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मंडल और महिला आरक्षण

वासंती रामन

( इस सरकार में ६ महिला मंत्रियो को विशिष्ट विभागों का पदभार दिया गया है . यह लोकसभा भी महिला सदस्यों के मामले में पिछली से मामूली ही सही बढ़त बनाए हुए है. लेकिन ५० प्रतिशत महिला आबादी की तुलना में सीटो का यह अनुपात नगण्य है . पुरुष , महिला सांसद का अनुपात १०० : १२ का है. विदेश मंत्री  सुषमा स्वराज ने महिला आरक्षण बिल को अपनी प्राथमिकता बतलाई है . हमलोग आमीन कहते हुए इस प्राथमिकता का ५ सालों में नंबर आने का इन्तजार करे. यह आलेख पड़ताल करता है कि  आरक्षण के भीतर  आरक्षण के प्रति ब्राहमावादी व्यवस्था कैसे नकारात्मक रूख लिए हुए है और महिला आन्दोलन भी कैसे मंडल आंदोलनों के दौरान नकारात्मक भूमिका में था.  हालांकि राज्यसभा में आरक्षण के भीतर आरक्षण के बिना ही महिला आरक्षण बिल पारित हो चूका है, लेकिन समझना जरूरी है कि यह व्यवस्था क्यों अड़ी हुई है मौजूदा स्वरुप में किसी बदलाव के खिलाफ , तब भी, जब लोकसभा में गैरद्विज सदस्यों की संख्या ज्यादा है.  स्त्रीकाल ने महिला आरक्षण संबंधी सुझावों- विवादों को सिलसिलेवार छापा था . हमें इस वेब साईट पर  पिछले सारे अंको की बेहतर प्रस्तुति के लिए तकनीकी स्तर पर काम करना शेष है , फिर भी वासंती रामन के आलेख पाठकों के लिए स्कैन फॉर्म में मौजूदा व्यवस्था में ही प्रस्तुत कर रहे  हैं .)

‘ भारतीय महिला आन्दोलन राजनीति और विकास में नागरिकों की समान भागीदारी के दावे पर जोर देने के लिए प्रस्फुटित हो रहे अनेक प्रयासों में एक था . इस लक्ष्य ने आन्दोलन को रुढ़िवादी व प्रतिक्रयावादी ताकतों के विरुद्ध ला खड़ा किया .’

‘आखिर कार यह नजर अंदाज नहीं करना चाहिए की पिछड़ी जातिया और मुस्लिम ही ( अपनी संख्या तथा उससे भी महत्वपूर्ण अपनी सामाजिक स्थिति के कारण ) सवर्ण वर्चस्व को वास्तविक चुनौती दे सकते हैं न की अनुसूचित जाति समुदाय . इसीलिए सवर्ण वर्चस्व के कट्टर पैरोकार भी जहां अनूसूचित जाति-जनजाति को संरक्षण देते दिखाई देते है , वही अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की मांगो का विरोध करने में जुनून की हद तक चले जाते है. ‘

‘किन्तु अधिक दिलचस्प यह था की राजनीति प्रेरित कतिपय बुद्धिजीवियों और क्रान्तिकारी वामदलों के अलावा समूचा भारतीय सवर्ण मध्यम वर्ग और उच्चवर्ग एक स्वर में ‘ योग्यता’ का समर्थन कर रहा था . …… आँखे खोल देने वाली बात यह थी कि जब छात्र संघों के चुनाव में महिला विद्यार्थियों  के प्रति भेदभाव का मुद्दा उठा , मंडल के खिलाफ बढ़ -चढ़ कर बोलने वाली छात्राओं ( जो अधिकाशतः सवर्ण थी ) ने पाया की उनके सवर्ण पुरुष साथी उनके साथ नहीं है , बल्कि इस मुद्दे पर दलित छात्रो ने उनका साथ दिया . ‘

सरकार व मजूमदार ने बड़ी सरलता के साथ इस बात पर ध्यान खींचा कि स्वतन्त्रता पूर्व की पीढी होने के कारण स्वयं उन्होंने पहले कभी विशेष प्रतिनिधित्व का समर्थन नहीं किया था तथा अकादमिक चर्चाओं में अजा , जजा के लिए आरक्षण की आलोचना वे यही तर्क देकर करते रहे है कि, ‘ यह उपनिवेशवादी मानसिकता का नमूना है .’

और क्या सचमच  महिला आन्दोलन भारतीय महिला एकता का सच्चा प्रवक्ता है , दुर्भाग्य से अबतक महिला संगठन के नेताओं के वकतव्य , जो विधेयक के समर्थन में  आये हैं , वे समस्या की जटिलता की उनकी समझ का खुलासा करते दिखाई नहीं देते , न ही उनमें कोइ पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यकों में जेंडर विविधता का कोइ उल्लेख है .

( वासंती रामन सी डवल्यु डी एस में सीनियर फेलो हैं)

बदलाव की बयार : जद्दोजहद अभी बाकी है

अमृता ठाकुर

( यह आलेख हरियाणा के सतरोल खाप के द्वारा , महिला विंग बनाने , अन्तरजातीय विवाहों को मान्यता देने आदि के फैसलों के बाद एक केस स्टडी है . इस आलेख में  पितृसत्ता के द्वारा अपनी हेजेमनी बनाए रखने के नए -नए तरीके अपनाने की पड़ताल है , लेकिन कोइ भी आधुनिक बदलाव दूरगामी असर भी लेकर आता है , उसके संकेत भी हैं इसमें . अमृता ने एक पत्रकार की दृष्टि  के साथ -साथ अकादमिक दृष्टि से भी इन फैसलों को पढ़ा है . यह आलेख स्त्री अध्ययन के विद्यार्थियों को भी पढ़ना चाहिए .  )

विवाह क्या  है व्यक्तिगत मामला, सामाजिक मामला,  या पारिवारिक मामला.  हकीकत यह है कि विकसित समाज व्यक्तिगत आजादी को जितना महत्व देता है बंद समाज अपना वजूद खोने के डर से व्यक्तिगत आजादी पर उतने ही पहरे लगाता।  विवाह जैसी संस्था हमेशा से व्यक्तिगत आजादी और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच झूलती रही है। खासतौर पर उस समाज में जहां स्त्री  को दोयम दर्जा दिया  जाता है। स्त्री मात्र वंश आगे वढाने वाली मशीन होती है . जहां विवाह के ऊपर समाज का शिकंजा मजबूती से कसा होता है, उस शिकंजे पर थोडा सा भी प्रहार उस समाज को हिला देता और वह बौखला कर प्रहार करने वाले को नस्तेनाबूत करने का भरसक प्रयास करता है। समय -समय पर ऐसे ही बंद समाज के प्रतिनिधियो ने चुनौती देने वाले प्रेमियों को सामाजिक बहिष्कार से लेकर मृत्युदंड और सामूहिक बलात्कार जैसी सजाएं दी हैं। और वह अब उतनी ही मजबूती से अपनी इस परंपरा को थामे रखने का पक्षधर है। पर क्या  समय के साथ इनकी सोच में बदलाव आया  है। सतरोल खाप की अंतरजातीय विवाह की स्वीकृति और महिलाओं के लिए अलग विंग की घोषणा कुछ ऐसी ही खुशफहमी पैदा करती है।  यह बडी बात थी। कई और खुशफहमियाँ मन में जन्म लेने लगीं। लगा अब शायद प्रेमियों की लाशे पेडो पर लटकी हुई नहीं मिलेंगी। लडकी को प्रेम करने के जुर्म में बलात्कार नहीं झेलना पडेगा । अब ऊंची जाति की लडकी या  लडके से प्रेम करने के एवज में गांव के गांव नहीं जलाए जायेगे। खुशफहमियों का क्या  है ! बस वक्त और वजह खोजती रहती है, और हो जाती है । एक और खबर आई। औरतों ने सर से घूंघट का बोझ उतारा। हरियाणा के गांव की महिलाओं ने सर पर घूंघट न रखने का फैसला किया । महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले मेरे मन को इस खबर ने भी सकून का एहसास करवाया । पर पता नहीं विश्वास नहीं हो रहा था कि जो समाज समय की ओर पीठ करके चल रहा है वह अचानक कदम मिला कर कैसे चलने लगा गया  क्या  यह बदलाव की बयार  है या बस मन का भ्रम ! यह  देखने हम सतरोल खाप में शामिल कुछ गांवों का जायजा लेने निकले-

…..  लंबा कुर्तानुमा ब्लाउज, खूब घेर वाला लहंगा। हाथ और पैर में मोटे मोटे चांदी के कडे। लंबी तगडी कद काठी। एक ने गोद में बच्चा भी लिया  हुआ था। बातचीत में इतनी मशगुल की आस पास का ख्याल  ही नहीं। बगल से गुजरती बुजुर्ग महिला ने उनमें से किसी एक महिला को टोका –‘गाय नै बाछडा दे दिया तेरी सासू ने कही थी……।‘  जवाब न मिलने पर मुंह बिचकाती बगल से गुजर गई। वो तीनों औरतें पैंतीस से चालीस के उम्र की थी। चलती हुईं बातचीत की उसी तारतम्यता को बनाए हुए तीनों औरतों ने अचानक चेहरे के सामने एक बित्ते का घूंघट खींच लिया । मैनें आस पास देखा कहीं कोई नहीं। फिर किससे परदा ! थोडी दूर पर एक चबूतरा से बना था जहां कुछ कुर्सियाँ पडी थीं। औरतों ने अपनी चाल तेज कर दी थी। तेजी से वहां निकल कर फिर अपना घूंघट ऊपर कर लिया । ये  गांव का चौपाल है। औरतों की भागीदारी तो बहुत दूर की बात है औरते यहां से गुजरती भी हैं तो एक बित्ते का घूंघट चेहरे के सामने खींच देती हैं क्या  पता कोई बुजुर्ग वहां बैठा हो! यह वो चौपाल है, जहां दूसरों की जिंदगी को प्रभावित करने वाले फैसले लिए जाते है। ऐसे एकतरफे फैसले जिसमें औरतें अपना पक्ष नहीं रख सकती, चुप चाप फैसलों को स्वीकारती हैं। पर शायद अब वह अपना पक्ष रख पाएंगी। यह  दूसरी बात है कि उसके पक्ष को कितना महत्व दिया  जाएगा,  यह  वहां औरतों की स्थिति को देख कर समझा  जा सकता है। 650 साल के इतिहास में पहली बार सतरोल खाप ने महिलाओं के पक्ष को पंचों के सामने रखने के लिए, महिला विंग का गठन किया और सुदेश चौधरी का उसका प्रधान बनाया ।

 सडक के दोनो ओर फैले खेत। आलू की फसल तैया र थी। खेत के मेडों के पास कई जोटा बग्गी खडी थी। औरतें आलू की सफाई में लगी हुई थीं। कहीं कहीं उनके साथ पुरुष भी दिखे। ‘हरियाणा की औरतें बहुत मेहनती होती हैं।‘ गाडी चला रहे ड्राईवर ने कहा। ‘ पर यहां के आदमी….’  इतना कह कर चुप हो गया । वह खुद भी हरियाणा का ही है। हमारा पहला ठिकाना था बीबीपुर के सरपंच सुनील जागलान का घर। गाडी जब उनके घर के आस पास रुकी तो आस पडोस के किवाड में भी हलचल हुई। कुछ घुंघट से ढंके सिर झांकते  नजर आए। कुछ बच्चे  दौड कर गाडी के पास आ गए। सुनील जागलान घर में नहीं थे। उनकी बहन ऋतु से बातचीत का मौका मिला। एम ए -बी एड ऋतु विवाह का इंतजार कर रही है। पर साथ ही महिलाओं के सशत्तिकरण के कार्य  में भाई का साथ दे रही है। ऋतु अब पंचायत में पंचों के सामने मुंह खोलने की हिम्मत भी करने लगी है। जब पहली बार उसने ऐसा किया  तो उसे खुद विश्वास नहीं हो रहा था कि वह  पंचायात  में पंचों के सामने कैसे बोल पाई.  उसमें इतनी हिम्मत कैसे आई !  उसपर शायद उतना सोचा विचारा नहीं बस बोल दिया , क्योंकि  वहां पक्ष रखना जरूरी था।  बकौल ऋतु ‘ औरतें अब बोलने लगीं हैं। सोचने लगी हैं। अपनी जिंदगी के आस पास के मसलों पर जागती है।‘  ऑनर किलिंग के मामलें कैसे खत्म होंगे ? इस सवाल पर ऋतु बिल्कुल रटे रटाए लफ्जों को दोहरा देती है, ‘ और प्रेम व्रेम गांव के अंदर पॉसिबल नहीं है। इसमें खाप की क्या  गलती है। परिवारों की गलती है। वे इस तरह के मामले खाप के पास लाते। सच तो यह है कि यह सब पश्चिमी सभ्यता के दुष्प्रभाव की वजह से है। लडकियाँ परिवार के विरुद्ध जा कर प्रेम कर रहीं हैं। बेटी गांव की इज्जत होती है। पहले इतने रेप केसेज नहीं होते थे। गांवों में आपस में भाईचारा था। अब यह खत्म हो रहा है।‘  अंतर्जातीय्ा विवाह को खाप ने स्वीकृति दे दी है,  और सुनील कह रहे हैं कि वह इसकी पहल अपने घर से ही यानी आपके विवाह से ही करेंगे,  इस सवाल पर ऋतु थोडी गंभीर हो गई। ‘ मैने भी सुना। पर मै  अपने लाईफ में यह  नहीं चाहती।जो करना है वह अपने बच्चों के साथ करें।‘ युवा सुनील जागलान के पंचों में तीन महिलाएं भी शामिल है। यह  महिला सशत्तिकरण की उनकी सोच को दर्शाता है। पर वास्तविक बदलाव कितनी सूक्ष्मता की अपेक्षा करता है यह समझना भी जरूरी है। उनकी पत्नी हमें कहीं नजर नहीं आई। सुना वो सामने नहीं आती, पिछलीं बार भी दिखीं तो लंबे घूघट में ही, वह भी केवल ‘ हूं हां के साथ ही।

अगला पडाव सुदेश चौधरी। एक अखबार के लोकल रिपोर्टर का दफ्तर और सुदेश चौधरी का दफ्तर -टू इन वन। सुदेश चौधरी और अखबार का संवाददाता व दो तीन अन्य पुरुष वहां बैठे थे। सतरोल खाप की उस बैठक में वह अकेली औरत थी। बकौल सुदेश , ‘ उस बैठक में मैं पहले चौपाल के नीचे खडी हुई थी। अजीब तो लग रहा था। सभी पुरुष थे मैं अकेली महिला थी। बैठक में बातचीत हो रही थी। फिर मेरा नाम खाप के सदस्यों के सामने रखा गया कि महिला विंग की प्रधान यह  होंगी। सबने सहमति दे दी।  मै चौपाल के ऊपर चढी।‘  सुदेश के चौपाल पर चढने पर बाकी वहां बैठे पुरुषों की प्रतिक्रिया  के सवाल पर सुदेश का कहना था , ‘ समान्य ही था हां कुछेक माथों पर थोडी सिलवट दिखीं थीं। पर क्योंकि खाप के प्रधान ने ही मेरा नाम कहा था तो फिर विरोध नहीं हो सकता था।‘  सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सुदेश की पहचान सभी गांववालों के बीच पहले से ही मौजूद है। वास्तव में सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनकी पहचान उनके औरत होने की पहचान पर काफी हद तक हावी है। कोई हर दुख ,मुसीबत,  जरूरत में साथ खडा हो,  औरत ही सही, उसका विरोध कैसे किया  जा सकता। सवाल है, ‘  क्या  एक समान्य लडकी यह  औरत अपने पक्ष को रखने के लिए पंचायत के उस चौपाल पर पैर रख सकती है?  हालांकि सुदेश चौधरी ,जो इतिहास में एम ए हैं महिला स्वतंत्रता पर आजाद खयाल रखती हैं। महिलाओं पर कपडों और सेलफोन जैसी पाबंदियों की सख्त खिलाफ हैं , लेकिन शादी ब्याह  के मामले में खासतौर पर प्रेम विवाह के मामले में खाप की ही तरह प्रेम को शर्तों में बांधती हैं। उनका कहना है कि प्रेम विवाह गोत्र से बाहर, गांव से लगे सभी पडोसी गांवों से दूर, और अभिभावक की स्वीकृति के बाद ही होनी चाहिए। खाप की सबसे ज्यादा मार तो प्रेमी युगलों पर ही पडती है। बकौल सुदेश लड़के लडकियों में अच्छे संस्कार भरे जाएंगे, हम उन्हें समझाएगे  की शादी ब्याह  में क्या  बातें ध्यान  रखें,  अभिभावक की इच्छा के अनुसार चलें, अच्छे संस्कार डलेंगे तो लडकियाँ इस तरह से शादी करेंगी ही नहीं और ऑनर किलिंग जैसी घटना भी नहीं होगीं। खाप में एक महिला को शामिल करने के पीछे महिला सशत्तिकरण का कौन सा उद्देश्य, कितना काम कर रहा था,  वह तो स्पष्ट ही था। तथाकथित पश्चिमी सोच से युवाओं को बचा कर रूढिवादी परंपरा के बंधन में जकडे रहने के लिए मानसिक रूप से तैयार  करना। सुदेश इस कर्तव्य को अच्छे से निभा भी रही हैं। अक्सर महिलाओं और लडकियों के साथ बैठक करतीं और खाप और उसके नियम कानून के फायदे का ब्योरा  देकर खाप की दीवारों केा मजबूत करतीं।

ज्ञात हो की हाल ही में हरियाणा के बडे खापों में से एक , सतरोल खाप,  ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में अन्तर्जातीय  विवाहो को मंजूरी दे दी है।  खाप के इन 42 गांवों में भाईचारा माना जाता रहा है,  इनमें आपस में शादियाँ नहीं होती।  सतरोल खाप के प्रमुख इंद्र सिंह मोर ने अंतर्जातीय विवाह व गोत्र और गुहांड के अलावा भाईचारे के अन्य गांवों में विवाह से बैन हटाने की घोषणा की। अब इस फैसले का मूल्यांकन हरियाणा की स्थिति पर नजर डालते हुए करें। हरियाणा में लिंगानुपात की स्थिति सबसे खराब है। प्रति हजार पुरुष पर 877 महिलाएं है। बडी संख्या  में पुरुष कुंवारें हैं , यहाँदूसरे राज्यों से लडकियाँ खरीद कर,  या ब्याह कर लाई जा रही हैं। इंद्र सिंह मानते हैं कि यह बैन हटाना एक व्यवहारिक जरूरत थी। इंद्र सिंह के अपने गांव में, जहां की  आबादी 18000 है ,200 बहुएं पूर्वोत्तर राज्यों से लाई गई हैं। बकौल इंद्रसिंह , ‘ ये  लडकियाँ आराम से परिवार में घुल मिल जाती हैं, फिर क्या दिक्कत है, दूसरी जाति में शादी करने से।  लेकिन भाईचारे वाले गांव, एक गोत्र में और अभिभावकों की मंजूरी के बिना शादी नहीं होनी चाहिए। खाप के नियमों को तोडेगा कोई तो उसका विरोध किया जाएगा।‘ बारह गांवों ने इस फैसले का विरोध किया  है। पर इंद्रसिंह ने साफ कहा है कि इसे वापिस नहीं लिया  जाएगा। इंद्रसिंह के इस फैसले का विरोध करने वालेां में एक , हांसी  (हिसार जिला) ब्लॉक काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष बीर सिंह कौशिक का कहना है कि, ‘  अगर महिलाओं को इतनी आजादी दे दी जाएगी तो वे अपनी पसंद से शादियाँ करने लगेंगी और समाज और मर्यादा  की सभी अवधारणाएं नष्ट हो जाएंगी। यह परंपरा के विरुद्ध है।

सुनील जागलान से बातचीत हमारी यात्रा  का अंतिम पडाव था। युवा ,  उत्साही, आधुनिक विचारों से कदम मिला कर चलने की कोशिश करने वाले सपरंच । पूरा कमरा कई तरह के पदक व शिल्ड से भरा हुआ। बकौल सुनील , ‘ सामाजिक बंधन मनवाने और दिल में बिठाने की बात है। लडके लडकियों को गोत्र और भाईचारे वाले गांव की जानकारी होनी चाहिए ताकी वह सोच समझ कर रिश्ते बनाएं। वह गलत काम नहीं करेंगे, तो फिर खाप क्यों कडे फैसले लेगा। और खाप क्यों है,  खाप इसलिए है कि सरकार अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा रही। सरकार अपनी भूमिका ठीक से निभाए, हर गांव में पुलिस स्टेशन हो न्याय व्यवस्था  हो तो खाप की जरूरत नहीं ।‘ पर कई बार तो खाप ने कानून से इत्तर अपने फैसले सुनाएं हैं,  तो केवल व्यस्था  को इस बात के लिए दोषी कैसे ठहराया  जा सकता है ? मेरे इस तर्क पर एक चुप्पी कमरे में पसर गई। सुनील जागलान खाप के फैसलों से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं। मेरे यह पूछने पर की  क्या  खाप अब प्रेम का विरोध नहीं करेगा ! सुनील झट से बोल पडे , ‘ हां! हां! किसने मना किया ,  प्रेम करने से,  करो ना! खाप बस मना कर रहा है कि गांव कें अंदर और आस पास के गांव के लडके लडकी न हो। उसके बाहर शादी करो ना! गांव के अंदर और आस- पास के गांव के साथ तो भाई बहन का रिश्ता हो जाएगा ना!’  अपने तर्क को वैज्ञानिक जामा पहनाने की कोशिश करते हुए बोलें-‘ रिश्ते जितने दूरी में हों बच्चे स्वस्थ्य और इेंटेलीजेंट होते हैं। इसमें पिछडापन क्या ! यह तो विज्ञान के साथ चलना हुआ। यह  हमारी परंपरा है। परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश है।‘  अपने इस जवाब पर संतुष्टि  की रेखाएं उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी। और प्रेम, प्रेम तो उसी से होता है ना , जिसके साथ आप उठते बैठते है,  पंद्रह गांव दूर के लडके लडकी के बीच प्रेम कैसे होगा ? अच्छा यह बताइए आप तो युवा हैं आप नहीं चाहते थे कि आप की पत्नी ऐसी हो जिससे आपके विचार मिलते हो। मतलब एक दूसरे को अचछी तरह से समझते हों ! ’  मेरे इस सवाल पर सुनील जरा अटक गएं। उन्हें यह समझ ही नहीं आया  कि पत्नी से विचार मिलने जैसी क्या  बात होती है,  पत्नी का काम घर परिवार संभालना, सास ससुर की सेवा करना है, इसमें विचार मिलने की कहां बात से आती है।  फिर कुछ उपलब्धियाँ गिनाई ,जो उन्होंने महिला सशत्तिकरण के लिए किए हैं। उनकी पत्नी कहीं नजर नहीं आईं। देखना चाहती थी , सुना था बहुत खूबसूरत हैं। पर शायद सामने आती भी तो लंबे से घूंघट में चेहरा दिखता कहां।
बदलाव की यह बया र मंद – मंद बहती हुई कुरुक्षेत्र के बीर पिपली गाँव  की गलियों तक पहुंची हुई है। यहां 31 महिलाओं के पतियों ने अपनी अपनी पत्नियों के घूंघट उठाकर उन्हें इस कैद से मुक्ति  दी।  इन महिलाओं में 60 साल की रोशनी देवी से लेकर चालीस साल तक की महिलाएं हैं। रोशनी देवी ने चालीस साल उसी घूंघट के अंधेरे में बिताए हैं। शादी के चालीस साल के दौरान रौशनी ने इसी घूंघट तले रोजमर्रा के काम निपटाए। किलोमीटर चल कर पानी लाईं। इस दौरान कई बार ठोकर खाकर गिरीं भीं। चोटें खाईं। जाट समुदाय से आने वाली रोशनी ने जब भी पर्दा उठाने की कोशिश की हर बार तो हर बार बुजुर्गो ने ऐसा न करने के लिए दबाव बनाया  । अब उन्हें इस घूंघट से मुक्ति  तो मिल गई,  या  कहिए पति ने घूंघट सर पर न रखने की छूट उन्हें दे दी।  अब बच्चे भी तो बडे हो गए हैं,  और उम्र भी ढल गई।  रोशनी नहीं चाहती कि उसके बच्चों को घूंघट की यह कैद मिले।      इक्कीसवी सदी में स्त्री  पुरुष संबंधों को नियंत्रण में रखने वाले इन पंचायतो ने खुद में बदलाव के संकेत दिए है। पर हकीकत यह है कि ऊपरी तौर पर दिखने वाला बदलाव वास्तव में मजबूरी है। लिंगानुपात में आए असंतुलन की वजह से लडकों का विवाह नहीं हो पा रहा,  ऑनर किलिंग, बलात्कार जैसी घटनाओं में लगातार बढोतरी ऐसे क्रांतिकारी फैसले लेने के लिए खाप को मजबूर कर रहा है। सोच में कोई विशेष बदलाव नजर नहीं आ रहा है- आज भी लडकी, यानी  गांव और परिवार की इज्जत, और इज्जत इंसान की जिंदगी से ज्यादा  महत्वपूर्ण हैं। यह परंपरा कहीं न कहीं घबरा रही है कि उसकी पकड से युवा सोच छूट न जाए। कहीं इतना हो हल्ला न हो कि कानून के शिकंजे में इस परंपरा के प्राण पखेरू उखड जाएं। इस परंपरा में निहित सोच पुरातन जरूर है, लेकिन इस परंपरा को बचाए रखने के लिए ढूंढा गया  तरीका विज्ञानिक हैं। युवाओं को मानसिक रूप से इस सोच को आत्मसात् करने के लिए तैयार  किया  जा रहा है। घूंघट स्वयम  पुरुष उठा कर विद्रोह की सोच को दबाने की कोशिश कर रहा। ताकि स्त्री  इस पहल को अपना अधिकार नहीं एहसान समझे । और एहसान के तले कुछ समय विद्रोह को दबा कर शांत हो जाए। लेकिन मजबूरी ही सही परंपराओं की मुट्ठी से परिवर्तन की आंधी को रोका नहीं जा सकता उसे आनी है और वह आएगी ही। कई बार मजबूरी परिवर्तन  का आधार बनती है, शायद ऐसा ही इस बार हो रहा है।

अमृता स्त्रियों की पत्रिका बिंदिया से संबद्ध हैं

बेहाल गाँव, बेहाल बेटियां , गायब पौधे… धरहरा , जहाँ बेटी पैदा होने पर नहीं लग पाते हैं पेड़ : सुशासन का सच

 संजीव चंदन        

यह गाँव अचानक से देश -विदेश में चर्चित हो गया, जब 2010 में सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गाँव की बेटी ‘लवी’ के जन्मदिन पर गाँव में जाकर वृक्षारोपण किया. तब जाकर लोगों को पता चला कि इस गाँव के लोग एक बेटी के जन्म पर दस पेड़ लगाते  हैं. इसके बाद 2011 से 2012-हर साल नीतीश कुमार ने क्रमशः ‘रिमु राज’ और अंजलि कुमारी के जन्म पर पौधे लगाए. गाँव भ्रूणहत्या के खिलाफ तथा पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में एक स्टेटमेंट बन चुका है. यह मुख्यमंत्री के विकास कार्यक्रम और राजनीतिक दर्शन का प्रतीक बन चुका है. इसीलिए यह आदर्श गाँव है उनके विकास कार्यक्रम और राजनीतिक दर्शन को समझने के लिए भी. पाठक यहाँ किसी राय या निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे. आइये हमारे साथ गाँव चलते हैं.

भागलपुर जीरो माइल से गंगा पार करने के बाद ८ से १० किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है ‘धरहरा’ पहुँचने के लिए. इस बीच सड़क के दोनों किनारों पर लगाये गये पौधों की कतार में आप कोई पौधा खोजने की कोशिश नहीं करें , निराश होंगे. वहां लकड़ी के बाड़ और थोड़े-थोड़े अंतराल पर चापानल देख कर आप आश्वस्त हो सकते हैं कि सरकार वृक्षारोपण के प्रति गंभीर है और वह मनरेगा के पैसों का सही इस्तेमाल कर रही है. इसके डिटेल में न जाना उचित है और न धरहरा जाते हुए डिटेल में जाया जा सकता है कि कितनी राशि के गायब पौधे इन बाड़ों में लगाये गये हैं या कितनी राशि के गायब पौधों को  जीवित रखने की अंतिम कोशिश इन चापानलों के माध्यम से की गई है या फिर कितने मजदूरों को इस योजना में काम मिला है. ध्यान रहे हमलोग उस गाँव में जा रहे हैं, जो बेटियों के जन्म से जोड़कर वृक्षारोपण करता है , एक साथ पर्यावरण संरक्षा के लिए तथा भ्रूण हत्या के खिलाफ कटिबद्ध गाँव. वहां पहुँचने के पूर्व इन गायब या जल गये पौधों से कोई राय बना लेना ठीक नहीं होगा.

धरहरा, यानी मकंदपुर पंचायत का एक गाँव . मकंदपुर रास्ते में ही है. मैंने दारू पीनी छोड़ दी है. यदि आपको तलब है तो आप आश्वस्त रहें बिहार सरकार ने हर तीन पंचायत में एक ब्रांडेड  दारू की दूकान को लायसेंस दे रखा है, मकंदपुर एरिया में भी एक ठेका है. ग्रामीणों की माने तो लायसेंसधारी दुकानदारों ने कई गांवों में किराना दुकानदारों के माध्यम से मनपसंद ब्रांड उपलब्ध करा रखा है – ‘सर्विस ऐट डोर स्टेप’!  धरहरा के ग्रामीणों के अनुसार यह व्यवस्था उनके गांव में नहीं है.

1900 दर्ज मतदाताओं और चार से पांच हजार आबादी वाले इस गाँव में १२०० मतदाता कुशवाहा ( पिछड़ी) जाति के हैं १७५ मतदाता राजपूत जाति के शेष ५२५ मतदाता अति पिछड़ी जाति , दलित , अति दलित जाति  तथा पश्मान्दा मुसलमान आदि में बटें हैं. गाँव की ७५% जमीनों पर राजपूत जाति के लोगों का मालिकाना है, शेष अधिकांश पर मालिकाना है  कुछ कुशवाहा किसानों का  लगभग ६० से ७० प्रतिशत आबादी भूमिहीन है. खबरों और दावों को मानें तो इस गाँव में बेटी के जन्म पर १० से १५ पेड़ लगाने की परम्परा की शुरुआत ‘ निर्मला देवी ‘ के परिवार से हुई. नीतीश कुमार ने इन्हें बुलाकर पुरष्कृत किया और नीव डाली बेटी के जन्म पर वृक्षारोपण के मॉडल गाँव के रूप में धरहरा को विकसित करने की.

 निर्मला देवी सहित कई ग्रामीणों के यहाँ आपको मिलेंगी  अख़बारों के वे कतरनें, जिसमें सूबे के मुख्यमंत्री पौधा लगा रहे हैं और साथ में कैप्शन : ‘ बेटियों का मान बढ़ने वाले धरहरा को सलाम ‘ ‘सी.एम ने भी सराहा धरहरा के जज्बे को’ आदि. आदि . उत्साहित ग्रामीण आपको घुमायेंगे उन विशेष जगहों पर जहाँ सी.एम ने पौधे लगाये हैं, इस घोषणा के साथ शिलापट्ट भी लगे हैं वहां. नीतीश कुमार के ब्रांड अम्बेसडर गाँव की ब्रांड अम्बेसडर निर्मला देवी से मिलने पर आपको यकीन हो जाएगा कि इस गाँव के हर घर में बेटी पैदा होने पर १० पौधे लगाये जाते हैं. निर्मला देवी कहती हैं कि ‘ किसी भी जाति धर्म के लोग अपनी बेटी के जन्म पर पौधे लगाकर उत्सव मानते हैं. गाँव में बड़े बगीचों -दर्जनों एकड़ जमीन में फैले बगीचों और वीकीपीडिया पर इस गाँव में आम और लीची के पेड़ों की बताई गई संख्या ( १ लाख ) के प्रभाव में बेटी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील गाँव और सरकार के प्रति आप श्रद्धा से भर जायेंगे .

लेकिन जरा ठहरिये, आपको उत्सुकता और गर्व से गाँव घुमा रहे लोगों को थोड़ा और कुरेदिए , उन्हें आश्वस्त करिए कि आप हकीकत जानने आये हैं और हकीकत ही लिखेंगे तो आपसे वे खुलेंगे . तब आपको पता चलेगा कि आम और लीची के पेड़ों वाले भागलपुर के दर्जनों गाँव में से एक धरहरा में बड़े-बड़े बगीचों पर बमुश्किल एक दर्जन परिवार का मालिकाना है, उसमें से ८० % बगीचे का आकार राजपूत जाति के लोगों के अधिकार में है. आपको पता चलेगा कि तीन सालों से मुख्यमंत्री ने  दो बार राजपूत परिवार की बेटियों और एक बार कुशवाहा परिवार की बेटी के जन्म पर पेड़ लगाये हैं. आपको यह भी पता चलेगा कि लगभग सौ एकड़ में फैले जिस बगीचे से होकर आप निर्मला देवी के घर पहुंचे हैं, वह किसी राजपूत परिवार की मिलकियत है और निर्मला देवी के खुद के बगीचे भी आकर -प्रकार में कमतर नहीं हैं.

 मेरे साथ पहली बार गाँव के ही कुशवाहा जाति के युवा संजय सिंह घूम रहे थे. उनकी मानें तो गाँव के 60 से 70 % लोग भूमिहीन हैं और उनके द्वारा बेटी के जन्म पर पेड़ लगाना संभव ही नहीं है. ‘ कहाँ लगायेंगे वे पेड़ रहने को तो उनके पास बमुश्कील से कुछ एक  धूर जमीन है?’ संजय पूछते हैं. संजय का  सवाल नीतीश कुमार की राजनीति को कठघरे में खड़ा करता है. सवाल है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भू सुधार का वायदा करने वाले नीतीश ने आखिर क्यों बंदोपाध्याय कमिटी की संस्तुतियों को ठंढे बक्से में डाल दिया ! संजय जैसे लोग इससे ही जुड़े सवाल करते हैं कि क्या भूमिहीनों के बीच जमीन की बन्दोवस्ती जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम नीतीश कुमार उन्हीं लोगों के दवाब में नजरअंदाज करते हैं, जिनके दवाब में उन्होंने कई हत्याओं के अभियुक्त की हत्या की जांच सी.बी.आई को सौप दी, उसके समर्थकों को पटना और आरा  में खुलेआम तांडव    की छूट दे दी और कुशवाहा जाति के जनप्रतिनिधियों की औरंगाबाद में हत्या की जांच की मांग कर रहे लोगों पर लाठी बरसवाकर दर्जनों लोगों के हाथ-पैड तुडवा डाले ! मेरे साथ घूम रहे सामजिक कार्यकर्ता डा. मुकेश  सवाल करते हैं कि ‘क्या सूबे के नेता के पास इतनी दृष्टि भी नहीं है या उनके सलाहकार उन्हें सलाह नहीं देते हैं कि भूमिहीनों के लिए कोई एक -डेढ़ एकड़ जमीन गाँव में मुहैया करा दें जहाँ वे भी अपनी बेटियों के जन्म पर पेड़ लगा सकें !’  मुकेश अपने प्रश्नों के साथ सही सवाल उठा रहे हैं कि आखिर जब तक पूरे गाँव के लोग अपनी बेटियों के लिए पेड़ नहीं लगा पायेंगे तो प्रतीक बने इस गाँव में उनकी बेटियां कैसे बराबरी और सम्मान का दर्जा पा सकेंगी ! फिर पूरे गाँव के द्वारा बेटी के जन्म पर वृक्षारोपण की खोखले  अफवाह का क्या सन्दर्भ हो सकता है, जिस गाँव में बमुश्किल १० से १५ प्रतिशत लोग ऐसी हैसियत में हैं, जो इस सरकारी कर्मकांड में शामिल हो सकें .


इसके पहले कि बेटी के जन्मोत्सव से जुड़े पर्यावरण संरक्षण के इस अभियान के प्रभावों को धरहरा की जेंडर स्थिति की कसौटी पर कसा जाय जरा उन भूमिहीन घरों से घूम आते हैं, जिनमें से अधिकांश या तो नीतीश कुमार के नायाब सोशल  इंजीनिअरिंग के तहत चिह्नित ‘ महादलित’ परिवार के घर हैं या फिर मुसलमान परिवार के, जिनके वोट बैंक को टार्गेट कर नीतीश कुमार अपनी धर्मनिरपेक्षता की राजनीति को नरेन्द्र मोदी के इर्द -गिर्द घुमाते हैं. महादलित परिवार के कच्चे पक्के मकानों के सामने धरहरा की बेटियां खेलती नजर आ सकती हैं, या छोटी उम्र में अपने भाई -बहनों को खेलाती ताकि उनके माँ-बाप अपने काम निपटा सकें. वे अपने घर के सामने के बगीचे में तब तक ही खेल सकती हैं, जब तक उनपर फलों के मौसम नहीं आये हों, अन्यथा पहरेदार उन्हें उन बगीचों में घुसने नहीं देते, जो उनके नहीं हैं, या जो उन बेटियों के हैं जिनके पिताओं के पास कई एकड़ में फैले बगीचे हैं.

बमुश्किल पोषाहार के लिए स्कूल का समय निकल पाती इन बेटियों को अपने गाँव से जुड़े ‘शोर ‘ का पता नहीं है. महादलित परिवार के कुछ सदस्य उत्सुकता बस हमलोगों के पास चले आते हैं. उनसे पता चलता है कि गाँव में मुख्यमंत्री के आने के बाद वे भीड़ के तौर पर कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित होते हैं. उनमें से कोई मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत तौर पर पास जाकर नहीं मिला है और न ही मुख्यमंत्री ने अपने इस ‘मॉडल गाँव ‘ के अपने प्रिय लोगों ‘ महादलितों’ के टोले में आकर उनका हाल-चाल पूछना उचित समझा है. उन्हें जरूरी नहीं लगता कि वे इनके पास आकर इनकी ‘बेटियों’ के लिए वृक्षारोपण की इनकी चिंता में शामिल हों या इन्हें अपने मुहीम में शामिल करें. क्या नीतीश कुमार जिन्हें अपना चिर प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, लालू प्रसाद यादव, कभी किसी गाँव में हर साल आते और अपने प्रिय लोगों ( वोट बैंक ही सही ) से नहीं मिलते या उनके टोले में नहीं जाते, ऐसा संभव था ! गाँव के ही  प्रमोद पोद्दार नीतीश और लालू की राजनीति के इस फर्क को चिह्नित करते हैं.

मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है : अरविन्द जैन

( कल ही दिल्ली की एक अदालत ने यह व्यवस्था दी है कि पति के द्वारा जबरन संभोग बलात्कार नहीं है , और दो दिन  पहले ही मध्यप्रदेश में एक पति के द्वारा अपने अन्य परिवार -सद्स्यों के साथ मिलकर एक महिला का सामूहिक बलात्कार किया गया . ये बलात्कार की कुछ ऐसी घटनायें हैं , जिनमें परिवार ही स्त्री उत्पीडन का सबसे बडा केंद्र दिखा है, जिसके साथ सांस्कृतिक तर्क और उससे संचालित कानून की व्यवस्था भी है. महभारत में एक कथा है कि भीष्म किसी ‘ओघवती’ की कहानी सुनाते हैं , जिसमें अतिथि की सेवा के लिए उसका पति उसे सौंप देता है . यह कथा पति के मोक्ष के लिए पत्नी के बलात्कार को सांस्कृतिक तर्क देती है . स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किया है . उनसे स्त्रीकाल के लिए विवाह , परिवार के भीतर स्त्री पर बलात्कार और कानून एवम संस्कृति में अंतर्निहित पितृसत्तात्मक षडयंत्र पर बातचीत का एक अंश. अ‍रविंद जैन से उनके मोबाइल न . 9810201120 पर संपर्क किया जा सकता है  )

हेमेंन्द्रनाथ मजूमदार

क्या आप मह्सूस करते हैं कि बलात्कार के लिए, भारतीय समाज की संस्कृति ही तर्क और संरक्षण मुहैय्या कराती है?

यह जान कर आश्चर्य होगा  आपको कि २०१४ के मौजूदा कानून के अनुसार भी विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए ,मगर 18 से कम होने पर भी विवाह “गैरकानूनी” नहीं माना-समझा जाता और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अनुसार ‘सहमति की उम्र’ 18 साल है पर इसी कानून के अपवाद अनुसार “15 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध, किसी भी स्थिति में बलात्कार नहीं है”। क्यों?
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 1860 में सहमति की उम्र सिर्फ 10 साल थी जो 1891 में 12 साल, 1925 में 14 साल और 1949 में 16 साल की गई थी। 1949 के बाद इस पर, कभी कोई विचार ही नहीं किया गया। अध्यादेश (3.2.2013) और बाद में नए अधिनियम (२०१३) में इसे 16 से बढ़ा कर 18 किया गया।
अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (संयुक्त राष्ट्र) की एक रिपोर्ट के अनुसार “दुनिया की ९८ प्रतिशत पूँजी पर पुरुषों का कब्जा है. पुरुषों के बराबर आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पाने में औरतों को अभी हज़ार वर्ष और लगेंगे.” पितृसत्तात्मक समाजों के अब तक यह पूँजी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों को पुत्राधिकार में मिलती रही है, आगे भी मिलती रहेगी. आश्चर्यजनक है कि श्रम के अतिरिक्त मूल्य को ही पूँजी माना जाता है, मगर श्रम की परिभाषा मे घरेलू श्रम या कृषि श्रम शामिल नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप आधी दुनिया के श्रम का अतिरिक्त मूल्य यानी पूँजी को बिना हिसाब-किताब के ही परिवार का मुखिया या पुरुष हड़प कर जाते हैं.
सारी दुनिया की धरती और (स्त्री) देह यानी उत्पादन और उत्पत्ति के सभी साधनों पर पुरुषों का     ’सर्वाधिकार सुरक्षित्” है. उत्पादन के साधनों पर कब्जे के लिये उत्तराधिकार कानून और उत्पत्ति यानी स्त्री देह पर स्वामित्व के लिये विवाह संस्था की स्थापना (षड्‌यन्त्र) बहुत सोच-समझकर की गयी है.
दरअसल भारतीय विधि-व्यवस्था में भी उत्तराधिकार के लिए वैध संतान और वैध संतान के लिए वैध विवाह होना अनिवार्य है. न्याय की नज़र में, वैध संतान सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की होती है. वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (माँ) होती है। विवाह संस्था की स्थापना से बाहर पैदा हुए बच्चे ‘नाजायज’, ‘अवैध’, ‘हरामी’ और ‘बास्टर्ड’ कहे-माने जाते हैं. इसलिए पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते. हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे. ‘वैध-अवैध’ बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विश्व-भर में ‘विवाह संस्था’ को, अभी तक बनाए-बचाए हुए है. वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए यौन-शुचिता, पवित्रता, सतीत्व, नैतिकता, मर्यादा और इसके लिए स्त्री देह पर ‘पूर्ण स्वामित्व’ तथा नियंत्रण बनाए रखना पुरुष का ‘परम धर्म’ घोषित किया गया है. मतलब जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध है या गैरकानूनी है, वो स्त्री का. जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसा ही है हमारा कानून। ईमानदारी से बोलूँ तो मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है.

  आपने तो न्यायालयों की भाषा पर भी काम किया है, क्या न्यायालयों की  मर्दवादी भाषा इसी संस्कृति से पोषित नहीं है?

उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से पूँजी और पूँजी के आधार पर राजसत्ता, संसद, समाज, सम्पत्ति, शिक्षा – सब पर मर्नियम, कायदे-क़ानून, परम्परा, नैतिकता-आदर्श और न्याय सिद्धांत- सब पुरुषों ने ही बनाए हैं और वे ही उन्हें समय-समय पर परिभाषित और परिवर्तित करते रहते हैं हमेशा अपने वर्ग-हितों की रक्षा करते हुए. ‘भ्रूण हत्या’ से लेकर ‘सती’ बनाए जाने तक, प्रायः सभी क़ानून, महिला कल्याण के नाम पर सिर्फ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेकअप’ ही दिखाई देते  हैं . मौजूदा विधान-संविधान-क़ानून महिलाओं को कानूनी सुरक्षा कम देते हैं, आतंकित, भयभीत और पीड़ित अधिक करते हैं. निःसंदेह औरत को उत्पीडित करने की सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया में पूँजीवादी समाज क़ानून को हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है. इसलिए ‘लॉ’ का असली अर्थ ही है-‘लॉ अगेंस्ट वूमैन’. समता की परिभाषा (बकौल सुप्रीम कोर्ट) है- सामान लोगों में समानता.
नारी सम्बन्धी अधिकांश फैसलों के लिए आधारभूमि तो धर्मशास्त्र ही हैं जो मर्दों के लिए ‘अफीम’ मगर औरतों के लिए ज़हर से भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुए हैं. तमाम न्यायाशास्त्रों के सिद्धांत पुरुष हितों को ही ध्यान में रखकर गढ़े-गढ़ाए गए हैं. मथुरा से लेकर भंवरी बाई और सुधा गोयल से लेकर रूप कंवर सती कांड तक की न्याय- यात्रा में हजारों-हजार ऐसे मुकदमे, आंकड़े, तर्क-कुतर्क, जाल-जंजाल और सुलगते सवाल समाज के सामने आज भी मुंह बाए खड़े हैं। अन्याय, शोषण और हिंसा की शिकार स्त्रियों के लिए घर-परिवार की दहलीज से अदालत के दरवाजे के बीच बहुत लम्बी-चौड़ी गहरी खाई है, जिसे पार कर पाना बेहद दुसाध्य काम है। न्यायलयों की मर्द वादी भाषा इसी महान सभ्यता और संस्कृति की देन  है.

कानून की भाषा ही नहीं, परिभाषा भी घोर ‘मर्दवादी’ और पुरुष हितों को पोषित करने वाली लगती है. “औरत होने की सजा” के “यौन हिंसा और न्याय की भाषा” नामक लेख में, मैंने इस पर विस्तार से चर्चा की है. कानूनी भाषा ही नहीं, व्यवहार में भी पुरुष वर्चस्व साफ़ झलकता है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीशों पर यौन शोषण के आरोप, वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर यौन शोषण-उत्पीड़न के आरोप और आए दिन महिला अधिवक्ताओं के साथ होने वाले यौन शोषण-अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद, समाज-मीडिया-न्यायपालिका की रहस्यमयी ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या यह सब होने-देखने के लिए ही औरतें अभिशप्त हैं? आखिर कब तक? दूर-दूर तक विरोध-प्रतिरोध  या प्रतिशोध की चिंगारी तक दिखाई नहीं दे रही. संभावनाओं का गर्भ में ही, गला घोंटा जा रहा है.  अक्सर महसूस होता है कि औरतों को अपनी आत्मरक्षा के लिए, कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल हथियारों की तरह और हथियारों का इस्तेमाल कानूनी अधिकारों की तरह करना होगा.

 बलात्कार के खिलाफ मानस बनाने के लिए जहां समाज, न्यायालय और संस्कृति के प्लेटफार्म पर काम करने की जरूरत है, वहीं क्या आप यह देखते हैं कि परिवार न सिर्फ इसके लिए अपने ‘पवित्र डोमेन’ में तर्क बनाता है, बल्कि बलात्कारियों को सांस्कृतिक संरक्षण भी देता है?    विवाह के भीतर बलात्कार के लिए क्या यही संस्कृति और परिवार का ‘पवित्र डोमेन’ जिम्मेवार नहीं है?

 सच कहूँ तो भारतीय समाज दोहरी चरित्र(हीन) नैतिकता में जीने वाला समाज है. भारत में वैवाहिक पार्टनर के बीच यौन संबंध ही ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’. हालांकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है. विवाह-पूर्व वयस्क स्त्री-पुरुष द्वारा सहमति से यौन संबंध (या परस्पर सहवास) ‘अनैतिक’ माने-समझे जाते हैं मगर कोई कानूनन अपराध नहीं.
बाल विवाह की ‘सामजिक कुप्रथा’ अभी भी जिन्दा है. समाज ही नहीं, बाकायदा कानून-विधि-विधान में फल-फूल रही. वर्तमान कानून के अनुसार विवाह के लिए लड़के की उम्र २१ साल और लड़की की उम्र १८ साल होनी चाहिए पर यदि कोई १८ साल से कम उम्र का लड़का,१८ साल से कम उम्र कि लड़की से विवाह करे, तो ना कोई कानूनी जुर्म है और ना कोई सजा. १८ साल से कम उम्र की लड़की से विवाह दंडनीय अपराध है और सहमती की उम्र भी १८ साल है, मगर १५ साल से बड़ी उम्र की अपनी पत्नी से जबरदस्ती यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं. भारतीय कानून-विधान-संविधान पत्नी से ‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस या अधिकार’ और समाज ‘बलात्कार की संस्कृति’ को बढ़ावा देता है. स्त्री देह शोषण के लिए विवाह और वेश्यावृति की जड़ें तो भारतीय समाज की महान सभ्यता और संस्कृति का स्वर्णिम अध्याय कहा जाता है. विवाह संस्था में स्त्री, पति की निजी संपत्ति है और वेश्यावृति के प्राचीनतम धंधे में स्त्री. सार्वजनिक संपत्ति. देवदासी से लेकर आधुनिकतम ‘एस्कॉर्ट्स’ तक, मर्दों का ‘आनंद बाज़ार’ ही नहीं ‘व्यवसाय भी है.  हालांकि वेश्या या ‘काल-गर्ल’ से यौन सम्बन्ध बनाना, भले ही ‘अनैतिक’ बताया जाता है मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं. पकड़ी गई तो वेश्या को ही जेल जाना होगा.
ऐसे आधे-अधूरे और गड्ढे भरे कानूनों से ना तो ‘बाल विवाह’, ‘बाल तस्करी’, ‘बाल वेश्यव्रती’ को रोका जा सकता है और ना ही स्त्री विरोधी हिंसा-यौन हिंसा को. वैधानिक प्रावधानों में अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण ‘सुधारवादी मेकअप’ से, स्त्री के विरुद्ध हिंसा-यौन हिंसा, कम होने की बजाये बढ़ी है, बढती रही है और बढती रहेगी।

  हिन्दू धर्म शास्त्रों में अतिथि के द्वारा पत्नी की कामना करने पर उसे अतिथि को पेश करना स्वर्ग के लिए जरूरी बताया गया, क्या ऐसे तर्क मानस का निर्माण नहीं करते हैं, विवाह के भीतर बलात्कार के लिए.

प्राचीन भारत से लेकर अब तक, पति के लिए पत्नी उसकी अपनी ‘निजी संपत्ति’ है, जिसे वह अपने हितों को पूरा करने के लिए ‘उपयोग-दुरूपयोग’ की इज़ाज़त दे सकता है. वैवाहिक जीवन में बलात्कार की छूट के कारण भारतीय शादीशुदा महिलाओं की स्थिति ‘सेक्सवर्कर’ और घरेलू दासियों से भी बदतर है। ‘सेक्स वर्कर’ को ना कहने का अधिकार तो है , शादीशुदामहिला को वो भी नहीं है।अपने लाभ या राज्य-विस्तार के लिए, साधन-संपन्न अतिथि को पत्नी पेश करने से लेकर अपनी बेटियों के डोले तक भेजे जाते रहे हैं. काशीनाथ विश्वनाथ राजवाड़े ने “भारत में विवाह संस्था का इतिहास” में प्रामाणिक दस्तावेज सहित विस्तार से विवेचना की है. स्त्री देह को पाने-हथियाने और बलात्कार करने के, सैंकड़ों उदाहरण हिन्दू धर्मशास्त्रों और मिथकों में मौजूद हैं. जब घर में स्त्री देह का जबरन भोग-उपभोग, हिंसा-यौन हिंसा या उत्पीड़न मान्य है, तो घर से बाहर भी अधिकार मानने- समझने की ‘मानसिकता’ भी स्वाभाविक रूप से बनेगी ही. क्या कागजी विकल्प, मौलिक अधिकारों की बराबरी कर सकते हैं ? परंपरा , संस्कृति , संस्कार , रीति – रिवाजों और रूढि़वादियों व धर्मशास्त्रियों द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर वैवाहिक बलात्कार को जायज नहीं ठहराया जा सकता। कोई भी ‘असली धर्म’ इसका समर्थन नहीं करता परन्तु धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने सब ‘धर्मभ्रष्ट’ किया हुआ है.

  ‘व्यभिचार’ का कानून भी तो विह के भीतर पति की इच्छा से दूसरे पुरुष के साथ यौन संबंध का तर्क देता है, यानी एक हद तक बलात्कार के लिए स्पेस बनाता है?

‘व्यभिचार’ (धारा-497 आई.पी.सी.) सम्बन्धी कानून के अनुसार पुरुष (भले ही विवाहित हो) किसी भी अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा स्त्री (स्त्रियों) के साथ सहमती से यौन रिश्ते (आप कहते रहें ‘अनैतिक’) बना सकता है। दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन संबंध ‘व्यभिचार’ है (अगर उसके पति की सहमति या मिलीभगत नहीं है) लेकिन यदि पति (मालिक) भी सहमत हो तो, यह कोई अपराध नहीं। यानि आपस में पति-पत्नियाँ बदलना विधान-सम्मत है. ‘व्यभिचार’ एक मायने में स्वेच्छा से ‘सहम’ नहीं, मानसिक अनुकूलन के बाद ‘बलात्कार’ ही है. समलैंगिक संबंधों को भी अपराध-मुक्त करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक बहस जारी है. कभी भी ‘अध्यादेश’ जारी हो सकता है. कानूनी जाल-जंजाल में, ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं मगर उन पर फिर कभी…..
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भारत में विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ कनून बनने के मार्ग में क्या -क्या बाधायें हैं.

सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर, पुरुषों का कब्जा है. संसद में मर्दों का बहुमत है, सो ऐसा कोई कानून नहीं बनायेंगे, जो पित्रसत्ता की जड़ों में मट्ठा डालने का काम करे. ‘महिला आरक्षण विधेयक’- अभी नहीं, कभी नहीं. सारे कानून मर्दों के हितों और वर्चस्व को बनाये-बचाये रखने वाले ही बने-बनाये गए हैं. हालांकि उपरी तौर पर ढिंढोरा यह पीटा जाता है कि ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के लिए, संसद ने ना जाने कौन-कौन से विधेयक पारित किये है. वास्तविकता यह है कि दांपत्य में यौन संबंधों के बारे में सदियों पुरानी सामंती सोच और सीलन भरे संस्कारों में, कोई बदलाव नहीं हो पा रहा। मालूम नहीं इस सवाल पर सबने, क्यों ‘मौनव्रत’ धारण कर लिया है।

देश में अपराधियों का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण इतना बढ़ गया है कि
वर्तमान दहशतज़दा माहौल में यौन हिंसा की शिकार औरत की चीख, आखिर कौन और कब सुनेगा ? मेरे विचार से स्त्री के दमन, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ़ कानून बनने-बनाने में सबसे बड़ी बाधा है- राजनीति और सत्ता में ‘मर्दवादी’ नेताओं की षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और अपने अधिकारों के प्रति स्त्री आन्दोलन के दिशाहीन भटकाव.

दुख तो यह भी है कि महिला प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, गवर्नर, सुप्रीम और हाईकोर्ट की न्यायमूर्तियां और अन्य सांसद, मंत्री, अफसर वगैरह के होने के बावजूद, आम औरतों के हालात बद से बदतर होते गये हैं। कुर्सी मिलते ही औरत, औरत नहीं रहती, सत्ता के इशारे पर नाचने वाली ‘गुड़िया’ बन जाती है, गुड़िया।

अफसोस कि तमाम प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी बेटे-बेटियां, जो सचमुच स्वाधीनता संघर्ष के दौरान बुने सपनों को साकार कर सकते थे या जिनमें देश की नियति बदलने की सारी संभावनाएं मौजूद थीं, सत्ता संस्थानों ने खरीद लिए, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आवारा पूंजी की गुलामी करने लगे या पेशेवर दलाल हो गये। कुछ ने सपनों के स्वर्ग अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड या कहीं और जाकर ‘आत्महत्या’ कर ली। जिनके बस का दलाल होना नहीं था, वो ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारे गये या फिर अराजक जीवन की दारु पीते-पीते एक दिन, खून की उल्टियां करते बरामद हुए। ऐसी विश्वासघाती और आत्मघाती होनहार पीढ़ियों को या राष्ट्र कर्णधारों को क्या कहे?

जाति और धर्म संस्थानों को स्त्री के प्रति यौन हिंसा के बडे  उत्प्रेरक के तौर पर माना जाता है, इन्हें कानूनों से किस हद तक ठीक किया जा सकता है ?

 धार्मिक पाखंड, कर्मकांड, अन्धविश्वास और तर्कहीन आस्थाओं के शिकार, मर्द और स्त्रियाँ दोनों ही हैं. धर्म मर्दों के लिए अनाथालय सिद्ध हुआ है, मगर स्त्रियों के लिए ‘वेश्यालय’. स्त्रियों की शस्त्रों से अधिक हत्या तो, धार्मिक शास्त्रों ने की है. मर्दों की आँखों में फिट जाऔर धर्म  के ‘टेलीलेंस’ का फोकस, हर स्त्री देह पर एक जैसा ही होता है। स्त्री को देखते ही ‘टेलीलेंस’ की लार टपकने लगती है और दिमाग में हिंसक घोड़े हिनहिनाने लगते हैं। स्त्री फ़िल्मी हिरोइन (सीता, पार्वती, द्रोपदी, तुलसी, आनंदी या किसी भी भूमिका में हो) हो या टेनिस-हाकी-क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता हो या समाजसेविका, पुलिस अफसर-डॉक्टर- वकील- इंजिनियर हो या एयर होस्टेस- नर्स-स्टेनो, अध्यापक हो या छात्रा, शिक्षित हो या अनपढ़, अमीर हो या गरीब, सवर्ण हो या दलित, शहरी हो या ग्रामीण, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई हो या नास्तिक। गंगा-यमुना में नहा रही हो या पांच सितारा स्विमिंग पूल में, सड़क किनारे या गांव के तालाब पर- कैमरा क्लिक,क्लिक करने लगता है। मीलों की दूरी से फिल्म शूट होने लगती है और स्त्री को पता तक नहीं चलता कि कब सीडी या एम् एम् एस, पितृसत्ता के ‘आनंद बाज़ार’ में छप गया।
दरअसल पुरुषों को घर में घूंघट या बुर्केवाली औरत (सती-सावित्री) चाहिए और अपने धंधा चलाने या ब्रांड बेचने के लिए बिकनीवाली। सो स्त्रियों को सहमती के लिए लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार या सोने का लालच (विश्व सुन्दरी के ईनाम और प्रतिष्ठा) और जो सहमत नहीं उनके साथ जबरदस्ती यानी हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न, शोषण के तमाम हथकंडे।
स्वयं सहमत हुई या की गई (नायिकाओं) स्त्रियों का तर्क होता है कि “हम देह नहीं सिर्फ देह की (कामुक-उतेजक) छवि बेच रही हैं, जो सचमुच देह बेचने या गुजारे के लिए विवाह बंधन में बंधने से कहीं ज्यादा फायदेमंद और सम्मानजनक है। देखो हत्या, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न और शोषण की शिकार ब्याही-अनब्याही आम स्त्रियाँ घुटघुट कर दम तोड़ रही हैं या सालों से इन्साफ के मंदिरों के चक्कर काटती घूम रही हैं।“ आपके ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों में भी लिखा है ‘सलज्जा गणिका नष्टा, निर्लज्श्च कुलांगना’। समझ नहीं आ रहा कि  (अ)न्यायशास्त्रों में घुस कर बैठे, आदिकालीन धर्मशास्त्रों की भरी-भरकम गठरी- आखिर हम कब तक ढोते रहेंगे.
दिक्कत यही है कि अधिकांश कानूनों की बहुमंजिला ईमारत, ऐसे ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों, परम्पराओं और रीति-रिवाजों के नीवं पर बनी-बनाई गई है. शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं, बदल रही हैं मगर भारतीय पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. उसके लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का दबाव-तनाव बढ़ता है तो कुछ ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं.

स्मृतिशेष अनुराधा मंडल की कवितायें .

( अनुराधा मंडल आज ही हमें अलविदा कह गईं ,वे लम्बे समय से बीमार थीं . उन्हें स्तन कैंसर था , जिससे वे 2012 में ही लड कर जीत चुकी थीं . बेहद संवेदंशील इंसान और कवयित्री अनुराधा की जिंदादिली की  कुछ पंक्तियां और दो कवितायें. स्त्रीकाल की ओर से उन्हें विनम्र श्राद्धांजलि !)

अनुराधा का आह्वान : 


कई तकलीफों का मुफ्त इलाज है हंसी। ज़ाहिर है, कैसर होने की खबर पाने के बाद कोई हंसता हुआ डॉक्टर के कमरे से नहीं निकलता, लेकिन ये भी सच है कैंसर हजारों बार हंसने के मौके देता है। हंसी कैंसर से जुड़ी चिंताओं को भुलाने का मौका देती है और मरीजों की जिंदगी के अंधेरे कोनों तक भी पहुंचने के लिए रौशनी की किरण को रास्ता बताती है। एक बीमारी ही तो हुई है, उसकी चिंता में आज जिंदगी जीने से क्यों रुका जाए भला! और अगर सचमुच जिंदगी कम बाकी है तब तो और भी जरूरी है कि सब कुछ किया जाए। भरपूर जी भी लिया जाए, जल्दी-जल्दी। ताकि कुछ बाकी न रह जाए।

कवितायें 

1. मेरे बालों में उलझी मां

मां बहुत याद आती है

सबसे ज्यादा याद आता है

उनका मेरे बाल संवार देना

रोज-ब-रोज

बिना नागा

बहुत छोटी थी मैं तब

बाल छोटे रखने का शौक ठहरा

पर मां!

खुद चोटी गूंथती, रोज दो बार

घने, लंबे, भारी बाल

कभी उलझते कभी खिंचते

मैं खीझती, झींकती, रोती

पर सुलझने के बाद

चिकने बालों पर कंघी का सरकना

आह! बड़ा आनंद आता

मां की गोदी में बैठे-बैठे

जैसे नैया पार लग गई

फिर उन चिकने तेल सने बालों का चोटियों में गुंथना

लगता पहाड़ की चोटी पर बस पहुंचने को ही हैं

रिबन बंध जाने के बाद

मां का पूरे सिर को चोटियों के आखिरी सिरे तक

सहलाना थपकना

मानो आशीर्वाद है,

बाल अब कभी नहीं उलझेंगे

आशीर्वाद काम करता था-

अगली सुबह तक

किशोर होने पर ज्यादा ताकत आ गई

बालों में, शरीर में और बातों में

मां की गोद छोटी, बाल कटवाने की मेरी जिद बड़ी

और चोटियों की लंबाई मोटाई बड़ी

उलझन बड़ी

कटवाने दो इन्हें या खुद ही बना दो चोटियां

मुझसे न हो सकेगा ये भारी काम

आधी गोदी में आधी जमीन पर बैठी मैं

और बालों की उलझन-सुलझन से निबटती मां

हर दिन

साथ बैठी मौसी से कहती आश्वस्त, मुस्कुराती संतोषी मां

बड़ी हो गई फिर भी…

प्रेम जताने का तरीका है लड़की का, हँ हँ

फिर प्रेम जो सिर चढ़ा

बालों से होता हुआ मां के हाथों को झुरझुरा गया

बालों का सिरा मेरी आंख में चुभा, बह गया

मगर प्रेम वहीं अटका रह गया

बालों में, आंखों के कोरों में

बालों का खिंचना मेरा, रोना-खीझना मां का

शादी के बाद पहले सावन में

केवड़े के पत्तों की वेणी चोटी के बीचो-बीच

मोगरे का मोटा-सा गोल गजरा सिर पर

और उसके बीचो-बीच

नगों-जड़ा बड़ा सा स्वर्णफूल

मां की शादी वाली नौ-गजी

मोरपंखी धर्मावरम धूपछांव साड़ी

लांगदार पहनावे की कौंध

अपनी नजरों से नजर उतारती

मां की आंखों का बादल

फिर मैं और बड़ी हुई और

ऑस्टियोपोरोसिस से मां की हड्डियां बूढ़ी

अबकी जब मैं बैठी मां के पास

जानते हुए कि नहीं बैठ पाऊंगी गोदी में अब कभी

मां ने पसार दिया अपना आंचल

जमीन पर

बोली- बैठ मेरी गोदी में, चोटी बना दूं तेरी

और बलाएं लेते मां के हाथ

सहलाते रहे मेरे सिर और बालों को आखिरी सिरे तक

मैं जानती हूं मां की गोदी कभी

छोटी कमजोर नाकाफी नहीं हो सकती

हमेशा खाली है मेरे बालों की उलझनों के लिए

कुछ बरस और बीते

मेरे लंबे बाल न रहे

और कुछ समय बाद

मां न रही

* नोट- कैंसर के दवाओं से इलाज (कीमोथेरेपी) से बाल झड़ जाते हैं

2. अधूरा

सुनती हूं बहुत कुछ
जो लोग कहते हैं
असंबोधित
कि
अधूरी हूं मैं- एक बार
अधूरी हूं मैं- दूसरी बार
क्या दो अधूरे मिलकर
एक पूरा नहीं होते?
होते ही हैं
चाहे रोटी हो या
मेरा समतल सीना
और अधूरा आखिर
होता क्या है!
जैसे अधूरा चांद? आसमान? पेड़? धरती?
कैसे हो सकता है
कोई इंसान अधूरा!

जैसे कि
केकड़ों की थैलियों से भरा
मेरा बायां स्तन
और कोई सात बरस बाद
दाहिना भी
अगर हट जाए,
कट जाए
मेरे शरीर का कोई हिस्सा
किसी दुर्घटना में
व्याधि में/ उससे निजात पाने में
एक हिस्सा गया तो जाए
बाकी तो बचा रहा!
बाकी शरीर/मन चलता तो है
अपनी पुरानी रफ्तार!
अधूरी हैं वो कोठरियां
शरीर/स्तन के भीतर
जहां पल रहे हों वो केकड़े
अपनी ही थाली में छेद करते हुए।

कोई इंसान हो सकता है भला अधूरा?
जब तक कोई जिंदा है, पूरा है
जान कभी आधी हो सकती है भला!
अधूरा कौन है-
वह, जिसके कंधे ऊंचे हैं
या जिसकी लंबाई नीची
जिसे भरी दोपहरी में अपना ऊनी टोप चाहिए
या जिसे सोने के लिए अपना तकिया
वह, जिसका पेट आगे
या वह,जिसकी पीठ
जो सूरज को बर्दाश्त नहीं कर सकता
या जिसे अंधेरे में परेशानी है
जिसे सुनने की परेशानी है
या जिसे देखने-बोलने की
जो हाजमे से परेशान है या जो भूख से?
आखिर कौन?
मेरी परिभाषा में-
जो टूटने-कटने पर बनाया नहीं जा सकता
जिसे जिलाया नहीं जा सकता
वह अधूरा नहीं हो सकता
अधूरा वह
जो बन रहा है
बन कर पूरा नहीं हुआ जो
जिसे पूरा होना है
देर-सबेर।
कुछ और नहीं।
न इंसान
न कुत्ता
न गाय-बैल
न चींटी
न अमलतास
न धरती
न आसमान
न चांद
न विचार
न कल्पना
न सपने
न कोशिश
न जिजीविषा
कुछ भी नहीं।
पूंछ कटा कुत्ता
बिना सींग के गाय-बैल
पांच टांगों वाली चींटी
छंटा हुआ अमलतास
बंजर धरती
क्षितिज पर रुका आसमान
ग्रहण में ढंका चांद
कोई अधूरा नहीं अगर
तो फिर कैसे
किसी स्त्री के स्तन का न होना
अधूरापन है
सूनापन है?

अनुराधा मंडल आज ही हमें अलविदा कह गईं

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता -भाग 2

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता

(एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल के अनियतकालीन प्रकाशन और विशेषांकों के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये थे . इस लम्बे आलेख को हम तीन किश्तों में प्रकाशित करेंगे . यह दूसरा किश्त है , पहले किश्त के लिए यहां क्लिक करें यह आलेख पश्चिमी इतिहास लेखन में व्याप्त पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की पड्ताल करता है, जिसे भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में भी पढा जाना चाहिए .  मूल आलेख का हिंदी अनुवाद स्त्रीकाल के संपादक मंडल की सदस्य डा अनुपमा गुप्ता ने किया है .  रुस्सुम फ्लोरिडा ,यू एस ए, के एक कालेज में दर्शन पढाते हैं और डा अनुपमा एम जी आई एम एस , वर्धा , में कार्यरत हैं   रुस्सुम से LRussum@polk.edu पर संपर्क किया जा सकता है)

अरुणा बुरटे का रेखांकन

स्त्रीत्व  में दैत्यत्व की उपस्थिति की धारणा और इसीलिए उसे नकार दिये जाने की समझ अश्वेत स्त्रीवादी, उत्तर उपनिवेशीय व यौनता पर विचित्रा धारणाओं वाले लेखन में मुखर है, जिसमें एक स्पष्ट बोध है कि पश्चिमी इतिहास के अभिलेखन में इरादतन क्या-क्या छोड़ गया है। जब पश्चिमी पुरुषी- इतिहास की सत्यलेखन की दावेदारी पर प्रतिक्रिया देनी हो, तब दुर्लक्ष्यता की समझ का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है; ‘दुर्लक्ष्यता’ शब्द का प्रयोग इस समझ का प्रतिनिधित्व करता है कि इतिहास में स्त्री देह की निर्मिति यौनिकता के सच्चे स्त्री -अनुभवों की अनुपस्थिति में की गई है। दुः की यह उत्तर-औपनिवेशीय चर्चा पश्चिमी विचारधारा में मौजूद भेदभाव की आलोचना के लिए जमीन तैयार कर रही है। यह मुख्य कथानक से बाहर की आवाजों को सुने जाने का मौका दे रही है। स्त्री यौनिकता को हाशिये का लेखन मानने की समझ दार्शनिक जाक देरिदा के विखंडन (Deconstruction) के व्याख्यात्मक भाष्य सिद्धांत से विकसित हुई है।
विखंडन की धारणा का सार यह है कि पश्चिमी विवरणों में मूलपाठ/ इतर ( other ) के शब्दयुग्म ( Binary )  के जरिये मुख्यकथानक को हाशिये पर बढ़त हासिल है। समूचा पश्चिमी इतिहास स्वयं को व्याख्या का केन्द्र बना कर प्रस्तुत करता है, वह समर्थ का यथार्थ है। केन्द्रीय सत्ता संरचना की अनुमति के बिना किसी देह की दृश्यता की यहां कल्पना भी नहीं की जा सकती। और यह वही यूरोपकेन्द्रित कथ्य है, जिसका विश्व के सभी जनसमुदायों पर गहरा असर रहा है। पश्चिमी इतिहास ने स्वयं को सत्ता के मूल ढांचे की तरह स्थापित किया है और अधीनस्थ सत्ताओं पर नियंत्राण की ताकत में ही स्वयं की पहचान पाई है। स्वयं से इतर को नजरअंदाज करने वाली इस मुख्य पाठान्तर की भाषा किताब के पृष्ठ पर दी गई क्रमिक टिप्पणियों तक ही सीमित नहीं है। स्त्री-देह को दुर्लक्ष्य तब भी किया जाता है, जब किसी देह की तस्वीर दिखाई देती है। दुर्लक्षित करने, नकार देने की क्षमता तब नजर आती है, जब तस्वीर एक निगेटिव की तरह शुरू होती है, क्योंकि इसमें शोषित देह एक अलैंगिक बना दिये गये स्त्री-समुदाय की नुमाइंदगी करती है।

पुरुष- इतिहास स्वयं को उस मूल संदर्भ की तरह लेता है, जिसे खुद से अलग रह गये भाग को अर्थ प्रदान करने की जिम्मेदारी निभानी है (जो भोगा हुआ नहीं, बल्कि रचा गया यथार्थ है)µतस्वीर में औरतें हैं, लेकिन उनकी लैंगिकता कहीं दिखाई नहीं देती। लिपिबद्ध भाषा में निहित वर्गभेद के जरिये अपना नियंत्रण बनाये रखना ही इस इतिहास को रचने की विधि है। अब विखंडन की अवधारणा दावा करती है कि इसकी भाषा का सहज झुकाव समानताओं की ओर अधिक रहा है, यानी सहमति की ‘आवाजों’ को ही ग्रहण करने की ओर। इसका अर्थ यह हुआ कि मुख्यधारा का पश्चिमी इतिहास ‘हाशिये’ पर नियंत्रण द्वारा कृत्रिम रूप में सत्यापित की गई समानता प्राप्त करने के बारे में है। यहां ‘समानता’ कभी ‘समता’ के द्वारा प्राप्त नहीं की गई, अर्थात् पितृसत्तात्मक इतिहास के लिए द्वैत का अर्थ कभी दो समान ढांचों से नहीं रहा, बल्कि पहले भाव को विशेष बनाने के लिए दूसरे भाव को बहिष्कार का दंड भोगना पड़ा हैµकेन्द्र को दृश्यमान बनाये रखने के लिए इतर को दुर्लक्षित करने का यही अर्थ है। इससे एक समतापूर्ण नहीं, बल्कि श्रेणीबद्ध संरचना बनती है, जिसमें दूसरे स्थान के भाव को वर्गीकरण में हमेशा नकारात्मक माना जाता है। विलोम शब्दों के इस प्रकार के युग्मों के उदाहरण हमें भाषा में और भी मिलेंगे जैसे वाणी/ लेखन, अवधारणा/ रूपक, आंतरिक /बाहरी, उपस्थिति/ अनुपस्थिति, प्रकाश/ अंधकार, अमीर/ गरीब, इतरलैंगिक/ समलैंगिक और पुरुष/ स्त्री। विलोमों के वर्गभेद में वाणी लेखन को बहिष्कृत कर देती है, प्रकाश अंधकार को और उसी तरह पुरुष स्त्री को। यह बहिष्कार इतिहास में ऐसी पितृसत्ता की रचना करता है, जिसमें युग्म के दोनों शब्द एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं, क्योंकि यह व्यवस्था पहले शब्द के केन्द्र में स्थापित होने की मंशा पूरी करती है और इस दौरान दूसरे शब्द को हाशिये पर कथ्यहीन/ वाचाहीन/ अलैंगिक कोरी जमीन बना कर पृष्ठ के मुख्य भाग के बाहर कर दिया जाता है। यूरोपकेन्द्रित इतिहास में हाशिये का उपयोग सिर्फ टिप्पणियों के लिए किया जाता है, जिस पर मनचाहा उकेरा जा सके, मूलपाठ के मात्रा पूरक भाग की तरह, जिसे मूल पाठ में दुर्लक्ष्य कर दिया गया। यह हाशिया हमेशा वह ‘इतर’ रहा है, जिस पर से दृष्टि प्रयासपूर्वक हटा कर रखी गई हैµवह एक ऐसी सम्पूर्ण बाहरी चीज है, जिसकी आवाज का अस्तित्व ही नहीं है (देरिदा, 1982, पृ.-ग्प्प्प्)।

यही, हाशिये की इसी जमीन पर, मूलपाठ से ‘इतर’ के भाव में वह उत्तर-उपनिवेशीय विखंडन अपना अस्त्र उठाता है- हाशिये की आवाज को दृश्यता प्रदान करने के लिये, उसके टिप्पणी-स्वरूप की कैद से उसे आजाद करने के लिये और अब तक केन्द्र की भूमिका निभा रहे मूलपाठ को विस्थापित कर देने के लिये, यह अवधारणा दमन के झूठे युग्मों को धराशायी करती है। इस तरह यह अनिर्मित होते हुए भी ‘निर्मित’ कर रही होती हैं, क्योंकि यह हाशिये को दृश्यमान बना कर केन्द्र पर मानो किसी प्रेत के साये सी झूल रही है।
उत्तर-औपनिवेशीय विखंडन की अवधारणा शब्द युग्म को पलट कर और ‘इतर’ पक्ष की आवाज बन कर मूलपाठ को भीतर से खोखला कर रही है, जिससे वर्गभेद का ढाँचा भरभराने लगता है।

पुरूष/स्त्री  युग्म पलट कर अब
स्त्री /पुरूष हो जाता है और इस योजना में पुरूष के विशेषाधिकार वाली वर्गीकृत संरचना अपनी ताकत खो देती है; अब पुरूष के बारे में बात करते हुए स्त्री को बहिष्कृत नहीं किया जा सकता। इस परिवर्तन के बाद अब स्त्री को उस हाशिये की कैद में कभी नहीं रखा जा सकता, जो पुरूष/ स्त्री की शब्द योजना संभव थी। इससे श्रेणीबद्धता का खात्मा हो रहा है, दुर्लक्षित अब लक्षित बन रहा है। जहाँ यह वर्गभेद में गहरा संशय पैदा कर रहा है और वर्गीकरण और इससे उपजने वाले भेदभाव की संभावना खत्म कर रहा है, वहीं एक ‘दृश्यमान इतर’ की संभावना को जन्म दे रहा है. उलट-फेर का यह पल हाशिये पर स्त्री के लिये दुर्लक्षता की पहेली सुलझ जाने का समय है। यह नयी वैकल्पिक आवाज बहुधा हिंसा के जरिये राजनीतिक स्वरूप में आती है। ‘हिंसा’ एक ‘पारंपरिक स्त्री’ के मूल विचार को ही छिन्न-भिन्न कर देती है और हाशिये पर बैठी अब तक अनदेखी ‘डायनें’ साकार हो उठती हैं और मुख्य धारा के कथ्य की स्थिरता को हिला कर रख देती हैं, जो फिलीस्तीनी फिदायिनी (आत्मघाती) हमलावरों के उदाहरण से स्पष्ट है-‘‘फिदायिनी हमलों की हिंसा को राजनीतिक अभियान के स्वरूप में पहचानना एक फिदायिनी हमलावर को न तो छोटा करने की कोशिश है, न उसके महिमामण्डन की, बल्कि इन आत्मघाती स्त्रिायों को राजनीतिक कार्यकर्त्ता मानना उनके सैनिकीकरण और ऐसे राष्ट्रवाद की आलोचना का शुरूआती और जरूरी कदम है, जो स्त्री को मात्र डायन/फरिश्ता ‘स्त्रीहंता संस्कृति की शिकार’ के रूप में देखने से आगे जाता है , (Amireh, 2007, p. 207).

डायन करार दी गई स्त्री

दुनिया की बहुत सी स्त्रियों के लिये, वे जिनकी पहचान उनके बुर्के की नीली जाली के पीछे लापता हो गई है, या वे जिन्हें किर्गिजस्तान की सड़कों से सिर्फ इसलिए उठा लिया जाता है ताकि उन्हें ‘एक अपहृत दुल्हन’ बनाने के लिए मजबूर किया जा सके, या सूडान की वे युवतियाँ जिन्हें अपनी माँओं, दादियों, चाचियों, बेटियों और बहनों पर होते बलात्कार जबरन दिखाये जाते हैं ताकि वक सबक ले सकें कि जब उनके साथ यही सब हो तो उन्हें किस तरह ‘पेश’ आना है- उन सबके लिए विखंडन का यह उलट फेर शोषण से मुक्ति की आवाज बनकर आता है। अब वे ऐसी छायाएँ नहीं रह गई है जिनके बहिष्कार से ही पितृसत्ता स्वयं को परिभाषित करती थीं, बल्कि शब्द युग्म के उलट जाने से वे मुक्त हो गई हैं, युग्म खंडित हो गया है। इस खंडन से स्त्री /पुरूष की नई शब्द योजना में उन्हें मौका मिला है कि वे वह सब वापिस ले सके, जो उनका है- उनकी अपनी ‘आवाज’, उनकी ‘सत्ता’। पिछले कुछ हजार वर्षों के पुरूष- इतिहास में उनके द्वारा झेली गई अंतहीन गैरजरूरी पीड़ा के ‘गलत’ को ‘सही’ करने का यही मौका है। यह उलट फेर उन्हें शोषण के पुंसत्व केन्द्रीय प्रतीकों को फिर से दुनिया के सामने लाने के लिये यौनिकता को प्रामाणिक आवाज प्रदान करता है।

दुर्लक्षित के दृश्यता प्रदान करने के विचार को सिद्धांत रूप में रचने और विखंडित करने वाले उत्तर-उपनिवेशीय सिद्धांतकारों ने निश्चित ही हाशिये को एक आवाज दी है, किन्तु क्या यह वही पड़ाव है, जिस पर अब मुख्य कथानक को हम बख्श सकते हैं, क्या स्त्री -यौनता के संदर्भों की यही अंतिम परिणति है कि समूचे पितृसत्तात्मक इतिहास में स्त्री -कथ्य कभी-कभार सत्ता पर अपने अस्थायी अधिकार को मुक्ति के कुछ द्वीपों की तरह इंगित करें और असल में, व्यापक परिप्रेक्ष्य में वे हाशिये पर ही बनी रहें? क्या देह-कथाएँ मात्रा केन्द्र/परिधि के शब्द-युग्म के रूप में ही लिखी जा सकती हैं? यदि शोषित यौनिकता की ये कहानियाँ इतिहास और वंशविरूदावलियों के बीच का नव-इतिहास है तो इनके अस्तित्व में आने के बाद पश्चिमी इतिहास के मुख्यधारा के कथ्य का क्या हश्र होता है? क्या दुर्लक्ष्यता का खात्मा मुख्यकथ्य को छिन्न-भिन्न कर पाता है? यहाँ उत्तर् नकारात्मक है! हाशिये की आवाजों की अवधारणा में ‘दुर्लक्ष्यता’ वाले नकार को तो हम मिटा सकते हैं, पर शोषण का अपरोक्ष ढाँचा वैसा ही रहता हैµहाशिये को आवाज तो मिली है, लेकिन केन्द्र फिर भी इसलिये सुरक्षित है कि अब भी उसके पास एक हाशिया तो मौजूद है ही। इसका सबसे अच्छा उदाहरण यूरोप केन्द्रित इतिहास में ‘डायन’ की निर्मिति है।

‘‘चर्च ने डायन की अवधारणा को अपनाया, क्योंकि निरंतर बढ़ती अनिश्चितताओं के उस दौर में इसने कम से कम यह तो सिद्ध कर दिया कि ईश्वर की सत्ता है। यदि डायन ने भूत-पिशाचों के साथ मिलीभगत का आरोप स्वीकार कर लिया (खासकर अंतरंग दैहिक रूप ,जैसे यौन संबंधों में) तो इसका मतलब है कि फिर फरिश्ते भी हैं और ईश्वर भी। बुरी आत्माओं की यह दूर-दूर की मौजूदगी लोगों को फिर अपने धार्मिक विश्वासों की ओर लौटा लाई, चर्च की सुरक्षित पनाह में।’’ , (Marriott, 2010, p. 207).डायन और ऐसी ही कई अन्य निर्मितियों ने हाशिये के वजूद को बनाये रख कर मुख्यधारा के कथानक को और मजबूत कर दिया। इन्होंने केन्द्र को कुछ नुकसान जरूर पहुंचाया, पर वे इसकी सत्ता को खत्म नहीं कर पाईं और बहुधा ‘बाहरी शक्ति’ की अपनी भूमिका को स्वीकार करके उन्होंने शोषण के उसी शब्द युग्म को पुनर्निमित करने में परोक्ष रूप से मदद ही की।

यदि उत्तर-उपनिवेशीय विखंडन की अवधारणा से बस इतना ही हुआ कि इसने एक और हाशिये को खड़ा करके युग्म को पछाड़ना चाहा तो यह इन् शब्द युग्मों के जाल को कभी काट नहीं पायेगी। विखंडन यदि हाशिये को बनाये रखती है तो क्या केन्द्र को पर्याप्त रूप में बनाये रखने की भी जरूरत होगी? केन्द्र की अपरिहार्यता से यह संभावना हमेशा बनी रहेगी कि एक नया शब्द-युग्म पुराने की जगह ले ले और हाशिये को फिर खामोश कर देµवर्गीकृत व्यवस्था खत्म हो, पर हाशिये और केन्द्र के विलोमों के बीच मौजूद ‘इतर’ दुर्लक्ष्यता के एक और युग्म-जाल में फंस जाए तो फिर स्त्री -यौनिकता के सिद्धांतकारों के रूप में हमारी भूमिका यह होनी चाहिए कि हम केन्द्र परिधि के रूप की इस सीमा को लांघें।

यौनिकता की विश्वसनीय दृश्यता

एल.जे. रूस्सुम/ अनुवाद : डा अनुपमा गुप्ता

(एल .जे .रुस्सुम का यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के लिए भेजा गया था , जिसे हम स्त्रीकाल के अनियतकालीन प्रकाशन और विशेषांकों के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये थे . इस लम्बे आलेख को हम तीन किश्तों में प्रकाशित करेंगे . यह आलेख पश्चिमी इतिहास लेखन में व्याप्त पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियों की पड्ताल करता है, जिसे भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में भी पढा जाना चाहिए .  मूल आलेख का हिंदी अनुवाद स्त्रीकाल के संपादक मंडल की सदस्य डा अनुपमा गुप्ता ने किया है .  रुस्सुम फ्लोरिडा ,यू एस ए, के एक कालेज में पढाते हैं और डा अनुपमा एम जी आई एम एस , वर्धा , में कार्यरत हैं   रुस्सुम से LRussum@polk.edu पर संपर्क किया जा सकता है )

मानव इतिहास के पश्चिमी लेखन  में स्त्री देह को जानबूझ कर उपेक्षित किया गया है। यह उपेक्षा एक सोचा-समझा फैसला रहा है, जिसके तहत मानव के जीवन संघर्षां व उन्नति में स्त्री के योगदान को   यौनिकता के ऐतिहासिक संदर्भों में नहीं देखा गया। स्त्री देहों की वे कथाएं, जो पश्चिमी सभ्यता की मुख्यधारा के मानकों में नहीं बैठती थी, उन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की सूची से ही मिटाया जाता रहा है। इस पुंसत्व प्रधान अंधेपन की प्रतिक्रिया स्वरूप बहुत से उत्तर-उपनिवेशीय  स्त्रीवादी यौनिकता के आख्यान स्वरूप की ओर मुड़ गये हैं ताकि वे ‘इतर’ ( वैकल्पिक  इतिहासों की रचना कर सकें। ये आख्यान बहुधा पश्चिमी इतिहास के अभिलेखन के लिए स्वीकृत शब्दावली की सीमा तोड़ते दिखाई देते हैं।1

ये साहित्यिक आख्यान स्त्री देह का ऐतिहासिक लेखन हैं , जो पश्चिम के  मानक इतिहास माने जाते रहे इतिहास  के कथित सच के गुब्बारे की हवा निकाल देते हैं।

अब जो प्रश्न उभरते हैं वे हैं:

एक, इन तथ्यों  को जिस तरह मान्य इतिहास में अलक्षित (invisible) और दुर्लक्ष्य (un visible) किया गया है, क्या अब इसी तरह इनकी कुलक्ष्यता (dis visiblity) या अवज्ञापूर्ण अनावरण को स्त्री यौनिकता के पितृसत्तात्मक मानकों के खिलाफ बगावत के रूप में लिया जाना चाहिए? दूसरा ,स्त्री देह के ये साहित्यिक नव-इतिहास पश्चिमी इतिहास में रची गई यौनिकता की झूठी तस्वीर के विरोध की राजनीतिक जमीन किस तरह बन जाते हैं?

पुरुष- इतिहास (His-tory) द्वारा  आघात

‘‘मेरे दल में हर कोई यह जताता है कि उसने इस संवाद का एक शब्द भी नहीं सुना है। तब भी, जब मैं बयानों की ओर उनका ध्यान खींचने की कोशिश करूँ, उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। ऐसा लगता है जैसे मैं उनसे बात नहीं कर रही हूँ, अचानक जैसे उनके लिए वहाँ हूँ ही नहीं। जैसे मैं अदृश्य हो गई हूँ।’’
(हुक्स, 1992, पृ.-113)

यदि कुछ पल के लिए मान भी लें कि इतिहास अतीत की पुनर्रचना का अभिलेख है, तो भी हमें इससे कोई लगाव महसूस नहीं होता, क्योंकि यह पश्चिमी अभिलेख दरअसल भौगोलिक रक्तस्नान के सिवा और कुछ हीं है। इतिहास के नाम पर उपलब्ध ये रक्तस्नान- विवरण सत्य के अभिलेखन का प्रयास नहीं, बल्कि इस बात के चिह्न  हैं कि पश्चिम ने दुनिया की दूसरी ‘अमानुष’ संस्कृतियों पर विजय हासिल की है अथवा उनमें सेंध लगाई है। यह इस तरह प्रदर्शित किया जाता है ,जैसे यह रक्तपात है, पर फिर भी नहीं हैµयह तो भूमण्डल के शुद्धिकरण के लिए पश्चिम द्वारा मजबूरीवश उठाये ग्ये अतिवादी, लेकिन अतिआवश्यक कदम हैं।
‘‘सतह पर दिखता नियतिवाद उन लोगों के लिए बढ़िया नकाब का काम करता है, जो अन्यथा इन हत्याओं, दासत्व और रक्तपात को लेकर चिंतित हो सकते थे। पिछले 350 वर्षों से यह अनवरत चल रहा है और इसके कम होने के कोई आसार नहीं दिखते। अंततोगत्वा इस दैवीय दलील ने एक ऐसे जनसमुदाय को जन्म दिया है, जिसके लिये हत्याएं और दासकरण स्वर्ग में पहुँचाने वाली सोने की सीढ़ी है।’’
(म्यूजिको, 2005, पृ.-16)

तो अतीत का वर्णन कहा जाने वाला इतिहास जब इन्हीं संदर्भों में लिखा गया है, तब इसका उद्देश्य कुछ विशेष मूल्यों को जनमानस में उतारना ही हो सकता है। कुछ खास-आदर्शों में डुबकी लगाने की तरह।
इस निर्देशित प्रकार की पश्चिमी ‘शिक्षा’ के मूल में यही है कि इतिहास में विवरण ‘उन बहुत दूर के प्रदेशों के बारे में हैं, जिनकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है और इस तरह मॅककिट्रिक के शब्दों में उन्हें अंततः अभौगोलिक बना दिया गया है।’ (मॅककिट्रिक, 2006, पृ.-ग्)। जब कोई राष्ट्र पश्चिमी प्रभुसत्ता की सैनिक विजय के एक चिह्न  से ज्यादा कुछ नहीं रह जाता तो इस ‘अनस्तित्व’ में एक और चीज है, जो नकार दी जाती हैµदैहिक यौनिकताµ‘‘भूगोल को हमेशा मानवीय होना चाहिए और मानवता को  सदा भौगालिक।’’ (मॅककिट्रिक, 2006, पृ.-ग्)। पश्चिम के इतिहास में जमीन पर कब्जे का मतलब देह पर भी कब्जा है या बहुत बार इसका उल्टा भी यानी एक संस्कृति में सेंध लगाना भी  भौगोलिक सत्ता को जीत लेने जैसा ही है। यह सिद्ध करने के लिए हमें बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा। भारत में अंग्रेजी और फ्रांसीसी आधिपत्य को, कांगो में डच प्रभुत्वध् को, या हाल में इराक में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति को देखना काफी है, जहां स्त्राी देहों पर हिंसात्मक कार्यवाहियां असल में उस समुदाय को दहशत में लाने के लिए की गयीं। जापान के इवोजिमा द्वीप पर अमेरिकी नौसैनिकों की उस कुख्यात तस्वीर के बिम्बार्थ को समझने में कौन गलती कर सकता है? और ये देहें जिन्हें ‘अभौगोलिक’ बना कर इतिहास से लुप्त कर दिया गया तो परिणाम क्या होना था? क्या होना था जब ये कथाएं, ‘इतर प्राणियों’ के ये कथासूत्र इतिहास के सच्चे संदर्भों से काट कर अलग कर दिए गये? हुआ यही कि एक खतरनाक पूर्वाग्रह ऐतिहासिक तथ्यों की शक्ल ले बैठा।

यह यथार्थ, जिसे मॅककिट्रिक ‘पारदर्शी’ का विशेषण देती हैं, अथवा ‘जैसा का तैसा’ का लेबल, जिस पर चस्पा किया गया है, दरअसल पश्चिम के इतिहास द्वारा मान ली गयी या ओढ़ी गई ‘स्वघोषित पारदर्शिता’ है (मॅककिट्रिक, 2006, पृ.-ग्टए 5)। इन देहों को अपठ्य बना दिया गया है, ये ऐसे उपकथानक हैं, जिन्हें  मुख्य कथानक के अधीन और टुकड़ों में बाँट दिया गया है। पश्चिम की दृष्टि में वे मात्रा दर्पण हैं. उनकी अलैंगिक देहें उनके साम्राज्यवादी प्रकाश स्रोतों के प्रतिबिम्ब को हम तक पहुँचाने का कार्य मात्रा करती हैंµवे सिर्फ इसीलिए मौजूद हैं, क्योंकि पश्चिम से उनका साक्षात्कार हुआ है, लेकिन मुख्य कथानक के मुद्रित कथ्य में उन्हें मात्र नगण्य स्थान देने की इस प्रक्रिया में उनकी दृश्यता विकृत हो गई है।

‘‘तुमने मेरे कंधों पर अपना नाम उकेर दिया है, अपनी छाप मुझ पर अंकित कर दी है। तुम्हारी उँगलियों के पोर मुद्रण ब्लॉक बन गये हैं, जिनसे तुम अपना संदेश मेरी त्वचा पर टंकित कर देती हो और उसका लक्ष्यार्थ मेरे शरीर में मुद्रित हो जाता है। तुम्हारा मोर्स कोड मेरे दिल की धड़कन को बाधित करता है। तुमसे मिलने के पहले मेरी यही धड़कन स्थिर हुआ करती थी, मुझे इस पर यकीन हुआ करता था और इसने मेरे सक्रिय सैनिक जीवन से शक्ति पाई थी, लेकिन अब तुम  इसी चाल को अपनी लय से बदल देती हो। मेरे ऊपर् तुम्हारी थिरकन मुझे एक कसा हुआ मृदंग बना देती है।’’

दृश्यता के आयाम

पश्चिमी इतिहास ने सदियों से अभिलिखित कथ्य में स्त्री देह की दृश्यता व यौनिकता में हेर-फेर करने के लिए एक असरदार पितृसत्तात्मक अभियान छेड़ा हुआ है। चाहे स्त्री की यौनिकता को उघाड़ा गया हो और अक्सर कुछ ज्यादा ही उघाड़ा गया हो, पर उसमें स्त्री का अपना प्रामाणिक पक्ष कभी दिखाई नहीं दिया। ‘ढाक के तीन पात’ की तर्ज पर लिखे गये पश्चिम के अतीत के ये पृष्ठ स्त्री देहों तक अपनी पहुंच तो संभव कर लेते हैं, क्योंकि उनकी आवाजों तक पहुंचने के रास्तों को अगम्य बना देते हैं, क्योंकि इन आवाजों के सच्चे स्वरूप में इन्हें स्वीकार ही नहीं किया गया। बजाय इसके इन दौहिक-आख्यानों का पुनर्लेखन करके, नये संदर्भों से उन्हें जोड़कर, उनके नैतिक मूल्य पक्ष को बदल कर, उन्हें नये अवतारों में ढाल दिया गया ताकि उन्हें पश्चिमी साम्राज्यवाद की वृहत् योजना के उपयुक्त बनाया जा सके।

पश्चिमी परंपरा के तहत स्त्री देह पर लिखे गये उत्तर-उपनिवेशीय स्त्रवादी कथ्य को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता हैµ‘अदृश्य/अलक्षित ( In visible) तथा ‘दुर्लक्षित’ ( un visible)। ये श्रेणियाँ ‘लोप करना’ (elimination) या ‘काट छांट करने’ की अपेक्षाकृत सरल अवधारणा की तुलना में कुछ अधिक जटिल हैं। लोप/ काट छांट करना यानी हटा देना/ रोक देना है, जिसमें सिवाय उस आभासी चिह्न् के सिवा कुछ नहीं रहता, जो मिटा देने के बाद बचा रह गया है। उत्तर-उपनिवेशिक लेखन के संदर्भ में उपनिवेशवाद की श्किार स्त्री देहों की स्थिति को दिखाने के लिए ‘काट-छांट करना’ शब्द सही नहीं लगता। हर एक उपसर्ग के प्रयोग में फर्क को देखना जरूरी है, जिसे हम ‘अ-’ (पद) और बाद में ‘दुः’ (पद्) पर चर्चा करके समझने की कोशिश करेंगे। उपसर्ग अ- (पद) का मूल लेटिन में अर्थ होता है ‘जिसे छोड़ा न गया हो।’ हालांकि ‘अ’- नकार की ही अभिव्यक्ति है, किन्तु इसका भाव ग्रहण न कर पाने या इन्द्रियातीत होने से है। यह दृश्यमान वस्तु का नकार नहीं है, बल्कि मात्रा उसे देख पाने में हमारी अक्षमता को इंगित करता हैµअलक्षित/ है पर नहीं है/ अग्राह्य/ जिसकी कमी है/ न देख पाने के कारण नकारा गया/ अदृश्य; क्योंकि स्त्री की यौनिकता को कथानक में मात्रा ‘कोष्ठकों के भीतर’ मौजूद मान लिया गया है; वह यथार्थ नहीं है, यथार्थ तो मात्र पुरुष देह ही हो सकती है। पश्चिमी कथ्य लेखन में स्त्री यौनिकता बहुधा अलक्षित ही रही है, जिसे कभी देखा ही नहीं गया।

एह्रलिक के अनुसार, ‘‘समाजशास्त्र में अध्ययन की विषय-वस्तु के रूप में स्त्री सामान्यतः उपेक्षित ही रही है। सिर्फ विवाह या परिवार जैसे क्षेत्रों में ही उसकी मौजूदगी देखी जा सकती है। दूसरे शब्दों में समाजशास्त्र में भी उसका स्थान वही पारंपरिक है, जो समाज ने उसे दिया है: उसकी जगह मात्रा घर में है’’ (एह्रलिक, 1971, पृ.-421)। स्त्राी देहें अलक्षित रही हैं, क्योंकि वे निजी संपत्ति की तरह या वैयक्तिक क्षेत्रा में घरेलू वस्तुओं की तरह नियंत्रित की गई हैं और अपनी यौनिकता पर उनका अपना आधिपत्य कभी नहीं रहा। देह को इस प्रकार अलक्षित बना देना केवल पितृसत्तात्मक युग के पुरुषों का ही शगल नहीं है, उत्तर-उपनिवेशीय लेखकों की एक छोटी जमात भी जब कुछ सांस्कृतिक मुद्दों को चुनौती देती है, तो अक्सर उन्हीं में उलझ जाती है। इस प्रक्रिया में स्त्री यौनिकता का पश्चिमी, पितृसत्तात्मक छद्म कथानक स्वीकार कर लिया जाता हैµउन लेखकों के नये आख्यान भी पृथ्वी पर मानव के इतिहास में स्त्री देह के संदर्भों/ आयामों/ दृश्य पक्ष को खो देते हैं। मानववाद के अपने प्रयासों के दौरान वे यह देखने से चूक जाते हैं कि यूरोपकेन्द्रित विचारधारा के कथनकों में स्त्री यौनिकता किस कदर ‘अमानव’ बना दी गई है।इन उत्तर-उपनिवेशीय विद्वानों ने भी अपने राजनीतिशास्त्र, मनोविश्लेषण व समाजवाद के रूपकों में स्त्री दैहिकता को गौण कथ्य की तरह संयोजित किया है। ये उत्तर-औपनिवेशीय स्वर पितृसत्तात्मक ढांचे के ही भीतर रहते हुए स्त्री दैहिकता से सुविधाजनक फासला बनाये रखते हैं। उनकी विफलता इस बात में है कि वे शोषित स्त्रिायों के बारे में, पश्चिमी अकादमिया के आरामगाहों में बैठे हुए लिखते हैं। हालाँकि बहुत से पश्चिमी उत्तर-उपनिवेशीय लेखकों को अपना मत तर्कसंगत लग सकता है, किन्तु यह नव-पितृसत्तात्मक इतिहास लेखन भी स्त्री-यौनिकता का सटीक विवरण प्रस्तुत नहीं करता, लेकिन असल में स्त्री लैंगिकता सिर्फ अलक्षित ही नहीं है, भूमण्डलीय युग में इससे भी अधिक अनास्वादक कुछ घट रहा है।

कथ्य के अधिक सही पाठन की संभावना बने, इसके लिए हमें उपसर्ग ‘दुः’  का सामना करने की जरूरत है। ‘अनदेखी करना’  अथवा ‘दुर्लक्ष्य करना’ में अ-लक्षित से अधिक नकार का बोध है। ‘दुः’ में निहित नकार को किसी शब्द के भीतर के विलोम शब्द पर जोर देते हुए अधिक अच्छे से समझा जा सकता है। पश्चिमी इतिहास के संदर्भ में स्त्री दैहिकता पर बात करते हुए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुः उपसर्ग शब्द में मौजूद क्रिया का बिल्कुल उलट अर्थबोध देता है। इस विलोम क्रिया-बोध को प्रयोग करने में तर्क यही है कि यूरोपकेन्द्रित विचारधारा  में स्त्री यौनिकता को अलक्षित नहीं, बल्कि दुर्लक्ष्य रखा गया हैµलक्षित के अर्थ को उलट कर नव-उपनिवेशी स्त्राी देह की यौनता को दृश्यमान बनाया जायेµ फूको की परियोजना, ‘दुर्लक्षित को लक्षित बनाना’ में प्रयुक्त परिभाषा को अल्क्षित  देहों पर लिखते हुए प्रयोग में लाने में स्पीवेक की यही कोशिश है। ये वही देहें हैं, जिन्हें इतिहास में अलिखित हैं  (स्पीवाक, 1988, पृ.-290)

अ-उपसर्ग से भिन्न ‘दुः’ उपसर्ग का मतलब है नव-उपनिवेशी स्त्री यौनता का पश्चिमी विचारधारा में सम्पूर्ण निषेधµयहां तक कि इन शोषित देहों के अनायास फूट पड़े दैहिक अनुभव भी स्वामी-दास सम्बन्धों के संदर्भ में नहीं लिखे गये। ‘दुः’ में इतिहास की व्यापक लेखन योजना में इन्हें गलती से ‘भूल जाने’ या इनके ‘छूट जाने’ का भाव नहीं है। ‘दुः’ योजनाबद्ध तरीके से इन्हें छोड़ देने का संकेत देता हैµशोषित देहों की यौनिकता को सोची समझी योजना के तहत ही इतिहास में शामिल नहीं किया गया है।
अ-लक्षित के ‘अ’ में स्त्राी देह है, पर नहीं है, क्योंकि वह अपने पारंपरिक भाव मात्रा में ही, जैसे कुमारी, माँ लड़की आदि। ‘दुर्लक्षित’ शब्द में पितृसत्तात्मक आदर्शों की जानी बूझी निर्मिति है और इसमें इन देहों को शामिल ही नहीं किये जाने का भाव है। यह दुर्लक्षित अलैंगिक देह ,अब अजनबी बना देने के एक उद्यत प्रयास से घिरी है। असहाय या अबला के शब्दविन्यास से भिन्न यह वह धारणा है कि अधीन कर ली गयी यह स्त्राी मनुष्य जाति से इतर कोई चीज है। स्त्री के अस्तित्व को मानव प्रजाति में एक विकृति अथवा नियम विरुद्ध मान लेने की पश्चिमी धारणा असल में अरस्तू के समय से ही चली आ रही हैµ‘‘क्योंकि माँ के गर्भ में विकसित होने में भी मादा भ्रूण  को नर भ्रूण  से अधिक समय लगता है, हालांकि जन्म के बाद का विकास उनमें अत्यधिक गति से पूरा हो जाता हैµजैसे वयः संधि, वयस्कता या वृद्धावस्था, क्योंकि असल में स्त्रीत्व का प्रादुर्भाव ही प्रकृति में एक  विकार था, ऐसी विकृति, जो प्रकृति में बार-बार होती है।’’ (अरस्तू, 1942, पृ.-77, ंए 12-16)

सविता सिंह की कवितायें

प्रख्यात आलोचक मैनेजर
पाण्डेय सविता सिंह की कविताओं के सन्दर्भ में लिखते हैं, ‘ सविता सिंह की कविताओं
में गहरा आत्म संघर्ष है और आत्म मंथन भी उनमें स्त्री की स्वायतता का बोध है . उस
बोध से ही स्त्री पराधीनता के परंपरा जनित शाप से मुक्त होती हैं . लेकिन सविता
सिंह का स्वायतता का बोध व्यक्तिगत को ही राजनीतिक मानने वाली स्त्री दृष्टि का
अनुकरण नहीं करता . उनके यहाँ स्त्री की व्यक्तिगत स्वायतता के बोध के साथ सामूहिक
चेतना के महत्व की पहचान है .’ संपादक ) 


चाँद तीर और अनश्वर स्त्री


अपने ही सपनों का पीछा करते हुए
कितनी ही रातों के रहस्यों का पता चला
जिनमें मैं अकेली और बेचैन
ख़ुद से लड़ती करवटें बदलती रही
वर्षों तक मुझे पता नहीं था
मैं किससे लड़ रही थी
कौन था जो आखेट के लिए बुलाता था
कौन थे वे पशु जिनका अंत करने हर रात मैं निकलती थी
जिनकी आँखें अंधकार में हरी रोशनी सी चमकती थीं
जो मुझे ऐसे देखती थीं
जैसे उन्हें मेरा ही इंतज़ार हो

कई बार मुझे ऐसा लगता
वे मेरी ही आँखें थीं
जो मुझ तक हरे रंग में रँग कर आती
मुझमें लग जाने के लिए
अपनी आँखें मैं टटोलती तब
वहाँ रोशनी की जगह अंधकार होता
एक अंधापन
और मैं चीख़ने लगती
जाने किससे कहती
हटाओ यह पर्दा
अंधकार और प्रकाश के बीच जो पड़ा है
इस रात को हटाओ
जो धँसी है मेरी देह में
इन पशुओं को काबू में लाओ
मुझे घेर कर जो खड़े हैं

कोई फिर कहता…
यह सब स्वप्न है यथार्थ नहीं
यहाँ कोई पर्दा नहीं
नहीं कोई क्षमा
यहाँ जीवन और मृत्यु एक समान हैं
ईश्वर और मनुष्य एक दूसरे का हिस्सा
यहाँ प्रेम और संभोग की
कोई पवित्रता या अपवित्रता नहीं
यहाँ आनन्द निर्बाध है
और दुख स्वच्छन्द
आँखों की यहाँ ज़रूरत नहीं
न किसी रोशनी की
यहाँ सब कुछ दिखता है बिन आँखों के
अंधकार ही ब्रह्म है यहाँ
स्वप्न ही जीवन
चलचित्र समान
वही है आखि़री पर्दा
इसे हटाने को मत कहो
इसके बाद का इलाव़ पूर्णतया अज्ञात है
अपरिचित इतना कि किसी को कुछ नहीं पता
मृत्यु को भी नहीं
कोई नहीं जानता वहाँ क्या है जीवन या सिर्फ हवा
या महज़ कुछ और विस्तार
मैं फिर भी कहती
मुझे देखना है इस आखि़री पर्दे के पीछे का रहस्य
क्या स्वप्न का भी होता है कोई मुखौटा
उसका चेहरा भी कहीं वही तो नहीं
जिसे वह छिपाए हुए है
किसी कुष्ठग्रस्त राजा के दर्प सा

कभी-कभी यूँ ही चीख़ती परेशान
अँधेरे जंगलों में चलती जाती
देखती अपने ही पूर्वजों को
निरपेक्ष अपनी बेचैनियों से
अब भी उनके सरोकार होते उनके खेत आम के बाग़
हाथी घोड़े हीरे माणिक मोती
अब भी बटोरते दिखते वे शक्ति अपार
युद्ध और शांति के फैसले करते
गिनते मृत योद्धाओं के अनगिनत शव
मुझे पहचनवाया जाता
ये फलां राय हैं वे फलां राजा
ये तुम्हारे ये लगते हैं वे, वे
कितनी ही आदतें जो मुझमें हैं बची
होतीं उनमें से किसी की
मेरी आँखें मेरा रंग मिलता उनमें से किसी से
बनी रहती फिर भी दूरी
लौट सकने में जिससे आसानी होती

कोई वैसा रोकता नहीं मुझे न कुछ कहता
बस एक हल्की सी हँसी ज़रूर दिखती
किसी के चेहरे पर एक आश्वस्ति ठहरी सी
भटकती ही सही मैं उन्हें मिली तो
लौटने पर फीकी-फीकी सी अनुभूति ही
मेरे भीतर बची मिलती
कुछ भी ऐसा नहीं कि उनके बीच फिर लौटूँ

एक बार मिली मुझे एक सुंदर स्त्री
जिसकी आँखों के नीचे था जमा सा अँधेरा
जो मुझसे लिपट-लिपट कहती वह मेरी है
बहुत अपनी
जिसके ऐसा कहने में थी एक परिचित पीड़ा
लगता जिससे वह जो कुछ भी चाहती है कहना
वह सत्य होगा
वह बस एक ही बात कहती
ले चलो सपनों के रास्ते ही है संभव अब मेरा लौटना
ले चलो मुझे अपने घर
वही है मेरा भी घर जो तुम्हारा
जहाँ से मुझे निर्वासित किया गया
मैं थी उस घर की बाल विधवा बहू
जिसके साथ प्रेम और अभिसार का
क्रूरतम खेल खेला गया
मैं एक बच्ची ही थी नासमझ
मुझे एक रात नष्ट किया गया
मेरे बच्चे की हत्या की गयी
और छोड़ दिया गया मुझे किसी जंगल में
जिसमें तुम आज तक भटकती हो
शायद मुझे खोजती
और जहाँ के ख़ूंखार जानवर भी
अभिशप्त हैं दया करने के लिए मुझ पर

मैं मरी नहीं, मैं बची हुई हूँ अब तक
घुमड़ती एक आवाज़ की तरह
जिसे तुम्हीं अकेली सुनती हो
मैं भटकती रही जंगलों जंगलों
खेतों से होती हुई
पार करती अनगिनत आम और जामुन के बाग़

मैं गयी शहरों तक गयी
नहीं बता पाया कोई मुझे मेरा गाँव
मैं अब भी पालना चाहती हूँ अपने बच्चे को
हासिल कर सके ताकि वह अपना संसार
समझ सके कस्तूरी की गंध
कितनी जोखिम भरी होती है खुद हिरण के लिए

अक्सर मैं इसी सपने का पीछा करती
ताकि मिलूँ अपनी इस पूर्वज से दोबारा
जानूँ उसके भटकाव और दुख के दूसरे करुण प्रसंग
महसूस करूँ वहाँ व्याप्त उन पशुओं की साँस की गंध
जिससे नृशंसता की बू आती थी
जिनकी आँखों की हरी रोशनी
शायद मुझे डराने के लिए थी

लेकिन नहीं लौट पाती उस सपने में आसानी से
बदले में दिखता कोई और चरित्र
नृत्य करता हुआ जो आता मुझ तक
और डाल देता मेरे गले में एक हार
मुझे यह अभद्रता लगती
मैं निकाल फेंकती उसका यह बंधन
और वह रोता हुआ
मिट्टी में धँसता चला जाता
मैं चिल्लाती पूरी रात प्रयत्न करती उसे बचाने का
रोती हुई फिर बाहर आती इस हादसे से किसी तरह
पश्चाताप के पाताल में डूबी
कौन था वह कौन था कहती हुई

तभी दिखता हिरणों का एक झुंड स्वच्छन्द कुलाँचें भरता
मैं भूल जाती सब कुछ सारी हताशा पश्चाताप सारा
हो जाती उन्हीं के पीछे-पीछे होने शामिल उन्हीं के उल्लास में
तभी दिखता झाड़ी में तीर साधे कोई खड़ा
फिर अनन्त स्वप्न भर मैं उससे विनती करती
मत करो नष्ट इस सौंदर्य को
इस स्वच्छन्दता को बाधित मत करो
वह तीर नीचे रखता मुझे घसीटता हुआ ले जाता एक तरफ
और आश्चर्य कि वह होता कितना अपना
मैं सोचती क्यों बना यह शिकारी
फिर सशंकित हो उठती
शायद यह है कोई और
जीवन से अधिक मृत्यु चाहने वाला

तभी अचानक जैसे वह बदल जाता किसी और व्यक्ति में
जाने क्यों परिचित लगता है वह
लम्बी काया पतली ऊँची नाक
गोरा सुन्दर चेहरा
सोचने लगी ऐसे व्यक्ति से कैसी अपेक्षा करूँ
कुछ अच्छा या फिर वही चिरपरिचित बुरा
तभी वह मेरी तरफ मुड़ता
एक विचित्र भाव चेहरे पर उसके
डराती सी आवाज़ में पूछता
कैसी है उसकी प्रिया वन-वन जो भटकती है

अचानक मुझमें एक रोष पैदा होता
‘‘तो आखि़र तुम हो वह काम रूप
वास्तव में कुरूप नृशंस कायर क्रूर
स्त्री की मृत्यु चाहने वाले
तुम जिसे कभी प्रेम नहीं मिलना चाहिए था
जिसे भटकना चाहिए जन्मों-जन्मों अकेला
भूखा-प्यासा…’’
‘‘तुम तुम तुम…’’ कहती हुई जैसे मैं नींद में लौटती
पीछे छोड़ती हुई सपने को
अपनी ही चीख़ से जागती आखि़र
भरी एक अफसोस से क्यों नहीं हिंसक हुई मैं
क्यों उसे और अपमानित नहीं किया
और अधिक अपमानित
मैं मिली ही क्यों उससे
कि तभी मुझे लगता शायद
वह खुद ही मिलना चाहता था मुझसे
तभी तो चीर कर अंधकार के कितने मैदान
वह आया मेरी नींद तक
शायद वह सचमुच जानना चाहता था
अपनी आत्मा के उस अंश के बारे में
जिसमें पीड़ा ही पीड़ा थी
थे जिस पर घाव ही घाव

मगर उसके चेहरे पर तो दिखी नहीं कोई ग्लानि
अभी भी वह उसे बलात ही पाना चाहता था
मैंने अपने हाथों से अपने चेहरे को ढँका
अपनी बेचैनी कम करने के लिए शायद
और लगा जैसे मेरा चेहरा मेरा नहीं
वहाँ महसूस नहीं हुई अपनी ही आत्मीयता
मुझमें ख़ुद से ही जैसे एक अलगाव पैदा हो गया था
मेरा अपना ही कुछ ग़ैर हो गया था
हिंसा पर उतारू अपने ही खि़लाफ
अगली रातों में क्या कुछ घटित होगा
सोचकर मैं आशंकित थी
कुछ मौतें कोई युद्ध लम्बा जैसे छिड़ सकता था
और फिर मैं कितनी कितनी रातें
कई नींदों तक उसमें शामिल रहूँगी
युद्ध करती ढूँढ़ती कितनी ही हरी रौशनियों को
बनाती उन्हें अपनी आँखों का प्रकाश

वैसे मैंने खुद को भी मरते हुए देखा है कई बार
कोई तीर मुझे ही भेद जाता है
और मैं नहीं देख पाती उसे
जो भेदता है मुझे
उसे देखने के लिए मैं लौटती हूँ
कितनी ही बार इस स्वप्न में
जानती हुई कुछ-कुछ वह कौन है
जानती हुई उसे मैं खोज लूँगी सपने के बाहर भी
कठोर रौशनियों के मैदानों में घोड़े पर सवार
वह मुझे धोखा न दे सकेगा
उसके पास बची हैं अनगिनत तितलियाँ मेरी
उसके भीतर अब भी उड़ती हुई

कितनी ही रातों का रहस्य इस तरह मैं जानती गयी
जिनसे यह जीवन सपनों की तरह खुलता गया
इस दौरान मैंने सीख लिया था आखेट में जीतना
पहचान लिया था हरी रोशनी वाली चमकती आँखों को
मृत अपनी देह से अलग कर लिया था खुद को
मुझे भी आ गया था तीर चलाना
मैं आ-जा सकती थी सपनों के बाहर-भीतर
अंधकार को समझ चुकी थी मैं
उसकी मुक्ति में ही अब मेरा विहार था
मैं जान रही थी अब

आखेट के लिए बुलाता है अगर कोई मुझे
नहीं है भागना
शामिल होना है इस खेल में
आखेटक से डरना नहीं
यदि बचे रहना है

मुझे मालूम है अब ख़ूब
रात और स्वप्न के मैदान में
तीर और चाँद मुझे देखा करेंगे
और मैं रहूँगी हिरणों के झुण्ड में शामिल
उनकी छलांगों के मुक्ति विलास में
लाँघती-फाँदती जंगल के जंगल

अब न तीर चल सकेंगे
न रात होगी और गहरी
एक दूधिया रोशनी में स्वप्न चलता रहेगा
भले चाँद देखता रहे मुझे एकटक
करता रहे अपनी कामना से मेरा शिकार
मैं उससे कहूंगी जैसे मैं कहूँगी हर आखेटक से
या फिर उस स्त्राी से जो भटकती है
किन्हीं बियाबानों जंगलों में अब तक
मैं स्वयं काम हूँ स्वयं रति
अनश्वर स्त्री
संभव नहीं, नहीं मृत्यु मेरी

ईश्वर और स्त्री


जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण
देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को
बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को
कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक
ले सकें जो उसे बाँहों में
उनींदी आँखें बंद होने-होने को
खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े
जिन्हें बचा रखा है अब तक रात ने
लहराता अंधकार मिल जाने देता है
अपने तम में एक और तम को
सारी वासना को जैसे स्त्री हो
चंद्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर
सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता
बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही
ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका

जैसे खुद वीरानी

आखि़र मैं बढ़ी झिझकती हुई
उस स्वीकार की तरफ
जिसमें आहट थी प्रेम की
और एक दीर्घ प्रतीक्षा टकटकी लगाये
एक हाॅलनुमा कमरा
पर्दे बिस्तर तकिये ताकते ज्यों शून्य में
गुन-धुन में थिराई एक देह
प्रेम घटित होने की उत्सुकता में
थरथराता एक संसार था
उसी स्वीकार पर टिका
गुलाब का कोई पौधा इंतज़ार करता
ज्यों अपनी मधुमक्खियों का
और हवा थी कि बार-बार
धूल उड़ाती हुई गुज़रती
पहले से अधिक वेगवती
सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देने को आतुर
एक आहट फिर भी भीतर सुनायी पड़ती थी
मंद-मंद एक स्थिति जैसे अपनी ही धड़कन की
एक स्पंदन भीतर तक तरंगित
तभी एक दरवाज़ा खुला
दिखी वीरान-सी एक घाटी
एक रात जिस पर झुकी थी
अकेली हवा जिसमें टहलती थी
अनायास मैं उसमें दाखि़ल हो गयी
सोचती हुई क्या कोई हृदय ऐसा भी होता है
घाटियों पठारों वाला
जहाँ रात झन-झन बजती है
जैसे खुद वीरानी

सविता सिंह

अपनी भाषा में हूँ सुकून
से /मुझे खोजने आ सकते हैं प्रेमी ,  सविता
सिंह की खुद की इस पंक्ति से बेहतर और कोई परिचय नहीं हो सकता है हिन्दी के इस मह्त्वपूर्ण कवयित्री का .

एक यायावर पत्रकार

राजेंद्र प्रसाद सिंह

भाषाविद राजेन्द्र प्रसाद सिंह हिन्दी आलोचना में अपने हस्तक्षेप के लिए जाने जाते हैं.
यह लेख उनकी पुस्‍तक  ‘हिंदी का अस्मितामूलक साहित्य और अस्मिताकार’, में संकलित है। 
संपर्क : rpsingh.ssm65@yahoo.in .

राजेंद्र प्रसाद सिंह
 
पत्रकारिता सार्वजनिक दायित्व से परिपूर्ण एक प्रकृष्ट कला है जैसा कि कार्लांइन ने कहा है कि ‘महान है पत्रकारिता, लोकमानस को प्रभावित करने वाला होने के कारण पत्रकार क्या विश्व का शासक नहीं ? वास्तव में रोचक एवं चुनौतीपूर्ण इस पेशे में वही सक्षम सिद्ध होगा जिसमें कवि की कल्पना शक्ति, कलाकार की सृजनात्मक योग्यता, न्यायाधीश की विषयनिष्ठा, वैज्ञानिक की सुस्पष्टता और कम्प्यूटर मशीन की गति हो.’  प्रमोद रंजन पत्रकारिता के इन सभी गुणों से परिपूर्ण हैं.  भारत के इस यशस्वी पत्रकार की पत्रकारिता ने हिंदी पत्र-साहित्य में लोकप्रियता का अभूतपूर्व मानदंड स्थापित किया है.
उनके द्वारा सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक एवं अन्य विषयों पर लिखे गए लेख मील का पत्थर बन गए हैं. इस पत्रकार की उम्र अभी कम है, पर उम्र का कोई सीधा संबंध किसी क्षेत्र में उसके द्वारा किए गए उत्कृष्ट कार्यों से नहीं होता है. कई साहित्यकार-पत्रकार शतायु हुए, पर जरूरी नहीं है कि उनके द्वारा किए गए कार्य भी उत्कृष्ट हो. हिंदी में ही भारतेंदु ने सिर्फ पैंतीस साल की उम्र पायी थी लेकिन उन्‍होंने साहित्य में इतना काम कर दिया कि कई साहित्यकार सौ वर्षों में भी नहीं कर पाए. वे अल्पायु के बावजूद हिंदी साहित्य के युग-निर्माता बने. उनके नाम पर हिंदी साहित्य में एक कालखंड का नामकरण किया गया है.
 
प्रमोद रंजन
ख्यातिलब्ध पत्रकार प्रमोद रंजन का जन्म 22 फरवरी, 1980 को हुआ। उनका पैतृक गाँव बिहार के जिला अरवल में नदौरा है. नदौरा गाँव बिहार के कुर्था प्रखंड में स्थित है.यह वही कुर्था है, जहाँ  ‘बिहार के लेनिन’ नाम से जाने जाने वाले जगदेव प्रसाद पुलिस की गोली से शहीद हुए थे. उन्होंने  दलित-पिछड़ों, आदिवासियों एवं शोषितों के हक की लडाई सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर काफी मजबूती से लडी थी. यह संयोग है कि प्रमोद रंजन उसी भूमि से आते हैं, और उससे भी विस्मयकारी तथ्य यह है कि उनकी भी पत्रकारिता के क्षेत्र में संघर्ष दलित-पिछड़ों एवं शोषितों के पक्ष में है. किंतु प्रमोद रंजन का बचपन अपने पैतृक गाँव नदौरा में नहीं बीता. वे ननिहाल में पाले-पोसे गए. उनका ननिहाल नालंदा जिले के बेले गाँव में है.

उनकी प्रारंभिक शिक्षा इसी गाँव के सरकारी स्कूल में हुई. गाँव के स्कूल इतने उर्वर मस्तिष्क को पैदा कर सकते हैं, सहसा विश्वास नहीं होता, कारण कि प्रमोद रंजन की पैनी दृष्टि एक्स-रे मशीन की भाँति किसी तथ्य को आरपार देख लेती है. सामान्य लोगों में वह दृष्टि नहीं होती है, जो इनके पास है. उनक लेख इतने विचारोत्तेजक एवं मौलिक होते हैं कि आश्चर्य होता है कि क्या मानव-मस्तिष्क इतने गहरे में जाकर सोच सकता है. रंजन अत्यंत स्वाभिमानी पत्रकार हैं. इतनी कम उम्र में ही उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया. उनका संपादन-स्थल भी भारत के विभिन्न कोनों में रहा. शायद ऐसे भी स्वाभिमानी पत्रकार खूँटे में बंधकर रह भी नहीं सकते. वे निरंतर अपना कार्य-स्थल बदलते रहे मानो वे किसी ऐसे मुकाम की खोज में हों जहाँ से बहुजनों की लड़ाई लड़ी जा सके. संप्रति प्रमोद रंजन ‘फारवर्ड प्रेस’ के सलाहकार संपादक हैं और इस पत्रिका के माध्यम से बहुजनों के हित में लगातार लड़ाई लड़ रहे हैं.
आज जिसे हिंदी का अस्मितामूलक साहित्य कहा जाता है, उसको समृद्ध करने में इनका अप्रतिम योगदान है. ‘फारवर्ड प्रेस’ ने अभी तक ‘बहुजन साहित्य’ पर केंद्रित तीन वार्षिक अंक प्रकाशित किया है. सभी अंक एक से बढ़कर एक हैं. इसी के एक अंक में प्रमोद रंजन ने भारत के हिंदी पुरस्कारों में व्याप्त सवर्ण कब्जे को पर्दाफाश किया है. कुछ मायनों वे पर्दाफाशी पत्रकार भी हैं. मुझे याद है उनकी एक पुस्तिका ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ (2009), जिसमें बिहार के अखबारों और टीवी चैनलों में ‘फैसला लेने वाले पदों पर’ बहुजन पत्रकारों के नहीं होने का अदभुत  विवरण दर्ज है. पुस्तिका में हिंदी के प्रायः सभी प्रमुख समाचार-पत्रों का बहुजन दृष्टिकोण से विश्लेषण है. उसमें कई आँकड़े हैं जो साबित करते हैं कि बिहार ही नहीं, राष्ट्रीय  मीडिया के प्रायः सभी प्रमुख पदों पर सवर्णों का कब्जा है.
जैसा कि हम कह आए हैं कि प्रमोद रंजन कई अखबारों से जुड़े,  हटे और फिर नए-नए से जुड़ते गए. उन्होंने शिमला से प्रकाशित सांध्य दैनिक ‘भारतेंदु शिखर’ में बतौर संपादक कार्य किया. इस अखबार का ‘साहित्यिक विमर्श परिशिष्ट’ प्रमोद रंजन के संपादकत्व में काफी ख्यात रहा. यह बात कोई 2000 ई. की है. इसके बाद उन्होंने  शिमला से ही प्रकाशित ‘ग्राम परिवेश’ (साप्ताहिक) का संपादन किया, पर रंजन यायावरी पत्रकार हैं. मन नहीं लगा. वे कांगड़ा चले आए. यहाँ वे ‘दिव्य हिमाचल’ (दैनिक अखबार) से जुड़े. इसमें वे फीचर संपादक रहे. पर पत्रकार तो स्वतंत्रता का आकांक्षी होता है. उसे उन्मुक्तता की तलाश रहती है. खास तौर से रंजन जैसे स्वाभिमानी पत्रकारों की तो यह नियति है. वे जालंधर गए और ‘पंजाब केसरी’ (दैनिक) से जुड़े. पुनः वे शिमला आए तथा ‘दैनिक भाष्कर ’ से जुड़ गए. वे शिमला में ‘अमर उजाला’ से भी जुड़े. वे 2007 ई. में बिहार की राजधानी पटना आए. यहाँ वे प्रेमकुमार मणि के साथ ‘जन विकल्प’ (मासिक) का संपादन किया.

इस पत्रिका के विभिन्न अंकों में प्रमोद रंजन के अनेक लेख छपे. सभी लेख मौलिक एवं विचारोत्तेजक हैं. इस पत्रिका मे लिखे गए उनके प्रमुख लेख हैं-उपभोक्तावाद और परिवार (मई, 2007), आज के तुलसीगण (अगस्त, 2007) और ‘ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना  ‘  का षडयंत्र (अक्टूबर-नवंबर, 2007). प्रमोद रंजन के जन-विकल्पकालीन लेखों में ‘आज के तुलसीगण’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. इसमें उन्होंने सप्रमाण साबित किया कि तुलसीदास जैसे कवि आज भी मरे नहीं हैं. वे जिंदा हैं. उन्होंने इसमें कई कवियों की कविताओं को उद्धृत करके बताया है कि तुलसीदास का बहुजन विरोधी संस्कार कैसे रूप बदलकर आज भी हिंदी कविता में जीवित है.
दुर्भाग्य से ‘जन विकल्प’ का प्रकाशन अल्पावधि में ही बंद हो गया. पत्रकार प्रमोद रंजन 2008 ई. में ‘प्रभात खबर’ (दैनिक) से जुड़े. इसी समय में उनकी एक और पुस्तिका प्रकाशित हुई – ‘बाढ़: अनकही कहानियाँ’. वस्तुतः यह पुस्तिका एक प्रकार का रिपोर्ताज है, जिसमें कोशी नदी की विभीषिका का वर्णन है.
बिहार के मधेपुरा, सुपौल, कटिहार जैसे जिलों के बाढ़ से हुई तंगो-तबाही का इसमें जीवंत चित्रांकन है. निश्चय ही वे विभिन्न विधाओं और विषयों के पत्रकार हैं. बिहार में जब सवर्ण आयोग का गठन हुआ तो उसका विरोध उन्होंने किया . उनकी पुस्तिका ‘नीतीश के सवर्ण आयोग का सच’ इसी का नतीजा था. उन्होंने सत्ता से हमेशा अपने को दूर रखा. सत्ता जहाँ भी गलत करती है, पत्रकार प्रमोद रंजन उसका विरोध करते हैं. वे सौ प्रतिशत बेफिक्र पत्रकार हैं. सत्ताधीशों की लाठी का डर उन्हें नहीं सताता है. वे चिंता भी नहीं करते हैं कि कोई बेईमान सत्ताधीश मुझे बिगाड़ लेगा. पत्रकारिता का  जोखिम उठाना उनकी प्रकृति और नियति है. मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के गलत कार्यों का वे पर्दाफाश करनेवाले पत्रकार हैं. एकदम निडर और बेखौफ. कभी-कभी उनकी तल्ख टिप्पणियाँ बड़ों-बड़ों को तिलमिला देती हैं. अरुण कमल जैसे कवि और प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार से वे अकेला ताल ठोकते हैं.
इस पत्रकार की कलम में जितनी ताकत है, उतनी ही ताकत उनके आंदोलन में भी है. वे आंदोलनकारी भी हैं. भगाणा की गैंग-रेप पीड़िताओं के पक्ष में उन्होंने ने काफी सक्रियता दिखलाई. वे उनके आंदोलन में शामिल भी हुए. वस्तुतः  प्रमोद रंजन ने बहुजनों की लोक परंपरा, मिथक और लोकगाथाओं से लेकर बहुजन राजनीति एवं साहित्य तक के विषयों पर खूब कलम चलाई है. बतौर संपादक अन्य बहुजन चिंतकों से उन्होंने ऐसे विषयों पर लिखवाया भी है. अभी हाल ही में वाणी प्रकाशन से तीन खंडों में ‘हिंदी की आधुनिकता: एक पुनर्विचार ’ नामक पुस्तक आई है. इसमें प्रमोद रंजन का ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ विषय पर वह व्याख्यान और उस पर हुई लंबी बहस शामिल है, जिसे उन्होंने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में दिया था. वे बहुजनों के सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रकार हैं और बहुजनों के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं. यह प्रमोद रंजन ही हैं, जिन्होंने बहुजनों के पर्व-त्योहारों को नई दृष्टि से मूल्यांकित किया है.

 उनकी एक और पुस्तिका है-‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन (महिषासुर: एक पुनर्पाठ)’। यह पुस्तिका 2013 ई. में प्रकाशित हुई है. ‘फारवर्ड प्रेस’ से जुड़ने के बाद प्रमोद रंजन की पत्रकारिता और निखरी. इसके अंकों में वे लगातार लिख रहे हैं. वे नए लिख रहे हैं,  मौलिक लिख रहे हैं और विचारोत्तेजक लिख रहे हैं. बिहार के फारबिसगंज में पिछड़े मुसलमानों पर गाज गिरने के बाद जो चुप्पी थी, उसे प्रमोद रंजन ने तोड़ी (फारवर्ड प्रेस, जुलाई 2011). ‘गीता’ को लेकर जनवरी-फरवरी 2012 में भारतीय राजनीति में जो उबाल आया था, उसे लेकर रंजन ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेख लिखा है- ‘गए राम, आए कृष्ण’ (फारवर्ड प्रेस, फरवरी 2012). ‘बहुजन साहित्य’ पर उनका लेख ‘बहुजन आलोचना: हिंदी समाज का साहित्य इस कोण से’ अत्यंत महत्वपूर्ण है. इस लेख में उन्होंने लिखा है कि ”बहुजन आलोचना कई प्रकार के आवरणों, छद्मों और भाषाई पाखंडों का उच्छेदन करते हुए वास्तविक जनोन्मुख साहित्य की तलाश करती है.”
एक दूसरे लेख ‘बहुजन साहित्य और आलोचना’ (फारवर्ड प्रेस, अप्रैल 2013) में उन्होंने यह स्थापना दी है कि ”जैसे-जैसे हम बहुजन साहित्य को चिन्हित करते जाएंगे, द्विज साहित्य स्वतः हाशिए का साहित्य बनता जाएगा, क्योंकि हिंदी साहित्य का अधिकांश हिस्सा बहुजन साहित्य ही है.”  सचमुच पत्रकार प्रमोद रंजन का कार्य बहुजन समाज, साहित्य, संस्कृति और राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. वे शोषित, दलित तथा पिछड़ों की बुलन्द आवाज हैं तथा भारत की बेजुबान वंचित जनता की जुबान हैं.

माया अंजेलो की कवितायें

माया अंजेलो/ अनुवाद : विपिन चौधरी

1. न्यूयार्क में जागरण

पर्दे,

हवा के खिलाफ
अपनी जंग छेड़ रहे हैं,

बच्चे परियों से
सपनों का आदान-प्रदान करते हुए
नींद ले रहे हैं.

शहर ख़ुद को जगा कर
मेट्रो की पट्टियों पर खींच लाया है

भोर तक लेटी हुयी आशातीत और असावधान मैं,
युद्ध की अफवाह में बजी अलार्म सुन
जैसे  जाग उठती हूँ

2  फ़रिश्ते की छुअन 


हम   जब  साहस के लिए अनभ्यस्त और
खुशियों से निष्कासित
अकेलेपन के घेरे में सिमटे रहते हैं

प्यार अपनी उच्च पवित्र मंदिर के रास्ते
तक
हमारी दृष्टि में आता है
जीवन में हमें आजाद कराने के लिए.

प्यार आता है
और अपनी गाड़ी में
खुशी की पुरानी यादें
दर्द के प्राचीन इतिहास को लाता है
यदि हम मजबूत हैं तो

प्रेम, भय की जंजीरों के हमलों को
हमारी आत्मा से दूर करता है
हम अपनी कायरता से निकलकर्
प्यार के प्रकाश की रौशनी में
बहादुर  हिम्मत से    देखते हैं

प्यार हम सभी को
किसी समय भी हो जाता है
यह केवल प्रेम ही है
जो हमें मुक्त करता है

3.  वे अपने घर चले गए 

वे अपने घर गए और अपनी पत्नियों को बताया
वे अपने जीवन में कभी एक जैसे नहीं रहे  कि,
क्या वे मुझ जैसी लड़की को जानते हैं
लेकिन … वे अपने घर गए

वे  कहने लगे मेरा घर इतना साफ़ है कि उसे चाटा जा सकता है
मेरा कुछ कहने का मतलब नहीं था,
मेरे करीब रहस्य की  हवा थी
लेकिन … वे अपने घर चले गए

मेरी तारीफ़  सभी पुरुषों की जुबां पर थी
उन्हें मेरी मुस्कान, मेरी बुद्धि, मेरे कुल्हे  पसंद  आये थे
वे  यहाँ एक  या दो या तीन रात बिताना चाहते थे
लेकिन …

4 ,अकेलापन 

कल रात

लेटे हुए मैं सोच रही थी

मेरी आत्मा को वह घर कैसे मिल सकता है

जहाँ जल, प्यासा  नहीं  है

और रोटी का टुकड़ा

पत्थर की मानिंद नहीं है

मैं यहाँ एक चीज़ के लिए आयी थी

और मुझे विश्वास है कि मैं गलत नहीं  हूँ

यह कारण है या कोई और,

लेकिन कोई भी

इस अकेलेपन को संभव कर सकता  हैं

अकेले, बिलकुल अकेले

लेकिन कोई

इस अकेलपन को गढ़ नहीं  सकता है

यहाँ  कुछ करोड़पति हैं जो अपने पैसे का प्रयोग  नहीं कर सकते

उनकी पत्नियाँ चुड़ैलों की तरह घूमती हैं

उनके बच्चे उदास गाना गाते हैं

उन्हें अपने पत्थर जैसे ह्रदयों के इलाज़ के लिए

महंगे डॉक्टर मिल गए हैं

लेकिन कोई नहीं

कोई भी नहीं

अकेले यहाँ से नहीं जा सकता

अब आप ध्यान से सुनो

जो कुछ भी मैं जानती हूँ मैं आपको बता दूंगी

तूफानी  बादल जमा हो रहे हैं

हवा  चलने ही वाली है

मनुष्य की प्रजाति पीड़ित है

और मैं, विलाप सुन रही  हैं

‘क्योंकि कोई नहीं,

लेकिन कोई भी

इसे अकेले में सुन  सकता  हैं.

अकेले, बिलकुल अकेले

कोई भी, लेकिन कोई

इसे अकेले में संभव कर सकता है

5. बेचारी लड़की 

मैं जानती हूँ

तुम्हें दूसरा प्रेम मिल गया है

जिसे आप प्रेम करते हो

वह मुझ जैसी है

तुम्हारे शब्दों पर इस तरह लटकती है जैसे हो वो सोना

वह सोचती है कि उसने तुम्हारी आत्मा को समझ लिया है

बेचारी

मुझे जैसी लड़की

मैं जानती  हूँ

तुम एक और दिल को तोड़ रहे हो

और कुछ भी नहीं कर सकती

यदि मैं उसे बताने की कोशिश करूँ

कि मैं क्या जानती हूँ

वह मुझे गलत समझेगी

और मुझे जाने को कहेगी

बेचारी

मुझ जैसी लड़की

और मैं यह जानती हूँ

तुम  उसे भी छोड़ने  जा रहे हो

और मैं यह जानती  हूँ

वह कभी  नहीं जान पाएगी

तुम जाने को क्यों मजबूर हुए

वह रोई और आश्चर्यचकित हुई

कि क्या कुछ गलत हुआ

तब  वह  फिर से गीत की शुरूआत करेगी

बेचारी मुझ जैसी लड़की

माया अंजेलो

माया अंजेलो ब्लैक कविता की सशक्त हस्ताक्षर हैं, वे पिछले 28 तरीख को उनका परिनिर्वाण हुआ. विपिन चौधरी हिन्दी कविता में एक मह्त्वपूर्ण युवा उपस्थिति हैं.

विपीन चौधरी