दैनिक जागरण द्वारा आयोजित ‘बिहार संवादी ‘ का साहित्यकार करेंगे बहिष्कार (!)


वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने दैनिक  जागरण की आज की खबर को 'सीधा-सीधा फासिज्म को प्रमोट करने वाला बताते हुए  अखबार की इस अमानीय व बर्बर हरकत की भर्त्सना की। उन्होंने आगे कहा कि अखबार द्वारा बलात्कारियों के पक्ष में इस हद तक की गलतबयानी करना उस बच्ची के साथ बलात्कार करने जैसा ही है।और उसके द्वारा आयोजित संवादी में शामिल होने के सवाल पर प्रतिप्रश्न किया कि 'क्या आपको लगता है कि इसके बाद भी हम कार्यक्रम में जायेंगे?' वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा कि दैनिक जागरण हमेशा से ऐसा ही अखबार रहा है। खबरों को तो छोड़िए लेखों को भी हद से ज्यादा एडिटिंग करनेवाला। इसीलिये मैंने कभी कुछ नहीं लिखा इस अखबार के लिए। मदन कश्यप जी कहते हैं कि वो शुरू से ही दैनिक जागरण के कार्यक्रमों का बहिष्कार करते रहे हैं। वरिष्ठ साहित्यकार उषा किरण खान का जवाब निराशाजनक था, वे आज ही आसिफा सहित अन्य बलात्कार के मामलों पर प्रतिरोध की कविता का पाठ आयोजित कर रही हैं और इसे ही वे उपलब्धि बताते हुए कार्यक्रम में जाने को तैयार हैं. सुशील मानव की रिपोर्ट :




जम्मू के कठुआ जिले के रसाना गाँव में बकरवाल समुदाय की आठ वर्षीय बच्ची आसिफा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में हिंदी अखबार दैनिक जागरण ने आज 20 अप्रैल 2018 के जम्मू, दिल्ली,लखनऊ,पटना, चंडीगढ़, समेत कई अंको में “बच्ची से नहीं हुआ था दुष्कर्म” हेडलाइन वाली निष्कर्षात्मक खबर छापी है। जबकि दिल्ली की फोरेंसिक लैब एफएसएल ने अपनी रिपोर्ट में बच्ची संग मंदिर में बलात्कार की पुष्टि की है। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि मंदिर के अंदर जो खून के धब्बे मिले थे वो पीड़िता के ही हैं। इसके अलावा मंदिर में जो बालों का गुच्छा मिला था जाँच में वो एक आरोपी शुभम संगारा के होने की पुष्टि लैब ने की है। इसके अलावा पीड़िता के कपड़ों पर मिले खून के धब्बे उसके डीएनए प्रोफाइल से मैच करते हैं। साथ ही पीड़िता की वजाइना पर खून मिलने की पुष्टि लैब ने की हैं।

इतने सारे वैज्ञानिक सबूतों, प्रमाणों, तथ्यों को झुठलाते हुए दैनिक जागरण ने उस मिथ्या बात को हाइलाइट करके फ्रंट पेज पर छापा जो लगातार भाजपा और संघ के लोग दुष्प्रचारित करते चले आ रहे हैं। साफ जाहिर है दैनिक जागरण अखबार पत्रकारिता के बुनियादी बातों, उसूलों और मूल्यों को त्यागकर सत्ता के मुखपत्र की तरह कार्य करते हुए बलात्कार के पक्ष में मानस बनाने का कार्य कर रहा है जो न सिर्फ अनैतिक अमानवीय व हिंसक है अपितु आपराधिक भी।

विगत वर्षों की भाँति दैनिक जागरण इस वर्ष भी बिहार के तारामंडल पटना में 21-22 अप्रैल 2018 को बिहार“संवादी” कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है।जिसे बिहार का साहित्य उत्सव नाम से प्रचारित किया गया है। चूँकि साहित्यकार ही जन और समाज को सबसे अधिक नजदीक से देखने सोचने और अनुभूति करनेवाला जीव होता है और उसकी सबसे पहली प्रतिबद्धता इन्हीं जन व समाज के प्रति होती है। अतः एक ऐसा अख़बार जो जनविरोधी फासिस्ट ताकतों के हाथों बिककर उनका मुखपत्र बन चुका है और जो लगातार मिथ्या, आधारहीन तर्कहीन खबरों व उनके पोपोगैंडा को चलाकर जनचेतना, व सामूहिक विवेक को नष्टकरके लोगों को हत्यारी बलात्कारी भीड़ में तब्दील करने के उपक्रम में लगा हुआ है। अतः उसके द्वारा आयोजित किये जा रहे तथाकथित साहित्य उत्सव बिहार संवादी में खुद को जनपक्षधर कहने वालासाहित्यकार शामिल ही क्यों हो ? क्यों न सभी साहित्यकार विशेषकर जो दैनिक जागरण संवादी में बतौर वक्ता बुलाये गये हैं वो इस कार्यक्रम का वहिष्कार करें? यही सब सोच विचारकर हम कुछ साहित्य,पत्रकारिता व रंगकर्म से जुड़े हुए लोगों ने दैनिक जागरण संवादी के वहिष्कार करने का कदम उठाया है। ये सिलसिला हमने फेसबुक से शुरू करते हुए उसी क्रम में बिहार संवादी में बतौर वक्ता शिरकत करने जा रहे कुछ वरिष्ठ युवा व नामी साहित्यकारों से (जो खुद को जनपक्षधर कहते हैं) बात करके ऑन रिकार्ड उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही।



सबसे पहले हमने मोबाइल फोन के जरिए अरुण कमल  से बात की। अरुण कमल जी ने दैनिक जागरण की आज की खबर को सीधा-सीधा फासिज्म को प्रमोट करने वाला बताते हुए दैनिक जागरण की इस अमानीय व बर्बर हरकत की भर्त्सना की। उन्होंने आगे कहा कि अखबार द्वारा बलात्कारियों के पक्ष में इस हद तक की गलतबयानी करना उस बच्ची के साथ बलात्कार करने जैसा ही है।बिहार संवादी में उनके शामिल होने को लेकर पूछे गये सवाल के जवाब में उन्होंने कहा-“क्या आपको अब भी लगता है कि मैं वहाँ जाऊँगा!” हमने आग्रह किया कि फिर क्या करेंगे वो बोले-“आप जान जाएगें।”-

बलात्कार और हत्या का न्यायशास्त्र-समाजशास्त्र !
जबकि आलोक धन्वा ने कहीं व्यस्त होने की वजह से बाद में प्रतिक्रिया देने की बात कहकर फोन लाइन काट दिया। वहीं बिहार संवादी में बतौर वक्ता शामिल वरिष्ठ महिला साहित्यकार उषा किरण ने आज शाम अपनी संस्था द्वारा आयोजित लड़कियों के काव्यपाठ के जरिए दैनिक जागरण के इस शर्मनाक हरकत का प्रतिरोध करने की बात कही। संवादी के वहिष्कार के बाबत पूछने पर उषा किरण ने कहा कि वो संवादी के मंच से ही दैनिक जागरण के एजेंडे का विरोध करेंगी।

युवा साहित्यकार अनीस अंकुर ने दैनिक जागरण को फासीवादी अखबार, बरगलाने वाली खबर बनाने वाला अखबार  बताते हुए कहा कि बहिष्कार आखिरी और इक्स्ट्रीम कदम होता है। उससे पहले बीच के भी कुछ कदम उठाये जा सकते हैं। आगे उन्होंने कहा कि इस तरह के सामूहिक फैंसलों के लिए एक साझा मंच से मिल-बैठकर फैंसला लिया जाना चाहिए।

कठुआ रेप केस को लेकर उड़ाई जा रही अफ़वाहों से बचें, यहाँ सीधे चार्जशीट पढ़ें! (मीडिया विजिल) 

वहीं कवयित्री निवेदिता  ने कहा कि मैंने अनंत विजय को संबोंधित करके एक पत्र लिख दिया है।वो दैनिक जागरण के संपादक से बात करके मैटर को शार्टआउट  कर लेंगे। खैर आपको अवगत करा दूँ कि उन्होंने पत्र में लिखा क्या है। उन्होंने लिखा है- प्रिय अनंत जी , आपकी शुक्रगुजार हूँ की आपने जागरण संवादी में मुझे बुलाया। इस साहित्यिक आयोजन से मुझे और बिहार के लोगों को काफी उम्मीद है। हमें यकीन है कि दैनिक जागरण जैसा अख़बार हमेशा आम लोगों के साथ खड़ा रहेगा। पर आज की खबर से गहरी निराशा हुयी। और आगे कठुआ गैंगरेप मामले की दिल्ली लैब रिपोर्ट के बाबत बाते लिखी गई हैं।

सम्मानित कवि मदन कश्यप ने कहा कि दैनिक जागरण हमेशा से ऐसा ही अखबार रहा है। खबरों को तो छोड़िए लेखों को भी हद से ज्यादा एडिटिंग करनेवाला। इसीलिये मैंने  इस अखबार के लिए लिखना छोड़ दिया। मदन कश्यप कहते हैं कि वे शुरू से ही दैनिक जागरण के कार्यक्रमों का बहिष्कार करते रहे हैं। वो आगे कहते हैं कि यह अखबार सांप्रदायिक आधार पर खबरों को तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करता है, कह सकते हैं कि बहुत ही घटिया स्तर की पत्रकारिया करता है यह। ऐसे अखबारों और उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों का बहिष्कार किया जाना चाहिए। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि मैं संवादी कार्यक्रम के बहिष्कार का आह्वान करता हूँ तब तक, जब तक कि अखबार अपनी मिथ्या खबर का खंडन करके पाठकों से माफी नहीं माँगता।

आगे वे साहित्यकारों से अपील करते हुए कहते हैं कि- “ऐसे समय में जबकि इस अखबार ने बच्ची के बलात्कार जैसे अतिसंवेदशील मामले में बहुत ही गंदा और क्रूर स्टैंड लिया मैं सभी लेखकों से गुजारिश करता हूँ कि इसके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों मेंवे शामिल न हों । कम से कम तब तक तो बिल्कुल नहीं शामिल हों जब तक कि वो अखबार अपने इस कृत्य के लिए पाठकों से माफी नहीं माँगे। मदन कश्यप जी ने आगे कहा कि अभी तो मैं सिर्फ लेखकों से अनरोध ही कर सकता हूँ, तब तक मैं उन लेखकों को कुछ नहीं कह सकता जब तक कि आयोजन हो न जाये या कि वो लेखक शामिल होना न होना, हो न जाए। उसके बाद ही मैं किसी की निंदा कर सकता हूँ। हाँ इतना ही कह सकता हूँ कि बहुत ही घोर सांप्रदायिक आधार पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करना पत्रकारिता के मूल्यों के खिलाफ हैं इस तरह के अखबारों के कार्यक्रमों में शामिल होना इस तरह की पत्रकारिता और विचारों को समर्थन करना है।

तस्वीरें गूगल से साभार 
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह 'द मार्जिनलाइज्ड' नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. 'द मार्जिनलाइज्ड' मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

'द मार्जिनलाइज्ड' के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com
Blogger द्वारा संचालित.