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कुमार मुकुल की दो कवितायें

कुमार मुकुल

चर्चित कवि कुमार मुकुल इन दिनों कल्पतरू एक्सप्रेस के स्थानीय सम्पादक हैं. संपर्क : 08791089601,kumarmukul07@gmail.com

   सिर्फ मेरी औरत

मैंने आलोक धन्वा– को पढा …..

‘क्या तुम एक ही बार खरीद लाए एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें…..’
मैंनें आलोक दा को पढा और मेरी औरत सिर्फ मेरी औरत नहीं रही

मनन करती हुई  मनुष्य हो गयी वह

मात्र स्त्री  नहीं रही

अब चिंतित हैं पुरूषगण और उनकी अनुगामिनियां

कि स्त्री  नहीं रही तो मेरा परिवार कैसे रहेगा

पर मैं देख रहा कि मेरी नहीं रही स्त्री अब ज्यादा मनुष्य है

मुझे किनारे करती हुई

तमाम लोगों के दुख सुख मे  शामिल हो पा रही वह
मेरे बच्चे अब केवल मेरे बच्चे  नहीं रहे

मेरी आकाशी सिताराकांक्षाओं से पार पाने में थकते टूटते या छूटते
छूट कर जा बसते सात समंदर पार

वे यहीं हमारे आजू बाजू अपने जैसे लोगों के साथ घुल मिल रहे हैं

मर खप रहे हैं

अमरता पर उनका विश्वास नहीं
कोई स्वर्ग  नहीं आकाशी
एक पुष्प – स्वपन  का बीज बन दाखिल हो जाना चाह रहे वे

अपने समय की धूल मिट्टी  में…।

  महानता से अलग

‘कितने घटिया हैं आप

किसने अधिकार दिया आपको यह सब करने का’

चीखती है वह

‘क्या बकवास कर रही हो’

‘बकवास नहीं
मैंने तो बस तुम्हारी नकल करनी चाही’

प्यार समर्पण सहअस्तित्व और न जाने क्या- क्या

और तुम्हारा वह पाठ

तू और मैं  तुम

मेरा कोई पाठ वाठ नहीं

वह तो तुम्हारी तथाकथित महानता की नकल की कोशिश थी बस

घृणा मृत्यु अनस्तित्व की ध्वनियां आ रहीं तुम्हा‍रे इस पाठ से’

‘आखिर क्या चाहती हो तुम’

‘यही तो समझना चाहती हूं मैं
जरा ठमक कर

कि आखिर क्या  चाहती हूं मैं

और तबतक यह फैसले लेना बंद रखो

जाओ कोई और काम करो’

‘और काम    मतलब’

‘मतलब अपनी महानता से अलग
कोई साधारण सा काम

जो करती रहती हैं हम औरतें
तमाम वक्त….। ‘

चालीस साल की स्त्री : कवितायें और विमर्श

( पता नहीं क्यों चालीस की एक उम्र सीमा के साथ इन दिनों स्त्रियां लिख रही हैं या उन्हें इस उम्र सीमा के साथ देखा जा रहा है. महिलाओं की उम्र सीमा पुरुषों के लिए सदियों से विमर्श का विषय रही है . 19 वीं शताब्दी मे समाज सुधारक शादी की उम्र को लेकर बहस में उलझे थे , 9 या 11 का गहन मंथन कर रहे थे . शादी की उम्र सीमा 18 हो जाने पर भी  16 वर्ष की रुमानियत हाल के दिनों तक पुरुष चेतना का हिस्सा थी , गाने गाये जाते थे ‘ तू  सोलह वरस की मैं सत्रह वरस का. पिछले दिनों फेसबुक पर चालीस की उम्रसीमा के सन्दर्भ से कुछ कवितायें पढने को मिलीं फिर हिन्दी की मह्त्वपूर्ण पत्रिका पाखी के सम्पादक प्रेम भारद्वाज ने चालीस की महिलाओं को अपने सम्पादकीय का विषय बनाया. स्त्रीकाल पर उक्त सम्पादकीय की आलोचना करते हुए दो आलेख प्रस्तुत किये गये. अब चालीस की उम्र सीमा के सन्दर्भ से लिखी गई कुछ कवितायें स्त्रीकाल के पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत हैं , क्रमशः कलावंती सिंह , अंजू , शर्मा , सुशीला शिवरान , सोनी पांडेय , वीणा वत्सल सिंह, निवेदिता  और शायक आलोक की कवितायें . इन कविताओं की स्त्रीवादी आलोचना का स्वागत है . पाखी के सम्पादकीय और उसकी आलोचना के लिए स्त्रीकाल पर प्रस्तुत दो आलेख पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें 🙂

हाशिये का हर्फ या वर्चस्ववादी विमर्श

हर पुरुष अपनी चमडी के भीतर मर्द ही होता है 

पाखी का सम्पादकीय : मैं चांद पर हूं .. मगर कब तक

कवितायें ……

चालीस पार की औरत

कलावंती सिंह

एक

किसी बरसात की
घनघोर बारिशवाली रात
एक चालीस
पार की औरत
भीगती हुई थरथराती है
कुछ अघोरी आवाजें
हर वक्त उसका पीछा करती हैं
यह बरगद की जटा पकड़कर
झूलनेवाली डायनों की आवाजें हैं
वे हर अमावस की रात
बरगद की जड़ें पकड़कर
खेलती हैं छुआ-छुई का खेल

चालीस पार की औरत को लगता है
ठीक बरगद की तरह ही ठहर गई है उसकी जिंदगी भी
वे जहाँ हैं वहाँ से हिल भी नहीं सकतीं
कभी कभी उन्हें लगता है
बरगद की झूलती हुई जड़ें
उनके ही खुले हुए केश हैं
रातभर अपनी चिंताओं और कुंठाओं के साथ
वे ही उनमें झूलती हैं।

दो

कभी कभी बड़ी खतरनाक होती है
यह चालीस पार की औरत
वह तुम्हें ठीक ठीक पहचानती है जिसे
तुम नहीं पढ़ा सकते चालीस का पहाड़ा
क्योंकि वह खुद को भी अच्छी तरह पहचानती है
वह समझती है जीवन का ऊँच नीच
जानती है कहाँ लपेटेंगे उसे पंक कीच
वह तुम्हारे छल पहचानती है
और हँसती है एक निष्छल हँसी
वह घूमती है तीनों लोकों में
तीनों युगों में – त्रेता, द्वापर और कलियुग।
बचाए रहती है अपने हिस्से का सतयुग
वह पानी पिला भी सकती है
और पानी उतार भी सकती है
चालीस पार की औरत के पास होती है सत्ता
उसके अपने संविधान के साथ।
बड़ी खुद्दार हैं, खुदमुख्तार हैं ये

चालीस साला औरतें

अंजू शर्मा

इन अलसाई आँखों ने
रात भर जाग कर खरीदे हैं
कुछ बंजारा सपने
सालों से पोस्टपोन की गई
उम्मीदें उफान पर हैं
कि पूरे होने का यही वक्त
तय हुआ होगा शायद

अभी नन्हीं उँगलियों से जरा ढीली ही हुई है
इन हाथों की पकड़
कि थिरक रहे हैं वे कीबोर्ड पर
उड़ाने लगे हैं उमंगों की पतंगे
लिखने लगे हैं बगावतों की नित नई दास्तान,
सँभालो उन्हे कि घी-तेल लगा आँचल
अब बनने को ही है परचम

कंधों को छूने लगी नौनिहालों की लंबाई
और साथ बढ़ने लगा है सुसुप्त उम्मीदों का भी कद
और जिनके जूतों में समाने लगे है नन्हें नन्हें पाँव
वे पाँव नापने को तैयार हैं
यथार्थ के धरातल का नया सफर

बेफिक्र हैं कलमों में घुलती चाँदी से
चश्मे के बदलते नंबर से
हार्मोन्स के असंतुलन से
अवसाद से अक्सर बदलते मूड से
मीनोपाज की आहट के साइड एफेक्ट्स से
किसे परवाह है,
ये मस्ती, ये बेपरवाही,
गवाह है कि बदलने लगी है ख्वाबों की लिपि

वे उठा चुकी हैं दबी हँसी से पहरे
वे मुक्त हैं अब प्रसूतिगृहों से,
मुक्त हैं जागकर कटी नेपी बदलती रातों से,
मुक्त हैं पति और बच्चों की व्यस्तताओं की चिंता से,

ये जो फैली हुई कमर का घेरा है न
ये दरअसल अनुभवों के वलयों का स्थायी पता है
और ये आँखों के इर्द गिर्द लकीरों का जाल है
वह हिसाब है उन सालों का जो अनाज बन
समाते रहे गृहस्थी की चक्की में

ये चर्बी नहीं
ये सेलुलाइड नहीं
ये स्ट्रेच मार्क्स नहीं
ये दरअसल छुपी, दमित इच्छाओं की पोटलियाँ हैं
जिनकी पदचापें अब नई दुनिया का द्वार ठकठकाने लगीं हैं
ये अलमारी के भीतर के चोर-खाने में छुपे प्रेमपत्र हैं
जिसकी तहों में असफल प्रेम की आहें हैं
ये किसी कोने में चुपके से चखी गई शराब की घूँटें है
जिसके कड़वेपन से बँधी हैं कई अकेली रातें,
ये उपवास के दिनों का वक्त गिनता सलाद है
जिसकी निगाहें सिर्फ अब चाँद नहीं सितारों पर है,
ये अंगवस्त्रों की उधड़ी सीवनें हैं
जिनके पास कई खामोश किस्से हैं
ये भगोने में अंत में बची तरकारी है
जिसने मैगी के साथ रतजगा काटा है

अपनी पूर्ववर्तियों से ठीक अलग
वे नहीं ढूँढ़ती हैं देवालयों में
देह की अनसुनी पुकार का समाधान
अपनी कामनाओं के ज्वार पर अब वे हँस देती हैं ठठाकर,
भूल जाती हैं जिंदगी की आपाधापी
कर देती शेयर एक रोमांटिक सा गाना,
मशगूल हो जाती हैं लिखने में एक प्रेम कविता,
पढ़ पाओ तो पढ़ो उन्हें
कि वे औरतें इतनी बार दोहराई गई कहानियाँ हैं
कि उनके चेहरों पर लिखा है उनका सारांश भी,
उनके प्रोफाइल पिक सा रंगीन न भी हो उनका जीवन
तो भी वे भरने को प्रतिबद्ध हैं अपने आभासी जीवन में
इंद्रधनुष के सातों रंग,
जी हाँ, वे फेसबुक पर मौजूद चालीस साला औरतें हैं

चालीस साला औरतें

सुशीला शिवराण

मुर्गे की बाँग से पहले
उठ जाती हैं चालीस साला औरतें
घड़ी के अलार्म से पहले
घनघना उठता है उनके मन का अलार्म
और पाँवों में लग जाते हैं पहिए
बल्ब, ट्यूब-लाईट की रोशनी को
मात देती है तीन-चार बर्नरों की लौ
मशीन हो जाते हैं हाथ
उम्र को धता बताते हुए।

कलफ़ लगी सलीके से पहनी साड़ी
सधे क़दमों से बढ़ती हैं गाड़ी की ओर
रसॊईवाले हाथों की
चपलता, सतर्कता
संभाल लेती है स्टीयरिंग
कलियों-सी मुस्कान बिखेरती
फूलों-सी महक लिए
दफ़्तर में दाखिल होती हैं
चालीस साला औरतें।

थकी-हारी पहुँचती हैं घर
एक चुस्की चाय
चहकते बच्चों की मुस्कान
भर देती है ऊर्जा से
बच्चों की पढ़ाई
दफ़्तर की गुफ्तगू
घर की बातें
समस्याएँ, चुनौतियाँ
चाँदी बन झाँकने लगती हैं
सुरूचि से बंधी केशराशि से
बच्चों की उपलब्धियों से
हो जाती हैं गरिमामयी
बच्चों की ट्रॉफियों की चमक से
दिपदिपाती हैं चालीस साला औरतें।

तृप्त मन लिए
रसोई में हो जाती हैं अन्नपूर्णा
कामवाली बाई अचरज से देखती है इन्हें
दीदी कभी थकती नहीं !
रात के खाने पर
पुडिंग में घोल देती हैं
ढेर-सी नेह की मिठास
बच्चों की तारीफ़ से
पिया की नेहभरी चितवन से
हो जाती हैं बाग़-बाग़
चालीस साला औरतें।

बिस्तर पर निढाल
थका तन, ताज़ा मन लिए
अगले दिन का ख़ाका बना
बेहद सुकून की
सबसे मीठी नींद सोती हैं
चालीस साला औरतें।

उम्र के चालीसवे पायदान पर 

सोनी पांडेय

एक

उम्र के चालीसवेँ पायदान पर
खडी मैँ देख रहीँ हूँ पलट कर
जीवन अध्याय ।
जीवन कभी अल्मस्त , अल्हड सी गाँव की गुईयाँ संग खेले गये
गुड्डे और गुडिया की कहानी तो
कभी माँ के गीतोँ मेँ पिरोये
राजा और रानी के जीवन संघर्ष की कहानी लगता है ।
धीरे – धीरे छूटते गये
रेत की तरह फिसलते गये
मुट्ठी मेँ कैद बचपन के स्वप्न
किशोर मन की आकाँक्षा
वो पहले प्रेम – पत्र की गुदगुदाहट
और युवा मन की बेचैन अभिलाषाओँ का अर्न्तद्वन्द
कैद ही रहा चौखट के भीतर
तुलसी के चौरे पर बँधे कलावे की तरह जीवन आँगन और गलियारे के मध्य भटकते हुए
बीत गया संस्कारोँ के बिहड मेँ
जीवन के बीस वर्ष ।
उम्र के चालीसवेँ पायदन पर बैठी निहारती हूँ
जीवन के मध्य का इतिहास
तो पाती हूँ सर्वत्र अपने मैँ का बिखरा हुआ भग्नावशेष
और कण्ठ तक रुका पडा विष
जो अभी तक रुका है ठीक ह्रदय के ऊपर
बैठी हूँ बनकर नीलकण्ठ ।
बीस के बाद मैँ पृथ्वी के रंगमँच पर ,
निभाती रही माँ , बहन , बेटी .बहू .पत्नी का किरदार
पाती रही स्वर्णपदक
मार कर खुद के अस्तित्व को ।
बचतन छूट गया . पीछे . बहुत पीछे
चलता रहा समय चक्र ।

दो

उम्र के चालीसवेँ पायदान पर
बैठी , देख रही हूँ
कि , अब मैँ जीवन समर मेँ
ठहरी हुयी , स्थिर मैदानी नदी हूँ ।
अब नहीँ आते स्वप्न रंग- बिरंगे
नाचते , गाते , रुठते , मनाते
बचपन के ।
युवा मन की तरंग , जो बहा ले जाना चाहती थी
तमाम बेमानी वर्जनाओँ को ।
अब मैँ शिकायत नहीँ करती पिता से
कि क्योँ ब्याह कर भेज दिया
पराये देश ।
अब मैँ निकल पडी हूँ निश्चिँत
खुद की तलाश मेँ
निभाते हुए डयोढी की शर्त ।
शारीरिक . मानसिक . सामजिक , अनुबन्धोँ को धीरे – धीरे रख रही हूँ
तुलसी के चौरे पर बने ताखे मेँ
और खोज रही हूँ अपने हिस्से का आकाश
लिख रही हूँ ” बदनाम औरतोँ ” का सच
दर्ज कर रही हूँ ” तीसरी बेटी का हलफनामा ”
अब देवालयोँ मेँ नहीँ लगाती आस्था के फेरे
ये समय बीतता है अनुभव के पुस्तकालय मेँ
पढती हूँ . रचती हूँ . देखती हूँ .
सुनती हूँ, जीवन समर मेँ
गुनती हूँ , चुनती हूँ समुद्र से कुछ मनके
और सजा देती हूँ टूटती हुई वर्जनाओँ के द्वार पर टाँक कर तोरण मेँ ।
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर ।

तीन 
 
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर बैठी
मैँ देख रही हूँ . बीते हुए पतझड और बसन्त
वर्षा और धूप
पाती हूँ
मेरी उँगली थाम चलने वाले पौधे , भाग रहे हैँ सरपट
निबटा चुकी हूँ जीवन के साठ प्रतिशत काम
फिरभी कुछ रिक्त है ।
अब थक चुकी हूँ बुहारते हुए आँगन
चढते हुए मन्दिर की सीढियाँ
आस्था – अनास्था का द्वन्द
जारी है
अब नहीँ लगती मुझे देवी की मूर्ति ,सच्ची
वह पुरुष सत्ता की साजिश के तहत
कैद , मन्दिरोँ मेँ
उपयोग की हुई वस्तु लगती है ।
और मैँ निकल पडी हूँ अब
तलाशने , अपना अस्तित्व
हाँ
उम्र के चालीसवेँ पायादन पर
मैँ खुद को पहचाने लगी हूँ
इस लिये माँग लायी हूँ
कुम्हार से चाक
कुछ शब्दोँ की गिली माटी का लोना
और गढ रही हूँ
हाशिये पर बिखरे हर्फ़ से
जीवन का मजबूत गढ
जहाँ चल रही है कोशिश
रचने की . एक नयी कहानी ,
क्योँ कि मैँ जान चुकी हूँ कि
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर , एक बार फिरसे
जन्म लेती है औरत ,और लिखती है
जीवन की कहानी
यहाँ कोयी राजा है न रानी ।

चार

उम्र के इस पायदान पर
मुक्त हो शारीरिक अनचाही
क्रियाओँ से औरत निश्चिँत एक नया अध्याय लिख रही है
अब गीता , मानस , मन्दिर की परिक्रमा छोड , रच रही है
शब्दोँ की तुलिका से यौवन के गीत ।
हाँ मैँ देख रही हूँ कि ये औरतेँ अपनी दमित इच्छाओँ को फिरसे जगा ,रंग भर रही है सपनोँ के खाली कैनवास पर ।
ये जानती और पहचानती हैँ धरती की गहराई और आकाश के विस्तार को . इस लिये सधे कदमोँ से भरतीँ हैँ उडान ।
ये तितली के मन की बात सुन सकती हैँ और भँवरोँ के मधुर गान के धुन पर नाच सकतीँ हैँ
दिखा सकती हैँ अपने सधे कदमोँ का हुनर . जहान को ।
ये औरतेँ जो केवल जीती रहीँ
वर्जनाओँ के दायरे मेँ जीवन
अब निकल रही हैँ ठीक पृथ्वी की नाभी से लेकर अमृत कलश
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर ।

चालीस पार की औरतें 

वीणा वत्सल सिंह

कुछ कच्चे कुछ पके सपनों की
दहलीज पर खडी होती हैं
चालीस पार की औरतें
जीवन के सच को पह्चानती
कर्तव्यों की वेदी पर
स्वयं को चढ़ाए होती हैं
चालीस पार की औरतें
इन्हें अब
दूध का उफन कर गिरना
उद्वेलित नहीं करता
हाथ से छूटकर
शीशे का टूटना
इनके ह्रदय की आहट नहीं होता
ये हर छोटी – बड़ी घटनाओं का
सच पहचान लेती हैं
चीडियों की चहचहाहट पर
पहले की तरह उमग कर नहीं हँसतीं
बस ,मुस्कुराकर
बच्चों को उनके चहकने की महत्ता
बताने लगती हैं
चालीस पार की औरतें

एकदम अलग होती हैं
एक अल्हड किशोरी
अपने से कम उम्र की औरतों से
चालीस पार कीऔरतें

पुरुष में प्रेम नहीं
प्रेम में पुरुष को
तलाशती हैं
जीवन के कड़वेपन को
आँसुओं के साथ घोल
चुपचुपाप पीने में
माहीर होती हैं
ये चालीस पार की औरतें

चालीस की उम्र
निवेदिता

मैं एक मीठी नींद लेना चाहती हूँ
40 की उम्र में भी चाहती हूँ कि
मेरे सर पर हाथ रख कर कोई कहे
सब ठीक हो जाएगा
ठीक वैसे ही जैसे बचपन में माँ
हमें बहलाया करती थी
हमारी उम्मीदें जगाती थीं

मैं इस उम्र में माँ की गोद में
सुकून की नींद लेना चाहती हूँ
उसके सीने से लिपट जी भर रोना चाहती हूँ

जानती हूँ समय ठहरता नहीं
बचपन पीछे लौट चुका है
फिर भी बार-बार मेरे आइने में मुस्कुराता है
मैं फिर से नन्हीं बच्ची की तरह
बेवजह रोना खिलखिलाना चाहती हूँ

मैंने तो कई सदियां गुज़ारी है
हर सदी में स्त्री का दुख एक सा है
हर सदी की स्त्री का संघर्ष
घर की दीवारों में दफ़न है
हर सदी में वह अपने को मिटाती रही है
घर के लिए सुकून और ख़ुशी तलाशती रही है
वह आंधी और तूफ़ानों के बीच कुछ रौशनी बचा लाई है
उस दिन के लिए जब बच्चे आएँगे तो उजाले में वह उनसे मिलेगी
और उनकी आँखों में तलाशेगी अपने लिए आदर और प्यार
कि बच्चे एक दिन कहेंगे
यह वही उजाला है जिसे हमारी माँ ने
सूरज से चुराया था
बादलों से छिपाया था
हवा के थपेड़ों से बचाया था
वह रोशनी है यह जिससे रौशन है इन्सान

चालीस पार की औरतें

शायकआलोक

सुनो तुम आसमान में चिन्ह लो एक तारा और करो उसे आँखों के इशारे
कहो उसे आँखों ही से कि करती हूँ तुम्हें जहाँ भर का प्रेम
तारे को उठा ले आया करो सिरहाने तक
उसे देर तक चूमकर अपनी पीठ से सटा कर सोया करो
उसे कहो वह देता रहे तुम्हें थपकियाँ
उसकी नाक तुम्हारी गर्दन पर
उसकी जीभ तुम्हारे कान पर हो.

तुम चिट्ठियों में लिख दो अपना सारा प्रेम
हलन्त-अल्पविराम-विस्मयादी में दर्ज करो मन के दुःख
और चिट्ठियों को नदी में बहा दो.

तुम्हारी इच्छा है कि तुम अपने बालों का रंग सुनहरा कर लो
बदल लो तुम अपने कपडे पहनने का तरीका
आँखों के कोर पर ही नहीं पलकों पर भी चढ़ा लो काजल का मोटा रंग
गोल बिंदी के बजाय तीर बनाया करो माथे पर.

और सुनो तुम मंगलसूत्र को बक्से में रख दो कुछ दिन.

तुम घर में अपना एक कोना बना लो
हाथों में कुछ लकीरें रखो जिसे अपनी इच्छा पर मन पर बिस्तर पर
खेंच दो कहीं भी आवश्यकतानुसार
तुम चाहो तो गले से कुछ गुनगुना लो
और मन हो तो कह दो कि इन दिनों मौन के प्रयोग पर हो तुम.

सुनो परले मकान की चालीस पार औरत
जरुरी है कि तुम कभी कभी आवारा हो जाया करो
बेहद जरुरी कि बेबात लम्पटों की तरह भी मुस्कुराया करो.

दलित आलोचना अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती : प्रोफ . मैनेजर पाण्डेय

( वरिष्ठ आलोचक प्रोफ. मैनेजर पाण्डेय से हिन्दी आलोचना के विकास और प्रवृत्तियों पर ‘ लहक’ के लिए यह बातचीत स्त्रीकाल के सम्पादक द्वय संजीव चन्दन और धर्मवीर सिंह ने की. इस विस्तृत बातचीत में दलित आलोचना ,स्त्रीवादी आलोचना सहित साहित्य की विभिन्न आलोचाना पद्धति की बातचीत तो है ही साथ ही उदय प्रकाश , उर्मिलेश के साथ हुए भेद भाव  या पाण्डेय जी के द्वारा आलोचना के संभावित नामों में द्विज चुनाव पर काफी तल्खी से बातचीत हुई है . प्राश्निकों ने उन्हें घेरा है , कहीं वे तंज, कही व्यंग्य और कहीं दृढ़ता से अपना पक्ष रखते हुए अपनी बात कहते हैं . आलोचना का भविष्य जिनमें उन्हें दिखता है वे हैं , पंकज चतुर्वेदी , ज्योतिष जोशी और जीतेंन्द्र श्रीवास्तव . प्राश्निकों ने  यहीं से तीखे सवाल शुरू किये हैं , इन तीन नामों की उपयुक्तता से परे सवाल . बातचीत अंततः बहुत आत्मीय माहौल में हुई . यह बातचीत कई मायने में ऐतिहासिक , विचारोत्तेजक और जानकारियों से संपन्न है , विवादास्पद भी .  )

इस साक्षात्कार के अवसर पर स्त्रीकाल के संपादकों से बातचीत करते हुए प्रोफ मैनेजर पाण्डेय

शुरुआत एक सामान्य सवाल से ही की जाए, आचार्य शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना के विकास को आप किस तरह देखते है? आलोचकों के एक वर्ग का यह मानना है कि हिंदी आलोचना आज भी शुक्ल जी से आगे नहीं बढ़ पाई है?

देखिए, ऐसा है कि हिंदी आलोचना में एक खास प्रवृति है व्यक्ति पूजा की। यदि सम्पूर्ण हिंदी साहित्य की बात छोडकर केवल हिंदी आलोचना पर ही बात करुं तो आपको बीसो जगह यह लिखा मिल जाएगा कि नामवर जी के बाद हिंदी आलोचना स्थिर हो गई या रामविलास जी के बाद आलोचना में कुछ नहीं हुआ। कुछ नामवर जी को मानने वाले है, कुछ रामविलास जी को। लेकिन दोनों का कहना यही है कि  इनके बाद आलोचना में कुछ नहीं हुआ। ज्यादा अच्छा यह होगा  कि इस व्यक्ति पूजा की प्रवृत्ति को छोड़कर हम परवर्ती आलोचना की प्रमुुख प्रवृत्तियों , उसका विकास एवं उसकी परिस्थितियों पर विचार करें। यदि विस्तार से देखें  तो आचार्य शुक्ल के बाद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ही उनसे भिन्न इतिहास और आलोचना-दृष्टि विकसित करते हुए आलोचना लिखी तब यह बताइये कि क्या इससे हिंदी आलोचना आगे बढ़ी या पीछे गई.  शुक्ल जी  के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद भी आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी ने उनसे भिन्न दृष्टि अपनाते हुए छायावाद की आलोचना लिखी। छायावाद और उसके सबसे बडे कवि माने जाने वाले निराला की जो आलोचना रामविलास शर्मा ने लिखी उससे क्या हिंदी आलोचना शुक्ल जी से आगे नहीं बढ़ी? नामवर जी की छायावाद वाली पुस्तक से क्या हिंदी आलोचना आगे नहीं बढ़ी? इसने पाठकों की दृष्टि विकसित की। जाहिर है कि आगे बढ़ी। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि आचार्य शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना का कोई विकास नहीं हुआ। इससे आगे कि बात मैं इसलिए नहीं करना चाहता कि उसमें कहीं न कहीं मै भी हूं .

तब क्या हजारी प्रसाद द्विवेदी की कबीर पर जो आलोचना है उसे इस तरह देखा जाए कि आचार्य शुक्ल पर उनका ब्राम्हणवाद अधिक हावी था, कबीर द्विवेदी जी की आलोचना दृष्टि का एक शिफ्ट  है?

रामचन्द्र शुक्ल को ब्राम्हणवादी कहना कुल मिलाकर देखा जाए तो दलित-दृष्टि से साहित्य पर विचार करना है । अगर आचार्य शुक्ल ब्राम्हणवादी थे तो जिस जायसी का हिंदी में कहीं नाम नहीं था उसकी सम्पूर्ण ग्रंथावली को 200 पृष्ट की भूमिका के साथ क्यों प्रकाशित करवाते? इसलिए यह  कहना मुझे उचित नहीं जान पड़ता कि शुक्ल जी ब्राम्हणवादी थे।

यह क्या आप रचनाकारों की खोज के आधार पर कह रहे हैं या किसी नवीन सैंद्धांतिकी की दृष्टि से आलोचना के सन्दर्भ में कह रहे है?

यह दूसरे किस्म का सवाल हुुआ। लेकिन मैं कहना चाहूंग  कि जिसने  हिंदी आलोचना की सैद्धांतिक  सोच का विकास किया,  वे थे मुक्तिबोध। लेकिन उन्हे कोई पढे़ ही नही ,तो कथावाचक की तरह मुक्तिबोध तो हर घर पर बता कर नहीं आ सकते। इस बात को लेकर कम से कम चार बार तो मैने ही लिखा है। आचार्य शुक्ल के आलोचना कर्म की एक खास विशेषता यह थी  कि वे जितने भारतीय काव्यशास्त्रियों की पम्परा से जुडे थे वहीं पाश्चात्य काव्यशास्त्र का भी उन्हे गम्भीर एवं विशद ज्ञान था। बाद में आलोचना के भारतीय एवं पाश्चात्य चिंतन से जुडे लोग अलग-अलग हो गए अतः समग्र दृष्टि विकसित नहीं हुई। प्रगतिशील हिंदी आलोचना के दौर में तो सैंद्वांतिकी की बहुत कम जरुरत रह गई थी क्योंकि उसका सैंद्वांतिक आधार मार्क्सवाद  था। नामवर जी ने इस पर लिखा है बल्कि उन्होने कई बार कहा भी है कि आलोचना तो व्यावहारिक ही होती है, सैद्वांतिकी कोई आलोचना नहीं होती।

प्रोफ. मैनेजर पाण्डेय

मुक्तिबोध के यहां से किस तरह सैद्वांतिक विकास  आप देख रहे है?

देखिए, मुक्तिबोध सबसे पहले कामायनी की व्याख्या एक फैंटेसी मानकर करते हैं,  वे उसे बुर्जआ वर्ग की अंतिम प्रतिनिधि कृति कहते हैं । कामायनी की इस ढंग कि व्याख्या न तो मुक्ति बोध से पहले हुई तथा न उसके बाद में। उन्होने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि ’साहित्य रचना एक सांस्कृतिक कर्म है’ यह बात व्याख्या की मांग करती है ’एक साहित्य की डायरी’ में उन्होने काव्य की रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए सृजन के तीन क्षणों की बात कही है। यानी मुक्तिबोध से पहले आलेाचना में रचना प्रक्रिया का क्षेत्र उपेक्षित था जिस पर उन्होने बात करके एक नवीन सैंद्वांतिक पक्ष रखा।

यदि परवर्ती आलोचना के विकास की बात की जाए  तो क्या आप दलित चिंतन की दृष्टि से हिंदी आलोचना का विकास नहीं देखते ! दलित आलोचना  विचार के स्तर पर वह अम्बेडकरी चिंतन से प्रेरणा लेते हुए नई सौन्दर्य एवं कला दृष्टि की बात करती है?

रामचंद्र शुक्ल

चिंतन का विकास असहमति , खण्डन-मण्डन एवं द्वंद्व की प्रक्रिया से होता है . काव्याशास्त्रीय दृष्टि से देखे तो पश्चिम में यह प्लेटों अरस्तु से लेकर आई ए रिचर्डस तक एवं भारतीय संदर्भो में भरत मुनि से लेकर जगन्नाथ तक यही द्वंद और असहमति की पंरपरा रही है.   दलित दृष्टि की सीमा यह है  कि वह अपने प्रति असहमति को बर्दाश्त  नहीं कर सकती।वह स्वयं के कहे और लिखे को ही श्रेष्ठ मानती है इसलिए अगर वैचारिक विकास की प्रक्रिया का ही अनुसरण नहीं किया जा रहा है तो वहाॅ विकास कैसे होगा?

लेकिन दलित साहित्य और आलोचना दृष्टि साहित्य में एक वैचारिक शिप्ट तो है ही ,जैसे धर्मवीर की कबीर संबंधी आलोचना.  क्या यह कबीर के साहित्य को देखने की अलग दृष्टि नहीं है, क्या इससे हिंदी आलोचना समृद्ध नहीं हुई?

कबीर संबंधी धर्मवीर की जो पुस्तक है वह कबीर पर नहीं; कबीर के आलोचकों पर है। यही उनकी पुस्तक का नाम भी है । कबीर की कविता की किन्ही चार पंक्तियों की भी उनकी कोई विशिष्ट व्याख्या हो तो कोई मुझे बताये। धर्मवीर को मैं मानता था। मैने ही उन्हे जे एन यू में बुलाया भी था। फोन पर बातचीत में उन्होने कहा कि मै कबीर तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बोलना चाहता हॅू। लेकिन इस पर होने वाले विवाद को आप किस तरह शांत कर पायेगें इस पर मैने उन्हे आश्वस्त किया कि हमारे विश्वविद्यालय के विद्यार्थी आप से सवाल कर सकते हैं बहस कर सकते है। लेकिन मारपीट नहीं करेंगें और वही हुआ भी । उनसे किसी ने गलत ढंग से यह नहीं कहा कि आप ऐसा क्यों कह  रहे है? लेकिन बाद में उन्होने मेरे बारे में ही जो कुछ लिखा, तब से मैने उन्हे पढ़ना छोड दिया। एक घटना का जिक्र करना चाहुॅंगा । धर्मवीर की इसी पुस्तक पर एक गोष्ठी हुई थी। मै पूरी तैयारी के साथ इस गोष्ठी में गया और मैने कहा कि धर्मवीर की यह पुस्तक दलित विमर्श की पुस्तक है . इसी पर धर्मवीर नाराज हो गये। और कुछ दिन बाद राष्ट्रीय सहारा में श्यौरान सिंह बेचैन ने लेख लिखकर कहा कि आखिर मैनेजर पाण्डेय का पाण्डेयत्व प्रगट हो ही गया। अब  इसके बाद संवाद की कोई गुंजाइश बचती हे क्या?

लेकिन आप तो दलित और स्त्री दोनों विमर्शो को समर्थन करते रहे है?

हाॅ, लेकिन इसका उनके लिए कोई महत्व नहीं है।

 खैर, लेकिन शरण कुमार लिंबाले आदि  ने जिस भिन्न  सौंदर्य दृष्टि की बात की है, उसके बारे में ,,,,,,?

शरण कुमार लिम्बाले हिन्दी  के लेखक नहीं है। इसलिए मैं उनके चिन्तन को हिंदी आलोचना का हिस्सा नहीं मानता। दूसरे मराठी के लेखक ऐसा व्यवहार नहीं करते जैसे हिंदी के दलित लेखक करते हैं  मैं फिर एक घटना का जिक्र करना चाहता हॅू हालांकि यह फिर व्यक्तिगत हो रहा है। हजारीबाग में एक गोष्ठी रमणिका  गुप्ता ने आयोजित करवाई थी.  मैंने  दलित साहित्य के पक्ष में बोला लेकिन दलित साहित्यकारों का व्यवहार वही रहा जिसके बारे में मैने पहले कहा। बाद में शरण कुमार लिम्बाले आये और उन्होनें कहा कि “हम लोग हिंदी के लेखकों , आलोचकों से सीखते है और आप हिंदी के लोग  दूसरे का सम्मान करना नहीं जानते ।’  इसलिए मैने तय कर लिया है कि अब दलित साहित्य पर नहीं बोलूॅगा।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

लेकिन हम तो कुछ ही समय बाद आपको दलित अस्मिता पर होने वाली संगोष्ठी के  उद्घाटन सत्र में बुलाना चाह रहे हैं?

भले ही कोई सत्र हो; लेकिन मै नहीं बोलूॅगा। अभी कुछ ही समय पूर्व बाल्मीकि जी का देहांत हुआ है। मैं उनकी बहुत सी शोक सभाओं में गया। मैं खुद वाल्मीकि जी को हिंदी का महत्वपूर्ण लेखक मानता हूँ  लेकिन उनका व्यवहार ऐसा नहीं था जो शेष हिंदी के दलित लेखकों का है। लअब मैने न बोलना ही तय कर लिया है।

आप अपनी सैद्धांतिक आलोचना के लिए कुछ कह रहे थे?

देखिए आत्मप्रशंसा ठीक नहीं है। लेकिन इस संदर्भ में मै अपनी तीन पुस्तकों पर बात करना चाहूंगा । पहली है- साहित्य और इतिहास दृष्टि यह आधी सिद्धांत और आधी व्यवहार की पुस्तक है। यानी पहले भाग मेें साहित्य तथा इतिहास से जुडी  सैद्धांतिक  चार्चाए है तो दूसरे भाग में आ0 शुक्ल, हजाारी प्रसाद द्विवेदी ,रामविलास शर्मा आदि की इतिहास दृष्टि का विश्लेषण है। दूसरी, मेंरी किताब साहित्य के समाज शास्त्र की भूमिका है यह पुस्तक सैंद्धांतिक आलोचना की  अधिक है, उसमे व्यवहारिक आलोचना कम है। मेरा एक निबंध है-उपन्यास और लोकतंत्र। मेरी अपनी जानकरी में हिंदी में इस तरह का कोई निबंध लिखा नहीं गया है। सच बताऊ तो अंगे्रजी में भी इस तरह का कोई निबंध मेरी जानकारी में नहीं है . जब यह लेख पहली बार पहल में छपा तो मराठी के एक बडे लेखक को इतना पसंद आया कि उन्होने इसका अनुवाद मराठी में किया। आप खुद जानते हैं  कि जिन भारतीय भाषाओं में उपन्यास की परंपरा है, उनमें सर्वाधिक समृद्ध मराठी है। कादम्बरी लेखन और उस पर विचार की वहाॅ लम्बी परंपरा है। बाद में यही लेख बम्बई से पुस्तिका के रुप में भी छापा गया । संक्षेप में इस तरह के कुछ सैद्धांतिक  काम मैंने  किये हैं । उनका देश भर के हिंदी के आकादमिक जगत में क्या महत्व है, इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है।

मुक्तिबोध

सहित्य के इतिहास दर्शन पर एक और  पुस्तक है नलिन  विलोचन शर्मा की,  जिसमें वे साहित्य का आदर्श साहित्यिक इतिहास को बताते है लेकिन आप इससे भिन्न मत रखते है?

ऐसा है कि साहित्य का इतिहास अनिवार्यतः साहित्यिक इतिहास होगा। इसका खंडन तो स्वयं आचार्य शुक्ल का इतिहास  करता है। या किसी का साहित्यिक होना या न होना यह भी तो समाज से ही तय होगा इस पर विस्तृत चर्चा मैने अपनी पुस्तक में की है।

क्या आपको लगता है कि संस्कृत की आलेाचना पद्धति का  आगे विकास नही हो  पाया? साहित्य के संदर्भ में जो सूक्ष्म चिंतन की परंपरा भामह,दण्डी या आनन्दवर्धन की थी,वह हिंदी में विकसित नहीं हुई अगर होती तो हिन्दी आलोचना आधिक समृद्ध होती।

नहीं , मै पहले ही कह चुका  हूँ कि देा अलग-अलग स्कूल हो गये थे। और तो छोड़ो, स्वयं शुक्ल भी ने उस पद्धति का बहुत अनुशरण नहीं किया। उन्होने पश्चिम में आई0 ए0 रिचर्डस, क्रोंचे,टी एस इलियट आदि को लिया।

जैसा कि नामवर जी भी कहते है कि हमने संस्कृत की अपनी टीका पद्धति (टेक्स्ट के भीतर से गुजरना) को छोड़ दिया। आज रचना भीतर से गुजरे बिना ही आलोचना हो रही है? नामवर जी यह भी उसी लेख में लिखते है कि आलोचना अतिशय विचारधारात्मक हो गई?

आलोचना को अतिशय विचारधारात्मक बनाने में खुद नामवर जी का योगदान कितना है? फिर वे किस मुह से यह बात कर सकते है। दूसरी बात मैं इस फ्रेम में सोचने का आदी  नहीं हूॅ कि नामवर जी यह कहते है या रामविलास जी वह कहते हैं ।

नामवर जी ने ’फरमाइशी आलोचना’ की बात की है। आलोचना में इसका अर्थ क्या है?

यह तो ज्यादा बेहतर नामवर जी ही बता सकते है लेकिन नामवर जी ने कहा था-’’ मै फरमाइशी आलोचक हॅू’’ नामवर जी के संदर्भ में इसका अर्थ मैं इतना ही समझता हॅू कि किसी पत्रिका के द्वारा लेखक को कहा गया होगा कि अमुक लेखक या पुस्तक के बारे में लिखो और उन्होने लिखा होगा। इससे अधिक समझाने में असमर्थ हॅू। लेकिन उनकी पुस्तक ‘छायावाद’  या ‘कविता के नये प्रतिमान’ या ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’ किसी फरमाइश की देन नहीं है।  फिर भी वे कह रहें है तो उन्हे कौन रोक सकता है!

नामवर जी के बाद हिंदी आलोचना में किन लोगों की महत्वपूर्ण उपस्थिति देखते है?

नामवर जी के बाद क्या या उनके बाद कुछ नहीं , जैसी पद्धति में  मैं नहीं सोचता। उनके आसपास के समय में ही मेरे जैसे दर्जन भर लोग है। जिन्होने महत्वपूर्ण आलोचना लिखी। विश्वनाथ त्रिपाठी ने हर तरह (सैद्धांतिक  और व्यवहारिक आलोचना) की महत्वपूर्ण आलोचना लिखी है।

परवर्ती समय में या समकालीन पीढ़ी में महत्वपूर्ण आलोचना दृष्टि की संभावना आपको किन लोगों में दिखती है?

पंकज चतुर्वेदी हैं , जीतेन्द्र श्रीवास्तव हैं , ज्योतिष जोशी हैं .

लेकिन हमें लगता है कि आप के समय तक आलोचक की जो केन्दीयता थी, वह आगे नहीं रहेगी। वैसा स्पार्क आज नहीं है। विश्वविद्यालयों में विभाग बौद्धिक रुप से आज रिक्त दिखते है। जे एन यू को ही आप ले लेजिए। क्या आपको नहीं लगता कि आप अपने कार्यकाल में अच्छी पीढ़ी तैयार नहीं कर पाये, ग्रूम नहीं कर पाए?

प्रोफ नामवर सिंह

ऊपर जो मैने तीन नाम लिये वे मेरे छात्र हैं। यहाॅ तक की वीर भारत तलाावार, पुरुषोंत्तम अग्रवाल हमारे विद्यार्थी रहे। इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि हमने कुछ किया ही नहीं। दूसरी बात किसी प्रोफेसर या विभागाध्यक्ष के तमाम छात्र कवि, लेखक और आलोचक होगे यह संभव भी नहीं है।

लेकिन आलोचना तो दीर्घ अध्ययन की बौद्धिक प्रक्रिया है? 

ओहो, लेकिन कोई पढे ही  नहीं तो मै क्या करु? आज 10 साल नामवर जी को जे एन यू से गए हो गया, 7-8 साल मुझे भी हो गये। अब विभाग को मैं कैसे देखूं

देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों की स्थिति यही है?

देखिए, पढ़ने लिखने ही प्रवृति का हृास हर जगह हुआ ही।

आपने उपर आलोचना के क्षेत्र में जिन तीन लोगों के नाम लिये वे तीनों द्विज है? क्या आपके यहाँ  कोई दलित पिछड़ा आलोचक तैयार नहीं हो सकता था?

जब हजारों वर्षों से इसी वर्ग का अधिपत्य है तो मैं क्या करुँ।

लेकिन भविष्य में आपको इस दृष्टि से भी जज किया जाएगा?

करे, कोई भी करे।

यह तो आप स्वीकार करेंगें कि विभागों का ब्राह्मणीकरण इसके लिए जिम्मेदार है? आपके यहाँ से ओ बी सी होने के नाते उर्मिलेश को बाहर का रास्ता दिखाया इसका जिक्र उन्होने एक लेख में किया है, ऐसा भी नहीं  कि वे प्रतिभशाली न हो?

मैने हजाारों जगह यह कहा है कि भारत में शेष विचारधाराएँ चमड़ी तक होती हैं  लेकिन जातिवाद की  पैठ आत्मा तक है। संयोग से उर्मिलेश मेरे ही विद्यार्थी थे। उन्होने राहुल सांस्कृत्यान पर काम किया था। लेकिन इसके बाद वे मीडिया में चलें गये पी एच डी करने आये ही नही तो कोई दूसरा क्या करे। उन्हे निकाला किसी ने
नहीं.

विश्वनाथ त्रिपाठी

वे एम ए के प्रवेश के दौरान और उस के कुछ बाद के दिनों की विस्तार से चर्चा  करते हैं .

मै नहीं मानता कि विभाग में उस समय इस तरह का महौल था, किसी भी विद्यार्थी के साथ जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया। यह सब आज के फ्रेम से सोचने के कारण लगाता है।

लेकिन 1990 के मण्डल कमिशन तक तो आपके यहाँ बहुत से दलित तथा पिछड़े वर्ग के विद्यार्थी भी आने लगे थे और आप तो उसके काफी बाद तक जे एन यू में रहे तो आपको नहीं लगता  कि इस वर्ग से प्रतिभाओं को न तराश पाना आपकी असफलता है?

नहीं मेरी असफलता नहीं है . आज हमारे विभाग में रामचन्द्र है गंगा सहाय मीणा हैं , वे  हमारे ही विद्यार्थी रहे , वे तो  ब्राहमण नहीं है.  वे यहीं प्रोफेसर भी होगे । दिनेशराम जो ’बहुरि नाहि आवना’ पत्रिका निकाल रहे हैं  वे भी.  अपने दृष्टिकोंण के साथ आप जबरदस्ती आरोप क्यों लगा रहे है?

लेकिन आपने उपर जो तीन नाम लिए उनमें इनका नाम क्यों नहीं था? तब तो आरोप लगेगा ?

मैं जाातिवाद के आरोप से मुक्त होने के लिए किसी की झूठी  प्रशंसा नहीं कर सकता। जब दूसरे लोग भी ढंग का पढे़गें-लिखेगें तो उनकी भी प्रशसा करुंगा । उदाहरण के लिए एक बात कहता हूँ गंगा सहाय मीणा ने अभी आदिवासियों पर एक पुस्तक संपादित की, मैने उसकी समीक्षा रेडियो में की। अब मैं और क्या कर सकता हूँ? तुम लोग हो कि आरोप ही लगाये जा रहे हो। जब इस तरह से दूसरे लोग पढे़गे-लिखेंगे  ही  नहीं तो मै क्या कर सकता हूँ,  क्या दो चार एस सी ,एस टी, और ओ बी सी लोगों के नाम ले लूं  और इस आरोप से मुक्त हो जाऊँ।

उदय प्रकाश का ही नाम लें . इस बात में तो कोई शक नहीं  कि वे महत्वपूर्ण कवि और कथाकार हैं  और बहुत हद तक अच्छे आलोचक भी हैं  लेकिन आप के विभाग के लिए एक अच्छी संभवना होते हुए भी उन्हे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया?

शरण कुमार लिम्बाले

तो मैं क्या करुँ? उन्होने अपनी पी एच डी ही पूरी नहीं की तो मै क्या कर सकता हूँ . उनके गुरू नामवर जी थे, जिनके निर्देशन में वे काम कर रहे थे। उन्होने बिना पी एच डी पूरा किये ही उदय प्रकाश को मणिपुर नियुक्त भी करवाया। लेकिन वे वहां के वातावरण एवं परिस्थितियों  के कारण छोड़कर आ गये। अब महत्वपूर्ण कथाकार होने के नाते ही तो कोई विभाग उन्हे निमंत्रण भेजेगा नहीं . अगर नामवर जी के रहते या मेरे रहते उन्होने इंटरव्यू दिया होता तो संभावना बनती। लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं फिर चाहे वे आरोप लगाये या आप?

 खैर , बहुत कुछ व्यक्तिगत ज्यादा हो रहा है इसलिए वापस आलोचना पर आते हैं,  हिंदी आलोचना पर एक आरोप यह लगता रहा है कि वह प्राध्यापकीय आलोचना है आ .शुक्ल से लेकर नामवर जी और आप तक अधिकांश लोग अध्यापक रहे है। कवियों का कहना है कि ये आलोचना लद्द्ड आलोचना है , जो कविता को समझने में असमर्थ है। इसलिए कवि-आलोचक जैसा टर्म  भी इस्तेमाल होता है। आप क्या कहेंगें?
तो  क्या करें !  आ. शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी नन्ददुलारे वाजपेयी रामविलास शर्मा क्या सबको हिंदी आलोचना से निकाल दें !!

राजेन्द्र जी भी यह बात कहते थे..

तो क्या करें? राजेन्द्र जी खुद 20 बार कहकर नामवरजी से या मेरे से क्यों लिखवाते थे ?  तब वे नहीं जानते थे कि हम अध्यापक हैं । यह केवल हिंदी आलोचना पर ही आरोप नहीं हो सकता है. पश्चिम के भी बहुत से आलोचक अध्यापक रहे हैं । अब अगर कवियों को लगता है कि उनकी कविता को हम नहीं समझ पा रहे तो वे समझने वालों से लिखवा लें हमने तो यह कह कर नहीं रखा है कि हम ही लिखेंगें दूसरा कोई न लिखे

अशोक वाजपेयी तो कवि- आलोचक हैं  वे कहते हैं

अशोक बाजपेयी क्या हैं ? यह कहना थोडा मुश्किल है। वे कवि हैं , चिंतक हैं कला पारखी हैं  समीक्षक हैं , बहुत कुछ है। लेकिन कवियों की आलोचना लिखने की परंपरा तो छायावाद में भी रही है। प्रसाद निराला सभी ने आलेाचना लिखाी आगे अज्ञेय मुक्तिबोध ने लिखी लेकिन अधिकांश कवि आलोचना आत्मरक्षा या अपनी रचना शाीलता की व्याख्या में लिखी गई आलोचना है। टी एस ईलियट या मुक्तिबोध जैसे लोग इसका अपवाद हैं ,  जिन्होने दूसरों पर भी पर्याप्त लिखा है।

स्त्रीवादी आलोचना पर आपकी क्या राय है?

हिंदी में स्त्रीवादी आलोचना बहुत कम विकसित हुई है विमर्श तो विकसित हुआ है लेकिन आलोचना विकसित नहीं हुई। अनामिका या अर्चना वर्मा को छोड़कर दूसरा कोई नाम मुझे स्त्रीवादी आलोचना में दिखाई नहीं देता।
मृदूला गर्ग, मैत्रेयी पुष्पा आदि का लेखन विमर्श के अंतर्गत आता है आलोचना में नहीं.

अरविन्द जैन ने स्त्रियों के उपन्यासों, कहानियों पर कई लेख लिखे है , आपकी नजरों से गुजरे होंगे क्या वह स्त्रीवादी आलोचना है?

हा गुजरे हैं , पढे़ हैं । लेकिन वह स्त्रीवादी आलोचना नहीं है। उसी तर्क से जिससे ब्राम्हण होने के नाते  दलित लेखन की मेरी सारी आलोचना निर्थक है। अरविन्द जैन भी पुरुष हैं.

यह तो आपका व्यंग्य हुआ?

व्यंग्य नहीं सत्य बोला रहा हूँ यही तो वे कहते भी हैं .

लेकिन अरविन्द जी ने तो पुरुष होते हुए भी स्त्रीवादी नजरिये से लिखा है !

नहीं तुम्हारे कहने से मैं नाम नहीं लूंगा .

हाशिये का हर्फ या वर्चस्ववादी विमर्श !

 ( पाखी के सितम्बर अंक के सम्पादकीय पर स्त्रीकाल ने एक टिप्पणी प्रस्तुत  की थी , टिप्पणी की थी इसके सम्पादन मंडल की सदस्य और कवयित्री एवम वरिष्ठ  पत्रकार निवेदिता ने . यह नई टिप्पणी स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के एक और सदस्य एवम युवा आलोचक धर्मवीर सिंह कर रहे हैं  )

आप किन मुद्दों पर बोलते हैं और किन पर चुप हैं , बोलने के लिए आपका चुनाव क्या है , किन प्रतीकों और बिम्बों में बोलते हैं , तय  इसीसे होता है कि आपका पक्ष क्या है. मसलन आप तथाकथित ‘ लवजिहाद’ ‘गो ह्त्या’ आदि से दुखी हैं और उसके लिए चिंतित अभिव्यक्तियाँ कर रहे हैं या आपकी चिंता में इन फर्जी मुद्दों के जरिये हो रहा देश का साम्प्रदायीकरण है !आप स्त्रियों से  छीने जा रहे स्पेस से दुखी हैं , जिसे बमुश्किल उन्होंने अपने लिए बनाया या किसी स्पेस पर उनकी अभिव्यक्ति से छटपटा रहे हैं , कुछ हिलता दिख रहा है आपको !
पाखी के सम्पादकीय ‘ मैं चाँद पर हूँ मगर कब तक’ हाशिये के हर्फ़ सीरीज से लिखे जा रहे सम्पादकीय की राजनीति तय करता है . इस पड़ताल में हम जायें कि ‘हाशिये का हर्फ़’ में कितना हाशिया है और कितना उसका हर्फ़ है, एक अलग लेख की मांग करता है . इसी नाम से सम्पादक के एक किताब से गुजरकर हालांकि हाशिये का ‘ भारद्वाजी’ विमर्श समझा जा सकता है . फिलहाल सम्पादकीय की मुख्य चिंताओं पर गौर करें और सम्पादक  का अपना पक्ष चिह्नित करने की कोशिश करें तो सारी तस्वीर स्पष्ट हो जाती है , यह स्पष्ट हो जाता है कि सम्पादक महोदय हाशिये के साथ हैं या उसके बरक्स विमर्श कर रहे हैं – पक्षधरता की आड़ में  प्रहार कर रहे हैं !
निवेदिता की टिप्पणी पढने के लिए क्लिक करें : ( हर पुरुष की चमड़ी के भीतर मर्द होता है  )

सम्पादक स्वयं लिखते हैं कि ‘ हमारी शुभकामनाएं रामसजीवन के साथ हैं , जिसके लिए किसी को जीना ही उसे प्रेम करना है .’ रामसजीवन उदय प्रकाश की कहानी का एक पात्र है . एक ऐसा पात्र जो लोकतंत्र के साथ बने नए समाज में अपने सामंती मूल्यों के साथ मिसफिट है . उसका खात्म होना ही उसकी नियति है , घुट –घुट कर मरना . उससे सहानुभूति हो सकती है उसके द्वारा चुने  अपने मानसिक मकडजाल में खुद उसे घुटते हुए देखकर.  उसकी  त्रासद विडम्बनाओं को कोई उदय प्रकाश जैसा कहानीकार ही पूरी संवेदना के साथ प्रस्तुत कर सकता है , पाठक जिससे सहानुभूत तो हो सकता है लेकिन उसकी मौत पर शोकग्रस्त नहीं हो सकता . उसे मरना ही है , लोकतंत्र के फैलाव के साथ , उसे मरना ही है उसके सपनों की ‘ शाहजादी’ की खुदमुख्तारी के बाद . वह किसी लड़की के लिए ‘देवदासीय’  अंदाज में जीता है , जब तक उसकी पारो उसके इशारों पर उसकी फैंटसी की नायिका है तब तक तो वह जान हथेली पर लेकर घूमेगा उसके लिए लेकिन जैसे ही वह लड़की अपने स्पेस पर अपना निर्णय लेते हुए अपने व्यत्क्तित्व के साथ खड़ी होती है तो उसका स्वनिर्मित ख्वाब टूट जाता है . वह एक ऐसे परिवेश से है , जहां गाना गोटी खेलती , गलियों में चहकती लड़की किशोर होते ही किसी के ख्वाब का हिस्सा हो जाती है , वह स्कूल , कॉलेज नहीं जाती है , जे एन यू तो कतई नहीं . बंद कमरे में अपने पुरुष मित्र के साथ अपने कोर्स की किताब पढ़ती लडकी रामसजीवन की कल्पनालोक को उद्दीप्त कर देती है , उसे करिअर की ऊंचाई चढ़ती लडकियां नहीं चूल्हे के धुंए से आंसू पोछती लडकियां आदर्श दिखती है, जिसका होना उसके प्रेमी या पति के लिए होना है , खुद के लिए नहीं . ऐसे रामसजीवन की नियति ही आत्महत्या है, क्योंकि लडकियां अब क्लास में उससे अव्वल , ऑफिस में उसका बॉस और बिस्तर पर अधिक सक्रिय हैं .

वही रामसजीवन प्रेम भारद्वाज के सम्पादकीय में अपनी सम्पूर्ण कुंठाओं और वासनाओं के साथ चालीस साल की औरत से  अपने लिए वह सबकुछ पाना चाहता है , जो वह जे एन यू में अपनी प्रेमिका से नहीं पा सका. वह आज भी उतना ही आत्मकेंद्रित है जितना आत्महत्या के पूर्व था , जबकि आज स्त्रियाँ उसके आत्महत्या के सम्पूर्ण कारणों के साथ और मुक्त हुई हैं , उन्होंने अपने स्पेस हासिल कर लिए हैं , अभिव्यक्त भी हो रही हैं.
पिछले दिनों फेसबुक पर चली बहसों में पाखी के सम्पादकीय के बचाव में मूलतः तर्क यही दिया जा रहा है कि ‘ मैं चांद पर हूँ मगर कब तक’ में रामसजीवन के बयान एक पात्र के हैं स्वयं सम्पादकीय लेखक के नहीं . यह एक बेवजह तर्क है . किसी टेक्स्ट में लेखक अपने किसी प्रिय पात्र के साथ अपने को उपस्थित करता है . तुलसीदास की उपस्थिति ‘राम’ में है , वेदव्यास की ‘ कृष्ण में.’ तो प्रेमचंद ‘ वंशीधर के साथ हैं . प्रेम भारद्वाज का अपना पक्ष रामसजीवन का ही पक्ष है , जिसे वे छिपाते भी नहीं हैं . प्रेम भारद्वाज का  राम सजीवन किस बात से दुखी है. वह दुखी इसलिए है कि ४० साल के बाद की स्त्रियाँ प्रेम तो कर रही हैं , “लेकिन सोती पति के साथ हैं’ यहाँ फिर से रामसजीवन जे एन यू वाला पूर्ण समर्पण की जिद्द लिए है .’ उसकी नज़रों में ४० साल की इन महिलाओं का अपराध है कि वे प्रेम भी कर रही हैं और पति , घर गृहस्थी में भी फंसी है . सवाल है कि वे स्त्रियाँ रामसजीवन जैसे किसी आत्मग्रस्त प्रेमी के लिए घर छोड़ कर बाहर आ भी जाती हैं , तो उन्हें हासिल क्या होगा , फिर से एक सनक भरा साथ और दूसरी कैद के सिवा !  वे कितनी बार  घर छोड़ेंगी , कितने रामसजीवनों के लिए !

पूरे सम्पादकीय का ताना बाना  इस एक स्वनिर्मित धारणा के साथ बुना गया है कि  फेसबुक इन महिलाओं का  ‘ आखेट’ स्थल है , लाइक, कमेन्ट ,और प्रेम प्राप्त करने का , फ्लर्ट करने का . पता नहीं यह धारणा सम्पादक पुरुषों के लिए क्यों नहीं बना पाते हैं . उन्हें  यह पता तो जरूर होगा कि महिलाओं ने रसोई घर की दीवारों पर अभिव्यक्त होने की शुरुआत कर फेसबुक की दीवाल पर लिखना शुरु किया है , जहां उन्हें किसी स्वनामधन्य सम्पादक की किसी कृपा की जरूरत नहीं है , वे हैं और उनके पाठक हैं . फिर सम्पादक महोदय इतने बेचैन क्यों हैं . हाशिये के हर्फ़ में मरने की नियति प्राप्त किसी रामसजीवन को शामिल होना चाहिए या जीने की आकांक्षा से भरपूर चालीस साला स्त्री को , जो विवाह और परिवार के भीतर अपने लिए स्पेस बना रही है – इसके बाहर विकल्प क्या है , रामसजीवनों की कुंठा या एक दूसरा परिवार और विवाह ? वैसे आप तलाक के आंकड़ों से तो परिचित ही होंगे , जो दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है , महिलाओं की सक्रियता के साथ, उनके आकार लेते व्यक्तित्व के साथ, अन्यथा ४० साला सक्रिय पुरुषों ने तो ‘ रखैल’ की व्यवस्था विकसित कर ही ली थी .
सम्पादक महोदय बड़ी चालाकी से चालीस साल की महिलाओं को मध्यवर्ग का प्रतीक बना देते हैं , भाई वे प्रतीक नहीं बल्कि हैं ही इसी मध्यवर्ग से और उसकी जड़ताओं से अपनी सीमाओं में लड़ सकती हैं. और आपको दिख रहा है कि ये महिलायें ही इस मध्यमवर्ग की प्रतीक हैं .

क्यों आप हर किसी से इरोम , मेधा और अरुणा राय होने की उम्मीद रखते हैं या थोपते हैं बाबू रामसजीवन . आपके कल्पना लोक के बाहर भी एक सन्नी लियोन या शर्लिन चोपड़ा हो रही है तो आप आतामहत्याग्रस्त  क्यों हो रहे हैं ! आपके डाल्स हाउस की गुड़िया अब आपके इशारों से बाहर –भीतर नाचने वाली ‘ भद्र महिला’ भर नहीं है , जिसकी आँखों पर पट्टी बांधकर कल्पना में और बिस्तर पर अपने पसंदीदा आसनों से गुजर जाना चाहते हैं इस उम्मीद के साथ कि वह सुबह आपको रसोई घर में आँचल का पल्लू सर पर डाले दिखेगी या आपकी माँ की तरह तुलसी में जल डालते हुए . आप कराह उठते हैं जब उसी भोर में आपकी उम्मीदों के विपरीत वह अपनी इच्छाओं के साथ सविता भाभी या सनी लियोन के रूप में अवतरित होती है. ‘ मस्तराम’ , जिसे आप तकिये के नीचे पढ़ते थे जे एन यू के दिनों में और इंटरनेट पर सविता भाभी डॉट कॉम पढ़ कर आये हैं ,४० साला महिलाओं के लिए फैंटसी लिए , उसकी नायिकाएं अब जीवित रूप में आपकी निर्मित आस्थाओं को चुनौती दे रही है. आपकी नियति मौत है . आप खुद ही बताएं कि उसी मध्यवर्ग के पुरुषों में से कितने विनायक सेन , सुधीर ढवले , या सुनील हो पा रहे हैं ! सक्रियता के हिसाब से देखें तो अनुपातिक तौर पर महिलाओं की भूमिका ज्यादा प्रशंसनीय है रामसजीवन बाबू , प्रशंसा की आपकी कसौटी पर .

 

संपादकीय में परकाया प्रवेश की निर्थक कोशिश की गई है . महिलाओं के बयान भी लिखे गए हैं . पहले तो परकाया प्रविष्ट पुरुष स्त्री के छदम रूप में आर्तनाद करता है और फिर मातृत्व के गौरव गान में लग जाता है . वैसे भारद्वाज जी आपको तो शायद यह पता ही होगा कि हर्फ का एक अर्थ किसी विचारधारा को विकृत रूप मे पेश करना भी होता है , आप वही कर रहे हैं. महिलाओं की आवाज मे बोलने का भी छद्म रचा है आपने अपने सम्पादकीय में , जिसकी भाषा रुदाली की सी है और फिर तो मां बना कर सहला भी दे रहे हैं उन्हें. यानी उसी  स्टीरियोटाइप का महिमामंडन , जिसे पुरुष ने स्त्री के लिए तय किया है . यही संकट है ,मां और प्रेयसी की स्वनिर्मित छवि के ताप से दग्ध है रामसजीवन लेकिन उसे हर मोड़ पर बेवफाई दिख रही है, किसी ‘ पवित्र प्रेम’ के खिलाफ व्याप्त माहौल दिख रहा है – प्रेम भी अराजनीतिक नहीं होता रामसजीवन जी. ७० के दशक की सिनेमाई रूमानियत से निकालिए तो प्रेम की राजनीति दिखेगी. ४० साल की महिलाओं के प्रेम की भी.

मलाला की कहानी बी बी सी के जुबानी

पाकिस्तान  की स्वात घाटी में स्त्री शिक्षा की लड़ाई लड़ने वाली मलाला यूसुफ़जई को  को ९ अक्टूबर २०१२ को तालिबान ने गोली मार दी थी . ११ साल की उम्र से ही स्त्रीअधिकार के लिए संघर्षरत मलाला को शांति का नॉबेल सम्मान मिला है . मलाला से दुनिया को सबसे पहले रु ब रू कराया था बी बी सी ने . स्त्रीकाल के पाठको के लिए मलाला की कहानी बी बी सी हिन्दी के ज़ुबानी पेश कर रही हैं अमिता . अमिता बिलासपुर केन्द्रीय विश्वविद्यालय में मीडिया पढ़ाती हैं  तथा स्त्रीकाल के वेब वर्जन के सम्पादक मंडल में शामिल हैं .

मलाला की प्रतिभा को सबसे पहले बीबीसी के एक पत्रकार ने पहचाना और उनसे साप्ताहिक कॉलम लिखवाना शुरू किया, यह स्वात घाटी से बाहर की दुनिया से मलाला का पहला संपर्क था. पढ़ने के लिए  क्लिक करें नीचे दिए गए  लिंक पर :

जिसने दुनिया को रूबरू कराया मलाला सेदुनिया

मलाला की दास्तान दिखाती है कि उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबान के जाने के बाद भी, एक 16 वर्षीय लड़की की ज़िन्दगी कितने खौफ, दर्द और कठिनाइयों से भरी है. पढ़ने के लिए  क्लिक करें बी बी सी के लिंक पर:

मलाला युसूफ़जइ के खौफ और साहस की दास्तान

२०१२ में तालेबान ने मलाला को गोली मार दी थी . बी बी सी पर पूरी रपट पढ़ने के लिए क्लिक करे :

तालिबान से लोहा लेने वाले को गोली मारी 

मलाला को नॉबेल सम्मान से सम्मानित किये जाने पर पूरी दुनिया उसे बधाई दे रही है लेकिन उसके अपने ही देश पाकिस्तानमें इस पर मिश्रित प्रतिक्रया है . पढ़ने के लिए क्लिक करें :

मलाला को नॉबेल: विरोध में उठी आवाज

यह बहादुर लडकी देश दुनिया में महिलाओं के खिलाफ कट्टरपंथी हमलों पर अपनी राय के साथ सामने आती है . उसने अफ़्रीकी देश नाइजीरिया में 200 से अधिक छात्राओं के अपहरण के मामले में दुनिया को कहा कि चुप नहीं रहना चाहिए. पढ़ने के लिए क्लिक करें :

छात्राओं के अपहरण पर चुप न बैठे दुनिया : मलाला 

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अरुण देव की कवितायें

अरुण देव

युवा कवि और आलोचक अरुण देव चर्चित वेब पत्रिका समालोचन के सम्पादक हैं. संपर्क :09412656938,devarun72@gmail.com

मेरे अंदर की स्त्री

तुम्हारे अंदर जो अँधेरा है
और जो जंगल है घना, भीगा सा
उबड खाबड से बीहड़ हैं जो दु:स्वप्नों के
उसमें मैं एक हिरन की तरह भटकता हूँ
कोई गंध मुझे ढूंढती है
किसी प्यास को मैं खोजता रहता हूँ

यहाँ कुछ मेरा ही कभी मुझसे अलग होकर भटक गया था
मैं अपनी ही तलाश में तुम्हारे पास आया हूँ

कब हम एक दूसरे से इतने अलग हुए
की तुम स्त्री बन गई और मैं पुरुष
क्या उस सेब में ऐसा कुछ था जो तुमने मुझे पहली बार दिया था

उस सेब के एक सिरे पर तुम थीं
मुझे अनुरक्त नेत्रो से निहारती हुई और दूसरी तरफ मैं था आश्वस्त…
कि उस तरफ तुम तो हो ही

तब से कितनी सदियाँ गुज़री
कि अब तो मेरी भाषा भी तुम्हें नहीं पहचानती
और तुम्हारे शब्द मेरे ऊपर आरोप की तरह गिरते हैं
तुमने भी आखिरकार मुझे छोड़ ही दिया है अकेला
अपने से अलग
हालाकि तुम्हारी ही अस्थि मज्जा से बना हूँ

तुमसे ही बनकर तुम्हारे बिना कब खड़ा हो गया पता ही नहीं चला
तुम्हारे खिलाफ खड़ा हुआ
यह मेरा डर था या शायद मेरी असहायता
कि मेरा प्रतिरूप तुम तैयार कर देती थी
जैसे कोई जादूगरनी हो
देवि…. दुर्गा…. असीम शक्तियों वाली
सुनो !. तुम्हारे कमजोर क्षणों को मैंने धीरे धीरे एकत्र किया

जब मासिक धर्म से भींगी तुम नवागत की तैयारी करती
मैं वन में शिकार करते हुए तुम्हें अनुगामी बनाने के कौशल सीखता
जब तुम मनुष्य पैदा कर रही थी मेरे अंदर का पुरुष तुम्हें स्त्री बना रहा था

और आज मेरे अंदर का स्त्रीत्व संकट में है
मैं भटक रहा है जंगल-जंगल अपनी उस आधी स्त्री के लिए जो कभी उसके अंदर ही थी.

हत्या

उसकी हत्या हुई थी. सड़क से गाँव के रास्ते का एक हिस्सा सुनसान था. खेतों से होकर गुजरता था. वही से वह गायब हुई. वही गन्ने के खेत के पीछे उसका शव मिला, कई दिनों बाद. चेहरा झुलसा हुआ. कपड़ो से पहचानी गई.

पिता ने ज़ोर देकर कहा कपड़ो से पता चलता है उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है. लड़की ने मरते मरते भी कुटुंब की लाज़ बचाई.

कहीं बाहर नौकरी करता भाई आया था. चेहरे पर थकान. जैसे किसी झंझट में पड़ गया हो.

घर के लोग अब जो हो गया सो गया का भाव लिए कुछ आगे करने के बारे में संशय में थे.     एक पड़ोसी ने यह भी कहा कि क्या जरूरत थी जवान लड़की को पढाने की.

वह सिपाही बनना चाहती थी. कोचिंग करने समीप के नगर में जाती थी. अन्त समय उसने मोबाईल से जिनसे बातें की वे भी उसके मौसरे भाई, चचेरे भाई थे. ऐसा उस लड़की की  जाति-बिरादरी के लोग कह रहे थे. बार-बार

अगर लड़की किसी के प्रेम में होती और तब उसकी हत्या होती तो इसे स्वाभाविक माना जाता, उसके इस स्वेछाचार का अन्त यही होना था, इसी किस्म से कुछ कहा जाता. और कुटुंब के लिए यह बदनामी की बात होती.

उसकी बस हत्या हुई थी. उसका किसी से प्रेम या शारीरिक सम्बन्ध नहीं था. यही राहत की बात थी.

एक लड़की जो स्त्रीत्व की ओर बढ़ रही थी
इसी के कारण मार दी गई

उसके लंबे घने काले केश जो इसी दुनिया के लिए थे

उसका चमकता चेहरा
जिसकी रौशनी में कोई न कोई अपना दिल जलाता

वह एक उम्मीद थी
उसे अपना भी जीवन देखना था

अगर वह प्रेम में होती, बिनब्याही माँ बनने वाली होती, उसके बहुत से प्रेमी होते
या वह एक बेवफा महबूब होती
तो क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए थी

क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे.

छल

अगर मैं कहता हूँ किसी स्त्री से
तुम सुंदर हो

क्या वह पलट कर कहेगी
बहुत हो चुका तुम्हारा यह छल
तुम्हारी नज़र मेरी देह पर है
सिर्फ देह नहीं हूँ मैं

अगर मैंने कहा होता
तुम मुझे अच्छी लगती हो
तो शायद वह समझती कि उसे अच्छी बनी रहने के लिए
बने रहना होगा मेरे अनुकूल
और यह तो अच्छी होने की अच्छी – खासी सज़ा है

मित्र अगर कहूँ
तो वह घनिष्ठता कहाँ
जो एक स्त्री-पुरूष के शुरूआती आकर्षण में होती है
दायित्वविहीन इस संज्ञा से जब चाहूँ जा सकता हूँ बाहर
और यह हिंसा अंततः किसी स्त्री पर ही गिरेगी

सोचा की कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
और अब यह सहजीवन की तैयारी जैसा लगता है
जो अंततः एक घेराबंदी ही होगी किसी स्त्री के लिए

अगर सीधे कहूँ
कि तुम्हरा आकर्षण मुझे
स्त्री-पुरूष के सबसे स्वाभाविक रिश्ते की ओर ले जा रहा है…
तो इसे निर्लज्जता समझा जायेगा
और वह  कहेगी
इस तरह के रिश्ते का अन्त एक स्त्री के लिए पुरूष की तरह नही होता..

भाषा से परे
मेरी देह की पुकार को तुम्हारी देह तो समझती है
भाषा में तुम करती हो इंकार

और सितम कि भाषा भी चाहती है यह इंकार.

चाँद , पानी और सीता

स्त्रियाँ अर्घ्य दे रही हैं चन्द्रमा को
पृथ्वी ने चन्द्रमा को स्त्रियों  के हाथों जल भेजा है

कि नर्म मुलायम रहे उसकी मिट्टी
कि उसके अमावस में भी पूर्णिमा का अंकुरण होता रहे

लोटे से धीरे-धीरे गिरते जल से होकर आ रहीं हैं चन्द्रमा की किरणें
जल छू रहा है उजाले को
उजाला जल से बाहर आकर कुछ और ही हो गया है
बीज भी तो धरती से खिलकर कुछ और हो जाता है

घुटनों तक जल में डूबी स्त्रियों को
धान रोपते हुए, भविष्य उगाते हुए सूर्य देखता है
देखता है चन्द्रमा
स्त्रियाँ सूरज को भी देती हैं जल, जल में बैठ कर
कि हर रात के बात वह लौटे अपने प्रकाश के साथ

धरती पर पौधे को पहला जल किसी स्त्री ने ही दिया होगा
तभी तो अभी भी हरी भरी है पृथ्वी
स्त्रियाँ पृथ्वी हैं
रत्न की तरह नहीं निकली वें
न ही थी किसी मटके में जनक के लिए

अगर और लज्जित करोगे
लौट जायेंगी अपने घर

हे राम !
क्या करोगे तब…

पर्यायवाची

गुलमोहर आज लाल होकर दहक रहा है
उसके पत्तों में तुम्हारे निर्वस्त्र देह की आग
मेरे अंदर जल उठी है

उसके कुछ मुरझाये फूल नीचे गिरे हैं
उसमें सुवास है तुम्हारी
मुझे प्रतीक्षा की जलती दोपहर में सुलगाती हुई

यह गुलमोहर आज मेरे मन में खिला है
आओ की आज हम दोनों एक साथ दहक उठे
की भीग उठे एक साथ की एक साथ उठे और
फिर गिर जाएँ साथ साथ

मेरी हथेली पर तुम्हारे नाम से निकल कर एक अक्षर आ बैठा है
और तबसे वह जिद्द में है कि पूरा करू तुम्हरा नाम

शेष तो तुम्हारे होठों से झरेंगे
जब आवज़ दोगी अपने होठों से मुझे मेरी पीठ पर

उन्हें ढूढता हूँ तुम्हारे मुलायम पहाडो के आस-पास
वहाँ मेरे होटों के उदग्र निशान तुम्हें मिलेंगे
तुम्हारे नाभि कुण्ड से उनकी तेज़ गंध आ रही है

मैं कहाँ ढूंढू उन्हें जब कि मैं ही अब
मैं नहीं रहा

तुम्हारे नाम के बीच एक-एक एक करके रखूं अपने नाम का एक-एक अक्षर
कि जब आवाज़ दे कोई तुम्हें
मेरा नाम तुम्हे जगा दे कि उठो कोई पुकार रहा है
अगर कहीं गिरो तो गिरने से पहले बन जाएँ टेक
और अगर कहीं घिरो तो पाओ उसे एक मजबूत लाठी की तरह अपने पास
कि अपने अकलेपन में उन्हें सुन सको
कि जब उड़ो ऊँचे आकाश में वह काट दे
काटने वालो की डोर

वैसे दोनों मिलकर पर्यायवाची हो जाएँ तो भी
चलेगा
अर्थ के बराबर सामर्थ्य  वाले दो शब्द
एक साथ.

आटे की चक्की

पम्पसेट की धक-धक पर उठते गिरते कल-पुर्जों के सामने
वह औरत खड़ी है
पिस रहा है गेहूं

ताज़े पिसे आटे कि खुशबू के बीच मैं ठिठका
देख रहा हूँ गेहूं का आटे में बदलना

इस आंटे को पानी और आग से गूँथ कर
एक औरत बदलेगी फिर इसे रोटी में

दो अंगुलिओं के बीच फिसल रहा है आटा
कहीं दरदरा न रह जाए

नहीं तो उलझन में पड़ जायेगी वह औरत
और करेगी शिकायत आंटे की
जो शिकायत है एक औरत का औरत से
वह कब तक छुपेगी कल-पुर्जों के पीछे

इस बीच पीसने आ गया कहीं से गेहूं
तराजू के दूसरे पलड़े पर रखना था बाट

उसने मुझे देखा छिन्तार
और उठा कर रख दिया २० किलो का बाट एक झटके में
पलड़ा बहुत भारी हो गया था उसमें शमिल हो गई थी औरत भी

उस धक-धक और ताज़े पिसे आंटे की खुश्बू के बीच
यह इल्हाम ही था मेरे लिए

की यह दुनिया बिना पुरुषों के सहारे भी चलेगी बदस्तूर.

भाजपा सरकार से अपील : फॉरवर्ड प्रेस पर पुलिस कार्यवाई और उसके संपादकों के खिलाफ एफ आई आर की निंदा और अपील

( देश भर से साहित्यकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने फॉरवर्ड प्रेस पर हुए हमले के खिलाफ यह अपील जारी की है . यदि आप सहमत हों तो कमेन्ट में अपना भी हस्ताक्षर अग्रेसित करें . ) 


अपील : 


यह देश विचार, मत और आस्थाओं के साथ अनेक बहुलताओं का देश है और यही इसकी मूल ताकत है. लोकतंत्र ने भारत की बहुलताओं को और भी मजबूत किया है. आजादी के बाद स्वतंत्र राज्य के रूप में भारत ने अपने संविधान के माध्यम से इस बहुलता का आदर किया और उसे मजबूत करने की दिशा में प्रावधान सुनिश्चित किये.

इस देश के अलग –अलग भागों में शास्त्रीय मिथों के अपने अपने पाठ लोकमिथों के रूप में मौजूद हैं. देश के कई हिस्सों में  ‘रावण’ की पूजा होती है, पूजा करने वालों में सारस्वत ब्राह्मण भी शामिल हैं. महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर राजा बलि की पूजा की जाती है, जो वैष्णवों के मत के अनुकूल नहीं है. आज भी इस देश में असुर जनजाति के लोग रहते हैं,  जो महिषासुर व अन्य  असुरों को अपना पूर्वज मानते हैं।  हर साल मनाये जाने वाले अनेक पर्वों में धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप निर्मित छवि वाले असुरों के खिलाफ जश्न मनाया जाता है, जो एक समूह के अस्तित्व पर प्रहार करने के जाने –अनजाने आयोजन हैं.

दिल्ली से प्रकाशित फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका अक्टूबर के अपने ‘बहुजन –श्रमण परंपरा विशेषांक’ में  में इस तरह की अनेक परंपराओं, सांस्कृतिक आयोजनों, विचारों को सामने लायी है, जिसमें ‘दुर्गा –मिथ’ या दुर्गा की मान्यता के पुनर्पाठ भी शामिल हैं.

२०११ में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक छात्र समूह ने ‘महिषासुर शहादत’ दिवस मनाने की परम्परा की शुरुआत की, जिसके बाद पिछले चार सालों में देश के सैकड़ो शहरों में यह आयोजन आयोजित होने लगा है. इस व्यापक स्वीकृति का आधार इस देश के बहुजन –श्रमण परम्परा और चेतना में मौजूद है.
पिछले ९ अक्टूबर को इस कारण फॉरवर्ड प्रेस के खिलाफ दिल्ली के वसंतकुञ्ज थाणे में अतिवादी छात्रों के एक समूह के द्वारा किये गए एफ आई आर और उसके बाद पुलिस की कार्यवाई की हम घोर निंदा करते हैं. फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका के नेहरु प्लेस स्थित दफ़्तर पर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा द्वारा 9 अक्टूबर को छापा मार कर चार कर्मचारियों की हिरासत में लेने तथा वहाँ से पत्रिका की प्रतियां जब्त करने की घटना बेहद चिंताजनक और निंदनीय है. पुलिस के पास अपनी इस कार्रवाई के लिए कोई अदालती आदेश या सक्षम प्राधिकारी का आदेश नहीं था. संपादकों के घरों पर पुलिस की दबीश, दफ्तर और घरों पर निगरानी पत्रिका के कामकाज पर असर डालने के इरादे से की जा रही है. ऐसा लगता है कि पुलिस ऐसी किसी फर्जी शिकायत के इन्तजार में थी ताकि वही अति सक्रिय हो सके. यह अभिव्यक्ति की आजादी और देश में बौद्धिक विचार परम्परा के खिलाफ हमला है.

हम भारतीय जनता पार्टी सरकार से  आग्रह करते हैं कि इस एफ आई आर को तत्काल रद्द करने का निर्देश जारी करे और पुलिस को निर्देशित करे कि इसके संपादकों के खिलाफ अपनी कार्यवाई को अविलम्ब रोका जाए. 

चिंतित लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता 

In English 

 Police action on FORWARD Press and FIR against its editors condemnable

India is a country of many faiths, thoughts and beliefs. It is a land of diversities and therein lies its strength. Democracy has strengthened our diversity. After Independence, the Indian Constitution duly recognised this diversity and provided for protection and preservation of the same.
In different parts of the country, various religious and folk myths are prevalent. In some places, Ravana is worshipped and among the worshippers are Saraswat Brahmins. In Maharashtra, Raja Bali is worshipped, which is something Vaishnavites may not agree with. India is also home to the Asur tribe, which believes that Mahishasur and other Asurs were its forefathers. Several religious functions celebrated with great gusto rely on the image of Asurs, as created by some religious texts. This may be hurtful to those who do not view Asurs as demons.
The Delhi-based FORWARD Press magazine, in its October 2014 issue centered on Bahujan-Shraman tradition has brought to fore several such traditions, cultural functions, beliefs and thougts. And these included a re-rendition of the ‘myth’ of Durga.
In 2011, a group of students of JNU started celebrating ‘Mahishasur Martyrdom Day’ and over the last four years, the celebration of this Day has started in many places in the country.
On October 9, a group of extremist students lodged an FIR against FORWARD Press in Vasant Kunj police station of New Delhi. We condemn the arbitrary police action that followed the registration of the FIR. Without any proper enquiry or probe and without any order from a court or a competent authority, the special branch of Delhi police raided the office of the FP, picked up four of its staffers and seized copies of the magazine. We strongly condemn the police action.
This, coupled with the police raids on the homes of the editors of the magazine and the surveillance mounted at the office and the residences of the editors seems to be aimed at disrupting the publication of the magazine. This is also a wanton assault on the fundamental right to freedom of expression and the tradition of free discourse in our country.

We demand that the BJP government should order immediate withdrawal of the case and order the police to stop its illegal action against the magazine and its editorial staff.   

Concerned writers and social activists

1.       अरूंधति राय

2.       उदय प्रकाश

3.       शमशुल इस्लाम

4.       वीर भारत तलवार

5.       शरण कुमार लिंबाले

6.       गिरिराज किशोर

7.       आनंद तेलतुम्‍बडे

8.       अनिल चमडिया

9.       मंगलेश डबराल

10.     कँवल भारती

11.     नूतन मालवीय

12.     प्रसन्‍न कुमार चौधरी

13.     राम पुनियानी

14.     उर्मिलेश

15.     एस. आनंद

16.     वीरेंद्र यादव

17.     विद्याभूषण रावत

18.     फेरोज. एल. विसेंट

19.     राजकुमार राकेश

20.     मदन कश्यप

21.     अपूर्वानंद

22.     नीलिमा शर्मा

23.     मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

24.     संजीव कुमार

25.     शंभुनाथ शुक्ला

26.     रोज केरकेटटा

27.     जवरीमल पारिख

28.     जुगनू शारदेय

29.     अविनाश दास

30.     फैसल अनुराग

31.     कुमार मुकुल

32.     विनीत कुमार

33.     अनिरूद्ध देशपांडे

34.     सुधीर सुमन

35.     दिलीप मंडल

36.     सुषमा असुर

37.     वंदना टेटे

38.     रोज केरकेटटा

39.     ग्‍लैडसन डुंगडुंग

40.     आशुतोष कुमार

41.     अशोक कुमार पाण्डेय

42.     श्रीधरम

43.     संदीप मील

44.     सत्येंद्र मुरली

45.     सुधा अरोडा

46.     विमल कुमार

47.     रजनी तिलक

48.     राजेन्द्र प्रसाद सिंह

49.     हरिनारायण ठाकुर

50.     पल्लव

51.     गुलजार हुसैन

52.     चन्द्र भूषण सिंह यादव

53.     पवन के श्रीवास्तव

54.     सुनील कुमार सुमन

55.     रेयाज-उल-हक

56.     स्वतंत्र मिश्र

57.     अरूण देव

58.     एल एस हरदेनिया

59.     समर अनार्य

60.     अशोक दुसाध

61.     जितेंद्र कुमार बिसारिया

62.     रजनीश कुमार झा

63.     संजीव चन्दन

64.     टेकचंद

65.     मोहम्मद इमरान

66.     सुभाष चंद्र कुशवाहा

67.     अनिता भारती

68.     मुसाफिर बैठा

69.     अजय प्रकाश

70.     कृपाशंकर

71.     अफलातून अफलू

72.     कौशल पंवार

73.     अमरेंद्र कुमार शर्मा

74.     रतन लाल

75.     एचएल दुसाध

76.     शिवानंद तिवारी

77.     हरनाम सिंह वर्मा

78.     उमराव सिंह जाटव

79.     मनीष रंजन

80.     कमल भारती

81.     निवेदिता झा

82.     कृष्णकांत

83.     रेक्टर कथूरिया

84.     रमेश ठाकुर

85.     कुमार प्रशांत

86.     बीरेंद् यादव

87.     चंद्रेश मडावी

88.     शिल्‍पा भगत

89.     अतुल आनंद

90.     विष्‍णु शर्मा

91.     प्रकाश शत्रुद्र

92.     कबीर वर्मा

93.     अशोक दास

94.     ओम सुधा

95.     गुलज़ार हुसैन

96.     वीरेंद्र मीणा

97.     आलोक मिश्रा

98.     आशीष कुमार अंशु

99.     लाल बाबू ललित

100.    अमलेंदू उपाध्‍याय

101.    सुशील कुमार शीलू

102.    राजीव मणि

103.    तपन

104.    अशोक चौधरी

105.    अखिलेश प्रसाद

106.    रजनी तिलक

107.    लाल जी निर्मल

108.    राकेश सिंह

109.    हरेराम सिंह

110.    सुभाष चंद्र

111.    हिमांशु पांड्या

112.    अशोक यादव

113.    अजीत राठौर

114.    सचि कुमारी

115.    अनिमेश बहादुर

116.    राहुल राज पॉल

117.    ब्रजेश कुमार पाण्‍डेय

118.    सूर्यनारायण

119.    प्रमोद श्रीवास्‍तव

120.    संतोष सतनामी

121.    आशुतोष सिंह

122.    राकेश श्रीवास्‍तव

123.    अविनाश गौतम

124.    नवजीत कुमार

125.    मुकेश

126.    प्रमोद गौतम

127.    तेजभान तेज

128.    रामकेश मीणा

129.    ओमप्रकाश

130.    अक्षय पाठक

131.    मुकेश कुमार

132.    ताहीरा हसन

133.    रामअवध राम

134.    अरविंद मुरली

135.    परमानंद आर्य

136.    नंदलाल चौहान

137.    श्‍याम हलदार

138.    नेहा सिंह

139.    विपिन बिहारी दूबे

140.    अशोक मेश्राम

142.    वी. उदयभान सिंह

143.    रमेश गौतम

144.    निर्दोष कुशवाहा

145.    रमेश विद्रोही

146.    मेहुल चावडा

147.    अभिनंदन कुमार

148.    संदीप मेघवाल

149.    अजीत कुमार ददौरिया

150.    राकेश गौतम

151.    अनिल कुमार

152.    प्रभांश यादव

153.    वीएस यादव

154.    अरविंद कुमार मोदी

155.    रविंद्र सिंह कुशवाहा

156.    भारत अमन

157.    जितेंद्र नारायण

158.    सूर्य नारायण

159.    सुधीर कुमार जाटव

160.    आलोक मिश्रा

161.    उदय यादव

162.    गिरीश अंजान

163.    सुभाष सिंह सुमन

164.    देवराज रावत

165.    अनिल कुमार यादव

166.    आदित्य जाटव

167.    चंद्रशेखर बाबू आम्‍बेडर

168.    प्‍यारे लाल

169.    राजेश कुमार

170.    चंदन राय

171.    फिरोज खान

172.    राकेश कुमार

173.    सुनील यादव

174.    अभिनव मल्लिक

175.    निर्भय प्रकाश

176.    देवेश कुमार

177.    संजय कुमार

178.    मोहम्मुद आलम

179.    ओमप्रकाश यादव

180.    अमित रंजन चित्रांशी

181.    आशीष अनचिन्हा्र

182.    धर्मेंद्र सिंह

183.    अंकित अग्रवाल

184.    आलोक कुमार

185.    गौतम परमार

186.    समीर शेखर

187.    बीरेंद्र सिंह

188.    राजेंद्र चतुर्वेदी

189.    अलका वर्मा

190.    सुधीर आम्‍बेडकर

191.    भूपेश कुमार सुहेरा

192.    पवन श्रीवास्‍तव

193.    बुद्ध विक्रम सेन

194.    शोभित जायसवाल

195.    जयराम राकेश

196.    अवज्ञा अमरजीत गुप्ता

197.    अलका वर्मा

198.    विशेष राय

199.    राजीव मणि

200.    चंद्रेश मेरावी

201.    हिमांशु ककोडिया

202.    उदय पाल

203.    आनंद सिंह गोदरा जाट

204.    अमृत सागर

205.    धीरेश सैनी

206.    बीरेंद्र मीणा

207.    अश्‍वघोष

208.    लखन सिंह

209.    पूंज प्रकाश

210.    अमित के. मिश्रा

211.    राजेश मंचल

212.    राजवीर

213.    अनुज शुक्‍ल्‍

214.    प्रतीक राव

215.    अमरदीप सिंह

216.    संघ शरण

217.    अमित चौधरी

218.    शाहिद अख्‍तर

219.    रामलगन

220.    अनिल वर्मा

221.    शिवंत कुमार

222.    महेश अमन

223.    अरूण कुमार

224.    प्रमोद गौतम

225.    संजय यादव

226.    हीरलाल बवानिया

227.    जिया हसन

228.    राजकुमार मीणा

229.    पवन भास्‍कर

230.    प्रकाश भारत

231.    कैलाश नौरियाल

232.    सुनील सरदार

233.    अनिल सिंह गोंड

234.    अशर्फी लाल

235.    संजय बौद्ध

236.    जगदीश लाल

237.    इरफान हुडा

238.    मनोज अभिज्ञान

239.    रेखा मौर्या

240.    प्रीतम सिंह

241.    मदन कुमार

242.    धीरज कुमार

243.    राजेंद्र कुमार

244.    संतोष कुमार

245.    रौशन कुमार पासवान

246.    उदय भानू

247.    राजेश कुमार

248.    अरविंद भारती

249.    रामअवतार यादव

250.    आलोक मौर्या

251.    अवधेश कुमार

252.    जंगबहादुर यादव

253.    आशिफ खुर्शीद

254.    अजय गीनवाल

255.    रवि नागवंशी

256.    शुजातुल्ला खान

257.    अभय कुमार

258.    जितेंद्र वाल्मिकी

259.    सतवीर तंवर

260.    अश्वाघोष

261.    निशांत सिंह

262.    राजू बौद्धी

263.    संदीप नाईक

264.    अर्पणा

265.    संदीप प्रसाद

266.    प्रमोद ताम्बट

267.    मोहन श्रोत्रिय

268.    राजू कुमार सिंह

269.    गोविंद माथुर

270.    मुकम्म द ताईद

271.    महमूद आलम

272.    अलका प्रकाश

273.    गिरीश जाटव

274.    मुन्नूज लाल

141.     रविंद्र कुमार सिन्हा

276.    अनिल गुप्ता

277.    साजिना राहत

278.    विवेक निराला

279.    मदन गोपाल सिंह भदौरिया

280.    मनोज कुमार झा

281.    अंजु शर्मा

282.    हेमेंद्र कुमार भगत

283.    संघ शरण

284.    मुकेश अहिरवार

285.    रमेश रावत

286.    विनोद आजाद

287.    आशुतोष चौधरी

288.    राजकुमार राजन

289.    शत्रुध्न

290.    दिवाकर घोष

291.    राजेश कोतेड

292.    राजेंद्र सिंह

293.    देवेंद्र देव

294.    परमेवर दास

295.    मनोज कुमार

296.    प्रकाश्वीरर नवल

297.    हंसराज धनका

298.    संजय कुमार

299.    अरविंद वर्मा

300.    पवन कुमार निराला

301.    राकेश यादव

302.    मोतीलाल द्रविड

303.    प्रमोद गौतम

304.    नसरउद्दीन

305.    संजय शान

306.    नाथूराम मेघवाल

307.    महेश पीपल

308.    अविनाश कुमार

309.    गुरेंद्र सिंह

310.    सुधीर कुमार

311.    एस प्रसाद यादव

312.    अमित कुमार

313.    घनश्याम कुशवाहा

314.    अमर मेघवंशी

315.    विनोद

316.    कौशिका पाटिल

317.    अतुल कांत गौतम

318.    राकेश कुमार

319.    सुमित शाक्य

320.    राम सिंह

321.    आलोक तिवारी

322.    सुरेंद्र कुमार कोरी

323.    अभिवनव आलोक

324.    चैतन्‍य मित्रा

325.    जयसिंह नरनौलिया

326.    नरेंद्र चौहान

327.    सुधीर कुमार

328.    जयपाल नेहरा

329.    कैलाश प्रसाद

330.    मनोज गौतम

331.    कपिलेश प्रसाद

332.    राकेश कुमार सिंह

333.    पवन गहलोत

334.    सुनील वर्मा

335.    कबीर वर्मा

336.    सुधीर यादव

337.    राम रविन्द्र

338.    सुधीर यादव

339.    मो‍हसिन हबीब

340.    राजीव सुमन

341.    प्रदीप शिंदे

342.    शाक्य मुनि चांडाल

343.    अनंत सिन्हा

344.    शीलरतन गौतम

345.    विजय सैन

346.    ललित कुमार

347.    रीतेश कुमार दास

348.    हेमराज हरनोट

349.    अखिलेश प्रभाकर

350.    अजय नेताम

351.    निर्दोष कुशवाहा

352.    सचिन कुमार

353.    जयप्रकाश सिंह कुशवाहा

354.    बाघाराम शार्दुल

355.    विक्रम सिंह यादव

356.    अखिलेश प्रभाकर

357.    शैलेश वर्मा

358.    अजित राज

359.    अरिविंद गोहिल

360.    मनीष कुमार बोध

361.    संजय कुमार

362.    नीलांबुज

363.    दीपक भारती

364.   एसके चौटाला

365.   श्रवण देवरे

366.    राजेश कश्‍यप

367.   अतिफ रब्‍बानी

368.   घनश्‍याम शाह

369.   आशीष अलैक्‍सजेंडर

370.     अंजली देशपांडे

371.     श्री प्रकाश

372.     कुमार सुंदरम

373.     राजदेव यादव

374.     प्रदीप गौतम

375.   गिरिजेश्‍वर प्रसाद

376.   रमेश अवस्‍थी

377.       जॉन दयाल

378.     विशाल मंगलवादी

379.    फिजा इमरान

380.    जयपाल मेहरा

381.    राजीव कुमार

382.    मानिकचंद्र झा

383.    धर्मेद्र कुमार यादव

384.    प्रदीप कुमार गौतम

385.    मुकेश अहिरवार

386.    प्रीतम सिंह

387.    आलोक कुमार

388.    राम सिंह

389.    नूर मोहम्‍मद नूर

390.    केसी सिहरा

391.    संदीप कन्‍नौजिया

392.    जियाउल हसन

393.    विनोद बहाडे

394.    रंजीत सिंह

395.    सुनील कुमार सिंह

396.    अजय आनंद

397.    शिवसागर यादव

398.    सलमान अरशद

399.    श्रीकांत चौधरी

400.    सिमोन पिटरसन

401.    अशोक कुमार मिश्र

402.    परशुराम कांबले

403.    कुमार सत्‍येंद्र

404.    अवज्ञा अमरजीत गुप्ता, आदि अनेक। प्रवीण वाणखेडे

अशोक कुमार पाण्डेय की कवितायें

अशोक कुमार पाण्डेय

सोशल मीडिया में बेवाक सक्रिय अशोक कुमार पाण्डेय बेहद संवेदनशील कवि हैं. संपर्क :ashokk34@gmail.com



कहां होंगी जगन की अम्मा ?

सतरंगे प्लास्टिक में सिमटे सौ ग्राम अंकल चिप्स के लिये
ठुनकती बिटिया के सामने थोड़ा शर्मिंदा सा ज़ेबें टटोलते
अचानक पहुंच जाता हूं
बचपन के उस छोटे से कस्बे में
जहां भूजे की सोंधी सी महक से बैचैन हो ठुनकता था मैं
और मां बांस की रंगीन सी डलिया में
दो मुठ्ठी चने डाल भेज देती थीं भड़भूजे पर
जहां इंतज़ार में होती थीं
सुलगती हुई हांड़ियों के बीच जगन की अम्मा.

तमाम दूसरी औरतों की तरह कोई अपना निज़ी नाम नहीं था उनका
प्रेम या क्रोध के नितांत निज़ी क्षणों में भी
बस जगन की अम्मा थीं वह
हालांकि पांच बेटियां भी थीं उनकीं
एक पति भी रहा होगा ज़रूर
पर कभी ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई उसे जानने की
हमारे लिये बस हंड़िया में दहकता बालू
और उसमे खदकता भूजा था उनकी पहचान.

हालांकि उन दिनों दूरदर्शन के इकलौते चैनल पर
नहीं था कहीं उसका विज्ञापन
हमारी अपनी नंदन,पराग या चंपक में भी नहीं
अव्वल तो थी हीं नहीं इतनी होर्डिगें
औा जो थीं उन पर कहीं नहीं था इनका ज़िक्र
पर मां के दूध और रक्त से मिला था मानो इसका स्वाद
तमाम खुशबुओं में सबसे सम्मोहक थी इसकी खुशबू
और तमाम दृश्यों में सबसे खूबसूरत था वह दृश्य.

मुठ्ठियां भर भर कर फांकते हुए इसे
हमने खेले बचपन के तमाम खेल
उंघती आंखो से हल किये गणित के प्रमेय
रिश्तेदारों के घर रस के साथ यही मिला अक्सर
एक डलिया में बांटकर खाते बने हमारे पहले दोस्त
फ्राक में छुपा हमारी पहली प्रेमिकाओं ने
यही दिया उपहार की तरह
यही खाते खाते पहले पहल पढ़े
डिब्बाबंद खाने और शीतल पेयों के विज्ञापन!

और फिर जब सपने तलाशते पहुंचे
महानगरों की अनजान गलियों के उदास कमरों में
आतीं रहीं अक्सर जगन की अम्मा
मां के साथ पिता के थके हुए कंधो पर
पर धीरे धीरे घटने लगा उस खुशबू का सम्मोहन
और फिर खो गया समय की धुंध में तमाम दूसरी चीज़ों की तरह.

बरसों हुए अब तो उस गली से गुज़रे
पता ही नहीं चला कब बदल गयी
बांस की डलिया प्लास्टिक की प्लेटों में
और रस भूजा – चाय नमकीन में!

अब कहां होंगी जगन की अम्मा?
बुझे चूल्हे की कब्र पर तो कबके बन गये मक़ान
और उस कस्बे में अब तक नहीं खुली चिप्स की फैक्ट्री
और खुल भी जाती तो कहां होती जगह जगन की अम्मा के लिए?

क्या कर रहे होंगे आजकल
मुहल्ले भर के बच्चों की डलिया में मुस्कान भर देने वाले हाथ?
आत्महत्या के आखिरी विकल्प के पहले
होती हैं अनेक भयावह संभावनायें….

ज़ेबें टटोलते मेरे शर्मिन्दा हांथो को देखते हुए ग़ौर से
दुकानदार ने बिटिया को पकड़ा दिये है- अंकल चिप्स!

तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश

तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश
गुजर जाना चाहता हूं
सारे देश देशान्तरों से
पार कर लेना चाहता हूं
नदियां, पहाड़ और महासागर सभी
जान लेना चाहता हूं
शब्दों के सारे आयाम
ध्वनियों की सारी आवृतियां
दृश्य के सारे चमत्कार
अदृश्य के सारे रहस्य.

तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश
इस तरह चाहता हूं तुम्हारा साथ
जैसे वीणा के साथ उंगलियां प्रवीण
जैसे शब्द के साथ संदर्भ
जैसे गीत के साथ स्वर
जैसे रूदन के साथ अश्रु
जैसे गहन अंधकार के साथ उम्मीद
और जैसे हर हार के साथ मज़बूत होती ज़िद

बस महसूसते हुए तुम्हारा साथ
साझा करता तुम्हारी आंखों से स्वप्न
पैरो से मिलाता पदचाप
और साथ साथ गाता हुआ मुक्तिगान
तोड़ देना चाहता हूं सारे बन्ध

तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश
ख़ुद से शुरू करना चाहता हूं
संघर्षो का सिलसिला
और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये।

मत करना विश्वास

मत करना विश्वास
अगर रात के मायावी अंधकार में
उत्तेजना से थरथराते होठों से
किसी जादूई भाषा में कहूं
सिर्फ तुम्हारा हूं मै

मत करना विश्वास
अगर सफलता के श्रेष्ठतम पुरस्कार को
फूलों की तरह सजाता हुआ तुम्हारे जूड़े में
उत्साह से लड़खड़ाती भाषा में  कहूं
सब तुम्हारा ही तो है

मत करना विश्वास
अगर लौटकर किसी लम्बी यात्रा से
बेतहाशा चूमते हुये तुम्हें
एक परिचित सी भाषा में कहूं
सिर्फ तुम ही आती रही स्वप्न में हर रात

हालांकि सच है यह
कि विश्वास ही तो था वह तिनका
जिसके सहारे पार किये हमने
दुःख और अभावों के अनन्त महासागर
लेकिन फिर भी पूछती रहना गाहे ब गाहे
किसका फ़ोन था कि मुस्कुरा रहे थे इस क़दर?
पलटती रहना यूंही कभी कभार मेरी पासबुक
करती रहना दाल में नमक जितना अविश्वास

हंसो मत
ज़रूरी है यह
विश्वास करो
तुम्हे खोना नहीं चाहता मैं

चूल्हा 

चूल्हे की याद करता हूँ
तो याद आती है
ताखे पर टिमटिमाती ढिबरी
जलते – बुझते गोइंठे ’ की
जुगनू सी नाचती लुत्तियां
और इन सबकी आंच में
दिपदिपाता माँ का संवलाया चेहरा

उन गीतों की उदास धुनें
अब तक गूंजती हैं
स्मृतियों की अनंत गुहा में
लीपते हुए जिन्हें गाया करती थीं बुआ

छत तक जमी कालिख
दीवारों की सीलन
पसीने की गुम्साइन गंध
आँखों के माडे
दादी के ताने
चिढ- गुस्सा- उकताहट – आंसू

इतना कुछ आता है याद चूल्हे के साथ
कि उस सोंधे स्वाद से
मितलाने लगता है जी…

वे इसे सुख कहते हैं 

साथ साथ रहते हैं दोनो
एक ही घर में
जैसे यूं ही रहते आये हों
पवित्र उद्यान से निष्काषन के बाद से ही
अंतरंग इतने कि अक्सर
यूं ही निकल आती है सद्यस्नात  स्त्री
जैसे कमरे में पुरूष नहीं निर्वात हो अशरीरी

चौदह वषों से रह रहे हैं
एक ही छत के नीचे
प्रेम नहीं
अग्नि के चतुर्दिक लिये वचनों से बंधे
अनावश्यक थे जो तब
और अब अप्रासंगिक

मित्रता का तो ख़ैर सवाल ही नहीं था
ठीक ठीक शत्रु भी नहीं कहे जा सकते
पर  शीतयुद्ध सा कुछ चलता रहता है निरन्तर
और युद्धभूमि भी अद्भुत !

वह बेहद मुलायम आलीशान सा सोफा
जिसे साथ साथ चुना था दोनो ने
वह बड़ी सी मेज़
जिस पर साथ ही खाते रहे हैं दोनो
वर्षों से बिला नागा
और वह बिस्तर
जो किसी एक के न होने से रहता ही नहीं बिस्तर

प्रेम की वह सबसे घनीभूत क्रीड़ा
जिक्र तक जिसका दहका देता था
रगों में दौड़ते लहू को ताज़ा बुरूंश सा
चुभती है बुढ़ाई आंखों की मोतियाबिंद सी

स्तनों के बीच गड़े चेहरे पर उग आते हैं नुकीले सींग
और पीठ पर रेंगती उंगलियों में विषाक्त नाखून
शक्कर मिलों के उच्छिष्ट सी गंधाती हैं सांसे
खुली आंखों से टपकती है कुत्ते की लार सी दयनीय हिंसा
और बंद पलकों में पलती है ऊब और हताशा  में लिथड़ी वितृष्णा
पहाड़ सा लगता है उत्तेजना और स्खलन का अंतराल

फिर लौटते हैं मध्ययुगीन घायल योद्धाओं से
अपने अपने सुरक्षा चक्रों में
और नियंत्रण रेखा सा ठीक बीचोबीच
सुला दिया जाता है शिशु

चौदह वर्षों का धुंध पसरा है दोनो के बीच
खर पतवार बन चुके हैं घने कंटीले जंगल
दहाड़ता रहता है असंतोष का महासागर
कोई पगडंडी … कोई पुल नहीं बचा अब
बस शिशु  रूपी डोंगी है एक थरथराती
जिसके सहारे एक दूसरे तक
किसी तरह डूबते उतराते पहुंचते हैं

… वे इसे सुख कहते हैं।

मैं धरती को एक नाम देना चाहता हूँ

मां दुखी है
कि मुझ पर रुक जायेगा ख़ानदानी शज़रा

वशिष्ठ से शुरु हुआ
तमाम पूर्वजों से चलकर
पिता से होता हुआ
मेरे कंधो तक पहुंचा वह वंश-वृक्ष
सूख जायेगा मेरे ही नाम पर
जबकि फलती-फूलती रहेंगी दूसरी शाखायें-प्रशाखायें

मां उदास है कि उदास होंगे पूर्वज
मां उदास है कि उदास हैं पिता
मां उदास है कि मैं उदास नहीं इसे लेकर
उदासी मां का सबसे पुराना जेवर है
वह उदास है कि कोई नहीं जिसके सुपुर्द कर सके वह इसे

उदास हैं दादी, चाची, बुआ, मौसी…
कहीं नहीं जिनका नाम उस शज़रे में
जैसे फ़स्लों का होता है नाम
पेड़ों का, मक़ानों का…
और धरती का कोई नाम नहीं होता…

शज़रे में न होना कभी नहीं रहा उनकी उदासी का सबब
उन नामों में ही तलाश लेती हैं वे अपने नाम
वे नाम गवाहियाँ हैं उनकी उर्वरा के
वे उदास हैं कि मिट जायेंगी उनकी गवाहियाँ एक दिन

बहुत मुश्किल है उनसे कुछ कह पाना मेरी बेटी
प्यार और श्रद्धा की ऐसी कठिन दीवार
कि उन कानों तक पहुंचते-पहुंचते
शब्द खो देते हैं मायने
बस तुमसे कहता हूं यह बात
कि विश्वास करो मुझ पर ख़त्म नहीं होगा वह शज़रा
वह तो शुरु होगा मेरे बाद
तुमसे !

आशा पांडेय ओझा की कवितायें

आशा पांडेय ओझा

मूलतः जोधपुर की रहने वाली आशा पांडेय की चार काव्य कृतियां प्रकाशित हैं. संपर्क : asha09.pandey@gmail.com

1. चीख स्त्री चीख

क्यों हो मौन
कौन सी साध साधने को रखा है
यह अखंड मौन व्रत तूने स्त्री ?
अब तोड़ तेरा ये मौन व्रत
और चीख स्त्री
क्या पता तुम्हारी चीख
अंधी बंजर आँखों में रौशनी उगा दे
जो देख पाने में सक्षम नहीं

तेरे साथ पग-पग पर
होता हुआ अन्याय
क्या पता तुम्हारी चीख
छील दे उन कानों में उगा
मोटी परतों का  बहरापन
जो सुन नहीं पाता तेरा क्रन्दन

हो सकता है तेरी चीख जरुरी हो
इस सृष्टि की जमीं पर
तेरी चुप्पी के बीज
व तेरे आंसूओं की बरसात से
उपजी पीड़ा की फसल काटने के लिए
क्या पता तुम्हारी चीख
पशुत्व की ओर बढती हुई आत्माओं  को
पुन:घेर लाये मनुष्यत्व की ओर
क्या पता तुम्हारी इसी चीख से बच जाये
तुम्हारा अस्तित्व
इस अनंत चुप्पी में डूबी हुई
भोगेगी कब तक
यह भयावह संत्रास!

चुप्पी की इस शय्या पर लेटी
तुम जीने की कामना से वंचित
एक लाश सी लगती हो
तुम्हारी चुप्पी का यही अर्थ लगाता है पुरुष
कि तुम हो सिर्फ़ भोग विलासिता की वस्तु भर हो
दर्ज कराने को अपने अस्तित्व की मौजूदगी
तोड़ अंतहीन मौन
उधेड़ अपने होठों की  सिलाई
जो जरा सी खुलते ही फिर सीने लगते हैं
बता कब तक नहीं उतरेगी
तूं अपने अंतःस्थल में
और कितने युगों तक न होगा तुझको स्व का भान
चल खुद के लिए न सही इस सृष्टि के लिए ही बोल
तुम्हारी चीख जरुरी है
बचे रहने को स्त्री
बची रहने को पृथ्वी

2 . हावी है जब तक पुरुषार्थ


देह दिखाना
तुम्हारा धर्म
गगन परिधान भी
तुम्हारा ही धर्म

पाप
स्त्री देह से
खिसकना दुप्पटा भी
धर्म,अर्थ,काम
तीनों पर हावी

जब तक पुरुषार्थ है
स्त्री कभी अहिल्या
कभी सीता कभी द्रोपदी
बनाई जाएगी पत्थर
कभी होगा चीर हरण
कभी होगी ज़मींदोज़द

3 . पुरुष गिद्द दृष्टि


ज़िन्दगी जीने की चाह
कुछ पाने की ख्वाहिश
आँखों के सुनहले सपने
इक नाम, मुकाम की ज़िद्द
अटूट आत्मविश्वास
यही कुछ तो लेकर निकली थी
वह ख्वाहिशों के झोले में

किसी ने नहीं देखी
उसके सपने भरे आँखों की चमक
किसी को नज़र नहीं आया
उसका अटूट आत्मविश्वास
किसी ने नहीं नापी
उसकी लगन की अथाह गहराई

माने  भी नहीं किसी के लिए
उसकी भरसक मेहनत के
उसके चारों ओर फ़ैली हुई है
एक पुरुष गिद्द दृष्टि
जो मुक्त नहीं हो पा रही
आज भी उसकी देह के आकर्षण से
वह  लड़ रही है लड़ाई
देह से मुक्त होने को

4 . संभल लड़की


सोहलवां बसंत
आँखों में ताज़े सतरंगी सपने
करवट बदलता मन का मौसम
एकम से पूनम की और बढ़ता
रूप रंग का चाँद
आस-पास की तारावलियों को मात देकर
सुन्दर और सुन्दर प्रतीत होने को
क्षण-क्षण निखारता खुद को
उड़ान को उतावले मन पंख
बेरोक बहती अल्हड़ नदी सी मासूम हंसी
बेखबर इस बात से कि
उमड़-घुमड़ रहे हैं आस-पास
आवारा बादल
ठन्डे-ठन्डे अहसासों के

तेरी गर्म देह पिघलाने को
संभल लड़की