आस्था का सम्मान

कहानी :अभय कुमार

चौबे टोला गाँव के बाज़ार के पास एक मंदिर था। मंदिर के पास ही एक पुराना बरगद का पेड़ था। लोग कहते हैं कि यह कई सौ साल पुराना पेड़ है। हज़ारों चिड़ियाँ यहाँ रहती थीं। कई बार साँप को भी पेड़ की जड़ों में घुसते हुए देखा गया था। विशाल बरगद के नीचे दिन में लोग ताश खेलते थे, और शाम से लेकर देर रात तक गाँव के सवर्ण वहाँ बैठते और चिलम फूँकते थे। बरगद के पेड़ के नीचे लगने वाली महफ़िल में वे लोग बिना नागा के पहुँचते थे, जो घर की ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को ‘फ़ारिग’ कर चुके थे।

वहाँ बैठने वालों में बहुत ऐसे भी थे, जिनकी पत्नियाँ मर चुकी थीं, या फिर कुछ वैसे भी थे, जिनकी पत्नियाँ ज़िंदा तो थीं, मगर उनसे बनती नहीं थी। वे ऐसे ‘सज्जन’ और ‘उदार’ थे कि अपनी बीवी को छोड़कर गाँव की तमाम औरतों के सबसे बड़े ‘खैरख्वाह’ बन जाते थे। कुछ तो ऐसे भी थे, जो कई बार दलित बस्तियों की महिलाओं पर बुरी नज़र डालने के कारण गालियाँ भी खा चुके थे और लात भी।

बरगद के पेड़ के नीचे सब लोग रात के खाने से पहले बैठते थे। उनमें कुछ गांजा पीते थे, कुछ खैनी खाते थे। मोबाइल पर ‘न्यूज़ एंकर’ के ‘ज्ञान’ को ग्रहण कर फिर उसे कई जगहों पर छितराते थे। देश-दुनिया की बातें खूब होती थीं, मगर उनकी बातों को सुनकर ऐसा लगता था कि बातें वे बोल रहे हैं, लेकिन उनके मुँह में ‘कैसेट’ किसी और का बज रहा हो।

ऐसी ही एक शाम मास्टर संजय मिसिर ने चिलम सुलगाते हुए कहा,

“मोबाइल पर न्यूज़ देखी आप लोगों ने? मंत्री जी इस इतवार को ज़िला मुख्यालय में भव्य मंदिर का उद्घाटन करने आ रहे हैं। मानना पड़ेगा कि नेता जी के पास ग़ज़ब की हिम्मत है। ऐसे धर्मवीर सौ साल में एक बार जन्म लेते हैं, जो अपने धर्म की रक्षा के लिए सब कुछ त्याग देते हैं।”

मास्टर संजय मिसिर पेशे से शिक्षक थे। रिटायरमेंट में कोई दो-चार साल और बचे होंगे। बच्चों को पढ़ाने और स्कूल में समय देने से ज़्यादा उनकी दिलचस्पी मुखिया और विधायक के आगे-पीछे घूमने में थी। साल भर घूम-घूमकर खाते थे। बच्चों को पढ़ाने से ज़्यादा यह पूछते थे कि उनके घर में कौन-सी फसल, फल और सब्ज़ी उगती है। यह भी पूछते थे कि अगर घर में गाय या भैंस है, तो गुरुजी के लिए दही और घी भेंट करें।

मास्टर संजय मिसिर माथे पर चंदन और टीका लगाए रहते थे, और जब मौक़ा मिलता, तो जजमानी भी करने लगते थे और जजमान के घर में मौजूद सारी चीज़ों को अपने झोले में लपेट लेना चाहते थे। सिर्फ़ मैट्रिक पास थे और पैरवी की मदद से टीचर बन गए, मगर नेताओं के बीच में रहकर, टी.वी. न्यूज़ देखकर और लाठी-धारी संगठनों की कार्यशालाओं में शामिल होकर उनके पास बोलने की कला आ गई थी। 

मगर उस दिन लालबहादुर पाड़े भी उनकी बातों को सुन रहे थे। पाड़े की उम्र कोई चालीस साल थी। वह इंटर पास थे और कॉलेज के दिनों में लाल-परचम वाली पार्टी से जुड़ गए थे। एक पाड़े ही थे, जिनके पास मास्टर संजय मिसिरसे बहस करने की कुछ क्षमता थी।

बरगद की नीचे बैठे बैठें लालबहादुर पाड़े सारी बातें सुन रहे थे फिर अचानक से उन्होंने मास्टर संजय मिसिर को धीरे से टोका, “मगर सुना है कि वह मंदिर एक दूसरे समुदाय के धार्मिक स्थल को गिराकर बनाया गया है…”।

चिलम फूँकने के कारण मास्टर संजय मिसिर को काफ़ी नशा चढ़ गया था, मगर पाड़े की बात सुनकर उनका कुछ नशा उतर गया। मास्टर मिसिर ने पाड़े की बात कुछ यूँ काटी: “पाड़े जी, आप भले आदमी हैं, लेकिन लाल-झंडे वालों के असर में आपका दृष्टिकोण उल्टा हो गया है। आप कुतर्क करने में माहिर हो गए हैं। ‘एंटी-नेशनल’ लोगों के साथ रहेंगे, तो सोहबत का असर पड़ेगा ही। एक ब्राह्मण के मुँह से जब देश-विरोधी और हिंदू-विरोधी बातें सुनता हूँ, तो बहुत तकलीफ़ होती है। पाड़े जी, बार-बार मैंने आपसे अनुरोध किया है कि देश जोड़ने वालों के साथ रहिए और उनका साथ छोड़ दीजिए, जो खाते देश का हैं, गाते विदेशियों का हैं। यही तो इस देश की त्रासदी है। देशद्रोहियों के तुष्टिकरण का ज़हर इस देश को खा गया है! और इस ज़हर की प्रयोगशाला लाल-झंडे वाली पार्टियाँ हैं।”

पास बैठे शंभु सुकुल ने मास्टर संजय मिसिर की बातों की हिमायत करते हुए कहा, “मास्टर जी की बात में तो दम है। आजकल के बच्चों को कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ने भेजो, तो वे पढ़ाई कम और राजनीति ज़्यादा करते हैं। मेरा भी एक मामा का लड़का दिल्ली गया था पढ़ने। जाने से पहले तो बड़ा संस्कारी था, मगर जब पढ़ाई पूरी करके आया, तो एक दिन वह मंगरुआ डोम के घर जाकर चाय पी रहा था। यह देखकर मैंने उसे खूब डाँटा और मंगरुआ डोम को मन भर गालियाँ दीं।”

यह बात सुनकर मास्टर संजय मिसिरको बल मिला और अब वे और ज़ोरों से बोलने लगे, “अब तुम ही बताओ, पाड़े जी, यह देश किसका है? हमारा, या उनका जो खाते हैं देश का और गाते हैं औरों का?”

यह सुनकर लालबहादुर पाड़े शांतिपूर्ण अंदाज़ में बोले: “मगर मंदिर-मस्जिद के झगड़ों का कोई अंत है क्या? अगर आप मस्जिद से पहले मंदिर की बात करेंगे और मस्जिद तोड़ने की बात करेंगे, तो फिर आपको इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि मंदिरों से पहले भी तो कुछ था। क्या वे बुद्ध के स्थल थे? क्या वे आदिवासियों के जाहेरथान थे?”

यह सुनकर मास्टर संजय मिसिर का चेहरा तमतमा गया। ग़ुस्से से उनकी नाक फड़कने लगी। उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा, “देखो लालबहादुर पाड़े, अपना महान ज्ञान अपने पास रखो। देश के एक संत ने हमारे समाज का सत्यानाश कर दिया। पायजमा की चापलूसी करते रहे और उनके कट्टरपन पर आँख बंद किए रहे, और उल्टा हमें उपदेश देते रहे कि सब धर्म एक ही हैं!”

“मगर यह तो सच है,” पाड़े ने बीच में कहा।

यह सुनकर मास्टर संजय मिसिर आग-बबूला हो गए और बोले: “हमारे समाज के बुद्धिजीवियों के दिमाग़ में गोबर भर गया है। सब धर्म कैसे बराबर हो गए? जिस धर्म में बचपन से मुर्गी और बकरी काटने की तालीम दी जाती हो, वह हमारे धर्म के बराबर कैसे हुआ, जहाँ चींटियों को भी दाना खिलाया जाता है?”

“चींटियों को दाना तो खिलाया जाता है, मगर एक इंसान को अछूत कहकर क्यों दुत्कारा जाता है?” पाड़े ने प्रश्न उठाया।

“देखिए पाड़े, समाज में इतना ज़हर आप लोग ही घोल रहे हैं। जात-पात कभी यहाँ नहीं थी। यह तो विदेशी-आक्रांताओं ने यहाँ लाकर हमारे समाज को बाँटा। यह बात आप लोग कभी नहीं समझेंगे, क्योंकि आपको उनकी बिरयानी खानी है। अरे, हमारा समाज धर्म को मज़बूत करने से ही मज़बूत होगा, क्योंकि धर्म से बड़ा कुछ नहीं होता। जात-पात, ये सब अपने समाज को तोड़ने के बहाने हैं। करते रहिए आप लोग जात-पात की बात, और जो टोपी वाले हैं, वे अपनी संख्या बढ़ा रहे हैं और हम आपस में बँट रहे हैं,” मास्टर संजय मिसिर बोले।

इस बीच चिलम एक हाथ से दूसरे हाथ तक घूमता रहा। घूमकर चिलम फिर मास्टर संजय मिसिर के पास आया। उन्होंने चिलम को अपने हाथों में लिया और “जय भोले शंकर” कहकर चिलम को इतनी ज़ोर से खींचा कि उसमें लौ जल उठी और आस-पास कुछ लम्हों के लिए रोशनी फैल गई।

धुआँ मुँह से छोड़ते हुए, मास्टर संजय मिसिरबोले, “याद रखिए, नेताजी ठीक कहते हैं कि बाँटिएगा तो कटिएगा।”

मास्टर संजय मिसिर इतना ही कहकर चुप नहीं रहे, बल्कि अपने हाल के दिनों में नेताजी के आवास पर हुई एक मुलाक़ात का ज़िक्र करने लगे। “हमारे मंत्री जी ने साफ़ कहा है कि जहाँ भी हमारे मंदिर तोड़े गए हैं, वहाँ हम मंदिर बनाएँगे, चाहे प्यार से बनें या लाठी के ज़ोर पर। और अब हम डरने वाले नहीं हैं। याद रखिए, पाड़े, यह पहले का देश नहीं है। आज हमारा समाज जाग गया है और उसे जगाने वाली सरकार आ गई है। आज उसी जागरण के कारण वह मंदिर तैयार हुआ है। यही वजह है कि कल हर भक्त मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाएगा और प्रभु का दर्शन करेगा। जिनको बिरयानी की फ़िक्र है, वे घर में चुपचाप चादर तानकर लेटे रहें या फिर कल छाती पीटकर मातम मनाएँ।”

इसी बीच, मंत्री जी के प्रतिद्वंद्वी और पिछली बार मात्र पाँच सौ वोटों से चुनाव हार चुके गजेंद्र चौबे के एक समर्थक, भोला तिवारी बोले, “देखिए संजय भाई, हम सब आपका आदर करते हैं। यह आपको शोभा नहीं देता कि आप विपक्षी पार्टियों के योगदान को भुला दें। मंदिर बनवाने का सारा श्रेय मंत्री जी को देना ठीक नहीं है। इस काम की पहल तो हमारी पार्टी ने सालों पहले की थी। मंदिर के हक़ में कोर्ट में मामला भी हम ही लोग ले गए थे। उस वक़्त तो मंत्री जी को कोई जानता भी नहीं था।”

भोला तिवारी की बातों को सुनकर कुछ लोगों ने हामी भरी, और फिर वे तक़रीर के मूड में आ गए: “आज अगर गजेंद्र बाबू चुनाव हार गए हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि उनका योगदान मंदिर निर्माण में किसी से कम हो गया है। दरअसल, हमारे समाज के जागरण का काम गजेंद्र बाबू से ज़्यादा किसी ने नहीं किया है। वह किसी भी पार्टी में हों, उनके दिल में हमेशा हमारे धर्म और समाज का हित ही सर्वोपरि रहा है। जब भी माहौल बिगड़ा, उन्होंने लाल-झंडे धारियों की तरह टोपी वालों को खुश करने की कोशिश नहीं की, बल्कि अपने समाज के साथ खड़े हुए। आप इस बात को भी तो बोलिए।”

“बात में दम तो है,” वहाँ बैठे शंभु सुकुल ने कहा।

यह सुनकर भोला तिवारी का जोश और बढ़ गया, और वे अधिक आत्मविश्वास के साथ बोलने लगे: “संजय भाई, यह मत भूलिए कि आज ही के न्यूज़पेपर में उन्होंने मंदिर उद्घाटन का स्वागत किया है और कहा है कि वे अपने समर्थकों के साथ ज़िला मुख्यालय जाएँगे और मंदिर के प्रांगण में कीर्तन-भजन करेंगे। इसलिए मंत्री जी को सारा क्रेडिट देना कहीं से उचित नहीं है।”

यह सारी बातें सुनकर मास्टर संजय मिसिर बोले: “देखिए, आप जिनका खाते हैं, उनका गाते भी हैं। आप कुछ भी कह लीजिए, काम तो मंत्रीजी ने ही किया है। अगर ऐसा नहीं होता, तो मंदिर पहले के दौर में ही बन जाता। देखिए, आज हमारा समाज जग गया है, इसलिए बहुत लोग अपना सुर बदल रहे हैं।”

बहस काफ़ी लंबे वक्त तक चली। रात भी काफ़ी हो चुकी थी। बरगद के पेड़ के नीचे की मजलिस आज के लिए ख़त्म हो गई। सभी लोग अपने-अपने घर चले गए।

जब सुबह हुई, तो पाड़े ने देखा कि गाँव में लोगों को मंदिर के उद्घाटन में ले जाने के लिए मंत्रीजी ने गाड़ियाँ भेज दी हैं। मास्टर संजय मिसिर भी लोगों से मंदिर उद्घाटन में जाने के लिए कह रहे थे। कुछ लोग तो जाने के लिए तैयार हो गए, मगर बहुत से लोग यह कहकर टाल-मटोल कर रहे थे कि उन्हें मज़दूरी करने जाना है।

मास्टर संजय मिसिर को लगा कि अगर बस की सीटें नहीं भरेंगी, तो उन्हें डाँट पड़ेगी। इसलिए उन्होंने मंत्रीजी के निजी प्रतिनिधि को सारा मामला बता दिया। फिर निजी सचिव ने उन्हें फोन पर कुछ सलाह दी और कहा कि एक व्यक्ति कार से उनके पास थोड़ी देर में पहुँच रहा है।

कार की डिक्की में पूड़ी, लड्डू और सब्ज़ी के पैकेट थे। मास्टर हेमंत मिसिर घर-घर जाकर कहने लगे कि मंदिर के उद्घाटन पर जाने के लिए खाना मिलेगा और हर व्यक्ति को दो सौ रुपये भी मिलेंगे।

कुछ लोगों ने सोचा कि मज़दूरी में भी दो सौ रुपये मिलते हैं, तो अगर बस में बैठकर शहर घूमने और पूड़ी खाने के लिए इतने ही पैसे मिल रहे हैं, तो इसमें क्या बुरा है। देखते ही देखते चार बसें पूरी तरह भर गईं, और मास्टर संजय मिसिरने हर सीट पर बैठे व्यक्ति को सौ-सौ के दो नोट दे दिए। बस फिर शहर के लिए रवाना हो गई।

इधर लालबहादुर पाड़े ने लाल-झंडे वाली पार्टी के अपने सीनियर लीडर को फोन किया और कहा कि मंदिर उद्घाटन के दिन एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया जाए। अपनी दलील में वे कहते हैं, “साथी, नफ़रत काफ़ी बढ़ गई है। लोगों को धर्म के आधार पर बाँटा जा रहा है। हमें लोगों को नफ़रती ताक़तों के ख़िलाफ़ एकजुट करना होगा। कमज़ोर तबकों के साथ खड़ा होना होगा।”

पाड़े की बात सुनकर पार्टी मुख्यालय के सीनियर नेता ने कहा, “साथी, आप शांत हो जाइए और आप परेशान न हों। हम इसका जवाब चुनाव में देंगे।”

“मगर चुनाव के इंतज़ार में हम समाज को जलते हुए तो नहीं देख सकते?” पाड़े ने जवाब दिया।

यह सुनकर सीनियर लीडर ने कहा, “शांत हो जाइए, साथी। जोश में होश नहीं खोना है। यह बात याद रखिए कि आज मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा काफ़ी बढ़ गई है। इसलिए हमें कोई भी ऐसा काम नहीं करना है जिससे जन-मानस हमसे नाराज़ हो जाएँ। अभी वक़्त फूँक-फूँक कर क़दम रखने का है। हमें लोगों की आस्था का सम्मान करना है; नहीं तो जब चुनाव आएगा, तो हमारे विरोधी हमें धर्म-विरोधी, समाज-विरोधी और देश-विरोधी बताकर बदनाम करेंगे।”

यह बात सुनकर लालबहादुर पाड़े फ़ोन पर ही ज़ोर से चिल्लाने लगे, “समझ गया आपको। लाल परचम की आड़ में आप लोग अपना चेहरा छुपाए हुए हैं। समझ गया आप लोगों को। अब मुझे शर्म आती है कि मैं आप लोगों के साथ क्यों जुड़ा और काम किया।” यह कहकर पाड़े ने अपना फ़ोन काट दिया और वहीं ज़मीन पर बैठ गए। उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया था और उन्हें सब कुछ लुटा हुआ नज़र आ रहा था।

अभय कुमार : लेखक

Related Articles

ISSN 2394-093X
418FansLike
783FollowersFollow
73,600SubscribersSubscribe

Latest Articles