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पंखुरी सिन्हा की कवितायें

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पंखुरी सिन्हा

मूलतः मुजफ्फरपुर की रहने वाली पंखुरी सिन्हा युवा साहित्यकारों में एक प्रमुख उपस्थिति हैं. संपर्क : nilirag18@gmail.com



सीढ़ियों का कद

मैं गिना सकती हूँ
हर एक सीढ़ी उनकी राह की
जो बनाई उन्होंने मेरे घर तक
और बता सकती हूँ
उन सीढ़ियों का कद
बहुत अदने और बौने थे सवाल उनके
उनका तब भी हस्तक्षेप था
उनका अब भी हस्तक्षेप है…………

आदतन

सारी मुश्किलें आसान नहीं होतीं
नौकरी से
कुछ खाली बर्तनो के
झनझनाने की आदत भी होती है
वो यों ही बजते हैं
आदतन…………..

कहने का हक़

मेरी सारी बातों को बदलकर
गणित में
मेरी सारी बातों को बनाकर
केवल कहने की स्थिति
वो जाने क्या क्या कहने का हक़
अख्तियार कर लेते हैं.

मेरुदण्ड

इतनी सीधी सादी परिभाषा
सभ्यता की
प्रतीत हो कड़ी
जटिल नहीं सख्त केवल
पर दरअसल ढीली ढाली ढुल मुल
ज़रा सा भी लीक से हटना जिसमे मंज़ूर नहीं हो
कुछ भी अलहदा नहीं
कोई अंतर नहीं ह

हमारी जीवन शैलियों में
इतना तय हो सब कुछ
कि ज़रा सा भी फ़र्क भटकाव लगे
अँटकाव लगे
ये दरअसल
एक लचर
मेरुदण्ड हीन
खोते हुए विश्वास का प्रतीक है.

लाल बिन्दी से रश्क

क्यों रश्क हो रहा है
उसकी लाल बिन्दी से मुझे
वो औरत जो लाल बिंदी लगाए
महफूज़ है अपने घर में
कुछ इस तरह कि मात कर दे
मेरी दौड़ती भागती दफ्तरी दुनिया की सारी फाइलें
मेरी सारी आज़ाद शख्सियत को मात कर दे
ऐसे हो कुछ सूत्र उसके पास
उसकी लाल बिन्दी कहती हो मुझसे
प्रेम से ज़्यादा बड़ी कोई बात………..

प्यार के बिम्ब

अपने आप निभ जाती है
शादी,  ज़िन्दगी, कविता
निभ जाते हैं
प्यार और बिम्ब
प्यार के भी
निभ जाता है संधि विच्छेद भी
अगर ईमानदारी से तोडा गया हो

घर बाहर

इन दिनों कहीं भी बाहर जाने पर
मेरा घर मुझे दिखवाया जाता था
उनकी नज़रों से
सामने वाले की खिड़की से
बगल वाले की भी
नीचे वाले की
सिर्फ दरवाज़े से दी गयी गवाही से
उसका वास्ता सिर्फ आवाज़ों से था
शायद बहुत सी
बहुत तेज़ आवाज़ें थीं
हमारे घर की
आवाज़ें ऊपर वालों की भी थीं
कुछ तो अनायास और आकस्मिक होंगी
कैसे नहीं होंगीं
ये फर्नीचर खिसकाने की आवाज़
जैसे किसी को फर्नीचर खिसकाने
की बहुत ज़रुरत हो
जैसे कि मेरी नानी टेबल खिसका कर ही
चलती थीं
लेकिन ये ज़रुरत कुछ ऐसे उत्पन्न हो
कि ताल बिठाए आपकी दिनचर्या से
उन सब बातों से भी
जो बस रोज़मर्रा की ज़िन्दगी हैं
और जिनका ऐसा कोई शोर नहीं
बस कटोरियों  के थाली में रखने
चम्मच बटोरने की आवाज़ है
और उसके तारतम्य में
बहुत कुछ इर्द गिर्द की
बहुत कुछ है बर्तन सजाने
बस धोकर यथास्थान रख देने की आवाज़ में
पुरानी होटलबाज़ी के किस्से हैं
न की गयी होटलबाज़ी के भी
दरअसल
कुछ चीख चिल्लाहटें मेरे घर के तोड़े जाने
के बाद की उपज हैं
टूटे हुए घर की बहुत सारी दरारें हैं
फिलहाल यहाँ
गीली मिटटी के साथ साथ
ईंट के बुरादे भी
सीमेंट की बोरिओं के निशान हैं
यहाँ, वहाँ
उन्हें उठाने के भी
कुछ हमारे हाथों
कुछ हमारे कन्धों पर
और कुछ उन लोगों की थकान है
हमारे चेहरों पर
जो सैलानियों  को पीठ पर बिठाये
घाटी दिखाते हैं
और कुछ उन लोगों की परेशानी
जिनका तबादला अभी अभी
एक ऐसे शहर में हो गया हो
जहाँ सुबह शाम बारिश होती हो
दोपहर को भी
या हर शाम आंधी आती हो
हमारे घर की बातें हमें बाहर सुनवाई जाती थीं
इस तरह
जैसे और लोगों के घरों से
टकराकर लौट रही हों
ये रोटी के कच्चे होने की चिकचिक
ये केवल दो रोटी खाने पर भी
कच्चे होने की चिकचिक
ये मेरी ही आवाज़ की तल्ख़ी
ये विदेशी कांफ्रेंस में कच्चे चावल की याद
ये भोजन के बिलकुल ही न पचने देने की राजनीती
ये मेरी ही आवाज़ की बेबस तल्ख़ी
बाहर की बातों का हवाला
हम क्या खा रहे हैं
फिलहाल
हम किसी और के हिस्से का पैसा नहीं खा रहे
न देश का
न घूस, न हड़प
हम तो किसी का दिमाग़ तक नहीं खा रहे

इतिहास का अंधकूप बनाम बंद गलियों का रूह-चुह : गया में यौनकर्म और यौनकर्मी : पहली क़िस्त

संजीव चंदन


( यह आलेख २००९ में एक शोध के सिलसिले में किये गये केस स्टडी का एक हिस्सा है :दो किस्तों में प्रकाश्य  ) 

यद्यपि गया का रेड लाइट एरिया शहर के केन्द्र में टावर चैक के समीप बसा है। इसकी मौजूदगी आज भी है और कल भी थी, लेकिन ‘कल’ के इतिहास को व्यक्त करता कोई दस्तावेज नहीं है। तमाम दूसरे स्थानों, क्षेत्र अथवा राज्यों की तरह मगध और गया का इतिहास भी राजा-रजवाड़ों की सामारिक गतिविधियों से भरा है या फिर आजादी के पूर्व और बाद तक के सिलवटों से भरा है इतिहास। यौनकर्मियों का इतिहास! इतिहास नहीं; स्मृतियों, अफवाहों और गप्पों से टूट-बिखरकर इतिहास लायक जो कुछ भी है-समझा जा सकता है वही इतिहास हो सकता है इनका।

स्पष्ट है स्वीकार्यता और उपेक्षा के द्वैध में फँसी इनकी जिंदगी को लिपिबद्ध कौन करेगा? स्त्रिायों और दलितों का उपेक्षित इतिहास तो आधुनिक परिघटना है। गया का इतिहास खंगालते वक्त कुछ भी लिपिबद्ध नहीं मिलता इनके विषय में। गया में बोली जाने वाली ‘‘मगही’’ भाषा का इतिहास लिखते हुए अब तक कोई भी किसी एक अनाम धोबी तथा एक कुम्हार (अतिशुद्र) जाति के व्यक्ति के द्वारा लिखित रामायण पर शोध नहीं कर पाया है-उपेक्षित इतिहास का दंश झेलते इन समूहों का इतिहास लिखते हुए स्त्राीवादी, दलितवादी इतिहासकार कुछ चुनने-बीनने का काम कर सकते हैं। गया के इतिहास में टेकारी की रानी के आंशिक उल्लेख, अहल्याबाई के द्वारा मंदिर निर्माण की चर्चा के अलावा कहाँ हैं स्त्रियां ? 1995 में पत्थर तोड़ने वाली मुसहर स्त्री  भागवती देवी (भगवतिया देवी), जो गया की पहली महिला सांसद बनी, के विषय में भी बहुत कुछ लिखा उपलब्ध नहीं होगा। यदि इनके संदर्भ में कहीं उल्लेख है तो आखिरकार शासक समुदाय में शामिल स्त्रियों  का ही उल्लेख है। डाॅ. सुरेन्द्र चौधरी धरी जैसा मार्क्सवादी  आलोचक भी गया के इतिहास को स्मृत करते हुए टावर चैक से रेडलाइट तक की यात्रा तो करते हैं, परंतु उन बंद गलियों में प्रवेश से हिचक जाते हैं- इतिहास का अंधकूप है वहाँ!!

डाॅ. चौधरी उन बंद गलियों तक जाकर लौट आते हैं : ‘रमना’ में वे 18वीं सदी के कुछ बंगलों के भाग थे। पुरानी जेल, पिलग्रीम अस्पताल उत्तरी भाग में थे। सन् 1842 में गया का नक्शा शेरविल का मिलता है। रेनल के बाद यह बिहार का दूसरा पुराना  नक्शा है। 18वीं सदी के अंत में उत्तरी गया में एक चुंगी द्वारा बनाया गया था। यह द्वार आज दुःखहरिणी फाटक के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ पर हिन्दुओं का एक छोटा पूजा स्थल भी है।’  (डाॅ. सुरेन्द्र चैधरी)।

गया टावर चौक इसी इलाके में हैं  यौनकर्मियों के घर

यानी डाॅ.  चौधरी पिलग्रीम अस्पताल से आगे बढ़ते हुए रुक जाते हैं, फिर दुःखहरिणी फाटक के पास ही आकर विराम ले लेते हैं, क्योंकि इसी प्रभाग में बसा है यौनकर्मियों का मुहल्ला, जोकि इतिहासकारों के लिए बंद गलियों जैसा ही है। गया के चौक  पर बने टावर (1888, में कलक्टर ओल्डहम के द्वारा) के पास ही बसा है यह मुहल्ला, जो कि नर्तकियों का मुहल्ला है, जिससे थोड़ी दूरी पर लगे मानपुर पुल से रमना रोड होते हुए स्टेशन तक जाने वाले रोड पर खानगी (देह व्यापार) से जुड़ी महिलाएँ रहती हैं, यहीं आकर इतिहास थम जाता है।
इतिहास के अंधकूप में प्रवेश के लिए जनश्रुतियों पर निर्भर होना पड़ता है अथवा गया की संस्कृति में इनके महत्वपूर्ण अवदान के कारण सांस्कृतिक झरोखे से देखना पड़ता है। शेष कुछ अनुमानित ही हो सकता है इतिहास की चुप्पियों से।

कोई डाक्यूमेंटड साक्ष्य तो नहीं उपलब्ध है, लेकिन इस इलाके को अकबर के मनसबदार मानसिंह (1540-1614) के द्वारा बसाया गया माना जाता है, जब उसने मानपुर(गया) की यात्रा की थी। यह व्यवस्था मानसिंह के सैनिकों के लिए की गयी मानी जाती है, परंतु इस पर न तो बुकानन ने कोई उल्लेख किया है या न ही राय चैधरी अथवा अन्य इतिहासकारों ने। मानसिंह 1588 में बिहार का सुबेदार (गवर्नर) नियुक्त हुआ था।

विष्णुपद में विष्णु का चरण

गणिकाओं की परंपरा बड़ी समृद्ध थी। भारतीय सिनेमा की सिरमौर-स्त्री  नर्गिस की माँ जद्दन बाई को यहाँ खूब शोहरत थी। ढेलाबाई की ठुमरी दूर-दूर तक मशहूर थी। चैक के इलाके में संगीत का एक केन्द्र ‘शनिश्चरी क्लब’ हुआ करता था। क्लब के संस्थापक थे टिकारी-राज के कैप्टन गोपाल शरण सिंह के राजगुरू पंडित वंशीधर शुक्ल! अध्यक्ष स्वयं गोपाल शरण सिंह थे तथा सचिव हुआ करते थे मुजफ्फर  नवाब। शनिवार को समृद्ध गयावालों की बिसात जमती थी, जहाँ गणिकाओं के नृत्य हुआ करते थे। 1918-30 तक यह क्लब गया के चौक  पर सक्रिय था। शिरकत करती थी चुलबुले वाली मलिका, छोटी मलिका, जद्दनबाई, छप्पनछुरी राजेश्वरी, तुलाबाई अथवा देश के दूसरे हिस्सों की मशहूर गणिकायें।

गणिकाओं की इन सार्वजनिक गतिविधियों के अतिरिक्त उनका कुछ भी व्यक्तिगत दर्ज नहीं है, लोगों की स्मृतियों में। व्यक्तिगत सार्वजनिक होकर जब कोई हलचल  पैदा करता, तो वह सब भी स्मृतियों का अंग बन जाता। मसलन गणिकाएं समृद्धों की ‘‘रखैल’’ भी हुआ करती थीं जो कभी-कभी दो ‘‘आन’’ वालों के बीच टकराव पैदा करती। समृद्ध परिवारों के संपर्क का यह दास्तान 80 के दशक तक भी यथावत रहा। मध्य बिहार के एक बाहुबली ने एक प्रसिद्ध गणिका को अपनी पत्नी बनाकर संपत्ति में हिस्सेदारी देते हुए मिसाल पेश की। यही गणिका 20वीं सदी के अंतिम दशकों में नगर-चुनावों में उम्मीदवार भी बनी।

गणिकायें परिवार की परंपरा जीती है, कुछ सिंदूर लगाती है। शोध के दौरान कमलादेवी का सिंदूर और उनके द्वारा उनके सबसे यादगार लम्हे के रूप में ‘‘पति-पत्नी के वे दिन’’ का दर्ज होना पारिवारिक आस्था को व्यक्त करता है। गया के गणिकाओं के कई बच्चे उँचे पदों पर है और अपने अतीत के संपर्क में भी।
कोठों की नवाबी संस्कृति आजादी के दिनों के बाद सिमटती चली गयी। पंडों की समृद्धि में गिरावट आई, नवाबी और जमींदारी समाप्त हुई। गणिकाएँ अब नए अवतार में शादी-विवाह अथवा अन्य उत्सवों पर नर्तकियां थी ,यही उनका आजीविका का मुख्य साधन बना। मुजरे कम हो गये, धीरे-धीरे समाप्त हो गए।
नवे दशक तक गया के गाँव सांस्कृतिक और आर्थिक टकराव के केन्द्र बनते गए। अति वामपंथी संगठनों के साथ-साथ सवर्ण जाति की सेनाओं ने भी उत्सवों के अवसर पर नर्तकियों की उपस्थिति को अपने नैतिक एजेण्डे का टारगेट बनाया। फलतः इनकी आजीविका का एक बड़ा हिस्सा इनसे छिनता गया। मुजरे पर निर्भरता बढ़ी, जिसका प्रचलन नवाबों और जमींदारों की विदाई के साथ समाप्त हो गया था। नर्तकियों के पास भी देह व्यापार का विकल्प शेष था-जिसे आज वे थोड़ी उँची कीमत पर (तुलनात्मक) और नृत्य-संगीत के आवरण के साथ अपनाने के लिए बाध्य हैं। कभी-कभी कोई मुजरा भी सज जाये, तो ‘रइसों’ के लिए नहीं ‘अवारा युवाओं के लिए’।

इतिहास के अंधकूप में सबसे उपेक्षित जीवन, जो कि स्मृतियों में भी शेष नहीं, ‘‘खानगी’’ से जुडी स्त्रियों  का है, कोई इतिहास नहीं-सिर्फ एकरूपीय वर्णन या अनुमान! देह व्यापार के प्रभागों का भी फैलाव हुआ है। गया जैसे छोटे शहरों में भी काॅल-गर्ल बड़ी संख्या में इस पेशे से आ जुड़ी हैं। एक गैर-सरकारी संस्था में कार्यरत  ऐसी ही काॅल-गर्ल की मां ‘‘सराय’’ की नर्तकी एवं गायिका थी। गावों में भी जी.टी.रोड अथवा अन्य मुख्य मार्गों से जुड़े गावों में स्त्रियाँ  इस पेशे से जुड़ी हैं। उपभोक्ता वहां भी और सराय में भी प्रायः ट्रक-ड्राइवर, रिक्शा-चालक अथवा मध्यमवर्गीय युवा है ,जो सस्ते दामों वाला क्रेता हैं। क्रेताओं में पारिवारिक अथवा यौन कुंठाओं के शिकार कुछ युवेतर भी है।

अभी गया के इस मुहल्ले में यौन-सेवा-प्रदाता स्त्रियों  को मुख्यतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। परिवार आधारित ,  अर्थात् नर्तकियों का लायसेंस प्राप्त घर तथा ब्रोथल आधारित यानी चकलाघर .

इन दिनों शहर में कई गैर-सरकारी संस्थायें भी काम कर रही हैं, जो कि इनके अधिकारों के लिए किसी संगठनात्मक गोलबंदी की जगह यथास्थिति के बीच इन्हें रोगमुक्त रखने के एजेंडे से काम कर रही हैं अथवा पुनर्वास का काम संपन्न करती हैं। इन संगठनों में दो प्रकार की स्त्रिायां पेशे से जुड़ी महिलाओं के बीच जाती है-
1 पेशे से अभी या अतीत में जुड़ी रही महिलायें
2 पेशे से बाहर की महिलाएं, पुरूष भी

काल-गर्ल्स  की संख्या में भी इजाफा हुआ है, परंतु स्थयी घरों में रहका सेवा-प्रदाता स्त्रिायों से वे अधिक मुक्त और निर्णयों के मामले में स्वावलंबी है। इनका समाजीकरण दूसरी प्रकार की स्त्रियों  से भिन्न है। ये आम समाज से मिलकर दूसरी अन्य सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल हैं।

संजू’ जो कि पेशे से कालगर्ल है, वह भी किसी गैर-सरकारी संगठन से जुड़ी है। इसने गया के प्रतिष्ठित राजकीय कन्या विद्यालय ये दसवीं तक की पढ़ाई की है। इसकी मां भी नर्तकियों के पेशे से जुड़ी थी, जिसे संजू के शब्दों में पिता ने छोड़ दिया था। वह 2005 से इस पेशे में कार्यरत है। वह दूरदर्शन पर धारावाहिक भी देख लेती  है। 12 से 1 बजे तक आने वाला ‘‘स्त्री ’’ धारावाहिक उसे पसंद है।

मेरे शोध (केस-स्टडी) के कुछ माह पूर्व ही रेड-लाइट एरिया पर पुलिस ने छापा मारा था। इसमें दो पुरूष संचालक, जिसके घर पर ये स्त्रियाँ किराये  पर रहती हैं, को गिरफ्तार किया गया। दरअसल सराय में प्रायः ब्रोथल -आधारित यौन-कर्म किराये के मकानों में ही संचालित हो रहा है। पकड़ी गई चार लड़कियों को जागरण नामक संस्था में पुनर्वास कराया गया था। पुनर्वास केन्द्र में मैं उनसे मिलने पहुंचा तो सिलिगुड़ी की दो लड़कियां अपने-अपने घरों में जा चुकी थीं, दो नाबालिक लड़कियों के परिवार वाले नहीं आये थे। बातचीत के दौरान भावुक लड़कियों ने बताया कि उनके मां-बाप नहीं हैं। चाचा-चाची ने उन्हें किसी के साथ घर से भेजा था, काम करने के लिए।

बंद गलियों में जीवन


‘चक्की पीसने वाली औरत, जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मीनान से सोती है, मेरे अफसाने की हीरोईन नहीं हो सकती। मंटो की हीरोईन एक चकले की टखयाई (रंडी) हो सकती है, जो रात को जागती है और दिन को सोते समय कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाजे पर दस्तक देने आ रहा है। उसके आरी-आरी पपोटे, जिसमें वर्षों की नींद जम गई है, मेरे अफसानों का मौजू बना सकते हैं। उसकी गलाजत, उसकी बीमारियां चिड़चिड़ापन, उसकी गालियां सबकुछ भाती हैं। मैं उसके मुताबिक लिखता हूं और घरेलू औरतों की शाइस्ता कलामी उनकी सेहत और नफासत पसंदी को नजर अंदाज करता हूँ ।’

सआदत हसन मंटो के उपरोक्त बयान यौनकर्मियों की गलाज़त भरी जिंदगी का खुलासा करता है-मंटो, जिन्होंने इन ‘त्याज्य मानी जाने वाली मानवों के अस्तित्व के सम्मान के साथ कहानियां लिखी हैं, इस शोध के लिए केस-स्टडी भी थोड़ी उपरोक्त अनुभूति और थोड़े भिन्न अनुभवों के साथ संपन्न हुआ-क्या यौनकर्मियों के पास है फुर्सत के वक्त? यदि है तो क्या करती हैं वे ऐसे समयों में?

फुर्सत अथवा अवकाश के वक्त से शोध का तात्पर्य मार्क्सवादी  अवधारणा के लीजर ( leisure) से है, जिसका अर्थ होता है, स्वतंत्र होना, फुर्सत में होना।  मूलतः लैटिन और  शब्द फ्रेंच के से चैदहवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में अस्तित्वगत माना जाता है। लीजर तथा लीजर टाइम (अवकाश) विक्टोरियन ब्रिटेन में 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में अपने वर्तमान अर्थबोध के साथ अस्तित्व में आया हुआ माना जाता है। 1870 के पूर्व फैक्टरियां अपने कामगारों को एक दिन में 18 घंटे काम के लिए बाध्य करती थीं, जबकि छुट्टी का दिन सिर्फ रविवार होता था। 1870 के बाद उद्योग जगत में मशीनीकरण की दक्षता तथा ट्रेड यूनियन के उद्भव ने सप्ताह में दो छुटिट्यां व्यवस्थित करायी और काम के घंटे कम करवाये।

लीजर (अवकाश) को एक ऐसे समय के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो काम और घरेलू काम (गतिविधियों) से मुक्त हो-शरीरतः, मानसिक भी। परंतु सवाल यह है कि क्या स्त्रिायाँ खासकर यौनकर्मियों  के पास वे अवकाश के समय हैं, जब वे अपने आर्थिक गतिविधियों से शारीरिक और मानसिक तौर पर मुक्त हों तथा आत्मगत हो मनोरंजन कर रहे हों।

श्रमिकों के श्रम से भी जो सरप्लस (अधिशेष समय) बनता है उसे अपने अवकाश के रूप में इस्तेमाल करनेवाला एक वर्ग पैदा होता है, जो इसका इस्तेमाल अपने सामाजिक अवस्थिति  ( Status)  विस्तृत करने में करता है। स्त्रिायों के श्रम से उत्पन्न सरप्लस पुरुष इस्तेमाल करता है अपने लीजर के तोर पर।

अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ


मेरे शोध क्षेत्र (गया का रेड लाइट एरिया) के नागरिक ही नहीं संबद्ध मगध क्षेत्र सहित देशभर में घरेलू काम और घर की जिम्मेदारियों से मुक्त अपने लिए स्त्रियाँ  नहीं जीती हैं.  मगध के गाँवों में, ड्योढ़ी में (घर के आगे के हिस्से), जो कि जनाने का पब्लिक स्फीअर होता है, स्त्रिायाँ (40-50 के बाद) यदि कुछ स्त्रियों  के साथ बातचीत करती दिखें भी, तो उनके हाथ से कुछ बीनने, चुनने अथवा अन्य घरेलू जिम्मेवारियों की गतिविधियाँ संचालित हो रही होती हैं। मुक्त अवकाश संभव ही नहीं, तो फिर यौनकर्मियों को अवकाश! त्याज्य और हाशिये की जिंदगी जी रही स्त्रियों  को अवकाश!!

मैं अपने शोध के लिए उन से मिलने गया तो प्रश्नावली का कोई पुलिंदा मेरे हाथ में नहीं था। डर थ कि वे उन प्रश्नों की औपचारिकता में जबरदस्त ‘दूसरेपन’ के भाव में न आ जायें।उन्हीं दिनों गया के रेड-लाइट पर पुलिस ने छापा मारा था। यौनकर्मियों को लगता था कि यह छापा उनके बीच काम कर रहे एक गैर सरकारी संस्था ने मरवाया था, जो कि एक पुनर्वास केन्द्र भी चलाता है। दरअसल उसी पुनर्वास केन्द्र के छापे से बरामद नाबालिग लड़कियों को पुलिस ने सुपुर्द किया था। मेरे प्रति भी उनका अविश्वास हो सकता था, ऐसा मेरे मार्गदर्शकों ने बताया था। हां, मरे ऊपर  विश्वास का एक कारण अवश्य था कि मेरी मार्गदर्शिका उनके बीच कभी काम कर चुकी महिला थी, जो कि अब एक सामाजिक संस्था की कार्यकर्ता थीं। एन.जी.ओ. की शब्दावली में उन्हें ‘ Peers’  (आंतरिक) कहा जाता है।

पहली बार जाते हुए, अपने शहर में होने के कारण, मैं थोड़ी झिझक में था। वहां सामान्य आना-जाना यद्यपि उसका प्रयोजन क्रेता या विक्रेता का न भी हो, तब भी, सामाजिक अपवाद का विषय है। मेरे एक परिचित कत्थक शिक्षक किसी नर्तकी के घर (कोठे पर) जाते हुए मुझे थोड़ी दूरी से दिखे। शायद मैं भी उन्हें दिखा होउंगा .  उन्होंने अपने सर पर नीेचे तक लटकता हुए गमछा रख लिया। वे शहर की सभ्य (तथाकथित) बस्तियों के भी शिक्षक थे।

मैं करीब 2 बजे के आस-पास शनिवार को नर्तकियों और यौनकर्मियों का मेहमान था। सवाल लिखित तौर पर तो नहीं थे, परंतु निश्चित सवालों के साथ मैं उनके अवकाश को जानने-समझने तो जरूर गया था।मरे पड़ाव दो समूहों में विभक्त थे, नर्तकियों के बैठक खानों में और खानगी (देह-व्यापार) से जुड़ी स्त्रियों  के मेहमान खानों में। नर्तकियां स्वयं को खानगी स्त्रियों  से श्रेष्ठ मानती हैं। मेरे मार्गदर्शिका भी दुनियादारी समझती थी। उनका हृदय खानगी स्त्रिायों से सहज जुड़ा था, लेकिन उन्होंने मेरे नर्तकी मेहनाननवाजों के समक्ष उनकी श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए बहुत चतुराई से मेरा परिचय कराया।

कमला देवी (उम्र 50 के आस-पास) नर्तकियों के पेशे से जुड़ी हैं। मैं पहले उनका मेहमान बना। शनिवार को 2 बजे के वक्त महफिल सजी थी। दीदी (सीता देवी, मेरी मार्गदर्शिका) ने महफिल के बीच से उन्हें बुलाया, महफिल से घुंघरू और गाने की आवाज आती रही। मैं झिझक रहा था इसलिए समय लेकर आने की बात करता रहा, लेकिन उन्होंने उसी वक्त मुझे एक कमरे में बैठाया। मैंने सामान्य परिचय के बाद माहौल को हल्का करते हुए उनके सबसे यादगार क्षणों के विषय में कुरेदा। उनका जवाब था सबका प्रायः ‘पति-पत्नी का वो क्षण’ ही यादगार होता है। पूरी बातचीत में वे परिवार के फ्रेम में ही बात करती रही। 2009 तक तो अधिकांश नर्तकियों के पास तो काम नहीं थे। इक्के-दुक्के ग्राहक आ जायें तो बात अलग है। 90 के बाद ही विवाह आदि समारोहों में उनके नाच-गाने की परंपरा पर कुठाराघात हुआ था। फिर  कभी-कभी सट्टा पर वे जाती ही हैं, यानी अवकाश ही अवकाश (?)।

सवाल यह है कि क्या यह अवकाश है? जब काम, आजीविका और जीवन का मुख्य साधन, प्रभावित हो तो खाली समय अवकाश नहीं हो सकता। अवसाद पैदा करता है। काम की चिंता से मुक्ति के बाद ही लीजर का पूर्ण संदर्भ बनता है। गया की नर्तकियों के लिए तो काम ही नहीं है, उससे अधिक काम पाने का तनाव है। कुछ नर्तकियां थोड़े अधिक पैसों में यौन सेवा भी दे रही है। ऐसा कुछ लोग बताते हैं। परंतु कमलादेवी जैसी नर्तकियां इसे स्वीकार नहीं करतीं। वे परिवार और विवाह के फ्रेम में ही सोचती हैं। खाली समय में ये टी.वी. देखती हैं। कमला देवी को टी.वी. के धारावाहिकों से सास-बहू पसंदीदा धारावाहिक है। नर्तकियाँ बाजार भी घूम आती हैं, जो कि उनके मनोरंजन का एक साधन भी है। सिनेमा भी जाती हैं। नर्तकियों के यहाँ मेरा सैम्पल बहुत ही छोटा था। वैसे इनकी संख्या भी बहुत कम है।

आपसी साहचर्य के तौर पर इनके बीच पारिवारिक रिश्ते हैं। एक कोठे पर रहने वाी लड़कियां आपस में बहनें हैं। इनके बच्चे अच्छे स्कूलों में भी पढ़ते हैं। पर्व-त्योहार (हिंदू और मुस्लिम अथवा अन्य धार्मिक परंपरा के अनुसार) उनके आपसी साहचर्य का एक माध्यम है। ईश्वर में वे समान रूप से आस्था रखती हैं। मेरे पास जो सुनिश्चित सवाल थे, उनके इर्द-गिर्द ही मैंने उनसे बातचीत की।फुर्सत के वक्त-अंतराल और दिन के भाग(घंटो, अवधि) के सांचे में मेरा पहला सवाल था। पुनः ऐसे अवकाश की अवधि में वे क्या करती है? मेरा दूसरा सवाल। तय था कि अवकाश जीवन के दैनंदिनी में कहीं पारिभाषिक तौर पर शामिल नहीं है-काम नहीं है, तो बोरियत है। यह जरूरी नहीं है कि दरवाजे पर बैठी कोई कोठे की मालकिन या नर्तकी अवकाश की स्थिति में बाहरी दुनिया का विहंगावलोकन कर रही होती है। काम का हिस्सा, मेहमान के आने का इंतजार। समारोहों में भागीदारी मेरे सवालों के दायरे में था। समारोह अधिकांशतः पर्व-त्योहार ही थीं, लेकिन पर्वों के दिनों में ग्राहकी भी बढ़ जाती है। यानि सामान्य उत्सव के बाद पर्व उनके लिए व्यस्तता के सर्वाधिक बड़े अवसर होते हैं।

नर्तकियों और खानगी पेशे की  स्त्रियाँ एक साथ ईश्वर में विश्वास रखती हैं, बिना किसी गिला-शिकवा के। देवालय नहीं जाती है, लेकिन ईश्वर अराधना में विश्वास है। कमला देवी खूबसूरत हैं। वे ठुमरी गाती हैं-दूसरे अन्य क्लासिकल (शास्त्रीय ) संगीत भी। उनके कोठे पर जब मैं गया तब फिल्मी गीत चल रहा था। मुजरे के तौर पर ग्राहक आज भी फिल्मी गीत पसंद करते हैं। मुकद्दर का सिकंदर का गाना ‘सलामे इश्क’ की आवाज ‘महफिल खाने’ से आ रही थी। गायन बहुत सुरीला नहीं था, गायिका बाहर जो बैठी थी हमारे साथ।

हमारे दूसरे पड़ावों में थे देह-व्यापार से जुड़ी स्त्रियों  के मेहमानखाने- दार्जलिंग से आयी दो बहनों के यहां, बहन 22-23 की। कोठे की मालकिन भी वहीं थी और सेवा प्रदाता भी। दिन के तीन बजे के आस-पास बड़ी बहन कौरीडोर से बाहर झांक रही थी, ग्राहकों के लिए प्रदर्शन का यह रूटीन काम था उनका। कौरीडोर भी हो सकता है क्या? एक रूम और बाहर के खाली स्पेस का दरबा जैसा है घर। नर्तकियों के घर की तुलना में अधिक सीलन भरा। खाली जगह रोड पर खुलता है, वही है कौरीडोर। बहने काम पर थीं यानी अवकाश का सवाल ही कहां हैं? छोटी बहन बड़ी के(चार-पांच साल) बच्चे के साथ कमरे में थी। हम लोगों के जाने पर बड़ी बहन ने अपने खुले घुटनें पर तौलिया डाल लिया, तय था कि सीता दीदी के साथ आने वाला मैं उनका ग्राहक नहीं था, ऐसा ही समझा होगा उसने। हमारे स्वागत के लिए स्टूल था, जिस पर मैं बैठा। दरवाजे की चैखटे पर सीता दी। उसने छोटी बहन को बुलाया और चार ग्लास मैंगो-ज्यूस भी।

वे खाना खुद नहीं पकाती हैं- खाना पकाने और बर्तन धोने के लिए काम वाली बाई आती है। यानी घरेलु काम से मुक्त हैं वे। वे ही नहीं इसके बाद में जिस किसी यौनकर्मी से मिला, सभी। सबका एकमात्र काम है, ग्राहक की सेवा। वे या तो ग्राहक की सेवा के पूर्व की स्थिति में होती है, ग्राहक की सेवा कर रही होती है या एक ग्राहक के सेवा के बाद दूसरे के इंतजार  के अंतराल (बचे समय) के बीच होती हैं-अवकाश का सवाल ही कहां है?

दार्जलिंग की इन लड़कियों की जिंदगी मोबाइल है। वे पांच-छह सालों से गया में है। बड़ी बहन छोटी को बहुत प्यार करती है- ‘है न सुंदर और मासूम मेरी बहन।’ दोनों बहनें कोठे से बाहर नहीं निकलतीं। स्कूल दोनों हीं बहनें कभी नहीं गयीं। एक दिन में दोनों बहनें चार-पांच या उससे अधिक ग्राहकों को निपटाती हैं दिन भर में 500 रूपये मिल गये तो काफी है, दलालों का भी रेट बंधा है। किराया देना है। घर भेजना है। बच्चे का भविष्य है। घर में न टीवी है और न टीवी देखने की फुर्सत। फिल्म नहीं देखतीं-देख भी नहीं सकती। गया के बाहर कभी कोई फिल्म देखा था। मैं गया में ही धंधे में हूं। दार्जलिंग में कोई नहीं जानता। अपना देश नहीं गंवाना चाहिए।’ वैसे दोनो के मां-बाप नहीं है। भाई-बहन हैं।

‘ईश्वर को मानती हूं। ईश्वर न हो तो दुनिया चलेगी ही नहीं।’ मैं उनसे पूछ  नहीं सकता था कि फिर ईश्वर उनके लिए किसी वैकल्पिक व्यवसाय की व्यवस्था क्यों नहीं देता? उमड़ता हुआ यह मेरा  सवाल ‘दूसरे पन’ की मेरी अवस्थिति के कारण था। वे अपने इस पेशे से शिद्दत से जुड़ी हैं। ग्लानि बोध में नहीं है। उनका कहना है, ‘हमलोग कई मां-बहनों को बचा रही हैं। अभी पुलिस का रेड हुआ, धंधा बंद रहा। मानपुर पुल पर बलात्कार हुआ। ‘हमलोग तो समाज को बचा रही हैं।’

पर्व मानती है, धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप। जीवन में कोई यादगार क्षण नहीं है इन बहनों के। छोटी सिर्फ मुस्कुराती है, बोलती कम है। दोनो बहनों की दिली ख्वाहिश है स्वतंत्र घूमने की, फिल्म देखने की बिना किसी घूरती निगाह के, अवकाश कहां!!

थोड़ी देर बाद हम किसी दूसरे कोठे पर बढ़ रहे थे कि इस घर पर हो रही हमारी मेहमाननवाजी को देख रही सामने के कोठे की लड़की ने हमें बुलाया। सीता दी सबसे घुली-मिली थी। बल्कि यहां ज्यादा सहज थी। इस घर की भी मालकिन आम छवि में बैठी कोई मौसी नहीं है, बल्कि वही लड़की है, जिसने हमें बुलाया ‘रेखा’। वह भी तथाकथित कौरीडोर से झांक रही थी। दो बूढ़ी स्त्रियाँ  सो रही थी। नीचे फर्श पर। बुआ कहकर उसने उन्हें जगाना चाहा। जागकर भी वे उठकर बैठी नहीं। वह बहुत बोलने वाली लड़की है, ऐसा उसने स्वयं बताया। कपड़े छोटे थे घुटनों से ऊपर , और नाभी  से भी। उसने कोई तौलिया नहीं डाला। बेफिक्र सी बैठी बातें करती रही चाय मंगवाना चाहा, लेकिन हमने मना कर दिया-अभी ज्युस पिया था।’

वह सिलीगुड़ी की है। रवीन्द्र संगीत जानती है-बंगला गीत गा सकती है।घर में टीवी नहीं है। डेक है, वह बातचीत के बीच उन्हें बजाना शुरू कर देती है। मैंने भी सिर्फ आवाज कम करवायी वह 12 साल से गया में है। उम्र 25-26 साल के बीच। उसने कोई फिल्म नहीं देखी है। ब्यूटी पार्लर भी नहीं गयी।

फुर्सत के वक्त। वह हंसने लगती है। कोई अपराध बोध नहीं। बुढि़या, जिन्हें वह बुआ कह रही थी, उनके प्रति वह बहुत स्नेहिल है और जिम्मेवारी से भरी है। बुढ़ापे के डरावने ख्वाब से उन्हें उसने लगभग मुक्त रखा है यानी जिम्मेवार पारिवारिकता से बंधी है। आपस में एक-दूसरे से मिलती है, लेकिन बहुत कम। ग्राहकों के इंतजार में झांकते हुए कई बार दूसरे से बात कर लेती हैं। वह किसी अपराध बोध से मुक्ति हैं, ‘गलत है, तो गया में ही गया के बाहर बताते भी नहीं।’

पुलिस तंग भी करती है, लेकिन यह सब रूटिन का हिस्सा है। उनके मानसिक उतार-चढ़ाव का अध्ययन अथवा मनोवैज्ञानिक बारीकियां मेरे शोध में शामिल नहीं थे। फिर भी मैने पूछा,
‘पुलिस तंग करती है।’
‘नहीं प्यार करती है।’
सीता देवी ने कहा, ‘तू आसानी से दे देती होगी।’
‘मैं बहुत बोलती हूं। मेरे बक-बक से वे भी परेशान हो जाते हैं।

इसी बीच सीढि़यों के पास दरवाजे पर दस्तक हुई। कौन के जवाब में उसने कहा, ‘मैं तुम्हारा चाचा’।
उसने दरवाजा खोलकर दुत्कारते हुए उसे भगा दिया। फिर शांत बातचीत में तल्लीन हो गयी। सीता दी ने बताया ग्राहक था। बहुत पीकर आए ग्राहकों को ये भगा देती हैं ।

‘खूब सोने की, निश्चित खाने की और प्यार करने की तीव्र इच्छा महज ख्वाब भर है।’

प्रतिरोध का सिनेमा उत्सव भी है ,और आंदोलन भी

अनुपम सिंह

अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com

जब  भारतीय संस्कृति के नाम पर सामंतवादी और पुरुषवादी मूल्यों के पुनर्रस्थापन  की बात ज़ोरों पर हो तो, ऐसे में उस संस्कृति के प्रतिरोध में एक वैकल्पिक संस्कृति की भूमि बनाना ,उसे जनता के बीच ले जाना,उस पर चर्चा-परिचर्चा करना आवश्यक हो जाता है । ‘जन संस्कृति मंच’ के द्वारा शुरू किया गया ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ऐसा ही एक वैकल्पिक मंच है, जहां अतार्किक ,भावुक,असहिष्णु ,एकांगी इस  संस्कृति का पुनर्मूल्यांकन किया जा सके । इसी कड़ी मे उदयपुर के  दूसरे फिल्मोत्सव का आयोजन किया गया था । यह  कार्यक्रम ख्वाजा अहमद अब्बास ,जैनुल आबेदिन ,ज़ोहरा सहगल और नबारुण भट्टाचार्य के उस क्रांतिकारी जज़्बे को समर्पित था ,जिससे भारतीय संस्कृति की सही पहचान की जा सकती है । इनके साथ ही यह कार्यक्रम उन तमाम तरक्की पसंद लोगों को भी समर्पित था  जिनसे प्रेरणा लेकर इस कार्यक्रम की शुरूआत संभव हो सकी थी । जब मैं उदयपुर पहुंची तो इस नयी संस्कृति के सृजन के उत्सव की शुरुआत हो ही रही थी ।एक बड़े से हॉल  मे जैनुल आबेदिन के चित्रों के साथ –साथ मुकेश बिजोले ,महावीर वर्मा के चित्रों की प्रदर्शनी को वहाँ पहुंचे हुये लोग उत्साहित हो कर देख रहे थे । वहीं दूसरे सटे हुये हॉल में उदयपुर फिल्म सोसाइटी के उत्साही युवा साथियों ने ‘बल्ली सिंह चीमा’ के गीत –“ले मशाले चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के ,अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के” से इस तीन दिवसीय कार्यक्रम का आगाज किया ।दूसरे उदयपुर फिल्मोंत्सव के संयोजक शैलेंद्र प्रताप सिंह भाटी नें मंच पर बैठे हुए अतिथियों का परिचय कराते हुए इस कार्यक्रम को करने के उद्देश्य एवं महत्व पर सार-संक्षिप्त रूप में बात रखी।   उदघाटन सत्र के अध्यक्ष : नरेश भार्गव ,प्रमुख वक्ता : संजय काक ,विशेष अतिथि : अशोक भौमिक ,मुकेश बिजोले,महावीर वर्मा थे । मंच पर प्रतिरोध के सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी जी भी उपस्थित थे ।

फिल्में कैसे अपने समय का प्रतिरोध रचती हैं  इस पर संजय जोशी ने विस्तृत रूप से अपनी बात रखी ।चर्चा नियमगिरी से शुरू होकर कुडनकूलम और फिलिस्तीन के लोगों के प्रतिरोध तक गयी ।बेदान्ता को डोगरिया कोंध आदिवासियों नें  नियमगिरी के जंगलो में  खनन करने से रोक कर अपने आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित किया है , तो वही तमिलनाडु के तिरुनेलवली जिले मे कुडनकुलम परमाणु संयंत्र को हटाने के लिए चल रहे लोंगों के प्रतिरोध मे साथ होने की बात कही संजय जी ने । इन तीन दिनों के कार्यक्रम की रूप-रेखा देखकर आशुतोष कुमार की यह बात पुष्ट होती है की ‘जब हम फिल्मोत्सव मानते है तो वह सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं होता है, बल्कि उसमे वे तमाम कला रूप शामिल होते हैं जिनसे प्रतिरोध की नयी जमीन को तैयार किया जा सके ,उसमे नयी पौध रोपी जा सके । ‘जन संस्कृति मंच’ ने सांस्कृतिक आन्दोलनों के अनेक रूपों को अपने इस प्रतिरोध के वैकल्पिक मंच के भीतर ही समाहित कर लिया है। ऐसा उयदयपुर के इस फिल्मोत्सव में देखने को मिला । फिल्म के साथ –साथ चित्र- प्रदर्शनी ,कविता ,कहानी ,गीत ,वाद –संवाद ,स्टैंड अप कॉमेडी आदि सांस्कृतिक विधाओं का प्रयोग इस फिल्मोत्सव में हुआ ।  अशोक भौमिक जी का कहना था कि, जब समाज में अनेक रूपों मे शोषण ,अत्याचार ,भ्रष्टाचार ,असमानता ,जातिवाद ,संप्रदायवाद आदि व्याप्त है तब केवल एक  कला माध्यम  सफल नहीं हो सकता । यह बात सच ही है । तभी तो  आज अनेक कला माध्यमों,साहित्यिक विधाओं, सोशल मीडिया आदि के द्वारा प्रतिरोध का  मंच तैयार करने की कोशिश देखने को मिल रही है ।

जैनुल आबेदिन के अकाल के चित्रों  पर  बात करते हुए भौमिक जी ने मेट्रो-कला का विरोध किया । और यह बात वहाँ  लगी मुकेश विजोले और महावीर वर्मा के चित्रों  की प्रदर्शनी से समझी जा सकती है । वर्तमान समय में  महानगरो को कलाओं का केंद्र मानने की जो प्रथा चल पड़ी है उस छवि को इन छोटे शहरों के कलाकार तोड़ रहे हैं। उदयपुर के लोगों के मन मे कला को लेकर अनेक जिज्ञासाएँ और अनगिनत सवाल थे जिसको उन लोगों ने मंच से साझा किया । दस्तावेजी फ़िल्मकार संजय काक जी मौजूद थे उनका कहना था  कि , आज प्रतिरोध की भाषा बदल गयी है ,प्रतिरोध की फिल्में भी अधिक बन रही हैं,परंतु मेरे जेहन में इस दुनिया को एक दिन में  बदलने का कोई तरीका नहीं हैं । संजय काक की इस बात से पूरी तरह सहमत हुआ जा सकता है।  जिस सभ्यता के विकास का  इतिहास इतना लंबा और दमनात्मक रहा हो कि, वह हमारी कल्पना में  ही न अटे सके तो उसके  संस्कृति कि लड़ाई उतनी  ही सूक्ष्म और लंबी लड़नी होगी । लेकिन इससे होने वाला परिवर्तन निःसंदेह स्थायी होगा । नरेश भार्गव का कहना था कि, आज दुनिया भर के समाजविज्ञानी ‘प्रतिरोध’ का समाजशास्त्रीय विश्लेषण कर रहे हैं । यह सही है कि, आज सिनेमा प्रतिरोध का एक सशक्त माध्यम है। शिक्षण संस्थाओं में फिल्मों पर काम करने का रुझान बढ़ा है,पिछले कुछ वर्षों में  सिनेमा से संबन्धित अच्छी पुस्तके भी आयी हैं । सिनेमा को  लेकर निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में जो नकारात्मक भाव था, वह टूटा है । लेकिन सवाल यह है कि, प्रतिरोध के इस वैकल्पिक सिनेमा को  हम उन गाँव और घरों तक कैसे ले जाएंगे ? तो शायद इसका जवाब यही  होगा कि , उदयपुर फिमोत्सव की  तरह से ही  गाँव और  शहरों में  फिल्मोंत्सवों का  आयोजन  और छोटे –छोटे फिल्म क्लबों का निर्माण करके जनपक्षधर सिनेमा का विकास किया जा सकता है  ।उदयपुर का यह फिल्म महोत्सव तब और सार्थक हो जाता है, जब यह वैश्विक प्रतिरोध को अपने इस प्रतिरोध के मंच से जनता के सामने प्रस्तुत करता है। फिलिस्तीन के साथ –साथ दुनिया के किसी भी कोने में जो फिलिस्तीन रोज  घट रहा है ,ऐसे फिलिस्तीनीयों के जिजीविषा और प्रतिरोध के समर्थन मे रफीफ ज़िहाद द्वारा “वी टीच लाईफ सर”अंग्रेजी मे 5 मि॰ की वीडियो काव्य प्रस्तुति की गयी ।उदयपुर की फिल्म सोसाइटी द्वारा जिन फिल्मों का चुनाव किया गया था  उसमे- ‘गुलाबी गैंग’,’विकास के नाम पर’,’माटी के लाल’,’छिपा हुआ इतिहास’,’व्हेयर हैवयू हिडन माय न्यू क्रिसेंट मून’, ’फ़ंड्री’, ’धरती के लाल’, ’इज्जतनगरी की असभ्य बेटियाँ’, ‘कैद’ ,’कंचे और पोस्टकार्ड’, ’ए घेटो फॉर द डेड’, ‘इन सिटीलाइट’, ‘भोभर’, ’आँखों देखी’,आदि थी। अभी हाल मे ही मुख्य धारा के सिनेमा ने भी ‘गुलाब गैंग’ नाम से फिल्म बनाई थी। उदयपुर में  जब मैंने निष्ठा जैन द्वारा निर्देशित ‘गुलाबी गैंग’फिल्म देखी तो दस्ताबेजी फिल्मों और मुख्य धारा की फिल्मों के पूरे चरित्र को बड़ी आसानी से समझने का अवसर मिला  । मुख्य धारा की फिल्मों में जिस तरह रंग –रोगन लगा कर समस्या का उपचार किया जाता है, वह पूरी तरह बाजार,पूंजीवाद और पारंपरिक भारतीय जनमानस को ध्यान मे रख कर ही किया जाता है । उनका प्रथमतः और अंततः उद्देश्य पैसा कमाना ही होता है । इस देश में जहां पुंषवाद ही सम्पूर्ण संस्कृति का निर्माता और निर्देशक हो वहाँ ‘गुलाबी गैंग’, ‘इज्जतनगरी  की असभ्य बेटियाँ’जैसी दस्ताबेजी फिल्में बनानी  अति आवश्यक है ।

‘इज्जतनगरी की असभ्य बेटियाँ’ का निर्देशन नकुल सिंह साहनी ने किया है । यह फिल्म हरियाणा के जाट समुदाय मे ’खाप पंचायत’ नाम की  सामाजिक पहरेदारी करने वाली संस्था के प्रतिरोध में बनी हैं । वर्तमान समय में इस फिल्म की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।  जब ‘लब जेहाद’ जैसी राजनीतिक रणनीति के माध्यम से इस देश में  स्त्रियों की आजादी को छीनने की कोशिश कुछ सांप्रदायिक संस्थाएँ कर रही हो ।’लब जेहाद’ और ’खाप पंचायत’जैसी संस्थाएँ एक समान उद्देश्य से चलायी जा रही है।  आजादी के इतने दिनों बाद भी इस देश मे स्त्री ,दलित ,आदिवासी आदि के लिए स्वाभिमान और आत्मसम्मान  के साथ जीवन जीने की कोई झलक नहीं दिखाई देती । दलितों की स्थिति में जो भी परिवर्तन हुआ है वह नाकाफी है । आज भी जो दलित साहित्य आ रहा ,जो फिल्में बन रही हैं उससे उनके विकास की सही पोल खुलती है । मराठी में जो आत्मकथाएं लिखी गयी हैं वह उनके जीवन का सही प्रमाण देती हैं  । और सिनेमा के माध्यम से उस यथास्थिति,असमानतापूर्ण नारकीय जीवन का यथार्थ चित्र उसके पूरे अंतर्विरोधों के साथ  ‘फ़ंड्री’ फिल्म( नागराज मंजुले द्वारा निर्देशित है) में दिख रहा है । उदयपुर फिल्मफेस्टिवल मे ‘फ़ंड्री’ के प्रोडयूशर विवेक कजरिया के साथ –साथ नकुल सिंह साहनी ,मोहम्मद गनी(कैद के निर्देशक ),सौरभ व्यास(सिटी लाईट्स, कंचे और पोस्टकार्ड),गजेन्द्र श्रोत्रिय (भोभर)  रामकुमार से संजय जोशी की बात-चीत ,जो फिल्म के विषय-चयन ,उसके वितरण ,खर्च आदि को लेकर थी वहाँ बैठे दर्शक साथियों मे उत्साह भरने वाली थी , मोहम्मद गनी से बात करके दर्शक-दीर्घा मे बैठे कई  साथियों का मानो फिल्म बनाने का सपना पूरा हो गया हो इस कदर उत्साह से भर गए । इस कार्यक्रम कि महत्ता इसके समवेशी चरित्र के कारण और  अधिक बढ़ जाती  है। जो इस कार्यक्रम कि प्रतिबद्धता भी है।  संजय काक द्वारा निर्देशित फिल्म ‘माटी के लाल’ देखने  के बाद दर्शको नें फिल्म में दिखाये गए आदिवासियों के जल ,जंगल, जमीन अर्थात जीवन को बचाने कि लड़ाई को, जो कि ‘माओवाद’ के नाम से जानी जाती है से संबन्धित कई सवाल पुछे। संजय काक का कहना था कि लड़ाइयाँ तो पंजाब ,कश्मीर ,उड़ीसा,छत्तीसगढ़ ,झारखंड, नार्थईष्ट सभी जगह लड़ी जा रही हैं,हाँ लड़ाइयों का रूप अलग हो सकता है।

इस कार्यक्रम में  बच्चों से जुड़ा एक पूरा सत्र ही था। जिसमें  बच्चों द्वारा बनाए गये चित्रों कि प्रदर्शनी लगी थी। बच्चों के नन्हें हाथों से खींची गयी आड़ी तिरछी रेखायेँ बहुत ही सुंदर लगी । संजय मट्टू ने बच्चों को बहुत ही रोचकीय ढंग से ‘ डॉ॰ ज़ाकिर हुसैन’ कि कहानी सुनायी। कहानी सुनते समय बच्चे कभी तो आश्चर्य से  भर उठते तो कभी खुश होकर संजय मट्टू के साथ कहानी दुहराते ।कहानी से संबन्धित सवालों के जवाब भी बच्चों ने बड़ी समझदारी के साथ दिया।    बच्चों के साथ मेरा भी मन बचपन कि उन स्मृतियों में खो गया जब कहानी सुनने के लिए सबकी टहल बजाती थी । बच्चों के लिए चुनी गयी फिल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड; बहुत ही अच्छी फिल्म थी । जिसमें बच्चों के खेल-खिलौने , उनके दोस्तों की दुनिया और उनके मनोविज्ञान को समझने के लिए एक सरहनीय प्रयास था । आज का  बचपन बस्ते के नीचे दम तोड़  रहा है ,उनके खेल-खिलौने का निर्धारण पूरी तरह से बाजार के हाथों मे चला गया है ,दोस्तों की दुनिया  घर के कुछ सदस्य  तक सीमित हो गयी है। ऐसे समय मे यह बचपन बचाने की एक सफल शुरुआत है ।इसी  तर्क को  यदि आगे बढ़ाया जाय तो कई और भी सवाल पैदा होते हैं, जिनको मोहम्मद गनी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ क़ैद ‘मे उठाया गया है। स्कूलों और घरों में बच्चों के प्रति बरती जाने वाली  किसी भी तरह की  असंवेदनशीलता कैसे उनको मनोरोगी बना देती है। उस पर यदि परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो अशिक्षा ,अंधविश्वास जैसी कई बुराइयाँ घर के भीतर जड़ जमा लेती हैं । गनी की फिल्म को देखकर वहाँ बैठे शिक्षक ,अभिभावक और स्वयम बच्चों ने भी अपने –अपने अनुभव साझा किए। एक और बात का संकेत इस फिल्म में है जिसकी तरफ शायद दर्शकों का ध्यान नहीं गया ,वह यह की शिक्षा के निजीकरण होने से शिक्षको के जीवन मे अस्थायित्व आया है।  जीवन मे असुरक्षा का बोध बढ़ा है, जिसके चलते कर्तव्य बोध टूट है  और पेट भरने ,बढ़ी हुयी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वह अन्य माध्यमों से भी  पैसा बनाने की कोशिश करता है। मेरी दृष्टि में यह फिल्म- शिक्षक ,शिक्षार्थी और अभिभावक के आर्थिक सम्बन्धों को विश्लेषित करती है।  उदयपुर फिल्मोत्सव में युवा ‘वालेंटियर’ साथियों की सहभागिता,उनके सवाल ,जिज्ञासाएँ उनकी टिप्पणियाँ सुनकर लगा की इस देश में एक ऐसी  युवा पीढ़ी का उभार हो रहा है, जो मानव विरोधी संस्कृति और प्रतिगामी विचारों के खिलाफ सजग है ।  इस कार्यक्रम कि बहुत सारी स्मृतियाँ बाकी हैं, जिसको लिखना संभव नहीं हो पा  रहा है। लेकिन अंत मे वरुण ग्रोवर कि कॉमेडी का जिक्र करने से खुद को रोक नहीं पा  रही हूँ । कॉमेडी  के नाम पर खूब  कूड़ा- करकट उड़ रहा है।  स्त्रियों के प्रति बहुत ही  सूक्ष्म भाषिक हिंसा कि जा रही है।  ऐसे मे वरुण ग्रोवर कि राजनीतिक समझदारी, कॉमेडी और व्यंग को नयी दिशा दे रही है ।

हर पुरुष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है

निवेदिता


निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com

( पाखी के सम्पादक ने सितम्बर अंक के अपने सम्पादकीय में चालीस साल की स्त्रियों के प्रेम , उनके विश्वास और विश्वासघात तथा तथाकथित तौर पर उनमें साहस के अभाव सहित अभिव्यक्ति के नये आयाम के साथ ज्यादा उन्मुक्त होती स्त्रियों को अपना विषय बनाया है . ४० साल की यह उम्र सीमा समझ से परे है . वैसे पुरुषों के लिए स्त्रियों की उम्र और उनका कौमार्य बड़ा पुराना विमर्श -विषय रहा है . १९वी शताब्दी में तिलक और रानाडे आदि विवाह के लिए ९ साल या ११ साल की बहस में फंसे थे या फिर किस विधवा की शादी हो , जैसे विषय में . यानी बहस यह थी कि पति -संसर्ग कर चुकी विधवा का पुनर्विवाह हो या नहीं . पाखी के सम्पादक भी उसी कड़ी में विमर्श कर रहे हैं ,  शर्मिला इरोम  , अरुंधति राय , शोभना भारतीय , इंदिरा नुई , सुस्मिता सेन , विद्या बालन के समय में. या उस समय में जब स्त्रियाँ अपनी कामनाओं और इच्छाओं के साथ सक्रिय हैं . निवेदिता पाखी के विवादित सम्पादकीय के परिप्रेक्ष्य से अपनी बात कह रही हैं . आप भी आमंत्रित हैं . )

प्रेम भारद्वाज को पढ़ती रही हूं । मुझे उनको पढ़ना अच्छा लगता है। अच्छा इसलिए नहीं कि वे मित्र हैं, इसलिए कि लिखना एक कला है। उंनकी अभिव्यक्ति लेखन -कला के साथ जीवंत होती है . काला  जितनी उनके बाहर है उतनी भीतर। हम यह उम्मीद करते हैं कि कला के प्रति गहरा अनुराग रखने वाला इंसान स्त्री मुद्दों पर भी उतना ही संवेदनशील होगा ,जितना मनुष्यता को लेकर। सीमोन कहती हैं, ‘  स्त्री जन्म नहीं लेती स्त्री गढ़ी जाती है।’  मुझे लगता है पुरुषों के बारे में भी यह कहा जाना चाहिए कि ‘ हर पुरुष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है.’

पाखी के संपादकीय‘ चांद पर हूं…मगर कब तक’ में प्रेम भारद्वाज ने जो कुछ लिखा उससे अंधेरा और गहरा हुआ है। एक बार फिर स्त्री लहुलूहान हुई है। मैं नहीं जानती की जिन 40 पार की स्त्रियों का जिक्र संपादकीय में किया गया है वे किस दुनिया की स्त्री हैं? जहां प्रेम भी प्रेम जैसा नहीं है। टाइम पास है। सिनेमा का मध्यांतर है। जहां मौज मस्ती के साथ पाॅपकार्न खा लेने भर का ही वक्त है।  प्रेम भारद्वाज की यह स्त्री छलना है, पर पुरुष गामिनी  है। अपने घर के दायरे को सुरक्षित रखकर प्रेम करती है, मजा लेती है। यह वह स्त्री नहीं है, जो प्रेम के लिए मर जाती है या मार दी जाती है, जिसने घरती पर पांव जमाने के लिए खुरदरी जमीन पर अपनी मेहनत से फसल उगायी है। जिसने अपने हिस्से के आसमान के लिए खून से भरे शोक  के फर्श  पर सदियां बितायी है।

ये कौन स्त्री है? किस वर्ग की? किस दुनिया की जिसे अपने गोपन कक्ष में प्रेम करने की आजादी है। जहां वह प्रेमी के साथ जीती है,पति के साथ सोती है? और यह बेचारा पुरुष कितना मासूम, प्रेम में मरने वाला, जान देने वाला है। राम सजीवन जैसा पुरुष किस दुनिया में रहता है ? काश  कि किसी स्त्री के जीवन में इतने संवेदनशील  मर्द होते!

सब्जेक्शन आॅफ विमेन में जाॅन स्टुअर्ट मिल कहते हैं-‘पुरुष अपनी स्त्रियों  को एक बाध्य गुलाम की तरह नहीं बल्कि एक इच्छुक  गुलाम की तरह रखना चाहते हैं,सिर्फ गुलाम नहीं, बल्कि पंसदीदा गुलाम। इसलिए उनके मस्तिष्कों को बंदी बनाए रखने के लिए उन्होंने सारे संभव रास्ते अपनाए हैं।’

हर नैतिकता स्त्री से यही कहती फिरती है कि स्त्री को दूसरों के लिए जीना चाहिए। सच तो यह है पराजित  नस्लों और गुलामों से भी ज्यादा सख्ती और क्रूरता  से स्त्री को दबाया गया। यह हम नहीं कह रहे हैं यह स्त्री का इतिहास बताता है। क्या कोई भी गुलाम इतने लंबे समय के लिए गुलाम रहा है जितनी की स्त्री? क्या यह स्थापित करने की कोशिश नहीं है कि अच्छे पुरुष की निरंकुश सत्ता में चारों तरफ भलाई,सुख और प्रेम के झरने बह रहे हैं। जिसकी आड़ में  वह हर स्त्री के साथ मनमाना व्यवहार कर सकता है। उसकी हत्या तक कर सकता है और थोड़ी होशियारी बरत कर वह हत्या कर के भी कानून से बचा रह सकता है। वह अपनी सारी दबी हुई कुंठा अपनी पत्नी पर निकाल सकता है। जो अपनी असहाय स्थिति के कारण न पलट कर जबाव दे सकती है, न उससे बचकर जा सकती है। अगर यकीन न हो तो हर रोज मारी जा रही स्त्रियों के आंकड़े को उठा कर देख लें।

40 के पार की औरतोें अगर प्रेम में इतनी ही पकी होतीं तो हर रोज रस्सी के फंदे से झूलती खबरें अखबारों के पन्ने पर नजर नहीं आती। सच तो यह है कि उसकी पूरी जिन्दगी अपने घर को बचाने में चली जाती है। घर उसके जीने का केन्द्र है। उसके हंसने, बोलने, रोने का। इसलिए उसने घर को अपना फैलाव माना। उसे सींचा। पर इसके पेड़ का फल पुरुषों ने ही खाया। उसे राम सजीवन जैसा न कभी प्रेमी मिलता है न एकनिष्ठ पति। फिर भी वह अनैतिक है। पुरुष को नैतिक और  स्त्री को अनैतिक बनाने की मानसिकता के पीछे यह बताना है कि पुरुष नैतिक रुप से श्रेष्ठ है। नैतिकता और अनैतिकता को लेकर हमेशा  से अतंर्विरोध रहा है। जिसका नायाब उदाहरण है टाॅलस्टाय का उपन्यास अन्ना कैरेनिना। अनैतिक अन्ना विश्व  उपन्यास की सबसे यादगार चरित्रों में से है।  टाॅलस्टाय के नैतिकता संबंधी विचारों को उसकी कला ध्वस्त कर देती है।

जिस समाज में प्रेम अपराध है उस समाज में स्त्री को इस बात की छूट कहां कि वह प्रेम से भरी दिखे। वह प्रेम के लिए जिए। वह प्रेम कविता लिखे। पता नहीं प्रेम भारद्वाज को वैसी स्त्रियाँ  कहां दिख गयीं । जिस फेसबुक को स्त्री के लिए किसी दरीचे के खुलने  जैसा मान रहे हैं  उसके खुलेपन  से इतने आहत क्यों? फेसबुक पुरुषों का भी  चारागाह है। जहां वे शिकारियों  की तरह ताक में बैठे रहते हैं कि जाने कौन किस चाल में फंसे। दरअसल ये पूरी बहस ही बेमानी है। प्रेम को किसी अलग सदंर्भ में नहीं देखा जा सकता। हमारी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक और लैंगिक बुनावट तय करती है कि कौन सा समाज किन मूल्यों के साथ जीता है। इसी समाज में ईरोम भी है और अरुणा राय भी।

सवाल उठता है कि हम स्त्री को किस तरह से देखते हैं। एक आब्जेक्ट के रुप में या मनुष्य के रुप में ? अगर हम मनुष्य की तरह देखेंगे तो हमें तीसरी कसम का हीरामन ही याद नहीं आयेगा हीराबाई के प्रति भी हमारी गहरी संवेदना होगी। देवदास शराब में डूब कर मर जाता है पारो जिन्दगी से लड़ती है, पलायन नहीं करती। अगर लैेला नहीं होती तो आज मजनूं नहीं होता। न लैला कहती , ‘ मेरा कब्र वहीं बनाना ,जहां मैं पहली बार उससे मिली थी। उससे कहना कि मेरी कब्र पर आयें,और सामने क्षितिज की ओर देखे.  वहां मैं उसका इंतजार कर रही हूंगी। ‘ और जिन आंखों में मजनूं के सिवा कोई समाया नहीं था, वे आंखें हमेशा  के लिए बंद हो गयी।

‘ कागा सब तन खाइयो
चुनि-चुनि खाइयो मास
दुइ अंखियां मत खाइयो
पिया मिलन की आस।’ …

दरअसल प्रेम यही है। इससे इतर कुछ नहीं। वह 40 की पार औरतें हों या फिर 16 साल की मासूम उम्र,  जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियाबी रस्मों रीवाज छू पाते हैं।

घर की प्रताड़ना से फोटोग्राफी की मंजिल तक

( चर्चित फोटोग्राफर सर्वेश ने घरेलू हिंसा की असहनीय पीड़ा से मुक्त होकर फोटोग्राफी को अपनी मंजिल  चुना और मुकाम तक  पहुँची भी  . सर्वेश से परिचित करा रही हैं कवयित्री दीप्ति शर्मा  )

यह एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी एक ऐसी लडकी की कहानी है, जिसने अपना रास्ता खुद बनाया तमाम
बंदिशो ,कठिनाईयोँ को लांघकर वह आज एक अलग मुकाम पर खडी है.  बचपन से ही सर्वेश का सपना वकील बनने का था, वह कानून की पढाई करना चाहती थी पर 12 वीँ पास करते ही  ( बाद में उन्होंने बी ए की डिग्री ली . उसकी शादी पक्की कर दी गयी . वह  इस शादी के लिये तैयार नहीँ थी , परिवार ने उसे इस इनकार के लिए प्रताड़ित किया और उसकी शादी उसकी  बिना मर्जी के सन 1976 में  एक ऐसे व्यक्ति से कर दी  ,जो औरत को अपनी जरुरतेँ पूरी करने वाली एक मशीन समझता, बात बात पर पिटाई,गाली -गलौच मानो उसकी नियती बन गयी हो.

राहत पाने की चाह में एक दिन माता-पिता के पास पहुंची ,तो उन्होंने भी वह नरक भोगने की सलाह दी और कहा शादी हो गयी है ,अब निभाना ही पडेगा। सर्वेश ने कई बार महसूस किया कि उसका आत्मसम्मान, सुरक्षा के लिए  भी उसका पति तैयार नहीँ था ।

एक बार बालकानी से फेँका कूडा वहां से गुजर रहे एक व्यक्ति पर गिर गया ,वह व्यक्ति बहुत गुस्से में ऊपर घर पर आ पहुंचा बहुत मांफी मांगने पर भी वह आदमी अभद्र भाषा का प्रयोग करता रहा , गाली- गलौच करता रहा बॉलकानी से नीचे फेँक देने की धमकी भी दे डाली और उसका पति चुपचाप यह सब देखता रहा ,उसने कोई बीच-बचाव नहीँ किया .

इस घटना से  सोती हुई औरत जाग गयी और एकदम कडक आवाज़ में बोली ” हाथ लगाकर तो देख ” इस पर वह आदमी बुदबुदाता हुआ वहां से चला गया । यह सब देखकर वह समझ गयी थी की अब आगे उसे क्या करना है तो फिर क्या था नवम्बर सन 1988 में पति का घर छोड वह निकल पडी अपनी मंज़िल तलाशने ।

धीरे धीरे बहुत से लोग उसके सम्पर्क में आये . छोटे -मोटे रोजगार भी मिले .  नए दोस्तों के बीच वह किताबे पढ़ती . लेकिन जिन्दगी का अहम पड़ाव था एक दोस्त के द्वारा भेट किया गया कैमरा . शायद वह सर्वेश के अंदर छुपे हुनर को जान गया था ,इससे सर्वेश का पुरुष जाति पर फिर से भरोसा हुआ , उस कैमरे ने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी . वही उसका साथी हो गया हर सुख दुख का।

उसने अपने कैमरे से कई मृतप्राय वस्तुओँ में जान डाल दी . सर्वेश का  पहला professional फोटोग्राफ हिमाचल टाइम्स देहरादून में प्रकाशित हुआ । सन 1991 में उत्तराखंड में भूकंप के दौरान लिये गये फोटोग्राफ से उसकी एक अलग पहचान बनी , उसके  फोटो ग्राफ अधिकतर अखबारोँ में प्रकाशित हुए । पुरुष प्रधान समाज़ में जहाँ इस क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा अधिक दिखायी पडता है ,वहाँ उसने  हिम्मत नहीँ हारी और उत्तराखंड में डटी रहीं, एक  सप्ताह रोड पर सोकर गुजारा .  उस दौरान लिये गये तकरीबन ५० फोटोग्राफ देश के प्रमुख अखबारोँ में प्रकाशित हुए।

कारगिल  की लड़ाई में भी सर्वेश ने साहसिक फोटोग्राफी की . वहाँ खींचें गये 100 से अधिक फोटोग्राफ देश के महत्वपूर्ण अखबार एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए. कई औरतोँ बच्चोँ के जीवन की तमाम कडियोँ को उन्होनेँ अपने कैमरे में कैद किया। कोयले की अँधेरी खानोँ में उसके सम्वेदनशील कैमरे ने नयी जान डाल दी,  उसने   कई दंगों में ,हिमालय कार रैली, लद्दाख के त्यौहार, हर जगह पर अपने कैमरे का करतब दिखाया ।

गुजरात भूकम्प और सूखे की स्थिति हो या कुम्भ मेला  हरिद्वार या इलाहाबाद की तस्वीरें, मुरादाबाद के दंगे हो या उतरांचल का प्रसिद्ध नंदा राज जाट त्यौहार हर जगह सर्वेश के कैमरे ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की .

सर्वेश ने फोटोग्राफी  के लिए श्रीलंका , यू.के. भूटान ,नेपाल आदि देशोँ की यात्रा की .  फोटोग्राफी की कई किताबों की इस लेखिका के फोटोग्राफ  women in the time of flux  सीरीज के तहत दिल्ली, भोपाल, बरेली, मेरठ,लखनऊ और मैसूर में प्रदर्शित हुए .  मुम्बई, अहमदाबाद, कोच्चि, चेन्नई, कलकत्ता में की भी प्रदर्शनियों में सर्वेश की प्रमुख भागीदारी रही .  एकल प्रदर्शनी ‘ children in times of flux ‘के नाम से IIC ,दिल्ली, में  फरवरी 2008 में बहुत सफल और महत्वपूर्ण रही ।

कारगिल में ली गई एक तस्वीर के लिए सर्वेश भारत सरकार से सम्मानित हो चुकी हैं .हिन्दी अकादमी सहित विभिन्न संस्थानों से सम्मानित हो चुकी हैं . सर्वेश ‘गॉड फ्रे’ सम्मान से सम्मानित हैं .  आजकल वे एक सफल फ्रीलांस ( स्वतंत्र ) फोटोग्राफर के रुप में सक्रिय हैं।

अब तक सर्वेश एक बहुचर्चित नाम  हैं ,जिसे शायद आज हम सब बखूबी

जानते हैं.  एक आम लडकी जो अपने पति की प्रताडना से परेशान थी यहां तक कैसे पहुंची ? निश्चित ही अपने डर और अपने औरत होने के मनोविज्ञान पर काबू पाकर .

मीना खोंड की दो कवितायें

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मीना खोंड

मीना खोंड कवितायें लिखती हैं, लन्दन  में रहती हैं. संपर्क : meenakhond@gmail.com

१. 


क्या पूछते हमें
कैसे रहे ? कैसे जीए ?
हम तो बस
उन्हीं के हो गए
उन्होंने अपनाया
हम न हमारे रहे
उनके इशारे चलते रहे
बस, हम जीते रहे

क्या पसंद , नापसंद क्या
बेमतलब सवाल रहे
वे कहते रहे
हम सुनते रहे
अपने लिए , अपनी मर्जी से कैसे जीते !
आखिर औरत हूँ
कन्यादान में जो मिली हूँ
स्वतंत्र देश की गुलाम नागरिक हूँ

2. 


तेरा उडता आंचल
तेरा बहता काजल
गहरा अह्सास
कौन पह्चानता ?

दुःख दर्द आहें
आंसू भरी निगाहें
अर्थ उनका
कौन समझता ?

पल भर की देहभूख
पल भर का देह सुख
अस्तित्व तुम्हारा
यहीं सिमटता

तू माता भगिनी
तू कांचन कामिनी
तेरी एक ही औरत जात
हर कोई  समझता

शादी का झूठा आश्वासन यौन शोषण

अरविंद जैन

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120
bakeelsab@gmail.com

यौन शोषण (हिंसा) के अधिकांश मामले, अनियंत्रित काम-वासना को संतुष्ट करने के लिए, बेहद सावधानी से रचे होते हैं । कामुक फिल्मी छवियों का एहसास और उद्दाम ‘फैंटेसी’ का एक मात्र उद्देश्य, महिलाओं पर हावी होना है। दरअसल, वास्तविक बलात्कार या ‘डेट रेप’ करने से पहले, बलात्कारी के दिमाग में नशे की तरह, कई बार इसकी ‘रिहर्सल’ की गई होती है। मगर प्राय पीड़िता को ही सदा दोषी ठहराया और अपमानित किया जाता है । परिजनों द्वारा कथित ‘खानदान की इज्ज़त’ के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है।

शादी का झांसा देकर किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाना और बाद में शादी से मना करना, बलात्कार के दायरे में आता है । वह भी तब, जब लड़के का लड़की से शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा न हो। हम इसे ‘शादी की आड़ में ‘यौन शोषण’ भी कह सकते हैं। अधिकतर लड़के शादी का झांसा देकर, शारीरिक रिश्ते बनाते हैं और तब तक बनाते रहते हैं, जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती। कुछ समय बाद, गर्भपात कराना भी मुश्किल हो जाता है और अंतत मामला परिवार और पड़ोसियों की नजर में आ ही जाता हैं। बाद के अधिकतर मामलों में, ऐसे दोषियों के खिलाफ मामले दर्ज होते हैं। रोज़ हो रहे हैं।

भारतीय अदालतों ने कई बार सवाल उठाए हैं– “किसी लड़की से शादी का झूठा वायदा करके, शारीरिक रिश्ते बनाना सहमति है या नहीं? यदि वह बलात्कार नहीं है तो यह धोखेबाजी है या नहीं?”

जयंती रानी पांडा बनाम पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य के मामले में कलकता उच्च न्यायालय का मानना था कि अगर कोई बालिग लड़की शादी के वादे के आधार पर, शारीरिक रिश्ते को राजी होती है और तब तक इस गतिविधि में लिप्त रहती है, जब तक कि वह गर्भवती नहीं हो जाती, तो यह उसकी ओर से ‘स्वच्छंद संभोग’ के दायरे में आएगा। ऐसे में, तथ्यों को गलत इरादे से प्रेरित नहीं कहा जा सकता। भारतीय दंड संहिता की धारा-90 के तहत अदालत द्वारा कुछ नहीं किया जा सकता, जब तक यह आश्वासन न मिले कि रिश्ते बनाने के दौरान, आरोपी का इरादा आरम्भ से ही शादी करने का नहीं था। (1984 क्रिमिनल लॉ जर्नल 1535) बंबई उच्च न्यायालय ने कहा भारतीय दंड संहिता की धारा-415 में ‘धोखाधड़ी’ के अपराध को परिभाषित किया गया है।  शादी का झूठा वायदा कर, जानबूझकर दिए गए प्रलोभन के बाद शारीरिक रिश्ते बनाना, ‘धोखाधड़ी’ की परिभाषा के तहत ‘शरारत’ के दायरे में आते हैं और दंडनीय अपराध है। (आत्माराम महादू मोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1998 (5) बीओएम सीआर 201)

पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि यह बलात्कार का अपराध नहीं है। शादी के झूठे वायदे की आड़ में  आरोपी द्वारा वादी को धोखे में रखकर, लगातार शारीरिक रिश्ते बनाना  धारा-415 के तहत ‘धोखाधड़ी’ का प्रथम-दृष्ट्या अपराध सिद्ध होता है। (मीर वाली मोहम्मद उर्फ कालू बनाम बिहार सरकार (1991 (1) बीएलजेआर 247) सर्वोच्च न्यायालय  ने 2004 में एक  फैसला सुनाया- हमें इसमें संदेह नहीं कि आरोपी ने लड़की से शादी का वायदा किया था और इसी प्रभाव में लड़की ने उसके साथ शारीरिक रिश्ते भी बना लिए। आरोपी असल में विवाह का इरादा तो रखता था लेकिन परिवार के बड़े-बुजुर्गों के दबाव में ऐसा नहीं कर पाया। यह विवाह करने के वायदे को लेकर, वायदा खिलाफी का मामला प्रतीत होता है, न कि विवाह के झूठे वायदे का मामला। (दिलीप सिंह उर्फ दिलीप कुमार बनाम बिहार राज्य, 2005 (1) सुप्रीम कोर्ट केसेस 88)। उदय बनाम कर्नाटक सरकार के मामले (2003) में सर्वोच्च न्यायालय  ने दृढ़तापूर्वक कहा कि कोई कड़ा फार्मूला नहीं बनाया जा सकता लेकिन यदि लड़की की उम्र 19 साल है और उनमें इस करतूत के महत्व और नैतिक गुण की पर्याप्त समझ है, तो उसकी सहमति मानी जाएगी। न्यायाधीश एन. संतोष हेगड़े और बी. पी. सिंह ने गंभीर संदेह जताया कि याचिकाकर्ता के बुलाने पर चोरी-छुपे लड़की, रात 12 बजे सुनसान जगह पर चुपचाप गयी। जब दो लोग जवान हों, तो आमतौर पर ये होता ही है कि वे सभी अहम बातों को भुलाकर जुनून में आकर प्यार कर बैठें, खासकर तब जब वे कमजोर क्षणों में अपनी भावनाओं पर काबू न कर पायें। ऐसे में, दोनों के बीच शारीरिक रिश्ते कायम हो ही जाते हैं। लड़की स्वेच्छा से लड़के के साथ रिश्ते कायम करती है, वह उस लड़के से बेहद प्यार करती है, इसलिए नहीं कि उस लड़के ने उससे शादी के वायदा किया था, बल्कि इसलिए कि लड़की ऐसा चाहती भी थी। (2003 (4) सुप्रीम कोर्ट केसेस 46)

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ए.के माथुर और अल्तमस कबीर ने 2006 में एक और फैसला सुनाया- “हम संतुष्ट हैं कि आरोपी ने उसे राजी करते हुए सबकुछ किया, लेकिन वह ऐच्छिक भी नहीं था क्योंकि उसने शादी करने जैसा वायदा करके उसे फुसलाया। कानून इसकी इजाजत नहीं देता। पीड़ित लड़की और गवाहों की गवाही से पूरी तरह स्पष्ट होता है कि गवाह पंचायत की तरह काम कर रहे थे। आरोपी ने पंचायत के समक्ष स्वीकार किया कि उसने लड़की के साथ शादी करने का वायदा कर उसके साथ शारीरिक रिश्ते बनाये लेकिन पंचायत के समक्ष वायदे करने के बावजूद वह पलट गया। इससे पता चलता है कि आरोपी का शुरू से ही लड़की से विवाह करने का कोई इरादा नहीं था और वह पीड़िता से शादी नहीं करेगा, इसका झांसा देकर उसने शारीरिक रिश्ते बनाये। अतएव, हम संतुष्ट हैं कि प्रतिवादी को सजा देना न्यायसंगत है। हमारे निष्कर्ष के मुताबिक, कोई मामला नहीं बनता। अपील खारिज की जाती है।’ (यादला श्रीनिवास राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य) माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में लड़की की उम्र, उसकी शिक्षा और उसके सामाजिक स्तर और लड़के के मामले में भी इन्हीं सब पर गौर किया जाना जरूरी है। यदि आरोपी कम उम्र की लड़की को फुसलाकर उससे विवाह करने का वायदा कर ले, तो ऐसे में यह उसकी सहमति नहीं होती, बल्कि फुसलाकर किया गया कृत्य होता है। आरोपी शुरू से ही अपने वायदे को पूरा करने का इरादा नहीं रखता। ऐसी कपटपूर्ण सहमति को सहमति नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अपराध के लिए हामी भराना आरोपी का अपराध है।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी.के. जैन ने 1 फरवरी, 2010 को आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए, ऐसे आपराधिक कृत्य की निंदा करते हुए लिखा- ‘इस पर गौर करने पर कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर, लड़की से शारीरिक रिश्ते बनाये, इस आशय से कि उससे विवाह का उसका कोई इरादा नहीं था।  कोई बलात्कार का मामला नहीं बनता। यह न सिर्फ घोर निंदनीय कृत्य है बल्कि प्रकृति से भी आपराधिक है। यदि ऐसा होने रहने की अनुमति दी जाए, तो इससे इनसान अनैतिक और बेईमानी बनेगा। जो भी इस इरादे से इस देश में आएगा, शादी का ढोंग रचाएगा और कमजोर वर्ग की लड़की से शारीरिक रिश्ते बनाने का दबाव डालकर उनका शोषण करेगा। उधर, लड़की को यकीन रहेगा कि वह उसके साथ शादी करेगा। उसे भी यही लगेगा कि जिससे भविष्य में शादी होनी है, वह पति बनेगा ही, कम से कम उससे शादी से रिश्ते रखने में कुछ भी गलत नहीं है। इस वायदे का हवाला देकर उसके साथ दुष्कर्म करके आरोपी आराम से जब चाहे, चलता बनेगा। ऐसे मौकापरस्त लोगों को लड़की की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का लाइसेंस नहीं दे सकती। इस तरह तो शादी के पवित्र रिश्ते में भारतीय लड़की को डाल देना कोई दो दिलों का मेल नहीं है। बेसहारा लड़कियों का शोषण करने वाले ऐसे लोगों को बेखौफ बच निकलना हमारे ऐसे कानून का मकसद कभी नहीं हो सकता, जो इस घिनौने कृत्य के बाद ताउम्र जेल की सजा का हकदार है।’ (निखिल पराशर बनाम राज्य)

विवाह करने संबंधी वायदे के साथ सेक्स करना और गर्भवती होने पर पुलिस रिपोर्ट वर्ग, धर्म, क्षेत्र, आयु या सामाजिक स्तर संबंधी ज्यादातर मामले एक जैसे होने पर आदमी लड़की पर सेक्स के लिए दबाव बनाता है, विवाह करने का भरोसा देकर गर्भवती करता है, परिवार और पुलिस का रिपोर्ट के संदर्भ में बरी होने, संदेह का लाभ पाने या उच्च अदालत में सजा..अपील और इस तरह अंतिम न्याय मिलने में पांच से बीस साल लगना। ये वे मामले हैं, जो समूचे मामलों की नजीर भर हैं।

इस खास संदर्भ में कानूनी राय और फैसले सीधे-सीधे बंटे हुए हैं। सहमति और तथ्यों के उलझाव में उलझे हुए हैं, क्योंकि कानून पूरी तरह पारदर्शी नहीं है और फैसले हर मामले के तथ्यों और हालातों के आधार पर होते हैं। न्यायिक राय को लेकर आमराय यही है कि विवाह का वायदा कर पीड़िता से शारीरिक रिश्ते की सहमति लेना कि भविष्य में वह विवाह करेगा, गलत तथ्यों के तहत ली गयी सहमति नहीं कही जा सकती। कुछ अदालतों का विचार है कि विवाह करने का झूठा वायदा करने को लेकर दी गयी कथित सहमति विवाह का राजीनामा नहीं है। इसके मुताबिक, विवाह के झूठे वायदे को लेकर पति-पत्नी जैसा शारीरिक रिश्ता बनाने संबंधी सहमति हासिल करना कानूनी नजरिये से सहमति ही नहीं है। ऐसे मामलों में सबसे कठिन काम यह साबित करना होता है कि आरोपी का शुरू से ही पीड़ित लड़की से विवाह करने का कोई इरादा नहीं था। वह कह सकता है कि मैं विवाह करना तो चाहता हूं लेकिन मेरा माता-पिता, धर्म, जाति, ‘खाप’ आदि इसके लिए अनुमति नहीं देते। औरत के खिलाफ अपराध संबंधी किंतु-परंतु को लेकर जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, न्याय से जुड़े ऐसे कानूनी पेंच यूं ही कायम रहेंगे।

कर्मानंद आर्य की कवितायें : वसंत सेना और अन्य

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कर्मानन्द आर्य

कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

( कर्मानंद आर्य की इन कविताओं में इतिहास और वर्तमान के बीच एक सुन्दर सेतु बना है ,जिससे आवाजाही करते हुए दोनो ही एक दूसरे के काल को अतिक्रमित करते हुए गलबाहियां डाले हैं . स्त्री की अनंत यात्रा जारी है , जाति-वर्ग से सज्ज , जाति-वर्ग से परे भी – जाति -वर्ग दंश से  युक्त भी . )

वसंतसेना

नायकों की एक विशाल पंक्ति
बाहर खड़ी है
आज के दिन भी तुम उदास हो वसंतसेना

कितने बिस्मिल्लाह खड़े हैं
अपनी शहनाइयों के साथ
कितने तानसेन गा रहे हैं
सधे सुरों का गीत

अपने सधे क़दमों से
नृत्य की मुद्रा में आज है
‘दाखनिता कुल’

उल्लास का मद अहा
चोर, गणिका, गरीब, ब्राह्मण, दासी, नाई
हर आदमी आज है नायक

चारुदत्त आये हैं वसंतसेना
फिर भी हो तुम उदास

वसंतसेना निर्व्याज नही जायेगा तुम्हारा प्रेम
प्रकृति उत्तम है

उदास क्यों होती हो ?
क्या गणिकाओं का विवाह नहीं होता वसंतसेना

मत्स्यगंधा

एक:

जातियों का बंधन टूटता है
तुम्हारे प्रणय के स्पर्श से
जिसे तोड़ नहीं पायी
पवित्र माने जाने वाली ऋचायें
उसे तोड़ दिया
रूप की आकांक्षा ने

तृषा जागती है
देव, गंधर्व, कोल, किरात
सब लोटते हैं तुम्हारे चरणों में

अरे यह क्या ?
तुम समय की भाषा पढ़ने लगी हो
तुममें भी आ गए हैं
उच्च वर्णस्थ स्त्री के भाव

अच्छा है तुम्हारा यह निर्णय भी
तुम उसी से विवाह करोगी
जो देव, गन्धर्व, कोल, किरात नहीं
तुम्हारे आँखों के वर्ण का होकर रहेगा

दो:

तुम्हारा पति आज
मछलियाँ पकड़ने नहीं गया
उसे सता रही थी अद्भुत प्यास
वह तुम्हारे आसपास मंडराता रहा

यह बसंत की दोपहरी नहीं है
जब गाती है कोयल
कि… कि… कि….
करके दौड़ती है गिलहरी

वह आज तुम्हें
गिलहरी की तरह दौड़ाना चाहता है
रेंगती रहो जल, थल, आकाश

आज जाल के साथ नहीं
तुम्हारे साथ फसेंगा
उसका प्रथम प्रणय गीत

हर दिन काम का
हर दिन प्रेम का होना चाहिए!

‘होना चाहिए न मत्स्यगंधा’ !!!!!!

इस बार नहीं बेटी

मैं तुम्हें प्रेम की इजाजत देता हूँ
और काँपता हूँ अपने व्यक्तिगत अनुभवों से
अपने जीवन की सबसे अमूल्य निधि तुम्हें भी मिलनी चाहिए

देखता हूँ तुम तल्लीनता में खोई रहती हो
निश्चित तौर पर प्रेम बढ़ाएगा तुम्हारा अनुभव
तुम चाहो तो जी भरकर प्रेम करो

प्रेम करो इसलिए नहीं कि प्रेम पूजा है
प्रेम पर टिकी हुई है दुनिया
इसलिए क्योंकि सबसे बुरा अनुभव मिल सकता है प्रेम से
मिल सकता है रूठने मनाने का हुनर

जिसने सीखा है अपने अनुभवों से
वह जिन्दगी में कभी असफल नहीं हो सकता
कभी टूट नहीं सकता रूठने मनाने वाले का घर

प्रेम केवल कहने के लिए बुरा है
जबकि अच्छाई का स्श्रोत वहीँ से फूटता है

प्रेम प्रयोग की वस्तु है
प्रेम करो और बताओ अपनी सहेलियों को
अपनी माँ को बताओ अपनी मूर्खताएं

वह सब करो जो किया है मैंने
जो मैंने जिया तुम भी जी सकती हो
पर सीखना अपनी माँ से भी

वह प्रेम में हारकर सब हार गई

कादम्बरी
.

बर्फीली सर्दी की पहली रात
एक ही विस्तर पर लेटे हैं
अतीत और वर्तमान

कभी अतीत करवट बदलता है
कभी वर्तमान

नदियों में पानी आता है
डूब जाते हैं गाँव के गाँव
फिर धरती हरियाती है

नर्म विस्तर
जब ठंडा हो जाता है
तुम इसे सुखा लेती हो

सुख-दुःख
बरसों की कथा है
आज ही
क्यों पूछ रही हो कादंबरी?

अवंतिसुंदरी

वर्षा जाने को है
इस अर्धरात्रि में कोई तेज सुर में गा रहा है

मैं अप्रतिहत
सुन रहा हूँ तुम्हारा मादल
अविधावक्र, सूची, उत्तानवंचित, हंसपक्ष
कितना अदभुत है
हजार हजार पुष्पों से सजा तुम्हारा
जोगी नृत्य

अचानक बदल रहे हैं सुर
आवाज भारी हो रही है तुम्हारी
आज कोई बनावट भी नहीं तुम्हारी मुद्रा में

अदभुत है
यह कैसा मिलन है अवन्ति
कविता तुम्हारे अंग अंग पर
अठखेलियाँ कर रही है
शनैः-शनैः द्राक्षारस टपक रहा है
इस अर्धनिमीलित रात्रि में भी

कपाट बंद हैं
खुले हुए सीने पर लोट रहे हैं
जाने कितने प्रहरी

अब हम सो नहीं सकेंगे
अवन्ति
प्रेम ने आज ही तो मुझे जगाया है.

प्रेमी पहरुआ

रूप लुभाता है
रूप की दीप्ति ह्रदय से आँख में आती है

मेरा प्रेमी रूप का लोभी है
यही मुझे कभी कभी गुण लगता है
कभी कभी अवगुण

गुण तब लगता है
जब वह मुझे देखता है
अवगुण तब जब उसे मेरे सिवा
कुछ और भी दिखाई देने लगता है

जहन्नुम में जाए मेरा प्रेमी
अब मैं ऐसा नहीं सोचती
बस उसे करती हूँ प्रेम
उसपर दुनिया की हर ख़ुशी वारती हूँ

कभी कभी उसके कंधे पर मेरे कई सिर होते हैं
मेरे कई कई रूप होते हैं
वह जानता है मेरे सारे दुर्गुण

जानती हूँ
उसकी कई प्रेमिकाएं और हैं
उसके कई ठिकाने और हैं
जिन्हें वह सिर्फ दुःख में याद करता है

उसके पास कई प्रयोगशालायें हैं
मेरी आग को जलाने बुझाने के लिए
सुलगाने के लिए भी हैं उसके पास
हजारो टन बारूद

वह मेरी मनोग्रंथियों को पढ़ लेता है
फिर वह आता है मेरे पास
गोद, प्रेम, गर्माहट और देखभाल के लिए
जाने कितनी कमजोरियां साथ

वह मेरा प्रेमी है
वह मेरा पति
मैं उसके खिलाफ कुछ भी नहीं सोच सकती

सिवाय इसके कि मुझे वह ऐसे ही पसंद है

तुम्हारी उदासी मेरी कविता की पराजय है

सच कह रहा हूँ
नहीं लिख सकूंगा इस जंगल का इतिहास
इस जंगल से गुजरने वाली नदियों का आत्मवृत्त
मछलियों और केकड़ों की जीवंत कहानी
सच कहूँ यहाँ इतिहास है ही नहीं

यहाँ कुछ टटोलेंगे
तो मिलेगा कुछ और

राजाओं के नाख़ून हैं यहाँ इतिहास की जगह
रानियों का क्रीड़ालाप और फंसी हुई कंचुकी है
सीताओं का मृगचर्म पड़ा हुआ है
सच कह रहा हूँ
नहीं लिख सकूंगा इस जंगल का इतिहास

यह आदिमानवों की नगरी है
जंगली और असभ्य
अपनी अनोखी दुनिया और प्रतिमानों से भरे हुए
फूलों की नाजुक कहानी है यहाँ

देवता, जाख, केंदु और पलास
भालू और मनुष्य का सामूहिक नृत्य
यहाँ पशु हैं लेकिन पशुता आयी नहीं आजतक

जोंक, घोंघे, केकड़े, शैवाल और नदियाँ
उन्होने सोचा नहीं अपने पुरुखों के बारे में
बस खाया पिया और खोये रहे अपनी दुनिया में
नदियों के किनारे रखे कुछ सूत्र
पाणिनी के व्याकरण से पहले लिखे हुए

हाँ एक इतिहास है उनके पास
उनके औजार और गीत कहते हैं कोई कहानी
पर वाह कहानी राजाओं की नहीं है
वह केवल प्रजा और प्रजा की कहानी है

जानता हूँ दोस्त तुम बेचैन हो
तुम्हारी उदासी मेरी कविता की पराजय है

क्रान्ति के कपड़े

अर्चना वर्मा

अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं.  ई मेल :  mamushu46@gmail.com

2007 के अन्तरराष्ट्रीय -वाणिज्य-मेले के समय ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसमेँ अठारह दिसंबर, दो हजार पांच के ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट को उद्धृत करते हुए बताया गया था कि सन दो हजार तीन के मेले में सेल्स-गर्ल की स्कर्ट की लंबाई अठारह इञ्च और दैनिक भुगतान पंद्रह सौ रूपया था जो दो हजार पांच में बढ़ कर दो हजार हो गया था। उस समय, 2007 मेँ चालू मेले में स्कर्ट की लंबाई बारह इञ्च और दैनिक भुगतान तीन हजार रूपया था। लेकिन यह भुगतान सबके लिये समान दर से होने वाला नहीं था।

मेले के दौरान दिल्ली शहर के युवा छात्र छात्राएं वहाँ अस्थायी रोज़गार के तौर पर जेबखर्च कमाने के लिये ‘सेल्स बॉयज़ ‘ और ‘ सेल्स गर्ल्स ‘ की हैसियत से काम कर लिया करते हैं। भुगतान की दर अलग अलग किस्म की दूकानों पर अलग अलग किस्म के ड्रेस कोड के अनुसार अलग अलग हुआ करती है। घरेलू उपयोग का साजसामान बेचने वाली दूकान पर साड़ी या सलवार कमीज़ में उपस्थित विक्रय–परिचारिका का वेतन उस रिपोर्ट के अनुसार तब तीन सौ रूपया प्रतिदिन था और ‘इलेक्ट्रॉनिक गुड्स’ की दूकान पर ‘ मिनी स्कर्ट ‘ में आपका स्वागत करनेवाली ‘सेल्सगर्ल’ तब दिन भर की मेहनत के बदले मे तीन हज़ार रूपया पाती थी। ज़ाहिर है कि वहाँ पर ख़रीद में सामान के साथ सुंदर सुडौल अनावृत्त टांगों का दर्शन अतिरिक्त पाया जाता रहा होगा और कुछ न भी खरीदना हो तो भी दुकान तक जाने का एक आकर्षण तो रहता ही होगा। चले ही गये होंगे लोग तो क्या पता शायद कुछ खरीद भी लाये होंगे। बहेलिये तो लासा लगा कर जाल फैलाते ही हैँ।

तब से अब तक सात या आठ बरस और बीत गये हैं। तब से अब तक में हमारी रिहायशी दुनिया की सूरत ही अब एक लम्बे लगातार मेले मेँ बदल चुकी है और उसके अनुरूप समाज के एक वर्ग में हमारी जीवन पद्धति भी। उस वर्ग में अब हमें याद भी नहीं आता कि मेला रहने की जगह नहीं, थोड़ी देर घूम कर लौट आने की जगह है।लेकिन लौट कर अब आयें कहां? मेले ने तो घर में भी घर कर लिया है। इस मेले की न कोई चौहद्दी न चारदीवारी। लेकिन बेहतर है कि इस पैमाने के मेले मेँ मौका है, हर एक के लिये। बेहतर है कि यह खेल का, ‘सेल’ का, एक समतल मैदान है। उन के लिये यह मौका और मैदान कुछ और अधिक बेहतर और समतल है जिनके पास बोलने के लिये अंग्रेज़ी और दिखाने के लिये सुंदर, सुडौल, अनावृत्त टांगे मौजूद हैं।

मुझे अहसास है कि मेरी ये टिप्पणियाँ हद दर्जे की ‘सेक्सिस्ट’ करार दी जाने वाली हैँ। अहसास है इस बात का भी कि अपने बारे मेँ खुले दिमाग़ का मेरा मुगालता भी बस चकनाचूर किया जाने को है लेकिन फिर भी मैँ पूछूँगी अपना सवाल कि आदमी ने कपड़ा आखिर बनाया ही क्यों? यह जवाब पुराना और अप्रासंगिक हो चुका है कि नग्नता उसके लिये असहनीय रूप से बदसूरत थी और सभ्यता की दिशा में पहला कदम उसने शरीर को ढक कर बढ़ाया था। जी नहीं, इस अन्तर्राष्ट्रीय-वाणिज्य-मेले का जवाब शायद यह होगा कि वही एक उत्पाद था जिसको सबसे पहले ‘मार्केट’ किया जा सकता था। सिर से पांव तक ढकने की संस्कृति क्यों आई? क्योंकि कपड़ा बेचना था। कहां से आई? कपड़े का बाज़ार बढ़ाने की ज़रूरत से। अब क्यों गायब होती जा रही है ? क्योंकि कपड़े के अलावा अब इतना बहुत कुछ है बेचने के लिये जिसे बेचने में कपड़े कम से कम होकर ज़्यादा से ज़्यादा मददगार हैं। भूमण्डलीय ग्राम के वाणिज्य मेले की दिशा में गंतव्य तक दौड़ के लिये देह सबसे सहज सवारी है। एक मैराथॉन दौड़ जो शॉर्ट-कट की फ़िलॉसफ़ी के तहत दौड़ी जा रही है।

सच कहूं तो लड़कियों का अपनी देह में यह सहज स्वच्छंद, निस्संकोच वास मन को मुग्ध करता है। भले ही अभी समाज के कुछ ही हिस्सों में व्याप्त हो लेकिन है यह सचमुच क्रान्ति। लेकिन क्रान्ति क्या किसी खास नाप या डिज़ाइन के ही कपड़े पहनती है तभी क्रान्ति कहलाती है? मामला जब ‘लाइफ़स्टाइल’ और ‘स्टैण्डर्ड आफ़ लिविंग’ का बना दिया जाय और ‘स्टैण्डर्ड आफ़ लिविंग’ जब ‘क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़’ का स्थानापन्न बन जाय तब ऐसी भी परिणतियाँ होती हैं। ये वाक्यांश इसलिये अंग्रेजी में दिये जा रहे हैँ क्योंकि उस वर्ग के ये प्रचलित मुहावरे हैँ और हिन्दी में अनूदित होकर अपनी आन-बान-शान खो बैठते हैं। तो बिल्कुल ज़रूरी नहीं रहता कि स्पगेट्टी स्ट्रैप, हेल्टर टॉप, बैकलेस ब्लाउज़ में पीठ, कन्धे या वक्ष को खुला/अधखुला छोड़ने वाला शरीर दिमाग़ से भी खुला हो। बल्कि शायद वह सहज स्वच्छन्द की ठीक उलटी दिशा में असहज-स्वच्छन्द होने की कोशिश कर रहा हो। अनावश्यलक ही आत्म-सजग। एक साथ विरोधी दिशाओं में दौड़ता हुआ। कोई देख तो नहीं रहा? कोई देख क्यों नहीं रहा? देख रहा है तो ऐसे क्यों देख रहा है?

कैसे भूला जा सकता है हम किसी सामाजिक-सांस्कृतिक शून्य मेँ नहीं रहते और हमारी स्वच्छन्दता किसी शून्य में सक्रिय नहीं होती। समाज के अलग अलग इलाकों में अलग अलग संस्कृति के पास अपनी अलग अलग आचरण संहिता या ‘कोड ऑफ़ कंडक्ट’ है। खेल के मैदान में सानिया मिर्ज़ा के स्कर्ट की नाप को लेकर मचाया गया हल्ला ग़लत और बेकार था, क्योंकि स्कर्ट की वह नाप अन्य प्रतियोगियों के साथ उसकी प्रतिद्वन्द्विता को अधिक समतल धरातल पर स्थापित करती है और खेल के संदर्भ–समाज में ‘कोड ऑफ़ कंडक्ट’ के अधीन है लेकिन सेल के मैदान मेँ सेल्सगर्ल के स्कर्ट की नाप के पास कोई कोड ऑफ़ कण्डक्ट नहीं, वह उसे बिकने वाले सामान के पैकेज का हिस्सा बनाती है और साड़ी या सलवार कमीज पहनने वाली विक्रय-परिचारिका के लिये अवसर को असमान और मैदान को असमतल कर देती है। जिस समुद्रतट पर पूरी की पूरी भीड़ स्विमिंग सूट में हों वहाँ किसी का शरीर अलग से नहीं दिखता, न्यूड-फार्म पर किसी की नग्नता महसूस नहीं होती, अपने घर पर पार्टी की निजता मेँ या पाँच सितारा होटल में पार्टी की सामूहिकता में जो स्पगेट्टी स्ट्रैप, हेल्टर टॉप, बैकलेस ब्लाउज़ और उनमे खुले/अधखुले पीठ, कन्धे या वक्ष सहज होते हैँ वे ही सड़क पर, कॉलेज में या मेट्रो और बस में आक्रामक हो उठते हैँ। हर खम्भे, हर दीवार, हर बिल-बोर्ड हर सम्भव जगह पर टँगा और घूरता सौन्दर्य और शृंगार पहले कभी इतना आक्रामक नहीं रहा होगा जितना अब। प्रतिक्रिया में प्रत्याक्रमण भी प्रत्याशित ही होगा। नहीं, इस बात की कोई गारण्टी नहीं की शरीर ढका होगा तो बलात्कार से सुरक्षित भी होगा। वह असुरक्षा तो स्त्री-शरीर नामके जन्मजात वस्त्र की है।

मैँ बात अपनी आज़ादी और क्रान्ति के चुनाव-चिह्न की कर रही हूँ। जिस सामाजिक ‘कोड ऑफ़ कंडक्ट’ की बुनियाद में अन्याय निहित हो उसे ललकारने और बदलने की ज़रूरत होती है। लेकिन हम उसे कैसे चुनते हैँ? जिस समाज में अधिकतम संख्या अभी उन स्त्रियों की हो जो बुनियादी न्यूनतम मानवाधिकारों से भी वंचित हैं वहाँ हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं? क्या हम देख पा रहे हैँ कि जिसे हम स्वच्छंदता का दावा बना कर पेश कर रहे हैँ वह केवल फ़ैशन है, ‘स्किनडीप’ तक भी नहीं, ‘स्किन’ के भी ऊपर, केवल कपड़ों तक बाकी रह जाता है। और अक्सर तो कुल क्रान्ति कपड़ों मेँ ही रह जाती है। जब घूंघट उठाना ही विद्रोह हो तब इस ललकार की कीमत समझी जा सकती है। लेकिन घूँघट में कैद हो सीता तो राधा को अपने कपड़े उतार कर यह दावा नहीं कर सकती कि सीता की आज़ादी का बिगुल बज रहा है। वह बजेगा ही नहीं।

यह शायद पिछली सदी से आई एक औरत का पूर्वग्रह ही हो लेकिन मुझे लगता है कि जब स्वच्छंदता का बोलबाला हो चुका हो तब स्वेच्छा से कुछ निषेधों का चुनाव उचित है। निषेधों के चुनाव की स्वेच्छा में स्वतंत्रता सुरक्षित है। निषेध नहीं होते तो विधेयों की कीमत भी जाती रहती है और अन्ततः उस स्वच्छंदता की भी जिसे हमारी पिछली पीढ़ी ने महंगे मोल कमाया और विरासत में हमें दिया।

( जनसत्ता से साभार )

सुनीता झाड़े की कवितायें : हम गुनाहगार औरतें और अन्य

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सुनीता झाड़े


सुनीता झाड़े मराठी और हिन्दी में कवितायें लिखती हैं . नागपुर में रहती हैं . संपर्क: commonwomen@gmail.com

१ . हम गुनहगार औरतें

सांझ की धुप
जाने कितनी ही देर से किवाडो पर ही टीकी थी
इस इंतजार में कि
जमीं  की चादर पर बिखर के एक गहरी सांस ही ले ले
और मैं बेखबर
बेखबर अपने आपसे पतंग मांजा करते हुए
मांजा जो दिखाई नही देता और पतंग है
जो उडने को बेकरार

किसीने दरवाजे पर दस्तक दी
कोई आया नही बस बाहर से ही दस्तखत लिए
जुर्म के कागज थमा गया.
कितने गुनाहो के कागजाद आते हैं
और मैं, जो हर एक कागज पर दस्तखत करती,
अपने आप को सजा देती हूं
देखो तो, जैसे सजा के लिए दरवाजा खोला
सलाखो वाले दरवाजे के भीतर अपने आप को पाया
अब तक किवाडो पर टिकी धूप भी
मेरी परछाई लिए कुछ इस तरह फैली
मानो मुझे पकडकर जेल के अंदर बंद कर दिया हो
चलो अब मैं तुम्हारी भी गुनहगार हूं

किवाड को खुला कर किवाड के पास ही बैठी रही
उस धूप को देखते जो धीरे धीरे अलसा रही थी.
गहरे सुनहरे रंग की पलके अब डूब  जाना चाहती थी
मैं चाहती थी वो और कुछ समय मेरे साथ रुके
इन दिवारो को उन के धुप  की कहानी सुनाए

अक्सर जेल की  दीवारो में देखा गया है कि
किसी कोने में पानी का एक मटका होता है.
उसपर जर्मन की थाली.
उसपर संतरे के रंग का प्लास्टीक का ग्लास.
डुबाओ और पियो
बस उस खाली से समय में पानी पीयो
प्यास लगी इसलिए , भूख  लगी इसलिए
कोई याद आया इसलिए , किसे भूल जाना है इसलिए,
आसू जो पत्थर बन गले में अटक गया है इसलिए
और इसलिए भी कि सजा कट जाए, खतम हो जाए
रिहा हो जाए सारे शिकवे- शिकायत से रिहा हो जाए
एसे अनगिनत वजह से,
एसे ही अनगिनत बार मैने भी पानी पीया  है…
पानी जो जीवन है, पानी जो जीना सिखाता है,
पानी जो सोच को सोख भी लेता है…
बहरहाल मै अपने आप को उस जेल से आजाद कर
एक मग पानी पीने निकल गई.

तुम्हे किसी भी समय प्यास लगती है,
मेरे पानी पीने पर उसका एतराज  याद आया

जब वापस उस जेल  में जाना चाहा तो पाया
जेल, जेलर, दरवाजे सब गायब. मुझसे  सब आजाद

कोई है ?
हर कोने को दी गई आवाज;
जो एक दिया जलाए
शाम होते ही यादो की परछाईया जैसे घेर लेती हैं
उठने ही नही देती. किसी का संगीत,
किसी की शहनाई, किसी की बिदाई,
कितनी ही कोशिशें , कितनी ही कहानियाँ
और एक इकट्ठी  आवाज
तुम कुछ कहती क्यूं  नही?
तुम कैसे बर्दाश्त करती हो?
तुम गलत कर रही हो?
तुम गुनहगार हो

हाँ
हम गुनहगार है
कि सच का परचम उठा के निकले
तो झूठ के शाह राहें अटी मिलीं
हर एक दहलीज पें सजाऒं की दास्तानें रखी मिलीं
जो बोल सकती थी वो जबानें कटी मिलीं

२. आशियाना

भीतर दीवारो में अंधेरा छिपा था शायद
या फिर अंधेरो में दीवारें गढी थीं
पता नही पर उस अंधेरे मे उसका उजला सा चेहरा अच्छा लगा.

अच्छी लगी परोस कर खतम किये गये
चावल की महक
लगा चावल की तरह अधपके ढके हुए से हैं
भांप में खुशबू -खुशबू खेलते

पता चला कुछ धीमे  से उजाले जलाये थे उसने
जिनमें  किसी भी प्रहर का पता नही चलाता था.
एक समय था, जो कई युगों से वही थमा था,
और उस ठहरे से समय की कुर्सी   पर
सामने वो किसी पोट्रेट की तरह
साडी सरकी थी कंधो से नीचे
खुली बाह में अटकी
गले मे मोतियों  की लड़ी
फिर सुनहरे बाल सुनहरा रंग
बला की खूबसूरती
हसती थी तो मानो
लेकिन  उस हंसी में कुछ सिसकियाँ  सी थी
बातो में चुभन

नीचे देखा कालीन पर पैर कुछ ज्यादा ही काले दिख रहे थे
सिकुडकर भिंच लिए गए भीतर
कछुये की काया की तरह
बस नजरो का पता चले
नजर उन तख्त, ताज को देखती
यहां से, वहां से, उस से
कितनो से सुना फिर से सुन सुन
उसपर एक नक्काशी हंसी
नक्काशीदार कारागीरी में विलीन होती

पुरखो की तस्वीरें ताजा तरीन
मानो तस्वीर में ही उनका अपना मकान हो
और देख रहे हो शायद कुछ इस अंदाज से
कौन…? कौन है…?
हर सीढी के साथ उपर ले जाती
और हर तस्वीर से आती अवाज
कौन है… कौन है… कौन…?
और फिर
और भी ज्यादा सिकुडकर
उनके पीछे  उनके स्ट्डी में दाखिल.
एसी लगे कमरे में अलगाववादी पुस्तकें
कोई लगाव ही  नही हो जैसे

फिर झट से बेडरुम की तरफ
यह मेरा बेडरूम है
हर बार बेडरुम देखते समय
नजर बेड पर से ऎसे गुजरती है जैसे…
एक तस्वीर थी ’उनका’ माथे चुमते हुए
और सवाल, क्या अभी भी इतना ही प्यार
कितने ही जवाब एक नहीं  के बदले

और फिर उस बर्फीली जमीन की छत, उंची
कभी बर्फबारी हो भी तो सीने से उतर जाये
पिघल जाये  सफेद चादर में लिपटी यादें.
मैं तो यूं  ही थम गयी
उन यादों के साथ उसे देखते
और वह बारी बारी बताती रही
ये वो, यहां से, वहां से
गमले, पेड, पौधे, बेल… बल पडे माथे के साथ
फिर सीढ़ियों  से नीचे  उतर
एक और बगल के कमरे मे दाखील
कमरे में ताजा सिगरेट की तलब से निकला धुआँ
उंची एडी की चप्पलें , कुछ बैग ,  कुछ किताबें
टेबल के पिछली दीवार र पर टंगी   हुई
कुछ तस्वीरें, कुछ सपने,  कुछ ख्वाहिशें
अपने आपसे की कुछ गुजारिश
देखना चाहा था उसे पर ना वो दिखी
ना उसकी कोई तस्वीर…
सुना किउससे बडी वाली ज्यादा सुंदर है

और..
फिर वापस उन सारी तस्वीरों के सामने से
जो एक एक कर बुदबुदा रही थी मन ही मन
फिर से कौन… कौन है???
वापस हॉल में पहुंच
अपने ऊंचे लकडे के सामान को लेकर
वह उत्तेजित कितने ही वृक्ष दोष लगे होगें इन्हे, पितृदोष जैसे…

पिछेसे उंची कढाई वाली अलमारी में
भारी काच का सामान देखा, सुनहरे  रंग की कुछ बोतलें
न जाने क्यूं  मुझे युहीं दिख गया
पतले से कांच के ग्लास को भींच के तोडा हुआ एक हाथ
और हांथ  में काच के टुकडे, रक्त से सिलसिलाते….
वॉशरुम???
वह बाहर
और में भीतर देख रही थी उसे
आईने के सामने, फ्लॅश खोल उसकी रुआसां सूरत
जाने कितनी ही देर
फिर हाथों से पानी ले चेहरा ढकती
कई बार.
उन सब यादों पर पानी फेरती,
आंखो की कड़ाही तक पोछती

उस छलके हुए काजल के लकीर को देख
ठहरी रही फिर से उसकी राह देखते
जो कह गया था,
इस फैले से काजल में तुम
और भी सुंदर दिखती हो

इस घर को देखने से पहले तुम्हारी बात मान लेनी थी मुझे
‘ मिलने जा रहे हो, वहीं खो न जाना सुकूंन
दिखाऒं तो कहां हूँ  मैं !

३. सफर 

वहां दीवार पर लिखा था
यह कब्रिस्तान  है यहां पेशाब न करें

दस कदम की दूरी  पर
सात जन्मो के
धागों से बंधा हुआ बरगद
पांच कदम की दूरी  पर पाठशाला

कब्रिस्तान का एक भूत
बरगद पर सात धागो से बंधा
अपनी सत्तो की राह देखता

सत्तो जो अभी सातवी कक्षा की तयारी में है

न जाने अभी और कितने जनम