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भारतीय संतों के हमेशा कुंडलिनी जागरण की तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं: लेनिन

महिलाओं के मुद्दों पर लेनिन 
क्लारा जे़टकिन

आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. इस बातचीत का एक हिस्सा (बीच का हिस्सा), जो महिला श्रम के सन्दर्भ में है स्त्रीकाल के पाठक 1 मई (मजदूर दिवस) को पहले ही पढ़ चुके हैं, इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. 

लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है


आज से हम इस बातचीत को प्रारम्भिक हिस्से से क्रमवार प्रकाशित करेंगे. 

महिलाओं के अधिकारों की समस्या पर कॉमरेड लेनिन मुझसे लगातार चर्चा करते थे। महिलाओं के आंदोलन को वे बहुत महत्व देते थे। उनके अनुसार महिलाओं के आंदोलन, जन-आंदोलनों का एक जरूरी हिस्सा है, जो कुछ परिस्थितियों में निर्णायक होता है। वे महिलाओं को सामाजिक बराबरी देने को एक सिद्धांत की तरह देखते थे। निश्चित ही कोई भी कम्युनिस्ट इस बात से असहमत नहीं होगा।  इस विषय पर हम दोनों की सबसे पहली लंबी बातचीत 1920 की शरद ऋतु में हुई थी। यह बातचीत क्रेमलिन में लेनिन के बड़े से अध्ययन-कक्ष में हुई थी। लेनिन अपनी मेज पर बैठे थे, जो किताबों और कागजों से ढंकी हुई थी। वो किसी बेहद विद्वान व्यक्ति के अध्ययन और काम करने की ओर इशारा करती थीं, वो भी बिना किसी अव्यवस्था के।

मेरा स्वागत करने के बाद वे बोले, “हमें साफ सैद्धांतिक आधार पर महिलाओं का एक शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करना चाहिए। इसके लिए हमें हर साधन का उपयोग करना चाहिए। ये तो तय है कि मार्क्सवादी सिद्धांत के बिना हम उचित व्यवहार नहीं कर सकते। इस मामले में भी हम कम्युनिस्ट लोगों की सैद्धांतिक समझ बिलकुल साफ होनी चाहिए। हमें हमारी और दूसरी पार्टियों के बीच स्पष्ट रेखा खींचनी होगी। यह दुखद है कि महिलाओं के मुद्दे पर हमारे ‘दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’  (सेकंड इंटर्नेशनल) में अपेक्षानुरूप चर्चा नहीं हो पाई। वहां प्रश्न तो उठाए गए लेकिन किसी निश्चित मत तक नहीं पहुंचा जा सका। इस मामले पर अभी भी एक समिति है। उसे एक प्रस्ताव, पर्चा और निर्देश लिखने हैं। लेकिन अब तक बहुत कम प्रगति हो पाई है। तुम इसमें जरूर मदद करो।’’

जो लेनिन अब मुझे बता रहे थे, मैं दूसरों से पहले ही सुन चुकी थी। मैंने अपनी खुशी जाहिर की। क्रांति के दौरान जो कुछ रूसी महिलाओं ने किया था, और जो वे अब उसकी रक्षा और विकास के लिए कर रही थीं, मैं उससे उत्साहित थी। जहां तक बोल्शेविक पार्टी में महिलाओं की स्थिति और गतिविधियों का सवाल है, मेरा मानना है- ये आदर्श पार्टी है। इसने अकेले ही अंतररार्ष्ट्रीय कम्युनिस्ट महिला आंदोलन तैयार किया, वो भी मूल्यवान, प्रशिक्षित और अनुभवी दल-बल के साथ। इसने इतिहास के लिए एक महान उदाहरण पेश किया।
फीकी मुस्कान के साथ लेनिन बोले, “सही है, यह बेहतरीन है। पेत्रेगार्द में, यहां मास्को में और दूसरे शहरों और औद्योगिक केंद्रों पर क्रांति के दौरान सर्वहारा महिलाओं ने बहुत अच्छा काम किया। मेरा विचार हैं कि उनके बगैर हमारी जीत मुश्किल होती। उन्होंने बहुत साहस दिखाया। उनमें अब भी बहुत दम है। उनकी तकलीफों और पाबंदियों की कल्पना करो। लेकिन फिर भी उन्होंने ये सब किया, क्योंकि वे सोवियत लोगों की रक्षा चाहती थीं। क्योंकि उन्हें आजादी और साम्यवाद चाहिए था। हां, हमारी कामकाजी महिलाएं बेहतरीन वर्ग-लड़ाकू हैं। वे प्रशंसा और प्रेम के काबिल हैं। ये भी स्वीकारना चाहिए कि पेत्रेगार्द में हमारे खिलाफ लड़ने में, संवैधानिक जनवादियों के फौजियों के मुकाबले, उनकी महिलाओं ने हमें अच्छी टक्कर दी। फ्ये सच है कि हमारी पार्टी में भरोसे लायक, बुद्धिमान और न थकने वाली महिलाएं हैं। वे सोवियतों, कार्यकारी समितियों, जन समितियों और हर तरह के कार्यालयों में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। उनमें से कई तो पार्टी में या मजदूरों, किसानों के बीच या लाल सेना में दिन-रात काम करती हैं। ये हमारे लिए बहुत अच्छी बात है। ये सारी दुनिया की महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये महिलाओं की योग्यता, समाज के लिए उनके द्वारा किए गए बहुत अच्छे काम का सबूत है। सर्वहारा के अधिनायकवाद के इस पहले प्रयोग ने महिलाओं के लिए सामाजिक बराबरी का रास्ता साफ किया है। अधिकतर महिलावादी साहित्य की अपेक्षा इसने ज्यादा पूर्वाग्रहों को खत्म किया है। बावजूद इस सबके अभी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं का कम्युनिस्ट आंदोलन नहीं है। जल्द ही हमें ऐसा आंदोलन खड़ा करना चाहिए। ऐसे आंदोलन के बगैर हमारे इंटरनेशनल और उसकी पार्टियों का काम अधूरा रहेगा, वह कभी भी पूरा नहीं हो सकेगा। हमारा क्रांतिकारी काम संपूर्णता में होना चाहिए। मुझे बताओ कि विदेशों में हमारा कम्युनिस्ट आंदोलन कैसा चल रहा है?”

उस समय जितना मैं बता सकती थी-जबकि कॉमिटर्न की पार्टियों के आपस में संबंध ढीले और छिटपुट थे- मैंने बताया। कुछ आगे झुककर बैठे लेनिन ने ध्यान से हर बात सुनी। उनके चेहरे पर ऊब, जल्दबाजी या थकावट का कोई निशान नहीं था। यहां तक कि कम महत्व के विवरण पर भी उन्होंने ध्यान दिया। मैंने उनसे बेहतर श्रोता कभी नहीं देखा। साथ ही ऐसा व्यक्ति भी जिसने जो कुछ सुना और उतनी ही तेजी से उसका सैद्धान्तीकरण कर लिया। यह इस बात से पता चलता है कि जो कुछ मैंने उन्हें बताया, उस पर उन्होंने समय-समय पर छोटे और सटीक प्रश्न किए। जो कुछ मैंने बयान किया था, उसके एक या दूसरे मुद्दे पर वे बाद में आए। लेनिन ने कुछ छोटे-मोटे विवरण भी दर्ज किए।

जाहिर है कि मैंने जर्मनी के काम-काज के बारे में सविस्तार बताया। रोजा लक्जमबर्ग द्वारा क्रांतिकारी संघर्ष में अधिक से अधिक महिलाओं को लाने की बात के व्यापक महत्व के बारे में मैंने लेनिन को बताया। जब कम्युनिस्ट पार्टी गठित की गई, रोजा ने महिलाओं का एक अखबार निकालने पर जोर दिया। आखिरी बार जब मैं लियो जोगिशे से उनकी हत्या के 36 घंटे पहले मिली थी, तो उन्होंने मेरे साथ पार्टी के काम करने के इरादों के बारे में चर्चा की थी। उन्होंने मुझे कई काम सौंपे। इसमें से एक था- कामकाजी महिलाओं के बीच संगठन बनाने का। अपने पहले अवैधानिक अधिवेशन में पार्टी ने इस मुद्दे को लिया था। युद्ध के पहले या उस दौरान प्रसिद्ध हुई प्रशिक्षित और अनुभवी महिला आंदोलनकर्मी और नेत्रियां, बिना किसी अपवाद के किसी न किसी तरह की सामाजिक जनवादी थी। उन्होंने सर्वहारा महिलाओं को आंदोलनरत और व्यस्त बनाए रखा था। हालांकि इनमें ऊर्जावान, समर्पित महिलाओं का एक छोटा-सा समूह था। वे पार्टी के प्रत्येक काम और संघर्ष में हिस्सा लेती थीं। इसके अलावा पार्टी ने कामकाजी महिलाओं के बीच व्यवस्थित संगठन की गतिविधियां संचालित की। हालांकि ये तो अभी शुरुआत ही है, एक अच्छी शुरुआत।

लेनिन बोले, “अच्छे, बहुत अच्छे। अवैधानिक या अर्ध वैधानिक दौर में कम्युनिस्ट महिलाओं की ऊर्जा, समर्पण, उत्साह, हिम्मत और बुद्धि हमारे भविष्य के काम की उन्नति का आश्वासन है। यह पार्टी के फैलाव में उपयोगी है। यह लोगों के दिल जीतने और काम करने की पार्टी की ताकत को बढ़ाने वाला है। लेकिन इस मुद्दे के मूल सिद्धांतों की स्पष्ट समझ प्रत्येक सदस्य को कैसे दी जा सकती है? जनता के बीच काम करने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण है। जनता को जो विचार हम देते हैं, और चाहते हैं कि जनता जिन चीजों को समझे या जिनसे प्रेरणा ले, उस बारे में यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। मैं याद नहीं कर पा रहा हूं कि किसने कहा था कि, ‘महान काम करने के लिए प्रेरणा जरूरी होती है।’

“हमें और दुनिया के कामगारों को सचमुच अभी महान काम करने हैं। आपके साथियों की प्रेरणा क्या है? जर्मनी की सर्वहारा महिलाएं? वहां के सर्वहारा की क्या स्थिति है? क्या उनकी रुचियां और कार्रवाईयां इस समय की राजनीतिक मांगों पर केंद्रित हैं? उनके विचारों का केंद्र क्या है?

“मैंने रूस और जर्मनी के साथियों से इस बारे में अनेक अनोखी बातें सुनी हैं। मेरा मतलब क्या है, मैं बताता हूं। मैं जानता हूं कि हेम्बर्ग में कोई कम्युनिस्ट महिला वेश्याओं के लिए अखबार निकालती है। वो उन्हें क्रांतिकारी संघर्ष के लिए संगठित कर रही है। अपने दुखद धंधे के कारण किसी पुलिस धारा का उल्लंघन करने पर जेल भेज दी गई वेश्याओं की रक्षा में रोजा जैसी सच्ची कम्युनिस्ट ने मानवीय सोच से एक लेख लिखने का अच्छा काम किया था। वेश्याएं बुर्जुआ समाज के दोहरे शोषण की शिकार हैं। एक तो इसकी संपत्ति की व्यवस्था की, दूसरी नैतिक दम्भ की। बेशक कोई कठोर स्वभाव और तंग नजरिए वाला ही इसे भूल सकता है। यह सब समझ पाना एक बात है, लेकिन वेश्याओं को एक विशेष क्रांतिकारी संघ के हिस्से की तरह संगठित करना और उनके लिए ट्रेड यूनियन अखबार निकालना! क्या जर्मनी में कामगार महिलाएं बची ही नहीं हैं जिन्हें कि संगठित किए जाने की जरूरत है? जिन्हें एक अखबार की जरूरत है? जिन्हें आपके संघर्ष में शामिल किया जाना है?
यह एक भटकाव है। यह मुझे उस साहित्यिक फैशन की जोरदार याद दिलाता है, जो हर वेश्या को एक हसीन मैडोना बना देता है। इसका उद्गम भी मजबूत हैः सामाजिक सहानुभूति और आदरणीय बुर्जुआओं  के नैतिक ढकोसलों के विरूद्ध क्रोध। लेकिन यह अच्छा विचार तो बुर्जुआ के पतन और विकृति के पीछे दब गया। हमारे देश में भी वेश्यावृत्ति का प्रश्न, अनेक समस्याओं के साथ हमारे सामने होगा। वेश्याओं को उत्पादक कामों की तरफ लाना, सामाजिक अर्थ व्यवस्था में उनके लिए जगह बनाना, ये काम करने होंगे। लेकिन हमारी वर्तमान अर्थव्यस्था और दूसरे हालात इसे मुश्किल और जटिल बना देते हैं। सर्वहारा के सत्ता में आने के बाद से, महिला समस्याओं का यह पहलू हमें हर तरह से चुनौती दे रहा है, और हल ढूंढे जाने की मांग करता है। यहां सोवियत रूस में भी इसके लिए बहुत ज्यादा प्रयासों की जरूरत है।

लेकिन जर्मनी में तुम्हारी विशेष समस्या पर लौटा जाए। अपने किसी सदस्य के ऐसे अव्यवस्थित काम पर किन्हीं भी परिस्थितियों में पार्टी को शांत नहीं रहना चाहिए, ये भ्रम पैदा करता है और हमारी ताकत को बांटता है। अभी इसे रोकने के लिए तुमने क्या किया है?”

ब्लैक कम्युनिस्ट

मैं जवाब दे पाती कि इससे पहले ही लेनिन फिर कहने लगे, ‘क्लारा, तुम्हारे ‘पापों का रिकार्ड’ तो और भी बुरा है! मुझे बताया गया है कि कामगार महिलाओं के लिए शाम को आयोजित किए जाने वाले पाठों और चर्चाओं में सेक्स और विवाह की समस्या सबसे पहले उठाई जाती है। तुम्हारे राजनीतिक पाठों और शैक्षणिक कार्य में ये सबसे ज्यादा रुचि के विषय बताए जाते हैं। जब मैंने यह सुना, मुझे अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ। सर्वहारा के सबसे पहले तंत्र को दुनिया-भर की प्रतिक्रांतियों से जूझना पड़ रहा है। जर्मनी के हालात में भी सर्वहारा की तमाम क्रांतिकारी शक्तियों की एकता की जरूरत है, जिससे कि दबाव बना रही प्रतिक्रांति से मुकाबला किया जा सके। लेकिन सक्रिय कम्युनिस्ट महिलाएं सेक्स की समस्याओं और ‘अतीत, वर्तमान और भविष्य’ की विवाह स्थितियों पर चर्चा करने में व्यस्त हैं। इन प्रश्नों पर कामगार महिलाओं को सचेत करना, वे अपना सबसे महत्वपूर्ण काम मानती हैं। ये दुखद है कि वियेना की एक कम्युनिस्ट लेखिका द्वारा सेक्स के प्रश्नों पर लिखा गया एक पर्चा बहुत लोकप्रियता पा रहा है। पुस्तिका एकदम बकवास है! इस विषय में कामगारों ने सही बातें बेबेल के लेखन में पहले ही पढ़ लिया है। न सिर्फ उस थकाऊ और सूखे पर्चे के रूप में बल्कि बुर्जुआ समाज में उठने वाले आंदोलन के द्वारा भी। पर्चे को वैज्ञानिक मुलम्मा चढ़ाने की गरज से फ्रायड के सिद्धांत को शामिल किया गया है, लेकिन यह एक नवसिखुए  द्वारा की गई गड़बड़ी-भर है। फ्रायड की थ्योरी तो अब एक ‘झक’ बन चुकी है। मैं लेखों, शोधपत्रें, पर्चों आदि में वर्णित सेक्स थ्योरियों पर विश्वास नहीं करता। थोड़े में कहूं तो बुर्जुआ  समाज की गंदगी के ढेर पर तेजी से पनपने वाले उस खास किस्म के साहित्य में दी गई थ्योरियों पर। भारतीय संत जो सदा अपनी कुंडलिनी ही जागृत करने में लगे रहते हैं, उसी तरह हमेशा सेक्स की समस्याओं में उलझे रहने वालों पर भी मैं अविश्वास करता हूं- मेरे ख्याल में सेक्स पर इस तरह की थ्योरियों की भरमार, जो कि अधिकांश के लिए महज एक ख्याल है और अधिकतर तो इकतरफा ही है, किसी व्यक्तिगत जरूरत से पैदा होती है। ये बुर्जुआ नैतिकता के सामने अपने असामान्य और अत्यधिक सेक्स वाले जीवन को सही सिद्ध करने और खुद के प्रति समर्थन पैदा करने की नीयत से फलती-फूलती है। बुर्जुआ नैतिकता के प्रति यह छिपा हुआ सम्मान मेरे लिए उतना की घृणास्पद है जितना कि सेक्स पर आधारित हर बात की जड़ में उतरना। चाहे इन्हें जितना भी विद्रोही और क्रांतिकारी दिखाने की कोशिश की जाए, अंतिम विश्लेषण में ये तमाम अपने चरित्र में बुर्जुआ ही हैं। बुद्धिजीवी और उन जैसे लोग इनके बारे में बहुत रुचि रखते हैं। इनके लिए पार्टी में, वर्ग-सचेत, लड़ाकू सर्वहारा में कोई जगह नहीं है।
क्रमशः 

भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 

तस्वीरें गूगल से साभार
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सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का बजरंगी पैटर्न: नालंदा से लौटकर निवेदिता

निवेदिता
एक शहर को हमसब दरकते और टूटते हुए देख रहे हैं। मुहब्बत और भाईचारा को हिन्दू और मुसलमान में बदलते हुए देख रहे हैं। जहर को नसों में फैलते हुए देख रहे हैं। मैंने उनके तमामदुःख,डर और गुस्से को अपनी डायरी में दर्ज कर लिया है, जिनके बीच से वे गुजरे हैं। जो कुछ घटा उसकी आंशका उन्हें पहले से थी। ये घटनाएं उन गंभीर और दुःखदायी घटनाओं की पूर्व सूचनाएं थी, जिसका विवरण हम यहां पेश कर रहे हैं:

नालंदा में साम्प्रदायिक तनाव को हुए अब लगभग एक माह होने को है। जब हमलोग नालंदा जिला के सिलाव प्रखंड पहुंचे तो दोपहर हो चुकी है। गर्मी काफी है। सूरज तप रहा है। दीवारों पर सलेटी रंग के धूल जमे हुए हैं। सड़क के दोनों किनारे कतार से दुकानें हैं। छोटी-छोटी दुकानें जहां रोजमर्रे का सारा सामान मिलता है।
कड़़ा बाजार में चहल-पहल है। वर्षो से हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ रोजगार करते हैं। ये ऐसा प्रखंड है जहां कभी साम्प्रदायिक तनाव नहीं हुए। धनी आबादी वाला ये शहर अपने आप में अनोखा है। जहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। लगभग दो हजार मुसलमान परिवार के बीच 200 परिवार हिंन्दुओं का है। यहां के लोग खूब मेहनती हैं। उनकी मुख्य दिलचस्पी व्यापार में है। गरीबों की संख्या काफी है। बीड़ी इनके रोजगार का मुख्य साघन है। यहां घर-घर में बीड़ी बनाने का काम होता है। पूरा का पूरा परिवार बीड़ी बनने से होने वाली आमदनी पर जिंदा है। 1 हजार बड़ी बनाने पर सिर्फ 125 रुपए मिलते हैं।

ऊपर से देखने में शांत शहर के भीतर-भीतर बहुत कुछ उबल रहा है।  मुहब्बत से रहने वाले लोगों के बीच नफरत के बीच बोये जा चुके हैं। नफरत की प्रयोगशाला नयी नहीं है पर ईलाका नया है। तुच्छता और नग्नता के सभी प्रयोग बिहार में सफल रहे। साम्प्रदायिकता का किटाणु न मरता है, ना हमेशा  के लिए लुप्त होता है। वह सालों तक लोगों के दिलों में छिपकर सोया रहता है। और उपयुक्त अवसर की ताक में रहता है। यह अवसर बजरंग दल के लिए सही अवसर था। जिसकी तैयारी वे पिछले एक साल से कर रहे थे। वे जानते हैं धर्म एक ऐसा हथियार है जिसके जरिये वे समाज को विभाजित कर सकते हैं।

बजरंग दल से जुड़े कुछ लोगों ने तय किया कि इस बार की रामनवी का जुलूस वे नुरानी मुहल्ला से निकालेंगे। उन्होंने इसके लिए प्रशासन पर दवाब बनाना शुरु किया। कड़ा बाजार से नुरानी मुहल्ला का रास्ता काफी संकरा है। इस मुहल्ले की खास बात रही है कि आजतक यहां कभी कोई साम्प्रदायिक तनाव नही हुए। लेकिन पिछले रमजान के महीने से लगातार तनाव करने की कोशिश  जारी थी। रमजान के महीने में बजरंग दलों के लोगों ने जुलूस निकाले थे और भडकाउ नारे लगाए गये थे। ’मुल्ला जाओ पाकिस्तान’ और ’हिन्दुस्तान में रहना है तो बंदे मातरम कहना होगा’ जैसे नारे लगे।

26 मार्च को नालंदा के डी.एम ने शान्ति समिति की बैठक बुलाई जिसमें दोनों समुदाय के लोग शामिल हुए थे। प्रशासन ने कहा कि किसी कीमत पर वे उन इलाकों से जुलूस निकालने नहीं देंगे। पर बजरंग दल के लोग अड़े रहे। काफी मशक्कत के बाद तय हुआ कि पांच-हिन्दू और पांच मुसलमान मिलकर राम के रथ को गली से बाहर ले जायेंगे-दस लोगों में बीजेपी के वार्ड पार्षद सुधीर सिंह,विजय सिंह, बबलू महतो , लखपति साव, संदीप पासवान और मुसलमानों की तरफ से मोहम्द इस्राफिल, गजनी, निसार अहमद,अरमान, सफदर इमाम शामिल हुए। 28 मार्च को राम के रथ को कड़ा डीह से सिलाव ब्लॉक तक सभी दस लोगों ने शान्तिपूर्ण तरीके से गली के बाहर पहुंचा दिया।

दरअसल बजरंग दल की मंशा राम के रथ को शन्तिपूर्ण निकालना नहीं था । इसलिए बिना प्रशासन की सूचना के अचानक रेलवे होल्ड के पास चार से पांच हजार लोग जमा हो गये जिसमें महिलाओं की काफी संख्या थी। इनलोगों ने प्रशासन पर उसी रास्ते से निकलने का दवाब बनाना शुरु किया। दवाब में आकर प्रशासन ने महिलाओं को उस रास्ते से जाने की अनुमति दी पर जब मर्दो का हुजूम भी उसी रास्ते से जाने का दवाब बनाने लगा तो मुसलमानों ने विरोध किया। प्रशासन का कहना है जो लोग जमा हुए थे वे उस इलाके के नहीं थे उनके पास बड़ी संख्या में तलवार और दूसरे हथियार थे। वे भडकाउ नारे लगाने लगे। फिर पत्थरबाजी शुरू हुई । प्रशा सन को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कठोर कदम उठाने पड़े। जमकर लाठीचार्ज किया। जिसमें बच्चे और महिलाएं भी धायल हुए।

ये हिंसा स्थानीय स्तर पर की गयी । यहां के लोगों ने बताया कि जुलूस में शामिल होने के लिए बाहर से लोगों को बुलाया गया था। इस बात की पुष्टि प्रशासन ने भी की। हिंसा के लिए रामनवमी का दिन चुना गया । कुछ जगह रामनवमी गुजर जाने के बाद जुलूस निकाला गया। ज्यातर नौजवानों को शामिल किया गया। सिलाव के दंगे में दिलीप पासवान और संदीप पासवान का नाम आ रहा है। संदीप बजरंग दल का नेता है और दिलीप पासवान का छोटा भाई है। दिलीप वार्ड 13 के पार्षद रहे हैं। पहले राजद से जुड़े हुए थे। इन दिनों भाजपा के नजदीक हैं। इसबार चुनाव हार गए। मोहम्मद इस्राफिल ने उन्हें हराया है। इस मामले में अबतक 38 लोग गिरफ्तार हैं। 72 लोग नामजद अभियुक्त हैं। नालंदा के डीएम ने स्वीकार किया कि यहां हुए साम्प्रदायिक तनाव के लिए बजरंग दल जिम्मेदार है।  सिलाव में अभी भी दहशत है। साम्प्रदायिक तनाव के दौरान 8 दिन दुकानें बंद रही। जिसका गहरा असर रोजगार पर पड़ा। इस तरह के तनाव से दोनों समुदाय के लोग प्रभावित हुए हैं। पत्थरबाजी में कई लोगों के घर को नुकसान पहुंचा है।

नकाद खानम वार्ड पार्षद हैं। उनके पति दिल्ली में काम करते हैं। उनका घर कड़ा बाजार में है। जब हम उनके घर पहुंचे वे बेहद परेशान थी। उनके चेहरे पर गहरी थकान थी।  उन्हें मालूम है एक लड़ाई जीत ली गयी है, दंगाई पीछे हट गए हैं। लेकिन इसे जीत नहीं कहा जा सकता। दंगाई अपना काम पूरा कर गए। उन्होंने लोगों के दिलों में दरार पैदा कर दिया।  उन्होंने कहा कि पिछले 20 सालों से रह रही हूं । कभी कोई तनाव हिन्दू -मुसलमानों के बीच नहीं हुआ। पहली बार ये दहश त महसूस हुआ। ये मुस्लिम बहुल इलाका है फिर भी हम डरे हुए हैं। बगेर हिंदूओं के हम जी नहीं सकते और हमारे बिना वे रह नहीं सकते। हम एक -दूसरे के जीवन में रचे-बसे हैं। हम शादी,विवाह में शामिल होते हैं। रोजमर्रे की जिन्दगी के सुख-दुख में शामिल होते हैं,पर अब मन में गांठ पड़ गयी है।

दहशत इतनी  है कि नुरानी मुहल्ले में छोटी सी परचून की दुकान चलाने वाली 75 साल की उम्रदराज महिला ने अपना नाम नहीं बताया। उनके पति रामधनी महतो अब बीमार रहते हैं इसलिए पत्नी ही दुकान देखती हैं। पहले कुछ भी बताने को तैयार नहीं थीं। काफी देर बात-चीत के बाद उनकी आँखें भर आयी। उन्होंने कहा की इससे बुरा क्या होगा कि उम्र के इस पड़ाव पर एक-दूसरे के लिए नफरत देख रही हूं। हमारे बीच ऐसा कभी नहीं था। यहां मुसलमानों की तादाद ज्यादा है फिर भी कभी ये बात जेहन में नहीं आयी। हम एक दूसरे की जिन्दगी में शा मिल हैं। उन्होंने कहा कि कुछ पार्टी वाले नेता ये सब करा रहे हैं।

सरीफन खातून और सईदा खतून की उम्र 70 से 75 के आस पास होगी। हम जब नुरानी मुहल्ले में पहुंचे मकानों के दरवाजे बंद थे। घरों में मातम छाया हुआ है। हर आदमी कहने से बच रहा है। उनकी आंखें भावशून्य हो गयी थीं। बूढ़ी आवाज में कपंकंपी है। अपने को जप्त करते हुए कहा ’मैं रुखसत होकर आयी तो ममता चाची ने मुझे सबकुछ सिखाया था। मैं बच्ची थी। घर का काम- काज नहीं जानती थी। मेरे लिए मेरी मां की तरह थी। हमलोग किस तरह एक दूसरे के बिना रह सकते हैं। दूधवाली, सब्जी वाली, धोबिन ये सब हमारे जीवन का हिस्सा हैं ये हिन्दू हैं। इस तनाव के बाद भी हमारे घरों में आना-जाना नहीं बंद किया।

सिलाव में अब जिन्दगी फिर से पटरी पर लौटी है। पर बहुत कुछ है जिसे सबने खो दिया है। जो सबकी सांझी चीजें थीं -प्यार, भरोसा, साझेदारी। उन्हें उम्मीद है कि वे मुहब्ब्त से जीत लेंगे अपने लोगों का दिल। हमलोग अब निकल आएं हैं। क्षितिज दूर तक फैला नजर आ रहा है। धूल से सनी सड़कों पर हम अब दूसरे श हर को देखने जा रहे हैं। गर्मी के सुखद मौसम का सुनहरा जादू नहीं रहा। आम के मंजर की खूश बू भरी हुई है पर दंगों ने सारे रंग और खश बू तबाह कर दिए हैं।  मैली सड़कें और मैली सफेद दीवारें जिस पर कहीं किसी पेड़ की परछाई नहीं है। हम सुन रहे हैं धीमी पदचापों और असंख्य दिल की आवाजें जो कह रही हैं कि हमें चैन से जीने दो।

साहित्यकार और सोशल एक्टिविस्ट निवेदिता स्त्रीकाल के संपादन मंडल से जुड़ी हैं. सम्पर्क: niveditashakeel@gmail.com 

तस्वीरें गूगल से साभार
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पहली ट्रांसजेंडर स्टूडेंट (पंजाब विश्वविद्यालय) के संघर्ष की कहानी

डिसेन्ट कुमार साहू

“किन्नर समाज में अछूत बने हुए है। आमतौर पर उन्हें स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में दाखिला नहीं मिलता। उनके लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।”
सुप्रीम कोर्ट,  22 अक्टूबर 2013

पिछले कुछ समय में विभिन्न क्षेत्रों में ट्रान्सजेंडर ने संघर्ष करते हुए अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है। यह बात चाहे भारत की पहली ट्रान्सजेंडर न्यूज़ एंकर पद्मिनी प्रकाश की हो, राजस्थान की पहली ट्रान्सजेंडर हवलदार बनी गंगा की हो या अन्य क्षेत्रों में उपस्थिती दर्ज कराने वाली ट्रान्सजेंडर की हो, सभी ने यह मुकाम अपने संघर्षों से हासिल की है। ये उपलब्धियां सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इन्होंने कुछ करके दिखाया है और अन्य लोगों के लिए उदाहरण पेश की है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इन्होंने अपने लिए बनाई गई पारंपरिक ढांचे को तोड़ा है जो उन्हें समाज से बहिष्कृत होकर भीख मांगने के लिए मजबूर करती है। निश्चित ही इन एक-एक ईटों के सहारे पहचान और स्वीकार्यता की एक बड़ी भवन तैयार की जा रही है जहां मानवीय गरिमा के साथ जीवन का अधिकार हो। ऐसे ही बेहतर समाज की ओर कदम बढ़ाते हुए पंजाब विश्वविद्यालय ने ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने की घोषणा की है। इससे पहले यह विश्वविद्यालय, ट्रान्सजेंडर टॉयलेट बनवाने वाला पहला विश्वविद्यालय बनने के कारण देशभर में अपनी पहचान बना चुका था, साथ ही विश्वविद्यालय परिसर को भेदभाव मुक्त बनाने के लिए एंटी डिस्क्रिमिनेशन सेल भी बनाया गया है। हाल ही में चंडीगढ़ में ट्रान्सजेंडर कल्याण बोर्ड का भी निर्माण किया गया। इन उपलब्धियों के पीछे धनंजय की संघर्ष और साहस की कहानी है, जिन्होंने एक बेहतर समाज बनाना ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया और इसमें उन्होने काफी हद तक सफलता भी प्राप्त की है। उनकी सफलता को पंजाब विश्वविद्यालय के परिसर में महसूस कर सकते है जहां ट्रान्सजेंडर की उतनी ही स्वीकार्यता है जितनी अन्य लोगों की। उन्हें लोगों की भेदती या असहज करने वाली नजरों का सामना नहीं करना पड़ता, यही कारण है कि धनंजय मानती है कि पंजाब विश्वविद्यालय ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों के लिए बेहतर जगह बन रही है।

ऐसे हजारों ट्रान्सजेंडर बच्चे है जिन्हें अपनी पढ़ाई सहपाठियों तथा शिक्षकों के दुर्व्यवहार के कारण छोड़ देना पड़ा। जिनमें हंसी-मज़ाक से लेकर यौन हिंसा तक की घटनाएँ शामिल होती है। ऐसी परिस्थितियों में जब धनंजय ने पंजाब विश्वविद्यालय में पहली ट्रान्सजेंडर विद्यार्थी के रूप में प्रवेश ली तो यह खबर काफी दिनों तक चंडीगढ़ के अखबारों तथा सोशल मीडिया पर छायी रही। इस समय धनंजय मानवाधिकार विषय लेकर स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। वैसे तो इससे पहले भी उन्होने दो बार स्नातकोत्तर करने हेतु प्रवेश लिया था लेकिन दोनों बार ही अपनी पढ़ाई पूरा नहीं कर पाए, इसके साथ ही तब उनकी पहचान एक पुरुष की ही थी। अपनी पहचान को स्वीकार करना तथा इस पहचान के साथ आगे की पढ़ाई करने का निर्णय धनंजय के लिए आसान नहीं था। वैसे तो समाज द्वारा बनाये गये इस द्विलैंगिक खांचे से उसका संघर्ष 4-5 वर्ष की उम्र में ही शुरू हो गया था जब उसने यह एहसास कर लिया था कि वह पुरुष शरीर में कैद कोई और है जो इस शरीर के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है। उम्र की शुरुआती अवस्था में स्त्रैण हाव-भाव को लेकर किसी भी तरह की समस्या का सामना तो नहीं करना पड़ा जो आमतौर पर दूसरे ट्रान्सजेंडर को करना पड़ता है। धनंजय को घर के कामों में माँ का हाथ बटाना तो पसंद था ही, फ़्राक व माँ की साड़ी पहनना भी पसंद था। परिवार तथा रिश्तेदारी के सारे लोग उसे बहुत प्यार करते थे, हो भी क्यों न आखिर वह प्यारी-प्यारी बातें जो करता था। उस समय धनंजय को सभी लोग कहते ‘कुडियां वर्गा द मुंडा'(लड़कियों की तरह लड़का)।

धनंजय पढ़ाई में होनहार थे, उन्होने चंडीगढ़ के सेक्टर 46 के सरकारी कालेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वे स्नातक स्तर पर कालेज भर में प्रथम आये इसके साथ ही उन्हें तीन साल तक कालेज कलर (college colour) भी चुना गया जो कालेज का मान-सम्मान बढ़ाने वाले विद्यार्थी को दिया जाता है। इसी दौरान 1989 से 1993 तक उन्होंने शास्त्रीय संगीत और नृत्य की भी दीक्षा ली। ज़िंदगी बिलकुल सामान्य सी पटरी पर चल रही थी लेकिन अपने बेटे के हाव-भाव देखकर शायद घर वालों को कोई चिंता सताए जा रही थी तभी तो घर वालों ने लाख मना करने के बाद भी बेटे को 21 वर्ष की आयु में शादी के बंधनों में बांध दिया। तब वे स्नातक की पढ़ाई कर ही रहे थे। आज भी धनंजय शादी की बात याद करती हुई अपराधबोध से भर जाती है और सिर्फ इतना कहती है कि ‘काश यह नहीं हुआ होता’ यह अपराधबोध उस स्त्री के प्रति है जिसे वह एक पुरुष के रूप में मुकम्मल प्यार न दे सकें। धनंजय भी उन ट्रान्सजेंडर में से एक हैं जिन्हें जबर्दस्ती शादी के बंधनों में बांध दिया जाता है। वे उस सोच के शिकार हुए जो शादी के बाद सब कुछ ‘ठीक’ हो जाएगा समझते हैं। 21 वर्ष की उम्र में भी धनंजय असमंजस की स्थिति से निकल नहीं पाये थे, शादी के लिए मना सिर्फ इसलिए कर रहे थे क्योंकि लड़कियों के प्रति कोई आकर्षण नहीं था।

धनंजय के लिए आगे की ज़िंदगी और भी कठिन होने वाली थी, उसे दुखों का दरिया पार करना था। स्नातकोत्तर करने के लिए सन 1993 में इतिहास विभाग में प्रवेश लिया लेकिन स्त्रैण हाव-भाव के कारण छेड़-छाड़ तथा सीनियरों के द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार हुए। आखिरकार तंग आकार विभाग छोड़ देना पड़ा लेकिन पढ़ाई से लगाव होने के कारण अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए फ्रेंच तथा रशियन भाषा में डिप्लोमा किया। वर्ष 1993 में ही वे लिपिक पद हेतु विश्वविद्यालय में चुने गए, इसके साथ ही आगे की पढ़ाई भी करना चाहते थे अत: 1994 में एलएलबी करने के लिए पुनः विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया लेकिन इस बार फिर से वह हैवानों से बच नहीं पाये और हास्टल में सीनियरों द्वारा उनके साथ बलात्कार किया गया (उसके साथ जबर्दस्ती गुदा मैथुन किया गया)। इस घटना ने शायद उसे अंदर तक तोड़ कर रख दिया था, वह नहीं चाहती थी कि यह सब उसे और सहना पड़े अतः उसने पढ़ाई छोडने का निर्णय लिया। इसके बाद भी वह कलर्क के रूप में विश्वविद्यालय में काम कर ही रहे थे, लेकिन एक षड्यंत्र यहाँ भी इंतजार कर रहा था। आगे धनंजय बताती है “1998 में पेपर लीक हुआ, इस मामले में मुझे झूठे तरीके से फंसा दिया गया। पुलिस कस्टडी में मुझे कई तरह की प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ा, पुलिस वालों के द्वारा भी मेरा यौन उत्पीड़न हुआ।” एक तरफ अदालती मामला तो दूसरी तरफ “मैं कौन हूँ” इस सवाल का अब तक जवाब ना मिलना, ने धनंजय को गहरी निराशा और तनाव में डाल दिया था। यह सन 1998 का साल था, कहीं से भी इस निराशा और तनाव की स्थिति से निकलने की उम्मीद न दिखाई देने पर मन में आत्महत्या कर लेने का ख्याल आने लगा। इस निराशा के कारण ज़्यादातर समय घर से बाहर भटकते हुए बीतने लगा। ऐसे ही एक दिन जब वह पार्क में सोये थे तो एक व्यक्ति पास आकार उससे समय पूछने लगा, समय बताने पर आग्रह करता है कि वह उससे बात करना चाहता है। शायद उसे कुछ अनुभव हो गया था। एक-दूसरे के साथ अनुभव साझा करते हुए वह व्यक्ति धनंजय से कहता है कि “तुम गे (समलैंगिक पुरुष) हो।” अपने समान अनुभवों के कारण धनंजय को भी लगा कि शायद वह सही कह रहा हो। उस दिन से पहले तक उसने ‘गे’ शब्द कभी नहीं सुना था, अर्थ से तो अब भी अनजान ही था। मतलब पूछे जाने पर उस व्यक्ति ने बस इतना कहा था कि “जो आदमी, आदमी की ओर आकर्षित होता है।” यह धनंजय के लिए जादुई शब्द था, जिसने उसके भावनाओं को एक पहचान दे दी थी। उसने यह भी बताया कि ऐसा महसूस करने वाला वह दुनिया में अकेला व्यक्ति नहीं है, उसने चंडीगढ़ में ही समूह के अन्य सदस्यों से धनंजय को मिलवाया भी। उस दिन को याद करते हुई धनंजय कहती है “उस दिन मैं बहुत खुश थी, पहली बार लगा कि मैं अकेली नहीं हूँ, मेरे जैसे और भी लोग है।” अब ज़्यादातर समय नए दोस्तों के साथ ही गुजरने लगा था, उनसे मिलना, बात करना, एक-दूसरे से मज़ाक करना अच्छा लगने लगा था। आखिर खुद को ‘मैं कौन हूँ’ इसका जवाब जो मिल गया था। ज़्यादातर मामलों में एलजीबीटीक्यू पहचान वाले लोगों के  लिंग अभिव्यक्ति (जेंडर एक्स्प्रेशन), यौन रुझान (सेक्सुयल ओरिएंटेशन) को बहुसंख्यक समाज द्वारा कलंकित तथा हेय दृष्टि से देखें जाने के कारण एलजीबीटीक्यू पहचान वाले लोग अपनी अभिव्यक्ति या रुझान को पाप या गलत मानने लगते है। जब उन्हें यह एहसास होता है कि यह गलत या असामान्य नहीं है तथा उनके जैसे और भी लोग है तो यह उनके लिए दुनिया की सबसे खुशी देने वाली चीज होती है।

अब भी पेपर लीक वाला मामला चल रहा था। धनंजय बताती है “मैं पुलिस कस्टडी में थी, पुलिस ने जमानत के कागजात बताकर अन्य कागजातों पर मेरा हस्ताक्षर ले लिया और अदालत द्वारा जून 2000 में मुख्य अपराधकर्ता ठहराएँ जाने के कारण मुझे जेल भेज दिया गया। फरवरी 2001 में जमानत पर रिहा हुई। यह पूरा मामला 2014 में जाकर समाप्त हुआ। यह मेरे जीवन का सबसे बदतर समय था, शायद इन्हीं मुश्किलों ने मुझे लड़ना सीखा दिया।” 2001 से ही उसने एक गैर सरकारी संस्था के साथ मिलकर एलजीबीटीक्यू मुद्दों पर काम करना शुरू कर दिया। उस समय उनका ज्यादा ज़ोर एमएसएम (समलैंगिक पुरुष) पर ही था इसलिए अब भी वह ट्रान्सजेंडर समूह से ज्यादा मिल नहीं पायी थी। 2009 में दोस्तों के साथ मिलकर एनजीओ(गैर-सरकारी संगठन) रजिस्टर्ड कराने के बाद किन्नर समुदाय के साथ मिली और उनके साथ काम करने लगी। “2013-14 तक मैं खुद को गे ही मानती थी लेकिन डेरे (किन्नर समुदाय) के लोगों से मिलते रहने और अपने अनुभवों से लगा कि मैं गे नहीं ट्रान्सजेंडर हूँ।” इस तरह 43-44 साल गुजर गए खुद की पहचान करते हुए, आधे से ज्यादा जीवन दो जेंडरों के बीच झूलते हुए निकल गया था।

अपनी पहचान के बारे में निश्चित होने के बाद एलजीबीटीक्यू समूह के लोगों के लिए उस पहचान के साथ लोगों के सामने आना महत्वपूर्ण कदम होता है। ज़्यादातर ट्रान्सजेंडर के साथ यह आसान नहीं होता, क्योंकि परिवार व समाज का दबाव ऐसा न करने का होता है, या फिर समाज में ऐसे व्यक्तियों के पहचान को कलंकित किए जाने के कारण खुद ऐसे पहचान वाले लोग खुद की पहचान को गलत समझने लगते है। लेकिन धनंजय ने कभी भी अपनी पहचान को गलत नहीं माना। वह कहती है कि ‘अगर हमें खुद अपनी पहचान को लेकर शर्म या झिझक हो तो लोग भी उसी नजरिए से देखेंगे। आज लोग मुझसे बात करते है, मुझे उनका साथ और सहयोग मिलता है क्योंकि मैंने अपनी पहचान को कभी गलत नहीं माना।’ पंजाब विश्वविद्यालय से धनंजय का बचपन से नाता रहा कारण मामा और पापा यहाँ काम करते थे। यहाँ के लगभग लोग उसे बचपन से ही जानते थे। वह कई इमारतों की तरफ इशारा करके बताने लगती है कि कहाँ पर क्या था और कहाँ पर वह अपने दोस्तों के साथ खेला करती थी। इस तरह उसकी लड़कपन की खुशनुमा यादें इस विश्वविद्यालय से जुड़ी थी तो दूसरी तरफ अपना आत्म-सम्मान भी उसने यही खोया था, इसलिए उसने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि वह अपना खोया हुआ आत्म-सम्मान और अधिकार यही से लेगी। यही कारण है कि उसने विश्वविद्यालय में फिर से आना चुना।

पढ़ाई करने का निर्णय तो ले ही लिया था अब बारी थी अगले कदम की यानि लोगों के बीच जाकर जेंडर तथा यौनिकता के मुद्दे पर बात करने की। विश्वविद्यालय में ट्रान्सजेंडर के रूप में प्रवेश लेना और लोगों के द्वारा स्वीकार्यता प्राप्त कर लेना, यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ था यह उसके मेहनत का ही फल था। वह कहती है ‘इसके लिए मैंने 4-5 साल तक तैयारी की, इस विश्वविद्यालय में मैंने इन मुद्दों को लेकर 2012 से ही काम शुरू कर दिया था। मैंने अलग-अलग विभागों के छात्रों तथा शिक्षकों से बात-चीत शुरू की। मैंने बात करते हुए एक चेन बनाया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकूँ। इसी बीच हमने 2013 में पहली बार यहां (चंडीगढ़) प्राइड मार्च का आयोजन किया। उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी कह दिया था कि यहाँ से चले जाओ, यहाँ कार्यक्रम मत करो। हमें हटाने के लिए सुरक्षा गार्ड भी आ गये, लेकिन हमारे समर्थन में छात्र-छात्राएँ तथा शिक्षक सामने आये। उन्होने प्रशासन से बात की और हमें कार्यक्रम की शुरुवात विश्वविद्यालय से ही करने के लिए कहा।’ आज भी समाज की मुख्यधारा ट्रान्सजेंडर के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता, धनंजय ने इसी खाली जगह (gap/space) को भरने का प्रयास किया।

अप्रैल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के थर्ड जेंडर पहचान संबंधी निर्णय आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन से प्रवेश फॉर्म में थर्ड जेंडर का कॉलम देने लिए लिए कहा गया। 2016 में पंजाब विश्वविद्यालय की पहली ट्रान्सजेंडर विद्यार्थी के रूप में धनंजय ने प्रवेश लिया। अब भी कुछ लोगों के लिए धनंजय का ट्रान्सजेंडर पहचान स्वीकार करना मुश्किल था। उन्हें लगता था कि अब तक तो लड़का था फिर कैसे ट्रान्सजेंडर हो सकता है, तो वहीं कुछ लोगों के लिए अब भी हंसी-मज़ाक की पात्र मात्र थी। धनंजय अपने सहपाठियों के साथ हुए पहले परिचय के बारे में बताती है “जब मैंने बताया कि मैं शादी-शुदा हूँ तो लोगों को लगा कि मैं नकली हूँ और सिर्फ कुछ लाभ प्राप्त करने के लिए नाटक कर रही हूँ। इसका कारण उनके दिमाग में ट्रान्सजेंडर के प्रति बैठी कई भ्रांतियाँ थी, लेकिन जब धीरे-धीरे उन्हें मेरे बारे में पता चलता गया तो वे मेरे साथ खड़े होते गए।” पूर्व के अनुभवों (यौन उत्पीड़न, छेड़-छाड़) के कारण अब भी वह कहीं अकेले जाने से डरती थी, ऐसे में उन्होंने लड़कियों को एक बेहतर साथी पाया जो उनकी समस्याओं को समझ रही थी और सहायता के लिए भी तत्पर थी। विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के बाद एक बड़ी समस्या टॉयलेट की थी कि कौन सा टॉयलेट उपयोग में लिया जाए। कुलपति को जब इस समस्या से अवगत कराया गया तो उन्होने जल्द ही अलग टॉयलेट बनाने का आश्वासन के साथ अस्थायी तौर पर लड़कियों की टॉयलेट के उपयोग करने सहमति प्रदान की।

धनंजय जितना महत्वपूर्ण कक्षा में समय बिताने को मानती है उतना ही महत्वपूर्ण वह अन्य लोगों के साथ मिलना और बात करने को भी मानती है यह इस दृष्टि से कि ताकि सोशल स्पेस में ट्रान्सजेंडर की मौजूदगी सामान्य हो जाए। वह इस संदर्भ में कहती है ‘अगर मुझे सिर्फ पढ़ाई करनी होती तो चुपचाप अपनी कक्षाओं में शामिल होती और चली जाती लेकिन इससे क्या होता? लोगों का ट्रान्सजेंडर समुदाय के प्रति जो नजरियाँ है वह जस का तस बना रहता।’  ज़्यादातर ट्रान्सजेंडर किशोरावस्था में आते तक अपनी पहचान के बारे में निश्चित हो जाते है। यह स्कूली शिक्षा का अंतिम पड़ाव (10वीं या 10+2वीं) या स्नातक की पढ़ाई का शुरुआती समय होता है। ऐसे में जब उन्हें उसकी पहचान के कारण परिवार व समाज से बहिष्कृत किया जाता है तब उसके पास किसी प्रकार की सहायता के लिए व्यवस्था नहीं होती। रोटी और सुरक्षा के तलाश में या तो वे डेरा में शामिल हो जाते (यहाँ भी अपनी आजीविका के लिए बधाई, मंगनी ही करना होता है) है या सेक्स वर्कर के रूप में काम करने लगते है। इसका कारण यह भी है कि कोई छोटा सा काम भी उन्हें मयस्सर नहीं हो पाता है, इन दोनों ही अवस्था में उसका आगे का भविष्य खत्म सा हो जाता है। आखिरकार इन दोनों ही स्थितियों में उन्हें बहिष्कृत जीवन ही गुजारना पड़ता है। बहुत सारे ट्रान्सजेंडर पढ़ाई तो करना चाहती है लेकिन उन्हें सहपाठियों तथा शिक्षकों की उपेक्षा, मज़ाक का पात्र बन जाने के कारण पढ़ाई छोड़ देनी पड़ती है। धनंजय को भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, अतः उन्होने प्रशासन के सामने शिक्षा, आवास तथा भोजन जैसे बुनियादी चीजों को निशुल्क उपलब्ध कराने की मांग रखी इसके साथ ही भेद-भाव मुक्त माहौल को सुनिश्चित करने के लिए कहा ताकि समाज में स्वीकार्यता के साथ एक बेहतर जीवन के लिए तैयार हो सकें। इन मांगों के प्रति प्रशासन का रवैय्या सकारात्मक रहा है।

धनंजय के प्रयासों से आज पंजाब विश्वविद्यालय ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों के लिए बेहतर जगह बनती जा रही है। इस सत्र में 5 ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों ने अलग-अलग विषयों में प्रवेश लिए है। भविष्य में इस संख्या के बढ़ने को लेकर धनंजय सकारात्मक है, वे बताती है कि अलग-अलग जगहों से लोग विश्वविद्यालय में प्रवेश संबंधी पूछताछ के लिए फोन करते रहते है। इस तरह के प्रयासों का लाभ असमंजस की स्थिति से निकलने, अपनी पहचान निर्धारित करने तथा एक बेहतर रोल मॉडल के लिए होगा। फैशन डिजायनिंग में स्नातक कर रही प्रीत कहती है ‘मैं बहुत दिनों से महसूस करती थी कि मैं लड़की हूँ लेकिन बदनामी, पारिवारिक-सामाजिक दबाव के कारण खुद को कभी व्यक्त नहीं कर पायी थी। लेकिन जब मैं दीदी(धनंजय) से मिली तो मुझे हिम्मत मिला कि मैं जैसा महसूस करती हूँ वैसा ही रहूँ।’ प्रीत के इस कदम के बाद परिवार वालों ने प्रीत को घर से निकाल दिया, इस समय प्रीत अपने बुआ के साथ रहती है। आज तक लोगों ने ट्रान्सजेंडर को पारंपरिक कामों से अपनी आजीविका चलाते हुए देखा है, खुद ट्रान्सजेंडर भी यहीं मानकर चलते थे कि यही हमारा काम है ऐसे में इस तरह के बदलाव लोगों का ट्रान्सजेंडर को देखने की दृष्टिकोण में बदलाव लाएगी। पिछले 13 साल से विश्वविद्यालय के कैंटीन में काम करने वाले रंजीत कहते है ‘आज तक मैंने उनके (धनंजय) बारे में किसी को बुरा कहते हुए नहीं सुना है, जब उनका व्यवहार सबके साथ अच्छा है तो कोई बुरा क्यों बोलेगा? उनको यहाँ पढ़ते देखने से पहले मैं यही सोचता था कि हिजड़ा सिर्फ ट्रेनों में पैसा मांगते है और नाच-गाने का काम करते है, अब मैं ऐसा नहीं सोचता हूँ।’

धनंजय विश्वविद्यालय परिसर में हुए परिवर्तनों के बारे में बताते हुए कहती है “पहले लोग बात करने, मिलने में शर्म महसूस करते थे। कहीं से गुजरता तो लोग मेरे हाव-भाव देखकर हँसते, मज़ाक बनाते। लेकिन आज लोगों ने हमें हमारी पहचान के साथ स्वीकार कर रहे है। शुरुआत में लोग एलजीबीटीक्यू पहचानों के बारे में नहीं जानते थे, विशेष रूप से ट्रान्सजेंडर के बारे में उनके दिमाग में बहुत सारी भ्रांतियाँ थी। वे सभी को ‘गे’ समझते थे। लोगों के बीच रहने से यह हुआ है कि आज इसी विश्वविद्यालय में 10 से भी ज्यादा शोध ट्रान्सजेंडर के ऊपर हो रहे हैं। वे संवेदनशील हुए है, उनकी सोच में बदलाव आया है। उन्हें पहली बार पता चल रहा है कि हमें किन समस्याओं से गुजरना पड़ता है। इन बदलाओं के बाद  भी मुझे इस विश्वविद्यालय से बहुत सारी उम्मीदें है।”

इन तमाम संघर्षों के पीछे एक ही आग्रह है कि हमें भी इंसानों की तरह स्वीकार्यता मिले। ताकि धनंजय जैसे लाखों ट्रान्सजेंडर को अपने परिवार, समाज, संस्कृति से विस्थापित ना होना पड़े। आपको उनकी जेंडर व यौनिक पहचान को स्वीकार करने से पहले उन्हें एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। सफलताओं की कहानी सिर्फ इसलिए है ताकि उन्हें आप कमतर ना समझने लगे, ताकि उन्हें बंद खांचों के बाहर भी समझ सकें। क्या इससे पहले भी कोई ए. रेवती जैसी लेखिका नहीं हो सकती थी? हो सकती थी लेकिन कभी हमने उन्हें सुनने की जहमत नहीं उठाई। क्या इससे पहले किसी धनंजय को इन अमानवीय यातनाओं से नहीं गुजरना पड़ा होगा? आज भी उन्हें अमानवीय अत्याचारों को सहना पड़ रहा है सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने उन्हें वे जैसे है और जैसा रहना चाह रहे है वैसे पसंद नहीं करते। वह तभी स्वीकार किए जाएंगे जब वे हमारी मानकों पे फिट हो।

(यह आलेख धनंजय के साथ की गई बातचीत  पर आधारित है)

लेखक म.गां.अ.हि.वि.वि. वर्धा के  समाजकार्य विभाग में शोधार्थी हैं. संपर्क: dksahu171@gmail.com, मोबाइल: 9604272869




तस्वीरें गूगल से साभार
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लेनिन: कम्युनिस्ट नेतृत्व महिलाओं के आन्दोलन के सवाल पर निराशावादी, रुको और देखो वाला रुख अपना लेता है



मजदूर दिवस पर विशेष 


आज से लगभग 100 साल पहले 1920 में मार्क्सवादी स्त्रीवादी क्लारा जेटकिन ने रूसी क्रांति के विराट नेता लेनिन से यह बातचीत की थी. लेनिन इस बातचीत के हिस्से में महिलाओं के सवाल पर नेतृत्व की बेरुखी और महिला श्रम के प्रति लोगों में अनादर और उपेक्षा की बात कर रहे हैं. हम पूरी बातचीत किस्तों में प्रकाशित करेंगे, यह हिस्सा बातचीत के मध्य से लिया गया है मजदूर दिवस को ख़ास संदर्भ करते हुए. 

लेनिन कहते रहे, “महिलाओं के लिए हमारी मांगों पर सोवियत रूस ने नई रोशनी डाली है। सर्वहारा की तानाशाही में वे सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच संघर्ष की एक वस्तु नहीं रह गई है। एक बार उन्हें बाहर ले आया जाए, तो वे साम्यवादी समाज के निर्माण में ईंटों का काम करेंगी। ये महिलाओं को दूसरी तरह दिखाता है।  सर्वहारा की सत्ता हासिल करने में एक निर्णायक महत्व की तरह। यहां और वहां की उनकी स्थितियों को बडे़ पैमाने पर बताया जाना चाहिए, ताकि सर्वहारा के  क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष के लिए बड़ी संख्या में महिलाओं की सहायता हासिल की जा सके। सिद्धांतों की स्पष्ट समझ और मजबूत संगठनात्मक आधार के साथ महिलाओं को लामबंद करना, कम्युनिस्ट पार्टियों और उनकी जीत के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा होना चाहिए। खैर, हमें खुद को निर्णायक नहीं बनाना चाहिए। हमारे राष्ट्रीय धड़े में अभी भी इस मामले पर स्पष्ट समझ नहीं बन पाई है। जब भी कम्युनिस्ट नेतृत्व के तहत कामकाजी महिलाओं के जन आंदोलन की बात उठती है, वे निराशावादी और रुको और देखो वाला रुख अपना लेते हैं। वे यह नहीं मान पाते कि ऐसे जनआंदोलन को विकसित कर उसका नेतृत्व करना पार्टी गतिविधि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि पार्टी का आधा काम ही समझो। कम्युनिस्ट महिलाओं के उद्देश्यपूर्ण, मजबूत और व्यापक आंदोलन की जरूरत और महत्व के बारे में यदा-कदा उनकी सम्मति, पार्टी की निरन्तर चिंता और काम के बजाय एक आदर्शवादी बक-बक ही है।”

“महिलाओं के बीच आंदोलन प्रचार करने और उन्हें जागरूक और क्रांतिकारी बनाने के काम को ये लोग दोयम दर्जे का मानते हैं। उसे सिर्पफ कम्युनिस्ट महिलाओं का काम मानते हैं। चूंकि यह काम तेजी से और मजबूती से आगे नहीं बढ़ा, इसलिए कम्युनिस्ट महिलाओं की निंदा की जाती है। यह गलत है, बुनियादी तौर पर गलत है। सरासर भेदभावपूर्ण है। जैसी कि एक प्रेंफच कहावत हैμ ‘यह समानताकी पलटी है।’ हमारे राष्ट्रीय धड़े के  गलत रवैये के तल में क्या है? मैं सोवियत रूस की बात नहीं कर रहा हूं। अंतिम विश्लेषण से यह निकलता है कि यह महिलाओं को और उनकी उपलब्धियों को कम कर आंकने के  कारण है। बस यही बात है! यह विडम्बनापूर्ण है कि अभी भी हमारे कई साथियों के बारे में कहा जा सकता है कि उनके  कम्युनिस्ट आवरण को खुरचों तो एक दोमुंहा स्वरूप मिलेगा। इसके  लिए आप उनके  संवेदनशील बिंदु, मसलन महिलाओं के बारे में उनकी मानसिकता को खुरचिए। इसका सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण इस सामान्य दृश्य, जिसमें एक महिला किसी काम, मसलन घरेलू काम में जो साधरण, नीरस, मेहनतवाला और समय खर्चने वाला हो, पिस रही हो, उसे एक पुरुष शांत-भाव से देख रहा हो. उसकी घटती हिम्मत, दिमाग के  पस्त होते जाने, हृदय गति के  धीमे होते जाने, इच्छा के  कमजोर होते जाने को ताक रहा है। मैं बुर्जुआ महिलाओं की बात नहीं कर रहा, जो घरेलू काम को और बच्चों की देखभाल नौकरानियों के  भरोसे छोड़ देती हैं। जो मैं कह रहा हूं, वो महिलाओं के  व्यापक वर्ग पर लागू होता है, मजदूरों की पत्नियों पर भी, चाहे वे दिन-भर कारखानों में काम कर पैसा कमाती हों।”

“बहुत ही कम पति, यहां तक कि सर्वहारा वर्ग के पति भी नहीं सोचते कि वे अपनी पत्नियों का कितना बोझ और चिंताएं हल्की कर सकते हैं या कि इन ‘महिलाओं वाले काम’ में हाथ डालकर उन्हें पूर्णतः मुक्त कर सकते हैं। लेकिन नहीं, ये तो पुरुषों के  ‘अधिकारों और सम्मान’ के विरुद्ध होगा। वे तो आराम और सुविध की मांग करते हैं। एक महिला का घरेलू जीवन, प्रतिदिन हजारों तुच्छ बातों के सामने स्वयं का त्याग करने का होता है। उसके पति के , ‘भगवान और स्वामी’ के  पुरातन अधिकार बिना परिर्वतन के  बने रहते हैं। वस्तुतः उनके  दासत्व का ही वे बदला लेती हैं, छिपे रूप में। महिलाओं का पिछड़ा रह जाना और अपने पति के  क्रांतिकारी आदर्शवादी कामों के  प्रति अज्ञानता से पतियों की संघर्ष क्षमता, लड़ने की इच्छा पिछड़ जाती है। वे उन सूक्ष्म किटाणुओं की तरह हैं, जो अन्दर पनपते हैं और कुतरते हैं. धीरे-धीरे लेकिन निश्चित तौर पर। मैं मजदूरों के जीवको जानता हूं, के वल किताबी तौर पर नहीं। महिलाओं के  बीच हमारे कम्युनिस्ट काम और साधरण तौर पर हमारे राजनीतिक कामों में पुरुषों के बीच समुचित शैक्षिक कामों का शुमार है। हमें पुराने स्वामी-दासी दृष्टिकोण को पार्टी और समाज, दोनों में से बाहर निकलना चाहिए। यह हमारा एक राजनीतिक काम है और जल्द से जल्द जरूरी है। उतना ही जरूरी जितना कि कामकाजी महिलाओं के बीच पार्टी का काम करने के लिए गहन सैद्धांतिक और व्यवहारिक प्रशिक्षण पाये पुरुष और महिला साथियों का एक समूह बनाने का।”

सोवियत रूस में आज के हालात के बारे में मेरे प्रश्न पर लेनिन ने जवाब दिया,  “सर्वहारा की तानाशाही वाली सरकार, कम्युनिस्ट पार्टी और मजदूर संघों के साथ मिलकर पुरुषों और महिलाओं के पिछड़े विचारों को बदलने की हर संभव कोशिश कर रही है, ताकि पुरानी और गैर साम्यवादी मानसिकता को जड़ से नष्ट किया जा सके। कहने की जरूरत नहीं कि कानून के समक्ष पुरुषों और महिलाओं की स्थिति बिल्कुल बराबरी की है। इस बराबरी को प्रभाव में लाने की गंभीर कोशिश हर क्षेत्र में देखी जा सकती है। हम आर्थिक क्षेत्र, प्रशासन, विधयिका और सरकार में काम करने के लिए महिलाओं की सूची बना रहे हैं। उनके लिए तमाम पाठ्यक्रम और शिक्षण संस्थाएं खुली है, ताकि वे अपना व्यावसायिक और सामाजिक प्रशिक्षण सुधार सकें। हम सामुदायिक रसोईघर, सार्वजनिक भोजनालय, लॉन्ड्रियां और मरम्मत की दुकानें, झूलाघर, बाल विद्यालय, शिशु आवास और तमाम तरह की शिक्षण संस्थाएं खोल रहे हैं। संक्षेप में यह कि हम व्यक्तिगत परिवारों के घरेलू कामों और शिक्षा को समाज में ले जाने के काम को पूरा करने के  लिए गंभीर और तत्पर हैं। इसीलिए महिलाओं को अपनी पुरानी घरेलू गुलामी और पति पर उसके पूर्ण आश्रय से मुक्त किया जा रहा है। उसे समाज में अपनी क्षमताओं और आकांक्षाओं के लिए जगह बनाने के लिए योग्य बनाया गया है। बच्चों को उनके विकास के लिए घर के बजाय बेहतर अवसर दिए जा रहे हैं। हमारे पास विश्व का सबसे प्रगतिशील महिला श्रम कानून है, जो संगठित श्रम के  मान्यता प्राप्त प्रतिनिधियों द्वारा लागू किया जाता है। हम प्रसव घर, मां एवं शिशु घर, मातृत्व केंद्र, नवजात एवं शिशु देखभाल हेतु पाठ्यक्रम, मां एवं बच्चे की देखभाल पर प्रदर्शनियां आदि स्थापित कर रहे हैं। जरूरतमंद और बेरोजगार महिलाओं की हर संभव मदद की कोशिश भी हम कर रहे हैं। हमें पता है कि कामकाजी महिलाओं की जरूरतों को देखते हुए, यह बहुत कम है। अभी भी यह उनकी वास्तविक मुक्ति के  लिए पर्याप्त नहीं है। लेकिन जारशाही और पूंजीवादी रूस में जो कुछ था, उससे आगे की ओर यह एक बड़ा कदम है। लेकिन यह उन स्थानों पर  अभी भी पूंजीवादी शासन है उसकी तुलना में कहीं अधिकहै। सही दिशा में यह एक अच्छी शुरुआत है। हम इसे लगातार, सारी उपलब्ध ऊर्जा के साथ आगे भी बढ़ाएंगे। विदेशों में आप निश्चिन्त रहें। क्योंकि बीतते जाते हर दिन के साथ यह स्पष्ट होता जा रहा है कि लाखों महिलाओं को साथ लिए बगैर हम उन्नति नहीं कर सकते। एक ऐसे देश में जहां की कुल आबादी में 80 प्रतिशत किसान हैं, सोचो, इस बात के क्या मायने है। छोटी किसानी का मतलब व्यक्तिगत घरबार और महिलाओं का बंधन। इस मामले में तुम हमसे कहीं बेहतर होगे, अगर यदि तुम्हारे देश ‘जर्मनी’ का सर्वहारा यह समझ ले कि सत्ता हासिल करने, क्रांति करने के लिए समय, ऐतिहासिक तौर पर तैयार है।इसी बीच, विकट समस्याओं के  बावजूद, हम निराश नहीं हैं। जैसे समस्याएं बढ़ती हैं हमारी शक्ति भी बढ़ती है। व्यावहारिक जरूरत भी हमें महिलाओं की मुक्ति के नए रास्ते तलाशने के लिए उकसाती है। सोवियत राज्य के साथ कॉमरेडों की एकजुटता अजूबा करदिखाएगी। मैं स्पष्ट कर दूं कि कॉमरेड की एकता का मेरा आशय कम्युनिस्ट एकता से है, न कि बुर्जुआ अर्थ में, जैसा कि सुधरवादियों द्वारा उपदेश दिया गया था। जिनका क्रांति का जज्बा किसी सस्ते सिरके  की गंध की तरह उड़ गया। व्यक्तिगत पहल जो सामूहिक गतिविधि में तब्दील हो, इस एकजुटता के लिए चाहिए। सर्वहारा की तानाशाही के  तहत साम्यवाद के सच होने से देहातों में भी महिलाओं की मुक्ति होगी। इस मसले पर हमारे उद्योगों और खेती के विद्युतीकरण से मुझे बहुत अपेक्षाएं हैं। वो एक महान योजना है! इसके रास्ते में ढे़र-सीभयंकर बड़ी बाधएं हैं। समुदाय में छिपी पड़ी शक्ति को जगाना पड़ेगा। जो इनसे पार पा सकें। लाखों महिलाओं को इसमें जरूर हिस्सेदारी करनी होगी।”

पिछले दस मिनटों में कोई दो बार दरवाजों पर दस्तक दे चुका था, लेकिन लेनिन बोलते रहे। अब उन्होंने दरवाजा खोला और चिल्लाए, “मैं आ रहा हूं।“ मेरी तरफ मुड़कर,  मुस्कुराते हुए वे बोले, “तुम जानती हो क्लारा, मैं इस बात का लाभ उठाने जा रहा हूं कि मैं एक महिला से बतिया रहा था। देर हो जाने के  लिए महिलाओं की बकवास की बदनाम आदत का बहाना बनाउंगा। यद्यपि इस बार महिला की बजाय पुरुष ने ही अधिक बातें की। तुम एक अच्छी श्रोता हो! शायद यही वजह थी, जिसने मुझे इतना बोलने के  लिए उकसाया।”  इस मजाकिया बात के साथ लेनिन ने कोट पहनने में मेरी मदद की।

“तुम्हें और गर्म कपड़े पहनना चाहिए।“ उन्होंने विनम्र सुझाव दिया। मास्को स्टुटगार्ट नहीं है। तुम्हारी देखभाल के लिए कोई होना चाहिए। ठंड से बचना। अलविदा!” उन्होंने मजबूती के  साथ मुझसे हाथ मिलाया।

भारत विज्ञान समिति द्वारा ‘महिलाओं के मुद्दे’ शीर्षक से प्रकाशित किताब से साभार. हिंदी में अनुवाद मनोज कुलकर्णी ने किया है 

तस्वीरें गूगल से साभार
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हूक….!!

प्रो.परिमळा अंबेकर

विभागाध्यक्ष , हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और. परिमला आंबेकर मूलतः आलोचक हैं.  हिन्दी में कहानियाँ  अभी हाल से ही लिखना शुरू किया है. संपर्क:09480226677

बस स्टैंड के कंपाउंड के भीतरी घेरे की गोलाई में कोई आ या जा नहीं रहा था। सुनसान पसरा पडा वह अहाता, शमशानी मौन से धीरे धीरे भरता जा रहा था  बस स्टैंड की पिछली ऊंची दीवार से लगी खडी बसें जैसे इस नीरवता को साक्षी दे रहे हों। जलती लाईटों से छनती रोशनी का मटमैलापन वातावरण के पसारे को उदासी से लीप पोत कर थक हार कर बैठ चुका था। रह रहकर कोई कुत्ता अपनी जगे से उठता और दुम हिलाते एकाध अधखुले दुकान का चक्कर काटता फिर लौटकर अपनी जगे पर हल्के से रिरियाते हुए दुम और मुंडी को दुबकाकर, आँखें मिटकाते सो जाता। शायद रात के डेढ दो बज रहे होंगे। यादगिरी के इस छोटे से बस स्टैंड में इस वक्त किसी गाडी के आने या जाने का कोई अंदाजा नहीं लग रहा था ।

लेकिन यादगिरी के इस बस स्टैंड के भीतरी अहाते में पसरी इस बियाबानी की स्थिरता को कोई आवाज तोड़े जा रही थी । जैसे दिल के गर्त से उठती चीख को दबाने से फट पडनेवाली रूदनभरी सिसकी की आवाज हो- हाँ यह किसी औरत की ही आर्त ध्वनि थी, जो रह रहकर सन्नाटे को चीरती हुयी कहीं दूर अंधकार के गर्त में समा जा रही थी। खाली बोतल से निकली हवा का गले में फंसने से उठनेवाली सिटकरी सी ध्वनि से पास में सोया कुत्ता अपनी मूंदी आँखें क्षणभर खोलता फिर ऐसे बंद कर लेता, जैसे उस इन्सान के रूदन से अपनी अनुकंपा को बोध रहा हो या मातम के प्रति अपनी हिस्सेदारी जता रहा हो। कुछ क्षण के लिए रूदन की आवाज बंद सी हो गयी । शायद उस औरत ने फेंफडे के भीतर की हवा को बाहर आने से रोक ली हो, मुंह में आंचल को ठूंसकर या फेफडो का बर्तन ही खाली हो गया हो…!! यह आंचल का कपडा भी अजीब है, मुंह में ठूंसते ही रोते हुए को चुप करा देता है, चुप बैठे हुए को रूला भी देता है …!!

 उस खाली स्थिर अहाते में उसी समय कुछ हलचल सा हुआ । मायूसी के अंधकार से उठकर आता सा कोई आदमी बस स्टैंड के अहाते के एक कोने से दूसरे कोने की ओर चल पडा जहां से औरत के रोने की आवाज आ रही थी। वह आदमी लगभग अधेड उम्र का गंवई लग रहा था । धोती, बुशर्ट और कंधेपर अंगोछा डाले वह शख्स गठरी बनी बैठी उस औरत के बगल में जा निढाल सा पसर गया । जैसे जिंदगीभर चलते ही आ रहे उस आदमी को अब एक कदम भी उठाना असाध्य हो गया हो, उसे लग रहा था जैसे पैर में सीसा भरते जा रहा हैं। आदमी के आते ही औरत के रोने की ध्वनि और तेज हो गयी। कुछ क्षण बाद  सन्नाटा फिर मायूसी का चादर ओढकर कुत्ते की तरह आंख मूंद कर सो गया। लेकिन दूसरे ही पल एक विस्फोट सा हुआ। उस आदमी का लोहे के बेंचपर उस औरत के पास आकर बैठने के दूसरे ही पल उन दोनो के एक सुर में रोने की आवाज ने उस मायूसी लिपी अंधकार के परत को तार तार कर दिया । उस भयंकर दिल को टूक कर देने की रूलायी से पास का वह कुत्ता भी अपनी जगे से उठकर उनके पास जाकर चुपचाप खडा हो गया, जैसे उसकी समझ में रहा हो, कि आदमियो की मायूसी मे शरीक होना अपने जानवरपन का आदिम कर्तव्य है।

बात साफ थी। निश्चय ही बेटी की मौत की खबर थी और वह भी स्टोव के फटने से जलकर मरने की खबर,  जैसे ब्याहता बेटी के मरने या मारने का दमदार सामाजिक नुस्खा। सर्वस्वीकृत न्यायिक और संवैधानिक नुस्खा !! और बात उससे भी साफ और सरल थी, ससुराल वालों से खबर मिली इस दुर्घटना का रात के लगभग एक बजे, क्यूंकि हमारे निम्न और मध्यम समुदाय की बस्तियों के स्टोव तो रात में, अधिकतर रात के बारह के बाद ही तो फटते हैं …!! शिवम्मा और बसप्पा को उनकी बेटी भीमव्वा का स्टोव के फटने से जल जाने से कलबुर्गी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने तक की खबर, और…और उसके देह का नब्बे प्रतिशत से ज्यादा जलजाने से मरजाने की खबर देर रात को ही मिली थी। इस खबर को पाकर आधे घंटे से यादगिरी के बस स्टैंड में कलबुर्गी जाने वाली बस के इंतजार में बिलखते बैठे थे पति पत्नी शिवम्मा और बसप्पा। बसप्पा उठकर पूछताछ के बंद काउंटर में बार बार झांक आता या फिर निरीह सा लौटकर शिवम्मा के पास आकर बैठ जाता। शिवम्मा के रह-रह कर रोने की उस दिलटूक करने वाली आवाज को सुनने के लिए निर्जीव से खडे बसों की कतार और उन कुत्तों के सिवाय और कोई नहीं था, जिनमें से उनके पास बैठा एक कुत्ता , बार बार अपने फर्ज को निस्संदेह निभा भी रहा था ।

बसप्पा अपने बुशर्ट की जेब से माचिस और बीडी निकालकर सुलगाने लगा, उसकी ओर जलती आंखों से देखती शिवम्मा फूलकर मोटे हुए गले की नसों में और तनाव भरते हुए भर्रायी आवाज में कहने लगी, “वहां मेरी भीमा असप्ताल में मरी पडी है और यहां तुझे बीडी सुलगाने की पडी है।” रूलाई का भभका शिवम्मा को उसी बेंच पर निढाल सा कर दिया वह बेंच के लोहे के पाइप  से अपना सर पीट पीटकर दे मारने लगी । जलती बीड़ी को वहीं जमीन से मसलकर बसप्पा, शिवम्मा के पास आकर बैठ गया। हलकान होती अपनी आवाज मे जरा ताकत डालते पत्नी की ओर देखकर उसने कहा, ‘अरी, क्या मैं बीडी का कश खींच रहा हूं, नहीं री शिवी… शिवी मेरा दिल जल रहा है री …इसे कैसे ठंडा करूं …तू ही बोल … भीमव्वा … बेटी भीमा…!!,” फुक्का फाडकर रोने लगा ।

शिवम्मा ने अपने दोनो हाथों को आकाश की ओर उठाया। वहां भी धुप्प अंधकार आर पार पसरा पैठा था। निढाल से हाथों को उठा उठाकर अपनी छाती पर दे मारने लगी !! दूसरे ही पल सीना तानकर बैठ गयी। अपने दोनों  हाथों को पति की ओर सीधा तानकर भग्न मुद्रा में बैठी शिवम्मा के मुंह से जैसे आग के गोले बरसने लगे, अब कैसे मिलेगा रे छाती को ठंडक? कित्ती बार बोली थी रे भीमा कि अप्पा मुझे वहां शादी नई करने का, मुझे और पढना है, मैं कलबुर्गी जाउूंगी, वहां जाकर पढूंगी… नौकरी करूंगी।’’ शिवम्मा हठात अपनी जगह से उठी  बसप्पा के नजदीक जाकर आपने दोनो हथेलियों को तीर के नोक सी उसके मुंह पर तानती हुई भर्राये गले से कहा, ‘हां  हां तूने तो मेरी भीमा को कलबुर्गी भेजा, जरूर भेजा, लेकिन-लेकिन किस लिए, किस लिए,’ वह दहाड़ मारकर रोने लगी।

शिवम्मा सीधे तीर से तने उसके पतले से दोनो लंबे लम्बे हाथ हवा में उसी तरह ताने खड़ी रही, जैसे भीमा की मौत का उत्तर मांग रही हो। उत्तर में बसप्पा पत्नी की ओर सूखे प्रश्न भरी आंखों से बस देखता ही रह गया ।
उसी समय कहीं दूर से कुत्तों के झुंड से लंबी हॅूंक सी उठी । उस हूंक में घुले सदियों के रूदन की लरज से सारा वातावरण कांप सा गया …!!

तस्वीरें गूगल से साभार
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दम तोड़ते रिश्ते

कौशल पंवार

   रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709

“फ़िर, फ़िर क्या हुआ?”


उसने ठण्डी आह भरते हुए कहा- “मैं भाग रही थी, बेसुध, सपाट और सुनसान सड़क पर. हिरण जैसे कश्तूरी की सुंगध पाने के लिए मारा मारा फ़िरता है, मैं भी उसी तरह थी. जैसे कोई शिकारी हिरण का शिकार करने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ता है. हिरण आगे -आगे और शिकारी पीछे पीछे. उसके पैर आगे की ओर बढते है और गर्दन बार- बार मुड मुड़कर शिकारी को देखती है. मैं भी उसी तरह थी. मैं भाग रही थी आगे की ओर, और गर्दन बार -बार पकड़े जाने के डर से अपने आप पीछे मुड़- मुड़कर देखती रही थी. सामने देखती तो कान पीछे लगी पदचापों को सुनने के लिए घोड़े के कान की तरह सीधे खड़े होकर पदचापों की दूरी नापने लगते. कानों पर भी आंखों को विश्वास नहीं हो रहा था तो झट से भागते -भागते पीछे की ओर घूमती. तरह-तरह के ख्याल मन में उमड़ रहे थे. एक तरह मेरे सामने मेरी मंजिल, मेरी दुनिया थी तो दूसरी ओर…मेरा पूरा परिवार. अगर घरवालों के हत्थे चढ गयी तो..तो…… क्या होगा, सोचकर ही मेरी रुंह कांपने लगती थी. मैं रूकी नही. बेइन्तहाशा दौड़ती रही.”

“सूरज की रोशनी ढल गयी थी, अंधेरा फ़ैलने लगा था. मेरे साथ देने के लिए मानो कायनात भी चाहती थी कि मैं पा लूं उसे, जिसके लिए मैं सब रश्मों को तोड़कर आगे बढने का निर्णय कर चुकी थी. सड़क पर स्ट्रिटलाइट नहीं थी. गांव देहात में लाइट अक्सर आती भी नहीं है. कहने को तो पूरी सड़क पर लाइटें लगी हुई थी परन्तु जलती नहीं थी. मुझे धुंधलके ने घेर लिया था. सड़क भी साफ़ नजर नहीं आ रही थी परन्तु मैने अपनी प्रेम की आंखों की रोशनी में उसकी बाइक देख ली थी. मुझे पूरा यकीन था कि वही होगा जो सड़क किनारे घने पेड़ के नीचे खड़ा था. भीतर तूफ़ान उमड़ रहा था. मेरे सामने कुछ कदम पर ही मेरी मंजिल थी. आज एक नये रिश्ते की ओर मैं बढ रही थी. आज मै अपने नये रिश्ते में बंध जाऊंगी इसी का जनून मुझे उस ओर खींच रहा था.

मेरे पीछे की पदचाप और नजदीक आती जा रही थी. हाथ की दूरी थी बाईक तक पंहुचने की और इतनी ही दूरी घरवालों की पदचाप की. अंधेरा घना हो चुका था. बादलों ने चांद की रोशनी को भी ढक लिया था. तारे टिमटिमाते हुए आंखमिचौली खेल रहे थे जिनकी रोशनी में मैं बाइक को देख पा रही थी और घरवाले मुझे. धुंधलका बढ गया था. इसी का फ़ायदा उठाकर मैं बाइक पर बैठ जाऊंगी, कुछ कदम और. मैने पूरा दम लगा दिया अपनी सांसों को बंद करके. पदचाप बहुत नजदीक आ गयी थी. मैने हाथ बढाकर बाइक के पीछे की सीट पकड़नी ही चाही थी कि…”

“फ़िर फ़िर क्या हुआ?”

उसने मुझसे पूछा तो मैने अपने अंदर की टूटन को समेटा और कहा कि “बाइक घर्र घर्र की आवाज करती हुई मुझे पीछे धकेलती हुई छोड़कर चली गयी, इतनी तेज कि मेरी दौड़ उसके आगे बौनी थी. मेरे पास अपनी आवाज निकालने तक का वक्त नहीं था. मेरा मन किया कि मैं रमेश को आवाज लगाकर रोक लूं. उसे पकड़कर जोरदार तमाचा लागाऊं. क्या यही रिश्ता था. ..? मुझे इतना सोचने तक की फ़ुर्सत नहीं थी ओर मैं झट से उसी पेड़ की ओट में छुप गयी. तारों ने भी टिमटिमाना बंद कर दिया था.

इससे पहले कि घरवाले बाइक को पकड़ पाते वह भाग गया था. थोडी दूर दौड़ कर उसका पीछा भी किया पर वह उनकी पहुंच से बाहर था. वे बाइक के पड़े निशान पर तेज-तेज पैर पटक रहे थे. हाथ मल रहे थे कि मैं बाइक पर बैठकर उनकी आंखों के सामने भाग गयी. और मैं बेजान पेड़ की ओट से आंखें फ़ाड़े सब परिवार वालों को अपने सामने सड़क पर देख रही थी- मेरी मां जिसने मुझे पैदा किया, मेरा भाई जो बचपन में मेरे साथ गुड्डे गुडिया का खेल खेलता था, नाराज होने पर चीजें बाहर से लाकर देता था, पिता और ताऊ जो कभी अपने कंधे पर बिठाकर मुझे झुलाते थे-सब आज मेरी आंखों के सामने होते हुए भी मुझसे दूर जा चुके थे. मन किया कि मां से लिपटकर रोऊं. चीख-चीखकर बताऊं कि मुझे रमेश ने धोखा दिया. इस मोड़ पर लाकर मेरा साथ छोड़ दिया. साथ जीने-मरने की कस्में खायी थी लेकिन जीना तो दूर वह मेरे साथ मर भी न सका. मैं फ़िर भी जिंदा थी. मां अब मां रही ही कहां थी? मैं संभली. भावनाओं से बाहर निकली, हकीकत मेरे सामने थी. सबकी आंखे आग उगल रही थी. सब कुछ भस्म करने को तैयार. जरा सी नजर मुझ पर पड़ी तो घरवाले मुझे जिंदा गाड़ देंगे, सोचकर ही मैं कांप गयी थी. अपने सामने मुझे मौत नजर आ रही थी.

थोड़ी देर पहले के सपने अपना दम तोड़ चुके थे. बहुत कुछ बिखर गया था, टूट गया था. उस टूटन की आवाज केवल मैं ही सुन सकती थी या फ़िर वह पेड जो मेरा एकमात्र सहारा था उस वक्त. वे बादल जो उमड़ उमड़कर चांद की चांदनी को ढक रहे थे. टुटन अगर बाहर आयी तो इसकी किमत मेरे शरीर को जान देकर चुकानी पड़ेगी.
मेरे ताऊ ने दहाडकर मेरे छोटे भाई को घर से बाइक उठाकर लाने को कहा. वह दौडकर गया और गांव के भीतर जाने वाली सड़क की ओर मुड़ गया. घरवाले अभी भी सड़क पर कुछ ढूंढ रहे थे मानो मुझे बाइक की लकीरों से बाहर निकालकर ही छोड़ेंगे. मुझे अब अपनी जान बचानी थी. अपने आपको बचाना था. अचानक मुझे अपने आपसे प्यार हो आया था. जो मुझे बीच मझधार छोड़ गया उसके नाम पर सजा मुझे भी मंजूर नहीं थी. जो पकड़े जाने के डर से ही भाग गया, क्या पता वह मेरे साथ अपना जीवन बिता भी पाता या नहीं. थोड़ा सा हवा का झौंका क्या आया, सब प्यार-व्यार अपने साथ उड़ा ले गया.

अंधेरे से छिपी मैं उन सब को ही देख रही थी कि सबका ध्यान सड़क पर पड़ी किसी चीज पर गया. आंखे गाड़े सबके सब नीचे की ओर देख रहे थे. मेरे लिए यहीं मौका था वहां से हटकर कहीं ओर छुप जाने का. बिना नजरों में आये मैं ज्यादा देर नहीं छुपी रह सकती थी वहां. इक्का-दुक्का वाहन सड़क से गुजर ही रहे थे. उनकी लाईट से रोशनी फ़ैल रही थी जिससे देखे जाने का डर था. जब सबका ध्यान नीचे जमीन की ओर था मैं उस ओट से वहां से हट गयी. पेडों की छांव मे छुपते-छुपाते मैं घर की ओर जाने वाली सड़क की ओर मुड़ी ही थी कि मुझे झट से एक बार फ़िर पेड़ की ही ओट लेनी पड़ी. सामने गली से भाई बाइक लेकर आ गया था. मैं छुप गयी. उसके रोड पर आने तक वहीं छुपी रही. जब वह मेरे पास से गुजर रहा था मन किया कि अपने भाई को बता दूं कि मैं भागी नहीं हूं बल्कि रमेश मुझे छोड़कर भाग गया है. मैं तो यहीं हूं अपने भाई के बिल्कुल नजदीक. मैं ऐसा केवल सोच ही सकती थी. भाई जब रोड पर पंहुच गया तो मैं अन्दर घर की ओर जाने वाली गली में घुस गयी.

अपने घर के नजदीक पंहुच, मैं ठीठक गयी थी. मन किया कि भाग कर अपने घर में चली जाऊं. पर इसके बाद क्या होगा मैं जानती थी. मेरे घर के पीछे ही एक प्लाट खाली पड़ा था जिसमें ज्वार खडी थी- आदमकद ज्वार. वह मेरे छुपने के लिए माकूल जगह थी. मैं भागकर उसके अंदर घुस गयी. जान तो बचानी ही थी मुझे.
जहां छुपी, इस जगह तो मैं दिन में भी कभी नहीं आती थी लेकिन आज यही मेरी जान बचाने का साधन बनी थी. मैं ज्वार के अंदर मचान की पीठ से अपनी पीठ को सहारा देकर बैठ गयी थी. रात और गहरी होती जा रही थी. सन्नाटा बढ गया था. मैं डर के मारे कांप रही थी. रात के इस सन्नाटे से कहीं ज्यादा डर घरवालों के मुझे पकड़े जाने का था.

मैंने जो किया था उसका मुझे कोई अफ़सोस नहीं हो रहा था. अंदर से सब कुछ निकल गया था. मैने रमेश को चाहा था. जीने-मरने तक साथ निभाने का वायदा मैने भी तो किया था. उसने नहीं निभाया तो यह उसकी गलती थी जिसकी सजा मैं क्यूं भुगतूं ? यही सोचकर मैने अपने आपको शांत कर लिया था. घरवालों की नजर में यह  उनकी पगड़ी उछालने का सवाल था. मान मर्यादा का मसला था. पर मेरे लिए नहीं था. अपना माना था उसे..! इसलिए उसके साथ भागना क्या जुर्म था ?

घरवालों से इस रिश्ते के बारे में बात करना “आ बैल, मुझे मार” वाला था. उनकी रजामंदी होने का सवाल ही नहीं था. जातीय दम्भ के आगे मेरा रिश्ता दम तोड़ जाता. कभी साहस भी तो नहीं किया था कि इस बारे में खुलकर बात करूं. “इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते” पता लग ही गया था कि कुछ है जो ठीक नहीं चल रहा था. बात यहां तक पंहुच जायेगी इसका अंदाजा सगाई के लिए मेरे ना करने से साफ़ हो गया था. मैने रजनी जो मेरे सरपंच ताऊ की बेटी थी, सब बता दिया था. वह भी डर गयी थी. खूब समझाया था मुझे कि मैं रमेश के चक्कर में पड़कर अपने आपको आग में न झोकूं. पर दिल कहां इन बंदिशों का मान रहा था. मैं जोर-जोर से दहाड़ मारकर रोना चाहती थी. रमेश ने ऐसा क्य़ूं किया. रमेश- रमेश- रमेश….. करते-करते मुझे कब नींद आयी, पता ही नहीं चला. मैं सो गयी थी वहीं ज्वांर में घुटनों को मोडकर मुंह को छिपाये हुए. दिन निकल आया था. आंख खुली तो अपने आपको हिलते हुए ज्वार के पौधों के बीच में पाया. सारी रात एक ही मुद्रा में बैठे- बैठे जुड़ गयी थी, सो पैर पसार लिये.

मेश का चेहरा फ़िर आंखों के सामने छा गया था. एक बारगी तो उसकी मासूमियत और शरारत भरी नजरों ने मन में एक झुरझरी सी पैदा कर दी परन्तु दूसरे ही पल रात का एक-एक सीन फ़िल्म की तरह आंखों के आगे आ गया. मेरा चेहरा कठोर हो गया था. उस आदमी के नाम का कलंक नही लगने दूंगी जो बुजदिल था, कायर था. घरवालों को देखते ही भाग खड़ा हुआ. एक बार भी नहीं सोचा कि मैं सबको क्या जवाब दूंगी?  सबका सामना मैं अकेले कैसे करुंगी? एक हाथ से भी कम की दूरी रमेश ने जीवन भर की दूरी बना दी. मैने सोच लिया था कि मैं हर हालत में अपने आपको बचाकर रहूंगी.

ज्वार में बैठे-बैठे यही सोचती रही. कभी घरवालों का चेहरा तो कभी रमेश की कायराना हरकत. धीरे-धीरे दिन बढ रहा था. सूरज ने अपनी रोशनी से आग उगलना शुरु कर दिया था. ज्वार में भी उमस बढ रही थी. जैसे ही ज्वार की कोई बली मेरे नंगे हिस्से पर पड़ती तो बिजली की तार जैसे चुबती. पैर उठने को होते तो तुरंत पकड़े जाने के डर से दुबक जाती. अपनी धड़कनों तक को रोक रही थी कि कहीं गली से गुजरते हुए कोई मेरी धड़कन तक की आवाज न सुन ले. मेरे पास अपनी जान बचाने का कोई साधन नहीं था. एक बार मन में आया कि अपने आपको खत्म कर लूं, फ़िर लगा कि किस अपराध के लिए, वो अपराध जो किया ही नही, और किसके लिए अपनी जान दूं.

ज्वार से छनकर आयी रोशनी में से मैं बाहर गली में झांक रही थी कि रजनी दिखाई दी. मैं अपनी सांस रोकर उसे गुजरते हुए देख रही थी. मन किया मैं उसे पुकार लूं फ़िर पकडी जाऊंगी, नही आवाज लगा पायी. पता नहीं क्या सोचकर मैने अपने जम्फ़र (कमीज की झालर) को धीरे धीरे फ़ाड़कर उस झरनी से बाहर की ओर सरका दी. जाने कौन सी शक्ति थी जो मुझे ऐसा करवा रही थी या फ़िर मेरी जरुरत ने मेरा साथ देना शुरु कर दिया था. रजनी ने जैसे ही जम्फ़र की झालर देखी, झट पहचान ली कि ये तो मेरी कमीज का कपड़ा है. वह मेरी ओर ही बढ गयी. मैने झालर को वापिस खीच लिया. हमारी आंखे एक दूसरे से टकरा चुकी थी. उसने इधर-उधर देखा और घर के प्लाट से लगे ज्वार के खेत में बनी इस चार दिवार को फ़ांद कर मेरी ओर कूद गयी. हम दोनों बहने एक दूसरे से लिपट गयी. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं हूं उसकी बहन जिसे हमारे घरवाले कुत्ते की तरह सुंघते मारे-मारे फ़िर रहे हैं. मरे हुए को जिंदा देखकर जो खुशी मिलती है, ऐसी खुशी पाकर हम एक दूसरे से काफ़ी देर लिपटे रहे. रजनी की सिसकियां बढ रही थी. मैने उसे अपने से अलग किया और उसके मुंह पर अपनी हथेली रख दी. ना में मैने गर्दन हिलाई और चुप करा दिया. वैसे उसे भी बहुत सी शिकायतें थी मुझसे. वह फ़ूट फ़ूटकर रोना चाहती थी. मैं उसे चुप रहने का ईशारा करती रही. शांत होने के बाद उसने मुझे पिछली रात से लेकर और आज दिन भर में क्या – क्या घरवालों ने किया, सब कुछ एक सांस में बता दिया.

रोड पर पड़े हुए जो घरवालों ने देखा था, वह रमेश का फ़ोन था जिसे ट्रैक कर लिया गया था. पडोस के गांव का पूरा पता घरवालों को लग गया था. इससे पहले कि वे उसे पकड़ पाते वह वहां से भाग निकला था. घरवालों के हाथ फ़िर खाली थे. पर इतना पता उन्हे लग गया था कि मैं उसके साथ नहीं गयी थी. पर उनकी इज्जत तो शरेआम नीलाम हो ही गयी थी. इसलिए बड़े संयत होकर अब वे मुझे ही ढूंढ रहे थे कि मैं आखिर गयी कहां हूं?
पूरा परिवार मेरे इस कदम से नाराज था. वह भी नाराज है, मैने चुहलबाजी करते हुए रजनी से पूछा तो उसने मुझे प्यार से छिड़क दिया और बच्चों की तरह रो पडी. मेरी आँखें तो सुख ही चुकी थी. उससे मेरी हालत नहीं देखी जा रही थी. मैं रात भर इसी खेत में थी, जानकर वह दुखी हो गयी थी पर वह कुछ खास कर भी नहीं पा रही थी इसलिए और दुखी हो गयी थी. जब वह शांत हुई तो मैंने उसे कहीं से सरोज का फोन नम्बर लाने के लिए कहा. यहा ज्यादा देर तक रुकना ठीक नहीं था इसलिए मैने उसे घर भेज दिया. सबकी नजरों से छुपकर वह घर चली गयी.

सरोज जिसके बारे में मैंने अपने कालेज के दिनों में एक अखबार में पढा था. हम लड़कियों के बीच वह चर्चा का विषय कई दिनों तक बना रहा था. इस समय मेरी जान को बचाने का केवल यही एक रास्ता था.  सरोज और रजनी मेरी उम्मीद बन गयी थी. दिन ढलने लगा था. मैं खामोश दिवार से सटी ज्वार के एक कोने में पड़ी-पड़ी सोच रही थी. किस्से किस्से होते हैं हकीकत नहीं. इन्हीं किस्से कहानियों ने मेरे अंदर प्यार का पौधा रोप दिया था. यही सच होता है, मैने ये मान लिया था. बलविंदर कौर और रोशन के प्यार की कहानी मुझे आज भी याद थी. दिवार के सहारे सहारे धस कर मैं अपने अतीत में धस गयी थी.”

…बलविंदर कौर और रोशन की यादें ताजा हो आयी थी. दूर ऊपर आसमान में बादल घिर आये थे और मैं भी अपने ख्यालों में घिर गयी थी. गड़्गड़ की आवाज करते बादल गरजने लगे. बलविंदर कौर और रोशन का प्रेम मेरी आंखों के आगे तैर गया था. बलविंदर कौर मेरे ही गांव से अगले गांव के ढेरे से आती थी. बस अड्ड़ा मेरे ही गांव का था. जहां से हम कालेज जाने के लिए बस पकड़ती थीं. कई बार वह टम्पू मे अकेले आती तो कई बार उसका भाई उसे मोटरसाइकिल से मेरे गांव के अड्ड़े तक छोड़कर आता था. वह बहुत सुंदर थी. गौरा-गौरा गेहूआं रंग था उसका. भोली सी सूरत जो किसी का भी मन मोह ले. बडी-बड़ी सी गहरी सी काली काली आंखे, लम्बी सी नाक ठीक अपनी लम्बाई की तरह, छरहरा बदन, गुलाबी से होंठ और उन पर प्यारी सी पंजाबी बोली. बहुत कम बोलती और जब बोलती मानो फ़ूल झड़ रहे हों. नीला सूट और फ़ुलकारी वाला दुप्पटा पहनकर जब आती तो गजब की सुंदर लगती. अक्सर सफ़ेद रंग की हिल वाली बैली पहनती. उस पर हिल वाली बैली जचती भी खूब थी. उसे पहनकर वह और पतली व लम्बी लगती.

जब भी हम बस में बैठते तो कोई उसे बड़े प्यार से निहारता. कॉलेज के बीच में पड़ने वाले रास्ते के गांव से वह चढता था. उसी बस में आता-जाता जिस बस में वह होती. अगर किसी दिन छुट्टी मारती तो वह भी कालेज नहीं जाता था. उसे न देखकर बस में से उतर जाता था,  चलती बस में से, कई बार तो नीचे पड़ते-पड़ते बचा था.
हम बलविंदर को छेड़ते तो वह झूठ मूठ की नाराज होती, नीचे पलके झुकाती और मंद-मंद मुस्कराती. वह भी उसे चोरी छुपी निहारने लगी थी. ऐसे ही दोनो का चोरी- चोरी, चुपके-चुपके चलता रहा. हमारा कालेज लड़कियों वाला था और वह कॉमन कालेज में पढता था. हमारी एन.सी.सी. की परेड उसी के कॉलेज में होती थी. बलविंदर ने एन.सी.सी नहीं ले रखी थी. एक दिन हम सब कालेज के ग्राउंड से परेड करके लौट रहे थे कि हमने पार्क में बैठे हुए बलविंदर और रोशन को देख लिया, जोर से हुक लगायी. “उड़ गये तोते उड़ गये तोते” जोर-जोर से चिल्लाये और अपनी एन.सी.सी. की टोपियां हवा में उछाली. खुशी से या छेड़खानी से पता नहीं. ये हमारा बचपना था या शरारत, या दोनों थी. उन्होंने भी हमे देख लिया था. दोनों थोड़ा सा शर्माये और हमे देखकर मुस्काराये भी.

धीरे-धीरे कालेज में आग की तरह ये खबर फ़ैल गयी थी, जैसे उन दोनों ने साथ बैठकर कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो. ये आग उनके घर तक भी फ़ैली. बलविंदर ने कॉलेज आना बंद कर दिया था. हम लोग कुछ नहीं कर पाये थे.
एक दिन उसका भाई शादी का कार्ड दे गया यह कहते हुए कि मुझे शादी में जरुर आना है. बिना मुझसे बात किये बाइक पर बैठकर चला गया. शादी की सूचना रमेश को भी मिल गयी थी. उसने मुझे सिर्फ़ एक बार उससे मिलवाने के लिए कहा जो मैं नहीं कर पायी थी. थोड़े दिनों बाद ही शादी थी. उसकी शादी में हम सब गये थे. यह शादी नहीं एक समझौता था जो उसने किया था.

सब अपने अपने कामों में व्यस्त हो गये थे. बलविंदर भी अपने आपसे समझौता कर आगे बढ गयी थी. नहीं बढा था तो वह था रौशन . उसका जीवन ठहर सा गया था. उसने बलविंदर के साथ बिताये उन क्षणों को ही अपना जीवन दे दिया था. उसने कभी किसी से दोबारा प्यार नहीं किया और न ही विवाह ही किया. मैने भी ऐसे ही प्रेम को पाने की कल्पना कर ली थी जो रौशन ने किया था.

बादल बरस रहे थे जैसे मेरी आंखों से आंसू झर रहे थे. मेरे दुःख में मेरा साथ दे रहे थे. ज्वार के  खेत में पानी भरना शुरु हो गया था. मेरे प्यार का नशा अब बादलों की तरह झड़ गया था. मुझे उन दोनों के प्रेम से भी कोफ़्त हो आयी थी. आखिर रोशन ने भी तो बलविंदर को अकेला छोड़ ही दिया था, क्यों नहीं दिया था उसका साथ, उसका हाथ थामकर. उसे भी तो अपने परिवार, समाज का खौफ़ था, उन्हे खोने का डर था, जमीन से बेदखल कर दिये जाने का ड़र था. हालांकि उसने इसकी सजा अपने आपको जरुर दी ताउम्र शादी न करके. दूसरी ओर बलविंदर थी जिसने अपने प्रेम को पाने के लिए कुछ नहीं किया था, समझौता कर लिया था, परिस्थितियों के आगे हार मानकर.

मेरे साथ क्या हुआ मैं सोचने लगी थी. मेरी आंखों के पानी की तरह बादल भी बरस कर थम गये थे. ठण्डी हवा चलने लगी थी जिससे शरीर में ठण्डक होने लगी थी. पानी की निकासी न होने के कारण खेत में पानी भर कर घुटनों तक आ गया था. मैं अब बैठ भी नहीं सकती थी. पर रात तो काटनी ही थी, इसलिए दिवार का सहारा लिये खड़े खड़े ही जैसे-तैसे दूसरी रात भी बिताई.

दो रातें गुजर गयी थी. तीसरा दिन निकल आया था. मैं बार-बार रजनी के आने की बाट जो रही थी. पर वह नहीं आयी थी अभी तक. रात तो बारिश के कारण नहीं आयी होगी पर अब तो दिन चढ गया है अब तो आ ही सकती थी. मेरा दिल बैठा जा रहा था कि तभी ज्वार की बली तेजी से हिली. मैं डर गयी थी . मेरी सांसे हल्क में अटक गयी थी. परछाई आगे बढ रही थी. रजनी थी. उसके हाथ में फोन भी था. हम दोनों ने सरोज को नम्बर मिलाया. लैण्डलाईन का नम्बर था. किसी ने फोन उठाया तो एक आदमी की आवाज सुनाई दी. मैने “हैलो” भी नहीं बोला था जान बुझकर. मैं सतर्क थी. दोबारा फ़िर से फोन मिलाया पर इस बार भी आदमी की ही आवाज आयी. समझ नहीं आ रहा था क्या करूं? पर बात करना भी बहुत जरूरी था. मैने हिम्मत करके “हैलो” बोल ही दिया. मेरी आवाज मुझे खुद ही अजनबी जैसी लग रही थी. आवाज में कंपन था शायद उसने भांप भी लिया होगा. ’कोई मेसेज हो तो दे दीजिए’, वह तो अभी यहां नहीं है.”. मैने फ़िर जोर देकर उससे कहा कि “उन्हीं से बात करनी है, कब हो पायेगी”. जवाब मिला -“आधे घण्टे बाद फोन कीजिए तब तक वह आ जायेगी.” फोन कट चुका था. अब इंतजार करने के अलावा और कोई चारा नहीं था.

रजनी का इतनी देर तक मेरे साथ ठहरना ठीक नहीं था. घरवालों को शक हो सकता था. घरवाले अपने रसूख के दम पर थाने भी जाकर आ चुके थे पर बिना कोई रिपोर्ट लिखवाये. ताऊ सरंपच था और उनकी इज्जत का सवाल था. थाने वाले सब समझ रहे थे. इसलिए बिना गांव वालों को भनक लगे सब खोजबीन जारी थी. पर उन्हे अभी तक कोई सुराग नहीं मिला था. इसलिए रजनी को मैंने वापिस घर भेज दिया. दोपहर ढलने को थी. रजनी मौका देख फ़िर आ गयी थी. मैने फोन मिलाया तो सरोज ने ही उठाया. सरोज एक सामाजिक कार्यकर्ता थी और स्त्रीवादी, जनवादी आन्दोलनों में काम कर रही थी. मैने एक सांस में पूरी बात उसे बता दी. पर ये नहीं बताया कि मैं कहां से बोल रही हूं. वह ध्यान से मेरी बात सुनती रही. पूरी बात सुनकर उसने सिर्फ़ इतना कहा कि “मैं देखती हूँ कि क्या हो सकता है.” मैने उससे केवल इतना कहा कि “वह मुझे फ़ोन न करे, मैं खुद करूंगी. मेरी जान को खतरा है. मुझे बचा लो.” रजनी घर जाकर फ़िर आ गयी थी.

शाम को  मैने फ़ोन किया तो सरोज ने मेरी बात विजय से करवायी. मैने उसे भी सब कुछ बता दिया. उसने मुझे हौसला दिया कि वे मुझे कुछ नहीं होने देंगे. मैं जहां छिपीहूं, वही रहूं. बाहर ना निकलूं. जब तक वे लोग मुझे खुद वहां से बाहर निकलने के लिए न कहे. मेरी बातों को सुनकर वे सब हैरान रह गये कि “मैं तीन दिन से अकेली खेत में छिपी हुई हूं.” पिछली रात को तो बारिश भी खूब हुई थी ऐसे में अकेली लड़की अपनी जान बचाने के लिए बारिश में पूरी रात बिता रही है. भूखी-प्यासी. उन्हे मेरी हालत सुनकर ही घबराहट होने लगी थी. फोन रख दिया गया.

विजय अपनी टीम के साथ थाने गये. थानेदार को पूरा केस पहले ही पता था. विजय को वह बहुत अच्छे से जानता था कि ये लोग अगर कोई केस हाथ में लेते हैं तो छोडते नहीं है. उनकी ईमानदारी का कायल वह थानेदार भी खुद था. एक तरह ताऊ जी -गांव का सरपंच और रस रसूख वाला दूसरी ओर विजय की टीम. विजय व्यक्तिगत और कानूनी दोनो तौर पर इसे सुलझाने में लगा था जिससे थानेदार भी सहमत था. थानेदार ताऊ से भी दबता था. एक तरफ ताऊ और दूसरी ओर विजय. ताऊ मेरे घर लौटने और अपनी इज्जत बचाकर मुझे सजा देने के लिए तैयार था तो दूसरी ओर विजय थानेदार के सामने अड़ा हुआ था कि मुझ पर कोई आंच न आये. थानेदार को अब बीच का रास्ता ही अपनाना था, उसने ताऊ और विजय की एक मीटिंग रखवा दी.
विजय ने पुलिस, सरपंच और परिवार वालों से मुझे खतरा बता कर सबको पार्टी बना लिया था. दूसरी ओर थानेदार को भी इसमे उसने पार्टी बनाया कि कहीं थानेदार दवाब में न आ जाये. उसने थानेदार के बड़े साहब को भी कार्यवाही करने के लिए तैयार कर लिया था. स्थितियां कुछ भी बन सकती थी इसलिए विजय कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. थानेदार अपनी नौकरी जाने के डर के कारण वही सब करने के लिए बाध्य हो गया था जो विजय चाहता था.

चौथा दिन निकल आया था. थाने में ही थानेदार और एस.एच.ओ. के सामने मीटिंग हुई. दोनों आमने- सामने थे. विजय ने कहा-“अगर लड़की को एक खरोंच भी आयी तो पूरा परिवार जेल की चक्की पीसेगा. थानेदार की भी नौकरी जायेगी, सब बंधे-बंधे फ़िरोंगे. गांव में बात फ़ैलने और पूरी बिरादरी में अपनी नाक कटने के डर से ताऊ राजी हो गया था. सारी शर्ते मान ली थी. मुझे कोई कुछ नहीं कहेगा और मैं वापिस घर आ जाऊं- बात फ़ैल ना जाये. विजय ने इस बारे में निश्चिंत रहने के लिए कहा तो ताऊ ने आखिर में पूछा ही लिया कि “मैं हूं कहां” ? विजय ने जवाब दिया कि “हमारे पास ही है और सुरक्षित है. आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं”. अप्लिकेशन पर सबके हस्ताक्षर करवा लिये गये थे. तय हुआ कि अब मुझे परिवार वालों को दे दिया जाना चाहिए. रजनी आ गयी थी और बहुत खुश थी. उसने विजय की सारी कही बातों को मुझे बता दिया था और साथ ही ये भी कहलवाया था कि मैं यहीं रहूं जब तक वह मुझे मेरा नाम लेकर न बुला ले.

पुलिस की जीप के साथ मेरा पूरा परिवार मुझे लेने के लिए आ रहा था. विजय और सरोज भी साथ थे. जैसे ही जीप रोड़ पर आयी तो विजय ने जीप को गांव की ओर चले जाने के लिए कहा. सब हैरान थे. जीप को गांव की ओर मेरे घर के पास मुड़ने वाली गली में रोक दिया गया. ताऊ ने गुस्से से भरकर विजय की ओर देखकर कहा- “क्यूं घर की ओर पंचायत को लेकर जा रहे हो, थोड़ी बहुत इज्जत बची हुई है, उसे भी नीलाम करके छोड़ोंगे”. विजय ने उसे धर्य रखने के लिए कहा और खुद मेरे घर की पीठ की ओर लगने वाली चाहरदिवारी की ओर खड़ा हो गया. सब उसी ओर मुंह फ़ाड़े देखने लगे थे. विजय ने तीन बार मेरा नाम पुकारा. मैं सांसे रोके अपना नाम सुन रही थी. इन चार दिनों में तो मैं अपना नाम तक भूल गयी थी. मैं उठी और लड़खड़ाती हुई आवाज की ओर बढ गयी. विजय ने लपककर मुझे सहारा दिया और बच्चे की तरह अपने सीने से लगा लिया, कहा-“मेरी फ़ूलन” सब अवाक रह गये.

तस्वीरें गूगल से साभार
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इजाडोरा डंकन: नृत्य की महान साम्राज्ञी और स्त्री-स्वतंत्रता की प्रवक्ता!

ज्योति प्रसाद

 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com

आज 29 अप्रैल है। आज ही के दिन अंतरराष्ट्रीय  नृत्य दिवस (इंटरनेशनल डांस डे) मनाया जाता है। जो इस कला से जुड़े हैं उन्हें इसकी पहले से ही जानकारी होगी पर जो इस कला को सिर्फ सिनेमा, टीवी कार्यक्रमों या अन्य माध्यमों से वाकिफ़ हैं उन्हें आज के दिन घर आए अखबारों या अन्य माध्यमों से पता चल रहा है।

नृत्य, नाच, झूमना, गाना या डांस इन्सानों की नैसर्गिक प्रवृत्तियों में से एक प्रवृत्ति है। यह माना जा सकता है। इसमें बहस मुबाहसे की जरूरत नहीं है। भारत में तो क्लासिक संगीत की तरह क्लासिक नृत्य भी हैं। पर उनकी चर्चा यहाँ करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है। इस लेख का उद्देश्य अमरीका की आधुनिक नृत्य की जननी महान इज़ाडोरा की आत्मकथा के बहाने स्त्रीत्व को समझना होगा। गौरतलब हो कि इस महान नृत्यांगना को इतिहास में कई तरीक़ों से याद किया जाता रहा है। इसके साथ ही उनकी मुक्त विचारधारा और जीवनशैली को भी निशाने पर लिया जाता रहा है। हैरत की बात है कि जिस नृत्य को लेकर अमरीका बीसवीं शताब्दी में माइकल जैकसन को लेकर दीवाना रहा वहीं इस मशहूर नृत्यांगना का ज़िक्र भी नहीं सुनाई देता या बहुत बड़े पैमाने पर सुनाई नहीं देता। ज़िक्र होता भी है तो बहुत ही धीमी आवाज़ में।

भारत में भी तमाम तरह की नृत्य प्रतियोगिताओं के कार्यक्रमों के दौरान माइकल जैकसन का नाम आता रहता है पर इज़ाडोरा का नाम सुनाई भी नहीं देता। यह भी सच है कि सत्ताओं ने जिस इतिहास को दिखाना चाहा,लोगों तक वही पहुंचा भी। जिसे स्कूली किताबों में जगह मिली उनका मनमाना चेहरा दिखाया गया। या कहूँ इतिहास की एक परिभाषा मनगड़ंत महान घटनाओं और चरित्रों का हनन भी हैं। जो लोग/व्यक्तित्व/समाज बनाई गई लीक पर चले उन्हें फ्रेम में लिया गया। पर जो लीक पर चलने को राज़ी न हुए उन्हें एक अंधेरा और लंबी खामोशी दी गई। यह हर जगह के इतिहासों के साथ है। महिलाओं और दबाये गए लोगों के साथ यह काम और भी क्रूरता से किया गया। लेकिन ये लोग इतिहास में किसी भी तरह मारे नहीं जा सके और उभर आए।

एंजेला इज़ाडोरा डंकन का जन्म 27 मई 1878 को अमरीका के सेन फ्रांसिस्को में हुआ था। बेहद छोटी अवस्था में उनके माता पिता के बीच तलाक हो गया था। उनके परिवार में उनकी माँ को मिलाकर पाँच लोग थे। माँ ने ही अकेले अपने चारों बच्चों की परवरिश की। इज़ाडोरा ने अपनी आत्मकथा ‘माय लाइफ’ में अपने बचपन का बेहद प्रभावपूर्ण वर्णन किया है। वह आत्मकथा में नृत्य के बारे में लाजवाब बात कहती हैं- “अगर लोग मुझसे पूछते हैं कि मैंने नाचना कब शुरू किया तब मैं जवाब देती हूँ- ‘अपनी माँ के गर्भ में। शायद शहतूतों और शैम्पेन के असर की वजह से, जिन्हें प्रेम की देवी एफ़्रोदिती की खुराक कहा जाता है।”

वह यह भी कहती हैं- “मुझे इस बात का शुक्रगुजार होना चाहिए कि जब हम छोटे थे तब मेरी माँ गरीब थी। वह बच्चों के लिए नौकर या गवर्नेस नहीं रख सकती थी।। इसी वजह से मेरे अंदर एक सहजता है, ज़िंदगी को जीने की एक कुदरती उमंग है, जिसे मैंने कभी नहीं खोया।” बीसवीं शताब्दी के आरंभ में इज़ाडोरा का इस तरह से ज़िंदगी के प्रति मुखर होना सचमुच आकर्षित करता है।

स्कूली जीवन, गरीबी और खुद का नृत्य स्कूल 
वे स्कूल में भी इस कदर पेश आती थी कि परंपरा में ढली टीचर की निगाह में वे चुभ जाया करती थीं। आत्मकथा में वे लिखती हैं कि एक बार टीचर ने अपनी जिंदगी का इतिहास लिखकर लाने को कहा। अपने दिये जवाब में वे कहती हैं- “जब मैं पाँच वर्ष की थी तब तो तेइसवीं गली में हमारा एक कॉटेज था। पर किराया न दे पाने के कारण हम वहाँ नहीं रह सके और सत्रहवीं गली में चले गए। पर पैसों की तंगी के कारण जल्दी ही मकान मालिक यहाँ भी तंग करने लगा और हम बाइसवीं गली में शिफ्ट हो गए। वहाँ भी शांति से नहीं रह सके और वहाँ से भी खाली करके दसवीं गली में जाना पड़ा। इतिहास इसी तरह चलता रहा और हम लोगों ने जाने कितनी बार घर बदले।” टीचर ने जब यह सुना तो वह गुस्से से लाल हो गई और नन्ही इज़ादोरा को प्रिन्सिपल के पास भेज दिया गया। प्रिन्सिपल ने माँ को बुलाया। जब माँ ने यह देखा तो वह खूब रोने लगीं और कसम खाकर कहा कि यह सच है।

सभी बच्चों के लिए टीचर की एनक में एक ही फ्रेम है। एक ही साँचे में ढालने की कोशिश। आज भी यही शिक्षा है। टीचर को किसी भी विद्यार्थी की स्वतंत्र स्वतन्त्रता को सम्मान देते बहुत हद तक नहीं देखा गया। उसकी मूल दिलचस्पी या चाहत की समझ बहुत से कम शिक्षकोंको हो पाती है। यह स्कूली शिक्षा की एक कड़वी सच्चाई भी है। इसलिए जब इज़ाडोरा का स्कूल चल पड़ा तब उन्होंने इस पढ़ाई को नकार दिया। पर व्यक्तिगत रूप से परिवार के अन्य लोगों के साथ उन्होंने जगह-जगह की लाइब्रेरी में बहुत सा समय बिताया।
बेहद कम उम्र से आसपड़ोस के बच्चों को इज़ाडोरा ने नृत्य सिखाने की शुरुआत की और लगभग दस वर्ष की होते होते उन्हों ने एक बढ़िया नृत्य प्रशिक्षण स्कूल खोल लिया। इसकी मूल प्रेरणा उनकी माँ रहीं जो नृत्य और संगीत की गहराई से समझ रखती थीं। उन्हों ने अपने बच्चों में भी उसका पर्याप्त प्रवाह किया।

इज़ाडोरा और आधुनिक नृत्य 
इज़ाडोरा दो शताब्दियों के बीच के बिन्दु पर विख्यात रहीं। इस प्रसिद्धि की मूल वजह उनका आधुनिक नृत्य था। कहना न होगा कि उन्होंने नितांत अपनी शैली विकसित की बल्कि उसे नए आयामों तक भी पहुंचाया। इसी शैली ने उन्हें यूरोप और अमरीका में विख्यात कर दिया। उनके लिए लोग दीवाने हो जाया करते थे। उनके नृत्य के बाद लोग घंटों सम्मोहन में रहते थे। इंग्लंड के मशहूर नृत्य समीक्षक रिचर्ड ऑस्टिन के मुताबिक- “एक तरह से वह एक ऐसी नृत्यांगना थी जो किसी शास्त्रीय अध्ययन और प्रशिक्षण की देन होने की बजाय विशुद्ध प्रकृति की पैदाइश थी।” खुद इज़ादोरा आत्मकथा में यह कहती भी हैं कि उनका बचपन संगीत और काव्य से भरा था। इसका स्रोत उनकी माँ थी जो पियानो पर संगीत बजाने में इतनी खो जाती थी कि कई बार रात से सुबह हो जाया करती थी।

इज़ाडोरा ‘माय लाइफ’ में कई जगह अपनी कला यानि नृत्य से जुड़े अपने विचार रखती हैं। वे कई घंटों तक आत्म केन्द्रित होकर उस आयाम को खोजती रही थीं जो मनुष्य की सर्वोच्च आकांक्षाओं को अभिव्यक्त कर सके। उन्हों ने गति के उस सिद्धान्त की खोज की जो मन, मस्तिष्क और संवेगों से जुड़ा हुआ था। वे कहती हैं- “… मन की, आत्मा की वह जागृति चाहिए जिसके द्वारा हम अपने शरीर के सभी संवेगों को और अपने अंगों की सभी क्रियाओं को महसूस कर सकें। एक तरह से मन, शरीर औए मस्तिष्क का पूरा तालमेल।” एक जगह इज़ाडोरा ‘प्रिमाविरा’ पेंटिंग से प्रभावित होकर अपने ‘डांस ऑफ फ्यूचर’ की ईजाद भी करती हैं। इसमें इस नृत्य के माध्यम से ज़िंदगी की भव्यता और उसके चरम आनंद का संदेश देना उनका लक्ष्य था।

ऐसे ढेरों उदाहरण उनकी आत्मकथा में भरे पड़े हैं जहां वे अपनी कला के प्रति पूरी तरह से समर्पित और आत्मा से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। खुली खर्ची और स्कूल को बनाए रखने के कारण उन्हें हर जगह अपने नृत्य कार्यक्रम पेश करने होते थे। पूरी आत्मकथा में कहीं भी वे यह नहीं कहती कि इस ज़िंदगी से वे ऊब गई हैं। बल्कि ज़िंदगी से मिले दुखों में वे हमेशा नृत्य की ओर मुड़ती हैं।

इज़ाडोरा के विवाह को लेकर विचार
जरा सोचिए कि आज के समय में हमारे समाज में उन लड़कियों या औरतों को लेकरहम क्या सोच बनाते हैं जिनके बिना विवाह के बच्चे हो जाते हैं। आज के दौर में तो फिर भी एक समझ धीरे धीरे विकसित हो रही है। पर नीना गुप्ता (अभिनेत्री) ने जब बिना विवाह अपनी बेटी को जन्म दिया तब उन्हें क्या क्या सुनना पड़ा था। अपने कई इंटरव्यूज़ में वे बार बार इसका ज़िक्र भी करती हैं। आज भी यदि कोई महिला पिता के नाम के बिना अपने बच्चे का स्कूल में दाखिला करवाने जाती है तब कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कितने ही गलत विचारों और मानसिकता से टकराना पड़ता है।

इज़ाडोरा ने बचपन से अपनी माँ की दुखद और दयनीय स्थिति देखी थी। इसलिए वे शादी जैसी संस्था को कड़े/आलोचनात्मक नज़रिये से देखती थीं। वे स्वतंत्र मस्तिष्क वाली स्त्री की बात करती हैं। ‘माय लाइफ’ में वे लिखती भी हैं- “आज से बीस वर्ष पहले (1905 में) जब मैंने विवाह करने से इंकार किया और बिना विवाह के बच्चे पैदा करने के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए दिखाया तब अच्छा-खासा हँगामा हुआ था।” उनके मुताबिक,“विवाह संस्था की नियम संहिता को निभा पाना किसी भी स्वतंत्र दिमाग की स्त्री के लिए संभव नहीं है।”

इतना ही नहीं वे समाज और परिवार के संकुचित विचारों को भी निशाना बनाती हैं। उनकी मौसीऑगस्टा के जीवन की बरबादी वे परिवार के संकुचित विचारों के कारण ही मानती हैं। मौसी को नृत्य-नाटिकाएँ करने का शौक था। वह थिएटर में काम को लेकर उत्साहितरहती थीं। पर उनके नाना नानी को यह पसंद नहीं था। मौसी की कलात्मक प्रतिभा के खत्म होने को इज़ाडोरा इसी संकुचित सोच को मानती हैं। अपनी मृत्यु के कुछ वर्षों पहले जब वे रूसी नौजवान कवि से विवाह भी करती हैं तब उसके पीछे की वजहों को जानकार पता चलता है कि उनके मन में विवाह के प्रति विचारों में कोई खास अंतर नहीं आया था।

इज़ाडोरा और उनके अन्य भाई-बहन ने अपनी भावनाएँ और कला को दबाने के बजाय उसे निखारा और ताउम्र उसके प्रति समर्पित भी रहे। अपनी कला और उसको और ऊंचाई तक ले जाने के लिए वे लगभग योरोप भ्रमण से लेकर रूस तक घूमे। अपने संघर्ष के दिनों में वे शिकागो, न्यूयॉर्क और लंदन तक ठोकरे खाते रहे।इस दरमियान वे कई बार भूखे रहे तो कई बार बिना छत के इधर उधर भटकते रहे।

इज़ाडोरा, प्रेम और प्रेमी
इज़ाडोरा की आलोचना का एक कारण उनके और कई पुरुषों के बीच के संबंध भी रहे। उनकी ज़िंदगी में कई पुरुष आए और गए। उनका पहला प्रेम का भाव पोलिश चित्रकार इवान मिरोस्की के लिए था। वह उम्र में काफी बड़ा था और इज़ाडोरा बेहद कम उम्र की थीं। लेकिन यह प्रेम प्रसंग आगे न बढ़ पाया क्योंकि इज़ाडोरा को कुछ बनने के जुनून ने कला की कदर के लिए दूसरे शहर में जाने को मजबूर कर दिया। बाद में उनके भाई ने जब इस चित्रकार के बारे में छानबीन की तो पाया कि यह पहले से शादीशुदा है। इसके बाद हंगेरियन अभिनेता ऑस्कर बरजी से उनके प्रेम संबंध रहे। इतिहासविद् हेनरीख थोड से भी गहराई में प्रभावित हुई और आध्यात्मिक प्रेम के पक्ष को भी जाना। मंच सज्जाकार गार्डन क्रेग से प्रेम संबंध काफी सुखद रहे और इन्हीं से सन् 1905 में अपनी पहली संतान द्रेद्रे को जन्म दिया।

गार्डन क्रेग का साथ लंबा चला. पर उसके साथ रहने के लिए इज़ाडोरा को तालमेल बिठाना पड़ा। ‘माय लाइफ’ में वह एक जगह जिक्र करती हैं- “यह मेरी नियति थी कि मैं इस जीनियस के महान प्रेम को प्रेरित करूँ और यह भी मेरी नियति थी कि उसके प्रेम के साथ अपने करियर का तालमेल बिठाने का अथक प्रयत्न करूँ।” क्रेग कई बार इज़ाडोरा को अपने काम और कला को छोड़ने की बात कहता था। उसकी सलाह थी कि घर पर रह कर वह उसकी पेंसिलों की नोकें तैयार करे। यही वजह भी रहे कि उनके सम्बन्धों में खटास भी मिलती चली गई।
एक बड़े नृत्य स्कूल खोलने के सपने ने उन्हें सिंगर मशीन कंपनी के वारिस पेरिस सिंगर से मिलाया। सिंगर के साथ इज़ाडोरा ने अपने चरम पर जाकर एश्वर्य का जीवन जिया और इन्हीं से सन् 1911 में एक बच्चे पेट्रिक को भी जन्म दिया। सिंगर से हुए मन मुटाव के बाद भी कई लोग आए और गए। पर इज़ाडोरा इनसब के साथ अपने नृत्य और स्कूल को कभी नहीं भूलीं। नृत्य उनके लिए जीवन था।

इस सब प्रेम सम्बन्धों के चलते उन्हें बहुत कुछ सहना भी पड़ा। लेकिन उन्हों ने इसकी ज़्यादा परवाह नहीं की और अपने काम में लगी रहीं। एक आकस्मिक दुर्घटना में उनके दोनों बच्चों के डूब के मर जाने का सदमा उनके साथ ताउम्र रहा और वह इस सदमे से कभी भी उबर नहीं पाईं। यह समय 1913 का था। इस बीच वह तमाम जगह राहत पाने के लिए भटकती रहीं। वे एक बार फिर गर्भवती हुईं पर यह तीसरा बच्चा भी जल्दी ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। इसके बाद मानसिक रूप से वह बहुत टूट चुकी थीं। मरने के खयाल तक ने उनके दिमाग में दस्तक दे थी। पर फिर भी वे वापसी करती हैं। यही वजह है कि इज़ाडोरा मामूली चरित्र बनकर नहीं रह जातीं।
हालातों से टकराते हुए वे रूस से आए न्योते को स्वीकार करती हैं और वहीं के एक युवा कवि से सन् 1922 में विवाह भी करती हैं। यह चौंका देने वाली घटना थी। लेकिन इसके पीछे की पृष्ठभूमि को समझना होगा। उनकी एक प्रिय शिष्या इस बारे में अहम जानकारी देती है। 1922 को इज़ाडोरा की माँ का निधन अमरीका में होता है। इसके साथ ही उन्हें रूस में स्कूल चलाने की दिक्कतें और रुपयों की कमी ने आ घेरा था। इसके अलावा सेर्जी एसेनिन जो उनका युवा पति था, काफी बीमार रहने लगा था। इसलिए उसे एक बेहतर इलाज़ और अमरीका और यूरोप की यात्रा के जरिये रचनात्मकता का बेहतर माहौल देना चाहती थीं। बिना विवाह के पासपोर्ट या यात्रा मुश्किल थी। अत: उन्हों ने मई में इस युवा कम उम्र कवि से विवाह कर लिया। एक वजह यह भी थी वे इस व्यक्ति में अपने बेटे का चेहरा भी पाती थीं और मोहित भी थीं।

इस विवरण से स्त्री पुरुष सम्बन्धों की झलक भी मिलती है। उनके आलोचक उनके वफादार न होने का उन पर इल्ज़ाम लगते हैं। पर वहीं पुरुषों को इस तरह की आलोचनात्मकता का सामना नहीं करना पड़ता। उनकी आत्मकथा के हिन्दी अनुवादक युगांक धीर लिखते भी हैं कि इज़ाडोरा अपने समय से काफी आगे थीं। अनुवादक की ओर से लिखे नोट में वे लिखते हैं“…एक सहज स्वाभाविक स्वतंत्र स्त्रीत्व की तलाश। एक ऐसी स्वतन्त्रता जिसका अर्थ सिर्फ ‘पुरुषों से मुक़ाबला’नहीं—‘स्त्रीत्व को त्यागकर ‘पुरुषत्व’ अपना लेना नहीं—बल्कि एक स्त्री के रूप में जीते हुए, अपने स्त्रीत्व का पूरा आनंद उठाते हुए,‘प्रेमत्व’ और ‘मातृत्व’ दोनों का सुख भोगते हुए, अपनी क्षमताओं और प्रतिभाओं की, अपनी आकांक्षाओं और अपने सपनों की असीम संभावनाएँ तलाशना।” इज़ाडोरा कुल मिलाकर यही चरित्र थीं।

लेखिका के रूप में इज़ाडोरा 
इजाडोरा एक प्रतिभा थीं। अपने संघर्ष के दिनों में वे जितना ज़िंदगी में ऊपर उठीं उतना ही कला के उच्चतम मुकाम पर भी पहुंचीं। उनकी आत्मकथा में जगह जगह महान कवियों, नाटककारों, संगीतज्ञों, पेंटरों, नृत्यांगनाओं, मूर्तिकारों, दार्शनिकों आदि का ज़िक्र किया गया है। ज्यां ज़ाक रूसो,व्हीटमन, बिदोवन और नीत्शे को महान पाया है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि उनको लगभग कला और कला से इतर क्षेत्रों की बहुत बेहतर जानकारी थी। वह कई बार लंदन की लाइब्रेरी में कई दिनों तक बैठकर पढ़ने का जिक्र भी करती हैं।यह पढ़ना और जीवन के अनुभव मिलाकर ‘माय लाइफ’ जैसी आत्मकथा का रूप लेते हैं। यह भी खास बात है कि इस किताब में उनकी नृत्य के प्रति एक तरह की आस्था, ललक, जुड़ाव, सम्मोहन, नृत्य के नए प्रयोग एक आत्मिक धारा है जो पूरी किताब में बह रही है। इसलिए जब पाठक इस किताब को पढ़ने के लिए उठाकर उसे वापस नहीं रखा जा सकता। किताब में एक लय है जो बाँधें रखती है। दिलचस्प वर्णन हैं जो कभी चौंकाते हैं तो कभी ऐसे भाव हैं जो रुला भी देते हैं।

इज़ाडोरा और हम  
हम औरतों का इतिहास खाली डिब्बा नहीं है। इतिहास में बहुत सी औरतें ऐसी हैं जिन्हों ने इतिहास में हम औरतों को खाली होने भी नहीं दिया है। इज़ाडोरा उनमें से एक हैं। वह एक कलाकार थी। दुनिया को खोजने और जाने वाली यात्री थीं। लेखक थीं। घंटों लाइब्ररी में पढ़ने में समय बिता देने वाली पक्की पाठिका थीं। नृत्य स्कूल खोलने वाली महान नृत्यांगना थीं। कला और जीवन में आत्मा को जानने और समझने वाली प्रबुद्ध औरत थीं। अपने जीवन को अपने शर्तों पर जीने वाली साहसी औरत थीं। अपने विचार खुलकर रख देने वाली विचारक थीं। इतना ही नहीं प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका को देखने के बाद उन्होंने भरसक मानवता की सेवा करने की कोशिश की। वह ऐसी महिला थी जिसने उन्माद का आनंद भी भोगा और असमय मृत्यु का शिकार हुए अपने तीनों बच्चों का सदमा भी झेला। फिर भी जीने की जिजीविषा बनाए रखी। ऐसे महान चरित्रों का हाथ थामकर समाज और समय में घूम लेना चाहिए। कहीं न कहीं से हौंसला बना रहेगा।
बहुत ही कम उम्र में एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई थी। लेकिन अपने पीछे एक पूरी विरासत छोडकर गई हैं, जो बेहद अहम है। उनके ही शब्दों में इस लेख को पूरा करना ठीक रहेगा- “मैं जीवन में विश्वास करती हूँ, प्रेम में और प्रकृति के नियमों की महानता में!” यह सूत्र वाक्य हम पर लागू हो सकता है।

पढ़ें: एक बार फिर नाचो न इज़ाडोरा

(यह लेख इज़ाडोरा की आत्मकथा‘माय लाइफ’ के हिन्दी अनुवाद ‘इज़ाडोरा की प्रेमकथा’ पढ़कर लिखा गया है। उसी किताब से उद्धरण लिए गए हैं। किताब के अनुवादक, युगांक धीर हैं और प्रकाशक, संवाद प्रकाशन(2002) है।)

तस्वीरें गूगल से साभार
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इन बिटवीन द एलिमेण्ट्स ऑफ़ पेण्टिंग, द बॉडी एंड द स्पेस (जयपुर में नवीन कलात्मक आगाज)

कृष्णा महावर


सहायक प्रवक्ता, चित्रकला, राजस्थान विश्वविद्यालय संपर्क:krish_mahawer@yahoo.co.in

 पिछले दिनों  राजस्थान ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित 20वें कला मेले में कई नवीन व मौलिक कलात्मक कार्यों का प्रदर्शन हुआ। ‘‘इन बिटवीन द एलिमेण्ट्स ऑफ पेण्टिंग, द बॉडी एण्ड द स्पेस‘‘ शीर्षक से मेर द्वारा परिकल्पित आर्ट पर्फोमेन्स भी हुआ। यह परफ़ॉर्मेंस कई विषयों व पक्षों को छूती है। यह आर्ट पर्फोमेन्स कला शिक्षा व कला दोनों के जुड़ाव के साथ नवीन कलात्मक पहलुओं का एक नवीन आगाज उजागर करती है। जिसमें कला की प्रकृति पर भी सवाल उठाया गया है, साथ ही कला की शिक्षा में किताबी पढ़ाई पर भी प्रश्न खड़े किये गये।

कला शिक्षिका होने के नाते मेरी सर्वप्रथम प्राथमिकता विद्यार्थी ही होते है और उन्हें एक खुला और स्वतंत्र माहौल देने के लिये कई बार मुझे सिस्टम से बाहर भी आना पड़ता है। मैं बहुत गहराई से सोचती हूँ कि आर्ट थ्योरि को भी विजुअल तरीके से पढ़ाया जाना चाहिये। इस आर्ट के लिये मेरी पहली पसंद विद्यार्थी ही थे ताकि उनका सीधा संबंध स्थापित हो सके। आरम्भिक रूप में यह क्लासरूम का हिस्सा था बाद में एक आर्ट वर्क के रूप में विकसित हो गया। इस परफ़ॉर्मेंस में साउण्ड व म्यूजिक ने भी बहुत असर छोड़ा है।

वास्तव में परफ़ॉर्मेंस आर्ट की उत्पत्ति ही, कला की सीमाओं को तोड़ने व कला बाजार को खत्म करके तथा कला को मात्र वस्तु मानने जैसी अवधारणाओं के विरोध स्वरूप होती है। जहाँ पारम्परिक कलाओं (चित्रकला व मूर्तिकला) में दर्शक के पास मात्र देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं रह जाता व कलाकार बेहद एकांतिक माहौल में सृजन करता है। इसके विपरीत आज के उत्तर आधुनिक समय में जिन नवीन कलाओं ने जन्म लिया उनमें इन्स्टोलेशन आर्ट, साइट स्पेसिफिक आर्ट, डिजिटल आर्ट, लैण्ड आर्ट, पर्फोमेन्स आर्ट है। ये सभी क्षणिक प्रकृति की है अतः अन्तिम वस्तु के रूप में मात्र डाक्युमेण्टेशन ही उपस्थित रहता है। इन तमाम कलाओं में दर्शकों की भागीदारी अतिमहत्वपूर्ण होती है।

परफ़ॉर्मेंस कला की प्रकृति प्रत्ययवादी (कान्सेप्चुअल) है तथा उच्च स्तरीय दार्शनिक भी होती है। पर्फोमेन्स कला में कलाकार की सशरीर उपस्थिति व उसका दर्शक के साथ संबंध अतिआवष्यक माना जाता है। व किसी विशिष्ट स्थान व समय की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इसी क्रम में उक्त आर्ट पर्फोमेन्स में सभी कलाकार स्नातक व स्नातकोत्तर के विद्यार्थी ही थे। और कला के तत्वों- रेखा, रूप, रंग, तान, पोत अन्तराल आदि को मूल विषय या विचार बनाकर मानवीय शरीरों द्वारा एक अमूर्त व नॉन लिनियर परफोर्मेंस की गई इसके प्रथम दृश्य में विद्यार्थी अपने दायें हाथ पर ब्रश बांधे व बांये हाथ में ‘‘फण्डामेण्टल ऑफ़ विजुअल आर्ट‘‘ नामक काल्पनिक पुस्तक पकड़े हुये दर्शकों के समक्ष उपस्थित होते हैं। वे सभी बैठ जाते है, लेट जाते है और पुस्तक में एकाग्रता तथा ब्रश वाले हाथ को कई बार ऊपर नीचे होना कई प्रश्न पैदा करते हैं। यकायक सभी पुस्तकों के पृष्ठों को खीज वाली स्थिति में आकर फाडना आरम्भ करते है और देखते ही देखते वहाँ कागजों का ढेर लग जाता है। मैंने पुस्तकीय ज्ञान की कला क्षेत्र में अपर्याप्तता पर सवाल खड़ा कया है और आज की कला शिक्षा प्रद्धति को भी निशाना बनाया है।

आगे के दृश्य में स्वयं कलाकार अपने कमर पर बहुत सी रस्सियाँ बांधे हुए झुककर मुंह से ब्रश पकड़े अमूर्त आकृतियाँ उकेरती है। इसी प्रकार आगामी दृश्य में एक विद्यार्थी एक मोटी रस्सी के साथ कई-कई बार गुत्थमगुत्था होता दिखाई देता है वह रस्सी के फर्श पर ऊलट पुलट कर कुछ खोजता, कुछ सोचता, कभी उछालता, कभी लपेटता है और कुछ अमूर्त पंक्तियाँ भी बुदबुदाता है:- ‘‘वो वहाँ लटकती रेखा, क्या कहना था उसे, उसका कोई प्रेम, प्रिय रूपाकार, अटका गया उसे, वो वहाँ लटकती रही, लटकती रही, लटकती रही।‘
इसी प्रकार एक दृश्य में चार छात्राएं एक पेन्सिल को लेकर व कुर्सी पर बैठकर विभिन्न मुद्राऐं बनाती है। वे सिर पर स्केच फाइल को रखकर प्रवेश करती है व पेन्सिल को कभी कानों में फंसाती है, कभी मुंह में लेती है और सामने की ओर एकाग्र, एकटक देखती रहती है। शायद कुछ अवलोकन कर रही है या विषय की तलाश में है जिसे अपनी स्केच फाइल में उकेर सकें। इसी क्रम में आगे एकदम से बहुत सारे (सारे ही) कलाकार, विद्यार्थी, अलग-अलग दिशा में मुंह किये खड़े हो जाते हैं और कला की परिभाषाऐं ऊंचे स्वर में बोलने लगते है जैसे आर्ट इज लाइफ, सत्यम् शिवम सुन्दरम, कला मानव की सहज अभिव्यक्ति है, कला मन के भावों का प्रदर्शन है आदि और इस अन्तराल को बीच-बीच में एक प्रश्न तोड़ता है कि व्हाइट इज आर्ट? व्हेयर इज आर्ट? व्हाई इज आर्ट?। यह दृश्य तमाम कलात्मक परिभाषाओं पर आक्रामक तरीके से वार करता है कि अन्तिम रूप में कला है क्या? आखिर कला का उद्देश्य क्या है? व किसे कला माना जाये?

यह आर्ट परफ़ॉर्मेंस उस समय चरम पर होती है जब रिक्त स्थान पर दो छात्रायें आकर रंगीन मिट्टी को फैलाने लगती हैं। माहौल में कुछ धुल सा उड़ता है दर्शकों पर भी जाता है। परन्तु तुरंत ही अन्य कलाकार वहाँ आकर आपकी अंगुलियाँ व पैरों से कुछ रेखायें खिचने से दिखाई देने लगते हैं। यह दृश्य बहुत गंभीर प्रस्तुति देता है। इसी प्रकार एक बार तो रंगीन फर्श भी आ जाता है। पूरी परफ़ॉर्मेंस में फर्श भी तीन चार बार अपना रंग बदलता है। रंगत व टेक्स्चर को प्रदर्शित करते विद्यार्थी जमीन पर लेटकर फर्श को हाथों से अनियमित अन्तराल में छूते हैं व महसूस करते है तभी एक लड़की हाथों में कांच का गिलास, एक अन्य लड़की प्लास्टिक की बोतल व तीसरी लकड़ी को हाथों में लेकर उन्हें सहलाती हुई अन्तराल पर विचरण करती रहती है। मैंने रंगो व पोत को इस तरह से दृश्यमान होते देखा है। इस परफ़ॉर्मेंस की परिकल्पना मैंने जिस भी विचार से की हो परन्तु यह दर्शकों पर नवीन आयामों को उजागर करती अभिव्यक्त होती है। एक ऐसा सैद्धान्तिक विषय जो कक्षाओं में पढ़ाने का है अधिक से अधिक विषय से संबंधित चित्रों को स्लाइड या स्क्रीन पर पढ़ाया जा सकता है। ऐसे ही विषय को कक्षा से बाहर निकाल कर एक पर्फामेन्स द्वारा अभिव्यक्त करना वाकई एक नये विचार का आगाज है। एक विचार, एक कान्सेप्ट होते हुये भी गूढ़ अर्थों में कला शिक्षा के इर्द गिर्द के कई गंभीर मुद्दों को भी परोक्ष रूप में उकेरा गया है। कलात्मकता है। परन्तु माध्यम अलग है। अभिव्यक्ति है परन्तु न कोई रंग, न रेखा, न कैनवास, फिर भी कलाकारों द्वारा अपने शारीरिक मूवमेंट्स तथा हलचलों द्वारा विचार का     एक अमूर्त संप्रेषण किया गया।

यूं तो परफार्मेंस कला, सामाजिक, राजनीतिक, लिंग भेद, समकालीन मुद्दों का संप्रेषण व अभिव्यक्ति स्पष्ट तरीकों से करती है। उसी कला को मैंने अपनी शैक्षणिक पद्धति में समाहित किया और एक कला कार्य के रूप में तैयार कर कला छात्रों व कलाकारों से एक साथ संवाद स्थापित किया। अमूर्त-मूर्त, सृजन-विध्वंस, विश्वास, पॉजिटिव-नेगेटिव के इर्द गिर्द यह पर्फोमेन्स रचित हुआ दिखाई देता है। यह  परफार्मेंस पूरी तरह से बॉडी द्वारा सेल्फ एक्सप्लोरेशन की और एक कदम है, जिसका मूल विचार तो चित्र के छः तत्व हैं, परन्तु प्रक्रिया के दौरान कई बार उस विचार से आगे व परे की यात्रा भी हो जाती है। जो किसी भी सृजन प्रक्रिया में जायज भी है। एक रेखा किस प्रकार अपनी भौतिक सत्ता रखती है। या रंगों और टेक्स्चर की मुठभेड़ जब शरीरों से होने लगे तो क्या कुछ नई संभवनाऐं निकल कर आती हैं। रिक्त स्थल की उर्जा को परोक्ष रूप में स्वयं कलाकार और साथ ही दर्शक भी एक साथ महसूस करने लगते हैं।

परफार्मेंस कला ललित कला की ही एक नवीन कला शैली है और मरीना एबोमोविक को परफार्मेंस कला की ‘ग्रैंडमदर‘ माना जाता है। इसका नाटक या थियेटर से कोई संबंध नहीं होता। बल्कि कलाकार स्वतंत्र रूप में एक विचार को ही आगे बढ़ाता है मात्र  शरीर द्वारा। वह अन्य कलाओं से प्रेरणा ले सकता है। इसमें किसी स्क्रिप्ट या कथा की आवश्यकता नहीं होती। यह पूरी तरह कलाकार स्वयं ही निर्धारित करता है कि उसे क्या चाहिये और कैसे प्रस्तुत होना है। साउण्ड, वस्तुयें, कपड़े आदि हो भी सकते हैं, नहीं भी। कुल मिलाकर इस नवीन कला का प्रदर्शन जयपुर शहर में बहुत शानदार तरीके से हुआ। यह मेरा दूसरा परफार्मेंस था। इससे पूर्व भी  मैं अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर 24×7 शीर्षक से परफॉर्म कर चुकी हूँ। मुझे चित्रकला बहुत ही अपर्याप्त माध्यम प्रतीत होता है। परफार्मेंस कला में कहने के लिए बहुत कुछ है और बात बहुत ही सीधे तरीके से दर्शकों व समाज तक तुरंत ही पहुंचती है। इस परफार्मेंस के साथ राजस्थान में मुझे बहुत सी संभावनाएँ प्रतीत हो रही हैं।

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मुश्किल डगर को आसान बनाया दलित महिला उद्यमी कृष्णा कुमारी ने

राजीव सुमन


साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली दलित महिला उद्यमी की कहानी कह रहे हैं राजीव सुमन. डिक्की (दलित इन्डियन चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) की सदस्य कृष्णा कुमारी यद्यपि दलित शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन अभी तक हम पैंथर आंदोलन से जुड़ी दलित शब्द की ऐतिहासिकता, निहित आक्रामकता, गौरव बोध  और राजनीतिक बयान के कारण इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं.

यह कहानी एक ऐसी लड़की की है, जिसके गाँव में लडकियां प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा के बाद स्कूल की पढाई आगे नहीं कर पाती थीं. वह पहली लड़की थी जिसने दसवीं की पढाई पूरी की. 12वीं की पढाई पूरी करने के बाद उसके साथ भी वही हुआ, जो पितृसत्तात्मक जकडन में फंसी लडकी के साथ होता है-शादी, और उसके बाद पढाई का छूटना. यही हाल इस लडकी यानी, कृष्णा कुमारी के साथ भी हुआ- 20 सालों बाद वह स्नातक की अपनी पढाई पूरी कर सकी, घर गृहस्थी में फंसकर.

पति गोविन्द राम, इस मामले में सहयोगी सिद्ध हुए कि वह आगे अपनी मंजिल बनाने के लिए निकल पड़ी. कृष्णा और उनकी बेटी दिव्या, दोनो ने, लगभग  एक साथ स्नातक की परीक्षा दी, यानी बेटी एक साल बाद के बैच में थी.  उसके बाद उन्होंने 2012 में फैशन डिजायनिंग का कोर्स किया. यह सब उन्होंने पीछे मुड़कर देखने के लिए किया नहीं था , इसलिए आज वह कृष्णा क्रिएशन्स नाम से कुशन और बेडशीट का कारोबार कर रही हैं- एक उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बनाकर अपने साथ कुछ और महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं.

कृष्णा कुमारी

कृष्णा का जन्म हरियाणा के पलवल जिले के एक गाँव रायदसका में हुआ था. माता-पिता रामश्री और ग्यासी राम की छः संतानों में से एक कृष्णा ने 1991 में 10वीं की परीक्षा पास कर गाँव की अन्य लड़कियों के लिए निर्धारित शिक्षा की सीमा को तोड़ा. गाँव में माध्यमिक से आगे का स्कूल न होने के कारण दूर जाना पड़ता था, उन्होंने माता-पिता से सायकिल खरीदवाई और पढाई की मंजिल पर बढीं.

उन्होंने बताया कि पहली बार जब मैं अपने पति (वित्त मंत्रालय में अंडर सेक्रेट्री पद पर कार्यरत) के साथ एक मॉल में घूमने गयी, वहीं डिजायनर बेडशीट देखकर इसी दिशा में बढ़ने का मन बनाया. उन्होंने उसके बाद कुछ कुशन डिजायन किये, जिसे जब लोगों से प्रशंसा मिली तो एक कारोबारी के रूप में आगे बढ़ने का मन बनाया. शुरुआती पूंजी के लिए उन्होंने एनआईटी-4 के कम्युनिटी सेंटर में नौकरी की और पूंजी जमा की.

बाजार के बारे में वे बताती हैं कि अब तो वे ऑनलाइन मार्केटिंग भी कर रही हैं, इसके पहले दिल्ली हाट या सूरजकुंड मेला, प्रगति मैदान के ट्रेड फेयर अथवा मुम्बई ट्रेड फेयर जैसी जगहों पर अपने उत्पाद बेचती रही हैं. इन दिनों एक्सपोर्ट की प्रक्रिया की ओर कदम बढ़ा रही हैं.

कृष्णा क्रिएशन का उत्पाद

कृष्णा कहती हैं कि ‘महिलाओं को पर्दे से मुक्त होना चाहिए, पर्दा प्रथा का खात्मा जरूरी है.’ इसके बाद वे हर महिला को पढने का आह्वान करती हैं. कहती हैं ‘कभी देर नहीं होती. पढाई कभी भी शुरू की जा सकती है और यदि आर्थिक आत्मनिर्भरता भी हो जाये तब तो उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए सबसे बढिया है.’ बताती हैं कि शादी के बाद ससुराल पक्ष पढाई करने देने का समर्थक नहीं था, खासकर सास, बाद में मेरी पढने की इच्छा का सम्मान मेरे पति गोविन्द राम जी ने किया.’  डिक्की (दलित इन्डियन चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) की सदस्य कृष्णा कुमारी यद्यपि दलित शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं हैं, वे कहती हैं कि ‘हमसब खुद को अम्बेडकरवादी कहें तो बढिया है.’ उनका संकल्प है कि जल्द ही वे हरियाणा और राजस्थान में पर्दा से मुक्ति अभियान की शुरुआत करेंगी.

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राष्ट्रपति के कार्यक्षेत्र में मोदी-सरकार का हस्तक्षेप, बिना सहमति के जारी किया अध्यादेश

स्त्रीकाल डेस्क 


क्या केंद्र सरकार सारी संवैधानिक संस्थाओं  को नष्ट करने की मुहीम पर है या सरकार के मुखिया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,  स्वयं को ही सरकार और संविधान दोनो समझते हैं? यह सवाल उठ रहा है सरकार द्वारा हाल में जारी अध्यादेश पर, जिसमें बलात्कार को लेकर फांसी की सजा का प्रावधान किया गया है. सरकार और शासक पार्टी भाजपा वैसे भी सवालों के घेरे में है कि एक ओर कठुआ बलात्कार के मामले में बलात्कारियों के पक्ष में सड़क पर उतरे भाजपा विधायकों पर पार्टी कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, कर्नाटक विधान सभा में पोर्न देखने वाले अपने नेताओं को टिकट दे रही है, उन्नाव बलात्कार मामले में गिरफ्तार भाजपा विधायक को निलंबित तक नहीं कर रही है, वहीं दूसरी ओर जनाक्रोश को देखते हए अध्यादेश लेकर आ रही है, जिसकी संवैधानिक वैधता पर ही सवाल उठ रहे हैं.

अध्यादेश की वैधता पर सबसे पहले सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और महिला कानूनविद अरविंद जैन ने अपने फेसबुक पोस्ट पर कल, 24 अप्रैल की देर शाम,   लिखा, ‘ 
 
#अध्यादेश 
बिना राष्ट्रपति की मंजूरी के अध्यादेश जारी!
 
आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 दिनांक 21अप्रैल, 2018 (शनिवार) को ही जारी हो गया। पर उल्लेखनीय है कि मंत्री मंडल की बैठक शनिवार, 21अप्रैल, 2018 को करीब 11-12 बजे हुई थी और (Hindu में छपी रिपोर्ट के अनुसार) इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हुए, रविवार, 22 अप्रैल को।
 
ऐसे में, अध्यादेश 20-21 अप्रैल, 2018 की मध्य रात्रि 00 बजे से कैसे लागू हो सकता है? आजतक नहीं देखा-सुना कि राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने से पहले ही, अध्यादेश जारी हो या कर दिया गया हो। अब इस कानून की क्या संवैधानिक वैधता होगी।

फैक्ट चेक के लिए हमने जब जारी हुआ अध्यादेश देखा तो उसमें 21 तारीख से लागू होने की बात लिखी थी। होना यह चाहिए था कि इसे कैबिनेट और राष्ट्रपति के आदेश के बाद की पहली रात, यानी  22 तारीख की रात, को 12 बजे लागू से लागू होना चाहिए था।

खबर है कि इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कुछ लोग हाई कोर्ट जाने वाले हैं ताकि इसे ठीक तरीके से लागू किया जा सके और अपराधियों को सजा सुनाते वक्त इसकी संवैधानिक वैधता को  आरोपियों का पक्ष चुनौती न दे  पाये. साथ ही हाई कोर्ट से यह अपील भी की जाने वाली है कि सरकार संवैधानिक नियमों और संस्थाओं को खत्म न करे यह सुनिश्चित हो.

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