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मलाला की कहानी बी बी सी के जुबानी

पाकिस्तान  की स्वात घाटी में स्त्री शिक्षा की लड़ाई लड़ने वाली मलाला यूसुफ़जई को  को ९ अक्टूबर २०१२ को तालिबान ने गोली मार दी थी . ११ साल की उम्र से ही स्त्रीअधिकार के लिए संघर्षरत मलाला को शांति का नॉबेल सम्मान मिला है . मलाला से दुनिया को सबसे पहले रु ब रू कराया था बी बी सी ने . स्त्रीकाल के पाठको के लिए मलाला की कहानी बी बी सी हिन्दी के ज़ुबानी पेश कर रही हैं अमिता . अमिता बिलासपुर केन्द्रीय विश्वविद्यालय में मीडिया पढ़ाती हैं  तथा स्त्रीकाल के वेब वर्जन के सम्पादक मंडल में शामिल हैं .

मलाला की प्रतिभा को सबसे पहले बीबीसी के एक पत्रकार ने पहचाना और उनसे साप्ताहिक कॉलम लिखवाना शुरू किया, यह स्वात घाटी से बाहर की दुनिया से मलाला का पहला संपर्क था. पढ़ने के लिए  क्लिक करें नीचे दिए गए  लिंक पर :

जिसने दुनिया को रूबरू कराया मलाला सेदुनिया

मलाला की दास्तान दिखाती है कि उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबान के जाने के बाद भी, एक 16 वर्षीय लड़की की ज़िन्दगी कितने खौफ, दर्द और कठिनाइयों से भरी है. पढ़ने के लिए  क्लिक करें बी बी सी के लिंक पर:

मलाला युसूफ़जइ के खौफ और साहस की दास्तान

२०१२ में तालेबान ने मलाला को गोली मार दी थी . बी बी सी पर पूरी रपट पढ़ने के लिए क्लिक करे :

तालिबान से लोहा लेने वाले को गोली मारी 

मलाला को नॉबेल सम्मान से सम्मानित किये जाने पर पूरी दुनिया उसे बधाई दे रही है लेकिन उसके अपने ही देश पाकिस्तानमें इस पर मिश्रित प्रतिक्रया है . पढ़ने के लिए क्लिक करें :

मलाला को नॉबेल: विरोध में उठी आवाज

यह बहादुर लडकी देश दुनिया में महिलाओं के खिलाफ कट्टरपंथी हमलों पर अपनी राय के साथ सामने आती है . उसने अफ़्रीकी देश नाइजीरिया में 200 से अधिक छात्राओं के अपहरण के मामले में दुनिया को कहा कि चुप नहीं रहना चाहिए. पढ़ने के लिए क्लिक करें :

छात्राओं के अपहरण पर चुप न बैठे दुनिया : मलाला 

और इन्हें भी पढ़ें :

मलाला : गोली खाकर जो उम्मीद की मशाल बन गई

मलाला की तस्वीर ब्रिटेन की मशहूर गैलरी में

अरुण देव की कवितायें

अरुण देव

युवा कवि और आलोचक अरुण देव चर्चित वेब पत्रिका समालोचन के सम्पादक हैं. संपर्क :09412656938,devarun72@gmail.com

मेरे अंदर की स्त्री

तुम्हारे अंदर जो अँधेरा है
और जो जंगल है घना, भीगा सा
उबड खाबड से बीहड़ हैं जो दु:स्वप्नों के
उसमें मैं एक हिरन की तरह भटकता हूँ
कोई गंध मुझे ढूंढती है
किसी प्यास को मैं खोजता रहता हूँ

यहाँ कुछ मेरा ही कभी मुझसे अलग होकर भटक गया था
मैं अपनी ही तलाश में तुम्हारे पास आया हूँ

कब हम एक दूसरे से इतने अलग हुए
की तुम स्त्री बन गई और मैं पुरुष
क्या उस सेब में ऐसा कुछ था जो तुमने मुझे पहली बार दिया था

उस सेब के एक सिरे पर तुम थीं
मुझे अनुरक्त नेत्रो से निहारती हुई और दूसरी तरफ मैं था आश्वस्त…
कि उस तरफ तुम तो हो ही

तब से कितनी सदियाँ गुज़री
कि अब तो मेरी भाषा भी तुम्हें नहीं पहचानती
और तुम्हारे शब्द मेरे ऊपर आरोप की तरह गिरते हैं
तुमने भी आखिरकार मुझे छोड़ ही दिया है अकेला
अपने से अलग
हालाकि तुम्हारी ही अस्थि मज्जा से बना हूँ

तुमसे ही बनकर तुम्हारे बिना कब खड़ा हो गया पता ही नहीं चला
तुम्हारे खिलाफ खड़ा हुआ
यह मेरा डर था या शायद मेरी असहायता
कि मेरा प्रतिरूप तुम तैयार कर देती थी
जैसे कोई जादूगरनी हो
देवि…. दुर्गा…. असीम शक्तियों वाली
सुनो !. तुम्हारे कमजोर क्षणों को मैंने धीरे धीरे एकत्र किया

जब मासिक धर्म से भींगी तुम नवागत की तैयारी करती
मैं वन में शिकार करते हुए तुम्हें अनुगामी बनाने के कौशल सीखता
जब तुम मनुष्य पैदा कर रही थी मेरे अंदर का पुरुष तुम्हें स्त्री बना रहा था

और आज मेरे अंदर का स्त्रीत्व संकट में है
मैं भटक रहा है जंगल-जंगल अपनी उस आधी स्त्री के लिए जो कभी उसके अंदर ही थी.

हत्या

उसकी हत्या हुई थी. सड़क से गाँव के रास्ते का एक हिस्सा सुनसान था. खेतों से होकर गुजरता था. वही से वह गायब हुई. वही गन्ने के खेत के पीछे उसका शव मिला, कई दिनों बाद. चेहरा झुलसा हुआ. कपड़ो से पहचानी गई.

पिता ने ज़ोर देकर कहा कपड़ो से पता चलता है उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है. लड़की ने मरते मरते भी कुटुंब की लाज़ बचाई.

कहीं बाहर नौकरी करता भाई आया था. चेहरे पर थकान. जैसे किसी झंझट में पड़ गया हो.

घर के लोग अब जो हो गया सो गया का भाव लिए कुछ आगे करने के बारे में संशय में थे.     एक पड़ोसी ने यह भी कहा कि क्या जरूरत थी जवान लड़की को पढाने की.

वह सिपाही बनना चाहती थी. कोचिंग करने समीप के नगर में जाती थी. अन्त समय उसने मोबाईल से जिनसे बातें की वे भी उसके मौसरे भाई, चचेरे भाई थे. ऐसा उस लड़की की  जाति-बिरादरी के लोग कह रहे थे. बार-बार

अगर लड़की किसी के प्रेम में होती और तब उसकी हत्या होती तो इसे स्वाभाविक माना जाता, उसके इस स्वेछाचार का अन्त यही होना था, इसी किस्म से कुछ कहा जाता. और कुटुंब के लिए यह बदनामी की बात होती.

उसकी बस हत्या हुई थी. उसका किसी से प्रेम या शारीरिक सम्बन्ध नहीं था. यही राहत की बात थी.

एक लड़की जो स्त्रीत्व की ओर बढ़ रही थी
इसी के कारण मार दी गई

उसके लंबे घने काले केश जो इसी दुनिया के लिए थे

उसका चमकता चेहरा
जिसकी रौशनी में कोई न कोई अपना दिल जलाता

वह एक उम्मीद थी
उसे अपना भी जीवन देखना था

अगर वह प्रेम में होती, बिनब्याही माँ बनने वाली होती, उसके बहुत से प्रेमी होते
या वह एक बेवफा महबूब होती
तो क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए थी

क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे.

छल

अगर मैं कहता हूँ किसी स्त्री से
तुम सुंदर हो

क्या वह पलट कर कहेगी
बहुत हो चुका तुम्हारा यह छल
तुम्हारी नज़र मेरी देह पर है
सिर्फ देह नहीं हूँ मैं

अगर मैंने कहा होता
तुम मुझे अच्छी लगती हो
तो शायद वह समझती कि उसे अच्छी बनी रहने के लिए
बने रहना होगा मेरे अनुकूल
और यह तो अच्छी होने की अच्छी – खासी सज़ा है

मित्र अगर कहूँ
तो वह घनिष्ठता कहाँ
जो एक स्त्री-पुरूष के शुरूआती आकर्षण में होती है
दायित्वविहीन इस संज्ञा से जब चाहूँ जा सकता हूँ बाहर
और यह हिंसा अंततः किसी स्त्री पर ही गिरेगी

सोचा की कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
और अब यह सहजीवन की तैयारी जैसा लगता है
जो अंततः एक घेराबंदी ही होगी किसी स्त्री के लिए

अगर सीधे कहूँ
कि तुम्हरा आकर्षण मुझे
स्त्री-पुरूष के सबसे स्वाभाविक रिश्ते की ओर ले जा रहा है…
तो इसे निर्लज्जता समझा जायेगा
और वह  कहेगी
इस तरह के रिश्ते का अन्त एक स्त्री के लिए पुरूष की तरह नही होता..

भाषा से परे
मेरी देह की पुकार को तुम्हारी देह तो समझती है
भाषा में तुम करती हो इंकार

और सितम कि भाषा भी चाहती है यह इंकार.

चाँद , पानी और सीता

स्त्रियाँ अर्घ्य दे रही हैं चन्द्रमा को
पृथ्वी ने चन्द्रमा को स्त्रियों  के हाथों जल भेजा है

कि नर्म मुलायम रहे उसकी मिट्टी
कि उसके अमावस में भी पूर्णिमा का अंकुरण होता रहे

लोटे से धीरे-धीरे गिरते जल से होकर आ रहीं हैं चन्द्रमा की किरणें
जल छू रहा है उजाले को
उजाला जल से बाहर आकर कुछ और ही हो गया है
बीज भी तो धरती से खिलकर कुछ और हो जाता है

घुटनों तक जल में डूबी स्त्रियों को
धान रोपते हुए, भविष्य उगाते हुए सूर्य देखता है
देखता है चन्द्रमा
स्त्रियाँ सूरज को भी देती हैं जल, जल में बैठ कर
कि हर रात के बात वह लौटे अपने प्रकाश के साथ

धरती पर पौधे को पहला जल किसी स्त्री ने ही दिया होगा
तभी तो अभी भी हरी भरी है पृथ्वी
स्त्रियाँ पृथ्वी हैं
रत्न की तरह नहीं निकली वें
न ही थी किसी मटके में जनक के लिए

अगर और लज्जित करोगे
लौट जायेंगी अपने घर

हे राम !
क्या करोगे तब…

पर्यायवाची

गुलमोहर आज लाल होकर दहक रहा है
उसके पत्तों में तुम्हारे निर्वस्त्र देह की आग
मेरे अंदर जल उठी है

उसके कुछ मुरझाये फूल नीचे गिरे हैं
उसमें सुवास है तुम्हारी
मुझे प्रतीक्षा की जलती दोपहर में सुलगाती हुई

यह गुलमोहर आज मेरे मन में खिला है
आओ की आज हम दोनों एक साथ दहक उठे
की भीग उठे एक साथ की एक साथ उठे और
फिर गिर जाएँ साथ साथ

मेरी हथेली पर तुम्हारे नाम से निकल कर एक अक्षर आ बैठा है
और तबसे वह जिद्द में है कि पूरा करू तुम्हरा नाम

शेष तो तुम्हारे होठों से झरेंगे
जब आवज़ दोगी अपने होठों से मुझे मेरी पीठ पर

उन्हें ढूढता हूँ तुम्हारे मुलायम पहाडो के आस-पास
वहाँ मेरे होटों के उदग्र निशान तुम्हें मिलेंगे
तुम्हारे नाभि कुण्ड से उनकी तेज़ गंध आ रही है

मैं कहाँ ढूंढू उन्हें जब कि मैं ही अब
मैं नहीं रहा

तुम्हारे नाम के बीच एक-एक एक करके रखूं अपने नाम का एक-एक अक्षर
कि जब आवाज़ दे कोई तुम्हें
मेरा नाम तुम्हे जगा दे कि उठो कोई पुकार रहा है
अगर कहीं गिरो तो गिरने से पहले बन जाएँ टेक
और अगर कहीं घिरो तो पाओ उसे एक मजबूत लाठी की तरह अपने पास
कि अपने अकलेपन में उन्हें सुन सको
कि जब उड़ो ऊँचे आकाश में वह काट दे
काटने वालो की डोर

वैसे दोनों मिलकर पर्यायवाची हो जाएँ तो भी
चलेगा
अर्थ के बराबर सामर्थ्य  वाले दो शब्द
एक साथ.

आटे की चक्की

पम्पसेट की धक-धक पर उठते गिरते कल-पुर्जों के सामने
वह औरत खड़ी है
पिस रहा है गेहूं

ताज़े पिसे आटे कि खुशबू के बीच मैं ठिठका
देख रहा हूँ गेहूं का आटे में बदलना

इस आंटे को पानी और आग से गूँथ कर
एक औरत बदलेगी फिर इसे रोटी में

दो अंगुलिओं के बीच फिसल रहा है आटा
कहीं दरदरा न रह जाए

नहीं तो उलझन में पड़ जायेगी वह औरत
और करेगी शिकायत आंटे की
जो शिकायत है एक औरत का औरत से
वह कब तक छुपेगी कल-पुर्जों के पीछे

इस बीच पीसने आ गया कहीं से गेहूं
तराजू के दूसरे पलड़े पर रखना था बाट

उसने मुझे देखा छिन्तार
और उठा कर रख दिया २० किलो का बाट एक झटके में
पलड़ा बहुत भारी हो गया था उसमें शमिल हो गई थी औरत भी

उस धक-धक और ताज़े पिसे आंटे की खुश्बू के बीच
यह इल्हाम ही था मेरे लिए

की यह दुनिया बिना पुरुषों के सहारे भी चलेगी बदस्तूर.

भाजपा सरकार से अपील : फॉरवर्ड प्रेस पर पुलिस कार्यवाई और उसके संपादकों के खिलाफ एफ आई आर की निंदा और अपील

( देश भर से साहित्यकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने फॉरवर्ड प्रेस पर हुए हमले के खिलाफ यह अपील जारी की है . यदि आप सहमत हों तो कमेन्ट में अपना भी हस्ताक्षर अग्रेसित करें . ) 


अपील : 


यह देश विचार, मत और आस्थाओं के साथ अनेक बहुलताओं का देश है और यही इसकी मूल ताकत है. लोकतंत्र ने भारत की बहुलताओं को और भी मजबूत किया है. आजादी के बाद स्वतंत्र राज्य के रूप में भारत ने अपने संविधान के माध्यम से इस बहुलता का आदर किया और उसे मजबूत करने की दिशा में प्रावधान सुनिश्चित किये.

इस देश के अलग –अलग भागों में शास्त्रीय मिथों के अपने अपने पाठ लोकमिथों के रूप में मौजूद हैं. देश के कई हिस्सों में  ‘रावण’ की पूजा होती है, पूजा करने वालों में सारस्वत ब्राह्मण भी शामिल हैं. महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर राजा बलि की पूजा की जाती है, जो वैष्णवों के मत के अनुकूल नहीं है. आज भी इस देश में असुर जनजाति के लोग रहते हैं,  जो महिषासुर व अन्य  असुरों को अपना पूर्वज मानते हैं।  हर साल मनाये जाने वाले अनेक पर्वों में धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप निर्मित छवि वाले असुरों के खिलाफ जश्न मनाया जाता है, जो एक समूह के अस्तित्व पर प्रहार करने के जाने –अनजाने आयोजन हैं.

दिल्ली से प्रकाशित फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका अक्टूबर के अपने ‘बहुजन –श्रमण परंपरा विशेषांक’ में  में इस तरह की अनेक परंपराओं, सांस्कृतिक आयोजनों, विचारों को सामने लायी है, जिसमें ‘दुर्गा –मिथ’ या दुर्गा की मान्यता के पुनर्पाठ भी शामिल हैं.

२०११ में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक छात्र समूह ने ‘महिषासुर शहादत’ दिवस मनाने की परम्परा की शुरुआत की, जिसके बाद पिछले चार सालों में देश के सैकड़ो शहरों में यह आयोजन आयोजित होने लगा है. इस व्यापक स्वीकृति का आधार इस देश के बहुजन –श्रमण परम्परा और चेतना में मौजूद है.
पिछले ९ अक्टूबर को इस कारण फॉरवर्ड प्रेस के खिलाफ दिल्ली के वसंतकुञ्ज थाणे में अतिवादी छात्रों के एक समूह के द्वारा किये गए एफ आई आर और उसके बाद पुलिस की कार्यवाई की हम घोर निंदा करते हैं. फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका के नेहरु प्लेस स्थित दफ़्तर पर दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा द्वारा 9 अक्टूबर को छापा मार कर चार कर्मचारियों की हिरासत में लेने तथा वहाँ से पत्रिका की प्रतियां जब्त करने की घटना बेहद चिंताजनक और निंदनीय है. पुलिस के पास अपनी इस कार्रवाई के लिए कोई अदालती आदेश या सक्षम प्राधिकारी का आदेश नहीं था. संपादकों के घरों पर पुलिस की दबीश, दफ्तर और घरों पर निगरानी पत्रिका के कामकाज पर असर डालने के इरादे से की जा रही है. ऐसा लगता है कि पुलिस ऐसी किसी फर्जी शिकायत के इन्तजार में थी ताकि वही अति सक्रिय हो सके. यह अभिव्यक्ति की आजादी और देश में बौद्धिक विचार परम्परा के खिलाफ हमला है.

हम भारतीय जनता पार्टी सरकार से  आग्रह करते हैं कि इस एफ आई आर को तत्काल रद्द करने का निर्देश जारी करे और पुलिस को निर्देशित करे कि इसके संपादकों के खिलाफ अपनी कार्यवाई को अविलम्ब रोका जाए. 

चिंतित लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता 

In English 

 Police action on FORWARD Press and FIR against its editors condemnable

India is a country of many faiths, thoughts and beliefs. It is a land of diversities and therein lies its strength. Democracy has strengthened our diversity. After Independence, the Indian Constitution duly recognised this diversity and provided for protection and preservation of the same.
In different parts of the country, various religious and folk myths are prevalent. In some places, Ravana is worshipped and among the worshippers are Saraswat Brahmins. In Maharashtra, Raja Bali is worshipped, which is something Vaishnavites may not agree with. India is also home to the Asur tribe, which believes that Mahishasur and other Asurs were its forefathers. Several religious functions celebrated with great gusto rely on the image of Asurs, as created by some religious texts. This may be hurtful to those who do not view Asurs as demons.
The Delhi-based FORWARD Press magazine, in its October 2014 issue centered on Bahujan-Shraman tradition has brought to fore several such traditions, cultural functions, beliefs and thougts. And these included a re-rendition of the ‘myth’ of Durga.
In 2011, a group of students of JNU started celebrating ‘Mahishasur Martyrdom Day’ and over the last four years, the celebration of this Day has started in many places in the country.
On October 9, a group of extremist students lodged an FIR against FORWARD Press in Vasant Kunj police station of New Delhi. We condemn the arbitrary police action that followed the registration of the FIR. Without any proper enquiry or probe and without any order from a court or a competent authority, the special branch of Delhi police raided the office of the FP, picked up four of its staffers and seized copies of the magazine. We strongly condemn the police action.
This, coupled with the police raids on the homes of the editors of the magazine and the surveillance mounted at the office and the residences of the editors seems to be aimed at disrupting the publication of the magazine. This is also a wanton assault on the fundamental right to freedom of expression and the tradition of free discourse in our country.

We demand that the BJP government should order immediate withdrawal of the case and order the police to stop its illegal action against the magazine and its editorial staff.   

Concerned writers and social activists

1.       अरूंधति राय

2.       उदय प्रकाश

3.       शमशुल इस्लाम

4.       वीर भारत तलवार

5.       शरण कुमार लिंबाले

6.       गिरिराज किशोर

7.       आनंद तेलतुम्‍बडे

8.       अनिल चमडिया

9.       मंगलेश डबराल

10.     कँवल भारती

11.     नूतन मालवीय

12.     प्रसन्‍न कुमार चौधरी

13.     राम पुनियानी

14.     उर्मिलेश

15.     एस. आनंद

16.     वीरेंद्र यादव

17.     विद्याभूषण रावत

18.     फेरोज. एल. विसेंट

19.     राजकुमार राकेश

20.     मदन कश्यप

21.     अपूर्वानंद

22.     नीलिमा शर्मा

23.     मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

24.     संजीव कुमार

25.     शंभुनाथ शुक्ला

26.     रोज केरकेटटा

27.     जवरीमल पारिख

28.     जुगनू शारदेय

29.     अविनाश दास

30.     फैसल अनुराग

31.     कुमार मुकुल

32.     विनीत कुमार

33.     अनिरूद्ध देशपांडे

34.     सुधीर सुमन

35.     दिलीप मंडल

36.     सुषमा असुर

37.     वंदना टेटे

38.     रोज केरकेटटा

39.     ग्‍लैडसन डुंगडुंग

40.     आशुतोष कुमार

41.     अशोक कुमार पाण्डेय

42.     श्रीधरम

43.     संदीप मील

44.     सत्येंद्र मुरली

45.     सुधा अरोडा

46.     विमल कुमार

47.     रजनी तिलक

48.     राजेन्द्र प्रसाद सिंह

49.     हरिनारायण ठाकुर

50.     पल्लव

51.     गुलजार हुसैन

52.     चन्द्र भूषण सिंह यादव

53.     पवन के श्रीवास्तव

54.     सुनील कुमार सुमन

55.     रेयाज-उल-हक

56.     स्वतंत्र मिश्र

57.     अरूण देव

58.     एल एस हरदेनिया

59.     समर अनार्य

60.     अशोक दुसाध

61.     जितेंद्र कुमार बिसारिया

62.     रजनीश कुमार झा

63.     संजीव चन्दन

64.     टेकचंद

65.     मोहम्मद इमरान

66.     सुभाष चंद्र कुशवाहा

67.     अनिता भारती

68.     मुसाफिर बैठा

69.     अजय प्रकाश

70.     कृपाशंकर

71.     अफलातून अफलू

72.     कौशल पंवार

73.     अमरेंद्र कुमार शर्मा

74.     रतन लाल

75.     एचएल दुसाध

76.     शिवानंद तिवारी

77.     हरनाम सिंह वर्मा

78.     उमराव सिंह जाटव

79.     मनीष रंजन

80.     कमल भारती

81.     निवेदिता झा

82.     कृष्णकांत

83.     रेक्टर कथूरिया

84.     रमेश ठाकुर

85.     कुमार प्रशांत

86.     बीरेंद् यादव

87.     चंद्रेश मडावी

88.     शिल्‍पा भगत

89.     अतुल आनंद

90.     विष्‍णु शर्मा

91.     प्रकाश शत्रुद्र

92.     कबीर वर्मा

93.     अशोक दास

94.     ओम सुधा

95.     गुलज़ार हुसैन

96.     वीरेंद्र मीणा

97.     आलोक मिश्रा

98.     आशीष कुमार अंशु

99.     लाल बाबू ललित

100.    अमलेंदू उपाध्‍याय

101.    सुशील कुमार शीलू

102.    राजीव मणि

103.    तपन

104.    अशोक चौधरी

105.    अखिलेश प्रसाद

106.    रजनी तिलक

107.    लाल जी निर्मल

108.    राकेश सिंह

109.    हरेराम सिंह

110.    सुभाष चंद्र

111.    हिमांशु पांड्या

112.    अशोक यादव

113.    अजीत राठौर

114.    सचि कुमारी

115.    अनिमेश बहादुर

116.    राहुल राज पॉल

117.    ब्रजेश कुमार पाण्‍डेय

118.    सूर्यनारायण

119.    प्रमोद श्रीवास्‍तव

120.    संतोष सतनामी

121.    आशुतोष सिंह

122.    राकेश श्रीवास्‍तव

123.    अविनाश गौतम

124.    नवजीत कुमार

125.    मुकेश

126.    प्रमोद गौतम

127.    तेजभान तेज

128.    रामकेश मीणा

129.    ओमप्रकाश

130.    अक्षय पाठक

131.    मुकेश कुमार

132.    ताहीरा हसन

133.    रामअवध राम

134.    अरविंद मुरली

135.    परमानंद आर्य

136.    नंदलाल चौहान

137.    श्‍याम हलदार

138.    नेहा सिंह

139.    विपिन बिहारी दूबे

140.    अशोक मेश्राम

142.    वी. उदयभान सिंह

143.    रमेश गौतम

144.    निर्दोष कुशवाहा

145.    रमेश विद्रोही

146.    मेहुल चावडा

147.    अभिनंदन कुमार

148.    संदीप मेघवाल

149.    अजीत कुमार ददौरिया

150.    राकेश गौतम

151.    अनिल कुमार

152.    प्रभांश यादव

153.    वीएस यादव

154.    अरविंद कुमार मोदी

155.    रविंद्र सिंह कुशवाहा

156.    भारत अमन

157.    जितेंद्र नारायण

158.    सूर्य नारायण

159.    सुधीर कुमार जाटव

160.    आलोक मिश्रा

161.    उदय यादव

162.    गिरीश अंजान

163.    सुभाष सिंह सुमन

164.    देवराज रावत

165.    अनिल कुमार यादव

166.    आदित्य जाटव

167.    चंद्रशेखर बाबू आम्‍बेडर

168.    प्‍यारे लाल

169.    राजेश कुमार

170.    चंदन राय

171.    फिरोज खान

172.    राकेश कुमार

173.    सुनील यादव

174.    अभिनव मल्लिक

175.    निर्भय प्रकाश

176.    देवेश कुमार

177.    संजय कुमार

178.    मोहम्मुद आलम

179.    ओमप्रकाश यादव

180.    अमित रंजन चित्रांशी

181.    आशीष अनचिन्हा्र

182.    धर्मेंद्र सिंह

183.    अंकित अग्रवाल

184.    आलोक कुमार

185.    गौतम परमार

186.    समीर शेखर

187.    बीरेंद्र सिंह

188.    राजेंद्र चतुर्वेदी

189.    अलका वर्मा

190.    सुधीर आम्‍बेडकर

191.    भूपेश कुमार सुहेरा

192.    पवन श्रीवास्‍तव

193.    बुद्ध विक्रम सेन

194.    शोभित जायसवाल

195.    जयराम राकेश

196.    अवज्ञा अमरजीत गुप्ता

197.    अलका वर्मा

198.    विशेष राय

199.    राजीव मणि

200.    चंद्रेश मेरावी

201.    हिमांशु ककोडिया

202.    उदय पाल

203.    आनंद सिंह गोदरा जाट

204.    अमृत सागर

205.    धीरेश सैनी

206.    बीरेंद्र मीणा

207.    अश्‍वघोष

208.    लखन सिंह

209.    पूंज प्रकाश

210.    अमित के. मिश्रा

211.    राजेश मंचल

212.    राजवीर

213.    अनुज शुक्‍ल्‍

214.    प्रतीक राव

215.    अमरदीप सिंह

216.    संघ शरण

217.    अमित चौधरी

218.    शाहिद अख्‍तर

219.    रामलगन

220.    अनिल वर्मा

221.    शिवंत कुमार

222.    महेश अमन

223.    अरूण कुमार

224.    प्रमोद गौतम

225.    संजय यादव

226.    हीरलाल बवानिया

227.    जिया हसन

228.    राजकुमार मीणा

229.    पवन भास्‍कर

230.    प्रकाश भारत

231.    कैलाश नौरियाल

232.    सुनील सरदार

233.    अनिल सिंह गोंड

234.    अशर्फी लाल

235.    संजय बौद्ध

236.    जगदीश लाल

237.    इरफान हुडा

238.    मनोज अभिज्ञान

239.    रेखा मौर्या

240.    प्रीतम सिंह

241.    मदन कुमार

242.    धीरज कुमार

243.    राजेंद्र कुमार

244.    संतोष कुमार

245.    रौशन कुमार पासवान

246.    उदय भानू

247.    राजेश कुमार

248.    अरविंद भारती

249.    रामअवतार यादव

250.    आलोक मौर्या

251.    अवधेश कुमार

252.    जंगबहादुर यादव

253.    आशिफ खुर्शीद

254.    अजय गीनवाल

255.    रवि नागवंशी

256.    शुजातुल्ला खान

257.    अभय कुमार

258.    जितेंद्र वाल्मिकी

259.    सतवीर तंवर

260.    अश्वाघोष

261.    निशांत सिंह

262.    राजू बौद्धी

263.    संदीप नाईक

264.    अर्पणा

265.    संदीप प्रसाद

266.    प्रमोद ताम्बट

267.    मोहन श्रोत्रिय

268.    राजू कुमार सिंह

269.    गोविंद माथुर

270.    मुकम्म द ताईद

271.    महमूद आलम

272.    अलका प्रकाश

273.    गिरीश जाटव

274.    मुन्नूज लाल

141.     रविंद्र कुमार सिन्हा

276.    अनिल गुप्ता

277.    साजिना राहत

278.    विवेक निराला

279.    मदन गोपाल सिंह भदौरिया

280.    मनोज कुमार झा

281.    अंजु शर्मा

282.    हेमेंद्र कुमार भगत

283.    संघ शरण

284.    मुकेश अहिरवार

285.    रमेश रावत

286.    विनोद आजाद

287.    आशुतोष चौधरी

288.    राजकुमार राजन

289.    शत्रुध्न

290.    दिवाकर घोष

291.    राजेश कोतेड

292.    राजेंद्र सिंह

293.    देवेंद्र देव

294.    परमेवर दास

295.    मनोज कुमार

296.    प्रकाश्वीरर नवल

297.    हंसराज धनका

298.    संजय कुमार

299.    अरविंद वर्मा

300.    पवन कुमार निराला

301.    राकेश यादव

302.    मोतीलाल द्रविड

303.    प्रमोद गौतम

304.    नसरउद्दीन

305.    संजय शान

306.    नाथूराम मेघवाल

307.    महेश पीपल

308.    अविनाश कुमार

309.    गुरेंद्र सिंह

310.    सुधीर कुमार

311.    एस प्रसाद यादव

312.    अमित कुमार

313.    घनश्याम कुशवाहा

314.    अमर मेघवंशी

315.    विनोद

316.    कौशिका पाटिल

317.    अतुल कांत गौतम

318.    राकेश कुमार

319.    सुमित शाक्य

320.    राम सिंह

321.    आलोक तिवारी

322.    सुरेंद्र कुमार कोरी

323.    अभिवनव आलोक

324.    चैतन्‍य मित्रा

325.    जयसिंह नरनौलिया

326.    नरेंद्र चौहान

327.    सुधीर कुमार

328.    जयपाल नेहरा

329.    कैलाश प्रसाद

330.    मनोज गौतम

331.    कपिलेश प्रसाद

332.    राकेश कुमार सिंह

333.    पवन गहलोत

334.    सुनील वर्मा

335.    कबीर वर्मा

336.    सुधीर यादव

337.    राम रविन्द्र

338.    सुधीर यादव

339.    मो‍हसिन हबीब

340.    राजीव सुमन

341.    प्रदीप शिंदे

342.    शाक्य मुनि चांडाल

343.    अनंत सिन्हा

344.    शीलरतन गौतम

345.    विजय सैन

346.    ललित कुमार

347.    रीतेश कुमार दास

348.    हेमराज हरनोट

349.    अखिलेश प्रभाकर

350.    अजय नेताम

351.    निर्दोष कुशवाहा

352.    सचिन कुमार

353.    जयप्रकाश सिंह कुशवाहा

354.    बाघाराम शार्दुल

355.    विक्रम सिंह यादव

356.    अखिलेश प्रभाकर

357.    शैलेश वर्मा

358.    अजित राज

359.    अरिविंद गोहिल

360.    मनीष कुमार बोध

361.    संजय कुमार

362.    नीलांबुज

363.    दीपक भारती

364.   एसके चौटाला

365.   श्रवण देवरे

366.    राजेश कश्‍यप

367.   अतिफ रब्‍बानी

368.   घनश्‍याम शाह

369.   आशीष अलैक्‍सजेंडर

370.     अंजली देशपांडे

371.     श्री प्रकाश

372.     कुमार सुंदरम

373.     राजदेव यादव

374.     प्रदीप गौतम

375.   गिरिजेश्‍वर प्रसाद

376.   रमेश अवस्‍थी

377.       जॉन दयाल

378.     विशाल मंगलवादी

379.    फिजा इमरान

380.    जयपाल मेहरा

381.    राजीव कुमार

382.    मानिकचंद्र झा

383.    धर्मेद्र कुमार यादव

384.    प्रदीप कुमार गौतम

385.    मुकेश अहिरवार

386.    प्रीतम सिंह

387.    आलोक कुमार

388.    राम सिंह

389.    नूर मोहम्‍मद नूर

390.    केसी सिहरा

391.    संदीप कन्‍नौजिया

392.    जियाउल हसन

393.    विनोद बहाडे

394.    रंजीत सिंह

395.    सुनील कुमार सिंह

396.    अजय आनंद

397.    शिवसागर यादव

398.    सलमान अरशद

399.    श्रीकांत चौधरी

400.    सिमोन पिटरसन

401.    अशोक कुमार मिश्र

402.    परशुराम कांबले

403.    कुमार सत्‍येंद्र

404.    अवज्ञा अमरजीत गुप्ता, आदि अनेक। प्रवीण वाणखेडे

अशोक कुमार पाण्डेय की कवितायें

अशोक कुमार पाण्डेय

सोशल मीडिया में बेवाक सक्रिय अशोक कुमार पाण्डेय बेहद संवेदनशील कवि हैं. संपर्क :ashokk34@gmail.com



कहां होंगी जगन की अम्मा ?

सतरंगे प्लास्टिक में सिमटे सौ ग्राम अंकल चिप्स के लिये
ठुनकती बिटिया के सामने थोड़ा शर्मिंदा सा ज़ेबें टटोलते
अचानक पहुंच जाता हूं
बचपन के उस छोटे से कस्बे में
जहां भूजे की सोंधी सी महक से बैचैन हो ठुनकता था मैं
और मां बांस की रंगीन सी डलिया में
दो मुठ्ठी चने डाल भेज देती थीं भड़भूजे पर
जहां इंतज़ार में होती थीं
सुलगती हुई हांड़ियों के बीच जगन की अम्मा.

तमाम दूसरी औरतों की तरह कोई अपना निज़ी नाम नहीं था उनका
प्रेम या क्रोध के नितांत निज़ी क्षणों में भी
बस जगन की अम्मा थीं वह
हालांकि पांच बेटियां भी थीं उनकीं
एक पति भी रहा होगा ज़रूर
पर कभी ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई उसे जानने की
हमारे लिये बस हंड़िया में दहकता बालू
और उसमे खदकता भूजा था उनकी पहचान.

हालांकि उन दिनों दूरदर्शन के इकलौते चैनल पर
नहीं था कहीं उसका विज्ञापन
हमारी अपनी नंदन,पराग या चंपक में भी नहीं
अव्वल तो थी हीं नहीं इतनी होर्डिगें
औा जो थीं उन पर कहीं नहीं था इनका ज़िक्र
पर मां के दूध और रक्त से मिला था मानो इसका स्वाद
तमाम खुशबुओं में सबसे सम्मोहक थी इसकी खुशबू
और तमाम दृश्यों में सबसे खूबसूरत था वह दृश्य.

मुठ्ठियां भर भर कर फांकते हुए इसे
हमने खेले बचपन के तमाम खेल
उंघती आंखो से हल किये गणित के प्रमेय
रिश्तेदारों के घर रस के साथ यही मिला अक्सर
एक डलिया में बांटकर खाते बने हमारे पहले दोस्त
फ्राक में छुपा हमारी पहली प्रेमिकाओं ने
यही दिया उपहार की तरह
यही खाते खाते पहले पहल पढ़े
डिब्बाबंद खाने और शीतल पेयों के विज्ञापन!

और फिर जब सपने तलाशते पहुंचे
महानगरों की अनजान गलियों के उदास कमरों में
आतीं रहीं अक्सर जगन की अम्मा
मां के साथ पिता के थके हुए कंधो पर
पर धीरे धीरे घटने लगा उस खुशबू का सम्मोहन
और फिर खो गया समय की धुंध में तमाम दूसरी चीज़ों की तरह.

बरसों हुए अब तो उस गली से गुज़रे
पता ही नहीं चला कब बदल गयी
बांस की डलिया प्लास्टिक की प्लेटों में
और रस भूजा – चाय नमकीन में!

अब कहां होंगी जगन की अम्मा?
बुझे चूल्हे की कब्र पर तो कबके बन गये मक़ान
और उस कस्बे में अब तक नहीं खुली चिप्स की फैक्ट्री
और खुल भी जाती तो कहां होती जगह जगन की अम्मा के लिए?

क्या कर रहे होंगे आजकल
मुहल्ले भर के बच्चों की डलिया में मुस्कान भर देने वाले हाथ?
आत्महत्या के आखिरी विकल्प के पहले
होती हैं अनेक भयावह संभावनायें….

ज़ेबें टटोलते मेरे शर्मिन्दा हांथो को देखते हुए ग़ौर से
दुकानदार ने बिटिया को पकड़ा दिये है- अंकल चिप्स!

तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश

तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश
गुजर जाना चाहता हूं
सारे देश देशान्तरों से
पार कर लेना चाहता हूं
नदियां, पहाड़ और महासागर सभी
जान लेना चाहता हूं
शब्दों के सारे आयाम
ध्वनियों की सारी आवृतियां
दृश्य के सारे चमत्कार
अदृश्य के सारे रहस्य.

तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश
इस तरह चाहता हूं तुम्हारा साथ
जैसे वीणा के साथ उंगलियां प्रवीण
जैसे शब्द के साथ संदर्भ
जैसे गीत के साथ स्वर
जैसे रूदन के साथ अश्रु
जैसे गहन अंधकार के साथ उम्मीद
और जैसे हर हार के साथ मज़बूत होती ज़िद

बस महसूसते हुए तुम्हारा साथ
साझा करता तुम्हारी आंखों से स्वप्न
पैरो से मिलाता पदचाप
और साथ साथ गाता हुआ मुक्तिगान
तोड़ देना चाहता हूं सारे बन्ध

तुम्हे प्रेम करते हुए अहर्निश
ख़ुद से शुरू करना चाहता हूं
संघर्षो का सिलसिला
और जीत लेना चाहता हूं
ख़ुद को तुम्हारे लिये।

मत करना विश्वास

मत करना विश्वास
अगर रात के मायावी अंधकार में
उत्तेजना से थरथराते होठों से
किसी जादूई भाषा में कहूं
सिर्फ तुम्हारा हूं मै

मत करना विश्वास
अगर सफलता के श्रेष्ठतम पुरस्कार को
फूलों की तरह सजाता हुआ तुम्हारे जूड़े में
उत्साह से लड़खड़ाती भाषा में  कहूं
सब तुम्हारा ही तो है

मत करना विश्वास
अगर लौटकर किसी लम्बी यात्रा से
बेतहाशा चूमते हुये तुम्हें
एक परिचित सी भाषा में कहूं
सिर्फ तुम ही आती रही स्वप्न में हर रात

हालांकि सच है यह
कि विश्वास ही तो था वह तिनका
जिसके सहारे पार किये हमने
दुःख और अभावों के अनन्त महासागर
लेकिन फिर भी पूछती रहना गाहे ब गाहे
किसका फ़ोन था कि मुस्कुरा रहे थे इस क़दर?
पलटती रहना यूंही कभी कभार मेरी पासबुक
करती रहना दाल में नमक जितना अविश्वास

हंसो मत
ज़रूरी है यह
विश्वास करो
तुम्हे खोना नहीं चाहता मैं

चूल्हा 

चूल्हे की याद करता हूँ
तो याद आती है
ताखे पर टिमटिमाती ढिबरी
जलते – बुझते गोइंठे ’ की
जुगनू सी नाचती लुत्तियां
और इन सबकी आंच में
दिपदिपाता माँ का संवलाया चेहरा

उन गीतों की उदास धुनें
अब तक गूंजती हैं
स्मृतियों की अनंत गुहा में
लीपते हुए जिन्हें गाया करती थीं बुआ

छत तक जमी कालिख
दीवारों की सीलन
पसीने की गुम्साइन गंध
आँखों के माडे
दादी के ताने
चिढ- गुस्सा- उकताहट – आंसू

इतना कुछ आता है याद चूल्हे के साथ
कि उस सोंधे स्वाद से
मितलाने लगता है जी…

वे इसे सुख कहते हैं 

साथ साथ रहते हैं दोनो
एक ही घर में
जैसे यूं ही रहते आये हों
पवित्र उद्यान से निष्काषन के बाद से ही
अंतरंग इतने कि अक्सर
यूं ही निकल आती है सद्यस्नात  स्त्री
जैसे कमरे में पुरूष नहीं निर्वात हो अशरीरी

चौदह वषों से रह रहे हैं
एक ही छत के नीचे
प्रेम नहीं
अग्नि के चतुर्दिक लिये वचनों से बंधे
अनावश्यक थे जो तब
और अब अप्रासंगिक

मित्रता का तो ख़ैर सवाल ही नहीं था
ठीक ठीक शत्रु भी नहीं कहे जा सकते
पर  शीतयुद्ध सा कुछ चलता रहता है निरन्तर
और युद्धभूमि भी अद्भुत !

वह बेहद मुलायम आलीशान सा सोफा
जिसे साथ साथ चुना था दोनो ने
वह बड़ी सी मेज़
जिस पर साथ ही खाते रहे हैं दोनो
वर्षों से बिला नागा
और वह बिस्तर
जो किसी एक के न होने से रहता ही नहीं बिस्तर

प्रेम की वह सबसे घनीभूत क्रीड़ा
जिक्र तक जिसका दहका देता था
रगों में दौड़ते लहू को ताज़ा बुरूंश सा
चुभती है बुढ़ाई आंखों की मोतियाबिंद सी

स्तनों के बीच गड़े चेहरे पर उग आते हैं नुकीले सींग
और पीठ पर रेंगती उंगलियों में विषाक्त नाखून
शक्कर मिलों के उच्छिष्ट सी गंधाती हैं सांसे
खुली आंखों से टपकती है कुत्ते की लार सी दयनीय हिंसा
और बंद पलकों में पलती है ऊब और हताशा  में लिथड़ी वितृष्णा
पहाड़ सा लगता है उत्तेजना और स्खलन का अंतराल

फिर लौटते हैं मध्ययुगीन घायल योद्धाओं से
अपने अपने सुरक्षा चक्रों में
और नियंत्रण रेखा सा ठीक बीचोबीच
सुला दिया जाता है शिशु

चौदह वर्षों का धुंध पसरा है दोनो के बीच
खर पतवार बन चुके हैं घने कंटीले जंगल
दहाड़ता रहता है असंतोष का महासागर
कोई पगडंडी … कोई पुल नहीं बचा अब
बस शिशु  रूपी डोंगी है एक थरथराती
जिसके सहारे एक दूसरे तक
किसी तरह डूबते उतराते पहुंचते हैं

… वे इसे सुख कहते हैं।

मैं धरती को एक नाम देना चाहता हूँ

मां दुखी है
कि मुझ पर रुक जायेगा ख़ानदानी शज़रा

वशिष्ठ से शुरु हुआ
तमाम पूर्वजों से चलकर
पिता से होता हुआ
मेरे कंधो तक पहुंचा वह वंश-वृक्ष
सूख जायेगा मेरे ही नाम पर
जबकि फलती-फूलती रहेंगी दूसरी शाखायें-प्रशाखायें

मां उदास है कि उदास होंगे पूर्वज
मां उदास है कि उदास हैं पिता
मां उदास है कि मैं उदास नहीं इसे लेकर
उदासी मां का सबसे पुराना जेवर है
वह उदास है कि कोई नहीं जिसके सुपुर्द कर सके वह इसे

उदास हैं दादी, चाची, बुआ, मौसी…
कहीं नहीं जिनका नाम उस शज़रे में
जैसे फ़स्लों का होता है नाम
पेड़ों का, मक़ानों का…
और धरती का कोई नाम नहीं होता…

शज़रे में न होना कभी नहीं रहा उनकी उदासी का सबब
उन नामों में ही तलाश लेती हैं वे अपने नाम
वे नाम गवाहियाँ हैं उनकी उर्वरा के
वे उदास हैं कि मिट जायेंगी उनकी गवाहियाँ एक दिन

बहुत मुश्किल है उनसे कुछ कह पाना मेरी बेटी
प्यार और श्रद्धा की ऐसी कठिन दीवार
कि उन कानों तक पहुंचते-पहुंचते
शब्द खो देते हैं मायने
बस तुमसे कहता हूं यह बात
कि विश्वास करो मुझ पर ख़त्म नहीं होगा वह शज़रा
वह तो शुरु होगा मेरे बाद
तुमसे !

आशा पांडेय ओझा की कवितायें

आशा पांडेय ओझा

मूलतः जोधपुर की रहने वाली आशा पांडेय की चार काव्य कृतियां प्रकाशित हैं. संपर्क : asha09.pandey@gmail.com

1. चीख स्त्री चीख

क्यों हो मौन
कौन सी साध साधने को रखा है
यह अखंड मौन व्रत तूने स्त्री ?
अब तोड़ तेरा ये मौन व्रत
और चीख स्त्री
क्या पता तुम्हारी चीख
अंधी बंजर आँखों में रौशनी उगा दे
जो देख पाने में सक्षम नहीं

तेरे साथ पग-पग पर
होता हुआ अन्याय
क्या पता तुम्हारी चीख
छील दे उन कानों में उगा
मोटी परतों का  बहरापन
जो सुन नहीं पाता तेरा क्रन्दन

हो सकता है तेरी चीख जरुरी हो
इस सृष्टि की जमीं पर
तेरी चुप्पी के बीज
व तेरे आंसूओं की बरसात से
उपजी पीड़ा की फसल काटने के लिए
क्या पता तुम्हारी चीख
पशुत्व की ओर बढती हुई आत्माओं  को
पुन:घेर लाये मनुष्यत्व की ओर
क्या पता तुम्हारी इसी चीख से बच जाये
तुम्हारा अस्तित्व
इस अनंत चुप्पी में डूबी हुई
भोगेगी कब तक
यह भयावह संत्रास!

चुप्पी की इस शय्या पर लेटी
तुम जीने की कामना से वंचित
एक लाश सी लगती हो
तुम्हारी चुप्पी का यही अर्थ लगाता है पुरुष
कि तुम हो सिर्फ़ भोग विलासिता की वस्तु भर हो
दर्ज कराने को अपने अस्तित्व की मौजूदगी
तोड़ अंतहीन मौन
उधेड़ अपने होठों की  सिलाई
जो जरा सी खुलते ही फिर सीने लगते हैं
बता कब तक नहीं उतरेगी
तूं अपने अंतःस्थल में
और कितने युगों तक न होगा तुझको स्व का भान
चल खुद के लिए न सही इस सृष्टि के लिए ही बोल
तुम्हारी चीख जरुरी है
बचे रहने को स्त्री
बची रहने को पृथ्वी

2 . हावी है जब तक पुरुषार्थ


देह दिखाना
तुम्हारा धर्म
गगन परिधान भी
तुम्हारा ही धर्म

पाप
स्त्री देह से
खिसकना दुप्पटा भी
धर्म,अर्थ,काम
तीनों पर हावी

जब तक पुरुषार्थ है
स्त्री कभी अहिल्या
कभी सीता कभी द्रोपदी
बनाई जाएगी पत्थर
कभी होगा चीर हरण
कभी होगी ज़मींदोज़द

3 . पुरुष गिद्द दृष्टि


ज़िन्दगी जीने की चाह
कुछ पाने की ख्वाहिश
आँखों के सुनहले सपने
इक नाम, मुकाम की ज़िद्द
अटूट आत्मविश्वास
यही कुछ तो लेकर निकली थी
वह ख्वाहिशों के झोले में

किसी ने नहीं देखी
उसके सपने भरे आँखों की चमक
किसी को नज़र नहीं आया
उसका अटूट आत्मविश्वास
किसी ने नहीं नापी
उसकी लगन की अथाह गहराई

माने  भी नहीं किसी के लिए
उसकी भरसक मेहनत के
उसके चारों ओर फ़ैली हुई है
एक पुरुष गिद्द दृष्टि
जो मुक्त नहीं हो पा रही
आज भी उसकी देह के आकर्षण से
वह  लड़ रही है लड़ाई
देह से मुक्त होने को

4 . संभल लड़की


सोहलवां बसंत
आँखों में ताज़े सतरंगी सपने
करवट बदलता मन का मौसम
एकम से पूनम की और बढ़ता
रूप रंग का चाँद
आस-पास की तारावलियों को मात देकर
सुन्दर और सुन्दर प्रतीत होने को
क्षण-क्षण निखारता खुद को
उड़ान को उतावले मन पंख
बेरोक बहती अल्हड़ नदी सी मासूम हंसी
बेखबर इस बात से कि
उमड़-घुमड़ रहे हैं आस-पास
आवारा बादल
ठन्डे-ठन्डे अहसासों के

तेरी गर्म देह पिघलाने को
संभल लड़की

कंचन भारद्वाज की कवितायें

कंचन भारद्वाज

कंचन भारद्वाज जामिया मीलिया इस्लामिया वि वि ,दिल्ली, में पढ़ाती हैं. संपर्क :kanchanbhardwaz@gmail.com

( कंचन भारद्वाज की ये कवितायें अभिव्यक्ति , अर्थ और कहन के साथ बड़ी     कविताओं में शामिल होंगी .)

1. लड़कियाँ 

लड़कियों की किताबें कवर चढ़ी होती हैं
किताबों के कवर के भीतर वे रख लेती हैं प्यार

लड़कियों के बालों से लट निकली होती है
बालों से निकली लट को चिपका लेती हैं गाल से
उनके गाल से चिपका होता है उनका प्यार

लड़कियां अपनी चाय का रंग तय करती हैं
अपनी चाय के रंग में घोलकर पी लेती हैं प्यार
लड़कियां अपने हर रंग को ख़ास बनाती हैं

लड़कियों के पर्स में कई डिब्बियां होती हैं
अपने पर्स की डिब्बियों में न जाने
कितनी बार खोलती बंद करती हैं प्यार

प्रेम पर लिखने वालो तुम्हें पता भी है क्या
लड़कियां कहां कहां छुपा लेती हैं अपना प्रेम

तुम उन्हें गुलाब और गुलाबी गालों में तकते हो
किताब के सूखे फूलों में चुनते हो
तुम्हें क्या पता लड़कियां प्रेम में
कहां कहां होती हैं तुम्हारे भीतर

तुम्हारी चाय के कप में
तुम्हारे बालों की लट में
तुम्हारे कंधे की छांव में
तुम्हारी उंगली के पोर में
तुम्हारे क़दमों की आहट में

लड़कियां नहीं होती सिर्फ
सुर्ख गुलाब और गुलाबी गालों या
न किताबों के पन्नों के बीच रखे सूखे हुए फूलों में

जैसे रख लेती हैं अपने कानों के संगीत में अपना प्यार
तुम उन्हें अपने कैनवस के रंगों में उतार लो

प्रेम की क़लम को थामने से पहले
प्रेमिका के दिल की झन्कार से पहले
ज़रा जान लेना दिल थामकर
लड़कियां कहां कहां छुपा लेती हैं अपना प्रेम
तुम्हें कुछ पता भी है!

2. आहटों का तांडव 

तीन पग में पूरी धरती
नापने का सपना देखने वाली औरत
असल ज़िंदगी में एक सड़क तक
अकेले पार नहीं करती !…

जब आदेश मिलता है
तो अकेली होने पर ज़हरीले जंगल में भी
पाल पोसकर तैयार कर देती है
दो वीर योद्धा …

फिर जब आदेश मिलता है
अग्नि -परीक्षा देने का
तो धरती फोड़ उसमें समा जाने का
हौसला रखती है

हौसले के कारण तो
टांग काट दिए जाने पर भी
एक औरत एवरेस्ट पर चढ़ गयी
एक औरत धरती में समा गयी
एक औरत ने गायब कर दीं
सारी सड़कें अपने ख़वाब में
और नाप ली सारी धरती
तीन पग में।

तीन पग में
धरती नाप लेने वाली औरत
अपनी खिड़की से
सड़क पार का चाँद नहीं ताका करती
वह भर लेती है अपनी दोनों आँखों में
चाँद और सूरज एक साथ
उसके हांथों की उँगलियों से
एक साथ झर उठते हैं
आकाश के टिमटिमाते तारे
जुगनुओं से भर गया है मेरा अहाता
किसी भैरवी की नयी बंदिश
अभी उठने को है….

हौसलों का डमरू
मेरे बादलों में गूँजता है
आहटों के तांडव से थिरक उठता है
कोई नटराज नयी मुद्रा लिए हुए.

3.   ताला , राखी , भाषा , आंखें 

ताला –
बेबस लटका रहा
घर के बाहर
चाबी के इंतज़ार में। ….

राखी-
बंधी पड़ी  रही
पोस्टमैन के पास
कलाई के इंतज़ार में। …

भाषा-
कतार में रही
उनकी जिद में
पहचान के इंतज़ार में । …

आँखें-
देर तक तकतीं रहीं
सपने में आसमान
इन्द्रधनुष के इंतज़ार में

4 . प्रतिकिया 

वह  प्रेम लिख रही थी ,
प्रतिक्रिया मिली – क्रांति लिखो

वह  क्रांति करने लगी,
प्रतिक्रिया मिली – प्रेम करो

वह बायो पढ़ने लगी ,
प्रतिक्रिया मिली -आध्यात्म जियो

वह घुँघरू की दुकान खोलकर बैठ गयी ,
प्रतिक्रिया नहीं मिली

इस बार कला जागी थी
पोस्टर बनने  लगे,
कविताएँ छपने लगीं ,
घुंघरू की दुकान के सामने खड़ी स्त्री ने अचानक
ब्रेकिंग न्यूज़ का बैकग्राउंड म्यूजिक बदल दिया है ,
अब गिफ्ट में घुंघरू का चलन चल निकला है

5  . धीमी आवाज़ का शोर 


उसकी दबती धीमी आवाज़ को
तेज कर सकने की हिम्मत मुझे चाहिए

नहीं सुननी उसकी आवाज़ केवल अपने कान में
चाहती हूँ कि उसकी आवाज़ और उसकी पीड़ा से
गूँज उठे यह धरती और ब्रह्मांड्

उसे धीमे से कहने की आदत है
उसमें प्रतिष्ठित लोगों के सामने घबराहट है
वह चाहकर भी चीख नहीं पाया कभी
उसकी पीड़ा में घुट गयी उसकी आवाज़ की तेजी

उसने बच्चों को देखा तेज दौड़ते हुए
उसने बच्चों की तेज आवाज़ को भी सुना
उसने भी औरों की तरह तेज़ दौड़ना चाहा
उसने भी औरों की तरह तेज बोलना चाहा

लेकिन उसके पाँव औरों की तरह नहीं थे
उसे कोई नहीं दे सकता सामान्य पाँव
लेकिन उसकी दबी हुयी आवाज़ तो तेज हो सकती है

उसकी धीमी आवाज़ उसकी घुटी हुयी पीड़ा है
उसकी दबती आवाज़ को तेज किया जा सकता है
उसके हौसले को ऊँचा करने की कोशिश में
उसकी आवाज़ भी ऊँची उठती जायेगी क्या ?

उसकी आवाज़ को तेज चीखना सिखाना है
उसकी घुटन को उससे बाहर निकालना है
उसके बँधे हाथ कंधे से ऊपर तक खड़े करने होंगे
उसका हाथ सिर्फ़ कोहनी तक ऊपर उठता है

कितना संकोच है उसके हाथों में, उसकी आवाज़ में
उसके मन की पीड़ा में,उसके मन की जरूरतों में

वह धीमी आवाज़ में तेज़ गति से जल्दी से
अपनी बात कहकर चुप हो जाना चाहता है
लेकिन अपनी आँखों के सपनों में वह चुपचाप
ख़ुद को किसी ऊंचाई पर अकेले देखता है

सपने देखने वाली उम्र में बच्चे तो
“शोर वाली जेनरेशन” का ताना सुनते हैं
लेकिन वह तो तेज आवाज़ निकालने के संकोच में
धीमे से ही कुछ कहकर जल्दी से शांत हो जाना चाहता है

मैं उसकी धीमी आवाज़ से उठती
किसी आक्रामक बैचेनी में हूँ

उसकी दबती धीमी आवाज़ को तेज़ करने की हिम्मत चाहिए

6  . लाल ग़ुलाब ….!!

मुझे चाँद नहीं चाहिए तुमसे
न ही कोई लाल ग़ुलाब !
गुलाब की खेती मैंने कर ली है और
चाँद की ओर मैंने कदम बढ़ा दिए हैं
न मेरे होंठों को गुलाबी पंखुड़ियाँ कहो और
न अपनी उँगली से मुझे चाँद का ख्वाब दिखाओ
मेरे होंठों में सवालों के काँटे हैं और
मेरे ख़वाब में मेरा पूरा आसमान
मैं सिर्फ़ ग़ुलाबी और लाल रंग कब तक पहनूं
तुम मेरे लिबास का रंग तय न करो
स्त्री !! तो तुमने रच ली नयी
जो खुले आम तुमसे प्रेम करे
तुम मेरी आँखों में न देखो, न रंग भरो मुझमें
एक अपना नया चित्र खींचो, कोई नयी बात बोलो
नहीं चाहिए मुझे तुमसे कोई ग़ुलाब न कोई चाँद
न रंग, न कोई ख़वाब , न कोई स्वप्निल प्रेमकथा
न अपने लिए चाहिए तुम्हारी रची कोई नयी भाषा
मैं एक नयी भाषा के साथ तुमसे संवाद करना चाहती हूँ

7. अभी तो उसे पैदा होने दो !


हाँ ,उस माँ को मालूम है
बेटी के होने का मतलब
कितना समझाया उसे कि
बेटी भी पढ़ -लिखकर आगे
तुम्हारा सहारा बन सकती है
नहीं माना उसने एक बार भी
आँसू भी नहीं थम सके उसके
न ही उसने मुझे कहने दिया –
अभी तो उसे पैदा होने दो !
वह खुद ही लगातार
एक के बाद एक ,
कई-कई किस्से
सुनाये जा रही थी लगातार
जीने की कोशिश में मरती हुई
मारी जाती ,जलाई जाती हुई
जलती हुयी ,घुटती हुयी ,तड़पती हुई
लड़कियों के किस्से-दर-किस्से
उन्हें घर में ही मारा और
जला दिया जाता
बिना किसी डर के।
वह माँ थी
आज ही बेटी के
पैदा होने से पहले ही
उसे जवान होकर मरता हुआ देख रही थी
“जल्लादों ने बहुत तड़पाकर मारा उसे
उनकी माँगों का मुँह बंद ही नहीं होता था”
अपनी अजन्मी बेटी की
जवानी की मौत पर
ज़ार-ज़ार रोये जा रही थी.।
उसके आँसुओं ने
जबड़ा थाम लिया था मेरा ,
और शब्द बहे जा रहे थे
उसके आँसुओं से मिलकर।
मैं अपनी धुन में
किसी नदी की राह में
उन अनवरत आँसुओं को
मिला देना चाहती हूँ
जो सींच सके उस धरती को
जो लड़कियों की लाशों के मलबे से
हर तरफ बंजर हुयी जाती है
एक हरा भरा उद्यान जहाँ
लड़कियाँ चिड़ियों सी हँसे
और इन्द्रधनुष सी चमके
उनके उन्मुक्त आकाश को
कोई धुआं काला न कर सके
कोई चहक घुटन न बन सके
बस करो !
अभी उसे पैदा तो होने दो।
उसे जिन्दा रहने की लड़ाई आती है
उसके साथ पूरी नई फसल का भरोसा है।
वह मार दिए जाने वाले
इन आंकड़ों से नहीं डरेगी
यू .पी और बिहार में सबसे ज्यादा होती हैं
दहेज़ हत्याएं और
कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़ों को तो
आँसू पोंछती माएँ रास्ता दिखा देंगी।

8 . बादलों के सफ़ेद फाये !

बंजर ज़मीन से टकराकर
बदहवास लौट आती है
दबी हुयी कोई चीख़
थके पांवों से बेहाल
छोड़कर अपनी चप्पलें
अपनी क़ैद में वापस !
फिर चढ़ जाती हैं नंगे पांव
ऊँचे ख़ूबसूरत पहाड़ों पर
लिपट-लिपट जाती है
हवा के किसी झोंखे से
उड़ जाती बादलों के फाये पर
बहने लगती है बेलगाम
तेज़ बहते पानी की लहरों संग
खिलखिला उठती है !
पानी की लहरों के बीच
किसी पत्थर पर बैठ
वह दबी हुयी चीख़
जो बरसों बाद
घर से बाहर भागती है.…
सुना नहीं गया उसे कभी भी !
न आज जब वह खिलखिला उठी
न तब जब उसे दबा दिया था जोर से
बहरे और गूँगे होने का चलन
अब हमारी चमकदार पहचान है
हम आबाद शहर के चौराहे पर हैं
जिसकी हर राह की मंज़िल
किसी वीरान बस्ती से मिलती है
जहाँ चीखें बेख़ौफ़ खिलखिलाती हैं
वीरान बस्ती का पता सबकी ज़ेब में है
ज़ेब में नन्हीं पाज़ेब खनकती है
ज़ेब में कोई लोरी सिसकती है
ज़ेब से जब निकल भागता है कोई मिल्खा
तब दुनिया के हाथों से ताली बज उठती है
वीरान बस्ती में हर रात
किसी थियेटर के मंच पर
यही रंगीन जश्न होता है
फ़िर कोई चीख बेख़ौफ़
खिलखिलाकर
बदहवास लौट आती है
किसी बंज़र ज़मीन से टकराकर
थके पांवों बेहाल
छोड़कर अपनी चप्पलें
अपनी कैद में वापस !
उसकी गोद में गिर पड़ते हैं
नीले बादलों के सफ़ेद फाये

एक क्रांतिकारी की पत्नी का आत्मकथ्य

सरस्वती भट्ट 


( निजी जीवन में अराजक और स्वप्न तथा कर्म से क्रांतिकारी रहे सुरेश भट्ट बिहार आन्दोलन के भी एक प्रमुख नाम हैं . यह आलेख उनकी पत्नी सरस्वती भट्ट का आत्मकथ्य है . आलेख मे उल्लिखित क्रांति चर्चित थिएटर आर्टिस्ट असीमा भट्ट हैं .


मेरी शादी अप्रैल, १९५५ में हुई. मैं ११ साल की और मेरे पति (सुरेश भट्ट) २४ साल के थे , जब हमारी शादी हुई. शादी क्यूँ और किसलिए होती है, मैं नहीं जानती थी. मेरी विदाई के साथ एक ‘दाई माँ’ भी साथ आई थी. जिस रात मैं ससुराल पहूँची उस रात जो कुछ रस्म होता था , हुआ. थकी थी  इसलिए जल्दी सो गयी. सुबह उठी तो अपने पलंग पर किसी मर्द को देखकर रोने लगी कि यहाँ मेरा अपना कोई नहीं है तो मुझे मर्द के साथ सुला दिया, मेरी दाई ने समझाते हुए कहा – “यह कोई गैर मर्द नहीं, आपके पति हैं .’ लेकिन मैं पति-वति कुछ नहीं समझती थी. मुझे रोज़ वो सजा-धजा कर नयी साड़ी पहना कर मेरे पति के कमरे में ले जाना चाहती और मैं उसकी साड़ी का आँचल पकड कर जोर जोर से रोने लगती  – “कुत्ती, मुझौसी…हम बाबु जी से  कह देव कि हमरा मरदाना के कमरा में सुतेलय भेजे छय…” मुझे रोते देखकर यही (मेरे पति) बोले  – “जाने दीजिये ना, काहे बच्चा को तंग करते हो, जहाँ उसका मन है, वहाँ सोने दो”.

सरस्वती और सुरेश भट्ट

पांच दिन वहां किसी तरह से कटा फिर मेरे नैहर ( मायके )  से मेरे बड़े भाई के साथ एक नौकर मुझे वापस लिवा ले जाने आये. मैं बहुत ख़ुशी -ख़ुशी वापस आ गई. यह बात अप्रैल, १९५५ की है. शादी के कुछ ही दिनों बाद अगस्त १९५५ में पटना में छात्र आन्दोलन हुआ. वो बनारस में पढ़ रहे थे, आन्दोलन की खबर सुनते ही पटना आ गए. पुलिस फायरिंग हुई. कई लोग घायल हुए. उसी में गोली कांड में दीनानाथ पाण्डे शहीद हुए. नवादा के उनके एक और साथी महेंद्र कुमार शहीद हो गए. दरअसल वह  गोली इनपर चली थी. ‘महेंद्र भाई जी’ ने इन्हें धक्का देकर दूर धकेल दिया और इनकी गोली खुद अपने सीने पर झेल ली. पूरे नवादा में खबर फ़ैल गई – “सुरेश भट्ट को पुलिस ने गोली मार दी.” मेरे ससुराल में भट्ट जी की दादी-बुआ–बहन थीं सब का रोना- पीटना शुरु हो गया

मेरे ससुराल में भट्ट जी के दादी-फुआ (उनकी माँ का देहांत हो चुका था और पिता जी ने दूसरी शादी कर ली थी) सबका रोना पीटना शुरू हो गया. उन दिनों टेलीफोन की सुविधा नहीं थी. तुरंत मेरे ससुर ने दो आदमी मेरे घर भेजा. खबर सुनकर हमारे यहाँ भी सब लोग रोने-पीटने लगे. मैं उस समय खेल रही थी .मेरी दादी भगवान को कोस कोस कर रो रही थी- “हे भगवान! इस छोटी सी बच्ची ने आपका क्या बिगाड़ा था. ऐसा अन्याय क्यों किया.” गांव घर की औरतें जमा हो गई, और मुझे पकडकर मेरा मांग धुलवा दिया गया. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह मेरे साथ क्या हो रहा है. एक हफ्ते बाद भट्ट जी घर (नवादा) आ गए. उनकी दादी उनसे गले लगाकर रोने लगी और तुरंत मेरे ससुर से कहा- “बडकी को घर बुलवा लो. वो सीता है, आज उसी की वजह से मेरा राम (भट्ट जी) जिंदा है.” मेरे ससुर जी ने तुरंत आदमी मेरे घर भेजा. मेरे घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई और मेरे घर वालों ने मुझे दुबारा मेरे छोटे भाई के साथ विदा कर दिया.

उसी केस के सिलसिले में गणेश शंकर विद्यार्थी, बृजनन्दन लाल और भट्ट जी तीनों को सात साल की सजा हो गई. बृजनन्दन भाई जी और गणेश शंकर विद्यार्थी तो साल दो साल में छूट गए लेकिन भट्ट जी पर काफी कड़ा केस लगा था. इसलिए वो पूरे सात साल बाद ही जेल से वापस आये . जेल से आने के बाद कुछ दिन अपने बाबूजी के सिनेमा हॉल चलाने में हाथ बटाने लगे और सामाजिक काम भी चलता रहा.

भट्ट जी की दादी और बुआ ने ही बताया था कि इनके क्रान्तिकारी स्वभाव के कारण इनके पिता जी इनसे क्षुब्ध रहा करते थे. मेरे ससुर शहर के सबसे नामी और धनी व्यक्ति थे इसलिए अँगरेज़ अफसरों का मेरे ससुर जी के घर पर आना जाना था. भट्ट जी को लगता की उनके पिता अंग्रेजों के मुखबिर हैं. उन्हें अपने पिता पर इस बात के लिए बहुत गुस्सा था लेकिन पिता से डर की वजह से कुछ नहीं कहते थे लेकिन एक दिन जब अँगरेज़ अफसर मेरे ससुर जी से मिलने आये और वो लोग बैठक खाने में बातें कर रहे थे  तो भट्ट जी, जो अंग्रेजों की जीप दरवाज़े पर खड़ी थी उसमें आग लगा कर भाग गए .

अंग्रेजो के लिये इनके मन में इतना आक्रोश भरा था कि पोस्टआफिस जला दिया था और रेलवे लाइन की पटरी उखाड़ दी थी ताकि अँगरेज़ नवादा से भाग ना सके. अंग्रेजों को सड़क पर खदेड़ खदेड़ कर मारा था, जिसके कारण उस कम उम्र में उन्हें जेल जाना पड़ा. जो आज़ादी के बाद ही जेल से बाहर आये. उनके इसी स्वभाव की वजह से उनके पिता जी चाहते थे कि इनकी शादी जल्दी करा दें. लेकिन भट्ट जी खुद के लिए आये रिश्ते और मेहमानों को खुद अपने बारे में उलटी – पुलटी मनगढ़त कहानियां सुना कर भगा देते. यहाँ तक कह दिया कि लड़का भांग-गांजा पीता है और लड़का पागल भी है.

मेरे पिता जी जब इन्हें देखने आये तो मेरे मौसा जी भी साथ आये थे. उनको भट्ट जी ने वही सब बताना शुरू कर दिया लेकिन मेरे पिता जी सब सुनकर बस हंस रहे थे क्योंकि उन्होंने पहले ही सबकुछ पता करा लिया था कि लड़का बनारस हिन्दू विश्वविद्दालय में पढता है. और बहुत ही तेज़ और होनहार छात्र है. ज्ञान इतना है कि किसी भी विषय पर बहस करा लो. बाबूजी को लगा बाकी सब शादी के बाद ठीक हो जायेगा. इसलिए मेरे पिता जी ने तुरंत बात पक्की कर दी. और १९५५ के अप्रैल में हमारी शादी हो गई. लेकिन शादी के बाद भी इनकी हरकतों में बदलाव नहीं आया. लगातार या तो जुलूस – आन्दोलन में उलझे रहते या फिर जेल में रहते….
मैं रोती कि मेरे बाप ने किससे शादी करा दी. एक-दो बार बाबूजी से कहा भी कि – आपने मेरी शादी सही नहीं करायी. वो कहते – “देखना सब ठीक हो जायेगा. लड़का हीरा है, बस थोड़ा भटक गया है. एक बच्चा हो जायेगा तो सब ठीक हो जायेगा.”

आम सभा को सम्बोधित करते जे पी

शादी के दस साल हो गए हमारा बच्चा नहीं हुआ.  ससुराल में सबको हमसे शिकायत होने लगी. लोग मुझे ‘बाँझ’ कहने लगे. ससुरजी को अपने वंश की चिंता होने लगी. अपने बेटे को बुलाकर कहा – ‘इसको बच्चा नहीं हो रहा. बाँझ है. आपको दूसरी शादी करनी पड़ेगी.’ इन्होने बाबूजी से साफ साफ कह दिया. ‘मुझे पहले भी शादी की ज़रूरत नहीं थी, आज भी नहीं है. मेरा तो पूरा देश ही बच्चा है.’ लेकिन इनके पिता जी नहीं माने और घर पर रिश्तेदारों का आना शुरू हो गया. एक दिन जब एक मेहमान आये तो भट्ट जी अपने पिता जी के सामने ही मुझे उन लोगों  के सामने बुला कर उनसे कहा –‘यह मेरी पत्नी है, आपको पता है ना. इसे बच्चा नहीं हो रहा है तो मैं इसके घर में रहते दूसरी शादी कर लूँ. इसकी क्या गारंटी है कि आपकी बेटी से बच्चा हो ही जायेगा और नहीं हुआ तो दोनों को घर में बिठाकर तीसरी शादी करूंगा तो आपको कैसा लगेगा?“

१३ साल हो गए मुझे बच्चा नहीं हुआ. कोई दवा नहीं, इलाज नहीं.  अचानक मुझे लगा कि मैं पेट से हूँ. लेकिन पूरी तरह यकीन नहीं हो रहा था क्योंकि मेरे ससुर जी दावा करते थे कि अगर इसे बच्चा हो गया तो मैं डाक्टरी छोड़ दुंगा. मुझे भी लगता, इतने बड़े ‘वैद्य’ हैं, भला यह कैसे गलत हो सकते हैं. डर से मैं तीन महीने चुप ही रही. फिर अचानक ४ महीने में मेरी सौतेली सास को ही कुछ शक सा हुआ उन्होंने पूछा – “कोई बात है क्या बड़की?”मैंने उन्हें बताया तो उन्होंने मेरे ससुर जी को बताया. ससुर जी बोले – “हो ही नहीं सकता ऐसा कई बार होता है कि कभी कभी औरतों को लगता ही कि वो पेट से है लेकिन वो भरम होता हैं. असल में पेट में पानी भरा होता है”

मेरी माँ मेरी शादी के दो साल बाद ही मर गयी थी. मेरी दादी थी जो कि सौतेली थी लेकिन सगी से भी बढ़ कर थी. मेरी माँ के मर जाने के बाद हम पांच भाई बहन को माँ से भी बढ़कर प्यार दिया. उन्हें जैसे ही मेरे माँ बनने की खबर मिली वो मेरे बड़े भाई को मुझे लिवा लाने भेजा क्योंकि वो जानती थीं कि  मेरी सौतेली सास है, जिनका बर्ताब मेरे साथ ठीक नहीं. वह  खुद हर साल एक बच्चे को जन्म देती थी और चूँकि मुझे बच्चा नहीं होता था. मैंने अपने देवर और ननद को अपने बच्चों जैसे ही प्यार से पाला. मेरी सौतेली सास कहती भी थी- ‘हम कुछ नहीं जानते हैं कि हमारा बच्चा कैसे पलता  है. हम तो खाली जन्म देते हैं. बाकी तो मेरा सब बच्चा बडकी के हाथ से ही पलता है.” कुल ९ बच्चे उनके हुए जिनमें कुछ की असमय मृत्यु हो गई पर चार बच्चों को मैंने ही बड़ा किया. सारे बच्चे अपनी माँ से कम और मुझसे ज़यादा घुले मिले थे. इन्हीं बच्चों को देख देखकर मैं अपने माँ बनने का अरमान पूरा करती.

जब मेरे भैया मुझे लेने आये तो ससुर कहने लगे – ‘क्या झूठ-मूठ तमाशा लगा रखा है? इसको ऐसे ही लग रहा है कि इसको बच्चा होगा और आप लोग भी बेवकूफ़ की तरह बात मान रहे हो. कहीं नहीं जाएगी. मैंने कहा ना इसके पेट में बस पानी है.”भैया कुछ नहीं बोल पाये. मैंने सास से कहा – “माय, जाने दीजिये न हमको नहरा. भैया आये हैं तो चले जाते हैं कुछ दिन के लिए. बच्चा हो चाहे ना हो.”

वो बोली – ‘अरे बाप रे. हमको मरना है तुमरे ससुर का हुकूम टालके.’मैं रोने लगी. मैं जानती थी कि इतने दिनों बाद भगवान ने मेरी सुनी है. यह मेरा भरम नहीं हो सकता. भट्ट जी से कहा – देखिये, आप बाबूजी से बात कीजिये, हमको जाने दीजिये. जानते हैं कि हमको यहाँ एकदम आराम नहीं मिलता. यहाँ हम पूरा दिन खटते रहते हैं, एक तो इतना  दिन पर मेरा अचरा भरा है. यहाँ ठीक से देखभाल नहीं होगा तो कुछ भी हो सकता है. वहां नहरा में दादी है. बडकी भाभी है, छोटी बहन. सब मेरा देखभाल करेगी.’

भट्ट जी बोले – ‘तुम जानो, तुम्हारा काम. हम मैया- बाबूजी से कुछ नहीं कहेंगे.’ अपने माँ बाबूजी को तो यह भगवान मानते थे. उनकी आज्ञा ऐसे ही निभाते थे जैसे भगवान राम.मैं बहुत रोयी, ऐसे भी तो पहला बच्चा नहरा में होता है. मुझे जाने दीजिये लेकिन मेरे ससुर बोले – ‘हमारे खानदान में ऐसा नहीं होता. देखती नहीं तुम्हारी सास का सब बच्चा यहीं होता है.’ .बात कुछ और ही थी. सास को चिंता थी कि मैं मायके चली गई तो इनके इतने सारे बच्चे कौन सम्हालेगा. क्योंकि सारे बच्चे मेरे साथ ही सोते थे. बल्कि बहने तो बड़ी हो गई थी तब तक अपने भाई (भट्ट जी) में सटकर ही सोती थी. भट्ट जी अपने सौतेले भाई-बहन को अपने बच्चों से बढ़कर मानते थे. और ससुर जी को लगता था कि बच्चा-बच्चा हैं नहीं. ढोंग कर रही है. कहीं ऐसा ना हो कि नैहर से किसी दूसरे का बच्चा लेकर चली आये.

1974 का आन्दोलन

दिन-रात ये सिनेमा में ही पड़े रहते थे. बस पैसे पंहुचाने घर आते थे. पूरे दिन भर सिनेमा के टिकट की जो कमाई होती वो अलग अलग थैलियों में करके अपनी माँ (सौतेली माँ, अपनी माँ का तो देहांत हो चुका था) को दे जाते. और कहते -“लाओ मईया! चार आना दो, सिगरेट पीयेंगे.” अपने बाबूजी से बहुत डरते थे. उनके सामने कभी सिगरेट नहीं पीते थे. सिगरेट पीना तो दूर की बात हैं, कभी अपने बाबूजी के सामने खड़े भी नहीं होते. वो जितना कहते, सर झुकाकर सुन लेते. हाँ, हूँ में जवाब देकर खिसक लेते. कभी सिगरेट पीते सामने पाए जाते तो जलती सिगरेट हाथों में दावा लेते. और अगर तब भी नहीं छुप पाता तो बाबूजी खड़ाऊ उतरकर पीटना शुरू कर देते और ये कुछ नहीं बोलते. इनकी दादी कहती – “अरे; घर में दुल्हिन है. इसकी शादी हो गयी है, अब तो रहने दो. जवान शादी सुदा बेटे पर ऐसे कोई हाथ उठाता है ?.” यह चुप चाप वहां से कट लेते.

जिस दिन मेरी बेटी हुई. उस दिन भी वो सिनेमा में ही थे. श्यामलाल बाबा (घर के सबसे बुजुर्ग और पुराने नौकर, बहुत जिद्दी और खूद्दार, उनके गुस्से से मेरे ससुर जी भी डरते थे). वे ख़ुशी ख़ुशी सिनेमा भागे, इन्हें बताने. -“अरे बड़े बाबू, घर में लक्ष्मी आयी.” यह दौड़े-भागे घर आये. जब तक यह घर पंहुचते, तब तक बाबूजी बच्ची को गोद में लेकर पंचांग (वे खुद ज्योतिष भी थे) देख चुके थे. खुश होकर बोले – “बहुत भाग्यशाली बच्ची है. साक्षात् ‘माँ भवानी’ का रूप हैं. उन्होंने नाम भी ‘भवानी’ रख दिया. पर सतैसा (kind of ritual on 27th day)  में पड़ी है, बाप पर भारी होगी. इसलिए २७ दिन बाद ही बड़े बाबू  इसको देखेंगे.

अब बड़े बाबूको कौन समझाए, वो तो बेटी को देखने के लिए उतावले हो रहे थे. इसपर मेरे देवर बोले – “इतना क्या है. इतने सालों (हमारी शादी के १४ साल हुई थी) बाद हुई भी तो बेटी.” तुरंत अपने भाई को डांटते हुए बोले – “बेटी नहीं. क्रांति हैं.”बाबूजी के हुक्म टालने की इनकी हिम्मत तो नहीं थी लेकिन सिनेमा विनेमा छोड़ कर घर में ही दिन भर घुर घुर करते रहते. और मौका देखकर मेरे कमरे की खिड़की के पास आकर गिगगिड़ाते. – ‘एक बार ‘बाबु’ को देखने दो ना, मुझे लगता भी कि एक बार दिखा दें, इतने सालों बाद खुद की बच्ची हुई है, दूसरों के बच्चों को बहुत प्यार करते थे, खूब खेलते थे. आज खुद की बेटी को देख नहीं पा रहे, मन तो बेचैन होता ही होगा. लेकिन मेरे कमरे में हमेशा एक दाई रहती थी. वो बोली – “हमरा बाबूजी मार के ज़मीन में गाड़ देंगे.”
बेटी को देखने के लिए इनका २७ दिन बड़ी कठिनाई से कटा. आखिर सतैसा हो गया. बेटी को गोद में लेकर ऐसे खुश थे जैसे सारी दुनिया की दौलत मिल गई हो. बेटी में तो जैसे जान बसती थी इनकी. छोटी सी बच्ची को भी सिनेमा में ही लेकर पड़े रहते थे. बच्ची बहुत प्यारी मगर कमज़ोर थी. कई औरतें जो देखने आती, वे मेरे मुंह पर ही कह देतीं – “चूहे के बच्चे जैसी है, बचेगी नहीं.” मैं रोने लगती. – “इतने दिनों बाद गोद भरी भी तो लोग ऐसी बातें करते हैं, हे भगवान! बच्चा देकर, छीन मत लेना.”

क्रांति जो अब असीमा हैं

ये कहते -“पागल! रोती क्यूँ हो? यह क्रांति है. देखना इसको कुछ नहीं होगा.“बेटी होने बाद यह बेटी में ही खोये रहने लगे. बेटी को लेकर बहुत खुश रहते, दिन-रात बस बेटी को लेकर सोना. बेटी को लेकर ही जागना. लोगों से कहते मेरी बेटी इंदिरा गांधी की तरह नाम करेगी. यह देखकर सौतेली माँ जल भून गयी. तुरंत ही बातें बनाने लगी और ताने देने लगीं. बेटी होते ही उन्हें लगने लगा कि सम्पत्ति का हिस्सेदार आ गया. घर में सौतेली सास का बर्ताव बिगड़ने लगा. घर के तनाव को देखते हुए ससुरजी ने हमें अलग कर दिया. घर से हमें ये बिलकुल खाली हाथ लेकर निकल आये. उन दिनों खुद सिनेमा हॉल चलाते थे. वहीँ सिनेमा हॉल के ऊपर वाले पुराने केबिन में लाकर हमें रख दिया. हम नहाकर  क्या पहनेंगे, क्या खायेंगे, इसका कुछ इंतजाम नहीं था. मैंने कहा भी भट्ट जी से कि कुछ सामान घर से मंगवा लेते. ये मुझे डाँटते हुए बोले – ‘तुम एकदम चुप रहो. जब माँ –बाबूजी नहीं सोच रहे हैं या सामान नहीं भिजवा रहे हैं. उनको यही सही लग रहा तो लगने दो. तुम चुप रहो.’  माँ-बाबूजी ने कुछ भी सामान भिजवाना ज़रूरी नहीं समझा. छह महीने तक हम छोटी सी बच्ची को लेकर ज़मीं पर सिनेमा के पुराने पोस्टर बिछाकर सोते रहे. और सिनेमा के होटल से खाना खाते रहे. बच्ची को देर रात कभी भूख लगती तो ना दूध का इंतजाम था न घर में कोई बर्तन की हम किसी तरह कुछ गर्म करके उसे दें. उस रोती हुई बच्ची को कंधे पर लेकर ये बाहर निकल जाते. कई बार देर रात को बंद होटल खुलवा कर दूध या कुच्छ मिठाई खिला देते. मुझसे बेटी का तकलीफ नहीं देखा जा रहा था. आखिर इसमें इस छोटी सी बच्ची का क्या कसूर.   मैंने दुबारा इनसे कहा कि माँ बाबूजी से बात करके घर का ज़रूरत का कुछ सामान ले आते है. इन्होंने मुझे दुबारा सख्त मना कर दिया. ‘देखते जाओ अभी, यह लोग और क्या क्या करते हैं.’ बच्ची की परेशानी मुझसे देखी नहीं जा रही थी. मैंने कहा ऐसे तो मेरी बेटी मर जाएगी. आप मुझे नैहर भेज दीजिये, वह नहीं माने क्योंकि बेटी के बिना एक मिनट नहीं रह सकते थे. मैंने कहा- ‘ठीक है, फिर सिनेमा से जो इतना पैसा कमाते हैं उसमें से कुछ दीजिये. आखिर इस पैसे पर इस बच्ची का भी हक है.’ यह बोले – ‘बिलकुल नहीं.’ और रोज सिनेमा की जो कमाई होती श्यामलाल बाबा (जो हमारे घर के सबसे भरोसेमंद, पुराने और बुजुर्ग नौकर थे) के हाथों घर भिजवा देते. कई बार शायमलाल बाबा भी गुस्सा करते- ‘बड़े बाबु आप सही नहीं कर रहे हैं तनिक बच्चा का मुंह देखिये.’ लेकिन भट्ट जी अपने सिद्धांतो से कहाँ हटने वाले थे. उन्होंने मुझे भी सास-ससुर के घर जाने से सख्त मनाही कर दी.

देखते देखते छह महीने बीत गये. मेरे गांव की एक बेटी की शादी नवादा में ही हुई थी. उसका बाप अपनी बेटी से मिलने आया था. वह आदमी मेरे घर भी आया. हमारी दशा देखकर जाकर मेरे बाबूजी को बताया. बाबूजी तुरंत भागे आये. पहले तो मुझे जी भर कर डांटा कि मैंने उन्हें कुछ क्यों नहीं बताया. बाद में मेरे ससुर जी से बात की. उन्होंने साफ़-साफ़ कहा कि- ‘समधी जी, आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी. आपको तो मैं विद्द्वान समझता था. इतने सालों बाद मेरी बेटी को एक बच्चा हुआ है और आप ऐसा कर रहे हैं आपको अपनी फूल सी मासूम पोती पर भी तरस नहीं आया.’मेरे ससुरजी ने जवाब दिया- ‘यह मेरे घर का मामला है. जब मेरा बेटा-बहु कुछ नहीं बोल रहा तो आप कौन होते हैं.’

उस समय मेरे दादा ससुर जी का २५ करोड़ की सम्पत्ति थी. पर ना भट्ट जी ने माँगा और ना मेरे ससुर जी ने दिया. फिर इमरजेंसी में यह जेल चले गए मैं अकेली छोटी सी बच्ची को लेकर वहां क्या करती. इसलिए नैहर चली आयी लेकिन वहां भी कितने दिनों तक रहती. भट्ट जी का कहीं कोई पता नहीं. मायके में एक बड़ी भाभी और और एक छोटी भाभी थी. मैंने बाबूजी से कहा- मुझे जाने दीजिये. परायी घर की भाभियाँ हैं. कब तक यहाँ रहूँगी, उन्हें बोझ लगूंगी. आप मुझे जाने दीजिये. जो भाग्य में होगा, देखेंगे. बाबुजी  मुझसे बहुत नाराज़ हुए. –जब तक मैं जिंदा हूँ किसी को भी कुछ बोलने का हक नहीं है. भट्ट जी का कहीं कुछ पता नहीं है. छोटी सी बच्ची को लेकर वहां जाकर क्या करोगी? कैसे  रहोगी?’

अब जो होगा, जैसे भी हो हम वहीँ रहेंगे. अपना घर अपना होता है, भाभी लोग कुछ बोले ना  बोले. मन में तो सोचेगी. मेरी क्या इज्जत रहेगी अगर मैं पूरी जिंदगी यहीं बैठी रहूंगी.गांव-समाज भी चार बातें बनायेगा. किस किस का मुंह पकड़ेंगे आप. जाने दीजिये बाबूजी. दादी ने भी मुझे समझाया, कि बहुत छोटी बच्ची है. कम से कम दामाद बाबु का कुछ पता चले तो चली जाना. लेकिन मेरा मन नहीं लग रहा था. भट्ट जी को चिट्ठी लिखने की भी आदत नहीं कि पता लगे की जेल में हैं कि भूमिगत हैं. खैर मैं जिद्द करके वापस नवादा आ गई. बाबूजी से कहा अगर आप मेरी मदद करना चाहते हैं तो मुझे एक सिलाई मशीन दे दीजिये. मैं सिलाई करके कुछ कमा लूंगी.    बाबूजी मेरी बात मान गए. उन्होंने एक सिलाई मशीन खरीद कर दे दी और हम वापस नवादा आ गए. साथ में चावल, दाल, चुड़ा. बड़ी, सब खाने का सामान भी भिजवा दिया. बाबूजी अपने जीते जी हमेशा खाने का पूरा सामान और कपडे हर त्योहारों पर भिजवाते रहे.

बेटी असीमा के साथ सुरेश भट्ट

नवादा आकर हम मुह्ल्ले की एक गरीब विधवा चाची थी, उसे साथ लेकर घर घर जाकर लोगों से सिलाई का कपडा मांग कर सिलाई करने लगे. जब यह बात मेरे ससुर जी को पता चली तो उन्हें लगा की इस तरह से उनके घर की बहू दूसरों का सिलाई करके गुज़ारा करेगी तो उनकी इज्ज़त जाएगी. गुस्से में आकर उन्होंने मेरे घर की बिजली कटवा दी. हम उनसे कहने गए कि बाबूजी बिजली कट गई है. अकेले बच्चे को लेकर अँधेरे में रहने से डर लगता है. वे बोले तो “हम क्या करें.”सास से मैंने कहा – ‘मायजी आप ही कुछ समझाइये ना बाबूजी को. एकदम वीरान है चारो तरफ. उस समय सिनेमा के आस-पास कुछ भी नहीं था. एकदम शहर से बाहर सिनेमा हॉल  था और पीछे नदी. जब तक सिनेमा चलता रौनक रहती. उनके बाद चारों तरफ सायं सायं करता. हम अकेले बच्चे को लेकर रात भर हनुमान चालीसा जपते हुए गुजार देते. एक बार श्यामलाल बाबा से बोले – बाबा बहुत, डर लगता हैं आप यहीं सोया कीजिये. और तब से वे वहीं मेरे घर के नीचे ठीक दरवाज़े के सामने सोने लगे. जब तक वो जिंदा रहे, वहीं सोते रहे. कई बार उन्हें गुस्सा  आता तो जाकर मेरे ससुरजी से झगड़ा करते. ‘वे भी इसी घर की बहु है. इज्जत है इस घर की,  लाज है आपकी. ब्याह कर लाये हैं ना आप. वो खुद उठ कर नहीं चली आई है कहीं से, आप जो इस तरह कर रहे हैं ठीक नहीं हैं. भगवान सब देखता है. यह शनिचरी (मेरी सास के बारे में) की वजह से जो आप पागल हो गए हैं. यह शनिचरी सबको खा जाएगी. देख लीजिये. सबको बरबाद कर देगी एक दिन.’मेरी सास ने साफ़ मना कर दिया कि बाबूजी से बात नहीं करेगी. वे बोली. वो क्या मेरा कहना में हैं?  .
सच तो यही था कि ससुरजी वही करते जो वो कहती थी, एक तरह से वो पत्नी के हाथ की कठपुतली बनकर रह गये थे. मेरी सास को लगता बेटा (भट्ट जी) इधर-उधर भागा ही रहता है या जेल में ही रहता. वे किसी दिन इसी तरह पुलिस की गोली से मारा जायेगा. यह अपने बच्चे के साथ जाकर नहरा में रहे. यहाँ रहेगी तो हिस्सा मांगेगी. और इस वजह से उन्होंने मुझे मेरे बच्चों के साथ उस सिनेमा के केबिन से निकलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कभी घर में चोरी करवा देना, कभी घर का सामान उठवा कर सडक पर फिकवा देना. एक बार मेरे घर में चावल दाल था, जो मेरे भाई पंहुचा गए थे. पूरा का पूरा बोरा उठवा कर सडक पर फेंकवा दिया. सडक पर बालू ही बालू था. इस चिंता में की बच्चे क्या खायेंगे. यह तो मेरे बच्चे का अन्न है. मैं पागल की तरह उस रेत में चावल और दाल चुनने की कोशिश करने लगी. लेकिन सब बर्बाद हो चूका था कुछ भी हाथ नहीं लगा. यह सब मेरे ससुरजी को पता था लेकिन वो सब जानकर अंजान बने रहते. भट्ट जी के साथी (कामरेड) कभी-कभार हमारा हाल जानने-पूछने आ जाते हम उनसे रो रो कर पूछते की भट्ट जी कहाँ हैं? लेकिन वे कुछ नहीं बताते. सिर्फ इतना कहते कि आ जायेगे. हां. यदि भट्ट जी जेल में होते तो कभी कभी हमें जेल मिलाने ले जाते. लेकिन ज्यादातर तो क्रांति ही जाती थी क्योंकि भट्ट जी क्रांति को जेल में भी याद करते थे इसलिए  क्रांति को भी डर नहीं लगता. वो आराम से उन लोगों के साथ ‘गया सेन्ट्रल जेल’ या हजारीबाग जेल चली जाती थी और शाम तक वापस भी आ जाती थी. वे लोग भी बताते थे कि कभी इसने किसी को रस्ते में तंग नहीं किया. हाँ, एक-दो बार रास्ते में जूता खोकर चली आती थी. बच्ची  थी. रास्ते में थक कर सो जाती थी. और नींद में ही कहीं जूता पैर से गिर जाता था. वे लोग भी ध्यान नहीं दे पाते. पर मैंने बेचारी को कई बार बहुत मारा. गरीबी में किसी तरह सब कुछ जुटाना और एक भी चीज़ खो जाये तो इस तकलीफ़ में कि नया कहाँ से आयेगा. झुंझलाहट होती थी.
एक बार की बात है जब हम साथ रहते थे यानि घर नहीं बंटा था. मेरे ससुरजी बनारस से मेरी सास के लिए दो साड़ी लेकर आये. उन दिनों हिन्दी सिनेमा में अक्सर नूतन, मीना कुमारी और वहीदा रहमान लाल बाॅर्डर और आंचल की साड़ी पहनती थी. मुझे खूब पसंद थी. मैंने सास से कहा  – ‘माय जी मुझे इसमे से लाल आंचल बाॅर्डर वाली साडी बहुत पसंद है. एक हमको दे दीजिये ना.’  वो बोली – ‘हम दोनों साड़ी में आग लगा देंगे लेकिन तुमको एक  नहीं देंगे.’

मैं मन मार कर रह गई, जब बड़ी बेटी क्रांति पटना आज अखवार में कमाने लगी तो ठीक वैसी ही साडी मुझे उसने दुर्गा पूजा पर लाकर दिया और कहा – “माँ, तुम यही साड़ी पहनकर पूजा करोगी.”बात तब कि है जब बड़ी बेटी क्रांति और बेटा प्रकाश (विप्लव) दोनों बाल भारती स्कूल में पढ़ते थे. क्रांति तीसरी में थी और प्रकाश दूसरी कक्षा में. दोनों के स्कूल के दो महीने की फीस  बाकी हो गयी थी. मास्टर ने दोनों बच्चों को पूरे स्कूल के सामने बुरी तरह बेंत की छड़ी से मारा. दोनों भाई-बहन रोते रोते घर आये. बच्चों का हाल देखकर मैं एकदम घबरा गयी. दोनों का हाथ पकड़ा और वैसे ही दोनों को लेकर ससुरजी के घर भागी. दोनों भाई-बहन की पीठ पर बेंत के लाल गहरे निशान पड़ गए थे. दोनों बच्चों के कपड़े उतार कर ससुरजी को दिखाया, देखिये बाबुजी. आप के जीते जी सिर्फ बीस रुपए के लिए आपके पोते-पोती को कैसे जानवर की तरह पीठ फाड़ कर पीटा गया है. तो उनका जवाब था – ‘यहाँ हमारे पास लेकर क्यूँ आयी हो, हमने कहा था बच्चा पैदा करने. बाप कुत्ते की तरह पैदा करके भाग गया तो हम क्या ठेका लिए हैं. पढ़ाई-लिखाई छोड़वा दो. पढ़ लिख कर क्या करेगा. चीनियाबादाम खरीद के दे दो. फुटपाठ पर बैठकर बेचेगा तो २ रुपया भी कमाएगा.

उस दिन के बाद से हमने कभी ससुरजी के घर पर पैर नहीं रखा और सोच लिया चाहे जो हो जाये. अपने बच्चों की पढ़ाई कभी नहीं छोड़वाउंगी. तब से और भी रात-रात भर जाग कर सिलाई-बुनाई करने लगी ताकि कभी मेरे बच्चे ना भूख से सोये और ना कभी उन्हें स्कूल की फी की वजह से मार खानी पड़े.१९५५ के छात्र आन्दोलन में भट्ट जी सात साल की सजा में हजारीबाग जेल में थे. छह माह उन्हें बेड़ी हथकड़ी में रखा गया. जेपी आन्दोलन में पूरे दो साल ‘गया सेन्ट्रल जेल’ में बेड़ी-हथकड़ी के साथ सेल (मीसा) में रखा गया. कभी कभी उनसे जेल मिलने जाती तो, देखकर दिल दहल जाता था. मैं मुंह से कुछ नहीं कहती, उनकी हालत देखकर रोने लगती. तो हँसते हुए कहते- ‘अरे पगली, रोती काहे हो? मरे थोड़े हैं. देखो भगत सिंह को. वो कैसे देश के लिए शहीद हो गया. हम ऐसे थोड़े मरेंगे, देखना कईयों को मार के मरेंगे. और देश पर मरने वाले कई भगत सिंह पैदा करके मरेंगे.’
‘नगरपालिका कर्मचारी आन्दोलन’ में डेढ़ साल और ‘बिजली आफिस कर्मचारियों के आन्दोलन’ में करीब एक साल जेल में रहे. जेल से छूटने पर कभी कभी घर पर होते भी तो ना के बराबर. अक्सर उनके घर पर होने पर लोगों की भीड़ जमा रहती. सब अपने अपने काम की पैरवी लेकर घर पर भीड़ लगाये रहते. कभी बीडी-मजदूर, कभी रिक्शा मजदूर संघ के लोग तो कभी ईंट भठ्ठा मजदूर घर पर आ आकर दिन भर इनको घेरे रहते. और सबसे हंसकर बड़े प्यार से बात करते. लेकिन हमसे बात करने या बच्चों से बात करने की कभी फुर्सत नहीं. एक बार भी नहीं पूछा कि घर कैसे चलता है. बच्चे कैसे पढ़ते हैं.

असीमा अब मुम्बई रहती हैं

बहुत बार रोकर, प्यार से समझाने की कोशिश की. अपने घर और बच्चों पर भी ध्यान दीजिये. इन्हें बाप की कमी महसूस होती है. यह भी आपकी जिम्मेवारी हैं. मेरा ना सही बच्चे की कुछ तो परवाह कीजिये. लेकिन उनको कभी कोई फर्क नहीं पड़ा. हँसते हुए कह्ते. ‘हाँ ठीक है., मेरा तो पूरा हिंदुस्तान ही बच्चा हैं. जिस दिन दुनिया के तमाम बच्चे पढ़ लिख जायेंगे. भर पेट खायेंगे. उस दिन मेरे बच्चे का भी भविष्य सुधर जायेगा. इनको कायर मत बनायो. सिखने दो, दुनिया की तीन तिहाई आवादी कैसे जीती है. आलिशान महलों की तरफ मत देखों. जो लोग झोपड़े में रहते है उनको देखो. उनके झोपड़े में ना चूल्हा जलाने के लिए किरासन तेल हैं ना लालटेन जलाने के लिए.’उनके बहस और तर्क के आगे मेरा एक नहीं चलता था. कभी ना उन्होंने मेरी बात सुनी और ना समझी. हमेशा रोकर, चीख-चिल्लाकर रह जाती. और यह घर से बाहर निकल जाते. और पता चलता कि कभी मुसहर टोली में, तो कभी पासी के घर पर ताड़ी पीकर पड़े हैं. जो बच्चा घर में है, उसे भर पेट अन्न नहीं मिल रहा उपर से बाहर से किसी भी दूसरों का बच्चा ले आने को उतारू रहते. एक बार एक १० साल का बच्चा कहीं झरिया या बेतिया से अपने साथ ले आये और कहने लगे कि आज से यहीं रहेगा. मैंने पूछा तो कहा कि इसके माँ-बाप को नक्सलियों ने गोली मार दिया. अकेला बचा है. आज से यहीं रहेगा. क्रांति और विप्लव (प्रकाश का नाम उन्होंने विप्लव रखा था) के साथ पढ़ेगा. पानी-वाणी भर देगा. बाज़ार से तरकारी ला देगा. मैंने भी उसे घर में रख लिया, अब ले ही आये थे तो क्या करते. हमारे बच्चों के साथ रहने लगा लेकिन कुछ समय बाद खुद ही कहने लगा हमको चाय की दुकान पर काम मिल गया है और ५ रुपया भी मिल रहा है.

पीछे की नदी में कई बार बच्चा फेंका हुआ इनको पता चलता तो ये सबसे पहले बच्चे को बचाने पंहुच जाते. लेकिन अक्सर बच्चा मारा हुआ पाया जाता. एक बार जाडे की रात में एक छोटी सी बच्ची घर के ठीक पीछे ही नदी  के पास सरकंडे की झाड में पड़ी थी. मुंह अंधेर हल्ला होने लगा कि कोई बच्चा है… कोई बच्चा फेंक गया है. यह तुरंत भागे. माचिस और नेवार लेकर. बच्ची को आग जलाकर सेंका शायद साँस चल रही थी. बच्ची को गोद में लेकर भागे हास्पिटल. वहां डाक्टर ने बताया कि रात भर की ठंढ से सिकुड़ कर बच्ची ने दम तोड़ दिया. उसके बाद उन्होंने ही अपने हाथों से बच्ची को कफन लाकर दफनाया. कई दिनों तक दुखी रहे कि बच्ची को बचा नहीं सके. अक्सर मुझसे कहते कि एकदम क्रांति जैसी थी ना . यहाँ तक कि क्रांति को भी कह दिया कि उसे उन्होंने उस्सी नदी के नाले में पड़े हुए पाया है कई दिनों तक क्रांति रोती रही. फिर मैंने ही डान्टा- ‘क्यों बच्चे को उटपाटांग बाते दिमाग में घुसाते हैं’ तो ऊपर से कहने लगे देखना एक दिन इसके ढेर सारे भाई-बहन ला देंगे. जितने भी आनाथ और बेघर बच्चे हैं सबको ले आयेंगे और एक आश्रम खोलेंगे- ‘अभय आश्रम’.

1978 की बात है, एक बड़ी बस भरकर विदेश से लोग आये थे, जिसमें मर्द-औरतों दोनों थे. सब मुझसे हाथ मिलाने के लिए बढ़ाते और मैं हाथ जोडकर सबको नमस्कार करती. औरतें गले मिलती. मुझे बड़ी शर्म आ रही थी. सिनेमा के प्रांगण में ही शाम से लेकर सुबह तक मीटिंग चली. भट्ट जी ने एक घंटे से ऊपर अंग्रेजी में ज़ोरदार भाषण दिया. उन्हें देखकर कभी ख़ुशी होती थी कभी अपनी हालत पर तकलीफ. शहर के बहुत बड़े-बड़े लोग जमा हुए थे. सबका खाना-पीना सब सिनेमा के मैदान में ही चला. सबलोग बहुत खुश लग थे. काफी लोग बंगाल और केरल से भी आये थे. सब मुझसे आकर आकर मिलते और मुझे  इज्जत दे रहे थे. मुझसे कहते कि हमे सुरेश भट्ट जैसे अपने नेता पर गर्व है. आपको भी होना चाहिए. मैं हाँ-हाँ में सर हिला देती. क्या कहें, कोई मेरी बात समझने वाला नहीं था.

कई बार हमारे घर नागार्जुन, फनीश्वरनाथ रेणु, राजकमल चौधरी, लाल धुँआ, कैलाशपति मिश्र, जार्ज फर्नांडिस, जाबिर हुसैन भी आते थे. कई और भी लोग जो उस समय के बड़े-बड़े मंत्री और सांसद थे. नागार्जुन और फनीश्वरनाथ रेणु को हम नहीं जानते थे कि वो देश के इतने बड़े लेखक हैं. वो बहुत बाद में मेरी बड़ी बेटी ने बताया कि वो दोनों पूरे देश में जाने जाने वाले बड़े लेखक हैं. हमसे वे दोनों बहन की तरह मिलते थे. उन्हें मेरे साथ चौका में बैठकर मेरे काम में हाथ बटाना अच्छा लगता था. मैं रोटी बनाती तो वे लोई बनाने लगते. दोनों को मछली बड़ी पसंद थी. मेरे हाथ की बनी मछली बड़े मज़े से खाते. बिलकुल ग्रामीण औरतों की तरह पारवारिक बातें करते. गीत गाते. रेणु जी के बाल बड़े सुंदर और चमकीले थे. वे अपने बालों का पूरा ध्यान भी रखते. और भी कई बड़े-बड़े साहित्कारों का ताँता लगा ही रहता. घर में कुर्सी के आभाव में मैं ज़मींन पर ही चादर बिछा देती. मुझे शर्मिंदगी भी होती कि इतने बड़े बड़े लोग हैं और ज़मीन पर बैठेंगे?. पर वे लोग घंटों वैसे ही बैठे कहानी-कविता का पाठ करते. जोर जोर से बातें करते. हंसी-ठहाका लगाते. घर में जो बना होता वही मांग कर खा लेते. कई बार सूखी रोटी प्याज़ बड़े प्यार से खा लेते. मैं सोचती भी ऐसे कैसे खायेंगे, जल्दी कुछ बना दें पर भट्ट जी मुझे मना कर देते. –‘अरे ज्यादा कुछ मत करो. जीने के लिए खाते हैं. खाने के लिए नहीं. जो है, वही लाओ दो’. और वहीं पुराने अख़बार पर रोटी.प्याज़-नमक-मिर्च धरकर सब मिल बाँट कर खा लेते और फिर धंटों वैसे ही बहस चालू रहते.

एक बार भट्ट जी बहुत सालों बाद जेल से छूटकर घर आये थे, इसलिए उनसे मिलने उनके खास दोस्त अनंत कुमार राय आये. रात काफी हो गई थी और भट्ट जी तब तक घर नहीं पहुंचे थे. वैसे भी नवादा में रहकर भी भट्ट जी के पैर घर में नहीं टिकते थे. मैं बोलती भूकती, कि सालों बाद घर लौटते हैं तो ज़रा घर पर भी पैर टिकाईये. उनका बस एक ही जवाब होता- ‘इतना दिन बाद बाहर आये हैं तो ज़रा बाहर का भी माहौल समझने दो.’ अनंत राय ( भाय जी ) हमारी शादी में बाराती बनकर भी गये थे. हमारे घर और हमारे बाबूजी का ठाट-बाट देख चुके थे. वे जानते थे कि हम कितने बड़े ज़मींदार परिवार से आते हैं. हमारी बेटी को जमीन पर सोते देखकर बहुत भड़के. गुस्से से तमतमा कर वहीं ज़मीन पर बैठे रहे कि जब तक भट्ट जी नहीं आयेंगे, तब तक वो नहीं जायेंगे. भट्ट जी काफी देर से लौटे. आनंत भाय जी ने उन्हे बहुत डान्टा. बहुत बुरा-भला कहा लेकिन भट्ट जी बस हँसते रहे. उन्हें किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था. असल में वो इससे इतमिनान रहते थे कि मेरे नेहरा से सबकुछ आ ही जाता है. जब तक बाबुजी और दादी जिंदा रही. खेती का सारा सामान रहे भेजते रहे. दादी मुझे और बच्चों को बहुत मानती थी लेकिन ना अब दादी है ना बाबूजी. तीन भाई हैं. सब का अपना परिवार हैं. सब नाती-पोते वाले हो गए और सब वहीँ झारखंड में दुमका-गोड्डा में बसे हैं.

भट्ट जी स्वतंत्रता संग्राम आंदोंलन में भी अपने कम उम्र में ही दो साल जेल में रहे लेकिन कभी अपने जीते जी ना स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन लिया और ना ही जेपी आन्दोलन वाला पेंशन.लालू यादव, नितीश कुमार, जार्ज फर्नांडिस, सी.पी. ठाकुर, शिबू सोरेन, यह सब भट्ट जी को अपना रानजीतिक गुरु मानते थे और गुरु जी कहके बुलाते थे. उसके बावजूद नितीश कुमार कहते हैं कि –‘किसको-किसको पेंशन दें, भेड़िया से ज्यादा गरेडिया हो गया है.’ शायद नीतीश जी को पता नहीं कि भट्ट जी अगर घर छोडकर समाज सेवा में नहीं रमते तो कम से कम वो खुद २५ करोड़ सम्पत्ति के मालिक होते. जिस आदमी ने अपना सारा जीवन सामाजिक काम में होम कर दिया वैसे आदमी की विधवा को कोइ भी पेंशन ना देकर नितीश जी खुद अप्रतिष्ठित हो रहे  हैं. समाज के नाम पर जिस सुरेश भट्ट ने अनेकों बार खून बहाया, गोली खायी, लाठी खायी. आज कोई समाज और प्रशासन नहीं देखने वाला कि आज मेरे साथ  मेरे घर में और हमारे बच्चों के साथ क्या हो रहा है. यह समाजसेवा किस काम आया. मेरा सौतेला देवर साल में १०-२० लाख रूपये सिर्फ गुंडों और पुलिस को खिलाता है. सारी सम्पत्ति हडप कर बैठा है. उसने मेरे देवर (भट्ट जी के छोटे भाई नरेश भट्ट) के दो बेटों की हत्या करवा दी. यह बात पुलिस भी जानती है और पत्रकार भी. लेकिन सब के सब रूपये की ताकत के आगे चुप हैं. एक बार मेरे बेटे प्रकाश पर जब वह सिर्फ ७ साल का था बम फेंकवा दिया. बुरी तरह जख्मी हुआ मेरे पिताजी आये और उसका इलाज करवाया. किसी तरह बच गया. फिर पिताजी उसको साथ ही ले गये. वो जानते थे कि यहाँ रहा तो फिर इस पर हमला होगा. वो १६ साल नानीघर में ही रहा और अपनी पढ़ाई पूरी करके जब वापस आया तो फिर कई बार उस पर  अलग अलग तरीके से हमला करवाया गया. वो अपने रास्ते में आने वाले सबको खत्म कर देना चाहता है. भट्ट जी ने अपनी पत्नी और बच्चों को इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया कि आज मेरा दुःख समझने वाला कोई नहीं है.

इतिहास का अंधकूप बनाम बंद गलियों का रूह -चुह : गया में यौनकर्म और यौनकर्मी : अंतिम क़िस्त

संजीव चन्दन 


( यह आलेख २००९ में एक शोध के सिलसिले में किये गये केस स्टडी का एक हिस्सा है :दो किस्तों में प्रकाशित , अंतिम क़िस्त  ) 

“यद्यपि गया का रेड लाइट एरिया शहर के केन्द्र में टावर चैक के समीप बसा है। इसकी मौजूदगी आज भी है और कल भी थी, लेकिन ‘कल’ के इतिहास को व्यक्त करता कोई दस्तावेज नहीं है। तमाम दूसरे स्थानों, क्षेत्र अथवा राज्यों की तरह मगध और गया का इतिहास भी राजा-रजवाड़ों की सामारिक गतिविधियों से भरा है या फिर आजादी के पूर्व और बाद तक के सिलवटों से भरा है इतिहास। यौनकर्मियों का इतिहास! इतिहास नहीं; स्मृतियों, अफवाहों और गप्पों से टूट-बिखरकर इतिहास लायक जो कुछ भी है-समझा जा सकता है वही इतिहास हो सकता है इनका।”

पहली क़िस्त को पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें :

( इतिहास का अंधकूप बनाम बंद गलियों का रूह -चुह : गया में यौनकर्म और यौनकर्मी : पहली क़िस्त ) 



इनसे मिलते हुए जो सवाल थे मेरे मन में वे क्रमशः इस प्रकार थेः-

1. फुर्सत के वक्त
क.अंतराल
ख.दिवस-भाग
2. फुर्सत के क्षणों में क्या करती हैं ?
3. समारोहों में भागीदारी
क. रूचि
ख. किस समारोह से विशेष लगाव है
4.सबसे तीव्र इच्छा, जिसे करने का मन करता हो?
5. क्या ईश्वर में आस्था रखती है?
6. क्या देवालय गयी हैं?
7. यदि नहीं तो क्या जाने की इच्छा होती है?
८. आपस में एक-दूसरे से किन-किन अवसरों पर मिलती हैं?
9.एक-दूसरे को किस प्रकार संबोधित करती हैं? आदि।

अधिकांश मामलों में ये स्त्रियाँ  आस्थावान हैं-ईश्वर आपसी साहचर्य, परिवार और निजी संबंधों के प्रति आस्थावान हैं-काम, जो वे कर रही हैं, वह उनका चुनाव भी है और मजबूरी भी, कुछ हद तक विकल्पहीनता एक कारण है। थोड़ा अफसोस है, परंतु कुंठा नहीं, अपराध बोध नहीं। अवकाश इन्हें भी नहीं है, तो इनका सवाल है कि क्या घर की महिलाओं को है! वे भी सब करती है, जो हम कर रहे हैं, रेखा ऐसा मानती है। इन्हें न तो अपने यौनकर्मी होने पर अपराध महसूस होता है और न स्त्री  होने का अफसोस ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजौ’ से इनका बहुत इतफाक नहीं है।

गया का मंगलागौरी मंदिर , कहते हैं यहाँ सती का स्तन कट कर गिरा था

मंटो उद्धरणीय हैं, (अवकाश का संदर्भ) ‘‘मेरे पड़ोस में कोई औरत हर रोज अपने खाविंद से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए जर्रा बराबर हमदर्दी पैदा नहीं होती। लेकिन जब मेरे पड़ोस से कोई और अपने खाविंद से लड़कर और खुदकुशी की धमकी देकर फिल्म देखने चली जाती है और मैं खाविंद को दो घंटे सख्त परेशानी की हालत में देखता हूं तो मुझे दोनों से एक अजीब व गरीब किस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है।’’ ।
यौनकर्मियों को अवकाश है ही नहीं-न वीकेण्ड का कोई संदर्भ और न काम के घंटों का कोई निर्धारण!

नागरिक भूमिका :(नागरिक अधिकार एवं भागीदारी तथा राजनीतिक जागरूकता)

नागरिक के रूप में यौनकर्मियों ने अपनी भूमिका बनायी है।
नगर बंधुओं के भवन नगरों के राजनीतिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र हुआ करते थे। लखनऊ की तवायफों ने नवाबों को तहजीब सिखलाये और स्वतंत्रता संग्रामों में बागियों को शरणगाह  भी उपलब्ध करवाये। बिहार के लोक गायक महेंद्र मिश्र और उनकी राजनीतिक गतिविधियों की खैरख्वाह मुजफ्फरपुर की वेश्याएं भी मानी जाती है। अनामिका ने अपने उपन्यास ‘तिनके-तिनके पास’ में मुजफरपुर (बिहार) के कोठों की राजनीतिक सक्रियता का उल्लेख किया है, ‘‘जीवन का रस और मजा तो संघर्ष की धार में है। यह उसकी मां ने उसे घुट्टियों में पिलाया था और मां की नानी, ढेलाबाईको उसकी नानी अफसाना बेगम ने , जो  1857 के गदर में अपने आशिक पीरजी घसियारे की नृशंस हत्या के बाद दिल्ली से बचती-बचती कानपुर आयी थीं और कानपुर से मुजफ्फरपुर…मुजफ्फरपुर में क्रांतिकारियों की शरणस्थली उनका कोठा रहा। एक अर्से तक क्रांतिकारी वेश्याओं का एक अखिल भारतीय मुखपत्र भी वहां से निकालती रहीं… पंडिता रमा बाई ने जब पुणे में ‘शारदा सदन’ खोला-वेश्याओं के गुरू जनकवि महेंद्र मिश्र की पहल पर उनकी नवासी, ढेलाबाई वहां ठुमरी-शिक्षिका भी नियुक्त हुई।’’

यौनकर्मियों के नागरिक भूमिका की वर्तमान स्थिति को मैंने उनके अधिकारों और उनकी जागरूकता, भागीदार आदि के खांचे में देखने का प्रयास किया है। मेरे दायरे में उनका वोट करना, उनकी पसंद की  पार्टी और पसंदगी का आधार, टैक्स, बी.पी.एल. सूची, राशन कार्ड आदि थे। साथ ही यौनकर्मियों को लायसेंस दिये जाने के आंदोलनों (? ) आदि के प्रति उनकी जागरूकता भी जानना शोध  के उद्देश्य में था।

मातृदेवी

गया से यौनकर्मियों के सदस्यों के बीच से एक जन प्रतिनिधि मुन्नी देवी 2005 में म्युनिसिपल काउंसिल में वार्ड सदस्य चुनी गयी। यद्यपि यौन कर्मियों के बीच उनके रिश्ते आज भी कायम हैं, परंतु वह वर्षों पहले एक दबंग बाहुबली की पत्नी हो चुकी थीं, इसलिए इस राजनीतिक प्रतिनिधित्व को पूरी तरह रेडलाइट एरिया के खाते में नहीं डाला जा सकता। खानगी से जुड़ी स्त्रियाँ  चूंकि लायसेंस धारक नहीं है, अतः बहुसंख्य स्थितियों में वे चुनावों में वोट नहीं डालतीं। कोठों पर लड़कियां आती जाती भी रहतीं हैं। इसलिए अधिकांश का वोटर लिस्ट में नाम भी होने का सवाल नहीं है। इनके पास न तो राशनकार्ड है और नहीं बी. पी. एल सूची में इनका नाम, यद्यपि इस एरिया को स्लम के तौर पर रखा जाता है।

लाइसेंस धारी नर्तकियां वोट डालती हैं। भाजपा और कांग्रेस जैसे राजनीतिक पार्टियां ही इनकी पसंदीदा पार्टियां हैं, यद्यपि स्थानीय कम्युनिस्ट नेता (मुस्लिम) की भी इनके बीच पैठ है। वे इनके मददगार भी साबित होते हैं। वोटों को स्थानीय विधायक मुन्नी देवी तथा दूसरे अन्य कांग्रेसी एवं कम्युनिस्ट नेता प्रभावित करते हैं।
इनमें से कई लड़कियों को यौनकर्म के लिए उठ रहे लायसेंस की मांग का पता नहीं है। परंतु कुछ इस आंदोलन से वाकिफ भी हैं। यद्यपि कोई भी लड़की मुझे ऐसी नहीं मिली जो ऐसे किसी आंदोलन में भागीदार हो। छोटे शहरों के रेडलाइट में रहनेवाली स्त्रियों  को अपने इन मुद्दों का बहुत पता नहीं है। पूरी तरह समझाने पर वे लायसेंस दिये जाने के पक्ष में ही अपना बयान देती हैं।

राजनीतिक पार्टियों के बड़े मुद्दों की भी इन्हें बहुत जानकारी नहीं है। यद्यपि बड़े राजनेताओं के नामों से वे वाकीफ  हैं, कुछ एक को छोड़कर पूरी उदासीनता के साथ। 2002-2004 के बीच गया के एक जिलाधिकारी की पत्नी ममता महरोत्रा, समाजसेवी रेणुका पालित आदि ने मिलकर इनके बच्चों के शिक्षण का कार्यक्रम चलाया था, परंतु कुछ तो ममता महारोत्रा के पटना डी.ए.वी. में शिक्षिका और इंचार्ज हो जाने के कारण और कुछ उचित मैकेनिज्म के अभाव में यह सिलसिला बहुत दिनों तक नहीं चल पाया।

स्पष्टतः इन यौनकर्मियों को न तो पूरी तरह नागरिक अधिकार प्राप्त हैं और न ही उनकी नागरिक भूमिका सक्रिय रूप से बन पाती है। ऐसी स्थिति में वे राष्ट्र के सबसे उपेक्षित और अलक्षित समूह हैं। इनके बीच कार्यरत गैर सरकारी सामाजिक संस्थान बिना किसी विशेष हस्तक्षेप के अधिकांशतः कंडोम उपलब्ध कराने की भूमिका भर ही निभा पाते हैं, एड्स और अन्य संक्रामक बीमारियों की जानकारी और उनसे बचाव की ट्रेनिंग देने के अलावा।

आंतरिक आवाजें: आत्मकथ्य और आह्वान 


यौन-बाजार में काम करने वाली स्त्रियां इस बाजार के उपभोक्ताओं को अथवा इससे बाहर रहने वाले लोगों की  दया या उपेक्षा की पात्र प्रतीत होती हैं। साहित्यकारों की अपनी दृष्टि है, सुधारकों की अपनी। फिल्मकार कुछ और कहते हैं, नीति नियंता कुछ और। शरत्चंद का देवदास चंद्रमुखी को, जो कि नर्तकी है, गणिका है, को पतिता समझता है, वहीं आश्रय पाता है और चंद्रमुखी बिना किसी सेल्फ (स्व) के उसके प्रति न्यौछावर है, बलिदानी  भूमिका में . फिल्मों में वेश्याएं नायक के प्रति उदात्त भाव से भरी, उस पर न्यौछावर तथा हरदम बलिदान को तत्पर होती हैं या उद्धारक के प्रति प्रस्तुत। अमृतलाल नागर के ‘ये कोठे वालियाँ’ में उल्लिखित स्त्रियां गलीज जिन्दगी जी रही हैं, पतित हैं और पारिवारिक स्नेह, पुरुष-प्रेम के लिए उत्कंठ रहती हैं। लेखक स्वयं भी उनके प्रति दयार्द्र हैं। लेकिन अनामिका की ‘तिनके-तिनके पास’ की नायिका एक कालगर्ल है, सुशिक्षित है, नृतत्वशास्त्र की शिक्षिका रही है, साहित्य, दर्शन और राजनीति की समझ रखती है. आत्मग्लानि से मुक्त है वैसे ही, जैसे मंटो की कहानियों में ‘काली शलवार’ की नायिका या ऐसी ही उनकी अन्य कहानियों की नायिका, जो ‘ठंडे गोश्त’ में तब्दील होकर भी अपने ‘स्वत्व’ को जीवित रखती है।

यौन कर्मियों के लिए समाज का मानस बनाने में शब्द, भाषा और साहित्य की बड़ी भूमिका है परंतु स्वयं यौनकर्मियों का आंदोलन और उनकी आवाजें ऐसी किसी भी ‘निर्मिति’ के खिलाफ हैं, या अपने प्रति दया या उद्धार अथवा घृणा के भाव को नकारती हैं।आंदोलनों ने  विभिन्न माध्यमों से , आपसी संवादों से  स्वयं इस पेशे से जुड़ी स्त्रिायों  को अपराध-भाव से मुक्त किया है। यही कारण है कि पढ़ी-लिखी लड़कियाँ या काॅलेज में पढ़ाती स्त्रियाँ  इस पेशे का चुनाव करती हैं, घोषणा भी करती हैं, किसी भी प्रकार की कुण्ठा से रहित। बल्कि प्रायः प्रयासरत भी हैं कि उन्हें अनैतिक , पाप-लिप्त अथवा असामान्य न समझा जाए।

जेनेट, जो कि नृतत्वशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं तथा साथ ही काल-गर्ल का पार्ट टाइम काम भी करती रही हैं, लिखती हैं , ‘ सुनो! काॅल गर्ल्स  मूल्यों का आदर करती हैं, उनके भी मूल्य होते हैं। हम भी अपने धर्म और नैतिकताओं से प्रेरित होकर वैसे ही निर्णय लेते हैं, ‘रिपब्लिकन’ हो सकती हैं या ‘डेमोक्रेट’ हो सकती हैं या समाजवादी अथवा उदारवादी। हममें से कुछ जानवरों से मुहब्बत करती हैं। हम भी विश्वास हासिल करती हैं और हम रहस्यों  को गुप्त रखना भी जानती हैं। हम बेटियाँ हैं, बहनें हैं, माँ अथवा पत्नियाँ हैं। सच्चाई है कि पुरुषों को हमारी जरूरत है और वे इस जरूरत से मुक्त भी होना चाहते हैं। वे हमें दोषी ठहराते हैं .  यही कारण है कि मुस्लिम महिलाएं पुरुषों से परदा करती हैं। यही कारण है कि ‘वेश्याएँ’ अनैतिक होती हैं, क्योंकि उनका काम हर इंसान के भीतर अवस्थित उस ‘अनैतिक’ को संतुष्ट करना है अतः अपनी निर्मितियों पूर्वग्रहों को खत्म करो। थोड़ी देर के लिए ही सही, अपने अपराधबोध, पूर्वग्रहों तथा अपने मूल्यांकनों को परे रख दो, तभी हमारी कहानी तुम सुन सकते हो, समझ सकते हो।’

किसी अपराध बोध से मुक्ति की स्थिति यह है कि 2008 में 22 वर्ष की  स्त्री -अध्ययन की एक छात्रा, नेटेल डायलन (छद्म नाम) ने खुलेआम अपने ‘कौमार्य की बोली लगवायी। वह कैलिफोर्निया की रहने वाली है। उसने स्त्री -अध्ययन में स्नातक किया है तथा ‘विवाह और परिवार चिकित्सा’ में स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए अपने ‘कौमार्य’ नीलाम करने की घोषणा की। उसकी बहन भी अपनी पढ़ाई के लिए ‘चकलाघर’ में काम करती है। इस नीलामी के साथ उसने घोषणा की, ‘‘मैंने अपने नाम को अपनी सुरक्षा के लिहाज से गुप्त रखा है, वह किसी नैतिक बोध की शिकार नहीं है तथा अपने निर्णय से खुद को शक्ति संपन्न महसूस कर रही है। मैं नहीं समझती कि मेरे कौमार्य की नीलामी मेरी सारी समस्याओं का हल है, परंतु इससे थोड़ी आर्थिक स्थिरता तो आयेगी ही। हम पूंजीवादी  समाज में रहते हैं, तो क्यों नहीं कौमार्य का मैं पूंजीकरण करूं।’  किसी ग्लानिबोध से मुक्त  यह 21वीं सदी के ‘कार्ल-गर्ल’ का आत्मविश्वास बोल रहा है।

बारबरा मेरा नाम की एक काल-गर्ल अपने लेख में समय के इस हिस्से में यौन बाजार में कार्यरत स्त्रियों  का मनोभाव व्यक्त करती है। वह काम के शुरुआत की झिझक, अनुभवहीनता से प्रेरित होकर काम की पूरी संलग्नता तक का विस्तृत विवरा प्रस्तुत करती हैं उसकी टिप्पणी गौरतलब है.’

कुछ ऐसी महान आत्माएं, जो इस पेशे से जुड़ी स्त्रियों  के प्रति दयाद्र होती हैं, उन्हें मुक्त कराना चाहती हैं, वे बड़ी ही दयनीय होती हैं सबसे निकृष्ट! वे क्षणिक भावुकता से भरे लोग हैं। वे समझते हैं कि हम इस पेशे से मुक्त होना चाहते हैं, बचना चाहते हैं। यदि कोई (यौनकर्मी) उनके इस मुक्ति अभियान में शामिल होने से इनकार कर देती है, तो उनके दिमाग पर हथौड़े जैसा प्रहार होता है। वे समझते हैं कि वे हमें इस अवांछित और असहनीय कार्य से मुक्त कराकर अपने प्रति कृतज्ञता हासिल कर लेंगे और फिर हमारा सिर उनके कदमों में होगा। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चलता है कि जिस अहिल्या के वे राम होना चाहते हैं, वह अपने पेशे में खुश हैं तो उनकी दुनिया ही बिखर जाती है। उनके प्रति हमें पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए और प्लेग की तरह उन्हें दूर रखना चाहिए। मुझे उस वक्त नफरत होती है, जब वे दयार्द्र हो कहती हैं , ‘ तुम्हारी जैसी अच्छी लड़की ऐसा काम क्यों कर रही है?’

जेनेट एंजल अपने अनुभव व्यक्त करती है और आह्वान करती है , ‘ अस्तित्व  को निरस्त करने या हम पर कोई निर्णय देने की तत्परता मत दिखाओ। हम तुम्हारी माँ हो सकती हैं, तुम्हारी बहन, तुम्हारी दोस्त, तुम्हारी बेटी। हाँ तुम्हारी प्रोफेसर भी।’

‘‘लोग इस संदर्भ में सवालों का बौछार कर देते हैं तुमने ऐसा किया? तुम बचकानी हरकत कर रही हो? कैसे लोग इस सेवा का उपयोग करते हैं? कैसे लड़कियाँ इस धंधे में आती हैं? जेनेट ने अपनी आत्मकथा लिखा  है,  अपना अनुभव तथा अपने पुरुष मित्र के धोखे से शुरू होकर अपने प्रथम अभिसार (!) के सुरुचिपूर्ण उल्लेख के साथ, अपने मित्र की लम्पटता पर लानत भेजते हुए अपने प्राध्यापकीय जीवन, अपने आनंद और फुर्सत के वक्त और अपने पेशे का तन्मयचित्राण के साथ। पेशे का प्रथम अनुभव सचमुच के प्रथम अभिसार (स्व-चयनित सुहागरात) जैसा ही था, इस नृतत्वशास्त्राी यौनकर्मी के लिए। धक्का उन्हें तब लगता है जब उनका मित्र, उनका महाराज उनसे  यौन-उपहार चाहता है, इस भाव में कि वह तो काल-गर्ल है, उसे क्या फर्क पड़ता है। वह बिखर जाती है रिश्ता तोड़ लेती है।

बारबरा इस पेशे के प्रति पाॅपुलर मानस से खिन्न हैं, वह लिखती हैं, ‘हम सबसे ज्यादा मीडिया से नाराज हैं। यदि कोई हमें फिल्मों में चित्रित करता है, तो ऐसे जैसे कि हम कोई जीती जागती आपदा हों तथा सभी दुर्गुणों से ग्रस्त हों। लड़कियाँ वैसी नहीं होतीं। यदि मेरे पास कोई एक विकल्प हो कुछ करने का तो मैं सबसे पहले उनके उपर आरोपित धब्बे से मुक्त होना चाहूंगी। जरूरी है कि कानून बदले, परंतु यह काफी नहीं है ‘आरोपित धब्बे’ को धोने के लिए। ऐसा सिर्फ लोगों की चेतना से ही संभव है। उदाहरण के लिए यदि मैं माँ हूँ तो तुम्हें मेरी बच्ची से ज्यादा सुपोषित-सुसंरक्षित ,स्नेह प्राप्त बच्ची नहीं मिलेगी। मुझे पता है कि मैं उसे खराब कर सकती हूँ, लेकिन जब वह मेरे साथ नहीं है, तब उसे मैं सबसे ज्यादा देखभाल करती हूँ। उसे अच्छे, खूब अच्छे स्कूल में भेजती हूँ। उसे किसी चीज की कभी कमी नहीं होने देती। उसका प्यारा घर है वह हर खतरों से मुक्त है फिर कौन कह सकता है कि मैं एक अच्छी माँ नहीं हूँ, यदि मैं ऐसा नहीं करती हूँ, सिर्फ अपना पेट भर लेती हूँ, तब तो मुझसे बुरी कोई माँ नहीं हो सकती (बारबरा, 1983)।

यौनकर्मियों के अनुभव, अंतर्संवादों और आह्वानों  का सारा प्रसंग भारत के संदर्भ में वैसा ही नहीं है, जैसा कि कैलीफोर्निया, आमर्सटरडम , जर्मनी में कार्यरत उनकी सहकर्मियों की। भारतीय मानस दुनिया के दूसरे पितृसत्तात्मक मानस की तुलना में ज्यादा संश्लिष्ट है। गरीबी के कारण जो लड़कियाँ इस पेशे में आती हैं, वे सबकुछ वैसा ही अनुभव नहीं कर सकतीं जैसा कि आस्ट्रेलिया में उनका कोई सहकर्मी अनुभव कर रहा हो। पूरी संवेदना के साथ, पक्षधरता के साथ, यौनकर्मियों के साथ सहानुभूति की जगह साख्य भाव में लिखित अनामिका का उपन्यास ‘तिनका-तिनके पास’ परिवेशगत सीमाओं में बांटा जाता है, कथा की नायिका वही है, काल-गर्ल, नृतत्वशास्त्र  की प्राध्यापिका जेनेट एंजेल का भारतीय संस्करण, अनामिका खुलासा करती हैं कि ‘जेनेट’ उन्हें बंग्लादेश में मिली थीं, उन्होंने उन्हें अपने डायरी के अंश दिये थे, जिसे वे शीघ्र ही अपनी आत्मकथा में ढालने वाली थीं, लेकिन अनामिका उसी डायरी के साथ जब ‘तिनका-तिनके पास’ में प्रस्तुत होती हैं तो कुछ इस तरह!

‘उन दिनों की अपनी डायरी पढ़कर छुट्टी करती हूँ!’ विश्वायन के बाद के एक कालगर्ल की डायरी! अंतरराष्ट्रीय नेक्सस पर औरत की दुर्गति का किस्सा… एक पढ़ी-लिखी औरत की दुर्गति का…अनामिका परिवेशगत प्रस्थान लेती है, अथवा इस पेशे के प्रति अपनी वैचारिक अवस्था से। जेनेट अपनी आत्मकथा में कहीं पश्चाताप नहीं करती, कहीं दुगर्ति का भाव नहीं देती हैं। परिवेश की सीमा यह भी है कि अनामिका की नायिका का प्रथम अभिसार ठीक उतना विस्तृत और बारीक वर्णनों से युक्त नहीं है, जितना की उसका अपना वर्णन। लेखिका की नायिका ‘बाल-यौन उत्पीड़न’ की शिकार भी है। प्रथम अभिसार के बाद उसकी अपनी माँ का रुआँसा चेहरा सामने है, जब उसके ‘रिश्ते’ के चाचा ने उसे कुछ ज्यादा ही मसल दिया था, विदा लेते वक्त! वह अपने पिता के आवेग को भी झेलती है।

मेरा शोध अनुभव भी यही कहता है, छोटे शहरों (गया) में काम करने वाली बारबरा मिकुल्सकी की सहकर्मी ठीक वैसा ही अनुभव नहीं करती जैसा कि वह करती हैं , उसके कुछ सहकर्मी यौनजन्य बीमारियों के प्रति सजगता अभियान में लगी हैं,  कम पढ़ी-लिखी हैं, हाँ अच्छी माँ हैं। उसके पूर्व की पीढि़यों ने भी ‘फर्स्ट  क्लास अफसर’ और प्राध्यापक पैदा किए हैं।

गया के चकलाघरों  में कार्यरत स्त्रियां अपराधबोध में तो नहीं है परंतु वह कहती हैं कि ‘अपनी जगहों पर, (जहाँ से वे आयी हैं, प्रायः सिलीगुड़ी या पश्चिम बंगाल से) वे ‘खराब’ औरतें नहीं हैं ,यानी वे अच्छी लड़कियाँ हैं वहां , क्योंकि वे वहां छुट्टी पर होती हैं.  वैसे बारबरा भी एक कालगर्ल की माँ वाली भूमिका में अपने बच्चे के प्रति ‘इस खराबी’ से मुक्त रखने की बात करती हैं। यद्यपि भारत में गणिकाओं की पीढि़यां भी समान पेशे का चुनाव करती रही हैं या लायी जाती रही हैं। गया में कार्यरत एक लड़की कहती है कि हम हैं तो कई माँ-बहनों की इज्जत बची है। अभी रेड हुआ था, हमारा व्यवसाय बंद था , तो बगल के मानपुर पुल पर बलात्कार हुआ।

मुम्बई की ‘आश्रय तिरस्कृत नारी संघ’ यौनकर्मियों की ऐसी ही सामाजिक भूमिका का पक्ष रखता है, इसके प्रतिनिधि आई. एच. गिलहड़ा के अनुसार ‘ वेश्यावृत्ति एक अनिवार्य बुराई है, जो परिवार को सुरक्षित रखती है तथा स्त्रियों  को बलात्कार से बचाती है। कुछ ऐसा ही विचार दिल्ली के समाजसेवी खैराती राम भोला का है,
‘‘यदि वेश्याएं अस्वस्थ होती हैं, तो बच्चों को प्रभावित करेंगी.  जो उनके पास स्फूर्त होने जाते हैं , वे सेक्स के भूखे होते हैं . वेश्याएं न हों तो अविवाहित युवा किसी  पर हमला बोल सकते हैं। मेरी दृष्टि में वो वेश्याएं माँ जैसी हैं, उनका आदर होना चाहिए।’

स्त्रीवादी  विचारक तथा पेशे से जुड़े कुछ लोग पुरुषों के अनियंत्रित उद्दाम यौन-उत्कंठा को पितृसत्तात्मक समझ मानते हैं। परंतु यदि यह समझ किसी यौनकर्मी के द्वारा व्यक्त अथवा उसके लिए काम कर रहे संगठन की है, तो वह इस दृष्टि से कि यह समझ इस व्यवस्था से जुड़ी स्त्रियों  को थोड़ा सम्मान, थोड़ी स्वीकृति दिला सके। पेशे से जुड़ी स्त्रिायों के अनुभवों का एक मार्मिक प्रसंग, जिसे जेनेट कम से कम मार्मिक समझती हैं तथा जिससे यह तय होता है कि स्त्रियाँ अपने ग्राहकों के प्रति मशीनी भाव के अतिरिक्त लगाव भी महसूस करती हैं, उल्लेख्य है। जेनेट लिखती है,

‘‘मेरा ग्राहक दुबला-पतला था, पीली त्वचा इस कदर कि पारदर्शिता का आभास देती हो। वह उदास और निर्दोष मुस्कान बिखेरता रहा, बहुत बात नहीं की। संगीत बैकग्राउंड में था, कोई नया ‘सिम्फाॅनी’। उसने मुझे शेरी (वाइन) परोसी और हम शयन-कक्ष में दाखिल हुए। उसने मुझे अंतर्वस्त्रों को छोड़कर सबकुछ उतारने का  आग्रह किया। मैं प्रायः दूसरी अन्य रातों की तरह ब्रा और पैंटी में थी, जिसके ऊपर पारदर्शी कैमिसोल था।

‘क्या तुम्हारे पास मेक-अप बैग है’, उसने बहुत ही आस और निर्दोष चेहरे के साथ पूछा। ‘मैं दरअसल तुम्हें मेकअप करते हुए देखना चाहता हूँ।’

‘सिर्फ मेक-अप! थोड़ी विस्मय में थी। ‘हाँ, और मुझसे बात करो।’

यह कई मायने रखता था। मैं समझ गयी कि ऐसा करते हुए मुझे अश्लील बातें करनी है, जो मैंने पहले भी कुछ ग्राहकों के साथ की थी। मैं बिस्तर तक गयी और अपने मेकअप के सामान उठाये।

‘तुम क्या बात करना चाहोगे?’


अब तक वह बिस्तर के पास ‘लुइस क्वीज’ चेअर पर बैठा था। ‘तुम कहो कि तुम्हारे डैडी के साथ बाहर जाने के लिए तैयार हो रही हूँ उसने कहा, उसकी आवाज ‘इको साउंड’ की तरह ध्वनित हुई ,कहीं दूर बाहर से आती हुई।’
‘मुझसे  कहो कि आया जल्द ही आती होगी। कहो कि डैडी तुम्हें डिनर के लिए कहाँ ले जा रहे हैं? उसने कहा। मैं तो जम सी गयी.  सच कहूँ, ईमानदारी से, मुझे रोने की तीव्र इच्छा हुई। मैंने वही किया जो वह चाहता था, मैं कर भी क्या सकती थी? मैं बोलती रही और अपने आईने में देखती रही, कुछ इस तरह कि वह हस्तमैथुन करता हुआ न दिखे, जब मैं उसकी माँ की भूमिका कर रही हूँ।’

‘‘मैं तुम्हें वहाँ पहुँचकर काॅल करूंगी। और जाने के पहले तुमसे विशेष ‘किस’ भी करूँगी।’’

मैं किसी तरह अपने आँसू उमड़ने से रोक सकी। उसने मुझे खूब पैसे दिये, सत्तर डाॅलर टिप के तौर पर, मेरे अपने रेट के अलावा।दूसरी लड़कियों ने इससे खूब मजा किया होता। एक आसान से काॅल के तौर पर और बाद में जी भरकर हँसी होतीं। मैं घर आयी भीतर से खोखली महसूस करती हुई, क्या हुआ होगा उसके बचपन में उसकी यौनिकता पर प्रहार करते हुए। आखिर उसने क्यों किसी मनोचिकित्सक के पास अपने दर्द की दवा ढूँढने की जगह कालगर्ल का चुनाव किया था… आखिर क्यों?

स्त्री-शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( राम का मुखौटा पहने — समाज, सत्ता, धर्म और खाप के कितने रावण! )

( आज से हिन्दुओं का पर्व ‘ नवरात्र’ प्रारम्भ  हो गया  है. इसके सन्दर्भ से कथाकार और स्त्री -अधिकार के  संघर्ष  में हमेशा तत्पर रहने वाली सुधा अरोड़ा अपना मत रख रही हैं – हिन्दू मिथों को छेड़े बिना , उनके अंतर्पाठ से मिथकों में अन्तर्निहित पितृसत्ता की पड़ताल कर रही हैं )

सीता की त्रासदी तमाम महिमामंडनों के बावजूद वैसी ही बनी हुई है और हमारे समाज के व्यवहार से कहीं न कहीं रिस-रिसकर बाहर आती रहती है। वह रावण की जबर्दस्ती का ही शिकार नहीं हुई बल्कि मर्यादा और प्रजा प्रेम के नाम पर राम की ज्यादती का भी शिकार हुई। समर्पण की पराकाष्ठा को छूते हुये उसने राजमहल की जगह जंगल का रास्ता चुना और शक की सुइयों से बिंधकर अग्नि-परीक्षा दी। क्रूरता के चरम का शिकार होकर वह जंगल में छोड़ दी गई और यातना के सीमांत पर पहुंच कर उसने धरती में समा जाने का निर्णय लिया। आज पारिवारिक ढांचे में स्त्री की दशा देखकर इनमें से कई सच्चाइयां  हमारे सामने तैर जाती हैं। लोग रावण का पुतला फूंकने की खुशी में यह भूल जाते हैं कि सीता का अपराधी केवल रावण ही नहीं है।
सीता हर जगह लड़ रही है और रावण अनेक रूपों में संक्रमित हो चुका है – प्रेमी, पति, पिता या भाई – वह कहीं भी हो सकता है। समाज, सत्ता, धर्म और खाप के न जाने कितने रावण हैं जो राम का मुखौटा पहने, महलों से लेकर झोपडों तक में, आसन जमाये बैठे हैं. वे आज मिथक से निकल कर हमारे रोजमर्रा के जीवन में पैठ रहे हैं.”

विजयादशमी को सालों से बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता रहा है ।  राम इस कथानक के नायक हैं और विजय का सेहरा उन्हीं के सिर माथे है । मिथक की ही बात करें तो क्या राम की विजय सिर्फ उन्हीं की विजय है ? क्या सीता की दृढ़ता, पार्वती (शक्ति) के वरदान की कोई भूमिका नहीं है ? क्या राम के संघर्ष और जीत में स्त्री-शक्ति की कोई भागीदारी नहीं थी ? आखिर क्यों हमारे पौराणिक आख्यानों में शक्ति-पूजा की परंपरा है ? क्यों हर संघर्ष से पहले देवी-पूजा का विधान है ? समय चाहे कितना भी बदल जाए, अंतिम विजय सिर्फ सद्शक्ति की मदद से ही मिल सकती है। यह सिर्फ रामकथा का ही सच नहीं है, आधुनिक युग का भी सच है।

जीवन के हर तरह के संघर्ष में जीत तब ही निश्चित हो पाती है, जब स्त्री किसी-न-किसी रूप में साथ हो चाहे स्त्री का मां रूप हो, बहन, पत्नी, बेटी या फिर दोस्त । पुरुष की शक्ति का स्रोत ही स्त्री है । जीवन के रोजमर्रा से जुड़ी घटनाओं में पुरुष की शक्ति के तौर पर कोई-न-कोई स्त्री खड़ी मिलती है। कुछ रचना हो, कहीं लड़ना हो, कहीं जीतना हो… स्त्री का वजूद पुरुष की मदद, संबल और सहयोग के लिए हुआ ही करता है । सामान्य सा तथ्य  है कि जिस पुरूष को अर्थ उपार्जन के कारण हम घर का कर्णधार मानते रहे, क्या। उसके बाहर जाकर कमाने के पीछे उसकी अनुपस्थिति में घर के बडे बुजुर्गो, बच्चों और समूचे घर की देखभाल करती स्त्रीे का कोई योगदान नहीं रहा ? यह बात अलग है कि उसे इसका श्रेय कभी दिया नहीं गया । संपत्ति का हकदार उसे कभी माना नहीं गया ।

जैसे जैसे समय बीतता गया, न सिर्फ़  इस शक्ति को अनदेखा किया गया, उसके मायने भी बदल गये । उसे पुरुष सत्ता ने सचमुच देवी की तरह ऊंचे आसन पर प्रतिमा की तरह स्थापित कर दिया और प्रतिमाएं मूक बधिर होती हैं, वे मंदिरों और पूजा पंडालों में सजी धजी ही भली लगती हैं, तभी वे पूजा अर्चना की पात्र बनती हैं। घर में अष्टभुजा बनकर सारे दायित्व निबाहती, सारी परंपराओं को अपने कंधों पर ढोतीं और बेटी, बहन और पत्नी बनकर सारी आचार संहिताओं का पालन करती स्त्री जब आंखें मूंद लेती थीं तो उसके सच्चरित्र, कुलशीला होने के बखान उसके परिवार और आस पड़ोस में किये जाते। इसी में उसके होने की सार्थकता मान ली गयी !

सदियों से स्त्री ने अपनी शक्ति को सिर्फ अपने पति और परिवार की उन्नति और विकास के लिये बनाए रखा। सिर्फ सौ साल पहले का समय देखें, स्त्रियों के नाम के साथ देवी या रानी लगाने का प्रचलन था। वे घर को घर बनातीं और घर की शोभा बढाती अपने-अपने देवता की देवियां थीं।  हर कहीं सहयोगी की भूमिका में — मौन, शांत और अन्तत: अनंत में विलीन… सब कुछ सहज गति से चल रहा था । सहयोग करती, सहती और चुप रहती स्त्री समाज को अपने अनुकूल लग रही थी। देवी की तरह प्रतिष्ठित कर उससे मानवी होने के सारे अधिकार और श्रेय छीन लिए गए। घर के किसी हिस्से में देवी प्रतिमा को पूरी साज-सज्जा के साथ स्थापित करने के बाद पूजा-अर्चना तक ही शक्ति-पूजा का सिलसिला चलता रहा। मुश्किल तब शुरू हुई जब स्त्री ने अपनी शक्ति को हथियार बनाया, अपने नैसर्गिक गुणों को अपनी ताकत में रूपांतरित किया और मुखर हुई। शिक्षा और जागरूकता ने स्त्री को सवाल करना सिखाया और उन्हीं सवालों ने एक तरफ स्त्री को अपनी शक्ति का अहसास कराया तो दूसरी तरफ पुरुष सत्ता को चुनौती की आहट सुनाई पडी । अब तक स्त्री ‘देवी-स्वरूप’ होकर खुश थी, लेकिन जैसे ही उसने सवाल उठाए, अधिकार मांगे, सत्ता की लडाई शुरू हो गई । सामाजिक संतुलन गड़बड़ाया और स्त्री का दोहरा संघर्ष शुरू हो गया। एक पुरुष के संघर्ष के साथ, दूसरा अपने वजूद के लिए ।

रामकथा को बुराई पर अच्छाई की जीत की तरह पढ़ने, देखने और मानने का प्रचलन है। बदलते समय के साथ उसमें नयापन ढूँढना एक गंभीर मसला है। खासतौर पर जब इसका अंतर्निहित सत्य आज के समय में स्त्रियों और दूसरे हाशियाई समुदायों के साथ उसके सम्बन्धों की नवीन व्याख्या हो। संस्कृति में भावना का पारंपरिक रूप तभी तक सुरक्षित होता है जब तक उसपर बाज़ार और आधुनिकता का नकारात्मक प्रभाव न हो। भारत में आज मिथकों और महाकाव्यों को लेकर जो एक विश्लेाषणात्मनक रवैया बन गया है वह दरअसल परंपरागत मान्यताओं को लेकर एकांगी पाठ रचता रहा है। वर्चस्व और आदर्श की पुरानी मूल्यव्यवस्था को भावनात्मक समर्पण इस हद तक जायज बनाता है कि प्रमुख चरित्रों के निजी दुख और यातनायेँ उनकी ‘‘लार्जर दैन लाइफ’’ इमेज के पीछे छिप जाते हैं। लोग उन पात्रों के साथ इतने एकात्म हो जाते हैं कि अपने जीवन में भी वैसा ही कुछ चाहते हैं। पुरुष बेशक राम की जगह कन्हैया हो जाये लेकिन पत्नी तो उसे सीता जैसी ही चाहिए। स्वयं वह कितनी ही गोपिकाओं के साथ रास रचाता रहे पर पत्नी के रूप में उसे कोई गोपी नहीं चाहिये। पत्नी  के लिये सीता वाला मानक ही मान्य है ।

रामकथा मौलिक रूप से स्त्रियों की केन्द्रीयता का आख्यान है हालांकि रावण जैसे महायोद्धा और राम जैसे सूझ-बूझ वाले चरित्र के टकराव को ही इसका मूल घटक माना जाता है। इस घटक के अतिरिक्त एक और घटक हम आसानी से देख लेते हैं और वह है स्त्री के साथ इन दोनों पक्षों का रवैया। जिस पक्ष में स्त्री का सम्मान है, वही विजयी है और उसी को आदर्श माना जाता है । राम का पक्ष इन्हीं कारणों से अलग और श्रेष्ठ हो जाता है। रावण का सारा ऐश्वार्य और ज्ञान इसीलिए क्षीण होता दिखता है क्योंकि वह एक स्त्री का अपहरण करने और जबरन उसे अपने पास रखने का अपराधी है। लोक में किसी स्त्री के साथ यह रवैया त्याणज्य  रवैया है। चाहे महल सोने का हो और चांदी के थाल में ही कोई क्यों न खाये लेकिन किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे अपने अधिकार या दबाव में रखना एक  कुत्सित और घटिया कर्म माना जाता है। कहीं न कहीं लोक के अवचेतन में यह बात गहरे पैठी है इसलिये उसकी सारी सहानुभूति मर्यादा पुरूषोत्तम  राम के साथ है।

दरअसल रामकथा को भारतीय सामाजिक संरचना और पारिवारिक संस्कृति के साथ उसकी आर्थिक संरचनाओं के बरअक्स देखना बहुत जरूरी है और इन सब में स्त्री हमेशा एक ऐसे पायदान पर रही है जहां उसका जीवन-संघर्ष घनीभूत और जटिल रहा है । इस प्रक्रिया में उसकी आत्मा पर कितना भी बड़ा बोझ हो और कितना ही उसे जूझना पडा हो, पूरी तरह से पति के प्रति समर्पण ही उसका सत्य रहा है । कौशल्या, सुमित्रा, सीता, उर्मिला, मंदोदरी, तारा आदि ऐसी ही स्त्रियाँ हैं। सीता का चरित्र इनमें सबसे विराट है। वह न केवल बाहर निकली बल्कि सौ दुख सहने के बावजूद उसने अग्निपरीक्षा दी और गर्भकाल में बेवजह जंगल में छोड़ दी गई। इन सबके बावजूद उसने राम की वंशबेल को बढ़ाया और संतान को योग्य  बनाया। सीता एकमात्र ऐसा चरित्र है, जिसने सबकुछ सहन करके पितृसत्ता की जड़ों को सबसे अधिक मज़बूत किया। एक सहनशीला पत्नी का इससे शानदार उदाहरण पूरी दुनिया  में नहीं मिलेगा। भारत में रोजगार और विस्थापन का शिकार निम्नवर्ग हो या देश-विदेश में दौलत का अंबार खड़े करते व्यापारी या फिर अपनी रंगरेलियों में मस्त सामंती मानसिकता वाला पूंजीपति, सबके लिए सीता ही सबसे अनुकूल और ज़रूरी पात्र है। सीता ही उस हजार कमियों से निजात दिलाकर उसकी प्रतिष्ठाे बरकरार रखने के लिए अपने जीवन को होम कर सकती है। कैसी विडम्बना है कि जीवनभर प्रेम के लिए यहाँ-वहाँ भटकने वाले को भी राधा जैसी प्रेमिल स्त्री नहीं चाहिए। सीता इसलिए सदियों से एक चाहत और आदर्श का प्रतिरूप है क्योंकि वह पुरुष के सभी गलत निर्णयों को बिना सवाल किये स्वीकार लेती है।

सीता की त्रासदी तमाम महिमामंडनों के बावजूद वैसी ही बनी हुई है और हमारे समाज के व्यवहार से कहीं न कहीं रिस-रिसकर बाहर आती रहती है। वह रावण की जबर्दस्ती का ही शिकार नहीं हुई बल्कि मर्यादा और प्रजा प्रेम के नाम पर राम की ज्यादती का भी शिकार हुई। समर्पण की पराकाष्ठा को छूते हुये उसने राजमहल की जगह जंगल का रास्ता चुना और शक की सुइयों से बिंधकर अग्नि-परीक्षा दी। क्रूरता के चरम का शिकार होकर वह जंगल में छोड़ दी गई और यातना के सीमांत पर पहुंच कर उसने धरती में समा जाने का निर्णय लिया। आज पारिवारिक ढांचे में स्त्री की दशा देखकर इनमें से कई सच्चााइयाँ हमारे सामने तैर जाती हैं। लोग रावण का पुतला फूंकने की खुशी में यह भूल जाते हैं कि सीता का अपराधी केवल रावण ही नहीं है।

सीता हर जगह लड़ रही है और रावण अनेक रूपों में संक्रमित हो चुका है – प्रेमी, पति, पिता या भाई – वह कहीं भी हो सकता है। समाज, सत्ता, धर्म और खाप के न जाने कितने रावण हैं जो राम का मुखौटा पहने, महलों से लेकर झोपडों तक में, आसन जमाये बैठे हैं। वे आज मिथक से निकल कर हमारे रोजमर्रा के जीवन में पैठ रहे हैं ।

जाहिर है स्त्री की भूमिका भी बदली है और स्वरूप भी। अब सीता बेवजह अग्नि-परीक्षा देने के लिए तैयार नहीं है, धोबी के लांछन से वह घर छोडने से इनकार करती है। स्त्री मुखर हुई है,उसकी शक्ति ज्यादा धारदार हुई है, तो उसके संघर्ष भी गहन और लंबे होंगे। यूं स्त्री सदियों से संघर्षरत है — सीता रावण से और द्रोपदी दुर्योधन-दु:शासन से। आज भी उसका संघर्ष थमा नहीं है। वह संघर्ष कर रही है, पुरुषों के मोर्चे पर पुरुषों के साथ और अपने मोर्चे पर पुरुषवादी स्त्रियों के साथ भी ।

वक्त के बदलने के साथ संघर्ष का स्वरूप भी बहुत कुछ बदल गया है। बस नहीं बदला तो स्त्रीं के संघर्ष की प्रकृति। सीता ने रावण से संघर्ष किया, लेकिन राम के अन्याय को सहा। आज की स्त्री रावण से भी संघर्ष कर रही है और राम के अन्याय से भी। संघर्ष दोहरा तिहरा नहीं, चहुंमुखा है और लंबा भी। यह बहुत जल्दी  समाप्त  होने वाला नहीं है। यह चल रहा है और आगे भी चलेगा। सकारात्मक उर्जा , शक्ति , प्रकृतिगत लचीलेपन और दूरदर्शिता से स्त्री  स्थितियों को बदल पाने में सक्षम होगी। किसी भी प्रगतिशील समाज के विकास और उन्नदति के लिये यह जरूरी भी है।