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सभी शैक्षणिक संस्थानों पर लागू होता है मातृत्व लाभ कानूनः NCW

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने वाराणसी स्थित सनबीम वीमेंस कॉलेज वरुणा को को सात दिनों के अंदर मातृत्व लाभ मुहैया कराने का दिया आदेश।
कहा- मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के अनुसार मातृत्व लाभ प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान पर लागू होता है, क्योंकि यह प्रत्येक महिला का मूलाधिकार है।

नई दिल्ली/वाराणसी। कानून के तहत कामकाजी महिलाओं को वेतनयुक्त छह महीने का मातृत्व अवकाश मुहैया नहीं कराने के मामले में सनबीम समूह को राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) से झटका लगा है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने सनबीम समूह के वाराणसी स्थित सनबीम वीमेंस कॉलेज वरुणा को सात दिनों के अंदर शिकायतकर्ता को मातृत्व लाभ देने का आदेश दिया है।
आयोग की सदस्य एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अर्चना मजूमदार ने बुधवार को जारी अपने आदेश में लिखा है, “मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के अनुसार मातृत्व लाभ प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान में लागू होता है, क्योंकि यह प्रत्येक महिला का एक मौलिक अधिकार है।”

आयोग के इस आदेश के बाद उत्तर प्रदेश के निजी शैक्षणिक संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के लिए वेतनयुक्त छह महीने के मातृत्व अवकाश का रास्ता खुल गया है। संभवतः यह राज्य का पहला मामला है जिसमें किसी आयोग या न्यायालय ने किसी निजी शैक्षणिक संस्था में कार्यरत महिला कर्मचारी को छह महीने का मातृत्व लाभ प्रदान करने का आदेश दिया है। प्रदेश में संचालित निजी शैक्षणिक संस्थान अपने यहां कार्यरत शिक्षकाओं एवं शिक्षणेत्तर महिला कर्मचारियों को वेतनयुक्त छह महीने का मातृत्व अवकाश नहीं देते हैं। सनबीम समूह अपने यहां कार्यरत और कर्मचारी राज्य बीमा निगम के प्रावधानों से आच्छादित महिला कर्मचारियों को भी वेतनयुक्त छह महीने का मातृत्व लाभ मुहैया नहीं कराता है।
बता दें कि सनबीम वीमेन्स कॉलेज वरुणा में 15 दिसम्बर 2021 से पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में कार्यरत संगीता प्रजापति ने पिछले साल 2 अगस्त को एक बच्चे को जन्म दिया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश शासन के शासनादेशों और यूजीसी रेगुलेशन-2018 समेत मातृत्व लाभ कानून में उल्लिखित प्रावधानों के तहत महाविद्यालय प्रशासन से वेतनयुक्त छह महीने का मातृत्व अवकाश मांगा था लेकिन उसने उनके अनुरोध को यह कहकर खारिज कर दिया कि वह एक स्ववित्तपोषित निजी संस्थान है और उस पर मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के प्रावधान लागू नहीं होते हैं। साथ ही उसने संगीता प्रजापति को कानूनी प्रावधानों में उल्लिखित छह महीने के मातृत्व अवकाश के बाद नौकरी पर वापस लेने से भी मना कर दिया था।

संगीता प्रजापति ने महाविद्यालय प्रबंधन के आदेश को पहले क्षेत्रीय श्रम प्रवर्तन अधिकारी सुनील कुमार द्विवेदी और अपर श्रमायुक्त/उप श्रमायुक्त डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह के समक्ष चुनौती दी। उन्होंने माना कि सनबीम वीमेन्स कॉलेज वरुणा पर मातृत्व लाभ कानून के प्रावधान लागू होते हैं। क्षेत्रीय श्रम प्रवर्तन अधिकारी सुनील कुमार द्विवेदी ने गत 7 फरवरी को लिखित रूप से सनबीम वीमेन्स कॉलेज वरुणा को संगीता प्रजापति के मातृत्व हित लाभ की देयता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था लेकिन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. राजीव सिंह और प्रशासक डॉ. शालिनी सिंह समेत उसके प्रबंधन तंत्र ने पीड़िता को मातृत्व लाभ मुहैया नहीं कराया और ना ही उसे नौकरी पर वापस लिया।
पीड़िता ने इसकी शिकायत उत्तर प्रदेश शासन के श्रमायुक्त मार्कण्डेय शाही, श्रम मंत्री डॉ. अनिल राजभर, जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की कुल-सचिव डॉ. सुनीता पाण्डेय, कुलपति ए.के. त्यागी, क्षेत्रीय उच्च शिक्षाधिकारी डॉ. ज्ञान प्रकाश वर्मा से भी लिखित रूप में की लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी इनमें से किसी ने भी कोई कार्रवाई नहीं की और ना ही पीड़िता की शिकायत के संदर्भ में उसे कोई सूचना देना मुनासिब समझा।
उत्तर प्रदेश सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था से निराश संगीता प्रजापति ने गत 6 अगस्त को राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य डॉ. अर्चना मजूमदार से न्याय की गुहार लगाई। उनकी पहल पर आयोग ने 8 अगस्त को उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव महेंद्र प्रसाद अग्रवाल को नोटिस जारी कर पूरे प्रकरण पर कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) तलब की लेकिन दो महीना बीत जाने के बाद भी उन्होंने आयोग या शिकायतकर्ता को किसी कार्रवाई की कोई सूचना नहीं दी। आयोग की सदस्य डॉ. अर्चना मजूमदार ने गत 7 अक्टूबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस मामले पर सुनवाई की। सुनवाई में शिकायतकर्ता संगीता प्रजापति शामिल हुईं। वहीं, सनबीम वीमेन्स कॉलेज वरुणा की ओर से प्राचार्य डॉ. राजीव सिंह, प्रशासक डॉ. शालिनी सिंह और महाविद्यालय के लीगल हेड एवं अधिवक्ता देवेश त्रिपाठी शामिल हुए।
आयोग की सुनवाई के बारे में पूछे जाने पर पीड़िता संगीता प्रजापति ने कहा, “मैं राष्ट्रीय महिला आयोग की सुनवाई से बहुत खुश हूं लेकिन नौकरी पर वापसी से संबंधित कोई सूचना नहीं होने से थोड़ी निराशा भी है। हालांकि अभी आयोग का अंतिम फैसला आना बाकी है, इसलिए इस पर विचार होने की पूरी संभावना है। मैं माननीय डॉ. अर्चना मजूमदार मैम की आभारी हूं कि उन्होंने मेरे अनुरोध का संज्ञान लेकर इस पर सुनवाई की और न्याय के पक्ष में खड़ी हुईं। मुझे पूरा विश्वास है कि राष्ट्रीय महिला आयोग से मुझे न्याय मिलेगा। मैं उन सभी लोगों को धन्यवाद देना चाहती हूं जो न्याय की इस लड़ाई में मेरा सहयोग कर रहे हैं। यह केवल मेरी लड़ाई नहीं है। यह उन सभी कामकाजी महिलाओं की लड़ाई है जिन्हें मातृत्व लाभ के उनके मूलाधिकार से वंचित किया जा रहा है।”

अडानी पावर प्रोजेक्ट नया रोजगार नहीं देगा,बल्कि मौजूदा रोजगार छीन लेगा: दीपंकर

भाकपा-माले महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य के नेतृत्व में पार्टी की एक उच्चस्तरीय जांच टीम 2 अक्टूबर को भागलपुर जिले के पीरपैंती का दौरा कर वहां की स्थिति का निरीक्षण किया. टीम ने उन किसानों से विस्तृत बातचीत की जिनकी जमीन पावर प्लांट के नाम पर अधिग्रहित की जा रही है. जांच दल में घोषी विधानसभा से विधायक रामबली सिंह यादव, पूर्व विधायक मनोज मंजिल तथा स्थानीय नेता महेश यादव, रणधीर यादव,गौरीशंकर और रिंकु यादव सहित भाकपा-माले,इंडिया गठबंधन और नागरिक समाज के कई प्रतिनिधि शामिल थे. जांच दल ने पीरपैंती नगर पंचायत के सुंदरपुर और कमालपुर गांवों के किसानों से लंबी चर्चा की और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना.

गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण
पीरपैंती प्रस्थान करने से पूर्व भाकपा-माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर गांधी विचार विभाग पहुंचे और गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया.उन्होंने कहा कि गांधी लूट,झूठ,गुलामी और नफरत के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक हैं.इस मौके पर डॉ.के.के. मंडल,डॉ.मनोज दास,डॉ.संजय रजक सहित विश्वविद्यालय के कई एक शिक्षक,छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे.

कटाव पीड़ितों की समस्याओं से भी हुए रूबरू
पीरपैंती जाने के क्रम में गंगा कटाव पीड़ितों ने भी अपनी व्यथा सुनाई. कहलगांव प्रखंड के किसनदासपुर पंचायत के रानी दियारा के 2 वार्ड (वार्ड नंबर 12 एवं 13) और पीरपैंती के रानी दियारा पंचायत के रानी दियारा गांव के 10 वार्ड 2016 में ही गंगा में बह गए. ये सभी लोग पिछले 10 साल से रेलवे की जमीन पर रह रहे हैं, लेकिन अभी तक इनका स्थायी पुनर्वास नहीं हो सका है. कई लोगों ने शिकायत की कि उनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया.कॉ.दीपंकर भट्टाचार्य ने सरकार से इन सभी लोगों का तत्काल स्थायी पुनर्वास करने की मांग की.

माले महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने पीरपैंती के सुंदरपुर और कमालपुर गांव के किसानों से लंबी चर्चा के बाद कहा है कि पीरपैंती की उपजाऊ ज़मीन 1 रुपये प्रति एकड़, अडानी को सौंपना – किसानों की रोज़ी-रोटी, बागानों और पर्यावरण पर सीधा हमला है।किसान कह रहे हैं: नया रोज़गार नहीं मिलेगा, बल्कि मौजूदा रोज़गार छिन जाएगा। यह विकास नहीं, विनाश का सौदा है।कमालपुर टोले में विस्थापित होने वाले परिवारों का आरोप है कि इतने कम मुआवजा में वे कहां जमीन खरीदेंगे? सरकार उन्हें मकान बनाकर जमीन के बदले जमीन दे. यहां तकरीबन 64 घर विस्थापित किये जाएंगे, उन्हें लगातार नोटिस भेजी जा रही है.
माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि बिहार में चुनाव नजदीक है. चुनाव से पहले अडानी को 1 रुपये की सालाना दर से 1050 एकड़ जमीन पावर प्लांट के नाम पर लीज पर दी जा रही है. पूरे इलाके में लाखों पेड़ काटे दिए जाएंगे. पावर प्लांट का सब्जबाग दिखाकर सच्चाई छुपाई जा रही है. लोग बताते हैं कि उन्हें पहले से ही रोजगार मिल रहा है – आम के बगीचे लाखों परिवारों को आजीविका प्रदान करते हैं. जिनके पास जमीन है और जिनके पास नहीं है – दोनों को यहाँ रोजगार मिलता है. इतनी बड़ी संख्या में लोगों को उनकी जमीन, रोजगार और आजीविका से बेदखल करके अडानी को लाभ पहुँचाना मोदी व नीतीश सरकार की साजिश है.

उन्होंने कहा कि किसानों ने जिला प्रशासन से यह अपील की थी कि उपजाऊ जमीन की बजाय बगल की एकफसला जमीन को अधिग्रहण किया जाए ताकि नुकसान कम हो. बाद में वे उच्च न्यायालय गए लेकिन कोर्ट ने इस मामले में अजीब फैसला दिया गया. कोर्ट ने कहा कि सरकार किसानों से पूछ कर जमीन खरीदेगी क्या? तो यह पहला अन्याय था वहाँ के किसानों के साथ.

यहां 40-50 साल के पुराने पेड़ मौजूद हैं. लेकिन प्रशासन कहता है कि ये पेड़ 2011 के बाद लगाए गए. अब मोदी जी से यह सवाल करना होगा कि वे माँ के नाम पर पेड़ लगाते हैं या अडानी के नाम पर पेड़ कटवाते हैं? अडानी का पावर प्रोजेक्ट नया रोजगार नहीं देगा, बल्कि मौजूदा रोजगार छीन लेगा और पूरे इलाके की हवा, पानी और जमीन को जहरीला बना देगा.

उन्होंने आगे कहा कि भाजपा के स्थानीय विधायक लोगों को डराकर विरोध न करने के लिए दबाव डाल रहे हैं और कह रहे हैं कि विरोध करने पर लोगों को जेल में डाल दिया जाएगा. इसके उद्घाटन के दिन मुखिया दीपक सिंह को जेल भेज दिया गया था और कई लोगों को नजरबंद कर दिया गया था. किसानों पर जमीन खाली कराने का दबाव डाला जा रहा है. इस तरह के डराने-धामकाने की साजिश का जवाब दिया जाएगा.

उन्होंने कहा कि कहलगाँव में एनटीपीसी का पावर प्लांट पहले से है, जहां जमीन गंवाने वाले बहुत कम लोगों को रोजगार मिला है. लोग प्रदूषण की मार झेल रहे हैं. गोड्डा की भी ऐसी ही स्थिति है – वहां कोयला ऑस्ट्रेलिया से आता है और बिजली बांग्लादेश को जाती है. झारखंड के लोगों को भी कुछ नहीं मिला. पूरे इलाके को खनन-ऊर्जा परियोजनाओं के माध्यम से घेर कर बर्बाद करने की योजना चल रही है. यहां कोल ब्लॉक और गैस पाइप लाइन की भी चर्चा चल रही है.पीरपैंती की उपजाऊ जमीन अडानी को सौंपना विकास नहीं, विनाश का सौदा है. यह सौदा किसानों की खेती, बागानों और पूरे इलाके की जिन्दगी पर सीधा हमला है.

जांच में सामने आए प्रमुख बिन्दु

  1. एनटीपीसी के नाम पर 2010 में 7 पंचायतों की जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई. अचानक 15 वर्षों के बाद यह जमीन अडाणी को दे दी गई. किसानों का कहना है कि जमीन उन्होंने बिहार सरकार को दी थी अडाणी को नहीं.
  2. मुआवजे में तीन तरह की अनियमितताएं हैं. (क) एक ही मौजा, खाता, खेसरा की जमीन के लिए अलग-अलग दर पर मुआवजा दिया गया है. (ख) जिन किसानों ने जमीन खरीदी थी लेकिन कागज नहीं बना पाए थे, उन्हें मुआवजा नहीं मिल रहा. मामला कोर्ट में लंबित है (ग) कई लोगों को कोई भी मुआवजा नहीं मिला है. मुआवजे में ताकतवार लोगों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई है जबकि गरीबों को सही से मुआवजा नहीं मिला.
  3. कमालपुर टोले में विस्थापित होने वाले परिवारों का आरोप है कि इतने कम मुआवजा में वे कहां जमीन खरीदेंगे? सरकार उन्हें मकान बनाकर जमीन के बदले जमीन दे. यहां तकरीबन 64 घर विस्थापित किये जाएंगे, उन्हें लगातार नोटिस भेजी जा रही है.
  4. आम के बगीचे साल में 7 महीने लाखों लोगों के रोजगार का माध्यम है. इन सभी लोगों की आजीविका का साधन छीन जाएगा.
  5. पहले से कार्यरत कहलगांव, गोड्डा और अब पीरपैंती का पावर प्लांट पूरे इलाके के पर्यावरण को नष्ट कर देगा.

भाकपा-माले के उच्चस्तरीय जांच टीम के पीरपैंती दौरा में
भागलपुर से एसके शर्मा,सामाजिक न्याय आंदोलन(बिहार) के राज्य अध्यक्ष रामानंद पासवान,संयुक्त सचिव अर्जुन शर्मा,बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन(बिहार) के सोनम राव,सोनू,आइसा के प्रवीण कुशवाहा,ऐपवा की आशा देवी भी शामिल थे.

-गौरी शंकर राय
जिला कमिटी सदस्य,भाकपा-माले

जगजीवन राम और उनका नेतृत्व पुस्तक सामाजिक संस्कारों में विन्यस्त करने को प्रेरित करती है

कर्मेन्दु शिशिर

पता नहीं क्यों बाबू जगजीवन राम जिन्हें प्यार से लोग बाबूजी कहते हैं को याद करने अथवा उन पर चर्चा करने को लेकर लोगों में एक हिचक बनी हुई रही।

यहाँ तक कि बिहार सरकार ने भी उनको उनके कद के अनुरूप प्रतिष्ठा न दी। यहाँ तक कि ललितनारायण मिश्र के नाम पर जिस तरह विश्वविद्यालय बिजनेस शिक्षा संस्थान और सरकारी भवनों का नामकरण हुआ उस तरह स्मृति-स्मारक बाबू जगजीवन राम के सम्मान में न बने। बेशक बाबू जगजीवन राम का योगदान और कद कहीं ज्यादा ऊँचा था। क्या इसके पीछे सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर जातिवादी कुंठा थी। एक ऐसी कुंठा जो सवर्णों से पिछड़ों तक में पसरी हुई है।

यह कितनी बड़ी विडंबना है कि हमने एक ऐसा समाज बनाया कि दिवंगत महापुरुषों को भी उसी संकीर्ण नजरिये से देखा जाता है। वे सब जो सार्वजनिक व्यक्तित्व थे।  वे दिवंगत होकर भी जातिमुक्त नहीं रह जाते। वे पूरे समाज के पूर्वज नहीं बन पाते। हम उनमें से अपनी जाति के अनुसार चयन करते हैं और वर्त्तमान में अपनी सहूलियत के मुताबिक इस्तेमाल करते हैं। हम न उनके विचारों से प्रेरित हुए और न ही व्यक्तित्व से प्रभावित।

        ऐसे दौर में यह बेहद सुखद बात है कि बाबू जगजीवन राम की सम्यक और प्रामाणिक जीवनी के लिए इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने बड़ी निष्ठा से चुपचाप अथक श्रम किया। उन्होंने उनके जीवन विचार और योगदान को लेकर जो बीहड़ शोध-यात्रा की है उसका मूर्त्त साक्ष्य है- ‘जगजीवन राम और उनका नेतृत्व’ नामक पुस्तक। हिन्दी पाठकीयता के मौजूदा अकाल को देखते हुए यह विस्मय होता है कि छपने के साथ ही इस जीवनी के आठ संस्करण हो चुके हैं और यह सिलसिला अब भी जारी है। इस पुस्तक के अंग्रेजी और बांग्ला भाषा संस्करण भी प्रकाशित हो चूके हैं। एक बार डॉ० रामविलास शर्मा ने कहा था कि जिनकी सायास उपेक्षा होती है, उनके पाठक जब परिदृश्य पर आते हैं तो वे अपने नायकों की पहचान करने में कोई कंजूसी नहीं करते। आज बाबू जगजीवन राम का एक विशाल पाठक वर्ग मौजूद है। यह बात सही है कि इं0 राजेन्द्र प्रसाद कोई पेशेवर लेखक नहीं हैं । मगर बाबूजी के इस जीवनी को इस रूप में लिखकर उन्होंने एक बड़े लेखक जैसा ही कार्य किया है।

            उनकी पुस्तक से गुजरते हुए यह बात बिलकुल स्पष्ट दिखती है कि उनका उद्देश्य एक ऐसी जीवनी लिखने का था जिसमें बाबू जगजीवन राम को लेकर जो लोगों’ में आधी-अधूरी धारणा बनी है या बनाई गई है वह दूर हो। उनका कोई वांग्मय उपलब्ध नहीं थी न कोई दस्तावेज सहित प्रामाणिक जीवनी उपलब्ध थी। उन पर लिखी जो सामग्री उपलब्ध थी वह एक तरह से औपचारिकता का निर्वाह भर था। राजेन्द्र प्रसाद जी न सिर्फ उनके बारे में फैली अनेक भ्रांतियों को दूर करना चाहते थे बल्कि उनकी इच्छा थी कि उनके व्यक्तित्व के विविध पक्ष उनके सामाजिक आर्थिक धार्मिक और राजनीतिक विचार और उनके द्वारा किए गए विभिन्न क्षेत्रों में योगदान को संपूर्णता में प्रस्तुत किया जाय। यह एक मुश्किल काम था क्योंकि इसके लिए दीर्घ शोध कार्य जरूरी था। इस जीवनी को पढ़ने के बाद यह बात पूरे विश्वास से कही जा सकती है कि इसमें वे बिलकुल सफल हुए हैं। राजेन्द्र प्रसाद जी सासाराम संसदीय क्षेत्र के निवासी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के अपने छात्र जीवन से ही जगजीवन राम से जुड़े रहे । जिस कारण उन्हें बाबूजी के क्रियाकलाप और राजनैतिक सफर की गुत्थियों की ज्यादा समझदारी रही। इसलिए राजेन्द्र प्रसाद जी ठोस और प्रामाणिक सामग्री की तलाश-उनके जीवन के लंबे कार्यकाल में जुड़े मुख्य अवसरों और प्रसंगों पर उनकी भूमिका को लेकर मूल सच्चाई तक आसानी से पहुँच बना पाए। बहुत सारे ऐसे ऐतिहासिक प्रसंग थे जिसकी आधुनिक भारतीय इतिहास में चर्चा तो खूब होती है मगर उसमें बाबू जगजीवन राम की क्या भूमिका थी इस पर कोई चर्चा नहीं मिलती अथवा उनकी भूमिका को अत्यन्त गौण कर दिया जाता है। जैसे पूना-पैक्ट में उनके विचारों और भूमिका की चर्चा नहीं होती और होती भी है तो डॉ० आंबेडकर के धुर विरोधी के रूप में एक खलनायक के रूप में। डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के प्रसंग में भी बाबू जगजीवन राम की प्रमुख भूमिका थी जिसका कहीं कोई जिक्र नहीं होता जबकि पं॰ जवाहरलाल नेहरू को उन्होंने ही समझाया कि यही उचित निर्णय होगा। उसी तरह जब बिहार में मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह और उनके मंत्री अनुग्रह नारायण सिंह के बीच में जब भी गंभीर मतभेद हो जाते थे तो नेहरूजी बाबूजी को ही सुलह कराने का यह काम सौंपते थे और बाबूजी दोनों नेताओं में सुलह सपाटा कराते थे। इस तरह इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी की यह पुस्तक अनेक नये तथ्यों का उद्घाटन करती है और आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन की कमियों को पूरा भी करती है। इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने पुस्तक में काफी तटस्थता बरतते हुए बाबूजी का मूल्याकंन किया है।

         इस पुस्तक को पढ़ते हुए इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी के घोर शोध-श्रम और संलग्नता का सुफल है कि उन्होंने ऐसी-ऐसी सामग्री पहली बार प्रकाश में लाई है जिसको पढ़ते हुए पाठक बार-बार विस्मित होता है। ऐसे अनछुए पहलुओं को लेकर उनकी जानकारी और सूझबूझ आपको जगह-जगह ठिठककर सोचने पर विवश करती है। मसलन यह पुस्तक बाबू जगजीवन राम के बारे में एक तरह का पुनर्मूल्यांकन करने का अनुरोध करती है। यह पुस्तक बाबू जगजीवन राम के अदीठ व्यक्तित्व से योगदान और उपलब्धियों से, पाठकों को नये आलोक में परिचित कराती है। इसमें उन्होंने बाबू जगजीवन राम के बौद्धिक व्यक्तित्व को जिस तरह उनके सामाजिक राजनीतिक आर्थिक धार्मिक और अल्पसंख्यकों पर विचार प्रसंगानुसार रखा है वह पुस्तक का बहुत ही मूल्यवान खंड है। बाबूजी संवैधानिक आरक्षण को सामाजिक क्रांति लाने का जरिया कहते थे। जाति विभेद के जहर को समाप्त करने के लिए अंतर्जातीय विवाह की अनिवार्यता कानून की वकालत करते थे। वे कहते थे कि जातिवाद और राष्ट्रवाद दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी हैं ।

 बाबू जगजीवन राम की बुद्धिमत्ता की चर्चा तो होती है लेकिन वे बौद्धिक स्तर पर कितने समृद्ध और ठोस थे इसका अहसास लोगों को नहीं था। इं0 राजेन्द्र प्रसाद ने भारतीय समाज की संरचना को लेकर, उसकी तमाम तरह की जटिलताओं को लेकर उनकी समझ कितनी स्पष्ट और दृढ़ थी यह सब इसमें शामिल है। गाँधीवाद से राष्ट्रीय समस्याओं का निर्माण उसके प्रयोग करने की नीति और दक्षता पर निर्भर है। इसलिए व्यावहारिक स्तर पर उनकी प्रशासनिक सूझ और क्षमता को लेकर इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने जो लिखा है उसे खासकर आज के राजनेताओं को सीखना चाहिए। देश का आर्थिक विकास मौजूदा संसाधनों में भी संभव है मगर कैसे? इस पर उनके विचार व्यवहार और कार्य के स्तर पर यथार्थ परक थे। वे आदर्शवादी नहीं व्यावहारिक राजनेता थे।

अक्सर यह देखा जाता है कि बाबू जगजीवन राम की चर्चा करते हुए बाबासाहेब आंबेडकर को प्रतिमान के रूप में ला खड़ा कर दिया जाता है। यह किसी व्यक्तित्व के मूल्यांकन का एक गलत तरीका है। हर व्यक्तित्व की भूमिका और उपलब्धि एक-दूसरे से भिन्न होती है। सबके टॉस्क अलग होते हैं । इसलिए एक ही प्रतिमान से आप सबका आकलन नहीं कर सकते। देखना यह होता है कि उक्त व्यक्तित्व जिस भूमिका में था वहाँ उसका योगदान क्या था और कैसा था?

जो लोग बाबू जगजीवन राम को सत्तावादी और अवसरवादी कहकर उनके योगदान को एकदम रिड्यूस कर देते हैं उनको यह जीवनी जरूर पढ़नी चाहिए। लोगों को यह भ्रम है कि सत्ता में ऊँचे पद पर जाकर बाबू जगजीवन राम को आंबेडकर की तरह अपमान नहीं झेलना पड़ा। संघर्ष नहीं करना पड़ा। वे अय्याशी और ऐश्वर्य का जीवन जीते रहे। इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने इस झूठ से पर्दा उठाया है। कोई गौर करे कि ऊँचे पद पर पहुँच जाने के बावजूद उनको सवर्ण मानसिकता का दंश छल प्रपंच और तंज पूरे जीवन भर झेलना पड़ा। किस तरह से लोग उनको लांछित करते थे। उन पर अपमानजनक टिप्पणियाँ करते थे। उनके जीवन और परिवार को झूठे आरोपों में डालकर कलंकित करते थे कींचड़ उछालते थे। दलित विरोधी मानसिकता वाली मीडिया उनकी उपलब्धियों पर चुप्पी साध लेती थी अथवा गौण रूप में प्रस्तुत करती थी। उनका श्रेय दूसरे के हिस्से में दे दिया जाता था और उनके योगदान और चरित्र को कलंकित कर बौना बना दिया जाता था। उनको अभद्र और गंदे विशेषणों’ से नवाजा जाता था। बावजूद बाबू जगजीवन राम ने यह सब झेलते हुए एक योद्धा की तरह निरंतर आगे बढते रहे । खाद्य मंत्री से रक्षा मंत्री तक जो भी मंत्रालय उनको मिला। उस पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने ऐसे-ऐसे मौलिक निर्णय लिए ऐतिहासिक फैसले किये कि उसका असर पूरे देश में महसूस किया गया और उन्होंने उस मंत्रालय की काया ही बदल डाली। राष्ट्र और जनता के हित में सरकार का क्या रुख होना चाहिए- इसका उन्हें सम्यक बोध होता। सबसे बड़ी बात यह कि उनकी प्रतिभा और दृष्टि बहुमुखी थी। वे आर्थिक सामाजिक राजनीतिक सवालों और समस्याओं को बड़ी गहराई और बारीकी से समझते थे। कैसे उसे समय के अनुरूप जनमुखी किया जाय यह उनकी सोच के केन्द्र में रहता था। भारतीय समाज की सबसे बड़ी और जटिल रूढ़ि जाति थी। एक विशाल दलित समाज गर्त में पड़ा हुआ था। जगजीवन राम को पता था कि यह समस्या आर्थिक स्तर को सुलझाने से नहीं सुलझने वाली। इसके लिए वे अक्सर संतों के सांस्कृतिक जड़ों को कुरेदते थे। डॉ० रामविलास शर्मा संत कवियों की भूमिका को लोकजागरण कहते थे। बाबू जगजीवन राम को इसका ज्ञान अपने पिता शोभी राम से ही संस्कार में मिला था। इसलिए वे अक्सर संत कवियों की उस ऐतिहासिक धारा और विचारों के साथ सामाजिक बदलाव की पहल करते थे। संत कवियों पर उनकी समझ बहुत विलक्षण थी। अनेक संत कवियों के पद उन्हें कंठाग्र थे। भले उन्होंने लिखा नहीं लेकिन अपने भाषणों में वे जब भी संत कवियों की चर्चा करते, उनके पद उद्धृत करते तो उनकी समझ विद्वानों को भी विस्मित कर देती थी। एक तो वे वक्ता बहुत प्रभावशाली थे। हिन्दी और भोजपुरी का उच्चारण इतना मोहक और उत्कृष्ट होता था कि सुनने वाला मुग्ध हो जाता था। आचार्य हजारी प्रसाद द्वेदी बाबूजी को संत साहित्य का अप्रतीम विद्वान कहते थे।

        इं0 राजेन्द्र प्रसाद की इस जीवनी लेखन को पढ़ते हुए आजाद भारत में सवर्ण ताकतों की छटपटाहट और धूर्त्तता का बखूबी अहसास होता है। जब संविधान में प्रदत्त दस साल के आरक्षण को बढ़ाने का प्रस्ताव आया तो सवर्ण ताकतों ने अपनी पूरी मेधा का इस्तेमाल किया। उस समय सरकार और विपक्ष की सवर्ण ताकतों में कोई भेद न रहा। इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने इसे बड़े ही प्रभावशाली ढंग से रखा है। सत्ता में बदलाव तो हुआ था मगर समाज से प्रशासन तक ढाँचा यथावत था। सवर्ण ताकतें ऑक्टोपस की तरह पूरी व्यवस्था को जकड़े हुई थी। इस कपट और कुटिल चाल को समझना एक बात है और इसे रोकना बिलकुल ही अलग। इसे बाहर के विरोध से रोकना तो लगभग असंभव था। सरकार के भीतर रहकर बाबू जगजीवन राम ने कैसे इस चाल को निरस्त किया, इसका विस्तृत वर्णन राजेन्द्र प्रसाद जी ने किया है। बाबू जगजीवन राम ने सरकार के भीतर रहकर ऐसे नाजुक और संवेदनशील मामले में दलित समाज के हित में क्या किया इस पर गौर करना चाहिए। इं0 राजेन्द्र प्रसाद की दृष्टि और समझ का महत्व ऐसे स्थलों पर देखने लायक है। उन्होंने हर ऐसे संवेदनशील पक्षों पर एकदम आवेगहीन होकर एक बौद्धिक बहस खड़ी की है। आज यह काम अपेक्षाकृत आसान है लेकिन तब स्थिति ज्यादा प्रतिकूल और जटिल थी। आप कल्पना कीजिए जवाहरलाल नेहरू जी जैसे प्रचंड विचारक प्रधानमंत्री के सामने उनके कथन के विपरीत विचारों को रखना कितना साहसिक काम रहा होगा। मसलन वैचारिक निर्भीकता को लेकर बाबू जगजीवन राम एक स्पष्ट, दृढ़ और बिलकुल खरे इंसान थे।

       यह आत्मविश्वास यह वैचारिक दृढ़ता और खरापन कभी-कभी खतरनाक निर्णय लेने को भी प्रेरित करता है। ऐसा निर्णय जिसका विपरीत परिणाम पूरी प्रतिष्ठा को गर्त में मिला सकता है। लेकिन ऐसे निर्णयों से ही व्यक्तित्व की दृढ़ता भी निखरकर सामने आती है। ऐसे ही एक निर्णय का उल्लेख इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने किया है। जब  बाबूजी 1971 में  रक्षा मंत्री थे तो पाकिस्तान से युद्ध हो गया। उनके पास लोगों के लगातार टेलीफोन चिट्ठियाँ मशविरे आये थे कि युद्ध में सीमा पर वे अगली कतार में मुसलमानों के सैन्य जत्थे को नहीं भेजें। बाबू जगजीवन राम ने ठीक इसके उल्टा किया। उन्होंने बाबू जगजीवन राम के शब्दों में ही यह उद्धरण दिया है-“मैंने एक मुस्लिम बहुल बटालियन को सबसे आगे शंकरगढ़ में भेजा। क्यों भेजा, क्योंकि मुसलमानों की देशभक्ति पर मुझे संदेह नहीं था। मैं लड़ाई हारना नहीं चाहता था । मैं लड़ाई जीतना चाहता था। लेकिन मैं लड़ाई यह दिखाकर जीतना चाहता था कि पाकिस्तान का मुसलमान पाकिस्तानी है और भारत का मुसलमान भारतीय है।“ इं0 राजेन्द्र प्रसाद जी की दृष्टि सूक्ष्म भी है और व्यापक भी। उन्होंने ऐसे अनेक स्थलों, प्रसंगों और घटनाओं को देकर उनकी सोच की विविधता और विलक्षणता को उद्घाटित किया हैं। उनकी कोशिश रही है कि लोग बाबू जगजीवन राम के व्यक्तित्व के विस्तार और बहुमुखी क्षमता को जान सकें। देश के निर्माण में तमाम धार्मिक अल्पसंख्यकों पारसी, ईसाई, सिक्ख, जैन, बौद्ध और मुसलमानों के योगदान को रेखांकित करें। वे मजहब और राष्ट्रीयता के फर्क को समझते थे- इसमें तनिक संदेह नहीं। गौर करने वाली बात विचारों की स्पष्टता नहीं उसे आचरण में उतारने की है।

          बाबू जगजीवन राम के प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए समाजवादी कांग्रेसी सवर्ण और पिछड़े समुदाय के नेताओं तक ने ऐसी कुटिल चाल चली। चरण सिंह और राजनारायण ने एक बार ऐसी घृणित चाल चली कि 1978 में उनके बेटे सुरेश कुमार का अपहरण कर उसके साथ किसी लड़की की नंगी तस्वीर के चित्र को मेनका गांधी ने अपनी पत्रिका सूर्या में छाप दिया। सवर्ण मानसिकता की मीडिया ने बाबू जगजीवन राम की बुरी तरह चरित्र-हत्या करने की कोशिश की। चरण सिंह जैसे लोगों ने भी उनको प्रधानमंत्री न बनने देने के लिए कुटिल चाल चली। जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद अधिकांश सांसद चाहते थे कि बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री बने। अगर जगजीवन राम प्रधानमंत्री बने होते तो सरकार निश्चित रूप से पाँच साल चलती। उनका लंबा राजनीति अनुभव देश की समझ और प्रशासनिक क्षमता ऐसी थी कि देश का शासन अपेक्षाकृत बेहतर होता। महात्मा गाँधी का सपना कि कोई दलित प्रधानमंत्री बने, इसका न सिर्फ देश में सकारात्मक संदेश जाता बल्कि विश्व में भी भारत की प्रतिष्ठा बढ़ जाती। मगर राजनारायण जो बड़े समाजवादी नेता थे उन्होंने ही पहला प्रहार किया। इसे अंतिम परिणति दी लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी ने। इन दोनों नेताओं ने गैरलोकतांत्रिक तरीके से मोरारजी भाई देसाई को प्रधानमंत्री बनवा दिया। मोरारजी भाई पूँजीपतियों को भी प्रिय थे और भाजपाइयों को भी। उनका ऐसा अकडँ स्वभाव था कि जनता पार्टी की  सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी बल्कि इसके विपरीत टूट कर बुरी तरह बिखर गई। 1980 में फिर कांग्रेस की वापसी भी हो गई। सवर्ण मानसिकता नहीं दलित विरोधी मानसिकता का यह सबसे कलंकित उभार था। बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री न बने इसके आये अवसरों और उसे असफल करने की कोशिशों को राजेन्द्र प्रसाद जी ने प्रमाण और इसमें शामिल नेताओं के नाम सहित पूरा वाकया विस्तार से लिखा है। बेशक इसकी चर्चा आधुनिक भारत के इतिहास में शामिल की जानी चाहिए। ये सारे प्रसंग इस पुस्तक को अत्यन्त महत्वपूर्ण बनाते हैं। पाठक इसे पुस्तक में पढ़े इसलिए मैंने इसे विस्तार नहीं दिया।

           इं0 राजेन्द्र प्रसाद की इस पुस्तक को सम्यक मानने के पीछे सिर्फ यह कारण नहीं है कि उन्होंने बाबू जगजीवन राम के जीवन विचार उनकी प्रशासनिक क्षमता और उपलब्धियों को प्रमाणिक साक्ष्यों के साथ लिखा है। इसको सम्यक कहने के पीछ सबसे बड़ा कारण पुस्तक का परिशिष्ट भाग है। उन्होंने उनकी स्मृति में स्थापित विभिन्न 14 संस्थानों का विवरण । खुद इं0 राजेन्द्र प्रसाद के द्वारा लिया गया साक्षात्कार जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और आत्मीय है। डॉ० आंबेडकर पर मद्रास में दिया उनका व्याख्यान इस पुस्तक का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। ये उनके वैचारिक व्यक्तित्व का साक्ष्य है। फिर उन्होंने बाबू जगजीवन राम के बारे में संसद में दी गई श्रद्धांजलियों का संकलन है। इसमें उनके व्यक्तित्व के विविध पहलुओं और व्यापक सरोकारों का अंदाज होता है। फिर राज्यसभा में दी गई श्रद्धांजलियों का संकलन भी है।

         राजेन्द्र प्रसाद जी ने  बाबूजी के संपूर्ण जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को कालानुक्रम से एक बहुत ही  उपयोगी विवरणी दी है, जिससे पाठक उनकी एक नज़र में संपूर्ण जीवन छवि से परिचित हो जाता है। संदर्भ-ग्रंथों की सूची इं0 राजेन्द्र प्रसाद के अकथ शोध-श्रम का प्रमाण है। लेकिन संदर्भ-ग्रंथों की सूची और अनुक्रमणिका अधुनातन शोध-ग्रंथों का अनिवार्य हिस्सा है। यह हिस्सा आने वाले शोधार्थियों के लिए आत्यन्त उपयोगी है। इसलिए राजेन्द्र प्रसाद जी की इस पुस्तक को मैं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और सम्यक मानता हूँ। पाठकों को इसे जरूरी टॉस्क समझकर पढ़ना चाहिए क्योंकि इसमें भारत के निकटतम अतीत का इतिहास है। न सिर्फ राजनीतिक इतिहास की कुछ अनदिखी सच्चाइयों पर रोशनी पड़ती है बल्कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि भारतीय समाज के संक्रमणकाल से भी वे परिचित होते हैं। अगर हम ईमानदारी निष्पक्षता और मानवता के सचमुच पक्षधर हैं तो यह पुस्तक सामाजिक न्याय को न सिर्फ विचारों में बल्कि संस्कारों में विन्यस्त करने को प्रेरित करती है। मानवकृत कृत्रिम जातिवाद ने हमारी चेतना को कुंद कर दिया है। हमारी बुद्धि को जड़ बना दिया है और देश की प्रगति को रोक दिया है। इसलिए अगर यह जीवनी इस दिशा में जड़ता को खत्म कर लोगों में गतिशील चेतना की स्वीकार्यता लाती है तो यह बहुत बड़ा काम होगा। यह सभी के लिए प्रेय और करणीय है और सबके हित में है।

    कर्मेन्दु शिशिर

सम्प्रति : बी.डी. कॉलेज, मीठापुर, पटना में प्राध्यापक
प्रकाशित कृतियाँ : बहुत लम्बी राह (उपन्यास), कितने दिन अपने, बची रहेगी जिन्दगी, लौटेगा नहीं जीवन (कहानी-संग्रह), नवजागरण और संस्कृति, राधामोहन गोकुल और हिन्दी नवजागरण, हिन्दी नवजागरण और जातीय गद्य परम्परा, 1857 की राजक्रान्ति : विचार और विश्लेषण, भारतीय नवजागरण और समकालीन सन्दर्भ, निराला और राम की शक्ति- पूजा (शोध-समीक्षात्मक लेख, आलोचना)।
सम्पादन : भोजपुरी होरी गीत (दो भाग), सोमदत्त की गद्य रचनाएँ, ज्ञानरंजन और पहल, राधामोहन गोकुल- समग्र (दो भाग), राधाचरण गोस्वामी की रचनाएँ, सत्यभक्त और साम्यवादी पार्टी, नवजागरण पत्रकारिता और सारसुधानिधि (दो खंड), नवजागरण पत्रकारिता और मतवाला (तीन खंड), नवजागरण पत्रकारिता और मर्यादा (छह खंड), पहल की मुख्य कविताएँ और वैचारिक लेखों का संकलन (दो भाग)। 8 पुस्तिकाएँ और समकालीन कविता, कहानी पर आलोचना लेख

*यह पुस्तक फ्लिपकार्ट अमेजन गुडरीड्स और गूगलबुक्स पर उपलब्ध है। इस पुस्तक के अंग्रेजी और बंगला संस्करण भी प्रकाशित हैं और फ्लिपकार्ट अमेजन गुडरीड्स और गूगलबुक्स पर उपलब्ध हैं। पुस्तक की छपाई और जिल्द उम्दा किस्म की है। पुस्तक रेड साइन प्रकाशन से प्रकाशित की गई है जिसका मूल्य ₹600 है।

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बिहार की राजनीति के लिए एकमात्र सुकून है कि विपक्ष भाजपा की बनाई पिच पर खेलने से बच पा रहा है। रोजगार के सवाल या नागरिकता के प्रश्न विपक्ष के सरोकारों में हैं। बिहार को यदि भाजपा शासित राज्यों के उन्मादी वातावरण से बचाना है, जनता के जीवन के मूल सवालों को शासकों के केंद्रीय सरोकार में लाना है तो भाजपा को ताकत देने से बचना एक जरूरी अभियान होना चाहिए, बिहार के नागरिकों का कर्तव्य होना चाहिए।

यह 2012  की बात है। साप्ताहिक शुक्रवार के लिए रिपोर्टिंग करते हुए मैं भागलपुर के कुछ इलाकों में घूम रहा था। भागलपुर की बिहपुर विधानसभा सीट से दूसरी बार विधायक बने थे इंजीनियर शैलेन्द्र। यह विधानसभा सीट परिसीमन में भागलपुर लोकसभा का हिस्सा हो गई थी, इसके पहले खगड़िया लोकसभा का हिस्सा थी।

इस वक्त तक नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी से थोड़ा अलग दिखने की कोशिश करने लगे थे। यह कोशिश 2009 में गुजरात के तब के सीएम नरेंद्र मोदी के लिए बिहार में आयोजित भोज रद्द किये जाने के समय से ही स्पष्ट थी। 2010 में नीतीश कुमार NDA में बड़े भाई की भूमिका में आ गये थे। 115 सीटें थीं उनके पास। जिस वक्त की मैं बात कर रहा हूं, 2012 के अंतिम महीनों में से किसी दिन की, नीतीश कुमार भाजपा से दो-दो हाथ के मूड में आ चुके थे, लेकिन सबकुछ उतना सतह पर नहीं था। इसके बावजूद कि 2009 में नरेंद्र मोदी का भोज रद्द होना और 2010 में संयुक्त पोस्टर पर नीतीश कुमार का आग बबूला होना राजनीतिक दृश्य में स्थाई रूप से अंकित हो गया था।

तब तक 7 सालों से भाजपा-नीतीश कुमार की अगुआई में सरकार में थी, जिसका जहरीला असर मुझे बिहपुर विधानसभा में साफ दिखा। बिहपुर बाजार में रह रहे डोम जाति के लोगों को नीतीश सरकार की 3 डिसमिल रिहायशी जमीन की योजना के तहत जमीन मिली थी। कागज पर सब अच्छा-अच्छा था, लेकिन डोम जाति के परिवारों को तीन डिसमिल जमीन अधिकारियों ने या यूं कहें कि विधायक के प्रभाव ने जहां दिलवाई थी, वहां कोई मजार थी, इमामबाड़ा था। ठीक सामने डोम जाति, जिनके दैनंदिन में पालतू सूअर होते हैं, को जमीन देना सांप्रदायिक शरारत का एक खास नमूना था। सूअर मुसलमानों के लिए नापाक माना जाने वाला जानवर है। यह नफरती मानस से उपजा एक दृश्य था मेरे सामने। जमीन मिली भी काफी गड्ढे में थी। आमतौर पर डलिया खचिया का काम करने वाली परिवार की महिलाओं ने बताया था कि ‘ जानबूझकर  यह लड़ाने – भिड़ाने के इरादे से हुआ था।’ बल्कि उनका मानना था कि बिहपुर बाजार में उनके सामान बिकने की सहूलियत भी इसके खत्म हो जायेगी,  रोजगार पर असर होगा। इस घटना को भाजपा की सीधी सरकारों, या गठबंधन की सरकारों के जहरीले असर के रूप में तब से मैं याद रखता हूं।नीतीश सरकार पर भाजपा के प्रभाव का यह साफ असर था। भागलपुर लोकसभा सीट से तब भाजपा के सांसद थे शाहनवाज हुसैन।

भाजपा और संघ परिवार की जुगलबंदी एवं सरकारी तंत्र का आश्रय समाज में मीठे जहर का काम करता है। यह एक पैटर्न का हिस्सा है, समाज के साम्प्रदायीकरण का। पिछले कुछ वर्षों में, खासकर 2002 के गुजरात दंगों के बाद संघ से जुड़े संगठनों और सांप्रदायिक जमातों ने एक नई नीति अपना ली है। समाज में निरंतर सुलगते साम्प्रदायिक माहौल की नीति। छोटे और मध्यम आकार के झगड़े, तनाव और दंगे। यह बिहार में भी खास पैटर्न बन गये।
एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार पुलिस के आँकड़ों बताते हैं कि 2005 में दंगों के केवल 205 मामले दर्ज हुए थे। वहीं, 2024 में ये संख्या बढ़कर लगभग 3,186 हो गई। पिछले लगभग दो दशकों में दंगों की वारदातों में करीब तीन गुना वृद्धि दर्ज हुई है

कुणाल पुरोहित की किताब है H-Pop: H-Pop: The Secretive World of Hindutva Pop Stars . यह किताब हिंदुत्वादी साम्प्रदायिक इरादों का पॉपुलर कल्चर में ढल जाने की पड़ताल करती है। कुणाल ने अपने अनुभव से बताया है कि कैसे झारखंड बिहार सहित पूरे देश में हिंदू त्योहारों के दौरान हिंदू संगठनों से जुड़े युवा तनाव पैदा करते हैं। मस्जिदों के पास जाकर डीजे के जरिए उत्तेजक सम्प्रदायिक गाने बजाये जाते हैं। भाजपा की रघुबर सरकार के दिनों की एक केस स्टडी इस किताब में कुणाल ने शामिल किया है।

आजकल तो योगी मॉडल भी चलन में आ चुका है। उत्तर प्रदेश में कई मस्जिदों पर भगवा झंडे लहराने की खबरें आती रहती हैं। बिहार में भी यह पैटर्न बन रहा है। 2024 के नवंबर में काली मूर्ति विसर्जन के दौरान टमटम चौक पर एक मस्जिद पर भगवा झंडा लहरा दिया गया। ऐसा नहीं है कि संघ परिवार और उससे जुड़े हिंदुत्ववादी संगठनों का यह बिल्कुल नया पैटर्न है। बल्कि इसकी जड़ें ऐतिहासिक रूप से संघ और उसके भी पहले हिंदू महासभा के जन्म के समय से ही है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 1948 में भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल को लिखे पत्रों में स्पष्ट बताया है कि संघ से जुड़े लोगमुसलमानों जैसे वेश भूषा में हिंदू मुस्लिम दंगों की आग भड़काते हैं।

14 मार्च 1948 को वे सरदार बल्लभ भाई पटेल को लिखते हैं, ” मुझे यह बताया गया है कि आरएसएस के लोग उपद्रव करने की योजना बना रहे हैं। उनमे से बहुत से लोगो मे मुसलमानों की तरह की वेशभूषा और उन्ही की तरह दिखने की योजना बना कर हिंदुओ पर हमला करके दंगे फैलाने की योजना बना रखी है। इसी प्रकार से उन्हीं में से कुछ लोग मुसलमानों पर हमला करके उन्हें दंगे के लिये भड़काएँगे। इस प्रकार के उपद्रव से हिंदुओं और मुसलमानों में दंगे की आग भड़केगी। ”( नीरजा सिंह द्वारा संपादित पुस्तक, नेहरू पटेल, एग्रीमेंट विदिन डिफरेंसेज, सेलेक्ट डॉक्यूमेंट एंड करेस्पोंडेंस, 1933 – 1950, एनबीटी, पृ.43 )

ये प्रवृत्तियां सरकारों के संरक्षण के बाद और बलवती हो जाती हैं, संरक्षण पा लेती हैं। भाजपा सरकारों में हुए मॉब लिंचिंग की घटनाओं में शामिल लोगों पर कार्रवाई नहीं होती रही है, बल्कि भाजपा के नेता मॉब लिंचर उन्मादियों को प्रोत्साहित करते समाने आये हैं। साम्प्रदायिक उन्मादियों के साथ खड़ी दिखती सरकार अपने अफसरों के लिए भी न्याय सुनिश्चित नहीं करा पाती। दंगाइयों से मुकाबला करते हुए मारे गए उत्तर प्रदेश के इंस्पेक्टर सुबोध सिंह का परिवार आज भी न्याय से महरूम है।

ये कुछ चंद उदाहरण हैं इतिहास के, वर्तमान के, निजी अनुभवों के, जो पर्याप्त हैं इस संकल्प के लिए कि भाजपा को वोट दिया जाना किस तरह समाज के वंचित और अकलियत तबके के लिए खतरनाक है। सामाजिक शांति और सौहार्द के लिए खतरनाक है।

भागलपुर के बिहपुर की घटना एक अनुभव जन्य उदाहरण है, केस स्टडी है कि कैसे भाजपा के प्रभाव का सरकारी तंत्र दलित बहुजन जमात को अल्पसंख्यकों के साथ लड़वाने के उन्मादी इरादे में सहयोगी होता है। डोम जाति के लोगों ने तब इस उन्मादी इरादे को भांप लिया था, लेकिन वह घटना जिसमें सड़क से बेहद नीचे,गड्ढे में जमीन दी गई थी, जो रोजगार के केंद्र से बहुत दूर भी थी, दलितों के प्रति भाजपा और उसके प्रभावी तंत्र का दलितों के प्रति असंवेदनशीलता और क्रूरता को दर्शाती घटना है।

जनता को बेहोशी में रखने और जीवन के मौलिक सवालों से दूर रखने में भाजपा और संघ परिवार के लोगों से कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता। कोई गौर करे तो साफ दिखेगा कि भाजपा के नेताओं के पास भाषा, भंगिमा और मुद्दों के स्तर पर क्या है जनता के लिए। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पाकिस्तान और झटका, हलाल मीटों की शब्दावली और मेटाफर में अपनी राजनीति की दुकान चलाते हैं, जनता बेगूसराय से दूसरे राज्यों में ले जाये जा रहे उद्योगों का सवाल पूछना भूल जाती है।

डिप्टी सीएम विजय सिन्हा की भाषा और भंगिमा हमेशा उन्मादी होती है। बुलडोजर राज का सपना देख रहे विजय सिन्हा राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार चाहते हैं। इन नेताओं के पास अपने कार्यकर्ताओं के लिए भी क्या कार्यक्रम है। राष्ट्रवाद भी उन्मादी शक्ल में ही इनके एजेंडे हैं, उनके कार्यक्रम हैं। पिछले दो तीन महीने में भाजपा के कार्यकर्ताओं को क्या कार्यक्रम मिले हैं? ऑपरेशन सिंदूर का जायगान और पीएम मोदी को मिली गाली के खिलाफ प्रदर्शन। वास्तव में लेकिन हुआ क्या? कौन से सवाल भाजपा के कार्यकर्ताओं के सामने भी नहीं आने दिए गये?

देखते देखते प्रधानमंत्री कथित ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान का साथ देने वाले चीन से गलबहियां कर आये। भाजपा कार्यकर्ताओं और देश को बता दिया गया कि अब ट्रंप हमारे दोस्त नहीं रहे, जिनपिंग का जायगान करिए। अबकी बार ट्रंप सरकार का नरेंद्र मोदी का उद्घोष और भारत में जगह जगह ट्रंप के लिए हुए हवन यज्ञ के कार्यक्रम बदल गए चीन से दोस्ती में। जवाहर लाल नेहरू की चीन नीति पर तीखा हमलावर रही जमात के लिए ‘ हिंदी चीनी भाई -भाई ‘ का नारा नरेंद्र मोदी का गिफ्ट बन गया है, यह नारा अब भाजपा कार्यकर्ताओं को नये शब्दों में थमा दिया गया, और थमा दिये गये नरेंद्र मोदी के आंसू – नरेंद्र मोदी की मां का मान। वह नरेंद्र मोदी जिन्होंने राहुल गांधी से लेकर नीतीश कुमार की मां के मान को मान नहीं माना।

क्या जानबूझकर कोई आधुनिक समाज अपने बच्चों को आधुनिक ज्ञान विज्ञान से दूर मिथकीय राष्ट्र गौरव का शिकार होने देगा? भाजपा और उसकी सरकारें जिस तरह कथित भारतीय ज्ञान आम जनता को देना चाहती है क्या उसे कोई सचेतन नागरिक संभव होने देना चाहेगा? क्या कोई मां या पिता अपने बच्चों से किसी अनुराग ठाकुर द्वारा पाया वह ज्ञान सुनना चाहेंगे कि हनुमान अंतरिक्ष के पहले यात्री थे और पुष्पक विमान दुनिया में पहला वायुयान आविष्कार! क्या पश्चिमी सभ्यताओं में मिथकीय धारणाओं की कोई कमी रही है? लेकिन क्या उन धारणाओं को आधुनिक आविष्कारों पर, ज्ञान पर कथित राष्ट्रवादी ज्ञान के आवरण में हावी होने दिया गया? क्या चीन का ज्ञान अमेरिकियों ने प्रतिबंधित कर दिया?


बिहार की राजनीति के लिए एकमात्र सुकून है कि विपक्ष भाजपा की बनाई पिच पर खेलने से बच पा रहा है। रोजगार के सवाल या नागरिकता के प्रश्न विपक्ष के सरोकारों में हैं। बिहार को यदि भाजपा शासित राज्यों के उन्मादी वातावरण से बचाना है, जनता के जीवन के मूल सवालों को शासकों के केंद्रीय सरोकार में लाना है तो भाजपा को ताकत देने से बचना एक जरूरी अभियान होना चाहिए, बिहार के नागरिकों का कर्तव्य होना चाहिए।

मोहन भागवत ने बिहार के मुजफ्फरपुर में अपने कार्यकर्ताओं को बिहार चुनाव का एक एजेंडा दिया है। उन्होंने कह कि ‘ दुर्भाग्य बहुत दिनों तक नहीं। रहता। ‘ वे भाजपा की अपनी सरकार का एजेंडा दे गये हैं। बिहार की जनता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि भागवत के इरादे को कैसे सफल नहीं होने देना है। बिहार के विभूतियों में से एक राजेंद्र प्रसाद की चेतावनी की अनुगूंज हमारे लिए लोकतंत्र के खतरे से बिहार को बचाने की स्थाई कार्यनीति होनी चाहिए।
राजद समाचार से साभार

क्यों विवादों में है बिहार सरकार का राजभाषा पुरस्कार

लेखक : विनय कुमार सिंह

साहित्य अकादेमी के पदाधिकारियों की इंट्री राजभाषा विभाग में रामवचन राय की वजह से होती रही है। राजभाषा विभाग में पुरस्कारों की बंदरबांट साहित्य अकादेमी के इन्हीं लोगों के कारण होती रही है। रामवचन राय से पहले प्रेमकुमार मणि नीतीश कुमार के खासम-खास होते थे, तो उन्होंने इसकी कमिटियों में नामवर सिंह, मैनेजर पांडे और देवेंद्र चौबे जैसे सवर्ण लेखकों को शामिल करवाया। उस दौर में भी बिहार के बहुत सारे लेखक इस पुरस्कार से वंचित रहे। इन नामवर लेखकों ने भी यहां आकर अपने ही भाई बंधुओं और परिचितों को सम्मानित करवाया।

मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा वित्तीय वर्ष- 2023-24 के लिए ‘हिन्दी सेवी पुरस्कार दिये जाने की घोषणा के साथ ही विवाद शुरू हो गया है। विवाद की शुरुआत कवि, पत्रकार विमल कुमार ने सोशल मीडिया पर जारी अपने एक पत्र के माध्यम से किया। ज्ञात हो कि मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा राष्ट्रकवि दिनकर सम्मान दिये जाने संबंधी पत्र विमल कुमार को प्रेषित किया था। जिसे उन्होंने लेने से अस्वीकार कर दिया। विवाद का एक तगड़ा प्रकरण अभी सामने आया है। राजभाषा ने डॉ. के श्रीनिवास राव को बाबू गंगा शरण सिंह पुरस्कार से सम्मानित किया है। राव साहित्य अकादेमी दिल्ली के सचिव हैं और यह वही शख्स हैं, जिन्होंने अपने ही संस्थान में काम करने वाली, एक महिला सहकर्मी के साथ यौन दुराचरण के आरोपी हैं। सन 2018 में उनपर जब उक्त महिला ने केस किया तो उसे एक साल बाद बर्खास्त कर दिया गया। उनका यह मामला कोर्ट में चल रहा था। अभी कोर्ट ने उस महिला की सेवा बहाल कर दी है और यह सख्त आदेश दिया है कि आरोप की जांच लोकल कमिटी से होनी चाहिए। विभाग ने इसबार तीन ऐसे लेखकों को पुरस्कृत किया है, जो पहले भी पुरस्कृत हो चुके हैं. ये घटनाएं बतलाती हैं कि साहित्य को लेकर यह विभाग, जो कि स्वयं मुख्यमंत्री का विभाग है, कितना लचर और यथास्थितिवाद का पोषण करने वाला है।


विभाग ने इस बार जिन 15 लेखकों को पुरस्कृत किया है उनमें ब्राह्मण जाति समुदाय के 7. भूमिहार के 3, कायस्थ के 2 और 1-1 लेखक बेलदार और दलित समाज से आनेवाले हैं। पुरस्कार पाने वालों की सूची में ओबीसी समाज का लेखक पूरी तरह से बाहर है। यह नीतीश कुमार का सवर्ण प्रभुत्व आधारित ऐसा छ‌द्म है जिसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम होगी। यह गौरतलब है कि जिस बिहार में बहुजन समाज से आनेवाले लेखकों की एक बड़ी आबादी हिन्दी साहित्य में लिख रही है, बावजूद इसके पिछड़े वर्ग से एक भी लेखक को यह सम्मान नहीं दिया गया। यह उपेक्षा नीतीश कुमार की सरकार में ही संभव थी। यूं ही नहीं नीतीश यहां के सवर्णों के प्रिय हैं। बिहार में जिन जाति समूहों की आबादी 88 प्रतिशत है, इस पुरस्कार में उन्हें मात्र 2 पुरस्कार मिले हैं और जिनकी आबादी मात्र 12 प्रतिशत है, उसी सवर्ण जाति समूह के लोगों ने सारे-के-सारे पुरस्कार अपने खाते में डाल दिये।
वित्तीय वर्ष-2023-24-2024-25 के लिए हिन्दी सेवी पुरस्कार, सम्मान योजना के लिए गठित निर्णायक मंडल का अध्यक्ष डॉ-विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को बनाया गया था, जो पहले से ही पुरस्कार लेने और दिलवाने की जुगाड टेक्नोलॉजी के मास्टरमाइंड माने जाते रहे हैं। राजभाषा में उनकी पहुंच का माध्यम रामवचन राय रहे हैं, जो नीतीश कुमार के करीबी बतलाये जाते हैं। आगे हम बतलाएंगे कि रामवचन राय के कारण कैसे इस विभाग की विश्वसनीयता गर्क हुई है। निर्णायक मंडल में शामिल सदस्यों में डॉ. एस-सिद्धार्थ (दलित), डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल (बनिया), डॉ श्योराज सिंह बेचौन (दलित) डॉ. मंजुला राणा, अरुण कमल (ब्राह्मण) और डॉ नन्दकिशोर नंदन यादव शामिल थे। इन सभी निर्णायकों में एक भी ऐसे नहीं थे, जो समकालीन रचनाशीलता की श्रेष्ठ प्रतिभाओं को चुन सकें। जाहिर है ये सभी के सभी जुगाड़ टेक्नोलेंजी से आये लोग थे। राजभाषा ने बी.पी. मंडल पुरस्कार शिवनारायण को दिया है। इससे पहले भी विभाग इन्हें 2003 में नागार्जुन सम्मान से सम्मानित कर चुकी है। फिर ऐसा क्या था कि दुबारा इन्हें सम्मानित किया गया? इसके पीछे भी जुगाड़ का पूरा तंत्र काम करता रहा है। शिवनारायण नई धारा पत्रिका के संपादक हैं। वह अरविंद
महिला कॉलेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं। वह जिस ‘नई धारा पत्रिका से जुड़े हैं, उसका स्वामित्व बिहार के चर्चित लेखक राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह के परिवार का है।

यह संस्था भी हर साल अपने बैनर तले तीन पुरस्कार देती है। शिवनारायण ने कुछ वर्ष पूर्व राजभाषा पुरस्कार चयन समिति के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को ‘नई धारा पुरस्कार, दिलवाया और बदले में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने उन्हें बी.पी. मंडल पुरस्कार देकर उपकृत किया। इससे जुड़ा एक और सच यह है कि जिस शिवनारायण को यह पुरस्कार दिया गया इसमें निर्णायक मंडल के एक और लेखक श्योराज सिंह बेचैन भी शामिल थे। उन्होंने भी खुलकर शिवनारायण को यह सम्मान दिये जाने का पक्ष लिया था, बदले में शिवनारायण ने उनकी पत्नी रजतरानी मीनू को ‘नई धारा रचना सम्मान 2025’ दे दिया। कुछ माह पूर्व भी ‘नई धारा विवादों में घिरा था। हिन्दी कवि कृष्ण कल्पित और एक युवा लेखिका को इस संस्था ने लेखक इन रेजीडेंसी नामक एक फलोशिप के लिए चयन किया था। उक्त कवि ने उस युवा लेखिका के साथ जबरिया यौन संबंध बनाने की कोशिश की, जिसके कारण वह विवादों में रहा। इस पूरे प्रकरण में संस्था ने कोई ऐसी पहल नहीं ली, जिसके कारण कल्पित को सजा दिलायी जा सके ।

विभाग द्वारा अब तक किसी भी गैर ब्राह्मण (सवर्ण) ओबीसी, दलित, अल्पसंख्यक या महिला साहित्यकारों की राशि वाला राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान नहीं मिला है। इस बार भी एक ब्राह्मण आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी को यह सम्मान दिया गया। यह वही आलोचक हैं जिनके प्रिय कवि तुलसी दास हैं। जिन पर उन्होंने तुलसी का देश’ नामक पुस्तक लिखी है। और जो फणीश्वरनाथ रेणु के गद्य को विचारहीन गद्य मानते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि किन लोगों ने और किन कारणों से ऐसे जातिवादी लोगों को बिहार के इन बड़े पुरस्कारों से विभूषित करने का निर्णय लिया। इसका सीधा-सा उत्तर यह है कि चूंकि राजभाषा के अध्यक्ष आमतौर पर दिल्ली के लेखक ही होते रहे हैं और प्रायः

‘मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए ‘हिन्दी सेवी पुरस्कार की सूचीके लिए बिहार हलचल पत्रिका का यह इमेज देखें

वे सवर्ण जातियों से आते हैं, इसलिए आमतौर पर उनकी पहली पसंद उनकी अपनी ही जाति के दायरे के लेखक होते रहे हैं। यहां सवाल यह उठाया जा सकता है कि इनके चयन में कौन सा-मापदंड है जिसकी वजह से वे ही इसके अध्यक्ष बनते रहे हैं। इसका मूल कारण यह है कि चूंकि यह विभाग मुख्यमंत्री का है और उनके सभी कामों में प्रो. डॉ. रामवचन राय की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। प्रो. राय चूंकि अरसे से लगातार बिहार से साहित्य अकादेमी के सदस्य मनोनीत होते रहे हैं, इसलिए वह साहित्य अकादेमी में अपनी उपस्थिति की कीमत वहां से उनके पदाधिकारियों को राजभाषा में अध्यक्ष पद और पुरस्कार दिलवाकर पूरा करते रहे हैं। सच पूछा जाए तो इसके मास्टर माइंड रामवचन राय ही हैं।

इनकी ही कृपा से साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया था। वित्तीय वर्ष 2020-21 एवं 2021-22 के लिए गठित निर्णायक मंडल का अध्यक्ष माधव कौशिक थे, जो वर्तमान में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं। ज्ञात हो कि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने अकादमी के अध्यक्षपद से हटने के बाद अपने विश्वास पात्र डॉ. माधव कौशिक को अकादमी का अध्यक्ष बनवाया। डॉ. कौशिक ने इस उपकार का बदला डॉ. तिवारी को राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान से सम्मानित कर चुकाया।

वित्तीय वर्ष 2023-24 एवं 2024-25 के लिए ‘हिन्दी सेवी पुरस्कार, सम्मान योजना के लिए गठित निर्णायक मंडल के अध्यक्ष पद पर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हैं। उन्होंने साहित्य अकादमी के सचिव डॉ के. श्रीनिवास राव को बाबू गंगा शरण सिंह पुरस्कार से पुरस्कृत किया। ज्ञात हो कि वर्ष 2018 में साहित्य अकादमी के सचिव डॉ के. श्रीनिवास राव पर उनकी एक महिला सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। अकादमी ने उन्हें यह कहकर नौकरी से निकाल दिया था कि उन्होंने काम में खराब प्रदर्शन किया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अकादमी के इस कदम को न केवल अनुचित और अवैध बताया बल्कि बदले की कार्रवाई माना है। 28 अगस्त, 2025 को सुनाये गए फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अकादमी और सचिव दोनों की दलीलों को पूरी तरह से खारिज करते हुए पीड़ित महिला को उनके पद पर दोबारा बहाल कर दिया है। फैसला आने के पांच दिनपूर्व 23 अगस्त 2025 को ऐसे चरित्रहीन व्यक्ति को बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सम्मानित करते हैं। इससे मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग राजभाषा ही नहीं बल्कि पूरी चयन समिति पर प्रश्न उठना लाजिमी है।

साहित्य अकादेमी के पदाधिकारियों की इंट्री राजभाषा विभाग में रामवचन राय की वजह से होती रही है। राजभाषा विभाग में पुरस्कारों की बंदरबांट साहित्य अकादेमी के इन्हीं लोगों के कारण होती रही है। रामवचन राय से पहले प्रेमकुमार मणि नीतीश कुमार के खासम-खास होते थे, तो उन्होंने इसकी कमिटियों में नामवर सिंह, मैनेजर पांडे और देवेंद्र चौबे जैसे सवर्ण लेखकों को शामिल करवाया। उस दौर में भी बिहार के बहुत सारे लेखक इस पुरस्कार से वंचित रहे। इन नामवर लेखकों ने भी यहां आकर अपने ही भाई बंधुओं और परिचितों को सम्मानित करवाया।

नामवर सिंह ने स्वयं अपने छोटे भाई काशीनाथ सिंह को यह सम्मान दिलवाया, जबकि राजभाषा में यह स्पष्ट नियम है कि पुरस्कार निर्णायक से जुड़े लोगों के किसी संबंधी को नहीं दिया जा सकता। पाठकों का यह सवाल उठ सकता है कि कौन से मूर्धन्य आलोचक, लेखक हैं, जिन्हें यह सम्मान दिया जाना चाहिए था ? राणा प्रताप, तारानंद वियोगी, सुरेंद्र नारायण यादव, कमलेश वर्मा, राजेंद्र प्रसाद सिंह, अनंत आदि कई लेखक, साहित्यकारों को आज तक यह सम्मान नहीं दिया गया। यह एक खास पैटर्न की ओर स्पष्ट संकेत देता है। किसी पुरस्कार के दिये जाने का मापदंड यह होना चाहिए कि कौन-सा वह लेखक है, जो समकालीन हिन्दी रचनाशीलता के बड़े सवालों को व्यापक ढंग से उठा रहा है, अगर यह कसौटी होती तो हिन्दी में यह सम्मान ओमप्रकाश कश्यप, वीरेंद्र यादव, अश्विनी कुमार पंकज, कमलेश वर्मा, राजेंद्र प्रसाद सिंह सरीखे लेखकों को मिलना चाहिए था, जो अपने समय की रचनाशीलता को अपने तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन उन्हें यह पुरस्कार इसलिए नहीं दिया गया, क्योंकि निर्णायक मंडल के अध्यक्ष ब्राह्मण बनते रहे हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य बंदरबांटतक ही सीमित होते रहे हैं। अंगिका में एक कहावत है ‘तोरा ब्याह में हम नटुआ, हमरा ब्याह म तोंय नटुआ। यानि कि एक-दूसरे का सहयोग कर बंदरबांट करना यही खेल यहां भी चल रहा है। और इसके कर्तादृधर्ता हैं प्रो. रामवचन राय।

विवाद का चौथा कारण हृषिकेश सुलभको वर्ष 2023-24 के लिए फणीश्वरनाथ रेणु सम्मान दिया गया। ज्ञात हो कि वर्ष 2015 में हृषिकेश सुलभ को बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा रामेश्वर सिंह कश्यप पुरस्कार दिया गया था, जिसे उन्होंने लौटा दिया था। सनद रहे कि उस समय बिहार सरकार में जदयू के साथ राजद भी शामिल थी। आलोचकों का कहना है कि चूंकि उस समय सत्ता में राजद भी शामिल थी इसलिए उन्होंने उस समय उक्त पुरस्कार को लौटा दिया था।शायद छोटी राशि मानकर, या राजद से दूरी बनाने के उद्देश्य से अब चूंकि जदयू के साथ सत्ता में भाजपा भी शामिल है और राशि भी चार लाख रुपये की है इसलिए इस बार पुरस्कार लेने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

बिहार सरकार में संवैधानिक पद परआसीन एक वयोवृद्ध प्रो. साहित्यकार ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘मुझे यह आश्चर्य हो रहा है कि चयन समिति के अध्यक्ष जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान का चयन कर रहे थे तब उन्होंने एक क्षण के लिए यह क्यों नहीं सोचा कि एक तो अपने हमनाम और दूसरा एक ही शहर के रहने वाले का चयन वे कैसे कर रहे हैं? तनिक भी संकोच क्यों नहीं हुआ? साथ ही अपने ही स्वजाति का चयन करने में। यदि यही काम कोई बहुजन समाज से आने वाला व्यक्ति करता तो तुरंत यही लोग उस पर जातिवाद करने का ठप्पा लगा देते। इस कमिटी को निश्चित रूप से भंग कर दिया जाना चाहिए। चयन पारदर्शी और समावेशी होनी चाहिए।’

शायद विवादों के कारण ही वित्तीय वर्ष-2024-25 के लिए पुरस्कार, सम्मान की घोषणा नहीं किया गया है। यूं तो पूर्व मेंदो वित्तीय वर्षों का पुरस्कार, सम्मान एक साथ ही दिया गया था। उस समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा किया था कि यह पुरस्कार, सम्मान प्रत्येक वर्ष हिन्दी-दिवस के मौके पर 14 सितंबर को दिया जाएगा, लेकिन इस बार यह पुरस्कार 23 अगस्त, 2025 को दिया गया। शायद आगामी चुनाव को देखते हुए ऐसा निर्णय लिया गया हो। हद तब तब हो गई जब डॉ भीमराव अम्बेडकर पुरस्कार से सम्मानित जियालाल आर्य ने इस बार के समारोह में अपनी एक किताब माननीय मुख्यमंत्री को भेंट करने गए। उन्होंने नीतीश कुमार का नाम भी सही से नहीं लिखा, जिसको लेकर मुख्यमंत्री ने वहां ही उन्हें टोक दिया कि आप कैसे लेखक हैं, जो हमारा नाम भी सही नहीं लिख सकते।

मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा आर्थिक रूप से अक्षम साहित्यकारों को उनकी अप्रकाशित कृति के लिए पांडुलिपि प्रकाशन योजना अंतर्गत अनुदान राशि दिया जाता है, लेकिन उसमें भी बड़े पैमाने पर अनियमितता होती है जिससे पात्र साहित्यकार उक्त योजना के लाभ से वंचित रह जाते हैं। विभाग द्वारा निर्धारित मापदंडों को ताख पर रखकर सारे निर्णय लिए जाते हैं। एक साहित्यकार ने बिहार सरकार के सूचना एवं प्रावैधिकी मंत्री कृष्ण कुमार सिंह ‘मंटू’ को लिखित आवेदन देकर इसकी उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। प्रतिष्ठित साहित्यकार अनंत ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 17 अगस्त, 2025 को ईमेल द्वारा और 20 अगस्त, 2025 को हार्ड कॉपी में मुख्यमंत्री सचिवालय में कई साहित्यकारों के हस्ताक्षर के साथ आवेदन दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग (राजभाषा) द्वारा स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से साहित्यकारों का चयन करेगी, जिससे उसकी विश्वनीयता कायम हो सके।

बिहार हलचल से साभार
(लेखक हिन्दी के महत्वपूर्ण बहुजन विमर्शकार हैं। संप्रति बरियारपुर, मुंगेर में रहते हैं।)

पटना में साहित्य अकादमी के आयोजन स्थल पर होगा लेखकों का मार्च: अपील जारी

साहित्य अकादमी की एक महिला कर्मचारी ने सचिव डॉ. के. श्रीनिवास राव पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे, इन आरोपों की जांच करने के बजाय अकादमी ने पीड़िता को चुप करने के लिए झूठे आरोप लगाकर उसे नौकरी से निकाल दिया, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 अगस्त 2025 को बदले की कार्रवाई बताते हुए अवैध करार दिया और उनकी बहाली का आदेश दिया।

इसी बीच साहित्य अकादमी 25–28 सितंबर को पटना के ज्ञान भवन में एक साहित्यिक आयोजन कर रही है।

विभिन्न संगठनों — जसम प्रलेस, जलेस, इप्टा, जुटान तथा बड़ी संख्या में नागरिक समाज ने निर्णय लिया है कि 25 सितंबर को सुबह 10 बजे से ज्ञान भवन के समक्ष साहित्य अकादमी के खिलाफ़ सशक्त विरोध दर्ज करेंगे।

आप सभी साथियों से अनुरोध है कि कल, 25 सितंबर को प्रातः 10 बजे ज्ञान भवन (गांधी मैदान) के बाहर एकत्र हों और प्रतिरोध सभा में शामिल हों।

एक संभावना का अंत : अलविदा इति !

कोई 2014 या 15 का साल होगा जब इति से बात और मुलाकात हुई होगी। फरवरी 2015 में स्त्रीकाल और साउथ एशियन वीमेन इन मीडिया द्वारा आयोजित ‘ गया सेमिनार’ में तो वह आई ही थी।

उसके बाद उसके साथ नियमित बातचीत होने लगी थी। स्त्रीकाल के लिए कई असाइनमेंट उसने किये। कुछ खुद से तय करके, कुछ मेरे सुझाव पर।

2015 में हमने कई जगह साथ रिपोर्टिंग की। कई जगह वह गई मेरे साथ। पातेपुर से रतन लाल इलेक्शन लड़ रहे थे। वहां रिपोर्टिंग के लिए गई।

दाउदनगर में हम सब गये। यह उसका कल्चरल रिपोर्टिंग का अनुभव था। मनीषा,इति, कर्मानंद आर्य और मैं वहां एक दिन रहे। जितिया आयोजन के लिए।

भाकपा (माले ) के महासचिव कामरेड दीपांकर भट्टाचार्य के साथ उनके इलेक्शन कैंपेन के दौरान इंटरव्यू और कैंपेन मोड देखने के लिए हमलोग साथ गये।

उसने हमारे असाइनमेंट पर उषा किरण खान का इंटरव्यू किया। कई रिपोर्ट और आलेख लिखे।

मैं उसे अपनी छोटी बहन की तरह देखता था। वह भी मुझे बड़े भाई की तरह समझती थी।

उसे कई बार परेशान देखता, लेकिन दुखी नहीं। बहन की शादी की, नौकरी को चिंता हो, या कोई छोटी मोटी परेशानी, जो मुझसे शेयर कर सके, मुझसे मदद ले सके, तो वह बेधड़क नॉक करती।

हेल्थ का इशू उसे तब भी था, जब वह मिली थी। लेकिन इस बार स्वास्थ्य उसे हमसे छीन कर ले गया। वह अपने ऑपरेशन के बाद बेहद तकलीफ में थी।

मेरे किडनी ट्रांसप्लांट के बाद एक बार फोन किया। उसने कहा कि ‘ मैं आपको फोन नहीं कर सकी थी बीमारी में, क्योंकि लगता था कि क्या कहें।’ उसने कहा कि ‘ वह कुछ शुभचिंतकों से खबरें ले रही थी मेरी। ‘ उसने बताया कि गूगल के लिए काम कर रही है। पैसे ठीक ठाक मिल रहे थे। उस दिन वह अपनी बुआ ‘ स्वर्णकांता ‘ यानी मुक्ता बुआ के यहां थी।

फिर उससे बात नहीं हुई, इधर दो तीन सालों से। और अब स्वर्णकांता के पोस्ट से उसकी बीमारी और बाद में न रहने की खबर।😢

उसके पापा सुमंत जी ने परसो- तरसो तबियत में सुधार की बात कही। हालांकि वह सुधार क्रिटिकल दायरे में था। मुझे लगा कि वह ठीक होकर पटना आयेगी। और कल उसके जाने की बात।

वह जुझारू थी, मिलनसार थी,निर्भीक और अकुंठ थी। उसके कुछ महत्वपूर्ण आलेखों का लिंक मैं दे रहा हूं कमेंट में।

इधर बहुत बात नहीं हो रही थी। कल जब उसके जाने की बात सुनी तो मन विचलित हो गया। अपने ध्यान को इस सूचना पर केंद्रित नहीं होने दिया। क्योंकि इन दिनों अपनों के जाने की सूचना मुझे बहुत ज्यादा विचलित कर देती है। लेकिन जब एकांत हुआ तो उसकी यादों से घिर गया। उसके साथ बीते हर क्षण, उसके साथ हुई बातचीत फिर से ताजा हो गये।

इति रंगमंच से भी जुड़ी थी। नाट्य संस्था इप्टा से भी।

अलविदा इति!

जनसंस्कृति मंच की अपील : लेखक करें साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों का बहिष्कार

साहित्य अकादमी द्वारा बिहार की राजधानी पटना में 25 से 28 सितंबर को आयोजित अंतराष्ट्रीय साहित्य उत्सव उन्मेष का लेखक करेंगे बहिष्कार ? भाकपा( माले) के अनुसंगी संगठन जन संस्कृति मंच ने की अपील। इसके पहले सीपीआई के अनुसंगी संगठन महिला समाज ने भी जारी की थी अपील। क्या वाम दल और उसके संगठन चार दिवसीय इस आयोजन के दौरान करेंगे कोई प्रदर्शन। यह मामला साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवास राव के खिलाफ यौन उत्पीड़न मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद बेहद गर्म है।

जन संस्कृति मंच का प्रस्ताव

जन संस्कृति मंच साहित्य अकादमी में हुए यौन उत्पीड़न के गंभीर मामले पर गहरी चिंता व्यक्त करता है।

समाचार पोर्टल द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, अकादमी की एक महिला कर्मचारी ने सचिव डॉ. के. श्रीनिवास राव पर 2018-2019 के दौरान अनचाहे शारीरिक संपर्क, अश्लील टिप्पणियां और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं।

इन आरोपों की जांच करने के बजाय अकादमी ने पीड़िता को चुप करने के लिए झूठे आरोप लगाकर उसे नौकरी से निकाल दिया, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 अगस्त 2025 को बदले की कार्रवाई बताते हुए गैरकानूनी घोषित किया और पीड़िता की बहाली का आदेश दिया।

कोर्ट के इस फैसले से आरोपों की गंभीरता के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता है।

जन संस्कृति मंच यौन उत्पीड़न और लैंगिक भेदभाव के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति का पालन करता है। भारत के लेखकों और कलाकारों के बीच यौन उत्पीड़न संबंधी जागरूकता और संवेदनशीलता का विकास करना हम अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी समझते हैं।

इस जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए
हम मांग करते हैं:
1. डॉ. के. श्रीनिवास राव को तत्काल उनके पद से बर्खास्त किया जाए, ताकि मामले की निष्पक्ष जांच हो सके और न्याय की प्रक्रिया प्रभावित न हो।

2. हम सभी लेखकों , साहित्यकारों से साहित्य अकादमी के आरोपी सचिव की बर्खास्तगी तक साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों का बहिष्कार करने की अपील करते हैं।

3 पटना में मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा राजभाषा विभाग (जो मुख्यमंत्री के अधीन है) ने साहित्य अकादमी सचिव को ‘बाबू गंगा शरण सिंह पुरस्कार’ प्रदान किया, जबकि यौन उत्पीड़न का मामला वर्ष 2018 से लंबित है। बिहार सरकार से हम इस पुरस्कार को वापिस लेने की मांग करते हैं।

यह प्रस्ताव पीड़िता के साथ एकजुटता और सांस्कृतिक इदारों में हर व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए है।
जन संस्कृति मंच
19 सितंबर 2025

नई धारा राइटर्स रेज़िडेंसी प्रकरण—नागरिक समिति की रिपोर्ट, साहित्यिक जगत की जवाबदेही पर उठे सवाल

नई धारा इस पूरी घटना के प्रति बेहद अगंभीर और गैर-जिम्मेदार रही। कैम्पस में स्त्री और पुरुष लेखकों के साथ रहने के लिए अनुकूल और भयमुक्त वातावरण का अभाव दिखा। चयन समिति के सदस्यों का व्यवहार गैर-जिम्मेदार था। अफवाहों के सृजन के लिए नई धारा से संबद्ध लोग भी जिम्मेदार बताए जा रहे हैं।

पटना, 19 सितंबर 2025। साहित्य अकादमी के सचिव के खिलाफ एक महिला कर्मी के आवेदन पर आदेश करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने अकादमी में लगे उत्पीड़न के आरोप को स्वतंत्र इकाई द्वारा जांच का निर्देश दिया एवं पीड़ित महिला की बर्खास्तगी को अकादमी के सचिव के श्रीनिवास राव द्वारा बदले की कार्रवाई माना क्योंकि उसने सचिव के खिलाफ उत्पीड़न का आरोप लगाया था। के श्रीनिवास राव अभी भी सचिव बने हुए हैं।
और बिहार में एक बड़ा आयोजन करने जा रहे संस्कृति मंत्रालय के साथ मिलकर। इसके पहले बिहार के राजभाषा विभाग द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया गया था।

इसी बीच स्त्रीकाल की पहल पर गठित नागरिक जांच समिति ने पटना की संस्था ‘नई धारा’ के राइटर्स रेज़िडेंसी प्रोग्राम ( तीन महीने का एक कैम्पस में प्रवास ) में हुए कथित यौन उत्पीड़न प्रकरण पर अपनी अंतरिम रिपोर्ट जारी की है। इस समिति की अध्यक्ष एडवोकेट अल्का वर्मा हैं। इसके सदस्य हैं वरिष्ठ पत्रकार एवं स्त्रीकाल की डिजिटल संपादक मनोरमा, वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार, सोशल एक्टिविस्ट, स्त्रीवादी संस्कृति कर्मी दिव्या गौतम। आमंत्रित सदस्य स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन

रिपोर्ट में आयोजक संस्था नई धारा के रवैये, निर्णायक मंडल की भूमिका, सोशल मीडिया पर पीड़िता के खिलाफ दुष्प्रचार और साहित्यिक संगठनों की चुप्पी को गंभीर माना गया है। समिति ने कहा कि यह मामला केवल व्यक्तिगत आरोप का नहीं, बल्कि साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की संरचनात्मक जवाबदेही और पारदर्शिता का सवाल है।
_ घटनाक्रम की पृष्ठभूमि

25 जून 2025 को सोशल मीडिया पर एक महिला लेखक ने आरोप लगाया कि पटना में आयोजित नई धारा की रेज़िडेंसी प्रोग्राम ( तीन महीने का एक कैम्पस में प्रवास ) के दौरान वरिष्ठ लेखक कृष्ण कल्पित ने उनके साथ अनुचित व्यवहार किया। दो दिन बाद कृष्ण कल्पित ने आरोपों से इनकार करते हुए सोशल मीडिया पर आवाज़ उठाने वालों को लीगल नोटिस भेज दिया। इसके बाद साहित्यिक जगत में तीखी बहस छिड़ी। जनवादी लेखक संघ ने 27 जून को बयान जारी कर घटना की निंदा की और आयोजक संस्था को जिम्मेदार ठहराया। प्रगतिशील लेखक संघ, राजस्थान ने 28 जून को आरोपी लेखक को संगठन से निष्कासित कर दिया। वहीं कई बड़े लेखक और संस्थाएँ लंबे समय तक चुप रहीं। _
निर्णायक मंडल की भूमिका
नई धारा की रेज़िडेंसी के निर्णायक मंडल में तीन लोग शामिल थे। समिति ने उनसे भी लिखित जवाब मांगे, परंतु ममता कालिया ने बिल्कुल चुप्पी साधी, जी एन देवी ने पहले गोपनीयता की गारंटी चाही फिर जवाब नहीं दिया, प्रियदर्शन ने अपना बयान फेसबुक पर दे दिया था। रिपोर्ट में दर्ज है कि निर्णायकों ने अपनी जिम्मेदारी को सीमित कर केवल चयन प्रक्रिया तक मान लिया और रेज़िडेंसी के दौरान सुरक्षा या जवाबदेही की जिम्मेदारी आयोजक संस्था पर डाल दी।
_ साहित्यकारों की राय समिति को कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएँ भी मिलीं। • विकास नारायण राय ने सवालों के जवाब में कहा कि “निर्णायक मंडल केवल प्रतिभागियों के चयन तक सीमित नहीं रह सकता। साहित्यिक आयोजनों में निर्णायकों को भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। नई धारा का रवैया टालमटोल वाला रहा है और इससे संस्था की साख को नुकसान हुआ है।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि साहित्य जगत में “क्विड प्रो क्वो की प्रवृत्ति” भी साफ़ दिखाई देती है — यानी साहित्यकार परस्पर लाभ या अवसर के एवज में चुप्पी, समर्थन या समझौते करते रहते हैं। • कुछ अन्य लेखकों, अनिल पुष्कर, नवनीत पांडेय ने भी समिति को जवाब दिया कि इस घटना ने साहित्यिक संस्थाओं के भीतर पितृसत्तात्मक रवैये और स्त्रियों की सुरक्षा के प्रति असंवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। कुछ ने साहित्य जगत से जुड़े सत्तधीशों द्वारा ख़ौफ़नाक स्टाकिंग की घटनाओं की जानकारी होने की बात भी कही। • वहीं कई चर्चित साहित्यकारों ने समिति के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। _
समिति की प्रमुख फ़ाइंडिंग्स
रिपोर्ट में दर्ज अवलोकन इस प्रकार हैं:

  1. नई धारा की भूमिका: संस्था ने घटना के बाद अस्पष्ट और बिना हस्ताक्षर वाले बयान दिए।
  2. जूरी की जिम्मेदारी: निर्णायकों ने जवाबदेही से दूरी बनाई, जबकि प्रतिभागियों की सुरक्षा भी उनकी साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए थी।
  3. सोशल मीडिया हमले: पीड़िता पर अफवाहें और चरित्रहनन के प्रयास हुए, जिसे समिति ने “दूसरे स्तर का उत्पीड़न” कहा।
  4. संगठनों की असंगत प्रतिक्रिया: कुछ संगठनों ने तुरंत कार्रवाई की, जबकि अधिकांश बड़े साहित्यिक समूह चुप रहे।
  5. गंभीर असंवेदनशीलता: घटना ने दिखाया कि साहित्यिक आयोजनों में जेंडर और जाति आधारित संवेदनशीलता गहराई से अनुपस्थित है।
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    समिति की सिफ़ारिशें
    समिति ने निम्न सिफ़ारिशें कीं:
    1. जिन संगठनों/संस्थाओं में 10 से ज्यादा महिलाएं कार्यरत या सदस्य हैं, उन्हें यौन अथवा जाति उत्पीड़न के खिलाफ एक जांच समिति होनी चाहिए, जिसकी अनिवार्य अध्यक्ष महिला हो, और सदस्यों में कम से कम आधे संस्था एवं संगठन से बाहर की महिला एवं पुरुष हों।
    2. सरकार द्वारा आर्थिक मदद प्राप्त या टैक्स के छूट की सुविधा प्राप्त संस्थाओं और संगठनों के लिए सरकार जाति और जेंडर विभेद की रोकथाम की प्रक्रिया सुनिश्चित करे।
    3. विविध संगठनों द्वारा एक सार्वजनिक नियामक समिति भी गठित की जा सकती है।
    4. लेखक या संस्कृति के अन्य संगठनों को जिम्मेवार और समावेशी होने की पहल करनी चाहिए।
    _ समिति के बयान समिति की चेयरपर्सन अलका वर्मा ने कहा, “हमारा जनादेश है कि पीड़िता की गवाही दर्ज करते हुए साहित्यिक संस्थाओं में संरचनात्मक सुधार की दिशा में ठोस सुझाव दिए जाएँ, जरूरत पड़ने पर अदालतों से निर्देश लेकर एक नियामक व्यवस्था बनवाई जाए। समिति की सदस्य मनोरमा ने कहा, “ यह घटना साहित्यिक दुनिया की असंवेदनशीलता का सबूत भी है।” _
    निष्कर्ष
    समिति ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक लेखक और संस्था तक सीमित नहीं है। यह पूरे साहित्यिक परिदृश्य में स्त्रियों की भागीदारी, गरिमा और सुरक्षा का प्रश्न है।

नागरिक समिति के सामने आए तथ्य विस्तार से
अफवाह
इस घटना के सामने आने के बाद से ही पीड़िता को लेकर कई अफवाहें पटना के साहित्यिक समाज में फैलने लगीं। अब इन अफवाहों और गप्पों का स्वरूप भयावह होता गया। इन अफवाहों में पीड़िता अब आरोपी बन गई है।(अफवाहों की चर्चा पटना के एक साहित्यकार ने की; नाम न उल्लेख करने की शर्त पर। शुरुआत पीड़िता का किसी लेखक/संस्कृति कर्मी डॉक्टर के घर पर शराब पीने की घटना या अफवाह से हुई। बाद में उस घटना की तस्वीर जारी की गई। उस तस्वीर में आरोपी कवि नहीं दिख रहे। कहा गया कि तस्वीर उन्होंने ही ली थी और इसे उन्होंने ही जारी किया। उस तस्वीर में पीड़िता के अलावा पटना के चर्चित साहित्यकार भी दिखे।
सेक्सिस्ट टिप्पणियां
समिति के सदस्यों ने देखा कि नई धारा द्वारा राइटर्स रेजीडेंसी कार्यक्रम के तहत पटना में रहने वाले साहित्यकारों—आरोपी और पीड़िता—का नाम और फोटो जैसे ही सोशल मीडिया में जारी हुआ, कई साहित्यकारों ने उस पर सेक्सिस्ट टिप्पणियां लिखनी शुरू कर दी। इनमें आरोपी कवि के साथी भी शामिल थे।
प्रतिरोध का अभाव
इस घटना पर लेखक संगठनों का व्यवहार बेहद आश्चर्यजनक था। सोशल मीडिया में हंगामे का असर था कि घटना के प्रकाश में आने के बाद कुछ लेखक संगठनों ने अपनी प्रतिक्रियाएं जारी की और आरोपी कवि कृष्ण कल्पित के बहिष्कार का संकल्प लिया। संस्था नई धारा की जिम्मेदारी पर प्रस्ताव पास किया।
इन लेखक संगठनों में जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच आदि शामिल थे। पीयूसीएल (पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज) ने भी बयान जारी किया। प्रगतिशील लेखक संघ ने उन्हें अपने संगठन से बाहर निकालने का प्रस्ताव जारी किया।
सवाल उठे कि कृष्ण कल्पित इसके पूर्व एक चर्चित लेखिका पर सेक्सिस्ट टिप्पणियां कर चुके थे। फिर भी प्रलेस ने उन्हें अपने यहां सदस्य और पदाधिकारी बनाए रखा। प्रलेस ने राष्ट्रीय स्तर पर कोई बयान जारी नहीं किया और इस समिति के सामने उनका कोई बयान प्रस्तुत नहीं हुआ। कुछ लेखक संगठनों के सदस्य पटना में पीड़िता के साथ सार्वजनिक रूप से थे, लेकिन उनमें से किसी ने पीड़िता के पक्ष में बड़ा प्रदर्शन नहीं किया।
साहित्य जगत में ऐसा कोई प्रदर्शन 2010 में नया ज्ञानोदय साक्षात्कार प्रकरण में हुआ था। इसके बाद लेखकों का एक साझा फिर से बन गया। बहिष्कृत साहित्यकार बहिष्कार करने वाले एक लेखक संगठन पर काबिज हो गए।
पीड़िता और आरोपी का पक्ष
पीड़िता ने अपना पक्ष सामने रखते हुए मुख्यतः आरोपी कवि से माफी और शहर छोड़ने की मांग की। आरोपी ने माफी नहीं मांगी, लेकिन शहर छोड़ दिया। संस्था नई धारा का रुख इस पूरी घटना के प्रति असंवेदनशील दिखाई दिया। निर्णायक मंडल भी गंभीर नहीं था। आरोपी कवि इस पूरे घटनाक्रम में सोशल मीडिया में बेखौफ और बुली करते नजर आए।
साहित्य की सत्ता
साहित्य जगत और संस्कृति के क्षेत्र में यौन और जाति उत्पीड़न की घटनाएं होती हैं। यह क्षेत्र यश और यश से हासिल आर्थिक, सामाजिक हैसियत के आपसी बंटवारे का क्षेत्र है। इसीलिए यहां होने वाली ऐसी घटनाएं क्षणिक चर्चाओं का कारण भर बनती हैं।
साहित्य में क्विड-प्रो-क्वो की घटनाएं भी होती हैं, साथ ही असहज करने वाले उत्पीड़न और स्टाकिंग भी। संस्थाओं और उनके प्रमुखों के साथ सहज संबंध रखने की होड़ होती है। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में सवर्ण हिन्दू पुरुषों का कब्जा है।
संस्था/चयन समिति की असंवेदनशीलता
नई धारा इस पूरी घटना के प्रति बेहद अगंभीर और गैर-जिम्मेदार रही। कैम्पस में स्त्री और पुरुष लेखकों के साथ रहने के लिए अनुकूल और भयमुक्त वातावरण का अभाव दिखा। चयन समिति के सदस्यों का व्यवहार गैर-जिम्मेदार था। एक सदस्य को आरोपी लेखक ने सार्वजनिक तौर पर अपने चयन में उनकी भूमिका रेखांकित करने का प्रयास किया। एक सदस्य ने अपने डिटेल जवाब में यह स्पष्ट नहीं किया कि उन्होंने आरोपी कवि के महिला विरोधी पूर्व आचरण को संस्था के सामने क्यों नहीं रखा। अफवाहों के सृजन के लिए नई धारा से संबद्ध लोग भी जिम्मेदार बताए जा रहे हैं।
संस्तुति

  1. जिन संगठनों/संस्थाओं में 10 से ज्यादा महिलाएं कार्यरत या सदस्य हैं, उन्हें यौन अथवा जाति उत्पीड़न के खिलाफ एक जांच समिति होनी चाहिए, जिसकी अनिवार्य अध्यक्ष महिला हो, और सदस्यों में कम से कम आधे संस्था एवं संगठन से बाहर की महिला एवं पुरुष हों।
  2. सरकार द्वारा आर्थिक मदद प्राप्त या टैक्स के छूट की सुविधा प्राप्त संस्थाओं और संगठनों के लिए सरकार जाति और जेंडर विभेद की रोकथाम की प्रक्रिया सुनिश्चित करे।
  3. विविध संगठनों द्वारा एक सार्वजनिक नियामक समिति भी गठित की जा सकती है।4 . किसी भी का निस्तारण या तो आंतरिक समिति के जरिये हो या लोकल कंप्लेंट कमिटी के जरिये।
    5 . लेखक या संस्कृति के अन्य संगठनों को जिम्मेवार और समावेशी होने की पहल करनी चाहिए।


बिहार महिला समाज पटना में होने वाले अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव उन्मेश 2025 का करेगा बहिष्कार

यौन हिंसा के आरोपी साहित्य अकादेमी के सचिव के श्रीनिवास राव की बर्खास्तगी की मांग

पटना, 18 सितम्बर

साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवास राव पर लगे यौन हिंसा के आरोप को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। बिहार महिला समाज ने राव की तत्काल बर्खास्तगी की मांग करते हुए घोषणा की है कि जब तक उन्हें पद से नहीं हटाया जाता, पटना में होने वाले अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव “उन्मेष 2025” का बहिष्कार किया जाएगा।

संगठन की अध्यक्ष निवेदिता झा ने कहा कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद श्रीनिवास राव का सचिव पद पर बने रहना महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देता है। उन्होंने आरोप लगाया कि साहित्य अकादेमी ने शिकायत करने वाली महिला कर्मचारी का साथ देने के बजाय उसे नौकरी से निकाल दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बर्खास्तगी को अवैध और प्रतिशोधात्मक करार देते हुए महिला को पुनः बहाल करने का आदेश दिया, साथ ही आरोपी सचिव के खिलाफ जांच का जिम्मा लोकल कंप्लेंट्स कमेटी को सौंपा। साहित्य अकादेमी के सचिव  के . श्रीनिवास राव को पिछले महीने राजभाषा विभाग द्वारा सम्मान दिये जाने पर भी साहित्यकारों ने उठाये थे सवाल।

निवेदिता झा ने कहा, “बीजेपी सरकार ने न केवल आरोपी को संरक्षण दिया, बल्कि उन्हें सम्मानित किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व का मौका भी दिया। यह बलात्कार संस्कृति को बढ़ावा देने वाला रवैया है।”बिहार महिला समाज ने

तीन मुख्य मांगें रखी हैं—

  1. के. श्रीनिवास राव को तुरंत बर्खास्त किया जाए।
  2. यौन उत्पीड़न की शिकायतों की सुनवाई विशाखा गाइडलाइंस के तहत हो।
  3. पीड़िता की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

संगठन ने साफ किया है कि जब तक आरोपी सचिव पद पर बने रहते हैं और साहित्य अकादेमी कोई ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक पटना में होने वाले साहित्यिक आयोजन का बहिष्कार जारी रहेगा।