आलोक धन्वा, ध्रुव गुप्त, निवेदिता समेत अधिकांश साहित्यकारों ने किया ‘बिहार संवादी’ (दैनिक जागरण द्वारा आयोजित) का बहिष्कार


सुशील मानव

दैनिक जागरण ने प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता का बेहद ही अश्लील नमूना पेश करते हुए अपनी कल के चंड़ीगढ़,पटना,दिल्ली,लखनऊ, जम्मू संस्करणों में छापे गए आधारहीन मिथ्या खबर को आज फिर से  इलाहाबाद, कानपुर वाराणसी समेत कई संस्करणों में उसी बर्बरता और निर्लज्जता के साथ उसी निर्णयात्मक शैली में  कल की हेडिंग के साथ दोहराया है।

दैनिक जागरण की प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता के विरोध में आलोक धन्वा समेत तमाम साहित्यकारों ने उसके इस कुकृत्य की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हुए आज से शुरू हो रहे “बिहार संवादी” कार्यक्रम का बहिष्कार किया है।
आलोक धन्वा ने फोन पर बताया कि सुबह से पच्चीसों लड़कियों का फोन आ चुका है। वे  सब बार-बार गुजारिश कर रहीं हैं कि दादा प्लीज आप बलात्कार को प्रमोट करनेवाले बिहार संवादी का हिस्सा मत बनिए। आलोक धन्वा आगे कहते हैं कि,“यही नन्हीं लड़कियाँ ही तो मेरा बल हैं उनके अनुनय की अनदेखी करके भले मैं कैसे किसी इसके कार्यक्रम  में शामिल हो सकता हूँ।” और आगे स्पष्ट शब्दों में आलोक धन्वा कहते हैं 'मैं दैनिक जागरण की असंवेदनशील पत्रकारिता की निंदा करते हुए बिहार संवादी का बहिष्कार करता हूँ।'



बिहार संवादी में बतौर वक्ता शामिल किये गए लेखक ध्रुव गुप्त ने बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहा- “जम्मू के कठुआ में आठ साल की एक मासूम बच्ची आसिफा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले में उपलब्ध तमाम वैज्ञानिक सबूतों, प्रमाणों और तथ्यों को झुठलाते हुए अखबार 'दैनिक जागरण' ने अपने जम्मू सहित कई संस्करणों के हैडलाइन में जो खबर लगाई है, वह यह है - 'बच्ची के साथ नहीं हुआ दुष्कर्म' ! मनगढंत तथ्यों के आधार पर बनाई गई 'जागरण' की इस खबर से देश का हर संवेदनशील व्यक्ति हैरत में है। ज्ञातव्य है कि दिल्ली की फोरेंसिक साइंस लैब ने अपनी रिपोर्ट में न सिर्फ बच्ची के साथ बलात्कार की पुष्टि की है, बल्कि यह भी स्पष्ट कहा है कि मंदिर के अंदर जो खून के जो धब्बे मिले थे वे पीड़िता के थे और वहां बालों का जो गुच्छा मिला वह एक आरोपी शुभम का था। और यह भी कि पीड़िता के गुप्तांग  और कपड़ों पर मिले खून के धब्बे उसके डीएनए प्रोफाइल से मैच करते हैं। 'जागरण' ने निष्पक्ष पत्रकारिता के मूल्यों की कीमत पर अपने ख़ास राजनीतिक एजेंडे के तहत देश में बलात्कार के पक्ष जो माहौल बनाने की कोशिश की है, उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाय कम होगी। 'जागरण' के इस अनैतिक, अमानवीय और आपराधिक चरित्र के ख़िलाफ़ मैं आज और कल पटना के तारामंडल में आयोजित बिहारियों के तथाकथित साहित्य उत्सव 'बिहार संवादी' का वहिष्कार करता हूं।”

आयोजकों की ओर से बिहार संवादी का हिस्सा बनाये गए युवा कवि राकेश रंजन जी बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहते हैं-“ कठुआ में सामूहिक बलात्कार के बाद जिस बच्ची की निर्मम हत्या हुई, उसे लेकर दैनिक जागरण की कल की रपट बेहद संवेदनहीन, दायित्वहीन तथा अनैतिक है। यह रपट नहीं, कपट है; जिस परिवार का सब कुछ लुट चुका है, उसकी बेचारगी और तकलीफ के साथ किया जानेवाला मजाक है। दैनिक जागरण की जैसी प्रवृत्ति रही है, उसके आधार पर मुझे लगता है कि ऐसा जान-बूझकर किया गया है। मैं इसका विरोध करते हुए आज से आरंभ हो रहे 'बिहार संवादी' नामक आयोजन में नहीं जा रहा।”

वहीं बिहार संवादी में शामिल एक और वक्ता साहित्यकार तारानंद वियोगी जी ने भी बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहा-“एक लेखक के रूप में 'बिहार-संवादी' में शामिल होने की सहमति मैंने दी थी। वे मुझसे सीता पर बात करनेवाले थे। मैं भी उत्साह में था कि बोलूंगा। खासकर, राम से परित्यक्त होने के बाद सीता की जो दशा थी, उनका जो भयानक जीवनसंघर्ष था, उसपर रचे मिथकों के हवाले से कुछ बात करूंगा। मिथिला में प्रचलित सीता की लोकगाथा 'लवहरि कुसहरि' को लेकर, कि कैसे उस दुखियारी औरत ने जंगल में रहकर, लकड़ी चुनकर, कंद-फल बीनकर अपने दो बालकों का प्रतिपाल किया, उन्हें लायक बनाया। ध्यान दीजिएगा, मिथिला में लोकगाथाएं बहुत हैं पर वे या तो दलितों की हैं या वंचितों की। लेकिन, सीता और उसके दो बच्चों की लोकगाथा है।
       लेकिन, मैं क्या करूं! दुनिया जानती है कि सीता का एक नाम 'मैथिली' भी है।
       और यह भी कि कठुआ की बेटी आसिफा भी एक छोटी-मोटी सीता ही थी।”

वरिष्ठ साहित्यकार कर्मेन्दु शिशिर जी बिना किसी लाग लपेट के कहते हैं कि “मेरा प्रसंग यह है कि बिना मुझसे बात किये ही उनलोगों ने नाम दे दिया था।कल शाम को पहली बार उनका फोन आया।वैसे भी मैं ऐसे आयोजनों में एकदम नहीं जाता।ऐसे में मेरे जाने का सवाल ही नहीं था।न जाने का निर्णय तो था ही। वह अखबार भी मैं नहीं लेता।कल फेसबुक पर यह प्रकरण देखा ।अब यह कि पहले से न जाने के निर्णय को मैं इस विरोध से जोड़ दूँ? यह बात लगे हाथ क्रांतिकारी बन जाने जैसा होता।न जाना था न गया, लेकिन विरोध प्रसंग में भी चुप रहा।झूठ मुझे पसंद नहीं।”



कवयित्री निवेदिता ने भी बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहा- “17 जनवरी 2018 की कठुआ बलात्कार मामले  को लेकर जागरण की ख़बर से  गहरे आक्रोश में हूँ . कल हमने जागरण के संपादक के नाम ख़त लिखा था और उम्मीद की थी की वे इन मामलों  के प्रति अपनी राय साफ करेंगे . मुझे कोई जबाब नहीं आया . और आज फिर से उसी खबर को जागरण ने छापा है . ये खबर पत्रकारिता के मूल्य को शर्मशार करते हैं . जागरण ने मुझे अपने संवादी आयोजन में आमंत्रित किया है . इस शर्मनाक खबर के बाद में अपने को इस आयोजन से अलग करती हूँ”

जबकि बिहार संवादी का हिस्सा बनी एक और महिला साहित्यकार सुजाता चौधरी ने बिहार संवादी के बहिष्कार की बात पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए नकरात्मक और निराशाजनक बातें कही - “जब पाकिस्तान से संवाद ,तो संवादी बिहार के संवाद का  विरोध क्यों?जो समाचार पत्र किसी खास दल  या सत्ता  की ठकुरसुहाती करती नजर आती है तो जनता उसे नकार देती है।मुझे लगता है किसी भी संवाद मंच पर निष्पक्ष आवाज का, नहीं जाकर चुप रहने से अच्छा है वहां जाकर अपनी सही बात रखना।सही बात कहने वाले यदि वहां नहीं जाएंगे तो उस शून्य को एक पक्षीय लोग भर ही देंगे और यह बहुत तेजी से हो रहा है।”



जन संस्कृति मंच (जसम) ने सभी साहित्यकारों से बिहार संवादी का बहिष्कार करने की अपील की है। वहीं इलाहबाद जलेस के सचिव व युवा कवि संतोष चतुर्वेदी ने भी दैनिक जागरण के प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता की कड़े शब्दोंमें निंदा करते हुए ‘जलेस इलाहाबाद’, साहित्यिक ब्लॉग ‘पहली बार’और ‘अनहद’ साहित्यिक पत्रिका की ओर से सभी साहित्यकारों से बिहार संवादी का बहिष्कार करने की अपील की है।

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