यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता


एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता


(एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल के अनियतकालीन प्रकाशन और विशेषांकों के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये थे . इस लम्बे आलेख को हम तीन किश्तों में प्रकाशित करेंगे . यह आलेख पश्चिमी इतिहास लेखन में व्याप्त पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की पड्ताल करता है, जिसे भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में भी पढा जाना चाहिए .  मूल आलेख का हिंदी अनुवाद स्त्रीकाल के संपादक मंडल की सदस्य डा अनुपमा गुप्ता ने किया है .  रुस्सुम फ्लोरिडा ,यू एस ए, के एक कालेज में पढाते हैं और डा अनुपमा एम जी आई एम एस , वर्धा , में कार्यरत हैं   रुस्सुम से LRussum@polk.edu पर संपर्क किया जा सकता है )

मानव इतिहास के पश्चिमी लेखन  में स्त्री देह को जानबूझ कर उपेक्षित किया गया है। यह उपेक्षा एक सोचा-समझा फैसला रहा है, जिसके तहत मानव के जीवन संघर्षां व उन्नति में स्त्री के योगदान को   यौनिकता के ऐतिहासिक संदर्भों में नहीं देखा गया। स्त्री देहों की वे कथाएं, जो पश्चिमी सभ्यता की मुख्यधारा के मानकों में नहीं बैठती थी, उन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की सूची से ही मिटाया जाता रहा है। इस पुंसत्व प्रधान अंधेपन की प्रतिक्रिया स्वरूप बहुत से उत्तर-उपनिवेशीय  स्त्रीवादी यौनिकता के आख्यान स्वरूप की ओर मुड़ गये हैं ताकि वे ‘इतर’ ( वैकल्पिक  इतिहासों की रचना कर सकें। ये आख्यान बहुधा पश्चिमी इतिहास के अभिलेखन के लिए स्वीकृत शब्दावली की सीमा तोड़ते दिखाई देते हैं।1

ये साहित्यिक आख्यान स्त्री देह का ऐतिहासिक लेखन हैं , जो पश्चिम के  मानक इतिहास माने जाते रहे इतिहास  के कथित सच के गुब्बारे की हवा निकाल देते हैं।



अब जो प्रश्न उभरते हैं वे हैं:

एक, इन तथ्यों  को जिस तरह मान्य इतिहास में अलक्षित (invisible) और दुर्लक्ष्य (un visible) किया गया है, क्या अब इसी तरह इनकी कुलक्ष्यता (dis visiblity) या अवज्ञापूर्ण अनावरण को स्त्री यौनिकता के पितृसत्तात्मक मानकों के खिलाफ बगावत के रूप में लिया जाना चाहिए? दूसरा ,स्त्री देह के ये साहित्यिक नव-इतिहास पश्चिमी इतिहास में रची गई यौनिकता की झूठी तस्वीर के विरोध की राजनीतिक जमीन किस तरह बन जाते हैं?

पुरुष- इतिहास (His-tory) द्वारा  आघात

‘‘मेरे दल में हर कोई यह जताता है कि उसने इस संवाद का एक शब्द भी नहीं सुना है। तब भी, जब मैं बयानों की ओर उनका ध्यान खींचने की कोशिश करूँ, उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। ऐसा लगता है जैसे मैं उनसे बात नहीं कर रही हूँ, अचानक जैसे उनके लिए वहाँ हूँ ही नहीं। जैसे मैं अदृश्य हो गई हूँ।’’
(हुक्स, 1992, पृ.-113)

यदि कुछ पल के लिए मान भी लें कि इतिहास अतीत की पुनर्रचना का अभिलेख है, तो भी हमें इससे कोई लगाव महसूस नहीं होता, क्योंकि यह पश्चिमी अभिलेख दरअसल भौगोलिक रक्तस्नान के सिवा और कुछ हीं है। इतिहास के नाम पर उपलब्ध ये रक्तस्नान- विवरण सत्य के अभिलेखन का प्रयास नहीं, बल्कि इस बात के चिह्न  हैं कि पश्चिम ने दुनिया की दूसरी ‘अमानुष’ संस्कृतियों पर विजय हासिल की है अथवा उनमें सेंध लगाई है। यह इस तरह प्रदर्शित किया जाता है ,जैसे यह रक्तपात है, पर फिर भी नहीं हैµयह तो भूमण्डल के शुद्धिकरण के लिए पश्चिम द्वारा मजबूरीवश उठाये ग्ये अतिवादी, लेकिन अतिआवश्यक कदम हैं।
‘‘सतह पर दिखता नियतिवाद उन लोगों के लिए बढ़िया नकाब का काम करता है, जो अन्यथा इन हत्याओं, दासत्व और रक्तपात को लेकर चिंतित हो सकते थे। पिछले 350 वर्षों से यह अनवरत चल रहा है और इसके कम होने के कोई आसार नहीं दिखते। अंततोगत्वा इस दैवीय दलील ने एक ऐसे जनसमुदाय को जन्म दिया है, जिसके लिये हत्याएं और दासकरण स्वर्ग में पहुँचाने वाली सोने की सीढ़ी है।’’
(म्यूजिको, 2005, पृ.-16)

तो अतीत का वर्णन कहा जाने वाला इतिहास जब इन्हीं संदर्भों में लिखा गया है, तब इसका उद्देश्य कुछ विशेष मूल्यों को जनमानस में उतारना ही हो सकता है। कुछ खास-आदर्शों में डुबकी लगाने की तरह।
इस निर्देशित प्रकार की पश्चिमी ‘शिक्षा’ के मूल में यही है कि इतिहास में विवरण ‘उन बहुत दूर के प्रदेशों के बारे में हैं, जिनकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है और इस तरह मॅककिट्रिक के शब्दों में उन्हें अंततः अभौगोलिक बना दिया गया है।’ (मॅककिट्रिक, 2006, पृ.-ग्)। जब कोई राष्ट्र पश्चिमी प्रभुसत्ता की सैनिक विजय के एक चिह्न  से ज्यादा कुछ नहीं रह जाता तो इस ‘अनस्तित्व’ में एक और चीज है, जो नकार दी जाती हैµदैहिक यौनिकताµ‘‘भूगोल को हमेशा मानवीय होना चाहिए और मानवता को  सदा भौगालिक।’’ (मॅककिट्रिक, 2006, पृ.-ग्)। पश्चिम के इतिहास में जमीन पर कब्जे का मतलब देह पर भी कब्जा है या बहुत बार इसका उल्टा भी यानी एक संस्कृति में सेंध लगाना भी  भौगोलिक सत्ता को जीत लेने जैसा ही है। यह सिद्ध करने के लिए हमें बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा। भारत में अंग्रेजी और फ्रांसीसी आधिपत्य को, कांगो में डच प्रभुत्वध् को, या हाल में इराक में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति को देखना काफी है, जहां स्त्राी देहों पर हिंसात्मक कार्यवाहियां असल में उस समुदाय को दहशत में लाने के लिए की गयीं। जापान के इवोजिमा द्वीप पर अमेरिकी नौसैनिकों की उस कुख्यात तस्वीर के बिम्बार्थ को समझने में कौन गलती कर सकता है? और ये देहें जिन्हें ‘अभौगोलिक’ बना कर इतिहास से लुप्त कर दिया गया तो परिणाम क्या होना था? क्या होना था जब ये कथाएं, ‘इतर प्राणियों’ के ये कथासूत्र इतिहास के सच्चे संदर्भों से काट कर अलग कर दिए गये? हुआ यही कि एक खतरनाक पूर्वाग्रह ऐतिहासिक तथ्यों की शक्ल ले बैठा।


यह यथार्थ, जिसे मॅककिट्रिक ‘पारदर्शी’ का विशेषण देती हैं, अथवा ‘जैसा का तैसा’ का लेबल, जिस पर चस्पा किया गया है, दरअसल पश्चिम के इतिहास द्वारा मान ली गयी या ओढ़ी गई ‘स्वघोषित पारदर्शिता’ है (मॅककिट्रिक, 2006, पृ.-ग्टए 5)। इन देहों को अपठ्य बना दिया गया है, ये ऐसे उपकथानक हैं, जिन्हें  मुख्य कथानक के अधीन और टुकड़ों में बाँट दिया गया है। पश्चिम की दृष्टि में वे मात्रा दर्पण हैं. उनकी अलैंगिक देहें उनके साम्राज्यवादी प्रकाश स्रोतों के प्रतिबिम्ब को हम तक पहुँचाने का कार्य मात्रा करती हैंµवे सिर्फ इसीलिए मौजूद हैं, क्योंकि पश्चिम से उनका साक्षात्कार हुआ है, लेकिन मुख्य कथानक के मुद्रित कथ्य में उन्हें मात्र नगण्य स्थान देने की इस प्रक्रिया में उनकी दृश्यता विकृत हो गई है।

‘‘तुमने मेरे कंधों पर अपना नाम उकेर दिया है, अपनी छाप मुझ पर अंकित कर दी है। तुम्हारी उँगलियों के पोर मुद्रण ब्लॉक बन गये हैं, जिनसे तुम अपना संदेश मेरी त्वचा पर टंकित कर देती हो और उसका लक्ष्यार्थ मेरे शरीर में मुद्रित हो जाता है। तुम्हारा मोर्स कोड मेरे दिल की धड़कन को बाधित करता है। तुमसे मिलने के पहले मेरी यही धड़कन स्थिर हुआ करती थी, मुझे इस पर यकीन हुआ करता था और इसने मेरे सक्रिय सैनिक जीवन से शक्ति पाई थी, लेकिन अब तुम  इसी चाल को अपनी लय से बदल देती हो। मेरे ऊपर् तुम्हारी थिरकन मुझे एक कसा हुआ मृदंग बना देती है।’’

दृश्यता के आयाम

पश्चिमी इतिहास ने सदियों से अभिलिखित कथ्य में स्त्री देह की दृश्यता व यौनिकता में हेर-फेर करने के लिए एक असरदार पितृसत्तात्मक अभियान छेड़ा हुआ है। चाहे स्त्री की यौनिकता को उघाड़ा गया हो और अक्सर कुछ ज्यादा ही उघाड़ा गया हो, पर उसमें स्त्री का अपना प्रामाणिक पक्ष कभी दिखाई नहीं दिया। ‘ढाक के तीन पात’ की तर्ज पर लिखे गये पश्चिम के अतीत के ये पृष्ठ स्त्री देहों तक अपनी पहुंच तो संभव कर लेते हैं, क्योंकि उनकी आवाजों तक पहुंचने के रास्तों को अगम्य बना देते हैं, क्योंकि इन आवाजों के सच्चे स्वरूप में इन्हें स्वीकार ही नहीं किया गया। बजाय इसके इन दौहिक-आख्यानों का पुनर्लेखन करके, नये संदर्भों से उन्हें जोड़कर, उनके नैतिक मूल्य पक्ष को बदल कर, उन्हें नये अवतारों में ढाल दिया गया ताकि उन्हें पश्चिमी साम्राज्यवाद की वृहत् योजना के उपयुक्त बनाया जा सके।

पश्चिमी परंपरा के तहत स्त्री देह पर लिखे गये उत्तर-उपनिवेशीय स्त्रवादी कथ्य को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता हैµ‘अदृश्य/अलक्षित ( In visible) तथा ‘दुर्लक्षित’ ( un visible)। ये श्रेणियाँ ‘लोप करना’ (elimination) या ‘काट छांट करने’ की अपेक्षाकृत सरल अवधारणा की तुलना में कुछ अधिक जटिल हैं। लोप/ काट छांट करना यानी हटा देना/ रोक देना है, जिसमें सिवाय उस आभासी चिह्न् के सिवा कुछ नहीं रहता, जो मिटा देने के बाद बचा रह गया है। उत्तर-उपनिवेशिक लेखन के संदर्भ में उपनिवेशवाद की श्किार स्त्री देहों की स्थिति को दिखाने के लिए ‘काट-छांट करना’ शब्द सही नहीं लगता। हर एक उपसर्ग के प्रयोग में फर्क को देखना जरूरी है, जिसे हम ‘अ-’ (पद) और बाद में ‘दुः’ (पद्) पर चर्चा करके समझने की कोशिश करेंगे। उपसर्ग अ- (पद) का मूल लेटिन में अर्थ होता है ‘जिसे छोड़ा न गया हो।’ हालांकि ‘अ’- नकार की ही अभिव्यक्ति है, किन्तु इसका भाव ग्रहण न कर पाने या इन्द्रियातीत होने से है। यह दृश्यमान वस्तु का नकार नहीं है, बल्कि मात्रा उसे देख पाने में हमारी अक्षमता को इंगित करता हैµअलक्षित/ है पर नहीं है/ अग्राह्य/ जिसकी कमी है/ न देख पाने के कारण नकारा गया/ अदृश्य; क्योंकि स्त्री की यौनिकता को कथानक में मात्रा ‘कोष्ठकों के भीतर’ मौजूद मान लिया गया है; वह यथार्थ नहीं है, यथार्थ तो मात्र पुरुष देह ही हो सकती है। पश्चिमी कथ्य लेखन में स्त्री यौनिकता बहुधा अलक्षित ही रही है, जिसे कभी देखा ही नहीं गया।

एह्रलिक के अनुसार, ‘‘समाजशास्त्र में अध्ययन की विषय-वस्तु के रूप में स्त्री सामान्यतः उपेक्षित ही रही है। सिर्फ विवाह या परिवार जैसे क्षेत्रों में ही उसकी मौजूदगी देखी जा सकती है। दूसरे शब्दों में समाजशास्त्र में भी उसका स्थान वही पारंपरिक है, जो समाज ने उसे दिया है: उसकी जगह मात्रा घर में है’’ (एह्रलिक, 1971, पृ.-421)। स्त्राी देहें अलक्षित रही हैं, क्योंकि वे निजी संपत्ति की तरह या वैयक्तिक क्षेत्रा में घरेलू वस्तुओं की तरह नियंत्रित की गई हैं और अपनी यौनिकता पर उनका अपना आधिपत्य कभी नहीं रहा। देह को इस प्रकार अलक्षित बना देना केवल पितृसत्तात्मक युग के पुरुषों का ही शगल नहीं है, उत्तर-उपनिवेशीय लेखकों की एक छोटी जमात भी जब कुछ सांस्कृतिक मुद्दों को चुनौती देती है, तो अक्सर उन्हीं में उलझ जाती है। इस प्रक्रिया में स्त्री यौनिकता का पश्चिमी, पितृसत्तात्मक छद्म कथानक स्वीकार कर लिया जाता हैµउन लेखकों के नये आख्यान भी पृथ्वी पर मानव के इतिहास में स्त्री देह के संदर्भों/ आयामों/ दृश्य पक्ष को खो देते हैं। मानववाद के अपने प्रयासों के दौरान वे यह देखने से चूक जाते हैं कि यूरोपकेन्द्रित विचारधारा के कथनकों में स्त्री यौनिकता किस कदर ‘अमानव’ बना दी गई है।इन उत्तर-उपनिवेशीय विद्वानों ने भी अपने राजनीतिशास्त्र, मनोविश्लेषण व समाजवाद के रूपकों में स्त्री दैहिकता को गौण कथ्य की तरह संयोजित किया है। ये उत्तर-औपनिवेशीय स्वर पितृसत्तात्मक ढांचे के ही भीतर रहते हुए स्त्री दैहिकता से सुविधाजनक फासला बनाये रखते हैं। उनकी विफलता इस बात में है कि वे शोषित स्त्रिायों के बारे में, पश्चिमी अकादमिया के आरामगाहों में बैठे हुए लिखते हैं। हालाँकि बहुत से पश्चिमी उत्तर-उपनिवेशीय लेखकों को अपना मत तर्कसंगत लग सकता है, किन्तु यह नव-पितृसत्तात्मक इतिहास लेखन भी स्त्री-यौनिकता का सटीक विवरण प्रस्तुत नहीं करता, लेकिन असल में स्त्री लैंगिकता सिर्फ अलक्षित ही नहीं है, भूमण्डलीय युग में इससे भी अधिक अनास्वादक कुछ घट रहा है।


कथ्य के अधिक सही पाठन की संभावना बने, इसके लिए हमें उपसर्ग ‘दुः’  का सामना करने की जरूरत है। ‘अनदेखी करना’  अथवा ‘दुर्लक्ष्य करना’ में अ-लक्षित से अधिक नकार का बोध है। ‘दुः’ में निहित नकार को किसी शब्द के भीतर के विलोम शब्द पर जोर देते हुए अधिक अच्छे से समझा जा सकता है। पश्चिमी इतिहास के संदर्भ में स्त्री दैहिकता पर बात करते हुए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुः उपसर्ग शब्द में मौजूद क्रिया का बिल्कुल उलट अर्थबोध देता है। इस विलोम क्रिया-बोध को प्रयोग करने में तर्क यही है कि यूरोपकेन्द्रित विचारधारा  में स्त्री यौनिकता को अलक्षित नहीं, बल्कि दुर्लक्ष्य रखा गया हैµलक्षित के अर्थ को उलट कर नव-उपनिवेशी स्त्राी देह की यौनता को दृश्यमान बनाया जायेµ फूको की परियोजना, ‘दुर्लक्षित को लक्षित बनाना’ में प्रयुक्त परिभाषा को अल्क्षित  देहों पर लिखते हुए प्रयोग में लाने में स्पीवेक की यही कोशिश है। ये वही देहें हैं, जिन्हें इतिहास में अलिखित हैं  (स्पीवाक, 1988, पृ.-290)

अ-उपसर्ग से भिन्न ‘दुः’ उपसर्ग का मतलब है नव-उपनिवेशी स्त्री यौनता का पश्चिमी विचारधारा में सम्पूर्ण निषेधµयहां तक कि इन शोषित देहों के अनायास फूट पड़े दैहिक अनुभव भी स्वामी-दास सम्बन्धों के संदर्भ में नहीं लिखे गये। ‘दुः’ में इतिहास की व्यापक लेखन योजना में इन्हें गलती से ‘भूल जाने’ या इनके ‘छूट जाने’ का भाव नहीं है। ‘दुः’ योजनाबद्ध तरीके से इन्हें छोड़ देने का संकेत देता हैµशोषित देहों की यौनिकता को सोची समझी योजना के तहत ही इतिहास में शामिल नहीं किया गया है।
अ-लक्षित के ‘अ’ में स्त्राी देह है, पर नहीं है, क्योंकि वह अपने पारंपरिक भाव मात्रा में ही, जैसे कुमारी, माँ लड़की आदि। ‘दुर्लक्षित’ शब्द में पितृसत्तात्मक आदर्शों की जानी बूझी निर्मिति है और इसमें इन देहों को शामिल ही नहीं किये जाने का भाव है। यह दुर्लक्षित अलैंगिक देह ,अब अजनबी बना देने के एक उद्यत प्रयास से घिरी है। असहाय या अबला के शब्दविन्यास से भिन्न यह वह धारणा है कि अधीन कर ली गयी यह स्त्राी मनुष्य जाति से इतर कोई चीज है। स्त्री के अस्तित्व को मानव प्रजाति में एक विकृति अथवा नियम विरुद्ध मान लेने की पश्चिमी धारणा असल में अरस्तू के समय से ही चली आ रही हैµ‘‘क्योंकि माँ के गर्भ में विकसित होने में भी मादा भ्रूण  को नर भ्रूण  से अधिक समय लगता है, हालांकि जन्म के बाद का विकास उनमें अत्यधिक गति से पूरा हो जाता हैµजैसे वयः संधि, वयस्कता या वृद्धावस्था, क्योंकि असल में स्त्रीत्व का प्रादुर्भाव ही प्रकृति में एक  विकार था, ऐसी विकृति, जो प्रकृति में बार-बार होती है।’’ (अरस्तू, 1942, पृ.-77, ंए 12-16)
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