यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता -भाग 2

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता


(एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल के अनियतकालीन प्रकाशन और विशेषांकों के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये थे . इस लम्बे आलेख को हम तीन किश्तों में प्रकाशित करेंगे . यह दूसरा किश्त है , पहले किश्त के लिए यहां क्लिक करें यह आलेख पश्चिमी इतिहास लेखन में व्याप्त पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की पड्ताल करता है, जिसे भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में भी पढा जाना चाहिए .  मूल आलेख का हिंदी अनुवाद स्त्रीकाल के संपादक मंडल की सदस्य डा अनुपमा गुप्ता ने किया है .  रुस्सुम फ्लोरिडा ,यू एस ए, के एक कालेज में दर्शन पढाते हैं और डा अनुपमा एम जी आई एम एस , वर्धा , में कार्यरत हैं   रुस्सुम से LRussum@polk.edu पर संपर्क किया जा सकता है)

अरुणा बुरटे का रेखांकन 
स्त्रीत्व  में दैत्यत्व की उपस्थिति की धारणा और इसीलिए उसे नकार दिये जाने की समझ अश्वेत स्त्रीवादी, उत्तर उपनिवेशीय व यौनता पर विचित्रा धारणाओं वाले लेखन में मुखर है, जिसमें एक स्पष्ट बोध है कि पश्चिमी इतिहास के अभिलेखन में इरादतन क्या-क्या छोड़ गया है। जब पश्चिमी पुरुषी- इतिहास की सत्यलेखन की दावेदारी पर प्रतिक्रिया देनी हो, तब दुर्लक्ष्यता की समझ का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है; ‘दुर्लक्ष्यता’ शब्द का प्रयोग इस समझ का प्रतिनिधित्व करता है कि इतिहास में स्त्री देह की निर्मिति यौनिकता के सच्चे स्त्री -अनुभवों की अनुपस्थिति में की गई है। दुः की यह उत्तर-औपनिवेशीय चर्चा पश्चिमी विचारधारा में मौजूद भेदभाव की आलोचना के लिए जमीन तैयार कर रही है। यह मुख्य कथानक से बाहर की आवाजों को सुने जाने का मौका दे रही है। स्त्री यौनिकता को हाशिये का लेखन मानने की समझ दार्शनिक जाक देरिदा के विखंडन (Deconstruction) के व्याख्यात्मक भाष्य सिद्धांत से विकसित हुई है।
विखंडन की धारणा का सार यह है कि पश्चिमी विवरणों में मूलपाठ/ इतर ( other ) के शब्दयुग्म ( Binary )  के जरिये मुख्यकथानक को हाशिये पर बढ़त हासिल है। समूचा पश्चिमी इतिहास स्वयं को व्याख्या का केन्द्र बना कर प्रस्तुत करता है, वह समर्थ का यथार्थ है। केन्द्रीय सत्ता संरचना की अनुमति के बिना किसी देह की दृश्यता की यहां कल्पना भी नहीं की जा सकती। और यह वही यूरोपकेन्द्रित कथ्य है, जिसका विश्व के सभी जनसमुदायों पर गहरा असर रहा है। पश्चिमी इतिहास ने स्वयं को सत्ता के मूल ढांचे की तरह स्थापित किया है और अधीनस्थ सत्ताओं पर नियंत्राण की ताकत में ही स्वयं की पहचान पाई है। स्वयं से इतर को नजरअंदाज करने वाली इस मुख्य पाठान्तर की भाषा किताब के पृष्ठ पर दी गई क्रमिक टिप्पणियों तक ही सीमित नहीं है। स्त्री-देह को दुर्लक्ष्य तब भी किया जाता है, जब किसी देह की तस्वीर दिखाई देती है। दुर्लक्षित करने, नकार देने की क्षमता तब नजर आती है, जब तस्वीर एक निगेटिव की तरह शुरू होती है, क्योंकि इसमें शोषित देह एक अलैंगिक बना दिये गये स्त्री-समुदाय की नुमाइंदगी करती है।

पुरुष- इतिहास स्वयं को उस मूल संदर्भ की तरह लेता है, जिसे खुद से अलग रह गये भाग को अर्थ प्रदान करने की जिम्मेदारी निभानी है (जो भोगा हुआ नहीं, बल्कि रचा गया यथार्थ है)µतस्वीर में औरतें हैं, लेकिन उनकी लैंगिकता कहीं दिखाई नहीं देती। लिपिबद्ध भाषा में निहित वर्गभेद के जरिये अपना नियंत्रण बनाये रखना ही इस इतिहास को रचने की विधि है। अब विखंडन की अवधारणा दावा करती है कि इसकी भाषा का सहज झुकाव समानताओं की ओर अधिक रहा है, यानी सहमति की ‘आवाजों’ को ही ग्रहण करने की ओर। इसका अर्थ यह हुआ कि मुख्यधारा का पश्चिमी इतिहास ‘हाशिये’ पर नियंत्रण द्वारा कृत्रिम रूप में सत्यापित की गई समानता प्राप्त करने के बारे में है। यहां ‘समानता’ कभी ‘समता’ के द्वारा प्राप्त नहीं की गई, अर्थात् पितृसत्तात्मक इतिहास के लिए द्वैत का अर्थ कभी दो समान ढांचों से नहीं रहा, बल्कि पहले भाव को विशेष बनाने के लिए दूसरे भाव को बहिष्कार का दंड भोगना पड़ा हैµकेन्द्र को दृश्यमान बनाये रखने के लिए इतर को दुर्लक्षित करने का यही अर्थ है। इससे एक समतापूर्ण नहीं, बल्कि श्रेणीबद्ध संरचना बनती है, जिसमें दूसरे स्थान के भाव को वर्गीकरण में हमेशा नकारात्मक माना जाता है। विलोम शब्दों के इस प्रकार के युग्मों के उदाहरण हमें भाषा में और भी मिलेंगे जैसे वाणी/ लेखन, अवधारणा/ रूपक, आंतरिक /बाहरी, उपस्थिति/ अनुपस्थिति, प्रकाश/ अंधकार, अमीर/ गरीब, इतरलैंगिक/ समलैंगिक और पुरुष/ स्त्री। विलोमों के वर्गभेद में वाणी लेखन को बहिष्कृत कर देती है, प्रकाश अंधकार को और उसी तरह पुरुष स्त्री को। यह बहिष्कार इतिहास में ऐसी पितृसत्ता की रचना करता है, जिसमें युग्म के दोनों शब्द एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं, क्योंकि यह व्यवस्था पहले शब्द के केन्द्र में स्थापित होने की मंशा पूरी करती है और इस दौरान दूसरे शब्द को हाशिये पर कथ्यहीन/ वाचाहीन/ अलैंगिक कोरी जमीन बना कर पृष्ठ के मुख्य भाग के बाहर कर दिया जाता है। यूरोपकेन्द्रित इतिहास में हाशिये का उपयोग सिर्फ टिप्पणियों के लिए किया जाता है, जिस पर मनचाहा उकेरा जा सके, मूलपाठ के मात्रा पूरक भाग की तरह, जिसे मूल पाठ में दुर्लक्ष्य कर दिया गया। यह हाशिया हमेशा वह ‘इतर’ रहा है, जिस पर से दृष्टि प्रयासपूर्वक हटा कर रखी गई हैµवह एक ऐसी सम्पूर्ण बाहरी चीज है, जिसकी आवाज का अस्तित्व ही नहीं है (देरिदा, 1982, पृ.-ग्प्प्प्)।

यही, हाशिये की इसी जमीन पर, मूलपाठ से ‘इतर’ के भाव में वह उत्तर-उपनिवेशीय विखंडन अपना अस्त्र उठाता है- हाशिये की आवाज को दृश्यता प्रदान करने के लिये, उसके टिप्पणी-स्वरूप की कैद से उसे आजाद करने के लिये और अब तक केन्द्र की भूमिका निभा रहे मूलपाठ को विस्थापित कर देने के लिये, यह अवधारणा दमन के झूठे युग्मों को धराशायी करती है। इस तरह यह अनिर्मित होते हुए भी ‘निर्मित’ कर रही होती हैं, क्योंकि यह हाशिये को दृश्यमान बना कर केन्द्र पर मानो किसी प्रेत के साये सी झूल रही है।
उत्तर-औपनिवेशीय विखंडन की अवधारणा शब्द युग्म को पलट कर और ‘इतर’ पक्ष की आवाज बन कर मूलपाठ को भीतर से खोखला कर रही है, जिससे वर्गभेद का ढाँचा भरभराने लगता है।

पुरूष/स्त्री  युग्म पलट कर अब
स्त्री /पुरूष हो जाता है और इस योजना में पुरूष के विशेषाधिकार वाली वर्गीकृत संरचना अपनी ताकत खो देती है; अब पुरूष के बारे में बात करते हुए स्त्री को बहिष्कृत नहीं किया जा सकता। इस परिवर्तन के बाद अब स्त्री को उस हाशिये की कैद में कभी नहीं रखा जा सकता, जो पुरूष/ स्त्री की शब्द योजना संभव थी। इससे श्रेणीबद्धता का खात्मा हो रहा है, दुर्लक्षित अब लक्षित बन रहा है। जहाँ यह वर्गभेद में गहरा संशय पैदा कर रहा है और वर्गीकरण और इससे उपजने वाले भेदभाव की संभावना खत्म कर रहा है, वहीं एक ‘दृश्यमान इतर’ की संभावना को जन्म दे रहा है. उलट-फेर का यह पल हाशिये पर स्त्री के लिये दुर्लक्षता की पहेली सुलझ जाने का समय है। यह नयी वैकल्पिक आवाज बहुधा हिंसा के जरिये राजनीतिक स्वरूप में आती है। ‘हिंसा’ एक ‘पारंपरिक स्त्री’ के मूल विचार को ही छिन्न-भिन्न कर देती है और हाशिये पर बैठी अब तक अनदेखी ‘डायनें’ साकार हो उठती हैं और मुख्य धारा के कथ्य की स्थिरता को हिला कर रख देती हैं, जो फिलीस्तीनी फिदायिनी (आत्मघाती) हमलावरों के उदाहरण से स्पष्ट है-‘‘फिदायिनी हमलों की हिंसा को राजनीतिक अभियान के स्वरूप में पहचानना एक फिदायिनी हमलावर को न तो छोटा करने की कोशिश है, न उसके महिमामण्डन की, बल्कि इन आत्मघाती स्त्रिायों को राजनीतिक कार्यकर्त्ता मानना उनके सैनिकीकरण और ऐसे राष्ट्रवाद की आलोचना का शुरूआती और जरूरी कदम है, जो स्त्री को मात्र डायन/फरिश्ता ‘स्त्रीहंता संस्कृति की शिकार’ के रूप में देखने से आगे जाता है , (Amireh, 2007, p. 207).
डायन करार दी गई स्त्री


दुनिया की बहुत सी स्त्रियों के लिये, वे जिनकी पहचान उनके बुर्के की नीली जाली के पीछे लापता हो गई है, या वे जिन्हें किर्गिजस्तान की सड़कों से सिर्फ इसलिए उठा लिया जाता है ताकि उन्हें ‘एक अपहृत दुल्हन’ बनाने के लिए मजबूर किया जा सके, या सूडान की वे युवतियाँ जिन्हें अपनी माँओं, दादियों, चाचियों, बेटियों और बहनों पर होते बलात्कार जबरन दिखाये जाते हैं ताकि वक सबक ले सकें कि जब उनके साथ यही सब हो तो उन्हें किस तरह ‘पेश’ आना है- उन सबके लिए विखंडन का यह उलट फेर शोषण से मुक्ति की आवाज बनकर आता है। अब वे ऐसी छायाएँ नहीं रह गई है जिनके बहिष्कार से ही पितृसत्ता स्वयं को परिभाषित करती थीं, बल्कि शब्द युग्म के उलट जाने से वे मुक्त हो गई हैं, युग्म खंडित हो गया है। इस खंडन से स्त्री /पुरूष की नई शब्द योजना में उन्हें मौका मिला है कि वे वह सब वापिस ले सके, जो उनका है- उनकी अपनी ‘आवाज’, उनकी ‘सत्ता’। पिछले कुछ हजार वर्षों के पुरूष- इतिहास में उनके द्वारा झेली गई अंतहीन गैरजरूरी पीड़ा के ‘गलत’ को ‘सही’ करने का यही मौका है। यह उलट फेर उन्हें शोषण के पुंसत्व केन्द्रीय प्रतीकों को फिर से दुनिया के सामने लाने के लिये यौनिकता को प्रामाणिक आवाज प्रदान करता है।

दुर्लक्षित के दृश्यता प्रदान करने के विचार को सिद्धांत रूप में रचने और विखंडित करने वाले उत्तर-उपनिवेशीय सिद्धांतकारों ने निश्चित ही हाशिये को एक आवाज दी है, किन्तु क्या यह वही पड़ाव है, जिस पर अब मुख्य कथानक को हम बख्श सकते हैं, क्या स्त्री -यौनता के संदर्भों की यही अंतिम परिणति है कि समूचे पितृसत्तात्मक इतिहास में स्त्री -कथ्य कभी-कभार सत्ता पर अपने अस्थायी अधिकार को मुक्ति के कुछ द्वीपों की तरह इंगित करें और असल में, व्यापक परिप्रेक्ष्य में वे हाशिये पर ही बनी रहें? क्या देह-कथाएँ मात्रा केन्द्र/परिधि के शब्द-युग्म के रूप में ही लिखी जा सकती हैं? यदि शोषित यौनिकता की ये कहानियाँ इतिहास और वंशविरूदावलियों के बीच का नव-इतिहास है तो इनके अस्तित्व में आने के बाद पश्चिमी इतिहास के मुख्यधारा के कथ्य का क्या हश्र होता है? क्या दुर्लक्ष्यता का खात्मा मुख्यकथ्य को छिन्न-भिन्न कर पाता है? यहाँ उत्तर् नकारात्मक है! हाशिये की आवाजों की अवधारणा में ‘दुर्लक्ष्यता’ वाले नकार को तो हम मिटा सकते हैं, पर शोषण का अपरोक्ष ढाँचा वैसा ही रहता हैµहाशिये को आवाज तो मिली है, लेकिन केन्द्र फिर भी इसलिये सुरक्षित है कि अब भी उसके पास एक हाशिया तो मौजूद है ही। इसका सबसे अच्छा उदाहरण यूरोप केन्द्रित इतिहास में ‘डायन’ की निर्मिति है।

‘‘चर्च ने डायन की अवधारणा को अपनाया, क्योंकि निरंतर बढ़ती अनिश्चितताओं के उस दौर में इसने कम से कम यह तो सिद्ध कर दिया कि ईश्वर की सत्ता है। यदि डायन ने भूत-पिशाचों के साथ मिलीभगत का आरोप स्वीकार कर लिया (खासकर अंतरंग दैहिक रूप ,जैसे यौन संबंधों में) तो इसका मतलब है कि फिर फरिश्ते भी हैं और ईश्वर भी। बुरी आत्माओं की यह दूर-दूर की मौजूदगी लोगों को फिर अपने धार्मिक विश्वासों की ओर लौटा लाई, चर्च की सुरक्षित पनाह में।’’ , (Marriott, 2010, p. 207).डायन और ऐसी ही कई अन्य निर्मितियों ने हाशिये के वजूद को बनाये रख कर मुख्यधारा के कथानक को और मजबूत कर दिया। इन्होंने केन्द्र को कुछ नुकसान जरूर पहुंचाया, पर वे इसकी सत्ता को खत्म नहीं कर पाईं और बहुधा ‘बाहरी शक्ति’ की अपनी भूमिका को स्वीकार करके उन्होंने शोषण के उसी शब्द युग्म को पुनर्निमित करने में परोक्ष रूप से मदद ही की।

यदि उत्तर-उपनिवेशीय विखंडन की अवधारणा से बस इतना ही हुआ कि इसने एक और हाशिये को खड़ा करके युग्म को पछाड़ना चाहा तो यह इन् शब्द युग्मों के जाल को कभी काट नहीं पायेगी। विखंडन यदि हाशिये को बनाये रखती है तो क्या केन्द्र को पर्याप्त रूप में बनाये रखने की भी जरूरत होगी? केन्द्र की अपरिहार्यता से यह संभावना हमेशा बनी रहेगी कि एक नया शब्द-युग्म पुराने की जगह ले ले और हाशिये को फिर खामोश कर देµवर्गीकृत व्यवस्था खत्म हो, पर हाशिये और केन्द्र के विलोमों के बीच मौजूद ‘इतर’ दुर्लक्ष्यता के एक और युग्म-जाल में फंस जाए तो फिर स्त्री -यौनिकता के सिद्धांतकारों के रूप में हमारी भूमिका यह होनी चाहिए कि हम केन्द्र परिधि के रूप की इस सीमा को लांघें।
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