कभी नहीं रहा. सच की भाषा आज अल्पसंख्यक हो गई है. लेखक समुदाय को सच की इस अल्पसंख्यता को समझना चाहिए. ऐसे वक्त में भाषा की मानवीयता, सत्यकथन,साहसिकता,विपुलता,सूक्ष्मता को बचाना साहित्य समाज का कर्तव्य है.जो लेखक अपने समय से महरूम रहेंगे,वे बहुत बड़ा लेखक नहीं बन पाएंगे. लेख वही है,जो दूसरों पर आरोप लगाने की बजाए खुद को कटघरे में खड़ा करे .हम रमणिका गुप्ता का आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने मुझे इस सम्मान समारोह में बुलाया

रमणिका फाउंडेशन व सभा की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि लेखकों का काम है दर्द का रिश्ता जोड़ना, मन से मन का रिश्ता जोड़ना. आज छद्म राष्ट्रीयता का हव्वा दिखाकर हमें हिंदुत्व की तरफ धकेला जा रहा है. लेकिन राष्ट्र अथवा राष्ट्रियता है क्या ? इसे भी परिभाषित करना होगा हमें. राष्ट्र केवल देश की सीमाएं ही नहीं होतीं, उसमे रहने वाले लोग भी राष्ट्र के दायरे में आते हैं. जनता के बिना राष्ट्र का क्या मतलब? आज छद्म राष्ट्रवाद के नाम पर हिंदुत्व परोसा जा रहा है. यह एक कटु सत्य है की भारत में राष्ट्रवाद की भावना अंगरेज़ लेकर आये थे. भारत तो रजवाड़ों का एक गुच्छ था. वे आपस में ही लड़ते रहते थे और अपने विरोधी से निपटने हेतु विदेशियों को बुला लाते थे. राष्ट्रीयता की भावना भारत में कभी थी ही नहीं. यहां राजशाही थी. अब आप लेखकों को यह फैसला करना है कि आप कौन-सी व्यवस्था चाहते हैं—सामन्ती, राजाशाही या समाजवादी?

भारतीय संस्कृति में पूजा करके ही दायित्व से मुक्ति पा ली जाती हैं, अनुपालन नहीं किया जाता. हमे निर्णय लेना होगा कि हम सामन्ती व्यवस्था चाहते हैं या जनवादी समाजवादी व्यवस्था. यह लेखकों को चुनना होगा. हमारे यहाँ संस्कृति और भाषा की अनेकता हैं, जिसे मित्रवत अनेकता की जगह शत्रुवत अनेकता में बदला जा रहा है.
गुलामी का स्रोत है – ईश्वर और धर्म. ये दोनों आपको तर्कहीन बनाते है. धर्म कहता है कि सोचो मत, आदेश का पालन करो . प्रश्न मत करो – यह धर्म का तकाजा होता है . लेखक को यह फैसला खुद करना है कि उन्हें तर्क के साथ चलना है या तर्कहीनता के साथ. संवेदनशीलता कभी तर्कहीन नहीं होती. लेखक को यह जिम्मेदारी उठानी है कि वह समाज को प्रबुद्ध बनाए . छद्म राष्ट्रवाद से बचें, नहीं तो कल आप नहीं बोल पाएंगे. जो हिंदूवादी गाय की पूजा करते है वे गाय को प्लास्टिक खाकर मरने के लिए सड़क पर छोड़ देते है और जब वह मर जाती है तो उसका मुर्दा भी नहीं उठाते है, दलितों को बुला कर उठवाते है किन्तु जिन देशों में लोग गाय खाते है वे लोग गाय को एयर कंडीशन में रखते है और सर्दी के मौसम में कंबल ओढा के रखते है .

दलित साहित्य पर भी हमने काम किया . आज दलितों को धर्म और भगवानवादी व्यवस्था से बाहर निकलने की दरकार है . दलितों को अपने श्रम की महत्ता को जानना होगा.

1998  पूरे देश से आदिवासी रचनाएं मंगवाना और उन्हें छापना शुरू किया, यह भी बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य था, लेकिन हमने ये चुनौती स्वीकारी. और 43 आदिवासी भाषाओं का अनुवाद करवा कर उनकी रचनाएं प्रकाशित की , जिनमे 15 पूर्वोतर की आदिवासी भाषाएं भी शामिल है.


हमने स्त्री मुक्ति के साहित्य को भी प्रकाशित किया. जिसके तहत 44 भाषाओं का अनुवाद करवाकर कविता एवं कहानी-संग्रह प्रकाशित करने का निर्णय लिया. इस परियोजना के तहत ‘हाशिए उलांघती स्त्री’ के नाम से दो काव्य-संग्रह, एक हिंदी भाषी कवयित्रियों का और दूसरा 43 भाषाओं की कविताओं का, ‘‘हाशिए उलांघती औरत’ कहानी श्रंखला में हिंदी के ३ खंड, बाकी 9 खण्डों की 22 कहानियां हम छाप चुके हैं, बाकी 22 भाषाओं की कहानियों का काम जारी है. दलित स्त्रियों ने मिलकर ‘स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण’ अंक निकाला. 2000 से हमने लेखकों को  सम्मान देने शुरू किए . आज हम साथ लेखकों को पुरस्कृत कर रहे हैं . प्रत्येक लेखक को प्रशस्ति-पत्र, 50,000 रुपये का चेक व शॉल द्वारा सम्मानित किया गया.



सोमदत्त शर्मा ने सम्मेलन में आए सभी लेखकों का स्वागत करते हुए कहा कि रमणिका फाउंडेशन का यह सम्मेलन ऐसे वक्त में हो रहा है जब हमारा देश और समाज हाशिए पर पड़े समूह, समाज, लेखकों पर एक हमला है. देश एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है और साहित्य इससे अछूता नहीं रह सकता क्योंकि साहित्य शून्य में पैदा नहीं होता , समाज की वास्तविकता के बीच ही जन्मता है. साहित्य की हर सरंचना को जनवादी सोच के साथ जोड़ना ज़रूरी है.

इन पुरस्कारों के अतिरिक्त वर्ष 2017 में युद्धरत आम आदमी पत्रिका में प्रकाशित अनुपम वर्मा की कहानी ‘बदसूरत’ को सर्वश्रेष्ठ कहानी सम्मान दिया गया, जिसके तहत उन्हें प्रश्स्ति पत्र, 5000 रुपये की राशि तथा शाल भेंट की गई.


पुरस्कृत लेखकों ने भी अपने-अपने अनुभव सबके साथ साझा किए —

गुजरात के चौधरी आदिवासी समूह की भाषा के लेखक विक्रम चौधरी ने कहा कि इस सम्मान को पाने से अब वे अधिक आंतरिक चिंतित  हो गए हैं क्योंकि सम्मान पाने से अब उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है, जिसे वो बखूबी निभाएंगे . वे पुरस्कृत राशी से मातृभाषा में लिखी कविताओं की किताब प्रकाशित करवाएंगे. आदिवासी भाषा में शिक्षा ना होने के कारण आदिवासी परम्परा, संस्कृति , ज्ञान और अस्तित्व खत्म होते जा रहे हैं. अत: मातृभाषा में शिक्षा होना जरूरी है . इन्होंने अपनी मातृभाषा में एक गीत भी प्रस्तुत किया .


पूर्वोत्तर के मेघ्लय की खासी भाषी लेखिका स्ट्रीमलैट ड्खार ने अपने वक्तव्य में कहा कि वे स्कूल के दिनों से लिखती-पढ़ती रही हैं. प्रतियोगिता में भाग लेने के कारण उन्हें लिखने की प्रेरणा मिलती गई और जब उनकी पहली किताब प्रकाशित हुई तब वह आगे लिखने के लिए प्रेरित हुई . उन्होंने रमणिका फाउंडेशन का तहेदिल से शुक्रिया अदा करते हुए फाउंडेशन कार्य को सराहा. उन्होंने बताया कि वे महाभारत का अनुवाद भी खासी में कर चुकी हैं. इस राशि का उपयोग भी वे अनुवाद में ही करेंगी.   पारंपरिक खासी गीत गाकर उन्होंने अपना वक्तव्य समाप्त किया .

उत्तर प्रदेश के दलित वरिष्ठ लेखक मलखान सिंह अपना अनुभव बांटते हुए कहते है कि वंचित समाज का जीवन जैसे पहले था, अभी भी वैसा ही है लेकिन आज वो सूली पर लटका हुआ है आज. ऐसे खतरनाक माहौल में वंचित समुदाय के साहित्य को सम्मान करना एक साहसिक कदम है . उन्होंने सम्पूर्ण समाज की तरफ से रमणिका फाउंडेशन का आभार प्रकट किया और कहा कि वे सम्मान से प्राप्त राशी से 25 हजार रूपये आम्बेडकरवादी लेखक संघ को दलित लेखकों को संगठित करने हेतु देंगे  .

दिल्ली के दलित लेखक सूरजपाल सिंह चौहान ने अपने जीवन के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि लोग आज भी अपनी जाती छिपाते हैं. दलितों में हीन भावना नहीं जा रही है . गैर दलितों के भीतर भी दलितों के प्रति अभी तक सम्मान भावना पैदा नहीं हुई है. दलितों को अपना सम्मान खुद पाना है . उन्होंने भी अपनी कविता ‘मेरा गांव’ पढ़कर अपना भाषण समाप्त किया.


लेखिका गीता श्री किसी कारणवश अपना पुरस्कार लेने के लिए उपस्थित नहीं थी, उनकी अनुपस्थिति में रश्मि भारद्वाज ने गीता श्री का पुरस्कार ग्रहण किया. गीता श्री जी ने अपना वक्तव्य लिख कर भेजा था, जिसे रश्मि भारद्वाज ने पढ़ा. उन्होंने सावित्री बाई फुले के नाम से सम्मान मिलने पर ख़ुशी जताई. हर स्त्री का जीवन कंटीला होता है जो मुक्ति की राह पर चलती हैं. हर पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को आसन रास्ता देती चलती है, सावित्री बाई फुले ने यही किया- महिला शिक्षा की मशाल उठाकर. उन्होंने आगे लिख कि आज वे चुनौती, बेचैन और ख़ुशी तीनों महसूस करत हैं पुरस्कार प्राप्त कर. आज भय का आलम यह है कि कई स्त्रियों स्त्री-विमर्श का ठप्पा अपने से हट रही हैं . यदि स्त्रीवादी लेखन करना गुनाह है, तो यह गुनाह उन्हें पसंद है.

अनुवादक सलाम बिन रज्जाक साहब ने कहा कि यह उनका हिंदी का पहला पुरस्कार है, जिसके लिए रमणिका फाउंडेशन के आभारी है. लेखन का सिलसिला चलते रहना चाहिए, रुकना नहीं चाहिए. रमणिका फाउंडेशन दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों के लिए बहुत अच्छा काम कर रही है. लेखक अपने जमाने की चिड़िया है, जो सबसे अधिक संवेदनशील होती है. इंसान के अंदर का दर्द ही उसका निर्वाण है.

सूर्य सिंह बेसरा ने अपने अनुभव बांटते हुए कहा कि रमणिका फाउंडेशन के साथ मेरा दिली रिश्ता है. यह मेरा व्यक्तिगत सम्मान नहीं बल्कि पूर्ण संथाली साहित्य का सम्मान है. मैं  फाइटर से राइटर बना. मैं इस राशी का उपयोग संथाल विश्वविद्यालय के बच्चों की किताबों पर करूँगा . जहाँ राजनीती में आप फिसल जाते है वहां साहित्य आपको संभाल लेता है .

पंकज शर्मा ने फाउंडेशन की रिपोर्ट पढ़ी और फाउंडेशन की 1997 से लेकर 2018 तक की 20 वर्षों की यात्रा का ब्यौरा दिया. इस पूरे कार्यक्रम का संचालन सम्पादक, युद्धरत आम आदमी, सूरज बड़त्या ने किया.
रमणिका फाउंडेशन की सदस्य अर्चना वर्मा ने कहा कि आप सभी यहाँ आए, कार्यक्रम का सम्मान बढ़ाया और रमणिका फाउंडेशन को अधिक मजबूत बनाया, इसके लिए आप सभी का धन्यवाद .


कार्यक्रम में दिवंगत हुए केदारनाथ सिंह, सुशील सिद्धार्थ, रजनी तिलक और पीटर पॉल को श्रद्धांजलि देते हुए दो मिनट का मौन रखा गया. 

सुमन कुमारी 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

श्री श्री की कविताएँ

श्री श्री 


विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ,कहानियां, आलेख प्रकाशित. . सम्पर्क:  shreekaya@gmail.com 

1.
कई बार ज़मीर इतना जिद्दी हो जाता है
जैसे किसी पुरानी इमारत की सीढ़ियां
और आखिरी सीढ़ी तक पहुँचते हुए
हम अपने भीतर से
कई आवाज़ों को बेदखल कर देते हैं
बातचीत के टुकड़ो में षड्यंत्र की उबकाई
और कोहराम करती किसी तीसरी दुनिया की रोशनी
धीमी गति से हमारे करीब आने लगती है
लेकिन हमेशा मृत
उतनी मृत जैसे मेरी कॉफी का खाली मग
बुझी सिगरेट की बची राख
और जिस्म को घायल करती प्रेम की क्रूरता
मुझे पागलपन की हद तक हँसी आ जाती है
आत्मा के जिस्म को क्षुद्रता से तबाह करने वालों पर
उन लोगों पर भी
जो जीवन के दुखों को प्रेम नहीं कर पाते
हार जाना चाहते हैं उसे जुए में
और त्याग नहीं पाते
अपने ऐतिहासिक प्रेमी
सीलन भरी माएँ
और बर्फ हो चुके पिताओं को
स्वप्न जब भी टूटते हैं नींद में
हम बेदखल हो जाते हैं अपने समीकरणों से
मात्र घटना बन जाते हैं अतीत की
और यह भी
कि कभी-कभी कोई घाव
हमें जगाए रखे सदा के लिए
कि रोना रोशनी बन जाए
और रोशनी गुमराह कर दे हमें
मरियम के पीछे
चुपचाप चलने की ग्लानि को
हम कह सके सच्ची विदा

2.
तुम्हें अपने पुरखों की आँखें विचित्र एकांत में चूमनी थी
तुमने मेरी पीठ का तिल चूम लिया
मुझे यह तुम्हारी असभ्य क्रूरता लगी
तुम्हें अपने अस्तित्व से बाहर की लड़ाई में किसी अंधे को दृष्टि देनी थी
तुमने घोर निराशा से ग्रस्त
अपना प्रेम देने के लिए मुझे चुन लिया
अशरीरी सभ्यता में तुम्हारा नाम एक मजाक है
नीरो की गलतियां तुम्हें लुभाती रही
इतिहास को पढ़ने की दौड़ में
तुम प्रेम कविताएं लगातार अपने तलवों के नीचे जमा करते गये
शरद ऋतु के आरंभ में तुम्हारे मुँह से निकला खून
तानाशाह की जबान सदियों से बोलता आ रहा है
तुम बेफिक्रे सुनामी की तरह
कितना कुछ खुद में समा लेना चाहते हो
स्वस्तिक चिन्ह तुम्हारी कालिमा को
अब तक जीवित रखे हुए है
यह मृत संसार है
और चर्च के घंटे हमेशा हवा की लहरों पर शोर करते रहते हैं
तुम्हें सांत्वना चाहिए
और मुझे तुम्हें दो टुकड़ों में बांटना है



3.
कमल पुष्पों की सौहार्द स्निग्धता में
चावल और रोली की कलश आहुति चलती रही
होता रहा श्रृंगार रक्ताभ चरित्रों से
अग्निवाहक सिन्दूर मथुरा से भाई लाया
और लाल धोती माँ के पीहर से आई
केले के पत्ते और लौंग से बंधी
यह विशिष्ट संस्कार था मृत देह का
मृत और अंतिम ध्वनि में बची स्मृति कोष्ठकों का आलाप था
चन्दन लकड़ी से मृत स्वप्नों को दीप्तिमान किया
गंगाजल से परिक्रमा के धागे बांधे
मगर खुलते गये तिमिर के नयन कमल
प्रतीक्षा कब से आहत थी
यह तुम न जान सके कभी
और सुना था इस मृत देह के पार भी होता है
देह का एक आश्रम
जहाँ धान
कपास और प्रेम सब उपजता है अपनी कंदराओं में
मेरे मोह के अश्रु जब न बींध पाये तुम्हारा हृदय
तो इसी परिणिति में होना था प्रेम का आरम्भ
खुलनी थी
वह गांठे जिनमें तुम्हारा निर्दोष संयम बंधा था
क्या तुम नही थे विदेह की गाथा के प्रथम बिंदु
और
मैं सारांश इस कथा की

4.
बची रहेगी प्रेमियों में आत्मीयता
जब तक जाड़ा रहेगा हल्का भी
ज़रूरी है एक अभ्यास
निकट आने का उनमें
ताप और अलाव के मध्य
चाय का एक गर्म प्याला
सर्द चुम्बन की जुम्बिश
स्मृति के जड़ों में
अगले मौसम तक
यूँ ही स्थिर रहेगी

5.
प्रेम मेरे पुरखों की आँखों का आँसू था
जो बिना गिरे ही
उनकी चिताओं में जल गया
तब से मेरा किया तर्पण श्रापित है
और मेरा शरीर
मेरी मौन प्रार्थनाएँ


6.
तुम्हे लौटना होगा
अपनी यौन इच्छाओं के साथ व्याकुल देह को रिक्त कर
मुझसे आसक्ति के बंधन का निर्वाह करना होगा
क्यों तुम मेरी मादक आत्मा की राह में खड़े हो
उतर जाओ
उन खाली सीढ़ियों से.
अपने डूबता हृदय को संभालो

सुनो
जासूसी उपन्यास पढ़ने वाले
मैं एक गौरैया हूँ
मेरे स्वर में ताज़ा और सुगन्धित मधु है
और मैंने हत्या की है उन छोटे प्राणियों की
जिन्होंने मेरे स्वर को इतना तल्लीन बनाया है
करनी पड़ी हत्या
क्योंकि उनका प्रेम मुझे डसता था
पर मैं कसम खाती हूँ
मुझे दुःख हुआ था
बस इतना ही जितना तुम्हारी हत्या करने में होता
तुम्हारा संहार कर मुझे तृप्ति मिलेगी
मैं सच कहती हूँ.
हुगली नदी का जादुई जल मेरे हाथ में है
उस जल की सौगंध
बताओ किस रीति से हत्या करू तुम्हारी
क्या बर्बाद कर दूँ तुम्हारी उम्र
या किसी बंगाली बाबा से पुड़िया ले आऊं
ताकि तुम्हे खिला सकूँ मिष्टी दोई और चाय के साथ
मैंने गिरीश घोष से जड़ी-बूटी तो खरीद ली है
तुम्हारे यौनिक भूत की पिपासा का अंत करने के लिए
गिरीश घोष ने पान खाते हुए मुझे सब विधि समझाई
कि प्रेम का अर्थ बहुत गहन होता है
भूत की लकड़ी के तंत्र से कही ज्यादा गहरा और असरदार
इस लकड़ी का काढ़ा कड़वा होता है थोड़ा
तो तुम अपनी जिव्हा की नोक से चखना
और अपने स्वर का मधु मिला देना
हत्या के बाद मुझे सच में कोई ग्लानि नही हुई
खाती हूँ तुम्हारी कसम
मेरे भटकते प्रेमी
तुम्हारी सूनी आँखे सदा मेरी स्मृति में रहेंगी

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

कल्पना पटोवारी द्वारा गाया गया और नवल कुमार द्वारा लिखित गीत कॉमनवेल्थ गेम्स में गूंजेगा

अागामी 4-15 अप्रैल के बीच अस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट शहर में कॉमनवेल्थ गेम्स के समारोह में प्रतियोगिता में शामिल सभी देशों की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाएंगे। इसमें भारत की तरफ से प्रख्यात लोक गायिका कल्पना पटोवारी भी भाग लेंगी और वे फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार द्वारा लिखा गया गीत प्रस्तुत करेंगी।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 में प्रख्यात लोक गायिका कल्पना पटोवारी की आवाज में गूंजेंगा ‘तिरंगा प्यारा’ गीत



कॉमनवेल्थ गेम्स, 2018 के समारोह में  प्रस्तुत किए जाने वाले नवल किशोर कुमार द्वारा लिखित गीत का शीर्षक ‘तिरंगा प्यारा’ है, जिसकी थीम भारत की नदियों और संबंधित संस्कृतियों पर आधारित है। गीत की शुरूआत आसामी लोकगीत देऊड़ी गीत से होती है। इसके बाद भिखारी ठाकुर और बाबू रघुवीर नारायण के भोजपुरी गीत को शामिल किया गया है। वहीं गीत के मुख्य हिस्से का लेखन नवल किशोर कुमार ने किया है।  गीत को कल्पना पटोवारी के साथ बीरेन देवड़ी और सेतु सिंह ने आवाज दी है। तकनीकी सहयोगियों में काकुल भारली, संग्राम लोहार और निप्पू खुंद आदि शामिल हैं। इस गीत को म्यूजिक बॉक्स नामक संगीत कंपनी ने तैयार किया है। संगीत कंपनी ने अपने यूट्यूब चैनल उपरोक्त गीत का प्रोमो जारी कर दिया है

देखें वीडियो :  ‘तिरंगा प्यारा’



नवल किशोर कुमार मूलरूप से बिहार की राजधानी पटना के रहने वाले हैं। कंप्यूटर टेक्नोक्रेट के रूप में कैरियर की शुरू करने वाले नवल ने 2007 में पत्रकारिता की शुरूआत की। प्रारंभ में वे पटना से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र सन्मार्ग और आज अखबार से जुड़े। फारवर्ड प्रेस से उनका जुड़ाव 2012 से है। उन्हें बिहार के पहले हिन्दी न्यूज वेब पोर्टल ‘अपना बिहार डॉट ओआरजी’ की स्थापना (2007) करने का भी श्रेय प्राप्त है।

गौरतलब है कि चर्चित लोकगायिका कल्पना पटोवारी मूल रूप से आसाम के गुवाहाटी जिले के बरपेटा की रहने वाली हैं। उन्होंने तीस से अधिक भाषाओं में गीत गाये हैं। उनकी विशेष पहचान भोजपुरी लोकगायिका के रूप में है। उन्होंने द लीगेशी ऑफ भिखारी ठाकुर के जरिए भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर के गीतों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत किया। साथ ही एंथोलॉजी ऑफ बिरहा के जरिए उन्होंने बिहार और उत्तरप्रदेश के लोक संगीत के इस विधा के विभिन्न आयामों को समग्रता में पेश किया है।

फॉरवर्ड प्रेस से साभार 


स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

सामाजिक क्रांति के लिए आवश्यक सावित्रीबाई फुले के महत्वपूर्ण दस्तावेज

विद्याभूषण रावत 


सावित्री बाई जोतिबा  फुले भारतीय इतिहास में सर्वोत्तम युगल के तौर पर कहे जा सकते है. भारतीय समाज में यदि फुले दम्पति के कार्यो को भली प्रकार से समझ लिया और अपना लिया तो अहिंसात्मक  क्रांति अवस्यम्भावी है. पिछले कुछ वर्षो में ज्योति बा फुले के विचारो के विषय में विभिन्न लोगो ने लिखा है लेकिन सावित्री बाई फुले के विचारो और कार्यो के बारे में बहुत कम जानकारी है. अधिकांशतः लोग उन्हें जोतिबा फुले की पत्नी के तौर पर जानते है हालाँकि ये उनके विशाल व्यक्तित्व के साथ अन्याय है.


सामाजिक आन्दोलनों को समर्पित रही हमारी अम्बेडकरवादी साथी रजनी तिलक को इस बात के लिए धन्यवाद देना पड़ेगा के उन्होंने सावित्री बाई फुले की रचनाओं, लेखो और जोतिबा  फुले को लिखे उनके पत्रों को संकलित कर ‘सावित्रीबाई फुले रचना समग्र’ नमक पुस्तक के तौर पर प्रकाशित की है जो हिंदी के पाठको के लिए बहुत ही अनमोल है. इस संकलन में सावित्रीबाई फुले द्वारा रचित कवितायें है, फिर उनके जोतिबा  को लिखे तीन पत्र और उनके पांच महत्वपूर्ण भाषणों की शामिल किया गया है.

इस संकलन को पढ़कर सावित्रीबाई फुले की बहादुरी और उनकी सैधान्तिक ताकत की जिसने उन्हें भारत की सबसे क्रन्तिकारी सामाजिक कार्यकर्त्ता बनाया. उनकी कविताएं हमें उनके विचारो की विशालता का दर्शन कराते है जिनमे न केवल अन्धविश्वास के विरुद्ध उनकी लड़ाई है अपितु लोगो से उसको मुक्त करने हेतु उनके सुझाव भी हैं. शुद्रो को अन्धविश्वास छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए और उसके लिए आवश्यक है अंग्रेजी भाषा का ज्ञान . उस ज़माने में भी एक साधारण शिक्षा प्राप्त महिला ये समझ चुकी थी के भारतीय शिक्षा शुद्रो को शोषित रखने का एक षड़यंत्र है. उनकी कविताओं को पढ़कर हम उनकी वैचारिक क्षमता और उनके चिंतन की दिशा को समझ सकते है . अपनी कविता अज्ञानता में वह कहती है:

‘ एक ही दुश्मन अपना,
खदेड़ दे उसे हम, सब मिल कर,
उससे ज्यादा खतरनाक न कोई,
खोजो खोजो मन की भीतर झांको,

बताओ तो खोजा क्या अपना दुश्मन,
खोजो तो कहाँ है वह हमारा दुश्मन,
सोचो सोचो बताओ बच्चो,
क्या नाम है उसका ?
नहीं पता कौन है दुश्मन ?
क्या तुमने प्रयास किया,
क्या तुम्हारा प्रयास विफल हुआ,
क्या तुमने खुद ही मान ली हार,

चलो चलो मैं बताती हूँ,
उस दुष्ट खतरनाक दुश्मन की पहचान,
ध्यान से सुनो उस दुश्मन का नाम,
उस दुश्मन को कहते हैं अज्ञान’

मैं समझता हूँ को आज के दौर में जब दुश्मन शब्द पर इतना जोर है, जब दुश्मन के माने पाकिस्तान, मुसलमान, दलित, आदिवासी बना दिए गए हो तो सावित्रीबाई फुले ये शब्द क्रांति से कम नहीं है और आज भी इसको दोबारा से हमारे बच्चो और बुजुर्गो के दिमाग में डालने की जरुरत है. ऐसी कितनी ही कविताएं इस संकलन में हैं जो आज के समाज को दिशा देने में बहुत सहायंक हो सकती है और शायद फुले दम्पति को भी भली प्रकार से समझने में काम आये.

अपने पति, मित्र, गुरु ज्योति बा फुले को सावित्री बाई के तीन पत्र इस संग्रह में शामिल किये गए है उनको प्रेम के अप्रतिम भेंट कह सकता हूँ. उनके पत्रों में केवल और केवल समाज की चर्चा है. वो इतने भावविभोर कर देने वाले है के आप अंदाजा लगा सकते है के दोनों के मध्य कितना मधुर सम्बन्ध था और कैसे सावित्री बाई ने अपने पति का कर कदम पर साथ दिया और कैसे ज्योति बा उनके साथ खड़े रहे. दूसरो को बदलने से पहले अपने घर में वो परिवर्तन नज़र आना चाहिए और वो कार्य ज्योतिबा फुले ने किया और सावित्री बाई फुले ने उस महान कार्य को आगे बढ़ाया. बेहद की खुबसूरत इन पत्रों में आप उन भावनाओं को समझिये जो सावित्रीबाई व्यक्त कर रही है.

जोतिबा और सावित्रीबाई फुले



29 अगस्त १८६८ को नाथ् गाँव खंडाला, जिला सतारा से ज्योतिबा को लिखे अपने पत्र में सावित्री बाई गाँव की एक घटना का जिक्र करते हुए कहती है :

गांव में गणेश नाम का पुरोहित अक्सर आता था. वह गाँव गाँव क़स्बा कस्बा घूम घूम कर ग्रामीणों को पंचांग पढ़ कर सुनाता था, भविश्यवाणी करता था, नक्षत्र देखकर अनपढ़ लोगो को उनकी किस्मत देखता था और अच्छे बुरे बता कर दक्षिणा लेकर, पूजा पाठ करके उनसे पैसे लेकर अपना पेट पालन का काम करता था.


हमारे गाँव की हाल ही में युवा अवस्था में कदम रखने वाली सारजा नाम की युवती उससे आकर्षित हो गयी और उसकी बातो में आकर उससे प्रेम कर बैठी. न केवल दोनों प्रेम कर बैठे बल्कि उन दोनों ने शारीरिक सम्बन्ध बना लिए जिसके चलते लड़की छः माह की गर्भवती हो गयी.  सारजा के शारीरिक बदलाव को देखकर लोगो के बीच कानाफूसी होने लगी. दोनों के बीच सम्बन्ध का आभास होते ही गाँव के दुष्ट किस्म के मनचलों ने दोनों पर हमला बोल दिया. सरे आम दोनों को घेर कर उनकी अव्नामानना की उनकी निर्दयता से पिटाई की. गाँव की सडको पर दौड़ा दौड़ा कर उनकी दुर्गति कर डाली यहाँ तक कि उन लोगो ने जान से मार डालने की कोशिश की. जैसे ही मुझे इस घटना का पता चला मैं सब काम छोड़ कर उधर ही दौड़ कर पहुंची. मार काट पर उतारू लोगो के बीच मैं खड़ी हो गयी और उन्हें अंग्रेजो के शासन और कानून के बारे में बताया . मैंने उन्हें डराया के इनकी हत्या करने पर तुम्हे सजा मिलेगी. तरह तरह से समझाते हुए  मैंने क्रूर भीड़ को हत्या करने से रोका. इस कुक्र्त्य से उनका मन शांत करके उधर से ध्यान हटाया . मेरे  बीच बचाव के बाद गाव के सदु भाई ने दोनों को धमकाते हुए अपना फैसला सुनाया के , ‘ सरजा ने इस पुरोहित वामन की बातो में आकर ने केवल अपनी इज्जत मिटटी में मिला दी बल्कि इसने गाँव की इज्जत भी  मिटटी में मिला दी. अतः हमारा ये फैसला है के दोनों हमारा गाँव छोड़ कही भी चले जाएँ . उसके इस फैसले को स्वीकार कर लिया गया . हालाँकि गाँव वालो ने उन दोनों की जान बचा लेने के मेरे प्रयास पर हैरानी जताई.

सरजा और पुरोहित अपनी रक्षक, काल के मुंह से निकालने वाली आदि माता समझ कर मेरे पांवो पर गिर कर बहुत रोये. उनका रुदन थम नहीं रहा था. मेरे समझाने पर दोनों थोड़े संयत हुए. मैंने दोनों को आपकी शरण में भेज दिया है.उम्मीद है इस घटना की जानकारी मिलने के बाद आप उनकी कही रहने की व्यवस्था कर देंगे. अंत में बस इतना ही मैं आपको बताना चाहती थी.”


ये पत्र पढ़ कर आप अंदाज लगा सकते हैं के सावित्री बाई और जोतिबा  का रिश्ता कैसा था और किस प्रकार से दोनों की इंसानी रिश्तो और उनके मानवाधिकारों के प्रति गहन निष्ठां थी. सावित्रीबाई और जोतिबा  बा ने ब्राह्मणवाद के पुरे तंत्र का पर्दाफाश  किया लेकिन अपनी मानवीय मर्यादाओं में उन्होंने गरीब और उत्पीडित ब्राह्मणों की रक्षा करने में कोई कोताही नहीं की. इस पत्र में ब्राह्मण युवक के खिलाफ वह कोई जहर नहीं उगलती अपितु उसकी करतूतों की आलोचना करते हुए भी दोनों लोगो को  भेज देती है. आज से करीब  150 वर्ष पूर्व एक महिला दो व्यक्तियों के चाहत के लिए समाज के सामने खड़ी हो गयी और उसके पति ने उसका पूरा साथ दिया, ये दिखाता है के दोनों के मध्य कितना प्रेम और विश्वास था तथा भीड़ के न्याय देने की कोशिश का सावित्रीबाई ने कैसे विरोध किया . आज जब प्रेम विवाहों पर हमारी खाप पंचायतो के फतवे चल जाते है और लोग अपने ही बच्चो को जान से मार देने में कोई शर्म और अपराध नहीं महसूस करते, उन्हें सावित्री बाई से सीखना चाहिए के लोगो का जीवन बचाने के लिए क्या किया जाए. ऐसा विश्वास केवल उन लोगो में हो सकता है जो ईमानदारी से अपने कार्य कर रहे है और जिन पर लोगो का भरोषा होता है. आज समाज में ऐसे कार्यकर्ताओं की कमी है क्योंकि वैचारिक ताकत नहीं है और छोटे छोटे पद, पैसे के लालच में हम वो ताकत नहीं ला सकते जो सावित्रीबाई ने दिखाई. इस महत्वपूर्ण प्रत्र से ये भी पता चलता है के सावित्री बाई मात्र गाँव में स्कूल नहीं चलाती थी अपितु समाज को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थे और उनकी राजनैतिक और सामाजिक समझ बहुत परिपक्व थी.

राजनीतिलक



एक अन्य पत्र में सावित्री बाई अपने मायके का जिक्र करती है के कैसे उनका भाई ज्योति बा की आलोचना करता रहता है और बताता है के अछूतों के लिए कार्य करने का कारण समाज ने आपका बहिष्कार किया क्योंकि आप पाप कर्म कर रहे हो.’ साधारणतः ऐसे वाकये हमारे घरो में आते है जब हमारे नाते रिश्तेदार हमारी सोच का विरोध करते है लेकिन आपका अपना भाई या पिता विरोध करे तो बेहद दुःख होता है. सावित्री बाई इस पत्र में ज्योति बा को बता रही है कैसे उन्होंने अपने भाई को बदला. अपने भाई के लिए वो लिखती है , ‘ आपकी मति ब्राह्मणों की चाल की शिकार हो गयी है . उनकी घुट्टी पी पी कर, उनके पाखंडी उपदेश सुन कर आपकी बुद्धि दुर्बल हो गयी है और इसी करान आपके स्वयं के विवेक ने काम करना बंद कर दिया है, एक तरफ आप इतने दयालु बनते है के बकरी गाय को खूब प्यार करते है, उन्हें दुलारते है, नागपंचमी के त्यौहार में विषैले सांपो को दूध पिलाते है, ये कृत्य आपके लिए धर्म सम्मत है और महार मांग अपने जैसे इंसानों को तुम इंसान नहीं समझते. उनसे तुम परहेज करते हो, उन्हें अछूत, अस्पर्श्य समझ कर दुत्कारते हो. क्यों करते हो ऐसा. क्या तुम नहीं जानते के ब्राह्मण लोग तुम्हे भी अछूत ही समझते है. हमारे स्पर्श से भी उन्हें नफरत है.’


ये पत्र पढ़कर आप समझ जाईये के ज्योतिबा की एक एक बात सावित्री बाई ने अपने मनमस्तिष्क में रख ली और उन्हें अपने पति को अपने कार्य को बताते हुए असीमित ख़ुशी और कौतुहल है . कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इन पत्रों के अन्दर छुपी भावनाओ को समझेगा तो बदलाव आएगा. और ये सब पूरे १५० वर्ष पूर्व और वह महिला जिसने ने विद्यालय देखा था न कुछ और.

इस पत्र में वह आगे लिखती है :  ‘ मैंने अपने भाई से यह भी कहा के मेरा पति तुम्हारे जैसे लोगो में से नहीं है, जो धर्म यात्रा के नाम पर पंढरपुर तक पैदल हरी नाम जपते हुए चलता जाए और अपने लिए पुण्य कमाने का ढोंग करे. वे असली और सच्चा काम करते है, मानवता को जिन्दा रखते है, अनपढो को पढ़ा लिखाकर, उन्हें ज्ञान देकर उनके जीवन में रौशनी भरते है, उनमे स्वाभिमान जगा कर जीने की राह दिखाते है . यही सच्चा रास्ता है. उनका ध्येय अब मेरा भी ध्येय बन गया है . लोगो को शिक्षित करने में मुझे बहुत शांति मिलती है, स्त्रियों को पढ़ाने से मुझे खुद को प्रेरणा, प्रोत्साहन और उर्जा मिलती है . यह काम मुझे ख़ुशी देता है . इससे मुझे सुख शांति, आत्मतृप्ति मिलती है . ये ही वो काम है जिसमे इंसानियत और मानवता दीख पड़ती है’.


इस पत्र से साफ़ दीखता है के सावित्री बाई पर ज्योतिबा का कितना प्रभाव है और विश्वास है. ये भरोसा  सबसे बड़ी चीज है किसी रिश्ते को मज़बूत करने में जब आपके रिश्तेदार, आपका अपना भाई भी आपका विरोधी हो जाए और आपके सामाजिक सरोकारों का मजाक उडाये लेकिन अगर सावित्री बाई के उत्तर देखे तो वो हरेक को निरुत्तर कर देती है. उनके में ज्ञान देने के लिए बड़ी बड़ी बाते नहीं है अपितु नैतिकता, ईमानदारी की वो बाते है जो हम सब जानते है लेकिन करते नहीं है. दूसरी बड़ी बात ये के दोनों आन्दोलन के साथी है इसलिए वो जो देखे उसी आधार पर बात रख रहे है. जिस प्रेम पूर्वक वह अपनी पूरी बातो को ज्योति बा के सामने रख रही है वो दिखाता है उन्हें अपने पति पर कितना गर्व है और उससे भी जरुरी के उनकी समझ कितनी पैनी और साफ़ हो चुकी है. आज अगर हर परिवार में पहले स्वयं को बदलने की चाहत होती तो हमारा समाज बहुत बदल गया होता.

इस पुस्तक में सावित्री बाई फुले के पांच भाषणों को भी शामिल किया गया है जो नितांत जरुरी है. ये बहुत साधारण भाषा में, जो गाँव के किसान, मजदुर, महिलाओं की समझ आ सकती है. अगर हम उनकी पूरी सोच को देखे तो वह निहायत ही व्यवहारिक है. उनके विचारो में ब्राह्मणवाद पर कुठारघात है तो अपने समाज को बदलने के लिए भी तैयार कर रही है. वो लोगो की पूजा विधि पर हमला नहीं करती लेकिन अन्धविश्वास को लेकर लोगो को समझाती है और धर्म के नाम पर पाखंड को वह बहुत साधारण भाषा में लोगो को समझा देते है. वह लोगो को मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है :

“काम धंधे, उद्यमशीलता ज्ञान व् प्रगति का प्रतीक है. इस कार्य में सामूहिक श्रम का महत्व है तो आलस्य, भाग्य विधाता, किस्मत, प्रारब्ध का निशेध उद्योगी इन्सान अपने सुख सुविधा  में बढ़ोतरी करते हुए, अन्य लोगो को भी सुखी करने का प्रयास करता है. ठीक इसके विपरीत देव देवतावादी, भाग्यवादी, किस्मत और भगवान के भरोसे जीने वाला व्यक्ति आलसी व् मुफ्तखोर होने के कारण हमेशा के लिए दुखी रहता है तथा वह अन्य लोगो की सुख शांति को मिटटी में मिलाने का काम करता है. आलस्य ही गरीबी का पर्याय है. ज्ञान, धन, सम्मान का आलस्य दुश्मन होता है. आलसी आदमी को कभी भी  धन, ज्ञान और सम्मान नहीं मिलता. लगातार परिश्रम, इच्छा शक्ति, सकारात्मक सोच बल पर ही सफलता मिलेगी, निश्चित रूप से मिलेगी, ऐसा मेरा यकीन है .


अपने एक भाषण विद्या दान में वह  कहती है :
परम्पराओं और पुरखो से मिले ज्ञान को अर्जित कर जिन कारीगरों ने श्रमजीवी मेहनतकश जनता ने, अपने कार्य में महारत हासिल कर भारत देश को समृद्ध बनाया है, उन लोगो की कुशलता, वास्तु निर्माण का ज्ञान एवं कलात्मकता आदि गुणों की अनदेखी कर  राजाओं ने राज किया, अपनी तिजोरी भरी किन्तु शुद्र अतिशुद्र जनता की उन्नति की और कतई ध्यान नहीं दिया.  शुद्र अतिशुद्र जाति के लोग स्वाभाव से सीधे सादे एवं अनपढ़ होने की वजह से  वे निहायत मुर्ख बने हुए है. उन्हें यदि न समझाया जाए और उपदेश न दिया जाए तो  वे आप होकर आगे बढ़कर खुद के दिमाग, हिम्मत एवं होसले से कोई भी उद्योग करने से कतराते है. उनका स्वाभाव भी मिलनसार न होकर बुरा होता है. . उन्हें अपने व्यक्तित्व में किस प्रकार सकारात्मक सुधार किया जाये, किस तरह अपनी प्रगति एवं विकास योजना बनाकर उस पर अमल करे , इस बात का ज्ञान जानकारी एवं प्रशिक्षण न होने के कारणों से  वे अज्ञानता की वजह से आधे भूखे रहने हेतु तो कभी कभी पूर्ण रूप से  भूखे रहने के लिए विवश है.  शुद्र अति शुद्र जनता हेतु सम्मानजनक आजीविका का रास्ता सरकार को पहल लेकर खोजना होगा.

विद्याभूषण रावत



सावित्री बाई फुले ने ज्ञान, उद्योग, कर्म, व्यसन, नेक आचरण आदि सभी बातो पर लोगो को आगाह किया. जहाँ उन्होंने सरकार से अपने अधिकारों को लेने की बात कही वही समाज में भी बदलाव की बात की. किसानो को वो कर्जदारी से दूर रहने की सलाह देती है और कहती है के कर्ज लेना सभी अनर्थो का मूल है और कर्ज अच्छे भले इंसान को समग्र रूप से दिवालिया बना देता है.’


क्या हम कभी सोच सकते है के ग्रामीण परिवेश में बढ़ी हुई महिला जिसने स्कूल भी न देखा हो इतनी परिपक्वता से बात करते हो और वो भी आज से पूरे १५० वर्ष पूर्व. फूले दम्पति हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा आदर्श है के कैसे पति पत्नी मिलकर समाज बदलाव में सबसे बड़ा योगदान दे सकते है. मैं समझता हूँ सावित्री-ज्योति बा के प्रेम की कहानी शायद किसी भी सीरी-फरहाद या लैला मजनूँ से बड़ी प्रेम कहानी है क्योंकि उनकी प्रेम कहानी में रोमांस सामाजिक क्रांति से है. वो किसी सरकार का तख्ता उलट देने की कहानी नहीं कह रहे, वो किसी के प्रति घृणा और नफ़रत नहीं फैला रहे अपितु वो अज्ञानता को दूर करने के लिए साथ मिलकर लड़ रहे है. दोनों आपस में इतने बड़े विश्वास और प्रेम से जुड़े है के समाज के हर कटाक्ष या चुनौती को सीधे से झेलने को तैयार है.

फुले दम्पति ने समाज के हर तबके तो छुआ क्योंकि वे जानते है के समाज का विकास सबके बदले विना हो नहीं सकता. जहाँ सावित्री बाई फुले ने उस्मान शेख की बहिन् फातिमा शेख को शिक्षा प्रचार प्रसार में शामिल किया वही काशीबाई नामक एक ब्राह्मण विधवा महिला के बच्चे को गोद लिया और बड़ा कर समाज में सम्मान दिलवाया. इन सभी कार्यो में जो महत्वपूर्ण बात है वह है सकारात्मक सोच और समाज से जुड़ने के लिए रचनात्मक कार्यो में पहल. आज के दौर में रचानात्मक कार्यो को भुलाकर जो जुमलेवाजी चल रही है वो समाज को कही भी आगे नहीं ले जायेगी. लोग समाज तक नहीं पहुँच रहे है और केवल इवेंट मैनेजमेंट से प्रसिधी पाने का जरिया ढूंढ रहे है. समाज बदलाव से प्रसिधी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है. सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले की जिंदगी हम सब के लिए एक बहुत बड़ा उदहारण है.

रजनी तिलक ने सावित्रीबाई फुले के जीवन के इन उनछुये पहलुओ को हमारे सामने लाकर एक बहुत बड़ा काम किया है. बहुत सी बाते केवल मराठी तक सीमित थी और उनका हिंदी अनुवाद श्री शेखर पवार ने किया है इसलिए उनका बहुत आभार. पुस्तक को द मर्जिनलाइज्द पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है. सामाजिक आन्दोलनों के सभी साथियो को जिनकी सामाजिक न्याय और बदलाव में गहन निष्ठां है उन्हें ये पुस्तक पढनी चाहिए क्योंकि ये बहुत विशाल काय ग्रन्थ नहीं है अपितु बहुत ठोस है और सावित्री बाई की कविताएं, उनके पत्र और उनके भाषण आपके दिलो को छू जाते है. ये सभी दस्तावेज हमारी बहुत बड़ी धरोहर है जिनका इस्तेमाल हमें अपने सामाजिक आन्दोलनों में लोगो में चेतना जगाने हेतु करना चाहिए. पुनः पुस्तक प्रकाशन से जुड़े सभी साथियो को बहुत शुभकामनायें .

पुस्तक का नाम : सावित्रीबाई फुले रचना समग्र
संपादक : रजनी तिलक
प्रकाशक : द मर्जिनलाइजद पब्लिकेशन, वर्धा
मूल्य :रुपैया 160
संपर्क : themarginalised@gmail.com

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में दलित, लैंड एंड डिग्निटी, प्रेस एंड प्रेजुडिस, अम्बेडकर अयोध्या और दलित आंदोलन, इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया और तर्क के यौद्धा शामिल हैं। उनकी फिल्में, द साईलेंस आॅफ सुनामी, द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल, अयोध्या : विरासत की जंग, बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तरप्रदेश व लिविंग आॅन द ऐजिज़, समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया से साभार 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

अभी तो बहुत कुछ शेष था ! (रजनी तिलक का असमय जाना)

संजीव चंदन


अलग-अलग सरोकारों के लोग, वामपंथी लेखक और एक्टिविस्ट, अम्बेडकरवादी लेखक और एक्टिविस्ट, सामाजिक संस्थाओं के लोग, महिला अधिकार के कार्यकर्ता, एलजीबीटी समूह की एक्टिविस्ट, विश्विद्यालयों के विद्यार्थी/शोधार्थी बड़ी संख्या में कल निगमबोध घाट पर राजनीतिलक को अलविदा देने आये, आख़िरी विदाई का यह दृश्य बहुत कम ही होता है. बड़ी संख्या में महिलाओं की उपस्थिति, पुरुषों से ज्यादा, बता रही थी कि किसी महिला-अधिकार की पुरोधा ने आख़िरी सांस ली है. अम्बेडकरवादी लेखकों के आँखों के आंसू बता रहे थे कि दलित लेखन और आन्दोलन की अपूरणीय क्षति हुई है. बिलखते लोग, विद्यार्थी इस बात की गवाही थे कि लोगों का कोई आत्मीय गया है, अपना गया है.

पढ़ें: खैरलांजी के एक दशक के बाद भी बदस्तूर जारी है शोषण

हाँ, रजनी तिलक का असमय निर्वाण मेरे लिए व्यक्तिगत भावनात्मक आघात सा है, हम सबकी अपनी भूमिकाओं में एक साथी के जाने से खालीपन की हकीकत की तरह है. उनसे अंतिम बातचीत फोन पर हुई थी. उनका फोन आया था, किसी महिला साथी का मुद्दा स्त्रीकाल पर उठाना चाहती थीं. चाहती थीं कि उसकी बात स्त्रीकाल पर आये. मेरी बात भी उन्होंने उससे कराई. मैंने उससे खुद लिखने का आग्रह किया. इसके दो-तीन दिन पहले उन्हें मैंने फोन किया था, दलित स्त्रीवाद पर सबलोग के लिए लिखने के लिए. तब वे अस्वस्थ थीं, उन्होंने अपनी बेटी ज्योति से लिखवाने को कहा, ज्योति से बात करवाई, वह अंग्रेजी में ही लिख सकती थी. पिछले दो-तीन सालों से उनके साथ बातचीत और काम का हमारा नियमित सिलसिला था. कितना कुछ करना चाहती थीं वे, कितनी बेचैन थीं वे उन कुछ सालों में, हर मोर्चे पर हस्तक्षेप के लिए! बहुत सी योजनायें थीं, और बहुत सी योजनओं पर काम कर रही थीं- साहित्य, संस्कृति और बदलाव के हर मोर्चे पर. साहित्य उनके लिए सिर्फ साहित्यिककर्म भर नहीं था, परिवर्तन का एक माध्यम था और सामाजिक सरोकारों के साथ सक्रियता से रहित साहित्यकार को वे साहित्यकार मानने से इनकार करती थीं.

पढ़ें: होली का स्त्रीवादी पाठ

राजनीतिलक की आख़िरी विदाई

इन दो-तीन सालों में हमने कुछ सामूहिक गोष्ठियां आयोजित की, एक साथ कुछ घटनाओं की फैक्ट फाइंडिंग की, कई धरने-प्रदर्शनों में शिरकत किया और कुछ आयोजनों में साथ-साथ मंच पर रहे. पहली बार उन्होंने 2013 में फोन किया था स्त्रीकाल के ‘दलित स्त्रीवाद’ अंक के प्रकाशन के बाद. वे चाहती थीं कि इस कड़ी में और अंक आयें, क्योंकि एक अंक में बहुत कुछ शामिल कर पाना संभव नहीं है- वे चाहती थीं दलित स्त्रीवाद का एक रचनात्मकता का अंक आये. एनएफआईडव्ल्यू के साथ स्त्रीकाल की एक बैठक में आईं तो ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ की पुरजोर वकालत की उन्होंने. उन्होंने बताया कि ‘महिला आरक्षण के भीतर दलित-आदिवासी  महिलाओं को तो स्वतः ही आरक्षण मिल जा रहा है, हमारी लड़ाई ओबीसी महिलाओं के लिए उसमें कोटा निर्धारित करवाने की है.’ उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण के भीतर आरक्षण की दलील लेकर ओबीसी-दलित नेताओं से महिलाओं का संगठन मिला था, जिसमें वे खुद भी शामिल थीं. वे चाहती थीं कि महिला आरक्षण की मांग बहुजन महिलायें अपने नेतृत्व में करें ताकि आरक्षण के भीतर आरक्षण का मुद्दा कमजोर न पड़े. उनकी दलील थी कि यदि यह आन्दोलन नीचे से, ग्रामसभाओं से शुरू हो तो, उनकी सहभागिता से शुरू हो तो हम महिला आरक्षण जल्द हासिल कर सकेंगे, क्योंकि वहाँ बड़ी संख्या में आरक्षित वर्ग की महिलायें हैं.
पढ़ें: सावित्रीबाई फुले रचना समग्र

रजनीतिलक की आत्मकथा अपनी जमीं अपना आसमां के विमोचन अवसर पर  बाएं से दाये, हेमलता माहिश्वर, प्रोफेसर अभय मौर्या,  संजीव चंदन , रजनीतिलक, बजरंग बिहारी तिवारी

वैचारिक रूप से स्पष्ट होने के कारण ही वे अपनी बात पूरी ताकत से रखती थीं, इसकी परवाह किये बिना कि कोई इससे नाराज भी हो रहा है या नहीं. मतभिन्नताओं को बेबाकी से रखना, एक हद तक लड़ लेना और रिश्तों में पुनः सहज रहना कोई उनसे सीख सकता था. यही कारण था कि जिस स्त्रीवादी आन्दोलन के भीतर वे सवर्ण तत्व देखते हुए उसकी आलोचना करती थीं, उसके कई अग्रणी कार्यकर्ता कल उन्हें अंतिम विदाई देने आये. वे सबकी सीमाएं सिर्फ पहचानने में यकीन नहीं करती थी, बल्कि सीमाओं से उसे अवगत कराने में भी यकीन करती थीं. वे 1942 में डा.अम्बेडकर की अगुआई में हुए महिला सम्मेलन के 75वें साल स्त्रीकाल द्वारा जेएनयू में आयोजित बातचीत में पहुँचीं और फिर नागपुर में भी इस सम्मेलन की 75वीं जयन्ती पर देश भर से महिलाओं का सम्मेलन आयोजित करने में अगुआई की. वहाँ वेश्यावृत्ति के ऊपर हुए विवाद को वे सम्यक दृष्टि से देख सकने की क्षमता रखती थीं. वहाँ कुछ स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं ने वेश्यावृत्ति को यौनकर्म का दर्जा देते हुए उसे कानूनी बनाने की मांग रखी तो स्वाभाविक रूप से दलित महिलाओं ने ऐतराज किया. रजनीतिलक भी इस ऐतराज से इत्तेफाक रखती थीं, लेकिन उसी वक्त वे यह कह पाने की क्षमता भी रखती थीं कि ‘ वेश्यावृत्ति में पीड़ित महिलाओं के साथ, उनके लिए जितना काम वामपंथी महिलायें अथवा वे महिलायें करती रही हैं, जो कानूनी बनाने की मांग कर रही हैं, उतना दलित महिलाओं का संगठन नहीं कर पाता, हमारा जुडाव उनसे नहीं है, हम अपने मुद्दों में उन्हें शामिल नहीं करते.’

रजनी तिलक होने के कई मायने थे. वे दलित साहित्यकारों के भीतर पितृसत्ता को बार-बार चिह्नित करती थीं, उनसे लड़ भी लेती थीं. उन्होंने डा. धर्मवीर के विरुद्ध भी स्त्रीवादी स्टैंड लिया था. यह कविता राजनीतिलक ही लिख सकती थीं, ‘ कथित दलित साहित्यकारों/ तुम्हारी ओछी नजर में/ स्त्री का सुंदर होना/ उसका मैरिट, सुंदर न होना उसका डिमैरिट!/ सवर्णों की नजर में/ वे ही है मैरिट वाले/ तुम हो डिमैरिट/ मैरिट का पहाडा जैसा उनका/वैसा ही तुम्हारा/ फिर तुम्हारा विचार नया क्या?/ कौन सा सामाजिक न्याय कौन सा तुम्हारा? इस बेवाकी के बावजूद वे दलित साहित्यकारों को प्रिय थीं, वैसे ही जैसे आलोचना के बावजूद सवर्ण स्त्रीवादियों को या फिर अपनी साथी दलित स्त्री लेखिकाओं और कार्यकर्ताओं को. वे स्पष्ट वक्ता थीं. कई बार मुझसे भी तीखी असहमति जतायी उन्होंने, मुझे खरी-खरी सुनाया भी, लेकिन वह उनका स्वाभाविक उदगार भर होता था, व्यवहार नहीं- हमारे स्नेह के रिश्ते कभी खंडित नहीं हुए.

पढ़ें : कौन काट रहा उनकी चोटियाँ: एक तथ्यपरक पड़ताल

सोचता हूँ कि क्या उन्हें दुनिया से जाने का अहसास हो गया था, थोड़ी बीमारी तो कुछ महीनों से थी उन्हें, लेकिन उसकी परवाह कभी नहीं की. वे देश भर में महिला आरक्षण के लिए घूमना चाहती थीं, दिल्ली से बाहर. उन्होंने इन्हीं दिनों अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच बनाया. इस मंच को लेखन और जमीन पर सक्रियता दिलाने की कोशिश की. बनते ही कई यात्राएं उन्होंने दिल्ली के आस-पास की, जहां दलित महिलाओं का उत्पीड़न हुआ हो. वे दलित महिला कथाकारों का संग्रह लाना चाहती थीं, उर्मिला पवार की किताब का अनुवाद मराठी से अनुवाद करवा रही थीं, अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लगभग लिख चुकी थीं-कितना कुछ, उनके पाँव में सच में पहिया लगा था और हृदय में अभिव्यक्ति की बेचैनी थी. दिसम्बर में हमने द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन से उनके द्वारा संपादित किताब ‘सावित्रीबाई फुले समग्र’ प्रकाशित की.

कितना कुछ याद करूं! इन सब मोर्चों पर सक्रिय थीं और निजी स्तर पर उतनी ही बेचैन. अपनी इकलौती संतान ज्योति के लिए उनकी चिंतायें, उनकी चाहत उन्हें बेचैन किये था. पता नहीं क्यों उन्हें ज्योति का जीवन अनिश्चित लगता था- नहीं, नहीं वे पारम्परिक माँ नहीं थीं, वे उसके जीने के, उसके निर्णय के अधिकार पर काबिज होना नहीं चाहती थीं, वे बस उसे खुश देखना चाहती थीं. चाहती थीं कि लेखन और शोध के क्षेत्र में वह बड़ा काम करे. उन्हें लगता था कि दलित स्त्रीवाद के क्षेत्र में कितना कुछ काम करना शेष है, ज्योति वह करे. उन्होंने कोशिश की कि ज्योति और अपराजिता (जेएनयू की शोधार्थी, जिसने प्रोफेसर गोपालगुरू के साथ दलित महिला लेखन पर शोध किया है) मिलकर इस क्षेत्र में काम करें. उन्होंने अपराजिता को चंडीगढ़ में ज्योति के पास बुलाया भी. मुझसे वे काफी कुछ शेयर करतीं- मैं एक प्रगतिशील बेचैन माँ को देख रहा था, उन्हें समझता ज्योति नयी पीढी की है, वह अपने बेहतर मार्ग तय कर लेगी!


पढ़ें: युग नायिका सावित्री बाई फुले

स्त्रीकाल और राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन के कार्यक्रम में

रजनी दी किसी के जाने पर मैं अमूमन रोता नहीं, लेकिन आप, आप मुझे रुलाने के लिए, हम सबको उदास करने के लिए क्यों छोड़ गयीं,असमय ! अभी तो बहुत कुछ शेष था!!
लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं. सम्पर्क: 8130284314

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

एनएच-91 ( राजेश मलिक की कहानी)

राजेश मलिक


विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित. . कहानियों पर फिल्म निर्माण और नाट्य प्रस्तुति सम्पर्क:  malikraj2508@gmail.com. मो.9935827672,  790544623

 खट-खट-खट-खटऽऽऽऽऽऽ बूटों के उठते स्वरों से जेल के सारे कैदी इस तरह सतर्क हो गए जैसे  क्लास में अध्यापक के आते ही बच्चे सतर्क हो जाते हैं. हर होंठ जैसे सिल गए हों. लेकिन यह सब जेलर के गश्त तक ही सीमित था. गश्त खत्म होते ही बाँध फट पड़ता. फिर चारों तरफ ही-हूँ-हे-मेरी-तेरी-था-थी-हैं का स्वर गूँजने लगता. कुछ मुलाकाती कैदियों को ऐसे देख रहे थे जैसे चिड़ियाघर में लोग जानवरों को देखते हैं.


‘‘चल उठ, तुझसे कोई मिलाई करने आया हैं.’’ सिपाही का लहजा सख्त था.
बजरंगी सिर झुकाये उकुड़ू बैठा था जैसे उसने कुछ सुना ही न हो.
‘‘ओए लगड़े, मैं तुझसे ही कह रहा हूँ…..सुनता क्यों नहीं.’’
बजरंगी निःशब्द, एकटक ज़मीन को ताके जा रहा था. कान मानो संज्ञाविहीन हो गए हों. उसने धीरे से किसी तरह गर्दन उठायी. सुलगती आँँखें सिपाही के चेहरे से जा चिपकीं.
‘‘क्यों बे! मुझे क्यों घूर रहा हैं?’’ सिपाही उसे हड़काता हुआ चला गया.
बजरंगी उठा. पोलियो से पतली पड़ी अपनी एक टाँग को झुलाता, भचकता हुआ चल पड़ा और सलाखों तक आकर रूक गया.
‘‘बजरंगी भैय्या! मैं एक बुरी खबर लाया हूँ.’’
इतना सुनते ही उसकी कुन्द हो चुकी चेतना में कुछ हरकत-सी आयी और उसकी उचटती निगाह उस खबर देने वाले की तरफ उठी.


‘‘भैय्या! हमने बचाने की बहुत कोशिश की फिर भी ना बचा सके तुम्हारी अम्मा को…..’’ बात पूरी करते-करते वह रोआँसा हो गया.
बजरंगी अभी भी एकटक उसे देखे ही जा रहा था. फिर भचकता हुआ पलटा. वह व्यक्ति उसे पुकारता रहा. बजरंगी चलता रहा और उसे मुड़-मुड़ कर देखता रहा. जैसे उसके लिए शब्द अपना अर्थ खो चुके हों. वह कूल्हे उचकाता अपनी काल-कोठरी में जा समाया.

‘मर गयी….अम्मा भी मर गयी….दिदिया भी मर गयी….सब के सब मर गए…….’’ वह गर्दन तिरछी किए बड़बड़ाता रहा. एकाएक उसके चेहरे पर सूर्य की किरणें पसर गयी तो आँखें किचमिचा उठीं. बजरंगी बुत-सा उन किरनों को निहारने लगा और तब तक निहारता रहा जब तक कि गीली आँखें सूख न गयी. पलकें उठाकर सामने देखा तो अम्मा का धुंधला बिम्ब आँखों में तैर गया और फिर तैरता ही गया………………………

‘‘बेटा! मत जाओं शहर, हम जैसे-तैसे मेंहनत-मजूरी करके जी लेंगे पर तुम्हारे बिना हम नहीं जी पायेगे.’’
‘‘मैं कोई ज़िंदगी भर के लिए थोड़े ही जा रहा हूँ बस कुछ ही दिनों की तो बात हैं वापस आते ही तुम्हें और दिदिया को साथ शहर ले जाऊँगा.’’
‘‘फिर भी बेटा, मेरा मन नहीं कहता कि तुम मुझसे दूर जाओं.’’
‘‘तुम समझती क्यों नहीं अब तुम्हारी वो उमर नहीं रही कि  इतनी मेहनत-मजूरी कर सको, बप्पा के न रहने बाद तुमने ही तो हम दोनों को संभाला हैं और वैसे भी आज नहीं तो कल दिदिया का ब्याह करना हैं, क्या ऐसे बैठे-बैठे कुछ हो पायेगा? अम्मा! तुम मेरी नहीं दिदिया की सोचो?’’
‘‘ठीक है बेटा! तुम जो ठीक समझो पर तुम्हारे खाने और रहने का क्या होगा?’’
‘‘तुम उसकी चिंता क्यों करती हो, भोलेनाथ! हैं ना वह सब ठीक कर देगें..’’

 जेल की काल-कोठरी में बैठा बजरंगी बीती बातों को सोचते ही सिहर उठा. उसे लगा अम्मा ने पहले उसके सिर को सहलाया फिर उसके बहते हुए अश्कों को पोछा. वह कुछ पलों तक खामोश रहा. फिर रूधे गले से बुदबुदाया, ‘‘तुम कहाँँ चली गयी अम्मा मुझे अकेला छोड़कर…….तुम्हारे बिना कैसे जी पाऊँगा मैं…..’’ वह अनायास फफक पड़ा. उसकी आँँखों के सामने अधेरा छाने लगा. उसी अन्धकार में दिदिया का चेहरा कौंध गया. वह जब अन्तिम बार आयी थी उससे मिलने…………..

‘‘तुम फिर आ गयी, कितनी बार कहा हैं दिदिया कि यहाँ मत न आया करो…….यह जगह भले लोगों की नहीं हैं.’’
‘‘ना आऊँ तो क्या करूँँ, तुम जब महीने-महीने भर घर की कोई खोज-खबर नहीं लोगे तो मुझे आना ही पड़ेगा….अगर तुम इतने ही भले होते तो मुझे गली-गली ताले-चाकू ना बेचने पड़ते. मगर तुम्हें क्या,बहिन मरे या जिये चाहे लोगों की उल्टी-सीधी बात सुने पर तुम्हें तो पीने के लिए बस अपनी दारू चाहिए.’’
‘‘कौन साला कहता हैं कि मैं दारू पीता हूँ, रही बात गली-गली फिरने की तो तुम अपने मन से फिरती हो.’’ बजरंगी की भौहें सिकुड़ने लगीं.
‘‘मैं कोई शौक से नहीं फिरती जो तुम मुझ पर आँख चियारते हो, अम्मा की दवा और इस पेट के खातिर…..’’ उसने अपने पिचके पेट पर हाथ रखते हुए कहा.
‘‘क्या यहाँ नोटों का पेड़ लगा हैं….कई-कई दिन गुजर जाते है तब कहीं एक ल्हाश आती हैं हाथ में……..अब मैं उससे अपना पेट भरूँ कि तुम…..’’

‘‘हाँ-हाँ! और भी कुछ कह लो…..चुप क्यों हो गए? अब यही सब सुनना तो बाकी रह गया हैं. अरे मेरा नही तो अम्मा का कुछ ख़्याल किया होता वह बेचारी कितनी आस लगाये तुम्हारी राह ताकती रहती है.’’ कहते-कहते उसकी आँखें छलक आयी थीं.
‘‘तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे अम्मा का सारा ध्यान तुम ही रखती हो, मैं तो कुछ करता ही नहीं.’’ बजरंगी की पलकें नीची हो आयी थीं.
‘‘यह तो तुम खुद ही जानते होगे… और हाँ! मैं तुम्हें यह याद दिलाने आयी थी कि नरसों रक्षा-बंधन है मैं और अम्मा तुम्हारी राह देखेगें.’’ दिदिया भड़ास निकालती हुई सड़क के उस पार चली गई.
मोटी मूँछ वाला मोटा मुंशी हर बार की तरह उसे भूखी नज़रों से सड़क पर जाते हुए घूरता रहा. जब तक कि वह उसकी आँखों से ओझल ना हो गयी.
बजरंगी-मुंशी की ललचाई निगाहों को ताड़ गया था. उसका मन हुआ था, कि जाकर उस मुंशी के बच्चे की आँँखें नोच ले. और उसे यह बता दे कि गरीब हैं तो क्या हुआ उसकी भी मान-मर्यादा हैं. पर क्या करता वह गरीब ही नहीं, लाचार भी था.

दिदिया के जाते ही बजरंगी को अपनी गलती का अहसास हुआ. उसने प्रण किया कि वह कभी शराब नहीं पियेगा. ना ही थाने के किसी सिपाही का अब वह काम करेगा. सिर्फ वह काम करेगा जिससे चार पैसा उसके हाथ में आये.
‘‘दिदियाऽऽऽऽऽ.’’ बजरंगी एकाएक चीख़ पड़ा. मानो नींद से जागा हो.
‘‘ऐ बे, गला क्यों फाड़ रहा हैं? जब देखो दिदिया-अम्मा-दिदिया-अम्मा…साला रटा करता हैं…. कितनी बार कहा हैं कि तेरी दिदिया-अम्मा मर गयी, मगर साले की समझ में नहीं आता.’’
बजरंगी पलकें नीचे किये मूक-सा सुनता रहा. यह लफ़्ज एक नहीं कई बार उसके चैतन्य पर गूँजें. फिर गूँजते गए. गूँजते गए-‘कितनी बार कहा हैं कि तेरी दिदिया-अम्मा मर गयी मगर साले की समझ में नहीं आता…….’
बजरंगी की आँखें अंगार की तरह चमक रही थीं, किसी को नहीं छोड़ूगाँ सब को मार डालूगाँ….सब को………….’

कबूतरों की फड़फड़ाहटों से उसकी सोच टूट गयी. उसने देखा छत के आलें में दो कबूतर अपने बच्चों के साथ गुटर-गूं-गूटर-गूं कर रहे थे. वह देखता रहा एकटक. एकाएक उसकी पलकें नीचे हो आयी थीं. हाथ-पैरों के नाखूनों से लगता था जैसे बरसों से नाखुन काटे ही ना गए हो. वह नाखुनों को देखता ना जाने कहा खो गया था……………………….



‘‘इतना बड़ा हो गया हैं और नाखुन नहीं काट पाता……अगर कल मैं न रही तो तब कौन काटेगा तेरे यह नाखुन?’’
‘‘ऐसा कभी मत कहना अम्मा, तुम हो तो सब कुछ हैं.’’
‘‘बस तुम दोनों के घर बस जाये और हमें क्या चाहिए.’’

 ‘‘नहीं अम्मा! नहींऽऽऽ.’’ उसकी चीत्कार से जेल की कोठरी कांप उठी थी. उसने अपनी हथेलियों से चेहरे को ढक लिया और सिसक-सिसक कर रोने लगा. फिर कुछ सोचते हुए उसने झट से उँगालियों के सारे नाखुन कुतर डाले. और विक्षिप्त-सा हाथ फैलाकर अनाप-शनाप बकने लगा- ‘‘देख अम्मा! देख, मैंने सारे नाखुन काट डाले…..सारे……अब तो तुम खुश हो न…… तो लौट आओं अम्मा…..लौट आओंऽऽऽऽऽ’’

‘‘उठ बे बजरंगीया, उठ.’’
‘‘ज…..जी……..ह…..जूर…….’
‘‘जा जल्दी जा, दरोगा जी ने तुझे चीर घर बुलाया हैं.’’ सिपाही कहकर बरामदे की तरफ बढ़ गया. चीर घर का नाम सुनते ही बजरंगी का मन खुशी से नाच उठा. उसने पहले ईश्वर का धन्यवाद किया. फिर गुनगुनाता हुआ रिक्शा लेकर चल पड़ा. वह रिक्शा ऐसे भगाये जा रहा था जैसे कोई खजाना मिल गया हो. कई मोड़ों के पश्चात् वह चीर घर जा पहुँचा.
‘‘कहाँँ मर गया था बे? हम तेरे बाप के नौकर है जो बैठे है इतनी देर से..’’
दरोगा आँखें तरेरकर गरजा, ‘‘जा भाग यहाँ से कोई लाश-वाश नहीं हैं.’’ बजरंगी के साँवले चेहरे पर खौफ की रेखाएँ उतर आयी थीं. शब्द टूट गए थे, ‘‘ह….जू…..र….व…वो…..म….मैं……’’
‘‘भागता है कि लगाऊँ दो-चार…….’’
बजरंगी को लगा जैसे किसी ने उसे ऊँचे पर्वत से नीचे फेंक दिया हो. उसे लगा अगर यह लाश ना मिली तो उसके सारे सपने ख़ाक हो जायेंगे. उसने पुनः गुहार लगायी, ‘‘हजूर! भगवान के लिए ऐसा जुल्म मत करिये आप बड़े लौगन की किरपा से हमार पेट चलत है, हो सके तो क्षमा कर दीजिए.’’ कहकर बजरंगी पैरो से जा लगा.
‘‘चल उठ, बहुत नौंटकी हो गई……अब खड़ा-खड़ा मुँह क्या ताक रहा है…. यह ले बीस का नोट और जाकर दो ठंड़ी बोतल ले आ.’’

बजरंगी के जाते ही दरोगा-सिपाही की तरफ मुख़ातिब हुआ, ‘‘यह बताओ इस वक्त तुम्हारे पास कितने पैसे है?’’
‘‘सर!पचास रूपये.’’
‘‘क्यों? क्या कल जीप स्टैण्ड से पैसे नहीं मिले थे?’’
‘‘जो मिले थे उससे तो कल रात बिरयानी और दारू आयी थीं.’’
‘‘हूँ.’’ दरोगा ने सिर हिलाया, ‘‘ऐसा करो तुम अस्पताल के सामने जाकर ठेले वालों से आज के पैसे ले आओं.’’
बोतल आ गयी थी. दरोगा ने हाथ लगाकर बोतल का स्पर्श किया और आश्वस्त होकर पीने लगा. दूसरी बोतल बजरंगी ने सिपाही की तरफ बढ़ा दी. सिपाही गट-गट करता एक ही साँस में बोतल डकार गया. फिर अनायास बोल पड़ा, ‘‘सर! सरकार के डेढ़ रूपये से कही दाह संस्कार होता हैं?’’
दरोगा को खामोश होता देख सिपाही चला गया.
मगर उसकी छोड़ी चिंगारी अभी भी दरोगा के सीने में दहक रही थी,‘सर! सरकार के डेढ़ रूपये में कहीं दाह संस्कार होता हैं?’



दरोगा सोचने पर विवश था,‘सरकार का क्या उसने तो सिर्फ निर्देश दे दिए कि डेढ़ रूपये में लावारिस लाशों का दाह संस्कार करो, पर कोई सरकार से यह पूछे कि डेढ़ रूपये में कितनी लकड़ियाँ आती हैं?’
‘‘मैं जाऊँ हजूर?’’ बजरंगी के पूछते ही दरोगा की तन्द्रा भंग हुई.
‘‘अबे जा……’’
बजरंगी ने सिपाही की मदद से लाश को रिक्शे पर लिटाया. तभी मुंशी ने उसकी हथेली पर सौ-सौ के दो नोट रख दिए.
लाश से उठती सड़ाँध बजरंगी के नथुने को फाडे़ दे रही थी. झट से उसने गमछे को मुँह पर लपेटा और गद्दी पर जा बैठा. उसका बायाँ पैर पैडिल पर घूमने लगा. लेकिन दायाँ पैर पैडिल के ऊपर ही झूल रहा था. किर्र-किर्र करता रिक्शा खड़न्जे से उतर कर पक्की सड़क को रौंदने लगा.
आग उगलती हुई धूप में बजरंगी के ज़िस्म से पसीने की बूँदें इस तरह टपक रही थी जैसे जलती हुई मोमबती से मोम. हवा मूक थी पेड़ गुमसुम.


लाश देखकर एक ने हाथ जोड़े तो दूसरे ने सिर पर हाथ रख लिया और तीसरे ने सिर झुका दिया. बजरंगी जल्दी से जल्दी गाँँव पहुचना चाहता था. इसलिए वह रिक्शा भगाये जा रहा था. उड़ते हुए आवारा बादल कभी-कभी सूर्य के समझ आ जाते तो बजरंगी को कुछ राहत महसूस होती. एक ही धुन थी कि गाँव पहुँँचना है, अपनों के पास.


‘‘दो सौ में दो शूट का कपड़ा……..’’
आवाज सुनते ही बजरंगी की निगाहें ठेले की तरफ घूम गयी. कपड़े रंग-बिरंगें थे. उसने सोच लिया था कि जब वह लाश फेंक कर वापस आएगा तो इसी में से एक जोड़ा कपड़ा दिदिया के लिए ले लेगा.
बजरंगी को अहसास हुआ जैसे दिदिया उसके सम्मुख आ खड़ी हुई हो और कह रही हो, ‘‘इस जनम में तो कपड़ा मिलेगा नहीं मुझे…….मगर हाँ, अगर मैं मर गई तो कफ़न जरूर मिल जाएगा….’’
ट्रक की ध्वनि उसके विचारों को रौदती हुई चली गयी थी. कई रिक्शे, मोटर साइकिल उसके अगल-बगल हो गए.

अचानक एक मोटर साइकिल वृद्धा को रौंदती हुई चली गई. उसने झट से रिक्शा रोका और चिल्लाता हुआ मोटर साइकिल के पीछे भागा, ‘‘अरे उसे कोई रोको……पकड़ोंऽऽऽ.’’ बजरंगी हाँफता-हाँफता गिरता हुआ बचा.
लोग अनदेखा करते हुए चले जा रहे थे. बजरंगी भचकता हुआ वृद्धा के निकट आया. वृद्धा का सिर एक तरफ लुढ़का था. खून ऐसे फैला था जैसे किसी ने सड़क के माथे पर बिंदिया लगा दी हो.
इतने में क्षणिक कौतुहलवश लोगों की भीड़ लाश के चारों ओर थोड़ा दूरी बनाए हुए जमा होने लगी थी. कि तभी संयोग वश पुलिस का एक दल भी वहाँ आ धमका.
बजरंगी रिक्शा लेकर चला ही था कि कानों में आवाज चुभी, ‘‘पहले पोस्टमार्टम होगा फिर कोई लाश को हाथ लगायेगा.’’


बेचारी कौन थी? कहाँ की थी, कुछ पता नहीं…..चीर घर में सड़ेगी बेचारी…..रंगीले तो बिना पैसे के हाथ भी नहीं लगायेगा…….’ बजरंगी मन ही मन में बुदबुदाये जा रहा था. इसी उधेड़बुन में वह त्रिवेणी घाट जा पहुँचा. उसने देखा, नदी सिकुड़ी हुई थी.

‘‘क्यों न इधर से ही रिक्शे को नीचे ले जाऊँ.’’बजरंगी बुदबुदाया. उसकी उँगलियाँँ ब्रेक पर कस गई. वह हौले-हौले ब्रेक में ढ़ील देकर रिक्शा आगे सरकाने लगा. एकाएक रिक्शे का तारतम्य टूट गया. और कई पलटी के बाद वह रिक्शे के साथ ही औधे मुँह जा गिरा.
उसकी देह कई जगहों से रगड़ गयी थी पर उसे अपनी तनिक चिंता नहीं थी. चिंता तो थी उस किराये के रिक्शे की जो क्षत-विक्षत था.


बजरंगी तहमद झारते हुए उठा और शिकायत भरी नजरों से आसमान की तरफ देखा, ‘‘हे भगवान! यह तूने क्या किया?’’ बजरंगी बड़बड़ाता हुआ रिक्शा लेकर सड़क पर आ गया.
चारों तरफ देखने के बाद उसे एक रिपेयरिंग की दुकान दिखी जो एक गुमटी में सिमटी थी. उसने रिक्शे के एक-एक भाग के बारे में मिस्त्री को अवगत कराया. सारी बात सुनने के बाद मिस्त्री ने अपनी मजूरी बता दी.


बजरंगी ने एक नहीं कई बार जेब को टटोला. मगर बटुवे का कहीं अता-पता नहीं था. वह वापस घाट की ओर भागा. गाँव पहुँचने की शीघ्रता उसके मस्तिष्क को कुतरती जा रही थी. वह भचकता हुआ पुल के नीचे जा पहुँचा. और विक्षिप्त-सा बटुवा इधर-उधर खोजने लगा. बटुवे की तलाश में वह लाश को भी उलट-पुलट कर देख लेना चाहता था. लाश का  कफ़न कई जगहों से तार-तार हो गया था. लाश पेट के बल थी उसका आधा भाग पानी में था.

बजरंगी ने सहमे-सहमे लाश की तरफ हाथ बढ़ाया. मारे सड़ाँध के उसे उबकाई आने लगी. उसने झटके से मुँह पर गमछा बाँधा. और लाश को बाहर खींच लिया और उसके एक-एक भाग को टटोलने लगा पर समस्या अभी भी वहीं थी.


झाड़ी में खड़ा एक कुत्ता जवान लपलपा रहा था. जिसकी लार ज़मीन पर टपक रही थी. कुत्ता इस इंतजार में था कि वह हटे और वह अपनी भूख शांत कर सके. तभी कुत्ता आसमान की तरफ मुँह उठाकर गुर्रा पड़ा, ‘‘ऊँ….ऊँ…ऊँऽऽऽऽऽ.’’ जैसे उस पेट भरने वाले को धन्यवाद दे रहा हो या इंसान की हैवानियत पर गुर्रा रहा हो.
अचानक हवा के तीव्र झोंके से पूरा वातावरण काँप-सा गया. दैत्यों के भाँँति एक साथ कई पेड़ झूमने लगे. हाहाकार का डरावना संगीत चारों तरफ चीत्कारने लगा.

बजरंगी आँख बंद किये एक तरफ दुबका खड़ा था. जैसे ही आँख खोली कि उसकी निगाहें तीर की भाँति लाश से जा चुभी. चेहरा देखते ही बजरंगी सन्न रह गया. जैसे पछाड़ खाकर गिर पड़ेगा. मुँह खुला का खुला रह गया. पूरे ज़िस्म में एक कंपकपी-सी दौड़ गयी, ‘‘दिदियाऽऽऽऽऽ.’’
वह चीखता हुआ घुटनों के बल बैठ गया. धीरे-धीरे उसकी चीख़ घुटती गयी. शब्द मारे भय के अंदर ही अंदर जैसे दुबक गए हों. मन-मस्तिष्क जैसेे दोनों फ्यूज हो गए हों. तभी रंगीले के एक-एक शब्द बजरंगी के कानों में चुभने लगे, ‘मैंने इतनी लाशें देखी मगर इस लाश को देख ना सका…….’
यह वाक्य एक नही कई बार बजरंगी के ज़ेहन में गूँजा. फिर मुंशी की घूरती आँखें, ललचायी आँखें दिदिया को जाता हुआ देख रही थी. यह दृश्य अनगिनत बार बजरंगी की आँखों पर चलता रहा. आँँखें इस कदर लाल हो गई थी जैसे पूरी देह का रक्त उसकी आँखों में उतर आया हो.
वह भचकता हुआ थाने की तरफ चल पड़ा. मुंशी की आकृति के आगे सारी आकृतियाँ, सारी खुशिया, सारे सपने धुल गए थे.
रह-रहकर दिदिया के वाक्य मन में उबल रहे थे, ‘भैय्या! तुम तो कपड़ा दे ना सके मुझे, पर देखों समाज ने मुझे कैसा कपड़ा दे दिया हैं….कैसा कपड़ा देऽऽऽऽऽऽ’
बजरंगी ने दोनों हाथों से कान बंद कर लिया था. लग रहा था जैसे कान फट जायेंगे. उसके दाँत किटकिटाने लगे. बजरंगी चलता रहा. आँसू पोेछता रहा. सोचता रहा, ‘मैं कोई शौक से नहीं फिरती हूँ जो तुम मुझ पर आँख चियारते हो…..अम्माँ की दवा और इस पेट के खतिर…..’
बजरंगी पागलो की तरह बड़बड़ाता हुआ चलता जा रहा था, ‘‘दिदिया…..कपड़ा….रक्षाबंधन……सब कुछ खत्म हो चुका था.


बिजली का कहीं अता-पता नहीं था. बजरंगी दबे पाँव बरामदे में जाकर लेट गया आधी रात के इंतजार में कि कब, कैसे, किस वक्त मुंशी को मारना हैं.
आख़िरकार वह क्षण आ गया. उसने इधर-उधर देखा दोनो बंदूकधारी गहरी निद्रा में विलीन थे. बजरंगी दबे पाँव चलता जा रहा था.
पीठ घुमाये मुंशी लिखने में इस कदर मशगुल था, कि उसे बजरंगी के आने का आभास तक नहीं था हुआ. मुंशी को देखते ही गुस्से की चिंगारी भभक उठी. जैसे-जैसे उसके कदम मुंशी की तरफ उठ रहे थे. वैसे-वैसे दिदिया का चेहरा उसकी आँखों में डूबने-उतरने लगा था. वह सारे दृश्य-अदृश्य उसकी आँखों के सामने नाच उठे. लपक कर उसने मुंशी की गर्दन को कस लिया.
‘‘छोड़ो मुझे…..छोड़ोऽऽऽऽ.’’
‘‘तुझे छोड़ दू कमीने……तुझे…….’’ बजरंगी की आँँखों पर दिदिया का चेहरा उतर आया था जैसे वह कह रही हो, ‘इस कमीने को मत छोड़ना भैय्या , मत छोड़नाऽऽऽ’
बजरंगी की उँगलियाँ मुंशी के गर्दन पर धसती जा रही थी.
‘‘ब……चाओं…बचाओंऽऽऽ’’ मुंशी ऐसे फड़फडा रहा था जैसे कोई चिड़िया शिकारी के पंजे में फड़फड़ाती हैं.
दो बंदूकधारी आए और बजरंगी को घसीटते हुए ले गए. वह चीखता-चिल्लाता रहा पर उसकी एक नहीं सुनी गयी.
‘‘बंद कर दो साले को.’’ मुंशी फुफकार पड़ा, ‘‘साला! हरामजादा, मुझे मारने आया था….मुझे….ऐसा केस बनाऊँगा कि साला ज़िंदगी भर जेल में सड़ता रहेगा…….’’

‘‘यह ले.’’ सरकती हुई थाली सामने से आयी. सिपाही के वाक्य ने बजरंगी के ध्यान को तार-तार कर दिया. कच्ची-पक्की जली रोटियां, पानी जैसी दाल उसकी आँखों के सामने थी.
तभी कुछ आवाज़ उसके कानों में उतरी, ‘‘जानते हो दो दिन से मुंशी की लड़की लापता थी….कल उसकी लाश एनएच-91 के किनारे  मिली. सुनने में आया हैं कि पहले बलात्कार हुआ हैं फिर उसकी हत्या…..’’
‘‘जब दूसरों की बहु-बेटियों की इज्जत से खेलोंगे तो यही सब होगा…..’’ सिपाही का स्वर नम था.
बजरंगी घुटने के बल सिर पकड़ कर बैठ गया और फिर सवालिया निगाहों से आसमान की तरफ ताकने लगा.

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

पितृसत्ता का छल और जे.एन.यू. छात्राएं

चैताली सिन्हा 


शोधार्थी – जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, भारतीय भाषा केंद्र
(हिंदी विभाग) . सम्पर्क:  .chaitalisinha4u@gmail.com

 “मात्र वर्ग – संघर्ष के द्वारा ही
  स्त्री – मुक्ति के महान लक्ष्य को
  हासिल नहीं किया जा सकता…
  चाहे साम्यवादी हों, माओवादी हों या ट्राटस्कीवादी, 
 औरत हर जगह, हर खेमे में अधीनस्थ की स्थिति में है,
  सबसे निचले पायदानों पर खड़ी है l”
                                     सिमोन द बउआर

जब भी हम पितृसत्ता के संदर्भ में बात करते हैं तो सबसे पहले हमें उस शब्द के अर्थ को जानना नितांत आवश्यक हो जाता है.अर्थात् ‘पितृसत्ता’ ! क्या है पितृसत्ता की व्याख्या ?, क्या करती है ये पितृसत्ता ?, यहाँ यह भी बताना उचित होगा कि पितृसत्ता का अर्थ किसी एक पुरुष या किसी एक व्यक्ति से लड़ाई नहीं है बल्कि पूरी व्यवस्था से है.यानि पितृसत्ता – “वह विचार है, सिद्धांत है, आदर्श है जो अपने से या अपने समूह से भिन्न प्रत्येक व्यक्ति पर नियंत्रण चाहती है l”

हालांकि पितृसत्ता शब्द की आज अपनी समस्याएं हैं और अंतर्विरोध हैं.पितृसत्ता दलन के उन वैश्विक और ऐतिहासिक तरीकों का इस्तेमाल करती रही है, जो स्त्री को उसकी जैविक, अधीनस्थ स्थिति से बार – बार परिचित कराती है.पितृसत्ता के नियमित ढाँचे और आकार हैं जिसमें किसी भी प्रकार का वैरिएशन (बदलाव) स्वीकृत नहीं और न ही इनसे अलग रहने वाला शान्ति से रहने ही दिया जाता है.पितृसत्ताक समाज स्त्री के मुद्दे पर सोचना ही नहीं चाहता.न यह स्वीकारना चाहता है कि ऐतिहासिक विकास के दौरान आधुनिक स्त्री ने अपने लिए अलग से कुछ भी हासिल किया है.वह स्त्री की चुनौती को महज एक बचकाना हरकत मानकर कभी उसे मारता है तो कभी उसे भुलाता – फुसलाता है.मगर पितृसत्ता की आंतरिक इच्छा यही है कि समर्पण एकतरफ़ा हो.
 
यदि क़ानून स्त्री को बराबरी का आधार दे भी तो सामाजिकता, नैतिकता और लोक-व्यवहार उसके आड़े आ जाते हैं.स्त्री की स्वतंत्र सत्ता और स्वाधीनता पुरुषों की आँखों की किरकिरी बन गई.उसको वापस घर के दायरे में लौटने के लिए कहा गया.यहाँ तक कि मज़दूर वर्ग के पुरुषों ने भी स्त्री की स्वाधीनता पर बंधन लगाने शुरू किए क्योंकि वे स्त्री को अपना एक खतरनाक प्रतियोगी समझने लगे.

अपने अस्तित्व को स्थापित करना चाहने वाला व्यक्ति अपनी दी हुई परिस्थितियों से परे जाकर स्वतंत्र परियोजनाओं में प्रतिबद्ध होकर ही अपने आपको पुनः वापस पा सकता है.औरत भी अन्य मानव प्राणियों की तरह एक स्वतंत्र और स्वायत्त जीव है, लेकिन यही जीव ऐसे जगत में रहता है जो उसकी अतिक्रमण की क्षमता को कुंद करके उसको हमेशा के लिए अंतरवर्ती-अवस्था में रख देना चाहता है.

कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय भूखंड में घटित स्त्री – केंद्रित आंदोलनों के बारे में एक बात दिलचस्प है कि वे प्रेम के से भोलेपन में घटित हो गए : कोई योजना नहीं बनी, कोई मैनिफेस्टो तैयार नहीं हुआ, यहाँ तक कि कोई प्रकट तथा सचेतन पूर्वपीठिका भी नहीं बनी….और हो गया जो होना था : बहुत सार्थक, बहुत क्रांतिकारी, पर दूरगामी प्रभावों की ओर प्रायः अचेत.हमारे देश में और हमारे आसपास घट रही घटनाओं पे यदि गौर किया जाए तो पितृसत्तात्मक औपनिवेश का प्रभाव चारों तरफ़ फैला हुआ है और इसके उदाहरण के लिए हमें बहुत अधिक प्रयास करने की ज़रूरत नहीं है.कहने को तो हमारा समाज आधुनिक है परंतु स्त्री के संदर्भ में हमारा दृष्टिकोण अभी भी रूढ़िवादी है, सामंती है और जड़ है.वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाए तो देश के कई विश्वविद्यालय इस फेहरिस्त में शामिल नज़र आते हैं जहाँ पितृसत्ता की जड़ें बहुत गहरी धंसी हुई दिखाई देती है.जहाँ की छात्राओं को अभी भी अपने अधिकार के लिए सड़कों, चौराहों पे उतरना पड़ रहा है, स्त्री शुचिता का प्रमाण देना पड़ रहा है, अपने होने का बोध कराना पड़ रहा है.इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति इस देश की छात्राओं के लिए और क्या हो सकती है कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर क्रांति करने की आवश्यकता पड़ रही है.जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में घट रही घटनाएं इन रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक दृष्टिकोणों का ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ यौन शोषण के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में छात्राएं अपने आपको अकेली और असहाय महसूस करती दिखाई दे रही है, इस गलियारे में उनके खुद के पुरुष सहयोगी भी, प्रशासन और समाज के समान ही उनसे किनारा करते नज़र आ रहे हैं.ऐसे में क्या उनको निष्पक्ष न्याय मिलने की आशा की जा सकती है.



बीच सड़क पर कोई छात्रा निर्वस्त्र होती है तो उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि उसके मुद्दे या उस आंदोलन का परिणाम क्या होगा ? बल्कि उसे ये चिंता और खौफ सताने लगती है कि वो कहीं सरेआम बदनाम न हो जाए शायद तभी उन्हीं में से एक ने कहा कि ‘ये वीडियो ज्यादा फैलाओ मत क्योंकि इसमें मेरी छाती दिख रही है’l  कहने का तात्पर्य ये है कि उस छात्रा को इस पितृसत्ताक समाज का कितना डर है कि वह अपने हक़ की लड़ाई को छोड़कर अपनी आबरू के बेपर्दा हो जाने के डर से सहम गई, वहीं यदि किसी पुरुष के वस्त्रों को सरेआम कोई खींच-फाड़ देता तो शायद उसे उतना फर्क नहीं पड़ता जितना कि उस छात्रा को.ये जो पवित्रता और देह पर आधारित सो कॉल्ड लज्जा का परिधान स्त्री के माथे मढ़ दिया गया है उससे मुक्त होने में अभी जे.एन.यू. तो क्या देश की हर स्त्री एवं छात्राओं को और कितना वक़्त लगेगा कोई नहीं जानता.


वहीं यदि उनके अपने पुरुष सहयोगियों के तटस्थ होने और उन्हें अपनी लड़ाई लड़ने के लिए अकेला छोड़ने की नीति की बात की जाए तो कहीं यह जे.एन.यू. में एक नए अध्याय की शुरुआत भी हो सकती है, जहाँ कि छात्राओं को यह आत्मज्ञान हो कि स्त्री चाहे जे.एन.यू. जैसे किसी बड़ी संस्था से जुडी हो या दूर बहुल आदिवासी या अनपढ़ समाज से हो वह अभी भी अकेली है एवं उन्हें अपनी लड़ाई उन्हें खुद ही लड़नी है.इस पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण की छाया यहाँ या वहां समान रूप से व्याप्त है.यहाँ की छात्राओं की इस लड़ाई में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की वह कविता अनायास ही याद हो आती है कि –
“जोदि तोर डाक शुने केयो ना आशे
तबे एकला चोलो रे……….!”

आज हम जिस संक्रमण काल में जी रहे हैं वहां स्त्री का बोलना ही जोखिम उठाने के समान है.स्त्री जब अपने को अभिव्यक्त करना आरम्भ करती है, अपने निजी अधिकारों की बात करना शुरू करती है तो उसे रोकने के हर संभव प्रयास ‘ग्रासरूट’ से आरंभ हो जाता है फिर चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या अन्य कार्य का, फ़िल्मी जगत का हो या पत्रकारिता का….! हर क्षेत्र में उस पर पितृसत्ता हावी होने की कोशिश में रहती है.इस प्रकरण में जे.एन.यू. छात्राओं द्वारा किये गए सत्याग्रहपूर्ण आंदोलन को देखा जा सकता है.अपने अधिकारों की मांगों को लेकर जिस तरह उनपर हमला बोला गया वह साफ़ तौर पर यह दिखाता है कि किस कदर ‘पेट्रीयार्की’ सबसे पहले स्त्री देह को टार्गेट करती है ताकि उसे पहले जिस्मानी तौर पर   कमज़ोर कर दिया जाए.शायद इसीलिए सबसे पहले उन छात्राओं को शारीरिक रूप से क्षति पहुंचाने की चेष्टा की गई, उन्हें नीचे गिरा दिया गया फिर उनके कैमरे तोड़ दिए गए, उन्हें छेड़ा गया और न जाने क्या – क्या.स्त्री आज जो जोखिम उठा रही है, अपने अधिकार के लिए जिस तरह सड़कों पर उतर आई है उसका बोलना ही राजनीति का हिस्सा बन जा रहा है.‘पर्सनल इज़ पोलिटिकल’ हो जा रहा है, बस यही पितृसत्तात्मक समाज को चुभ रही है, उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है.एक तरफ़ तो हमारा भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है तो वहीं दूसरी तरफ़ उस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अभिव्यक्त करने से पहले ही दबा दिया जाता है, उसके लब सिल दिए जाते हैं – ‘बोल कि तेरे लब आज़ाद हैं’…..! क्या वाकई में हैं ? यानि आवाज़ उठाओगे तो मार दिए जाओगे.
 


दूसरी जो सबसे बड़ी बात है वह ये कि आज जहाँ हर तरफ गांधीवादी विचारधारा को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी जा रही है, सत्याग्रह करने की बात की जा रही है, ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ के नारे लगाए जा रहे हैं वहीं इन सारे वादों-इरादों को ध्वस्त करने की नीति पहले से ही तैयार कर दी जाती है.आज गांधी जी का सत्याग्रह कहीं भी फलीभूत नहीं हो सकता जब तक पितृसत्ता के खम्भे मज़बूती से खड़े रहेंगे.उनके गढ़ तोड़े नहीं जायेंगे.किस बेटी को बचाने और किस बेटी को पढ़ाने की बात की जाती है इस देश में ! जहाँ आठ माह से लेकर आठ साल की बेटी और उससे भी आगे अस्सी साल की वृद्धा तक का यौन घर्षण किया जाता हो ? जिसके योनी में मोमबत्ती से लेकर बोतल तक, रॉड से लेकर लकड़ी तक ठूंस दिया जाता हो उस बेटी को बचाने की और पढ़ने की बात की जाती है ? बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है स्त्री जीवन में समाज का ये क्रूरतम चेहरा.


जे.एन.यू. छात्र – छात्राओं द्वारा किया गया आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण और सत्याग्रहपूर्ण था फिर ऐसा क्या हो गया जिसे बीच रास्ते में ही रोक दिया गया, उस शांतिपूर्ण आंदोलन को पूरी तरह से लहूलुहान कर दिया गया, उसे हिंसा में बदल दिया गया, छात्राओं को पीटा गया उनके कपड़े फाड़े गए, उन्हें डराने का प्रयास किया गया.ऐसे में सत्याग्रह और गांधीवादी विचारधारा एवं शांतिपूर्ण आंदोलन करने की बात करना ही बेमानी सी लगती है.हमारा समाज और प्रशासन स्त्री के प्रति कितना उदार है ये इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है.सच्चाई तो यह है कि हमारा समाज कभी बेटियों के प्रति उदार रहा ही नहीं. इतिहास इस बात की गवाह है कि जहाँ एक बेटी को इसलिए अपनी आहुति देनी पड़ी क्योंकि उसने पितृसत्ता के विरुद्ध अपना निर्णय लिया, एक स्त्री की ह्त्या इसलिए कर दी गई क्योंकि उसने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले लिया.ऐसे में इतिहास में घटित स्त्री जीवन की घटनाएँ आज वर्तमान में भी प्रासंगिक होती दिखाई देती है.
                   
मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) में बालिका वध-प्रथा (female infantcide) का अध्ययन करने से भी हमें यह पता चलता है कि किस प्रकार अपनी पेट की क्षुधा को मिटाने के लिए शिशु कन्याओं का भक्षण किया जाता था.शिशु कन्या ही क्यों ? उदाहरण देखें
– “आरंभ में मानव समूह अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था और इस अस्तित्व अभिमुख अवस्था में लड़की को बोझ समझा जाने लगा क्योंकि एक समूह दूसरे समूह पर आक्रमण करके लड़कियों एवं स्त्रियों का अपहरण करता था.इस कारण बालिका वध – प्रथा (फीमेल इफेंटिसाईड) प्रकाश में आई.जब किसी प्रकार का भोजन नहीं मिल पाता था तब बालिकाओं को वध करके जठराग्नि शांत की जाती थी.इस प्रथा के कारण स्त्री – पुरुष सम्बन्ध प्रभावित हुआ.जब स्त्री की संख्या कम हो गई तब इस समस्या का समाधान बहुपति प्रथा द्वारा किया गया l”  (‘सामाजिक सांस्कृतिक मानवशास्त्र’, विजय शंकर उपाध्याय, गया पाण्डेय, क्राउन पब्लिकेशन, मैकई रोड, उप्पर बाज़ार, रांची – 834001, झारखण्ड, संस्करण: 2005, पृ.सं.77)

इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है कि स्त्री तब भी बोझ समझी जाती थी स्त्री आज भी बोझ समझी जाती है. इतिहास आज भी अपने आपको दोहरा रही है, कभी ऑनर किलिंग के रूप में, तो कभी दहेज़ हत्या के रूप में और कभी बलात्कार के रूप में.

तमाम परिघटनाओं के बाद हम जिस विषय को सबसे अधिक संवेदनशीलता के दाएरे में रखते हैं वो है गुरु – शिष्य परंपरा को.हमारी परंपरा ने हमें शुरू से यही सिखाया है कि हमारे जीवन में गुरु का क्या और कितना महत्त्व है.इसी महत्त्व को ध्यान में रखते हुए यद्धपि कबीर ने कहा था कि –
“गुरु गोविन्द दौऊ खड़े, काके लागूं पाए
बलिहारी गुरु आपने जो गोविन्द दियो बताए”

आज ये संबंध ताड़ – ताड़ होती दिखाई पड़ती है.इस पवित्र संबंध की शाख को धूमिल करती नज़र आती है.गुरु से बड़ा सच्चा मार्गदर्शक कोई नहीं, इश्वर भी नहीं.अंत में…..? वैसे तो इस विषय का तब तक अंत नहीं होगा जब तक स्त्री समानता के दाएरे में नहीं आती, जब तक ‘पितृसत्ता के उलट इकुएलिटी’ स्थापित नहीं होती.अर्थात् संघर्ष जारी है और जारी रहेगा…..!
“तुम मुझे अपने तीखे और विकृत झूठों के साथ 
इतिहास में शामिल कर सकते हो 
 अपनी चाल से मुझे गंदगी में धकेल सकते हो 
 लेकिन फिर भी मैं 
 धूल की तरह उड़ती जाउंगी l”
 – (‘स्टील आई राइज़’, माया एंजेलो).




 गूगल से साभार 
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com

महिला पत्रकारों पर बढ़ रहे हमले, जेएनयू प्रदर्शन के दौरान भी पुलिस की बदसुलूकी

श्वेता यादव

सामाजिक कार्यकर्ता, समसामयिक विषयों पर लिखती हैं. संपर्क :yasweta@gmail.com



पिछले दिनों जेएनएयू प्रोटेस्ट के दौरान दिल्ली पुलिस ने न सिर्फ विद्यार्थियों को बुरी तरह से पीटा अपितु पत्रकारों के साथ भी बुरा बर्ताव किया जिसमें से दो महिला पत्रकार हैं, उनमें से एक ने अपने साथ शारीरिक रूप से भी दुर्व्यवहार का आरोप दिल्ली पुलिस पर लगाया है| दिल्ली पुलिस ने एक महिला फोटोपत्रकार को न सिर्फ पीटा बल्कि उसका कैमरा भी तोड़ दिया जबकि वह बार-बार कहती रहीं कि वह पत्रकार है, स्टूडेंट नहीं| इन सबके खिलाफ प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस ने सफाई दी कि यह सब धोखे से हुआ सवाल उठाता है कि जब पत्रकार चीख-चीख कर कह रही थी कि वह जनर्लिस्ट हैं तो पुलिसकर्मियों ने उन्हें सुनकर भी अनसुना क्यों किया?

देश दुनिया में दिलचस्पी है तो अखबार उठाइये और देखिये सारे अखबार, मीडिया घराने, वेब पोर्टल्स आपको इस खबर से भरे पड़े मिलेंगे कि जेएनयू के छात्रों द्वारा किये जा रहे आन्दोलन पर पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया सिर्फ लाठी ही चार्ज नहीं किया है, सोशल मीडिया पर तैरती तस्वीरों को नज़्म करें तो पुलिस वालों ने छात्रों को इतनी बुरी तरीके से मारा है जैसे वे छात्र नहीं अपराधी हों! सवाल है क्यों? आखिर वह छात्र किस बात के लिए लड़ रहे हैं कि फीस कम हो जाए? कि एक ऐसा व्यक्ति जो यौनिकता को लेकर कुंठित हो वह एक प्रतिष्ठित संस्थान में प्रोफेसर के पद पर न रहे? इससे नुकसान किसका है? इसमें गलत क्या है? और अगर इसे कोई पत्रकार कवर कर रहा है तो गलत क्या है आखिर वह तो अपना काम कर रहा है? वह तो अपनी ड्यूटी ही कर रहा या रही है न… ठीक उसी तरह जैसे पुलिस वाले कर रहे हैं| फिर पत्रकारों के प्रति इतना बुरा व्यवहार क्यों?


यूँ तो पिछले कुछ दिनों में पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं जिसके तमाम डेटा भी हैं हमारे पास| लेकिन आज हम सिर्फ महिला पत्रकारों पर हुए हमले पर बात करेंगे और समझने की कोशिश करेंगे कि अगर यह रूका नहीं तो इसका क्या प्रभाव पड़ेगा| बात शुरू करने से पहले नीचे कुछ आंकड़े जो यह दर्शाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में कितने पत्रकारों पर हमले हुए हैं और उनमें महिला पत्रकारों का प्रतिशत क्या है?

साल-         पीड़ित पत्रकारों की संख्या –      महिला पत्रकारों का प्रतिशत
2011-             86                                             2%
2012-           106                                             4%
1013-           141                                             7%
2014-             92                                             8%
2015-             99                                         10%
Source – कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों की (NCRB) की माने तो 2015 से लेकर पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या तक लगभग 142 पत्रकारों पर हमले हुए हैं इससे भी मजेदार बात यह है कि इनमें अभी भी लगभग सारे केस अनसुलझे ही हैं|
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में भारत पत्रकारों के लिए दुनिया का तीसरा सबसे खतरनाक देश था।
नीचे कुछ आंकड़ें हैं जिनमें पहला आंकड़ा 2014 -2015 का है कि किस राज्य में कितने पत्रकारों पर हमले हुए हैं और दूसरा मामलों में एफआई आर  रेट को दर्शाता है|

सोर्स- इण्डिया स्पेंड


पिछले दिनों मध्यप्रदेश में एक ही दिन तीन पत्रकारों की हत्या हुई| आइए कुछ  केस देखते हैं जिनमें महिला पत्रकारों पर हमले हुए हैं|

फरवरी 2016 लगभग 20 आदमियों की भीड़ स्क्रॉल.इन की पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम के घर के सामने अचानक ही जमा होती है और भीड़ मालिनी सुब्रमण्यम मुर्दाबाद, ‘नक्सली समर्थक बस्तर छोड़ो’ के नारे लगाते हुए उनके घर और गाड़ी पर पत्थर मारती है| आप कुछ भी कहिए लेकिन भीड़ का भी अपना  एक समाजशास्त्र होता है इस पर बात थोड़ी देर बाद पहले महिला पत्रकारों पर हुए हमले और कारणों की कुछ छोटी-छोटी कहानियां .. सच्ची कहानियाँ .. मनोहर कहानियाँ नहीं .. अप्रैल 2017 शाम के समय, जगह दिल्ली का अशोक विहार पार्क 45 वर्षीय महिला पत्रकार अपर्णा कालरा खून से लथपथ बेहोशी की हालत में मिली| डॉ. ने अपर्णा की हालत को गंभीर बताते हुए यह भी साफ़ किया था कि  अपर्णा के दिमाग की नसों को काफी नुकसान पहुंचा था.. पुलिस की जांच से यह बात साफ़ हुई कि अपर्णा पर हमला उनका यौन शोषण करने के इरादे से हुई थी|
जगह असम माना जाता है कि सेवन सिस्टर्स राज्य में महिलाओं की स्थिति सबसे अच्छी है वहां की नामी पत्रकार और महिला कार्यकर्ता बोंदिता आचार्य पर हमला सिर्फ इसलिए हुआ कि उन्होंने अपनी राय दर्ज की। बोंदिता ने अपने फेसबुक पर ये कहा कि असम राज्य में गाय का मांस खाना आम बात है। इसके बाद ही उनको बलात्कार, तेज़ाब से हमले, और मौत की धमकियाँ मिलने लगी। यह स्पष्ट है कि धमकियां देने वाले लोग कट्टर हिन्दुत्व विचारधारा वाले संगठनों से जुड़े हुए थे। यहां तक कि बजरंग दल ने एक प्रेसज्ञापन भी जारी किया था जिसमें उन्होंने बोंदिता से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने के लिए कहा।


5 सितंबर 2017 जगह बंगलूरू में वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या उनके अपने ही घर में गोली मारकर कर दी गई| वजह वह खुल कर उन चीजों के खिलाफ लिख रही थी जो समाज के विरूद्ध हैं| और जिनके नाम पर समाज को बांटने का काम तेजी से किया जा रहा है| विरोध की कीमत गौरी लंकेश को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी|



फरवरी 2017 जगह रामजस कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में एक सेमीनार के दौरान दक्षिणपंथी समर्थकों ने हंगामा कर दिया उन्होंने न सिर्फ स्टूडेंट्स को मारा अपितु पत्रकार भी उनके निशाने पर रहे उस हंगामें में कई पत्रकारों पर हमला हुआ जिनमें तीन महिला पत्रकार भी थी जिसमें दो पत्रकारों ने अपने नाम सहित अपने ऊपर हुए हमले को लेकर मीडिया के सामने अपनी बात रखी तो एक पत्रकार ने अपना नाम नहीं लेने की शर्त पर बात की| द क्विंट की रिपोर्टर तरुणि कुमार के ऊपर उस वक्त हमला हुआ जब वो पूरे मामले की क्विंट के हैंडल पर फेसबुक लाइव कर रही थीं जो अचानक बंद हो गया| फेसबुक लाइव के दौरान ही एक महिला बीच में आ गईं और उन्होंने बाल खींचना शुरू कर दिया| तरुणी के अनुसार ‘मेरा सिर झुका हुआ था और मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं कि कितने लोग मुझे पंच कर रहे थे| मुझे पुलिस ने आकर बचाया, तब तक मेरा लेपल माइक और चश्मा टूट चुका था| हमलावरों ने मेरा फोन छीन लिया था, जो मुझे महिला कांस्टेबल के ज़रिए मिला लेकिन उसकी स्क्रीन टूटी हुई थी| इस मारपीट में मेरा चश्मा गुम हो गया|’


वेबसाइट न्यूज़ क्लिक की कैमरामैन अपूर्वा चौधरी भी हमले का शिकार हुईं| उनकी पिटाई हुई और कैमरे का लेंस खींचने की वजह से वह टूटकर अलग हो गया|


पिछले दिनों एबीपी की रिपोर्टर निधी श्री ने न्यू इयर के समय शिमला में रिपोर्टिंग के वक्त लाइव कैमरे के सामने अपने साथ हुई बदतमीजी का वीडियो शेयर किया हालांकि निधी ने उस व्यक्ति को उसी समय थप्पड़ खींच कर जवाब दे दिया जब वह बदतमीजी कर रहा था लेकिन वहां का क्या जब आप बेकाबू हो रही भीड़ से घिरे हुए हों? अपना एक वाकया शेयर करती हूँ| पिछले साल नोटबंदी के दौरान नोयडा में एटीएम के बाहर रिपोर्टिंग करते वक्त ऐसा ही वाकया हुआ| मैं और मेरे तब के कैमरामैन गौतम जी को अचानक ही भीड़ ने घेर लिया| सरल शब्दों में समझाऊं तो ट्रोल्स थे वे लोग| मुझसे बात करते -करते अचानक ही उनमें से कुछ लोग बदसलूकी पर उतर आये और नौबत मारपीट तक पहुँच गई| मेरे पास वहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं था सिवाय इसके कि मैं उनका सामना पूरी मजबूती से करूँ| मैंने बहुत ही गुस्से में उनसे कहा कि “इस गलतफहमी में कत्तई मत रहना कि लड़की हूँ तो डर जाउंगी, ऑन कैमरा अभी यहीं पहले पटक के मारूंगी फिर रिपोर्टिंग भी करुँगी| बेहतर होगा कि हमें शान्ति से हमारा काम करने दो” हालांकि इसके अपने खतरे थे कुछ भी हो सकता था लेकिन इसके अलावा मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था अन्दर का डर दिखाने का मतलब था पता नहीं क्या होता| पर दिन अच्छा था ट्रिक काम कर गई और हमलोगों को रास्ता दिया गया| मैं और गौतम जी वहां से निकल आये, थोड़ी देर शांत रहे फिर गौतम जी ने हंस कर कहा वैसे श्वेता जी डायलॉग अच्छा था …  ‘ऑन कैमरा पटक के मारूंगी’….. मुझे भी सोच कर हंसी आ गई| पर अब जबकि इस तरह की घटनाओं को आम होते हुए देख रही हूँ तो मन में एक अजीब सा डर बैठ रहा है कितना मुश्किल हो गया है रिपोर्टिंग करना पता नहीं कब आपके साथ छेड़खानी हो जायेगी, कब आप पीट दिए जायेंगे कुछ पता नहीं| सड़क पर स्टेट मशीनरी दौड़ा कर आपके कपड़े फाड़ेगी| आपके लगातार चिल्ला चिल्ला कर बताने के बावजूद कि हमें छोड़ों हम पत्रकार हैं स्टूडेंट्स या आन्दोलनकारी नहीं| आपका इंस्ट्रूमेंट तोड़ कर फेंक दिया जाएगा महिला पुलिस की छोड़िये पुरुष पुलिसकर्मी आपको पकड़ेगा, कभी अनजाने तो अधिकतर जानबूझ कर यहाँ वहां हाथ लगाएगा| आपको क्या लगता है भीड़ से भरी जगह पर रिपोर्टिंग करना आसान होता है?  बिलकुल नहीं.. और यह खतरा तब कई गुना और बढ़ जाता है जब रिपोर्टर महिला हो| भीड़ की अपनी एक मानसिकता होती है जिसे आप बदल नहीं सकते वह कब क्या करेगी अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल होता है| लेकिन काम तो काम है अगर डर गए तो काम कैसे करेंगे? फिर तो सबका कहना मानो और घर बैठो बस यही रास्ता बचा है ले देकर|



इन सभी घटनाओं को ध्यान से देखे तो सभी महिला पत्रकारों पर अलग-अलग कारणों से हमले हुए हैं किसी की वही राजनीति रही तो किसी कि यौनिकता पर सवाल यह है कि आखिर क्यों? एक पत्रकार कि यह ड्यूटी है कि वह लोगों तक ख़बरें पहुंचाए लेकिन अगर इसी तरह पत्रकारों पर हमले होते रहे तो फिर काम करना कैसे संभव होगा|

इन सब में सबसे ज्यादा जरूरी बात की एक महिला पत्रकार होने के नाते बहुत सारे डर एक साथ आते हैं| पहला डर तो परिवार से ही होता है आज के समय में भले ही माँ-बाप अपनी बच्चियों को पत्रकारिता को कैरियर के रूप में अपनाने की सलाह देने लगे हैं लेकिन हमारे समय तक भी यह थोड़ा मुश्किल था| सबको लगता था कि एक तो पत्रकारिता दूसरे लड़की| कहाँ गली-गली दौड़ती फिरोगी| मेरी एकाध बैचमेट को छोड़ दूँ तो किसी ने भी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद भी इसे कैरियर के रूप में नहीं अपनाया… ज्यादातर टीचिंग में हैं वह भी दुबारा बीएड करके| सारे हमले छोड़ कर जेएनयू प्रोटेस्ट के दौरान हुए हमले की बात करें तो यह हमला एक फोटो जर्नलिस्ट पर हुआ है| कंधे पर भारी कैमरे का बोझ उठाए फिल्ड में निकलने वाली फोटो जर्नलिस्ट की संख्या आप उँगलियों पर गिन सकते हैं मतलब साफ़ है कि इस फिल्ड में महिलाओं की धनक अभी हो ही रही है ऐसे में अगर शुरुआती दौर में ही उन पर इस तरह के हमले शुरू हो जाएंगे वह भी स्टेट मशीनरी की तरफ से तो आप अंदाजा लगाइए कि क्या इस फिल्ड की तरफ महिलाएं बढ़ेंगी शायद नहीं… मीडिया में वैसे भी ज्यादातर टेक्निकल और नॉन टेक्निकल पदों पर अभी भी पुरुषों का ही वर्चस्व है और अगर हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले समय में इसे तोड़ना लगभग मुश्किल ही होगा| आज भी मीडिया में महिलाओं को लेने से लोग हिचकते हैं इसका एक कारण शिफ्टों में काम भी है अक्सर लोग कहते हैं कि अगर महिला हुई तो वह नाईट शिफ्ट में काम नहीं करेगी .. कारण फिर वही महिला सुरक्षा| देश की राजधानी में एक महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी वह भी स्टेट रिप्रजेंटेटिव के द्वारा सोच कर देखिये कि यह कितना भयावह है| आप मार रहे हैं, कथित तौर पर  मालेस्ट कर रहे हैं.. वीडियों में साफ़ दिखाई दे रहा की पुलिसकर्मियों ने खिंच कर कपड़े फाड़ दिए| यह कैसा विद्वेष है सिर्फ इसलिए कि आपकी कारगुजारी लोगों के सामने न आ जाए? अगर देश की राजधानी का यह हाल है तो बाकी जगहों का क्या हाल होगा?

मिडिया स्टडीज ग्रुप द्वारा किये गए एक शोध की माने तो मीडिया में महिलाओं का प्रतिशत बहुत ही कम है यह लगभग 2.7 है जो कि वास्तव में बेहद कम है इसमें भी अगर ध्यान देंगे तो फिल्ड रिपोर्टिंग में तो बहुत ही कम है|



पिछले कुछ दिनों में पत्रकारों पर हमले बहुत तेजी से बढ़े हैं और उनमें भी अगर हम ऊपर दिए गए आंकड़ों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि महिला पत्रकारों के प्रति होने वाले हमले में साल दर साल बढ़ोत्तरी हुई है| अगर इसी तरह से महिला पत्रकारों पर हमले होते रहे तो यह प्रतिशत बढ़ने की बजाय और घट ही जाएगा|

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com