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जीवन और मृत्यु के बीच अस्तित्व की तलाश

रामजी यादव

( रामजी यादव यहां सुधा अरोडा की कहानियों से गुजरते हुए स्त्री की पीडा , उसके संघर्ष , पितृसत्ता का स्त्री के ऊपर वर्चस्व और उसके द्वारा पितृसत्ता से मुठभेड की पड्ताल कर रहे हैं .)

मेरे एक मित्र ने अपनी गरममिजाज और झगड़ालू बीवी को माफ करते
हुये अनेक बार अपनी सुकरतीयता का परिचय दिया है — ‘क्या करूँ यार
! रोज़-रोज़ की किचकिच से तंग आकर मैंने सोच लिया कि स्त्रियाँ वास्तव में एक ऐसे
ग्रह की जीव होती हैं जहां पुरुषों के बिलकुल विपरीत गुण पाये जाते हैं । “ क्या इस बात
में कुछ दम हो सकता है?
यह नृविज्ञान को चुनौती देने वाला सिद्धान्त बेशक एक मज़ाक हो
लेकिन इसमें छिपे सामाजिक मनोविज्ञान से मुंह मोड़ना बहुत आसान नहीं है बल्कि कोई
भी संवेदनशील व्यक्ति इससे विचलित ही हो सकता है । क्या स्त्रियाँ जिस ग्रह की जीव
हैं वह ठीक हमारे परिवेश के भीतर ही नहीं मौजूद है ? और वे
पुरुष-प्रभुत्व , पैतृक सम्पत्ति और उत्तराधिकार की दुनिया की एक वंचित और
गूंगी सदस्य हैं ? और वहाँ पुरुषों के इतने विपरीत गुण पाये जाते हैं कि न
सिर्फ वह अपना दोयम दर्जा स्वीकार कर लेती हैं बल्कि अपने मालिकों की खुशहाली के
लिए करवा चौथ , राखी , भैया दूज , जीवूत्पुत्रिका , छठ , हरितलिका तीज
से लेकर न जाने कितने उपक्रम करती हैं। आखिर यह क्या है ? वह अपने
उत्पीड़क की खुशहली की कामना क्यों करती है? इस प्रकार वह
क्यों  उसी व्यवस्था में क्रमशः घुलती जाती
है जो व्यवस्था उसे बहुत उपेक्षित , लाचार और एकाकी बनाती जाती है ?
सत्तर के दशक की सशक्त कथाकार सुधा अरोरा की कहानियों की
केंद्रीय धुरी एक ऐसी ही स्त्री है । अगर एक रैखिक विन्यास देखा जाय तो  उनकी कहानियाँ एक पढ़ी-लिखी स्त्री के पत्नी
बनने , घर  की अर्थव्यवस्था में योगदान के
लिए बाहर निकलने और बराबरी के अहसास को पाने , भागदौड़ और
थकान के बीच एक अपराधबोध और क्षोभ से धीरे-धीरे ग्रसित होने तथा पति-पुरुष की एक
अपरिहार्य इकाई में रूपांतरित होते जाने की रचनात्मक बयान हैं । लेकिन इन
स्थितियों से ऊपर होकर वे तब बड़ी अभिव्यक्तियाँ बन जाती हैं जब उनमें से एक ऐसा
चेहरा झाँकता है जो स्वयं अपने ही विखंडन को देखता है और यहीं से अपने लिए एक
भूमिका का चुनाव करता है । इस तौर से सुधा जी एक पारिवारिक इकाई के भीतर मौजूद
शक्ति-सम्बन्धों को उनके जटिल संरचनाओं के साथ बयान करती हैं ।
इन शक्ति सम्बन्धों का एक रूप “महानगर की
मैथिली” है तो एक रूप “रहोगी तुम वही” है । इन शक्ति सम्बन्धों का एक सिरा “
अन्नपूर्ण मण्डल की आखरी चिट्ठी” है तो दूसरा सत्ता संवाद” से जुड़ा है । इन शक्ति
सम्बन्धों की एक नियति “काला शुक्रवार” है
तो दूसरी “ताराबाई चॉल : कमरा न एक सौ पैंतीस” है । इन शक्ति-सम्बन्धों का
एक दृश्य “ करवाचौथी औरत में दिखता है दूसरा दृश्य “ डेजर्ट फोबिया उर्फ समुद्र
में रेगिस्तान” में दिखता है । लेकिन शादीशुदा स्त्रियों से बहुत पहले इन
शक्ति-सम्बन्धों का सबसे वीभत्स रूप कोख के भीतर या जन्म लेते ही मार दी जाने वाली
उन बेटियों के जीवन में देखा जा सकता है जिसे कथाकार सुधा अरोड़ा ने बहुत गहरी पीड़ा
और यंत्रणा के साथ देखा और लिखा है । इन कहानियों से गुजरना दरअसल एक ऐसी दुनिया
से गुजरना है जहां लिंग के आधार पर एक सतत वध-स्थल सक्रिय है और जहां स्त्री सतत
ज़िबह की जा रही है । ये कहानियाँ भारतीय सभ्यता के ज़िबह वेला को दिखाती हुई
कहानियां हैं और इन्हें सिर्फ कहानी की तरह नहीं पढ़ा जा सकता ।
इनमें एक स्त्री इस भौतिक दुनिया से इतनी बेगानी और अलग हो
चुकी है कि वह केचुए के साथ अपनी तुलना करती है और उसमें जीवन के प्रति स्पंदन
समाप्त हो चुका है । एक और स्त्री उत्पीड़न को इतना बर्दाश्त कर चुकी है कि जब उसका
उत्पीड़क पति मर जाता है तो वह उदास हो जाती है और उत्पीड़न बर्दाश्त करने की आदत से
बाहर नहीं निकल पाती तथा उस अनुभव को अपनी जांघ पर जलती हुई सिगरेट रखकर पाती है ।
इनमें एक ऐसी औरत है जो पति के कल्याण में करवाचौथ पर भूखी है और उसका महत्व उसकी
कुतिया फ्लॉपी से भी कम है , गोया कथाकार ने फ्लॉपी के समानांतर एक स्त्री की नागरिकता
को फ्लॉप होने का मेटाफर रचा हो और यह कहा हो कि घर , समाज या देश
के कल्याण से वाबस्तगी और उससे मनोवैज्ञानिक जुड़ाव किसी नागरिक को पीछे धकेलता है ।
इनमें एक ऐसी पत्नी है जो शहर में भड़के दंगे का लोमहर्षक अनुभव बांटना चाहती है
लेकिन उसके पति के पास फालतू समय नहीं है । यह औरत अपनी सामाजिक दृष्टि और अनुभव
के परिणाम के रूप में पति की डांट खाती है और गूंगी होने को विवश की जाती है ।
आखिर ऐसी स्त्रियाँ भारत के किस कोने में पाई जाती हैं ? आखिर वे इतनी
चुप क्यों रहने लगती हैं कि एक दिन अपनी भाषा ही भूल जाती हैं ? वे कौन सी
वजहें हैं जो उन्हें बेगानगी के एक ऐसे द्वीप में जाने को मजबूर कर रही हैं जहां
जीवन का हर सौन्दर्य मर गया है ? सुधाजी की कहानियाँ लगातार इन  प्रश्नों को उठाती हुई कहानियाँ हैं । वे इन
सवालों से इतनी वाबस्ता हैं कि लेखकीय निजता और बाहरी जीवन-जगत के बीच कोई फांक
नहीं रह जाती । यानि “ रुदाद मेरी रूदाद-ए-जहाँ मालूम होती है ! जो सुनता है उसी
की दास्ताँ मालूम होती है !!”
सवाल उठता है कि दास्तानों का यह यकसां होना क्या है ? क्या हर
क्षेत्र में आसमान छूने की ललक के साथ अपनी ज़िंदगी को संघर्ष में झोंक देने वाली
स्त्रियों और इन्दिरा नुई , चंदा कोचर या शिखा शर्मा जैसी कारपोरेट-चेहरों तथा
उच्चवर्गीय सुविधाओं का उपभोग करती महिलाओं की दास्तां एक हैं ? एक
मध्यवर्गीय कर्मचारी या एक अभिनेत्री या खिलाड़ी की दास्तां एक हैं? असंगठित
क्षेत्र की श्रमिक महिलाओं और घरेलू महिलाओं की ज़िंदगी की दास्तां एक हैं ? क्या नई
आर्थिक नीति और उदारीकरण की राह आनेवाली संपन्नता ने स्त्री के जीवन में दिखाई
देनेवाली भौतिक विविधता के पीछे कोई ऐसा सत्य या यथार्थ छिपा रखा है जो अंततः सभी
स्त्रियों की दास्तान एक बना दे रहा है ? क्या सुधा अरोड़ा की कहानियाँ सामाजिक
संस्तरों का निषेध करते हुये स्त्री-जीवन का रेटोरिक कथानक रचती हैं ? क्या समय ने
उनकी प्रासंगिकता को धुंधला कर दिया है ? इन सारे सवालों के जवाब केवल इस बात से
मिलते हैं कि आधुनिकता के सम्पूर्ण इतिहास को उस सामाजिक दृष्टि से परखा जाय जहां
मुख्य कारक लिंग न हो या जहां दो मनुष्यों को ऐसी किसी योग्यता या कसौटी  पर न कसा जाय जो जैविक हों ।
सुधाजी अपने पूरे कथा संसार में जिस बात को केंद्रीय मुद्दे
के रूप में उठाती है वह वस्तुतः वही मुद्दा है जो एल एच मॉर्गन और एंगेल्स उठाते
हैं । जो बीसवीं शताब्दी में क्लारा जेटकिन , सीमोन द बोउआ
या जर्मेन ग्रीयर उठाती हैं । भारतीय संदर्भों में जिस मुद्दे को थेरियों ने बुद्ध
के समय उठाया । गार्गी , मैत्रेयी , अपाला अथवा घोषा जैसी स्त्रियों ने जिस
मुद्दे को उठाया और जो व्यक्ति के मिथक में दब गए । लेकिन सुधाजी ने उन सवालों को
एक ऐसा कथा-वितान दे दिया कि वे मुद्दे सुख-सुविधा की पपड़ी के नीचे छिप गए हरे
घावों की तरफ बराबर संकेत करते हैं । यह मुद्दा दरअसल स्त्री की गुलामी के उस कारण
की शिनाख्त है जो लिंग से शुरू होती है और उसकी शक्ति को कमजोर करती हुई संपत्ति से
उसकी बेदखली तक जाती है और राज्य में उसकी भूमिका और निर्णयों को शून्य कर देती है
। सारी कहानी निर्णय क्षमता और प्राधिकार के समाप्त हो जाने की ही कहानी है और
इसीलिए स्त्रियाँ राज्य में सहानुभूति की पात्र हैं । बराबरी की नहीं । इसीलिए घर
तक सहानुभूति दिखाने के नियम हैं लेकिन निर्णयों का सीमा-क्षेत्र अभी बहुत छोटा है
। एक कथाकार के रूप में सुधाजी इस सीमा-क्षेत्र को बार-बार देखती हैं और यही वह
बात है जहां दस्तानों का यकसां होना शुरू हो जाता है । यही वह जगह है जहां से यह
बात सिर उठाने लगती है कि स्त्री-जीवन का पर्सनल एक बहुत बड़ा पोलिटिकल है ।
जैसे मजदूर अपनी बेची गयी श्रम-शक्ति से अपने एक दिन के काम
से अपने दूसरे दिन की गुलामी भी पैदा करता है और इस प्रकार एक जीवन के काम से
दूसरे जीवन की गुलामी पैदा करता है । यही गुलामी एक ऐसे राज्य को मजबूत करती है जो
उसकी अनेकों पीढ़ियों को गुलाम बना लेता है और इस प्रकार एक दिन ऐसा भी आता है कि
वे पीढ़ियाँ गुलामी को ही चरम-सत्य मान लेती हैं और आजादी को एक भयानक खतरे के तौर
पर महसूस करते, देखते हुये कभी लड़ नहीं पातीं। क्या ठीक इसी तरह अपनी
लैंगिक विशेषताओं के कारण स्त्री भी अपनी गुलामी पैदा कर लेती है और यह प्रथा एक
पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इतनी सघनता से चली चलती है कि एक दिन आज़ादी उसे खतरनाक लगने
लगती है ? राज्य के सबसे छोटे समूह परिवार में स्त्री की स्थिति इस खतरे के निशान के
ऊपर-नीचे ही है , इसे सुधा जी रोज़मर्रा के व्यवहारों के माध्यम से दर्ज़ करती
हैं । उनकी कहानियाँ इस तरह एक ऐसे सांस्कृतिक टकराव को चिन्हित करती हैं जहां एक
समूह के दो बुनियादी घटक दो विरोधी व्यवहारों , प्राधिकारों
और भूमिकाओं में हैं । यह सांस्कृतिक टकराव लिंग का है , जिसके कारण
स्त्रियाँ किसी और ग्रह से आई हुई लगती हैं ।
राज्य ने दोनों के लिए दो मानदंड तय किए हैं । इसका सबसे अच्छा उदाहरण उनकी
कहानी “सत्ता-संवाद” पेश करती है । पति अगर कमासूत हो तो सत्ता की चाबी ज़ाहिरन उसी
के हाथ में होगी लेकिन नकारा भी हो तो घर का दरवाजा उसके लिए बंद नहीं हो सकता ।
वह केवल पुरुष होने के कारण ही इतना विशेषाधिकार रखता है कि सामने रखी थाली को
बेस्वाद बताकर मुंह बनाकर उठ सकता है । उसके मानस में यह बात नहीं आती कि बेस्वाद
खाना भी एक संघर्ष और परिश्रम का नतीजा है बल्कि उसके मानस में यह बात सदियों से
धर दी गई है कि स्वाद पर उसका अधिकार है और उसे स्वाद ही चाहिए । उसकी पत्नी का
कर्तव्य है कि उसे स्वाद उपलब्ध कराये । भले उसमें उसे अपना खून मिलना पड़े या
स्वयं को बेच देना पड़े । वह पत्नी की उस बेजारी और अलगाव को कभी नहीं महसूस करता
कि इसी स्वाद को बनाए रखने की कोशिश में उसके लिए कला , साहित्य , कविता या और
कोई भी गतिविधि बेमायने हो चुकी है । यह शायद प्रारम्भिक गतिविधि है जहां से चीजें
खुलना शुरू होती हैं । यहीं से एक करवाचौथी औरत जन्म लेती है । यहीं से केवल बाहर
का शुक्रवार काला नहीं होने लगता बल्कि घर के भीतर भी एक कालिमा पैठ जाती है ।
यहीं से “नमक” जैसी कहानियाँ जन्म लेती हैं और यहीं से एक स्त्री के
सारे उपक्रमों और उद्यमों का एक ही कोम्प्लीमेंट मिलता है – “ रहोगी तुम वही” । वास्तव
में सुधा अरोड़ा की कहानियों ने अपनी अंतर्वस्तु में परिवार और रोज़मर्रा को इतना बड़ा
वितान दिया है कि उनकी सारी कहानियाँ मिलकर एक महाकाव्य बनाती हैं और इस महाकाव्य
में राज्य की संरचना और उसके द्वारा तय मानदंडों के परिणाम रेशा-रेशा दिखाई पड़ता
है । इस परिणाम के एक छोर पर भ्रूण से बाहर निकलती लड़कियों की हत्या है तो दूसरे
छोर पर आत्महत्या का चुनाव करती अन्नपूर्णा मण्डल है । एक छोर पर तीसरी बेटी के
प्रति ठंडे और बेजान शब्द हैं तो दूसरे छोर पर ताराबाइ है । कहा जा सकता है कि
सुधा अरोड़ा की कहानियों  में मौजूद
स्त्रियाँ किसी एक दौर या एक भूगोल की स्त्रियाँ नहीं हैं । वे इतिहास के वर्तमान
से सुदूर अतीत के दरवाजों तक जाती हुई स्त्रियाँ हैं । उनके कंधों पर वे सारे बोझ
रखे हुए हैं जिसकी कोई जरूरत नहीं है । जो आज़ादी और लोकतन्त्र के आगे खड़ी एक
अभेद्य दीवार हैं । लेकिन सुधाजी इस दीवार को तोड़ने की एक अनवरत कोशिश करती दिखाई
देती हैं । वे राज्य और उसके विशेषाधिकार क़ानूनों का सतत निषेध करती हैं और कहानी
का सूत्र वहाँ तक ले जाकर छोडती हैं जहां इस राज्य को खुली चुनौती दी जाने और उसे
तोड़ने की ज़रूरत साफ-साफ महसूस की जा सकती है । अमूमन सहनशीलता के आवरण में लिपटे
एक सतत विरोध को इन कहानियों में आसानी से देखा जा सकता है । बेशक यह विरोध
अन्नपूर्ण मण्डल किसी और रूप में करती हो और काला शुक्रवार की नायिका किसी और रूप
में । यह विरोध प्रायः उनकी कहानियों में एकालाप के रूप फूट पड़ता है ।
शायद इसीलिए उनकी अधिकतर उम्दा कहानियाँ एकालाप हैं । और इस
प्रविधि से उन्होने कहानियों को एक खास ऊंचाई देते हुये उस मुकाम पर पंहुंचाया है
जहां एकालाप भी एक घरेलू महाभारत की तरह जीवंत हो उठता है । जैसा कोई ठहरा हुआ
दृश्य चल पड़ा हो और हर रंग मुखर हो उठा हो । शायद ही एकलाप के भीतर अनेक पात्रों
के हू-ब-हू मौजूद रहने की इतनी शानदार कहानियाँ इतनी अधिक संख्या में औरों के पास
हों ! ‘सात सौ का कोट’ ऐसी ही एक अविस्मरणीय कहानी है जो एक साथ कई पीढ़ियों , वर्गों और
प्रवृत्तियों को इतने कम स्पेस में इतनी बारीकी से प्रक्षेपित कर देती है जितने
में बहुधा रचनाकार भूमिका ही बना पाते हैं । शब्दों और स्लेंग्स का धारदार प्रयोग
और विनम्रता तथा निरीहता में छिपी क्रूरता और रक्तपायी व्यावहारिकता को परत-दर-परत
उधेड़ना सुधाजी के उस रचनात्मक कौशल का सबूत है जो कालांतर में उन्होने मानव-मन के
भीतर पैठी उस सत्ता-संरचना की तसदीक में लगाया जो वस्तुतः लिंग-भेद को भी एक
वर्ग-संस्तरण की तरह देखती और उसपर काबिज रहती है । ज़ाहिर है शैली सुधाजी के कथा-कैनवास
का वह रंग है जो मूल चित्र को अतिरिक्त उभार प्रदान करती है।
लेकिन सुधा अरोड़ा की कहानियाँ अपनी शैली के अतिरिक्त इसलिए
भी जानी जाती हैं कि वे संवादों के परस्पर आदान-प्रदान के बिना भी दूसरे पक्ष के
संवाद का बहुत गहरा आभास पैदा करती हैं । इसके साथ ही सहज स्थितियों को क्रमश बहुत
जटिल वितान तक ले जाती हैं । यह जटिल वितान वस्तुतः उस सामाजिक और सांस्कृतिक
संरचना का ताना-बाना है जिसमें पुरुष लदा हुआ दिखता है और स्त्री ढोती हुई । और
बोझ से दबी हुई स्त्री इतनी अकेली और अलग-थलग है कि वह सारे संवाद स्वयं कर रही है
। बाहर का देखा और भीतर का भोगा हुआ किसी के साथ बांटना या तो बेमानी है या असंभव
होता जा रहा है । कुछ तो है !
सुधाजी की कहानियाँ समाज के बीमार होने की शिनाख्त करते हुए
राज्य और सत्ता-संरचना के उन मूल घटकों की ओर संकेत करती हैं जो स्त्री की कोख पर
कब्जा करते हैं और उसे एक उजरती मजदूर के रूप में सबसे निचले पायदान पर ला देते
हैं । ये कहानियाँ कहीं न कहीं उस सत्ता के निरंकुश होने की तसदीक करती हैं जो
आर्थिक संस्तरों की विभिन्नता के बावजूद स्त्री के लिए बराबरी को एक दूर का ढ़ोल
बना देती है । यह सत्ता केवल अतीत से वर्तमान तक नहीं आई है बल्कि उसके लगातार
भविष्य बनने का भी आधार है और इस दृष्टि से सुधा जी की कहानियाँ सदियों के यथार्थ
की कहानियाँ तो हैं ही सुदूर भविष्य की भी कहानियाँ हैं । इनका कालखंड बहुत
विस्तृत है । ये कहानियाँ इसी पृथ्वी पर स्त्रियों के लिए रच दिये गए दूसरे ग्रह
से मनुष्यों के राज्य के नियमों को सरासर गलत करार देती कहानियाँ हैं । और सबसे
बढ़कर उस राज्य को ही बुनियादी खतरा बताने वाली कहानियाँ हैं जिसके नियम स्त्री के
लिए मानवीय नहीं लैंगिक आधार पर बनाए गए हैं । ये कहानियाँ वस्तुतः उन संघर्षों की
पूर्वपीठिका हैं जो स्त्रियों की मुक्ति के लिए बहुत लंबे समय तक जारी रहनेवाला है
रामजी यादव
रामजी यादव मह्त्वपूर्ण कथाकार , आलोचक एवम फिल्मकार हैं . इनसे इनके मोबाइल न 09699894413 पर संपर्क किया जा सकता है .

अल्पना मिश्र की 5 कवितायें

(अल्पना मिश्र की अधिकांश कहानियां निम्न मध्यमवर्गीय
परिवेश की लडकियों /पात्रों की पीडा और संघर्ष की कहानियां होती हैं. आज उनका
जन्मदिन है उनके जन्मदिन पर इस पीडा और संघर्ष को अभिव्यक्त करती उनकी 5 कवितायें
स्त्रीकाल के पाठकों के लिए , उन्हें स्त्रीकाल की ओर से जन्मदिन की शुभकामनाओं के
साथ !)
 
1.  स्टिक
 
इतने इतने दबावों के बीच
बहुत आसान नहीं था मृत्यु को चुनवा देना
अगर उन्हें चुनना था ही
जीवन में बहुत चीजें थीं
मृत्यु के बिल्कुल बगल में बिखरी
वे बगल में गयी थीं, बिखरी हुई दुनिया में
हालांकि कोई लड़का उनका दोस्त नहीं था
वे लड़कों को देख कर किलक उठती थीं
शर्माती हुई
बतियाने की हुलस उनकी कोई देखता!
उनके राग के बीच पिता खड़े थे आशंकित
देते हुए चिड़चिड़ाहटें, दुश्चिंताएं और
लम्बे, गोल, चकोतरे नील
जिसे वे सफेद कपड़ों पर नहीं लगा पायीं
देह पर लगे नील की चीख से निकल कर
जो कुछ लकीरें उड़ गयी थीं हवा में
गवाह बनने के लिए नाकाफी पायी गयीं
हालांक़ि  कोई नहीं था उनकी तरफ
तब भी वे गयीं बगल में
तमाम सारी चीजों के बीच
जबकि पिता बहुत बड़ी, कठिन, तंग, अबूझ दुनिया में
परेशान से फॅसे थे
लड़कियॉ थीं कि कालरात्रि
बीतती ही नहीं
हर पकड़ से एक कदम आगे जाने को आकुल
रात भर गमले के फूलों को सहारा देने वाली स्टिक बनाती
खुद स्टिक बन जाती हैं लड़कियॉ
ट्यूब लाइट सी झप्प झप्प उजली होती
कबूतर हैं लड़कियॉ
खाना पकाते, बरतन मॉजते और
खॉसते पिता की दवा खरीदते हुए भी
मकड़ियों, जालों से निकल कर तितली तक जाती हुयीं
नई रजाई खरीदना चाहती हैं लड़कियॉ अबकी बचत से
मोबाइल खरीद लेंगी सेकंड हैंड
इसके बाद की बचत से
बचत पर गिद्ध की ऑख है!
अभी तो टटोलना शुरू ही किया था लड़कियों ने खुद को
समझने की कोशिश में थीं ही
कि हथौड़े की तरह बजने लगीं
पिता के सपनों में
बचत डूबी दारू के समुद्र में
पिता के भीतर उतरती हुई सीढ़ी दर सीढ़ी
दुनिया से निजात पाने की कुलबुलाहट होती गयी तेज
नसें फूलीं दिमाग की
लड़कियॉ लगने लगीं सारे दुखों की जड़
जमाने भर की परवाह से बेजार
पीटते हुए उन्हें, देते हुए गालियॉ, निकल जाते हुए दूर,
कभी न आने की धमकी दे दे कर,
अफसोस में खरीदते हुए थोड़े से चावल
लौटते हैं पिता
पिता नहीं चाहते थे
लेकिन क्या करें ? उन्होंने कभी जाना ही नहीं
लड़कियॉ स्टिक भी हैं
पौधों को सहारा देतीं
पौधों से बड़ी होतीं
बस, फूल तक पता था उन्हें
उसके आगे परम्परा, संस्कार, जैसी
तमाम मामूली चीजों ने ऐसा जकड़ रखा था
कि आखिरकार इस बार
उन्होंने चुना उनके लिए नीले निशानों के साथ
भयानक शान्त वह शब्द
 ‘मृत्यु
हॅलाकि लड़कियॉ गयी थीं
मृत्यु के बिल्कुल बगल में
तमाम चीजों के बीच
पर जबरन उन्हें चुनवा दिया गया जो
वे नहीं जानतीं कि उसके बाद
दुश्चिंता में कॉपते
बिना स्टिक के
अपाहिज जैसे पिता अफसोस में कहॉ निकले होंगे
संदर्भ – देहरादून में फूलों को सहारा देने वाली स्टिक बनाने वाली चार
लड़कियों के लिए, जिन्हें मौत देने के बाद उनके पिता ने खुद भी आत्महत्या कर लिया।
2. मैं
 
समय की कमी थी बहुत
मेरे समूचे वजन से भारी थीं
काम की गठरियॉ
गाठों में बॅधा था टुकड़ टुकड़ा मेरा आप
शोक, मोह, चिंता और हर्ष से बना
बेखबर ईश्वर बैठा था स्कूटी पर
मेरे पीछे
न जाने किस शोक में डूबी
किस मोह में हिम्मत धरती
किस चिंता में कॉपती
किस हर्ष के लिए विकल
हाथों में मन भर अनाज लादे
भीड़ के बीच
स्कूटी चला रही थी।
3. प्यार में डूबी स्त्री  
प्यार में डूबी स्त्री
सहेजती, संभालती है इस क्षण को
कैसे उठाए, कहॉ रखे…..
इसी के बारे में सोच सोच कर
वर्षों अपने आप में मुस्कराई थी
ऐसा होगा वह
वैसा होगा वह….
तो वही चला आया था दबे पॉव
प्यार में डूबी स्त्री
यह भी सोचती रही वर्षों
कि अनिश्चितता में जागे तो
निश्चित से हों उसकी तकिए के नीचे
डायरी, पासबुक, शेयरों के कागज, चाभी……
कहॉ समझ पाई थी तब
उसी एक क्षण के मोह में
चला जाएगा वर्षों की मेहनत से पाया सारतत्व
डायरी के शब्दों का आत्ममंथन
पासबुक की सुरक्षा
शेयरों का उत्साह…..
प्यार में डूबी स्त्री
अनिश्चितता में जागी है कब से
कब से झाड़ू पोंछा, चूल्हा चौका करती
बरतन खनखनाती
बच्चों के पीछे दौड़ती
मोटापा घटाती
कपड़े फटकारती….
फिर अनंत इंतजार में छटपटाती
उसी एक क्षण को पकड़ लेने की कोशिश में निढाल है
चाभी का खोखला जिस्म लटका है
कमर से
कहीं निकल जाने की तड़प लिए
दरवाजे तक आ कर लौट रही है स्त्री
सुनो, प्यार में डूबी स्त्रियों!
अगर यही है प्यार
तो दूर ही भली तुम प्यार से।
4. वर्षों से बिखरी थी दुनिया
 
वर्षों से पार कर रही थी सड़क
वर्षों से रास्ते पैरों के आगे दीखते थे
यही इसी जगह वर्षों से रहा होगा युगवाणीकार्यालय
घड़ी में चाभी भर रही थी
कि इसी एक पल में
जने कौन निकल गया मेरे आगे से
नाउम्मीदी में कोई ठिठका मुझे देख कर
यह वक्त था यक्ष प्रश्न का
अभी अभी विदा हुई एक लड़की
रोते रोते रूक गई है
यहीं से उसे उठानी है अचुनाव की जिम्मेदारी
भय या मृत्यु में से कोई एक
वह भी कहीं न कहीं पॅहुची होगी
जो लड़की निकली थी साइकिल पर पहले
अजीब से संशय थे
मर्यादाओं, लज्जा और अस्तित्व के घलमेल में
उत्तर सूझा था
जाने कौन सी चाभी ने दस दरवाजे पीछे के रहस्य में
झकझोरा था खूब
मैं निपट थी
अपने ही शोर में घिरी
अपने ही बोझ से दबी
भारी पॉव बढ़ाती
चारों ओर
वर्षों से बिखरी थी दुनिया।
5. बेवजह नहीं हॅू
खाली हो गई हू अचानक
ड्यूटी पर नहीं हॅू
पता चला है ड्यूटी पर पॅहुचने के बाद
कहॉ जाउॅ?
कभी सोचा ही नहीं
डयूटी पर पॅहुचूंगी एक दिन
और ड्यूटी पर नहीं होना होगा
जरूरत के खंभों पर कुहनी टिकाए खड़े घूरते सत्यों को देखूंगी
अलविदा नहीं कहूंगी
रोमांचक होंगे बाजार में बहुतेरे दृश्य
बिकने वाली उदास चीजों के बावजूद
बेचने वाले हतोत्साहित नहीं होंगे
यूं ही घूम रही हॅू
काम नहीं याद आ रहा
स्थगित करते करते स्थगित हो गया है
याद करते रहना खुद को भी
सब्जियॉ ठेलियों पर लदी हैं हरी, सुंदर और गुणवान
सड़ती हुई
भीतर का पिलपिलापन छूने के लिए नहीं है
पट्ट से फूटेगी कोई
और किरकिरा कर देगी बाजार का मजा
कपड़ा ले रही हॅू
और कितना लेना है, बता रहा है दुकानदार
मेरा नाप तक उसे बताना है
मेरे नाप से जरा ज्यादा
दर्जी से कहती हॅू
सदियों से नाप दिए गए में अड़स कर बड़ी घुअन होती है
यह नहीं कहती
अपने नाप से जरा ज्यादा सुकूनदेह है
यह भी नहीं
पर चाहने लगी हॅू कि जान ले
घड़ी की तरफ देखती हॅू
समय के लिए नहीं
अब यह समय देखना है भी नहीं
स्थिति और बल देखना भी है
खोया तौल रहा है हलवाई
एक कीड़े को लिए दिए
कितना कुछ यूंही हो रहा है
चाहने लगी हॅू कि बता दूं
सायास कोई शब्द नहीं सूझ रहा
जे आए थे, सब अनायास थे
अपने ही अर्थभार से ढलमलाते
चिंता कर रही हॅू अलबत्ता
घबड़ा रही हू कि ऐसे ही बीतेगा आगे
सरियाते बिखेरते अपना ही दिमाग
बेजगह हो गई हॅू
बेवजह नहीं।
अल्पना मिश्र
अल्पना मिश्र दिल्ली वि वि में असोसिएट प्रोफेसर हैं. इनसे alpana.mishra.yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है .

हलवा, कपड़े और सियासत



संदीप मील 


( संवादों
में गुंथी यह कहानी संदीप मील के कहन की एक अच्छी मिसाल है. यह कहानी बिना अतिरिक्त
शोर के स्त्रीवादी कथन के कारण बेमिसाल है. बल्कि काम के जेंडर डिविजन और घ्ररेलू
श्रम के राजनीतिक पाठ तथा पितृसत्ता के महीन रेशों से मुठभेड करती स्त्री को  स्त्री अध्ययन पाठ्यक्रमों में कहानी के माध्यम
से पढाने के लिए भी यह उपयुक्त कहानी है . आज मील का जन्मदिन है , उन्हें
मुबारकवाद  देते हुए पाठकों के लिए यह
पेशकश  )

‘‘अबकी बार, बेगम की सरकार।’’

‘‘रहने दो मियां, लगता है हलवा खाना है।’’

‘‘हलवे का सरकार से क्या ताल्लुक ?’’

‘‘सब जानते हैं कि आपको जब भी हलवे की तलब होती है तो
सारी सियासत मेरे

हवाले कर देते हो।’’

‘‘लेकिन अभी मुल्क को आपकी जरुरत है।’’

‘‘मुल्क हलवा थोड़े ही खाता है ?’’

‘‘देखिये, ये मजाक का वक्त नहीं है। आपको सरकार चलानी पड़ेगी।’’

‘‘आप मेरे कहने से रसोई चलाते हैं ?’’

‘‘अरे, रसोई और सरकार में बहुत फर्क होता है। सरकार चलाना
बड़े सब्र और

जहन का काम होता है ?’’

‘‘और रसोई बड़ी बेसब्री और जाहिलपन का काम होता है, यही ना ?’’

‘‘तुम्हारा गुस्सा भी बेगम…, सोचो, मैं सारा मुल्क तुम्हारे
हवाले कर

रहा हूं और तुम मुझ पर ही
खीज रही हो।’’

‘‘यह तो आप मर्दों की फितरत है कि वे घर और मुल्क को
अपनी अमानत मानते

हैं। अपनी मर्जी से किसी
के भी हवाले कर देंगे।’’

‘‘वाशिंग मशीन ठीक हुई ?’’

‘‘मुल्क के गंदे कपड़े भी धोने हैं क्या ? तभी शायद औरतों के हवाले
कर रहे हो।’’

‘‘तुम हर बात को उल्टी मत लिया करो।’’

‘‘तो बिना मैकेनिक मशीन ठीक कैसे होगी ? आप चार दिन से रोज जा रहे
हैं और

एक मैकेनिक नहीं मिला शहर
में ?’’

‘‘अरे, आजकल शादी-ब्याह का सीजन है ना। सब मैकेनिक व्यस्त
हैं।’’

‘‘जावेद की दुकान में अटेंडेंस रजीस्टर देखकर आये हो ?
’’
‘‘अब जावेद कहां से आ गया बीच में ?’’

‘‘रोज मैकेनिक के बहाने जावेद की दुकान पर ही ताश खेलकर
आ जाते हो। मुझे

सब पता है।’’

‘‘तुम्हारी कसम, दो महीने से ताश के हाथ भी नहीं लगाया।’’

‘‘आज तक किसी मर्द ने औरत की सच्ची कसम नहीं खायी होगी।
सच बात में तो

कसम की जरुरत ही कहां
होती है।’’

‘‘इसका मतलब सारे मर्द झूठ बोलते हैं ?’’

‘‘कम से कम औरतों के सामने तो….।’’

‘‘अब क्या किया जाये ?’’

‘‘मुल्क का, रसोई का, हवले का या फिर आपके

कपड़ों का।’’

‘‘अरे! मुझे तो याद ही नहीं रहा कि चार दिन से

कपड़े
भिगो रखे हैं।’’

‘‘और आपको इमराना की शादी तो याद होगी ?’’

‘‘यह लो! आज ही है इमराना की शादी। मेरे पास एक भी
कपड़ा नहीं बचा है।’’

‘‘एक दिन आप कह रहे थे कि आपको कहीं भी नंगे जाने में
शर्म नहीं आती।’’

‘‘तुम बड़ी बेरहम हो। एक तो मैं मुसिबत में हूं और ताने
भी मार रही हो!’’

‘‘आप सोच रहे होंगे कि मैं आपके कपड़े धो दूं ?’’

‘‘इसमें गलत क्या सोच रहा हूं ? मुझे कपड़े धोने आते ही
कहां हैं ?’’

‘‘जबकि आप सीखने की कोशिश तो लगातार करते रहे हैं।’’

‘‘जब आते ही नहीं तो कोशिश करने से क्या फायदा ?’’

‘‘मुझे भी तो सरकार चलानी नहीं आती, बेवजह की कोशिश क्यों
करुं ?’’

‘‘अब कपड़ों में भी सरकार को ले आयी। इमराना की शादी
में जाना तो मुश्किल

लग रहा है शायद।’’

‘‘मुझे तो नामुमकिन-सा भी लग रहा है शायद।’’

‘‘नामुमकिन क्यों ? मैं जरूर जाऊंगा, नये कपड़े खरीद लूंगा।’’

‘‘आपको खरीददारी बहुत पसंद है, एक सैट मेरे लिये भी खरीद
लीजिये।’’

‘‘हां बेगम, तुम्हारे लिये भी खरीद लेंगे। पैसा दो।’’

‘‘आप अपने लिये खरीदें उसमें से ही कुछ पैसा बचाकर मेरे
लिये खरीद लीजिये।’’

‘‘मेरे पास पैसा कहां है ?’’

‘‘तो फिर आप कपड़े कैसे खरीदेंगे ?’’

‘‘पैसा तो तुम ही दोगी।’’

‘‘मेरे पास भी पैसा नहीं है।’’

‘‘तुम्हें कल रौशनी सिलाई के पैसे देकर गई थी ना !’’

‘‘उसका तो तेल और आटा ले आयी। आपको भी तो तनख्वाह मिली
है परसों।’’

‘‘तुम तो जानती हो बेगम मेरे कितने झंझट हैं। सारी जेब
खाली हो गई।’’

‘‘आप एक पैसा भी कभी घर पर नहीं लाते हो। जुए का शौक भी
पाल लिया क्या ?’’

‘‘तौबा…तौबा….। जुआ तो हमारे खानदान में आजतक किसी
ने नहीं खेला।’’

‘‘आपका खानदान बड़ा इज्जतदार है। वैसे आजकल आपकी कुल
तनख्वाह क्या है ?’’

‘‘ऐसे पूछ रही हो जैसे तुम्हें मालूम ही न हो। पूरे दस
हजार मिल रहे हैं।’’

‘‘मुझे लगता है कि आपके खानदान में सबसे ज्यादा कमा रहे
हो ?’’

‘‘बिल्कुल दुरुस्त फरमाया तुमने। इस पर तुम्हें फख्र
होना चाहिये।’’

‘‘इसी फर्क से तो दुबली हुई जा रही हूं।’’

‘‘मतलब ?’’

‘‘यही कि दस हजार कमाने वाले के पास कपड़े खरीदने के
पैसे भी नहीं हैं।’’

‘‘मजाक मत करो। पैसे दो, कपड़े खरीदने हैं।’’

‘‘मैं सोच रही हूं…..।’’

‘‘बहुत ज्यादा सोचने की जरुरत नहीं है। केवल हजार रुपये
दे दो।’’

‘‘यह नहीं सोच रही हूं। सिलाई बंद करने की सोच रही हूं।’’

‘‘फिर घर कैसे चलेगा ?’’

‘‘आप दस हजार जो कमाते हैं ना!’’

‘‘मेरे दस हजार तो मुझे भी कम पड़ रहे हैं। सिलाई बंद
करने से तो सब चैपट

हो जायेगा।’’

‘‘एक रस्ता और भी है ?’’

‘‘क्या ?’’

‘‘आप भी सिलाई सीख लीजिये। कम कमायेंगे लेकिन आपके दस
हजार से ंज्यादा
बरकत हो जायेगी।’’

‘‘कान खोल के सुन लो बेगम, अभी इतने बूरे दिन नहीं
आये हैं।’’

‘‘इससे भी बूरे आने वाले हैं। मेरे सिलाई बंद करते ही।’’

‘‘सुबह-सुबह यह झंझट क्यों कर रही हो ?’’

‘‘आपने ही तो शुरु किया है।’’

‘‘लेकिन इमराना की शादी में तो जाना ही चाहिये ना ?’’

‘‘जाना तो चाहिये। आप पुराने कपड़े पहनकर क्यों नहीं
चले जाते ?’’

‘‘शादी में पुराने कपड़े कैसे पहनकर जाया जा सकता है
भला। मेरी भी कुछ इज्जत है।’’

‘‘यह बात तो सही है। आपकी इज्जत तो बहुत है लेकिन कपड़े
नहीं हैं।’’

‘‘एक उपाय है मेरे पास।’’

‘‘हम भी सुनें तो जरा।’’

‘‘मैं हलवा बनाने की कोशिश
करता हूं और आप कपड़े धो दीजिये।’’


‘‘यह बिल्कुल सही है। आप जल्दी से हलवा बनाईये, मैं कपड़े धोकर आती हूं।’’


‘‘ठीक है फिर।’’


‘‘जानाब, आप सच में हलवा बहुत अच्छा बनाते हैं।’’


‘‘बेगम, आप से ही सीखा है। आप कपड़े बहुत जल्दी धोते हैं।’’


‘‘मजा आ गया।’’


‘‘बेगम, कपड़े कितनी देर में सूखते हैं ?’’


‘‘धोने के दो घंटे बाद।’’


‘‘यानी कि बारह बजे तक सूख जायेंगे।’’


‘‘हां, अगर आपने अभी धो दिये तो। वैसे मैंने मेरे भी साथ
भिगो दिये हैं।’’

संदीप मील


( संदीप मील युवा कथाकार हैं और स्त्रीकाल के वेब एडिशन के
संपादक मंडल के सद्स्य भी इनसे 09636036561
पर संपर्क किया जा सकता है )

* जब अपने संकल्प के साथ एक निर्भ्रान्त जीवन शुरू किया… *

(भारतीय भाषाओं से दलित कवयित्रियों की कवितायें )
अनुवाद और प्रस्तुति  : फारूक शाह 
एक काम के दौरान भारतीय दलित स्त्री लेखन का संकलन और उसकी
पड़ताल करने का अवसर मिला था. कई कारणों से नारीवादी साहित्य आन्दोलन में दलित –
शोषित तथा हाशिए के स्तर का प्रतिनिधित्व बहुत अल्प रहा है. ऐसी स्थिति में दलित
साहित्य आन्दोलन के अन्तर्गत स्त्री विमर्श का यह जो प्रवाह निर्मित हुआ है वह
अपनी आरंभिक स्थिति से ही उल्लेखनीय संभावनाएं प्रकट करता दिखाई देता है. भारतीय
दलित स्त्री लेखन को देखें तो कुछ बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं. उसमें से
मुख्य यह कि जाति और जेंडर के विमर्श के साथ साथ सामाजिक, सांस्कृतिक, अर्थनीतिक व
राजनीतिक संकुल मुद्दों को ध्यान में रखकर यह विमर्श हाशिये के प्रदेश से आमूलचूल
परिवर्तन की बात ला रहा है. दलित स्त्री के सामने बहुस्तरीय मुश्किलें रही हैं.
जातिवादी पितृसत्तात्मक संरचना ने उसे न तो स्वावलंबन की सुविधाएं दीं और न उस
दिशा में आगे बढ़ने के लिए जरूरी शिक्षा पाने का अवसर दिया. फिर भी आर्थिक पिछड़ेपन
के बावजूद अपनी संघर्शीलता, आन्दोलन सामर्थ्य और दूरदर्शिता के कारण दलित
स्त्रियों ने अनेक क्षेत्रों में सफलता हासिल की है. यह बताने की जरूरत नहीं कि
दलित स्त्री ही सबसे ज्यादा हिंसा, यौनशोषण और आर्थिक शोषण का शिकार बनती रही है.
घरसे लेकर बाहर तक सभी जगह निशाने पर रहती हैं. सिर पर मैला उठाने से लेकर
जमींदारों के खेत, धनपतियों के कारखानें में कमरतोड़ परिश्रम करती वह मुक्ति की अवधारणा
के पाखंड और वास्तविकता को भली भांति पहचानती हैं.
जाति-व्यवस्था या पितृसत्तात्मक संरचना में कामचलाऊ सुधार
करने से समतामूलक समाज का निर्माण संभव नहीं. व्यापक एकता, सशक्त संगठन,
दीर्घकालीन रणनीति और बहुयामी संघर्ष से ही कुछ मार्ग निकल सकता है. इसलिए इस
विमर्श की क्षितिजे मानव मुक्ति के अन्य आंदोलनों के साथ संवाद रचती फैलती हैं. दलित
स्त्री लेखन ने अन्य मुक्ति आंदोलनों के साथ खुद को जोड़कर मुक्ति की अवधारणा का तो
विस्तार बढ़ाया ही है, परिवर्तन के लिए चल रहे समग्र संघर्ष को भी बहुमुखी और सघन
बनाया है. इस प्रक्रिया का लक्ष्य पारंपरिक सत्ता-संरचना के स्वरूप और अंतर्वस्तु
के बदलाव का है. इस दौरान यह पूरा साहित्य प्रवाह प्रचलित रूढ़ मानदंडों और
मान्यताओं से अलग मौलिक भूमि पर रहकर अनिष्ट यथार्थ की अनेक स्तरीय मीमांसा के लिए
प्रतिबद्ध दिखाई देता है. हाशिये के समुदायों, समाजों के यथार्थ की पड़ताल कर
मुक्ति के उपायों की ओर गति करता है. भारतीय भाषाओं में में जो दलित नारी लेखन हो
रहा है वह और दलित, आदिवासी तथा अन्य तमाम उत्पीड़ित और दमित समुदायों की नारी के
प्रश्नों को साथ लेकर समग्र जेंडर के बारे में संघर्ष दर्शाता है. इसलिए मध्य
वर्गीय व उच्च वर्गीय स्त्री समस्याएँ भी उसकी मीमांसा के दायरे में आ जाती हैं.
और मानवता के संकट समान प्रश्न भी उसकी चिंता के केंद्र में रहते हैं. मानव मुक्ति के व्यापक दर्शन की
संभावनाओं की थाह लेने का प्रयत्न इस लेखन में दिखाई देता है.
पड़ताल के समय जो कुछ सामग्री भारतीय भाषाओं से मिली थी
उसमें से कुछ कविताएँ यहाँ पर साझा कर रहे हैं. उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में इन
रचनाओं के भावविश्व और अंतर्वस्तु को देखा जा सकता हैं :
*जैसी हूँ वैसी ही 
(तेलुगु कविता)
   जाजुला गौरी 
चतुर्वर्ण व्यवस्था ने
धकेल दिया मुझे
छोर पर
बना दिया मुझे पंचमा
कर्म के सिद्धांत ने मुझे
दिया अछूतपन
और निराधार होने की दशा

मेरे भोलेपन से
खेल खेलता ब्राह्मणवाद
निरंतर मुझे
भ्रष्ट करता रहा
उसकी आज्ञा मानकर
क्षत्रियों ने खींचा मुझे
पंचो की चौपाल तक
खदेड़ दिया मुझे
मेरे गाँव से दूर
इन दोनों के वारिस
वैश्यवाद ने भी
खाने का नसीब
न पाने वाली मुझको
धकेल दिया ऐसे काम की और
जहाँ काली मजदूरी के बदले में
दिया जाता हो
निरा छल-कपट
उन्होंने तराजू में तौलकर
कर दिया मुझे चूर चूर

पंचम वर्ण चिपका कर
निरंतर बेगारी करवा कर
मेरे लहू की

आखरी बूंद तक पी कर
शूद्रता ने भी किया
मेरा धार्मिक बहिष्कार
और मेरा पंचम भाई कहता है कि
मेरी बची-कुची हड्डियों का
वह कर देगा चूरा

एकता का मंत्र बहुत दिनों से
मेरा पीछा कर रहा है
इस पीडा को अब

ज्यादा सहन नहीं कर सकूंगी
समय आ गया है
मेरे लिए मेरी जगह ढूँढ़ने का
ठगी गई हूँ
मानवता विहीन मानवजात के
सहअस्तित्व से
कुचली गई हूँ कल, आज और
आने वाले कल के बीच
अब मैं जैसी हूँ
वैसी ही खुद रक्षण करूँगी

( अनुवाद-सहयोग : जाजुला गौरी )

*बचपन
   (पंजाबी कविता)
         सरोज  
एक सांवली मटमैली नदी
मेरे मन में तेजी से
बहने लगती
रोज, सबसे पहले जाग जाती
बिना मुँह धोये उठाने जाती गोबर
उपले बनाती मैदान में
अपने बचपन जैसी लम्बी चुनरी को
सिर पर संभालती
उपलों पर उँगलियों से उकेरती जाती चित्र
घर आकर धोती जूठे बर्तन
बचीकूची चाय की चुसकियाँ भरती
और घिसा हुआ यूनिफार्म पहन
चली जाती स्कूल
सबसे पहले दिखाती होमवर्क
प्रार्थना सभा में
पीछे खिसकती रहती
अपने घिसे हुए यूनिफार्म को
छुपाने की कोशिश करती
एक सांवली मटमैली नदी
सुबह सबसे पहले जाग जाती
सबसे पहले स्कूल जाती
सबसे पहले जवाब देती
प्रार्थना सभा में पीछे खिसकती रहती
सुबह सुबह, हर रोज सबके सामने
( अनुवाद-सहयोग : गुरमीत कडियालवी )
*अग्नि 
(उड़िया कविता) 
         प्रतिभा
भोई
 
जब मैंने
अपने संकल्प के साथ
एक निर्भ्रान्त जीवन
शुरू किया
तब कहीं कोई एक कोने से
आग सुलग उठी

जब मैंने सिर उठाकर
सीना तानकर खड़े होकर
गाँव के रस्तों पर चलना शुरू किया
तब कहीं कोई कोने में
धधकता हुआ बारूद

इकट्‌ठा होने लगा

जब मैंने मुँह खोलकर
जरा सी उँची आवाज़ में
शब्द का उच्चारण किया तो
कहीं किसी कोने में
वज्राघात हुआ

दूसरे ने मेरी पीठ पर

घूंसा मारा
जवाब में मैंने भी हाथ उठाया तो
कहीं किसी कोने में

किसी की छाती में
क्रोध का अग्नि सुलगने लगा

याद रहे,
मैं अछूत हूँ
इसका मतलब यह नहीं कि
मेरे हृदय में कई सदियों से छुपा हुआ
होने का अहसास भी मर गया है
या फिर मैं हो गई हूँ
बिलकुल प्रतिक्रिया शून्य

(* अनुवाद–सहयोग : बासुदेव सुनानी )

भगाणा की पीडिताओं के संघर्ष में स्त्रियां
* सवर्ण भगवान 
    प्रियंका कल्पित

पूरा समूह
मुझे फेँक गया
कूड़े करकट मेँ
मुंह बंद
और हाथ-पांव भी बंधे हुए
गोबर के कीचड़ मेँ पड़ी हूं
लथपथ

मुझसे टकराने वाले ने
पीछे मुड़कर देखा
मेरे हाथ मेँ झाडू
और गांव के बीचोबीच
मुझ पर अत्याचार टूट पड़ा

मेरे भीतर प्रश्न
मंडराने लगा
लोग तो ठीक
सामने मंदिर मेँ बैठे
भगवान ने भी
मुझे क्योँ न बचायी ?
क्या उसके भी आड़े आया होगा
मेरा अछूतपन ?

इसीलिए तो
दीवार की दरारों से
अनुकंपा का हाथ
आगे बढ़ाने की बजाए
उसकी पत्थर की आंखे
हो गई थी एकदम
अंगारे-सी लाल
और देख रही थी मेरे सामने !

*बरतन वाली स्त्री
   (पंजाबी कविता)
चरनजोत कौरजोत’

वह स्त्री
जीवन के आखरी पडाव पर है
बूढ़ापे की लकड़ी से
कुछ टटोलती
ढ़ूंढ़ रही है कुछ

वह स्त्री
जिन्दगी की सांझ ढलते ही
दो टुकडे रोटी के लिए
धुंधली आँखों से
उजाले को ढूँढ़ रही है

पत्थर जैसे हाथ से
लोगों के जूठे बरतन साफ करने की
पीड़ा सहन करती
मुरझाए चहरे वाली
वटवृक्ष सी टेढ़ी मेढ़ी
अवमानना पाती आ रही
तिरस्कृत
अकेली अकेली बुदबुदाती बातें करती
वह दूसरी कोई नहीं
मेरे गाँव की दलित स्त्री है

          (अनुवाद-सहयोग : गुरमीत कडियालवी)
*साफ-सफाई 
(तेलुगु कविता) 

      जूपाका सुभद्रा 
जलते हैं मेरे पाँव के तलुए
सूरज की जलती धूप में
खाली मटका लेकर
जब पानी भरने निकलती हूँ
जरा खडे रहकर
मुझे मेरे संघर्ष की बात कहने दो

मुँह अंधेरे जागती हूँ
और जाती हूँ जमींदार के घर
आंगन साफ करूँ और कूड़ा उठाऊँ
ढोर को पीने का पानी
टंकी में भरूँ
बाड़े से गोबर और गंदगी हटाऊँ
और सबकुछ सिर पर उठाकर
फेंक आऊँ दूर

मेरे अपने घर तो काम करने का
वक्त ही न मिले
मजदूरी के बदले में
मिलता बासी खाना

ठूंठे जैसा झाडू और छाज पकड़
मेरी कच्ची-पक्की झोंपड़ी बुहारू
तभी दहलीज पर ढल पडूँ
पटेल मेरे पीछे पड़ा है

ऊँची साँस, जैसे तैसे कर
धूल में बिखरे अन्न को इकट्ठा करूँ
उसे झाड़झपट कूटने लगूँ
फिर भी एक मुट्ठी भी

इकट्ठा ना हो पाता
ढेर एक बालू छानकर
मिट्टी से अलग करूँ
फिर भी दानों का नाप
न निकाल सकूँ
बताओ, कब पूरे होगे
जिन्दगी के ऐसे बंधन ?
          (डॉ. के. पुरुषोत्तम के
इंग्लिश अनुवाद के आधार पर)
*टूटी हुई झोंपड़ी का गीत 
( कन्नड़ कविता ) 
          अनुसूया कांबले

मेरी कविताएँ –
अंधेरे में लपलपाती ज्वालाएँ,
टूटी हुई झोंपड़ी के गीत,
झूठे उसूल बोने वालों के सामने
फेंके गए सचेत प्रश्न.
मेरी कविताएँ –
उजले रास्ते के मुसाफिर,
गाँव को सजाने वालों के आत्मकथ्य,
फेंके गए जूठे फलों जैसे इन्सानों को
ढूँढती रहती काली चींटियाँ.
मेरी कविताएँ –
खीँच लेने के बाद भी
उग निकलती घास,
रात-दिन कमरतोड़ मेहनत करके –
थके लोगों के पसीने की बूंदें,
उठा कर ले आती रोज रोज
भूख की क्रूरता के बीच
मेरी कविताएँ –
जूझ रहे लोगों की पदचांप.
पवित्रता के बद्ध पंखों को
तोड़ने वाली,
तथाकथित पाखंडी संस्कृति पर
सवालिया निशान लगाने वाली,
छाती का दूध पीकर पलें
फिर भी पल्लू को चुराने वाले जो हैं
उनके सामने खिले गुलमहोर.
मेरी कविताएँ –
सुबह-सुबह मुँह अंधेरे सुगंधित फूल,
खिलखिलाते बच्चों के
नाजुक कोमल मार्ग,
मठ, मंदिर, गिरिजाघरों में जो
रक्त के छींटे हैं
उन्हें पोंछने के लिए आए
श्वेत कबूतर.
( अनुवाद-सहयोग : महादेवी कणवी )
*तृषा
दक्षा दामोदरा
पथ के उपेक्षित पत्थर की तरह
युगोँ से ठुकराये गए मनुष्यो की
एषणाओँ को पुकारना है
देना चाहती हैँ वे आवाज
लेकिन उन्हेँ याद नहीँ रहा है नाम
कण्ठ मेँ जम गए हैँ
न जाने कितने ही शोष
न जाने कितने ही जन्मोँ से !
रक्त की प्रत्येक बूंद
बह निकलती है आंसूओँ के साथ
फिर भी  होता नहीँ उनका शमन
सांस भी यहां दमती  है
पांव मेँ सुप्त पड़े तेजवंत तोखार की
हेषाओँ को
दौड़ पड़ना है… ज्वाल की जलगति से
आगे बढ़ जाना है
उन्हेँ धंसती हुई बाढ़ की तरह
पर खो गया है वह गांव
एकदम विवश
हैँ
कहां जाए?
अंतरपट का हरेक
तार
कोराकट्ट
विदीर्ण
होता जाए
गात्र को
चीरती निकलती व्याकुल तृषा
तृषा तृषा
बरसती  धुआंधार
युगोँ से
ठुकराये गए मनुष्योँ के
दोनोँ तट
पर
तृषा बहती
जाती है
*स्त्रीवादी
साहित्य पर सेमिनार
    (मलयालम् कविता)
         वलसला बेबी
स्त्रियों के
जलते प्रश्न
उन तितलियों
जैसे
जो सुलगकर मरती
हैं
तपती कड़ाही से
आग में
एजेण्डे पर
पहला प्रश्न :
अब नहीं चाहिए
घर घर में
नाईट गाउन
सिर्फ बरमूड़ा
!
एजेण्डे पर
दूसरा प्रश्न :
अब नहीं चाहिए
लम्बे बाल
सबके लिए बस
बॉयकट
एजेण्डा पर
तीसरा प्रश्न :
अब नहीं चाहिए
रसोईघर
धिक्कार हो
ऐसी क्षुल्लक चीजों पर
एजेण्डे पर
चौथा, पाँचवाँ
छट्ठा, सातवाँ… अठारहवाँ
अठारहवें
प्रश्न पर हो गए सांसद
आरक्षण द्वारा
!
कम से कम तीस
महनती व्यक्ति
चाहिए
हर सुबह
निराशा से भरी
है, आपको पता है ?
शांत आन्दोलन
चलाएँ
भारत को बचाएँ
यहाँ आओ प्रिय
जन,
बाय बाय
कोमरेड !
आप अपनी चर्चा
जारी रखें
आओ पिछली कतार
में
आप कौन सा प्रश्न
लेकर आए हैं ?
‘फटेहाल झोंपड़ियों और
दो पैसे का प्रश्न
घूरते फ्लेटों
ने घेर लिया है
नहीं टोइलेट
जैसी सुविधाएँ.’
‘अब
यह सब भूल जाओ
!’
    ( अजय शेखर के
इंग्लिश अनुवाद के आधार पर )
*उनसे पूछें 
   (बांग्ला कविता) 
        स्मृतिकना होवलादर  

भूमंडलीकरण के इस दौर में
दलित, शोषित और उत्पीड़ितों को
कई सारी चीज़े आपस में बाँटनी होगी,
चलो, हम उनसे पूछें…
भारतीय लोगों की पहचान क्या है ?
किसने लिखा है इतिहास अपने प्रेम से
और पाई है आज़ादी,
किसलिए वे सब बिना घरबार के भटक रहे हैं ?
चलो, हम उनसे पूछें…
रंगबिरंगी कई सारे झंडे
फहरा रहे हैं ऊँचे और ऊँचे,
शोषित कुचले लोगों ने
अपने प्राणों की आहुति दी,
पर बदले में क्या मिला ?
उनकी अपनी जमीन जोतने का अधिकार
उन्हें खोना पड़ा,
शोषक और शोषित के बीच का संघर्ष
अनवरत चलता ही आया है,
रहते हैं ग़रीब आखिर तो ग़रीब ही.
हमने आज़ादी पाई
हमारा रक्त अर्पण करके
पर यह आज़ादी है कि ग़ुलामी ?
चलो, हम उनसे पूछें…

( डॉ. जयदीप सारंगी के इंग्लिश अनुवाद के आधार पर )

फारूक शाह
फारूक शाह से  farook.shah.75@facebook.com पर संपर्क किया जा सकता है .

महिला मताधिकार के राजनीतिक संदेश

 
संजीव चंदन
 
अन्य देशों की तुलना में भारतीय महिलाएं इस मामले में
थोड़ी सुविधाजनक स्थिति में रही हैं कि उन्हें आजादी के बाद से ही
पुरुषों के साथ समान मताधिकार और चुनाव में खड़े होने का अधिकार प्राप्त हो गया
था। यही नहीं, देश में
जब 1935 में सीमित मताधिकार का प्रावधान हुआ, तो पुरुषों के समान ही यह
अधिकार स्त्रियों को भी हासिल हुआ था। दुनिया के दूसरे देशों की तरह उन्हें इसके
लिए लंबा संघर्ष भी नहीं करने पड़ा, जबकि मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट के
नेतृत्व में 1792 में स्त्रियों के लिए मताधिकार की पहली बार उठी मांग के बाद से
पश्चिमी देशों में इसके लिए महिलाओं ने सतत संघर्ष किया और इसे हासिल करने में
उन्हें सफलता बीसवीं शताब्दी में ही जाकर मिली। कई देशों में आज भी महिलाएं इस
अधिकार से वंचित हैं।
देश के पहले चुनाव में मतदान करतीं महिलायें
ऐसा भी नहीं है कि समान मताधिकार भारतीय महिलाओं को थाली में
सजा कर दिया जाने वाला उपहार था। जब भारत के लिए नया संविधान बनने के पूर्व
ब्रिटिश भारत के तत्कालीन सचिव इएस मांटेग्यु 1917 में यहां दौरे पर आए तो 1 दिसंबर 1917 को पांच महिलाओं का एक
प्रतिनिधिमंडल उनसे तत्कालीन मद्रास में मिला और महिलाओं के लिए मताधिकार की मांग
रखी। मांटेग्यु-चेम्सफोर्ड के सुझावों में हालांकि मताधिकार को और विस्तृत करने का
सुझाव भी शामिल था लेकिन इसमें महिलाओं का कोई उल्लेख नहीं था। 1918 में कांग्रेस और मुसलिम लीग ने
भी महिलाओं के मताधिकार का समर्थन किया। 1919 में जब ‘द गवर्नमेंट आॅफ इंडिया बिल’ पेश हुआ तो एनी बेसेंट, सरोजनी नायडू और हिराबाई ने
महिलाओं के राजनीतिक अधिकार के पक्ष में अपने तथ्य रखे लेकिन इस मसले को चुनी गई
सरकारों के ऊपर छोड़ दिया गया।
त्रावणकोर और मद्रास ने क्रमश: 1920 और 1921 में सीमित मताधिकार (पढ़ी-लिखी) महिलाओं
को दिए, जिसके
बाद दूसरे राज्यों में भी यह सिलसिला शुरूहुआ। 1931-32 में लॉर्ड लोथियन समिति ने
महिलाओं के मताधिकार के लिए जो दो आधार बनाए, उनमें एक बेहद भेदमूलक था। एक
तो किसी भी भाषा में पढ़-लिख सकने वाली महिलाओं को ही मताधिकार प्रस्तावित किया गया, इसके अलावा उन्हें किसी की
पत्नी होना भी अनिवार्य कर दिया गया, यानी विधवाएं या किसी कारण से
विवाह न करने वाली महिलाएं इस श्रेणी से बाहर रखी गर्इं।
महिलाओं को प्राप्त राजनीतिक
अधिकार
का असर
सोलहवीं लोकसभा के चुनावों में खूब दिखा। इस बार जहां चुनाव आयोग ने मतदाता जागरण
के संदेशों में महिला मतदाताओं को लक्षित कर अपने अभियान चलाए, वहीं लगभग सभी राजनीतिक
पार्टियों ने महिलाओं की सुरक्षा सहित उनके मुद््दों को अपने चुनाव प्रचार में
अहमियत दी। आयोग ने महिला ब्रांड अम्बेस्डरों के जरिये महिला मतदाताओं की अधिकतम
भागीदारी का अभियान चलाया। 2014 के लोकसभा चुनावों के पूर्व दिल्ली के निर्भया प्रकरण ने
महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को राजनीति के केंद्र में ला दिया।
दिल्ली के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय का बड़ा कारण
महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर पैदा आक्रोश था, वहीं यही आक्रोश आम आदमी पार्टी
के उभार के दो प्रमुख कारकों में से एक था। एक, भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान, और दूसरे निर्भया बलात्कार कांड
के खिलाफ चले आंदोलन में सक्रियता ने आम आदमी पार्टी के प्रति चमत्कारिक गोलबंदी
कराई। दिल्ली में महिलाओं के मुद्दे से तख्त बदलते देख राजनीतिक पार्टियों ने
आगामी चुनावों में महिलाओं की भूमिका का अनुमान लगा लिया। अन्यथा कोई कारण नहीं है
कि पिछली लोकसभा के दौरान महिला आरक्षण विधेयक को पारित न होने देने में कभी
प्रत्यक्ष कभी परोक्ष रूप से लगी रही पार्टियों को महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और बराबरी के मुद्दे
जरूरी लगने लगे।
पहला आमचुनाव
चुनाव जैसे-जैसे मतदान के विभिन्न चरणों से गुजरने लगा, वैसे-वैसे अलग-अलग कारणों से
चर्चा के केंद्र में महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य होती गई। हालांकि इस क्रम में
यह भी हुआ कि पितृसत्तात्मक समाज के चरित्र के अनुरूप विरोधाभास और आक्रामकता बढ़ती
गई। मुलायम सिंह ने बलात्कारियों के प्रति नरमी भरे बयान दे डाले, हालांकि उनकी पार्टी इस बयान पर
बगलें झांकती दिखी। धीरे-धीरे नेताओं के ‘अवैध’ रिश्ते खंगाले जाने लगे।
नरेंद्र मोदी तो पहले से ही एक लड़की के पीछे पूरे सरकारी तंत्र के साथ जासूसी
प्रकरण में घिरे थे, उनकी
पार्टी को दिग्विजय सिंह और एक विवाहित महिला पत्रकार के रिश्ते में कीचड़ उछालू
आनंद आने लगा। अभी वे जश्न मना ही रहे थे कि खबर आई कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल
बिहारी वाजपेयी के ऐसे ही ‘स्नेह
संबंध’ में बंधी
एक विवाहित महिला ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
हद तो तब हो गई जब समाजवादी पार्टी के कई नेता मायावती पर
फिकरे कसने लगे। सोशल मीडिया में इन नेताओं के प्रशंसकों ने सारी सीमाएं लांघ दीं, ट्रिक-फोटोग्राफी के जरिए और
अपनी महिला-विरोधी टिप्पणियों। इस तरह पितृसत्तात्मक समाज के सारे अंतर्विरोध
सामने आते गए, महिलाओं
की सुरक्षा को लेकर वादों की झड़ी और उनके अस्तित्व के प्रति मर्दाना नकार एक साथ
प्रकट हुए।
अंतर्विरोध सिर्फ वक्तव्यों और बयानबाजियों में नहीं है, एक दूसरे से बढ़-चढ़ कर महिलाओं
की हितैषी होने का दम भरने वाली पार्टियों के टिकट वितरण में भी है। 2009 में जहां महिला उम्मीदवारों की
संख्या 6.89 फीसद थी, वहीं 2014 में उसमें कोई गुणात्मक फर्क
नहीं आया है। चार चरणों तक आए आंकड़ों के अनुसार 7.83 फीसदमहिला उम्मीदवार ही चुनाव मैदान में थीं। इस आंकड़े में निर्दलीय महिला
उम्मीदवार और अपने पति या पिता की विरासत संभालने के लिए या उसका हवाला देकर चुनाव
मैदान में उतरीं उम्मीदवार भी शामिल हैं। इस चुनाव में स्त्रियों की प्राथमिकताओं
और उनकी राजनीतिक पसंद जानने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने बिहार के अलग-अलग
संसदीय क्षेत्रों की अलग-अलग जाति-वर्ग की महिला मतदाताओं से चुनाव के पूर्व और
चुनाव के बाद बातचीत की।

बिहार उन राज्यों में है जो 1920 के दशक में महिलाओं को दूसरे प्रदेशों के
द्वारा दिए जाने वाले मताधिकार के प्रति अड़ियल रुख अपनाता रहा था और 1929 में कई राज्यों के द्वारा पहल
किए जाने के बाद बिहार विधानसभा ने इसे पारित किया था। वहीं हाल के दिनों में
महिला अधिकारों के लिए बिहार सबसे अव्वल पहल लेता हुआ दिख रहा है। 2005 में देश में यह पहला राज्य बना, जिसने स्थानीय निकायों में
महिलाओं के लिए पचास फीसद आरक्षण दिया। लड़कियों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित
करने के मकसद से उन्हें साइकिल दिए जाने के कार्यक्रम को बिहार के मुख्यमंत्री
अपने शासन की क्रांतिकारी पहल बताते हैं। इस बदलाव के माहौल में बिहार की महिला
मतदाताओं का मन जानना काफी महत्त्वपूर्ण रहा। देश के दूसरे हिस्सों की महिला
मतदाताओं का रुझान भी कमोबेश इससे समझा जा सकता है, अलबत्ता स्थानीय परिवेश और
स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हो सकता है यह रुझान बदले हुए स्वरूप में हो।

हालिया चुनावों में मतदान करती महिलायें
मतदान के आखिरी चरण की ओर बढ़ते हुए आंकड़े बता रहे हैं कि बिहार में महिलाओं ने मतदान में
बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है, कुछ चरणों में तो उनकी भागीदारी पुरुषों की तुलना में काफी बेहतर
रही। विभिन्न संसदीय क्षेत्रों की महिला मतदाताओं से मिलते हुए चुनावी लहर, चुनावी मुद््दों और
मतदान के समीकरणों के कई ऐसे सच सामने आते दिखे, जो चुनावी सर्वेक्षणों या टीवी चैनलों
के कैमरों से ओझल रहते हैं। हालांकि सात मई को एक अजीब घटना भी घटी। उजियारपुर के
एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी पर गोली चला दी, महज इसलिए कि उसने पति की पसंदीदा
पार्टी के बजाय किसी और दल के उम्मीदवार को वोट दिया था।
सूबे की राजधानी के एक प्रतिष्ठित
कॉलेज में
पहली मुलाकात में लड़कियों ने एकबारगी
कहा कि उन्होंने नरेंद्र मोदी की खातिर वोट दिया है, यानी उनकी पार्टी के उम्मीदवार को।
ठीक वैसे ही हाजीपुर, जहां सात मई को मतदान हुआ, के एक दलित युवा मतदाता ने कहा कि
मोदी एक बेहतर प्रधानमंत्री हो सकते हैं। लड़कियों से जब जाति और आरक्षण पर उनकी
राय पूछी गई तो स्पष्ट विभाजन रेखा दिखी। गुजरात के दंगों और उनके मद्देनदर
मुख्यमंत्री के उत्तरदायित्व पर भी मतांतर सामने आए और जल्द ही साफ हो गया कि उन
लड़कियों ने वोट देते समय अपनी जाति और धार्मिक पहचान को ध्यान में रखा था। ऐसा
नहीं होता तो नीतीश कुमार की सरकार के द्वारा किए गए विकास-कार्य कुर्मी-कोयरी और
महादलित लड़कियों के अलावा दूसरी लड़कियों को भी उल्लेखनीय लगते।  कॉलेज में जब इन जातियों की लड़कियां मिलीं तो उन्होंने बताया कि
सत्रह अप्रैल को उन्होंने तीर-छाप (जद-यू) को वोट दिया है और उन्होंने उसका कारण
बताया नीतीश सरकार के द्वारा लड़कियों की बेहतरी, उनकी शिक्षा के लिए उठाए गए कदम या
विभिन्न नौकरियों में लड़कियों के लिए आरक्षण का प्रावधान। संसद में तैंतीस
महिला-आरक्षण की लड़ाई लड़तीं वृंदा करात या कविता कृष्णन को वे नहीं जानतीं, मगर उन्हें यह पता
है कि स्थानीय निकायों में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण देने वाला बिहार पहला
राज्य बना है, जिसे संभव किया है नीतीश कुमार ने।
 जल्द ही धर्म और जाति के पूर्वग्रहों से परे बताई जाती रही लहर या एक नेता की लोकप्रियता का मिथ टूट गया, जो संभव हो पाया धैर्यपूर्वक
उन लड़कियों से बातचीत करने पर। यह सब आंकड़ों और कथित वस्तुनिष्ठ प्रश्नों से संभव
नहीं था। ठीक वैसे ही हाजीपुर में दलित युवा के साथ उसके परिवार और जाति-बंधुओं के
पास पहुंचते ही, उसकी व्याख्या बदल गई। हालांकि सात मई को उसने राजग और लोक जनशक्ति
पार्टी के नेता रामविलास पासवान के  पक्ष में वोट दिया,लेकिन उसने स्पष्ट
कर दिया कि अगर पासवान राजग में न होते तो भी वह उन्हें ही वोट देता, यानी नरेंद्र मोदी
के प्रति दिखते उसके आकर्षण की हकीकत एक झटके में ही सामने आ गई। दरअसल, युवाओं और महिलाओं
के मत किसी अलग एजेंडे से संचालित नहीं दिखे, जिसके दावे किए जा रहे हैं। महिला
मतों की पहचान की इस कवायद से आए तथ्य चुनावी सर्वेक्षकों के लिए भी विचारणीय हैं, जो आंकड़ों और कथित
वस्तुनिष्ठ सवालों से ‘लहर’ तय करते हैं।
                                                 महिला
मतों का निर्धारण

यह जरूर है कि महिलाओं की सुरक्षा सभी लडकियों , महिलाओं के लिए अहम
मुद्दा है , चाहे वह जे डी वीमेंस कालेज की लडकियां हों या मसौढी और हाजीपुर की
महिलायें. लेकिन जब सुरक्षा और महिलाओं के सम्मान के वैसे मामले सामने आते है,
जहां उनके प्रिय नेताओं पर सवाल उठते हैं, वे पुरुषों की तरह ही बचाव के तर्क के
साथ उपस्थित होती हैं.  जे डी वीमेंस कालेज
में एम ए अंग्रेजी  की छात्रा और मोदी की
भक्त कंचन युवा लडकी की जासूसी के मामले में मोदी की सरकार  के इस कृत्य का लचर बचाव करती हैं, जिससे उसकी
ही साथी समरीन असहमत होती है.
इससे  अलग कोई दृश्य मसौढी के ‘घोरअउआं’ गांव की खास जाति की महिला मतदाताओं के मतों का नहीं
है, जिन्होंने 17 मई को पाटलीपुत्र संसदीय क्षेत्र के लिए मतदान किया. उनकी ही
जाति के अभियुक्तों ने उस गांव में होली के दिन एक मंदबुद्धि दलित लडकी से सामूहिक
बलात्कार किया. इस गांव में वर्चस्व वाली इस जाति की महिलाओं ने इस आधार पर वोट
नहीं किया कि पीडिता के पक्ष में कौन सी पार्टी
या कौन से नेता सामने नहीं आये और कौन से आये. जबकि नेताओं का व्यवहार अपने
मतदाताओं के जातीय पह्चान से ही तय हए . भाकपा माले और उसके महिला संगठन ‘एपवा’ ने
दवाब बनाया, प्रदर्शन किये तो  बलात्कारी पकडे गये थे . पीडिता से  मिलने माले के उम्मीदवार रामेश्वर प्रसाद के
अलावा  सिर्फ लालू यादव और उनकी बेटी  तथा राजद उम्मीदवार मीसा भारती ही उसके घर जा
पाये तथा  महिलाओं की सुरक्षा का आक्रामक प्रचार करने वाले नरेंद्र मोदी की पार्टी के
उम्मीदवार रामकृपाल यादव शायद  यह समझ नहीं
पाये   कि वे एन डी ए में शामिल  रामविलास पासवान की जाति की पीडित लड्की से जाकर
मिलें या गांव के दूसरे दबंगों का वोट हासिल करने के लिए अनुपस्थित रहें. यही हाल
क्षेत्र के वर्तमान सांसद रंजन यादव की रही, उनकी पार्टी के आधार वोट बैंक
‘कुर्मी’ जाति से ताल्लुक रखते हैं पकडे गये आरोपी. यदि महिला की सुरक्षा जातीय पहचान पर हावी होती तो इस
गांव की महिलाओं के वोट आरोपियों के खिलाफ सक्रिय माले के उम्मीदवार को जाने चाहिए
थे या मीसा भारती को , जो खुद भी महिला हैं, और चलकर पीडिता के घर पहुंची थीं.
हाजीपुर में हथीसारगंज में पासवान जाति की महिलायें अपने घरों में और इलाके में शौचालय न होने की
समस्या से जूझ रही हैं, इनके घरों में बिजली भी नहीं है. उनकी ही जाति के नगर
पार्षद ने जब तक इलाके में कुछ  चापानल
नहीं लगवाये थे , तब तक पानी भी उनके लिए बडी समस्या था , लेकिन पिछ्ले 35 सालों
में पिछला 5 साल छोडकर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे स्वजातीय रामविलास पासवान
के लिए उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता जताई. 2009 में पासवानों के लग़भग 66 हजार वोट कट
गये थे, जिसके कारण पासवान 37 हजार मतों से हार गये थे. आस –पास में जंगलों के
अभाव और अपने दैनिक कर्म की समस्या से जूझ रही हथीसारगंज की महिलाओं के लिए उनकी
दैनंदिन की पीडा के ऊपर अपने घरों के मर्दों की तरह जातीय अस्मिता का सवाल हावी हो
गया है. भागलपुर और पटना सिटी की महिलाओं के लिए भी सुरक्षा अहम मसला जरूर है,
लेकिन उनके जेंडर पहचान से ज्यादा धार्मिक पहचान के आधार पर . 1992 के दंगों को याद करते
हुए शिक्षिका बिल्किस बानो बताती हैं कि कैसे पटना सिटी के उनके इलाके ‘नून का
चौराहा’ के बच्चे , जो उनकी आंखों के
सामने बडे हुए थे अपने पडोसी मुसलमानों के लिए कातिल हो गये थे. वे
कहती हैं, ‘ तब हमारी लैंगिक पहचान से ज्यादा धार्मिक पहचान असुरक्षा के कारण बने
थे. किसी भी दंगे में महिलाओं पर बलात्कार उसकी लैगिक पहचान से ज्याद उसके धार्मिक
पह्चान के कारण अंजाम दिये जाते हैं.’
 
 

( संजीव चंदन स्त्रीकाल के संपादक हैं . इनसे 08130284314 पर संपर्क किया जा सकता  है .)

साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी

जयश्री रॉय
( जय श्री राय हिन्दी कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण उपस्थिति हैं. साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी

जयश्री राय

नामक यह आलेख इन्होंने  स्त्रीकाल , गुलबर्गा वि वि , गुलबर्गा और भारतीय भाषा परिषद केसंयुक्त तत्वावधान में मार्च में आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत किया था. जयश्री से उनके मोबाइल न : 9822581137 पर संपर्क किया जा सकता है )

 
स्त्रीलेखन एक बहुत बड़ा विषय है। इसलिए कहानी
में विशेष रुचि रखने के कारण मैं कथा साहित्य, खास कर अपनी पीढ़ी की
कुछ कहानियों के हवाले से
ही अपनी बात कहूँगी।
साहित्य
में स्त्रि
यों की भागीदारी
और दावेदारी पर अपनी बात की शुरुआत मैं प्रख्यात स्त्रीवादी लेखिका
प्रभा खेतान के एक उद्धरण से करना चाहती हूँ, जिसे मैंने उनकी
पुस्तक ‘उपनिवेश में स्त्री’ से
लिया
है। वे कहती हैं –

ऐसा नहीं कि स्त्री-लेखन में अंतर्निहित खामोशी

पहचानी नहीं गई है। यह एक ऐसी खामोशी है जो स्त्री के लेखन
में शुरू से आखिर तक छायी रहती है। उसका बहुत कुछ अनकहा रह जाता है। स्त्री का यह
अनकहा जगत उसकी अज्ञानता का सूचक नहीं। बल्कि मुझे तो
लगता है कि कुछ क्षेत्रों में वह जान-बूझकर खामोश रहती है। स्त्री भली-भांति जानती
है कि पितृसत्ता की दमनकारी शक्ति उसे कितनी छूट दे सकती है, कितनी नहीं। सदियों से उत्पीड़ित होती
हुई
स्त्री साहित्य-जगत में भी कुंठित है। वह पुरुषों की पैंतरेबाजी से आतंकित है, संपादक मण्डल की लाल स्याही के
सामने
असुरक्षा और हीनता के बोध से ग्रसित है। आज भी तो पुरुष संपादक और पुरुष आलोचक लेखिकाओं
से कहता है कि तुम यह लिख सकती हो और यह नहीं। उनका मसीहाई रवैया हर कहीं हावी है।“
प्रभा
खेतान की यह पुस्तक
ग्यारह वर्ष पूर्व यानी 2013 में
प्रकाशित हुई थी। यह लेख उससे कुछ और पहले ही लिखा गया हो। तेरह वर्ष के फासले के बाद
आज जब हम इन पंक्तियों के आलोक में स्त्री लेखन के वर्तमान स्वरूप को देखते हैं तो
लगता है परिदृश्य में बहुत कुछ बदला है। स्त्री अंतर्जगत के उस अनकहे
का कोई न कोई हिस्सा
आज हर रोज जाहिर हो रहा है। आज लेखिकायेँ
पुरुषों
की उन पैंतरेबाजियों को न सिर्फ पहचान रही हैं, बल्कि उसका एक रचनात्मक प्रतिपक्ष भी
रच रही हैं। हाँ, स्त्री
लेखन के इस नए तेवर को लेकर आलोचना
का रवैया आज भी बहुत सकारात्मक
नहीं
हो
पाया है। स्त्री आलोचकों की कमी और परिदृश्य में
मौजूद
कुछ
स्त्री
आलोचकों
का उसी पुरुषवादी दृष्टि से
अनुकूलित हो जाना इसकी बड़ी वजहें हैं। मौजूदा
हालात
में यदि हम प्रभा खेतान की बातों पर
गौर करें तो उसमें कहीं
न कहीं भविष्य के स्त्री लेखन का एजेंडा जरूर
दिखाई पड़ेगा, जिससे गुजरकर
आज के लेखन में स्त्रियों की भागीदारी और
दावेदारी दोनों को समझा जा सकता है।
मेरी
दृष्टि में साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी

का मतलब सिर्फ लिखते रहना और दावेदारी का मतलब उस लिखे पर किसी की अनुकूल टिप्पणी
के लिए किसी संपादक-समीक्षक से गुहार लगाना भर नहीं है। बल्कि मेरे लिए स्त्री
की रचनात्मक भागीदारी का मतलब अपने उन उपेक्षित और
अनकहे सच को मुख्यधारा में प्रकट कर खुद के लिए सम्मान और बराबरी का एक ऐसा दर्जा
हासिल करना है जहां स्त्रियों को एक दोयम दर्जे का लिंग नहीं बल्कि एक मनुष्य का
दर्जा
प्राप्त हो। मीरा,
महादेवी से लेकर कृष्णा सोबती,
मन्नू भण्डारी,
उषा प्रियंवदा,
मृदुला गर्ग,
ममता कालिया,
चित्रा मुद्गल,
रमणिका गुप्ता, नासिरा
शर्मा, प्रभा खेतान, अर्चना वर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, गीतांजली श्री और जया जादवानी तक हिन्दी
में स्त्री रचानाकारों की एक लंबी शृंखला है
जिनका लेखन साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी को इन्हीं अर्थों में स्वीकार किए
जाने की मजबूत दावेदारी पेश करता रहा
है। मित्रो, महक, शकुन, रीता, मनु, राधिका और सारंग
जैसे चरित्रों को रच कर हमारी अग्रज लेखिकाओं ने स्त्री मन की उन्हीं अभिलाषाओं और
कामनाओं को अभिव्यक्त किया है जो अपने हिस्से की धूप, हवा, आकाश और जमीन जाने कबसे तलाश रही  हैं।
मुझे
यह कहते हुये यह खुशी हो रही है
कि स्त्री कथाकारों की ताज़ा पीढ़ी
भागीदारी और दावेदारी की उस यात्रा को लगातार आगे बढ़ा रही है। हिन्दी साहित्य, खासकर कथा साहित्य में स्त्रियों की इस
रचनात्मक
भागीदारी
को समझने के लिए मैं इसी पीढ़ी की कुछ कहानियों की
तरफ बढ़ूँ उसके पूर्व स्त्री लेखन के उद्देश्य और निहितार्थों पर भी दो-एक बातें
कहना चाहती हूँ। आज का  स्त्री लेखन स्त्री
विमर्श के नाम पर बहुप्रचारित कई तरह के मिथकों का
खंडन ही नहीं करता बल्कि अतीत के कई धुंधलकों को भी साफ करता है। आज स्त्री
लेखन का मतलब पुरुष विरोध नहीं है। बल्कि स्त्री विमर्श बहुत हद तक मित्र-पुरुषों
की एक ऐसी खोज यात्रा है जिसके तहत अर्द्धनारीश्वर पुरुषों की शिनाख्त कर समाज और सभ्यता
की विकास यात्रा को एक संतुलित विस्तार दिया जाये। हमारे समय की स्त्री-कथाकारों
की कहानियों में स्त्री-मन
की अनकही
संवेदनाओं की उपस्थिती के समानान्तर वैसे पुरुषों को पहचानने की कोशिश भी स्पष्ट
तौर पर देखी जा सकती है। स्वयं के अस्तित्व को आवश्यक प्रतिष्ठा प्रदान करते हुये
सकारात्मक बदलावों के वाहक पुरुषों के पहचानने के इस जतन को
सृष्टि
में निहित स्त्री तत्वों
को सहेजने-संभाल
ने की
प्रक्रिया
के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
 
भागीदारी
की यह लड़ाई किसी
पत्रिका विशेष के कुछ पन्नों  पर अपने लिखे की उपस्थिति  सुनिश्चित करने की लड़ाई नहीं, बल्कि सत्ता और संपत्ति में अपनी जायज
भागीदारी की दावेदारी भी है। परंपरा से प्रतिपक्षी रहे पुरुषों का आवश्यक कायांतरण
कर मानवता की विकास यात्रा में स्त्री-पुरुष
दोनों
की सहभागिता को सुनिश्चित करना इतना आसान नहीं है। इसके लिए स्त्रियों
को
बाहर से ज्यादा अपने भीतर से लड़ना और जूझना होता है। जनवरी-फरवरी 2000 में
प्रकाशित हंस के विशेषांक ‘अतीत
होती सदी और स्त्री का भविष्य’
जिसका विशेष सम्पादन अर्चना जी ने किया था, के संपादकीय में वे कहती हैं –
व्यवस्था
के देने से जितना दिया
जा सकता
था इस औरत ने ले-लेने की अपनी हिम्मत के चलते उससे कहीं ज्यादा लिया। दिया जा
सकाता था, दिया गया- शिक्षा का अधिकार, व्यवसाय के अवसर, आर्थिक आत्मनिर्भरता, संपत्ति में साझेदारी और सत्ता की संभाव्य
भागीदारी।
उन्हें अपनी हिम्मत से लेना होता है। उसे लेकर यह
स्त्री विशिष्ट हुई,
पर किससे विद्रोह और किससे
स्वाधीनता?
सबसे पहले अपने ही अंदर बैठी,
पितृसत्तात्मक समाज के निर्णयों,
मूल्यों-मर्यादाओं में ढली और आस्थाओं में पगी
उस औरत से जो अपनी निर्भयता को अंकुशित, निर्णय
को संचालित और अभिव्यक्ति को ग्रस्त करती है। खतरे का निशान दिखाकर सावधान करती
है।“
मुझे
खुशी है कि आज
लेखिकाएं
अपनी कहानियों और कथा-चरित्रों के माध्यम से परंपरा से अपने
भीतर खींच दी गई लक्ष्मण रेखाओं को नकार कर
अपने मानवोचित अधिकारों की आचार संहिताएँ खुद लिख रही हैं। दया के प्रतिदान की
उम्मीद में रिरियाते रहने के मुकाबले
अपना
हिस्सा खुद अपने बूते ले-लेने की उनकी
हिम्मत का ही यह नतीजा है, जिसकी  तरफ चौदह वर्ष पूर्व
अर्चना जी ने इशारा किया था। भागीदारी की दावेदारी की इस पूरी प्रक्रिया को मैं स्त्रियों
को देवी या दासी बना देने की साजिश का प्रतिरोध करते हुये उनके मनुष्य होने की स्वीकार्यता
और पुरुषों के भीतर के स्त्री तत्व को पुनर्जीवित करने के संयुक्त उपक्रम के रूप में
देखती हूँ। यही कारण है कि स्त्री विमर्श का यह आधुनिक
स्वरूप
और अर्द्धनारीश्वर की अवधारणा दोनों ही मुझे समानधर्मी
लगते हैं। लेकिन इस सपने का साकार
होना
इतना आसान भी नहीं। इस नवनिर्माण के पीछे इच्छाशक्ति, संकल्प, प्रतिरोध, चुनौती और
अतिक्रमण
की
समवेत
सहभागिता होती है, जिन्हें
आज
की कहानियों में बखूबी देखा और पहचाना जा सकता है। उदाहरण के तौर
पर मैं
यहाँ अपने समकालीन स्त्री कथाकारों की तीन
बहुचर्चित
और महत्वपूर्ण कहानियों
का जिक्र करना चाहती हूँ। ये कहानियाँ हैं नीलाक्षी सिंह की
टेक
बे त टेक न त गो

जो उन
के पहले संग्रह में
प्रतियोगी नाम से संकलित है
, कविता की उलटबांसी और किरन सिंह की कथा सावित्री सत्यवान
की

बात सबसे पहले
टेक
बेट टेक न त गो

की। इस कहानी में दुलारी
जिस तरह जिलेबी
और
कचरी के
अस्तित्व को
बचाने के बहाने खुद को यानी एक स्त्री
को बचाने की लड़ाई लड़ती है वह उल्लेखनीय है।
एक ऐसे
समाज में जहां आर्थिक निर्णय हमेशा से
पुरुष
लेते रहे हैं
,
एक स्त्री का अपने पति के साथ मिलकर दुकान चलाना भी एक हद
तक
प्रगतिशील बात हो सकती थी, लेकिन दुलारी तथाकथित
प्रगतिशीलता की
खोल में छिपी पितृसत्ता को पहचानती है।
तभी तो वह
 छक्क
प्रसाद एंड संस के मु
काबले
दुलारी जलेबी सेंटर खोलकर पितृसत्ता को चुनौती
देते हुये छ
क्क्न
प्रसाद द्वारा निष्का
सित
जले
बी-कचरी को बचाने के
बहाने अपने भीतर की स्त्री को बचाने का
संघर्ष
करती है। यहाँ इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि दुलारी का पति छ
क्क
प्रसाद भले उसका प्रतियोगी हो
, लेकिन जीत के नए
उपकरण तलाशता उसका बेटा मिंटू
अस्मिता संघर्ष
में उसके साथ है।
मिंटू
भी पुरुष है लेकिन वह अपने पिता से इन
अर्थों में
 भिन्न है कि वह अपनी माँ
के अस्मिता-बोध
को पहचानता है। साथी पुरुष की यही पहचान समकालीन स्त्री विमर्श का नया चेहरा है जो
पुरुष को
हर सूरत में
खल नहीं साबित करता।
 
 
स्त्री
अस्मिता
,
पहचान और उसके
निर्णय लेने की स्वतन्त्रता को कविता ‘उलटबांसी’ में एक दूसरे धरातल पर उठाती
हैं, जहां घर परिवार में उपेक्षा का दंश
झेलती एक विधवा  मां अपने विवाह का निर्णय
लेती है। पूरे परिवार के मुखर विरोध के बीच बेटी का अपनी मां का निर्णय में साथ देना
स्त्री-स्त्री के बीच विनिर्मित जिस रसायन की बात करता है, उसकी जड़ें कहीं
न कहीं स्त्री होने के साझे दर्द और उस दर्द के मिल बांट लेने की सहज
आकांक्षा से उपजी है। एक स्त्री का यह निर्णय इतना आसान नहीं होता, संकल्प और निर्णय के इस हिम्मत के लिए
उसे खुद,
परिवार और समाज के तिहरे मोर्चों पर लड़ना होता है।
इन दोनों कहानियों के मुक़ाबले
‘कथा सावित्री सत्यवान की’ की नायिका का सच अलग है। सम्बन्धों को पुनर्जीवित
करने की लालसा में उन्हें पुनर्परिभाषित
करने की जो छटपटाट आज स्त्री मन के भीतर चल रही है, उसकी अनुगूंजें
इस कहानी में साफ सुनी जा सकती हैं, जहाँ एक स्त्री अपने पति की ज़िंदगी बचाने
के लिए खुद की प्रतिष्ठा तक को दांव पर लगा देती है। शोहरत
और प्रतिष्ठा की सहज कामना से भरी
एक नवोदित लेखिका के जीवन में किसी
संपादक
का
लार टपकाते हुये उसका गॉड फादर बन बैठना कोई नई बात नहीं है। इस प्रक्रिया
में
लेखिकाओं
को
जाने  किन-किन अंधेरी सुरंगों से गुजरना
होता है। लेकिन इस कहानी
में जिस तरह इन अंधेरी सुरंगों में प्रवेश कर चुकी एक लेखिका इसका
अपने पक्ष में इस्तेमाल करती हुई अपने बीमार पति
के ऑपरेशन का खर्च जुटाती है,
वह इस कहानी को एक ऐसे
धरातल पर ले जाता है, जिसे देखने के हम आदी नहीं रहे हैं।
अलग-अलग
धरातल और भावभूमि पर
खड़ी ये स्त्रियाँ अलग हो कर भी एक
दूसरे से अलग कहाँ हैं?
एक नई दुनिया के निर्माण का जो सपना इनकी
आंखों में पल रहा है,
वह सिर्फ इनका नहीं, पूरी स्त्री जाति
का सपना है। प्रसंगवश मैं अपनी
कहानी
‘औरत जो नदी है’ की दामिनी और ‘पिंजरा’ की सुजा
को याद करना चाहती हूँ जिन्हें रचते हुये न जाने किस अथाह पीड़ा से गुजरना
पड़ा था मुझे। जाहिर है मेरे या अन्य साथी
रचनाकारों
के लिए पितृसत्ता की बिसात को पलट
कर
रख देने की क्षमता रखने वाले ऐसे साहसी चरित्रों को
गढ़ना इतना आसान नहीं होता। अपने भीतर और बाहर खड़ी
कर
दी
गई परंपरा,
शिष्टाचार और मर्यादा की तथाकथित दीवारों को लांघने के संकल्प के
साथ जारी इस यात्रा में अपनी अग्रज लेखिकाओं द्वारा देखे गए स्वप्न भी शामिल
हैं। समकालीन लेखन में इन स्त्रियों
की ये मजबूत उपस्थितियाँ स्त्री अधिकारों की स्थापना
के साथ-साथ पुरुषों के विकास-यात्रा की भी दास्तान
हैं।
स्त्रियों को सिर्फ मादा होने तक सीमित कर दिये
जाने की साजिश के विरुद्ध उन्हें मनुष्य
रूप
में प्रतिष्ठित करने का जो बीड़ा रचना ने उठाया हुआ है, आलोचना को भी उसके मर्म तक पहुँचने की
जरूरत है।

मुकेश मानस और दीप्ति की कवितायें

 
 
(  मुकेश मानस कवि, कथाकार और विचारक हैं , चर्चित पत्रिका मगहर का संपादन करते हैं  और दिल्ली वि वि में हिन्दी के प्राध्यापक हैं. उनकी इन कविताओं में स्त्री के आत्मीय पुरुष की अभिव्यक्ति है , एक स्त्रीवादी पुरुष की . दीप्ति एम .ए की छात्रा हैं, निरंतर अपनी कविताओं में बेहतर होती जा रही हैं. हो सकता है इन कविताओं में एक स्त्रीमन की अनगढ अभिव्यक्ति मिले , लेकिन युवा स्त्री के मन की थाह  जरूर है इनमें . मुकेश मानस और दीप्ति से क्रमशः 9873134564, 9412526563 पर संपर्क किया जा सकता है ) 
 
मुकेश मानस की कवितायें 
 
1. पहाड़ में बाघ

मुकेश मानस
उत्तराखंड
के एक खूबसूरत पहाड़ की तलहटी में
एक
होटल की तीसरी मंजिल पर
आजकल
ठहरे हुए हैं हम
शाम का
समां है
हमारे
कमरे की बालकनी में
मेरी
बेटी और मैं बैठे हुए हैं
और
निहार रहे हैं पहाड़ी शाम की खूबसूरती
एक
पहाड़ी औरत ले के जा रही है अपने सिर पर
जंगल
से काटी गयी लकड़ी
सूरज
डूबता चला जाता है
खुश
होके कहती है मेरी बेटी-“वडरफुल”
अचानक
एक खामोशी पसर जाती है अन्धेरे सी
फिर
किलक के कहती है वो मुझे
पापा
सुनो तो ज़रा
एक
झरने की आवाज़ आ रही है
झरने
की आवाज़ सुनने की कोशिश में
मुझे
सुनाई देती है पहाड़ पर
एक बाघ
के गुर्राने की आवाज़
मैं उस
पहाड़ी औरत को जाते हुए देखता हूं
तो
ख्याल आता है मुझे
कि
पहाड़ में बाघ अब भी बाकी हैं
और
बाकी है उनकी आवाज़
2013
 
2. बेटी
मेरी बेटी मुझे बुलाती है
मैं दौड़ के जाता हूँ
और मुझे अपने होने की खुशी होती
है
मुझे लगता है कि मैं किसी काम का
हूँ
मेरी बेटी मुझे आदेश देती है
मैं उसके आदेश का पालन करता हूँ
मुझे लगता है मेरा जीवन सफल हो
गया
2010
 
3. माँ
मैंने जब इस धरती पर पहला कदम
रक्खा 
तब मौजूद थी एक स्त्री इस धरती
पर
उसने मुझे मुझे चूमा, मुझे
दुलराया
अपने जीवन की किसी जरूरी धड़कन की
तरह
 मुझे अपने दिल की गहराईयों में बसाया
ये मेरे जीवन का पहला स्पर्श था
पहली छुअन, पहला अपनापन
और किसी दूसरे शरीर की पहली मादक
गन्ध
रोम–रोम तक घटित होने वाल पहला
प्यार था यह
उसके बाद जीवन भर
मैं कहां कहां नहीं गया
क्या-क्या नहीं किया मैंने
जाने किस-किस से प्यार किया
और किस किस से नफ़रत की
अब ये मुझे याद भी नहीं
मगर जीवन भर उसकी बांहें मिली
मुझे संभालती, दुलराती हुई
उसकी सदिच्छाएं मिलीं
अन्धेरों में रौशनी की तरह प्रेरित
करतीं
अपार स्निग्ध प्यार मिला
कि मैं औरों को प्यार करने के
काबिल बना रहूँ
करूणा मिली जिसने मुझे भीतर से इन्सान
बनाए रखा
जब कभी मैं नहीं रहूँगा इस धरा
पर
तब भी रहेगी वो स्त्री
बना रहेगा उसका स्पर्श, उसकी गंध
बनी रहेगी उसकी विराटता
चलता रहेगा संसार उसके इशारों पर
जब मैं नहीं रहूँगा
तब भी रहेगी वो स्त्री इस धरती
पर
2010,
मां के परिनिर्वाण पर
 
4. कमोडिटी
प्रिय पूनम पांडे
मुझे तुम्हारी घोषणा सुनकार बहुत
खुशी हुई
धन्य है तुम्हारा वो देश
जिसके लिए तुम कहीं भी कपड़े उतार
सकती हो
धन्य हैं तुम्हारे वो माता–पिता
जिन्हें तुम्हारे नंगा होने पर
गर्व है
धन्य हैं तुम्हारे वो मित्र और
सहचर
जो तुम्हारी घोषणा सुनकर प्रसन्न
हैं
धन्य है तुम्हारा स्त्री होना
कि तुमने स्त्रीपन की नई मिसाल
दी है
चिढ़ने दो अगर चिढ़तीं हैं तुमसे
बछेन्द्री पाल, मेधा पाटकर,
अरुणा राय
ईरोम शर्मिला, भंवरीबाई वगैरह
वगैरह
पागला गई हैं ये औरतें जो चिढ़तीं
हैं तुमसे
मगर यकीन मानो पूनम पांडे
मैं तुम्हारी घोषणा सुनकर बहुत
खुश हूँ
इसलिए नहीं कि मैं दलित हूँ और
तुम ब्राह्मण हूँ
इसलिए नहीं कि मेरे मन में ब्राह्मणों
के लिए नफ़रत भरी है
और उनकी लड़कियों के नंगे होने पर
मैं खुश हूँ
यकीन मानो पूनम पांडे
मैं तुम्हारी घोषणा सुनकर
बहुत  खुश हूँ
इसलिए नहीं कि मैं एक पुरुष हूँ
और तुम एक स्त्री
और हर स्त्री को नग्न देखना
पुरूष की आदिम प्रवृत्ति है
यकीन मानो प्रिय पूनम पांडे
मैं तुम्हारी घोषणा सुनकर बहुत
खुश हूँ
खुश हूँ कि जिसे मैं अपना देश
कहता हूँ
तुम उस देश की नागरिक नहीं हो
खुश हूँ कि जिसे मैं नई पीढ़ी
कहता हूँ
तुम उस पीढ़ी की सद्स्य नहीं हो
खुश हूँ कि तुम आधुनिक स्त्री तो
कतई नहीं हो
तुम तो किसी बाज़ार की एक कमोडिटी
हो
सिर्फ़ एक बिकाऊ माल
खरीदी और बेची जाने वाली कोई
वस्तु हो
देह के बाज़ार में एक विज्ञापन हो
तुम कोई देश नहीं हो
तुम कोई धर्म नहीं हो
तुम कोई जाति नहीं हो
तुम कोई लिंग नहीं हो
2011
माडल पूनम पांडे की यह
घोषणा सुनकर कि अगर टीम इंडिया जीतती है तो वह इस खुशी में कहीं भी नंगी हो सकती
है।

उसे गर्व है कि वह नई पीढ़ी की है। उसके नंगा होने में उसके मां-बाप को कोई
आपत्ति नहीं है। 
 
5. नई भाषा
जिस
भाषा में बातचीत करते हैं हम
वह नाकाफ़ी है
हमारे उन भावों के लिए
जिन्हें हम व्यक्त करके भी
व्यक्त नहीं कर पाते
इसलिए हमें चाहिए एक नई भाषा
बेहद सहज और सरल भाषा
ठीक उस प्यार की तरह
जो हमारे भीतर महक उठता है
एक दूसरे के लिए
कभी-कभी
2011
दीप्ति की कवितायें 
1.

दीप्ति
अपाहिज नहीं हूँ
चल सकती हूँ
पर जंजीरों से जकडी हूँ ,
आँसू भी गिरते हैं
पर जंजीरे नहीं पिघलतीं
मजबूती से बंधी हुयी वो
और मजबूत होती जाती है ,
युग युगान्तर से बंधी
इन जंजीरों को तोडने की
प्रक्रिया अब शुरू हो गयी
है ।
2. मुक्ति की आकांक्षा को
त्याग
मुट्ठी भर भर गेहूँ
चाकी में पिसती – चलाती
अनुभवों को बटोरती
टेनिये में भरती जाती हूँ
चाकी के चारों ओर
कुछ दरदरा गेहूँ ,
बचा रह जाता है
निढाल सा पडा है
अपने आपमें मग्न
दुनिया की चाकी में
बार – बार
पिसने का अनुभव
लेना चहता है ,
तभी इतनी बार पिसकर भी
बचा रह जाता है
वो दरदरा गेहूँ ।
3. 
राजपथ पर चलती मैं अकेली
धूप से बचती   
छतरी ओढे चली जा रही हूँ
धूप की तेज़ किरणें
छतरी को पार कर
मुझे जला रही हैं
और मैं सुकडती चली जा रही
हूँ
,
वहीं पास से लोगों का हूजूम
निकल रहा है
लोग नारे लगा रहे हैं ,
बलात्कार के दोषियों को
फाँसी दो
,
बडे-बडे पोस्टर लटकाये , बडे बेनर उठाये
चले जा रहे हैं ,
उनमें कुछ परेशान हैं
देश की व्यवस्था को लेकर
और कुछ भीड में पीछे चल ,
भीड बढा रहे हैं ,
वो फोन में अश्लील चित्र /
फिल्में देख रहे
और  मुस्कुरा रहे हैं ,
साथ में नारी हक में नारे
लगा रहे है
,
वो आज फिल्में देख मुस्कुरा
रहे हैं
कल बलात्कार कर
खिलखिलायेगें
अपनी मर्दनगी पर इठलायेगे ,
ये देख
मैं वहीं किनारे सडक पर बैठ
गयी
और सोचने लगी
कि कल फिर क्या ये
किसी भीड का हिस्सा बन
नारे लगायेगें
बलात्कारियों को फाँसी दो !
या फिर किसी और हूजूम में
इकट्ठे हों
हिंदुस्तान जिन्दाबाद के नारे लगायेगें

स्त्री-सत्ता : यथार्थ या विभ्रम

अर्चना वर्मा
हम सब जानते हैं कि शब्दों के अर्थ उनके प्रयोग-सन्दर्भ से
निर्धारित होते हैँ। सत्ता का
प्राथमिक अर्थ विद्यमानता, वर्तमानता, उपस्थिति, मौजूदगी या होना यानी अस्तित्व है। लेकिन हमारे विषय

अर्चना वर्मा

स्त्री-सत्ता: यथार्थ या
विभ्रम को यहाँ ब्रैकेट में लिखित (Women Power:Illusion or
Reality) के हिन्दी रूपान्तर की तरह प्रस्तुत किया गया है इसलिये इस अर्थ के साथ प्रभुत्त्व और अधिकार की ध्वनियाँ भी जुड़ जाती हैँ। तब इसका सन्दर्भ शक्ति-विमर्श और अर्थ की कोटि राजनीतिक हो जाती है। पितृसत्ता या पुरुषसत्ता की सामाजिक संरचना के अधीन स्त्री का अस्तित्व हमारे विषय को एक साथ पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक सन्दर्भों और अर्थ की कोटियों से जोड़ देता है। बात चाहे स्त्री के प्रभुत्त्व और अधिकार की हो या अस्तित्व और विद्यमानता की, उसका तात्कालिक अर्थ और सन्दर्भ मर्द और मर्दों की दुनिया में उसकी सत्ता से न केवल जुड़ा बल्कि उसी के द्वारा सीमित, और प्रतिबन्धित भी है। इसलिये जहाँ तक ‘पावर’ या शक्ति के अर्थ मेँ सत्ता का प्रश्‍न है, मामला अभी तक ‘एम्पावरमेण्ट’ या सशक्तीकरण के राजनीतिक प्रयासों के भीतर ही घूम रहा है और सामाजिक पूर्वग्रहों को देखते हुए ये प्रयास बहरहाल अपर्याप्त ही साबित होकर रह जाते हैँ।

हमारे पास मन की तसल्ली के लिये बड़ी सुविधा की तरह हमारे परम्परागत सांस्कृतिक-दार्शनिक अवदान मौजूद हैँ जिन्हें मौका बेमौका उद्धृत करके हम स्त्री के सम्मान की संस्कृति का उत्तराधिकारी होने का दंभ पाल सकते हैँ। मिथक और पुराण किसी संस्कृति का अन्तःकरण कहे जाते हैं। लेकिन फि़लहाल आधुनिकता और उपनिवेश और विज्ञान और औद्योगीकरण के गुलेल ने संस्कृति को उसके अन्तःकरण की गहराइयों में से बाहर निकाल फेंका है। उत्पीड़न और अन्याय के अतीत उत्तराधिकार से मुक्ति की आकांक्षा स्वाभाविक भी है और ज़रूरी भी लेकिन जैसा कि अंग्रेज़ी के एक मुहावरे में होता है, “थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथवॉटर” वैसा न हो जाय यानी कि नहान का पानी फेंकते के साथ बच्चा भी फिँक गया जिसे नहलाया जा रहा था।
शिव और
शक्ति
, पुरुष और
प्रकृति के अलावा अर्धनारीश्‍वर जैसी परिकल्पनाओं
का उत्तराधिकार अभिमान
का विषय हो भी सकता है, है भी, लेकिन अब
वे न किसी जीवित परम्परा की कड़ी की तरह और न हमारे
सामूहिक अवचेतन
मेँ समाई किसी स्मृति या संस्कार की तरह लोकचेतना का
अंश रह गयी हैँ। वे अब सिर्फ इण्डोलॉजी के विद्वानों और उत्सुक
विदेशियों के लिये अध्ययन
का विषय और मुग्धता का सामान हैं। परम्परा के नाम पर
स्त्री-विरोधी रीति-रिवाजों, प्रथाओं और
मान्यताओं से लड़ने के लिये शायद वे परम्परा से ही प्राप्त औजार
की तरह काम मेँ लाई जा सकती हों लेकिन इसके लिये पहले उन्हें
लोकचेतना मेँ पुनर्जीवित करना होगा। लेकिन परम्परा

को फ़िलहाल
हमने ब्राह्मणवादी संस्कृति
के सवर्ण वर्चस्ववाद का उत्तराधिकार घोषित करके उसके
साथ उच्छेदन का रिश्‍ता बनाया है। क्योंकि उनमें सामूहिक
अवचेतन खोजने या उनको लोकचेतना का अंश बनाने की बजाय उन्हीं
मेँ सामाजिक विखण्डनों उत्पीड़नों और अन्यायों की निशानदेही
भी की जा सकती है। महिषासुरमर्दिनी
या काली का जो
अर्थ स्त्रीसत्ता के सन्दर्भ मेँ पढ़ा जा सकता है वह आदिवासी या
दलित सन्दर्भों मेँ बदल दिया जाता है। इसलिये स्त्रीसत्ता और
शक्ति के मिथकों और पुराणकथाओं और दार्शनिक परिकल्पनाओं के सांस्कृतिक
अंतरिक्ष के धुँधले आवेग और बौद्धिक कोहरे की बजाय उचित
है कि जो यथार्थ है – असमानता
– उसको
नापने के ठोस, व्यावहारिक और
सांसारिक पैमानों की तरफ़ देखा जाय। सशक्तीकरण की प्रक्रिया
को निर्धारित और कार्यान्वित
करने के लिये भी ज़रूरी
है कि दुर्बलताओं और दमन के रूपों को जाना और परखा जाय।

भारतीय समाज मेँ लैंगिक असमानता के विषय मेँ स्त्री और शिशु विकास मंत्रालय की स्टेटस रिपोर्ट सितम्बर 2009 मेँ प्रस्तुत की गयी। उसके अनुसार लैंगिक तुलनाओं को किसी भी समाज में स्त्री-पुरुष की असमानताओं को समझने की कुंजी कहा जा सकता है। इसी मान्यता के आधार पर इस असमानता की जाँच के लिये तुलनात्मक पैमाने तय किये गये।
इनमें कुछ जाने माने प्रत्यक्ष पैमाने हैँ
जैसे लैंगिक अनुपात मेँ स्त्री का हिस्सा, कन्या-भ्रूण हत्या, साक्षरता की
तुलनात्मक दर, स्वास्थ्य और
पोषक आहार के सूचक चिह्न, पारिश्रमिक और
वेतन की तुलनात्मक दर, और भूमि तथा जायदाद के स्वामित्त्व का तुलनात्मक अनुपात। इन असमानताओं की नाप आँकड़ों से की जा सकती है। ज़्यादा कठिनाई उन असमानताओं की नाप मेँ आती है जो अप्रत्यक्ष हैँ और शक्ति के वितरण में निहित और सांस्कृतिक उत्तराधिकार मेँ धँसी हुई हैँ। पारिवारिक संसाधनों पर नियंत्रण, निर्णय के अधिकार और आत्मनिर्भरता का अभाव, निर्मूल्य श्रम की व्यर्थता का बोझ इत्यादि दैनिक जीवनस्थितियों में निहित शक्ति का असमान वितरण इतना रोज़मर्रा और साधारण सामान्य है कि खुद को भी दिखाई नहीं देता क्योंकि वह सांस्कृतिक उत्तराधिकार की तरह हमको मिला है।
इन असमानताओं के संशोधन के लिये विकास
की दर को नापने के लिये भी कुछ आयाम और उनके संकेतक निर्धारित किये गये हैं। लैंगिक विकास के तीन आयाम वही हैँ जो मानव विकास के भी हैँ। पहला
आयाम है दीर्घ और स्वस्थ जीवन। इसका पहला संकेतक है नवजात-मृत्युदर और दूसरा सूचक है एक बरस तक जीवित रह गये बच्चे की जीवन प्रत्याशा। विकास का दूसरा आयाम है ज्ञान। इसका पहला संकेतक है एक से सात वर्ष तक की आयु मेँ साक्षरता की दर और दूसरा संकेतक है 15 वर्ष के आयु वर्ग की शिक्षा मेँ लगने वाले औसत वर्ष। विकास का तीसरा आयाम है सन्तोषजनक जीवनस्तर। इसके लिये चुना गया संकेतक है प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति अनुमानित अर्जित आय मेँ स्त्री-पुरुष का हिस्सा।
इन आयामों और उनके संकेतकों को न्यूनतम और अधिकतम के पैमाने मेँ बाँटा गया है और देखा गया है कि किस सिरे पर स्त्री-पुरुष की तुलनात्मक संख्या क्या है। उदाहरण के लिये दीर्घ स्वस्थ जीवन के संकेतक मेँ तुलनात्मक नवजात-मृत्युदर मेँ बच रहने वाले बच्चों में लड़कियों की संख्या अधिक है। इसका अर्थ यह है कि कन्या-शिशु मेँ प्राकृतिक जीवनी शक्ति अधिक होती है जब कि एक वर्ष तक बचे रह जाने वाले शिशुओं की जीवन-प्रत्याशा मेँ
लड़कोँ की संख्या अधिक हो जाती है। और हम सबका जाना माना निष्कर्ष
यह है कि जन्म लेने के बाद जो देखभाल और सारसँभाल ज़रूरी होती है उसकी बेहद कमी कन्या-शिशु की प्राकृतिक जीवनी-शक्ति को
हरा देती है। इन आँकड़ों मेँ भ्रूण-हत्या शामिल
नहीं है। इसका नतीजा देश की जनसंख्या के लैँगिक अनुपात में असन्तुलन है। यही स्थिति शेष दोनो आयामोँ की भी है। मानव विकास और लैँगिक विकास को साथ साथ रखकर देखने का स्पष्ट निष्कर्ष यह है कि सामान्य मानवाधिकार के स्तर पर भी हमारा समाज स्त्री को कुछ कम मानव या शायद अमानव मान कर चलता है।
लैंगिक समानता के पैमानों
और उपायों को भी तीन आयामों मेँ बाँटा गया है। पहला आयाम – राजनीतिक हिस्सेदारी और निर्णय का अधिकार जिसके संकेतक हैँ संसद, विधानसभा, जिलापरिषद ग्रामपंचायत
की सीटों में और संसदीय निर्वाचन मेँ वोट के अधिकार के प्रयोग में स्त्री की हिस्सेदारी का प्रतिशत। दूसरा आयाम है आर्थिक हिस्सेदारी और निर्णय का अधिकार जिसके संकेतक हैं भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस
सेवा, भारतीय वनविभाग
सेवा मेँ अफ़सरों की संख्या और मेडिकल और
इंजीनियरिंग संस्थानों के दाखिलों की संख्या में स्त्री के हिस्से का प्रतिशत। तीसरा आयाम
है आर्थिक संसाधनों पर अधिकार जिसके संकेतक हैँ जमीन जायदाद पर प्रभावी अधिकार मेँ स्त्री/पुरुष का तुलनात्मक प्रतिशत, अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों में दो लाख तक की कर्ज सीमा वाले खातों मेँ स्त्री/पुरुष खातों का तुलनात्मक प्रतिशत और प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष की अनुमानित अर्जित आय मेँ स्त्री/पुरुष के हिस्सों का प्रतिशत।
स्त्री की दशा के सुधार की दिशा में जन-चेतना मंच, फ़ाउण्डेशन टु
एजूकेट गर्ल्स ग्लोबली, द हंगर प्रोजेक्ट, स्टेप्स विमेन
डेवलपमेण्ट ऑर्गनाइज़ेशन, नेशनल मिशन
फॉर एम्पॉवरमेण्ट ऑफ़ विमेन इत्यादि और अन्य अनेक अनगिनत स्थानीय एन.जी.ओ. कार्यरत हैँ।
उपरोक्त पहलकदमियों के अलावा ICDS यानी (Integrated Child Development
Scheme), राजीव गाँधी नेशनल क्रेश स्कीम फॉर चिल्ड्रेन ऑफ़ वर्किंग मदर्स, धनलक्ष्मी, स्वाधार और
अन्य अनेक योजनाएँ भी लागू की
गयी हैं। यह केवल एक अधूरी और
अपर्याप्त सूची है। प्रादेशिक सरकारों
की भी अपनी अपनी योजनाएँ हैँ
निस्संदेह इन सब प्रयासों के नतीजे में ठोस
विकास और सुधार दर्ज भी किये गये। इनमेँ सबसे
महत्त्वपूर्ण जैसे कि, 1971 मेँ लिंगानुपात प्रति 1000 की तुलना में 930 था। वह 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति 1000 पर 940 हो गया है। 1961 में स्त्री साक्षरता की जो दर कुल 18.3% थी वह 2011 में 4% हो गयी जो वाकई एक मूल और गहन विकास है। 1981 में स्त्री-पुरुष की साक्षरता का अन्तराल 26.6 % था जो 2011 में घटकर 16.7 % रह गया। ये विकास के इंगित हैँ लेकिन बहुत नाकाफ़ी । इनके आधार पर स्त्री-सत्ता यानी शक्ति के यथार्थ होने का निष्कर्ष निकाला जा सकता है। स्त्री और शिशु विकास मंत्रालय की ओर से लगातार स्त्री की दशा के किसी न किसी आयाम के विषय में नियमित रूप से शोध, सर्वेक्षण, विश्‍लेषण चलता रहता है और उनकी स्टेटस रिपोर्ट भी प्राप्त होती रहती है। इन रिपोर्टों से वही बातें प्रमाणित और सत्यापित होती हैँ जिन्हें हम अपने और अपने आस पास के अनुभव से जानते हैं। लेकिन रिपोर्ट आँकड़ों की प्रमाणसम्मत भाषा मेँ बोलती है। जिनको आँकड़े पढ़ना आता हैँ उनके लिये बहुत कुछ व्यक्त करती है। वह हमारे अनुभव के दायरे के बाहर के आते हुए बदलावों को भी दर्ज करती है। आभास को वास्तविक बनाती है और हालात को ‘पिनपॉइण्ट’ करती है। हालात को बदलने और दिशान्वित करने के लिये उनको नियंत्रित करना ज़रूरी है लेकिन एक जीती जागती औरत का ज़िन्दा अस्तित्व उनमें अमूर्त और गुम हो जाता है।
स्त्री सशक्तीकरण बहुत से कारणों और घटकों से निर्धारित होता है जैसे स्थानिकता, सामाजिक और आर्थिक हैसियत, सांस्कृतिक ध्वनियाँ और व्यंजनाएँ, परम्पराएँ और आयु। स्त्री-विमर्श की
तह मेँ इस सार्वभौम सर्वमान्य मूलभूत
सत्य की मान्यता है कि स्त्री के जीवन की मुख्यधारा अन्याय, उत्पीड़न और
शोषण की है, फिर चाहे सहने का फ़ैसला हो या संघर्ष करने का। इसीके संशोधन और प्रतिकार के लिये 1975 में संयुक्त राष्ट्र-संगठन की वैश्‍विक पहल पर सोशल-इंजीनियरिंग आरंभ हुई थी।

वैश्‍विक प्रायोजन के अन्तर्गत भारत मेँ भी बड़े पैमाने पर सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक स्तर के सरकार समर्थित कार्यक्रम बने और कार्यान्वित भी हुए, महिला और शिशु विकास का अलग मंत्रालय बना, बहुत से गैर सरकारी संगठन स्त्रीमुक्ति को एक आन्दोलन में बदलने के अभियान मेँ शामिल हुए। संविधान में अनेक संशोधन हुए लेकिन इस राजनीतिक और रणनीतिक कार्रवाई के अलावा स्त्रीवादी विमर्शों और लैंगिक भेदभाव के अध्ययनोँ का जो भी थोड़ा बहुत अकादमिक कामकाज हुआ वह अंग्रेजी में ही किया जाता रहा। नतीजा यह रहा कि जन-सामान्य और व्यापक समाज मेँ स्त्री-चेतना की
समझ और प्रचार-प्रसार का
कोई सुव्यवस्थित और प्रभावी कार्यक्रम
कार्यान्वित हुआ ही नहीं। समाज में बदलाव आता दिखता है लेकिन बदलाव की समझ आती नहीं दिखती। परिवर्तन की अपरिचित और अज्ञात दिशाओं के प्रति भय, आशंका और असहिष्णुता ज़रूर उमड़ती दीखती है। बार बार प्रश्‍न उठता है कि चेतना-प्रसार के उपयुक्त और व्यापक सामाजिक कार्यक्रम के बिना केवल आर्थिक
सशक्तीकरण से वास्तविक समस्या का आंशिक भी समाधान संभव है क्या?

इतनी सारी योजनाओं के बावजूद GGGP यानी ( Global Gender Gap Index ) के पर्यवेक्षण के अनुसार स्वास्थ्य, शिक्षा और
आर्थिक भागीदारी के स्तर पर जो अन्तराल हैँ वे विकास की सक्रिय बाधाएँ हैँ। कुछ विशिष्ट प्रतीक स्त्रियों को छोड़कर स्थानीय, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय – सभी
स्तरोँ पर सशक्तीकरण अभी अपने शैशव मेँ ही है। CARE (Cooperative for Assistance and
Relief Everywhere) के सर्वेक्षण के अनुसार पूरी दुनिया मेँ नितान्त निर्धनता मेँ रहने वाले लोगों की संख्या कुल मिलाकर 1.3 बिलियन है। इनमेँ 70% स्त्रियों का है। यूनेस्को की मीडियम टर्म स्ट्रैटजी 2008-13 मेँ संगठन की वैश्‍विक प्राथमिकता की जगह लैंगिक समानता को दी गयी है लेकिन पूरी दुनिया में जो 774 मिलियन वयस्क
पढ़ लिख नहीं सकते उनका दो तिहाई औरतों का है। विकासशील दुनिया
और तीसरी दुनिया मेँ honor
klling एक सम्मानित प्रथा है। स्त्री प्रायः शिक्षा और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से वंचित है। CARE की एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट की एक टिप्पणी में भारत मेँ किशोर वय की लड़कियों को ” Temporary people who would cease to exist
at least by their fathers once they are married.’ ” (अस्थायी व्यक्ति
जो अस्तित्वहीन हो जायेंगी) कहा गया है क्योंकि यहाँ लड़की के विवाह का अर्थ अब भी बड़े पैमाने पर अपने मातृकुल की सदस्यता से वंचित और अस्तित्वहीन हो जाना है, कम से कम पिता के लिये। घरेलू हिंसा तथा
अपनी स्वतंत्रता पर अन्य सांस्कृतिक और और नैतिक प्रतिबन्ध स्वयं स्त्रियों
को भी स्वीकृत हैं – कहीं
स्वेच्छा से, कहीं मज़बूरी से।
अन्य भारतीय भाषाओं के बारे मेँ नहीं कह सकती लेकिन हिन्दी भाषी प्रदेशों में साहित्य के अलावा अन्य अनुशासनों मेँ कुछ एक छिटपुट प्रयासों के अलावा ज़्यादातर जिम्मेदारी कविता, कहानी, आत्मकथा आदि
साहित्यिक अभिव्यक्तियों के रूप मेँ ही सँभाली गयी है। नतीजा, या तो स्त्री की पीड़ा बखान या फिर उसकी शक्ति के महिमागान मेँ ही अपना मनोतोष खोज लिया जाता है। स्त्रीशक्ति का मतलब यहाँ विद्रोह की दिशाएँ जो पुरुष द्वारा कोख पर कब्जे और देह पर दखल की ज़्यादतियों और शुचितावादी नैतिकता के एकतरफ़ा कानूनों और सज़ाओं के ख़िलाफ़ जाती दिखाई देती हैँ जिन्हें आसानी से लोग अनैतिकता का झण्डा और नैतिकता की
ख़िलाफ़त का पर्याय समझ बैठते हैँ। कुल मिलाकर हिन्दीभाषी समाज के एक हिस्से मेँ स्त्री-पुरुष के बीच एक द्वेष और आक्रोश का सम्बन्ध और परस्पर आक्रामकता की संस्कृति पनपती दिखती है। पितृसत्ता और मातृसत्ता एक दूसरे का प्रतिपक्ष बन जाते हैं। अपवाद ज़रूर मौजूद हैं। मातृसत्ता के समर्थक पुरुष अपवादस्वरूप मिल जाते हैँ लेकिन पिछली पीढ़ी की स्त्रियाँ लगभग निरपवाद रूप से पितृसत्ता की पक्षधरता मेँ शामिल दिखती हैं। कहना यह चाहिये कि पहले की पितृसत्ता और मातृसत्ता में एक गठबन्धन दिखाई देता है जिसमें अब एक बदलाव आया है जिसकी वजह से पारिवारिक समीकरण भी बदल रहे हैं।
बात को शायद थोड़ा खोलकर
कहने की ज़रूरत है। पितृसत्ता पैट्रियार्की का हिन्दी रूपान्तर है। पैट्रियार्क
यानी समुदाय का मुखिया वृद्ध। पिता पीढ़ी के उस वृद्ध के शासन-अनुशासन मेँ न केवल स्त्री बल्कि उसके साथ पुत्र अथवा युवतर पीढ़ी का पुरुष भी शासन और दमन का पात्र है। पितृ+सत्ता के पास एक चेहरा सत्ता का है तो एक चेहरा पिता का भी है। औद्योगीकरण के
पहले की सामाजिक पारिवारिक व्यवस्था
मेँ घर के अन्दर और बाहर की दुनियाओं का बँटवारा था। पितृसत्ता और मातृसत्ता का गठबन्धन दमन-अनुशासन और वात्सल्य का गँठजोड़ रहा होगा। वहाँ वह परस्पर पूरक और प्रभावी भी रहा होगा।
भारत में औद्योगीकरण की प्रक्रिया पराधीनता की दशा में, विदेशी शासकों की आवश्‍यकताओं के अनुकूल, विषम भौगोलिक वितरण तथा असमान गति से सम्पन्न हुई। वह एक विकृत और अधूरा औद्योगीकरण
था। उसके साथ आने वाले सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों की गति भी असमान और असन्तुलित ही रह गयी। प्राक्-औद्योगीकरण की
वह दुनिया अधिकांशतः जा चुकी, बची खुची भी जा रही है। वृद्धता अब अनुभव की परिपक्वता का नहीं, विकास की
अवरुद्धता और जड़ता का प्रमाण बन
चुकी है। इसलिये पितृसत्ता और
मातृसत्ता अपनी पकड़ खो बैठे हैँ।
इस दुनिया मेँ उनका रूपान्तर पितृसत्ता से पुरुष-सत्ता मेँ
और मातृसत्ता से स्त्री-सत्ता मेँ
हो चुका है। वे प्रायः पितृसत्ता+मातृसत्ता के
पिछले गठबन्धन यानी स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के पुराने समीकरण के विरुद्ध तो हैं ही, किसी नये समीकरण के उभरने के पहले अक्सर एक दूसरे के भी विरुद्ध दिखाई देते हैँ। इस घालमेल मेँ हो यह रहा है कि यथार्थ बदल गया है लेकिन भूमिकाएँ और कसौटियाँ वही पुरानी चलती चली जा रही हैँ जिन्हें कभी पितृ-सत्ता या
पुरुषसत्ता ने स्त्री पर आयद किया था और जिनके उल्लंघन का दण्ड अब भी स्त्री को अपवाद नहीं, लगभग नियमस्वरूप दिया जाता रहता है।
इसी दुनिया के एक सिरे पर उन आँकड़ों में
से झाँकती सकारात्मक दुनिया है जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है लेकिन दूसरे सिरे पर वे सारी बाधाएँ भी हैँ जिनकी वजह से वह दुनिया यथार्थ बनते बनते रह
जाती है। नये प्रावधानों के बारे मेँ जनसामान्य
के लिये तथा स्वयं स्त्री के लिये भी, सूचना और जानकारी की भयंकर कमी, सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण का अभाव, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, जवाबदेही का दुर्बल तंत्र, सुरक्षा के प्रावधानों पर पुलिस द्वारा कार्यान्विति का अभाव और इन सबकी जड़ में समाज का लैंगिक संस्कृति का अभाव, उसके स्वरूप से अपरिचय, और सच को न देखने, न मानने की ज़िद मौजूद हैं।
इस दुनिया मेँ खासकर भारत मेँ, बूढ़े अप्रासंगिक और असहाय, और अधिकतर संसार अभी युवा,

अनुभवहीन और अपनी अनुभवहीनता के प्रति अबोध भी है। अक्सर वे जीवन को एक प्रयोग की तरह जीकर देख रहे हैँ। प्रयोग असफल भी हो सकता है और उसके नतीजों को झेलना वे अभी नहीं जानते।

कुल मिला कर परिदृश्‍य बहुत अस्त-व्यस्त, धुँधला, अबूझ, क्षुब्ध, लगभग संवादहीन और प्रत्याशापूर्ण है। अपनी दुनिया
को हम अक्सर कुछ विस्मित, कुछ भयभीत और आशंकित भाव से देखते पाये जाते हैँ, आखिर यह हो क्या रहा है। भूमण्डलीकरण, उपभोक्तावादी जीवनमूल्य और लालसा का साम्राज्य, पूँजी और
बाज़ार की नियामक भूमिका, अपरिचित कॉर्पोरेट
अर्थतंत्र का विकट जंजाल आदि इत्यादि इसकी कारण-राशि का निर्माण करते हैं। इस बदलते हुए तंत्र ने एक ओर स्त्री के सामने अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल दिये हैँ तो दूसरी ओर पिछली मूल्य-व्यवस्थाओं, सम्बन्धों के
समीकरणों को ध्वस्त करने का अभियान भी शुरू कर दिया है। निर्णय में समर्थ, उपार्जन में सक्षम आत्मनिर्भर स्त्री के अस्तित्व ने पारिवारिक संरचना और नैतिकता के पुराने मूल्यों का ताना-बाना बदलना शुरू कर दिया है लेकिन अभी उनका बदलना कम और छिन्न-भिन्न होना ज्यादा दिखाई दे रहा है।
इस जगह आकर हम स्त्रीसत्ता के प्राथमिक अर्थ – विद्यमानता, वर्तमानता, उपस्थिति, मौजूदगी या होना यानी अस्तित्व की बात कर सकते हैँ। उसके सन्दर्भ मेँ विभ्रम अथवा यथार्थ की बात करें तो स्त्री-विमर्श ने हमको यह सोचने का आदी बना दिया है कि स्त्री होती नहीं, बनाई जाती है। स्त्री के अस्तित्त्व का वस्तुगत यथार्थ स्त्री-शरीर है। अस्ति और अस्मि का, वस्तु और व्यक्ति यानी ‘है’ और ‘हूँ’ का अन्तर यही है कि ‘अस्ति’ या ‘वस्तु’ यानी शरीर प्रकृति-प्रदत्त है। ‘अस्मि’ और ‘व्यक्ति’ उसके अस्तित्त्व का वह हिस्सा है जो समाज और इतिहास द्वारा बनाया जाता है और इतिहास की दीर्घता के कारण प्राकृतिक और वास्तविक सा प्रतीत होने लगता है। लेकिन केवल प्रतीत। वह संस्कृति-सापेक्ष और परिवर्तन-सापेक्ष अतः विकासशील है। अस्तित्व का ‘अस्मि’ तत्त्व जिससे
अस्मिता का निर्माण होता है, हमारा अन्तरंग हिस्सा है जिसे भीतर से देखकर केवल हम जानते हैँ और दूसरा कोई उसे उस रूप मेँ तबतक नहीं जान सकता जबतक वह वैसे ही अनुभव से होकर स्वयं न गुजरा हो। इसीलिये संप्रेषण अनिवार्य है।
स्त्रीसत्ता केअस्मितत्त्व मेँ वह ‘स्वयं’ होती है, अपना आप। इसके विपरीत उसके ‘अस्ति’ तत्त्व मेँ
वह वस्तु होती है, पुरुष के
लिये ‘अन्य’, केवल शरीर। भारतीय समाज में जहाँ यौनिक शुचिता को अबतक स्त्री-जीवन की कसौटी बना कर रखा गया है, शरीर ही स्त्री के लिये सारे फसाद की जड़ बन गया है। वही उसके शोषण, उत्पीड़न, अपमान का
उत्स और मर्यादाओं, अक्षमताओं, बन्धनों का अथ और इति है। इनमेँ वास्तविक तो केवल शरीर है, शेष सब संस्कृतिजनित व्याख्याएँ जिनको संकल्प और संघर्ष से विभ्रम साबित किया जा सकता है। इसका अर्थ आचरण के मूल्यों को पुनःपरिभाषित करना और नये समतामूलक, परस्परता के सम्मानगर्भित मूल्योँ को उन्मेष देना और स्त्री को केवल शरीर और शरीर को केवल कामवस्तु, कब्जे और दखल का सामान समझने वाले मूल्यों का विरोध करना है। मूल्य की संभावना मात्र को नष्ट कर देना नहीं, जैसा कि प्रायः समझ लिया जाता रहा है। स्त्री अपने अब तक के ‘अस्मि’ को, अपने ‘व्यक्ति’ को इस रूप मेँ पहचान चुकी है कि इस वस्तुगत यथार्थ – शरीर
के अलावा हर वह चीज़ बदली जा सकती है जिसे बदलने की ज़रूरत है और जो अन्यायमूलक हैं। अपनी योग्यताएँ, अपनी भूमिकाएँ, सम्बन्धों के समीकरण, मूल्यविधान – सबकुछ। इस सन्दर्भ मेँ पुरुष उसके लिये ‘अन्य’ हो जाता है और परस्पर अन्यता (‘अदरनेस’) का यह सम्बन्ध एक दूसरे की पूरकता की बजाय शत्रुता मेँ बदलने लगता है।
इसी घमासान के बीच पुरुषसत्तात्मक समाज मेँ स्त्रीसत्ता के प्रश्‍न ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के पुराने समीकरण ध्वस्त करके घर नामकी उस पुरानी शरण की सूरत भी बदल दी है। निस्संदेह नये समीकरण भी उभर रहे हैं। परस्परता के नये आश्‍वासन और सहयोग की नयी संरचनाएँ भी बन रही हैँ, नये रिश्‍ते जन्म ले रहे हैँ।लेकिन लेकिन केवल सीमित संसारों के छोटे छोटे कोनों मेँ ही। हमारा समाज मूलतः एक परिवारोन्मुख समाज है। परिवार की मर्यादाएँ और प्रतिबन्ध होते हैँ, घुटन और सीमाएँ भी होती हैँ, लेकिन अपनी शरण और सुरक्षा भी होती है, लेकिन स्त्री
के सन्दर्भ मेँ कई बार सुरक्षा एक भ्रम भी हुआ करती है।
बृहत्तर व्यापकतर परिवेश मेँ स्त्री के
लिये भय के बादल और आशंका की
गड़गड़ाहट है। असुरक्षा का आतंक है – घर
से लेकर सड़क तक हर जगह – दैहिक शोषण, विनय-भंग, बलात्कार, वैवाहिक बलात्कार, हत्या, आत्महत्या, एसिड अटैक। उसने फ़ैसला किया है न डरने का, वह बात अलग है। लेकिन एक सभ्य समाज के लिये यह असुरक्षा न केवल कानून और
व्यवस्था के रूप मेँ चिन्ता का
विषय बल्कि शर्मिन्दगी की वजह और कलंक का पर्याय है। बहुत सारे सिरे सुलझाने की, गुत्थियाँ खोलने की और एक संवाद कायम करने की अविलम्ब ज़रूरत है।
इन सच्चाइयों का नतीजा
क्या यह निकाल कर चुप बैठा जा सकता है कि सारी सरकारी, गैर-सरकारी और
व्यक्तिगत कोशिशों के बावजूद स्त्री-सत्ता मात्र
विभ्रम है? मैँ शायद खासी बेमरम्मत किस्म की आशावादी हूँ। उस चरम आशावाद और घनघोर निराशा के कर्म मेँ कोई ख़ास फ़र्क नहीं रह जाता। घनघोर निराशा का नतीजा भी यही होता हे कि इससे बुरा अब और क्या होगा तो जो करना है, क्यों न एक बार करके देख ही लिया जाय। मैँ मानती हूँ और मानते रहना चाहती हूँ कि विभ्रम यथार्थ का विलोम नहीं बल्कि भावी यथार्थ का पर्याय है। यथार्थ कोई ऐसी पूर्ण परिसमाप्त परियोजना नहीं है जो जैसी बन चुकी वैसी सदा सदा के लिये बन चुकी। यथार्थ एक प्रक्रिया है जिसे हम अपने आचरण से कार्यान्वित करके यथार्थ मेँ बदलते हैँ। जब तक वह यथार्थ हो नहीँ जाती तब तक ही वह विभ्रम है। आचरण और कार्यान्विति को जारी रखने का संकल्प और श्रम उसे यथार्थ बना देगा।
(अर्चना वर्मा
प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. यह आलेख उन्होंने स्त्रीकाल , गुलबर्गा वि वि और भारतीय भाषा संस्थान के द्वारा आयोजित सेमिनार में बीज वकत्व्य के रूप में पढा था .संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे 09871282073 पर भी संपर्क किया जा सकता है . )

हिन्दू पराक्रम का कैसे हो प्रतिकार

 
( भगाणा में दलित लडकियों पर बलात्कार के पीछे की हिन्दू और द्विज मानसिकता  और उसके प्रतिकार की पडताल में एच एल दुसाध का यह आलेख मह्त्वपूर्ण है. एच एल दुसाध हिन्दुस्तान में डायवर्सिटी के प्रवक्ता और संस्थापक विचारक हैं. )  
 
वैसे तो दलित-उत्पीड़न राष्ट्र के जीवन के दैनंदिन जीवन का अंग बन चुका
है.फिर भी रह-रहकर

एच एल दुसाध

ऐसी कुछ घटनाएँ हो जाती हैं कि इस समस्या पर नए सिरे से विचार
करना लाजिमी हो जाता है.हाल के दिनों में अल्प अन्तराल के मध्य दो ऐसी घटनाएँ
सामने आईं हैं.पहली घटना हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गाँव की है जहाँ 2012 में जाटों  द्वारा वहां के तमाम दलित परिवारों का बहिष्कार
कर दिया गया था जो अब भी जारी है.बहिष्कार के विरोध में सौ के करीब अपेक्षाकृत
चमार,खाती इत्यादि जैसी मजबूत दलित जातियों के लोग अपने परिवार और जानवरों सहित
हिसार के मिनी सचिवालय में खुले छत के नीचे आश्रय ले लिए और आज भी वहीँ रह रहे हैं
.किन्तु धानुक जैसी कमजोर दलित जाति के लोगों ने गाँव में ही टिके रहने का निर्णय
लिया.इन्ही धानुक जातियों  की चार लड़कियों
को भगाणा के दबंगों ने 23 मार्च को अगवा कर
दो दिनों तक सामूहिक बलात्कार किया.आठवीं और नौवीं क्लास में पढनेवाली इन लड़कियों
का सिर्फ इतना था कि वे पढना चाहती थीं और उनके अभिभावकों ने उन्हें इसकी इजाजत दे
रखी थी.वहां की दलित महिलाओं को अपने हरम में शामिल मानने  की मानसिकता से पुष्ट जाटों को यह मंजूर नहीं
था.लिहाज़ा उन्होंने इन लड़कियों को सजा देकर दलितों को उनकी औकात बता दी.

   इस ह्रदय विदारक घटना के बाद जब किसी
तरह लडकियां उनके परिवार वालों को मिली ,वे उनकी मेडिकल जांच  के लिए जिला अस्पताल पहुंचे जहाँ डाक्टरों ने जांच
में अनावश्यक बिलम्ब कर घोर असंवेदनशीलता का परिचय दिया.उधर पुलिस वालों ने नाम के
वास्ते एफ़आईआर  तो दर्ज कर ली किन्तु
दोषियों का नाम दर्ज नहीं किया.स्थानीय प्रशासन से हताश निराश पीड़ित परिवार दो
सप्ताह पहले दिल्ली पहुंचकर जंतर-मंतर पर
बैठकर इंसाफ की गुहार लगाने लगा.इनकी मांग है कि छुट्टा घूम रहे
बलात्कारियों की  अबिलम्ब गिरफ्तारी
हो;फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित कर छः महीने के अन्दर मामले की सुनवाई हो तथा बलात्कार
पीड़ितों एवं गाँव के समस्त बहिष्कृत परिवारों को गुडगाँव या फरीदाबाद में चार-चार
सौ गज का आवासीय भूखंड और एक-एक करोड़ रूपये मुआवजे के तौर पर दिए जांय.इसके साथ ही
उनकी उनकी मांग है कि पीड़ित लड़कियों के लिए शिक्षा की बेहतर व्यवस्था हो तथा
शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी दी जाय.
     देखते ही देखते भगाणा बलात्कार कांड के पीड़ितों इंसाफ दिलाने की मुहिम में दिल्ली के
ढेरों छात्र-शिक्षक,लेखक-एक्टिविस्ट जुड़ गए.किन्तु मीडिया की उदासीनता के कारण उसका
असर 2012 के 16 दिसंबर
को घटित निर्भया कांड जैसा नहीं हुआ.तब निर्भया को इन्साफ दिलानेवालों के सुर में
सुर मिलाते हुए मीडिया ने घटना को इतना हाईलाईट किया कि रायसीना हिल्स से लेकर
राजघाट,कोलकाता से कोयम्बटूर,कश्मीर से चेन्नई तक के लोग उस मुहिम  में शामिल हो गए.उसके फलस्वरूप महिलाओं के
खिलाफ यौन अपराध की रोकथाम के लिए जहाँ कानून में कई संशोधन हुए बही ‘निर्भया’ के नाम
पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बजट में हजार करोड़ का प्रावधान भी हुआ.किन्तु मीडिया
को भगाणा की घटना पर ज्यादा जोर इसलिए देना चाहिए था क्योंकि यह ‘निर्भया कांड’ से
ज्यादा गुरुतर मामला है.निर्भया काण्ड के पीछे जहां मुख्य रूप से ‘यौन –कुंठा’ की
क्रियाशीलता रही,वहीँ  भगाणा कांड के पीछे
यौन कुंठा के साथ एक उभरते समाज के मनोबल को तोड़ने तथा अपने  प्रभुत्व को नए सिरे से स्थापित करने का मनोवैज्ञानिक
सुख लूटने का सुचिंतित प्लान था.ऐसी ही घटनाओं के कारण 21वीं सदी में भी अन्तरराष्ट्रीय जगत में भारत की छवि
बर्बर व असभ्य राष्ट्र के रूप में पुख्ता  होती है.
   राष्ट्रीय राजधानी के
छात्र-शिक्षक,बुद्धिजीवी इत्यादि भगाणा पीड़ितों को न्याय दिलाने की चिंता में
व्यस्त थे कि दिल्ली बॉर्डर पर नोएडा के कनावनी गाँव में
29 अप्रैल को एक और बड़ी बारदात हो गयी.वहां दबंगों
ने दलितों की बस्ती में जमकर उत्पात मचाया और उनके घरों को तहस-नहस कर दिया.साथ ही
गाँव के स्कूल और ऑफिसों को भी जेसीबी  से
ढहा दिया.इतना ही नहीं दबंगों ने कई राउंड फायरिंग भी किया जिसमें  एक युवक की मौत हो गयी.छावनी में तब्दील उस गाँव
में पुलिस की उपस्थिति के बावजूद दलित प्राण-भय से   पलायन कर
गए हैं.
 
 
 
     बहरहाल जब-जब भगाणा या कनावनी जैसे
कांड होते हैं तो दलितों के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम व मानवाताबोध संपन्न हिन्दुओं के
खेमे में भी चिंता की लहर दौड़ जाती है.वे सभा संगोष्ठियाँ आयोजित एवं घटनास्थल का
मुयायना कर असहिष्णु हिन्दुओं के बर्बरोचित कार्य की निंदा करने एवं उनके विवेक को
झकझोरने का अभियान चलाते हैं.लेकिन नतीजा शिफर निकलता है.एक अन्तराल के बाद परवर्तित
स्थान पर उनकी दलित-विरोधी भावना का पुनः प्रकटीकरण हो ही जाता है.हिन्दू विवेक को
झकझोरने का अभियान इसलिए निष्प्रभावी होते रहता है क्योंकि दलितों की मानवीय सत्ता
हिन्दू धर्म-शास्त्रों द्वारा अस्वीकृत है.इसलिये शास्त्रों द्वारा मानवेतर रूप
में चिन्हित किया गया मानव समुदाय जब आम लोगों की भांति अपने मानवीय अधिकारों के प्रदर्शन
की हिमाकत करता है,धर्मनिष्ठ हिन्दू उन्हें उनकी औकात बताने के लिए कुम्हेर,चकवाडा
,एकलेरा ,नवलपुर,पिन्ट्री  देशमुख,सीखरा ,बेलछी,पिपरा,भगाणा,कनावनी
जैसे कांड अंजाम दे देते हैं.दलित-उत्पीडन में हिन्दू धर्म की क्रियाशीलता को देखते
हुए डॉ.आंबेडकर को कहना पड़ा था-‘हिन्दू जातिभेद इसलिए नहीं मानते कि वस्तुतः वे
क्रूर हैं या उनके मस्तिष्क में कुछ विकार है.वे जाति-भेद इसलिए मानते हैं कि उनका
धर्म जो प्राणों से भी प्यारा है ,उन्हें जाति-भेद मानने के लिए विवश करता है.अतः
कसूर उन धर्मशास्त्रों का है ,जिन्होंने उनकी ऐसी
मनोवृति कर दी है.’लेकिन हिन्दुओं के शास्त्र ही जब दलित उत्पीड़न  के लिए प्रधान रूप से जिम्मेवार तब तो यह क्रम
अनंतकाल तक चलता रहेगा ,क्योंकि तमाम कमियों के बावजूद ऐसा नहीं लगता कि हिन्दू
आगामी कुछ सौ वर्षो में अपने धर्म-शास्त्रों के प्रति पूरी तरह अनास्थाशील हो
जाएँगे.ऐसे में दलित-उत्पीड़न का प्रतिकार कैसे हो?
    जहां तक प्रतिकार का प्रश्न है
,डॉ.आंबेडकर ने वर्षों पहले उसका मार्गदर्शन कर दिया था.उन्होंने बताया था-‘ये
अत्याचार एक समाज पर दूसरे समर्थ समाज द्वारा हो रहे अन्याय और अत्याचार का प्रश्न
हैं.एक मनुष्य पर हो रहे अन्याय या अत्याचार का प्रश्न नहीं है,बल्कि एक वर्ग
द्वारा दूसरे वर्ग पर जबरदस्ती से किये जा रहे आक्रमण और जुल्म,शोषण तथा उत्पीडन
का प्रश्न है’.किस तरह से इस वर्ग कलह से अपना बचाव किया जा सकता है,उसका एकमेव
उपाय उन्होंने दलित वर्ग को अपने हाथ में सामर्थ्य और शक्ति इकठ्ठा करना बताया
था.वास्तव में डॉ.आंबेडकर ने दलितों को अपने अत्याचारी वर्ग से निजात दिलाने का जो
नुस्खा बाताया था वह सार्वदेशिक है.सारी दुनिया में ही जो अशक्त रहे उनपर ही सशक्त
वर्ग का अत्याचार व उत्पीड़न  होता
रहा.सर्वत्र ही ऐसे लोगों को सशक्त बनाकर सबल वर्गों के शोषण-उत्पीड़न से निजात
दिलाई गयी.अतः दलितों को भी हिन्दुओं के बर्बर अत्याचार से निजात दिलाने के लिए उनकी
सशक्तीकरण पर जोर देना होगा.अब जहाँ तक दलितों के सशक्तिकरण का सवाल है आजाद भारत में
तमाम सरकारें ही इस काम में लगे रहने का दावा करती रही हैं.पर बात इसलिए नहीं बनी
की देश के योजनाकारों ने दलित अशक्तिकरण की पहचान का बुनियादी काम ही नहीं किया.
     सारी
दुनिया में ही सभ्यता के हर काल में
धरती की छाती पर अशक्त समुदायों का वजूद
रहा और ऐसा इसलिए हुआ कि जिनके हाथ में सत्ता की बागडोर रही उन्होंने
जाति,नस्ल,धर्म इत्यादि के आधार बंटे विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के
मध्य शक्ति के स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक- का असमान बंटवारा कराकर ही
अशक्त समूहों को जन्म दिया.परिष्कृत भाषा में शक्ति के स्रोतों में सामाजिक  और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिबिम्बन कराकर
ही अशक्त सामाजिक समूहों को जन्म  दिया.जो
समूह शक्ति के स्रोतों पर जितना कब्ज़ा जमा सका वह उतना ही सशक्त और जो जितना ही
इससे वंचित रहा वह उतना ही अशक्त.सारी दुनिया में अश्वेतों ,महिलाओं व अन्य अल्पसंख्यक
अशक्त समूहों की समस्या
पर ध्यान दे तो पाएंगे कि उनको शक्ति के स्रोतों से
दूर रखकर ही अशक्त बनाया गया.सारी दुनिया की पराधीन कौमों के साथ यही समस्या रही
कि विजेताओं ने उन्हें शक्ति स्रोतों से वंचित कर उन्हें कष्ट में डाला.यदि सारी
दुनिया के विजेता गुलाम बनाए गए  लोगों को
शक्ति के स्रोतों में वाजिब शेयर दिए होते, दुनिया में कही भी स्वतंत्रता संग्राम
ही सगठित नहीं होता.अमेरिका का स्वाधीनता संग्राम,फ़्रांस की राज
क्रांति;गांधी,मार्टिन लूथर किंग(जू.)मंडेला का संघर्ष और कुछ शक्ति के स्रोतों के
असमान बंटवारे के विरुद्ध रहा.शक्ति के स्रोतों में सभी तबकों को न्यायोचित
हिस्सेदारी दिलाने के लिए ही ब्रितानी अवाम  ने 500 सालों
के सुदीर्घ संग्राम के बाद संसदीय प्रणाली की ईमारत खड़ी की.सदियों से सार्री
दुनिया में सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई और कुछ नहीं शक्ति के स्रोतों में अशक्त
लोगों को हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई मात्र है.
     जिन मानव समुदायों को शक्ति के
स्रोतों से वंचित कर अशक्त मानव समुदाय में तब्दील किया गया उनमें किसी की भी स्थिति
दलितों जैसी नहीं रही.मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी कौम को शक्ति के
तीनों प्रमुख स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक-से पूरी तरह वंचित नहीं किया
गया.मार्क्स के सर्वहाराओं सहित दुनिया के अधिकांश वंचित  कौमों को आर्थिक गतिविधियों से वंचित कर अशक्त
बनाया गया पर राजनीतिक और विशेषकर धार्मिक क्रियाकलाप तो उनके लिए पूरी तरह मुक्त
रहे.अमेरिका के नीग्रो स्लेवरी में जिन कालों का दलितों की भांति ही पशुवत
इस्तेमाल हुआ,उनके लिए पूजा-पाठ अब्राहम लिंकन के उदय पूर्व भी कभी निषिद्ध नहीं
रहा.यही कारण है जिस मार्टिन लूथर किंग (जू.)के मूवमेंट ने अश्वेतों की तकदीर बदल
दी वे बड़े धर्माधिकारी थे जिससे उनकी आवाज़ बड़ी आसानी से लोगों तक पहुँच गयी.आर्थिक
और राजनीति के क्षेत्र से हजारों साल से बहिष्कृत भारत के दलितों के लिए मार्टिन
लिथर की भांति धर्माधिकारी बनना तो दूर देवालयों में पहुँच कर सर्वशक्तिमान ईश्वर
के सामने अपने कष्टों के निवारण के लिए प्रार्थना करने तक का कोई अवसर नहीं
रहा.धार्मिक शक्ति के केंद्र से दलितों का बहिष्कार ही उन्हें अस्पृश्यता की खाई
में धकेलने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार है.हिन्दुओं ने देख लिया कि जब दलित
परमपिता परमेश्वर के घर से ही बहिष्कृत हैं तो हम उन्हें अपने करीब क्यों आने दें.
                मध्ययुग संतों और भारतीय रेनेसां के असंख्य महानायकों सहित ढेरों अन्य आधुनिक
चिंतकों ने दलितों की समस्या पर मगजपच्ची की पर आंबेडकर की भांति कोई भी उनके
अशक्तिकरण के कारणों को सम्पूर्णता में नहीं समझ पाया.इसलिए वे मानवेतरों को शक्ति
के स्रोतों में मुक्कमल हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई नहीं लड़ सके.गुलाम भारत में
जहां तमाम स्वतंत्रता संग्रामी अंग्रेजों के कब्जे में पड़ी आर्थिक और राजनीतिक
शक्ति हिन्दुओं के लिए छीनने में व्यस्त थे वहीँ आंबेडकर बड़ी मुश्किल हालात में
मानव जाति के सबसे अशक्त समूहों को शक्ति से लैस करने व्यस्त थे.उनके प्रयासों से  सदियों से बंद पड़े शक्ति के कुछ स्रोत दलितों के
लिए मुक्त हुए,पर सारे नहीं.स्मरण रहे डॉ.आंबेडकर अपने ज़माने में भारत के सबसे
असहयाय स्टेट्समैन रहे.यदि वे असहाय नहीं होते,शक्ति के सभी स्रोतों में दलितों की
हिस्सेदारी सुनिश्चित कर देते.लेकिन आजाद भारत में उनके बड़े से बड़े अनुसरणकारी
क्या दलितों की समस्या समझ पाए?मुझे लगता है नहीं.यदि वे दलितों की समस्या समझे
होते तो शक्ति के शेष स्रोतों में उनको हिस्सेदारी दिलाने का प्रयास करते.पर आजाद
भारत में तो शक्ति के सभी स्रोतों की बजाय टुकड़ों-टुकड़ों में हिस्सेदारी की लड़ाई
लड़ी जा रही है.कोई निजी क्षेत्र में आरक्षण की लड़ाई लड़ रहा है तो प्रमोशन में
आरक्षण की लड़ाई में अपनी उर्जा खपा रहा है.यही कारण है दलित शक्ति के स्रोतों में
मुक्कमल हिस्सेदारी से वंचित हैं.परिणामस्वरूप वे भगाणा और कनावनी में हिन्दू
पराक्रम के सामने असहाय व लाचार नजर आ रहे हैं.बहरहाल  दलित ही नहीं पिछड़े,अल्पसंख्यक और महिलाओं  के शक्ति समस्त स्रोतों में वाजिब शेयर दिलाने
के लिए डाइवर्सिटी से बेहतर कोई विचार तो शायद भारत भूमि पर आया नहीं.किन्तु अफ़सोस
के साथ कहना पड़ता है कि डाइवर्सिटी जैसे अचूक हथियार का इस्तेमाल करने में दलित
समाज  अभी भी खुलकर सामने नहीं आ रहा
है.

प्रसंग : मोदी और दलित

तुलसीराम

( जब द्विज समूह मोदी की
सत्ता की आगवानी के लिए पलक –पावडे बिछाये हुए है , तब मोदी को अति पिछडा और चाय
वाला गरीब बताने के बावजूद दलितों –पिछडों के बीच संदेह के पर्याप्त

तुलसीराम

कारण हैं,
गुजरात के डिटेल में न भी जाया जाय तो . यही संदेह है कि जैसे –जैसे चुनाव खत्म हो
रहे हैं, बिहार और उत्तरप्रदेश में मोदी और भाजपा का दम फूल रहा है. इस बीच
तुलसीराम जी का जनसत्ता में छपा यह आलेख मोदी और संघ परिवार के दलित विरोधी अभियानों
की गहन पडताल करता है. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए जनसत्ता से साभार )

 सैमुअल
हंटिगटन अपनी पुस्तक
‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ के शुरू
में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं- ‘दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो
दुश्मन निर्मित करो।’ मोदी का ‘परिवार’ इसी
दर्शन पर सन 1925
की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल
करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही
देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में
सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।
मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ
रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है।
इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ
आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व
हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू
करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके
चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर
देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में ‘अपार्थायड सिस्टम’ (भेदभावमूलक
पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां
दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता।
गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह
संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक
स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका
जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध
धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे
इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित
युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर
हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई
महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है।
गुजरात में दलित
इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला
न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना
नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे
गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई
थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है।
मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की
शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य
विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार
विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के
फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से ‘सामाजिक सद्भाव’ खतरे में
पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस
ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर
मोदी हमेशा खरा उतरते हैं।
सन 2000 में नई
शताब्दी
के आगमन के स्वागत में गुजरात
के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के
बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के
कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में
गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला
दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान
क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने
विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने
के लिए दे दिया।
नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं
पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक
सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत
जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद
से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ
दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि
इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।
इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस
कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के
लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता
है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए
नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते
ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा ‘अपार्थायड सिस्टम’ पूरे
गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने
दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही
संतुष्टि मिलती है।
तना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया
तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात
बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि
राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें
राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय ‘इंडियन
एक्सप्रेस’ ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ
मोदी के नेतृत्व में हो रहा था।
इस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है।
मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े
लोगों को दी जा रही हैं। ‘इंडियन
एक्सप्रेस’ के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद
गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को
इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे
मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग
से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है।
ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है।
गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां
वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है, जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का
विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है।
गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ
तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही
अपने बयान में कहा- ‘भारत की
वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस हमारे
धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।’ यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश
गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए ‘आरक्षण विरोधी
मोर्चा’ खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित
छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक
दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की
प्रयोगशाला कहा जा रहा है।
मोदी सेवा को दलित धर्म बताते हैं
उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को
आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत
में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार
पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे
डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो
डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके।
संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा
है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस
संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी
की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी
के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी।
इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया, जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण
की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप
मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है ‘टोकनिज्म’, दूसरा है, ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी’, यानी सबको समान
अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। ‘समान अवसर’ का इस्तेमाल सारी
दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ
परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए
आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित
विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा।
इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए।
अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा
चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का
दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित
पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत
करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना
खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर
बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी
भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों
के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा
के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन
लग गई। एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया
और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और
राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी।
मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं,
लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर
दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में
मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की
मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर
दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई
भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी
दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी
सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित
हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी
दलितों के हित में नहीं है।
मोदी के खिलाफ दलित जनमत
अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन ‘राम’ हैं। एक हैं रामराज
(उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में
भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये
तीनों ‘राम’, ‘रामराज’ लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध
बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए
उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब
बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के
खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने
दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के
दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन
में आ गए।
उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ
आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के
प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री
बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई
समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं।
हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन
सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं।
गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल
में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी
का प्रचार कर रहे हैं।
इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर
दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे
वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह
जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान
चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन
नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।