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स्लिम रहने से ज्यादा जरूरी है स्वस्थ रहना

नीवा सिंह


राष्ट्रीय कैडेट कोर,दिल्ली,  की गर्ल्स कैडेट इंस्ट्रक्टर नीवा सिंह से मासिक फिटनेस, पोषण और टीन एजर लडकियों को लेकर रंजना ने किया संवाद. संवाद पर आधारित यह आलेख.

अंशा कपूर ने बड़े ही उत्साह से खेलो में हिस्सा लेना शुरू किया ,स्कूल की तरफ से एनसीसी के कैंप में भी चली गयी ,लेकिन वहां जाते ही उसे उल्टियां–चक्कर आने शुरू हो गये,अब क्या था कैंप में एक दिन भी रहना मुश्किल हुआ-घर वापस हो गयी|

नारायणी दसवीं में पढ़ती है| उसके दोस्तों में लड़कों की संख्या ही ज्यादा है, जिनके साथ सिगरेट और बियर पीना नार्मल है लेकिन घर में खाना बहुत सोच समझ कर खाती है|कहीं मोटी न हो जाऊं,आये दिन माँ –बाप को उसे लेकर डॉ. के पास भागना पड़ रहा है|

अनिका बैडमिंटन की अच्छी ख़िलाड़ी है ,खाने को लेकर बहुत चूजी भी, उसके माँ बाप परेशान है कि हर एक बात पर हाथो का नस काट कर तैयार हो जाती है|

प्रियंसी बहुत खुबसूरत भी है और स्लिम भी इसके लिए मेहनत  भी करती है| अभी बारहवीं का पेपर देने गयी और हॉल में ही चक्कर  खा कर गिर पड़ी,हॉस्पिटल ले जाना पड़ा,डॉ ने बताया कुपोषण के कारण ऐसा हुआ है| उसे खाना देख कर ही डर लगता था|

ये कुछ उदाहरण हैं, जिनसे इस उम्र की लड़कियों की स्वास्थ्य समस्या को समझा जा सकता है.
टीन ऐज लडकियां 
फिल्म  अभिनेत्री  की तरह  सुंदर  दिखने की चाहत इसी उम्र से शुरू हो जाती है| इसमें कोई बुराई भी नहीं है| जिंदगी का सबसे खुबसूरत और मदमस्त उम्र होता है यह ,उत्साह उमंग और मस्ती अपने सर्वोत्तम पड़ाव पर होता है| इस उम्र में हर कोई द बेस्ट बनना चाहता है| मुश्किल तब होगी शुरू हो जाती है जब खुबसूरत, स्लिम और सेक्सी दिखने की चाह में खाना –पीना कम करके दिन रात खुद को सवारने में लगी रहती है| उन्हें  नहीं समझ की खाना छोड़ने से चेहरे का ग्लो कम हो जायेगा| इसमें उनकी भी कोई गलती नहीं ,उम्र में जितनी समझ , वैसे दोस्त ऊपर से शारीरिक बदलाव.

मातृ-मृत्यु का नियंत्रण महिला -स्वास्थ्य का जरूरी पहलू : चार्म
लेकिन इस उम्र की लडकियां जिस मानसिक और शारीरिक बदलाव से गुजर रही होती है ,उसका ध्यान रखना जरुरी है ,उनके भीतर हो रहे हार्मोनल परिवर्तन का असर पढाई के साथ साथ व्यवहार पर भी पड़ता है| इसका ध्यान रख कर ही समाज में बढ़ रही विकृतियों से बच सकते हैं.

व्यक्तित्व विश्लेषण, शिक्षा, फर्स्ट क्रश, डेटिंग ,सेक्स शिक्षा ,अपने ही शरीर में हो रहे ग्रोथ,आत्म सम्मान, माहवारी,और दोस्त. ये कुछ ऐसी बाते होती हैं जो हर टीन एजर फेस करती है| हमलोगों की सामाजिक संरचना में खुल कर बाते भी नहीं समझाई जाती है| नतीजतन गूगल और दोस्तों की संगत कुछ भी करवा लेती है|ऐसे में बहुत जरुरी होता है की उनका ध्यान पढाई के साथ साथ की अतिरिक्त गतिविधि में रहे,फिटनेश का पूरा ध्यान रखे ,संतुलित भोजन ले .

अक्सर लोग कहते है ,मासिक धर्म में ज्यादा काम न करो व्यायाम न करो ..लेकिन यह गलत सोच है ,बल्कि इन दिनों में व्यायाम जरुर करे ,इसके बहुत से फायेदे हैं. जैसे —इस टाइम बॉडी फ्लैसिबल ज्यादा होता है, तो आप बॉडी शेप बहुत आसानी से बना सकती है दिन भर हाय –हाय दर्द के नाम पर मूड खराब करने से बेहतर है की व्यायाम करके ,हारमोंस को बैलेंस कर ले,इससे दर्द में आराम मिलेगा और मूड भी फ्रेश होगा | व्यायाम से इंडोर्फिन नामक हारमोंस संचालित होता है ,जो थकान और सिरदर्द से मुक्ति दिलाता है, हारमोंस के नियमित रहने से बहुत शारीरिक विकृतियों से बचा जा सकता है मासिक के समय सफाई का विशेष ध्यान रखना होगा .
हो सकता है कई बार मासिक के समय व्यायाम करते वक्त बहाव ज्यादा हो,तो यह घबराने की बात नहीं बल्कि शरीर के लिए और सही है.मासिक में खाने में विशेष ध्यान रखना होगा ,दूध ,दही ,पनीर फल हर हाल में ले ,वरना एनेमिक भी हो सकती है. इस उम्र में विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षित होना भी स्वस्थ होने की ही निशानी है.पर यह सीख देना भी बहुत आवश्यक है की दोस्ती और उससे अधिक में कितना  अंतर है. देश का भविष्य स्वस्थ रखना है तो लडकियों को स्वस्थ रखना होगा.

फिटनेस का सम्बन्ध केवल शारीरिक व्यायाम से नही है. यह विषय काफी गूढ़तम विषय में से है जहाँ पर मानसिक और शारीरिक स्वास्थय जैसे हर पहलू पर ध्यान देना फिटनेस है. जिम में कठिन व्यायाम तथा वेट ट्रेनिंग से आप शारीरिक तौर पर सुडौल तो नज़र आ सकते है लेकिन इसके प्रतिकूल परिणामों पर हम कभी ध्यान नहीं देते जो आगे चलकर गंभीर बिमारी व चोट को जन्म देती है.

फिटनेस में ध्यान रखने वाली बातें:

क –फिटनेस  के  मूल आधार उत्तम खान-पान, श्वसन प्रक्रिया तथा सूक्ष्म व्यायाम, ये तीन आधार स्तम्भ हैं.

ख) सबसे पहले अपने शरीर को देखें, उसकी क्षमता को देखे फिर व्यायाम करना शुरू करे.

ग) फिटनेस  के प्रति जागरूक होना अच्छी बात है,लेकिन अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक या जो खुद के लिए उपयोगी न हो उसे भी करना ठीक नहीं है-दर्द को,शारीरिक तकलीफों को नज़र अंदाज़ करना भी उचित नहीं है

घ) व्यायाम रूटीन से करें, हमेशा कुछ रोचक तथा नयेपन के साथ करें तब मानसिक और शारीरिक दोनों का संतुलन बना रहता है. मसलन आप रनिंग करते हैं रोज, तो कभी-कभी जॉगिंग या तेज चाल के साथ कॉम्बो कर ले, व्यायाम के साथ डांस को भी शामिल कर लें ,इससे बोरियत नहीं होगी,और संतुलन भी बना रहेगा.

च) तन –मन को स्वस्थ रखने के लिए बॉडी को पूरी तरह रेस्ट और नींद मिलना बहुत जरुरी है ,कम से कम सप्ताह में एक दिन आराम करें,कोशिश करे की रिलेक्स मूड में रहें.

वैसे तो आजकल अपने फिगर को लेकर हर उम्र की महिलायें बड़े जतन करती रहती हैं  ,छोटी छोटी लड़कियां भी कैलोरी माप कर खाने लगी है, जिम में घंटो प्रैक्टिस करती रहती है ,फल –सब्जी से ज्यादा पाउडर सप्लीमेंट पर रहने की कोशिश करती है,ऐसे में खुद के साथ क्या बुरा कर रही है उन्हें नहीं पता. मूलतः फिटनेस के लिए जिम जाना और घंटो पागल की तरह लगे रहना कम उम्र लड़कियों के लिए सही नहीं है,जिम का हार्ड वर्क,कई बार मांसपेशियों को डैमेज कर देता है,किशोरावस्था में जिम की आदत से शारीरिक विकास भी रुक जाता है,कद भी छोटा रह सकता है,घुटने कमजोर हो जाते है. खाने पर कण्ट्रोल और जिम का भरी भरकम वर्कआउट से शरीर के विकास रुक जायेंगे. जिम की ओर रुख तब करें जब परिपक्व हो जायें, मसलन बीस से पच्चीस साल के बीच

1.बच्चो के लिए हेवी वेट ट्रेनिंग कभी नहीं होना चाहिए /ग्यारह से बीस साल के बच्चो को खेलने की आदत           डाले,कुछ भी रनिंग ,साइक्लिंग ,तैराकी या फिर डांस /जिससे उन्हें आनंद भी आये और फिटनेस भी बनी          रहे   के प्रति अभ्यस्त करें.

  आप बच्चो को कुछ इस तरह भी करवा सकते है:


2. स्ट्रेंथ एक्सेरसाइज़, जिसमे अपने ही शरीर का प्रयोग होता है और मांसपेशियां, हड्डियां मजबूत होती हैं.

3.खानपान –फिटनेस का सीधा सम्बन्ध खानपान से है,बढती उम्र में शरीर को सभी तरह के मिनरल्स ,प्रोटीन,   वसा लेनी चाहिए ,ऐसा नहीं है की घी –मक्खन हमेशा नुकसानदायक है ,अति कुछ भी नुकसान करता है /बस  अल्कोहल ,ड्रग्स ,सिगरेट और जंक फ़ूड से दूरी बना कर रखें.

प्रस्तुति: रंजना, सम्पर्क:8802868068

तस्वीरें गूगल से साभार 

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रूद्र मोहम्मद शहिदुल्लाह की कविताएँ

 सुलोचना वर्मा


विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित. छायाचित्रण और चित्रकारी में रुचि. सम्पर्क:  verma.sulochana@gmail.com

प्रेम और क्रांति के कवि रूद्र मोहम्मद शहिदुल्लाह की कविताओं का अनुवाद सुलोचना वर्मा ने किया है. बांग्लादेश के इस बड़े कवि की कविताएं जनता के बीच लोकप्रिय रही हैं. तसलीमा नसरीन से विवाह विच्छेद के बाद 45 साल की उम्र में वे दुनिया से रुखसत हो गये. 


 दूर हो दूर 


नहीं छू पाया तुम्हें, तुम्हारी तुम्हें
उष्ण देह गूँथ-गूँथ कर इकठ्ठा किया सुख
परस्पर खनन कर-करके ढूँढ ली घनिष्ठता,
तुम्हारे तुम को मैं छू नहीं पाया .

जिस प्रकार सीप खोलकर मोती ढूँढते हैं लोग
मुझे खोलते ही तुमने पायी बीमारी
पायी तुमने किनारा हीन आग की नदी .

शरीर के तीव्रतम गहरे उल्लास में
तुम्हारी आँखों की भाषा पढ़ी है सविस्मय
तुम्हारे तुम को मैं छू नहीं पाया .
जीवन के ऊपर रखा विश्वास का हाथ
कब शिथिल होकर तूफ़ान में उड़ गया पत्ते सा
कब ह्रदय फेंककर ह्रदयपिंड को छूकर
बैठा हूँ उदासीन आनन्द के मेले में

नहीं छू पाया तुम्हें, मेरी तुम्हें,
पागल गिरीबाज कबूतर जैसे नीली पृष्ठभूमि
तहस-नहस कर गया शांत आकाश का .
अविराम बारिश में मैंने भिगोया है हिया

तुम्हारे तुम को मैं नहीं छू पाया .

एक गिलास अंधकार हाथ में 

एक गिलास अंधकार हाथ में लिए बैठा हूँ .
शून्यता की ओर कर आँख, शून्यता आँखों के भीतर भी
एक गिलास अंधकार हाथ में लिए बैठा हूँ .
विलुप्त वनस्पति की छाया, विलुप्त हिरण .
प्रवासी पक्षियों का झुण्ड पंखों के अन्तराल में
तुषार का गहन सौरभ ढ़ोकर नहीं लाता अब .

 रूद्र मोहम्मद शहिदुल्लाह

दृश्यमान प्रौद्योगिकी की जटाओं में अवरूध्द काल,
पूर्णिमा के चाँद से झड़कर गिरती सोने सी बीमारी .
पुकार सुन देखता हूँ पीछे – नहीं है कोई .
एक गिलास अंधकार हाथ में लिए बैठा हूँ अकेला….
समकालीन सुन्दरीगण उठकर जा रही हैं अतिद्रुत
कुलीन शयनकक्ष में,
मूल्यवान असबाब की तरह निर्विकार .
सभ्यता देख रही है उसके अंतर्गत क्षय
और प्रशंसित विकृति की ओर .

उज्जवलता की ओर कर आँख, देख रहा हूँ-
डीप फ्रीज में हिमायित कष्ट के पास ही प्रलोभन,
अतृप्त शरीर ढूँढ ले रहे हैं चोरदरवाज़ा – सेक्सड्रेन .

रुग्णता के काँधे पर रख हाथ सांत्वना बाँट रहा है अपशिष्ट-
मायावी प्रकाश के नीचे गजब का शोरगुल, नीला रक्त, नीली छवि

पढ़ें: वो खौफ़ खा गया और अन्य कविताएँ

जग उठता है एक खंड धारदार चमचमाता इस्पात,
खोपड़ी के अंदर उसकी हलचल महसूस कर पाता हूँ सिर्फ .

इसी बीच कॉकटेल से बिखरा परिचय, संपर्क, पदवी –
उज्जवलता के भीतर उठाता है फन एक अलग अंधकार .
भरा गिलास अंधकार उलट देता हूँ इस अंधकार में .



 बतास में लाश की गंध 


आज भी मैं पाता हूँ बतास में लाश की गंध
आज भी मैं देखता हूँ माटी में मृत्यु का नग्ननृत्य,
बलत्कृता की कातर चीत्कार सुनता हूँ आज भी तन्द्रा के भीतर….
यह देश क्या भूल गया वह दुस्वप्न की रात, वह रक्ताक्त समय ?
बतास में तैरती है लाश की गंध
माटी में लगा हुआ है रक्त का दाग .
इस रक्तरंजित माटी के ललाट को छूकर एकदिन जिन लोगों ने बाँधी थी उम्मीद
जीर्ण जीवन के मवाद में वो ढूँढ लेते हैं निषिद्ध अन्धकार,
आज वो प्रकाश विहीन पिंजड़े के प्रेम में जगे रहते हैं रात्रि की गुहा में .
मानो जैसे नष्ट जन्म की लज्जा से जड़ कुँवारी जननी
स्वाधीनता – क्या यह जन्म होगा नष्ट ?
यह क्या तब पिताहीन जननी की लज्जा का है फसल ?

जाति की पताका को आज नाखूनों से जकड़ लिया है पुराने गिद्ध ने  .

दो चोटी वाली लड़की और अन्य कविताएं

बतास में है लाश की गंध
निऑन प्रकाश में फिर भी नर्तकी की देह में मचता है मांस का तूफ़ान .
माटी में है रक्त का दाग –
चावल के गोदाम में फिर भी होती है जमा अनाहारी मनुष्य की अस्थियाँ
इन आँखों में नींद नहीं आती . पूरी रात मुझे नींद नहीं आती –
तन्द्रा में मैं सुनता हूँ बलत्कृता की करुण चीत्कार,
नदी में कुम्भी की तरह तैरती रहती है इंसान की सड़ी हुई लाश
मुंडहीन बालिका का कुत्तों द्वारा खाया हुआ वीभत्स शरीर
तैर उठता है आँखों के भीतर . मैं नहीं सो पाता, मैं नहीं सो पाता….
रक्त के कफ़न में मुड़ा – कुत्ते ने खाया है जिसे , गिद्ध ने खाया है जिसे
वह मेरा भाई है, वह मेरी माँ है, वह हैं मेरे प्रियतम पिता .
स्वाधीनता, वह मेरी स्वजन, खोकर मिली एकमात्र स्वजन –
स्वाधीनता – मेरे प्रिय मनुष्यों के रक्त से खरीदी गयी अमूल्य फसल .
बलत्कृता बहन की साड़ी ही है मेरी रक्ताक्त जाति की पताका .


खतियान


हाथ पसारते ही मुठ्ठी भर जाती है ऋण से
जबकि मेरे खेत में भरा है अनाज .
धूप ढूँढे नहीं मिलता है कभी दिन में,
प्रकाश में बहाती है रात की वसुंधरा .

हल्के से झाड़ते ही झड़ती है सड़ी हुई ऊँगली की घाम,
ध्वस्त होता है तब दिमाग का मस्तूल
नाविक लोग भूलते हैं अपना पुकारनाम
आँखों में खिलता है रक्तजवा का फूल .
पुकार उठो यदि स्मृति सिक्त फीके स्वर में,
उड़ाओ नीरव में गोपनीय रुमाल को
पंछी लौटेंगे पथ चीन्ह चीन्ह कर घर में
मेरा ही केवल नहीं रहेगा चीन्हा हुआ पथ –
हल्के से झाड़ते ही झड़ जाएगी पुरानी धूल
आँखों के किनारे जमा एक बूँद जल .
कपास फटकर बतास में तैरेगी रुई
नहीं रहेगा सिर्फ निवेदित तरुतल
नहीं जागेगा वनभूमि के सिरहाने चाँद
रेत के शरीर पर सफेद झाग की छुअन
नहीं आएगी याद अमीमांसित जाल
अविकल रह जाएगा, रहता आया है जैसे लेटना
हाथ पसारते ही मुठ्ठी भर जाता है प्रेम से
जबकि मेरी विरहभूमि है व्यापक
भाग जाना चाहता हूँ – पथ थम जाता है पाँव में
ढक दो आँखें ऊँगली के नख से तुम .

 यह कैसी भ्रान्ति मेरी 


यह कैसी भ्रान्ति मेरी !
आती हो तो लगता है दूर हो गई हो, बहुत दूर,
दूरत्व की परिधि क्रमशः बढ़ा जा रहा है आकाश .
आती हो तो अलग तरह की लगती है आबोहवा, प्रकृति,
अन्य भूगोल, विषुवत रेखा सब अन्य अर्थ-वाहक
तुम आती हो तो लगता है आकाश में है जल का घ्राण  .

हाथ रखती हो तो लगता है स्पर्शहीन करतल रखा है बालों में,
स्नेह- पलातक बेहद कठोर उँगलियाँ .
देखती हो तो लगता है देख रही हो विपरीत आँखों को,
लौट रहा है समर्पण नंगे पैरों से एकाकी विषाद – क्लांत होकर
करुण छाया की तरह छाया से प्रतिछाया में .
आती हो तो लगता है तुम कभी आ ही नहीं पायी …

कुशल क्षेम पूछती हो तो लगता है तुम नहीं आयी
पास बैठती हो, तो भी लगता है तुम नहीं आयी .
दस्तक सुनकर लगता है कि तुम आयी हो,
दरवाजा खोलते ही लगता है तुम नहीं आयी .
आओगी जानकर समझता हूँ अग्रिम विपदवार्ता,
आबोहवा संकेत, आठ, नौ , अवसाद, उत्तर, पश्चिम
आती हो तो लगता है तुम कभी आ ही नहीं पायी .

चली जाती हो तो लगता है तुम आयी थी,
चली जाती हो तो लगता है तुम हो पूरी पृथ्वी पर.

तस्वीरें गूगल से साभार 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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पेशेवर महिलाएं : बदलती पीढ़ी की अभिव्यक्ति

 शरद जयसवाल


असिस्टेंट प्रोफेसर, स्त्री अध्ययन विभाग,महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय. सम्पर्क:  .sharadjaiswal2008@gmail.com

 भारतीय समाज में पिछले सत्तर सालों में स्त्री-पुरुष के बीच के संबंधों में काफी बदलाव आये हैं. इसे किसी न किसी अर्थ में भारतीय लोकतंत्र की उपलब्धियों में शुमार किया जा सकता है. लोकतांत्रिक मूल्य  अब सिर्फ सार्वजनिक विमर्श हिस्सा नहीं हैं, इसकी अनुगूँज को निजी यानी परिवार के दायरे में भी सुना जा सकता है. इन सत्तर सालों में बहुत कुछ बदला है. देश, समाज, शहर, ग्रामीण भारत, परिवार, विवाह, धर्म, लोकतांत्रिक संस्थाएं, राजनीति और पितृसत्तात्मक ढाँचे में इस बदलाव को आसानी से तलाशा जा सकता है. बेशक इस बदलाव ने महिलाओं के एक बड़े हिस्से को सजग किया है.


आज़ादी के बाद सार्वभौमिक मताधिकार, हिन्दू कोड बिल आदि के माध्यम से भारतीय राज्य के द्वारा महिलाओं को बराबरी का एहसास कराया गया. इसके साथ ही साथ समाज के एक हिस्से में बेटियों को लेकर परम्परागत धारणा में बदलाव आना शुरू हो गया था. आज़ादी के बाद चली औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया ने एक नए मध्यम वर्ग के लिए मार्ग प्रशस्त किया. 1980 के बाद शुरू हुई वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने बहुलतावादी भारतीय समाज के अलग-अलग तबकों को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया है. जहां एक तरफ तो वैश्वीकरण की इस प्रक्रिया ने समाज में वंचित तबकों के हाशियाकरण की प्रक्रिया को और मजबूत किया तो वहीँ दूसरी तरफ महिलाओं के एक तबके की श्रमशक्ति के लिए बाज़ार ने अपने रास्ते खोले हैं.


पिछले तीन-चार दशकों में महिलाओं की एक नई पीढ़ी आत्मनिर्भर हुई है. यह नई पीढ़ी समाज में अपनी पेशेवर भूमिका के लिए सजग है. शिक्षा के अवसरों ने इस नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को बदलने की दिशा में बड़ी भूमिका अदा की है. 2016 में एलिस डब्लू क्लार्क की पुस्तक ‘वैल्यूड डाटर्स: फर्स्ट जेनरेशन कैरियर वीमेन’ प्रकाशित हुई. किताब का हिंदी तर्जुमा 2017 में ‘अनमोल बेटियां: पहली पीढ़ी की पेशेवर महिलाएं’ के नाम से प्रकाशित हुआ. इस किताब के शीर्षक से ही लेखिका किताब की अंतर्वस्तु के बारे में स्पष्ट कर देना चाहती है कि बेटियों को लेकर भारतीय समाज में जो परम्परागत सोच थी, उसमें बदलाव आ रहा है. समाज के एक तबके के लिए वे सिर्फ बेटियां नहीं हैं बल्कि वे भी एक लड़के की ही तरह अनमोल हैं. इस किताब में लेखिका ने महिलाओं की अलग-अलग पीढ़ियों की सोच व आकांक्षाओं में आ रहे बदलावों को समझने की ईमानदाराना कोशिश की है. इस किताब में महिलाओं की आकांक्षाओं में आ रहे बदलावों को समझने के लिए पुरानी पीढ़ी की महिलाओं के साथ-साथ महिलाओं की समकालीन पीढ़ी से भी बात-चीत की गई है. किताब का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें देश के अलग-अलग महानगरों में पेशेवर भूमिका में आ चुकी महिलाओं से साक्षात्कार लिए गए हैं. यह साक्षात्कार महिलाओं की चेतना में आ रहे बदलावों को परिलक्षित करते हैं.

उन्नीसवीं शताब्दी में शुरू हुए समाज सुधार आन्दोलन ने महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाने का काम किया था. सती प्रथा का विरोध, विधवा पुनर्विवाह के साथ महिलाओं की शिक्षा इस आन्दोलन के केंद्र में थी. बीसवीं शताब्दी में गाँधी के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रभाव में बड़े पैमाने पर पहली बार महिलाओं ने घर की दहलीज़ को पार किया था. आन्दोलन में कई सारी महिलाओं का घर से बाहर निकलना और उनकी नेतृत्वकारी भूमिका ने महिलाओं की अगली पीढ़ियों को काफी प्रभावित किया था. लेखिका लिखती हैं कि महिलाओं ने राष्ट्रीय आन्दोलन में अपने परिवार की रजामंदी से भाग लिया था. न कि पुरुष प्रधान समाज में व्याप्त पुरुष वर्चस्व के खिलाफ… स्वतंत्रता संघर्ष की प्रतिध्वनि उन महिलाओं के बीच भी पहुंची जो राजनीतिक आन्दोलन का भाग बनने के लिए बहुत ‘छोटी’ थीं. इस गूँज ने कुलीन परिवारों की कुछ युवा महिलाओं के मन में शिक्षित होने की इच्छा का रूप लिया. ताकि सार्वजनिक क्षेत्र में उपयोगी कार्य करने के लिए सुसज्ज हो सकें… वे केवल राजनैतिक या सामाजिक सक्रियता में लिप्त होने के लिए नहीं, न ही निजी बनाम सार्वजनिक रोजगार तलाशने के लिए, बल्कि व्यापक रूप से कई क्षेत्रों में अपनी आदर्शवादी पेशेवर उम्मीदें पूरी करना चाहती थीं. उनकी यह इच्छाएं केवल नौकरी या आजीविका के लिए नहीं थीं. बल्कि सेवा, कार्य और आत्म अभिव्यक्ति की पूर्णता के लिए थीं. जो केवल घर बैठकर नहीं मिल सकती. ऐसी पूर्णता जिसके लिए उच्च शिक्षा की आवश्यकता नहीं थी, बल्कि उस शिक्षा को घर के दायरे से बाहर निकालकर अच्छे उपयोग में भी लाना था.



आज़ादी के बाद महिलाओं की एक नई पीढ़ी जब खुद माँ बनी तो उन्हें यह लगा कि उनकी खुद की बेटियों के लिए महाविद्यालय की डिग्री प्राप्त करना विवाह के लिए एक बीमा पालिसी की तरह है. पुरुषों की शिक्षा में बढ़ोतरी का भी प्रभाव पड़ा क्योंकि शिक्षित पुरुष शिक्षित महिलाओं से ही विवाह करने की उम्मीद रखते थे. आज़ादी के बाद महिला आन्दोलन की सक्रियता ने भी महिला शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. महिला आन्दोलन की गति को तेज़ करने में 1974 में प्रकाशित ‘टूवर्ड्स इक्व्यल्टी’ नामक रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. आज के समय में महिलाओं के बीच शिक्षा के प्रचार, प्रसार और कैरियर को लेकर आकांक्षाओं में आ रहे बदलावों के पीछे जनसांख्यिकी संक्रमण की बड़ी भूमिका रही है.
महिलाओं के द्वारा कम बच्चों को जन्म देना, उनकी सेहत के लिए बेहतर है तथा इसके साथ बच रहे समय ने उनके द्वारा काम करने की संभावनाओं को भी बढ़ा दिया. लेखिका ने कहा है कि अतीत में महिलाओं के जीवन में जो बात स्पष्ट थी, वह यह कि वे अपने स्वास्थ्य पर बहुत बोझ डालती थीं और बहुत ही डरावने ढंग से खुद को वक़्त से पहले ही मृत्यु के अधीन कर देती थीं. वे अपने जीवन के शिखर वर्षों के दौरान वांछित, अवांछित, जीवित, मृत बच्चों को जन्म देती थीं और दुर्भाग्यवश इस बोझ को खुद ही उठाती थीं.


धीरे-धीरे मेडिकल साइंस के विकास की वजह से बाल मृत्युदर में कमी आनी शुरू हुई. 1981 की जनगणना ने सबसे पहले प्रजनन क्षमता में गिरावट का संकेत दिया था. मृत्युदर में गिरावट का मुख्य श्रेय उन सभी आविष्कारों को जाता है जिनकी वजह से मलेरिया, तपेदिक, चेचक और हैजा जैसी बीमारियों पर नियंत्रण पा लिया गया था. इसके साथ-साथ महिला मृत्यु दर पर नियंत्रण ने भी महिलाओं की उम्र लम्बी करने में मदद की. महिला शिक्षा में बढ़ोत्तरी के कारण विवाह योग्य आयु व लम्बे समय तक अकेले रहने के अनुपात में बढ़ोत्तरी होती है. लेकिन लेखिका का यह मानना है कि भारत में प्रजनन क्षमता में संक्रमण मुख्य रूप से गर्भनिरोधकों के कारण और विशेष रूप से महिला नसबंदी के कारण हुआ है. इसके साथ-साथ यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि 1981 से 1991 के बीच प्रजनन क्षमता में हुई गिरावट का 65 फीसदी हिस्सा उन महिलाओं का है जिन्होंने कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की है. इसके साथ-साथ परिवार में सिर्फ बेटों की चाहत से भी प्रजनन क्षमता में गिरावट आ सकती है. आज के समय में लिंग चयनात्मक गर्भपात को संभव बनाने वाली प्रौद्योगिकी व्यापक रूप से उपलब्द्ध होने लग गई है और अवांछित बेटियों से छुटकारा पाने के लिए लिंग चयनात्मक गर्भपात ने कन्या भ्रूण हत्या की पुरानी प्रथा को प्रतिस्थापित कर दिया है. इसके साथ ही कल्याणकारी राज्य के अभाव ने भी बुढ़ापे के समय लड़कों की जरूरत को और ज्यादा बढ़ा दिया है.


इस किताब में लेखिका ने कई सारी पेशेवर लड़कियों के साक्षात्कार लिए हैं. इन साक्षात्कारों के माध्यम से उनकी आकांक्षाओं को समझा जा सकता है. जैसे इलाहाबाद की तनिका कहती हैं कि ‘विवाह के लिए मैं किसी से मिलने के लिए बहुत लालायित नहीं हूँ. मेरे माता-पिता एक अच्छे परिवार का, समान जाति-धर्म का अच्छा कमाने वाला लड़का चाहते हैं. मेरे विचार से वह स्वतंत्र और अच्छा व्यक्ति होना चाहिए और उसे मेरी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए…. महिलाओं को महसूस होता है कि उन्हें आर्थिक तौर पर भाग लेना चाहिए, हम निर्माण के लिए बने हैं न कि केवल प्रजनन के लिए. सतत विकास केवल पुरुषों के साथ नहीं हो सकता. देश तभी विकसित होगा जब महिलाऐं भी श्रम शक्ति में भागीदारी करेंगी. विचारधारा और क्रांतिकारी आदर्शों में एक बदलाव आया है. हमें केवल उनके हाथ की कठपुतली नहीं होना है. बात केवल पैसे की नहीं है बल्कि व्यक्तिगत दृश्यता की भी है. हम अभी अदृश्य हैं. पुरुष और महिला को समान होना चाहिए. सारा जोर शिक्षा पर होना चाहिए.’ इसी के साथ-साथ कई और युवा पेशवर महिलाओं के साक्षात्कार में भी इसी तरह की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है. लेखिका का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ युवा महिलाओं में ही नहीं आये हैं बल्कि उनके माता पिता की सोच में भी इस तरह के बदलाव परिलक्षित होते हैं. तनिका के पिता कहते हैं कि ‘हम चाहते हैं कि वह अपनी आजीविका खुद कमाए. पहले परिवार में एक कमाने वाला सदस्य होता था, लेकिन अब दोनों को कमाना जरुरी है…पहले उसे अपना लक्ष्य प्राप्त करने दीजिये और फिर हम उससे विवाह के बारे में बात करेंगे.

समान जाति हमारी पहली प्राथमिकता होगी.’ इन साक्षात्कारों के माध्यम से लेखिका कहती हैं कि बेटियों की आजीविका की महत्वाकांक्षा की स्वीकृति छोटे शहरों में भी बढ़ रही है और उन परिवारों में भी जो पहले इन योजनाओं की स्वीकृति नहीं देते थे. इस किताब में जितनी पेशेवर महिलाओं के साक्षात्कार लिए गए हैं उन सभी ने जाति के अन्दर माता-पिता के द्वारा तय किया हुआ विवाह करने से इनकार नहीं किया है. ये सभी महिलाऐं सामाजिक रूप से प्रगतिशील न होते हुए भी एक प्रकार से ‘नारीवादी’ हैं.


लेखिका लिखती हैं कि जो साक्षात्कार मैंने लिए हैं उसमें कुछ महिलायें खुद को मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अन्तर्गत आने वाले सभी अधिकारों पर दावा करते हुए देखी जा सकती हैं. उदहारण के लिए अनुछेद 17 अपनी स्वयं की संपत्ति पर अधिकार सुनिश्चित करता है और उससे किसी को मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जा सकता है. इस किताब के अनुवाद ने इसकी अंतर्वस्तु को काफी जटिल बना दिया है इसके साथ-साथ भाषा की त्रुटियाँ भी शोध की गंभीरता को कम कर रही हैं. फिर भी इस किताब में स्थापित तथ्यों के आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि आज के समय में महिलाओं का एक पेशेवर तबका अपनी आकांक्षाओं को खुलकर समाज के सामने अभिव्यक्त कर रहा है और अपेक्षा कर रहा है कि समाज भी उन सपनों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़े.

पुस्तक- अनमोल बेटियां : पहली पीढ़ी की पेशेवर महिलाएं- एलिस डब्लू क्लार्क 
पृष्ठ संख्या: 183, मूल्य: 250, सेज पब्लिकेशन, ISBN 978-93-864-4664-0 

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कामकाज़ी औरतें और अन्य कविताएँ

 मंजू शर्मा


हिन्दी की शिक्षिका,  सोशल मीडिया में सक्रिय. सम्पर्क:  manjubksc@gmail.com


मध्यम वय की औरतें


मध्यम वय की औरतें
कुछ ज्यादा जागती और कम नींद सोती है.
हार्मोनल बदलाव से जूझती हैं
मेनोपॉज की वज़ह से भीतर-ही-भीतर दरकती हैं.
किशोरियों की तरह अल्हड़ बिंदास वो
छोटी-सी बात पर कभी-कभी खूब खिलखिलाती हैं.
मोम की तरह का इनका कुछ गुस्सा
भी ऐसा कि वो जल्द ही पिघल जाती हैं.
कई बार अतीत की बातों पर भीतर-ही-भीतर
झुंझलाती है और अन्तर्मन मेँ खूब चिल्लाती हैं.
घर में रखे सामान की तरह होकर वो
बिखरे हुए बालों में कई बार आधी रात में घबराती हैं.
अपने लिए अच्छे दोस्त भी तलाशती हैं.
ये मध्यम वय की औरतें
कुछ-कुछ अज़ीबोगरीब होती हैं.
कभी-कभी अपनी तन्हाइयों से उबकर सच्चे प्रेमी की आस में
लक्ष्मण-रेखा लाँघकर बाहर की दुनिया में उसे तलाशती हैं.

कामकाज़ी औरतें


कामकाज़ी औरतें
रविवार के दिन का इंतज़ार बड़े बेसब्री से करती हैं.
जैसे रविवार का दिन न होकर एक करिश्माई दिन है
और इस एक रविवार के दिन जी लेगी वह सप्ताह के सातों दिन.
बेवकूफ़ हैँ वे कामकाज़ी औरतें!
बाकी के दिन उसके पास पेश की जाती हैं
कुछ कम ख्वाहिशों की फ़ाइलें
कुछ कम उम्मीदों की चॉक
कुछ कम अपेक्षाओं की गठरी.
बेहतर होते हैं ये सप्ताह के बाकी के छ: दिन
जब सबकी सहानुभूति भरी निगाहें तो उठती है उसकी ओर.

तुम सुनती तो होगी
थकी हुई है बेचारी,अभी ही तो लौटी है काम-से
तनिक सोने दो उसे और देर शाम तक.
और इस मुए रविवार के दिन तुम देखना!
कपड़ों का बड़ा-सा ढ़ेर तुम्हें बड़े प्यार-से देखता है
जिसे तुम रेशे के हिसाब-से मशीन में भिगोती हो
रसोई में सबके खास फ़रमाइशों के साथ समाती हो
बेतरतीब हो रखे घर के सामान को तन्मयता-से सजाती हो.
और खुद का क्या!
ज़रूरत-से ज्यादा बेतरतीब हो जाती हो.
फिर पसीने-से तर होकर खुद में ही बुदबुदाती हो.
कि इससे भले तो मेरे काम वाले सप्ताह के वो छ: दिन!!!!!
वहाँ तो रोज़ फिर भी अपने सहकर्मियोँ से कुछ हँसती और बतियाती हो.
रविवार का दिन तो निहायत ही बेशर्म-सा निष्ठुर एक दिन है!
कोई रहमो-करम की उम्मीद इस दिन घरवालों से नहीं करती हो
फिर क्योंकर इस मुए रविवार का इंतज़ार करती हो?
पसीने-से तरबतर कई बार तो एकदम-से गंधाती हो.
जब खुद को एकदम-से बदरंग हल्दी लगी नाईटी में बेतरतीब छोड़ देती हो.

वो उदास-सी स्त्री


चन्द्रग्रहण के बाद वह उदास-सी स्त्री 
अक्सर उदास हो जाती थी
कुछ था जो उसे उदास कर जाता था
स्याह अँधियारे उसे अब नहीं भाते थे
बस चंद्रमा की दूधिया रौशनी में नहाई हुई दुनिया
और उजाले को वह पसन्द करती थी.

वज़ह कुछ अतीत के साये में दफ़न थे.
कई बार इन्हीं स्याह अँधेरों में कोई था
जो उसे प्रेम करने की सुखद कहानियाँ सुनाया करता था.
उसे बस याद आती उसी बेईमान की
और वही सुखद-सी रैन बतिया
जो उससे अँधेरे में की जाती थी.
चंद रोज़ पहले उसे इंतज़ार होता था स्याह अँधियारे
और अमावस की रात का.
इन्हीं अँधेरे रैनों में वो घनघोर बरसता था
और उसके प्रेम की मधुमास में वह मगन हो जाती थी.
उसकी खिलखिलाती हुई हँसी
हरसिंगार की फूलों की तरह धरा से गगन तक पसर जाते थे
दूर तलक बस होती वह और उसके मुखर प्रेम की बात
और महक उठती थी उसकी वह अकेली -सी रात
उसके साथ
तब!!
क्या हुआ,कोई इंद्र बनकर छल तो नहीं गया उसे?
कि वह चन्द्रग्रहण के बाद इतनी उदासियों की बातें करती है
और सघन अँधियारे में समेट लेती है
खुद को कहीं ऐसी जगह जहाँ
प्रेमी बनकर कोई छलिया प्रेम से उसे न छल सके.
हर अँधेरी रात अब रिसती रहती है
और उसे याद आने लगता है वही
उसका जो नहीं था शायद कभी भी
अब हँसती नहीं है वह
हरसिंगार के फूल की तरह
वह अब बरसती है हर बार
और ओंस की तरह फैल जाती है
गहराई हुई वह कहीं भीतर ही भीतर.
और लग गया है एक चन्द्रग्रहण
हमेशा के लिए उसके सुंदर-सी लगती खिलखिलाहट पर

अनवरत जारी तुम्हारा यह सफ़र


इल्लियों से तितलियाँ बनने की क़वायद अनवरत जारी तुम्हारा यह सफ़र आसान नहीं है.
कोकून तो कब की तोड़ चुकी हैं ये तितलियाँ
और तुम हो कि अब भी वही घिसे-पिटे सवाल करते हो!
क्या कर रही हो?
कहाँ जा रही हो?
किसके साथ जा रही हो?
कैसे कर सकती हो?
काँच की किरचियों की तरह चुभने लगे हैं अब ये घिसे-पीटे सवाल!
सभ्यताओं का वहन
अपनी कोख़ में करने वालों से भी पूछा जाता है क्या कोई सवाल?

प्रकृति को सरजती हैं
और सँवारती हैं हर बेतरतीब कोने को
तुमसे तो न होगा इतना कुछ!
हाँ तुम्हें अपनी शक्ति-प्रदर्शन का शौक चढ़ आया है
और बेहयाई से
जब-तब अपनी शक्तियों का नपुंसक प्रदर्शन करते रहते हो.
पौराणिक कथाओं और वेदों की ऋचाएँ पढ़कर भी
तुम निरे मूर्ख हो!
गार्गी और अपाला तक तुम्हें याद नहीं !
पर तुम नहीं भूलना चाहते,सीता,सावित्री और उर्मिला की कथाओं को.
लाँघ चुकी हैं वे लक्ष्मण की खींची हुई देहरी की पुरानी उस रेखा को.
बन्द करो अब कूढ़मगज की तरह घिसे-पिटे पुराने सवाल करना!!!
वह अब भी कहीं रंग ले रही होगी किसी फूल से
कि भर सके अपने पंखों में सुंदर-सुंदर रंग
और इस बदरंग दुनिया को वह रंगीन बना देगी.

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वो खौफ़ खा गया और अन्य कविताएँ

साँझ

साँझ नाम से कविताएं लिखने वाली सौम्या गुलिया दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी हैं.नाटक के एक समूह ‘अनुकृति’ से जुड़ी हैं. संपर्क : ई मेल-worldpeace241993@gmail.com

वो खौफ़ खा गया

बस इतनी सी बात थी
और वो खौफ़ खा गया
मैंने रंग दिए सफे जो कुछ
स्याह काली रात से
जुबाँ तो खामोश थी
चीख़ें जो मेरे हर्फ़ कुछ
तो वो खौफ़ खा गया

मैंने जो बाँहें खौल कर
बादलों से थोड़ी बात की
और बात को सुनके मेरी
बादल बरसने की जगह
खिलखिला के हँस दिए
अब ऐसा भी क्या गज़ब हुआ
कि वो खौफ़ खा गया

घरदारी की चारदीवारी से
थोड़ा जो झाँका मैंने बाहर
सूरज की किरणों की तरह
जो मैने अपने सर का पल्लू उतार
हर दिशा में फैला दिया
अब ये भी भला क्या बात थी
जो वो खौफ़ खा गया

करते थे बहुत ही शोर जो
वो पायल, कंगन और बालियाँ
एक रोज़ यूँही जी किया
तो मैंने उनको उतार रख दिया
अब ऐसा भी मैंने क्या किया
जो वो खौफ़ खा गया

वो डरा रहा था रात को अंधेरे से
वो डरा रहा था नदी को लड़खड़ाने से
वो डरा रहा था मुझे मर्दों के इस ज़माने से
फिर जो मैंने नज़रे उठाके
थोड़ा-सा मुस्कुरा दिया
कमाल ही हुआ बड़ा
कि मुझको डरा रहा था जो
वो खुद ही खौफ़ खा गया

तो तुम उससे उलझना नहीं

जब वो हर खौफ़ से आज़ाद होकर
घूम रही हो अँधेरी रात में
सुनसान सड़क पर
अपनी आँखों मे
बग़ावत की बात लेकर
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब वो झील से नदी
और नदी से दरिया बन जाए
और बगावत उसकी
रोज़मर्रा की आदत बन जाए
फ़ितरत बन जाए
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब उसकी आँखों में
नज़ाकत न दिखे
उसकी बातों में तुम जिसे कहते हो शराफ़त
वो शराफत न रहे
जब उसकी आँखों में काजल की जगह
खौलता लाल रंग ले ले
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब सदियों से ताला लगे
जंग खाए
उसके लब
खामोशी का दामन छोड़
तुम्हारी आँखों में आंखें डालकर
तुम्हें पुचकारने की बजाय
ललकारने लगे
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब वो तुम क्या चाहते हो से ज्यादा
खुद की चाहत को चाहने लगे
तुम्हारे मर्दाना रौब की
खिल्ली उड़ाने लगे
तुम्हारी ख्वाहिशों, फरमाइशों को
को पूरा करने से इनकार करने लगे
और तुम से ज्यादा
अपनी बात करने लगे
तो तुम उससे उलझना नहीं

जब वो तुम्हारे बनाए खाँचों में
ढलने से इनकार करने लगे
अपने हर अंग हर एहसास से
मोहब्बत करने लगे
उनकी खुलकर बात करने लगे
जब अपनी जाँघों के बीच बहते
लाल रंग को
अपने माथे पर सजाने लगे

तो देखो,  तुम उससे उलझना नहीं

लड़की की तरह हँस
.
सुन! ऐ पगली! यूँ न खिलखिला के हँस
नज़रें झुका, होंठों को दबा
ज़रा ख़ामोश रहके हँस

अपना नहीं
तो ज़रा मआशरे का सोच
बड़े अदब-ए-पसंद है लोग
ज़रा मुँह छुपा के हँस

वड़े-वढ़ेरों अक्लमंदों ने
क़ायदे कानूनों की
लिखी हैं एक किताब
ख़ास लड़कियों के नाम
पहले जाके उसको पढ़
और हँसना ही है फिर भी
तो ज़रा लड़की की तरह हँस

ठहाके लगाना तो मर्दाना तौर है
ख़ातूनों की हँसी ऐसी हो
जो न बेहया लगे
न कानों में ही चुभे
जिसकी तासीर हो शकर
जो मर्दों के दिल छुए
मेरी सलाह है ये
तू नज़ाकत का पाठ पढ़
दुनिया-ए-अदब सीख
और ज़रा शर्मों हया से हँस

लड़की है तू
ज़रा लड़की की तरह हँस
ख़ामोश रहके हँस
मुह छुपा के हँस
और शर्मों -हया से हँस
ज़रा लड़की की तरह हँस
ख़ामोश रहके हँस
मुह छुपा के हँस
और शर्मों-हया से हँस

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
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न्याय के भंवर में भंवरी

मंजुल भारद्वाज

25 सालों से रंगमंच में सक्रिय. फाउंडर थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस. संपर्क :09820391859

स्त्री-अधिकार की मुखर नायिका सावित्रीबाई फुले के स्मृति दिवस (10 मार्च) पर संघर्ष की नायिका भंवरी देवी के संघर्षों को याद करते हुए यह नाटक पढ़ें. 


कहाँ और कैसे शुरू करूँ , कोई नई बात तो है नहीं , बात तो सदियों पुरानी है , मर्द औरत की  है , मर्द जात , औरत जात की है ..जब दो ही जात होती थी एक औरत और एक मर्द …तब से लेकर आज तक इन जातों की खाई पट नहीं पाई ..बख्त ( वक्त) के हिसाब से बढती जाती है  … कभी पटती नहीं …ये खाई ..साथ साथ चलती है पर मिलती नहीं …

आदम जात बहुत खुश थी जब पेट भरना ही जीवन का मकसद था ..पेट भरना और जीवन का आनंद लेना …और पेट भरने के लिए कंद , फूल , फल  और शिकार , उसके बाद नाच , गाना , मौज मस्ती , नाच , नृत्य , कबीला , और खानाबदोशी …सारी धरती आपनी … समभवत वो औरत जात का स्वर्ण काल था ..जब उसकी इच्छा सबकी सर आँखों पर थी …और उसको मिली कुदरत की नियामत उसकी आज़ादी का सबब थी … वो किसके साथ घूमेगी , खेलेगी , नाचेगी , गाएगी और सोएगी ..ये उसका अख्तियार था … बरखुरदार ..आँख फाड़ ..फाड़ के क्या देखे है ..तेरे हिसाब से बस ..जन्नत थी ..जन्नत … इतना मान ..सम्मान की तिनका भी बहुत था खुले आसमान में अपनी आज़ादी के लिए .. व्यक्तिगत फ्रीडम के लिए ..जो आज तालों , प्राइवेट फ्लाटों , बंगलों में नहीं मिलती ….

शक , सुबाह, मैल, का कीड़ा नहीं था … मर्द सही में मर्द था ..उसमें न्यूनगंड… इन्फेरिरोरिटी काम्प्लेक्स नहीं था … होगा भी तो कहीं कोने में पडा होगा … तू किसका है …किसकी औलाद है …किसका खून है ..ये सवाल नहीं थे ..एक ही समान भाव था ..किस माँ की औलाद है ..सबको स्वीकार थी माता की सत्ता …मातृसत्ता… क्योंकि आज भी मातृत्व यकीन है और पितृत्व अनुमान …

उत्क्रांति ..एवोलुशन..बख्त की सबसे कुदरती नियामत है ..यानी जो चलता है वो बख्त ..जो ठहरा वो मौत … इस बख्त के साथ आदम भी बदला …और उसकी जात भी बदली और ऐसे बदली की औरत बदल गयी ..सृष्टि का चक्र बदल गया .. पैदा करने वाली गुलाम और पैदा होने वाला मालिक … मालक ..और यही वो काली शहाई थी जिससे आज भी औरत का आसमान काला है और मर्द का टिमटिमाते तारों सा …
आदम जात के दिमाग में ऐसा केमिकल लोचा हुआ की मेरा सारा व्यक्तित्व  काया , स्तन , कमर , कोख और योनी तक सीमित हो गया और अंतत एक ‘बस्तु’ की पहचान में सिमट गया … संस्कृतियों के महान दौर आये और गए ..बस ‘वस्तु’ और तथास्तु कायम है …

भंवरी का मंचन

बात है उस समय की जब हम ‘सभ्य’ बनाना शुरू हुए .. हमने अपने शुद्ध , सात्विक शरीर को जब ढकना शुरू किया .. सर्दी ..गर्मी से बचने के लिए तो हम ..अपने बचाव शुरू से करते आयें हैं … पर सभ्यता के नाम पर जब ..अपने तन को ढकना शुरू किया … पहले पत्तों, से ..फिर पशुओं के चरम से फिर वस्त्रों से ..और इतिहास गवाह है की सभ्यता के नाम पर हमने जितना तन ढका ..इंसानियत उतनी ही नंगी होती चली गयी … जिस्म पर वस्त्र बढ़ते गए और इंसानियत  के वस्त्र उतरते गए …निश्छल,पवित्र मन , भाव , लोभ , लालच बढ़ता गया .. भविष्य की भट्टी में वर्तमान जल गया ..और आज तक जल रहा है ..आज को जीने की बजाय कल की आग में सब जल रहे हैं … जैसे ..यहाँ बैठे बैठे आप ..मैं क्या कह रही हूँ ये समझने ..बुझने ..मनन करने की बजाय ..मैं आगे क्या बताने वाली हूँ ..उस अनुमान .. अंदाज़े के तवे पर अपने इस पल के सुख को भुन रहे हो … मतलब ..सुख चैन ..का स्वाद , आनंद सीखा ही नहीं ..हाँ भाई सभ्य जो हो ….

इस आगे की सोच ने उजाड़ दिया आदम जात को … खाने को अपार , रहने को प्रकृति की गोद … आदम और प्रकृति का संतुलन , बल्कि प्रकृति की श्रेष्ठता का ढंका बोलता था … पर आज तो सब मिल रहा है ..पूरी दुनिया का भ्रमण , कबीला , खानाबदोश जीवन .. पर नहीं कीड़ा घुस गया दिमाग में कल क्या होगा … फिर क्या .. जोड़ना , जमा करना शुरू , सामूहिक कबीला बंटा तेरे कबिले, मेरे कबिले में… तेरे भू भाग मेरे भू भाग में .. कबीला बंटा , ज़मीन बटी, जल जंगल बंट गए … पशु प्राणी बंट गए ..पहले पशु गुलाम हुए ..आदम ने पशुओं को गुलाम बनाया .. पशु पालन शुरू किया .. पशु पालन से खेती शुरू हुई . और खेती से सम्पति ..जायदाद का ख्याल आदम के दिमाग में आया … और हम सब अपना अपना बाँट के सभ्य हो गए … यानी पशु से इंसान ..सभ्य इंसान बन गए … ये बात और है की हम इंसान बनने की बजाय वस्त्रों से लदे पशु बन गए …

अरे हाँ पशुओं से याद आया की जब तक पशु पालन को मर्द जात ने करीब से नहीं देखा था तब तक ..मर्द जात को पता नहीं था की सन्तान के जन्मने में उसकी कोई भूमिका है … पशुओं के लैंगिक व्यवहार को देखकर .. समझ कर मर्द जात के दिमाग में बत्ती जली की सन्तान उत्पत्ति में उसकी अहम् भूमिका है … बच्चा ..औरत और मर्द के सम्भोग से पैदा होता है ..ये मर्द को पता चला ..उससे पहले मर्द को लगता था औरत में गजब की दैवीय ताकत है जिसके बल पर वो सन्तान पैदा करती है …

पशु पालन से मर्द को जो ब्रह्म ज्ञान मिला वो ये …१ अपने शरीर और दिमाग के बल पर वो पशुओं को पालतू बना सकता है २. सन्तान उत्पत्ति में उसकी भूमिका है ..बिना मर्द के औरत सन्तान पैदा नहीं कर सकती ३. खेती करना …4. खेती ने संपत्ति ..जायदाद का लालच ..लोभ मर्द में पैदा किया … पहले कबीलाई संपत्ति ..फिर कुनबे की ससंपत्ति और फिर निजी संपत्ति… और फिर संपत्ति..संपत्ति .. और सिर्फ़ संपत्ति…. पति..पति..पति ….
इस संपत्ति और  पति के नए अवतार में मर्द को एक ताक़त का अहसास हुआ ..मैं कर सकता हूँ ..मैं हूँ …ये मेरा है ….बस यही वो कीड़ा है जो मर्द के इन्सान को खा  गया …इसने ..मर्द के अन्दर ‘डर’ पैदा कर दिया …’डर’ खो जाने का … संपत्ति के छीन जाने का … और इस ‘डर’ का मुकाबला करने के लिए उसने ‘हिंसा’ का उपयोग किया .. मजे की बात ये ‘डर’  उसे कभी औरत जात से नहीं था …कोई मेरी संपत्तिछीन लेगा … ये ‘डर’ उसे अपने जैसे ‘मर्द’ से था ..और आज भी है .. इस ‘डर’ से पीछा नहीं छुड़ा पाया मर्द ..उसने दूसरों को डराने के लिए ..युद्ध किये ..इस ‘डर’ ने मर्दों में श्रेष्ठता की होड़ लगाईं ..और मर्दानगी को जन्म दिया … यानी शरीर बल , युद्ध कौशल  , हिंसा ..कब्ज़ा …ये इसके माप दंड बने ..और इसमें से वो मर्द जो इस  कसौटी पर खरे नहीं उतारे उनको इस मर्दानगी वाले मर्द ने …दास बनाया … कबिले से शुरू हुई ये दरिंदगी ..नस्ल तक पहुँच गयी … उस समय शुरू हुआ मर्दानगी का खेल आज भी बदस्तूर जारी है …. इतनी  हिंसा .. खून खराबे .. के बाद भी मर्द अपने अन्दर के ‘डर’ को नहीं जीत पाया ..उससे आज भी आतंकित है ..और वो हैसंपत्ति. के खो जाने का ‘डर’… इस संपत्तिके ..जायदाद के खेल ने मर्द से इंसानियत छीन ली और उसमें सदा सदा तक ये जंगली ‘पशु’ को पैदा कर दिया … जो हिंसा के बल पर दुनिया में काबिज़ होना चाहता है ..पर तब से लेकर आज तक हो नहीं पाया … मेरी संपत्ति मेरी रहे ..इस ‘डर’ ने इससे क्या क्या नहीं करवाया ..एक व्यवस्था बनवाई ..मर्द की चले ..कबिले में ..घर में ..गाव में .. मर्द याने पिता … पितृसत्ता … जिसमें ‘मर्दानगी’ वाले मापदंड वाले पुरुष ही श्रेष्ठ होते हैं ..उनकी सत्ता .. उसके लिए इस मर्द ने …हिंसा , और भेद का सहारा लिया …जो आज भी कायम है …
अब खेल देखिये … सन्तान पैदा करती है औरत और मर्द मिलकर ..दोनों की  साझा सन्तान ..इस मर्द ने कुदरत के इस नियम को अपने हाथ में लिया ..और कहा मेरा बच्चा ..यानी बच्चा पैदा करे औरत ..पर बच्चा मर्द का … इस मर्द ने अपना बच्चा पैदा करने के लिए क्या क्या नहीं किया ..पहले तो औरत जात को गुलाम बनाया ,उनको एक बाड़े में रखा , उनकी आज़ादी को खत्म किया … कहीं भी जाने की .. घुमने की ..किसी के बच्चे की माँ  बनने की ..अपने लैंगिक इच्छा और औरत के कुदरती स्वभाव  पर अंकुश लगाया ..उसके लिए ..इस मर्द ने युद्ध किये ..  समाज के नियम बनाये .. और एक पितृसत्ता व्यवस्था कायम की …पितृसत्ता व्यवस्था का मतलब ही है ‘मर्दानगी वाले मर्दों’ की सत्ता जिसका मूल है  शोषण  और भेद भाव … मर्दों, मर्दों में भेद भाव … औरत मर्द में भेद भाव … व्यवस्था में औरत को गुलाम बनाने के बाद ..’ इस मर्द ‘ ने औरत जात को पालतू बनाना शुरू किया ..उसके लिए इसने धर्म बनाया …और वो ‘मर्द’ वाला इजाद ‘धर्म’ आज भी मर्दानगी के उसूलों पर चलता है …चाहे वो कोई भी धर्म हो ..’वध’. क़त्ल .;; हिंसा .. उसका मूल है ..ऊपर से वो कितनी मिट्ठी बात करे … उस धर्म में पहला धर्म शुरू हुआ ..औरत के मासिक धर्म से ..हाँ भाई क्यों ‘मेरा बच्चा’ हो इस दुराग्रह से औरत के मासिक धर्म को नियंत्रित किया गया … इस समय वो कहाँ जायेगी ..क्या करेगी .. ये तय किया ‘मर्द’ ने ..उसमें छुत.. अछूत का खेल किया … पवित्र ..अपवित्र का ऐसा खेल शुरू किया की इस कुदरती प्रक्रिया को औरत एक बोझ समझती है …इस समय अपने आप को हीन समझती है ..जब की सृजन शक्ति के इस काल में उसे ‘आत्म विश्वास’ से लबालब होना चाहिए …. पर औरत इस सृजन शक्ति पर्व पर अपने को असहाय और पीड़ित समझती है ..दरअसल किसी से लड़ने का कारगर अस्त्र है उसको भीतर के स्तर पर  यानि मन के स्तर पर तोड़ दो …वो कभी स्वाभिमान से उठ नहीं पायेगा ..यही मर्द ने किया है उसके साथ … पहले उसके स्वाभिमान , फिर कुदरती सृजन प्रक्रिया और उसका इंसान होना ..स्वावलंबी होना इन  सब पक्षों पर षड्यंत्र वश कुठाराघात किया है …
अरे भाई क्या हो गया ..आप  क्यों उबल रहे हो …मैं आपकी नहीं उन मर्दों की बात कर रही हूँ ..आपकी नहीं ..या कहीं आप में भी वो मर्द तो नहीं जाग गया …बात बता रहीं हूँ मैं अपनी ..आप बीती … किसी को गलत या सहीं नहीं बता रही … और तुम जो उबल रहे हो … तुम भी इससे पीड़ित हो ..आज तुम्हा री बहन बेटी .. घर से देर सवेरे बाहर होती है तो किससे डर लगता है तुम्हें ..’इसी मर्द ‘ से ना ..तो तुम भी पीड़ित और मैं भी पीड़ित .. एक पीड़ित को दूसरे पीड़ित की बात सुननी चाहिए ..यही धर्म है …

भंवरी -मंचन के बाद

ये धर्म भी इस ‘मर्द’ ने अपनी हर बात जायज  ठहराने  के लिए किया .. औरत के मासिक श्राव पर कब्ज़ा करने  के लिए ..मासिक धर्म बना .. यानी औरत के बीज .. अंडाणु को कंट्रोल करने और ‘मेरी औलाद , हो इस औरत की कोख से’ यही है धर्म का मूल ..और आधार ये की सम्पत्ति के लिए क्लेश ना हो ..जो ‘मर्द’ का फ़ैसला हो वहीँ सबको मानना पड़ेगा ..यहीं है सभी धर्मो का मूल … ये बात कडवी है पर सोलह आन्ने सच है भाई ..
मर्द ने व्यवस्था और धर्म यानी .. पितृ सत्ता जो कहे वही धर्म ..से स्थापित करने के बाद पालतू औरत को अपनी भक्त बनाने के लिए संस्कारों का खेल शुरू किया … पहले तो औरत मेरी सम्पति, इसके लिए उसको बाड़े में बंद किया … और बाड़े से बाहर निकलने के लिए मर्द के कानून से वो व्यवहार करे ..इसको धर्म बनाया .. फिर मेरी संतान उत्पन्न हो उसके लिए औरत को ‘पत्नी’ बनाया यानी ..विवाह संस्कार की स्थापना की … पत्नी यानी पति की सम्पति .. इसके लिए मर्द ने .. बाकायदा .. औरत विवाह के बाद उसकी है उसको चिन्हित करने के लिये उसके गले में अपना पट्टा डाला उसको क्या कहते हैं आप ‘मंगल सूत्र’ ..उसके माथे पर बिंदी ..मांग में सिंदूर … पावं में पायल ..यानी वो जब भी कभी बाहर निकले ..वो अपना स्वयं विज्ञापन करती हुई निकले ..मैं उस मर्द की सम्पति हूँ ..माल हूँ … उसकी वस्तु हूँ …वो मेरा मालिक है .. मैं उसकी पराधीनता स्वीकार करती हूँ ..और मैं ये संस्कारों को मानती हूँ ..नहीं मानूगी तो मैं मर्द द्वारा निर्धारित दंड की भागीदार हूँ …

इतना करने पर भी ‘मर्द’ का डर गया नहीं ..शक का कीड़ा उसे हर पल सताता है …सता रहा इसलिए औरत के शरीर पर बल पूर्वक कब्जा करने के बाद उसके दिमाग पर कब्ज़ा करने के लिए उसने ..धर्म , पुरोहित ..संस्कार ..त्यौहार ..उपबास .. व्रत ..के तन्त्र ..मन्त्र की स्थापना की … यानि बाड़े में कैद औरत को संस्कारित किया गया ..पतिव्रत ….बनाने के लिए ..मर्द  के मन में एक ही मन्त्र चलता है ..तू मेरी हो .. मेरी रहे ..मैं सबका हूँ ..सब मेरी हों …उसके लिए ..संस्कार ..रचे गए ..वो परम्पराएं बन गयी … बाड़े के अंदर ,,मेरी बन कर रह .. मेरे लिए ..प्रार्थना कर ..मैं तेरा भगवान तू मेरी भोग्या.. जब चाहूँ ..जैसे चाहूँ ..हर समय उपलब्ध रह …तेरा धर्म है बस मर्द को खुश रखना और ..मेरी ही ‘ औलाद’ को जन्म देना … तू माँ बनेगी तो  सिर्फ़ मेरे बच्चों की ये तेरा धर्म हैं और मैं कितने ही बच्चों का बाप बन सकता हूँ ये मेरा यानी मर्द का धर्म है ..आखिर यही तो है असल मर्दानगी … और इन्हीं संस्कारों को तू  ऐ औरत आगे बढ़ा… इतना मैं तुझे  अधिकार देता हूँ पर कभी मेरे रास्ते मैं मत आना ..तब से लेकर औरत ..संस्कार , परम्परा और संस्कृति की खेवनहार है और वो है ..भोग्या वस्तु ..की संस्कृति .. संस्कार और परम्पराएं … जिसका पालन औरत आज भी कर रही है ..एक औरत दूसरी औरत को यही बताती है तू मर भी रही हो पर मर्द को मना मत करना …

इतना करने पर भी ‘मर्द’ का डर खत्म नहीं हुआ ... संपत्ति का रोग .. अब सन्तान पैदा होगी तो वो मोटी मोटी औरत और मर्द जात होगी या कभी कभी तृतीय पंथी भी  होगी .. अब औरत को सम्पति में हिस्सा देना नहीं .. और तृतीय पंथी को हाशिये से बाहर रखा … औरत को विवाह संस्था से बाँध दिया … और संपत्ति से बेदखल करने के लिए संस्कार बनाया ..कन्या दान और ये पुरोहित से मन्त्र चलवाया कन्या दान महादान … ये कोई पुन्य का काम नहीं है … इसकी असली वजह है ये  पक्का करना है , सुनिश्चित करना है की हर औरत  की पहचान एक ‘वस्तु’ है और उस वस्तु का दान हुआ की नहीं ..और उस दान वस्तु का मर्द ने भोग लगाया या नहीं … दान वस्तु का किसी सम्पति पर हक्क नहीं बनता …इसलिए .. अपनी नस्ल .. गोत्र विवाह ..वर्ण व्यवस्था को कायम रखने के लिए ये संस्कार और संस्कृति प्रस्थापित और प्रचलित की गयी और आज भी है ..आज भी मर्द तय करता है की वो  अपनी ‘कन्या वस्तु ‘ किसे दान करे .. वस्तु की राय मायने नहीं रखती …. उसको पितृ सत्ता  की संस्कृति   का निर्वहन करना होता है …

इस संस्कृति का हर संस्कार संपत्तिसे जुडा  है … औरत सन्तान पैदा करेगी और हर बार मर्द पैदा होगा… ये …प्रकृति नहीं स्वीकार करती ..इसलिए ..मर्द पैदा करने वाली औरत श्रेष्ठ ..औरत में श्रेष्ठ औरत वो जो मर्द पैदा करे .. एक भोग्या वस्तु के रूप में रहे और मर्द को खुश रखे … भोग्या के सारे गुण ..नाजुक , सुन्दर . ह्यावान , अब आप सब जानते हो …उसका बखान करने के लिए कवि कालिदास से ग़ालिब तक हैं ..मय..मदिरा ..शराब और शबाब से भरा पड़ा है मर्द साहित्य …जिसमें भोग्या..दबी ..कुचली ..शोषित जात है औरत ….
मर्द ही होगा मर्द की संपत्तिका वारस… और वारिश देने वाली … वंश ..कुल दीपक को जनने वाली ही इस पितृ सता में स्वीकार्य है .. ये है सम्पति का सच ..और संस्कारों का ढ़कोसला… सम्पति का डर यहीं खत्म नहीं हुआ मर्द का ..विवाह पश्चात . मर्द की मृत्यु … मर्द की मृत्यु के बाद औरत स्वीकार नहीं ..वो संपत्ति में हक्क मांगेगी ..इसलिए उसके पति प्रेम को महिमा मंडित करवाया गया और उसे जिंदा जलाया गया ..सती प्रथा, यही प्रथा है ..और आज भी हमारे समाज में ये महिमा मण्डन है …. मतलब संपत्तिको पाने के चक्कर में ये मर्द क्या क्या कर रहा है … पर संपत्तिहै की इसके कब्जे से बाहर चली जाती है …

ये कबीले के सरदार से लेकर  राजा, पुजारी , व्यापारी , सब बन गया , वर्ण व्यवस्था से वर्ग व्यवस्था , सामन्तवाद से समतावाद तक .. धर्मान्धता से विज्ञान तक .. तानाशाह से लोकतंत्र तक .. साम्यवाद से पूंजीवाद तक ..अनपढ़ से पढ़े  लिखे तक … असभ्य से सभ्य होने तक ये मर्द , मर्द रहा और इसने सब कर लिया ..पर संपत्ति कैसे इसकी हो इसका तोड़ नहीं निकाल पाया ये मर्द … आदम जात से हिंसक बना , शोषक बना .. अत्याचारी , व्यभिचारी या क्या क्या बन गया इस सम्पति के खेल में बस … इन्सान नहीं बन पाया ये मर्द ..जो बाहर से मज़बूत पर अन्दर से खोखला … बाहर निडर ..निर्भीक शेर ..अन्दर कायर ..डरपोक चूहा है ये रक्त पिपासु मर्द ….

फुट ..फुट ..और फुट .. डालो और राज करो ये मर्द का मन्त्र है ..इसलिए वर्ण व्यवस्था ..जात व्यवस्था में बदल गयी .. हर जात का अपना ..अपना मर्द … यानि कुदरत ने बनाई जात  में मर्द ने और जात बना दी … सवर्ण और बिना वर्ण … पर कमाल देखिये .. एक जात दूसरे से श्रेष्ठ ..यानी सवर्ण जात का मर्द श्रेष्ठ .. उसकी श्रेष्ठता सभी वर्णों को स्वीकार ..पर औरत के उपर सब शेर …वो सबकी संपत्ति … क्या सवर्ण और क्या अवर्ण … यानी मर्द तो मर्द है जी ..क्या हुआ अगर सवर्ण जाति के मर्द की लात खाया है अवर्ण जाति का मर्द ..पर औरत ..पर कब्जा सभी का ..जात की जात ..की जात की जात यानी औरत जात ..वो बस वही  काम आती है ..और वहीं सजती है ..यानी यौन संतुष्टि और पैर की जूती… ये हैं हमारे संस्कार और संस्कृति … मंगल से मांगलिक .. सौ भाग्यवती से अभागन , सर्प दोष से योनी दोष सब मर्द के द्वारा स्थापित पुरोहित की भोग्या पिपाशु पशुता का …. योनी में लिंग फंसाकर …लिंग  ध्वज को पूजा अर्चना की जगह स्थापित करने को ..की हर पल तू ..ऐ औरत मत भूलना तेरी  योनी पर  पहला और अंतिम कब्जा लिंग का है सिर्फ़ मर्द का लिंग ही जीवन और आराधना है तेरी .. मर्द का लिंग ही तेरा कल्याण है .. और ये मर्द द्वारा बनाई गयी चार दीवारी तेरी दुनिया है …इसके बाहर तूने कदम रखा तो मर्द का लिंग तेरी योनी का भोग लगाने के लिए तैयार है … इसलिये खबरदार ..तू किसकी है उसका मंगल सूत्र लटका कर आना ..किसी मर्द को साथ लेकर आना चाहे वो ३ साल का पिद्धा ही क्यों ना हो .. और मर्द ही जनना … और मर्द जब चाहे उसके लिए तैयार रहना ..फिर वो मर्द सवर्ण हो या अवर्ण … यही ज्ञान है …और यही विज्ञान है मर्द का ..मर्दों के लिए …कडवा है ..पर सच है …

औरत के बाहरी यौनांग यानी भग्नासा से यह  मर्द और इसकी पितृसत्ता डरती है … कांपती है .. पसीने छूट जाते हैं पितृसत्ता के …क्यों बात जमी नहीं क्या? पर सच्च है क्योंकि यह अंग … बाहरी यौनांग यानि भग्नासा औरत को उन्मुक्त यौनाचरण के लिए प्रेरित करता है . जिससे पितृसत्ता के खोखले समाज के स्थायित्व को खतरा है . नैतिकता ..नैतिकता का ढोल तब बजता है जब औरत के यौनाचरण पर पुरुषों की पाबंदी हो …ये औरत की देह के प्रति देखने का पितृसत्तात्मक नजरिया है ..जिसका मतलब है औरत केवल प्रजनन के लिए है … यानी उसका गर्भ तो पुरुषों को चाहिए ..परन्तु औरत का यौनानंद उन्हें स्वीकार नहीं … इस व्यवस्था में और को यौनानंद प्राप्त करने का अधिकार नहीं … यानी औरत की सारी देह का पुरुष जैसे चाहे आनंद ले … पर औरत नहीं ले सकती और ना ही ..ना कह सकती है … औरत की देह के वही  हिस्से इस व्यवस्था को स्वीकार हैं जिससे इनका फायदा है … इसलिए औरत के G स्पॉट और C स्पॉट ..कलितोरिउस … की संवेदन तंत्रियों को देह से अलग कर दिया जाता है ..यानी औरतों का खतना किया जाता है … उसको सी ..यानी तालेबंद किया जाता है .. यही वो दम्भी सोच है जो औरत के यौनानंद के  कुदरती हक़ को छीन कर उसे ‘यौन’ दासी बनकर रखती है … जिसकी वजह से औरत को अतिचारी अमानवीय प्रक्रियाओं को सहना पड़ता है … और ये मर्द जहाँ औरत दिखी नहीं … कि इसका लिंग ध्वज फडफड करने लगता है ..यही है मर्द के लिंग ध्वज का पराक्रम..शर्म आयी ना इस सच्चाई को जानकर ..पर ये तो आपके आसपास हमेशा होता है की ये औरत को देखा नहीं की मर्द का लिंग ध्वज फड फाड़ने लगता है और शर्म कहीं कोसों दूर भाग जाती है और सारे मर्द सामूहिक भोग लगा ..अपने लिंग ध्वज को फहराते हैं …

यही मेरे  साथ इन मर्दों ने किया … मेरा दोष ये था की मैं मान बैठी थी की मैं १९४७ में आज़ाद हो गयी थी ..मैं मान बैठी थी की लोकतंत्र में संविधान ने मुझे बराबरी का हक्क दिया है .. मैं मान बैठी थी की मुझे वोट देने का मर्द के बराबर अधिकार है .. मैं इस नई आज़ाद फ़िजा मैं एक इंसान हूँ ..मेरे हक्क ..हुकुक हैं ..मैं भारत सरकार के जन उत्थान योजना की एक कार्यकर्ती हूँ .मैं संविधान सम्मत ..नीतियाँ लागू करने में ..सक्षम हूँ … कानून सम्मत नहीं है बाल विवाह … वो एक बुराई है ..वो एक अभिशाप है और ग़ैर क़ानूनी है ….बस यही तो मेरा कर्म था … पर मर्द के बनाये दायरों ..कानूनों …मर्द की सत्ता में दखल था मेरा ये कर्म … ये मर्द को बर्दास्त नहीं हुआ … उसने सबक सीखाया .. अपना लिंग ध्वज ..सामूहिक .. रूप से सरे आम ..आज़ाद देश के आज़ाद परचम के नीचे फहराया अपना लिंग ध्वज और पूरी दरिंदगी के साथ … जानवरों से भी बदतर ..अपनी मर्द की सत्ता को स्थापित करने के लिए … मेरी योनी को सबक सीखाने के लिए ..मुझे ये बताने के लिए की मैं औरत हूँ ..औरत मर्द की एक वस्तु एक भोग्या …

अपने लिंग ध्वज उपक्रम में इस मर्द ने वहशीपन की हद्दें तोड़ दी ..समाज , परिवार , संस्कृति , रिश्ते नाते ..सारे संस्कृति के ढकोसले सामने आ गए .. क्या बुड्ढा, क्या जवान ..क्या बालिग़ ..क्या ना बालिग़ … सब मर्द उस दिन मेरी योनी का भोग लगाकर ..अपना ..अपनी मर्दानगी साबित करने के लिए  सामूहिक और सरेआम अपना लिंग ध्वज फ़हरा रहे थे …

मैं चूर ..चूर .. बेहाल … इनकी दरिंदगी की शिकार … मेरे शरीर को तोड़ा.. मेरी आत्मा को नश्तर .. मेरे रोयें रोंयें में बसी इनकी हवस … मेरी चीख ..पुकार ..पीड़ा ..मेरा मान, सम्मान , स्वाभिमान ..सब खंडित ..विखंडित … चूर ..चूर ..जज़्बा.. इसांनियत का चूर  चूर ..सिर्फ़ औरत ..औरत का शरीर ..अपने आप को कोसता हुआ ..घिन घिनौना ..रूप … बस एक जिंदा लाश ..अपने आप को ढोती हुई .. अपने व्यक्तित्व , अस्तित्व , स्वाभिमान और इंसानियत की लाश अपने कन्धों पर लेकर चलती हुई ..एक जिंदा लाश … और अपनी मर्दानगी का लिंग ध्वज फहराते मर्द …

भंवरी का अभिनय करती बावली रावत

पर मैं उठी … अपने जिस्म के घावों को भरा , रूह के नश्तरों को सीया, और अस्तित्व के एक एक टुकड़े को जोड़ा , अपनी अस्मिता की राख से अपनी स्वाभिमान के लौ को जलाया और न्याय के लिए निकली .. मैंने  अपने आप को कहा मैं वस्तु नहीं हूँ ..इंसान हूँ ..जिन्दा हूँ ..आज़ाद देश में हूँ … कानून है , न्याय व्यवस्था है … कोई सनक नहीं है किसी की … की जो जब चाहे, जो चाहे करे .. अदालत गयी .. अपने उपर हुए अन्याय के लिए न्याय मांगने … मेरा मेरे जीवन साथी ने साथ दिया , पूरे देश की औरतों ने साथ दिया .. देश में औरत के ह्क्कों की लड़ाई का सिलसिला तेज़ हुआ .. अदालतें जागी … ये भरोसा हुआ मुझे न्याय मिलेगा … पर अदालत की दहलीज़ में जाति व्यवस्था ने पैर ..पसार लिए .. विज्ञान के युग में चाँद से आये एक मर्द न्यायधीश ने जाति वादी व्यवस्था में सवर्ण और अवर्ण के छुआ छुत के भेद को मानते हुए … पूरी घटना को असम्भव करार दिया …  क्योंकि जज साहब के घर चाँद में जो पुस्तक पढाई जाती है .. उसको ही उन्होंने सच माना और इस देश की धरती पर आकर देख लेते कैसे सदियों से सवर्ण मर्दों की लार टपकती है अवर्ण औरतों पर .. वो खेत हो .. खलियान हों , घर हो ,  में चौबारा हो … सुबह , हो ,,दिन हो .. रात हो … उनकी सेज सजाने के लिए  अवर्ण महिलाओं को अपनी सम्पति समझ कर उपभोग किया जाता है … काश की जजये समझ पाते ..अपने जन्म के संयोग और मर्द होने के दभ को छोड़ एक न्याय व्यक्तित्व के रूप में घटना को देख पाते … ये अफ़सोस है मेरे मन में ..काश …
“जब तक औरत पुरुष की ज़रूरत पूरा करे …पैदा करे तब तक संस्कारी ..और जब औरत अपनी ‘इच्छा’ जाहिर करे तो चरित्रहीन… वाह रे वाह ..क्या मापदंड है  ये पुरुषों का .. पुरुषों के लिए .. पुरुषों द्वारा बनाया समाज का”.. इतिहास में ..धर्म में कौन सा ऐसा पुरुष है जिसने ‘औरत’ का  अपनी ज़रूरत के लिए उपयोग ना किया हो ..जिसने उसकी देह के अतिरिक्त उसे व्यक्ति समझा हो ..उसे इंसान माना हो .. कहाँ हैं वो मर्यादा पुरुषोत्तम जो सिर्फ़  ‘अग्नि परीक्षा’ लेना जानते हैं ..और  अपनी ‘परीक्षा’ के समय औरत के साथ खड़े होने की बजाए उसे ‘वनवास’ भिजवा देते हैं .. धिकारती हूँ मैं ऐसे ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ पुरुषों को .. धिकारती हूँ ऐसे समाज और उसकी मान्यताओं को .. धर्म , सामन्तवादी ,तानशाही  लोकतान्त्रिक , और उदारीकरण वाली सत्ता और उसकी व्यवस्थाओं को जो सिर्फ औरत की देह का उपयोग और उपभोग करना जानती हैं और मानव इतिहास के आरम्भ तक करती आईं हैं ..नकारती हूँ ऐसी व्यवस्थाओं को..

भंवरी देवी

पर मैं तो लोहे की बनी हूँ ..पक्की दृढ इच्छा शक्ति की हूँ ..जो टूटना था, वो टूट चूका ..ये मेरा युद्ध है न्याय संगत व्यवस्था के निर्माण के लिए ..अब बनना ही बनना है और बनाना है ..एक न्याय संगत समाज… मैं औरतों से पूछती हूँ अपनी कोख में मर्द को पालने की बजाय आओ इंसान पालें … मर्दवादी , मनुवादी , पितृ सत्ता , उपभोग वाद , शोषण कारी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लडें.. अपने घरों में मर्द बच्चा नहीं ..इंसान बच्चे की परवरिश करें , अपनी कुदरती रचना को विषमता का आधार ना बनने दें … हम भिन्न हैं ..विषम नहीं ..वस्तु नहीं ..इन्सान हैं ..शरीर से परे ..एक व्यक्तित्व के रूप में पहचान बनाएं ..औरतों के काम से मुक्ति पाएं और काम का कोई लिंग नहीं होता ये मर्दों को समझा दें .. हिंसा मुक्त एक समता वादी , नारीवादी,  शांतिप्रिय, इंसान का समाज बनाएं ….

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जहां ईश्वर है और अन्य कविताएं (वीरू सोनकर)

वीरू सोनकर

कविता एवं कहानी लेखन, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं व ब्लाग्स पर रचनाएं प्रकाशित . संपर्क :veeru_sonker@yahoo.com, 7275302077

जहाँ ईश्वर है 

प्रार्थना के पीछे पहले आत्मा गयी
फिर देह

दोनों ने इच्छाओं के आकाश तक अपने हाथ बढ़ाये
और संयुक्त रूप से एक नाम वहाँ टांक दिया.

देह की दृष्टि बार-बार आकाश को देखती.
वहाँ अपना नाम देखती और आश्वस्ति से भर उठती

आत्मा कहीं न जाती
रोज एक अंध-कूप खोदती
भर देती उसे तमाम व्याकुल प्रश्नों से.

देह और आत्मा दोनों को चाहिए था एक ईश्वर
जो एक निशान लगाता, आकाश पर लगातार जल रही एक प्रार्थना पर
प्रतीक्षा-सूची से घटा देता एक नाम
प्रश्नों के भरे एक पतीले को वही पलटा सकता था!

एक वही था
जो एक मौसम की तरह पृथ्वी पर गिरता.
एक वही था, जिसे हर प्रार्थना मोक्ष की तरह तलाशती.

बहुत बार वह मिलता था देह और आत्मा के एक अनुपातिक संतुलन में

देह और उसकी प्रार्थना,
ईश्वर के हो सकने पर दोनों ही शंकालु थे.

आत्मा अंधकूप में रोती कि देह ने अपवित्र किया है प्रार्थना को
वह सोचती थी और प्रश्नों से कूप भरती थी.

आत्मा ईश्वर की परछाई को एकदम साफ देखती थी
अपना पांव बढ़ाती थी उस तक

देह पीछे छूटती थी.
शंकाओं का भार सिर्फ देह उठाती थी.

नींद


1.
एक आदमी

हर दिन कपड़े की तरह पहनता है नई सुबह को
और रात को याद करता है कि वह आदमी होने से पहले एक बादल था.

एक थका हुआ बादल फिर बदलता है ओस में
जिसे रात ओढ़ कर सो जाती है.

2. 
एक स्त्री

नींद की प्रतीक्षा में गोल-गोल घुमाती है पृथ्वी.

घूमने से थकी पृथ्वी के पास नही है कोई शिकायत
उसके पास मौसम है.

स्त्री सोचती है वह मांग लेगी एक दिन पृथ्वी से उसके मौसम.

स्त्री कई सदी से थकान में चूर है पर उसके पास भी नही है शिकायतें

पृथ्वी और स्त्री अनंत चाहनाओं की देह है.

पृथ्वी और स्त्री एक दिन सो जाएंगी एक साथ.

एक मौसमी नदी का हाथ पकड़ कर जाएंगी वह
एक बहु-प्रतीक्षित नींद की ओर

3

एक बच्चा

हवा की आवाज सुनता है
और चला जाता है नींद की ओर

नींद बड़े होने के सपनो से भरी एक आकाशगंगा है.

वह उस आकाशगंगा को लोरी गाते सुनता है
कुनमुना कर कहता है अभी और सोऊँगा.

आकाशगंगा
उसकी इस नींद से इतना खुश है
कि अगली सुबह वह चुपके से काट देगी
बड़े होने की प्रतीक्षा का एक और दिन.

4

हवा के हाथों में है
उस एक आदमी, स्त्री और बच्चे की शिकायतें.

वह स्वांस बन कर रोज गिनती है प्रतिक्षाओ से भरे एक दिन को
और चाहनाओं से भरी एक नींद रोपती है उनके माथे पर

रात, पृथ्वी पर रोज फैलने वाला एक मौसम है.

नींद एक सुरंग है जो रात को खुलती है
और इन तीनो को एक साथ आवाज देती है.

ओ धरती के सबसे जिंदा मौसमों, ओ अथक दौड़ती घड़ियों, ओ प्रतीक्षित प्रेमिल नदियों

आओ, इस मखमल पर एक साथ गिरो.
आओ, अपने इस बहुत भारी दिन को मेरे हाथो में दे दो.

एक बादल बनो और सो जाओ!

स्त्री

वह संसार देख रहे थे
वह यात्री हुए.

उन्होंने दुख देखा तो कई बार बुद्ध बने.

आकाश देख साधु हुए.
पहाड़ देख कर वह पुरुष हुए.

वह कौतूहल से भरे थे वह बच्चे हुए.
अब एक पूरी पृथ्वी उनके मुँह में समा सकती थी

जब उनकी जिज्ञासा का भूत उतरा
तो उन्होंने इन सभी को फिर से देखा.

उन्होंने फिर से देखा, क्योंकि वह उनके प्रेम में पड़ गए थे.

वह अब चुप हुए
वह इस बार स्त्री हुए!

टिके रहने का सौंदर्य-शास्त्र 

वह बदसूरत होंगे.
रुकी हुई एक बासी झील के बगल से
एक नदी की लज्जा ओढ़ कर निकल जाएंगे!

वह धीमे चलेंगे
पर मुक्त होंगे ठहरे होने के अपराध-बोध से.

समझौते की पाप संधि से बाहर
एक अराजक दृश्य रचेंगे.

पुरानी होती देह पर घाव खाएंगे
और अपने वक्त की सबसे निष्पाप स्वांस लेंगे

वह एक लुप्तप्राय प्रजाति हैं उनकी भाषा मे समा जाती है एक पूरी पृथ्वी.

‘रुकने’ और ‘टिकने’ को बार-बार परिभाषित करते हुए
वह लगातार नए की ओर चलेंगे.

वह बदसूरत होंगे
पर दृश्य में सबसे सुंदर होंगे!

उसने जाना था 

जामुन से अपने हिस्से की रात उधार लेकर
उसने आंखों में दो बूंद इच्छा रोपी थी
एक स्वप्न उगा था फिर

देह में, दुख की एक रिस रही कोख भी है
उसने जाना था

आवाज में कोई अनंत प्रतीक्षा छुपी थी
पुकार से जाना उसने

उसने जाना, आकाश के भीतर बैठी है समस्त प्रार्थनाएं

वह समुद्र के मौन-शोर में पनाह मांग रही थी
कि उसके चेहरे पर टपक पड़ी
एक नवजात नदी!

उसने जाना कि एक नदी का साथ होना भर ही काफी है

उसने जाना कि कितना सुंदर है
नमक घुली मुस्कुराहट के साथ आईने के भीतर जाना

वह नही गयी फिर कहीं!

उसने शाम होते ही एक चुटकी सिंदूर हवा में उड़ा दिया
और उसकी सभी स्मृतियों के चेहरे चमक उठे

यह पहली बार था
कि एक उदास नदी से समुद्र ने उसकी गहराई मांग ली!

तस्वीरें गूगल से साभार 

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पेरियार: महिलाओं की आजादी का पक्षधर मसीहा

ललिता धारा 


महिला दिवस पर विशेष 


पेरियार की मूर्ति को नुकसान पहुंचना समतावादी आंदोलन और विचार के प्रति प्रतिगामियों के गुस्से की बानगी है. आइये आज महिला दिवस पर समझते हैं कि पेरियार किस तरह जेंडर-स्वतन्त्रता के बड़े पक्षधर थे. 

तमिलनाडू में २०वीं सदी के गैर-ब्राह्मण द्रविड़ आन्दोलन का लम्बा और उथल-पुथल से भरा इतिहास था. इसकी शुरुआत १९१६ में जारी गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र से मानी जा सकती है. इस अवधि में महिलाओं की स्थिति और जाति व्यवस्था से सम्बंधित सुधार हुए तो परन्तु वे बहुत सीमित थे. सन १९१७ में गैर-ब्राह्मणों की राजनीतिक और शैक्षणिक बेहतरी के लिए ‘जस्टिस पार्टी’ का गठन किया गया. सन १९२० के प्रांतीय चुनावों में यह पार्टी सत्ता में आयी और तमिलनाडू में पहली बार गैर-ब्राह्मण सरकार बनी. ईव्ही रामासामी, जिन्हें पेरियार के नाम से जाना जाता है, इतिहास के इसी दौर के प्रमुख पात्र थे.

पेरियार की नेतृत्व क्षमता सन १९२५ में शुरू हुए आत्माभिमान आन्दोलन में सामने आयी. इस आन्दोलन का लक्ष्य था गैर-ब्राह्मण जातियों को उनके द्रविड़ मूल पर गर्व करना सिखाकर उन्हें एक सूत्र में पिरोना. आन्दोलन के मूल सिद्धांत थे – ईश्वर, धर्म, कर्मकांडों व जाति का नकार. पेरियार ने इसमें एक और सूत्र जोड़ा – पितृसत्तामकता का नकार! आत्माभिमान आन्दोलन का अंतिम लक्ष्य था जाति-मुक्त समाज का निर्माण. इसके लिए उसे जाति व्यवस्था की सभी संरचनाओं से मुकाबला करना पड़ा. इनमें शामिल थीं ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवादी पितृसत्तामकता. पेरियार के संघर्ष की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि अपने जीवन में उन्होंने इन सभी संस्थाओं से अलग-अलग समय पर व्यक्तिगत स्तर पर लोहा लिया. हर लड़ाई अलग-अलग तरीकों से लड़ी गयी. पेरियार ने जहाँ ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म के विरुद्ध लड़ाई में तार्किकता को अपना हथियार बनाया वहीं पितृसत्तामकता का विरोध उन्होंने इस अपने इस दृढ विश्वास के आधार पर किया कि महिलाएं अपने आप में स्वतंत्र है और किसी के अधीन नहीं हैं.

मनिअम्मै के साथ पेरियार

अपने पूर्ववर्ती उच्च जातियों के समाज सुधारकों – जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर पितृसत्तामकता के मूल ढ़ांचे को चुनौती दिए बगैर विचार करते थे – के विपरीत, पेरियार ने एकपत्निक परिवार और सतीत्व के मानकों को चुनौती दी, जो महिलाओं को गुलाम बनाते थे. चूँकि विवाह, महिलाओं के दासत्व का प्रतीक था, इसलिए उन्होंने जोर देकर कहा कि विवाह की संस्था को ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए.

पेरियार ने १९२९ में आत्माभिमान विवाह (सेल्फ-रिस्पेक्ट मैरिज या एसआरएम) की जिस अवधारणा का विकास और प्रतिपादन किया, वह एक अनूठा मास्टर स्ट्रोक था. यह अवधारणा विवाह को दो व्यक्तियों के बीच एक ऐसे समझौते के रूप में देखती थी, जिसमें जाति, वर्ग या धर्म के लिए कोई जगह नहीं थी और जिसके लिए न तो पुरोहितों की आवश्कता थी और ना ही अभिवावकों की सहमति की. इसमें विवाह सदा के लिए पवित्र बंधन न होकर दो समकक्ष व्यक्तियों के बीच समझौता था, जिसे दोनों में से कोई भी पक्ष जब चाहे समाप्त कर सकता था. विवाह स्वर्ग में ईश्वर द्वारा नहीं वरन धरती पर दो व्यक्तियों द्वारा परस्पर समझौते से निर्धारित किये जाते थे. आत्माभिमान विवाहों के मूल में थी लैंगिक समानता और अपने निर्णय स्वयं लेने का अधिकार. यह विचार और सोच के क्षेत्र में एक क्रांति और जागरूकता व आत्म-चेतना की एक लम्बी छलांग थी. कुल मिलाकर, पेरियार ने एक नयी महिला और एक नए पुरुष का सृजन किया.

पेरियार के जन्म के चार दशक पूर्व, फुले दम्पती ने महाराष्ट्र के पुणे में ‘सत्यशोधक विवाह संस्कार’ के नाम से एक क्रंतिकारी सोच प्रस्तुत की थी. इन विवाहों में कोई पंडित नहीं होता था और हिन्दू धार्मिक मंत्रों की जगह, वर और वधु, अपने लिए निर्धारित धर्मनिरपेक्ष मंत्रों का स्वयं जाप करते थे. इन मंत्रों में कोई लैंगिक भेदभाव नहीं था. यद्यपि पेरियार ने फुले का नाम भी नहीं सुना था, तथापि उन्होंने फुले के काम को ही आगे बढ़ाया.

आत्माभिमान विवाह समारोहों की अध्यक्षता पेरियार स्वयं करते थे और इससे उन्हें अपने स्त्रीवादी विचारों का प्रसार करने का मौका मिलता था. स्त्री-पुरुष संबंधों का कोई ऐसा पक्ष नहीं था जो उनकी नज़रों से छूटा हो. वे महिलाओं को सेक्स व प्रजनन के मामलों में असीमित व बिना शर्त स्वतंत्रता दिए जाने के हामी थे.  उन्होंने पित्रसत्तामकता के ध्वंस के लिए वह सब कुछ किया जो वे कर सकते थे. सोये हुए समाज को झकझोर कर उठाने के लिए उत्तेजक बयान देने में उन्हें विशेषज्ञता हासिल थी. एक बानगी देखिये: “अगर इससे उनकी स्वतंत्रता में बाधा पड़ती हो तो महिलाओं को बच्चों को जन्म देना बंद कर देना चाहिए”. वे बिना लागलपेट के कहते थे कि जब तक ‘पितृसत्तात्मक पुरुषत्व’ है तब तक महिलाएं स्वतंत्र नहीं हो सकतीं. वे चाहते थे कि ‘सतीत्व’ और ‘चरित्र’ जैसे मानक या तो महिला और पुरुष दोनों पर लागू होने चाहिए या किसी पर भी नहीं.

उनका कहना था कि माता-पिता को अपनी लड़कियों का पालनपोषण उसी तरह करना चाहिए जैसा कि वे लड़कों का करते हैं. यहाँ तक कि लड़कों और लड़कियों के नाम और उनका पहनावा भी एक जैसे होने चाहिये और लड़कियों को मुक्केबाजी और कुश्ती जैसों खेलों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए.

जहाँ तक महिलाओं के लिए गर्भनिरोधकों  के इस्तेमाल का सवाल है, उनकी मान्यता थी ये महिलाओं को स्वतंत्रता और उनके जीवन पर अधिकार देने के उपकरण हैं. पेरियार की यह सोच, उनके समकालीन अन्य सुधारकों से एकदम अलग थी जो यह मानते थे कि महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक उपायों का इस्तेमाल परिवार, समुदाय और राष्ट्र के हित में होना चाहिए. पेरियार का यह मानना था कि केवल और केवल महिलाओं को यह तय करने का अधिकार है कि वे बच्चे चाहतीं हैं या नहीं, यदि हां तो कब और विवाह बंधन के अन्दर या उसके बाहर. उन्होंने अपने ये विचार अलग-अलग भाषणों और लेखों में व्यक्त किये और इन्हें संकलित कर एक पुस्तिका की शक्ल में प्रकाशित किया गया, जिसका शीर्षक था, ‘व्हाई द वुमन वाज एनस्लेव्ड’ (महिला क्यों गुलाम बनी).

वे उस काल में क्रांतिकारी स्त्रीवाद की भाषा में बात करते थे, जब पश्चिम के स्त्रीवादियों की दूसरी लहर ने इस शब्द को गढ़ा ही नहीं था.

आत्माभिमान विवाहों के अतिरिक्त, आत्माभिमान सम्मेलनों और युवा सम्मेलनों में भी पेरियार ने  लैंगिक मुद्दों पर अपने विचार रखे. इन आयोजनों में पारित प्रस्ताव, महिला-समर्थक और लैंगिक न्याय पर आधारित हुआ करते थे.

पेरियार और मनिअम्मै बच्चों के साथ

इस आन्दोलन का एक अनूठा पक्ष यह था कि महिलाएं केवल महिला सम्मेलनों में ही नहीं, बल्कि सामान्य आत्माभिमान सम्मेलनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं. उनकी आयोजन में तो भूमिका होती ही थी, वे सम्मेलनों की अध्यक्षता भी करती थीं और प्रस्ताव भी प्रस्तुत करती थीं. आन्दोलन की महिला कार्यकर्ता, जाति और पितृसत्तामकता के परस्पर अन्योन्याश्रित संबंधों से अनभिज्ञ नहीं थीं. वे ब्राह्मणों के जातिगत दमन और पुरुषों के लैंगिक दमन को सदृश पाती थीं. वे यह मानती थीं कि धर्म, जातिगत और लैगिक असमानताओं को वैध व औचित्यपूर्ण ठहरता है. आन्दोलन के साहित्य में उन्होंने अपने इन विचारों को स्वर दिया. ईवी रामासामी को ‘पेरियार’ या महान की उपाधि मद्रास में १९३८ में आयोजित तमिलनाडू विमेंस कांफ्रेंस में दी गयी.

पेरियार घर और सार्वजनिक जीवन दोनों में महिलाओं को किसी घेरे में बंद रखने के हामी नहीं थे. वे जो कहते थे, वह करते भी थे. उन्होंने अपनी १३ वर्षीय नवविवाहिता पत्नी नगम्मल को उसकी ‘थाली’ या मंगलसूत्र का त्याग करने के लिए राजी किया. वे अपनी पत्नी से कहते थे कि वे उन्हें कामरेड कहकर संबोधित करें और जिन भी सभा-सम्मेलनों में वे जाते, उनकी पत्नी उनकी साथ होतीं थीं. उन्होंने ठीक यही व्यवहार अपनी बहन कन्नामल के साथ भी किया. यहाँ तक कि जब गांधीजी ने सन १९२१ में शराबबंदी के समर्थन में ताड़ी की दुकानों पर धरना देने का आव्हान किया, तब इरोड में आन्दोलन का नेतृत्व नगम्मल और कन्नामल ने किया. इस सबके के बावजूद, सन १९३३ में अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने इस बात पर गहन खेद व्यक्त किया कि वे अपने वैवाहिक जीवन में अपनी स्त्रीवादी विचारों का एक छोटा सा अंश भी लागू नहीं कर सके.

पेरियार के जीवन की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना थी सन १९४९ में ७० वर्ष की आयु में अपने से चालीस वर्ष छोटी मनिअम्मै से उनका पुनर्विवाह. मनिअम्मै छह वर्ष से उनकी निजी सचिव थीं. इस विवाह के लिए उनकी घोर निंदा और भर्त्सना हुई. परन्तु वे अविचलित रहे. पेरियार ने कहा कि उन्होंने यौन सुख के लिए विवाह नहीं किया है और यह भी कि यौन सुख प्राप्त करने के लिए विवाह करना आवश्यक भी नहीं है. उन्होंने कहा कि विवाह के पीछे उनका उद्देश्य अपनी वैचारिक, सांगठनिक और भौतिक विरासत को सुरक्षित हाथों में सौंपना है ताकि उनका काम आगे बढ़ सके. उन्होंने रूढ़ीवाद के खिलाफ अपनी लम्बी और अथक लड़ाई की विरासत एक युवा महिला को सौंपी. यह स्त्रीवाद के प्रति उनकी आचरणगत प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा प्रमाण था.

ललिता धारा मुंबई के डॉ आंबेडकर कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स के सांख्यिकी विभाग की अध्यक्ष रही हैं। उन्होंने कई शोधपूर्ण पुस्तकों का लेखन किया है, जिनमें ‘फुलेज एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘भारत रत्न डॉ बाबासाहेब आंबेडकर एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘छत्रपति शाहू एंड विमेंस क्वेश्चन’, ‘पेरियार एंड विमेंस क्वेश्चन’ व ‘लोहिया एंड वीमेनस क्वेश्चन’ शामिल हैं। इसके अतिरिक्‍त सावित्रीबाई फुले के पहले काव्य संग्रह का उनका अनुवाद भी “काव्य फुले” शीर्षक से प्रकाशित है।

फॉरवर्डप्रेस से साभार 
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दलित स्त्रीवाद , मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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हमें अपना आसमान खुद नापना होगा

अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

अनुपमा तिवाड़ी

जीवन की वहीं तक सीमाएँ होतीहैं, जहाँ तक आप उन्हें तय करते हैं ! यहवक्तव्यसारे आसमान को आपके सामने खोल कर रख देता है और कहता है कि “सारा आसमान तुम्हारा है,तुमइसमें चाहे जितने पंख फैला सकते हो”.तो अब ये आसमान महिलाओं के लिए खुला है.  इस वर्ष भी पिछले वर्षों की तरह हीआ रहा है8 मार्च, यानि महिला दिवस !

क्या है महिला दिवस ?
पिछली कई शताब्दियों से दुनिया भर के अधिकतर समाजों में पुरुष वर्चस्व रहा है. इसी के चलते महिलाएं, अनेक प्रकार से विकास के दौर में पिछड़ती चलीजा रही थीं. जबदुनिया भर की लगभग आधी आबादी समानता के अधिकार से वंचित हो तो कैसेदुनिया, किसी देशऔर समाज में न्याय और खुशहाली की कल्पना की जा सकती है ? इसी स्थिति को देखते हुए 1908 मेंसबसे पहले 10 से 15 हजार महिलाओं ने न्यूयॉर्क में वोट देने की मांग को ले कर मार्च निकाला. जिसके एक वर्ष बाद 1909 में प्रथम राष्ट्रीय महिला दिवस 28 फरवरी को मनाया गया. 1910 में अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने मांग रखी गई और 19 मार्च 1911 को पहली बार ऑस्ट्रिया, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया. 1913 मेंइसकीतिथि बदल कर 8 मार्च रखी गई. तब से आजतकयह दिन महिलाओं के हक़ और बराबरी के अधिकार के समर्थन में दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय  महिलादिवसके रूप में मनाया जाता है.

सिर्फ दिवस ही नहीं उसके अनुरूप क्रियान्विति की भी ज़रुरत
अनेक देशों ने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कुछ कानून बनाए हैं लेकिन उन कानूनों की हम आज सरेआम धज्जियाँ उड़ती देख सकते हैं. हर दिन नन्हीं बच्चियों से होते बलात्कार और फिर उनकी हत्या किसी से छुपी नहीं है.दुनिया भर में हर दिन अनेक स्तरों पर महिलाओं के साथ हो रही यौन हिंसा क्यामहिलाओं को इस उत्सव को मनानेके लिए उत्साहित कर पाती है ?अब महिलाएं इस दिन घूम – फिर लेने, एक दूसरे को बधाईयाँ दे- देने भर से बहलने वाली नहीं हैं. अब उन्हें उड़ने के लिए एक पूरा आसमान चाहिए जिसमें वो अपने पंख फैला सकें और मनचाही उड़ान भर सकें.

अब महिलाएं असली आज़ादी चाहती हैं. वे चाहती हैं जन्म के साथ इन्सान होने के वो सभी अधिकार जो प्रकृति ने उन्हें समान रूप से दिए हैं.जो कानून ने दिए हैं उनकी पूर्ण रूप से क्रियान्विति और जो नहीं दिए हैं उन्हेंमांगने की आज़ादी.महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति अबऔर अधिक सजग हो रही हैं. अब वोआज़ादीचाहती हैं. पढ़ने – लिखने की, स्वास्थ्य में बराबरी की सुविधा, घूमने – फिरने की पूरी आज़ादी, पेशा चुनने की आज़ादी, विवाह सम्बन्धी निर्णयों की आज़ादी. अपनी पहचान की आज़ादी, कार्यस्थल पर समान भागीदारी और अधिकार की आज़ादी.अब वो सवाल करने लगी हैं कि ऐसा क्यों है कि हमें एक पुरुष सेअपने को बचाकर रखना पड़े. हमारी इज्ज़त एक पुरुष के हाथ में हो. वे अब अपनी इज्ज़त के नए मापदंड गढ़ना चाहती हैं, जिसमें उनकी इज्ज़त उनकीस्वयं की मुट्ठी में हो और उस पर हमला करने वाले पर इन्सान कोअपने किए कुकृत्य पर उचित दंड मिले.वर्तमान स्थितियों के चलते अब दुनिया भर में महिलाएं अनेक मोर्चों पर खुल कर बाहर आ रही हैं.

सुरक्षा और समान जीने का अधिकार, हर महिला की अस्मिता का मुद्दा 


हाल ही में हॉलीवुड की 300एक्टर, एजेंट्स, डायरेक्टर्स, राइटर्स, प्रोड्यूर्स, एक्सीक्युटिव्ज़ने टाइम्सअप केम्पेन,न्यूयॉर्क की शुरुआत की है. जिसमें उन्होंनेपुरुष वर्चस्व वाले कार्यस्थलों पर संघर्ष कर अपने अधिकार को ले कर चुनौती दी है. इस केम्पेन में वे खुल कर अपने साथ हुए और हो रहे गैरबराबरी वाले व्यवहारों और यौन हिंसा से जुड़े अनुभवों को साझा कर रही हैं और दोषियों के खिलाफ खुल कर कार्यवाहियों की मांग कर रही हैं. इस केम्पेन में इन महिलाओं ने 13 मिलियन का फंड भी बनाया है. जिससे नर्स, मजदूर, किसान, फेक्ट्री में काम करने वाली और रेस्टोरेंट जैसी जगहों पर काम करने वाली महिलाएं भी धनाभाव में कानूनी मदद प्राप्त कर  सकें. इसमें ऐसा कानून लाने का भी प्रस्ताव रखा जा रहा है जिसमें महिलाओं के साथ हो रहा गैरबराबरी पूर्ण व्यवहार और यौन हिंसा पर एक्शन नहीं लिए जाने पर उस संगठन/ फेक्ट्रीको दण्डित / फाइन करने का प्रावधान होगा. एकजेंडर पैरिटी बनाई जा रही है जो कि महिलाओं के साथ समान अधिकार को ले कर कार्य करेगी. इस अभियान की पहल करने वाली महिलाओं की अपील है कि जब भी कोई महिलागोल्डन / ब्ल्यू एवार्ड लेने जाएँ तब कालाकपड़ा पहनें या हाथ पर काली पट्टी बाँधें जो कि इस बात का प्रतीक है कि वे समान अधिकार के विचार को समर्थन देती हैं.  अब ट्वीटर पर महिलाएं ‘मी- टू’हैश टेग के साथ अपने बचपन, किशोर उम्र में हुए यौनिक दुर्व्यवहारों और अब भी वे किस – किस प्रकार से यौन हिंसा का शिकार हो रही हैं इस पर खुल कर अपनी बात सबके बीच साझा कर रही हैं.

इस वर्ष इन महिलाओं ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की थीम को ‘प्रेस फॉर प्रोग्रेस 2018’ नाम दिया है. जिसमें वे प्रेस के माध्यम से भी अपनी बात जन – जन तक पहुँचाना चाहती हैं. वर्तमान स्थितियों को देखते हुए एक अनुमान है कि इस गति से यदि इस मुद्दे पर काम होता है तो भी एक संतोषजनक स्थिति प्राप्त करने में कम से कम 200 वर्ष लग जाएंगे. ‘प्रेस फॉर प्रोग्रेस 2018’ थीम के अंतर्गत महिलाओं के समान अधिकारों को ले कर किसी देश विशेष की ही नहीं बल्कि दुनिया भर की महिलाओं के लिए यह मुद्दा उठाया जा रहा है.

अपनी कमान अब अपने हाथ में रखनी होगी
अब हर एक महिला को अपनी जगह से उठना होगा.1928में सेंट लुईस, मिसौरी अमेरिका में जन्मीं माया एंजलो अश्वेत कवियित्री, उपन्यासकार, निबंधकार, चलचित्र कथानक, लेखिका, अभिनेत्री, व्याख्याता और सिविल राइट्स एक्टिविस्ट थीं. उन्हें 50 से अधिक मानद उपाधियाँ और अनेक राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय पुरुस्कारप्राप्त हुए.वर्ष 2011 मेंउन्हेंअमेरिका का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘प्रेसिडेंशियल मैडल ऑफ़ फ्रीडम’ प्रदान किया गया.वे दुनिया भर में  एक संघर्षशील और जुझारू महिला के रूप में याद की जाती हैं. एक अश्वेत लड़की जिसके सौतेले पिता ने उसका यौन शोषण किया और जिसे अपने जीवन में देह व्यापार तक करना पड़ा उसकी जिंदगी की राह भी क्याकोई कम मुश्किल भरी होगी ? उनके जीवन से हमएक औरत की ताकत का हम अंदाज़ा लगा सकते हैं.वे स्वयं आगे बढ़ीं,उन्होंने स्वयंजीवनसे जूझकरएक सम्मानजनक मुकाम हासिल किया.

ये जो रूकावट की जंजीरें हमारे पैरों में पड़ी हैं वे कुछ तो समाज नेहमारे पैरों में डाली हैं और कुछ हमने स्वयं ही सामाजिक स्वीकारोक्ति के चलते अपने पैरों में डाल रखी हैं.लेकिनअब इन बेड़ियों को खोलने की पहल हमें स्वयं ही करनी होगी. जिस दिन हमने यह तय लिया उस दिन हम इन बेड़ियों से स्वयं ही मुक्त हो जाएँगी.
हाँ, इसकी शुरुआत छोटे – छोटे समूहों से की जा सकती है. गुजरात में लगभग 40 वर्ष पहले महिलाओं ने एक संगठन बनाया था ‘सेवा’. जो कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कार्यरत है. अभी हाल ही में जयपुर के गाँधी नगर रेल्वे स्टेशन की पूरी कमान महिलाओं ने संभाली है. येशुरुआत है लेकिन अंततः हमें मिलकर काम करना होगा क्योंकि पुरुष और महिलाएँ दो धुरी नहीं हैं वे एकदूसरे के पूरक हैं. किसी भी पुरुष या स्त्रीविहीन समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. एक समान अधिकार और सम्मान का रिश्ता ही सबसे न्यायपूर्ण और सुखद रिश्ता होता है जिसकी अभी दरकार है. तोबहनोंउठो! तोड़ दो / गुलामी की जंजीरों को / बाहर आओ/ खुली हवा में/ फेफड़े भर कर सांस लो और उड़ चलो/उस हवा के साथ/जो जाती है/उन्मुक्त आकाश तक !

तस्वीरें गूगल से साभार 

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स्त्रीवाद की ` रिले रेस `में रमणिका गुप्ता का बेटन

नीलम कुलश्रेष्ठ


जिंदगी की तनी डोर, ये स्त्रियाँ, परत दर परत स्त्री सहित कई किताबें प्रकाशित हैं.
सम्पर्क:  .kneeli@rediffmail.com,



स्त्रियों की जागृति  का इतिहास सवा सौ साल पुराना है जिस पर कुछ ना कुछ लिखा जाता रहा है लेकिन एक कलमकार स्त्री इस इतिहास को सही ढंग से अभिव्यक्त कर सकती है .वड़ोदरा[गुजरात ] की भूतपूर्व महारानी  चिमणाबाई गायकवाड़ ने लंदन के भारतीय मूल के एक सहयोगी लेखक श्री एस. एम. मित्र  के साथ सवा सौ वर्ष पूर्व एक पुस्तक लिखी थी “द पोज़ीशन ऑफ़ वीमन इन इंडियन लाइफ़ “ सम्भवत; ये भारत का  पहला स्त्री लिखित दस्तावेज होगा जिसने खुली आँखों से  स्त्री को पंगु बनाने वाला सामाजिक ढाँचा देखा .वो भी उस महारानी ने जिसने भारत के सभी राजघरानो में से प्रथम बार पति महाराजा सयाँ जीराव गायकवाड़  तृतीय के कहने पर घूँघट हटा दिया था .तो इन सवा सौ वर्षो में ये स्त्री जागृति संघर्ष करती , टूटती , हाँफती ,कभी जीतती कहाँ तक पहुँची है ?भारत के अलग -अलग प्रदेश की कलमकार स्त्री किस तरह  इसका दस्तावेज तैयार कर रही है ?हिन्दी की ये आइकन स्त्रियां लगभग जानी पहचानी है लेकिन अन्य  भाषाओं की  कौन सी आइकन स्त्रियां हैं जिनकी कलम से स्त्रियों की व्यथा कथा रिस रही है ? इन आइकन की  तलाश में दिल्ली की रमणिका   गुप्ता वर्षो से अपनी टीम के साथ जुटी हुई हैं .वे  दृढप्रतिज्ञ हैं कि चालीस भाषाओं की रचनाकारों  को हिन्दी  में प्रस्तुत करके बतायेगी कि अपने को कैद करती चारों  ओर की अग्निरेखा को किस तरह स्त्रियां उलांघ रही हैं .

रमणिका  खुद एक सुविख्यात साहित्यकार  हैं . वे 43  पुस्तकों की लेखिका है व उन्होंने 34 पुस्तकें संपादित की हैं . उन्होंने बिहार के कोलियरी के मज़दूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करके उन्हें अधिकार दिलवाये  हैं आदिवासियों व दलितों के लिये उनका कलम से संघर्ष जारी है याँ नि कि वे ऐसा व्यक्तितव नहीं  है कि खयालो में ही क्रांति  की बात करती रहे .एक पत्रिका का वर्षो से संपादन कर रही है “युद्धरत आम आदमी`.

वे  लेखिकओ से किस तरह से   स्नेह् से व्यवहार करती हैं ,मेरे स्वयम के अनुभव हैं -मैंने बिना पूर्व परिचय के उनसे पत्र डालकर “धर्म की बेडि़याँ  खोल रही है औरत `के लिए किसी पौराणिक स्त्री चरित्र पर कहानी माँगी तो उसी शाम उन्होने  फ़ोन  पर अपनी कहानी  `मेनका` का सारांश सुना दिया  था.“हाशिये उलांघती औरत `के लिए `रिले रेस` ई-मेल की तो उसी शाम उन्होंने फ़ोन  करके शाबासी दी व कहा कि इस कहानी को सबसे पहले हम प्रकाशित करेंगे .

उनका अटूट विश्वास है कि समाज का लेखा -जोखा इतिहास के अलावा सहित्य ही रखता है और अब स्त्री विमर्श मुख्य धारा में स्थान पा चुका है तो अलग अलग स्थानों की स्त्री मुक्ति  किस दौर से गुजर रही है ,ये वहा की साहित्यकारों की रचनाओं से ही जाना जा सकता है .  वे बताती हैं ,“हमने  तीस भाषाओं की 334 कवियित्रिओ का काव्य संकलन प्रकाशित कियाँ  है . लेकिन अब हमने कहानी अंक  निकालने का इसलिए निर्णय लियाँ  है कि कहानी में घटनाक्रम ,परिस्थितियां, क्षेत्र ,  व भूगोल सिलसिलेवार ढंग से स्पष्ट होता है जिससे मुक्ति की अवधारणा,उसका इतिहास ,विकास व स्तर स्थूल व सूक्ष्म रुप से प्रतिबिंबित हो सकता है . “

इस कठिन मुहिम पर उनके साथ हैं सुप्रसिद्ध संपादक व लेखिका  अर्चना  वर्मा  व संपादन सहयोग दे रहे हैं अनामिका ,हेमलता महिश्वर व विपिन चौधरी .व अन्य  भाषाओं के अनेक सहयोगी जो अनुवाद  कार्य में जुटे  हुए हैं .` युद्धरत आम आदमी` के तीन अंकों में हिन्दी कहानी  के  तीन खंडों में देश की 112 समर्थ कहानी लेखिकाओ की कहानियाँ  प्रकाशित की गई हैं  .प्रथम  खंड का बहुत दिलचस्प है नाम “कोठी में धान“जिसमे महादेवी  वर्मा .सुभद्रा कुमारी चौहान .सुमित्रा कुमारी सिन्हा . शिवरानी  प्रेमचंद   ,चंदकिरण  सौनरेक्सा ,मँजुल भगत व लवलीन .दूसरे खंड में “खड़ी  फ़सल `में  सन् 1948 में व उसके बाद जन्म लेने वाली लेखिकओ की कहानियाँ  हैं.खंड -3 `नई पौध `में 1964 व उसके बाद जन्मी लेखिकाओ की कहानियाँ  हैं . अब तक उनकी पास 25 भाषाओं की कहानियाँ  आ चुकी हैं बाकी भाषाओं की कहानियो को अनुवादित करने में उनकी टीम जुटी हुई है .पेश है उनसे संक्षित्प्त बातचीत 

आपने चालीस भाषाओं  की कहानियों के संकलन का बीड़ा क्यो उठाया  है ?“

विभिन्न दार्शनिकों ने कभी स्त्री को स्वतंत्र इकाई नहीं माना. यहूदी ये मानते रहे कि स्त्रियाँ पुरुष की पसली की  हड्डी  से निर्मित हुई है .ईसाइयों ने कहा कि ये पुरुष के मांसल  अंग से .निर्मित है .प्लेटो व अरिसटोटल ने तो स्त्री को ही नकार दिया  .कबीर ने इसे नरक का कुंड कहा .सृष्टि ने तो स्त्री पुरुष को समान पैदा किया  है किन्तु इन दो मनुष्य प्रजाति के बीच पुरुष ने भेद पैदा किया  यानि स्त्री की गुलामी पुरुष समाज की नियामत है . इन सभी मतों का प्रतिरोध है नारीवादी लेखन .स्त्री अपना भोगा  हुआ  यथार्थ अभिव्यक्त करती है  तो वह् अधिक प्रामाणिक बन जाता है .मैंने अपने सहयोगियों सहित इसलिए चालीस भाषाओं की स्त्रियों की रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद का बीड़ा उठाया  है जिससे वह् समाज के विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा फैलाये भ्रम के पार स्त्री को एक मनुष्य  रुप में देख सके .“

`इस विभेद को सहित्य किस तरह चुनौती दे रहा है ?

 “सवा सौ वर्षो में इस गुलामी से मुक्ति का अभियान ही नारीवाद है .जिसे नजरअंदाज नहीं  कियाँ  जा सकता है .स्त्री विमर्श का सहित्य स्त्री को वस्तु से व्यक्ति बनाने की मुहिम चला रहा है .इस मुहिम में कुछ पुरुष भी साथ हैं .ये अभिव्यक्ति की हर विधा व साहित्य की हर विधा में उभर रहा है . ये समाज के दोहरे मापदंड को चुनौती दे रहा है .ये मेरा व मेरी टीम का शोध अभियान है कि देखे किस प्रदेश की कौन सी स्त्री  अपनी कहानी में इस चुनौती को किस तरह अभिव्यक्त कर रही है क्या स्त्री मुक्ति की मुहिम याँ  आंदोलन के लिए उसे प्रभावकारी बनाने के लिये नए आइकन की खोज ज़रूरी नहीं    है ? “..

 “क्या इन खंडों में स्त्री मुक्ति का स्वर जनसाधारण से जुड़ पायेगा ?“

“धीरे-धीरे कही ये सब तो हो ही रहा है .स्त्री मुक्ति की पीड़ा की अवधारणा के तहत मात्र भोगी हुई पीड़ा का एहसास होना ही पर्याप्त नहीं  है .जिस पीड़ा से प्रतिरोध का स्वर न उभरे तो वह पीड़ा निरर्थक हो जाती है .कोई भी प्रतिरोध जब पूरे समाज का प्रतिरोध बन जाता है -तो ही बदलाव संभव हो पाता है .16 दिसंबर 2012 को सामूहिक बलात्कार की घटना ,इसका सटीक उदाहरण है  .“  दुर्भाग्य ये है कि इस आंदोलन के बावजूद सामूहिक बलात्कार नहीं  रुक रहे लेकिन उनकी ये बात भी सही है स्त्री को हिम्मत दी है कि वह बलात्कारियों के खिलाफ़ आवाज़ उठा रही है .

 “आप इन संकलन से क्या संदेश देना चाहती है?“
“अनेक माध्यमों से पुरुषों ने स्त्री को ऎसे अनुकूलित किया  है कि वह भी अपनी गुलामी का उत्सव मनाने लगी है .स्त्री जब तक स्व्यं को यौन का साधन समझती रहेगी तब तक मुक्त नहीं     हो पायेगी .स्त्री को स्वयम को प्यार करना ,इज़्ज़त देना सीखना होगा .

“क्या आपको लगता है कि ये संकलन स्त्री मुक्ति में कोई अहम् भूमिका अदा करेंगे ?`

स्त्री का अपनी यौन  शुचिता के लिए  अपराध बोध हो ,चाहे शुचिता बोध हो या  पवित्रता के प्रति नकार का आग्रह  .मुझे पूरा विश्वास है कि ये कहनियाँ  स्त्री में आत्म सम्मान व अस्मिता का बोध जगाने में सक्षम हैं . आज स्त्री केवल पुरुष की आँखों में प्यार या  अपने सौंदर्य के बखान के प्रति आग्रही नहीं  है बल्कि वह अपने मन में आदर व सम्मान देखना चाहती है जो कि उसे मालिक नहीं    एक साथी दे सकता है.

इन खंडों में कुछ स्त्री  देह के इर्द गिर्द कहानियाँ  है ,इसके विषय में आप क्या कहेंगी ?
इनमें सबसे अधिक तीव्र बोध देह को लेकर है क्योंकि स्त्री को देह से इतर देखा नहीं  जाता .  दक्षिण की मुस्लिम स्त्रियां अपने समाज की रुढ़ियो ,और परंपराओं की विकृतियों पर खुलकर प्रहार करती हैं .मेरे खयाल से ये स्त्रियों के लिए प्रेरणादायक है .स्त्री  आज मर्द बनने की इच्छा नहीं पालती.वह धर्म ,चमत्कार व अंधविश्वासों के इस बोझ को ढोने से इनकार कर रही है .वह जानना चाह रही है जिस कोख से पुरुष ने जन्म लिया  है उसी कोख को वर्जित कहने का राज़ ,उसके सौंदर्य को मोहमाया का जंजाल क्यो कहने लगा है , उसी अंग को गाली बना देने का राज़ .
क्या इस सन्दर्भ में पुरुष अहम आड़े नहीं आयेगा ?

आता तो है ही, बदलाव भी दिखाई दे रहा है.भारतीय स्त्रियां हजारों ग्रंथियों से ग्रस्त हैं लेकिन उससे बड़ा सच है कि पुरुष का अहम  हीन  भावना से उत्पन्न है .खंड -2 में अनेक कहानियों में भी स्त्री की हीन भावना  पुरुष दंभ की व्याख्या करने की कोशिश की है .

सोनी सिंह की कहानी एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने वर्जित कर दी थी आपने उसे खंड तीन में प्रकाशित किया  है .
“हां,वह् सोनी सिंह की `योनि कथा `है व वोल्गा की तेलुगु कहानी `अयोनि `है जिसमे कहानी की नायिका बचपन में सामूहिक बलात्कार से गुजरती है  .वह् कातर होकर प्रश्न करती है कि क्या स्त्री सिर्फ़ योनि है .  दोनों कहनियाँ  चौंकाने वाली है व स्त्री सोच को नई ज़मीन प्रदान करती  है   .अयोनि .`कहानी की नायिका का एक और प्रश्न है ,“`क्या योनि  रोटी है ?

अंत में फिर पुस्तक `पोज़ीशान ऑफ़ विमान इन इंडियन सोसायटीज “की बात कर रही हूँ    .मैंने इसे वड़ोदरा के गायकवाड़ राजघराने के इन्दुमति महल, वड़ोदरा के पुस्तकालय में  धूंढ़ने की कोशिश की .आश्चर्य अपनी ही महारानी की पुस्तक ये सम्भाल कर रख  नहीं पाया  था.ये पुस्तक मुझे मिली महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय  के पुस्तकालय में .इससे क्या समझा जाए स्त्रियों का लेखन भूतकाल में एक निरर्थक  उपेक्षित  काम था लेकिन आज के समय में क्या कोई पुस्तकालय होगा जिसमे स्त्री विमर्श की पुस्तक ना हो ? साहित्य में अब तक मान्यता रही है कि स्त्री लेखन का आरंभ विश्व में पंद्रहवी या  सोलहवीं शताब्दी से हुआ था लेकिन मुझे इस पुस्तक से ही पता लगा कि ग्यारहवीं शताब्दी में दो जापानी स्त्रियों मुरास्की दो शिकिबु ने एक उपन्यास `जेजी मोनोगावरी ` व शोनेगौन ने सामाजिक विषय पर एक अभूतपूर्व  पुस्तक लिखी थी` मकुरानो जोशी `ये जानकारी इसलिए भी प्रामाणिक है क्योंकि महाराजा साल में अधिकतर विदेश घूमते रहते थे .तो ग्यारहवीं शताब्दी से आरंभ हुए स्त्री लेखन का मुकाम कहाँ   तक पहुँचा है ?रमणिका जी व उनकी टीम को एक बार फिर बधाई उनके  प्रयास से औरत कितने हाशिये उलांघती मुख्य धारा में अपने पैर जमाये खड़ी हो सकेगी क्योंकि  तक इनके प्रयास से बाईस भाषाओं की स्त्री विमर्श कथाकारों की कहानियां हिंदी में अनुवादित होकर प्रकाशित  हो चुकीं हैं जिनमें छ;भाषाएँ उत्तरी पूर्व की शामिल हैं। उर्द वह  अपना विकास ,अपनी सोच  स्त्रीवाद की ` रिले रेस `में पुस्तक के रुप में अपना `बेटन `अगली पीढ़ी  को सौपती जा रही है .

तस्वीरें गूगल से साभार 

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