दिल्ली के कार्यक्रम से भी लेखकों ने किया किनारा: दैनिक जागरण का व्यापक विरोध


दैनिक जागरण के प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता से नाराज़ होकर प्रतिरोध स्वरूप उसके द्वारा दिल्ली में हर माह आयोजित किये जाने वाले दो सत्रों के साहित्यिक कार्यक्रम मुक्तांगन का भी साहित्यकारों फिल्मकारों ने बहिष्कार कर दिया है। मुक्तांगन का बहिष्कार करने वालों में वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह, विपिन चौधरी सुजाता, दिल्ली जलेस के सचिव प्रेम तिवारी और मिहिर पांड्या शामिल हैं।

अपना विरोध दर्ज करते हुए कवयित्री सविता सिंह ने जन व समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि मुक्त विचारधारा वाले लोगों के साहित्यिक आयोजनों से कोई दिक्कत नहीं है। चूँकि मुक्तांगन की आयोजक मुझे मुक्तधारा की लगी तो मैंने उनके कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए हामी भर दी थी, लेकिन जैसे ही पता चला की नहीं, मुक्तांगन के पीछे बलात्कारियों के समर्थन में खड़ा दैनिक जागरण है मैंने तुरंत मुक्तांगन कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया।आगे सविता जी कहती हैं,- “हम इन बच्चों के लिए सिर्फ़ रोयेंगें ही नहीं बल्कि अपने देश में उभर चुकी इन प्रतिगामी शक्तियों और समस्या को समझकर उनसे वैचारिक लड़ाई भी लड़ेंगें और भारत का एक नया इतिहास बनायेंगें।”



दैनिक जागरण के आयोजन वाले ‘मुक्तांगन’ का बहिष्कार करते हुए कवयित्री सुजाता पीड़ा, क्षोभ और आवेश से भरी हुई थी। उन्होंने सच्चाई व वैज्ञानिक तथ्यों के विपरीत आधारहीन,तर्कहीन दुष्प्रचार वफर्जीवाड़ा फैलाने वाले दैनिक जागरण और उसके तथाकथिक साहित्यिक कार्यक्रम मुक्तांगन के बाबत कहा कि,-“दैनिक जागरण का यह पोस्टर देखने के बाद इस कार्यक्रम में मैं ,सविता जी और विपिन भी नहीं जा रहे हैं। बलात्कारियों के पक्ष में बेशर्मी से खड़े होने वाले अखबार जहाँ शामिल होंगे उस तरह के किसी कार्यक्रम का हिस्सा हम नहीं हो सकते।”

दिल्ली जलेस के सचिव व साहित्यकार प्रेम तिवारी ने दैनिक जागरण के बलात्कारी पत्रकारिता की घोर भर्त्सना करते हुए कहा,-“मैंने मुक्तांगन के कार्यक्रम में जाना स्थगित कर दिया है । मेरे विरोध का पहला कारण यह है कि दैनिक जागरण ने पिछले दिनों कठुआ रेप केस को लेकर जैसी रिपोर्टिंग की है उससे पत्रिकारिता की न सिर्फ साख गिरी है ,लोगों का भरोसा टूट है बल्कि इससे मानवीय संवेदना को गहरा  धक्का भी लगा है । दूसरा , दैनिक जागरण की पत्रकारिता जनतांत्रिक और सेक्युलर मूल्यों और मर्यादाओं की हत्या करने वाली साबित हुई है।”

वहीं मिहिर पांड्या ने मुक्तांगन का बहिष्कार करते हुए कहा कि, -“मुक्तांगन में आराधना जी गंभीर सोच के साथ बहुत अच्छा आयोजन कर रही हैं, ऐसा मैंने महसूस किया और जाना है। लेकिन मुक्तांगन की चर्चा के लिए हाँ कहते हुए मैंने ध्यान नहीं दिया था कि अब इसमें दैनिक जागरण का नाम आयोजक के बतौर जुड़ गया है। शायद यह कल से पहले तक मुद्दा था भी नहीं। लेकिन कल और आज जिस किस्म की कुत्सित पत्रकारिता का नमूना एक छोटी सी बच्ची के साथ हुए अपराध को रिपोर्ट करते हुए दैनिक जागरण अख़बार ने पेश किया है, उसके चलते मुझे उनसे व्यक्तिगत माफ़ी मांगते हुए लिखना पड़ रहा है कि सैद्दांतिक आधार पर मैं जागरण के इस आयोजन से अपने आप को अलग कर रहा हूँ।मैं पेशे से अध्यापक हूँ और मेरे लिए यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अपने बच्चों के लिए कैसा भारत बनाना और बचाना चाहते हैं।”



चर्चित कवयित्री विपिन चौधरी ने बहुत ही तल्ख स्वरों में दैनिक जागरण द्वारा पत्रकारिता के नाम पर चलाए जा रहे कुत्सित घृणित व सांप्रदायिक एजेंडे की निंदा करते हुए कहती हैं-“एक रचनाकार का काम ही व्यवस्था के प्रति विरोध करते हुए अपने रचनात्मक संसार को विस्तृत करते जाना है। भीतर से असीम बेचैनी लिए और बाहर से शांत दिखने वाले लेखक की छवि भी अब बदल रही है। अब उसकी बाहर से भी शांति छीन गई है समय ने उसके मस्तक पर चिंता की रेखाओं को घना कर दिया है।इस आधुनिक समय में उसे अपनी मेज़ पर रखे कागज़ के अलावा भी दस जगह अपने प्रतिरोध की आवाज़ को दर्ज़ करना है, अब वहसक्रीय रूप में सोशल साइट्स पर भी विरोध करता है क्योंकि आज दुश्मन इसी पर सवार हो कर हमला करने आ पंहुचाहै। आज का लेखक यह जान गया है किदुष्ट प्रवृतियां अपने स्वभाव में इतनी शातिर होती हैं कि वे किसी भी दिशा से किसी की रूप से एक रचनाकार के पास पहुंच सकती हैं,. अपने रचनाकर्म में रत लेखक उन्हें अपने करीब देखकर चौंक उठता है। क्योंकि उसके स्वभाव में चालाकियाँ नहीं हैं शायद इसलिए वह उसके चक्रव्यूह को समझने में देरी लगती है।पिछलेकुछ समय से जैसे जैसे समाज का स्वरुप कठोर होता जा रहा वैसे लेखक को भी हर समय चौकन्ना रहना पड़ रहा है पहले की तरह शांत होकर बैठने का समय अबखत्म समझो।आधुनिक दौर में बहुत हम चीज़ों से सच की उम्मीद रखी जा सकती थी जिसमें अख़बारका नाम सबसे पहले आता था।अब वह भी जूठा हुआ जाता है और वह भी इंसान के सबसे घिनौने कृत्य की पैरवी में, ऐसे हर ठिकाने का पुरजोर विरोध हो जहाँ सच से दूरी हो चली है यह ध्यान रखते हुए किआजतक सच किसी के छुपाएं कभी छुप नहीं सका है।”

तस्वीरें गूगल से साभार 
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