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नाबालिग से बलात्कार मामले में आसाराम को मृत्युपर्यंत जेल की सजा

आज की तारीख महिला अधिकार के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि आज जोधपुर के एक न्यायालय ने नाबालिग से बलात्कार के आरोपी आसाराम (आसाराम बापू) को  मृत्युपर्यंत जेल की सजा दी है. एक ऐसे रसूखदार आरोपी को सजा दिलवाने में पीड़िता के संघर्ष की सिर्फ कल्पना की जा सकती है, जिसके खिलाफ चलने वाले मामलों के गवाह या तो गायब हो जाते रहे हैं या संदेहास्पद मौत के शिकार होते रहे हैं. इसे एक सीख की तरह लेनी चाहिए कि बेटियों को ऐसे बाबाओं और गुरुओं से दूर रखें.

जोधपुर की एक अदालत ने आसाराम को उम्र कैद की सजा सुनाई है। बाकी दो दोषियों शिल्पी उर्फ संचिता गुप्ता(सेविका), शरदचंद्र उर्फ शरतचंद्र को 20-20 साल की सजा सुनाई है। इससे पहले कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए शिवा उर्फ सवाराम (आसाराम का प्रमुख सेवादार), प्रकाश द्विवेदी (आश्रम का रसोइया) को दोषमुक्त कर दिया था। कोर्ट ने माना है कि आसाराम ने ही नाबालिग से बलात्कार किया था।

इस मामले में अंतिम सुनवाई एससी/एसटी की विशेष अदालत में सात अप्रैल को पूरी हुई थी और अदालत ने फैसले को सुरक्षित रखते हुए 25 अप्रैल को सुनाने की बात कही थी। आसाराम को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की एक किशोरी की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया था। पीड़िता आसाराम के मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा आश्रम में अध्ययन करती थी। पीड़िता का आरोप था कि आसाराम ने जोधपुर के पास मनाई इलाके में अपने आश्रम में बुलाकर उससे 15 अगस्त, 2013 को रेप किया था।

फैसले के बाद नाबालिग के पिता ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। पिता ने कहा कि हमें न्याय मिला। जिन लोगों ने हमारा साथ दिया हम उनका शुक्रिया अदा करना चाहते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि अब आसाराम  को कड़ी सजा दी जाएगी।

इसके पहले भी कई कथित संतों, बाबाओं पर लगे हैं बलात्कार के आरोप, हुई है सजा. 

गुरमीत राम रहीम :गुरमीत राम रहीम को सीबीआई की विशेष अदालत ने बलात्कार के आरोप में सजा सुनायी थी. राम रहीम के  डेरा सच्चा सौदा पर इसके आलावा आरोप था कि इस केस को दबाने के लिए एक शिकायतकर्ता साध्वी के भाई की हत्या करवा दी और इस केस की रिपोर्टिंग कर रहे एक पत्रकार की भी हत्या करवा दी थी.  25 अगस्त 2017 को इस मामले में पंचकुला की विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम को दोषी माना और 28 अगस्त 2017 को सज़ा सुनायी, जिसके बाद राम रहीम के लोगों ने हरियाणा में काफी हंगामा, उपद्रव, हिंसा की थी.

बाबा परमानंद : बाराबंकी जिले के देवां कोतवाली क्षेत्र स्थित हर्रई धाम के बाबा परमानंद नाम से प्रसिद्ध बाबा रामशंकर तिवारी पर आरोप है कि वो बच्चे पैदा करने के नाम पर महिलाओं से रेप करता था. पुलिस ने उसे 24 मई 2016 को गिरफ्तार कर लिया था. बाबा परमानंद पर 12 मुकदमे दर्ज हैं जिनकी सजा वो अब भी जेल में काट रहा है.

संत रामपाल : रेप, यौन शोषण जैसे कई आरोपों को लेकर संत रामपाल की गिरफ्तारी 20 नवंबर 2014 को हुई. खबरों के अनुसार रामपाल लड़कियों को अपने एक किले में बंधक बनाकर रखता था, जिन्हें वो साधिकाएं बुलाता था. इनमें से कुछ को वो अपने कमरे में बुलाता और शारीरिक संबंध बनाता था.  बबिता कुमारी रामपाल की सबसे खास साधिका थीं, जिसकी उम्र लगभग 27 साल थी. पुलिस के अनुसार ‘रामपाल के कमरे से प्रेग्नेंसी किट और सेक्स पावर बढ़ाने वाली दवाइयां भी मिली थीं’.

नित्यानंद :बंगलुरु के बिदारी में स्थित अधीनम मठ के 293वें प्रधान नित्यानंद को जून 2012 में रेप और यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किए थे. नित्यानंद की एक शिष्या ने उनका पूरा काला चिट्ठा खोला था, शिष्या के अनुसार उसके साथ नित्यानंद ने कई बार रेप किया. किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी भी दी. उसका दावा था कि नित्यानंद के तमिल हिरोइन के साथ जो सेक्स टेप सामने आए थे, वो शूट उसी ने किए थे.

संत स्वामी भीमानंद : फरवरी 2010 में दो एयरहोस्टेस समेत आठ लोगों को सेक्स रैकेट चलाने के मामले में गिरफ्तार किया गया तो मामले का खुलासा हुआ. तो इन लोगों से पूछताछ हुई तब पता चला कि इस पूरे गिरोह का मास्टरमाइंड 39 साल का शिवमूरत द्विवेदी है. जिसे दुनिया इच्छाधारी संत स्वामी भीमानंद जी महाराज चित्रकूट वाले के नाम से जानती है. भीमानंद 2010 से ही जेल में सजा काट रहा है.

तस्वीरें गूगल से साभार 

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आदिवासी युवती की हत्या को आत्महत्या करार देने की पुलिसिया साजिश (सामूहिक बलात्कार की भी आशंका)

किसके दवाब में वर्धा, महाराष्ट्र  की पुलिस, महिला एसपी सहित, आदिवासी युवती की हत्या को आत्महत्या करार देने में लगी है? लाश जिस हालत में मिली है उससे उसके साथ सामूहिक बलात्कार की भी आशंका जता रहे आदिवासी नेता और उसके परिवार के लोग.  शुभांगी संभरकर  एवं डॉ. मुकेश कुमार की रिपोर्ट: 

वर्धा, 24 अप्रैल, 2018. महाराष्ट्र के वर्धा जिले के दहेगाव में एक 19 वर्षीय आदिवासी युवती शुभांगी ऊईके की गैंगरेप के बाद बर्बरतापूर्ण हत्या का मामला सामने आया है। युवती की नग्न और क्षत-विक्षत लाश बरामद हुई, किन्तु पुलिस ने उसे आत्महत्या का मामला ठहराकर दबाने की कोशिश की। आदिवासी भूमिहीन किसान परिवार की यह बेटी अपने पूरे गाँव में पढ़ाई में काफी होशियार और हिम्मती लड़की मानी जाती थी। वर्ष 2016 में उसने दसवीं कक्षा में दहेगाव के यशवंत स्कूल में टॉप किया था। गाँव की अन्य लड़कियों के माता-पिता भी अपनी लड़कियों की सुरक्षा के प्रति शुभांगी पर भरोसा रखते थे और कहते थे कि चलो शुभांगी के साथ पढ़ने जा रही है तो चिंता की कोई बात नहीं। उसे पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और प्रकृति से काफी लगाव था।

ज्ञात हो कि शुभांगी का 19 मार्च 2018 की शाम को अपहरण कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। उसके बाद साक्ष्य मिटाने की मंशा से जालिमों ने पहले उसकी हत्या कर निर्वस्त्र अवस्था में ही उसकी लाश को रेल पटरी पर लिटा दिया। मुम्बई- नागपुर रेल मार्ग पर ट्रेन के गुजरने से उसका शव टुकड़ों में बंट गया। कमर से ऊपर और नीचे दो टुकड़ों में शव बरामद हुआ। उसका सिर इतनी बुरी तरह से कुचला हुआ था कि लाश को पहचानना भी मुश्किल था। प्रथम द्रष्टया ही यह पूरा मामला ठंढे दिमाग से रची गई गैंगरेप-ह्त्या की साजिश मालूम पड़ती है। इस पूरे घटनाक्रम को तफसील से समझने पर पूरा चित्र सामने आ जाता है। मृतक युवती के परिजन बताते हैं कि 13 मार्च 2018 को शुभांगी अपने पूरे परिवार के साथ जोगा गाँव (तालुका- सावनेर, जिला- नागपुर) अपने रिश्तेदार के यहाँ एक शादी में गई थी। शादी के बाद 15 मार्च 2018 को शुभांगी के परिजन घर लौट आए। चार दिन बाद यानी 19 अप्रैल 2018 को अपने चचेरे भाई के साथ मोटर साइकिल से तकरीबन 11:30 बजे दिन में वह दहेगाव अपने गाँव की ही एक सहेली की बड़ी बहन की सगाई में शामिल होने के लिए आई। दहेगाव पहुँचने के बाद वह दहेगाव चौक पर ही उतर गई और गाँव की अपनी अन्य दो सहेलियों से मिली। उसके कुछ देर बाद अपनी एक सहेली के साथ वह दोपहर में यशवंत कॉलेज माहाविद्यालय दहेगाव कॉलेज अपने काम से गई। उसके गाँव के एक व्यक्ति सुनिल नारायण खंडाते ने लगभग 1:30 बजे के दौरान उसे गाँव के दो युवक (विवेक लोटे और कुळसंगे) के साथ बातचीत करते हुए देखा भी था। इस दौरान उसके साथ उसकी एक सहेली भी पूरे समय तक मौजूद थी।

पुलिस द्वारा शुभांगी की सहेलियों और उक्त दोनों युवकों से ली गई गवाही के मुताबिक़ उनकी मुलाकात हुई और बातचीत खत्म होने के बाद शुभांगी ने उसमें से एक युवक को अपना मोबाइल चार्ज करने के लिए दे दिया। और फिर वहां से दोनों सहेलियां सगाई में पहुँची। शाम के लगभग 4:30 बजे तक शुभांगी अपनी सारी सहेलियों के साथ सगाई में रही। इसके बाद शुभांगी की सारी सहेलियां अपने-अपने घर चली गईं और शुभांगी अपने घर की तरफ रहने वाली एक सहेली के साथ अपने घर को निकल गई। दोनों दहेगाव के गुरुदेव चौक पहुँची, वहाँ से उसकी सहेली अपने घर चली गई। गुरुदेव चौक से शुभांगी का घर लगभग डेढ़ किमी की दूरी पर है। शुभांगी अकेली अपने घर की ओर चल पड़ी लेकिन वह घर नहीं पहुँच पाई।

शाम लगभग 6:30 बजे के आस-पास शुभांगी की बड़ी बहन ने उसकी एक सहेली को फोन किया और पूछा कि शुभांगी अभी तक घर क्यों नहीं आयी? इसपर उसकी सहेली ने बताया कि वह तो घर के लिए लगभग 4:45 बजे ही निकल गई थी। मृतक की बहन ने उसकी सहेली को सूचित किया कि शुभांगी अभी तक घर नहीं पहुँची है। इसके बाद शुभांगी की उस सहेली ने विवेक लोटे नामक युवक को कॉल करके बताया कि शुभांगी अभी तक घर नहीं पहुँची है। शुभांगी के लापता होने की खबर सुनकर उसकी सहेलियां भी उसे ढूंढने के लिए निकल पड़ी। लेकिन शुभांगी का कोई पता नहीं चल पाया।

रिजनों ने बताया कि इस घटना की जानकारी मिलने पर शुभांगी की सहेलियाँ उसके घर आई और शुभांगी के न मिलने पर सभी चिंतित हो उठे। और उसके पिता, भाई और चचेरा भाई 19 तारीख को ही लगभग 9:30 से 10:30 रात्रि के बीच दहेगाव पुलिस स्टेशन एफआईआर कराने पहुँचे। ‘शुभांगी का आवासीय प्रमाण-पत्र लेकर आओ तब 24 घंटे के बाद एफआईआर दाखिल करेंगे’- यह कहकर पुलिस द्वारा शुभांगी के परिजनों को वापस भेज दिया गया। निराश व बेबस होकर परिजनों को घर लौटना पड़ा।

20 अप्रैल 2018 को सुबह परिजनों को पता चला कि रेलवे ट्रैक पर रात में किसी 35 वर्ष के आस-पास के उम्र की महिला का कटा हुआ शव मिला है। इस सूचना पर परिजनों को लगा कि शुभांगी तो सिर्फ उन्नीस साल की है, इसी कारण लाश को देखने कोई नहीं गया। पुलिस ने लाश को तब तक पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। किन्तु 9 बजे सुबह के आसपास शुभांगी का भाई और उसकी एक सहेली के पिता जिस जगह से लाश बरामद हुई थी, वहां देखने पहुंचे तो उन्हें एक सफ़ेद स्टॉल, चप्पल और पैर का कटा हुआ पंजा दिखा। हालांकि इसके आधार पर वे लोग भी इसकी शिनाख्त नहीं कर पाए और वहां से लौट आये। कुछ देर बाद शुभांगी की मां भी घर आ गई, जो अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ गई हुई थी। मां को जब इसकी जानकारी मिली तो वह रेलवे पटरी पर यह देखने पहुँची कि कहीं वह शुभांगी के ही कपड़े आदि तो नहीं हैं। जब कटे हुए पंजे और दुपट्टे को उन्होंने देखा तो मानो उनके पैरों के निचे से जमीन खिसक गई। उन्होंने तुरत अपनी लड़की के पैर का पंजा, सफेद दुपट्टा और चप्पल पहचान ली। उन्हें लेकर वे पुलिस स्टेशन पहुँचे, लेकिन फिर भी पुलिस ने उनकी एफआईआर दर्ज नहीं किया और उलटा लड़की की माँ को यह कहते हुए डांट-फटकार लगानी शुरू की कि- ‘अपनी लड़की को तुमने किस तरह के संस्कार दिये हैं!’ इससे भी पुलिस की पितृसत्तात्मक स्त्रीविरोधी मानसिकता का पता चलता है। उसके बाद पुलिस ने उनके पास से शुभांगी के पैर का पंजा और अन्य बरामद सामान लेकर पैर के पंजे को भी वर्धा के सरकारी अस्पताल भेज दिया। पुलिस के द्वारा यह कहा गया कि पोस्टमार्टम के बाद पहले शव का अंतिम संस्कार कर लो उसके दो- तीन दिन बाद एफआईआर होगा।

शुभांगी की माँ के अनुसार बीस अप्रैल की शाम को उसकी कुछ सहेलियां भी एफआईआर दर्ज कराने पुलिस थाने गई थी किन्तु पुलिस ने उनकी भी एफआईआर दर्ज नहीं की। इन लड़कियों का कहना था कि गाँव का एक लड़का शुभांगी को पहले से ही छेड़ता रहता था।

मृतक शुभांगी जिस हालत में रेलवे पटरी पर पाई गयी थी वह अत्यंत  संदेह पैदा करती है। लाश पूरी तरह से नग्न थी और लाश के दो टुकड़े ऐसी जगह से हुए थे कि बलात्कार के मेडिकल रिपोर्ट की जांच ही न हो पाये। इतने सारे प्राथमिक सबूतों के बावजूद शुरू से ही पुलिस इस पूरे मामले को आत्महत्या करार देकर रफा-दफा करने की कोशिश में जुटी रही। युवती की लाश निर्वस्त्र स्थिति में पायी गई थी। इससे अहम् सवाल तो यह पैदा होता है कि कोई लड़की निर्वस्त्र होकर आत्महत्या क्यों करेगी? मृतक के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था, सिर्फ उसकी समीज हाथ में टंगी थी जिस पर खून का एक कतरा तक नहीं था। शव कमर के नीचे से कटी हुई थी और सिर पूरी तरह से तहस-नहस था। सिर से भेजा व नसें पटरी पर बिखरी पड़ी थीं और सिर के बाल बिखरे पड़े थे। आंख सफेद होकर बाहर निकल आई थीं और मानो कुछ कह रही थी। उसके अंगों मे नुकिले पत्थर धंस गए थे। एक पैर के दो टुकड़े और दूसरे पैर का सिर्फ एक पंजा और कुछ छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे पड़े थे।

इसके बावजूद पुलिस युवती के निर्वस्त्र शव की बरामदगी को छिपाने में लगी हुई है। पूरे मामले में स्थानीय पुलिस की खुलकर लापरवाही सामने आई है। एक तो पुलिस ने पहले एफ़आईआर दर्ज करने में ही आनाकानी की और जब सामाजिक दबाव बना तब पुलिस ने घटना के सात दिन बाद दर्ज की। दर्ज एफआईआर में पुलिस ने शातिराना ढंग से झूठी कहानी गढ़ते हुए इसे आत्महत्या करार देने की ही कोशिश की। इसके लिए पुलिस ने कई गवाह भी तैयार कर लिए। पुलिसिया एफ़आईआर के मुताबिक़ अनिल कुमार सचान (स्टेशन प्रबंधक) तुलजापुर तहसील सेलू इनके जरिए राष्ट्रपाल दादाजी माटे (उम्र 53 वर्ष) साल, काम नौकरी (काटेवाले) निवासी दहेगाव (ग्रामीण) ने पुलिस स्टेशन में जाकर लिखित पत्र दिया कि तुलजापुर से सेलू रोड स्टेशन के दरम्यान अप मार्ग पर एक महिला की लाश (लगभग उम्र 35 साल) पड़ी है। इसके अनुसार स्टेशन डायरी अमलदार पुलिस हवलदार संतोष कामडी (बैच नम्बर-713) ने 19 अप्रैल को लगभग 18:10 (शाम 6 बजकर 10 मिनट पर) दर्ज किया। ड्यूटी पर तैनात पुलिस हवलदार संघपाल इंगोले (बैच नम्बर-1065) और सिपाही रवि पुरोहित (बैच नम्बर-1245) दो पंचों के साथ घटना स्थल पर जाकर पंचनामा कर लाश को वर्धा स्थित सरकारी अस्पताल भेज दिया। दर्ज एफआईआर में पुलिस ने यह भी लिखा कि अँधेरे की वजह से मृतक के शरीर के सारे अंग बरामद नहीं हो पाए थे, जिसे अगले दिन यानी 20 मार्च को प्रातः कुछ पंचों के साथ घटना स्थल पर जाकर इकठ्ठा कर पुनः वर्धा अस्पताल पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया। जबकि सच्चाई यह थी कि मृतक युवती के परिजनों ने यह सब रेलवे ट्रैक के आसपास से बरामद कर स्थानीय पुलिस को सौंपा था।

अखिल भारतीय गोंडवाना पार्टी के विदर्भ अध्यक्ष चंद्रशेखर मडावी ने बताया कि जब 24 तारीख को वे मृतक के परिजनों से मिलने गये तो परिजनों ने उनके समक्ष पूरी घटना बयान की। इसके बाद वे दहेगाव पुलिस स्टेशन पुलिस से मामले की जानकारी लेने पहुंचे। पूछताछ के दरम्यान पुलिस कर्मियों ने कई निराधार बयान दिए, जो घटना से मेल नहीं खा रहे थे। तब तक पुलिस ने कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं किया था। चंद्रशेखर के कहने पर भी पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं किया। इसके बाद 26 मार्च को मृतिका के परिजन वर्धा जिले के जिला परिषद अध्यक्ष नितिन मडावी से मिलने उनके वर्धा स्थित कार्यालय पहुंचे। युवती के माता-पिता ने जिप. अध्यक्ष को पूरे मामले की विस्तृत जानकारी दी। सारी बात जान लेने के बाद जिला परिषद अध्यक्ष ने एसपी को फोन पर घटना के बारे में बताया। तदुपरांत एसपी ने उन्हें उक्त गाँव जाने का आश्वासन दिया। इस संदर्भ में वर्धा जिला पुलिस अधीक्षक (एसपी) निर्मला देवी 26 मार्च की शाम 4 बजे दहेगाव पहुँची। पुलिस स्टेशन पर पहले से ही अखिल भारतीय गोंडवाना पार्टी के चन्द्रशेखर मडावी मौजूद थे। उस वक्त सभी लोगों ने पुलिस थाने को घेर कर रखा था। एसपी ने पुलिस थाने के दरवाजे पर आकर सबके सामने लोगों से बातें की। चंद्रशेखर ने 24 मार्च को पुलिस विभाग द्वारा दिए गए निराधार बयानों को एसपी के सामने उजागर किया था कि किस तरह उनके पुलिस अधिकारी और कर्मचारी घटना के पहले दिन से ही इस हत्या को आत्महत्या का रूप देना चाह रही थी जिसमें स्थानीय पुलिस अब तक कामयाब रही। पुलिस ने शुरू से ही लापरवाह एवं पितृसत्तात्मक दुर्भावना से ग्रस्त होकर घटना की छानबीन ही नहीं की और झूठी कहानी गढ़कर जांच को उस दिशा में जाने ही नहीं दिया। जिसके कारण पूरा मामला ही डायल्यूट हो गया। थानेदार विलास काळे, केस के जांच अधिकारी रामकृष्ण गजानन भाकडे तथा पुलिस कांस्टेबल रवि पुरोहित ने घटना को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। इतना ही नहीं पुलिस ने उलटी दिशा में काम करते हुए मृतक की लाश निर्वस्त्र प्राप्त होने के बावजूद इस बात को दबाते हुए उसे कपड़े पहने हुए बताने का षड्यंत्र रचती रही।

चंद्रशेखर ने हमें बताया कि इस बारे में उन्होंने जब एसपी को जानकारी दी कि 19 से 24 मार्च तक मृतक की मृत देह पर कोई कपड़े न मिलने की बात सर्वविदित थी, किन्तु जैसे ही हमने इसपर सवाल उठाया उसके आधा घंटे बाद पुलिस मृतक के कपड़े प्राप्त होने और उसे परिजनों को सौंपने की बात कहने लगी। स्थानीय पुलिस ने पहले बताया कि कपड़े मृतक के मामा को दे दिया गया था। लेकिन जब परिजनों ने मृतक के मामा को पुलिस की मौजूदगी में ही फोन लगाकर इसके सम्बन्ध में पूछा तो इस बात से मामा ने साफ़ इन्कार किया। तब पुलिस बताने लगी कि मामा को नहीं बल्कि मृतक के पिता को कपड़े सौंपे गए। स्थानीय पुलिस के क्षण-क्षण बदलते इन बयानों को देखते हुए गोंडवाना पार्टी ने इस हत्या को आत्महत्या का रुप देने के जिम्मेदार पुलिस कान्सटेबल रवि पुरोहित को घटना के दिन मृतक की लाश को उठाने के बाद आये फोन कॉल की उच्चस्तरीय जांच किए जाने की मांग उठाई है।

पुलिस के समक्ष चंद्रशेखर ने दुष्कर्म के बाद हत्या कर लाश को रेलवे ट्रैक पर फेंके जाने की आशंका व्यक्त की। चन्द्रशेखर ने हमें बताया कि घटना स्थल पर जिस जगह शुभांगी के साथ दुष्कर्म हुआ उस स्थल से रेल-लाईन केवल आठ सौ मीटर की दूरी पर है। उनके बताए हुए बातों की सच्चाई जानने के लिए स्वयं एसपी अपनी टीम, चंद्रशेखर और अन्य चार लड़कों के साथ रात के समय मोबाईल टार्च की रौशनी में घटना स्थल पर पहुँची। उस जगह को देखने के बाद चंद्रशेखर ने थानेदार काळे के समक्ष यह पूछा कि उस स्थल पर मृतक शुभांगी खुद आयी थी या लायी गई थी? क्योंकि खोजी कुत्ते ने वो जगह पहले ही थानेदार को दिखाई थी। किन्तु थानेदार ने अपनी छान-बीन में उस जगह को अनदेखा कर दिया था। जबकि एसपी के सामने उन्होंने कबूल किया कि उन्हें खोजी कुत्ते ने यहाँ लाया था। वहाँ से जहाँ शुभांगी की लाश रेलगाड़ी से कटी थी वह दूरी मात्र 800 से 900 मीटर दाहिने तरफ थी, उसके ठीक बाईं ओर गाँव है। इस कारण गाँव की तरफ के ट्रैक पर न ले जाकर उसे दाहिने तरफ के रेल ट्रैक पर लाया गया। इससे साफ़ जाहिर होता है कि उसी स्थल पर उसे निर्वस्त्र कर सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर दी गई। अगर युवती को ट्रेन से कटकर आत्महत्या ही करनी थी तो फिर उसे न तो इतनी दूर आने की ही जरुरत थी और दूसरी बात तो यह भी कि निर्वस्त्र होकर किसी लड़की के आत्महत्या करने का कोई कारण नहीं हो सकता है! एसपी ने भी कबूल किया कि इतनी दूर आकर कोई आत्महत्या क्यों करेगा?

हमारी टीम के सदस्यों ने जब गाँव के कुछ लोगों से बात की तो पता चला कि शुभांगी काफी होनहार और निडर लड़की थी। वह किसी से भी डरती नहीं थी। लोगों ने तो इतना तक बताया कि किसी अकेले निहत्थे आदमी का उस पर काबू पाना संभव नहीं था। ग्रामीणों का स्पष्ट मानना था कि यह आत्महत्या न होकर सामूहिक बलात्कार कर की गई हत्या का मामला है। स्थानीय लोगों ने यह भी बताया कि शुभांगी का गाँव के ही एक युवक के साथ प्रेम संबंध था, किन्तु कोई अकेला आदमी ऐसा काम नहीं कर सकता।

30 मार्च 2018 को वर्धा की एसपी निर्मला देवी ने भी मीडिया को दिए अपने वक्तब्य में दहेगांव पुलिस की बात को सही ठहराते हुए इसे आत्महत्या करार दिया। एसपी की ओर से जारी वक्तब्य के अनुसार दिनांक 19 मार्च 2018 को 18:00 बजे यानी शाम 6 बजे पुलिस स्टेशन दहेगाव (गोसावी) के अंतर्गत तुलजापुर रेलवे स्टेशन के सामने थपकी क्षेत्र में रेलवे ट्रैक अप मार्ग पर एक अनजान स्त्री का मृत देह मिलने के आशय का मामला पुलिस स्टेशन दहेगाव (ग्रामीण) में दर्ज किया गया था। मृतक की शिनाख्त दिनांक 20 मार्च 2018 को शुभांगी पिलाजी उईके, उम्र 19 वर्ष रहिवासी दहेगाव (गो) तहसील सेलू, जिला वर्धा के रूप में हुई। एसपी ने आगे कहा कि इस घटना की छानबीन में यह पाया गया कि यह घटना केस नम्बर- 028/2018, भारतीय दंड विधान की धारा-306, 201, 501 के तहत दर्ज किया गया था।

मृतक के परिजनों व कुछ सामाजिक संगठनों ने यह आरोप लगाया था कि ‘मृतक की लाश घटना स्थल पर निर्वस्त्र स्थिति में प्राप्त हुई थी। इसलिए यह घटना सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या कर मृतक को रेलवे ट्रैक पर फेंक देने का है।’ उक्त पुलिसिया बयान में इसकी सफाई पेश करते हुए कहा गया है कि इस घटना की छानबीन पुलिस अधिक्षक निर्मलादेवी, उपविभागीय पुलिस अधिकारी माधव पड़ीले के मार्गदर्शन में पुलिस निरिक्षक विलास काले, प्रभारी पुलिस निरिक्षक दहेगाव, पुलिस उपनिरिक्षक भाकडे, पुलिस हवलदार जावेद धामीया, पवन देवगिरकर, सुनील चावरे आदि ने किया। इस जांच से यह साबित हुआ कि शुभांगी उईके का दहेगाव के एक 19 वर्षीय युवक के साथ 2 साल से प्रेम संबंध था और इन दोनों के आपसी झगड़े के कारण मृतक ने बिलासपुर से एर्नाकुलम की ओर जानेवाली ट्रेन नम्बर-22815 के सामने चलकर आत्महत्या की है। पुलिस ने साक्ष्य के बतौर प्रत्यक्षदर्शी गवाह के रूप में इस ट्रेन के लोको-पायलट एवं सहायक लोको-पायलट का बयान पेश करने का दावा किया है।

पुलिस ने आगे अपने वक्तब्य में कहा है कि मृतक और आरोपी युवक के मोबाइल सीडीआर का भी विश्लेषण किया गया है। मृतक ने कथित प्रेमी युवक को अपने मोबाइल से कुछ मैसेज भी भेजे थे, जिसे बतौर साक्ष्य सुरक्षित रखा गया है। युवक ने मृतक के व्हाट्सएप पर दोनों के एक साथ का फोटो डी.पी डाल रखा था। उस फोटो को हटाने के लिए शुभांगी ने उसे बार-बार आग्रह किया और कहा कि उस डीपी को कोई देख लेगा तो मेरी बदनामी होगी। इसके कारण मृतक दु:खी थी और इसी कारण से ही दोनों में मनमुटाव हुआ और पीड़िता ने आत्महत्या कर ली। पूरी पुलिसिया जांच फिलहाल इसी बात को सही ठहराते हुए अपनी लापरवाही को छिपा रहा है और युवती के कातिलों को बचा रहा है।

मृतक का जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त हुआ है उसमें भी मृत्यु का कारण अति रक्त स्राव एवं गंभीर चोट बताया गया है। जिला मुख्यालय के पुलिस अधिकारी जन-आक्रोश को ठंढा करने और लापरवाही के दोषी स्थानीय पुलिसकर्मियों को बचाने का दोहरा खेल खेल रहे हैं। जिला पुलिस एक तरफ तो स्थानीय पुलिस द्वारा युवती की मौत की गढ़ी गई झूठी कहानी को सच मान रही है वहीं दूसरी तरफ युवती की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने गए परिजनों की शिकायत को दर्ज न करने तथा प्राथमिक स्तर पर केस की छानबीन में लापरवाही बरतने वाले स्थानीय पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही का ढोंग भी कर रही है। जन दबाव के कारण इस घटना के आरोपी युवक को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। 3 अप्रैल को 5 हजार से ज्यादा लोगों ने वर्धा शहर में सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया था, उसके दबाव में मामले की आगे की छानबीन का जिम्मा पुलिस उप अधीक्षक पराग पोटे को सौंपा गया है। किन्तु पुलिस महकमे के रवैये से जाहिर होता है कि इस पुलिसिया जांच से मृतक के परिवार को इन्साफ मिलेगा, इसकी संभावना कम ही है। 19 अप्रैल को अनुसूचित जनजाति आयोग, नई दिल्ली की सदस्य मायाताई इवनाथे द्वारा इस केस को सीबीआई को सौंपे जाने का एसपी को सूचित किया है।
अब तक इस मामले को लेकर 1 अप्रैल 2018 को आदिवासी और अन्य जनसमुदाय के द्वारा नागपुर के संविधान चौक पर कँन्डल जलाकर न्याय की आवाज बुलंद की। वर्धा शहर में 3 अप्रैल 2018 को इस सवाल पर विशाल प्रदर्शन हुआ, जिसमें तकरीबन पांच हजार लोग सड़कों पर उतरे और जुलूस निकालते हुए कारला चौक से बजाज चौक होते हुए जिलाधिकारी कार्यालय तक की लगभग 6 किमी की दूरी तय करते हुए पहुंचे। जिलाधिकारी कार्यालय में ज्ञापन सौंपा और कार्यालय के समक्ष एक सभा के माध्यम से जोरदार तरीके से इन्साफ की आवाज उठाई। सभा में नेताओं ने इस घटना की जांच सीबीआई से कराये जाने की भी मांग की है। सभा में आरोपियों को कड़ी सजा देने तथा दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही की मांग भी मांग की गई। मामले को तूल पकड़ता हुआ देख वर्धा के स्थानीय विधायक ने भी इस मामले पर मुख्यमंत्री से हत्यारों की गिरफ्तारी और दहेगाव पुलिस थाने के थानेदार काले, भाकडे, रवि पुरोहित आदि अधिकारियों पर कार्यवाही की मांग की है। जिला परिषद अध्यक्ष नितिन मडावी ने अपने  निवास स्थान पर आयोजित पत्रकार वार्ता में दहेगाव (गोसावी) पुलिस थाना अंतर्गत शुभांगी उईके की हत्या मामले की सीबीआई  से जांच कराने की मांग की है। 20 अप्रैल को आसिफा के न्याय के लिए वर्धा शहर में निकाले गए विशाल मार्च में भी शुभांगी के हत्यारों की गिरफ्तारी व सजा देने की मांग उठाई गई थी।

(यह रपट महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग के स्नातकोत्तर की छात्रा शुभांगी संभरकर  एवं सहायक प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार ने तैयार की है।)

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सांप्रदायिक, जातिवादी, भाषा-वर्चस्ववादी ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण का आयोजन) छोड़ गया कई सवाल



अनन्त
पटना में आयोजित दैनिक जागरण के ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम को जहां लेखक ‘अनंत’ साम्प्रदायिक, दलित विरोधी बता रहे हैं, भाषा के सवाल पर वर्चस्ववादी बता रहे हैं, वहीं कठुआ बलात्कार मामले में आरोपियों के समर्थन में निर्णायक शीर्षक के साथ दैनिक जागरण में रिपोर्ट छपने के आधार पर लेखकों के बहिष्कार के तरीके  पर भी सवाल  उठा रहे हैं. लेख में बिहार की पत्रकारिता के सवर्णवादी और साम्प्रदायिक चरित्र पर लेखक संगठनों की पुरानी चुप्पी को याद दिलाते हुए उनकी भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं. उदाहरणों से भरे इस लेख के सभी मुद्दों से स्त्रीकाल की अनिवार्य सहमति नहीं है. लेखक संगठन के लोग या इस लेख में उल्लिखित कोई भी व्यक्ति या समूह इस लेख में उठाये बिन्दुओं और तथ्यों का खंडन भेज सकता है. यह एक दृष्टिकोण है दूसरे दृष्टिकोण भी आमंत्रित हैं. 

उदघाटन सत्र में बिहार के मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार

काफी प्रतिरोध के बीच शुरू हुआ दैनिक जागरण का ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम नोक-झोंक और हल्ला-हंगामा के साथ समाप्त हुआ। जागरण का संवादी आयोजन भले ही समाप्त हो गया हो लेकिन पटना का साहित्यिक महकमा शांत बैठने वाला नहीं है। संवादी कार्यक्रम के पक्ष और विपक्ष में अभी नये सिरे से गरमा गरम बहस जारी रहेगा। संभव है कुछ साहित्यकार इसे शीत युद्ध का रूप देने का प्रयास करें। सोशल मीडिया में और जसम के आहवान पर बहिष्कार करने वाले साहित्यकार अंतर्मन कुढ़न में दिख रहे हैं। इन साहित्यकारों का गुस्सा हिन्दुत्ववादी हिन्दी का ध्वजवाहक बना जागरण के प्रति कम और ‘बिहार संवादी’ का विरोध करने वालों के प्रति ज्यादा है। विरोध अभियान को खुला समर्थन देने वाले लेखक जसम के खिलाफ भले ही मुखर होकर कुछ नहीं बोले लेकिन बातों ही बातों में अपनी खिन्नता जाहिर कर बैठते हैं। बहरहाल जसम का कठुआ दुष्कर्म कांड पर दैनिक जागरण की स्त्रीविरोधी और सत्तापक्षी वृति से प्रेरित पत्रकारिता का मुखर विरोध और हिन्दी भाषा के सवाल पर मौन रहना भी उनके भाषाई दृष्टिकोण का आइना है। उधर बिहार की आंचलिक भाषा मैथिली को बोली की श्रेणी में रखने का विरोध कर रहे भाषाई अस्मिता के रणबांकुरों की हुड़दंगई ने मिथिला की सभ्य संस्कृति के दामन को ही दागदार बना दिया है।

पढ़ें: दैनिक जागरण द्वारा आयोजित ‘बिहार संवादी ‘ का साहित्यकार करेंगे बहिष्कार (!)

यहां उल्लेखनीय है कि  मीडिया समूह दैनिक जागरण का ‘बिहार संवादी’ नामक लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन 21-22 अप्रैल को होना तय था। इसकी जानकारी पटना के साहित्यिक बिरादरी को काफी पहले से थी। आयोजक ने महीना दो महीना पहले ही प्रतिष्ठित साहित्यकारों और कथित लेखकों से कार्यक्रम में शिरकत करने से संबंधित प्रस्ताव पर सहमति प्राप्त कर ली थी। हिन्दी को लेकर दैनिक जागरण की वैचारिक दृष्टि क्या है ? इससे वाकिफ कई लेखक भले ही न हों प्रतिष्ठित साहित्यकार तो हैं ही। फिर भी तमाम प्रगतिशील साहित्यकारों ने आयोजन में शिरकत करने की अनुमति दे रखी थी। कार्यक्रम की तिथि नजदीक आते ही अचानक छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगीं। कठुआ और उन्नाव की घटना ने तो मानवता को ही शर्मसार कर दिया। फिर बेशर्म हिन्दुवादी राष्ट्रवादी सेनानियों को शर्म नहीं आई। उतर पड़े तिरंगा लेकर सड़को पर। लगने लगा कि सचमुच देश बदला है- डिजिटल भारत में तिरंगा का इस्तेमाल बलत्कृत पीड़िता के खिलाफ होगा। कठुआ से लेकर उन्नाव तक की घटनाओं पर भाजपा सरकार और खासतौर से मोदी की चुप्पी से भी देशवासी खफा थे। फिर भी दैनिक जागरण के संवादी कार्यक्रम को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होने की संभावना नहीं थी। साहित्यिक उत्सव शुरू होने के सप्ताह भर पहले से ही ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र बांटा जा रहा था। निमंत्रण पत्र का मुख्य सलोगन था – ‘हिन्दी हैं हम’ और स्थानीय भाषा पर केन्द्रित कार्यक्रम के सत्र का टैग लाइन था  – ‘ बिन बोली भाषा सून ?’ आमंत्रित लेखकों की सूची में एक भी दलित और मुस्लिम समुदाय के साहित्यकार, पत्रकार और लेखक का नाम शामिल नहीं था, हालांकि बाद में खानापूर्ती के लिए एक मुस्लिम लेखक को आमंत्रित किया गया । इसकी सूचना बुद्धिजीवियों को पहले से थी, मिले आमंत्रण के आधार पर। संवेदनशील, बुद्धिजीवी और खुद को प्रगतिशील व क्रांतिवीर कलमकार कहने तथा कहलाने वाले साहित्यकार प्रतिनिधित्व के सवाल पर मौनी बाबा बने रहे। और ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम की तैयारी भी अपनी रफतार से आगे बढ रही थी। खासतौर से पटना के कथित लेखकों के बीच मंच लूट लेने की भी तैयारी चल रही थी। इसी बीच दैनिक जागरण ने कठुआ दुष्कर्म मामले में बलात्कार के आरोपियों को पाक-साफ और बलात्कार नहीं होने से संबंधित खबर प्रकाशित कर ही दी। जजमेंटल हेडिग के साथ प्रकाशित यह खबर ‘कठरार वृति पत्रकारिता’ का प्रतीक बन गया। दैनिक जागरण की पत्रकारिता पर चहुँ ओर सवाल खड़े होने लगे। अखबार पर लोगों का गुस्सा भड़कने लगा। फेसबुक से लेकर टयूटर तक पर दैनिक जागरण की ‘कठरार वृति पत्रकारिता’ की भर्त्सना की जाने लगी।

यह मामला जहां एक डगमग हो चुकी पत्रकारिता के खंभे को गतलखाने में फेंक रहा  था तो दूसरी ओर हाशिये के समाज को न्याय से वंचित रखने के लिए षडयंत्र भी रच रहा था। लोग अपने-अपने तरीके से दैनिक जागरण का विरोध कर रहे थे। इसी बीच जन संस्कृति मंच के पटना जिला के संयोजक राजेश कमल ने कठुआ मामले पर संज्ञान लेते हुये ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम का विरोध और उसमें शिरकत नहीं करने से संबंधित अपील जारी की। जसम के आहवान के साथ ही साहित्यिक बिरादरी में हड़कंप मंच गया। अरूण कमल, आलोकधन्वा, ध्रुव गुप्त, प्रेम कुमार मणि, संजय कुमार, निवेदिता सरीखे साहित्यकारों ने ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम में नहीं जाने का एलान कर दिया। वही कुछ लोगों ने कार्यक्रम में शिरकत करते हुये जागरण द्वारा सजाये गये बिहार संवादी के मंच से कठुआ मामले पर विरोध जताने का फैसला लिया। असली मार्क्सवादी और क्रांतिकारी कौन ? यह सवाल भी साहित्यिक फिजां में तैरने लगा।

जेएनयू में मैथिली भाषा के पक्ष में दैनिक जागरण के खिलाफ प्रदर्शन

‘जसम’ के विरोध से इतर मिथिला स्टूडेंट यूनियन ने ‘बिन बोली भाषा सून? अर्थात आंचलिक भाषा को बोली साबित करने के मामले को लेकर बिहार संवादी के विरोध में आ गया। यहां बता देना आवश्यक है कि बिहार की आंचलिक भाषाओं का इतिहास हिन्दी से बहुत पुराना है। मगही का अस्तित्व तो मगध की स्थापना से पहले से है। मगध की स्थापना के पहले इस क्षेत्र को ‘किकट’ कहा जाता था। मगही की प्राचीनता का जिक्र अश्विनीकुमार पंकज ने अपने उपन्यास ‘खाॅटी किकटिया’ में किया है। ‘मागधी सा मूल भाषा’ का सूत्र साहित्य में प्रसिद्ध है और इसे माईभाषा कहा जाता है। मैथिली के कवि विद्यापति आदिकाल में पैदा हुये थे। इसी प्रकार अन्य स्थानीय भाषाओं का भी इतिहास काफी प्राचीन है। हिन्दी का जन्म तो हाल साल के दशकों और शतकों में हुआ है। ‘बिहार संवाद’ के माध्यम से दैनिक जागरण ने भाषाई लठैती करने का प्रयास तो किया ही है। फिर भी साहित्यकारों का ध्यान सिर्फ कठुआ पर अटका रहा। खैर मैथिली के सम्मान में साहित्यकार तारानंद वियोगी और विभूति आनंद ने बिहार संवादी के आयोजन से दूरी बनाने की घोषणा कर बिहार की लाज बचा ली। वहीं वोटिंग के जरिये मैथिली भाषा में साहित्य अकादमी प्राप्त लेखिका उषा किरण खान ने बिहार संवादी के मंच से जागरण की भाषा-नीति की आलोचना का  आश्वासन मैथिली भाषियों को दिया, पर अंततः गयी नहीं.

बिहार संवादी का विरोध तो बड़े ही धूमधाम  से हुआ। लेकिन ‘हिन्दी हैं हम’ में छिपी भाषाई सांप्रदायिकता का सवाल विरोध का विषय नहीं बन पाया ? अब सवाल यह उठता है कि भाषाई सांप्रदायिकता जसम के लिये मुद्दा नहीं है? जसम ने इस सवाल को अपने एजेडे में क्यों नहीं शामिल किया? क्या जनवादी जसम भी हिन्दी को लेकर वही सोच रखती जो आरएसएस की है ? वैसे माकर्सवादी, प्रगतिशील और जनवादी साहित्यकार भाषाई साप्रदायिकता का उदाहरण पहले भी पेश कर चुके हैं। उर्दू का विरोध करते हुये बाबा नागार्जुन ने कहा था – ‘अगर उर्दू का विरोध करना जनसंघी होना है तो मै एक सौ बार जनसंघी होना स्वीकार करूंगा।’’ जहां तक हिन्दी भाषा का सवाल है तो यह भाषा घोर मर्दवादी और ब्रहमणवादी है। आपको भरोसा नहीं होता तो कुछ शब्दों पर गौर कर लें। ज्यादा पृष्ठों के लिए पुस्तक तो कम शब्द के लिए पुस्तिका शब्द का उपयोग किया जाता है। अंग्रेजी में एडिटर स्त्री हो या पुरूष स्त्री लिखा जाता है। लेकिन हिन्दी पुरूष के लिये संपादक तो स्त्री के लिये संपादिका का भी चलन है-हालांकि अब संपादक भी लिखा जाने लगा है। कहने का आशय है कि जो मर्दवादी और ब्राह्मणवादी होगा वह सांप्रदायिक भी होगा। क्योंकि यह मानसिकता श्रेष्ठताबोध से प्रेरित है। इस हिन्दी को जनवादी बनाने का प्रयास अमर कथाकार रेणु ने किया। रेणु ने न तो गांव की भाषा को लिखी है और ना ही खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग किया है। रेणु की हिन्दी खड़ी बोली हिन्दी से भिन्न है। जो देशज दुनिया में बसे समाज की हिन्दी है। रेणु की हिन्दी मगही, मैथिली, भोजपुरी, अंगिका, नेपाली, अंग्रेजी, बंगला आदि से निर्मित हुई है। रेणु की हिन्दी बहुभाषिकता का प्रतीक है। बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक भारत के लिये रेणु की हिन्दी को आगे बढ़ाने की जरूरत है। रेणु के यहां स्थानीय भाषायें अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ हिन्दी को समृद्ध करती है। रेणु की परंपरा को अन्य कथाकारों ने भी आगे बढ़ाया है और उसे जनभाषा का स्वरूप प्रदान किया है। लेकिन हिन्दी के अमिताभ बच्चन बाबा नामवर सिंह ने हाल-साल के वर्षो में रेणु की हिन्दी पर क्या टिप्पणी की है यह भी आप पढ ले – ‘‘ रेणु जैसे आंचलिक कथाकारों ने हिन्दी भाषा पर नाकारात्मक प्रभाव डाला है।’’ दरअसल नामवर उसी हिन्दी को बढावा देने के पक्षधर है जहां श्रमिको की बोलियों और भाषाओं का कोई स्थान न हो-जिसमें संघी आसानी से सेंध लगाने में सफल हुए हैं, ‘शुद्ध हिन्दू राष्ट्र की भाषा विशुद्ध हिन्दी होगी। ऐसे राष्ट्र में ‘पाटल’ कहने वाले को सजा दी जायेगी और गुलाब कहने वाले को मौत की सजा। बहरहाल रेणु की हिन्दी के संबंध में नलिन विलोचन शर्मा 1954 में ही हिन्दी भाषा को समृद्ध करने का खिताब दे चुके हैं। इसलिये रेणु को नामवर सिंह से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है। खैर दैनिक जागरण ने हिन्दी को लेकर जो दृष्टि पत्र का नमूना पेश किया है, वह बेहद खतरनाक है। मंटो, राही मासूम राजा जैसे मुस्लिम समुदाय के लेखक पैदा हुये है। बिहार संवाद से जुड़े भाषाई मर्मज्ञ इन्हें हिन्दी का कथाकार मानेगें ? यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि प्रेमचंद हिन्दी के मूल लेखक हैं कैसे ? प्रेमचंद की शुरूआती बहुत सारी रचनायें तो पहले उर्दू में प्रकाशित हुई है। बदलते वक्त के साथ हिन्दी को और प्रगतिशील बनाने की जरूरत हे तो दैनिक जागरण ने संवादी कार्यक्रम के माध्यम से हिन्दी को संकीर्ण दायरे में समेटने का पहला प्रयास किया है। फिर भी जसम को यह बात क्यों नहीं समझ में आई।

पढ़ें: 
आलोक धन्वा, ध्रुव गुप्त, निवेदिता समेत अधिकांश साहित्यकारों ने किया ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण द्वारा आयोजित) का बहिष्कार   

और अंत में जसम से एक सवाल: पिछले दिनों की ही तो बात है, आरक्षण विरोधियों के बंद के पक्ष में प्रभात खबर ने कलम तोड़ रिपोर्टिंग की थी। प्रभात खबर के संपादक को भी आरक्षण समर्थकों ने उस रिपोर्टिंग का विरोध करते हुये कई पत्र लिखे थे। इस मुहिम से भी जसम ने खुद को अलग रखा था। क्या ‘जसम’ कामरेड विनोद मिश्र के इस वक्तव्य के साथ आज भी खड़ा है कि – ‘‘जिस प्रकार बाबर की गलतियों की सजा उनके वंशजों को नहीं दी जा सकती। उसी प्रकार मनु की गलतियों की सजा उनके वंशजों को नहीं दी जा सकती’’ इतिहास के पात्र बाबर की गलतियों को प्रचारित तो संघ करता है। ‘जसम’ को या तो विनोद मिश्र की भर्त्सना करनी चाहिये या फिर बाबर की गलतियों की व्याख्या  करनी चाहिये ? क्या आरक्षण विरोधी मुहिम हवा देने की पत्रकारिता को श्रेष्ठ पत्रकारिता की श्रेणी में नहीं रखा जायेगा। बरमेसर मुखिया हत्या कांड पर बिहार के तमाम अखबारों ने वर्चस्ववादी रिपोर्टिग की थी। क्या वह कम कठरार वृति से प्रेरित पत्रकारिता का नमूना था ? आजादी के बाद बिहार में हुये पहले नरसंहार की खबर को यहां के अखबारों ने प्रकाशित किया ही नहीं था। कर्पूरी ठाकुर ने नरसंहार पीड़ित गांव रूपसपुर चंदवा से लौटकर प्रेस को बयान दिया तो अखबारों ने अंदर के पन्नों पर प्रकाशित कर मामले को इतिश्री कर दिया था। गरीब दलित पीड़ित लड़की के साथ हुये बालात्कार की खबरोंको  पटना के अखबार प्रमुखता के साथ नहीं प्रकाशित करते हैं। यह भी जगजाहिर है। पत्रकारिता को शर्मसार करने वाली घटनाओं से भरा-पुरा रहा है बिहार की पत्रकारिता का इतिहास और वर्तमान। जहां तक गलत खबर प्रकाशित करने का सवाल है तो इसमे माले द्वारा प्रकाशित अखबार लोकयुद्ध भी पीछे रहा है क्या ? इसका उदाहरण है एकरासी कांड। इसी वर्ष होली के वक्त की घटना है। सिविल सोसाइटी को लोकयुद्ध में प्रकाशित खबर को पढ़कर एकरासी गांव का दौरा करना चाहिये। तब चलेगा कि लोकयुद्ध बदलते वक्त के साथ कैसे ‘फेक युद्ध’ का पर्याय बन गया है। कुछ वर्ष पहले ‘हिन्दुस्तान’ के तत्कालीन संपादक गिरीश मिश्र ने ‘ अलाउद्दीन का राक्षसी कुकृत्य’ नामक शीर्षक से खबर प्रकाशित की । जिस घटना को अंजाम देने का आरोप लगाया उस वक्त अलाउद्दीन घटनास्थल से लगभग 6-7 किलोमीटर की दूरी पर कुरथौल पुल पर था। पत्रकारिता का इतिहास और वर्तमान गलत और झूठी खबरें प्रकाशित  करने के लिए  कुख्यात रहा है। कभी भी जसम ने ऐसी कारवाई नहीं की थी।

पटना में कार्यक्रम स्थल पर प्रदर्शन

यह मान भी लें  कि कठुआ का ममला तात्कालिक था। इस पर मुखर विरोध जरूरी था। तो सवाल यह उठता है कि जसम ने जागरण विरोधी प्रतिरोध को विस्तृत स्वरूप क्यों नहीं किया ? जसम के पटना जिला संयोजक राजेश कमल वकत की कमी को मुख्य कारण मानते हैं। राजेश कमल की बातों में जितना दम है उतनी ही राजनीति भी। वक्त की कमी तो थी ही लेकिन कुछ लेखकों पत्रकारों नाटककारों की बैठक बुलाई जा सकती थी। प्रतिरोध का रूप-स्वरूप तैयार भी किया जा सकता था। अगर ऐसा करते तो श्रेय जसम और राजेश कमल को नहीं मिलता। संभव है बिहार संवादी कार्यक्रम के विरोध मुख्य बिन्दु भाषाई साप्रदायिकता होता और कठुआ का मामला उससे जुड़ा होता। विरोध का तौर-तरीका अराजक नहीं बल्कि रचनात्मक होता। जैसा कि पिछले दिनों जयपुर में जे0 एल0 एफ0 के विरोध में पी0 एल0 एफ का आयोजन किया गया। समयाभाव में कोई समानान्तर आयोजन नहीं होता। लेकिन विरोध का स्वरूप साकारात्मक और दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाला अवश्यहोता। साकारत्मक विरोध से सनसनी भले ही कम फैलता लेकिन भाषाई सांप्रदायकिता के खिलाफ एक विमर्श का जन्म होता है। ऐसी बात नहीं है कि जसम से जुड़े लोगों को इतनी समझ नहीं है। वक्त कमी और अचानक फैसला लेने का जो तर्क दिया जा रहा है। वह बेहद बेतुका है। संवादी कार्यक्रम में नहीं जाने की घोषणा करने वालों को फेसबुक पर ट्रोल करने में कौन लोग जुटे थे। वही लोग थे जो जसम के स्टैंड के साथ खडे थे। फेसबुकिया विरोध के लिये इनके समर्थकों के पास वक्त कैसे था ? तभी तो कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि फेसबुक पोस्ट से ही सिर्फ क्रांति हो जायेगी ? भाषा को लेकर धरणा पर बैठे मिथिला स्टूडेंट यूनियन के छात्रों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने का भी प्रयास जसम ने नहीं किया? जब मुगलिया फरमान जारी किया था तो सड़क पर झंडा बैनर के साथ थोड़ा चिचिलाती धूप खड़ा होकर पसीना बहाते। जसम अगर सड़क पर कठुआ मामले को लेकर ही भाषाई अस्मिता को लेकर संघर्ष कर रहे छात्रों के साथ खड़ा रहता तो विरोध का स्वरूप रचनात्मक होता। छात्र मगही के हो या भोजपुरी के या मैथिली के। छात्रों का जोश और जुनून सांतवें आसमान पर होता ही है। आखिर गुस्साये छात्र कार्यक्रम के दूसरे दिन अराजक हो ही गये। कार्यक्रम स्थल पर पहूॅचकर हुड़दंग किया और कई लोगो को कालिख पोत डाली। अब इन छात्रों को कौन समझाये कि भाषा की लड़ाई उदंडता से नहीं लड़ी जा सकती।

कठुआ की रिपोर्टिंग को लेकर जसम इतना क्यों संवेदनशील हुआ और इसके राज्य सचिव सुधीर सुमन पूरे
परिदृश्य से बाहर रहे। बताते चलें कि कुछ ही महीने पहले दैनिक जागरण बनाम माले विवाद सामने आया था। माले के राज्य कार्यालय सचिव कुमार परवेज ने दैनिक जागरण पर गलत प्रेस बयान प्रकाशित करने आरोप लगाया था। कुमार परवेज ने प्रकाशित खबर का खंडन प्रकाशित करने का आग्रह भी किया था।  खबर का खंडन छापना तो दूर रिलिज लिखने वाले रिपोर्टर से स्पष्टीकरण भी नहीं पूछा था। इस पृष्ठभूमि में आयोजन के बहिष्कार पर भी सवाल उठने लाजिमी भी है क्योंकि संवादी कार्यक्रम का विरोध अराजक तरीके से हुआ है।

लेखक फणीश्वर नाथ रेणु डॉटकाम के संपादक व मॉडरेटर हैं।  संपर्क: 7461803343

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घोंसला (स्वाति श्वेता) की कहानी

स्वाति श्वेता


सहायक प्रवक्ता, गार्गीकालेज’, दिल्ली वि.वि. कैरेक्टर सर्टिफिकेट ( कहानीसंग्रह),ये दिन कर्फ़्यू के हैं (कविता-संग्रह). संपर्क: swati.shweta@ymail.com

मुझे लगता है कि अब मैं बुढ़ाने लगा हूँ । प्रायः कुछ न कुछ सोचता रहता हूँ । बच्चे बड़े हो गए और सबकी शादी भी हो गई । कहते हैं समय के साथ परिवार बढ़ता है । पर हम चार से दो हो गए और वे दो अब चार-चार हो गए हैं । मेरी पत्नी उम्र से पहले ही बुढ़ा गई । हमारा चौदह साल का कुत्ता जिसने हमारे साथ जिन्दगी के कई सुख-दुःख बाँटे थे, वह भी एक हफ्ते पहले गुजर गया और उसके साथ बच्चों के प्यार की अन्तिम कड़ी भी टूट गई ।

एक हफ्ते से मेरी पत्नी रोती चली जा रही है । मुँह से केवल ‘जैकी’ निकलता है । उसके पास जाता हूँ तो बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोती है । उसका सिकड़, खाने का डिब्बा, पानी का बर्तन, उसका बिस्तर सब उसने एक कोने में रख दिया है । फिर भी बार-बार वहाँ जाती है, शायद यह सोचकर कि  ‘जैकी’ घर से बाहर पेशाब करने गया है और फिर आ कर अपना खाना खाएगा । मुझसे उसकी यह हालत कभी-कभी देखी नहीं जाती ।

ऐसा नहीं कि उसकी मौत का मुझे दुःख नहीं पर क्या करूँ ? पुरुष हूँ, पत्नी की तरह फफक-फफक कर रो नहीं सकता । एक अजीब सा खालीपन महसूस करता हूँ और चारों तरफ से हम दोनों अपने आपको एकान्त, बुढ़ापा, यादों और… घिरे महसूस करते हैं ।

खैर छोड़िए इतना बताना जरूरी है कि हम दोनों इस दो मंजिला घर में अकेले रहते हैं । कभी-कभी लड़ते भी हैं पर प्यार भी तो करते हैं । कभी-कभी लगता है कि घर में सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं—
“सुनते हो । आज मेरा मन नहीं लग रहा है ।” ये मुझसे कहती हैं ।
“क्या करूँ ? तुम ही बताओ ।” मैं उत्तर देता हूँ ।
“यह भी कोई जवाब हुआ भला ।” ये खीझती हैं ।
‘तो फिर !’ मैं इन्हें और खीझाता हूँ ।
“तुम तो एक दम बुढ़ा गए हो । बिल्कुल अपने बाप की तरह ।”
“नहीं ! उनकी तरह तो बिल्कुल नहीं ।”
“क्यों ? ऐसा कैसे कह सकते हो ।”

“मैं तुम्हे लक्ष्मी जी थोड़े न कहता हूँ । वह तो माँ को सारा दिन लक्ष्मी जी, लक्ष्मी जी कहते थे । एक पल भी आँखों से माँ को ओझल नहीं होने देते थे ।” और ये हँस देती हैं और स्वीकृति भी दे देती हैं कि मैं, मैं ही हूँ, बदला नहीं हूँ ।

ऐसा क्यों होता है कि जैसे-जैसे आदमी की उम्र बढ़ती है वह शारीरिक रूप से कमज़ोर होने तो लगता है पर बाहर से वह निरन्तर प्रयास करता है अपने को मजबूत दिखाते रहने की । मुझे अब भी याद है बच्चे स्कूल से आकर अपनी माँ के आगे-पीछे भागा करते थे और ये उन्हें खाना खिलाने में इतनी व्यस्त हो जाया करती थीं कि प्रायः मैं इनकी चेतना से गायब हो जाता । मेरी बारी हमेशा बच्चों के बाद ही आती थी । बच्चों को खाना खिला ‘ये’ मुझे आवाज़ देतीं और मैं एक रूठे बच्चे की तरह उठ खाने की टेबल पर आ जाता ।

बच्चे कुछ बड़े हुए तो हम सब एक साथ खाने लगे । मालूम ही नहीं हुआ और बच्चे बरसात की घास की तरह बढ़ते चले गये । मैं अपने कार्यों में व्यस्त रहा । चाहते हुए भी अधिक समय बच्चों के पास नहीं बैठ पाया । पर कोई यह नहीं कह सकता कि मैंने उन्हें समय नहीं दिया । उनके हर सुख, हर दुःख में मैं उनके साथ खड़ा था । एक पिता होने का पूरा दायित्व तो मैंने निभाया पर पुरुष होने के कारण बाहरी दायित्व भी अधिक थे । पत्नी ने सब शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी नौकरी नही की । हमेशा बच्चों में लिपटी रहतीं ।

“सुनिये ।”
“हाँ कहो ।” मैंने कहा ।
“ये ऊपर बैठकर क्या सोचते रहते हैं ? नीचे आईए ! खाना लग गया है ।”
“आता हूँ ।” मैंने फिर से कहा ।
अगले ही क्षण मैं नीचे आ जाता हूँ ।
“क्या बनाया है ?” मैंने हाथ धोते हुए उत्सुकता दिखाई ।
“कद्दु की सब्जी, बैंगन आलू फोरन और कद्दु का चक्का ।” पत्नी ने बताते हुए कहा ।
“वाह आज तो मजा आएगा । अच्छा ये तो बताओ कल क्या बना रही हो?” मैंने अपनी इच्छा जताई ।
“कल !”
“हाँ कल! अरे बेटा-बहू आ रहे हैं ! अब तो हमारी पोती आठ साल की हो गई होगी । नहीं ?”
“हाँ, आठ साल चौदह दिन ।” मेरी पत्नी ने मुझे सुधारते हुए कहा ।
“तुम हिसाब-किताब में बहुत सही रहती हो ।”
वह कुछ नहीं बोलती हैं ।
“आओ तुम भी तो अपनी प्लेट लगवाओ ।”? मैंने कहा ।
“नहीं मैं बाद मैं खा लूँगी । आप खा लीजिए ।” उसका एक वाक्य का उत्तर था ।
“अरे मेरी स्वीटहार्ट, मेरे साथ भी तो बैठ कर खाओ । जब बच्चे छोटे थे तब भी नहीं खाती थी और अब जब बच्चे सब अपनी-अपनी दुनिया तलाशने निकल चुके हैं तब भी नहीं !”
मैं बोलता रहा पर उसने मेरी किसी भी बात का उत्तर  नहीं दिया । खाना खा मैं उसके पास आया तो देखा कि वह कुछ उदास है । मैंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए पूछा-“क्या बात है ? कुछ तो बोलो ।”

“कुछ नहीं । आप कुछ देर आराम कर लीजिए । मैं दीपा के साथ रसोई समेट लेती हूँ ।” इतना कह वह दीपा को आवाज़ लगा कमरे से बाहर चली जाती है ।

कुछ तो है जो आज वह मुझसे छिपा रही है । और उस कुछ को मैं जानता भी हूँ । पर न जाने क्यों चाहता हूँ कि वह उसे स्वर दे । पर वह मेरे हर प्रयास को विफल बना केवल मौन बुनती है ।

सुधीर पूरे दस वर्षों बाद घर आएगा । दस वर्ष कैसे निकले हैं क्या बताऊँ? मेरे पास कम्प्यूटर नहीं हैं और ना ही स्मार्ट फोन  कि मैं अपने बेटे की तस्वीर और आवाज़ उससे बातें करते समय देख -सुन लिया करूँ !ऐसा नहीं कि खरीद नहीं सकता बस चलाने से डरता हूँ , कभी चलाया नहीं न इसलिए I पर अब सोचता हूँ कि खरीद लूँ । सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका हूँ । जो कर्ज आज तक लिये थे सब चुका दिया । अब कम्प्यूटर  भी खरीद सकता हूँ और एक सस्ता स्मार्ट फोन भी और अब तो दाम भी कम हो गए है । पर ये मानती नहीं । कहती हैं कि अब कोई इच्छा नहीं ।

मेरी आँखों के आगे से भुलाए नहीं भूलते वे पल जब सुधीर पी.एच.डी करने कैलिफोर्निया जा रहा था और ये दहाड़े मार-मार कर बेहोश हो रही थीं । सुधीर कहता था माँ मैं तुम से अलग नहीं हो सकता और मैं नहीं जाऊँगा । पर मैं शायद माँ-बेटे के बीच आ गया । “कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है” मेरा यही वाक्य शायद मेरी पत्नी की जिन्दगी का बीज वाक्य बन गया।

हमारा दूसरा बेटा मुम्बई में नौकरी करता है । कोहलापुर से मुम्बई कोई बहुत दूर नहीं फिर भी हम से मिलने तीन-चार साल पर तीन-चार दिनों के लिए आता है । पहले पहल जब बच्चे घर से बाहर गए तो फोन की हर घण्टी के साथ ये दौड़ी आतीं । नौकर को दूर से चिल्लाती बोलती-“उठ, फोन उठा जरूर सुधीर  या अरुण का फोन होगा ।” पर अब फोन बजता रहता है और वह उठाती भी नहीं मानों फोन की आवाज़ अब उन्हें सुनाई ही नहीं देती है ।

मेरी दुनिया मेरी मन्नो जी, मेरी पत्नी मेरा सब कुछ है । मन्नो जी के बिना जीवन की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता । पर एक दिन इन्होंने कहा-“सुनिए अब हम दोनों सत्तर पार कर चुके । मेरी तबियत भी ठीक नहीं रहती । अपना ध्यान रखना सीख लीजिए । कहीं ऐसा न हो कि एक रात सोऊँ तो अगली सुबह उठ ही न पाऊँ । तब क्या करेंगे ? रसोई में नमक, हल्दी, चावल, दाल, तेल, मसाले, आटा किन-किन डब्बों में पड़े हैं मेरे रहते जान लो । पानी सुबह पाँच से सात ही आता है इसलिए मोटर उसी समय चलाना Iदूधवाला और अखबारवाला इतना ही नहीं प्रेसवाला सब चोर हैं इनकी बातों पर विश्वास कभी मत करना । अपना हिसाब हमेशा रखना । झाडू-पोछे वालियों से अपने सामने काम करवाना । उन पर घर नहीं छोड़ना । नहीं तो पता चलेगा कि सारा घर साफ हो गया । दवाई महीने में दो  बार ले कर आती हूँ और आपके नीले डिब्बे में रहती है । वहाँ से आपके इस छोटे डिब्बे में समय-समय पर भरती रहती हूँ और…”

मन्नों जी उस दिन न जाने और क्या-क्या समझाती रहीं पर मैं मानो बुत बन चुका था । उत्तर में केवल आँखों से आँसू ही निकले ।

“अरे, रो क्यों रहे हो ? जिन्दा हूँ अभी मैं ! मरी नहीं हूँ । मैं नहीं समझाऊँगी तो कौन समझाएगा ।”

बच्चों के चले जाने के बाद मैं ही मन्नो जी का पति और मैं ही उसका बेटा और मैं ही उसका पोता-पोती था । वह कभी पत्नी बन के तो कभी माँ बन के तो कभी दादी बन के मुझसे बातें करती । उसका मुझसे रूठना, मुझे डाँटना और फिर छोटे से बच्चे की तरह मुझे पुचकारना-दुलारना, सब मुझे अच्छा लगता । बच्चे बड़े हो गए और उनके साथ मन्नो जी की ममता भी ।

दोनों बेटों ने अपनी पसंद से शादी की । मन्नों जी के सारे अरमान दिल में ही रह गए । बेटों की खुशी के लिए सब कुछ किया । सुधीर जब अपर्णा को कैलिफोर्निया ले जा रहा था तब मन्नों जी के डर ने शब्दों का रूप ग्रहण किया-“अपर्णा, सुधीर मेरा लाड़ला बेटा है । हम माँ-बेटे को एक कड़ी में बाँधे रखोगी न !”

“अभी कैसे बता सकती हूँ मम्मी जी, वह तो समय ही बताएगा ।” अपर्णा का यह एक वाक्य मन्नों जी के ऊपर वज्रपात की तरह गिरा ।

तब का गया सुधीर अब आएगा । अपर्णा ने ठीक ही कहा था ।

मन्नों जी के घुटने इन सालों में जवाब दे चुके थे । और एक दिन तो मन्नो जी…

“ऑपरेशन करना पड़ेगा । पाँच से छह लाख रुपये और तीन महीने उनकी सेवा ।” मुझे अच्छे से याद हैं डॉक्टर साहब के वे शब्द । मेरे पास न तो इतने पैसे थे कि मन्नों जी के घुटने बदलवा सकूँ और न ही इतनी शारीरिक क्षमता की दौड़-भाग कर सकूँ ।

दोनों बेटों से फोन पर बात की और स्थिति से अवगत कराया सुधीर ने कहा कि वह तीन लाख तक भेज देगा पर उससे ज्यादा और न भेज पाएगा । वह भी अपनी पत्नी को बिना बताए । मैंने कहा भी कि अपर्णा को बता कर काम करो । पर सुधीर ने कहा कि अपर्णा को बताया तो वह एक भी पैसे नहीं भेजने देगी I किसी भी बात की  जिद करने पर वह तलाक देने की धमकी देती है । ऐसी स्थिति में पैसे छुपा कर ही भेज सकता हूँ और आने का सवाल नहीं क्योंकि अपर्णा जाने नहीं देगी । खैर ! सुधीर के भेजे तीन लाख रुपयों से मदद तो जरूर मिली ।

अरुण आर्थिक और शारीरिक दोनों ही रूप से सहयोग न दे पाया । उसकी भी कोई मजबूरी रही होगी । शायद सुधीर की तरह । मन्नो जी को अपनी अपाहिजता पर इतना रोना नहीं आया जितना रोना अपने बेटों की अपाहिजता पर आया । मैंने बहुत समझाया पर… ।

खैर छोड़िए !

मन्नो जी ठीक हो गईं । अब पहले से कहीं ज्यादा तेज़ चलतीं । अगर मैं यह कहूँ कि मन्नों जी अब तितली की तरह उड़ती हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी । जिन्दगी के सारे रंग जो धीरे-धीरे मृत होते जा रहे थे उनमें मन्नो जी ने एक बार फिर प्राण फूँक दिए । अब लाल रंग उन्हें लाल ही लगता और सफेद उन्हें सफेद ही । एक बार फिर मन्नो जी ने अपने जीवन के केनवस को रंगों से भरना शुरू किया । मुझे खुशी मिली कि मेरी मन्नों फिर से लह-लहा रही है । अबकी बार रंगौं के विचित्र चयन देखने को मिले । ऐसे रंग जो पहले कभी नही देखे गए थे । मैंने मन्नों जी से जानना चाहा पर उनका जवाब केवल इतना था कुछ रंग जिन्हें उन्होंने अपने चित्रों में भरे थे यह सोचकर कि उनसे चित्र और अधिक निखरेगा और अधिक सजीव हो उठेगा उन्होंने विपरीत परिणाम दिए । इसलिए अब चाह कर भी मैं उन रंगों को भर नहीं सकती –“आदमी उँगली जलाकर ही तो सीखता है न जी, ठीक कह रही हूँ न ।”

और मैं मन्नो जी के उस कथन पर सहमति दिए बिना नहीं रह पाता ।

आज मेरी मन्नो मेरे पास है । मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य है । मैं मन्नो के साथ टेलीविजन देखता हूँ, मन्नो के साथ बागवानी करता हूँ । मन्नो के सा थ कसरत करता हूँ । मन्नो के साथ टहलने जाता हूँ पर बच्चों को याद मन्नो के साथ नहीं करता हूँ । या यूँ कहूँ कि बच्चे तो मुझे कभी विस्मृत ही नहीं हुए जो उन्हें याद करूँ । वे तो मेरे साथ पल-प्रतिपल हैं । मन्नो जी आज भी सुधीर और अरुण को प्यार करती हैं । आज भी उनके बचपन को याद करती हैं जब मेरी मार से उन्हें बचाने के लिए वे न जाने क्या-क्या कहानियाँ गढ़ा करती थीं । जब उनकी एक फरमाइश पूरी करवाने के लिए वह निरन्तर मेरे आगे-पीछे घूमती थीं । मन्नो जी कुछ भी तो नहीं भूली हैं । मन्नो जी ने अपने आपको बस इन्ही यादों के सुपुर्द कर रखा है । इन यादों में किसी का भी हस्तक्षेप उन्हें पसन्द नहीं ।

 रात हुई तो मन्नों जी ने दीपा से नए पर्दे, नया टेबल क्लाथ, नया बेडशीट सब निकालने को कहा । मैं खुश था कि सुधीर का स्वागत करने की तैयारियाँ शुरू हो गईं थी । सुबह सब बदल देना था । कल शाम तक सुधीर हम लोगों के बीच होगा । मेरी पोती मेरे पास होगी । अब तक तो फ्लाइट में बैठ चुका होगा । मन्नो जी रात का काम समेट जब सोने आती हैं तो फोन बजता है ।

“अब इस समय किसका होगा?” मैं आश्चर्य से कहता हूँ ।

मन्नो जी चुप बिस्तर पर लेटी रहती हैं ।

मैं ही उठता हूँ । फोन सुनता हूँ और फिर बिस्तर पर आकर लेट जाता हूँ । मुँह में थूक जम चुका है उसे घोंट जाता हूँ ।
“मन्नो ।”
“हूँ ।”
“पूछोगी नहीं किसका फोन था ।”
“किसी अपने का ही होगा ।”
“सुधीर का था । वह नहीं  आ रहा है । कह रहा था कि कोई जरूरी काम आ गया है । अभी व्यस्त है । विस्तार से बाद में बात करेगा ।”

मन्नो जी  की कोई प्रतिक्रिया नही आती है । मैं आधी रात तक छटपटाता रहता हूँ और इस छटपटाहट में कब नींद लग गई पता ही नही चला ।

सुबह जब आँख खुली तो दस बज रहे थे । मैंने देखा घर के सारे पर्दे बदल दिए गए थे, टेबल क्लाथ नये लगा दिए गए थे । उठ कर सुधीर के कमरे में गया तो सब कुछ नया वहाँ व्यवस्थित रूप से दिखाई दिया । मुझे लगा कि शायद रात को मैंने जो कहा था वह मन्नो जी सुन नहीं पाई ।

“मन्नो सुधीर नहीं आ रहा है ।”

“छोड़ दिए घोसलों में चिड़िया के बच्चे फिर नहीं आते । वे अपने नये घोंसले बनाते हैं । पर चिड़िया ये जानते हुए भी आपना घोसला साफ रखती है कि क्या पता कभी वे बच्चे इधर से गुज़रे । मैंने तो बस अपना, घोंसला साफ रखा है” इतना कह मन्नो जी मुझे हाथ-मुँह धोने को कहती हैं ।

“नाश्ता तैयार है ।”
“क्या बनाया है ?”
“पूड़ी और आलू झोर ।”
और हम दोनों टेबल पर एक साथ पूड़ी और आलू झोर खाने बैठ जाते हैं । दीपा गरम-गरम पूड़ियाँ निकालती जाती  है।

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अध्यादेश: बचपन से बलात्कार की सज़ा उम्र कैद या फाँसी!

देखने और सुनने में महिला-पक्षधर लगने वाला नया कानून- यानी बच्चियों से बलात्कार के मामले में फांसी मूलतः पितृसत्तात्मक और स्त्री विरोधी है-खासकर उस देश में जहाँ बलात्कार के अधिकाँश आरोपी परिचित होते हैं और बच्चियों से बलात्कार के मामलों में सजा बमुश्किल 3% होती है. एक ऐसे देश में जहां की सरकार में शामिल मंत्रियों को लगता है कि एक बड़े देश में एक-दो बलात्कार तो होते ही रहते हैं. जानें नये प्रस्तावित कानून पर न्यायविद अरविंद जैन और सामाजिक एवं थिएटर एक्टिविस्ट शुभा के विचार: 

अरविंद जैन

नया कानून ,अध्यादेश जारी होने के बाद हुए अपराधों में ही लागू होगा। अब तक के मामलों में, वही पुराना कानून लागू रहेगा। देखना यह है कि नए कानून के अंतर्गत, कितने अपराधियों को फाँसी की सज़ा मिलती है। कहीं ऐसा ना हो कि अदालतें, ‘दुर्लभतम में #दुर्लभ’ मामला ही ढूँढती रहे और ऐसे अपराधों में सज़ा, पहले से भी कम हो जाये।अदालतों की संवेदनशीलता और गंभीरता के बिना, यह मिशन अधूरा ही होगा।हाँ! अध्यादेश से निश्चितरूप से ‘कठुआ’ और ‘उन्नाव’ बलात्कार कांड के बाद उभरा जनाक्रोश, जरूर ठंडा पड़ेगा। 2012-13 फिर दोहराया गया। अगर सही से अनुपालन हुआ, तो यह अध्यादेश स्वयं (पितृ)सत्ता के गले में, फाँसी का फंदा सिद्ध होगा।

आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 दिनांक 21अप्रैल, 2018 जारी हो गया और नया कानून लागू। अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1873, आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता और बाल अपराध संरक्षण अधिनियम, 2012 की कुछ धाराओं में संशोधन किया गया है। संशोधन के अनुसार 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में भी, फांसी की सज़ा का भी प्रावधान हो गया।

अध्यादेश जारी होने के बाद, 12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार की सज़ा उम्र कैद या फाँसी।न्यूनतम 20 साल कैद। फाँसी के फंदे से बचने के लिए, अबोध बच्चियों की हत्या की संभावना भी बढ़ेगी ही। अपराधी अपने ख़िलाफ़ सारे सबूत और गवाह भी मिटाने का भरसक प्रयास करता रहा है..करेगा। बाकी कुछ बचा तो, न्यायिक विवेक करता रहेगा, उचित सज़ा का फैसला।

पीड़िता की उम्र 16 से कम हुई, तो सज़ा दस से बीस साल तक और अभियुक्त को अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी। जमानत के लिए भी 15 दिन का नोटिस अनिवार्य होगा। अग्रिम जमानत के बारे में दलित कानून में सुनाए, सुप्रीम कोर्ट फैसले की तरह क्या इस कानून का भी  विश्लेषण या व्याख्या करेंगे। कानून की संवैधानिक वैधता पर ही, सालों बहस होती रहेगी। और हाँ! अगर अपराधी 16 साल से कम उम्र का किशोर हो, तो क्या होगा? किशोर की परिभाषा (16 साल से घटा कर 12 साल) भी बदलनी पड़ेगी या नहीं?दूसरी तरफ अगर स्त्री की उम्र 16 साल से अधिक पाई गई, तो सज़ा सिर्फ 7 से 10 साल। क्यों? क्या अब अपराध की गंभीरता भी, उम्र के आधार कार्ड से तय होगी!

निर्भय कांड के बाद, भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 में 2013 संशोधन द्वारा सहमति से सहवास की उम्र 16 साल से बढ़ा कर18 साल की गई थी। अब यहाँ फिर से वही ‘सौलहवें साल’ के मानसिक संस्कार, सिर चढ़ बोलने लगे हैं।

प्रावधान तो बन-बना दिया गया है कि दो महीनें में जांच, दो महीनें में मुकदमा, दो महीनें में फैसला यानी छह महीनें में प्रक्रिया पूरी करनी होगी।पर यह सब, बिना नए ढांचे के होगा कैसे? हम जानते हैं कि ‘फ़ास्ट ट्रैक’, कब और कैसे धीरे-धीरे ‘स्लो ट्रैक’ में बदल जाता है।’निर्भया केस’ (2012) को ही देख लो…फाँसी का फैसला होने के बाद भी, ना जाने कहाँ अटका-लटका हुआ है।

कहना न होगा कि बलात्कार के हर मुकदमें में स्त्री शिकायतकर्ता/पीड़िता है या सिर्फ एक गवाह! वो अपने ही साथ हुए दुष्कर्म की गवाह है,चश्मदीद गवाह। उसे बताना है, वो सब कुछ कब,कहाँ,कैसे और क्यों! स्मृतियों के सब छाया-चित्र दिखाने हैं घटना-दुर्घटना के, जिसकी वो गवाह है।एक बार फिर दोहराना है, बलात्कार अध्याय।बार-बार दोहराना है दिमाग में, कि कहीं कुछ छूट ना जाए और न्यायधीश उसे ही ‘झूठी’ ना समझ बैठे। गवाह इतने दबाव-तनाव में और बाकी सब यह जानने की प्रतीक्षा में कि आगे क्या हुआ, कब हुआ और कैसे! इस तरह, हाँ इसी तरह होती है अपने ही खिलाफ़, स्त्री की गवाही।

सच तो यह है कि अभी भी “घटनाघाट से न्यायपुरम के बीच कानून की कच्ची सड़क पर,गहरे गड्ढे और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर #टोलटैक्स। सालों बैठे रहो धूप में और करते रहो फैसले का इंतज़ार। फैसला हो जाए तो, अपील दर अपील। सदियों पुराने खंडहर से वातानुकूलित खंडहर तक की अंतहीन यात्रा। मिस्टर इंसाफ और कानून कुमार के बारे में, विस्तार से फिर कभी….!”

स्त्री और बच्चों के विरुद्ध अपराध बढ़ रहे हैं चूंकि कानून कमजोर हैं। व्यवस्था कमजोर है। पुलिस कमजोर है। कोर्ट कचहरी कमजोर है। न्याय व्यवस्था बहुत महंगी है। पुलिस संवेदनशील नहीं है। मीडिया और तमाम मनोरंजन के क्षेत्र महिलाओं को सिर्फ एक वस्तु, एक ऑब्जेक्ट के रूप में पेश कर रहे हैं। छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे तक और अखबारों के चिकने पन्नों तक, औरतों को तमाम आकर्षक उत्पादों की तरह ही पेश किया जा रहा है। एक ऐसे उत्पाद के रूप में जिसे भोगा जाना बहुत स्वभाविक है। ऐसे में इस सबका नतीजा अंततः महिलाओं के विरूद्ध अपराध के रूप में ही सामने आता रहा है।समय रहते इसके बारे में भी गंभीरता से विचार करना पड़ेगा, हालांकि पहले ही बहुत देर हो चुकी है।

इस अध्यादेश को भी, एक और कानून समझो। यूँ देश में बहुत से कानून हैं, मगर कोई कारगर कानून नहीं है, कानून है तो उसका अनुपालन नहीं। यह कहना कि केवल कानून बनाने से कुछ नहीं होगा, एक हद तक सही लग सकता है। मगर अपराध रोकने के लिए या उन पर काबू पाने के लिए कुछ कठोर कानून बनाना भी जरूरी है।कानून हो ना हो, तो सोचो कि क्या हालत होंगे! देश में कानून का राज है, तो कानून का वर्चस्व भी बनाए-बचाए रखना होगा। स्त्री के विरुद्ध निरंतर बढ़ रही यौन हिंसा को रोकने के लिए, कुछ कठोर कानून और कुछ कठोर कदम उठाने ही पड़ेंगे….वरना!

शुभा
फांसी की सज़ा किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।यह बलात्कार के सामने समर्पण ही है।बलात्कार की पक्षधर सरकार और विचारधारा फांसी की सज़ा लाकर समस्या को हल न करने कीअन्तिम और फाईनल घोषणा कर रही है।राजसत्ता और नागरिकों के बीच संवैधानिक माध्यमिकता को कुचलकर न्याय-व्यवस्था को निष्प्राण करते हुए फांसी की सज़ा का प्रावधान कई तरह की आशंकाओं और डर को जगाने वाला है।निरंकुश हिंसक सत्ता, हत्या को कई तरह से आसान और निरापद बनाने की कोशिश में है।बच्चियों के साथ बलात्कार को कम करने या ख़त्म करने के लिए जो काम करने ज़रूरी हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं—
राजनीति को अपराधीऔर अपराध-तन्त्र से अलग करना।
भ्रष्ट्राचार ख़त्म करना और राजनीति से अपराधिक निजी पूंजी को अलग करना।
जस्टिस वर्मा कमैटी की सिफारिशों को लागू करते हुए पुलिस रिफ़ार्म करना।
लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव ख़त्म करने के लिये सकारात्मक भेदभाव के सिद्धांत को अपनाकर इन्सैंटिव देते हुए संसाधनो तक उनकी पहुंच सुरक्षित करना।
बकरवाल समाज सहित सभी जनजातियों को जल, जंगल, जमीन के अधिकार देना।
2002 में हुए नरसंहार के अपराधियों को सज़ा देना और अल्पसंख्यकों को शिकार बनाने वाले हिन्दू धर्म का बहाना बनाकर आतंक फैलाने वाले संगठनों को प्रतिबंधित करना।धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वाले सभी संगठन बलात्कार को “बदला लेने ” का औजार बनाते हैं।
ग्रामीण ,भूमिहीन दलित स्त्री-पुरुष को संयुक्त पट्टा देकर भूमि -वितरण।भूमिहीन आबादियों पर लगातार बलात्कार होते हैं।
सभी को रोज़गार और कपड़ा, रोटी ,मकान व शिक्षा की गारंटी।

ये अधिकार न होने कारण ग़रीब आबादियों के बीच से साधन-सम्पन्न अपराधी अपने रंगरूट भर्ती करते हैं,निराशा भी अपराधों को जन्म देती है।ग़रीब आबादी के बच्चों और औरतों का निरन्तर भीषण शोषण और यौन उत्पीड़न होता है।श्रम कानूनों के अभाव में श्रमिक स्त्रियों और उनकी बच्चियों को यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है।स्वतंत्र मीडिया के अभाव में बलात्कारियों और यौन शोषण करने वालों के हौसले बुलन्द रहते हैं। विधान सभा, संसद और कैबिनेट स्तर तक महिलाओं के प्रति अपराध, बलात्कार और हिंसा के आरोपी मौजूद हैं।बलात्कार के पक्ष में बड़ा उत्साहपूर्ण वातावरण बना हुआ है। अभी बहुत बातें रह गई हैं जो फिर कही जाएंगी।

मौजूदा सरकार इनमें से कोई क़दम बलात्कार को ख़त्म करने की दिशा मे नहीं उठा सकती ।वह विपरीत दिशा में यानि बलात्कार के लिए उत्साहवर्धक परिस्थिति तैयार करने में लगी है। इस बात को छुपाने के लिए फांसी का कानून बना रही है।सरकार ख़ुद सभी कानूनों का दुरूपयोग  कर रही है इसलिये हमें इस क़ानून से डरना चाहिए।

बलात्कार पर अभी बात शुरू हुई है। (शुभा का मत उनके फेसबुक पेज से साभार). अरविन्द जैन का मत उसने बातचीत पर आधारित 
तस्वीरें गूगल से साभार 


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“ये निंदा प्रस्ताव नहीं है”

सुशील मानव 


हम जागरण संवादी में शामिल साहित्यकारों की निंदा नहीं कर रहे.. मरे हुए को और क्या मारना।  वे पहले ही बहुत कुछ मर-मारकर ही वहाँ तक गये होंगे।सबके अपने विचार, सरोकार, प्रतिबद्धता और हित हैं और वे अपने वैयक्तिकता में सोचने समझने और निर्णय लेने को स्वतंत्र भी हैं.. तो फिर हम या कोई और कौन होते हैं किसी की मजबूरी को किनारे करके उसकी निंदा करने वाले?

आखिर वे भी तो प्रतिरोध ही कर रहे हैं। फासिस्टों के मंच पर चढ़कर फासिस्टों का प्रतिरोध! बलात्कारियों के मंच पर चढ़कर बलात्कारियों का प्रतिरोध! पूँजीवादियों के मंच पर चढ़कर पूँजीवादियों का प्रतिरोध! सही भी है आखिर अपने मंच पर चढ़कर अपने में ही कह-सुन लेना क्या प्रतिरोध हुआ? अरे जिनका प्रतिरोध कर रहे हैं वो भी तो सुनें कि हम उनका प्रतिरोध कर रहे हैं। लेकिन ये तो बताइए की मुँह में उनका दिया रसगुल्ला दबाकर बोलिएगा कैसे? कि सींड़ा (चाशनी) चुएगा तो सीधा पैंट पर ही गिरेगा.

पढ़ें : दिल्ली के कार्यक्रम से भी लेखकों ने किया किनारा: दैनिक जागरण का व्यापक विरोध

कुछ साहित्यकारों का रोना है कि भाई अब तो मंच वैसे भी नहीं मिलता गर कोई मंच दे रहा तो क्यों न जाएँ। तो भाई मेरा आप लोगो से सीधा सा सवाल है कि आपको मंच चाहिए ही क्यों? अपनी बात रखने के लिए ही तो न। तो क्या फेसबुक आपको वो मंच नहीं दे रहा?साहित्यिक पत्रिकाएँ नहीं दे रही? और अगर नहीं भी दे रहे तो आपको अपनी बात कहने के लिए मंच ही क्यों चाहिए। बात ही कहनी है या चौधरियाना दिखाना है। गर बात ही करनी है तो लोगो के बीच जाइए ना। रखिए अपनी बात उनके बीच, करिए उनसे संवाद। उठिए बैठिए उनके बीच उनके सुख दुख का साझीदार बनिए। ऐसे ही जनवादी बने फिरते हैं। सीधे कहिए न कि मंच आपको जन से ऊपर उठने के लिए चाहिए। जन से ऊपर दिखने के लिए चाहिए। खासम-खास की अनुभूति और आनंद के लिए चाहिए, तो आप पहले ये निर्णय कीजिए की आपको चाहिए क्या, मंच या जन या कि दोनो? मंचीय कवियों को तो तीनो मिलते हैं मंच, जन और धन और बेहिसाब मिलते हैं। और तालियाँ तो बोनस में। हाँ इज्ज़त की बात फँसती है.

तो बलात्कार और फासिज्म को प्रमोट करनेवाली  संस्था के आयोजनों में भागीदारी करके तो इज्जत का फलूदा बनना वैसे भी तय हैं। कुछ को बेस्ट सेलर का लोभ है कि उनके मंच पर पहुँचे तो क्या पता अगली तिमाही उनकी भी कोई किताब बेस्ट सेलर घोषित हो जाए। तो अपनी किताबे तो नागार्जुन भीं बेचते थे। झोले में लेकर, वे किताबें घूम घूमकर बेंचते थे। वेद प्रकाश शर्मा सुरेंद्र मोहन पाठक ने अपनी किताबें झोले में लेकर घूम-घूमकर नहीं बेंची लेकिन बिके वो भी खूब। बस दोनों में फर्क है थोड़ा या बहुत निष्कर्ष आप निकालिए। नागार्जुन ने अपनी किताबें जन के लिए लिखी थी इसीलिए वो अपनी किताबें लेकर सीधे जन के बीच गए। सुरेंद्र मोहन और वेद प्रकाश ने बाज़ार के लिए लिखे थे इसीलिए वे अपनी किताबें लेकर बाज़ार के पास गए। तो भाई लोग पहले आप निश्चिंत हो लीजिए कि आपको किताबें बेचनी है या खुद बिकना है।


पढ़ें: आलोक धन्वा, ध्रुव गुप्त, निवेदिता समेत अधिकांश साहित्यकारों ने किया ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण द्वारा आयोजित) का बहिष्कार
पहले दिन तो फ्रंट पेज पर जो छापा दैनिक जागरण ने छापा ही जागरण संवादी के बहिष्कार की सुगबुगाहट बीच अगले दिन फिर छापा और संवादी के आगाज़ की उद्घोषणा के साथ और समानांतर छापा। दो चीजें एक साथ छपीं। एक जिसका साहित्याकार विरोध कर रहे थे और दूसरा जिसका वजूद ही साहित्यारों की भागीदारी पर टिका हुआ था, दोनों को एकसाथ छापकर दैनिक जागरण ने तमाचा मारा था, दोहरी वैचारिकता ढोनेवाले साहित्यकारों के मुँह पर। मानों दैनिक जागरण ने वैसा करके खुला ऐलान किया हो कि साहित्य का मंच उसकी फासीवादी बलात्कारी पत्रकारिता के पायों पर ही टिका है। ऐसा करके दैनिक जागरण समूह ने एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक खेल रचा।

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आलोक धन्वा, ध्रुव गुप्त, निवेदिता समेत अधिकांश साहित्यकारों ने किया ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण द्वारा आयोजित) का बहिष्कार

सुशील मानव

दैनिक जागरण ने प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता का बेहद ही अश्लील नमूना पेश करते हुए अपनी कल के चंड़ीगढ़,पटना,दिल्ली,लखनऊ, जम्मू संस्करणों में छापे गए आधारहीन मिथ्या खबर को आज फिर से  इलाहाबाद, कानपुर वाराणसी समेत कई संस्करणों में उसी बर्बरता और निर्लज्जता के साथ उसी निर्णयात्मक शैली में  कल की हेडिंग के साथ दोहराया है।

दैनिक जागरण की प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता के विरोध में आलोक धन्वा समेत तमाम साहित्यकारों ने उसके इस कुकृत्य की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हुए आज से शुरू हो रहे “बिहार संवादी” कार्यक्रम का बहिष्कार किया है।
आलोक धन्वा ने फोन पर बताया कि सुबह से पच्चीसों लड़कियों का फोन आ चुका है। वे  सब बार-बार गुजारिश कर रहीं हैं कि दादा प्लीज आप बलात्कार को प्रमोट करनेवाले बिहार संवादी का हिस्सा मत बनिए। आलोक धन्वा आगे कहते हैं कि,“यही नन्हीं लड़कियाँ ही तो मेरा बल हैं उनके अनुनय की अनदेखी करके भले मैं कैसे किसी इसके कार्यक्रम  में शामिल हो सकता हूँ।” और आगे स्पष्ट शब्दों में आलोक धन्वा कहते हैं ‘मैं दैनिक जागरण की असंवेदनशील पत्रकारिता की निंदा करते हुए बिहार संवादी का बहिष्कार करता हूँ।’

बिहार संवादी में बतौर वक्ता शामिल किये गए लेखक ध्रुव गुप्त ने बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहा- “जम्मू के कठुआ में आठ साल की एक मासूम बच्ची आसिफा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले में उपलब्ध तमाम वैज्ञानिक सबूतों, प्रमाणों और तथ्यों को झुठलाते हुए अखबार ‘दैनिक जागरण’ ने अपने जम्मू सहित कई संस्करणों के हैडलाइन में जो खबर लगाई है, वह यह है – ‘बच्ची के साथ नहीं हुआ दुष्कर्म’ ! मनगढंत तथ्यों के आधार पर बनाई गई ‘जागरण’ की इस खबर से देश का हर संवेदनशील व्यक्ति हैरत में है। ज्ञातव्य है कि दिल्ली की फोरेंसिक साइंस लैब ने अपनी रिपोर्ट में न सिर्फ बच्ची के साथ बलात्कार की पुष्टि की है, बल्कि यह भी स्पष्ट कहा है कि मंदिर के अंदर जो खून के जो धब्बे मिले थे वे पीड़िता के थे और वहां बालों का जो गुच्छा मिला वह एक आरोपी शुभम का था। और यह भी कि पीड़िता के गुप्तांग  और कपड़ों पर मिले खून के धब्बे उसके डीएनए प्रोफाइल से मैच करते हैं। ‘जागरण’ ने निष्पक्ष पत्रकारिता के मूल्यों की कीमत पर अपने ख़ास राजनीतिक एजेंडे के तहत देश में बलात्कार के पक्ष जो माहौल बनाने की कोशिश की है, उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाय कम होगी। ‘जागरण’ के इस अनैतिक, अमानवीय और आपराधिक चरित्र के ख़िलाफ़ मैं आज और कल पटना के तारामंडल में आयोजित बिहारियों के तथाकथित साहित्य उत्सव ‘बिहार संवादी’ का वहिष्कार करता हूं।”

आयोजकों की ओर से बिहार संवादी का हिस्सा बनाये गए युवा कवि राकेश रंजन जी बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहते हैं-“ कठुआ में सामूहिक बलात्कार के बाद जिस बच्ची की निर्मम हत्या हुई, उसे लेकर दैनिक जागरण की कल की रपट बेहद संवेदनहीन, दायित्वहीन तथा अनैतिक है। यह रपट नहीं, कपट है; जिस परिवार का सब कुछ लुट चुका है, उसकी बेचारगी और तकलीफ के साथ किया जानेवाला मजाक है। दैनिक जागरण की जैसी प्रवृत्ति रही है, उसके आधार पर मुझे लगता है कि ऐसा जान-बूझकर किया गया है। मैं इसका विरोध करते हुए आज से आरंभ हो रहे ‘बिहार संवादी’ नामक आयोजन में नहीं जा रहा।”

वहीं बिहार संवादी में शामिल एक और वक्ता साहित्यकार तारानंद वियोगी जी ने भी बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहा-“एक लेखक के रूप में ‘बिहार-संवादी’ में शामिल होने की सहमति मैंने दी थी। वे मुझसे सीता पर बात करनेवाले थे। मैं भी उत्साह में था कि बोलूंगा। खासकर, राम से परित्यक्त होने के बाद सीता की जो दशा थी, उनका जो भयानक जीवनसंघर्ष था, उसपर रचे मिथकों के हवाले से कुछ बात करूंगा। मिथिला में प्रचलित सीता की लोकगाथा ‘लवहरि कुसहरि’ को लेकर, कि कैसे उस दुखियारी औरत ने जंगल में रहकर, लकड़ी चुनकर, कंद-फल बीनकर अपने दो बालकों का प्रतिपाल किया, उन्हें लायक बनाया। ध्यान दीजिएगा, मिथिला में लोकगाथाएं बहुत हैं पर वे या तो दलितों की हैं या वंचितों की। लेकिन, सीता और उसके दो बच्चों की लोकगाथा है।
लेकिन, मैं क्या करूं! दुनिया जानती है कि सीता का एक नाम ‘मैथिली’ भी है।
और यह भी कि कठुआ की बेटी आसिफा भी एक छोटी-मोटी सीता ही थी।”

वरिष्ठ साहित्यकार कर्मेन्दु शिशिर जी बिना किसी लाग लपेट के कहते हैं कि “मेरा प्रसंग यह है कि बिना मुझसे बात किये ही उनलोगों ने नाम दे दिया था।कल शाम को पहली बार उनका फोन आया।वैसे भी मैं ऐसे आयोजनों में एकदम नहीं जाता।ऐसे में मेरे जाने का सवाल ही नहीं था।न जाने का निर्णय तो था ही। वह अखबार भी मैं नहीं लेता।कल फेसबुक पर यह प्रकरण देखा ।अब यह कि पहले से न जाने के निर्णय को मैं इस विरोध से जोड़ दूँ? यह बात लगे हाथ क्रांतिकारी बन जाने जैसा होता।न जाना था न गया, लेकिन विरोध प्रसंग में भी चुप रहा।झूठ मुझे पसंद नहीं।”

कवयित्री निवेदिता ने भी बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहा- “17 जनवरी 2018 की कठुआ बलात्कार मामले  को लेकर जागरण की ख़बर से  गहरे आक्रोश में हूँ . कल हमने जागरण के संपादक के नाम ख़त लिखा था और उम्मीद की थी की वे इन मामलों  के प्रति अपनी राय साफ करेंगे . मुझे कोई जबाब नहीं आया . और आज फिर से उसी खबर को जागरण ने छापा है . ये खबर पत्रकारिता के मूल्य को शर्मशार करते हैं . जागरण ने मुझे अपने संवादी आयोजन में आमंत्रित किया है . इस शर्मनाक खबर के बाद में अपने को इस आयोजन से अलग करती हूँ”

जबकि बिहार संवादी का हिस्सा बनी एक और महिला साहित्यकार सुजाता चौधरी ने बिहार संवादी के बहिष्कार की बात पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए नकरात्मक और निराशाजनक बातें कही – “जब पाकिस्तान से संवाद ,तो संवादी बिहार के संवाद का  विरोध क्यों?जो समाचार पत्र किसी खास दल  या सत्ता  की ठकुरसुहाती करती नजर आती है तो जनता उसे नकार देती है।मुझे लगता है किसी भी संवाद मंच पर निष्पक्ष आवाज का, नहीं जाकर चुप रहने से अच्छा है वहां जाकर अपनी सही बात रखना।सही बात कहने वाले यदि वहां नहीं जाएंगे तो उस शून्य को एक पक्षीय लोग भर ही देंगे और यह बहुत तेजी से हो रहा है।”

जन संस्कृति मंच (जसम) ने सभी साहित्यकारों से बिहार संवादी का बहिष्कार करने की अपील की है। वहीं इलाहबाद जलेस के सचिव व युवा कवि संतोष चतुर्वेदी ने भी दैनिक जागरण के प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता की कड़े शब्दोंमें निंदा करते हुए ‘जलेस इलाहाबाद’, साहित्यिक ब्लॉग ‘पहली बार’और ‘अनहद’ साहित्यिक पत्रिका की ओर से सभी साहित्यकारों से बिहार संवादी का बहिष्कार करने की अपील की है।

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दिल्ली के कार्यक्रम से भी लेखकों ने किया किनारा: दैनिक जागरण का व्यापक विरोध

दैनिक जागरण के प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता से नाराज़ होकर प्रतिरोध स्वरूप उसके द्वारा दिल्ली में हर माह आयोजित किये जाने वाले दो सत्रों के साहित्यिक कार्यक्रम मुक्तांगन का भी साहित्यकारों फिल्मकारों ने बहिष्कार कर दिया है। मुक्तांगन का बहिष्कार करने वालों में वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह, विपिन चौधरी सुजाता, दिल्ली जलेस के सचिव प्रेम तिवारी और मिहिर पांड्या शामिल हैं।

अपना विरोध दर्ज करते हुए कवयित्री सविता सिंह ने जन व समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि मुक्त विचारधारा वाले लोगों के साहित्यिक आयोजनों से कोई दिक्कत नहीं है। चूँकि मुक्तांगन की आयोजक मुझे मुक्तधारा की लगी तो मैंने उनके कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए हामी भर दी थी, लेकिन जैसे ही पता चला की नहीं, मुक्तांगन के पीछे बलात्कारियों के समर्थन में खड़ा दैनिक जागरण है मैंने तुरंत मुक्तांगन कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया।आगे सविता जी कहती हैं,- “हम इन बच्चों के लिए सिर्फ़ रोयेंगें ही नहीं बल्कि अपने देश में उभर चुकी इन प्रतिगामी शक्तियों और समस्या को समझकर उनसे वैचारिक लड़ाई भी लड़ेंगें और भारत का एक नया इतिहास बनायेंगें।”

दैनिक जागरण के आयोजन वाले ‘मुक्तांगन’ का बहिष्कार करते हुए कवयित्री सुजाता पीड़ा, क्षोभ और आवेश से भरी हुई थी। उन्होंने सच्चाई व वैज्ञानिक तथ्यों के विपरीत आधारहीन,तर्कहीन दुष्प्रचार वफर्जीवाड़ा फैलाने वाले दैनिक जागरण और उसके तथाकथिक साहित्यिक कार्यक्रम मुक्तांगन के बाबत कहा कि,-“दैनिक जागरण का यह पोस्टर देखने के बाद इस कार्यक्रम में मैं ,सविता जी और विपिन भी नहीं जा रहे हैं। बलात्कारियों के पक्ष में बेशर्मी से खड़े होने वाले अखबार जहाँ शामिल होंगे उस तरह के किसी कार्यक्रम का हिस्सा हम नहीं हो सकते।”

दिल्ली जलेस के सचिव व साहित्यकार प्रेम तिवारी ने दैनिक जागरण के बलात्कारी पत्रकारिता की घोर भर्त्सना करते हुए कहा,-“मैंने मुक्तांगन के कार्यक्रम में जाना स्थगित कर दिया है । मेरे विरोध का पहला कारण यह है कि दैनिक जागरण ने पिछले दिनों कठुआ रेप केस को लेकर जैसी रिपोर्टिंग की है उससे पत्रिकारिता की न सिर्फ साख गिरी है ,लोगों का भरोसा टूट है बल्कि इससे मानवीय संवेदना को गहरा  धक्का भी लगा है । दूसरा , दैनिक जागरण की पत्रकारिता जनतांत्रिक और सेक्युलर मूल्यों और मर्यादाओं की हत्या करने वाली साबित हुई है।”

वहीं मिहिर पांड्या ने मुक्तांगन का बहिष्कार करते हुए कहा कि, -“मुक्तांगन में आराधना जी गंभीर सोच के साथ बहुत अच्छा आयोजन कर रही हैं, ऐसा मैंने महसूस किया और जाना है। लेकिन मुक्तांगन की चर्चा के लिए हाँ कहते हुए मैंने ध्यान नहीं दिया था कि अब इसमें दैनिक जागरण का नाम आयोजक के बतौर जुड़ गया है। शायद यह कल से पहले तक मुद्दा था भी नहीं। लेकिन कल और आज जिस किस्म की कुत्सित पत्रकारिता का नमूना एक छोटी सी बच्ची के साथ हुए अपराध को रिपोर्ट करते हुए दैनिक जागरण अख़बार ने पेश किया है, उसके चलते मुझे उनसे व्यक्तिगत माफ़ी मांगते हुए लिखना पड़ रहा है कि सैद्दांतिक आधार पर मैं जागरण के इस आयोजन से अपने आप को अलग कर रहा हूँ।मैं पेशे से अध्यापक हूँ और मेरे लिए यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अपने बच्चों के लिए कैसा भारत बनाना और बचाना चाहते हैं।”

चर्चित कवयित्री विपिन चौधरी ने बहुत ही तल्ख स्वरों में दैनिक जागरण द्वारा पत्रकारिता के नाम पर चलाए जा रहे कुत्सित घृणित व सांप्रदायिक एजेंडे की निंदा करते हुए कहती हैं-“एक रचनाकार का काम ही व्यवस्था के प्रति विरोध करते हुए अपने रचनात्मक संसार को विस्तृत करते जाना है। भीतर से असीम बेचैनी लिए और बाहर से शांत दिखने वाले लेखक की छवि भी अब बदल रही है। अब उसकी बाहर से भी शांति छीन गई है समय ने उसके मस्तक पर चिंता की रेखाओं को घना कर दिया है।इस आधुनिक समय में उसे अपनी मेज़ पर रखे कागज़ के अलावा भी दस जगह अपने प्रतिरोध की आवाज़ को दर्ज़ करना है, अब वहसक्रीय रूप में सोशल साइट्स पर भी विरोध करता है क्योंकि आज दुश्मन इसी पर सवार हो कर हमला करने आ पंहुचाहै। आज का लेखक यह जान गया है किदुष्ट प्रवृतियां अपने स्वभाव में इतनी शातिर होती हैं कि वे किसी भी दिशा से किसी की रूप से एक रचनाकार के पास पहुंच सकती हैं,. अपने रचनाकर्म में रत लेखक उन्हें अपने करीब देखकर चौंक उठता है। क्योंकि उसके स्वभाव में चालाकियाँ नहीं हैं शायद इसलिए वह उसके चक्रव्यूह को समझने में देरी लगती है।पिछलेकुछ समय से जैसे जैसे समाज का स्वरुप कठोर होता जा रहा वैसे लेखक को भी हर समय चौकन्ना रहना पड़ रहा है पहले की तरह शांत होकर बैठने का समय अबखत्म समझो।आधुनिक दौर में बहुत हम चीज़ों से सच की उम्मीद रखी जा सकती थी जिसमें अख़बारका नाम सबसे पहले आता था।अब वह भी जूठा हुआ जाता है और वह भी इंसान के सबसे घिनौने कृत्य की पैरवी में, ऐसे हर ठिकाने का पुरजोर विरोध हो जहाँ सच से दूरी हो चली है यह ध्यान रखते हुए किआजतक सच किसी के छुपाएं कभी छुप नहीं सका है।”

तस्वीरें गूगल से साभार 
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दैनिक जागरण और अन्य मीडिया के अपराधिक खबरों पर जम्मू पुलिस ने जारी की प्रेस विज्ञप्ति

सुशील मानव 

जम्मू पुलिस ने जम्मू के कठुआ जिले के रसाना गाँव में बकरवाल समुदाय की आठ वर्षीय बच्ची  के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में हिंदी अखबार दैनिक जागरण और अन्य मीडिया समूह द्वारा अपने यहाँ और
सोशल मीडिया में की जा रही झूठी रपटों का खंडन करते हुए विज्ञप्ति जारी की है. पढ़ें क्या कहा है पुलिस ने:

जम्मू के कठुआ जिले के रसाना गाँव में बकरवाल समुदाय की आठ वर्षीय बच्ची  के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में हिंदी अखबार दैनिक जागरण ने  20 अप्रैल 2018 के जम्मू, दिल्ली,लखनऊ,पटना, चंडीगढ़, समेत कई अंको में “बच्ची से नहीं हुआ था दुष्कर्म” हेडलाइन वाली निष्कर्षात्मक खबर छापी थी, और 21 और 21 अप्रैल को कुछ संस्करणों में दुहराया । जबकि दिल्ली की फोरेंसिक लैब एफएसएल ने अपनी रिपोर्ट में बच्ची संग मंदिर में बलात्कार की पुष्टि की है। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि मंदिर के अंदर जो खून के धब्बे मिले थे वो पीड़िता के ही हैं। इसके अलावा मंदिर में जो बालों का गुच्छा मिला था जाँच में वो एक आरोपी शुभम संगारा के होने की पुष्टि लैब ने किया है। इसके अलावा पीड़िता के कपड़ों पर मिले खून के धब्बे उसके डीएनए प्रोफाइल से मैच करते हैं। साथ ही पीड़िता की वजाइना पर खून मिलने की पुष्टि लैब ने की हैं।

इसे संघ और भाजपा समर्थक सोशल मीडिया में खूब फैलाया जा रहा है. इसके असर को देखते हुए जम्मू पुलिस ने आज एक प्रेसविज्ञप्ति जारी कर भ्रम दूर किया है. पढ़ें क्या लिखा है विज्ञप्ति में ( हिन्दी अनुवाद):



छः  दिनों से प्रेस/ एलेक्ट्रोनिक मीडिया और सोशल मीडिया हीरानगर, कठुआ, थाने में दर्ज एफआईआर न. 10/2018, दिनांक 12.01.2018, के बारे में कुछ सूचनायें शेयर कर रहे हैं. जांच की सारी कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा कर, एक समुचित कोर्ट के समक्ष  चार्जशीट पेश किया गया था, और जांच एजेंसी एक पूरक चार्जशीट भी दाखिल करने वाली है.


हालांकि पिछले कुछ दिनों से प्रिंट/ एलेक्ट्रोनिक मीडिया ने सच से कोई भी वास्ता न रखने वाली जानकारियाँ प्रकाशित/ प्रसारित किया है और सोशल मीडिया साइट्स पर शेयर भी किया है. इन रिपोर्टों से विवश होकर अंततः हम यह तथ्य सामने रखना चाहते हैं कि मेडिकल विशेषज्ञों की राय द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि पीडिता आरोपियों द्वारा यौन हमले की शिकार हुई थी. मेडिकल विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि पीडिता का हाइमीन भी अक्षुण्ण नहीं था. इन चिकित्सकीय निर्णयों के आधार पर आईपीसी की धारा 376 (डी) इस केस में जोड़ी गयी है. इसके अलावा संदेह से परे जाकर चिकित्सकीय निष्कर्ष है कि पीडिता को कैद में रखा गया था और नशे की दवाइयां (दर्द निवारक) दी गयी थीं और मौत का कारण डीएम घुटने से हुआ हृदयघात है.

तस्वीरें गूगल से साभार 
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दैनिक जागरण द्वारा आयोजित ‘बिहार संवादी ‘ का साहित्यकार करेंगे बहिष्कार (!)

वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने दैनिक  जागरण की आज की खबर को ‘सीधा-सीधा फासिज्म को प्रमोट करने वाला बताते हुए  अखबार की इस अमानीय व बर्बर हरकत की भर्त्सना की। उन्होंने आगे कहा कि अखबार द्वारा बलात्कारियों के पक्ष में इस हद तक की गलतबयानी करना उस बच्ची के साथ बलात्कार करने जैसा ही है।और उसके द्वारा आयोजित संवादी में शामिल होने के सवाल पर प्रतिप्रश्न किया कि ‘क्या आपको लगता है कि इसके बाद भी हम कार्यक्रम में जायेंगे?’ वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा कि दैनिक जागरण हमेशा से ऐसा ही अखबार रहा है। खबरों को तो छोड़िए लेखों को भी हद से ज्यादा एडिटिंग करनेवाला। इसीलिये मैंने कभी कुछ नहीं लिखा इस अखबार के लिए। मदन कश्यप जी कहते हैं कि वो शुरू से ही दैनिक जागरण के कार्यक्रमों का बहिष्कार करते रहे हैं। वरिष्ठ साहित्यकार उषा किरण खान का जवाब निराशाजनक था, वे आज ही आसिफा सहित अन्य बलात्कार के मामलों पर प्रतिरोध की कविता का पाठ आयोजित कर रही हैं और इसे ही वे उपलब्धि बताते हुए कार्यक्रम में जाने को तैयार हैं. सुशील मानव की रिपोर्ट :





जम्मू के कठुआ जिले के रसाना गाँव में बकरवाल समुदाय की आठ वर्षीय बच्ची आसिफा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में हिंदी अखबार दैनिक जागरण ने आज 20 अप्रैल 2018 के जम्मू, दिल्ली,लखनऊ,पटना, चंडीगढ़, समेत कई अंको में “बच्ची से नहीं हुआ था दुष्कर्म” हेडलाइन वाली निष्कर्षात्मक खबर छापी है। जबकि दिल्ली की फोरेंसिक लैब एफएसएल ने अपनी रिपोर्ट में बच्ची संग मंदिर में बलात्कार की पुष्टि की है। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि मंदिर के अंदर जो खून के धब्बे मिले थे वो पीड़िता के ही हैं। इसके अलावा मंदिर में जो बालों का गुच्छा मिला था जाँच में वो एक आरोपी शुभम संगारा के होने की पुष्टि लैब ने की है। इसके अलावा पीड़िता के कपड़ों पर मिले खून के धब्बे उसके डीएनए प्रोफाइल से मैच करते हैं। साथ ही पीड़िता की वजाइना पर खून मिलने की पुष्टि लैब ने की हैं।

इतने सारे वैज्ञानिक सबूतों, प्रमाणों, तथ्यों को झुठलाते हुए दैनिक जागरण ने उस मिथ्या बात को हाइलाइट करके फ्रंट पेज पर छापा जो लगातार भाजपा और संघ के लोग दुष्प्रचारित करते चले आ रहे हैं। साफ जाहिर है दैनिक जागरण अखबार पत्रकारिता के बुनियादी बातों, उसूलों और मूल्यों को त्यागकर सत्ता के मुखपत्र की तरह कार्य करते हुए बलात्कार के पक्ष में मानस बनाने का कार्य कर रहा है जो न सिर्फ अनैतिक अमानवीय व हिंसक है अपितु आपराधिक भी।

विगत वर्षों की भाँति दैनिक जागरण इस वर्ष भी बिहार के तारामंडल पटना में 21-22 अप्रैल 2018 को बिहार“संवादी” कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है।जिसे बिहार का साहित्य उत्सव नाम से प्रचारित किया गया है। चूँकि साहित्यकार ही जन और समाज को सबसे अधिक नजदीक से देखने सोचने और अनुभूति करनेवाला जीव होता है और उसकी सबसे पहली प्रतिबद्धता इन्हीं जन व समाज के प्रति होती है। अतः एक ऐसा अख़बार जो जनविरोधी फासिस्ट ताकतों के हाथों बिककर उनका मुखपत्र बन चुका है और जो लगातार मिथ्या, आधारहीन तर्कहीन खबरों व उनके पोपोगैंडा को चलाकर जनचेतना, व सामूहिक विवेक को नष्टकरके लोगों को हत्यारी बलात्कारी भीड़ में तब्दील करने के उपक्रम में लगा हुआ है। अतः उसके द्वारा आयोजित किये जा रहे तथाकथित साहित्य उत्सव बिहार संवादी में खुद को जनपक्षधर कहने वालासाहित्यकार शामिल ही क्यों हो ? क्यों न सभी साहित्यकार विशेषकर जो दैनिक जागरण संवादी में बतौर वक्ता बुलाये गये हैं वो इस कार्यक्रम का वहिष्कार करें? यही सब सोच विचारकर हम कुछ साहित्य,पत्रकारिता व रंगकर्म से जुड़े हुए लोगों ने दैनिक जागरण संवादी के वहिष्कार करने का कदम उठाया है। ये सिलसिला हमने फेसबुक से शुरू करते हुए उसी क्रम में बिहार संवादी में बतौर वक्ता शिरकत करने जा रहे कुछ वरिष्ठ युवा व नामी साहित्यकारों से (जो खुद को जनपक्षधर कहते हैं) बात करके ऑन रिकार्ड उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही।

सबसे पहले हमने मोबाइल फोन के जरिए अरुण कमल  से बात की। अरुण कमल जी ने दैनिक जागरण की आज की खबर को सीधा-सीधा फासिज्म को प्रमोट करने वाला बताते हुए दैनिक जागरण की इस अमानीय व बर्बर हरकत की भर्त्सना की। उन्होंने आगे कहा कि अखबार द्वारा बलात्कारियों के पक्ष में इस हद तक की गलतबयानी करना उस बच्ची के साथ बलात्कार करने जैसा ही है।बिहार संवादी में उनके शामिल होने को लेकर पूछे गये सवाल के जवाब में उन्होंने कहा-“क्या आपको अब भी लगता है कि मैं वहाँ जाऊँगा!” हमने आग्रह किया कि फिर क्या करेंगे वो बोले-“आप जान जाएगें।”-

बलात्कार और हत्या का न्यायशास्त्र-समाजशास्त्र !
जबकि आलोक धन्वा ने कहीं व्यस्त होने की वजह से बाद में प्रतिक्रिया देने की बात कहकर फोन लाइन काट दिया। वहीं बिहार संवादी में बतौर वक्ता शामिल वरिष्ठ महिला साहित्यकार उषा किरण ने आज शाम अपनी संस्था द्वारा आयोजित लड़कियों के काव्यपाठ के जरिए दैनिक जागरण के इस शर्मनाक हरकत का प्रतिरोध करने की बात कही। संवादी के वहिष्कार के बाबत पूछने पर उषा किरण ने कहा कि वो संवादी के मंच से ही दैनिक जागरण के एजेंडे का विरोध करेंगी।

युवा साहित्यकार अनीस अंकुर ने दैनिक जागरण को फासीवादी अखबार, बरगलाने वाली खबर बनाने वाला अखबार  बताते हुए कहा कि बहिष्कार आखिरी और इक्स्ट्रीम कदम होता है। उससे पहले बीच के भी कुछ कदम उठाये जा सकते हैं। आगे उन्होंने कहा कि इस तरह के सामूहिक फैंसलों के लिए एक साझा मंच से मिल-बैठकर फैंसला लिया जाना चाहिए।

कठुआ रेप केस को लेकर उड़ाई जा रही अफ़वाहों से बचें, यहाँ सीधे चार्जशीट पढ़ें! (मीडिया विजिल) 

वहीं कवयित्री निवेदिता  ने कहा कि मैंने अनंत विजय को संबोंधित करके एक पत्र लिख दिया है।वो दैनिक जागरण के संपादक से बात करके मैटर को शार्टआउट  कर लेंगे। खैर आपको अवगत करा दूँ कि उन्होंने पत्र में लिखा क्या है। उन्होंने लिखा है- प्रिय अनंत जी , आपकी शुक्रगुजार हूँ की आपने जागरण संवादी में मुझे बुलाया। इस साहित्यिक आयोजन से मुझे और बिहार के लोगों को काफी उम्मीद है। हमें यकीन है कि दैनिक जागरण जैसा अख़बार हमेशा आम लोगों के साथ खड़ा रहेगा। पर आज की खबर से गहरी निराशा हुयी। और आगे कठुआ गैंगरेप मामले की दिल्ली लैब रिपोर्ट के बाबत बाते लिखी गई हैं।

सम्मानित कवि मदन कश्यप ने कहा कि दैनिक जागरण हमेशा से ऐसा ही अखबार रहा है। खबरों को तो छोड़िए लेखों को भी हद से ज्यादा एडिटिंग करनेवाला। इसीलिये मैंने  इस अखबार के लिए लिखना छोड़ दिया। मदन कश्यप कहते हैं कि वे शुरू से ही दैनिक जागरण के कार्यक्रमों का बहिष्कार करते रहे हैं। वो आगे कहते हैं कि यह अखबार सांप्रदायिक आधार पर खबरों को तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करता है, कह सकते हैं कि बहुत ही घटिया स्तर की पत्रकारिया करता है यह। ऐसे अखबारों और उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों का बहिष्कार किया जाना चाहिए। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि मैं संवादी कार्यक्रम के बहिष्कार का आह्वान करता हूँ तब तक, जब तक कि अखबार अपनी मिथ्या खबर का खंडन करके पाठकों से माफी नहीं माँगता।

आगे वे साहित्यकारों से अपील करते हुए कहते हैं कि– “ऐसे समय में जबकि इस अखबार ने बच्ची के बलात्कार जैसे अतिसंवेदशील मामले में बहुत ही गंदा और क्रूर स्टैंड लिया मैं सभी लेखकों से गुजारिश करता हूँ कि इसके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों मेंवे शामिल न हों । कम से कम तब तक तो बिल्कुल नहीं शामिल हों जब तक कि वो अखबार अपने इस कृत्य के लिए पाठकों से माफी नहीं माँगे। मदन कश्यप जी ने आगे कहा कि अभी तो मैं सिर्फ लेखकों से अनरोध ही कर सकता हूँ, तब तक मैं उन लेखकों को कुछ नहीं कह सकता जब तक कि आयोजन हो न जाये या कि वो लेखक शामिल होना न होना, हो न जाए। उसके बाद ही मैं किसी की निंदा कर सकता हूँ। हाँ इतना ही कह सकता हूँ कि बहुत ही घोर सांप्रदायिक आधार पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करना पत्रकारिता के मूल्यों के खिलाफ हैं इस तरह के अखबारों के कार्यक्रमों में शामिल होना इस तरह की पत्रकारिता और विचारों को समर्थन करना है।

तस्वीरें गूगल से साभार 
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