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स्मृतिशेष अनुराधा मंडल की कवितायें .

( अनुराधा मंडल आज ही हमें अलविदा कह गईं ,वे लम्बे समय से बीमार थीं . उन्हें स्तन कैंसर था , जिससे वे 2012 में ही लड कर जीत चुकी थीं . बेहद संवेदंशील इंसान और कवयित्री अनुराधा की जिंदादिली की  कुछ पंक्तियां और दो कवितायें. स्त्रीकाल की ओर से उन्हें विनम्र श्राद्धांजलि !)

अनुराधा का आह्वान : 


कई तकलीफों का मुफ्त इलाज है हंसी। ज़ाहिर है, कैसर होने की खबर पाने के बाद कोई हंसता हुआ डॉक्टर के कमरे से नहीं निकलता, लेकिन ये भी सच है कैंसर हजारों बार हंसने के मौके देता है। हंसी कैंसर से जुड़ी चिंताओं को भुलाने का मौका देती है और मरीजों की जिंदगी के अंधेरे कोनों तक भी पहुंचने के लिए रौशनी की किरण को रास्ता बताती है। एक बीमारी ही तो हुई है, उसकी चिंता में आज जिंदगी जीने से क्यों रुका जाए भला! और अगर सचमुच जिंदगी कम बाकी है तब तो और भी जरूरी है कि सब कुछ किया जाए। भरपूर जी भी लिया जाए, जल्दी-जल्दी। ताकि कुछ बाकी न रह जाए।

कवितायें 

1. मेरे बालों में उलझी मां

मां बहुत याद आती है

सबसे ज्यादा याद आता है

उनका मेरे बाल संवार देना

रोज-ब-रोज

बिना नागा

बहुत छोटी थी मैं तब

बाल छोटे रखने का शौक ठहरा

पर मां!

खुद चोटी गूंथती, रोज दो बार

घने, लंबे, भारी बाल

कभी उलझते कभी खिंचते

मैं खीझती, झींकती, रोती

पर सुलझने के बाद

चिकने बालों पर कंघी का सरकना

आह! बड़ा आनंद आता

मां की गोदी में बैठे-बैठे

जैसे नैया पार लग गई

फिर उन चिकने तेल सने बालों का चोटियों में गुंथना

लगता पहाड़ की चोटी पर बस पहुंचने को ही हैं

रिबन बंध जाने के बाद

मां का पूरे सिर को चोटियों के आखिरी सिरे तक

सहलाना थपकना

मानो आशीर्वाद है,

बाल अब कभी नहीं उलझेंगे

आशीर्वाद काम करता था-

अगली सुबह तक

किशोर होने पर ज्यादा ताकत आ गई

बालों में, शरीर में और बातों में

मां की गोद छोटी, बाल कटवाने की मेरी जिद बड़ी

और चोटियों की लंबाई मोटाई बड़ी

उलझन बड़ी

कटवाने दो इन्हें या खुद ही बना दो चोटियां

मुझसे न हो सकेगा ये भारी काम

आधी गोदी में आधी जमीन पर बैठी मैं

और बालों की उलझन-सुलझन से निबटती मां

हर दिन

साथ बैठी मौसी से कहती आश्वस्त, मुस्कुराती संतोषी मां

बड़ी हो गई फिर भी…

प्रेम जताने का तरीका है लड़की का, हँ हँ

फिर प्रेम जो सिर चढ़ा

बालों से होता हुआ मां के हाथों को झुरझुरा गया

बालों का सिरा मेरी आंख में चुभा, बह गया

मगर प्रेम वहीं अटका रह गया

बालों में, आंखों के कोरों में

बालों का खिंचना मेरा, रोना-खीझना मां का

शादी के बाद पहले सावन में

केवड़े के पत्तों की वेणी चोटी के बीचो-बीच

मोगरे का मोटा-सा गोल गजरा सिर पर

और उसके बीचो-बीच

नगों-जड़ा बड़ा सा स्वर्णफूल

मां की शादी वाली नौ-गजी

मोरपंखी धर्मावरम धूपछांव साड़ी

लांगदार पहनावे की कौंध

अपनी नजरों से नजर उतारती

मां की आंखों का बादल

फिर मैं और बड़ी हुई और

ऑस्टियोपोरोसिस से मां की हड्डियां बूढ़ी

अबकी जब मैं बैठी मां के पास

जानते हुए कि नहीं बैठ पाऊंगी गोदी में अब कभी

मां ने पसार दिया अपना आंचल

जमीन पर

बोली- बैठ मेरी गोदी में, चोटी बना दूं तेरी

और बलाएं लेते मां के हाथ

सहलाते रहे मेरे सिर और बालों को आखिरी सिरे तक

मैं जानती हूं मां की गोदी कभी

छोटी कमजोर नाकाफी नहीं हो सकती

हमेशा खाली है मेरे बालों की उलझनों के लिए

कुछ बरस और बीते

मेरे लंबे बाल न रहे

और कुछ समय बाद

मां न रही

* नोट- कैंसर के दवाओं से इलाज (कीमोथेरेपी) से बाल झड़ जाते हैं

2. अधूरा

सुनती हूं बहुत कुछ
जो लोग कहते हैं
असंबोधित
कि
अधूरी हूं मैं- एक बार
अधूरी हूं मैं- दूसरी बार
क्या दो अधूरे मिलकर
एक पूरा नहीं होते?
होते ही हैं
चाहे रोटी हो या
मेरा समतल सीना
और अधूरा आखिर
होता क्या है!
जैसे अधूरा चांद? आसमान? पेड़? धरती?
कैसे हो सकता है
कोई इंसान अधूरा!

जैसे कि
केकड़ों की थैलियों से भरा
मेरा बायां स्तन
और कोई सात बरस बाद
दाहिना भी
अगर हट जाए,
कट जाए
मेरे शरीर का कोई हिस्सा
किसी दुर्घटना में
व्याधि में/ उससे निजात पाने में
एक हिस्सा गया तो जाए
बाकी तो बचा रहा!
बाकी शरीर/मन चलता तो है
अपनी पुरानी रफ्तार!
अधूरी हैं वो कोठरियां
शरीर/स्तन के भीतर
जहां पल रहे हों वो केकड़े
अपनी ही थाली में छेद करते हुए।

कोई इंसान हो सकता है भला अधूरा?
जब तक कोई जिंदा है, पूरा है
जान कभी आधी हो सकती है भला!
अधूरा कौन है-
वह, जिसके कंधे ऊंचे हैं
या जिसकी लंबाई नीची
जिसे भरी दोपहरी में अपना ऊनी टोप चाहिए
या जिसे सोने के लिए अपना तकिया
वह, जिसका पेट आगे
या वह,जिसकी पीठ
जो सूरज को बर्दाश्त नहीं कर सकता
या जिसे अंधेरे में परेशानी है
जिसे सुनने की परेशानी है
या जिसे देखने-बोलने की
जो हाजमे से परेशान है या जो भूख से?
आखिर कौन?
मेरी परिभाषा में-
जो टूटने-कटने पर बनाया नहीं जा सकता
जिसे जिलाया नहीं जा सकता
वह अधूरा नहीं हो सकता
अधूरा वह
जो बन रहा है
बन कर पूरा नहीं हुआ जो
जिसे पूरा होना है
देर-सबेर।
कुछ और नहीं।
न इंसान
न कुत्ता
न गाय-बैल
न चींटी
न अमलतास
न धरती
न आसमान
न चांद
न विचार
न कल्पना
न सपने
न कोशिश
न जिजीविषा
कुछ भी नहीं।
पूंछ कटा कुत्ता
बिना सींग के गाय-बैल
पांच टांगों वाली चींटी
छंटा हुआ अमलतास
बंजर धरती
क्षितिज पर रुका आसमान
ग्रहण में ढंका चांद
कोई अधूरा नहीं अगर
तो फिर कैसे
किसी स्त्री के स्तन का न होना
अधूरापन है
सूनापन है?

अनुराधा मंडल आज ही हमें अलविदा कह गईं

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता -भाग 2

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता

(एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल के अनियतकालीन प्रकाशन और विशेषांकों के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये थे . इस लम्बे आलेख को हम तीन किश्तों में प्रकाशित करेंगे . यह दूसरा किश्त है , पहले किश्त के लिए यहां क्लिक करें यह आलेख पश्चिमी इतिहास लेखन में व्याप्त पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की पड्ताल करता है, जिसे भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में भी पढा जाना चाहिए .  मूल आलेख का हिंदी अनुवाद स्त्रीकाल के संपादक मंडल की सदस्य डा अनुपमा गुप्ता ने किया है .  रुस्सुम फ्लोरिडा ,यू एस ए, के एक कालेज में दर्शन पढाते हैं और डा अनुपमा एम जी आई एम एस , वर्धा , में कार्यरत हैं   रुस्सुम से LRussum@polk.edu पर संपर्क किया जा सकता है)

अरुणा बुरटे का रेखांकन

स्त्रीत्व  में दैत्यत्व की उपस्थिति की धारणा और इसीलिए उसे नकार दिये जाने की समझ अश्वेत स्त्रीवादी, उत्तर उपनिवेशीय व यौनता पर विचित्रा धारणाओं वाले लेखन में मुखर है, जिसमें एक स्पष्ट बोध है कि पश्चिमी इतिहास के अभिलेखन में इरादतन क्या-क्या छोड़ गया है। जब पश्चिमी पुरुषी- इतिहास की सत्यलेखन की दावेदारी पर प्रतिक्रिया देनी हो, तब दुर्लक्ष्यता की समझ का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है; ‘दुर्लक्ष्यता’ शब्द का प्रयोग इस समझ का प्रतिनिधित्व करता है कि इतिहास में स्त्री देह की निर्मिति यौनिकता के सच्चे स्त्री -अनुभवों की अनुपस्थिति में की गई है। दुः की यह उत्तर-औपनिवेशीय चर्चा पश्चिमी विचारधारा में मौजूद भेदभाव की आलोचना के लिए जमीन तैयार कर रही है। यह मुख्य कथानक से बाहर की आवाजों को सुने जाने का मौका दे रही है। स्त्री यौनिकता को हाशिये का लेखन मानने की समझ दार्शनिक जाक देरिदा के विखंडन (Deconstruction) के व्याख्यात्मक भाष्य सिद्धांत से विकसित हुई है।
विखंडन की धारणा का सार यह है कि पश्चिमी विवरणों में मूलपाठ/ इतर ( other ) के शब्दयुग्म ( Binary )  के जरिये मुख्यकथानक को हाशिये पर बढ़त हासिल है। समूचा पश्चिमी इतिहास स्वयं को व्याख्या का केन्द्र बना कर प्रस्तुत करता है, वह समर्थ का यथार्थ है। केन्द्रीय सत्ता संरचना की अनुमति के बिना किसी देह की दृश्यता की यहां कल्पना भी नहीं की जा सकती। और यह वही यूरोपकेन्द्रित कथ्य है, जिसका विश्व के सभी जनसमुदायों पर गहरा असर रहा है। पश्चिमी इतिहास ने स्वयं को सत्ता के मूल ढांचे की तरह स्थापित किया है और अधीनस्थ सत्ताओं पर नियंत्राण की ताकत में ही स्वयं की पहचान पाई है। स्वयं से इतर को नजरअंदाज करने वाली इस मुख्य पाठान्तर की भाषा किताब के पृष्ठ पर दी गई क्रमिक टिप्पणियों तक ही सीमित नहीं है। स्त्री-देह को दुर्लक्ष्य तब भी किया जाता है, जब किसी देह की तस्वीर दिखाई देती है। दुर्लक्षित करने, नकार देने की क्षमता तब नजर आती है, जब तस्वीर एक निगेटिव की तरह शुरू होती है, क्योंकि इसमें शोषित देह एक अलैंगिक बना दिये गये स्त्री-समुदाय की नुमाइंदगी करती है।

पुरुष- इतिहास स्वयं को उस मूल संदर्भ की तरह लेता है, जिसे खुद से अलग रह गये भाग को अर्थ प्रदान करने की जिम्मेदारी निभानी है (जो भोगा हुआ नहीं, बल्कि रचा गया यथार्थ है)µतस्वीर में औरतें हैं, लेकिन उनकी लैंगिकता कहीं दिखाई नहीं देती। लिपिबद्ध भाषा में निहित वर्गभेद के जरिये अपना नियंत्रण बनाये रखना ही इस इतिहास को रचने की विधि है। अब विखंडन की अवधारणा दावा करती है कि इसकी भाषा का सहज झुकाव समानताओं की ओर अधिक रहा है, यानी सहमति की ‘आवाजों’ को ही ग्रहण करने की ओर। इसका अर्थ यह हुआ कि मुख्यधारा का पश्चिमी इतिहास ‘हाशिये’ पर नियंत्रण द्वारा कृत्रिम रूप में सत्यापित की गई समानता प्राप्त करने के बारे में है। यहां ‘समानता’ कभी ‘समता’ के द्वारा प्राप्त नहीं की गई, अर्थात् पितृसत्तात्मक इतिहास के लिए द्वैत का अर्थ कभी दो समान ढांचों से नहीं रहा, बल्कि पहले भाव को विशेष बनाने के लिए दूसरे भाव को बहिष्कार का दंड भोगना पड़ा हैµकेन्द्र को दृश्यमान बनाये रखने के लिए इतर को दुर्लक्षित करने का यही अर्थ है। इससे एक समतापूर्ण नहीं, बल्कि श्रेणीबद्ध संरचना बनती है, जिसमें दूसरे स्थान के भाव को वर्गीकरण में हमेशा नकारात्मक माना जाता है। विलोम शब्दों के इस प्रकार के युग्मों के उदाहरण हमें भाषा में और भी मिलेंगे जैसे वाणी/ लेखन, अवधारणा/ रूपक, आंतरिक /बाहरी, उपस्थिति/ अनुपस्थिति, प्रकाश/ अंधकार, अमीर/ गरीब, इतरलैंगिक/ समलैंगिक और पुरुष/ स्त्री। विलोमों के वर्गभेद में वाणी लेखन को बहिष्कृत कर देती है, प्रकाश अंधकार को और उसी तरह पुरुष स्त्री को। यह बहिष्कार इतिहास में ऐसी पितृसत्ता की रचना करता है, जिसमें युग्म के दोनों शब्द एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं, क्योंकि यह व्यवस्था पहले शब्द के केन्द्र में स्थापित होने की मंशा पूरी करती है और इस दौरान दूसरे शब्द को हाशिये पर कथ्यहीन/ वाचाहीन/ अलैंगिक कोरी जमीन बना कर पृष्ठ के मुख्य भाग के बाहर कर दिया जाता है। यूरोपकेन्द्रित इतिहास में हाशिये का उपयोग सिर्फ टिप्पणियों के लिए किया जाता है, जिस पर मनचाहा उकेरा जा सके, मूलपाठ के मात्रा पूरक भाग की तरह, जिसे मूल पाठ में दुर्लक्ष्य कर दिया गया। यह हाशिया हमेशा वह ‘इतर’ रहा है, जिस पर से दृष्टि प्रयासपूर्वक हटा कर रखी गई हैµवह एक ऐसी सम्पूर्ण बाहरी चीज है, जिसकी आवाज का अस्तित्व ही नहीं है (देरिदा, 1982, पृ.-ग्प्प्प्)।

यही, हाशिये की इसी जमीन पर, मूलपाठ से ‘इतर’ के भाव में वह उत्तर-उपनिवेशीय विखंडन अपना अस्त्र उठाता है- हाशिये की आवाज को दृश्यता प्रदान करने के लिये, उसके टिप्पणी-स्वरूप की कैद से उसे आजाद करने के लिये और अब तक केन्द्र की भूमिका निभा रहे मूलपाठ को विस्थापित कर देने के लिये, यह अवधारणा दमन के झूठे युग्मों को धराशायी करती है। इस तरह यह अनिर्मित होते हुए भी ‘निर्मित’ कर रही होती हैं, क्योंकि यह हाशिये को दृश्यमान बना कर केन्द्र पर मानो किसी प्रेत के साये सी झूल रही है।
उत्तर-औपनिवेशीय विखंडन की अवधारणा शब्द युग्म को पलट कर और ‘इतर’ पक्ष की आवाज बन कर मूलपाठ को भीतर से खोखला कर रही है, जिससे वर्गभेद का ढाँचा भरभराने लगता है।

पुरूष/स्त्री  युग्म पलट कर अब
स्त्री /पुरूष हो जाता है और इस योजना में पुरूष के विशेषाधिकार वाली वर्गीकृत संरचना अपनी ताकत खो देती है; अब पुरूष के बारे में बात करते हुए स्त्री को बहिष्कृत नहीं किया जा सकता। इस परिवर्तन के बाद अब स्त्री को उस हाशिये की कैद में कभी नहीं रखा जा सकता, जो पुरूष/ स्त्री की शब्द योजना संभव थी। इससे श्रेणीबद्धता का खात्मा हो रहा है, दुर्लक्षित अब लक्षित बन रहा है। जहाँ यह वर्गभेद में गहरा संशय पैदा कर रहा है और वर्गीकरण और इससे उपजने वाले भेदभाव की संभावना खत्म कर रहा है, वहीं एक ‘दृश्यमान इतर’ की संभावना को जन्म दे रहा है. उलट-फेर का यह पल हाशिये पर स्त्री के लिये दुर्लक्षता की पहेली सुलझ जाने का समय है। यह नयी वैकल्पिक आवाज बहुधा हिंसा के जरिये राजनीतिक स्वरूप में आती है। ‘हिंसा’ एक ‘पारंपरिक स्त्री’ के मूल विचार को ही छिन्न-भिन्न कर देती है और हाशिये पर बैठी अब तक अनदेखी ‘डायनें’ साकार हो उठती हैं और मुख्य धारा के कथ्य की स्थिरता को हिला कर रख देती हैं, जो फिलीस्तीनी फिदायिनी (आत्मघाती) हमलावरों के उदाहरण से स्पष्ट है-‘‘फिदायिनी हमलों की हिंसा को राजनीतिक अभियान के स्वरूप में पहचानना एक फिदायिनी हमलावर को न तो छोटा करने की कोशिश है, न उसके महिमामण्डन की, बल्कि इन आत्मघाती स्त्रिायों को राजनीतिक कार्यकर्त्ता मानना उनके सैनिकीकरण और ऐसे राष्ट्रवाद की आलोचना का शुरूआती और जरूरी कदम है, जो स्त्री को मात्र डायन/फरिश्ता ‘स्त्रीहंता संस्कृति की शिकार’ के रूप में देखने से आगे जाता है , (Amireh, 2007, p. 207).

डायन करार दी गई स्त्री

दुनिया की बहुत सी स्त्रियों के लिये, वे जिनकी पहचान उनके बुर्के की नीली जाली के पीछे लापता हो गई है, या वे जिन्हें किर्गिजस्तान की सड़कों से सिर्फ इसलिए उठा लिया जाता है ताकि उन्हें ‘एक अपहृत दुल्हन’ बनाने के लिए मजबूर किया जा सके, या सूडान की वे युवतियाँ जिन्हें अपनी माँओं, दादियों, चाचियों, बेटियों और बहनों पर होते बलात्कार जबरन दिखाये जाते हैं ताकि वक सबक ले सकें कि जब उनके साथ यही सब हो तो उन्हें किस तरह ‘पेश’ आना है- उन सबके लिए विखंडन का यह उलट फेर शोषण से मुक्ति की आवाज बनकर आता है। अब वे ऐसी छायाएँ नहीं रह गई है जिनके बहिष्कार से ही पितृसत्ता स्वयं को परिभाषित करती थीं, बल्कि शब्द युग्म के उलट जाने से वे मुक्त हो गई हैं, युग्म खंडित हो गया है। इस खंडन से स्त्री /पुरूष की नई शब्द योजना में उन्हें मौका मिला है कि वे वह सब वापिस ले सके, जो उनका है- उनकी अपनी ‘आवाज’, उनकी ‘सत्ता’। पिछले कुछ हजार वर्षों के पुरूष- इतिहास में उनके द्वारा झेली गई अंतहीन गैरजरूरी पीड़ा के ‘गलत’ को ‘सही’ करने का यही मौका है। यह उलट फेर उन्हें शोषण के पुंसत्व केन्द्रीय प्रतीकों को फिर से दुनिया के सामने लाने के लिये यौनिकता को प्रामाणिक आवाज प्रदान करता है।

दुर्लक्षित के दृश्यता प्रदान करने के विचार को सिद्धांत रूप में रचने और विखंडित करने वाले उत्तर-उपनिवेशीय सिद्धांतकारों ने निश्चित ही हाशिये को एक आवाज दी है, किन्तु क्या यह वही पड़ाव है, जिस पर अब मुख्य कथानक को हम बख्श सकते हैं, क्या स्त्री -यौनता के संदर्भों की यही अंतिम परिणति है कि समूचे पितृसत्तात्मक इतिहास में स्त्री -कथ्य कभी-कभार सत्ता पर अपने अस्थायी अधिकार को मुक्ति के कुछ द्वीपों की तरह इंगित करें और असल में, व्यापक परिप्रेक्ष्य में वे हाशिये पर ही बनी रहें? क्या देह-कथाएँ मात्रा केन्द्र/परिधि के शब्द-युग्म के रूप में ही लिखी जा सकती हैं? यदि शोषित यौनिकता की ये कहानियाँ इतिहास और वंशविरूदावलियों के बीच का नव-इतिहास है तो इनके अस्तित्व में आने के बाद पश्चिमी इतिहास के मुख्यधारा के कथ्य का क्या हश्र होता है? क्या दुर्लक्ष्यता का खात्मा मुख्यकथ्य को छिन्न-भिन्न कर पाता है? यहाँ उत्तर् नकारात्मक है! हाशिये की आवाजों की अवधारणा में ‘दुर्लक्ष्यता’ वाले नकार को तो हम मिटा सकते हैं, पर शोषण का अपरोक्ष ढाँचा वैसा ही रहता हैµहाशिये को आवाज तो मिली है, लेकिन केन्द्र फिर भी इसलिये सुरक्षित है कि अब भी उसके पास एक हाशिया तो मौजूद है ही। इसका सबसे अच्छा उदाहरण यूरोप केन्द्रित इतिहास में ‘डायन’ की निर्मिति है।

‘‘चर्च ने डायन की अवधारणा को अपनाया, क्योंकि निरंतर बढ़ती अनिश्चितताओं के उस दौर में इसने कम से कम यह तो सिद्ध कर दिया कि ईश्वर की सत्ता है। यदि डायन ने भूत-पिशाचों के साथ मिलीभगत का आरोप स्वीकार कर लिया (खासकर अंतरंग दैहिक रूप ,जैसे यौन संबंधों में) तो इसका मतलब है कि फिर फरिश्ते भी हैं और ईश्वर भी। बुरी आत्माओं की यह दूर-दूर की मौजूदगी लोगों को फिर अपने धार्मिक विश्वासों की ओर लौटा लाई, चर्च की सुरक्षित पनाह में।’’ , (Marriott, 2010, p. 207).डायन और ऐसी ही कई अन्य निर्मितियों ने हाशिये के वजूद को बनाये रख कर मुख्यधारा के कथानक को और मजबूत कर दिया। इन्होंने केन्द्र को कुछ नुकसान जरूर पहुंचाया, पर वे इसकी सत्ता को खत्म नहीं कर पाईं और बहुधा ‘बाहरी शक्ति’ की अपनी भूमिका को स्वीकार करके उन्होंने शोषण के उसी शब्द युग्म को पुनर्निमित करने में परोक्ष रूप से मदद ही की।

यदि उत्तर-उपनिवेशीय विखंडन की अवधारणा से बस इतना ही हुआ कि इसने एक और हाशिये को खड़ा करके युग्म को पछाड़ना चाहा तो यह इन् शब्द युग्मों के जाल को कभी काट नहीं पायेगी। विखंडन यदि हाशिये को बनाये रखती है तो क्या केन्द्र को पर्याप्त रूप में बनाये रखने की भी जरूरत होगी? केन्द्र की अपरिहार्यता से यह संभावना हमेशा बनी रहेगी कि एक नया शब्द-युग्म पुराने की जगह ले ले और हाशिये को फिर खामोश कर देµवर्गीकृत व्यवस्था खत्म हो, पर हाशिये और केन्द्र के विलोमों के बीच मौजूद ‘इतर’ दुर्लक्ष्यता के एक और युग्म-जाल में फंस जाए तो फिर स्त्री -यौनिकता के सिद्धांतकारों के रूप में हमारी भूमिका यह होनी चाहिए कि हम केन्द्र परिधि के रूप की इस सीमा को लांघें।

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता

(एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल के अनियतकालीन प्रकाशन और विशेषांकों के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये थे . इस लम्बे आलेख को हम तीन किश्तों में प्रकाशित करेंगे . यह आलेख पश्चिमी इतिहास लेखन में व्याप्त पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की पड्ताल करता है, जिसे भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में भी पढा जाना चाहिए .  मूल आलेख का हिंदी अनुवाद स्त्रीकाल के संपादक मंडल की सदस्य डा अनुपमा गुप्ता ने किया है .  रुस्सुम फ्लोरिडा ,यू एस ए, के एक कालेज में पढाते हैं और डा अनुपमा एम जी आई एम एस , वर्धा , में कार्यरत हैं   रुस्सुम से LRussum@polk.edu पर संपर्क किया जा सकता है )

मानव इतिहास के पश्चिमी लेखन  में स्त्री देह को जानबूझ कर उपेक्षित किया गया है। यह उपेक्षा एक सोचा-समझा फैसला रहा है, जिसके तहत मानव के जीवन संघर्षां व उन्नति में स्त्री के योगदान को   यौनिकता के ऐतिहासिक संदर्भों में नहीं देखा गया। स्त्री देहों की वे कथाएं, जो पश्चिमी सभ्यता की मुख्यधारा के मानकों में नहीं बैठती थी, उन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की सूची से ही मिटाया जाता रहा है। इस पुंसत्व प्रधान अंधेपन की प्रतिक्रिया स्वरूप बहुत से उत्तर-उपनिवेशीय  स्त्रीवादी यौनिकता के आख्यान स्वरूप की ओर मुड़ गये हैं ताकि वे ‘इतर’ ( वैकल्पिक  इतिहासों की रचना कर सकें। ये आख्यान बहुधा पश्चिमी इतिहास के अभिलेखन के लिए स्वीकृत शब्दावली की सीमा तोड़ते दिखाई देते हैं।1

ये साहित्यिक आख्यान स्त्री देह का ऐतिहासिक लेखन हैं , जो पश्चिम के  मानक इतिहास माने जाते रहे इतिहास  के कथित सच के गुब्बारे की हवा निकाल देते हैं।

अब जो प्रश्न उभरते हैं वे हैं:

एक, इन तथ्यों  को जिस तरह मान्य इतिहास में अलक्षित (invisible) और दुर्लक्ष्य (un visible) किया गया है, क्या अब इसी तरह इनकी कुलक्ष्यता (dis visiblity) या अवज्ञापूर्ण अनावरण को स्त्री यौनिकता के पितृसत्तात्मक मानकों के खिलाफ बगावत के रूप में लिया जाना चाहिए? दूसरा ,स्त्री देह के ये साहित्यिक नव-इतिहास पश्चिमी इतिहास में रची गई यौनिकता की झूठी तस्वीर के विरोध की राजनीतिक जमीन किस तरह बन जाते हैं?

पुरुष- इतिहास (His-tory) द्वारा  आघात

‘‘मेरे दल में हर कोई यह जताता है कि उसने इस संवाद का एक शब्द भी नहीं सुना है। तब भी, जब मैं बयानों की ओर उनका ध्यान खींचने की कोशिश करूँ, उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। ऐसा लगता है जैसे मैं उनसे बात नहीं कर रही हूँ, अचानक जैसे उनके लिए वहाँ हूँ ही नहीं। जैसे मैं अदृश्य हो गई हूँ।’’
(हुक्स, 1992, पृ.-113)

यदि कुछ पल के लिए मान भी लें कि इतिहास अतीत की पुनर्रचना का अभिलेख है, तो भी हमें इससे कोई लगाव महसूस नहीं होता, क्योंकि यह पश्चिमी अभिलेख दरअसल भौगोलिक रक्तस्नान के सिवा और कुछ हीं है। इतिहास के नाम पर उपलब्ध ये रक्तस्नान- विवरण सत्य के अभिलेखन का प्रयास नहीं, बल्कि इस बात के चिह्न  हैं कि पश्चिम ने दुनिया की दूसरी ‘अमानुष’ संस्कृतियों पर विजय हासिल की है अथवा उनमें सेंध लगाई है। यह इस तरह प्रदर्शित किया जाता है ,जैसे यह रक्तपात है, पर फिर भी नहीं हैµयह तो भूमण्डल के शुद्धिकरण के लिए पश्चिम द्वारा मजबूरीवश उठाये ग्ये अतिवादी, लेकिन अतिआवश्यक कदम हैं।
‘‘सतह पर दिखता नियतिवाद उन लोगों के लिए बढ़िया नकाब का काम करता है, जो अन्यथा इन हत्याओं, दासत्व और रक्तपात को लेकर चिंतित हो सकते थे। पिछले 350 वर्षों से यह अनवरत चल रहा है और इसके कम होने के कोई आसार नहीं दिखते। अंततोगत्वा इस दैवीय दलील ने एक ऐसे जनसमुदाय को जन्म दिया है, जिसके लिये हत्याएं और दासकरण स्वर्ग में पहुँचाने वाली सोने की सीढ़ी है।’’
(म्यूजिको, 2005, पृ.-16)

तो अतीत का वर्णन कहा जाने वाला इतिहास जब इन्हीं संदर्भों में लिखा गया है, तब इसका उद्देश्य कुछ विशेष मूल्यों को जनमानस में उतारना ही हो सकता है। कुछ खास-आदर्शों में डुबकी लगाने की तरह।
इस निर्देशित प्रकार की पश्चिमी ‘शिक्षा’ के मूल में यही है कि इतिहास में विवरण ‘उन बहुत दूर के प्रदेशों के बारे में हैं, जिनकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है और इस तरह मॅककिट्रिक के शब्दों में उन्हें अंततः अभौगोलिक बना दिया गया है।’ (मॅककिट्रिक, 2006, पृ.-ग्)। जब कोई राष्ट्र पश्चिमी प्रभुसत्ता की सैनिक विजय के एक चिह्न  से ज्यादा कुछ नहीं रह जाता तो इस ‘अनस्तित्व’ में एक और चीज है, जो नकार दी जाती हैµदैहिक यौनिकताµ‘‘भूगोल को हमेशा मानवीय होना चाहिए और मानवता को  सदा भौगालिक।’’ (मॅककिट्रिक, 2006, पृ.-ग्)। पश्चिम के इतिहास में जमीन पर कब्जे का मतलब देह पर भी कब्जा है या बहुत बार इसका उल्टा भी यानी एक संस्कृति में सेंध लगाना भी  भौगोलिक सत्ता को जीत लेने जैसा ही है। यह सिद्ध करने के लिए हमें बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा। भारत में अंग्रेजी और फ्रांसीसी आधिपत्य को, कांगो में डच प्रभुत्वध् को, या हाल में इराक में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति को देखना काफी है, जहां स्त्राी देहों पर हिंसात्मक कार्यवाहियां असल में उस समुदाय को दहशत में लाने के लिए की गयीं। जापान के इवोजिमा द्वीप पर अमेरिकी नौसैनिकों की उस कुख्यात तस्वीर के बिम्बार्थ को समझने में कौन गलती कर सकता है? और ये देहें जिन्हें ‘अभौगोलिक’ बना कर इतिहास से लुप्त कर दिया गया तो परिणाम क्या होना था? क्या होना था जब ये कथाएं, ‘इतर प्राणियों’ के ये कथासूत्र इतिहास के सच्चे संदर्भों से काट कर अलग कर दिए गये? हुआ यही कि एक खतरनाक पूर्वाग्रह ऐतिहासिक तथ्यों की शक्ल ले बैठा।

यह यथार्थ, जिसे मॅककिट्रिक ‘पारदर्शी’ का विशेषण देती हैं, अथवा ‘जैसा का तैसा’ का लेबल, जिस पर चस्पा किया गया है, दरअसल पश्चिम के इतिहास द्वारा मान ली गयी या ओढ़ी गई ‘स्वघोषित पारदर्शिता’ है (मॅककिट्रिक, 2006, पृ.-ग्टए 5)। इन देहों को अपठ्य बना दिया गया है, ये ऐसे उपकथानक हैं, जिन्हें  मुख्य कथानक के अधीन और टुकड़ों में बाँट दिया गया है। पश्चिम की दृष्टि में वे मात्रा दर्पण हैं. उनकी अलैंगिक देहें उनके साम्राज्यवादी प्रकाश स्रोतों के प्रतिबिम्ब को हम तक पहुँचाने का कार्य मात्रा करती हैंµवे सिर्फ इसीलिए मौजूद हैं, क्योंकि पश्चिम से उनका साक्षात्कार हुआ है, लेकिन मुख्य कथानक के मुद्रित कथ्य में उन्हें मात्र नगण्य स्थान देने की इस प्रक्रिया में उनकी दृश्यता विकृत हो गई है।

‘‘तुमने मेरे कंधों पर अपना नाम उकेर दिया है, अपनी छाप मुझ पर अंकित कर दी है। तुम्हारी उँगलियों के पोर मुद्रण ब्लॉक बन गये हैं, जिनसे तुम अपना संदेश मेरी त्वचा पर टंकित कर देती हो और उसका लक्ष्यार्थ मेरे शरीर में मुद्रित हो जाता है। तुम्हारा मोर्स कोड मेरे दिल की धड़कन को बाधित करता है। तुमसे मिलने के पहले मेरी यही धड़कन स्थिर हुआ करती थी, मुझे इस पर यकीन हुआ करता था और इसने मेरे सक्रिय सैनिक जीवन से शक्ति पाई थी, लेकिन अब तुम  इसी चाल को अपनी लय से बदल देती हो। मेरे ऊपर् तुम्हारी थिरकन मुझे एक कसा हुआ मृदंग बना देती है।’’

दृश्यता के आयाम

पश्चिमी इतिहास ने सदियों से अभिलिखित कथ्य में स्त्री देह की दृश्यता व यौनिकता में हेर-फेर करने के लिए एक असरदार पितृसत्तात्मक अभियान छेड़ा हुआ है। चाहे स्त्री की यौनिकता को उघाड़ा गया हो और अक्सर कुछ ज्यादा ही उघाड़ा गया हो, पर उसमें स्त्री का अपना प्रामाणिक पक्ष कभी दिखाई नहीं दिया। ‘ढाक के तीन पात’ की तर्ज पर लिखे गये पश्चिम के अतीत के ये पृष्ठ स्त्री देहों तक अपनी पहुंच तो संभव कर लेते हैं, क्योंकि उनकी आवाजों तक पहुंचने के रास्तों को अगम्य बना देते हैं, क्योंकि इन आवाजों के सच्चे स्वरूप में इन्हें स्वीकार ही नहीं किया गया। बजाय इसके इन दौहिक-आख्यानों का पुनर्लेखन करके, नये संदर्भों से उन्हें जोड़कर, उनके नैतिक मूल्य पक्ष को बदल कर, उन्हें नये अवतारों में ढाल दिया गया ताकि उन्हें पश्चिमी साम्राज्यवाद की वृहत् योजना के उपयुक्त बनाया जा सके।

पश्चिमी परंपरा के तहत स्त्री देह पर लिखे गये उत्तर-उपनिवेशीय स्त्रवादी कथ्य को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता हैµ‘अदृश्य/अलक्षित ( In visible) तथा ‘दुर्लक्षित’ ( un visible)। ये श्रेणियाँ ‘लोप करना’ (elimination) या ‘काट छांट करने’ की अपेक्षाकृत सरल अवधारणा की तुलना में कुछ अधिक जटिल हैं। लोप/ काट छांट करना यानी हटा देना/ रोक देना है, जिसमें सिवाय उस आभासी चिह्न् के सिवा कुछ नहीं रहता, जो मिटा देने के बाद बचा रह गया है। उत्तर-उपनिवेशिक लेखन के संदर्भ में उपनिवेशवाद की श्किार स्त्री देहों की स्थिति को दिखाने के लिए ‘काट-छांट करना’ शब्द सही नहीं लगता। हर एक उपसर्ग के प्रयोग में फर्क को देखना जरूरी है, जिसे हम ‘अ-’ (पद) और बाद में ‘दुः’ (पद्) पर चर्चा करके समझने की कोशिश करेंगे। उपसर्ग अ- (पद) का मूल लेटिन में अर्थ होता है ‘जिसे छोड़ा न गया हो।’ हालांकि ‘अ’- नकार की ही अभिव्यक्ति है, किन्तु इसका भाव ग्रहण न कर पाने या इन्द्रियातीत होने से है। यह दृश्यमान वस्तु का नकार नहीं है, बल्कि मात्रा उसे देख पाने में हमारी अक्षमता को इंगित करता हैµअलक्षित/ है पर नहीं है/ अग्राह्य/ जिसकी कमी है/ न देख पाने के कारण नकारा गया/ अदृश्य; क्योंकि स्त्री की यौनिकता को कथानक में मात्रा ‘कोष्ठकों के भीतर’ मौजूद मान लिया गया है; वह यथार्थ नहीं है, यथार्थ तो मात्र पुरुष देह ही हो सकती है। पश्चिमी कथ्य लेखन में स्त्री यौनिकता बहुधा अलक्षित ही रही है, जिसे कभी देखा ही नहीं गया।

एह्रलिक के अनुसार, ‘‘समाजशास्त्र में अध्ययन की विषय-वस्तु के रूप में स्त्री सामान्यतः उपेक्षित ही रही है। सिर्फ विवाह या परिवार जैसे क्षेत्रों में ही उसकी मौजूदगी देखी जा सकती है। दूसरे शब्दों में समाजशास्त्र में भी उसका स्थान वही पारंपरिक है, जो समाज ने उसे दिया है: उसकी जगह मात्रा घर में है’’ (एह्रलिक, 1971, पृ.-421)। स्त्राी देहें अलक्षित रही हैं, क्योंकि वे निजी संपत्ति की तरह या वैयक्तिक क्षेत्रा में घरेलू वस्तुओं की तरह नियंत्रित की गई हैं और अपनी यौनिकता पर उनका अपना आधिपत्य कभी नहीं रहा। देह को इस प्रकार अलक्षित बना देना केवल पितृसत्तात्मक युग के पुरुषों का ही शगल नहीं है, उत्तर-उपनिवेशीय लेखकों की एक छोटी जमात भी जब कुछ सांस्कृतिक मुद्दों को चुनौती देती है, तो अक्सर उन्हीं में उलझ जाती है। इस प्रक्रिया में स्त्री यौनिकता का पश्चिमी, पितृसत्तात्मक छद्म कथानक स्वीकार कर लिया जाता हैµउन लेखकों के नये आख्यान भी पृथ्वी पर मानव के इतिहास में स्त्री देह के संदर्भों/ आयामों/ दृश्य पक्ष को खो देते हैं। मानववाद के अपने प्रयासों के दौरान वे यह देखने से चूक जाते हैं कि यूरोपकेन्द्रित विचारधारा के कथनकों में स्त्री यौनिकता किस कदर ‘अमानव’ बना दी गई है।इन उत्तर-उपनिवेशीय विद्वानों ने भी अपने राजनीतिशास्त्र, मनोविश्लेषण व समाजवाद के रूपकों में स्त्री दैहिकता को गौण कथ्य की तरह संयोजित किया है। ये उत्तर-औपनिवेशीय स्वर पितृसत्तात्मक ढांचे के ही भीतर रहते हुए स्त्री दैहिकता से सुविधाजनक फासला बनाये रखते हैं। उनकी विफलता इस बात में है कि वे शोषित स्त्रिायों के बारे में, पश्चिमी अकादमिया के आरामगाहों में बैठे हुए लिखते हैं। हालाँकि बहुत से पश्चिमी उत्तर-उपनिवेशीय लेखकों को अपना मत तर्कसंगत लग सकता है, किन्तु यह नव-पितृसत्तात्मक इतिहास लेखन भी स्त्री-यौनिकता का सटीक विवरण प्रस्तुत नहीं करता, लेकिन असल में स्त्री लैंगिकता सिर्फ अलक्षित ही नहीं है, भूमण्डलीय युग में इससे भी अधिक अनास्वादक कुछ घट रहा है।

कथ्य के अधिक सही पाठन की संभावना बने, इसके लिए हमें उपसर्ग ‘दुः’  का सामना करने की जरूरत है। ‘अनदेखी करना’  अथवा ‘दुर्लक्ष्य करना’ में अ-लक्षित से अधिक नकार का बोध है। ‘दुः’ में निहित नकार को किसी शब्द के भीतर के विलोम शब्द पर जोर देते हुए अधिक अच्छे से समझा जा सकता है। पश्चिमी इतिहास के संदर्भ में स्त्री दैहिकता पर बात करते हुए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुः उपसर्ग शब्द में मौजूद क्रिया का बिल्कुल उलट अर्थबोध देता है। इस विलोम क्रिया-बोध को प्रयोग करने में तर्क यही है कि यूरोपकेन्द्रित विचारधारा  में स्त्री यौनिकता को अलक्षित नहीं, बल्कि दुर्लक्ष्य रखा गया हैµलक्षित के अर्थ को उलट कर नव-उपनिवेशी स्त्राी देह की यौनता को दृश्यमान बनाया जायेµ फूको की परियोजना, ‘दुर्लक्षित को लक्षित बनाना’ में प्रयुक्त परिभाषा को अल्क्षित  देहों पर लिखते हुए प्रयोग में लाने में स्पीवेक की यही कोशिश है। ये वही देहें हैं, जिन्हें इतिहास में अलिखित हैं  (स्पीवाक, 1988, पृ.-290)

अ-उपसर्ग से भिन्न ‘दुः’ उपसर्ग का मतलब है नव-उपनिवेशी स्त्री यौनता का पश्चिमी विचारधारा में सम्पूर्ण निषेधµयहां तक कि इन शोषित देहों के अनायास फूट पड़े दैहिक अनुभव भी स्वामी-दास सम्बन्धों के संदर्भ में नहीं लिखे गये। ‘दुः’ में इतिहास की व्यापक लेखन योजना में इन्हें गलती से ‘भूल जाने’ या इनके ‘छूट जाने’ का भाव नहीं है। ‘दुः’ योजनाबद्ध तरीके से इन्हें छोड़ देने का संकेत देता हैµशोषित देहों की यौनिकता को सोची समझी योजना के तहत ही इतिहास में शामिल नहीं किया गया है।
अ-लक्षित के ‘अ’ में स्त्राी देह है, पर नहीं है, क्योंकि वह अपने पारंपरिक भाव मात्रा में ही, जैसे कुमारी, माँ लड़की आदि। ‘दुर्लक्षित’ शब्द में पितृसत्तात्मक आदर्शों की जानी बूझी निर्मिति है और इसमें इन देहों को शामिल ही नहीं किये जाने का भाव है। यह दुर्लक्षित अलैंगिक देह ,अब अजनबी बना देने के एक उद्यत प्रयास से घिरी है। असहाय या अबला के शब्दविन्यास से भिन्न यह वह धारणा है कि अधीन कर ली गयी यह स्त्राी मनुष्य जाति से इतर कोई चीज है। स्त्री के अस्तित्व को मानव प्रजाति में एक विकृति अथवा नियम विरुद्ध मान लेने की पश्चिमी धारणा असल में अरस्तू के समय से ही चली आ रही हैµ‘‘क्योंकि माँ के गर्भ में विकसित होने में भी मादा भ्रूण  को नर भ्रूण  से अधिक समय लगता है, हालांकि जन्म के बाद का विकास उनमें अत्यधिक गति से पूरा हो जाता हैµजैसे वयः संधि, वयस्कता या वृद्धावस्था, क्योंकि असल में स्त्रीत्व का प्रादुर्भाव ही प्रकृति में एक  विकार था, ऐसी विकृति, जो प्रकृति में बार-बार होती है।’’ (अरस्तू, 1942, पृ.-77, ंए 12-16)

सविता सिंह की कवितायें

प्रख्यात आलोचक मैनेजर
पाण्डेय सविता सिंह की कविताओं के सन्दर्भ में लिखते हैं, ‘ सविता सिंह की कविताओं
में गहरा आत्म संघर्ष है और आत्म मंथन भी उनमें स्त्री की स्वायतता का बोध है . उस
बोध से ही स्त्री पराधीनता के परंपरा जनित शाप से मुक्त होती हैं . लेकिन सविता
सिंह का स्वायतता का बोध व्यक्तिगत को ही राजनीतिक मानने वाली स्त्री दृष्टि का
अनुकरण नहीं करता . उनके यहाँ स्त्री की व्यक्तिगत स्वायतता के बोध के साथ सामूहिक
चेतना के महत्व की पहचान है .’ संपादक ) 


चाँद तीर और अनश्वर स्त्री


अपने ही सपनों का पीछा करते हुए
कितनी ही रातों के रहस्यों का पता चला
जिनमें मैं अकेली और बेचैन
ख़ुद से लड़ती करवटें बदलती रही
वर्षों तक मुझे पता नहीं था
मैं किससे लड़ रही थी
कौन था जो आखेट के लिए बुलाता था
कौन थे वे पशु जिनका अंत करने हर रात मैं निकलती थी
जिनकी आँखें अंधकार में हरी रोशनी सी चमकती थीं
जो मुझे ऐसे देखती थीं
जैसे उन्हें मेरा ही इंतज़ार हो

कई बार मुझे ऐसा लगता
वे मेरी ही आँखें थीं
जो मुझ तक हरे रंग में रँग कर आती
मुझमें लग जाने के लिए
अपनी आँखें मैं टटोलती तब
वहाँ रोशनी की जगह अंधकार होता
एक अंधापन
और मैं चीख़ने लगती
जाने किससे कहती
हटाओ यह पर्दा
अंधकार और प्रकाश के बीच जो पड़ा है
इस रात को हटाओ
जो धँसी है मेरी देह में
इन पशुओं को काबू में लाओ
मुझे घेर कर जो खड़े हैं

कोई फिर कहता…
यह सब स्वप्न है यथार्थ नहीं
यहाँ कोई पर्दा नहीं
नहीं कोई क्षमा
यहाँ जीवन और मृत्यु एक समान हैं
ईश्वर और मनुष्य एक दूसरे का हिस्सा
यहाँ प्रेम और संभोग की
कोई पवित्रता या अपवित्रता नहीं
यहाँ आनन्द निर्बाध है
और दुख स्वच्छन्द
आँखों की यहाँ ज़रूरत नहीं
न किसी रोशनी की
यहाँ सब कुछ दिखता है बिन आँखों के
अंधकार ही ब्रह्म है यहाँ
स्वप्न ही जीवन
चलचित्र समान
वही है आखि़री पर्दा
इसे हटाने को मत कहो
इसके बाद का इलाव़ पूर्णतया अज्ञात है
अपरिचित इतना कि किसी को कुछ नहीं पता
मृत्यु को भी नहीं
कोई नहीं जानता वहाँ क्या है जीवन या सिर्फ हवा
या महज़ कुछ और विस्तार
मैं फिर भी कहती
मुझे देखना है इस आखि़री पर्दे के पीछे का रहस्य
क्या स्वप्न का भी होता है कोई मुखौटा
उसका चेहरा भी कहीं वही तो नहीं
जिसे वह छिपाए हुए है
किसी कुष्ठग्रस्त राजा के दर्प सा

कभी-कभी यूँ ही चीख़ती परेशान
अँधेरे जंगलों में चलती जाती
देखती अपने ही पूर्वजों को
निरपेक्ष अपनी बेचैनियों से
अब भी उनके सरोकार होते उनके खेत आम के बाग़
हाथी घोड़े हीरे माणिक मोती
अब भी बटोरते दिखते वे शक्ति अपार
युद्ध और शांति के फैसले करते
गिनते मृत योद्धाओं के अनगिनत शव
मुझे पहचनवाया जाता
ये फलां राय हैं वे फलां राजा
ये तुम्हारे ये लगते हैं वे, वे
कितनी ही आदतें जो मुझमें हैं बची
होतीं उनमें से किसी की
मेरी आँखें मेरा रंग मिलता उनमें से किसी से
बनी रहती फिर भी दूरी
लौट सकने में जिससे आसानी होती

कोई वैसा रोकता नहीं मुझे न कुछ कहता
बस एक हल्की सी हँसी ज़रूर दिखती
किसी के चेहरे पर एक आश्वस्ति ठहरी सी
भटकती ही सही मैं उन्हें मिली तो
लौटने पर फीकी-फीकी सी अनुभूति ही
मेरे भीतर बची मिलती
कुछ भी ऐसा नहीं कि उनके बीच फिर लौटूँ

एक बार मिली मुझे एक सुंदर स्त्री
जिसकी आँखों के नीचे था जमा सा अँधेरा
जो मुझसे लिपट-लिपट कहती वह मेरी है
बहुत अपनी
जिसके ऐसा कहने में थी एक परिचित पीड़ा
लगता जिससे वह जो कुछ भी चाहती है कहना
वह सत्य होगा
वह बस एक ही बात कहती
ले चलो सपनों के रास्ते ही है संभव अब मेरा लौटना
ले चलो मुझे अपने घर
वही है मेरा भी घर जो तुम्हारा
जहाँ से मुझे निर्वासित किया गया
मैं थी उस घर की बाल विधवा बहू
जिसके साथ प्रेम और अभिसार का
क्रूरतम खेल खेला गया
मैं एक बच्ची ही थी नासमझ
मुझे एक रात नष्ट किया गया
मेरे बच्चे की हत्या की गयी
और छोड़ दिया गया मुझे किसी जंगल में
जिसमें तुम आज तक भटकती हो
शायद मुझे खोजती
और जहाँ के ख़ूंखार जानवर भी
अभिशप्त हैं दया करने के लिए मुझ पर

मैं मरी नहीं, मैं बची हुई हूँ अब तक
घुमड़ती एक आवाज़ की तरह
जिसे तुम्हीं अकेली सुनती हो
मैं भटकती रही जंगलों जंगलों
खेतों से होती हुई
पार करती अनगिनत आम और जामुन के बाग़

मैं गयी शहरों तक गयी
नहीं बता पाया कोई मुझे मेरा गाँव
मैं अब भी पालना चाहती हूँ अपने बच्चे को
हासिल कर सके ताकि वह अपना संसार
समझ सके कस्तूरी की गंध
कितनी जोखिम भरी होती है खुद हिरण के लिए

अक्सर मैं इसी सपने का पीछा करती
ताकि मिलूँ अपनी इस पूर्वज से दोबारा
जानूँ उसके भटकाव और दुख के दूसरे करुण प्रसंग
महसूस करूँ वहाँ व्याप्त उन पशुओं की साँस की गंध
जिससे नृशंसता की बू आती थी
जिनकी आँखों की हरी रोशनी
शायद मुझे डराने के लिए थी

लेकिन नहीं लौट पाती उस सपने में आसानी से
बदले में दिखता कोई और चरित्र
नृत्य करता हुआ जो आता मुझ तक
और डाल देता मेरे गले में एक हार
मुझे यह अभद्रता लगती
मैं निकाल फेंकती उसका यह बंधन
और वह रोता हुआ
मिट्टी में धँसता चला जाता
मैं चिल्लाती पूरी रात प्रयत्न करती उसे बचाने का
रोती हुई फिर बाहर आती इस हादसे से किसी तरह
पश्चाताप के पाताल में डूबी
कौन था वह कौन था कहती हुई

तभी दिखता हिरणों का एक झुंड स्वच्छन्द कुलाँचें भरता
मैं भूल जाती सब कुछ सारी हताशा पश्चाताप सारा
हो जाती उन्हीं के पीछे-पीछे होने शामिल उन्हीं के उल्लास में
तभी दिखता झाड़ी में तीर साधे कोई खड़ा
फिर अनन्त स्वप्न भर मैं उससे विनती करती
मत करो नष्ट इस सौंदर्य को
इस स्वच्छन्दता को बाधित मत करो
वह तीर नीचे रखता मुझे घसीटता हुआ ले जाता एक तरफ
और आश्चर्य कि वह होता कितना अपना
मैं सोचती क्यों बना यह शिकारी
फिर सशंकित हो उठती
शायद यह है कोई और
जीवन से अधिक मृत्यु चाहने वाला

तभी अचानक जैसे वह बदल जाता किसी और व्यक्ति में
जाने क्यों परिचित लगता है वह
लम्बी काया पतली ऊँची नाक
गोरा सुन्दर चेहरा
सोचने लगी ऐसे व्यक्ति से कैसी अपेक्षा करूँ
कुछ अच्छा या फिर वही चिरपरिचित बुरा
तभी वह मेरी तरफ मुड़ता
एक विचित्र भाव चेहरे पर उसके
डराती सी आवाज़ में पूछता
कैसी है उसकी प्रिया वन-वन जो भटकती है

अचानक मुझमें एक रोष पैदा होता
‘‘तो आखि़र तुम हो वह काम रूप
वास्तव में कुरूप नृशंस कायर क्रूर
स्त्री की मृत्यु चाहने वाले
तुम जिसे कभी प्रेम नहीं मिलना चाहिए था
जिसे भटकना चाहिए जन्मों-जन्मों अकेला
भूखा-प्यासा…’’
‘‘तुम तुम तुम…’’ कहती हुई जैसे मैं नींद में लौटती
पीछे छोड़ती हुई सपने को
अपनी ही चीख़ से जागती आखि़र
भरी एक अफसोस से क्यों नहीं हिंसक हुई मैं
क्यों उसे और अपमानित नहीं किया
और अधिक अपमानित
मैं मिली ही क्यों उससे
कि तभी मुझे लगता शायद
वह खुद ही मिलना चाहता था मुझसे
तभी तो चीर कर अंधकार के कितने मैदान
वह आया मेरी नींद तक
शायद वह सचमुच जानना चाहता था
अपनी आत्मा के उस अंश के बारे में
जिसमें पीड़ा ही पीड़ा थी
थे जिस पर घाव ही घाव

मगर उसके चेहरे पर तो दिखी नहीं कोई ग्लानि
अभी भी वह उसे बलात ही पाना चाहता था
मैंने अपने हाथों से अपने चेहरे को ढँका
अपनी बेचैनी कम करने के लिए शायद
और लगा जैसे मेरा चेहरा मेरा नहीं
वहाँ महसूस नहीं हुई अपनी ही आत्मीयता
मुझमें ख़ुद से ही जैसे एक अलगाव पैदा हो गया था
मेरा अपना ही कुछ ग़ैर हो गया था
हिंसा पर उतारू अपने ही खि़लाफ
अगली रातों में क्या कुछ घटित होगा
सोचकर मैं आशंकित थी
कुछ मौतें कोई युद्ध लम्बा जैसे छिड़ सकता था
और फिर मैं कितनी कितनी रातें
कई नींदों तक उसमें शामिल रहूँगी
युद्ध करती ढूँढ़ती कितनी ही हरी रौशनियों को
बनाती उन्हें अपनी आँखों का प्रकाश

वैसे मैंने खुद को भी मरते हुए देखा है कई बार
कोई तीर मुझे ही भेद जाता है
और मैं नहीं देख पाती उसे
जो भेदता है मुझे
उसे देखने के लिए मैं लौटती हूँ
कितनी ही बार इस स्वप्न में
जानती हुई कुछ-कुछ वह कौन है
जानती हुई उसे मैं खोज लूँगी सपने के बाहर भी
कठोर रौशनियों के मैदानों में घोड़े पर सवार
वह मुझे धोखा न दे सकेगा
उसके पास बची हैं अनगिनत तितलियाँ मेरी
उसके भीतर अब भी उड़ती हुई

कितनी ही रातों का रहस्य इस तरह मैं जानती गयी
जिनसे यह जीवन सपनों की तरह खुलता गया
इस दौरान मैंने सीख लिया था आखेट में जीतना
पहचान लिया था हरी रोशनी वाली चमकती आँखों को
मृत अपनी देह से अलग कर लिया था खुद को
मुझे भी आ गया था तीर चलाना
मैं आ-जा सकती थी सपनों के बाहर-भीतर
अंधकार को समझ चुकी थी मैं
उसकी मुक्ति में ही अब मेरा विहार था
मैं जान रही थी अब

आखेट के लिए बुलाता है अगर कोई मुझे
नहीं है भागना
शामिल होना है इस खेल में
आखेटक से डरना नहीं
यदि बचे रहना है

मुझे मालूम है अब ख़ूब
रात और स्वप्न के मैदान में
तीर और चाँद मुझे देखा करेंगे
और मैं रहूँगी हिरणों के झुण्ड में शामिल
उनकी छलांगों के मुक्ति विलास में
लाँघती-फाँदती जंगल के जंगल

अब न तीर चल सकेंगे
न रात होगी और गहरी
एक दूधिया रोशनी में स्वप्न चलता रहेगा
भले चाँद देखता रहे मुझे एकटक
करता रहे अपनी कामना से मेरा शिकार
मैं उससे कहूंगी जैसे मैं कहूँगी हर आखेटक से
या फिर उस स्त्राी से जो भटकती है
किन्हीं बियाबानों जंगलों में अब तक
मैं स्वयं काम हूँ स्वयं रति
अनश्वर स्त्री
संभव नहीं, नहीं मृत्यु मेरी

ईश्वर और स्त्री


जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण
देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को
बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को
कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक
ले सकें जो उसे बाँहों में
उनींदी आँखें बंद होने-होने को
खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े
जिन्हें बचा रखा है अब तक रात ने
लहराता अंधकार मिल जाने देता है
अपने तम में एक और तम को
सारी वासना को जैसे स्त्री हो
चंद्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर
सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता
बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही
ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका

जैसे खुद वीरानी

आखि़र मैं बढ़ी झिझकती हुई
उस स्वीकार की तरफ
जिसमें आहट थी प्रेम की
और एक दीर्घ प्रतीक्षा टकटकी लगाये
एक हाॅलनुमा कमरा
पर्दे बिस्तर तकिये ताकते ज्यों शून्य में
गुन-धुन में थिराई एक देह
प्रेम घटित होने की उत्सुकता में
थरथराता एक संसार था
उसी स्वीकार पर टिका
गुलाब का कोई पौधा इंतज़ार करता
ज्यों अपनी मधुमक्खियों का
और हवा थी कि बार-बार
धूल उड़ाती हुई गुज़रती
पहले से अधिक वेगवती
सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देने को आतुर
एक आहट फिर भी भीतर सुनायी पड़ती थी
मंद-मंद एक स्थिति जैसे अपनी ही धड़कन की
एक स्पंदन भीतर तक तरंगित
तभी एक दरवाज़ा खुला
दिखी वीरान-सी एक घाटी
एक रात जिस पर झुकी थी
अकेली हवा जिसमें टहलती थी
अनायास मैं उसमें दाखि़ल हो गयी
सोचती हुई क्या कोई हृदय ऐसा भी होता है
घाटियों पठारों वाला
जहाँ रात झन-झन बजती है
जैसे खुद वीरानी

सविता सिंह

अपनी भाषा में हूँ सुकून
से /मुझे खोजने आ सकते हैं प्रेमी ,  सविता
सिंह की खुद की इस पंक्ति से बेहतर और कोई परिचय नहीं हो सकता है हिन्दी के इस मह्त्वपूर्ण कवयित्री का .

एक यायावर पत्रकार

राजेंद्र प्रसाद सिंह

भाषाविद राजेन्द्र प्रसाद सिंह हिन्दी आलोचना में अपने हस्तक्षेप के लिए जाने जाते हैं.
यह लेख उनकी पुस्‍तक  ‘हिंदी का अस्मितामूलक साहित्य और अस्मिताकार’, में संकलित है। 
संपर्क : rpsingh.ssm65@yahoo.in .

राजेंद्र प्रसाद सिंह
 
पत्रकारिता सार्वजनिक दायित्व से परिपूर्ण एक प्रकृष्ट कला है जैसा कि कार्लांइन ने कहा है कि ‘महान है पत्रकारिता, लोकमानस को प्रभावित करने वाला होने के कारण पत्रकार क्या विश्व का शासक नहीं ? वास्तव में रोचक एवं चुनौतीपूर्ण इस पेशे में वही सक्षम सिद्ध होगा जिसमें कवि की कल्पना शक्ति, कलाकार की सृजनात्मक योग्यता, न्यायाधीश की विषयनिष्ठा, वैज्ञानिक की सुस्पष्टता और कम्प्यूटर मशीन की गति हो.’  प्रमोद रंजन पत्रकारिता के इन सभी गुणों से परिपूर्ण हैं.  भारत के इस यशस्वी पत्रकार की पत्रकारिता ने हिंदी पत्र-साहित्य में लोकप्रियता का अभूतपूर्व मानदंड स्थापित किया है.
उनके द्वारा सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक एवं अन्य विषयों पर लिखे गए लेख मील का पत्थर बन गए हैं. इस पत्रकार की उम्र अभी कम है, पर उम्र का कोई सीधा संबंध किसी क्षेत्र में उसके द्वारा किए गए उत्कृष्ट कार्यों से नहीं होता है. कई साहित्यकार-पत्रकार शतायु हुए, पर जरूरी नहीं है कि उनके द्वारा किए गए कार्य भी उत्कृष्ट हो. हिंदी में ही भारतेंदु ने सिर्फ पैंतीस साल की उम्र पायी थी लेकिन उन्‍होंने साहित्य में इतना काम कर दिया कि कई साहित्यकार सौ वर्षों में भी नहीं कर पाए. वे अल्पायु के बावजूद हिंदी साहित्य के युग-निर्माता बने. उनके नाम पर हिंदी साहित्य में एक कालखंड का नामकरण किया गया है.
 
प्रमोद रंजन
ख्यातिलब्ध पत्रकार प्रमोद रंजन का जन्म 22 फरवरी, 1980 को हुआ। उनका पैतृक गाँव बिहार के जिला अरवल में नदौरा है. नदौरा गाँव बिहार के कुर्था प्रखंड में स्थित है.यह वही कुर्था है, जहाँ  ‘बिहार के लेनिन’ नाम से जाने जाने वाले जगदेव प्रसाद पुलिस की गोली से शहीद हुए थे. उन्होंने  दलित-पिछड़ों, आदिवासियों एवं शोषितों के हक की लडाई सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर काफी मजबूती से लडी थी. यह संयोग है कि प्रमोद रंजन उसी भूमि से आते हैं, और उससे भी विस्मयकारी तथ्य यह है कि उनकी भी पत्रकारिता के क्षेत्र में संघर्ष दलित-पिछड़ों एवं शोषितों के पक्ष में है. किंतु प्रमोद रंजन का बचपन अपने पैतृक गाँव नदौरा में नहीं बीता. वे ननिहाल में पाले-पोसे गए. उनका ननिहाल नालंदा जिले के बेले गाँव में है.

उनकी प्रारंभिक शिक्षा इसी गाँव के सरकारी स्कूल में हुई. गाँव के स्कूल इतने उर्वर मस्तिष्क को पैदा कर सकते हैं, सहसा विश्वास नहीं होता, कारण कि प्रमोद रंजन की पैनी दृष्टि एक्स-रे मशीन की भाँति किसी तथ्य को आरपार देख लेती है. सामान्य लोगों में वह दृष्टि नहीं होती है, जो इनके पास है. उनक लेख इतने विचारोत्तेजक एवं मौलिक होते हैं कि आश्चर्य होता है कि क्या मानव-मस्तिष्क इतने गहरे में जाकर सोच सकता है. रंजन अत्यंत स्वाभिमानी पत्रकार हैं. इतनी कम उम्र में ही उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया. उनका संपादन-स्थल भी भारत के विभिन्न कोनों में रहा. शायद ऐसे भी स्वाभिमानी पत्रकार खूँटे में बंधकर रह भी नहीं सकते. वे निरंतर अपना कार्य-स्थल बदलते रहे मानो वे किसी ऐसे मुकाम की खोज में हों जहाँ से बहुजनों की लड़ाई लड़ी जा सके. संप्रति प्रमोद रंजन ‘फारवर्ड प्रेस’ के सलाहकार संपादक हैं और इस पत्रिका के माध्यम से बहुजनों के हित में लगातार लड़ाई लड़ रहे हैं.
आज जिसे हिंदी का अस्मितामूलक साहित्य कहा जाता है, उसको समृद्ध करने में इनका अप्रतिम योगदान है. ‘फारवर्ड प्रेस’ ने अभी तक ‘बहुजन साहित्य’ पर केंद्रित तीन वार्षिक अंक प्रकाशित किया है. सभी अंक एक से बढ़कर एक हैं. इसी के एक अंक में प्रमोद रंजन ने भारत के हिंदी पुरस्कारों में व्याप्त सवर्ण कब्जे को पर्दाफाश किया है. कुछ मायनों वे पर्दाफाशी पत्रकार भी हैं. मुझे याद है उनकी एक पुस्तिका ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ (2009), जिसमें बिहार के अखबारों और टीवी चैनलों में ‘फैसला लेने वाले पदों पर’ बहुजन पत्रकारों के नहीं होने का अदभुत  विवरण दर्ज है. पुस्तिका में हिंदी के प्रायः सभी प्रमुख समाचार-पत्रों का बहुजन दृष्टिकोण से विश्लेषण है. उसमें कई आँकड़े हैं जो साबित करते हैं कि बिहार ही नहीं, राष्ट्रीय  मीडिया के प्रायः सभी प्रमुख पदों पर सवर्णों का कब्जा है.
जैसा कि हम कह आए हैं कि प्रमोद रंजन कई अखबारों से जुड़े,  हटे और फिर नए-नए से जुड़ते गए. उन्होंने शिमला से प्रकाशित सांध्य दैनिक ‘भारतेंदु शिखर’ में बतौर संपादक कार्य किया. इस अखबार का ‘साहित्यिक विमर्श परिशिष्ट’ प्रमोद रंजन के संपादकत्व में काफी ख्यात रहा. यह बात कोई 2000 ई. की है. इसके बाद उन्होंने  शिमला से ही प्रकाशित ‘ग्राम परिवेश’ (साप्ताहिक) का संपादन किया, पर रंजन यायावरी पत्रकार हैं. मन नहीं लगा. वे कांगड़ा चले आए. यहाँ वे ‘दिव्य हिमाचल’ (दैनिक अखबार) से जुड़े. इसमें वे फीचर संपादक रहे. पर पत्रकार तो स्वतंत्रता का आकांक्षी होता है. उसे उन्मुक्तता की तलाश रहती है. खास तौर से रंजन जैसे स्वाभिमानी पत्रकारों की तो यह नियति है. वे जालंधर गए और ‘पंजाब केसरी’ (दैनिक) से जुड़े. पुनः वे शिमला आए तथा ‘दैनिक भाष्कर ’ से जुड़ गए. वे शिमला में ‘अमर उजाला’ से भी जुड़े. वे 2007 ई. में बिहार की राजधानी पटना आए. यहाँ वे प्रेमकुमार मणि के साथ ‘जन विकल्प’ (मासिक) का संपादन किया.

इस पत्रिका के विभिन्न अंकों में प्रमोद रंजन के अनेक लेख छपे. सभी लेख मौलिक एवं विचारोत्तेजक हैं. इस पत्रिका मे लिखे गए उनके प्रमुख लेख हैं-उपभोक्तावाद और परिवार (मई, 2007), आज के तुलसीगण (अगस्त, 2007) और ‘ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना  ‘  का षडयंत्र (अक्टूबर-नवंबर, 2007). प्रमोद रंजन के जन-विकल्पकालीन लेखों में ‘आज के तुलसीगण’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. इसमें उन्होंने सप्रमाण साबित किया कि तुलसीदास जैसे कवि आज भी मरे नहीं हैं. वे जिंदा हैं. उन्होंने इसमें कई कवियों की कविताओं को उद्धृत करके बताया है कि तुलसीदास का बहुजन विरोधी संस्कार कैसे रूप बदलकर आज भी हिंदी कविता में जीवित है.
दुर्भाग्य से ‘जन विकल्प’ का प्रकाशन अल्पावधि में ही बंद हो गया. पत्रकार प्रमोद रंजन 2008 ई. में ‘प्रभात खबर’ (दैनिक) से जुड़े. इसी समय में उनकी एक और पुस्तिका प्रकाशित हुई – ‘बाढ़: अनकही कहानियाँ’. वस्तुतः यह पुस्तिका एक प्रकार का रिपोर्ताज है, जिसमें कोशी नदी की विभीषिका का वर्णन है.
बिहार के मधेपुरा, सुपौल, कटिहार जैसे जिलों के बाढ़ से हुई तंगो-तबाही का इसमें जीवंत चित्रांकन है. निश्चय ही वे विभिन्न विधाओं और विषयों के पत्रकार हैं. बिहार में जब सवर्ण आयोग का गठन हुआ तो उसका विरोध उन्होंने किया . उनकी पुस्तिका ‘नीतीश के सवर्ण आयोग का सच’ इसी का नतीजा था. उन्होंने सत्ता से हमेशा अपने को दूर रखा. सत्ता जहाँ भी गलत करती है, पत्रकार प्रमोद रंजन उसका विरोध करते हैं. वे सौ प्रतिशत बेफिक्र पत्रकार हैं. सत्ताधीशों की लाठी का डर उन्हें नहीं सताता है. वे चिंता भी नहीं करते हैं कि कोई बेईमान सत्ताधीश मुझे बिगाड़ लेगा. पत्रकारिता का  जोखिम उठाना उनकी प्रकृति और नियति है. मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के गलत कार्यों का वे पर्दाफाश करनेवाले पत्रकार हैं. एकदम निडर और बेखौफ. कभी-कभी उनकी तल्ख टिप्पणियाँ बड़ों-बड़ों को तिलमिला देती हैं. अरुण कमल जैसे कवि और प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार से वे अकेला ताल ठोकते हैं.
इस पत्रकार की कलम में जितनी ताकत है, उतनी ही ताकत उनके आंदोलन में भी है. वे आंदोलनकारी भी हैं. भगाणा की गैंग-रेप पीड़िताओं के पक्ष में उन्होंने ने काफी सक्रियता दिखलाई. वे उनके आंदोलन में शामिल भी हुए. वस्तुतः  प्रमोद रंजन ने बहुजनों की लोक परंपरा, मिथक और लोकगाथाओं से लेकर बहुजन राजनीति एवं साहित्य तक के विषयों पर खूब कलम चलाई है. बतौर संपादक अन्य बहुजन चिंतकों से उन्होंने ऐसे विषयों पर लिखवाया भी है. अभी हाल ही में वाणी प्रकाशन से तीन खंडों में ‘हिंदी की आधुनिकता: एक पुनर्विचार ’ नामक पुस्तक आई है. इसमें प्रमोद रंजन का ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ विषय पर वह व्याख्यान और उस पर हुई लंबी बहस शामिल है, जिसे उन्होंने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में दिया था. वे बहुजनों के सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रकार हैं और बहुजनों के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं. यह प्रमोद रंजन ही हैं, जिन्होंने बहुजनों के पर्व-त्योहारों को नई दृष्टि से मूल्यांकित किया है.

 उनकी एक और पुस्तिका है-‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन (महिषासुर: एक पुनर्पाठ)’। यह पुस्तिका 2013 ई. में प्रकाशित हुई है. ‘फारवर्ड प्रेस’ से जुड़ने के बाद प्रमोद रंजन की पत्रकारिता और निखरी. इसके अंकों में वे लगातार लिख रहे हैं. वे नए लिख रहे हैं,  मौलिक लिख रहे हैं और विचारोत्तेजक लिख रहे हैं. बिहार के फारबिसगंज में पिछड़े मुसलमानों पर गाज गिरने के बाद जो चुप्पी थी, उसे प्रमोद रंजन ने तोड़ी (फारवर्ड प्रेस, जुलाई 2011). ‘गीता’ को लेकर जनवरी-फरवरी 2012 में भारतीय राजनीति में जो उबाल आया था, उसे लेकर रंजन ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेख लिखा है- ‘गए राम, आए कृष्ण’ (फारवर्ड प्रेस, फरवरी 2012). ‘बहुजन साहित्य’ पर उनका लेख ‘बहुजन आलोचना: हिंदी समाज का साहित्य इस कोण से’ अत्यंत महत्वपूर्ण है. इस लेख में उन्होंने लिखा है कि ”बहुजन आलोचना कई प्रकार के आवरणों, छद्मों और भाषाई पाखंडों का उच्छेदन करते हुए वास्तविक जनोन्मुख साहित्य की तलाश करती है.”
एक दूसरे लेख ‘बहुजन साहित्य और आलोचना’ (फारवर्ड प्रेस, अप्रैल 2013) में उन्होंने यह स्थापना दी है कि ”जैसे-जैसे हम बहुजन साहित्य को चिन्हित करते जाएंगे, द्विज साहित्य स्वतः हाशिए का साहित्य बनता जाएगा, क्योंकि हिंदी साहित्य का अधिकांश हिस्सा बहुजन साहित्य ही है.”  सचमुच पत्रकार प्रमोद रंजन का कार्य बहुजन समाज, साहित्य, संस्कृति और राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. वे शोषित, दलित तथा पिछड़ों की बुलन्द आवाज हैं तथा भारत की बेजुबान वंचित जनता की जुबान हैं.

माया अंजेलो की कवितायें

माया अंजेलो/ अनुवाद : विपिन चौधरी

1. न्यूयार्क में जागरण

पर्दे,

हवा के खिलाफ
अपनी जंग छेड़ रहे हैं,

बच्चे परियों से
सपनों का आदान-प्रदान करते हुए
नींद ले रहे हैं.

शहर ख़ुद को जगा कर
मेट्रो की पट्टियों पर खींच लाया है

भोर तक लेटी हुयी आशातीत और असावधान मैं,
युद्ध की अफवाह में बजी अलार्म सुन
जैसे  जाग उठती हूँ

2  फ़रिश्ते की छुअन 


हम   जब  साहस के लिए अनभ्यस्त और
खुशियों से निष्कासित
अकेलेपन के घेरे में सिमटे रहते हैं

प्यार अपनी उच्च पवित्र मंदिर के रास्ते
तक
हमारी दृष्टि में आता है
जीवन में हमें आजाद कराने के लिए.

प्यार आता है
और अपनी गाड़ी में
खुशी की पुरानी यादें
दर्द के प्राचीन इतिहास को लाता है
यदि हम मजबूत हैं तो

प्रेम, भय की जंजीरों के हमलों को
हमारी आत्मा से दूर करता है
हम अपनी कायरता से निकलकर्
प्यार के प्रकाश की रौशनी में
बहादुर  हिम्मत से    देखते हैं

प्यार हम सभी को
किसी समय भी हो जाता है
यह केवल प्रेम ही है
जो हमें मुक्त करता है

3.  वे अपने घर चले गए 

वे अपने घर गए और अपनी पत्नियों को बताया
वे अपने जीवन में कभी एक जैसे नहीं रहे  कि,
क्या वे मुझ जैसी लड़की को जानते हैं
लेकिन … वे अपने घर गए

वे  कहने लगे मेरा घर इतना साफ़ है कि उसे चाटा जा सकता है
मेरा कुछ कहने का मतलब नहीं था,
मेरे करीब रहस्य की  हवा थी
लेकिन … वे अपने घर चले गए

मेरी तारीफ़  सभी पुरुषों की जुबां पर थी
उन्हें मेरी मुस्कान, मेरी बुद्धि, मेरे कुल्हे  पसंद  आये थे
वे  यहाँ एक  या दो या तीन रात बिताना चाहते थे
लेकिन …

4 ,अकेलापन 

कल रात

लेटे हुए मैं सोच रही थी

मेरी आत्मा को वह घर कैसे मिल सकता है

जहाँ जल, प्यासा  नहीं  है

और रोटी का टुकड़ा

पत्थर की मानिंद नहीं है

मैं यहाँ एक चीज़ के लिए आयी थी

और मुझे विश्वास है कि मैं गलत नहीं  हूँ

यह कारण है या कोई और,

लेकिन कोई भी

इस अकेलेपन को संभव कर सकता  हैं

अकेले, बिलकुल अकेले

लेकिन कोई

इस अकेलपन को गढ़ नहीं  सकता है

यहाँ  कुछ करोड़पति हैं जो अपने पैसे का प्रयोग  नहीं कर सकते

उनकी पत्नियाँ चुड़ैलों की तरह घूमती हैं

उनके बच्चे उदास गाना गाते हैं

उन्हें अपने पत्थर जैसे ह्रदयों के इलाज़ के लिए

महंगे डॉक्टर मिल गए हैं

लेकिन कोई नहीं

कोई भी नहीं

अकेले यहाँ से नहीं जा सकता

अब आप ध्यान से सुनो

जो कुछ भी मैं जानती हूँ मैं आपको बता दूंगी

तूफानी  बादल जमा हो रहे हैं

हवा  चलने ही वाली है

मनुष्य की प्रजाति पीड़ित है

और मैं, विलाप सुन रही  हैं

‘क्योंकि कोई नहीं,

लेकिन कोई भी

इसे अकेले में सुन  सकता  हैं.

अकेले, बिलकुल अकेले

कोई भी, लेकिन कोई

इसे अकेले में संभव कर सकता है

5. बेचारी लड़की 

मैं जानती हूँ

तुम्हें दूसरा प्रेम मिल गया है

जिसे आप प्रेम करते हो

वह मुझ जैसी है

तुम्हारे शब्दों पर इस तरह लटकती है जैसे हो वो सोना

वह सोचती है कि उसने तुम्हारी आत्मा को समझ लिया है

बेचारी

मुझे जैसी लड़की

मैं जानती  हूँ

तुम एक और दिल को तोड़ रहे हो

और कुछ भी नहीं कर सकती

यदि मैं उसे बताने की कोशिश करूँ

कि मैं क्या जानती हूँ

वह मुझे गलत समझेगी

और मुझे जाने को कहेगी

बेचारी

मुझ जैसी लड़की

और मैं यह जानती हूँ

तुम  उसे भी छोड़ने  जा रहे हो

और मैं यह जानती  हूँ

वह कभी  नहीं जान पाएगी

तुम जाने को क्यों मजबूर हुए

वह रोई और आश्चर्यचकित हुई

कि क्या कुछ गलत हुआ

तब  वह  फिर से गीत की शुरूआत करेगी

बेचारी मुझ जैसी लड़की

माया अंजेलो

माया अंजेलो ब्लैक कविता की सशक्त हस्ताक्षर हैं, वे पिछले 28 तरीख को उनका परिनिर्वाण हुआ. विपिन चौधरी हिन्दी कविता में एक मह्त्वपूर्ण युवा उपस्थिति हैं.

विपीन चौधरी

दाम्पत्य में ‘बलात्कार का लाइसेंस’ असंवैधानिक है

 अरविन्द जैन 

( भारत में नैतिकता और परिवार की पवित्रता और निजी दायरे की आड में विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ कानून बनाने के मार्ग  में समाज सहित न्यायपालिका और सरकार में पैठी पितसत्तात्मक सोच सबसे बडी बाधा है. हालात यह है कि विवाह के भीतर बलात्कार को संरक्षण देने वाली व्यव्स्था 15 साल से कम उम्र की पत्नी ( यानी नाबालिग ) के साथ बलात्कार  को भी संरक्षण देती है . और अब तो केंद्र में सीधे तौर सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों का कब्जा है . ह्म यहां , आलेखों , तथ्यों और बहसों के माध्यम से विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ मुहिम पेश कर रहे हैं . अखिल भारतीय महिला फेडरेशन की राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा इसके लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही हैं . इस मुहिम में आप भी अपने आलेख और जानकारियां हमें भेज सकते हैं. )

देश की अदालतों में खड़ी आधी-आबादी सोच रही है कि मौजूदा  मर्दवादी  कानूनों से, महिलाओं के खिलाफ लगातार बढती हिंसा-यौनहिंसा-घरेलू हिंसा कैसे रुक पायेगी? क्या पित्र्सत्ता तथाकथित  महान भारतीय सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं  की आड़ में, महिलाओं का  शोषण, उत्पीड़न, दमन और यौनहिंसा ज़ारी रखना चाहती हैं?  पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत का फैसला चर्चा में रहा, जिसमे कहा गया था कि अपनी पत्नी से जबरन यौन सम्बन्ध बलात्कार का अपराध नहीं है. इस सन्दर्भ में भारतीय कानून बेहद विसंगतिपूर्ण और अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है. “निर्भया बलात्कार काण्ड” के बाद हुए संशोधन के बावजूद, आज भी विवाहित पुरुष को अपनी १५ साल से बड़ी पत्नी के साथ ‘बलात्कार’ का ‘कानूनी लाइसेंस’ उपलब्ध है.

उल्लेखनीय है कि जनता पार्टी के राज (1978) में जब बाल विवाह रोकथाम अधिनियम,1929 और हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में संशोधन किया गया, तो लड़की की शादी की उम्र 15 साल से   बढ़ाकर 18 साल निर्धारित की गई। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के मुताबिक, किसी भी लड़की की शादी की उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 साल होना अनिवार्य है। 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी 21 साल से कम उम्र के लड़के के साथ कराना दंडनीय अपराध है और दो साल का सश्रम कारावास या एक लाख रुपये तक का आर्थिक दंड या फिर दोनों हो सकते हैं। मगर शादी के वक्त यदि लड़के की उम्र  18  साल से कम है, तो इसे अपराध ही  नहीं माना जाता।  विवाह और सहमती से सम्भोग की उम्र 18 साल कर दी गई है मगर धारा 375 के अपवाद में आज (२०१४) भी यह प्रावधान बना हुआ है कि अपनी पत्नी जिसकी उम्र 15 साल से अधिक है के साथ जबरन यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं माना-समझा जायेगा. लेकिन देश के ‘योग्य नौकरशाह’ और ‘महान नेता’, भारतीय दंड संहिता की धाराओं में संशोधन करना ही ‘भूल’ गए।

कानूनी संशोधन की कहानी  


महादेव बनाम भारत सरकार (2008-२०१३) मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 375, 376 की संवैधानिक वैधता को चुनोती देनी वाली याचिका पर बहस के दौरान, इस लेख के लेखक ने दिल्ली उच्चन्यायालय की पूर्ण पीठ के समक्ष बहुत से गंभीर मुद्दे उठाये थे और सरकारी वकीलों ने अक्सर यह कह कर तारीख ली थी कि सरकार कानून में समुचित संशोधन कर रही है. संशोधन विधेयक 2010, २०११ और २०१२ के प्रारूप अदालत में पेश भी किये गए थे. इस संदर्भ में प्राय सभी अख़बारों में रिपोर्ट छपती रही. सात दिसम्बर २०१२ को संशोधन विधेयक २०१२ पर बहस चल ही रही थी कि 16 दिसम्बर २०१२ को “निर्भया बलात्कार काण्ड” सामने आ खड़ा हुआ और देशभर में आन्दोलन हुए. अध्यादेश जारी हुआ और वर्मा कमीशन की रिपोर्ट भी आई और अंतत 3 फरवरी 2013 से अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 लागू हुआ. महादेव केस के तमाम मुद्दे “निर्भया काण्ड” के पीछे छुप गए, जिस पर विस्तार से फिर कभी बात करूंगा.

अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 से पूर्व कानून  


3 फरवरी 2013 से लागू अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 से पहले, बिना सहमति के किसी औरत के साथ यौन संबंध स्थापित करना या 16 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ (सहमति के साथ भी) संबंध स्थापित करना बलात्कार की श्रेणी में आता था। हालांकि, 15 साल से अधिक  उम्र की अपनी पत्नी के साथ जबर्दस्ती किया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाता रहा  है।  भारतीय दंड संहिता की धारा-376 के अनुसार  किसी महिला के साथ बलात्कार करने वाले को आजीवन कारावास की सजा दी  सकती थी/है लेकिन यदि पति 12 से 15 साल की अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करता तो अधिकतम सजा में “विशेष छूट” थी यानि सिर्फ दो साल की जेल या जुर्माना या दोनों ही हो सकती थे।बलात्कार संज्ञेय  और गैर जमानती अपराध था,  लेकिन 12-15 साल की उम्र  की पत्नी के साथ बलात्कार  संज्ञेय अपराध नहीं माना जाता था और जमानत योग्य अपराध था । 15 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ बलात्कार का मामला हो, तो पुलिस कोई भी कार्रवाई नहीं कर सकती थी और गरीब नाबालिग लड़की को खुद ही कोर्ट का दरवाजा खटखटाना और मुकदमे के दौरान काफी कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था।

अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 के बाद कानून  



3 फरवरी 2013 से लागू अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 में बलात्कार को अब ‘यौन हिंसा’ माना गया है और सहमति से सम्भोग की उम्र 16 साल से बढ़ा   कर 18 साल कर दी गई है, जबकि धारा 375 के अपवाद में पत्नी की उम्र 15 साल ही है। 15 साल से कम उम्र की पत्नी से बलात्कार के मामले में अब सजा में कोई ‘विशेष छूट’ नहीं मिलेगी। अपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 पारित करते समय सरकार ने ‘वैवाहिक बलात्कार’ संबंधी न तो विधि आयोग की 205वी रिपोर्ट की सिफारिश को माना और न ही वर्मा आयोग के सुझाव। भारतीय विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि “भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद को खत्म कर दिया जाना चाहिए”।

पराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 के बाद अब भी भारतीय दंड संहिता की धारा-375 का अपवाद, पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की पत्नी के साथ बलात्कार करने का ‘कानूनी लाइसेंस’ देता है, जो निश्चित रूप से नाबालिग  बच्चियों के साथ मनमाना और विवाहित महिला के साथ कानूनी भेदभावपूर्ण रवैया है। यह दमनकारी, भेदभावपूर्ण कानूनी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद-14, 21 में दिए गए विवाहित महिलाओं के मौलिक अधिकारों ही नहीं बल्कि मानवाधिकारों  का भी हनन है। परिणाम स्वरूप  शादीशुदा महिलाओं के पास चुपचाप यौनहिंसा सहन करने,  बलात्कार की शिकार बने रहने या फिर मानसिक यातना के आधार पर पति से तलाक लेने या घरेलु हिंसा अधिनियम के आधीन कोर्ट-कचहरी करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

सेक्स वर्कर’ और ‘घरेलू दासियां”


वैवाहिक जीवन में बलात्कार की सजा से छूट के कारण भारतीय शादीशुदा महिलाओं की स्थिति  ‘सेक्स वर्कर’ और ‘घरेलू दासियों’ से भी बदतर है, क्योंकि सेक्स वर्कर को ना कहने का अधिकार  है परन्तु शादीशुदा महिला को नहीं है। इकिस्वीं सदी के किसी भी सभ्य समाज में पति को पत्नी के साथ बलात्कार/ यौनहिंसा के  कानूनी लाइसेंस की वकालत करना, सचमुच  “बलात्कार की संस्कृति” को बढ़ावा देना ही कहा जायेगा। परंपरा,  संस्कृति,  संस्कार,  रीति-रिवाजों और रूढ़िवादियों व धर्मशास्त्रियों द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर, ‘वैवाहिक बलात्कार’ को कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। कोई भी धर्म वैवाहिक बलात्कार का समर्थन नहीं करता। हिन्दू अल्पवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा-6 सी, में आज भी यह हास्यास्पद प्रावधान मौजूद है कि  “विवाहित नाबालिग लड़की का संरक्षक उसका पति होता है” भले ही पति और पत्नी दोनों ही नाबालिग हों।

अन्य देशों में कानूनी स्थिति 


 बताने की जरूरत नहीं कि दुनिया के करीब 76 देशों में वैवाहिक बलात्कार दंडनीय अपराध के तौर पर घोषित हो चुका है जबकि भारत सहित पांच देशों में वैवाहिक बलात्कार को अपराध तब माना जाता है, जब कानूनी तौर पर दोनों एक-दूसरे से अलग रह रहे हों. 1991 में आर. बनाम आर. (रेप : वैवाहिक छूट) मामले में हाउस ऑफ लॉर्डस  के मुताबिक, ‘कोई भी पति अपनी पत्नी के साथ बिना सहमति के यौन संबंध बनाने पर अपराधी हो सकता है, क्योंकि पति और पत्नी दोनों समान रूप से शादी के बाद जिम्मेदार होते हैं। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता कि शादी के बाद सभी परिस्थितियों में पत्नी यौन संबंध बनाने के लिए खुद को पेश करेगी या मौजूदा शादी के बाद सभी हालातों में पत्नी यौन संबंध बनाने के लिए राजी हो।’ पीपुल्स बनाम लिब्रेटा मामले में न्यूयार्क की अपील कोर्ट ने कहा कि बलात्कार और वैवाहिक जीवन में बलात्कार के बीच अंतर करने का कोई औचित्य नहीं है और विवाह किसी पति को अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करने का लाइसेंस नहीं देता। कोर्ट ने न्यूयार्क के उस कानून को असंवैधानिक करार दिया जिसने वैवाहिक बलात्कार को अपराध ना मानने की छूट दे रखी थी।’
नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने घोषित किया कि पत्नी की सहमति के बिना वैवाहिक सेक्स बलात्कार के दायरे में आएगा। यह भी कहा गया कि धार्मिक ग्रंथों में भी पुरुषों द्वारा पत्नी के बलात्कार की अनदेखी नहीं की है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हिन्दू धर्म में पति और पत्नी की आपसी समझ पर जोर दिया गया है।  ।

‘परिवार की पवित्रता’ की दुहाई 


‘परिवार की पवित्रता’ की दुहाई देते हुए विद्वानों का कहना है कि “दांपत्य में बलात्कार  कानून  की  मांग से  पुरुष समाज भी डरा हुआ है। विवाह और   परिवार   जैसी   संस्थाओं   को   बदनाम   करके  इन  संस्थाओं  की  पवित्रता को खतरे में नहीं डाला जा सकता”।  पुरुष समाज क्यों डरा हुआ है ? विवाह और परिवार  जैसी  संस्थाओं   की पवित्रता को किसने खंडित किया? इसके लिए जिम्मेवार वो बलात्कारी पिता-पति-पुत्र हैं, जिनके कारण संबंधों की किसी भी छत के नीचे स्त्री सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही।
पता नहीं ‘परिवार की पवित्रता’, नैतिकता, मर्यादा और आदर्श भारतीय नारी के धार्मिक उपदेशों से हिंदुस्तान की स्त्री को कब और कैसे मुक्ति मिलेगी? नेहरु जी के शब्दों में ” हम हर भारतीय स्त्री से सीता होने की अपेक्षा करते हैं, मगर पुरुषों  से मर्यादा पुरषोतम राम होने की नहीं”। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि  सदियों पुराने संस्कारों की सीलन- आखिर  कब और कैसे समाप्त होगी?

अरविन्द जैन

अरविन्द जैन  स्त्रीवादी न्यायिक प्रविधि के विशेषग्य हैं . ‘ औरत होने की सजा ‘ नामक किताब के साथ  स्त्री के विरुद्ध न्यायपालिका की सोच और कानूनी अंतर्विरोधों को बारीकी से स्पष्ट करते हुए अरविन्द जैन ने हिन्दी भाषी स्त्रियों को कानूनन शिक्षित करने का काम किया है . संपर्क :  170, लॉयर चैम्बर्स, दिल्ली हाई कोर्ट, नई दिल्ली  इ -मेल bakeelsab@gmail.com, mob: 9810201120

अपर्णा अनेकवर्णा की कवितायें



1. एक ठेठ/ढीठ औरत

सुबह से दिन कंधे पे है सवार
उम्मीदों की फेरहिस्त थामे
इसकी.. उसकी.. अपनी.. सबकी..
ज़रूरतें पूरी हो भी जाएँ..
उम्मीदें पूरी करना बड़ा भारी है..
जहाँ खड़ीं हूँ.. वहां से सब दिखतें हैं
दौडूँ जाऊँ.. नज़रें बचा के..
दो-एक बातें अपनी मनवाली भी.
कर आऊँ… बिना रोक-टोक..
पर वर्जनाएं कुंठा बन गयी हैं
बिना बुरा.. वीभत्स.. हार सोचे
किसी भी नतीजे पर नहीं पहुँचती
ख़ुद को पुरज़ोर अंदाज़ में
सब ओर रखती हूँ
पर ऐसा करने में चालाकियां
दूसरों की नज़र आती हैं..
काटती हूँ उनको अपनी चालाकियों से…

जहाँ भांप ली जाती हूँ..
लोमड़ी करार दी जाती हूँ
जहाँ नहीं.. वहां बेचारी का मुंह बनाना
अब खूब आता है मुझको..
इस पूरी स्वांग-लीला से
घिन आती रहती है.. धीरे धीरे
पर चारा कुछ भी नहीं..
या तो बाग़ी घोषित हो जाऊँ
और अकेली झेलूँ रेंगती नज़रों..
टटोलते स्वरों को..
या ओढ़ लूँ औरतपन की चादर
और चैन की सांस लूँ अकेले..
और बेचारिगी पोत लूँ मुंह पर
जैसे ही कोई छेड़े उस छाते को…
मैं ऐसे ही एक ‘ढीठ’ औरत थोड़े हूँ..
मैं ऐसे ही एक ‘ठेठ’ औरत थोड़े हूँ…

2. बसंता की पुकार 
………………………………………………………
रात भर बसंता बुरांस जंगलों में टेरती रही..
पुकारती रही… ‘काफल पूरे-पूर’
बेचैनी धीरे धीरे उदास हो जाती..
दूर जंगलों में सुना था अभी ही तो..
उसकी ‘चेली’ रुआंसी कह रही थी
‘काफल पाको.. मैं नी चाखो’..
ऐजा री………….

माँ-बेटी जंगलों में ‘रिंगाल’ टोकरी
लिए तोड़ती रहीं काफल भर दिन
भरी टोकरी लिए बैठी बेटी…
माँ लौट गयी.. जंगलों ने चारे का वादा किया था
दिन जब पश्चिम की ओर लपका..
बेटी को सोता पाया.. और ‘हाय रे!’
काफल कित्ते कम… क्या बेचूँगी भला..

क्लांत-क्रोध ने ठोकर मारी..
नन्ही देह पूर्ववत बेसुध..
भूखी नन्ही.. भूख की हदें पार कर गयी थी..
शाम की ठंडी हवा ने सूखे काफल ताज़ा किया
रिंगाल टोकरी फिर भर उठी…
भग्न ह्रदय कित्ती देर बजता.. बंद हुआ..

आज बसंता पाखी बन गयी दोनों.. ऐजा-चेली..
जाने वन के किस हिस्से में होती हैं
पुकार सुनाई देती हैं दोनों को.. दोनों की..
बस मिल ही नहीं पाती हैं..
*’ओ चेली कां छे तू… ऐजा ईजा कां नैह गे छे’
………………………………………………………..
नोट: * ओ बेटी कहाँ है तू, मेरे पास आजा तू कहाँ चली गयी.
बसंता पहाड़ का पक्षी है.. द ग्रेट हिमालयन बारबेट

3. तोहफा 

खर्च कर दीं मैंने सारी..
जितनी भी दी थीं
तुमने तसल्लियाँ..

इस बार आना..
तो कुछ और लिए आना

मुझे तुमसे और कोई भी
तोहफा नहीं चाहिए..

4. फर्क


हवा हमेशा
ऊंचे पेड़ों के
ऊपरी पत्तों, टहनियों, डालों
पर ही अटक सी जाती है
वैसी.. नीचे नहीं आती कभी..

पी जाते हैं हवा को.. सोख लेते हैं..
ऊंचे पेड़.. घने पेड़…
आपस में ही बाँट लेते हैं..
नीचे ठिगने पेड़ों.. झाड़ियों के हिस्से का
बचखुच भी हजम कर जाती हैं..
ऊंचे पेड़ों की ही निचली पत्तियां…

सब सामान्य होने में.. सर्वमान्य होने में..
जाने कितना वक़्त लगे…
इंतज़ार की आदत है ठिगने पेड़ों को
धैर्य भी अब सीख लिया है उन्होंने…
अब पता है उन्हें भी
कि हवा भी..
‘हैव’ और ‘हैव नॉट’ का फर्क करती है..

5. बरामदे में धूप

धूप का चौरस सा टुकड़ा
बरामदे का सफ़र करता है
अचार की बरनियों की फ़ौज
लगातार पीछा करती हैं
कभी कभी सीले जूते भी
मुंह बाए… गरमाये..
उबासियाँ लेते हैं…

अपने गीले पैरों की छाप को
वाष्पित होते देखती हूँ
गर्माहट..
तलवों तक सरक आयी है
बिछुवे का सफ़ेद नग तड़प कर
इन्द्रधनुषीय हो उठा है

बीते क्षणों के रज-कण
उपराते.. गहराते…
मुझे नृत्यरत दीखते हैं..
जैसे उस अचानक मिले
मंच पर अंतिम श्वास से पहले का
कोई विदा-उत्सव मना रहे हों

इसी तरह तो जीवन भी
एक रंगमंच का मोहताज
पलों के पीछे पलों का क्रम
सब अपनी भूमिका से बंधे
उन दीप्त रज-कणों की भांति
अपना स्वांग पूरा कर विदा होते हैं

जीवन भी तो
समय के पगचिन्हों को
वाष्पित होते देखना ही तो है
रोज़ की दिनचर्या भी खूब है
उस नज़र से देखो तो..
दर्शन ही दर्शन नज़र आता है…

6. स्वप्न-संदेसे

स्वप्नों के संदेसे
रोज़ मिले थे मुझे
‘आँचल में आ गिरा था एक
सुनहला पका आम
मीठी खुश्बुओं से भीना हुआ’

‘लाल-हरे-सुनहले-रुपहले
रंगीन कई सारे सर्प..
ढेरों-ढेर..
पुचकार रही थी उन्हें
वो पालतू से-चमकती आँखों वाले..
स्नेह से लिपट रहे थे’

‘लाल शुभ चुनरी
उड़ आयी थी कहीं से..
भेजी थी मेरे लिए
किन्ही ऊंचाइयों ने..
हवाओं ने संभालकर
शीश पर धर दिया था मेरे’

‘राज-हंसों का जोड़ा देखा था..
मछलियों से पटा सरोवर..
धान के ढेर पर
खेलता दुधमुंहा शिशु भी’

और तब तुम आयीं थीं
आँचल में मेरे.. मेरी बच्ची
कैसे मान लूं मैं अनचाहा तुम्हें
क्यूँ न करूँ स्वागत तुम्हारा..

महामाया के भांति श्वेत ऐरावत
नहीं आया था तो क्या हुआ??
तुम्हारे आने के कितने ही शुभ संकेत..
मुझे, स्वयं प्रकृति दे गयी थी. ~ अनेकवर्णा
………………………………………………………
(इस कविता को वर्ल्ड डॉटर्स डे, २०१३ में ‘गरज’ (पंजाब) द्वारा आयोजित काव्य प्रतियोगिता में द्धितीय पुरस्कार मिला था. ‘गरज’ कन्या भ्रूण संरक्षण और बालिकाओं के किये कार्यरत समाजसेवी संस्थान है)

अपर्णा अनेकवर्णा

अपर्णा अनेकवर्णा ने  लेखन पिछले वर्ष आरम्भ किया है है और इनकी कवितायेँ काव्य संकलन ‘गुलमोहर’ में तथा ‘कथादेश’ (मई, २०१४ अंक) के ‘आभासी संसार से’ स्तम्भ में प्रकाशित हो चुकी हैं. ईमेल: aparnaanekvarna@gmail.com

फैंसी स्त्रीवादी आयोजनों में जाति मुद्दों की उपेक्षा

ज्योत्सना सिद्धार्थ / अनुवाद : रंजना बिष्ट 

( एक स्त्रीवादी आयोजन के बहाने ज्योतसना भारत में ठहर गये स्त्रीवादी आंदोलन और चिंतन की पड्ताल कर रही हैं. यह आलेख स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक़ में प्रकाशित हुआ था. )

आज की यथास्थिति हमें काटने को दौड़ती  है। स्त्रीवाद  में सवर्ण और उच्च वर्गीय  विशिष्टता बोध,  मुद्दों को लेकर उनका प्रपंच व गुमान वास्तव में चिंताजनक है। मैं यह  आलेख नहीं लिख पाती  यदि मैंने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग नहीं लिया होता । मैं ‘जुबान’ का तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहती हूं ,जिनके सौजन्य से आयोजित इस विचारोत्तेजक आयोजन ने  मुझे वर्तमान स्त्रीवादी राजनीति  और उसकी दिशा के  विषय में सोचने के लिए प्रेरित किया।यह कार्यक्रम ‘जुबान’ टॉकीज की एक विशिष्ट श्रृंखला का ही हिस्सा था।  यह कार्यक्रम कनॉट प्लेस में आयोजित किया गया। मेरे यहां उपस्थित होने की दो वजह थी। पहला ,मैं उस कार्टून को लेकर सवाल करना चाहती थी जो ,स्त्रीवादियों का मखौल उड़ाता हुआ नजर आ रहा था और एक गंभीर विषय को तुच्छ बना रहा था दूसरा , सिर्फ इसलिए कि यह जुबान का आयोजन था  और मैं जानना चाहती थी कि वहां क्या होने वाले था . मैं यह भी जानना चाहती थी कि क्यों स्त्रीवादियों ने सीमारेखा को लांघा, क्योंकि वहां कई वरिष्ठ स्त्रीवादी आन्दोलन कर्मी अपनी नई पीढ़ी की साथियों के साथ उपस्थित थीं .  किसी अंतिम निष्कर्ष की उम्मीद लेकर  तो मैं वैसे भी नहीं गई थी लेकिन मुझे बड़ी निराशा हुई कि मुझे वहां कोई विचरोतेज्जक उत्तर प्राप्त  नहीं हुए.

सबसे पहले मैं उस  कार्टून चित्र पर बात करना चाहूंगी, जिसमें स्त्री पुरूष दोनों नग्न अवस्था में बिस्तर पर हैं ,स्त्री पुरूष के ऊपर  बैठी है और पुरूष उसमें कोई रुचि न लेते हुए अखबार पढ़ रहा है। यह दर्शाया गया है कि स्त्री के भीतर दो विचार घुमड़ रहे हैं . एक तो वह  सोच रही है कि ‘मैं सबसे ऊपर हूं’। दूसरे वह प्रश्नाकुल है  ‘अब क्या’.  आखिर यह कार्टून क्या दर्शाना चाहता है? महिला उत्तेजित नजर आती है जबकि उसका साथी पुरूष निश्चिंत  अखबार पढ़ने में व्यस्त दिख रहा है।  यह चित्र स्त्रीवादी राजनीति के बारे में आखिर बताना क्या चाह रहा है ? कार्टून का एक पाठ यह हो सकता है कि महिला सिर्फ शीर्ष पर  रहना चाहती है, उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका परिणाम क्या होगा , यह किसी सूरत में स्त्रीवादी पाठ नहीं है .  दूसरा पाठ हो सकता है कि स्त्री ने शीर्ष को जीत लिया है  लिया है मगर उसे यह ज्ञात ही नहीं कि आगे क्या , यह मूर्खतापूर्ण लगता है। और अंततः यह पश्चिमी स्त्रीवाद के इतिहास के एक स्त्रीवादी आन्दोलन के महत्व को कम करता है , जिसमें महिलाएं अपने शरीर और अपने यौन आनंद पर अपना  हक़ जता रहा थीं , या अपनी पारंपरिक यौन भूमिका से अलग अपनी भूमिका क्लेम कर रही थीं , जिसका यह कार्टून मजाक उड़ा रहा है .

हांलाकि वहां काफी लोग आये थे और यह कार्टून बहुत सारे लोगों ने देखा मगर किसी ने भी आपत्ति  जाहिर नहीं की। टॉकीज शो की शुरूवात ही फेयर एण्ड लवली के विज्ञापन से हुई। जिसमें कि एक पुजारी मंदिर के भ्रम में अपनी काली बेटी को लेकर एक मार्डन ब्यूटी कंपनी में पहुंच जाता है . जैसे ही उन्हें पता चलता है कि वे गलत जगह खडे़ हैं वे बाहर जाने लगते है और उसी समय रिसेप्शेन पर बैठी महिला कहती है ‘‘ऐसी लड़कियों को सुन्दर बनाना है तो वेदो के जमाने में नहीं रह सकते’’ यह सुनकर पिता के हृदय को ठेस पहुंचती है और वह अपने घर जाकर अपना जड़ी बूटी से भरा हुआ बक्सा खोलता है, जिसमें से उसे एक ऐसा रासायन प्राप्त होता है जिससे वह अपनी बेटी को एक खूबसूरत परी बना देता है ( स्पष्ट है कि जो गोरी है , क्या आपने कभी काली परी देखी है?)

उनलोगों ने  चेहरों के रंग में निहित श्रेणीक्रम पर बात करना शुरू किया और अंततः इस स्थापना की ओर बढे की सबका अंतिम लक्ष्य है उजली चमड़ी हासिल करना .  क्या हम सभी लोग इस बात से पहले ही वाकिफ नहीं हैं कि भारत रेसिस्ट जातिवादी , लिंग व वर्ग आधारित असमानताओं वाला तथा   होमोफोबिक देश है। आखिर इस बात को लेकर हमें इतना आश्चर्य क्यों हुआ? फेयर एण्ड लवली के हास्यापद विज्ञापन पर आश्चर्य क्यों हुआ?
बात मात्र  विज्ञापन की नहीं है ,ऐसे विज्ञापन तो हम बचपन से देखते आये है? मुद्दे की बात तो यह है कि कब तक हम उन पुरानी लकीरों को पीटते रहेंगे, कब तक हम पुरानी पद्धतियों में उलझे रहेंगे !  क्या हमारे पास मुद्दों की कमी है , क्या हम  नहीं जानते कि हमें किस दिशा में जाना है?  मैं यह नहीं कह रही हूँ कि मीडिया की आलोचना करने की जरूरत नहीं है .जरूरी  है कि हमें एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए उन सभी  चीजों के प्रति ,जो टी.वी. में दिखाया जा रहा है , समाचार से लेकर सिनेमा तक ,  विज्ञापन से लेकर गाने तक कार्टून से लेकर  रियल्टी शो तक . हाशिये के समाज के संदर्भ में हम इसे नहीं देख रहे है।  इस प्रकार के फैंसी आयोजनों में कोई जाति के मुद्दे पर बात क्यों नहीं करता? क्यों असहज है जाति के बारे में बात करना, खास कर इस प्रकार के ग्लैमरस व अभिजातीय आयोजनों में ,जहां पर कोई भी जाति के मुद्दे पर दूर –दूर तक बात नहीं करना चाहता। ऐसा लगता है हम आज भी सपनों की दुनिया में जी रहें है ,जहां पर जाति को दरवाजे पर ही छोड़ दिया जाता है। खासकर एयर कन्डीसन मॉल, फेन्सी रेस्टोरेन्ट और अभिजातीय स्थलों पर चर्चा के दौरान।

वास्तव में जाति, वर्ग व लिंग आधारित भेदभाव का पता न केवल उन कपड़ों से चलता है जिन्हें हम पहनते हैं, बल्कि उन कपड़ों से भी जो हम  नहीं पहनते है, न सिर्फ उस शबदावली से , जो हम बोलते हैं बल्कि उससे भी, जो हम नहीं बोलते हैं , और उस  भोजन से भी जो हम एक  जातिविशेष से होने के कारण नहीं खाते हैं। यह अच्छा लगता है कि हम कुछ अलग दिखे, भाषा भी अलग हो और एक आदर्श संसार हो, जहाँ जाति का कोई अस्तित्व ही नहीं हो । हम तमाम उन मुद्दों जैसे गरीबी, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र, इतिहास से लेकर भुगोल तक पर बात करते हैं। मगर जाति व वर्ग विशेष के अधिकार की बात क्यों नहीं होती? आखिर हम बार बार जाति की जटिलता  पर बातचीत करने में असफल क्यों हो जाते है? इससे तो साफ तौर पर  भारत में व्याप्त जाति की व्यवस्था के सन्दर्भ में हमारी पोजीशन जाहिर होती है . जाति जब हमें कई तरीके से प्रभावित करता है, तो फिर इसको मिटाने का दायित्व सिर्फ हाशिये के लोगों का ही दायित्व क्यों मान लिया जाता है ? अंततः  आज जरूरत इस बात की है कि हमारे समाज में पीढ़ियों से चली आ रही इस बीमारी, जिसके कारण समाज भ्रष्ट हो गया है, को मिटाने के लिए दोनों ओर से प्रयास होना चाहिए।मुझे लगता है   कि साधन सम्पन्न शिक्षित व राजनीतिक लोग जबतक जाति, वर्ग व लिंग आधारित असमानता के मुद्दों को जब तक प्राथमिकता नहीं देंगे तब तक ऐसा होना संभव नहीं है .

जुबान की स्त्रीवादी अवधारणा व कार्य काफी समस्याप्रद है, जहां पर शरीर व सेक्स पर बात करना एक ग्लैमर है, इसकी बारीकियों को  जाने बिना  कि इसका  दूसरे तमाम चीजों से कितना गहरा रिश्ता है जैसे जातीय भेदभाव, बेघर होना, हिंसा, गरीबी व तनावपूर्ण माहौल । जुबान सिर्फ दिल्ली के उच्च वर्ग व जाति के ही लोगों की बात करता है, यह वाकई एक शर्मनाक बात है एक स्त्रीवादी प्रेस के लिए।जुबान एक बहुत पुराना स्त्रीवादी  प्रकाशन है। यहां से स्त्री मुद्दों पर  केन्द्रित कई लोकप्रिय पुस्तके छप चुकी हैं और अब भी प्रकाशित हो रही है। यह एक आधार व प्लेटफार्म है ,जो देश-विदेश की बौद्धिक जमात में खासा  लोकप्रिय है। यह एक ऐसा प्रकाशन है, जिसे लोग पसंद करते है और जिसके  प्रकाशनों से निरंतर संपर्क  में रहते हैं .यह वाकई एक चिंताजनक स्थिति है कि इस तरह का स्त्रीवादी प्रकाशन जिसकी एक बहुत बडी पाठक संख्या है, वह भी जाति, वर्ग व लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर बात करने से कतराते हैं।

अनीता रॉय  व गौतम भान की प्रस्तुति सबके लिए  बहुत ही सतही  व अरूचिकर है, साधन संपन्न  पश्चिमी दिल्ली के रहवासियों को छोड़कर .  वैसे तो अनीता रॉय को उनके काम के लिए ,उनके आत्मविश्वास के लिए,  शब्दों के चयन और सम्पूर्ण प्रस्तुति  के लिए दस में से दस अंक मिलने चाहिए। मगर मैं स्वयं को उस मजाक से जोड़ नहीं पाई .   किसी के चरम आनंद  के बारे में , बिस्तर पर पसंदीदा पोजीशन के बारे में, या बिस्तर में किसी की पसंद के बारे में बात करना काफी अभिजात्य मसला है  .  मैं यह बात उन तमाम महिलाओं के सन्दर्भ से कह रहीं हूं , जहाँ से मैं आती हूँ ,जिनकी पसंद या नापसंद ,सेक्स के मामले में ,कोई मायने नहीं रखती, जिनके लिए काम का अधिक बोझ, लगातार दबाव, व चिन्ता के बीच सेक्स करना भी एक अलग दवाब ही है। चरम आनंद जैसी कोई वास्तिविकता नहीं है. बहुत सारी दलित महिलाओं से यह पूछा ही नहीं जाता कि वे संतुष्ट है या नहीं। वे सेक्स के दौरान बिस्तर पर ठन्डी पड़ जाती हैं और खत्म होने का इन्तजार करती है, उच्च जाति के पुरुष और दलित पुरुष भी   उन्हें लगातार एक सेक्स मशीन की तरह इस्तेमाल करते हैं । यह बात एकदम साफ है कि एक मशीन कभी यह नहीं कह सकती कि उसका कैसे उपयोग किया जाए। दलित पुरूष बहुत बुरे न सहीं मगर वे भी बिस्तर पर उतने ही असंवेदनशील होते हैं जितने कि अन्य पुरूष।.

भारत सरकार के अपराधिक आकड़ों  (2001-2005 के औसत आंकडों) पर नजर डाले तो, प्रतिदिन दलितो के साथ होने वाले अत्याचार के 27 मामले सामने आते हैं। हर सप्ताह 13 दलित मौत के घाट उतार दिए जाते है। हर सप्ताह 6 दलितो के घर जलाकर उन पर कब्जा कर लिया जाता है। सप्ताह में छः दलित अगवा कर लिए जाते है। एक दिन में तीन दलित महिलाओं का बलात्कार होता है। ग्यारह दलित रोजाना हिंसा के शिकार होते है। उनके साथ मारपीट की जाती है। हर 18 मिनट के अन्तराल में एक दलित के साथ अपराध होता है। यह बात जानकर मैं बेहद असहज व असहाय महसूस करती  हूं कि एक ओर देश के किसी कोने में एक दलित महिला का बलात्कार हो रहा होगा  ,जहाँ दूसरी ओर हमलोग चरम आनंद की  बात कर रहे  हैं .

एक काली चमड़ी वाली दलित महिला होने के नाते मुझे कुछ चुटकुले बडे़ अटपटे लगते हैं और कुछ आपत्ति जनक भी। एक ऐसा मजाक, जो पश्चिमी दिल्ली के लोगों पर केन्द्रित है। उदाहरण के लिए एक स्टीरियोटाइप , जो दक्षिणी दिल्ली को दिल्ली  के दूसरे हिस्से की तुलना में ऊँचा और अभिजात्य बना देता है , मगर मुझे इस बात से आपत्ति है. क -शहर के अन्य हिस्सों को दक्षिण दिल्ली की अपेक्षा कमतर आंकना  कोई हास्यबोध नहीं पैदा करता है . ब -मुझे यह बहुत अजीब लगता है कि लोग वैसे स्टीरियोटाइप में हास्यबोध पा लेते हैं , जो  जातीय व वर्गीय पूर्वग्रह को जन्म देते हैं . शहरी जीवन व उसके  तथाकथित स्त्रीवाद की सबसे बड़ी त्रासदी है  जाति, वर्ग व लैंगिक असमानता को लेकर उसके पूर्वग्रहों की  बेशर्मी व बेहयायी।

यह बड़ा ही आसान व सुविधाजनक है कि हम अपनी पारम्परिकता  व रूढ़ीवादिता के जाल में फंसे रहे। हमें जरूरत है निरंतर आत्मनिरिक्षण की। हमारी राजनीतिक सजगता जरूरी है , अनुभवजन्य सक्रियता  और  एक मजबूत सैद्धान्तिक जमीन के साथ  । जुबान की राजनीति में इन दोनो का  अभाव है। हवा में की गयी राजनीति, जिसकी न कोई सक्रियता की जमीन है और न सिद्धान्त ,मुद्दों को लेकर भ्रम पैदा करने का काम करती है और जिसकी परिणति  उच्चवर्गीय , उच्च जातीय परिहास में होती है . अतिथि ने सबका आभार व्यक्त किया वहां आने और हंसने के लिए . आखिरकार कार्यक्रम सभी की हंसी के साथ खत्म हुआ। क्या हम अपने आप पर या दूसरों पर हंस रहे हैं ,मैं घर जाते वक्त यह सोचती रही कि जुबान के इस कार्यक्रम में परिचर्चा व सवाल-जवाब के लिए कोई जगह ही नहीं थी।

ज्योत्सना सिद्धार्थ

लेखिका  दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी  है
इनसे jyotsna.nirvana@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

दमदार

सुशीला टाकभौरे

( सुशीला टाकभौरे की यह कहानी दलित स्त्रीवादी कहानी के दायरे में पढी जा सकती है. आज भी सरकारी फाइलों में ‘अपराधी जाति’ के तौर पर दर्ज कंजर जाति की महिला  के साहस की कहानी जाति और स्त्री , दोनो ही विमर्शों के दायरे में पढी जा सकती है , जो स्त्री आंदोलन के हाशिये से कही गई है. )

बरहानपुरा गांव में बस स्टैण्ड से डाॅकबंगले की तरफ, रोड के पास ‘परिहार-निवास’ नाम की बड़ी बिल्डिंग है। बिल्डिंग में ऊपर निवास है, नीचे गॅरेज है। गॅरेज से लगकर छोटा कमरा है। इस एक कमरे के घर में सुमन
किराये से रहती है।

सुमन कंजर जाति की महिला है। कंजर जाति के विषय में लोग जानते हैं। इस घुमक्कड़ जाति के लोग बहुत ही निडर, साहसी और ताकतवर होते हैं। गांव-गांव में रहकर घूमते हुए अपना काम धन्धा करना, जंगलो में भटककर शिकार करना, बड़े, वजनदार सुअर आदि जानवर को अपने कंधो पर उठाकर लाना उनकी दिनचर्या में है। लड़ाई-झगड़े, खून-खराबे से वे कभी नहीं डरते, मरने-मारने से नहीं डरते। हँसते-हँसते जेल चले जाते, फिर वहाँ से लौटकर अपनी अदावत निकालते। सुमन का पति छेदीलाल ऐसा ही शूरवीर साहसी और निडर है।

इस जाति के लोगों को दूसरे काम धन्दे आसानी से नहीं मिलते। इस  कारण छेदीलाल शराब बनाकर बेचने का धन्दा करता है। पुलिस हमेशा उसके पीछे पड़ी रहती है। आसपास के गांव में, कहीं भी चोरी होने, डाका डाले
जाने जैसी घटना होने पर पुलिस सबसे पहले उसे ही पकड़ती। बेकसूर होने पर भी उसे मारा पीटा जाता और जेल में डाल दिया जाता। ऐसे समय में सुमन कठिनाइयों का सामना करते हुये गुजर-बसर करती है। आठ-दस साल से यही क्रम चल रहा है-एक दो महिने के लिए छेदीलाल बाहर आता है फिर दो-तीन साल के लिए जेल के अन्दर डाल दिया जाता। सभ्य सवर्ण समाज द्वारा हमेशा इन्हें ही गुनहगार साबित किया जाता है। गुनाह
न करने पर भी छेदीलाल को सजा दी जाती, उसे जेल की यातना भोगनी पड़ती। सुमन को भी ऐसे जीवन की आदत हो गयी थी। यदि उसके पति को बार बार जेल नहीं भेजा जाता, तो उसका जीवन ऐसा नहीं होता। परिस्थितियों ने उसे विवश किया। सुमन भी बड़ी दबंग और हिम्मत वाली है। वह अपना जीवन अपने ढंग से जीने लगी। वह भी किसी की परवाह नहीं करती-‘‘  आता है तो आ, जाता है तो जा-’’ इस भावना और अपनी हिम्मत के बल पर सुमन जिन्दा है। कुछ घरों में वह कपड़े-बर्तन धोने का काम करती है और अपने घर में खुश रहती है।

सुमन का पति जेल में रहता है, वह हर दो साल में एक बच्चे  को जन्म देती है। ऐसे जचकी के समय में चमार बलाई, ढीमर, भंगी जाति की महिलाएँ उसकी मदद करके उसे संभाल लेती हैं। वह भी उनका बड़ा एहसान मानती है।कई बार ये औरतें नवजात शिशु को गौर से देखते हुए मजाक के लहजे में पूछती हैं –  ‘‘कौन के जैसे दिखे है ?…  भंडारी के जैसे ?…  नहीं, ये तो रामरतन घांई दिखे है।’’  ये दोनो ही गांव के बदनाम लोगों में गिने जाते
है। सुमन हँस देती। वे महिलाएं कहतीं – ‘‘तेरा घरवाला तो नहीं आया, लड़का कैसे हो गया ?  किसका लाई है ?’’  सुमन हँसकर कहती – ‘‘छेदीलाल आया तो था।’’ फिर वह कहती – ‘‘लड़का तो मेरा है, मैंने पैदा किया है।
दिखने में किसी के जैसे भी दिखे, इससे क्या फरक पड़ता है ?’’

सुमन को किसी बात का फर्क नहीं पड़ता। जात-पंचायत का यह आदेश है-‘‘कोई उसके घर नहीं जायेगा,  न ही कोई उसे अपने घर बुलायेगा।’’ उसकी जाति के लोगों ने उसे जाति से बाहर कर दिया है। पंचो के आदेश का उल्लंघन करने पर दंड के विधान निश्चित थे, जुर्माना -हर्जाना,  जातिभोज। सुमन की जाति के नियम बहुत कठोर है। अकेली औरत का जीवन जाति समाज में कठिन ही रहता है। सुमन ने दूसरो की दया पर जीने के बदले स्वतंत्रता के साथ अपने बल पर जीवन जीना स्वीकार किया। समाज भला यह कैसे स्वीकार करता। दंड स्वरूप उसे जाति से बहिस्कृत कर दिया गया। सुमन भी अपनी जाति में किसी के घर नहीं जाती। जिन्दगी जीने की सुमन की अपनी जीवन शैली है। वह अपनी जाति की औरतों की तरह खानाबदोशो की जिन्दगी से अलग, एक ही गांव रहकर स्थायी जीवन जी रही है। वह अपने जाति समुदाय   की औरतों की तरह पुरुष वर्ग के स्वामित्व में न रहकर, अपने दम पर अकेली जी रही है। सबसे हिल मिल कर रहने वाली सुमन को जब किसी पर गुस्सा आता है, तो झगड़ने और गालियां देने से वह कभी नहीं चूकती। अपनी इसी हिम्मत और ताकत से वह दमदार बन सकी है
गांव में लोग अपने मतलब के लिए उससे सम्बन्ध बनाते हैं। वह भी अपने मतलब से उनसे सम्बन्ध रखती है। उसकी पसंद ऊंची है। साधारण जिन्दगी जीने वाले साधारण आदमी उसे पसंद नहीं आते। हिम्मती, उपद्रवी, नामी और बदनामी वाले लोगों से ही उसके सम्बन्ध जुड़ते हैं।

हाँ तो, बहुत दिनों से वह गांव में जग्गू पहलान के चर्चे सुन रही थी। पागल औरत को मारने की बात सुनकर उसे जग्गू पर बहुत गुस्सा आया। वह गुस्से के साथ खुद से बोल पड़ी थी-‘‘ठठरी बंधा, मेरे पल्ले पड़ेगा तो सारी हेकड़ी निकला दूंगी।’’जब उसने सुना -‘‘नीचे बाजार में रामू सेठ की बेटी का हाथ पकड़कर जग्गू ने सड़क तक खींच लाया, फिर हाथ छोड़ दिया – ’’ तब सुमन को बड़ी हैरत हुई। उसने कहा – ‘‘हाथ आई चिडि़या कैसे छोड़ दी…?’’  उसने मन ही मन विचार किया-‘‘जरा मैं भी तो देखूं, इसमें कितना दम है ?’’

कुछ दिनों से बरहानपुरा गांव में एक पागल-औरत गंदे, चीकट कपड़े पहने, बाल बिखेरे घूमती है। उसे देखकर बच्चे चिढ़ाते और पत्थर फेंककर मारते। वह भी चिढ़ाने वालों को दांत दिखाकर, मुंह चिढ़ाती और कंकर पत्थर
उठाकर मारती।एक दिन पागल औरत के सामने से जग्गू पहलवान निकला। जग्गू भग्गू पहलवान का छोटा भाई है। भग्गू ठाकुर शरीर और ताकत से पहलवान है। वह दिल और दिमाग से बहुत ही सज्जन नेक-दिल और शालीन व्यक्ति है। मगर उसका छोटा भाई जग्गू दुबला-पतला, मरियल, चरित्रहीन और एक नम्बर का गुण्डा-बदमाश है। वह बहुत ही निर्दयी और दुष्ट है। जग्गू के बड़े भाई भग्गू पहलवान को मान देने के लिए लोग जग्गू को जग्गू पहलवान कहते हैं।

हाँ तो, जग्गू पहलवान पागल औरत के सामने से निकला, पागल औरत ने उसकी तरफ देखा। जग्गू पागल की तरफ ही देख रहा था। अपनी तरफ देखने वाले को चिढ़ाने के लिए पागल ने बन्दर की तरह दांत दिखाये, फिर
जीभ दिखाकर वह हंसी। बीच बाजार की बात है। स्टेशन से बाहर तांगा स्टैण्ड से बाहर, चाय-नाश्ते की दुकाने हैं। इनमें सबसे बड़ी देवकरण की होटल है। होटल के सामने ‘जवाहर बगीचा’ है। बगीचे के बाजू से एक सड़क सामने बस स्टॅण्ड की तरफ गई है। इस सड़क के एक तरफ पूर्व में ‘नीचा बाजार’ है और दूसरी तरफ पश्चिम में ‘ऊपर बाजार’ है।  ऊपर बाजार में कपड़े, किराने और अनाज की बड़ी-बड़ी दुकाने हैं।  इन दुकानों के मालिकों के बड़े-बड़े घर, ‘नीचे बाजार’ में, सड़क के दोनों ओर एक कतार में हैं। यहाँ और भी हिन्दू महाजन रहते हैं। ‘जवाहर बगीचे’ की कम्पाऊन्ड दीवार से लगकर सब्जी और फल वालों की दुकानें हैं। शाम के समय सभी दुकानों मंे ग्राहकों की संख्या बढ़ जाती है।

देवकरण की होटल के सामने ‘जवाहर बगीचे’ की दीवार से टिककर पागल औरत बैठी थी। वह जग्गू को देखकर हँसी। पागल की हरकतों को देखकर कुछ लोग हँंस दिये। लोगों को हँंसते देखकर जग्गू ठाकुर को अपना बड़ा अपमान लगा। बीच बाजार में सरे-आम अपमान होते देखकर पहलवान का छोटा भाई जग्गू आपे से बाहर हो गया। उसने आव देखा न ताव, दौड़कर पागल के पास पहुंच गया। एक क्षण में उसने पागल औरत के बाल पकड़
लिये।

पागल औरत ने – ‘‘ऐ…..ऐं..…’’ करते हुए अपने बाल छुड़ाने की कोशिश की, तो बालों के साथ उसके हाथ भी पकड़कर जग्गू ने उसे घसीटना शुरू कर दिया। इसके साथ मुक्के, लात-जूते से उसकी पिटाई करने लगा।

लोग भौंचक होकर तमाशा देखने लगे। असहाय, गरीब पागल औरत के लिए सबके मन में सहानुभूति थी। कुछ लोगों ने जग्गू पहलवान को समझाने की कोशिश की – ‘‘भैय्या, जाने दो, पागल है, औरत है…. जाने दो….’’
मगर वह नहीं माना।

‘‘जग्गू नामी गुण्डा है। कौन उसके झंझट में पड़े, यह कहते हुये-लोग धीरे-धीरे वहां से जाने लगे। भरा बाजार सूना हो गया। दुकानदारों ने अपनी दुकानें बन्द कर दीं। ग्राहक बिना सामान लिए ही अपने घर लौट गये।बेचारी पागल औरत चीखती रही, चिल्लाती रही, मार खाते-खाते  बेदम-बेहोश हो गई, तब भी वह उसे पीटता रहा। जग्गू को किसी ने कुछ नहीं कहा। उसका हौसला बढ़ता गया।अब तो वह और सीना तानकर चलने लगा। जमीन पर छोटी-मोटी कोई भी चीज देखता तो उसे ठोकर मारकर दूर फेंक देता। पागल को मारने की घटना से लोग भयभीत थे। उसकी इस शोहरत की खबर पूरे गांव में फैल गई। गांव में सभी लोग उससे और डरने लगे। जब वह ‘ऊपर बाजार’ की दुकानों के सामने से निकलता, तो लोग नजरें नीची करके अपने-अपने काम में व्यस्त दिखने लगते। वह गर्व के साथ इधर-उधर देखते हुए निकल जाता।जब वह ‘नीचे बाजार’ की सड़क से गुजरता, तो वहां के घरों के लोग अपने-अपने दरवाजे बन्द कर लेते। बाहर खेल रहे छोटे बच्चे अपने घर की तरफ चल देते। बहुएँ और बूढ़ी औरतें आंगन या बरामदे में बातें कर रही होतीं तो वे उसे देखकर तुरन्त सड़क की तरफ अपनी पीठ कर लेतीं। बहुएँ, बेटियाँ घर के भीतर चली जातीं। जग्गू पहलवान निरापद भाव से अभिमान के साथ गर्दन ऊंची करके निकलता।

एक बार रामू सेठ की बेटी प्रेमलता घर के बरामदे में खड़ी थी। वह कुछ चबाते हुए, सड़क की तरफ, इधर-उधर देख रही थी। तभी वहाँ से जग्गू पहलवान निकला। सोलह साल की प्रेमलता दसवीं पढ़ रही है। अपनी सुन्दरता
के अभिमान के साथ युवावस्था का भान भी उसे होने लगा है।हाँ तो, प्रेमलता अपने खुले बरामदे में लकड़ी की मेहराब से टिककर खड़ी थी। जग्गू पहलवान ने चलते-चलते उसकी तरफ देखा। लड़की भागी नहीं, झुकी नहीं, डरी नहीं -वैसे ही तनकर खड़ी रही और कुछ चबाते हुए मुंह चलाती रही-जग्गू पहलवान को अचम्भा हुआ – ‘‘यह कैसे….?’’  वह ठहरकर उसे देखने लगा। जग्गू पहलवान को देखकर लड़की थोड़ी इतराई, थोड़ी लहराई और थोड़ी सी मुस्कराई-जग्गू पहलवान के लिए इतना ही काफी था। वह चीते के समान तेजी से आगे बढ़ा। लड़की कुछ समझ नहीं पाई। जग्गू ने पलभर में उसका हाथ पकड़ा और खींचकर सड़क तक ले आया। लड़की डर गई। वह चीखने लगी।

लड़की की चीख सुनकर लोग घरों से बाहर आ गये। जवान लड़के, बड़े-बूढ़े, नौकर-चाकर सब उसे घेरकर खड़े हो गये। मगर जग्गू ने लड़की का हाथ नहीं छोड़ा। लोग चुपचाप खड़े रहे। सब इस शंका में थे कि पता नहीं आगे क्या होगा ?

जग्गू ने सबकी तरफ देखा, फिर लड़की की तरफ देखा – ‘लड़की नासमझ है, बच्ची है – ’यह सोचकर अथवा पता नहीं क्या सोचकर उसने लड़की का हाथ छोड़ दिया। लड़की रोती हुई अपने घर में चली गई। सब लोग भी वहाँ से चल दिये।

लड़की तो घर में चली गई, मगर बात पूरे गांव में फैल गई। कई दिनों तक लड़की स्कूल नहीं गई। लड़की के माँ-बाप रिश्तेदारों के घर नहीं गये। शादी-ब्याह, जन्मदिन जैसे सामाजिक समारोहों में नहीं गये। उन्हें इस बात की
लज्जा लगती थी कि उनकी बेटी के कारण, गांव में उनकी इज्जत चली गई, मगर वे जग्गू पहलवान को कुछ नहीं कह सके, उसका बाल भी बांका नहीं कर सके।जग्गू पहलवान से गांव के लोग और ज्यादा डरने लगे। बहू-बेटियाँ तो क्या, बड़ी-बूढि़याँ भी अपनी इज्जत के लिए डरने लगीं। जग्गू पहलवान और अधिक अकड़कर चलने लगा। वह अब गांव में ज्यादा चक्कर लगाने लगा।

जग्गू पहलवान का घर बस स्टैण्ड से सीधे रेल्वे चैकी की तरफ है। सुमन सज-धज कर शाम के समय चैकी के तरफ जाती फिर घूमती-फिरती बाजर से सामान खरीदकर अपने घर आती।जग्गू की नजर सुमन पर पड़ी। तीन बच्चों की माँ होने पर भी सुमन दमदार औरत है, जग्गू को वह अच्छी लगी। जग्गू उसके पीछे-पीछे ‘परिहार निवास’ तक आने लगा। वह बेमतलब गॅरेज के पास खड़ा रहता। सुमन उसके मन को भा गई। सुमन भी उसे लुभाती रहती। एक दिन दोनों करीब आ गये। दोनों की रजामन्दी हो गई। अब जग्गू सुमन के घर आने-जाने लगा। गांव वालों को मालुम हुआ। जग्गू को किसी की परवाह नहीं थी। सुमन को भी किसी की परवाह नहीं थी। दोनों बेधड़क मिलने लगे। जग्गू रात में सुमन के घर आता और सुबह अपने घर चला जाता। चार महिने बड़े आराम से निकल गये।

एक दिन सुमन देवकरण की होटल के सामने, नीचे बैठकर चाय पी रही थी। दोपहर के बाद चार बजे की बात है, उधर से जग्गू पहलवान निकला। उसने सुमन को इस तरह बैठे देखा तो डांटकर कहा – ‘‘ऐ……ऐसी यहाँ
क्यों बैठी है ?’’

सुमन ने ऐंठकर कहा – ‘‘बैठी हूँ, मेरी मरजी -’’

जग्गू जोर से चिल्लाया – ‘‘तेरी मरजी ?… तेरी ऐसी की तैसी -’’

सुमन और जोर से चिल्लाई – ‘‘ऐ….गाली मत दे। मैं तेरी लुगाई नहीं हूँ। ज्यादा करेगा, तो सब निकल दूंगी। ठीक कर दूंगी… हाँ…’’

जग्गू गुस्से से बोला – ‘‘तू ठीक करेगी ? कंजरी… तू है ही कंजरनी, तुमको कोई शरम नहीं है। नीची जाति के लोग नीच ही रहते हैं-’’

अपनी जाति का अपमान होते देख, सुमन तनकर खड़ी हो गई – ‘‘क्या कहा ?…  कंजरनी…? अरे कंजर, तू तो हमारे कंजरों से गया बीता है। दिन में आने से डरता है। रात में मेरे घर में घुसा रहता है। चार महिने से मुझे चाट
रहा है… आज मैं तुझे नीच कंजरनी दिख रही हूँ? … अरे, तू तो कंजरो के पांव की धूल भी नहीं है। काहे का पहलवान है तू…?’’ इन  चार महिनों में सुमन जग्गू को अच्छी तरह समझ चुकी है। वह उसकी सब कमजोरियाँ जान चुकी है।झगड़ा होते देखकर आने-जाने वाले लोग ठहर गये। भीड़ बढ़ती गई। जग्गू को बहुत बुरा लगा। चार महिने से वह सुमन के साथ प्रेम से रह रहा था। आज उसे सुमन पर गुस्सा आ गया। यह वही जगह है, जहाँ उसने पागल औरत को मारा था। तब से वह पागल उसे देखते ही डर के कारण छिप जाती है। आज जग्गू को सुमन के ऊपर वैसा ही गुस्सा आया। वह लपककर सुमन के पास आया। उसने सुमन के बाल पकड़ने के लिए हाथ आगे बढ़ाया -सुमन के शरीर में बहुत ताकत है। गुस्सा उसकी ताकत को और बढ़ा देता है। वह अपनी जाति के मर्दो की तरह रहती है। अच्छा खाती, अच्छा पीती है- मटन, मुर्गा, मछली, अंडे़ पराठे खाती है, डटकर शराब पीती है, खुश हती है। वह मेहनती है, फुर्तीली है। उसकी जाति के गुण उसके खून में हैं। हिम्मत, गुस्सा, ढीटपन, निडरता उसमें ठूंस-ठूंस कर भरे हैं। मरने-मारने से वह भी नहीं डरती। वह जग्गू की मंसा भांप गई।

‘‘तू मुझे, भरे बाजार में, कमजोर औरत-समझकर, बाल पकड़कर मारेगा ?’’

बस फिर क्या था। सुमन का गुस्सा आसमान छू गया। जग्गू के आगे बढ़े हाथ को सुमन ने एक ही झटके में अपनी तरफ खींचकर, उसे जमीन पर गिरा दिया और वह उसकी छाती पर चढकर बैठ गई। उसके दोनों हाथ सुमन ने अपने घुटनों के नीचे दबा लिये और उसकी कमीज, बनियान फाड़ डाली। वह दोनों हाथों से दुहत्थड़ बनाकर उसकी छाती, मुंह और सिर पर मारने लगी। जग्गू इस जीवट की औरत के सामने पार नहीं पा सका। सुमन ने उसके बाल पकड़कर खींचे, फिर अपनी चप्पल उसके मुंह और सिर पर फड़ा-फड़ मारते हुए बोली -‘‘साला, हरामी, कुत्ता, हमको नीच कहता है…’’

जग्गू किसी तरह उसे धकेलकर उठा। लुढ़कते-लुढ़कते भी सुमन ने जग्गू की कमर का बेल्ट और फुलपेन्ट कसकर पकड़ लिया और पूरी ताकत लगाकर फुलपेन्ट को अपनी तरफ खींचा। कमर का बेल्ट टूट गया, बटन टूट गये। फुलपेन्ट खुलकर नीचे आ गई। उसमें उलझकर जग्गू खुद नीचे गिर गया।

सुमन के मन में बहुत गुस्सा है, जैसे सदियों से इकट्ठा होता आ रहा है – ‘‘अभी तक आदमी ही सरे-आम औरतों को नंगा करके मारते-पीटते आये हैं। क्या, औरत आदमी को नंगा करके नहीं पीट सकती ?’’ फिर तो सुमन ने कोताही नहीं बरती। जहाँ उसे मारना था, उसी जगह पर दनादन देने लगी-प्रेमलता शाम को स्कूल से घर लौट रही थी। जवाहर बगीचे के पास भीड़ देखकर कारण जानने के लिए वह वहाँ गई। देवकरण की होटल के सामने, भीड़ के बीच उसने देखा-जग्गू धूल में पड़ा है। उसकी कमीज और बनियान तार-तार होकर बदन से अलग झूल रहे हैं। उसकी फुलपेन्ट उतर गई है। बिना कपड़ो का जग्गू बहुत ही दुबला, मरियल और कमजोर दिख रहा है। सुमन उसे पीटे जा रही है।

पता नहीं कैसे पागल औरत को इस झगड़े की भनक मिल गई। वह दौड़ती हुई आई। जग्गू को पिटते देखकर वह खुशी से चीख पड़ी। फिर भीड़ के बीच इधर-उधर भागते हुए उसने एक बड़ा पत्थर ढूंढ लिया। उसने दोनो हाथों से पत्थर अपने सिर से ऊपर उठा लिया। कई महिनों का आक्रोश और दबी हुई प्रतिशोध की भावना उसके चेहरे पर चमकने लगी। उसकी आँखों में गुस्से का लावा है, मगर होठों पर सफलता की खुशी झूम रही है। वह जग्गू के सिर की तरफ देखकर पत्थर का निशाना तकने लगी- जग्गू ने उसे देखते ही खुद को बचाने के लिए दोनों हथेलिया फैलाकर उसके सामने कर दी। पागल औरत को इन हाथों पर ही ज्यादा आक्रोश था। उसने बड़ा पत्थर जग्गू के हाथों पर दे मारा।

जग्गू चीख उठा-‘‘अरे भैय्या रे… भैय्या मुझे बचाओ रे…’’

भग्गू पहलवान भीड़ में खड़ा अपने भाई को पिटते हुए देख रहा है। कई दिनो से जग्गू के कारण वह खुद परेशान है। आज शोषित पीडि़त खुद उससे बदला ले रहे है, यह देखकर वह निश्चिन्त हो गया।

प्रेमलता को बहुत खुशी हुई, जैसे उसने भी जग्गू से अपना बदला ले लिया। कितने महिने हो गये थे, गांव में उसका सिर हमेशा शर्म से झुका रहता था- आज उसने गर्व से सिर ऊंचा उठा लिया। आज वह समझ गई- ‘औरतें
कभी भी कमजोर नहीं हो सकतीं।’ उसने सुमन को देखा, फिर आगे बढ़कर उसने भी जग्गू को एक ठोकर मार दी।सुमन ने कसकर धौल जमाया। जग्गू पहलवान के हौसले पस्त हो गये। शोषित, पीडि़त सुमन ने अपने शोषण और अपमान का बदला अपने दम पर ले लिया। उसने बुद्धी-चातुर्य, हिम्मत और ताकत से शोषक दुष्ट आततायी को मजा चखा दिया। भीड़ तमाशा देखती रही। जग्गू पहलवान का आंतक उस दिन से खत्म हो गया। लोगों को यह भी समझ में आया,  पहलवान किसे कहना चाहिए, दमदार किसे कहना चाहिए।