सैयद हामिद हसन, सब अकाउंटेंट एचईसी ने यह जांच आयोग के सामने बतौर चश्मदीद जो बयान दिया वो तो रोंगटे खड़े कर देने वाला था । 24-25 अगस्त की रात थी । धुर्वा के सेक्टर दो के क्वार्टर संख्या 513/B में अनवर खान अपने परिवार के साथ सहमे-दुबके छीपे थे । घर से किसी तरह की आवाज नहीं आ रही थी । बाहर दंगाई घूम रहे थे । दूसरे धर्म के लोगों की तलाश हो रही थी । सामने में स्कूल टीचर तिवारी जी रहते थे । दंगाईयों ने मास्टर साहब से पूछा अनवर का परिवार कहां गया । तिवारी जी ने कहा कि वे सब छोड़ कर चले गए हैं । सुबह तिवारी जी जब क्वार्टर संख्या 1303/B से लौट रहे थे उन्हें मालूम चला कि अनवर और उसके परिवार की हत्या कर दी गई है । अनवर के घर पहुंचे थे देखा कि कॉलोनी के ही कुछ लोग जश्न मना रहे हैं । आस-पास वाले भी सीढ़ियों से उपर चढ़ रहे हैं और तमाशा देख कर लौट रहे हैं । मास्टर साहब जिन्हें तिवारी जी कहते थे लोग उन्होंने साहस दिखाई । ऊपर गए । दृश्य देखते ही रोंगटे खड़े हो गए । छोटी सी बच्ची के जिस्म जिसके कई टुकड़े थे…दरवाजे पर पड़े थे । दरवाजे के बाईं ओर के कमरे में एक औरत बैठी हुई थी । जिस्म में जान नहीं थी । देख कर ऐसा लग रहा था मानों उसने हत्यारों को रोकने की कोशिश की होगी । अनवर खान खून में सने मृत पड़े थे। एक बच्ची के सीने में खंजर पैबश्त था । अनवर खान की जवान बेटी निर्वस्त्र मृत पड़ी थी और दंगाई जश्न मना रहे थे । तिवारी जी नीचे उतरे तो अनवर खान का बेटा भी मरा पड़ा था । उन्होंने एक पुरानी साड़ी निकाली और निर्वस्त्र बेटी के जिस्म पर रख दी । बचाव दल की एक गाड़ी के ड्राइवर शाहजहां ने मस्जिट्रेड झा को उस वक्त फायरिंग की सलाह दी जब धुर्वा के क्वार्टर संख्या 1969 के पास 14 वर्षीय बच्चे की फसाद करने वालों ने हत्या कर दी । मजिस्ट्रेट झा ने ड्राइवर को ये कह कर मना कर दिया जब हिन्दू थोड़े ही मारे जा रहे हैं । गाड़ी संख्या BRN-9658 के चालक शाहजंहा ने बताया कि पुलिस और मिलिट्री की मौजूदगी में 4 हजार लोगों की भीड़ ने घर को लूट लिया । घरवालों को मार डाला । तब तक मजिस्ट्रेट को लग रहा था ड्राइवर हिन्दू है । जैसे ही जानकारी मिली कि वो गैर हिन्दू हैं उसे मारने की साजिश रची गई लेकिन वो बच गया और स्टेशन डायरी में बयान दर्ज कराने में कामयाब हो सका ।
जिस रांची में नेहरु ने एचईसी के जरिए आधुनिक भारत के निर्माण का सपना देखा था वहां इस तरह हिंसा होगी किसी ने सोचा नहीं था । 1964 के पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों के साथ हुई बर्बरता की यादें रांची के लोग भूले नहीं थे कि बिहार में कर्पूरी ठाकुर ने उर्दू को दूसरी भाषा की मान्यता दे दी । कांग्रेस के एक विधायक ने प्रस्ताव रखा और सरकार ने मंजूर कर लिया । कर्पूरी ठाकुर ने चुनाव के दौरान उर्दू को बिहारा की द्वितीय भाषा बनाने का वादा किया था । सरकार में साथ जनसंघ इसका विरोध कर रही थी । रांची में कांग्रेस के युवा नेता खुली गाड़ी में माइक लगा कर प्रचार करना शुरु कर दिया। नाम था विजय रंजन । उसने 22 अगस्त को रांची के जिला स्कूल के पास लोगों को इकट्ठा होने की अपील की । उसने लिखा जो लोग रांची सड़कों पर चीन और पाकिस्तान परस्त नारे लगा रहे उन्हें गिरफ्तार किया जाए। आग विजय रंजन ने लगाई । शादी लाल मल्होत्रा की जान चली गई। इससे पहले 12 अगस्त 1967 को जनसंघ उर्दू के खिलाफ रांची के तपोवन में बड़ी रैली आयोजित कर चुकी थी । जनसंघ ने हिन्दूओं की मर्दानगी को ललकारा था । कश्मीर वस्त्रालय वाले शादीलाल मल्होत्रा पाक अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद से बंटवारे से पहले आ चुके थे और रांची में अपना कारोबार शुरु किया था । उन्हें क्या मालूम था कि जिस बंटवारे बचकर वे रांची भागे उसने रांची में उनकी जान ले ली ।
1967 में बिहार के कर्पूरी सरकार ने उर्दू को द्वितीय भाषा तो बना दिया लेकिन इससे उपजे विवाद का खामियाजा रांची आज भी उठाना पड़ रहा है । एचईसी में उस जमाने में 16 हजार कर्मचारी थे , 4 हजार कॉन्ट्रेक्टर थे । चार हजार फ्लैट्स में सिर्फ तीन सौ मुसलमान कर्मचारी रहते थे । कर्मचारियों में 99 प्रतिशत ऊंची जातियों के लोग थे । कहा जाता है कि एचईसी में कर्मचारियों ने दंगों के दौरान हथियार बनाने शुरु कर दिए थे । उस वक्त केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी । सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज रघुवर दायल की अध्यक्षा में जांच आयोग बनी । दो सदस्य थे सांसद और बार एट लॉ कर्नल बी एच जैदी और एमएम फिलिप भारत सरकार के पूर्व सचिव । उन्होंने रिपोर्ट सौंपी । इसे रिपोर्ट को पढ़कर सांप्रदायिकता,दंगे और उसके पीछे की वजहों को समझा जा सकता है ।
REPORT OF THE
COMMISSION OF INQUIRY O N COMMUNAL DISTURBANCES RANCHI-HATIA (AUGUST 22-29, 1967) रांची की लाइब्रेरी में धूल फांक रही होगी।
इसी रिपोर्ट में प्रेस की भूमिका पर विस्तार से बताया गया । रिपोर्ट के मुताबिक
उर्दू प्रेस
• सदा-ए-आम और सदा-ए-हिंद (पटना से प्रकाशित) ने मुस्लिमों पर हुए अत्याचार और प्रशासनिक उदासीनता को प्रमुखता दी।
• इनमें पुलिस, होमगार्ड और सेना पर भी आरोप प्रकाशित हुए कि वे हत्या और लूट में शामिल थे।
• आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए और छोटे घटनाओं को भी बड़ा महत्व दिया गया, जिससे साम्प्रदायिक तनाव और बढ़ा।
हिंदी प्रेस
• स्थानीय हिंदी अख़बारों ने दंगों की खबरें अपेक्षाकृत संयमित तरीके से दीं।
• नवराष्ट्र, पटना ने सरकार की आलोचना की और पुलिस मंत्री पर दंगों की जिम्मेदारी डाली।
• अन्य जैसे साथी और सदक़त का स्वर शांत और नियंत्रित था।
अंग्रेज़ी प्रेस
• रांची से प्रकाशित द सेंटिनल (सैयद मोहिउद्दीन अहमद का अख़बार) ने साम्यवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया और हिंदुओं व सरकारी तंत्र को जिम्मेदार ठहराया।
• इसने CPI(M) नेता सत्य नारायण सिंह के उस बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया जिसमें “500 मुसलमानों की हत्या” का दावा किया गया।
• सर्चलाइट और इंडियन नेशन (पटना से प्रकाशित) ने ज़िम्मेदारी दिखाते हुए सिर्फ़ सत्यापित खबरें दीं और किसी भी समुदाय को भड़काने से परहेज किया।
बाहरी प्रेस
• लखनऊ का पंचजंय (हिंदी साप्ताहिक, जनसंघ का अंग), दिल्ली का Organiser (अंग्रेज़ी, जनसंघ का), और दिल्ली का Radiance (अंग्रेज़ी, मुस्लिम दृष्टिकोण वाला) ने साम्प्रदायिक भावनाओं को बढ़ावा देने वाले लेख प्रकाशित किए।
• इन अख़बारों ने घटनाओं को तोड़-मरोड़कर अपने-अपने समुदाय को पीड़ित दिखाने का प्रयास किया।
• यूपी के कुछ अख़बारों ने भी ऐसे समाचार प्रकाशित किए जिनसे मुस्लिम समुदाय में गहरी नाराज़गी फैल सकती थी।
इतना ही नहीं एचईसी जिसे भारत का सबसे महत्वपूर्ण कारखाना माना जाता है उसकी बर्बादी के पीछे जातियता, धार्मिक कट्टरता, क्षेत्रवाद के साथ-साथ सांप्रदायिकता को माना जा सकता है । रिपोर्ट पढ़ने से मालूम चलता है कि किस तरह दक्षिण भारतीय कर्मचारियों को भगाने की साजिश की गई । रिपोर्ट में एक कर्मचारी के हवाले से लिखा गया कि “समय एक अफ़वाह फैलाई गई कि कुछ दक्षिण भारतीय इंजीनियरों ने श्री नंदकुमार सिंह, जो उस समय हटिया प्रोजेक्ट वर्कर्स यूनियन के महासचिव थे, पर हमला किया है।
बिहारी कर्मचारियों में एंटी-दक्षिण भारतीय भावना भड़काने की कोशिश की गई। इसमें प्रमुख रूप से श्री एस.एन. सिंह (फ़िटर, “बी” क्रेन डिवीजन) और रामजी सिंह (डिवीजन) शामिल थे।
इस अफ़वाह की वजह से प्लांट का कामकाज लगभग ठप हो गया। कुछ दक्षिण भारतीय इंजीनियरों पर हॉस्टल में हुए हालातों की ज़िम्मेदारी डाली गई।
दरअसल ऐसा प्रतीत हुआ कि पिछली रात श्री नंदकुमार सिंह नशे की हालत में टैक्सी से लौट रहे थे। उसी टैक्सी में कुछ दक्षिण भारतीय इंजीनियर भी सवार थे। इंजीनियरों ने उनके थूकने और पैर फैलाकर बैठने के तरीके पर आपत्ति जताई। इसी को लेकर बहस और झगड़ा हुआ।
मुझे आगे पता चला कि उसी रात श्री नंदकुमार सिंह के समर्थकों ने एक समूह बनाकर कुछ इंजीनियरों पर हॉस्टल में हमला किया। इसका उद्देश्य दक्षिण भारतीयों को डराना और आतंकित करना था। “
आप नहीं गए होंगे। क्योंकि आप दिल्ली में रहते हैं । दिल्ली में नहीं भी रहते हैं तो आप का दिलो-दिमाग वहीं रहता है । आप क्यों जाएंगें नेमरा । यहां तो आए हैं विशु सोरेन और उन सुरेंद्र सिंह जैसे लोग । नेमरा से तीन सौ किलोमीटर दूर पोती को कंधे पर लेकर पहुंचा एक शख्स रात में पैदल चले जा रहा है । मिलों पैदल । साथ में पत्नी भी है । परिवार के दूसरे सदस्य भी । पूछा! क्यों आए हैं । कहने लगे शिबू के गांव कभी नहीं आए थे । देखने आए हैं। हमारी जमीन लूट ली जाती थी । शिबू ने बचाया 70 किलोमीटर दूर हजारीबाग के गांव से पहुंचे विशु सोरेन की पत्नी बिफर कर कहती हैं…”शिबू सोरेन बहुत सहयोग किया तब जाकर जान बचा । भूखे मर रहे थे। महाजन को हबड़ा (हड़बड़ा) दिया तब खाना मिला । बाल बच्चा बच गया । शिबू सोरेन बीत गया त अफसोस हो गया । ओकर जनमथनी (जन्मस्थली) में आ गए तो लोर( आंसू) गिरे लगल । विशु सोरेन की पत्नी कहतीं हैं । शिबू का बेटा भी वैसा ही बने ताकि उनके बाल-बच्चों की जान बचे ।
नेमरा के शिबू ने कभी मंदिर नहीं मांगा । नफरत नहीं बांटी । हिंसा नहीं किया । रोटी-कपड़ा-मकान नहीं मांगा । सिर्फ तीन चीजें मांगीं । जल-जल और जमीन । बाकी का इंतजाम वे खुद कर लेते। 16 अगस्त को शिबू सोरेन का संस्कार भोज था । मटन, मछली, पूरी, मिठाइयां बहुत सारी चीजें बनीं थीं। हिन्दुओं के त्योहार जन्माष्टमी का दिन भी था । आदिवासी समाज अपनी परंपरा निभा रहा था । जो सुबह आठ बजे घर से निकले वे रात के रात आठ बजे नेमरा पहुंचने में सफल हो सके । लोग चले ही जा रहे थे। पुरुषों से ज्यादा महिलाएं थीं । बच्चे थे । एक तरफ से लोग आ रहे थे दूसरी तरफ से जा रहे थे । कहीं कोई अफरा-तफरी नहीं। शाम के 5 बजे तक 7 लाख लोग नेमरा में आ चुके थे । ये सड़क नेमरा में ही जा कर खत्म हो जाती है । आगे पहाड़ है और जंगल । पार्किंग में 20 हजार से अधिक गाड़ियां लगीं थीं। ज्यादातर स्कॉर्पियो और टेकर थे । बरलंगा से नेमरा की दूरी सात किलोमीटर है। दोनों तरफ धान के खेत । नेमरा पंचायत की आबादी तीन हजार से ज्यादा की नहीं होगी । मिट्टी के घर । कुछ एक पक्के मकान । शिबू सोरेन का घर नेमरा का आखिरी घर है। रात के 9 बज चुके हैं । ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के चेहरे पर थकावट साफ झलक रही है । हजारों लोग अभी भी इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें भोज खाने का मौका मिले । शिबू के घर पहुंचने का , श्रद्धांजलि देने का । थकावट हमें भी महसूस हो रही थी । लेकिन इतने लोगों के साथ देख ऊर्जा मिली । हजारों लोग सड़के के दोनों तरफ अभी भी आ रहे थे जा रहे थे । शिबू सोरेन में लोगों की श्रद्धा थी। उनके प्रति कृतज्ञता। शिबू के लोग पैदल आ रहे थे । दिल्ली के लोग हेलीकॉप्टर से । आसमान से जब जमीन पर देखते होंगे तो खुद को अदना महसूस करते होंगे राजनाथ सिंह । बहुत साल पहले शिबू और उनके लोग दिल्ली चलो का नारा देते थे। पटना में प्रदर्शन करते । तीर-धनुष देख दिल्ली के लोग अपनी हंसी छुपाते थे। जंगली कहते थे । आज दिल्ली के लोग नेमरा आ रहे हैं। शिबू ने यही बदलाव किया है। अपने लोगों को आजादी दी है । सोचने-पैदल चलने अपने नेता तक पहुंचने और यूट्यूबर्स के सामने शिबू की कहानी कहने की ताकत दी है । रात के 10 बज रहे हैं । पुलिसवाले बता रहे हैं कि आठ लाख से कम लोग नहीं पहुंचे होंगे। दिल्ली से मीडिया की कोई टीम स्पेशल कवरेज के लिए नहीं आई है ।
शिबू गुरुजी थे। दिशोम गुरु । गुरु घंटाल नहीं। औरतों , मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों के प्रति नफरत फैलाने वाले बाबा होते तो दिल्ली की मीडिया जरुर आती । एंकर्स इंटरव्यू करते । शिबू सोरेन ने कभी किसी की पर्ची नहीं निकाली। कट्टरता नहीं फैलाई । उन्होंने सिर्फ तीन बातें कहीं जल-जंगल और जमीन । दिल्ली की मीडिया नहीं आई तो कोई बात नहीं.. वे भी नहीं आए जो दिल्ली की मीडिया से निकाले गए हैं और तरह-तरह की खबरें-खुलासे वैकल्पिक मीडिया पर करते हैं । कल्पना सोरेन का ग्लैमर होता है तो खबरें बनाते हैं मगर जब दिशोम गुरु के लिए ना दो शब्द लिखते हैं और ना ही बोलते हैं । शायद उनके घरों में शिबू के लोग मेड का काम करती होंगी । उन्होंने और उनके बाप-दादाओं ने आदिवासियों-दलितों को हमेशा जूते की नोक पर रखा होगा..। वे अभी भी नहीं मान रहे हैं कि मौजूदा राजनीति के दौर में कोई ऐसा करिश्माई नेता था जिसके अंतिम दर्शन के लिए दस लाख लोग पहुंचे। वे कभी नहीं मानेंगे । तब तक नहीं मानेंगे जब तक कि उनके बच्चे शिबू के लोगों के मातहत काम करें। रात के 11 बज चुके हैं । शिबू के लोग घर की लौट रहे हैं । पैदल । थक कर सड़क किनारे ही सो गए । बच्चे माओं की गोद में चिपक गए । आज बारिश नहीं हुई , जमीन सूखी है । थकावट से नींद आ गई । सुबह का सूरज नेमरा में देख लौट जाएंगें…अपनी खेतों में..आपकी घरों में ।
‘जाति’ या जातिवाद शब्द पर अक्सर सुनने को मिलता है, यह सब आजकल कहां होता है? अब सब बराबर हैं। देखो हमारे देश के प्रधानमंत्री ओबीसी हैं, राष्ट्रपति आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक दलित महिला राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और सत्ता पर अपनी मजबूती आज भी बनाए हुए हैं। सब पढ़-लिख रहे हैं, अब कहां जातिवाद? यह कहते हुए हम अगली पंक्ति में यह भी बोलते हैं कि इसके नंबर कम थे लेकिन मुझसे बढ़िया कॉलेज में एडमिशन मिला है। कोटा का फायदा होता है। ऐसा कहने वाले बहुत सारे लोग खुद ईड्ब्ल्यूएस, एससी, एसटी, ओबीसी के फर्जी प्रमाण-पत्र बनवाकर इन विद्यार्थियों की सुविधाओं को हड़पते हैं।
धड़क2 फिल्म शुरू होती है एक मर्डर से जिसमें एक लड़का-लड़की साथ समय बिताते हैं। कुछ देर में लड़की चली जाती है, तब एक व्यक्ति लड़के के पास आता है। उसके कमरे में डॉ अंबेडकर की फोटो, लिखा हुआ जय भीम, बुद्ध की तस्वीर देखकर गुस्से से भर जाता है| कुछ देर बाद वह आदमी उस लड़के को नीचे फेंक देता है| लोगों ने माना कि तनाव में आकर उस लड़के ने आत्महत्या की है| कोई कहता दारू के नशे में नीचे गिर गया है।
धड़क 2, नीलेश और विधि की कहानी है। नीलेश ढोल बजता है वह दलित बस्ती में रहने वाला एक विद्यार्थी है, जिसके पिता लौंडा नाच में लड़की का वेश धारण कर नाचते हैं। उसे अपने पिता के काम से शर्म महसूस होती है। नीलेश की मां जाति-व्यवस्था के दंश को समझने वाली एक समझदार महिला है। वह यह भी जानती हैं कि पढ़ने से ही उनके परिवार और समाज की स्थिति में परिवर्तन आ सकता है, इसीलिए वह अपने बेटे का एडमिशन ‘इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ’ में करवाती है| यहां नीलेश की दोस्ती विधि से होती है, दोनों में एक दूसरे के प्रति भावनाएं भी हैं| विधि को यह बात समझने में काफी परेशानी होती है कि उसके और नीलेश के बीच ऐसा क्या है, जो वह साथ नहीं रह सकते, प्यार नहीं कर सकते| विधि समाज के जातिवाद को न समझना चाहती न मानती है।
नीलेश को कभी उसकी हिंदी, कभी सरनेम पूछकर, उसपर कोटा से आए मुफ्त में पढ़ने वाले, उसकी सीट पीछे निर्धारित करके, बार-बार जातिवादी लोगों द्वारा हमले किए जाते हैं। विधि की बहन की शादी में नीलेश के साथ मारपीट की जाती है और उसपर पेशाब किया जाता है। शेखर फिल्म में एक अंबेडकरवादी विचारधारा छात्र दिखाया गया है, घर आर्थिक रूप से कमजोर फेलोशिप पर चलता है| वह बार-बार फिल्म में तर्क करता है कि आरक्षण जरूरी है और जातिवाद को खत्म करने पर आरक्षण की जरूरत भी खत्म हो जाएगी| जातिवादी मानसिकता वाले लोग उसकी फैलोशिप रोक लेते हैं जिससे वह आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। यहां यह कहानी हैदराबाद के होनहार विद्यार्थी रोहित वेमुला की याद दिलाती है और अधिकांश दर्शक शेखर की इस संस्थागत हत्या पर भावुक हो जाते हैं।
फिल्म के आरंभ में मर्डर करने वाला व्यक्ति अंत तक कई हत्याएं करता है। उसने अपनी बहन को भी इसलिए मार दिया था क्योंकि वह किसी से प्रेम करती थी। उसकी नजर में यह काम समाज की सफाई का है, इसीलिए वह इस काम को बहुत शिद्दत के साथ करता है। फिल्म के दूसरे भाग में जातिवाद झेलता नायक, नायिका से दूर होना चाहता है ताकि व्यवस्था उसे चैन से जीने दे। नायिका का भाई ऐसा होने नहीं देता। वह बार-बार नीलेश को अपमानित करता है। यूनिवर्सिटी में उस पर सीवर का पानी फेंका जाता है। उसके साथ मारपीट, क्रूर व्यवहार किया जाता है उसे बार बार यह बताने की कोशिश की जाती है कि वह कोटा से आया है इसलिए उसमें काबिलियत नहीं है। उसके पिता को उनके पेशे के कारण अपमानित किया जाता है। यूनिवर्सिटी में उनके कपड़े उतार कर उन्हें अपमानित किया जाता है। नायक, नायिका को बार-बार समझाता है कि लोगों में जातिवाद इतना है कि दलित जातियों द्वारा इस्तेमाल होने वाले पानी में पेशाब करना, नीलेश के प्रिय कुत्ते को मार देना, उसपर जानलेवा हमले करवाना उनके लिए एक साधारण सी बात है| रौनक भारद्वाज हत्यारे (शंकर) को सुपारी देता है ताकि नीलेश और विधि का प्रेम न बढ़ पाए और इज्जत बच जाए|
कहानी अंत में एक नया मोड़ लेती है| कहानी का आरंभ जातिवाद के विरोध से शुरू होता है| कहानी पढ़ने और लड़ने तक चलती है| समाज में निम्न जाति के साथ हुए व्यवहार पर कहानी टिकी है लेकिन उसका अंत पूरी फिल्म के भाव को बदल देता है| नीलेश की हत्या करने के लिए भेजा गया शंकर अपने काम में असफल होता है। नीलेश लगभग मरने की अवस्था में था लेकिन पुरानी फिल्म के हीरो की तरह अंत में उसमें शक्ति आती है और अपने और दूसरों के साथ हुए अन्याय भी उसे याद आने लगते हैं। वह पूरी ताकत के साथ शंकर को मारता है और उसे लगभग अधमरा छोड़कर रौनक के पीछे दौड़ता है। वह विधि भारद्वाज के घर जाकर रौनक को खूब मारता है और अंत में उसका एक वार चुकने पर रौनक मरते-मरते बचता है। फिल्म के अंतिम दृश्य में नीलेश पेपर में आगे की सीट पर बैठा है उसका पेन खत्म हो गया है वह अपने पेन से ही लिखने की कोशिश में है उसके पीछे रौनक बैठा है और वह उसे अपना पैन देता है। पेन देते हुए रौनक के चेहरे पर मुस्कान है। यहाँ रौनक के हृदय परिवर्तन को दिखाने की फिल्म में कोशिश की गई है। यह वही रौनक है जो नीलेश को आगे की सीट पर बैठने की कारण बहुत मारता है, उसके दोस्त उसे मरते हैं। अंत में हृदय परिवर्तन होने पर नीलेश आगे की सीट पर बैठा हुआ दिखाई देता है।
यहाँ सवाल उठता है कि क्या मारपीट से हृदय परिवर्तन संभव है? और किसका हृदय परिवर्तन हुआ है? क्या उन सभी विद्यार्थियों का जो यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं? क्या लॉ यूनिवर्सिटी के त्रिपाठी सर का जातिवादी दिमाग भी रौनक की पिटाई से ठीक हो जाता है? मारपीट सिर्फ रौनक के साथ हुई थी क्या सिर्फ इसके आधार पर सबका हृदय परिवर्तन संभव है? और इस आधार पर क्या यह फिल्म पढ़ने की बजाय लड़ने का संदेश नहीं दे रही है? फिल्म ने प्रारम्भ में अच्छे प्रश्न उठाए थे। दलित छात्रों की संस्थानिक हत्या, फेलोशिप की जरूरत, पढ़ाई की ताकत, (प्रिंसिपल का एक वाक्य है कि जो जुलाहा कह कहकर चिढ़ाते थे, आज वही बच्चों के एडमिशन के लिए हाथ जोड़ते हैं), लौंडा नाच करने वालों की स्थिति, उभरती स्त्री छवि (ऋचा का छात्र आंदोलन में सक्रिय होना) जैसे मुद्दों को लेकर शुरू हुई फिल्म हृदय परिवर्तन और एक व्यक्तिगत बदलाव पर खत्म होती है, जो कि संभव नहीं है| हैप्पी एंडिंग दिखाने के लालच में निर्माता-निर्देशक मुख्य बिंदुओं से अंत में कहीं भटक गए|
फिल्म के कुछ दृश्य बेहद मार्मिक, संवेदनशील और हिट करने वाले हैं। पहला दृश्य प्रिंसिपल और नीलेश का है| डॉ आंबेडकर, सावित्रीबाई फुले की तस्वीर के ठीक आगे पढ़ाई की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले नीलेश और प्रिंसिपल|
फिल्म में शेखर की आत्महत्या के ठीक पीछे अंबेडकर की तस्वीर भी एक संवेदना जागती है| साथ ही दीवार पर नीले रंग से लिखे शब्द| नीलेश जब अपने चेहरे पर हाथ रखता है तो वह नीला रंग उसके चेहरे पर लग जाता है यहां दर्शन यह उम्मीद करता है कि शायद अब वह अंबेडकरवादी विचारधारा को आगे बढ़ाएगा, लेकिन ऐसा होता नहीं है।
भले ही संविधान में सभी को पढ़ने का अधिकार दिया गया है लेकिन आज भी बहुत से विद्यार्थी जातिवादी मानसिकता के कारण स्कूल, विश्वविद्यालय छोड़ने को मजबूर हैं। यदि वह किसी तरीके से पढ़ाई पूरी कर भी लेते हैं तो उनको विभिन्न तरीकों से परेशान करने किया जाता है बहुत से छात्र इन्हीं सब तनावों के कारण आत्महत्या कर रहे हैं फिल्म इस बिंदु को भी उकेरती है।
फिल्म में नीलेश की मां पर पुलिस वाले का थप्पड़ पूरी व्यवस्था को दिखाता है कि कैसे महिलाएं खासकर दलित, गरीब महिलाएं पुलिसिया तंत्र से शोषित होती हैं। फिल्म में कीचड़ का पानी जब फेंका जाता है तो विधि अपने भाई को मारने व गुस्सा करने लगती है, जिस पर रौनक का हाथ विधि तक उठता है जिसके बीच में नीलेश आता है और वही गंदा साना हाथ रौनक पर लगता है। यह दृश्य भी अपने आप में एक बड़ा विद्रोह पैदा करता है। विधि का अपने मोहल्ले में सबके सामने नीलेश के साथ खड़े होना और जोर से चिल्लाना भी एक मार्मिक और संवेदनशील दृश्य है और विधि द्वारा यह अप्रत्यक्ष रूप से ऐलान भी है कि वह रौनक की बजाय नीलेश के साथ है।
कुल मिलाकर फिल्म में कई ज्वलंत और महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया गया है। जातिवाद एक ऐसा जहर है जो हमें दिखाई नहीं देता लेकिन कम या ज्यादा मात्रा में हम भारतीय इससे ग्रसित ही हैं जरूरत है इसे पहचानने और खत्म करने की।
आरती रानी प्रजापति
स्वतंत्र लेखक
चित्र गूगल से साभार
स्त्री काल के यूट्यूब चैनल पर इस फिल्म पर संवाद देखा जा सकता है
नेमराः मंगलवार,5 अगस्त, उमस भरी मौसम थी और गर्मी भी आम दिनों से ज्यादा थी । शिबू सोरेन के गांव के चारों ओर पहाड़ियां हरियाली से चमक रही थी । सड़कों पर काफिला आ रहा था । बड़े-ब़ड़े लोगों की बड़ी-बड़ी गाड़ियों के ब्रेक लगते ही आवाज गूंजती थी लेकिन दिशोम गुरु के अंतिम दर्शन करने के लिए मिलों पैदल चलने वाले चुपचाप आगे बढ़ रहे थे । नेमरा…उनके गांव का माहौल गमगीन था । हर घर से लकड़ी जा रही थी । चूल्हे जले नहीं थे । शिबू सोरेन के बिना नेमरा की शून्यता महसूस की जा सकती थी । गुरुजी का पार्थिव शरीर तंग सड़कों से उनके जन्मस्थली पर पहुंचा हर आंखें नम हो गईं । कल्पना सोरेन, रुपी सोरेन और परिवार की महिलाएं फफक पड़ीं । बाबा नहीं रहे। जहां शिबू का जन्म हुआ वहां से पार्थिव शरीर हेमंत-बसंत और परिवार के दूसरे सदस्यों के कंधे पर बाहर निकला तो बाहर खड़ी भारी भीड़ बरबस नारे लगाने लगी.. वीर शिबू अमर रहे ।
घर से अंतिम क्रिया के लिए तय स्थान की दूरी करीब दो किलोमीटर थी। 150 मीटर की सड़क के बाद खेत हैं । धान के खेत । पानी लबालब भरा था । मेड़ पर किसी तरह से प्लाईवूड बिछा कर रास्ता बनाया गया था । सबको इसी रास्ते से पहाड़ के नीचे बहती हुई छोटी सी नदी के किनारे जाना था जहां नेमरा की परंपरा थी । ढाई बजे चुके थे । अब मौसम बदल रहा था। चारों ओर की पहाड़ियों से बादल अचानक घिरने लगे। हवा में ठंडक हुई । नेमरा ..वीर शिबू सोरेन अमर रहे की आवाज से गूंज रहा था । हेमंत सोरेन आगे-आगे चल रहे थे । अर्थी को रास्ता दिखा रहे थे । लोगों को संभल कर चलने की नसीहत दे रहे थे। कीचड़ था, फिसलन थी। कंधा देने के लिए होड़ लगी थी। नेमरा के पुराने-नए लोग शांति से गुरुजी को जल-जंगल-जमीन को वापस सौंपने के लिए चले जा रहे थे ।
शिबू के साथी, शिबू के शिष्य और शिबू के लोगों के जेहन में इस बात का सुकून था कि दिशोम गुरु का आशीर्वाद झारखंड राज्य के तौर पर उनके साथ हमेशा रहेगा । चिता की लकड़ियां रखी जा चुकी थी । पार्थिव शरीर को रिवाज के मुताबिक रास्ते में एक जगह रखा गया। जल-जंगल और जमीन में विलिन होने से पहले शिबू ने अपनी जमीन को आखिरी बार छुआ। चंद मिनटों बाद फिर यात्रा शुरु हुई । हेमंत आगे-आगे चल रहे थे। जैसे ही चिता के पास पार्थिव शरीर पहुंचा बारिश होने लगी । घनघोर बारिश । कुछ लोग अस्थाई टेंट में बारिश रुकने का इंतजार करने लगे तो और हजारों की संख्या में ग्रामीण और कार्यकर्ता भीगते रहे। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, सुदेश महतो छोटी जी जगह में दबे से रहे । सबको इंतजार था बारिश रुके ।
बारिश रुकी, हेमंत सोरेन ने धोती पहनी । धोती पहनने से पहले छोटी सी नदी में स्नान किया। नदी के पानी के साथ हेमंत के आंसू भी बहने लगे । उन्होंने खुद को धीरज बंधाया । सिर से पिता का साया उठा….उस पिता का जिसे सब दिशोम गुरु कहते थे…. शायद हेमंत के जेहन में इन्हीं सवालों का बोझ था…कैसे संभलेगा के शिबू के बिना उनकी विरासत….उनका झारखंड । सरना रिति रिवाज के मुताबिक सखुआ की टहनियां लाई गईं। चिता के पास रखी गई । इसी बीच सलामी देने के लिए पुलिस बैंड ने कार्रवाई शुरु की । हवा में फायरिंग की आवाज बादलों और पहाड़ों से टकराती हुई ऐलान कर रही थी दिशोम गुरु अनंत यात्रा पर निकल रहे हैं । हेमंत ने मुखाग्नि दी। बारिश रुक चुकी थी । चिता की लपटों में तेज तो थी लेकिन बारिश से भीगे जिस्मों को गरमाहट दे रही थी । मानों शिबू अपने बच्चों को गीले होने से बचा रहे हों । हेमंत खड़े रहे । आंसू छिपाने की नाकाम कोशिश के बीच।
धीरे-धीरे नेमरा के लोग आगे आए। दिशोम गुरु को आखिरी जोहार कहा । चंदन की लकड़ी चढ़ाई । हेमंत खड़े रहे । अंधेरा होने लगा । तभी तेजस्वी यादव के आने की खबर मिली । खेत खलिहान होते हुए बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव हेमंत के पास पहुंचे। दिलासा दिया । सांत्वना दी । गुरुजी को अंतिम जोहार कहा । काफी देर तक बैठे रहे । खराब बारिश की वजह से राहुल गांधी के आने में देर हो रही थी । मल्लिकार्जुन खड़गे भी साथ थे। अंधेरा हो चुका । जंगल में चिता की लपटें रोशनी दिखा रही थी ।
नेमरा में राहुल गांधी पहुंचे तो पहले परिवार के लोगों से मुलाकात की । रुपी सोरेन से मिले । कल्पना सोरेन और घर में मौजूद दूसरे सदस्यों से मुलाकात की । कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को बताया गया कि वे इतनी दूर पैदल नहीें चल पाएंगें , वे परिवार के सदस्यों के साथ ही बैठे रहे । राहुल गांधी पैदल ही किचड़ और फिसलन भरे रास्ते में आगे निकले । हेमंत के पास पहुंचे । गले लगाया । गुरुजी की चिता पर अंतिम जोहार कहा । फिर हेमंत सोरेन से बात-चीत शुरु की । पूछने लगे आगे क्या होगा.. किस तरह का रिवाज है । 12 दिनों तक इसी तरह से रहेंगे ? हेमंत धीरे-धीरे समझाते रहे । राहुल ने हेमंत से उनके बेटे के बारे में पूछा तो बेटा आगे आए…राहुल के पांव छूए । पढ़ाई-लिखाई की बात की । राहुल गांधी ने दिल्ली आने का न्योता दिया । देर हो रही थी । रात के आठ बज चुके थे । सड़क के रास्ते से वापस जाना था। राहुल गांधी ने हेमंत सोरेन को अलविदा कहा और फिर पैदल निकल गए । अब हेमंत और उनके करीबी दिशोम गुरु की चिता की शांत होते हुए देख रहे थे। दिशोम गुरु इस दुनिया में नहीं है …उनका झारखंड हमेशा रहेगा ।
यह शोधपत्र हिंदी साहित्य में दलित विमर्श की महत्ता को भाषा के माध्यम से हुए सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है। दलित साहित्यकारों ने पारंपरिक साहित्यिक भाषा की सीमाओं को लांघते हुए अपने जीवन अनुभवों, पीड़ा और विद्रोह को मुखर अभिव्यक्ति दी है। उनकी भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता के विरुद्ध संघर्ष का सशक्त उपकरण बनकर उभरी है। इस शोध में प्रमुख दलित रचनाकारों की भाषा शैली और उनके साहित्यिक योगदान का विश्लेषण कर यह दर्शाया गया है कि दलित साहित्य सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक प्रभावशाली पहल है।
मुख्य शब्द- दलित विमर्श, भाषा, न्याय, आत्मकथा, सामाजिक परिवर्तन।
प्रस्तावना
दलित विमर्श हिंदी साहित्य में एक प्रभावशाली सामाजिक और वैचारिक आंदोलन के रूप में उभरा है, जिसने सदियों से शोषित सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वर्गों की पीड़ा, संघर्ष और आकांक्षाओं को साहित्य के केंद्र में स्थापित किया है। यह केवल व्यक्तिगत अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की चेतना है, जिसमें भाषा को बदलाव का सशक्त औजार बनाया गया है। दलित लेखक अपने जीवन और सामूहिक अनुभवों के माध्यम से जातिगत भेदभाव, ब्राह्मणवादी वर्चस्व और सत्ता की संकीर्ण मानसिकता को चुनौती देते हैं। इन रचनाओं में वर्ण व्यवस्था के प्रति विरोध, आत्मगौरव की तलाश और समानता की आकांक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। हिंदी के दलित साहित्यकारों ने साहित्य को केवल सौंदर्य और कल्पना तक सीमित न रखकर, उसे सामाजिक जागरूकता और परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया है। यह विमर्श न केवल हाशिए पर खड़े समाज को आवाज देता है, बल्कि मुख्यधारा की सोच और दृष्टिकोण को भी नई परिभाषा प्रदान करता है।¹ प्रस्तुत शोध पत्र में भाषा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन को दिखाने का प्रयत्न किया गया है।
दलित विमर्श
‘दलित’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है — पीड़ित, दबा हुआ या शोषित। यह केवल एक सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी वैचारिक प्रतीक भी बन गया है। दलित विमर्श, विशेषतः हिंदी साहित्य में, उस सशक्त आंदोलन को दर्शाता है जो भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव और विषमता के विरुद्ध संघर्ष का स्वर बनकर उभरा है। दलित विमर्श की बुनियाद डॉ. भीमराव अंबेडकर के सामाजिक चिंतन में निहित है, जिन्होंने शिक्षा, स्वाभिमान और अधिकारों के माध्यम से दलित समाज को जागरूक और सशक्त बनाने का मार्ग दिखाया। इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर दलित साहित्यकारों ने अपने व्यक्तिगत और सामूहिक अनुभवों को साहित्य का केंद्र बनाया। यह विमर्श सत्य पर आधारित अनुभव, विरोध की चेतना और सामाजिक बदलाव की आकांक्षा को प्राथमिकता देता है।² दलित विमर्श ने हिंदी साहित्य की पारंपरिक सीमाओं को पार करते हुए एक नवीन सामाजिक सौंदर्यबोध को जन्म दिया है, जिसमें यथार्थ, संवेदना और संघर्ष की गूंज प्रमुख रूप से सुनाई देती है।
दलित विमर्श और भाषा
भाषा केवल विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि वह सत्ता, संस्कृति और सामाजिक चेतना की वाहक भी होती है। दलित विमर्श में भाषा एक सामान्य उपकरण नहीं, बल्कि बदलाव और प्रतिरोध का सशक्त हथियार बनकर सामने आती है। दलित लेखकों ने उस परंपरागत, अभिजात्य और तथाकथित ‘शुद्ध’ भाषा की धारणा को चुनौती दी है, जो लंबे समय तक सिर्फ उच्च जातियों के अनुभवों और सौंदर्यबोध को ही महत्व देती रही। दलित साहित्यकार अपने अनुभव-संसार से जुड़ी बोली-बानी, क्षेत्रीय मुहावरों और जनपदीय शब्दों को अपनाकर भाषा को अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक बनाते हैं।
दलित साहित्य में प्रयुक्त भाषा को अक्सर ‘कठोर’, ‘अपरिष्कृत’ या ‘असौम्य’ कहा जाता है, परंतु यही भाषा उस अनुभव की सच्चाई को उजागर करती है जिसे मुख्यधारा की सौंदर्यप्रिय भाषा अक्सर दबा देती थी। इस भाषा में आक्रोश, पीड़ा, संघर्ष और विडंबना की तीव्रता होती है, जो समाज की वास्तविकता को उसकी पूरी नग्नता के साथ प्रस्तुत करती है।
ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’, श्योराज सिंह बेचैन की ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ और सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’ जैसी रचनाएँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि दलित साहित्य ने भाषा को जन-जीवन की जमीन से जोड़ा है। इन लेखकों ने शब्दों को संघर्ष के औजार की तरह इस्तेमाल किया है और अपमानजनक समझे जाने वाले शब्दों को आत्मगौरव और स्मृति का प्रतीक बना दिया है।
दलित विमर्श में भाषा अब केवल सौंदर्य या शैली का विषय नहीं रह जाती; वह सामाजिक अन्याय को बेनकाब करने और न्याय की मांग करने वाली एक सजीव शक्ति बन जाती है। यह वही भाषा है जो मौन को तोड़ती है, हाशिए पर पड़ी संवेदनाओं को स्वर देती है, और दलित चेतना को साहित्य के केंद्र में स्थापित करती है।³
प्रमुख दलित साहित्यकार और उनका योगदान-दलित विमर्श को सशक्त और समृद्ध बनाने में अनेक साहित्यकारों ने अपनी निर्णायक भूमिका निभाई है। इन लेखकों ने न केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों और पीड़ाओं को स्वर दिया, बल्कि साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बनाया। उनकी रचनाओं में आत्मस्वर, प्रतिरोध, संघर्ष और सामाजिक चेतना की स्पष्ट अनुगूंज सुनाई देती है। नीचे कुछ प्रमुख रचनाकारों की रचनाओं का विवरण दिया गया है, जिसमें भाषा के माध्यम से दलितों के प्रति भेद-भाव और दलित वर्ग का समाज के एक विशेष वर्ग के लिए प्रतिरोध को दर्शाता है :
ओमप्रकाश वाल्मीकि
हिंदी दलित साहित्य की नींव मजबूत करने वाले प्रमुख साहित्यकारों में ओमप्रकाश वाल्मीकि का नाम अग्रगण्य है। उनकी आत्मकथा “जूठन” भारतीय दलित आत्मकथाओं में एक ऐतिहासिक कृति मानी जाती है, जिसमें उन्होंने अपने बचपन से लेकर युवावस्था तक के जातिगत भेदभाव, अपमान और सामाजिक बहिष्कार को अत्यंत संवेदनशीलता और सजीवता के साथ चित्रित किया है। उनके कविता संग्रह “अब और नहीं”, “सदियों का संताप” आदि में दलित समाज की पीड़ा के साथ-साथ प्रतिरोध की गूंज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनकी भाषा अनुभवजन्य, मार्मिक और प्रभावशाली है।
“साफ सफाई का काम हमारे हिस्से आता था। स्कूल में झाड़ू लगाना, टॉयलेट धोना…. और मास्टर जी के झूठे पत्तल उठाना भी।“⁴
यह पंक्ति दलित बच्चों की बचपन में झेली गई अपमानजनक स्थिति को बिना किसी अलंकरण के सामने रखती है।
सुशीला टाकभौरे
हिंदी दलित साहित्य में सुशीला टाकभौरे एक प्रमुख महिला स्वर हैं, जिनके लेखन में जातीय शोषण के साथ-साथ स्त्री उत्पीड़न की पीड़ा भी गहराई से व्यक्त होती है। उनकी आत्मकथा “शिकंजे का दर्द” दलित स्त्री के दोहरे संघर्ष—जाति और लिंग—की मार्मिक अभिव्यक्ति है। कविता, कहानी, आलोचना और आत्मकथा के माध्यम से उन्होंने दलित स्त्री की संवेदना और विद्रोह को साहित्यिक मंच प्रदान किया। उनकी भाषा में सच्चाई, साहस और सामाजिक जागरूकता की गहरी स्पष्टता मौजूद है।
“जब मैं पहली बार मंच पर गई,लोगों ने मेरी जात पूछी कविता नहीं सुनी।”⁵
यह उद्धृरण एक दलित स्त्री की दोहरी बेबसी को सामने लाता है- नारी और जाति दोनों स्तरों पर।
जयप्रकाश कर्दम
जयप्रकाश कर्दम का लेखन दलित अनुभव को केवल आक्रोश की दृष्टि से नहीं, बल्कि गहरी विवेकशीलता और सामाजिक चेतना के साथ प्रस्तुत करता है। उनके उपन्यास “छप्पर” में एक दलित बालक के संघर्षशील जीवन की ईमानदार झलक मिलती है। वे दलित साहित्य को एक रचनात्मक दिशा देने का कार्य करते हैं। उनकी भाषा सहज, स्पष्ट और भावनात्मक रूप से समृद्ध है, जो पाठकों से सीधे संवाद करती है।
“जब बारिश होती थी , छप्पर टपकता था…. और मां कहती थी,’ सपनों में कभी महल मत देखना बेटा।” ⁶
यह भाषा में व्यक्त पीढियों की बेबसी है जहां सपना देखना अवसर नहीं, गुनाह था।
रजतरानी मीनू
रजतरानी मीनू दलित स्त्री लेखन की एक सशक्त प्रतिनिधि हैं। उनका कहानी संग्रह” हम कौन हैं” दलित स्त्री के आंतरिक भय, आत्मसंघर्ष और सामाजिक दबावों को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करता है। उनका लेखन नारीवादी दृष्टिकोण के साथ-साथ दलित चेतना को भी मजबूती से प्रकट करता है। वे पितृसत्ता और जातिगत अन्याय दोनों के विरुद्ध मुखर रूप से खड़ी होती हैं। उनका साहित्य आत्मसम्मान और स्वाभिमान की खोज का साहित्य है।
“हम स्कूल जा सकते हैं, पर बैठ नहीं सकते थे हम बोल सकते हैं, पर सुनने वाला कोई नहीं था।” ⁷
यहां भाषा मौन के रूप में सामने आती है जब आवाज भी सामाजिक ढांचे में दब जाती है।
श्योराज सिंह बेचैन
श्योराज सिंह बेचैन की आत्मकथा “मेरा बचपन मेरे कंधों पर” एक दलित बालक के सामाजिक, आर्थिक और मानसिक संघर्षों की सजीव गाथा है। उनका लेखन संवेदना से परिपूर्ण होते हुए भी कटु यथार्थ का साहसिक उद्घाटन करता है। उनकी भाषा तल्ख होने के बावजूद गहराई और प्रभाव से भरपूर है। वे अपने अनुभवों को केवल व्यक्तिगत दुख की कथा नहीं बनाते, बल्कि सामाजिक अन्याय के विरुद्ध एक मजबूत हस्तक्षेप के रूप में सामने लाते हैं।
“मैं कविता नहीं, ज़ख्म लिखता हूं — जिन्हें कोई देखना नहीं चाहता।”⁸
दया पवार
मराठी दलित साहित्य के अग्रदूतों में शामिल दया पवार की आत्मकथा “बलुतं” भारतीय साहित्य में दलित विमर्श की एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी कृति के रूप में स्थापित है। इस रचना में उन्होंने अपने जीवन के कड़वे यथार्थ के माध्यम से उस सामाजिक संरचना को उघाड़ा है, जिसने दलित समाज को सदियों से अपमान और बहिष्कार के गर्त में धकेल रखा था। यद्यपि वे मराठी भाषा में लिखते थे, परंतु उनके विचारों की गूंज पूरे भारतीय दलित आंदोलन में सुनाई देती है। उनकी लेखनी में करुणा, प्रतिरोध और जागरण की तीव्र शक्ति समाहित है।
“बलुतं हमारी मजबूरी नहीं थी, यह हमें दी गई एक बेड़ियां थी — जिसे अब हम तोड़ रहे हैं।“⁹
कंवल भारती
हिंदी दलित साहित्य के एक प्रखर चिंतक और निर्भीक लेखक कंवल भारती ने अपने लेखन के माध्यम से सामाजिक अन्याय, धार्मिक पाखंड, जातीय दमन और दलित राजनीति के मुद्दों को निर्भीकता से उठाया है। उनके निबंध और आलोचनात्मक लेख तथ्यों, तर्कों और विचारों की स्पष्टता से भरपूर होते हैं। वे साहित्य को केवल सौंदर्य या संवेदना तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाते हैं। उनकी भाषा तीखी, सशक्त और विचारोत्तेजक है, जो पाठकों को झकझोरती है और सोचने के लिए विवश करती है।
“मैं दलित हूं — और यही मेरी सबसे बड़ी राजनीतिक चेतना है। मेरे विचार आज़ाद हैं, और वही मेरी असल ताकत है।”¹⁰
इन सभी रचनाकारों ने न केवल दलित साहित्य को एक वैचारिक गहराई और सामाजिक चेतना दी है, बल्कि भारतीय समाज की जड़ता, असमानता और अन्याय को चुनौती भी दी है। इनका लेखन पीड़ा का वर्णन मात्र नहीं है, बल्कि संघर्ष, अस्मिता और परिवर्तन की उद्घोषणा भी है। इन्होंने साहित्य को सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक प्रभावी औजार बनाया है। इनकी रचनाएं पाठकों को झकझोरती हैं, सोचने के लिए विवश करती हैं और सामाजिक बदलाव की संभावना के द्वार खोलती हैं।
भाषा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन
जब भाषा केवल सौंदर्यबोध या कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर रह जाती है, तब वह एक सीमित दायरे में सिमट जाती है। लेकिन वही भाषा जब सामाजिक यथार्थ को उजागर करने, असमानता को चुनौती देने और बदलाव की चेतना जगाने का कार्य करती है, तब वह एक क्रांतिकारी औजार में परिवर्तित हो जाती है। दलित साहित्य ने हिंदी भाषा को इसी परिवर्तनकारी भूमिका में ढालकर उसे नया अर्थ और उद्देश्य प्रदान किया है।
दलित लेखकों की भाषा मुख्यधारा की तथाकथित ‘संस्कारी’ और अभिजात भाषा से भिन्न होती है। वह भाषा नहीं, बल्कि जीवन के जले हुए अनुभवों की आग होती है। उसमें शिल्प नहीं, बल्कि संघर्ष होता है; उसमें अलंकार नहीं, बल्कि अस्मिता की पुकार होती है। यह भाषा सत्ता, वर्चस्व और शोषण के खिलाफ सीधा प्रतिरोध है। दलित साहित्य में प्रयुक्त मुहावरे, शब्दावली और शैली समाज के उन वर्गों की पीड़ा, चेतना और संघर्ष को स्वर देती है जिन्हें सदियों तक खामोश रखा गया।
दलित रचनाकारों ने उन शब्दों को भी साहित्यिक गरिमा और नई पहचान दी है जिन्हें पहले अपमानजनक माना जाता था। जैसे — “चमार”, “भंगी”, “जूठन”, “छप्पर” जैसे शब्द अब केवल सामाजिक श्रेणियों के नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्मृति और आत्मगौरव के प्रतीक बन चुके हैं। इन शब्दों के माध्यम से लेखक यह बताते हैं कि अपमान और तिरस्कार अब दबी हुई पीड़ा नहीं, बल्कि मुखर विरोध और स्मरण की भाषा बन चुकी है।
इसके अतिरिक्त, दलित साहित्य की भाषा केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जागरूकता और विचार-परिवर्तन का माध्यम भी है। जब पाठक इन रचनाओं को पढ़ता है, तो वह न केवल दलित जीवन की त्रासदियों से रूबरू होता है, बल्कि अपने दृष्टिकोण और पूर्वग्रहों पर भी पुनर्विचार करने को बाध्य होता है। यह भाषा पाठक की संवेदना को जगा कर उसे संघर्ष और बदलाव की दिशा में ले जाती है। चाहे वह ओमप्रकाश वाल्मीकि की “जूठन” हो या श्योराज सिंह बेचैन की “मेरा बचपन मेरे कंधों पर”, इन आत्मकथाओं की भाषा केवल कथानक नहीं रचती, बल्कि समाज की आत्मा को झकझोरती है। सुशीला टाकभौरे, जयप्रकाश कर्दम और रजतरानी मीनू की रचनाओं में प्रयुक्त भाषा विशेष रूप से दलित स्त्री के अनुभवों और दलित समुदाय की आंतरिक दुनिया को सजीव और प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करती है।¹¹
अंततः, दलित विमर्श की भाषा हिंदी साहित्य में केवल एक वैकल्पिक सौंदर्यशास्त्र की स्थापना नहीं करती, बल्कि वह सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को सक्रिय और सशक्त करती है। यह भाषा न तो केवल पढ़ने के लिए है, न ही केवल समझने के लिए बल्कि यह भाषा बदलने के लिए है। यह वह भाषा है जो पाठक को केवल सोचने के लिए नहीं, बल्कि खड़ा होने और बदलाव के लिए कदम उठाने के लिए प्रेरित करती है।
निष्कर्ष
दलित विमर्श हिंदी साहित्य में मात्र एक साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि वह जाग्रत सामाजिक चेतना है जो सदियों से थोपे गए मौन को तोड़ती है और प्रतिरोध का स्वर बनकर उभरती है। यह विमर्श भाषा को सिर्फ संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और परिवर्तन का शक्तिशाली उपकरण बना देता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, सुशीला टाकभौरे, जयप्रकाश कर्दम, रजतरानी मीनू और श्योराज सिंह बेचैन जैसे साहित्यकारों ने अपने अनुभवों को इस तरह शब्दों में ढाला है कि उनकी रचनाएं केवल दलित समाज की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की पीड़ा, संघर्ष और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति बन गई हैं।
इन रचनाकारों की भाषा, लेखन शैली और वैचारिक दृष्टिकोण ने हिंदी साहित्य की पारंपरिक मुख्यधारा को न केवल चुनौती दी है, बल्कि एक समानांतर और सशक्त विमर्श की नींव भी रखी है—एक ऐसा विमर्श जो यथार्थ को केवल दर्शाता नहीं, उसे बदलने का माद्दा भी रखता है। दलित साहित्य ने यह प्रमाणित किया है कि साहित्य केवल सौंदर्य और कल्पना का नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है।
आज जब पूरी दुनिया में समानता, न्याय और मानव गरिमा की आवाज़ बुलंद हो रही है, दलित साहित्य वैश्विक विमर्शों से संवाद करते हुए भारतीय समाज को आत्मचिंतन और पुनर्विचार के लिए प्रेरित करता है। यह साहित्य हमें केवल पढ़ने के लिए नहीं है , यह हमें झकझोरने, बदलने और एक बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में सक्रिय होने का आह्वान करता है। दलित विमर्श की यही सबसे बड़ी उपलब्धि और आवश्यकता है।
संदर्भ ग्रंथ सूची –
1.राम, श्यामसुंदर, हिंदी में दलित आत्मकथा, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद 2011.
2.भारती, अशोक, दलित साहित्य और सामाजिक परिवर्तन, समता प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003 पृष्ठ सं. 201-205.
3. तिवारी, अजय कुमार, हिंदी दलित कथा साहित्य: स्वर और संदर्भ, वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली,2019.
यह पुस्तक नब्बे रुपये मूल्य की है और कुल पच्चीस पृष्ठों में संकलित है। इसमें कुल दस कविताएँ शामिल हैं, जो बाल साहित्य में आदिवासी दखल को दर्शाती हैं। यह झारखंड के फ्लोरा- फ़ाउना (वनस्पति जगत) पर आधारित एक विशेष पुस्तक है। इसमें चित्रात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की गई है, जिसका चित्रांकन कनुप्रिया कुलश्रेष्ठ द्वारा किया गया है।
पुस्तक में सेमल, जटंगी के फूल, पलाश, महुआ, सोनरखी, सनई के फूल, जिरहुल, कुसुम, कोइनार और सरई के फूलों का सुंदर वर्णन किया गया है।
कवि जसिंता केरकेट्टा कहती हैं –
> “जंगल से जुड़े लोग किसी भी फूल को जंगली नहीं कहते। शहर ऐसा अक्सर कहता है। असल में वह इनके बारे में कुछ नहीं जानता। जिनका उसे नाम नहीं मालूम, जो अजनबी हैं, उन्हें वह जंगली कह देता है।” (दो बातें)
कितना आसान है हर एक ना जानने वाली चीज़ को जंगली कह देना। जो समझ से परे हो, वह ‘जंगली’ हो जाता है। अपनी अज्ञानता पर विचार न करना और जो नहीं जानते उसे ‘जंगली’ कह देना — भाषा के लिहाज से भी यह अति क्रूर है।
जंगल की कोख से उपजी इन कविताओं को जसिंता केरकेट्टा ने हम सबके लिए सर्वसुलभ बनाया है। जंगल से हमारी अजनबियत को ख़त्म करने की चेष्टा के साथ-साथ इसमें भावी संततियों के प्रति संवेदनशील होकर प्रकृति को उपहार स्वरूप देने की योजना भी इस लेखन का उद्देश्य है।
‘लौटो प्रकृति की ओर’ का नारा उनके लिए है जिन्होंने प्रकृति से मुख मोड़ा है। जो प्रकृति के प्रति आज भी उतना ही आस्थावान है और सह-अस्तित्व में जीता आया है, उनके लिए ऐसे नारे खोखले मालूम होते हैं।
इस कविता संग्रह से आदिवासी जीवन के ज्ञान में लिपटे वनस्पति जगत के हवाले से जो हमारा परिचय बढ़ा है, वह अन्यतम साबित होगा। बाज़ार की दौड़ में, ब्लिंकइट, जोमैटो, स्विगी की गति से इतर भी थोड़ा रफ़्तार कम करके, थोड़ा ठहर कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
निरर्थक की इस दौड़ से परे जंगल की वनस्पतियों और यह कविताई की संजीदगी बाल मन के साथ-साथ युवा मन को भी अति संवेदनशील बनाएगी। इसी संदर्भ में कवि कहती हैं –
> “प्रकृति में विविधता है। इसी से वह सुंदर है। यही विविधता इसे बचाए रखती है। हमारे बचे रहने में भी इसी विविधता का हाथ है। जंगल विविधता का ही नाम है।” (दो बातें)
इस संग्रह की कविताएँ दस फूलों की उपस्थिति के माध्यम से झारखंड के जंगल के ‘जंगलीपन’ को प्रश्न के कठघरे में खड़ा करती हैं। उन्हें अपने जंगलीपन पर शर्मिंदगी नहीं अपितु गुमान है। ये कविताएँ उनके अस्तित्व को संजोने के लिए विस्तार देती हैं।
जसिंता केरकेट्टा ने इन अपरिचयों को समाप्त करने के उद्देश्य से यह लेखन बाल संसार को ध्यान में रखकर किया है। इसमें भोलापन, सादगी तो है ही, साथ ही एक मशाल लिए हुए नव उलगुलान की घोषणा को भी रेखांकित किया है।
सहज प्रतीत होने वाले ये शब्द कई घटनाओं को समेटे हुए हैं, जो एक ‘अदेखे युद्ध’ की भाँति दिखाई पड़ते हैं। संघर्ष जारी है, यही प्रकृति भी हमें सिखाती है।
यह कविताएँ न केवल ग़ैर-आदिवासी समाज को आदिवासी समाज के साथ हो रही वैश्विक हिंसा की जानकारी देती हैं, बल्कि यह आदिवासी समाज की उन जड़ों को भी वापस उनकी माटी, जल, जंगल, ज़मीन से जोड़ने का कार्य करती हैं, जो जंगलों से उखाड़कर आज ‘गमलों और बुके की संस्कृति’ का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
कवि यहाँ बहुत सचेत होकर इन संघर्ष की कहानियों को कविताओं के माध्यम से उस नन्हे संसार के समक्ष रख रही हैं, जो भविष्य में इन्हें पृथ्वी सहेजने के लिए कृतसंकल्प और अधिक संवेदनशील बनाएगा।
अपने पुरखौती ज्ञान परंपरा में मिले पूर्वाग्रहों के तहत जो आदिवासियों को असुर, दैत्य, जंगली, बर्बर कहने के पक्षधर रहे हैं, उनके लिए यह लेखन आँख खोलने वाला साबित होगा।
सहिष्णुता, प्रेम, भाईचारा, सह-अस्तित्व कितना आवश्यक है — यह सीखने के लिए कवि आदिवासी दर्शन के माध्यम से विश्व सभ्यता को आग्रहपूर्वक कहती हैं कि वह अपने विकास की सीमाओं को एक बार फिर से ठहर कर देखे।
आदिवासी दर्शन में चल-अचल सबके साथ एक रागानुराग का संबंध रहा है। वह धूल के कण से भी जुड़ा हुआ महसूस करता है। सामूहिकता को जीने का आग्रह कवि की पंक्तियों में देखने को मिलता है –
> “सरई के हल्के पीले फूल
इतने छोटे जैसे धूल पर,
जब साथ निकलते हैं
मिलकर मौसम का रंग बदलते हैं।”
(सनई कविता से, पृष्ठ 21)
वह नन्हे संसार से मुख़ातिब होते हुए भी, उसमें हाशिये के समाज की उस आदिवासी महिला के लिए हक़-हकूक की बात करती हैं जिससे आने वाला समय कम से कम बराबरी का भावबोध इन बाल मनों में लेकर आए। श्रम की महत्ता को चिन्हित करना कवि का उद्देश्य है।
वे कोइनार के पेड़ में मेहनत से तोड़ी गई साग की पत्तियों के वाजिब मूल्य के लिए बच्चों को जागरूक करती हैं –
> “कोइनार के कोमल पत्ते
पेड़ की फुनगियों पर लगते
स्त्रियाँ पेड़ पर चढ़कर उन्हें तोड़ती
वे बहुत मेहनत से मिलते
इसलिए बाज़ार
जब उनकी क़ीमत कम लगाता है
तब हर पत्ता
उन स्त्रियों के हक़ के लिए
आवाज़ उठाता है।”
(कोइनार कविता से, पृष्ठ 18)
विविधताओं का सौंदर्य हमें प्रकृति लंबे समय से सिखाती आ रही है, फिर भी जाने क्यों हम पूरी धरा को एक रंग, एक धर्म, एक संस्कृति में रंगने को आतुर दिखाई पड़ते हैं।
वे चेताते हुए कहती हैं कि हमें संभलना पड़ेगा, थोड़ा रुकना पड़ेगा। वे वैश्वीकरण की प्रक्रिया को कितनी सरलता से बच्चों के समक्ष प्रस्तुत करती हैं –
> “अगर जंगल में सब कुछ
एक रंग का होता
तो बोलो जंगल क्या जंगल होता?”
(कुसुम कविता से, पृष्ठ 16)
पुस्तक के शीर्षक ‘जिरहुल’ की कविता विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन जाती है, क्योंकि यहाँ कवि जसिंता जंगल में खिलने वाले बैगनी फूलों को सत्ता, कॉर्पोरेट, बाज़ार और पूँजी से लुटता हुआ देखती हैं और उन्हें ‘हूल’ अर्थात् क्रांति के लिए प्रेरित करती हैं।
संथाल हूल की समग्रता, उसका इतिहास, तब भी जल-जंगल-जमीन को बचाने का था और आज भी उसकी ज़रूरत बनी हुई है।
भारत की पहली लड़ाई 1857 ई. को कहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि ‘हूल’ 1855 ई. में झारखंड के पठारी भागों में लड़ा जा चुका था। उसकी आमद तो 1757 ई. के तिलका मांझी आंदोलन से हुई थी, जो उसी क्षेत्र में सौ वर्ष पूर्व लड़ा गया था।
इतिहासकारों द्वारा इन आदिवासी लड़ाइयों को जबरन ढँक दिया गया, जिसकी अनुगूँज इन बाल कविताओं में कवि ने प्रस्तुत करने की चेष्टा की है –
> “छोटे-छोटे जिरहुल के फूल
अपने अस्तित्व पर मंडराता ख़तरा देख
पहाड़ की चोटी से पुकारते हैं वे –
हूल… हूल…”
(जिरहुल कविता से, पृष्ठ 15)
इन सभी कविताओं में सबसे गहन कविता ‘सोनरखी’ कही जा सकती है। अमलतास को कुरुख़ भाषा में सोनरखी कहा जाता है। कवि कहती हैं –
> “पहले सोना कोइल नदी में था
कुछ लोगों ने नदी खोद दिया
नदी ने चुपके से सारा सोना
सोनरखी को दे दिया
सोनरखी का गाछ भी जब काटा गया
तब मरने से पहले उसने सारा सोना
पहाड़ के लोगों की हँसी में छिपा दिया”
यहाँ प्रकृति बार-बार पहाड़ों के आदिवासियों पर ही विश्वास करती है, क्योंकि उसे पता है कि मुझसे प्रेम करने वाला क़ौम कौन है? कौन है जो प्रकृति को अपने जीवन का अंग मानता है, उसका संरक्षण करना जानता है, और उसका उपभोग नहीं अपितु उसका सत्कार करता है।
वह पेड़ काटने से पहले क्षमा माँगता है, ज़मीन पर पैर रखने से पहले नमन करता है। वह संचय की प्रवृत्ति से कोसों दूर है।
समग्रता में कहें तो यह 25 पन्नों की दुनिया बाल मन को ही नहीं, बल्कि हम सुधी पाठकों को भी झकझोरने के लिए पर्याप्त है। यह अपने वॉल्यूम से नहीं, अपितु अपने संजीदगी से एक इनसाइक्लोपीडिया जैसी भावभूमि को समेटे हुए है।
इसका स्वागत बाल साहित्य में प्रमुखता से हुआ है, यह निश्चय ही कहा जा सकता है।
(कहानी: क्षमा शर्मा / प्रकाशन: हंस / संवाद : स्त्रीकाल) कल्पना मनोरमा की टिप्पणी
क्षमा शर्मा की अत्यंत समकालीन कहानी ‘सेलिब्रिटी’ एक गहरी और प्रतीकात्मक कथा है, जिसमें मध्यमवर्गीय शहरी परिवार के भीतर बनते-बिगड़ते रिश्तों की गुत्थियों को स्त्री दृष्टि से उकेरा गया है।
यह कहानी केवल मां, पिता और बेटियों के आपसी संबंधों की नहीं, बल्कि आज की आभासी दुनिया के प्रभाव, स्त्री की स्वतंत्र आकांक्षाओं, पुरुष की मौन उदासीन स्वीकृति और युवा पीढ़ी के हताश प्रेम-व्यवस्था और व्यथा को भी संजीदगी से प्रस्तुत करती है । युवा हो या बुजुर्ग ‘अर्थ’की कामना यानी पैसे के प्रति ख़ास लगाव और उनके सामाजिक-मानसिक ख़ाके को भी कहानी कुछ दृश्य और घटनों के माध्यम से चित्रित करती है ।
रोमिता के प्रति कहानी की लेखिका के ये वाक्य देखिये …
“उसने कंप्यूटर बंद किया. फोन ड्राअर में रखा फिर सीढ़ियां उतरती नीचे उतर आई. वहां कोने में खड़े होकर सिगरेट पीने लगी. आज ईशान से भी मिलना था. सामने आम के पेड़ पर लगी अमियां लहरा रही थीं. कोयल भी कूक रही थी. वह तेज हवा में उन्हें झूमते देखती रही. यह इलाका भी कैसा है. पुराने सरकारी क्वाटर्स, उनमें रहने वाले एक से एक तीर तमंचे. अक्सर घरों में आम के ऊंचे, घने पेड़. पता नहीं किसने इन्हें लगाया होगा, कौन इनके फल खाता होगा।”
एक आधुनिक लड़की जो स्वतंत्र है अपने व्यसनों के प्रति। जिसे प्रकृति की कोमलता रास नहीं आ रही क्योंकि उलझनों में डूबा उसका मन और तमाम प्रपंचों में जकड़ा जीवन उसे इसकी इज़ाज़त ही नहीं देता , व्यस्तता का आलम यह था कि इसके पूर्व के दृश्य में थकान से चूर नींद भर लेने को उसने सिगरेट भी अधूरी छोड़ दी और लापरवाही में बुझाना भी भूल गई जिससे परदे में आग लग जाती है ।
कहानी की प्रतिनिधि पात्र रोमिता की मां है। ये किरदार उस वर्ग की स्त्रियों की अगुआई करता दिखता है, जिनके पास न विशेष शिक्षा है, न ही आर्थिक आत्मनिर्भरता और न ही धन कमाने की कामना । इन्हें जीवन में सिर्फ उपेक्षा ही मिली है। अब जब सोशल मीडिया पर लोग उसकी पोस्ट को लाइक्स कमेंट्स आदि करते हैं तो वह हवा हवाई हो अमरबेल की तरह दूसरे के ऊपर सवार होकर उनका खून चूसने लगती हैं। इस कहानी में मां की बनी बनाई छवि टूटती है जो यथार्थ परक भी है। आज हर व्यक्ति सोशल मीडिया और ग्लैमर की चमक में विलीन होता जा रहा है। रोमिता की मां इंस्टाग्राम और फेसबुक पर दिखने वाले जीवन की नकली भव्यता से इतनी प्रभावित है कि वह खुद को भी उसी खांचे में फिट करने की जद्दोजहद में एक बनावटी जीवन जीने लगती है।
कहानी लेखिका क्षमा शर्मा
करीना कपूर को ऑटोग्राफ देते हुए देखना, और उसकी तरह नकल करना फिर बच्चों को हजार रूपये की चाकलेट देकर उनसे कहलवाना कि वह “सोसायटी की सेलिब्रिटी” है। यह सब उस गहरे मानसिक खोखलेपन और ‘डिजिटल इन्फीरियरिटी’ का संकेत है जो वर्तमान समाज में व्यापक से फ़ैल रहा है। मज़े की बात ये कि किसी को ये दिखता नहीं।
कहानी का पुरुष पात्र पिता एक ऐसा व्यक्ति है, जो न तो परिवार का नेतृत्व कर सका और न ही पत्नी की मनःस्थिति को समझ सका। कभी पिता के कहने पर कारोबार अपनाया और अब पत्नी की नाराजगियों को मौन सहता है। सामाजिक रूप से एक ‘दब्बू’ किस्म का पुरुष है, जिसकी भूमिका नगण्य-सी होती है। न ही अपनी आय को विस्तार दे सका, न पत्नी को खुश कर सका। उसके पास एक हथियार है मौन का, उसी के सहारे जीना उसका ध्येय है। वह स्त्री की आत्ममुग्धता या आक्रोश को सहता है, बेटियों की भलाई के लिए स्थान बदलता है, लेकिन संवादहीनता की अवस्था में ही जीता है। उसकी ‘गिल्ट’ भी कहानी का एक गूढ़ पहलू है। एक ऐसा पुरुष जो खुद को असफल मान चुका है।
रोमिता, कहानी का सबसे संतुलित पात्र लगता है। पर है नहीं, वह पढ़ी-लिखी है, नौकरी करती है, अपने परिवार के प्रति दायित्वपूर्ण भी दिखती है। मां की गैरवाजिब अपेक्षाओं और अतिशय कृत्रिमता से वह आहत भी होती है। वह मां को निराश नहीं करना चाहती लेकिन उस पर ऑफिस और घरेलु जिम्मेदारियों का दोहरा दबाब है इसलिए उसे लेकर मन में जो विरोध है, वह गहराता जाता है। रोमिता, एक ऐसी बेटी है जो मां से बुरा भला कहने से नहीं चूकती लेकिन उनकी इच्छा पूरी कर देना चाहती है ।
“तुम्हें हमेशा यंग बने रहने और पतले होने का शौक है तो हम क्या करें। गूगल पर कुछ भी देखकर उसे फॉलो करती रहती हो और बनती हो बड़ी डाइटीशियन. अपनी उम्र देखी है?”
रोमिता एक डेटिंग एप के जरिये वह ईशान से मिली जिसे वह अफेयर की तरह मानती है। माँ के रवैये के प्रति गुस्सा दिखाकर घर भी छोड़ देती है, मां से जितना बुरा बोल सकती है, बोलती है। मां के लिए “पागल” शब्द तो उसके मुंह पर रहता है। लेकिन कभी अपने परिवार के साथ बैठकर संवाद स्थापित नहीं करती। रोमिता की बहन आत्ममुग्ध अपने प्रति ही सोचने वाला किरदार है। रोमिता के प्रति किसी का स्नेहिल न होना, जो झुके उसे वहां तक झुकाओ की रीढ़ चटक जाए, इस भौतिक युग की देन है। प्रेम में विफलता, तथाकथित प्रेमी की लफंगई को पहचानना, और उससे पीछा छुड़ा लेना भी स्त्रैण जज़्बा है। सिबलिंग्स की लापरवाहियों को झेलना भी समकालीन युवतियों और युवाओं की जमीनी समझ का एक यथार्थ चित्रण है।
कहानी का सबसे गहरा बिंदु यह है कि मां की बेचैनी, दिखावे की प्रवृत्ति, असंतोष के लिए कृत्रिमता और न मिलने की संभावना में चिड़चिड़ापन, क्या केवल बाहरी है ? जबकि मां रूपी स्त्री की ये गहरी मानसिक परेशानी का संकेत भी हो सकता है। परिवार में इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। जबकि आज अवसाद, एंग्ज़ायटी, और यहां तक कि ऑटिज़्म के लक्षणों को समझना और पहचानना ज़रूरी हो गया है, उस स्थिति में परिवार, विशेषकर पढ़े-लिखे बच्चों द्वारा इन संकेतों को न समझ पाना भी एक सामाजिक सच्चाई है जिसे लेखिका ने इंगित किया है।
सेलिब्रिटी कहानी एक आईना है, न केवल परिवारों का, बल्कि हमारे उस सामाजिक ढांचे का भी, जहां आभासी सफलता की भूख और घरेलू संवादहीनता एक गहरी खाई बनाती जा रही हैं। साथ में यह कथा केवल एक घरेलू संघर्ष नहीं, बल्कि उस ‘पलायनवादी आधुनिकता’ की कथा है, जिसमें संवेदना से ज़्यादा दिखावा है, संबंधों से ज़्यादा अपनी छवि निखारने की चिंता है। लेखिका ने यहां पुरुष सत्ता को सीधा केंद्र न बनाकर उसके ‘अप्रभावी स्वरूप’ को दिखाया है, और स्त्री को केवल शोषित नहीं बल्कि ‘आकांक्षा और अभाव के बीच छटपटाती सत्ता’ के रूप में चित्रित किया है। यानी ‘सेलिब्रिटी’ कहानी एक बहुस्तरीय कथा है। इसे केवल किसी एक दृष्टिकोण से नहीं पढ़ा जा सकता। इसके स्थूल (surface), सूक्ष्म (psychological), और दार्शनिक (existential) तल पर उतर कर एक गंभीर विमर्श के रूप में भी देखना होगा। यह कहानी हमें यह सोचने पर भी विवश करती है कि हम साथ रहकर भी क्या वास्तव में एक-दूसरे को पूरी तरह देख पा रहे हैं?
एक बात पर और ध्यान ले जाना चाहती हूं। अब जबकि समय बदल गया है। ‘सेलिब्रिटी’ कहानी कहीं न कहीं यह तथ्य भी रेखांकित करती है कि आज की माएँ जहाँ बेटियों को अपना वारिस बनाकर एहसान जाता देती हैं तो दूसरी ओर अपने अधिकारों को दस गुना बढ़ाकर लड़कियों को उन्हें पूरा करवाने की धुन में दिखती है। जबकि इतना अधिकार बेटे वाली माएं अपने बेटों पर भी नहीं दिखाती हैं।
एक बात पर और ध्यान ले जाना चाहती हूं। अब जबकि समय बदल गया है। ‘सेलिब्रिटी’ कहानी कहीं न कहीं यह तथ्य भी रेखांकित करती है कि आज की माएँ जहाँ बेटियों को अपना वारिस बनाकर एहसान जाता देती हैं तो दूसरी ओर अपने अधिकारों को दस गुना बढ़ाकर लड़कियों को उन्हें पूरा करवाने की धुन में दिखती है। जबकि इतना अधिकार बेटे वाली माएं अपने बेटों पर भी नहीं दिखाती हैं। “क्या तेरे खर्चे इतने बढ़ जाएंगे कि अपनी एक मां का खर्चा न उठा सके. तुझे इसीलिए पढ़ाया-लिखाया है, अपने पांवों पर खड़ा किया है कि जब देखो तब मुझे सुनाती रहे कि तू मुझ पर कितना खर्च कर रही है”.
“ऐसा करो कि जितना मुझ पर खर्च किया है, उसकी किश्त बांध दो. चुका दूंगी. रोज-रोज के तानों से तो मेरा पीछा छूटेगा”.
“अरे नालायक! लड़कियां अपने मां-बाप के लिए न जाने क्या-क्या करती हैं और एक तू है…”
मशीनी युग की मां बेटी के संवादों से पता चलता है कि मनुष्य के भीतर अपने को महत्व देने की भूख का तांडव किस तरह उन्हें खोखला बनाता जा रहा है।
कहानी के अंत में रोमिता परिवार के पिता को छोड़ सभी ब्लॉक कर देती है। अपने पिता की दयनीय स्थिति को देखते हुए वह नहीं चाहती कि उसका हश्र उसके पिता जैसा हो वास्तव में ये भी आक्रोश दर्ज कराने का तकनीकी तरीका है। पल पल बनते बिगड़ते रिश्तों को लोग यूं ही ब्लॉक-अनब्लॉक करते दिखते हैं।
एक मध्यमवर्गीय स्त्री की आभासी चमक से मोहित होकर अपनी वास्तविकता को अस्वीकार करने की छटपटाहट, और उस अस्वीकार के परिणामस्वरूप परिवार में उपजे तनाव, दूरी और मौन पीड़ा की पड़ताल करती है कहानी सेलिब्रिटी।
कहानी यह भी उजागर करती है कि दिखावे की दुनिया में फंसी स्त्री की आकांक्षा, जब घर की सीमाओं से टकराती है, तो वह केवल स्वयं नहीं टूटती, अपने साथ पूरे परिवार की भावनात्मक संरचना को भी हिला डालती है।
यह कहानी उस स्त्री की है, जो ‘सेलिब्रिटी’ बनने के छलावे में मां, पत्नी और गृहणी की अपनी असल भूमिका से भटक जाती है — और उसका परिवार उसकी इस भटकन को समझ ही नहीं पाता है।
कल्पना मनोरमा
हिंदी और संस्कृत विषय की अध्यापक, कुछ वर्षों तक अकादमिक पब्लिकेशन हाउस में बतौर सीनियर एडिटर और हिंदी काउंसलर । फिलहाल पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन में संलग्न।’कब तक सूरजमुखी बनें हम’ नवगीत संग्रह, ‘बाँस भर टोकरी’, ‘नदी सपने में थी’ और ‘अब लौटने दो’ कविता संग्रह, कहानी संग्रह “एक दिन का सफ़र”, साक्षात्कार “संवाद अनवरत” प्रकाशित। एक बालकथा संग्रह और दो कविता संग्रह प्रकाशन की राह पर हैं। कल्पना मनोरमा ने पुरुष-पीड़ा जैसे विशेष संदर्भों पर आधारित दो कहानी संग्रह भी संपादित किए हैं। जिनके नाम हैं-‘काँपती हुईं लकीरें’ और ‘सहमी हुईं धड़कनें’ उन्हें ‘सूर्यकांत निराला सम्मान’, ‘लघुकथा लहरी सम्मान’, ‘आचार्य सम्मान’, ‘काव्य प्रतिभा सम्मान’ सहित कहानियों के लिए साहित्य समर्था टिक्कू पुरस्कार और कथा समवेत के द्वारा धनपति देवी पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है।ई-मेल : kalpanamanorama@gmail.com
आज के तकनीकी डिजिटल युग में “न्यू नार्मल” एक लोकप्रिय किंतु विरोधाभासी अवधारणा बन चुकी है, जो न केवल हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं को पुनर्परिभाषित कर रही है बल्कि मनुष्य के अस्तित्व, संवेदना और विचारधारा के आयामों को भी बदल रही है।“न्यू नार्मल” वास्तव में एक मानसिक अवस्था है। कोरोना काल के बाद “न्यू नार्मल” शब्द हमारे जीवन की एक स्थायी जीवनशैली जैसे मास्क, सोशल डिस्टेंस, वर्क फ्रॉम होम, आदि के रूप में प्रचारित हुआ। ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित प्रियदर्शन की कहानी “न्यू नॉर्मल” इस संकल्पना को मीडिया-हाउस की एक छोटी-सी घटना के माध्यम से व्यापक सामाजिक, राजनैतिक और तकनीकी परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करती है। कहानी “न्यू नार्मल” को गहन वैचारिक और मानसिक अवधारणा के रूप में प्रस्तुत करती है। संक्रमण के दौर में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियाँ , जिन्हें लगातार दोहराए जाने के कारण सामान्य मान लिया जाता है, न्यू नार्मल बन जाता है । कहानी में नई- नई पत्रकार प्रेरणा के संवाद स्पष्ट करते हैं कि सरकार की आलोचना न करना आज “न्यू नार्मल” है। जो दर्शाता है कि सत्ता और पूँजी की संरचना का हिस्सा बन चुका मीडिया की कार्यप्रणाली “न्यू नार्मल” हो चुकी है जिसमें सरकार की वैचारिक असहमति और उनकी आलोचना अब असामान्य है। कहानी का केंद्रीय तत्व इस बात पर टिका है कि कार्य स्थलों पर आज व्यवस्था और अनुशासन के नाम पर जो नीति-नियम स्थापित किये जाते हैं वे वास्तव में कर्मचारियों के रूप में नागरिक की स्वतंत्रता, रचनात्मकता और आत्म सम्मान समाप्त करने का उपक्रम है । “न्यू नार्मल” के तहत कार्य स्थलों पर बायोमेट्रिक मशीन , स्कैनर, कैमरे, स्वाइप कार्ड या अन्य तकनीकी साधन केवल उपस्थिति दर्ज करने के लिए ही नहीं है बल्कि इसके माध्यम से कर्मचारियों की गतिविधियों व्यवहार और सोच पर भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष नजर रखी जाती है और चूंकि कर्मचारियों को मालूम भी है कि उन पर नजर रखी जा रही है वे खुद को असुरक्षित अनुभव करते हुए डर के माहौल में जी रहे हैं । इस असामान्य विषम माहौल में भी सत्ता के खिलाफ कोई बोलने को भी तैयार नहीं । कहानी में बार-बार सवाल उठाती है- “यार लोग इतना डरते क्यों हैं”? यह डर दरअसल उस व्यवस्था का है, जहाँ संवेदना के लिए जगह नहीं केवल अनुशासन का महत्व है , धीरे धीरे कर्मचारी इसके अभ्यस्त हो जाते है और इस प्रक्रिया में असामान्य स्थितियाँ भी सामान्य प्रतीत होने लगती हैं।
कहानी का आरम्भ मीडिया हाउस में घटित एक मामूली घटना से होता है जब वे बायोमेट्रिक सिस्टम के दरवाज़े के न खुलने पर जबरदस्ती धकेल कर आगे बढ़ते हैं लेकिन सायरन बज उठता है और मैनेजरनुमा व्यक्ति उन दोनों पत्रकारों को चोर-डाकू कहता है, तिसपर उनके संसथान के प्रबंधक उन्हीं से माफ़ीनामा की मांग करते हैं तो उनके अहम को ठेस पहुँचती है वे माफ़ी न मांगने का फैसला लेते हैं धीरे-धीरे बाकी कलीग्स उनका साथ देने को तैयार हो जाते हैं और बिना माफ़ी मांगे ही अंत में उन्हें मानो माफ़ कर दिया जाता है जो कहानी को विडम्बनापूर्ण बनाती है। आरम्भ में ही कहानी के मूल बिंदु को स्थापित कर दिया गया है “उसने ठंडी सांस ली यह नॉर्मल है… न्यू नॉर्मल, फिर उसने माहौल हल्का करने के लिए कहा “अब हम टेक्नोलॉजी के गुलाम हैं उसके इशारे पर ही चलते हैं” नवीन ने संशोधित किया “टेक्नोलॉजी के नहीं, उन लोगों के जिन्होंने ये टेक्नोलॉजी लगाई है” यह पूंजीवादी शक्तियों के उस नए चेहरे की ओर इशारा है जो बायोमेट्रिक सिस्टम AI जैसे तकनीकी टूल्स के ज़रिए मनुष्य की पहचान को आंकड़ों में बदल देती हैं। बायोमेट्रिक सिस्टम द्वारा कर्मचारियों को नियंत्रित करना सम्पूर्णता में उनकी पहचान को रद्द कर देना है, जो मानवीय गरिमा को खंडित कर रहा है। तकनीक और पूंजी की मिलीभगत ने पत्रकारिता के मिशन को “प्रोफ़ेशन” में और जनता जिसके हक़ में उसे आवाज़ उठानी चाहिए उसे “प्रोडक्ट” में बदल दिया है। “एक तारीख को सैलरी लो और बाकी 30 दिन वह लिखो जो मालिक को भी रास आए और प्रधानमंत्री को भी” बिना किसी लाग लपेट के इतना स्पष्ट और बेबाक लिखने के लिए कहानीकार बधाई के पात्र हैं । यह वाक्य ‘पत्रकारिता के कॉर्पोरेट हाउस में रूपांतरण’ का उद्घोष है। जो इस यथार्थ को सामने रखने का साहस करता है कि मीडिया हाउस अब सिर्फ ख़बरों का माध्यम नहीं है बल्कि सत्तातंत्र का अभिन्न अंग बन चुका है।
अगर अभिषेक और नवीन की बात करें तो दोनों में पत्रकारिता के आदर्श बाकी हैं, लेकिन भय, असुरक्षा और निराशा के वातावरण में तो वे भी जी रहे हैं। पत्रकारिता का पतन का उस केन्द्रीय घटना से जुड़ता है जब इन दोनों पत्रकारों को बिना अपराध के “चोर-डाकू” जैसे शब्दों से अपमानित किया जाता है जो वास्तव में आज की मीडिया के ‘चरित्र-हनन’ की ओर भी संकेत करता है जो सत्ता के नियंत्रण में ख़बरों के ‘नैरेटिव सेट’ करता है। कर्मचारियों में तब्दील पत्रकारों का वजूद अथवा ‘एंकर्स’ जिनका काम अब खबरों में ‘वाहियात एंगल’ (साम्प्रदायिक या जो ट्रेंड में है ) खोजना जैसे कुंभ में भगदड़ की रिपोर्टिंग से पहले नॉरेटिव सेट करना हो गया है, उस पर विडम्बना कि दर्शक या जनता को भी खबरों में रोमांच या मसाला चाहिए । जिसके वे अभ्यस्त हो चुके हैं, किये जा चुके हैं यह भी “न्यू नॉर्मल” है। बलात्कार या मॉब-लिंचिंग में नृशंस हत्याओं पर समाज का उदासीन रुख ‘ब्रेन राट’ की स्थिति को इंगित करता है अथवा इसे संवेदनहीनता का सामान्यीकरण कहा जा सकता है। वास्तव में हम जितना ज्यादा सूचना संपन्न हो रहे हैं उतने ही ज्यादा संज्ञा शून्य भी हो रहे हैं। हम असामान्य अत्याचार को भी सहजता से देख पाते हैं जो न्यू नॉर्मल है । आप कह सकते हैं कि हमारे मन मस्तिष्क के सॉफ्टवेयर निरंतर तकनीक की भांति अपडेटेड/ अद्यतन होते जा रहे हैं मनुष्य अपने आप को परिस्थितियों के अनुकूल ढालना सीख रहा है इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि उसके पास विकल्प नहीं इसलिए भविष्य में कोई आशा नजर नहीं आ रही।
संवाद प्रधान ‘न्यू नार्मल’ कहानी की भाषा, प्रतीक और व्यंग्य सामाजिक यथार्थ को प्रकट करते है। संवादों में लेखक ने तीव्र प्रभाव उत्पन्न किया है- “यह गाड़ियाँ किसके लिए रेस लगा रही हैं”? या “पेड़ के पत्ते जितने शांत दिखते हैं, उतने हैं नहीं” जैसे वाक्य सामाजिक असंतोष और मानसिक हलचल के प्रतीक हैं। कॉरपोरेट जगत में “माफ़ी” की माँग, चुपचाप अपमान सह लेना ये सब मनुष्य के आत्मसम्मान को कुचलने वाली सत्ता की सूक्ष्म क्रूरता को उजागर करते हैं। समाज की पितृसत्तात्मक संरचना की यदि बात करें तो यहाँ अभी पुराना वाला ‘नार्मल’ ही लागू है,समाज में स्त्री के प्रति ‘व्यवहार’ अथवा भाषा प्रयोग आज भी सदियों पुराना है । कहानी में विनीता कपूर इसी मीडिया हाउस में एच.आर. कॉरपोरेट अधिकारी हैं लेकिन वह स्त्री सशक्तिकरण के रूप में न उभर कर सत्ता और पूँजीवाद की क्रूरता का मुखौटा प्रतीत होती है, उसकी स्मित मुस्कान व्यवस्था की कठोरता छिपा ले जाती है। कहना होगा कि पूँजीवादी सत्ता का प्रतिनिधित्व करने वाली विनीता कपूर का विनम्र व्यवहार और सुसंस्कृत भाषा “कॉर्पोरेट चेहरे” का प्रतीक है। दूसरी ओर व्यवस्था के विद्रोही नवीन का स्त्री के प्रति दृष्टिकोण अब भी वही पुराना ‘नॉर्मल’ है। नवीन कहता है “इस विनीता कपूर से माफी नहीं माँगूंगा” तब प्रतुल पूछता है “क्यों? क्या इसलिए कि वह लड़की है”?…लड़की होने से समस्या नहीं है, कुछ है जो खटक रहा है” यह “कुछ” वह सत्ता है जो स्त्री को मिली है, कोमलता के पीछे छिपी कठोरता आज भी पुरुष को असहज बनाती है। यह स्पष्ट करता है कि पितृसत्तात्मक समाज में जैसे ही स्त्री व्यवस्था का चेहरा बनती है, वह असहज लगने लगती है। वहाँ न्यू नार्मल का सिद्धांत लागू नहीं कर पाते।
“न्यू नॉर्मल” कहानी मात्र मीडिया हाउस की कहानी नहीं अपितु यह हमारे समय, समाज की लगातार बढ़ती अचेतना का आईना भी है।कहानी सवाल उठाती है कि क्या हम सच में परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल रहे हैं, या असहज स्थितियों को ‘सामान्य’ मान कर निष्क्रिय होते जा रहे हैं? मनुष्य की संवेदनहीनता और मानसिक थकावट का प्रमाण है खबरों के बाद की बेचैनी अब नहीं रही। जैसे “11 महीने से फ्रिज में रखी लाश की खबर” को लोग हँस-हँस कर साझा कर रहे हैं, यह मानवीय त्रासदी नहीं तो क्या है ? उपभोक्तावादी संस्कृति में ख़बरें मनोरंजक हो चुकी है । अंत में नवीन से प्रतुल का हाथ मिलाना भले ही एक आशा हो सकती थी कि शायद “छोटी क्रांति” कभी तो “बड़ी क्रांति” का मार्ग प्रशस्त करेगी लेकिन यह भी कटु यथार्थ है कि पूंजीवादी तकनीक और सत्ता अंततः सबको अपने अनुरूप ढाल ही देती है। कहानी के पहले हिस्से में प्रियदर्शनजी लिख चुके थे कि “पत्रकारिता के नाम पर क्रांति करने का जो कीड़ा तुम लोगों को दिमाग में घुसा है उसे निकाल दो जिसने नौकरी दी है उसके हितों का ख्याल रखो”। नवीन के दिमाग का कीड़ा बाद में देर तक भन्नाता रहा। जानता है आज जो लोग क्रांति के नाम पर साथ हैं भी कल को किसी संकट में साथ खड़े नहीं होंगे बल्कि उन्हें जरूरतमंद जानकार उसका शोषण करने लगे । अभिषेक ने तो अपने भीतर के कीड़े को बहुत दूर तक सुला दिया है, नवीन की तरह से यह कीड़ा काटता नहीं है बस उदास कर जाता है। अंत में “लेकिन असली बात नवीन ने कही-हां, छोटी क्रांति रंग लाई ताकि बड़ी क्रांति का स्कोप न रहे”। यानी क्रांति का कीड़ा बड़ा अजगर न हो पाए, उसके पहले ही उसे थपकी देकर सुला दो “आखिर हम काम तो उन्हीं का कर रहे हैं, उन्हीं के ढंग से कर रहे हैं, तो हमें क्यों छेड़ते। थोड़ा-सा गुमान बचा रहने दिया” । बड़े तंत्र केवल उतना ही बदलाव स्वीकार करते हैं जिससे उनकी सत्ता पर कोई आंच ना आए छोटी-छोटी और बदलाव की संभावना भी ना रहे अंत में यह वाक्य कि “यह बहुत बड़ा सुनहरा पिंजरा है जिसमें हम कैद है और यह भी न्यू नॉर्मल है “न्यू नार्मल” के इस पिंजरे में हमारे पास ज्यादा संभावनाएं नहीं है विकल्प नहीं है।
वस्तुत: जनता के पास विरोध या विद्रोह के लिए विकल्प कहाँ बचे? सोशल मीडिया पर चारों ओर रील्स ने रियल्टी पर मनोरंजन का आवरण चढ़ा रखा है उसी में दो घड़ी की खुशी ढूंढ ली जाती हैं। हरि भटनागर की कहानी “आपत्ति” में देख सकते हैं कि अकेले प्रतिरोध करने वाले व्यक्ति का क्या हश्र होता है, जब भौंकने वाले कुत्ते उसे नोंच खाने को दौड़ते हैं जबकि प्रियदर्शन जी की ही कहानी ‘देश के लिए’ के नायक को तो गोली ही मार दी जाती है। कहानी में “कृपया अनुशासन बनाए रखें, लिफ्ट की प्रतीक्षा करें और एक-एक करके प्रवेश करें” सोचने पर विवश करता है कि हम मशीन द्वारा संचालित हो रहे हैं, होना ही पड़ेगा और यह “न्यू नॉर्मल” है। “न्यू नॉर्मल” ऐसा मुहावरा बन चुका है कि जो समय-कुसमय की कसौटी पर खरा उतरेगा है वही आगे बढ़ सकता है। इस प्रकार “न्यू नॉर्मल” केवल जीवन-शैली का बदलाव भर नहीं,या पारिस्थितिक अनुकूलन भर भी नहीं अपितु संवेदनाओं का ह्रास है। डिजिटल कंट्रोल,ख़बरों का मनमाना विकृतिकरण, संवेदनहीनता और भीड़तंत्र की मानसिकता सब मिलकर हम एक ऐसा समाज बना रहे हैं जहाँ किसी एक विद्रोह की आवाज़ असहज लग सकती है जबकि घटनाओं, दुर्घटनाओं,युद्धों की विभीषिकाओं का ‘न्यू नार्मल’ सामाजिक, मानसिक और राजनीतिक असामान्यता का सुंदर मुखौटा है जिसे स्वीकार कर लेना सहज बन चुका है इस असामान्यता के इतने अभ्यस्त कर दिए गए हैं कि प्रतिकार/प्रतिक्रिया करना ही भूल गये हैं। कहानी के अंत में प्रतुल कह रहा था ‘एक तेंदुआ कुएं में गिर पड़ा है, कुछ देर इसी पर “खेल लो” ! यह ‘खेलना’ पूँजीवाद के कॉरपोरेट जगत का बड़ा ही महत्वपूर्ण शब्द है जिसके लिए हर बात ‘खेल’ है, आपके पास पैसा है तो आप किसी के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। अंत में यह कहना चाहूंगी कि “न्यू नार्मल” संकल्पना के तहत यदि साहित्य अध्ययन किया जाए तो मनुष्य कीसंवेदनशीलता के ह्रासपर चिंतन के नए आयाम खुलेगे जो विमर्शों की सीमाओं स्वतंत्र होंगे, विमर्श जो सत्ता और पूँजी के खेल बन चुके हैं।
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