Home Blog Page 175

रचना भंडारी की दो कवितायें

रचना भंडारी


रचना भंडारी पत्रकारिता , अध्यापन , फिल्म और टेलीवीजन लेखन में सक्रिय रही हैं . 15 वर्ष तक अध्यापन के बाद विभिन्न टी वी चैनलों के लिए लिखती रही हैं . आजकल स्टार प्लस नेटवर्क में एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं . इनसे rachanaa68@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

रचना भंडारी की इन दो कविताओं के अच्छे आदमी और अच्छी औरत हमारे आस -पडोस में रहते हैं , हमारे  घरों में रहते हैं , हम -आप भी हो सकते हैं ऐसी अच्छी औरत , अच्छे आदमी . अच्छी औरत पितृसत्तात्मक अनुकूलन की एक अच्छी कविता है , वही अच्छा आदमी पितृसत्तात्मक समाज के प्रतिनिधि पुरुष की.

अच्छी औरत 

अच्छी औरत  फ़रमाइश नहीं करती,
मानती है एहसान  कि  तुमने उसे अपना अमूल्य समय दिया .
अच्छी औरत  कभी तुम्हें इंतज़ार नहीं कराती,
क्योंकि  उसे सीखना पड़ता है  कि तुम्हारा मुट्ठी -भर समय
उसके बरसों के इंतज़ारसे कहीं बढ़कर है.

अच्छी औरत नहीं जताती अपना क्षोभ
कि मुश्किल से बनाया तुम्हारा मूड खराब न हो जाए ,
क्योंकि  यदि तुम उसे कोरा छोड़ कर चले गए तो उसके हिस्से आएगा
फिर एक  इंतज़ार… बेहद —लम्बा —इंतज़ार …   !

अच्छी औरत बिन-मांगे सामने रख देती है अपना बटुआ कि
तुम्हें मांगकर छोटा न होना पड़े…
पढ़ लेती है तुम्हारी मौन फरमाइश और बांच लेती है तुम्हारी  ख़ामोश ज़रूरत …
अच्छी औरत की ख़ामोशी किसी को सुनाई नहीं पड़ती…
उसकी चीखें भी नहीं…ना ही उसका बिफरता रुदन

अच्छी औरत मांगे भी तो उसे कोई देता नहीं एक  क्रोसीन या एक थपकी..
बिन-मांगे  मिलने की राहत समझती है अच्छी औरत.
अच्छी औरत जीती है तुम्हारे एक जन्मदिन से अगले जन्मदिन तक,
दिन-ब -दिन, लम्हा- दर- लम्हा
तब भी जब तुम उसके जन्मदिन भूलने का रिवाज़ निभाते जाते हो
एक अकड़-भरी बेशर्मी के साथ ।

अच्छी औरत नहीं थकती इतनी  ज़्यादा  अच्छी होने से…
वह  नहीं थकती तुम्हारे इतने ज़्यादा मतलबी  होने से …
तुम्हारी औरत होना उसकी  तक़दीर  है…और अच्छी होना उसकी नियति।

अच्छी औरत नहीं छोड़ती महकना तुम्हारी गंध से
तब भी जब तुमसे आती है बहकती महक उसकी अपनी सहेली की।
अच्छी औरत पोसती जाती है तुम्हारे अधूरे -से पौरुष को
तब भी जब तुम लाख कोशिश करके भी उसे पूरा नहीं  कर पाते
और अपनी औनी-पौनी मर्दानगी की रसीद मांगते हो
उसकी कोख की क्यारी में अपने बीमार बीज डालकर

आसान नहीं है अच्छी औरत को अच्छा मानना …
उसकी अच्छाई को आंकना …
उसकी औरतपन  को बूझना…
उसकी रातों को मापना…
उसकी हरारत को भांपना ..
उसकी करवटोंको सहलाना..
उसकी बेज़ुबान आहों से नुक्त  होना.
उसकी नज़रों कोसहना…

अच्छी औरत के पास नहीं है सामर्थ्य तुम्हें वैसे ही दुत्कार देने की
जैसे तुम निशब्द उसे दुत्कारते हो
और वह हिसाब करती है किसका गला घोंट देने से उसे कम तकलीफ होगी
अच्छी औरत की प्राण-वायु हो तुम —
तुम्हारा, अपना या अपनी अच्छाई का ।

अच्छी औरत जीती जाती है अपना अच्छी औरत होने का शाप
और मांगती जाती है तुम्हारे शतायु होने की दुआ .
अच्छी औरत  करती है इंतज़ार यम से मोल-भाव करने का
और इस जनम में तुम्हारे बिना जीना सीखने की सलीब उठाने का वरदान पाने का।।

अच्छा आदमी

अच्छा आदमी नहीं भूलता ६ हफ्ते बाद की मीटिंग की तारीख़,
अच्छा आदमी याद नहीं रख पाता ६ बजे मिलने का वादा…
अच्छे आदमी को अच्छा लगता है तोहफ़े पाना,
अच्छे आदमी को कोफ़्त होती है तोहफ़े जैसी गैर-ज़रूरी चीज़ों पर पैसे खर्च करना..
अच्छे आदमी को नागवार गुज़रता है उसीका कहा उसे याद दिलाना …
अच्छा आदमी सहज भूल जाता है अपना कहा सच कर दिखाना
अच्छा आदमी चोट करता है तुम्हारे मन पर,
और विवाद करता है तुम्हारे मस्तिष्क से…
अच्छा आदमी बुरा मान कर ख़ामोशी अख्तियार कर सकता है,
अच्छी औरत तभी अच्छी है जब रूठना भूल कर सिर्फ़ मनाना  सीखे।

अच्छे आदमी का अभिमान होता है उसके कद से बड़ा उसके भीतर छिपी बैठी छोटी-सी अच्छाई से कहीं बड़ा
अच्छा आदमी नहीं देखता कटु शब्दों के पीछे लुकी मिठास,
नहीं याद रखता फ़टकार में लिपटा सरोकार…
अच्छा आदमी भूल जाता है तुम्हारी हर स्तुति, हर अनुराग…
अच्छा आदमी जानता है तुमको खुद से वंचित करने का असर,
तुम्हारी धमनियों में सीसा भरकर जीतने का गुर…
अच्छा आदमी तुम्हें हराकर जीतने का सुख लेता है
और तुम वो सब फिर-फिर हार जाती हो जो बहुत अरसे पहले अच्छे आदमी को अर्पण करके तुमने जीता था.
अच्छे आदमी को सुख मिलता है तुम्हें तकलीफ़ में देख कर, बार-बार अपनी गरिमा को इक एहसान जता कर…

अच्छा आदमी तरस खाता है तुम पर,
और तुमको जब ख़ुद पर और तरस नहीं आता तो तुम्हें नफ़रत होती है अच्छे आदमी से आनेवाली हर राहत की याद से भी…
अच्छे आदमी की तकलीफ़ तुम्हारी सतही टीस से कहीं ज्यादा गहरी चीज़ है…
उसकी ऊंची अटारी तक नहीं,
केवल उसके क़दमों तक तुम्हारे मलिन हाथ पहुँचते हैं…

क्या होगा अगर अच्छा आदमी नहीं लेगा तुम्हारी ख़बर ??
ज़िन्दगी में कुछ रौशनी कम रहेगी न…
बस, वो एक दीया, वो मुट्ठी-भर धूप का अलाव, नहीं गरमाएगा तुम्हारे वजूद को — बसइतना ही न ?
सर्द पड़ गयी चाहत में ख़ुद को समेटे, अकेले ठिठुरने की आदी हो न तुम..?
अच्छा आदमी मर जायेगा मगर अपने अभिमान का कलफ़ ओढ़े रहेगा…
तब भी जब उसकी पीठ से मिन्नतें करते -करते तुम्हारी कोरें भीग जाएँ …
अच्छा आदमी तुम्हारा एक कौर खाकर थूक सकता है
और तुम कटे हुए होठों पर हंसी सजाकर पूछती हो –
कुछ और बना दूं? कुछ और बन जाऊं ?

अच्छा आदमी किवाड़ भेड़ कर जा सकता है
अपना मनपसंद कुछ चखने
तुम्हें पसारा समेट कर, खुद को, सेज को सजा कर
फिर तकनी है राह, ओढ़ लेनी है समर्पण वाली मुस्कान…
टुकड़े -चिंदे जमाकर गुदड़ी सीने में कुशल हो न तुम ?
सिर्फ़ इस बात से तुष्ट रहो — कि वो जो पावन, मनभावन, निशब्द, निस्वार्थ, निश्छल कुछ था…
उसको दुलारता, उसके पुरुषोचित अभिमान को पोसता , उसे ह्रदय से सींचता  ….
उसके बिना अच्छा आदमी भी कहीं गहरे, अकेले, यक़ीनन सिहरता होगा, कहीं बहुत गहरे, बिखरता होगा…
अपने हर मंतव्य पर अटल, हर गंतव्य तक सीध में चलता,

तुम्हारे होने-न होने से परे…
दुनिया के सामने –
अपनी हर कामयाबी का श्रेय तुम्हें देता
अपनी उपलब्धियों को तुम्हें समर्पित करता अच्छा आदमी
कितना नम्र है, नरमदिल है, मधुर है, उदार है…
अच्छा आदमी हमेशा सही है, सदा मुक्त  है !!

जच्चा

अनिता भारती


अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं – खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. स्त्रीकाल का दलित स्त्रीवाद अंक ( अंक देखने के लिए दलित स्त्रीवाद अंक पर  क्लिक करें ) इन्होंने अतिथि सम्पादक के रूप में सम्पादित किया है और दलित स्त्रीवाद की सैद्धंतिकी की इनकी एक किताब, समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध प्रकाशित हो चुकी है.  भी प्रकाशित है. कविता , कहानी के इनके अलग -अलग संग्रहों के अलावा बजरंग बिहारी तिवारी के साथ संयुक्त  सम्पादन में दलित स्त्री जीवन पर कविताओं , कहानियों के संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. अनिता भारती दलित स्त्री जीवन और आलोचना की किताब भी सम्पादित कर रही है. इनसे इनके मोबाइल न.  09899700767  पर सम्पर्क किया जा सकता है.

(अनिता भारती की यह कहानी हम सब के आस -पास रोज घटती है. कहानी में कुछ अचानक या अविश्वसनीय घटित होने के आस्वाद वाले लोगों के लिए यह कहानी नहीं है. इसे छोटी कहानी को पढें , क्योंकि हमारी सम्वेदनायें हमारी अपनी ही व्यस्तता के साथ मरती जा रही हैं. इसे पढें कि रुटिन में चलती जिन्दगी में स्त्री साख्य और एक दूसरे से जुडी गहरी सम्वेदना कैसे स्त्रियों का संसार रचती है. हमारे आस -पास रोज घटित होती कहानियों में से एक बीन ली गई कहानी है यह. )

मैं बस अड्डें से मुद्रिका मे शालीमार बाग जाने के लिए चढ़ी। एक तो गर्मी, ऊपर से बस खचाखच यात्रियों से भरी हुई। पूरी बस में हाय-तौबा सी मची हुई थी। अगला बस स्टॉप आते ही, बस में एक औरत चढ़ी। उसे औरत कहूं या लड़की ?… उसे लड़की ही कहूँगी। 15-16 साल की रही होगी। रक्तहीन पीला चेहरा, बाल बिखरे हुए, गोद में मैले तौलिये में लिपटा कमजोर सा बहुत ही नन्हा सा बच्चा, क्या पता शायद नवजात ही हो। लड़की बस में कभी अपने को संभालती, तो कभी बच्चा, कभी अपनी साड़ी। उसका कद इतना ऊँचा भी नही था कि वह बस का डंड़ा पकड़ सके, फिलहाल तो उसके दोनों हाथ बच्चा पकड़े होने के कारण व्यस्त थे। जब भी ड्राईवर ब्रैक लगाता, वह लड़की कभी इधर सवारियों पर गिरती, कभी उधर। अपने आप को संभालते-संभालते उसके मुँह से ना जाने क्यों कराह सी निकल जाती।

एक तो बिखरे हुए बाल, मैले अस्त-व्यस्त कपड़े फिर गरीब और ऊपर से गोद में नन्हा बच्चा। बस के लोग उसे घूर-घूर कर देखने लगे, उनकी निगाहों से लग रहा था मानों उन्हें इस बात पर क्रोध हो कि यह बस में क्यों चढ़ी ? क्या बस इन जैसे गन्दे घिनौने लोगों के लिए बनी है ?   तभी ड्राईवर ने जोर से ब्रैक लगया। लड़की दर्द से चिहुँक उठी, शायद पास खड़े आदमी ने उसका पैर दबा दिया। लड़की कातर स्वर में, उस अधेड़ से दिखने वाले आदमी से बोली – “अंकल, जरा पैर हटा लो, मेरा पैर दब रहा है।”

अंकल संबोधन सुन उस आदमी की त्यौरियां  चढ़ गई, वह गुर्राकर बोला – “देखती नहीं बस में कितनी भीड़ है ? क्या मैं जानबूझकर तेरे पर पैर रखकर खड़ा हूँ ? खुदको बस में खड़े होने की तमीज नहीं, कभी इधर गिरती है कभी उधर !” आदमी की बात से लड़की का मुँह लटक गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह बस में बच्चा संभाले या कपड़े ? ऊपर से बगलवाले महाशय जी ओर सटे जा रहे थे !

महिला सीट पर बैठी महिलाएँ सिर झुकाए बैठी थी या फिर खिड़की से बाहर झांक रही थी। भरी बस में किसी को सीट देने का मतलब है खुद भारी असुविधा में खड़े होकर घर जाना। ऐसी असुविधा कौन मौल ले ? तभी लड़की से थोड़ी दूर खड़े साधारण से दिखने वाले आदमी ने चुटकी ली – “अजी ऐसा ही भोला मुंह बनाकर जेब काटती है, देखा नहीं गोद में बच्चा भी है ? इनके गिरोह हैं गिरोह। इनसे पंगे मत लेना, चाकू सटा देती है बगल में और जेब कब कटी पता भी नहीं चलेगा।”

   उसकी यूँ हंसी उड़ते देख मेरा दम सा घुटने लगा। मुझे लगा इनकी नज़र में हर वो औरत जेब कतरी है जो गरीब है, बेबस है। मैंने उस झूठी बात घड़ने वाले को घूरकर देखा और बदतमीजी से बोली – “तेरी जेब कट गई क्या ? क्या सबूत है तेरे पास कि ये जेब काटने बाली है, बोल ?”

शायद उस आदमी को यह उम्मीद नहीं थी कि उसकी बात इस बुरी तरीके से काटी जायेगी, उसे लगा होगा कि सब हाँ में हाँ मिलायेगे। तभी वह अधेड़ सा आदमी लगभग घूरते हुए सा उस लड़की को देखकर मुझसे बोला – “आप तो अच्छे घर की लगती, आपको इनका क्या पता ? अजी ये दिन में बच्चा गोद में लेकर जेब काटतीं हैं और शाम को इसी बच्चे को सड़क पर फेंककर सज-धज कर खड़ी हो जायेंगी।

 उस आदमी की बात सुन मेरे साथ-साथ बस में बैठी एक वृद्धा को भी गुस्सा आ गया। वह आदमी को डाँटते हुए बोली – “बेटे ऊँचे बोल मत बोल, तू भी बाल-बच्चे वाला होगा, ये तेरी लड़की के बराबर ही होगी।”  फिर वह बड़ी मुश्किल से सीट पर एक तरफ खिसकते हुए लड़की से अपनत्व भरे स्वर में बोली – “बेटी इतने छोटे बच्चे को लेकर घर में बैठ, देख तेरे साथ साथ यह भी बस मे घक्के खा रहा है।”

वृद्धा की अपनत्व भरी बात सुन लड़की की आँखे छलछला आई। लड़की रूआंसे स्वर में बच्चे की ओर इशारा करते हुए बोली – “ये अभी पाँच दिन का है, मेरी आज ही अस्पताल से छुट्टी हुई है। इसके पापा को हमें लेने आना था। मैं सुबह से अस्पताल के ग्रांऊड में इंतजार करती रही। मुझे लगा कि अब वे नहीं आएंगे, और अभी मुझसे ठीक से बैठा नहीं जा रहा है, तो में अपने आप हिम्मत जुटा कर घर जा रही हूँ।” लड़की हाथ में दबे एक मैले कुचेले पन्नी के लिफाफे में से कुछ कागज निकालकर दिखाती हुई बोली – “देखो, ये मेरी छुट्टी के कागज हैं और ये इसका जन्म कार्ड।”

वृद्धा के मुंह से अकस्मात शब्द निकले – “अरी तू तो जच्चा है। जंचकी में तो गाय-भैंस कुत्ते-बिल्ली तक को लोग सम्मान और दुलार देते है, और फिर तू तो मानुष जात है। और तेरी ये गत !” वृद्धा की आँखें नम हो गई।

अब मुझसे से और सहना मुश्किल हो गया था, मैं सीट पर जानबूझकर आंख बंद किए बैठे आदमी से गुस्से में बोली- “कब तक जानबूझकर आँखें बंद किए बैठा रहेगा, उठ, देख, इसके लिए खड़ा रहना भी कितना मुश्किल है ? यह महिला सीट है कम से कम यह जगह तो हमारी है।”

मेरी कड़क आवाज सुन सोता हुआ आदमी एकदम घबराकर उठ गया। उसकी इस हरकत पर मैं और वृद्धा दोनों मुस्कुरा उठी।

स्त्री-विरोधी लेखन दलित लेखन नहीं हो सकता

( उर्मिला पवार मराठी कथा साहित्य में स्त्री अभिव्यक्ति के रूप में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं.   ‘आमची इतिहास गढे़ला’ (इतिहास संबंधी पुस्तक) तथा ‘आयदान’ (आत्मकथ्य) के अतिरिक्त इनकी 9 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है, जिनका अनुवाद अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में हुआ है।  युवा आलोचक तथा  स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के सदस्य धर्मवीर सिंह ने उनसे दलित -लेखन , दलित राजनीति और दलित स्त्रीवाद  पर ख़ास बातचीत की है ।  )

क्या केवल दलितों द्वारा ही लिखे गये साहित्य को दलित-साहित्य माना जाए या गैर दलितों द्वारा दलित जीवन पर लिखे गये साहित्य को भी दलित-साहित्य की श्रेणी में माना जा सकता है? जैसे हिन्दी में प्रेमचन्द, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, गिरिराज किशोर आदि गैर-दलितों ने दलित जीवन पर जो कुछ लिखा है?

उर्मिला पवार

देखिए! किसी भी साहित्य को जांचने- परखने की कुछ खास कसौटियां होती हैं। दलित साहित्य के संदर्भ में यह कसौटी आम्बेडकरी चेतना की मौजूदगी है। यदि किसी दलित द्वारा लिखे गये साहित्य में भी स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्त्व की चेतना नहीं है तो मैं उसे दलित साहित्य नहीं मानती। रही गैर-दलितों द्वारा लिखे गये साहित्य की बात तो मैं यह मानती हूं कि दलित जीवन का जितना कटु, ठोस एवं यथार्थ अनुभव खुद दलित के पास होगा, उतना किसी गैर-दलित के पास नहीं हो सकता। लेकिन प्रेमचन्द, नागार्जुन आदि को पूर्णतः खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने दलित जीवन को अपने साहित्य का विषय बनाने का साहस किया, यहां तक अन्य सवर्ण लेखकों की दृष्टि पहुंचती ही नहीं थी।

समकालीन स्त्रीवाद  और दलितवाद दोनों ही से एक भिन्न एक अलग श्रेणी की मांग रख रहा है, ‘दलित स्त्रीवाद’। आप इस अवधारणा से कहां तक सहमत हैं?

भारतीय संदर्भों में अगर देखें तो स्त्रीवादी आंदोलन और उससे जुड़ी संस्थाओं का नेतृत्व सवर्ण-स्त्रियों के हाथ में रहा है। इसलिए वहां दलित-स्त्री की मुक्ति के मुद्दे केन्द्र में नहीं हैं। जातिवाद की घृणित मानसिकता यहां भी मौजूद है। दूसरी ओर दलितों का मर्दवाद है , इसलिए दलित-स्त्री को आज दोनों ही से पृथक ‘दलित-स्त्रीवाद’ की बात करनी पड़ रही है जो एकदम जायज है।

दलित-स्त्री लेखन की मजबूत उपस्थिति दलित साहित्य के भीतर स्वीकार नहीं की जा रही है जबकि इस  समाज की औरतें अधिक स्वाधीन रही हैं?

इस स्थिति का जिम्मेवार दलित पुरुषों के अवचेतन में बैठा हुआ मनुवाद है। इसलिए अनेक बार स्त्री के साथ वह भी वही व्यवहार करता है जो एक सवर्ण पुरुष करता है। जबकि प्रत्येक भारतीय भाषा में दलित महिला की एक जोरदार सृजनात्मक उपस्थिति है। अब उनकी इस आवाज़ को दबाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है। यदि दलित पुरुष अपने ही आन्तरिक सवालों से टकराने से बचना चाहता है , तो वह अब संभव नहीं है।

अनेक विचारकों का सोचना है कि दलित साहित्य को अब अधिक व्यापक नजरिये से देखने की जरूरत है। आदिवासियों, प्रत्येक वर्ण की स्त्रियों तथा वर्णवादी उत्पीड़न के शिकार सभी वर्ग के लोगों को इसमें शामिल किया जाना चाहिए। जैसा कि राजेन्द्र यादव सभी वर्ण की स्त्रियों को दलित मानते थे?

वर्णवाद से मुक्ति के संघर्ष में ऐसा बहुत कुछ हो सकता है जो सामूहिक या कॉमन हो। लेकिन जाति का सवाल भारत में बड़ा अहम् सवाल है, इसीलिए हो सकता है कि थोड़ी दूर संघर्ष में सब साथ चलें और फिर किसी मुद्दे पर वे अलग हो जायेंगे । खैरलाजी जैसी भयानक दर्दनाक घटना के खिलाफ मैं लड़ी हूं। जेल भी गई हूं। जो सवर्णवादी मीडिया और स्त्रीवादी संस्थाएं दिल्ली दुष्कर्म का विरोध कर रही थीं , वे उसमें साथ क्यों नहीं आई? समझ रहे हैं प्रतिरोध का सवर्ण चरित्र, घटनाओं के चुनाव में ही है . फिर  राजेन्द्र जी ने सब स्त्रियों को दलित कहा था , तब सवर्ण स्त्रियां ही क्या इसके विरोध में नहीं थीं।

किसी भी उत्पीड़ित या वंचित अस्मिता से यह अपेक्षा रहती है कि वह दूसरी निकटस्थ अस्मिताओं के साथ अधिक संवेदनशीलता से व्यवहार करे। हिन्दी दलित साहित्य की अगर इस संदर्भ में बात की जाए तो अनेक स्थानों पर गहरी निराशा हाथ लगती है। सवर्ण समाज की स्त्रियों को प्रतिशोध का निशाना बनाये जाने को आप किस रूप में देखती है? जबकि छिटपुट ही सही, इस रवैये के प्रति हिन्दी दलित-स्त्री लेखिकाओं ने अपना प्रतिरोध भी दर्ज किया है?

देखिए दलित भी व्यवस्था के मारे हैं। वह व्यवस्था वर्णवाद की देन है। स्त्री भी एक व्यवस्था की मारी है। वह व्यवस्था पितृसत्ता की देन है। अब अगर कोई दलित पुरुष उस व्यवस्था के प्रतिरोध तथा अपने साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय का बदला लेने के लिए अगर स्त्री को टार्गेट करता है तो इस तरह के लेखन को मैं तो दलित लेखन ही नहीं मानती हूं। इस प्रवृत्ति का पुरजोर विरोध सभी को करना चाहिए।

भारतीय संदर्भ में ‘परिवार’ नाम की संस्था की संरचना ब्राह्मणवादी मूल्यों के फ्रेम में ही है जो स्त्री के शोषण का आधार भी है। विवाह, यौन शुचिता, नैतिकता आदि स्त्री-विरोधी अवधारणाओं का आधार परिवार ही रहा है, जबकि दलित साहित्य ने अनेकों स्थानों पर परिवार के इस मॉडल का महिमा-मंडन किया है। क्या यह यथास्थिति को बनाये रखने का प्रयास नहीं है?

मैं मानती हूं कि ‘परिवार’ स्त्री जीवन के लिए बंधन है, पिंजरा है , जिसकी दीवारों को जरूर टूटना चाहिए। लेकिन इसका कोई अच्छा विकल्प नहीं है हमारे पास। इसलिए हमें ‘परिवार’ संस्था के अधिकतम जनतांत्रीकरण के लिए संघर्ष करना चाहिए,  जहां रिश्तों में किसी तरह की वरीयता का कोई अनुक्रम न हो। जहां किसी एक के महत्तर और दूसरे के कमतर की स्थिति न हो।

हिन्दी दलित साहित्य के संदर्भ में अक्सर कहा जाता है कि यह ‘मराठी दलित साहित्य की कलम है’। आप इस धारणा से कहां तक सहमत हैं? और इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह भी है कि विविध भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्त दलित चेतना से मराठी दलित साहित्य किन अर्थों में विशिष्ट है?

पहली बात तो यह है कि महाराष्ट्र जनान्दोलनों की जमीन रहा है। जोतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और बाबा साहब आम्बेडकर के आंदोलनों का स्थान है यह। इन आन्दोलनों से पैदा हुई चेतना यहां के हरेक दलित में मौजूद है। यह अनायास नहीं है कि गांधी गुजरात से होने के बाद भी सेवाग्राम, वर्धा से आन्दोलन शुरू करते हैं। इन जनान्दोलनों की सीधी अभिव्यक्ति है-मराठी दलित साहित्य। साहित्य और आन्दोलनों का इतना सीधा संबंध अन्य भारतीय भाषाओं में नहीं है, हिन्दी में भी नहीं।

दलित दर्शन में आजकल धर्म की भूमिका को लेकर बहुत से सवाल उठ रहे है। यहां तक कहा जा रहा है कि बाबा साहब ने एक क्षत्रिय का धर्म अपनाकर बहुत बड़ी भूल की। दलित चिंतक दलित धर्म की खोज ‘आजीवक’ धर्म के रूप में कर रहे हैं तथा इस धर्म की खोज को दलित चिंतन की उपलब्धि बता रहे हैं। आपके मत में दलित धर्म की अवधारणा क्या है? तथा एक दलित स्त्री के रूप में जीवन में ‘धर्म’ की भूमिका को किस रूप में देखती है?

धर्म की भूमिका किसी भी स्वस्थ समाज एवं राष्ट्र के निर्माण के तौर पर नकारात्मक ही रही है। धर्म घीरे-घीरे सम्प्रदायवाद एवं वंशवाद में परिणित होकर कट्टरता को ही फैलाता है। वैज्ञानिक सोच को खत्म करता है। स्त्री के लिए तो वह ओर भी खतरनाक होता है। राज्य के नियमों के साथ धर्म भी स्त्री के आचरण के लिए भेदभाव पूर्ण एक संहिता तैयार कर देता है। इसलिए धर्म वही अच्छा है जो समता, न्याय और बंधुत्त्व का पक्षधर हो और इस दृष्टि के उपयुक्त बौद्ध धर्म के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। बाबा साहब ने बहुत सोच-समझकर धर्मान्तरण किया था और इस विकल्प (बौद्ध धर्म) को अपनाया था। ‘आजीवक’ की बात मुझे समझ नहीं आती; वह दलितों का धर्म नहीं हो सकता।

दलित स्त्रीवादी लेखन पुरुष लेखन की तुलना में अधिक सृजनात्मक नज़र आता है। दलित स्त्री लेखन के शीर्षकों में ही इस बात को देखा जा सकता है। जैसे तिरस्कृत, जूठन, अपने-अपने पिंजरे की तुलना में आयदान (फूलों का टोकरा), हमारा जीवन, एक कदम मेरा भी कितने सृजनात्मक एवं सकारात्मक है। दलित स्त्री-लेखन की इस सृजनात्मकता को आप किस रूप में देखती हैं?

स्त्री सृजन का ही दूसरा नाम है। बच्चा जनने से लेकर, घर की हर सजावट में, खाना बनाने से लेकर तमाम दूसरे कामों में वह हमेशा कुछ नया रच रही होती है। इसलिए सृजनशीलता स्त्री स्वभाव की  बुनियादी विशेषता है जो बच्चे को लोरी सुनाने से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास तक में अपनी अभिव्यक्ति पाती है। दूसरा दलित स्त्री के श्रम का सौंदर्य भी उसकी इस सृजनात्मकता में जुड़ता है जो उसे और गहरा और सकारात्मक बनाता है। आपने बहुत अच्छा सवाल रखा इस ओर मेरा भी ध्यान नहीं गया था, मैं भी कुछ और सोचूंगी।

इन्हें  भी देखें :

फैंसी स्त्रीवादी मुद्दों में जाति मुद्दों की उपेक्षा
स्त्रीवाद के भीतर दलित स्त्रीवाद
डा अम्बेडकर और स्त्री अधिकार
डा अम्बेडकर का मूल चिंतन है स्त्री चिंतन

दलित लेखन केवल लेखन नहीं आंदोलन भी है। जिसका उद्देश्य है जाति-मुक्त समता मूलक समाज की स्थापना करना। हम एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें जब यह सपना हकीकत हो जाएगा। तब दलित साहित्य की प्रासंगिकता क्या रहेगी? मेरा मतलब कालजयी साहित्य से है जैसे शेक्सपीयर, मिल्टन, प्रेमचन्द, गोर्की,टालस्टाय, चेखव आज भी पढ़े जाते हैं? क्या शाश्वत साहित्य का सवाल दलित चिंतन के केन्द्र में है?

दलित लेखन मानवतावादी लेखन है। मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता, उसकी बराबरी और न्यायोचित अधिकार की मांग का साहित्य है यह! क्या स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के ये मूल्य कभी अप्रासंगिक हो पायेंगे? यदि नहीं तो; दलित- साहित्य भी नहीं। जो मानवतावादी है उसका केवल नाम बदलेगा, मूल्य नहीं। समय की प्रवाहमान धारा में दलित- साहित्य में भी तथाकथित शाश्वत साहित्य से उच्च कोटि का साहित्य हमारे सामने आयेगा।

दलित साहित्य के वर्तमान परिप्रेक्ष्य को आप किस रूप में देखती हैं?

साहित्य में आत्मकथाओं के रूप में जगह बनाने वाला दलित साहित्य आज साहित्य की प्रत्येक विधा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुका है। मनुवाद से लड़ने में उसे गहरा संघर्ष करना पड़ा है। समय के साथ दलित साहित्य ने अपेक्षित प्रौढ़ता भी हासिल की है। कलात्मक रूपों में उसकी अपनी आभा है। कला के परम्परागत सौंदर्यशास्त्र को प्रतिस्थापित कर उसने अपना एस्थेटिक्स विकसित किया। इतिहास और परंपराओं के छद्म को उसने उजागर किया है। नये-नये लेखक अपनी गहरी रचनात्मक ऊर्जा एवं समझ को लेकर सामने आ रहे हैं। मैं पूरी तरह आश्वस्त एवं खुश हूं। लेकिन जिस तरह के विचलन की बात आपने पहले कही, उसके स्त्री-पक्ष की जो चर्चा हमने की; मैं उससे निराश हूं। इस तरह का लेखन आम्बेडकरी दलित लेखन नहीं है उसका विरोध होना चाहिए वरना वह दलित साहित्य को पीछे ले जाएगा। बाबा साहब की बात आपको याद होगी,  उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा था कि अगर आप मेरे इस कठिनाइयों से यहां तक लाये गये जहाज को आगे नहीं ले जा सकते तो मेरी विनती है कि आप उसे वहीं छोड़ दें। उसे पीछे ले जाने का उपक्रम न करें। दलित-लेखन के इस तरह के स्त्री-दृष्टिकोण को सुनकर मैं आहत हुई हूं।

सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के बतौर दलित-साहित्य का सपना वर्णमुक्त समता मूलक समाज की स्थापना का है। लेकिन जातियों और उप-जातियों के आधार पर खेमेबाजी तो दलित- साहित्यकारों में भी मौजूद है?

यह वर्णवादी व्यवस्था की देन है। किसी कार्यक्रम में दलित के नाम पर अपनी ही जाति के लोगों को शामिल करना, किसी पत्रिका का संपादक होने पर अपनी ही जाति के लोगों को छापना ये सब वर्णवाद के चिह्न हैं। इस तरह के लोगों में आम्बेडकरी चेतना का अभाव है। लेकिन अच्छे भविष्य के लिए दलित साहित्य को इन चीजों से ऊपर उठना होगा।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 56 इंच चौडे़ सीने वाली सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी ताकतों ने सत्ता प्राप्ति के लिए अपनी पूरी जोड़-जुगत लगा दी। दलित समुदाय अपनी मुक्ति की छवि जिन चेहरों में देखता था उनका भी उन्हीं ताकतों के साथ खड़े हो जाना, जिनके विरुद्ध पूरा समुदाय लड़ रहा था, आहत करता है। जैसे रामदास अठावले, रामविलास पासवान, उदित राज आदि।

अवसरवाद एवं व्यक्तिगत स्वार्थ दलित राजनीति में भी पनपा है। पहले बाबा साहब के नाम पर गोलबंदी कर ताकत को अर्जित करना और उस अर्जित ताकत के मुताबिक अपना मोल-भाव तय कर लेना अवसरवाद नहीं तो और क्या है। लेकिन अठावले साहब के एक दूसरे पक्ष को भी मैं देखती हूं। यदि ये कभी सवर्ण हिन्दूत्त्ववादी ताकतों के साथ भी खड़े हुए हैं तो एक चौकीदार की भूमिका के रूप में। एक सिपाही की भूमिका के रूप में, इनके शिवसेना के साथ जुड़ने के बाद मुंबई में ही दलितों पर शिवसैनिकों के अत्याचार बहुत कम हुए हैं। ये वहां वॉच-डॉग की भूमिका में रहे हैं।
( युद्धरत आम आदमी से साभार )

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता: भाग 3

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद डा अनुपमा गुप्ता

(एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल के अनियतकालीन प्रकाशन और विशेषांकों के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये थे . इस लम्बे आलेख को हम तीन किश्तों में प्रकाशित करेंगे . यह तीसरी किश्त है , पहली और दूसरी  किश्त के कुछ उद्धरण हम दे रहे है, ताकि पाठ्कों की निरंतरता बनी रहे. नीचे लिखे पहली किश्त ‌‌‌_अंश और दूसरी किश्त _अंश  पर  क्लिक करें , तो पीछे के दो भाग पढे जा सकते हैं. यह आलेख पश्चिमी इतिहास लेखन में व्याप्त पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की पड्ताल करता है, जिसे भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में भी पढा जाना चाहिए .  मूल आलेख का हिंदी अनुवाद स्त्रीकाल के संपादक मंडल की सदस्य डा अनुपमा गुप्ता ने किया है .  रुस्सुम फ्लोरिडा ,यू एस ए, के एक कालेज में दर्शन पढाते हैं और डा अनुपमा एम जी आई एम एस , वर्धा , में कार्यरत हैं   रुस्सुम से LRussum@polk.edu पर संपर्क किया जा सकता है)

पहली किश्त – अंश :
यदि कुछ पल के लिए मान भी लें कि इतिहास अतीत की पुनर्रचना का अभिलेख है, तो भी हमें इससे कोई

 लगाव महसूस नहीं होता, क्योंकि यह पश्चिमी अभिलेख दरअसल भौगोलिक
रक्तस्नान के सिवा और कुछ नहीं है। इतिहास के नाम पर उपलब्ध ये रक्तस्नान-
विवरण सत्य के अभिलेखन का प्रयास नहीं, बल्कि इस बात के चिह्न  हैं कि
पश्चिम ने दुनिया की दूसरी ‘अमानुष’ संस्कृतियों पर विजय हासिल की है अथवा
उनमें सेंध लगाई है। यह इस तरह प्रदर्शित किया जाता है ,जैसे यह रक्तपात
है, पर फिर भी नहीं हैµयह तो भूमण्डल के शुद्धिकरण के लिए पश्चिम द्वारा
मजबूरीवश उठाये ग्ये अतिवादी, लेकिन अतिआवश्यक कदम हैं।
‘‘सतह पर दिखता नियतिवाद उन लोगों के लिए बढ़िया नकाब का काम करता है, जो
अन्यथा इन हत्याओं, दासत्व और रक्तपात को लेकर चिंतित हो सकते थे।
पिछले 350 वर्षों से यह अनवरत चल रहा है और इसके कम होने के कोई आसार
नहीं दिखते। अंततोगत्वा इस दैवीय दलील ने एक ऐसे जनसमुदाय को जन्म दिया है,
जिसके लिये हत्याएं और दासकरण स्वर्ग में पहुँचाने वाली सोने की सीढ़ी
है।’’

दूसरी किश्त – अंश

पुरुष- इतिहास स्वयं को उस मूल संदर्भ की तरह लेता है, जिसे खुद से अलग रह गये भाग को अर्थ प्रदान करने की जिम्मेदारी निभानी है (जो भोगा हुआ नहीं, बल्कि रचा गया यथार्थ है)µतस्वीर में औरतें हैं, लेकिन उनकी लैंगिकता कहीं दिखाई नहीं देती। लिपिबद्ध भाषा में निहित वर्गभेद के जरिये अपना नियंत्रण बनाये रखना ही इस इतिहास को रचने की विधि है। अब विखंडन की अवधारणा दावा करती है कि इसकी भाषा का सहज झुकाव समानताओं की ओर अधिक रहा है, यानी सहमति की ‘आवाजों’ को ही ग्रहण करने की ओर। इसका अर्थ यह हुआ कि मुख्यधारा का पश्चिमी इतिहास ‘हाशिये’ पर नियंत्रण द्वारा कृत्रिम रूप में सत्यापित की गई समानता प्राप्त करने के बारे में है। यहां ‘समानता’ कभी ‘समता’ के द्वारा प्राप्त नहीं की गई, अर्थात् पितृसत्तात्मक इतिहास के लिए द्वैत का अर्थ कभी दो समान ढांचों से नहीं रहा, बल्कि पहले भाव को विशेष बनाने के लिए दूसरे भाव को बहिष्कार का दंड भोगना पड़ा हैµकेन्द्र को दृश्यमान बनाये रखने के लिए इतर को दुर्लक्षित करने का यही अर्थ है। इससे एक समतापूर्ण नहीं, बल्कि श्रेणीबद्ध संरचना बनती है, जिसमें दूसरे स्थान के भाव को वर्गीकरण में हमेशा नकारात्मक माना जाता है। विलोम शब्दों के इस प्रकार के युग्मों के उदाहरण हमें भाषा में और भी मिलेंगे जैसे वाणी/ लेखन, अवधारणा/ रूपक, आंतरिक /बाहरी, उपस्थिति/ अनुपस्थिति, प्रकाश/ अंधकार, अमीर/ गरीब, इतरलैंगिक/ समलैंगिक और पुरुष/ स्त्री। विलोमों के वर्गभेद में वाणी लेखन को बहिष्कृत कर देती है, प्रकाश अंधकार को और उसी तरह पुरुष स्त्री को। यह बहिष्कार इतिहास में ऐसी पितृसत्ता की रचना करता है, जिसमें युग्म के दोनों शब्द एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं, क्योंकि यह व्यवस्था पहले शब्द के केन्द्र में स्थापित होने की मंशा पूरी करती है और इस दौरान दूसरे शब्द को हाशिये पर कथ्यहीन/ वाचाहीन/ अलैंगिक कोरी जमीन बना कर पृष्ठ के मुख्य भाग के बाहर कर दिया जाता है।

तीसरा और अंतिम किश्त ;

और इसके लिये ‘दुर्लक्ष्यता’ की अवधारणा की बजाय कु-लक्ष्यता (Dis -visiblity) की धारणा पर कार्य करना अधिक कारगर होगा ताकि इतिहास के कथानक में स्त्री यौनिकता की वैकल्पिक दृश्यता की पूर्ण निर्मिति हो सके। उपसर्ग कु-का अर्थ एक नितांत भिन्न विलोमीकरण से है। ‘दुः’ से भिन्न ‘कु’ दृश्यता  अर्थ को ही उलट देता हैµयह पुरुष- इतिहास को स्त्री- इतिहास में बदलने की क्षमता रखता हैµहाशियेकरण के प्रयास को पहचानते हुए, लेकिन अपने लेखन से इसे वैध न बनाते हुए और दैहिक लैंगिकता के स्थायी स्वरूप की तरह इसे स्वीकार न करके।और इस तरह शोषितों का यौनिकता पर लेखन उनके प्रतिरोध का प्रतीक बन जाता हैµये कुदर्शित देहें पश्चिमी इतिहास में दृश्यमान यौनिकता के संदर्भ को एकदम बदल देती हैं। यह एक प्रामाणिक लौकिक यौनिकता की अवधारणा इतिहास निर्माण की नींव को बदल सकती है; यह शोषित स्त्रियों की दैहिकता की नई स्त्रीवादी कहानियाँ रच सकती है। ‘कुदर्शिता’ शब्द का मतलब होगा (आत्मकथात्मक) जीवनियों के द्वारा शोषित यौनिकता को दृश्यमान कर देना, भुक्तभोगी द्वारा अपनी स्वयं की दृश्यता रचना।

मुख्य कथानक के प्रति इस कुदृश्यता से यह संभावना ही समाप्त हो जाएगी कि इतिहास निर्मिति के बाद हाशिये द्वारा कभी भविष्य में केन्द्र की सत्ता को चोट पहुँचाई जाए, बल्कि निर्माण के समय ही मुख्य कथानक में नवकथ्य का भी स्थान हो। यही वह जमीन है, जिसे कवि Alexis De Veaux ‘शोषित आवाजों की प्रतिभा’ करार देते हैं, जहां शोषित अर्थों को बदल देते हैं, जहां पश्चिमी इतिहास विस्थापित हो जाता है।2 अपनी इसी प्रतिभा से ये शोषित संस्कृतियां स्त्री -यौनता को नागरिक असहयोग अभियान की तरह लिख रही हैंµअ-सहयोग के द्वारा कथ्य में दृश्यता को जबरन डाल रही हैं। कुदर्शित बन कर ये शोषित एक इतर इतिहास को जन्म दे रहे हैंµऐसा अतीत, जो पुरुष- इतिहास के साथ ही मौजूदगी दर्ज कराता है और वह भी उसकी शर्तों पर नहीं। यहां कुदृश्य देह इस दृश्यता को संदिग्ध मान कर उसे न देखने को नीतिसंगत बनाने के पश्चिम के सारे प्रयासों को धता बना रही है। पश्चिमी कथानक इसे अपनी अवमानना मानता है।
मुख्य कथानक के साथ सह-अस्तित्व में उपस्थित यह इतिहास केन्द्र-परिध के शब्द युग्म से नहीं बंधा  है। ये ‘जहीन स्त्री  कथाएं’ एक भिन्न स्रोत  से जन्म लेती हैं, ये शोषित स्त्रिायों के यौनिक अतीत का ‘रचा गया’ नहीं, बल्कि ‘भोगा गया’ यथार्थ विकल्प प्रस्तुत करती हैं। ये कथाएं अलक्षित और दुर्लक्षित के भाव को बदल कर कुदर्शित के संदर्भ में ले आती हैं, जहां दृश्यता को ढीठ, अभद्र, भौतिक देहों की जरूरत होती है।
कुदृश्यता की इस जमीन पर शोषित स्त्री की यौनता हमेशा पहले से ही दृश्यमान है। यहां स्त्री  इतिहास की ‘तलछट’ ने यूरोपकेन्द्रित पुरुष- इतिहास की महान ‘कलाकृतियों को नामंजूर कर दिया है। पुरुष- इतिहास में पुंसत्व प्रधान कलाकृतियां दरअसल शोषण की पराकाष्ठाएं हैं, जिन्हें कप्तानों, प्रधानों, पोपों, पुरोहितों, अयातुल्लाओं, इमामों, पादरियों, संतों, उद्धारकों देवों, कारपोरेट पदाधिकारियों, स्वयंसेवी संस्थाओं, जनकल्याण प्रतिनिधियों, पिताओं, बेटों, चाचाओं, भाइयों, न्यायधीशों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पुलिस अधिकारियों, राष्ट्राध्यक्षों, राष्ट्रपतियों, तानाशाहों, प्रधानमंत्रियों और सरकारों ने अपने छद्म कथानक को विखंडित होने से बचाने के लिये निर्मित किया है।

कुदृश्यता’ का एक और पहलू है, जो स्त्री  यौनता- लेखन के लिए इसे अधिक प्रासंगिक बनाता है। Dis (कु) उपसर्ग (Disablot) यानी मद्यपान और किस्सागोई की प्रथा की दैवीय सत्ता को इंगित करता है। साथ ही मतभेद या कलह की रोमनदीवी भी डिसकॉर्डिया है। नोर्स मिथकों में क्पेंइसवज की प्रथा वालकाइरी और बल पशु को चुनने के उनके अधिकार को दिये गये समान की ओर संकेत करती है। शोषित यौनिकता ने आपबीती वाली किस्सागोई के जरिये ताकत हासिल की है, मतभेद दिखाने की ताकत, यथास्थिति बरकरार रखने के पुरुषीय इतिहास के चलने को बाधित करने की ताकत, स्वयं की तबाही का ब्यौरा किस स्वरूप में लिखा जाए, इसे चुनने की ताकत। कुदृश्यता किस्सागोई के द्वारा मतभेद दिखाती है। यह कथाकारी की विभिन्न शैलियों को पश्चिमी इतिहास के अभिलिखित तथ्यों के विरुद्ध खड़ा कर देती है। वह इन तथ्यों की प्रकृति और मुख्य कथानक के ‘सत्यता’ के दावों पर सवाल खड़े करती है। यदि इतिहास ‘सभी’ तथ्यों का दस्तावेजीकरण है तो फिर क्यों स्त्रिायों के खिलाफ इतने अधिक दर्जन किये गये अत्याचारों की भरमार है? हमारे पास दर्ज ये ब्यौरे और पुरुषीय इतिहास की किताबों में दमनकारियों की तस्वीरें और आत्मकथ्य (कबूलनामे?) कब से हमारी आंखों में आंखें डालकर खड़े हैं और फिर भी सदियों से स्त्रिायों के खिलाफ गुनाहों के लिए किसी ने सजा नहीं पाई, क्योंकि इन शोषित स्त्रिायों को ही अनदेखा बना दिया गया, लेकिन यह अब और नहीं चल पायेगा, क्योंकि शोषित लैंगिकता की कुदृश्यता अब स्वतंत्रता की मुखर जीवनी लिख रही है।

सिद्धांतकार जब स्त्री यौनिकता की बात करते हैं, तब वे ‘कु’ यानी अर्थ को उलट देने के बारे में कह रहे होते हैं। यह टोनी मॉरिसन को पुनर्स्मृति की अवधारणा, यानी इतिहास ने जिसे भुला दिया, उसके बारे में लिखना, वे अत्याचार जिन्हें स्त्रिायां भुलाना चाहती हैं, पर भुला नहीं पातीं, उसके बारे में लिखना। पश्चिमी ‘सत्य’ की छवि पर, कुलीनता की मढ़ी हुई ‘पारदर्शिता’ पर यह जैसे किसी पिशाच की कुदृष्टि पड़ गई है। स्त्री  देह को असल में इन डरावने घावों, उसके भूगोल पर बिखरी पड़ी चोटों पर ध्यान दिये बिना देखा ही नहीं जा सकता। (McKittric, 2006, p. xv) । कुदृश्यता की यह भूतिया उपस्थिति उस व्यवस्था की झलक दिखाती है, जिसे कैथरिन मॅककिट्रिक ‘अपूर्वनिश्चितता की व्यथा’ कहती हैंµवह व्यवस्था, जो शब्दों के पूर्वनिश्चित अर्थों से भिन्न अर्थ खोलने की संभावना जगाती है। ये नये अर्थ पुरुष की कथित श्रेष्ठता को विस्थापित या उस पर हावी नहीं होते, लेकिन उसके अधीनस्थ बनकर भी नहीं रहते, बल्कि उसके विधान और उसके मानवपन के मुख्य कथानक के बिल्कुल समान्तर चलते हैं।’’ (McKittric, 2006, पृ.-ग्ग्)।
डैमॉन (Daimon) शब्द का ग्रीक भाषा में अर्थ होता है ‘उच्चतर चेतना’ सचेत, उत्तेजित, उत्प्रेरित अवस्था। लेटिन में इसका अर्थ कुछ बदल कर अपवित्र, अनर्थित, अपश्चिमी, अ-दीक्षित और ‘निर्वाण में अक्षम’ हो गया है, जो इस ‘डेमन’  शब्द की ‘संक्रमित जैसी इरावती छवि प्रस्तुत करता है। कुदृश्यता शब्द भी शब्द-प्रधान पश्चिम को शब्द से ही घेर कर मात दे देता है। स्त्री  यौनिकता की समर्पित, अत्यंत निर्मल, निराकार पश्चिमी छवि के मुंह पर उग्र, बर्बर दास/ दैत्य की पश्चिमी कल्पना को बिम्बित कर देता है। इसी डरावनी मौजूदगी को Heather Bidellterms ‘पैशाचिक मानवता’ कहती हैं, उग्र मांसल बोध, भुक्तभोगी तथा समुदाय/ इतिहास के बीच दैहिक संवाद की चेतना। यह चेतना अब ‘पुरुष’ शब्द की पश्चिमी व्याख्या में अंतर्निहित ‘इतर’ अथवा ‘अमानुसी’ नहीं रह गई है, यह उस दुरात्मा को मानवों में शामिल करने वाली चेतना हैµपश्चिम के ‘पुरुष’ सिद्धांत का स्त्री प्रति-सिद्धांत। यह ‘दुरात्मा मानव’ अब अपनी पैशाचिक प्रवृत्ति के प्रतीकों को इस दैहिक भूगोल के अंतःस्थल में सहज भाव से मौजूद मानवता के बिना दिखाने की अनुमति नहीं देता
कुदर्शित नव-स्त्री  कथाएं गुलाम देह की यौनिकता को पराया कर देने के खिलाफ नागरिक असहयोग है। यह लेखन पश्चिमी छद्म कथानक के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिक्रिया की जमीन/ संदर्भ/ मुजाहिरा बन गया है। सिद्धांतकार इस नागरिक असहयोग की जमीन से पश्चिमी इतिहास के खिलाफ जंग की ‘अराजकता’ का निर्माण कर रहे हैं।
नव- स्त्री-  इतिहास के रूप में अराजकता

अराजकता सत्ताधारियों को डांवाडोल करती है. ! अधिकांश पश्चिमी नागरिक जानते/ न जातने हुए भी दरअसल बौद्धिक जागरण ( ज्ञानोदय  ) की उपज हैं। वे स्वयं को तार्किकता के वंशज मानते आये हैं. ज्ञानोदय की मुख्य अवधारणा यह है कि  यदि मानवता  तर्क से काम लेगी तो ही सुख शांति से जी सकेगी.  जैसे कि Gelderloos का कहना है, ‘‘आज की दुनिया में सरकारें और कारपोरेट निगम सत्ता पर करीब-करीब एकाधिकार रखते हैं, जिसका एक बड़ा पहलू हिंसा है।’’ अब इन संस्थाओं को सबसे अधिक डर उनके एकाधिकार के खिलाफ हिंसक नागरिक विद्रोह से होता है (Gelderloos ,2007, पृ.-22)। यह निरंकुश सत्ता आत्मसमर्पण तभी करेगी, जब नागरिक समूह परिवर्तन के अस्त्र बनेंगे। सिद्धांतकारों को हिंसा की अवधारणा पर अब पुनर्विचार की जरूरत हैµएक विद्रोही होने का मतलब असल में क्या है? हमें अपनी राजनीतिक चेतना द्वारा यौनिकता की रक्षा के लिए नागरिक असहयोग अभियान छेड़ना चाहिए। यह अराजकताएं हमें मुफ्त में नहीं मिलेगी, लेकिन यदि हम इसे नहीं अपनाएंगे, क्योंकि हमें सजा मिलने, आर्थिक नुकसान और वर्गभेद का शिकार बनने का डर है तो अंततः यह डर, हिंसा के इस रूप से बहुत महंगा पड़ेगा, जो हमें एक नागरिक के रूप में सच्ची आजादी दिलवा सकता है।

वे सिद्धांतकार, जो स्त्री यौनिकता – लेखन को अराजकता लाने के औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं और वे नागरिक, जो हिंसक अराजकता फैला रहे हैं, समान हिंसक हैं। हम चाहते हैं कि आक्रामक  यौनिकता का यह लेखन और भी हिंसक हो, इस आक्रामक यौनिकता को अब बहुत समय तक आलमारी में या पितृसत्ता के बिस्तर में छुपा कर नहीं रखा जा सकता. वह क्षण, जब स्त्री  नागरिक अपनी यौनिकता को राजनीतिक वकतव्य बना ले , इस आराजकता को चुन ले , तो वह उसके सार्वजनिक रूप से प्रकट होने का पल होगा.
यौनिकता के बारे में लिखना शून्य में झांकने का वह क्षण है , ठीक वही चीज चुन लेने का क्षण , जिससे सभी पश्चिमी राजनीतिक संस्थायें बचती रही हैं- अराजकता का क्षण . यह आराजकता , जो , यौनिकता –लेखन को उसका स्थान प्रदान करती है , उतनी ही हिंसक प्रक्रिया है , जितना की यथास्थिति को अस्त व्यस्त करने वाला कोई भी हिंसक व्यवहार होगा. यह उस राजनीतिक नेतृत्व तंत्र का अस्वीकार होगा , जो दैहिक द्मन के माध्यम से नागरिकों पर नियंत्रण करना चाहता है.

पश्चिमी इतिहास ही एक मात्र सच्चाई नहीं है .  पश्चिम की मुख्यधारा का ऐतिहासिक विवरण ही इतिहास का एकलौता पाठ्यांतर नहीं है. ‘ यदि एक समुदाय किसी एकलौते व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों द्वारा शासित होता है , तो इसका साफ अर्थ है कि उसमें खुद को शासित करने का हुनर या सहस नहीं है,’ ( वाल्तेयर , 1994, पृ 195) . प्रत्येक दिन इस धरती पर कहीं कोई एक होना चाहिए , जो यौनिकता की अपनी नवकथा को राजनीतिक असहमति के रूप में लिख रहा हो.

जूते

कौशल पंवार


कौशल पंवार दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में संस्कृत पढाती हैं. उनसे उनके मोबाइल न.  09999439709 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

( कौशल पंवार की यह कहानी जाति दंश के साथ गरीबी में जीने वाले बहन और भाई के प्रेम की  कहानी है, एक  साथ बुने जा रहे सपने और सपने के लिए एक -दूसरे में अपने हिस्से को छोडने की लगी होड की कहानी भी , वह हिस्सा , जो हासिल भी बहुत मुश्किल से है. यह कहानी एक बहन के उस दंश की भी कहानी है, जो अपने  आंशिक रूप से कामयाब जीवन के बाद , उसकी  नीव के पत्थर अपने भाई के लिए कुछ करना चाहती है, तब वह भाई ही नहीं रहा. गहरी सम्वेदना की यह कहानी स्त्रीकाल के पाठकों के लिए : कौशल की पहली अभिव्यक्ति को भी सम्भवतः स्त्रीकाल ने ही प्राकशित किया था, जो इन्होंने पत्रिका के   ‘ जीवन’ कालम  के लिए के लिए लिखा था , आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति .)

पांच बजे के आस-पास मेरी बेटी टी.वी. देख रही थी। मैं पास ही सोफे पर बैठी लैपटाप पर अपना मेल चैक कर रही थी। बेटा मंयक ट्यूशन के लिए चला गया था सो हम दोनों ही घर में थे। वह बार-बार चैनल बदल रही थी। तभी मेरी भी नजर उस ओर चली गयी। सामने एल.सी.ड़ी. पर कोई फिल्म चल रही थी जिसमे टीचर अपने स्टूडैंट से कह रह था –  “तुम मैराथन दौड़ में हिस्सा नहीं ले सकते, तुम्हारे पास न तो मैराथन लायक जूते है और न ही मंहगी सी कोई टीसर्ट ही है।” बच्चा चुपचाप सुनकर निराश होकर कमरे से बाहर आ गया था।

अच्छे जूते नहीं है। यह  वाक्य मेरी जेहन में बैठ गया था। जूतों का संबंध मुझसे गहराई से जुड़ा हुआ था। मैने अपना लैपटाप बंद कर दिया था और बाल्कनी में चेयर डालकर बैठ गयी थी। बेटी फिल्म देखती रही। मैने उसे पानी के लिए आवाज दी पर उसका सारा ध्यान शायद फिल्म देखने में होगा इसलिए उसको सुनायी नहीं दिय। मै उठी, पानी की बोटल फ्रीज से निकाली  फिर वही उसके पास आकर बैठ गयी और एकटक टीवी स्क्रीन पर चल रही तस्वीरों को देखने लगी पर ध्यान कहीं ओर ही था, टी.वी. की तरफ तो केवल आंखे थी। हाथ में बोटल पकड़े-पकड़े मैं जूतों के बारे में ही सोचती रही थी पानी पीने के लिए मैं उठी थी, भूल ही गयी थी।

नमी पाकर चिल्ड बोतल से टपकती पानी की बूंद मेरे बाजू पर गिरी। तभी मुझे याद आया मुझे प्यास लगी थी । मैने बोतल से ही पानी पीया और उसे कुर्सी के नीचे ही रख दिया था। फिल्म चल रही थी, वहीं दूसरी ओर मेरे दिमाग में भी फिल्म की रील की तरह एक-एक सीन आंखों के आगे आ रहे थे ; सीन में मैं भागी जा रही थी कालेज के बरामदे में होती हुई सीधा एडब्लाक पहुंची थी। थोड़ी देर खड़ी होकर अपनी उखड़ती सांसों को मैने दुरुस्त किया और धीरे-धीरे अंदर आफिस में गयी।  सामने की कुर्सी पर कलर्क बैठा था। मैने डरी-डरी लड़खड़ती आवाज में पूछा – ““सर मैं फीस……..बस इतना ही मुश्किल से कह पायी थी कि तभी उसने दबंग आवाज में पुछा – “रोल नं…….” पूरा वाक्य नहीं बोला था । मैने कहा – “सर, १६३४…”

इतना सुनते ही वह फाइल में से कुछ टैटोलने लगा था। कभी एक फाइल देखता, उसे रखता, फिर दूसरी उठाता, उसे भी देखता। उसने दोबारा पूछा – “क्लास ?”

“सैंकिंड इयर सर…” मैने जवाब दिया ।

उसने फाइल बंद कर दी थी । वह मुझे ऊपर से नीचे तक घूरने लगा था। मैने अपने हाथ में पकड़ी किताबों की पालिथिन को कस कर पकड़ ली थी कि जैसे कि अभी यह मुझे आफिस से फीस न देने के कारण धक्के मारकर बाहर निकाल देगा। फिर मुझे उसकी आवाज सुनाई दी – “फीस भर तो दी, अब ओर क्या चाहिए तुम्हे ? सुबह-सुबह धक्के मरवा दिये फाइलों मे ? चाय भी नहीं पी थी अभी।”

मैने उनसे सम्भलते हुए पूछ ही लिया कि, “सर मेरी फीस किसने दी ?”

कलर्क ने सुनकर अजीब सी आंखों से मुझे ताका और कहा -“ “कल कोई आया था, वही भरकर गया है तुम्हारी फीस, तुम्हें नहीं बताया उसने ?” इतना कहरकर उसने चटकारा सा लिया। मुझे जवाब मिल गया था। मैं उल्टे पैर आफिस से बाहर आ गयी थी ।

  निश्चिंत हो गयी थी मैं कि चलो अब कम से कम इस साल की फीस तो भरी, वरना पता नहीं कालेज दोबारा आ भी पाती या नहीं ? मै बाहर निकलते हुए खुशी से झुमती-फुदकती बरामदे से निकल रही थी। ऐसे चहक रही थी जैसे किसी ने आकर बिन मांगे ही मुराद पूरी कर दी पर थोड़ी ही देर में खुशी में ब्रेक लग गया जब याद आया कि फीस कालेज में किसने भरी ? सारा सीन आंखों में घूम गया था मेरे…।

मैं पिछले कई दिनों से कालेज नहीं जा रही थी । सुभाष से भी मिलने नहीं गयी थी। जब भी वह मिलने आता तो मैं बाहर निकल जाती। मैं उससे आंखें मिलाने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। मैं उसके घर की सारी स्थिति को जानती थी। उसकी मां दूसरों के घरों में जो कमा कर लाती, उसी से घर का गुजारा चल रहा था ऊपर से उनके पिता जी की दवायी का खर्चा भी इधर-उधर से उधार मांग कर ही चल रहा था। इसलिए किस मुंह से उसे अपनी परेशानी बताती कि मेरी कालेज की फीस अभी तक नहीं गयी इसलिए कालेज नहीं जा पा रही हूँ।

जब भी मेरा और सुभाष का आमना-सामना होता तो मैं कभी पेट दर्द का बहाना बना देती तो कभी किसी ओर चीज का। मैं  जानती थी कि वह सुनकर परेशान हो जायेगा। उसे अपनी वजह से परेशान नहीं करना चाहती थी। अगर उसे पता लगा तो…..? तो वह कुछ भी करेगा पर फीस मेरे हाथों में लाकर रख देगा। इसलिए मैने उसे बिल्कुल नहीं पता लगने दिया कि कालेज न जाने की वजह क्या है ?

एक दिन सुभाष बहुत खुश था। वह  घर आया। उसका चेहरा खुशी के मारे दमक रहा था। मैं घर की छत पर पड़ी लकड़िया उठाने गयी थी चूल्हा जलाने के लिए। जैसे ही नीचे की ओर झुकी तो सामने गली से ही सुभाष आता दिखायी दिया था। कुछ लकड़िया हाथ में उठा रखी थी। हाथ में पकड़े हुए ही मैं उसे देखती ही रही। उसे मिले कई दिन गुजर गये थे इसलिए मन ही नहीं किया नजरों को चुराने का। वैसे भी इतना खुश वह कभी-कभी ही होता था या तो तब जब वह किसी की सहायता करता और ढेरों सपने किसी की आंखों में देखता या फिर रिजल्ट आने पर ही इतना खुश होता था वह भी मेरा। मैने तो अपना रिजल्ट कभी खुद देखा ही नहीं था। वह ही हमेशा देखता था और बहुत खुश होता था। अपनी कम्पार्टमैण्ट आने का दुख उसे कम होता बल्कि मेरे पास होने की खुशी ज्यादा होती थी। पर आज क्या कारण हो सकता है, मुझे समझ नहीं आ रहा था। पहले तो मैं उसके चेहरे को पढ कर ही बता दिया करती थी कि ये वजह  है पर आज पता नहीं लगा था।

 मैं छत से नीचे उतर आयी थी। चूल्हे के नजदीक जलावन को रख दिया था। दरवाजे की ओर गयी – “कैसे हो भैया…… ?” मैने उसकी ओर बढ़कर कहा ।

“मेरी छुटकी गुड़िया मैं एकदम पहले जैसा हूं….” कहते हुए वह खाट पर बैठ गया ।

मैं भी घडे से पानी का गिलास भरकर ले आयी थी। उसे गिलास पकड़ाते हुए कहा – “घर में सब ठीक-ठाक। मेरी बात का जवाब दिये बिना उसने पूछा था – “कालेज क्यों नहीं जा रही हो…..? एक दो दिन से तबीयत खराब है। उसने मेरे सिर पर चम्पत लगाते हुए मेरे शब्दों को दोहराते हुए कहा – “एक दो दिन…. तुम्हें कालेज गये आज पूरे सात दिन हो गये है ! मैने अपनी नजरे नीची कर ली थी जैसे अपनी गलती का अहसास हो गया हो।

मां पास में ही चूल्हे पर रोटियां सेंक रही थी । चूल्हे से आटे की महक और पास ही कूंण्ड़ी में कूटी गयी लहसून और लाल मिर्च की चटनी की महक फैल रही थी । रोटियां बनाते-बनाते मां ने कारण बताना चाहा पर मैने बात को टालते हुए कहा – “भैया, गर्म-गर्म रोटी खाओंगे ? मां ने लहसून की चटनी भी बना रखी है। मां को कहा – “मां, दो ना सुभाष को रोटी।“ मां का ध्यान एक पल के लिए हट गया था । तवे पर रखी रोटी जल गयी थी। सपनों के जलने जैसी महसूस हुई मां को वह। मां ने जल्दी से हाथ से रोटी को पल्टा और उसे सेंका। अगली रोटी का आटा लिया और उसे हथेलियों के बीच में रखकर गोल-गोल घुमाने लगी। आर्थिक तंगी को भी मानों अपने से दूर गोल-गोल घूमाकर दूर कर देना चाह रही थी मां। पर ऐसा नहीं कर पा रही थी। मां ने एक रोटी थाली में रखी और चटानी को उसके ऊपर रखकर सुभाष को दे दी।

सुभाष ने रोटी का बड़ा सा टुकड़ा मुंह में ठूंसा और मुझसे कहा-पूछोगी नहीं छूटकी गुड़िया कि मैं आज खुश क्यों हूं ? हां बताओ क्या हुआ आज जो इतना खुश हो ? उसने अपने पैरों की ओर देखा और कहा-मुझे मां ने जूते खरीदने के पैसे दिये है। मै जूते खरीदूंगा और कालेज में जूते पहनकर जाउंगा ? अब तुम मुझसे नहीं कहोगी कि कालेज में जूते पहनकर जाया करो, गठ्ठी हुई चप्पल नहीं। मैं हंस पड़ी । सुनकर बहुत खुश हुई। मेरा भाई भी कालेज में जूते पहनकर जाया करेगा। अब सब लड़कियां मुझे नहीं कहेगी कि इतनी ठेठ गर्मी में तुम्हारा भाई चप्पलों में कालेज कैसे चला जाता है, वह एक जोड़ी जूते भी नहीं खरीद सकता ? मुझे सुनकर बहुत बुरा लगता और शर्मिंदगी भी होती कि हमारे मां-बाप इतनी मेहनत करके भी एक जोड़ी जूते तक क्यों नहीं खरीद सकते ? दूसरी तरफ सभी लड़के-लड़किया सज-धज कर, अच्छे से तैयार होकर कालेज जाते है ? मैने सोचा चलो एक समस्या तो हल हुई। सोचते-सोचते मैं बरामदे में सामने की दिवार से टकरा गयी। माथे पर हल्की सी गांठ पड़ गयी पर मन की गांठ खुल चुकी थी।

अपने ऊपर बहुत गुस्सा आया। मुझे नये-नये जूते दिखाई दे रहे थे पर वे सुभाष के पैरों में नहीं थे। इतनी गर्मी की लू जिसमें सब कुछ झूलस रहा था। घर से सड़क तक चप्पलों में आना फिर कालेज में आना-जाना सोचते-सोचते अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था। हम और हमारे मां बाप दिन-रात काम पर लगे रहते हैं फिर भी हमारे पास कुछ नहीं है जो ओरों के पास है। पिता जी के कहे शब्द याद आ गये कि संसाधन बनते नहीं बनाये जाते हैं। बाबा साहब ऐसे ही तो नहीं बने होंगे डाक्टर ? हमारे समाज की शान। मैने सोचा और कालेज के गेट से बाहर निकल आयी। मन में आगे बढ़ने का उत्साह मिल चुका था। आगे का रास्ता तय था। कदम बढ़ाना अभी भी बाकी था जो बिना सुभाष के संभव नहीं था। अपने ऊपर फक्र महसूस हुआ। मैं कितनी अमीर हूँ, पता चल गया था मुझे। मेरे पास क्या कमी है ? मेरे पास वह था जो ओरों के पास नहीं था। वह थी शिक्षा और ज्ञान। कितनी लड़कियां हैं, जो मेरी तरह कालेज तक पंहुची है ? ज्यादातर हमउम्र दूसरों के घरों में कूड़ा-गोबर मल मूत्र उठाने का काम करती हैं। वे सब कहां पढ़ पायी है ? उनको ये अवसर दिया ही नहीं है इस व्यवस्था और घर की मजबूरियों ने। मैं कालेज में पढ़ पा रही हूँ। सुभाष जैसा भाई है, जो हर जरुरत को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता।

 यही सब दिमाग में चल ही रहा था कि पता नहीं लगा मैं कब बस-स्टैंड पर पहुंची। सामने सुभाष खड़ा मुस्करा रहा था। मेरी नजरे उसके पैरों में पड़ी चप्पलों की ओर गयी। मेरी आंखे उसे देखकर नम हो गयी थी। पर सुभाष की आंखों में ढेर सारे सपने थे, जिनकों उड़ान देने की जिम्मेदारी अब मेरी थी। सुभाष ने अपनी किताब मेरे सिर पर मारी। कहा – “मेरी गुड़िया, जब झूठ नहीं बोलना आता तो झूठ बोलने की कोशिश क्यों करती है ? मैं तुम्हे बहुत ऊपर उंचाईयों पर देखना चाहता हूँ। जहां पर मेरा समाज अभी तक नहीं पहुंचा है। तुम्हें मेरा, पिताजी का और बाबा साहब का सपना पूरा करना है जो मुश्किल नहीं तो आसान भी नहीं होगा। इन छोटी-छोटी चीजों की वजह से तुम कालेज ना जा पाओ, ऐसा कभी नहीं होगा। मेरे जीते जी तो बिल्कुल नहीं।” “रही बात जूतों की, तो जूते तो तुम्हारी  मेहनत की पहली तनख्वाह से खरीद कर पहनाना। मैं इन्तजार करुंगा। पर मैं तो आज भी इन्तजार कर रही हूं। मेरा इन्तजार आज भी अधूरा है। मेरे पास आज जूते खरीदने के लिए पैसे हैं, जूते हैं, पर वो पांव नहीं रहे जिनमें जूते होने चाहिए थे।”

प्रमोद कुमार तिवारी की कवितायें

प्रमोद कुमार तिवारी


प्रमोद कुमार तिवारी केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात में हिंदी पढाते हैं , इनसे pramodktiwari@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है

( प्रमोद कुमार तिवारी की इन चार कविताओं , ‘दीदी’, ‘जीभ थी ही नहीं तो कटी कैसे’ , ‘जे एन यू की लडकी’ और फसल औरतें और गीत’ , में हमारे आस -पास की स्त्रियां हैं, हमारे घरों में कैद स्त्री , हमारे गांव में डायन करार दी जाती स्त्री , अवसर पाकर मुक्त उल्लास और सपनों से भरी स्त्री , श्रम करती स्त्री . प्रमोद की कविताओं में ग्रामीण परिवेश के  पात्र और  बिम्ब होते हैं , तो लोकभाषा की खुशबू  भी होती है , लेकिन साथ ही ये कवितायें  ग्रामीण समाज में सामंती पितृसत्तात्मक मूल्यबोध के खिलाफ कथ्य भी हैं . भोजपुरी में भी कवितायें कहते हैं प्रमोद . )

1.  दीदी

दीदी मुझसे एक खेल खेलने को कहती
एक-एक कर
वह चींटों के पैर तोड़ती जाती
ग़ौर से देखती
उनके घिसट कर भागने को
और खुश होती।
दीदी मुझसे एक खेल खेलने को कहती
एक दिन देखा छुटकी की आँख बचाकर
दीदी ने उसकी गुड़िया की गर्दन मरोड़ दी।
पड़ोस की फुलमतिया कहती है
तेरी दीदी के सर पर चुड़ैल रहती है
कलुआ ने आधी रात को तड़बन्ना वाले मसान पर
उसे नंगा नाचते देखा था।
दादाजी ने जो जमीन उसके नाम लिखी थी
हर पूर्णमासी की रात दीदी वहीं सोती है
तभी तो उसमें केवल कांटे उगते हैं।
स्वांग खेलते समय दीदी अक्सर भूतनी बनती
झक सफेद साड़ी में कमर तक लंबे बाल फैला
वह हँसती जब मुर्दनी हँसी
तो औरतें बच्चों का मुंह  दूसरी ओर कर देतीं।
माँ रोज एक बार कहती है
कलमुँही की गोराई तो देखो
जरूर पहले राकस जोनी में थी
मुई! जनमते ही माँ को खा गई
ससुराल पहुचते ही भतार को चबा गई
अब हम सब को खाकर मरेगी
माँ रोज एक बार कहती है।
दीदी को दो काम बहुत पसंद हैं
बिल्कुल अकेले रहना
और रोने का कोई अवसर मिले
तो ख़ूब रोना
अंजू बुआ की विदाई के समय
जब अचानक छाती पीट-पीट रोने लगी दीदी
तो सहम गई थीं अंजू बुआ भी।
पत्थर से चेहरे पर बड़ी-बड़ी आँखों से
दीदी जब एकटक देखती है मुझे
मैं छुपने के लिए जगह तलाशने लगता हूँ।
दीदी के साथ मैं कभी नहीं सोता
वह रात को रोती है
एक अजीब घुटी हुई आवाज में।
जो सुनाई नहीं पड़ती बस शरीर हिलता है।
आधी रात को ही एक बार उसने
छोटे मामा को काट खाया था
और इतने ज़ोर से रोई थी
कि अचकचाकर बैठ गया था मैं।
दीदी मुझे बहुत प्यार करती है
गोद में उठा मिठाई खाने को देती है

उस समय मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ता रहता हूँ
और पहले मिठाई को जेब में
फिर चुपके से नाली में डाल आता हूँ।
दीदी मेरे सारे सवाल हल कर देती है
पर छुटकी बताती है
सवाल दीदी नहीं, चुड़ैल हल करती है।

दीदी से सभी डरते हैं
बस! पटनावाली सुमनी को छोड़कर
सुमनी बताती है
माँ ने ही अपनी सहेली के बीमार लड़के से
दीदी की शादी करायी थी!
सुमनी तो पागल है
जाने क्या-क्या बोलती रहती है
कहती है
घिसट कर ही सही
किसी के संग भाग गई होती
तो दीदी
ऐसी नहीं होती।

2.जीभ थी ही नहीं तो कटी कैसे

(सोनभद्र जिले ,उत्तरप्रदेश ,के करहिया गाँव की उस जागेश्वरी के लिए, जिसकी जीभ भरी पंचायत में 3 अगस्त 2010 को काट दी गई)

आदरणीय पंचो! जागेश्वरी डायन है
इसके कई सबूत हैं हमारे पास
पहला तो यही कि उसके चार बच्चे हैं
हमारी एक भी संतान नहीं और उसके चार-चार बच्चे।
दूसरा, जागेश्वरी बोलती है और जवाब देती है
आप ही बताइए, पूरे गाँव में है कोई स्त्री
जो हमारे सामने कर ले ऐसी जुर्रत
तीसरा, जागेश्वरी सुंदर है
चौथा, जागेश्वरी का नाम जागेश्वरी है
जो कायदे से बिगनी, गोबरी आदि होना चाहिए था
पाँचवा, आप खुद देख लें कि साज-शृंगार का इतना शौक है इसे
कि बाँह तक पर गोदवाए हैं फूल ।
अब क्या बताऊँ, हमें तो कहते भी शर्म आती है
पर महादेव कह रहा था कि
कई बार जागेश्वरी उसके सपने में आई
और ईख के खेत में चलने के लिए खींचने लगी।
और बासमती तो कह रही थी
कि उसने अपने रोते बेटे को
अगर नहीं छीना होता उसकी गोद से
तो चबा गई होती उसको!
रमकलिया भी कह रही थी

कि उसके मरद पर भी
मंतर पढ़ दिया है इसने
हरदम इसी को घूरता रहता है।
पंचो! इस सहदेव की बात छोड़ो
आपै बताओ
भला जागेश्वरियों के पास
कहीं जीभ, दाँत और नाखून होते हैं?
इन पंचों के पूर्वजों के पूर्वजों ने
सदियों पहले कर दी थी व्यवस्था
साफ बात है
जब जीभ थी ही नहीं
तो कटी कैसे
ये सब साजिश है
पंच परमेश्वरों और सभ्य पुरुषों को
बदनाम करने की।

3. जे.एन.यू. की लड़की

देखा मैंने उसे
जे.एन.यू. की सबसे ऊंची चटृान पर
डैनों की तरह हाथ फैलाये
उड़ने को आतुर

देख रही थी वह
अपने पैरों के नीचे
हाथ बाँधे  खड़ी
सबसे बडे़ लोकतंत्र की राजधानी को
जहाँ रही है चीरहरण की लंबी परंपरा

अलकों के पीछे चमकता चेहरा…
जैसे काले बादलों को चीर के
निकल रहल होे
चांद नहीं! सूरज
ग़ज़ब की सुन्दर लगी वो
चेहरे पर थी
उल्लास की चिकनाई, विश्वास की चमक
पैरों में बेफिक्री की चपलता

दिखी वो रात के एक बजे
सुनसान पगडंडियों पर कुलांचे भरती
याद आ गयीं ‘कलावती बुआ’
घर से निकलने से पहले
छः साल के चुन्नू की मिन्नतें करतीं
साथ चलने को।

पहली बार जाना
हँसती हैं लड़कियाँ भी
राह चलते छेड़ देती हैं
ये भी कोई तराना।

पर्वतारोहण अभियान से पहले
उठाए थी बड़ा सा बैग कंधे  पर
चेहरे की चमक कह रही थी
ये तो कुछ भी नहीं
सदियों से चले आ रहे बोझ के आगे
हाँफता समय चकित नजरों से देख रहा था
उसकी गति को।

तन कर खड़ी थी मंच पर
लगा दादी ने ले लिया बदला
जिसकी कमर टेढ़ी हो गई थी
रूढ़ियों के भार से
प्राणों में समेट लिया
उसकी पवित्र खिलखिलाहट को
देर तक महसूसा
माँ का प्रतिकार
जिसकी चंचलता
चढ़ा दी गई थी
शालीनता की सूली पर

बहुत-बहुत बधाई ऐ लड़की!
देखना! बचाना अपनी आग को
जमाने की पुरानी ठंडी हवाओं से
उम्र के जटिल जालों से
दूर रखना अपने सपनों को
हो सके तो बिखेर देना
अपने सपनों को हवाओं में
दुनिया के कोने-कोने में फैल  जाएँ
तुम्हारी स्वतंत्रता के कीटाणु
अशेष शुभकामनाएँ!

4. फसल, औरतें और गीत

एक बूढ़ी औरत सोह रही है खेत
साथ ही सुरीले कंठ से छीट रही है उसमें
आदिम गीतों के
न पुराने होने वाले कच्चे बीज।
एक आल्हर युवती
रोप रही है धान
साथ ही रोपती जा रही है,
लोकगीतों की हरियाली
खेतों में
नहीं श्रोता चरवाहों के मन में।
गीतों में भरी है कथा
कि कैसे रोपी जाती हैं उसकी सहेलियाँ
नइहर से उखाड़कर
अपेक्षाओं से लदे ससुराल में।
भारी काम के लंबे दर्द को
हर रहा है गीतों का सुरीलापन
मरहम लगा रहे हैं
सदियों की दासता को आवाज़ देनेवाले शब्द।
दोनों औरतों ने पूरा किया काम
अलगाए एक दूसरे के बोझ
फिर  दोनों ने सुर मिलाए
ज्यों-ज्यों बढ़ते गए सुर
घटता गया सिर का बोझ
साझी व्यथा ने बढ़ा दिया
करूण स्वरों का सुरीलापन
दोनों औरतों ने बाँट लिया
थोड़ा-थोड़ा हरापन और पकापन
जब वे गाँव में पहुँची तो
बूढ़ी और युवती कम
सखियाँ अधिक थीं
दोनों के चेहरे लग रहे थे
एक से।

जब ‘दुल्हन’ घर छोड़ कर चल देती है…

 असीमा भट्ट
( असीमा भट्ट चेखव की कहानी दुल्हन’ की नायिका की तरह पहले तो प्रेम  और विवाह के प्रचलित फ्रेम में स्वप्न देखती और जीती युवती रही हैं , जो उसी नायिका की तरह इन सब को छोड निकल पडती हैं जिंदगी के दूसरे मायनों की खोज में ,उनके प्रति आशक्त. इस आलेख में असीमा अपनी प्रिय नायिका और अपने प्रिय लेखक को याद कर रही हैं. असीमा पट्ना में पत्रकारिता के बाद  दिल्ली में एन एस डी में प्रशिक्षण प्राप्त कर थिएटर करते हुए आजकल मुम्बई में रह रही हैं, फिल्म , थियेटर और लेखन को समर्पित होकर )

१९९३ में मैंने चेखव की कुछ कहानियाँ पढ़ी थी, बल्कि यह कहूं कि चेखव से मेरा पहला साक्षात्कार हुआ. उनकी वन्या, तितली, क्लर्क की मौत और दुल्हन आदि कहानियों में सबसे अधिक प्रभावित मैं ‘दुल्हन’ कहानी से हुई थी. यही वजह है कि ‘दुल्हन’ याद भी रह गयी.

‘दुल्हन’ एक ऐसी लड़की (नाद॒या) की कहानी है, जो कुछ ही दिनों में दुल्हन बनने वाली है. दुल्हन के जो सपने होते हैं, उमंगे होती हैं, वो सब ‘नाद॒या’  में भी है. सगाई के बाद घर में शादी का माहौल है. शादी की होने वाली तैयारियों को लेकर वह बेहद खुश है लेकिन कहानी जहाँ ख़त्म होती है, वह दिलचस्प है कि ‘नाद॒या’ बिना व्याह किये घर छोड़कर चल देती है जिंदगी के एक नये सफर पर…जीवन के किसी और ही उद्देश्य के लिए. उस होने वाली ‘दुल्हन’ में ‘दुल्हन’ बनने की रूचि ही ख़त्म हो चुकी होती है.  इस कहानी को एक बार में समझना कठिन है. एक बार में पढ़कर कोई भी यह सोच सकता है कि आखिर इसमें पागलपन के सिवा है क्या ? जिस लड़की की अच्छी–खासी शादी होने वाली थी. वह अचानक घर छोड़कर चली जाती है वो भी कहाँ और किसलिए …. कोई नहीं जानता. वह खुद भी नहीं जानती .

दरअसल कमोवेश  ‘चेखव’ के सभी पात्र करीब करीब ऐसे ही होते हैं. चेखव समाज के यथार्थ से गहरे जुड़े थे. जैसे तालस्ताय, गोर्की और हमारे, ‘सबके’ प्रेमचंद .चेखव के बारे में कम शब्दों में कहा जाये तो चेखव के दादा मिखायल लोविच, गुलाम (एक बंधुआ) थे, उन्होंने ३५०० रूबल देकर अपनी आज़ादी खरीदी थी. पिता एगोरोविच चेखव जनरल स्टोर की दुकान चलाते थे. चेखव के चार भाई और एक बहन थी. चेखव पेशे से डाक्टर अवश्य थे ,लेकिन साहित्य और नाटक में दिलचस्पी होने की वजह से उन्होंने अपना अधिक समय दिया नाटक और साहित्य को. उन्होंने रुसी समाज को बेहद करीब से देखा था, उस समाज के अंदर जो क्रूरता और बर्बरता थी उसे उन्होंने अपनी कहानियों और नाटकों के पात्रों के माध्यम से दर्शाया.

जिस तरह गोर्की ‘मेरा बचपन’ में रूस की सामाजिक व्यवस्था की धज्जियाँ उघाड़ कर रख देते हैं उसी तरह चेखव बहुत ही खामोशी से व्यवस्था की परत दर परत उघाड़ते हैं. खुद चेखव ने एक जगह लिखा कि – ‘मेरे दिमाग में ऐसे लोगों, चरित्रों की पूरी पलटन  भरी है, जो दिन-रात अपनी मुक्ति के लिए प्रार्थना करती है.’ साथ ही उन्होंने लिखा है कि – ‘मैंने अभी तक जो कुछ भी लिखा है, पांच-दस साल में लोग सब भूल जायेंगे. लेकिन संतोष मुझे यही है कि जो रास्ता खोल दिया है, वह जीवित रहेगा. यही मेरी लेखक की दृष्टि से सबसे बड़ी सफलता होगी.’  एक लेखक अपनी लेखकीय कोशिश से अवगत है, यह बहुत बड़ी बात होती है, जो भविष्य की कोख में झांक सकता है और जानता है कि आने वाली नस्लें कैसी होगी. और उसके लिए उम्मीद छोड़ जाता है. ‘दुल्हन’ कहानी मुक्ति और भविष्य का सशक्त उदाहरण है. मुक्ति के कई मायने होते हैं. इंसान कई बार सामाजिक बन्धनों, ढकोसलों, रुढियों के बंधन से मुक्ति चाहता है तो कभी अपने अंदर के अज्ञान से, तो कभी कभी खुद से खुद की मुक्ति चाहता है.

नाद॒या तेइस साल की है. जो कि सोलह साल की उम्र से व्यग्रता से शादी के सपने देख रही थी, ‘आंद्रेइच’ से उसकी सगाई हो चुकी है. वह आंद्रेई को पसंद करती थी. शादी की तारीख सात जुलाई तय कर दी जाती है.
कहानी का एक दिलचस्प पात्र है – ‘साशा’, जो नादया की दादी की दूर के गरीब रिश्तेदार का बेटा है. साशा की माँ मरते वक्त साशा को नादया की दादी के हवाले सौंप गयी थी. साशा देखने में रुग्न और साधारण है, लेकिन उसकी बातें असाधारण हैं. वह अख्खड़/अराजक किस्म का कलाकार है. छुट्टियों में बीमारी से आराम पाने के लिए नाद॒या के घर आता है. संभ्रांत परिवारों की त्रासदी पर रौशनी डालता हुआ नाद॒या से कहता है – ‘यहाँ की हर चीज़ बड़ी अजीब लगती है, निकम्मे कहीं के. कोई कभी काम नहीं करता. तुम्हारी माँ रानी की तरह टहलने के आलावा कुछ नहीं करती है. दादी भी कुछ नहीं करती है और न तुम. और तुम्हारा मंगेतर, वह भी कुछ नहीं करता है. साशा अक्सर ऐसी बातों की ओर इशारा करता है जो एक घिसी-पिटी जिंदगी होती है. वह खोखले समाज के रहन-सहन और उसकी कुरीतियों पर बेबाक राय देता है. नाद॒या उसकी बातों की आदी हो चुकी है फिर भी वह अपने मंगेतर का अपमान नहीं सह पाती.  वह चिढ जाती है और साशा से शिकायत करती है कि – ‘तुम मेरे मंगेतर से जलते हो, तुमने मेरे आंद्रेई के बारे में जाने क्या क्या कहा, लेकिन तुम उसे जरा भी नहीं जानते.’साशा कहता है – “तुम कभी थकती नहीं,  बोरियत नहीं होती तुम्हे अपनी जिंदगी से ?’”

‘नाद्या’ अपने मंगेतर के प्यार में गिरफ्त है, जो कि तगड़ा, खूबसूरत और घुंघराले बालों वाला नौजवान है, जिसे वह अभिनेता या कलाकार मानती है, हमेशा उसका पक्ष लेती है. वह अपने मंगेतर के बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहती लेकिन वही नादया बाद में साशा से कहती है – ‘पता नहीं, मैंने इस मूर्ख को कैसे प्यार किया?’

परिस्थियाँ बदलती हैं या जीवन के पक्ष बदलते हैं, तो अपने-आप हर बातों के मायने भी बदल जाते हैं. आम से आम इंसान की सोच बदल जाती है और वो खास हो जाता है. ‘नाद्या’ को साशा की जो बातें विचित्र और पागलपन भरी लगती थी, उन्हीं बातों ने उसके दृष्टिकोण और जीवन दोनों को बदल दिया कि – ‘सबसे बड़ी बात है जीवन को उलट-पुलट देना.’अपनी शादी के लिए बेचैन और उतावली ‘नाद्,या’ जब शादी के कुछ ही दिन रह गये थे,  बेहद उदास हो जाती है. शादी की होने वाली तैयारियों से उसे चिढ सी हो रही है. वह माँ से कहती है – ‘मैं बहुत उदास हूँ. मैं किसी ऐतिहासिक बात की कल्पना करने की कोशिश करती हूँ.’

वह चिडचिडी हो चुकी है . उसे लगता है कि उसे समझने में हर कोई असमर्थ और अयोग्य है और तब वह साशा से कहती है, – ‘क्या तुम मेरे रोजमर्रा की बातें सुनोगे? मेरा जीवन बहुत ही नीरस है” इस वाक्य में रोज़ के एक ढर्रे पर चलने वाली जिंदगी की एकरसता का आभास होता है. आदमी कितना भी खुश, सुखी और संतुष्ट क्यों न हो उसमें अगर कोई परिवर्तन न हो, साशा के शब्दों में ‘उलट-पुलट’ न हो तो वह जीवन नहीं है.
साशा नाद्या को ‘नयी राह’ दिखाता है, वह कहता है, – ‘तुम कहीं चली जाओ और पढो. केवल सुविज्ञ और संत व्यक्ति दिलचस्त होते हैं, और जितने भी ऐसे आदमी होंगे उतना ही शीघ्र पृथ्वी स्वर्ग होगा. गतिरुद्ध और नीरस जिंदगी से हर इंसान ऊब जाता है.‘

जब ‘नाद्या’ पहली बार साशा से कहती है – ‘मैं शादी करने जा रही हूँ.” साशा कहता है – ‘उससे क्या होगा, सभी शादी करते हैं, मेरी प्यारी. तुम्हारी बेकार सी जिंदगी घृणात्मक और अनैतिक है.  तुम देखती नहीं तुम्हारे लिए दूसरे लोग काम करते हैं और तुम दूसरों की जिंदगी नष्ट कर रही हो. क्या यह गंदा और घिनौना नहीं है.
नाद्या को लगता है वह यह सब पहले कहीं पढ़ चुकी है. वह अपने मंगेतर के बारे में सोचती है. अपनी शादी के बारे में सोचती है. वह अपनी माँ की नीरस शादी को देख रही है उसमें ऊब और चिड़चिड़ाहट के अलावा कुछ भी अनुभव नहीं करती. इस कहानी में नाद्या  की दादी और उसकी माँ नीना भी अहम किरदार है. तीन पीढ़ियों का अंतराल साफ़ दिखाई देता है. उसकी माँ के वाक्यों से इस कहानी को गहराई से समझा जा सकता है.
“मैंने अपनी जिंदगी तबाह कर ली, मैं जिंदगी चाहती हूँ, जिंदगी …. मैं अभी जवान हूँ. मैं जिंदगी चाहती हूँ. जीना चाहती हूँ” ‘नाद्या’  को तब समझ में आता है कि उसकी जिंदगी भी उसकी माँ की तरह बेरंग और बेकार होने वाली है. साशा से कहती है – “मैं इस तरह नहीं रह सकती, पता नहीं, पहले यहाँ कैसे रहती थी. बिलकुल समझ नहीं पाती. मैं अपने मंगेतर से नफ़रत करती हूँ. अपने आप से नफ़रत करती हूँ…. मैं इस पूरी काहिल और खोखली जिंदगी से नफ़रत करती हूँ. साशा कहता है – “तुम चली जाओ और पढो. कहीं भी चली जाओ. अपने आप रास्ता निकल आएगा. जैसे ही तुम अपनी जिंदगी बदल दोगी. उलट-पलट दोगी. हर चीज़ बदल जायेगी,’  और वह चली जाती है. बाहर की दुनिया में, ठीक उस दिन, जिस दिन उसकी शादी होंने वाली है. उसे अपनी जिंदगी का मकसद समझ में आ जाता है. उसे महसूस होता है कि अब तक कितनी अवांक्षित, बेमानी और बेकार थी उसकी ज़िन्दगी.

चेखव

जब वह वापस शहर लौटती है, तब देखती है कि वहां की नौकरानियों के रहने का एक ही ढंग है. तहखाने में गंदगी वैसे ही भरे हैं. उसे लगता है शहर बूढा हो रहा है या फिर से ताजगी और जवानी का इंतजार कर रहा है. काश पाक और नई जिंदगी आ जाए, तब हम सिर ऊँचा कर आगे बढ़ सकें, किस्मत की आँखों में आँखे डाल सकें. खुश रह सकें. ऐसी जिंदगी देर, सवेर आकर रहेगी, जरूर आयेगी.’ अचानक दादी का रोना सुनाई देता है. दादी के पास एक ‘तार’ पड़ा है जिसमें लिखा है – “साशा क्षय (टीबी) रोग से मर गया.”‘नाद्या’  अब समझ गयी थी, अच्छी तरह … “जीवन में उलट-पलट का मतलब”  … और वह चल पड़ती है. उसकी कल्पना में नई, वृहत और विशाल जिंदगी थी, हालाँकि यह जिंदगी अस्पष्ट और रहस्यमय थी, फिर भी उसे बुला रही थी, खीच रही थी…

‘नाद्या’  मात्र इस कहानी की नायिका नहीं है बल्कि समाज और उसके अंदर स्त्रियों को लेकर जो उदासीनता है. उसकी एक प्रतिनिधि है. स्त्री के  व्यक्तित्व और उसके तलाश की बात जब उठती है तो अक्सर लोगों को ऐसा लगता है कि वह मात्र प्रेम कर सकती है और एक प्रेमी से दूसरे प्रेमी बदल सकती है जबकि नाद्या अपने अस्तित्व की तलाश अपने अंदर करती हुई. बाहर की दुनिया में बेझिझक शामिल होती है.

दरअसल यह कहानी इस तरफ भी इशारा करती है कि लड़कियों को बचपन से ही मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से इस तरह से तैयार किया जाता है कि शादी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि है. जैसे लडकियाँ बनी ही हैं सिर्फ शादी करने के लिए… जिंदगी में इसके अलावा जैसे और कोई दूसरा काम नहीं, उद्देश्य नहीं, जैसे कि वह पैदा ही हुई है,  शादी करने के लिए.  इस तरह से उन्हें जिंदगी के यथार्थ और और बाहर की दुनिया से बिलकुल अनजान रखा जाता है, पूरी साजिश के तहत….

चेखव की महिला पात्रों के बारे में उनकी प्रेमिका ‘लीडिया एविलोव’ ने लिखा है कि कात्या (एक नीरस कहानी) ओल्गा इवानोवना (दुल्हन) या कुत्ते वाली महिला की विन्रम महिला पात्र चेखव की विश्वप्रसिद्ध स्त्री चरित्र है. यह प्रेम करती है, भावुक है और जिज्ञासापूर्ण खोज के माध्यम भविष्य के अन्तर में झांक कर कुछ पाना चाहती है. चेखव की ऐसी अनगिनत महिला पात्र पूरे विश्व में जिज्ञासापूर्ण खोज में शामिल हैं और यही वजह है कि आज की तारीख में पूरे विश्व में ‘नोरा’ और ‘नाद् या’ जैसी स्त्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. कुछ की अपनी वजूद है तो कुछ अपनी वजूद की तलाश के लिए संघर्षरत हैं….जहाँ जीवन का मकसद खोखली शादी से इतर और भी बहुत कुछ है, ‘खोज जीवन है….जिंदगी को उलट–पलट कर देना जीवन है.’  बिना किसी डर के,  बिना किसी चिंता के…

असीमा भट्ट से उनके ई मेल asimabhatt@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है .

विष्णु नागर की कवितायें

 ( विष्णु नागर के लिए  और उनकी कविताओं के लिए आलोचक विजय कुमार से बढिया
नहीं कहा जा सकता : आप क्या हैं? कोई पीर , कोई दरवेश  , कोई साधु या पडोस
में रहने वाला कोई अनासक्त योगी? या किसी दूसरी दुनिया से इस जन्म का
स्वप्न देखता हुआ कोई अकिंचन जीवधारी ? आपको एक साथ पढना कठिन काम है ,
यह इतना जबरदस्त नुकीलापन आपके भीतर कहां से आता है? …………. ये
साहित्यिक हाट में नहीं, जिंदगी की गहराइयों में समाने वाली कवितायें हैं.
आज पहला डा शिवकुमार मिश्र स्मृति सम्मान कविता के लिए विष्णु  नागर ,
आलोचना के लिए  वैभव सिंह  तथा कथा के लिए प्रकाश कांत को दिया जा रहा है.
विष्णू नागर की 5 स्त्रीवादी कवितायें स्त्रीकाल के पाठ्कों के लिए .  )

1. किसी दिन उनकी स्त्री बन कर रहना

हां मुझे स्त्रियां अच्छी लगती हैं
उनकी सुन्दरता, उनका यौवन, उनका उत्साह ,उनका आग्रह
उनकी मुस्कुराहट , उनकी बातें , उनका संग –साथ
उनका पास से गुजर जाना, उनका स्पर्श पा जाना
उनका सपने में चला आना , उनकी यादों में खो जाना
उन्हें कनखियों से देखना , आड से छिप कर देखना
कभी उनके साथ चलना , कभी उनके पीछे-पीछे
उनके नेतृत्व में चलने में गौरव महसूस करना

कभी उनके साथ चाय पीना, कभी उनकी शिकायतें सुनना
उनके साथ गाना , उनके देर तक संगीत की तरह सुनते चले जाना
उनके क्रोध , उनकी निराशाओं में साझा करना
उनके मौन में , उनकी मुखरता में उनका साथ देना

उनकी बातों में छिपे अर्थ खोजने में
कभी –कभी बहुत दूर चले जाना, कभी जल्दी हार जाना
कभी उन्हें समझकर न समझना , कभी उनसे उलझना –लडना और हारना
कभी उनका पहल करना , कभी उनका भ्रम में रखना
कभी उनके साथ भावुक हो जाना , कभी रोने लग जाना
उनके लिए इंतजार करना , उनसे कभी इंतजार करवाना
उनके संघर्षों में साथ देना , उनके लिए जगह बनाने के लिए खडे हो जाना
उनकी आजादियों पर खुश होना ,
उनकी गुलामियों के खिलाफ खुलकर बोलना
उनके कन्धे पर हाथ रखना, उन्हें अपने में समेट लेना , उनमें सिमट जाना
और कभी –कभी उनके साथ खुद भी
स्त्री की तरह सोचने-देखने लग जाना
किसी दिन खुद भी उनकी स्त्री बनकर , उनके साथ रहना

2. विगत प्रेम

वह सुबह ऐसे उठता है जैसे अगर सूरज पर नहीं तो
अपनी पत्नी पर तो जरूर एहसान कर रहा है

वह चाय ऐसे मांगता है जैसे किसी से पुराना कर्ज मांग रहा हो
वह अखबार ऐसे पढता है जैसे जांघ खुजलाने के साथ
किया जानेवाला कोई अनिवार्य कर्म हो
वह फोन ऐसे करता है , जैसे इस दुनिया पर
आजकल उसी का राज चल रहा है
वह मुस्कियाता ऐसे है जैसे पाद अटक गया हो बीच में
वह रोटी ऐसे खाता है जैसे समय की बर्बादी हो रही है
मानवीयता के नाते ही वह इतना सब सह रहा है
लेकिन उसकी पत्नी को उसके इस वर्णन पर सख्त ऐतराज है
वह कहती है वह जैसा भी है, उसका सुहाग है .

3. तुम मेरे प्रेमी होते

तुम मेरे प्रेमी होते
तो तुम्हें सपने देखने की जरूरत ही नहीं पडती
तुम मेरे प्रेमी होते
तो तुम्हारे सामने रास्ते ही रास्ते
मंजिलें ही मंजिलें होतीं
हर मंजिल एक रास्ता होती
हर रास्ता एक मंजिल हो जाता
बल्कि तुम रास्तों और मंजिलों की भाषा भूल जाते
तुम दूरियों को मीलों मे नापना भूल जाते
तुम दूरियों को दूरियों की तरह देखना भूल जाते

तुम आग हो जाते
तो मैं पानी
तुम पानी हो जाते तो मैं आग

पानी और आग इतने एक हो जाते
कि लोग आग से पूछते कि पानी को कहां छोड आये
यही पानी के साथ भी होता
बल्कि लोग दोनों को एक ही समझते

लेकिन तुम मेरे पति होना चाहते थे
आग को पानी से बुझा देना चाहते थे
हवा को आग के करीब आने से रोक देना चाहते थे
तुम प्यार को मन्दिर और मस्जिद में बदल देना चाहते थे
मंत्र और नमाज में बदल देना चाहते थे
तुम मुझे खा –पीकर खर्च कर देना चाहते थे
और तुमने खो दिया
मगर मैंने अपने को अब फिर से पा लिया है.

4, वह समझती थी
मैं उसे धमकाता था
और वह समझती थी
यह भी प्यार करने का मेरा एक तरीका है

5. आलोचक
पत्नी से बडा कोई आलोचक नहीं होता
उसके आगे नामवर सिंह तो क्या
रामचन्द्र शुक्ल भी पानी भरते हैं
अब ये उनका सौभाग्य है
कि पत्नियों के ग्रंथ मौखिक होते हैं , कहीं छपते नहीं.

विष्णु नागर से उनके मोबाइल नम्बर 9810892198 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

कुँए में मेंढक

पुटला हेमलता/अनुवाद : डॉ. जी. वी. रत्नाकर

( पुटला हेमलता द्वारा लिखित तेलगू की यह कहानी भारतीय भाषाओं में हो रहे दलित स्त्री लेखन का एक हिस्सा है. इसे स्त्रीकाल के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं फारूक शाह )

फारूक शाह का नोट

दलित नारी लेखन में जाति और जेंडर के प्रश्नों के साथ-साथ समाज, संस्कृति और व्यवस्था में हाशिये  के  रूढ़ विषम पहलुओं की समीक्षा मिलना भी एक मूलभूत तत्त्व है. व्यवस्था के अबूझ पक्ष सवालों की तरह उजागर होते है. जिनके जवाब ढूँढने अभी बाक़ी है. इस तरह इतिहास शोधन और न्याय-परक नव्य इतिहास बोध के स्तर इस लेखन से निर्मित होते हैं. तेलुगु के नारीवादी लेखिका पुतला हेमलता की एक कहानी देखें, इस कहानी में अनाथ बच्चा श्रीनू, कि जिसे ओबुलम्मा ने पाला-पोषा है. उसे बाहरी दुनिया के खतरों से सुरक्षित रखने के लिए ओबुलम्मा उसे पकड़े रखने की कोशिश करती है. फिर भी श्रीनू ऊपर आकाश और नीचे धरती के बीच निराधार है. वह ख़ुद इस बात को महसूस करता है. परिस्थितियों के कारण बचपन में ही प्रौढ़ सा बन गया है श्रीनू. उसने रेलवे स्टेशन और ओबुलम्मा की खोली के अलावा कुछ देखा नहीं. उसके लिए दुनिया का नाप उतना ही, जितनी कि उसके हिस्से में आई. रेल में फली बेचने वाला छोटा सा बच्चा स्टेशन के अलावा आसपास के गाँव-शहर भी देखना चाहता है, और वह अंधेरों से घिर जाता है. छोटी सी दुनिया को नापता श्रीनू अचानक, अनजाने ही, एक यांत्रिक क्रिया के चलते काल के मुंह में चला जाता है. कहानी व्यवस्था की पहेलियों या नियति के मोड़ पर आकर रुक जाती है… इस तरह  कुएँ के मेंढक की नियति झेलते लाखों–करोड़ों बच्चें है. बच्चों का अनाथ होना, दूसरों के हाथों उनका पालन-पोषण होना और उन बच्चों की असमय मृत्यु होना – ऐसा समाज और संस्कृति का एक ऐतिहासिक पक्ष रहा है. हम सोचें  तो व्यवस्था से गढ़ी हुई ऐसी कई सारी नियति अबूझ ही रहती हैं. अबूझ स्थितियों के बयान से उपाय की ओर सक्रिय होने का आह्वान मिलता है. कहानी का यह मुख्य सूर है. इस कहानी का अनुवाद हमारे लिए तेलुगु कविमित्र डॉ. जी.वी. रत्नाकर ने किया है. प्रस्तुत है कहानी ‘कुएँ में मेंढक’ :

कुँए में मेंढक

 रेल ने जैसे ही स्टेशन छोड़ा, स्टेशन की भीड़ छंटने लगी. कुली भी अपना-अपना सामान उठाकर बाहर की ओर जाने लगे. चहल-पहल कम हो गई.

 श्रीनू अपनी फली की टोकरी लिए प्लेटफ़ॉर्म पर एक कोने में बैठा है. एक हाथ से सिक्के गिन, वह अपनी जेब में डाल रहा है. उसने टोकरी से एक कवर निकाला और सभी सिक्के उसमें डाल दिए. फिर उस कवर को संभालकर रख दिया. वह सोचने लगा – “अभी तक कोटि क्यों नहीं आया ? पंद्रह मिनट के बाद एक पेसेन्ज़र ट्रेन आने वाली है, तब अगर थोड़े रुपये का सौदा कर लूं तो घर में शायद गालियाँ कम खानी पड़े.” और एक बार पैसे के कवर को देखा, उसे सुकून महसूस हुआ. कवर ठीक से जेब में रख वह तिरुपति एक्सप्रेस में चढ़ गया और… ‘फली ले लो… ताजी ताजी फली ले लो…’ – ऐसी आवाज लगाने लगा. चार साल का एक लड़का टोकरी को लालच भरी नज़र से देख रहा था. श्रीनू उस लड़के के मनोभाव को भांप गया और ज्यादा जोर से आवाज लगाने लगा.

“माँ, मुझे भी फली चाहिए…” कहते हुए लड़का रोने लगा. माँ कुछ देर तो मनाती रही, पर आखिर हारकर उसने श्रीनू को एक रुपये की फली देने को कहा और दो रुपये दिए.

श्रीनू ने फली का पैकेट बांधकर बच्चे को दिया. जब चिल्लर के लिए जेब में हाथ डाला तो पाया कि सिक्के गायब थे. शायद चोरी हो गए थे. श्रीनू की हालत खराब हो गई. काटो तो खून न निकले. आँखों से आंसू बहने लगे. वह अच्छी तरह जानता था कि रेलवे स्टेशन पर कई जेब-कतरे होते हैं. फिर उसे लगा कि गरीब की जेब भला, कोई क्यों काटेंगा ? पर आज उसे पहली बार यह अहसास हुआ कि गरीब की जेब भी काटी जाती है. रेल से कब उतरा उसे होश न रहा. आंसू पोंछते हुए वह तुर्रा के पेड़ के नीचे बैठ गया. नज़रों के सामने ओबुलम्मा का चेहरा तैरने लगा.

श्रीनू का जन्म कब और कहां हुआ ? पता नहीं. कोई रेलवे स्टेशन पर छोड़ गया था. ओबुलम्मा, जो वडा बेचती थी, उसने बच्चे को पाला-पोषा और नाम रखा ‘श्रीनिवास राव’. लेकिन सभी लोग उसे ‘श्रीनूगाडु’ कहकर ही बुलाते थे. जब कोई पूछता तो बड़े गर्व से वह अपना नाम ‘श्रीनिवास राव’ बताता. ओबुलम्मा का पच्चीस साल का बेटा बहुत पहले गाँव छोड़कर चला गया था. फिर भी ओबुलम्मा को आस बंधी रहती थी कि वह एक दिन तो जरूर लौटकर आएगा. जब श्रीनू दस साल का हो गया तब ओबुलम्मा ने उसे रेल में फली बेचने का काम सौंपा.

पहले तो उसे बहुत अच्छा लगा. लेकिन बाद में कई सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा. पहले-पहल तो श्रीनू से बड़े फली बेचने वाले उसे रेल के डिब्बे से जबरदस्ती उतार देते थे. क्योंकि वह उम्र में सबसे छोटा था. और अगर वह बिना सौदा किए घर जाता तो ओबुलम्मा उसे पीटती थी.

धीरे-धीरे श्रीनू को दुनियादारी की समझ आने लगी. जो औरों पर धाक जमाता है उसी की चलती है. श्रीनू की हालत कुँए में मेंढक जैसी हो गई. उसकी दुनिया मात्र स्टेशन तक सीमित थी. हर रोज वह रेलवे स्टेशन पर कई तरह के लोगों को देखा करता. विदेशियों को वह तरह-तरह की वेशभूषा में निहारता रहता.

“अभी पंद्रह मिनट में ही पेसेन्ज़र ट्रेन आने वाली है, अब तक कितनी कमाई हुई ?” कोटिगाडु ने पूछा. श्रीनू ने अनसुना कर कोटि से ही सवाल किया – “उसकी बहन का गाँव कैसा है ?”

कोटि ने बड़े उत्साह से झुककर कहा – “ओहो… हैदराबाद ? क्या बताऊँ ? तुम ही अपनी आँखों से देखना… बड़ी-बड़ी सड़कें, रंग-बिरंगी रोशनियाँ, यात्रा गए पर गए हों ऐसा सारा माहौल. अरे हाँ, तूने कभी रंगीन सोड़ा पीया है ?” कोटि ने होठों पर जीभ फेरते हुए पूछा.
“नहीं.” श्रीनू ने जवाब दिया.
“अरे श्रीनू, तू वरंगल तक पेसेन्ज़र ट्रेन में फली तो बेच सकता है ना ?” कोटि ने पूछा.

“रहने दे ! ओबुलम्मा नहीं मानेंगी. वह राक्षसनी है.” श्री ने हताशा भरे स्वर में कहा और कोटिगाडु की ओर देखने लगा.

वह बड़बड़ाने लगा – “मुझे बचपन से ही शहर पसंद है. जब से पैदा हुआ हूँ, इस गाँव को छोड़ कोई दूसरा गाँव ही नहीं !”

उसका चेहरा देखकर कोटिगाडु को हँसी आ गई. वह कहने लगा – “मैं तो पेसेन्ज़र ट्रेन में कई बार वरंगल जाता हूँ. एक घंटे का तो सफ़र है. इस दौरान हम आराम से फली बेच सकते हैं. बहुत ही मज़ा आता है.”

धन… धन… की आवाज करती ट्रेन आ पहुँची.

“श्रीनू, देखो, तुम औरतों के डिब्बे में चले जाओ ! मैं जनरल डिब्बे में जाता हूँ.” कोटि ने कहा.

सारा दिन श्रीनू बहुत ही उदास रहा. खाना भी ठीक से नहीं खाया. खाट पर लेटकर वह आसमान की ओर देखता रहा. सांझ से ही ओबुलम्मा श्रीनू के व्यवहार को देख रही थी.

“श्रीनू, बेटा क्या बात है ?” उसने पूछा. श्रीनू एक मिनट के लिए रुका, फिर जवाब दिया  – “मां, मैं भी कोटि के साथ वरंगल तक फली बेचने जाया करूंगा. हमें बहुत नफ़ा होगा.” बोलते समय उसकी आंखें उलझन के कारण विस्फारित होने लगी.

ओबुलम्मा को हंसी आ गई. श्रीनू के सिर पर हाथ रखते वह बोली – “बेटा, तुम छोटे हो, नादान हो, इसलिए मैंने तुम्हें आज तक कहीं दूर जाने नहीं दिया. वैसे भी मैं एक बेटा तो खो चुकी हूँ. अब तुम्हें खोना नहीं चाहती. मैं कठोर भले ही लगूं, लेकिन मेरे हृदय में भी दया और ममता है. कोटि के साथ तुम्हें जरूर जाने दूँगी. ठीक लगे तो रोज जाना वरना नहीं.”

अविश्वास से श्रीनू ने माँ की ओर देखा. खुशी के मारे वह सो न पाया. रात भर सपने देखता रहा कि वह वरंगल तक फली बेचकर आता है… और ढेर सारे रुपये ओबुलम्मा के हाथ में रख देता है…

 “बेटा… संभालकर कोटि के साथ जाना.” पानी भरने जाते हुए ओबुलम्मा ने कहा.

कोटिगाडु के साथ श्रीनू उत्साह से चल पड़ा. जिस ट्रेन में वे जा रहे थे उसने आलेर स्टेशन छोड़ा. कोटि दूसरे डिब्बे में था. श्रीनू तो फूला समा नहीं रहा था. दरवाजे पर खड़ा-खड़ा बाहर के पेड़, बिजली के खम्भे देख रहा था. वहां पर दो शराबी आपस में गाली-गलौच कर रहे थे.

श्रीनू यथार्थ भूमि को छोड़ कल्पना-लोक में विचरने लगा. उसके पीछे जो शराबी थे वे मारपीट पर उतर आए. एक के पाँव की मार श्रीनू की पीठ पर पड़ी. उसने उठने की कोशिश की. तभी एक शराबी उस पर आ पड़ा. श्रीनू डिब्बे से बाहर उछलकर गिर गया. उसका सिर धड़ाम से एक पत्थर के साथ टकराया. सिर से खून बहने लगा. उसने बलपूर्वक आंखें खोली. उसे तेज रफ़्तार से जाती ट्रेन, अपनी ओर घूरती यात्रियों की आंखें और खुले आकाश के अलावा दूसरा कुछ भी न दिखाई दिया. उसकी पलकें हमेशा के लिए बंद हो गई.

ओबुलम्मा कुएँ से पानी निकाल रही थी. देखा तो पानी में मेंढक था. उसने मेंढक को बाल्टी में ही रहने दिया. तभी कोटिगाडु, श्रीनू के मरने की खबर लेकर आया. कोटि के चेहरे की उदासी देख ओबुलम्मा उसकी ओर भागी. बाल्टी का मेंढक आश्चर्य से चारों ओर देख रहा था. वह मेंढक, जो कुएँ में ही पैदा हुआ था, पला-बढ़ा था और कुआं ही जिसकी दुनिया थी. पर आज उसे चारों ओर का दृश्य विचित्र लगाने लगा. उसके लिए यह दुनिया नयी थी. वह कभी सोच भी नहीं सकता था कि बाहर की दुनिया इतनी बड़ी हो सकती है. सृष्टि के रमणीय वातावरण को देखने वह अचानक ही उछला, पर गलती से वापस कुँए में ही जा गिरा. उसने देखा, नीचे गोल-गोल घुमता पानी था… ऊपर प्लैट जैसा आसमान.