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रक्त शुद्धता, स्त्री दासता और लव जेहाद

सीमा आज़ाद

सीमा आज़ाद  सामाजिक कार्यकर्ता एवं साहित्यकार हैं. संपर्क :seemaaazad@gmail.com

धर्म, जाति, देश, राज्य, कबीलों के अस्तित्व में आने से पहले से धरती पर स्त्री और पुरूष का अस्तित्व था, फलतः इनके बीच के प्रेम का भी। ‘प्रेम’-यह धरती पर स्त्री और पुरूष के अस्तित्व में आने के साथ ही आया है और इनके साथ ही जायेगा। ऐसा हो ही नही सकता कि धरती पर स्त्री और पुरूष तो रहें  पर प्रेम न रहे। मनुष्य को मिली तमाम प्राकृतिक सम्पदा की तरह प्रेम भी एक प्राकृतिक सम्पदा है यह जाति धर्म और देश से परे है। इसी कारण धरती पर जैसे ही सत्ता के रूप- धर्म और राज्य की उत्पत्ति हुई, सभी ने स्त्री और पुरूष के इसी भाव को नियन्त्रित करने की कोशिश की। प्रेम, मोहब्बत, लव, एक मायने वाले ये सारे शब्द मीठे और नाजुक से लगते हैं, पर आदिम समाज से लेकर अब तक की तमाम सत्तायें इससे डरती रहीं हैं, उनके लिए ये शब्द बारूद की तरह हैं ,जो फट जायें तो अब तक स्थापित सत्ताओं की नींव हिला सकती है। आइये देखते हैं कैसेआदिम कबीला समाज जो मातृप्रधान था, को पलट पितृसत्ता अस्तित्व में आया।यानि मानव श्रम से संग्रहित सम्पदा जिसका रखरखाव और वितरण कबीले की महिलाओं के हाथ में था, के ऊपर पुरूषों का कब्जा। फिर इस सम्पत्ति पर पुरूषों के सामूहिक कब्जे का खात्मा और व्यक्तिगत स्वामित्व में बदलना। इतिहास बताता है कि मातृप्रधान समाज से पितृसत्ता में बदलने की यह प्रक्रिया सदियों तक चलती रही, जिसमें स्त्रियों को सम्पत्ति के स्वामित्व से बेदखल कर पुरूषों ने उन्हें अपने वंशज पैदा करने वाली दासी में तब्दील कर लिया ताकि अपने पास एकत्रित सम्पत्ति को अपनी ही सन्तान को सौंपा जा सके। इसे मुकम्मिल करने के लिए ऐसे विवाह संस्कार की नींव डाली गयी जिसमें स्त्रियों के लिए तो प्रेम की एकनिष्ठता अनिवार्य थी, लेकिन पुरूषों के लिए नहीं, जिसमें स्त्रियों को सारे अधिकारों से वंचित कर दिया गया। यह प्रेम पर पहरा लगाने की शुरूआत थी। वास्तव में यह स्त्रियों पर पहरा या स्त्रियों के प्रेम पर पहरे की शुरूआत थी। यह पहरा प्रेम की एकनिष्ठता बनाये रखने से भी ज्यादा ‘वंश की शुद्धता’ के लिए जरूरी थी।

स्त्रियों को दासी बनाने के बाद यह सिलसिला आगे बढ़ा, जो पुरूषों को दास बनाने तक गया। यानि मानव श्रम से अर्जित और इकट्ठी होती जाती अतिरिक्त सम्पत्ति पर श्रम के लिए मानव को गुलाम बनाने की शुरूआत, जिसमें स्त्री पुरूष दोनों शामिल थे। इस दास प्रथा ने ही भारत में वर्ण व्यवस्था का रूप लिया, जिसके तहत ब्राहमण और क्षत्रिय धरती की सम्पदा के मालिक बन बैठे और शेष उनकी सेवा में लगे दास। धर्म के संस्थागत रूप लेने और फिर राज्य की उत्पत्ति ने इस अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलने के लिए पूरी जान लगा दी, लेकिन नाजुक सा लगने वाला कमबख्त इश्क-मोहब्बत-प्रेम-लव ही था, जो इस वर्ण और जाति की व्यवस्था में सेंध मारता रहा। इस कारण इस पर पहरा और मजबूत किया गया। यहां हम प्रेम और स्त्री को समानार्थी शब्दों के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। प्रेम पर पहरा यानि स्त्री पर पहरा और स्त्री पर पहरा यानि प्रेम पर पहरा। विवाह संस्था के माध्यम से यह व्यवस्था की गयी कि एक वर्ण और जाति की स्त्रियां और पुरूष आपस में ही शादी करेंगे, दूसरे वर्ण या जाति में नहीं। दूसरी जाति में शादी हो भी जाती थी, किन्तु दूसरे वर्ण में शादी को महा अनर्थ समझा जाता था। वास्तव में यह व्यवस्था दास और मालिक वर्ग के बीच के फर्क को बनाये रखने के लिए की गयी  थी। ताकि मालिक वर्ग की औरतें मालिक वर्ग के ही बच्चे पैदा करें दास वर्ग के नहीं नहीं। ‘वंश शुद्धता’ अब ‘वर्ण शुद्धता’ के साथ मिल गयी और स्त्रियां ‘शुद्ध रक्त’ वाले वंशज पैदा करने वाली दासी बन गयी लेकिन मालिक वर्ग के पुरूषों की यौन स्वच्छंदता बरकरार रही। वास्तव में रक्त की ‘शुद्धता’ भी अपने आप में छलावा है, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। विज्ञान ‘रक्त समूह’ यानि ब्लड ग्रुप की बात करता है, जो जरूरी नहीं कि भाई से भाई का मिले बल्कि संभव है कि एक हिन्दू मुस्लिम और दलित का रक्त समूह एक ही हो। इसमें रक्त शुद्धता जैसी कोई चीज नहीं।

खैर…… मुगलों के आने के बाद भारत के वर्णों के बीच कथित रक्त शुद्धता का कानून तो बना रहा, परन्तु एक जैसी सामाजिक आर्थिक स्थिति वाले हिन्दू और मुसलमानों के बीच प्रेम कुलांचे मारने लगा। प्रेम ने धर्म की शुद्धता को तो नहीं माना, पर वर्ग यानि वर्ण की शुद्धता को बनाये रखा। यह उस समय की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था के अनुकूल था । जैसे-जैसे यह स्थितियां बदलीं और धर्म की राजनीति सत्ता के लिए जरूरी होती गयी, प्रेम को वर्ण, जाति के साथ धर्म के दायरे में भी बांध दिया गया। स्त्रियों पर पहरा फिर कड़ा हो गया। आज के ‘लव जेहाद की राजनीति इसी पृष्ठभूमि से निकल कर आयी है। यह आज की सत्ता की जरूरत है। वास्तव में आज की सत्ता की जरूरत प्रेम पर पहरा लगाना उतना नहीं, जितना भारत की शोषित आबादी को एकजुट होने से रोकना है। इस समय वह लोगों के दिमाग में बैठे पुरातन मूल्यों को उकसाकर एक तीर से दो निशाना साध रही है। पहला- वह धर्म के आधार पर लोगों को बांट रही है और दूसरा- वह स्त्री और पुरूष के बीच की दूरी को और बढ़ा रही है। आज के सत्ता की राजनीति अल्पसंख्यक धर्म पर बहुसंख्यक धर्म को मढ़ने की है। वह अल्पसंख्यकों के दमन के लिए बहुसंख्यकों को उकसा रही है। संविधान में लिखे वाक्य ‘‘भारत एक धर्मनिरपेक्ष, पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है’’ को झुठला रही है। ‘लव जेहाद’ की राजनीति वास्तव में अल्पसंख्यकों पर दमन की राजनीति है, यह साम्प्रदायिक राजनीति है। इसे दिये गये नाम से ही यह स्पष्ट है जिसमें भारत के दो अल्पसंख्यक समूहों से जुड़ी भाषा के शब्दों का चुनाव किया गया है- ‘लव’ (ईसाई) और ‘जेहाद’ (मुसलमान)। यह राजनीति हिटलर की तरह एक धर्म को श्रेष्ठ बताने वाली राजनीति है और यह आज के शासक वर्ग की सबसे बड़ी जरूरत है। हिन्दुत्ववादी संगठनों का यह तांडव लोगों को सामंती पितृसत्ता के युग में वापस ले जाने की साजिश है, जिससे वे महिलाओं की गुलामी को बरकरार रख सकें। याद करें रक्त शुद्धता की बात करते हुए महिलाओं पर तमाम बन्धन लादे गये और उन्हें दासी बनाया गया। आज वे फिर से इसी की बात कर रहे हैं। महिलाओं के प्रति उनका नजरिया क्या है यह इससे भी स्पष्ट है कि ‘लव जेहाद’ की इस राजनीति में यह अन्तर्निहित है कि हिन्दू महिलाओं के पास दिमाग नाम की चीज नहीं है और इसी लिए वे मुसलमान युवकों के बहकावे में आ रही हैं और उनकी रक्षा करना हिन्दू पुरूषों का परम कर्तव्य है, आज के समय का सबसे बड़ा कर्तव्य।

पिछली एक शताब्दी से दुनिया भर में शोषण के खिलाफ होने वाले विभिन्न आन्दोलनों ने महिलाओं के एक बड़े तबके को अपने अधिकारों के लिए जागरूक किया है। वे अपनी शारीरिक आर्थिक और मानसिक हर तरह की दासता को एक-एक कर तोड़ती जा रही है। पुरूषों का प्रगतिशील तबका जहां औरतों की इस नयी स्थिति का स्वागत कर रहा है और उससे तालमेल बिठाने में लगा है, वहीं उसका पिछड़ा तबका उनकी राह में रोड़े खड़े कर रहा है। साम्प्रदायिक राजनीति करने वालों ने इसी पिछड़े तबके को अपने साथ मिला लिया है और आगे बढ़ रही महिलाओं के खिलाफ खड़ा कर दिया है और यह दोनों तबके हर धर्म में हैं। पिछड़ी चेतना वाला यह समूह ही आज ठग्गू सत्ता से लड़ने की बजाय अपने ही सहोदर भाइयों (क्योंकि वे उनसे अलग धर्म में पैदा हुए हैं) और स्त्रियों से लड़ रहे हैं। ये लोग आज की साम्प्रदायिक, सामंती और साम्राज्यवादी राजनीति का शिकार बन रहे हैं। इस राजनीति के वाहक आपस में प्रेम करते हैं लेकिन अपने खिलाफ कभी भी खड़ी हो जाने वाली जनता को बांटने की राजनीति करते हैं। यकीन न हो तो भारत में इस राजनीति का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाली पार्टी, भाजपा के अन्दर जरा झांक कर देख लीजिये कि उनके नेता और उनके परिजन खुद कितने अन्र्तजातीय और अन्र्तधर्मीय विवाह बन्धन में बंधे हैं सिकन्दर बख्त, मुख्तार अब्बास नकवी, शहनवाज आलम आदि ने हिन्दू लड़कियों से विवाह किया, और ये लड़किया किसी भाजपा नेता की लड़कियां रही हैं, यानि उन पिताओं को भी अपनी लड़की किसी मुस्लिम के हाथ में देने में कोई परेशानी नहीं थी। भाजपा के फायरब्रांड नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने पारसी लड़की से शादी की थी। इसके अलावा कई अन्य भाजपा नेताओं ने अपने बेटे-बेटियों का अन्तरधर्मीय विवाह खुशी-खुशी किया है। लेकिन जनता के ऐसे विवाह को वे ‘जेहाद’ बताते हैं।

अगर इस ‘जेहाद’ से धर्म और जाति की दीवारें टूटती हैं तो यह ‘जेहाद’ किया ही जाना चाहिए, जैसा कि खुद भाजपा के नेताओं और उनके परिजनों ने किया है, हम उनके इस कदम का स्वागत करते हैं। जनाब, यदि आपको अपने धर्म और जाति से बाहर प्रेम और विवाह का अधिकार है तो दूसरों को क्यों नहीं? आप इस पुण्य के काम को अपने तक ही क्यों सीमित रखना चाहते हैं? यह कैसी राजनीति है?

डा. अम्बेडकर ने कहा है कि भारत से छूआछूत, जाति व्यवस्था को खत्म करने और धार्मिक सौहार्द्र के लिए इनके बीच विवाह को प्रोत्साहित करना चाहिए। इन दिनों हिन्दुत्ववादी संगठन दलितों के वोट के लिए अम्बेडकर और छुआछूत मिटाने की बात तो बहुत कर रहे हैं पर अम्बेडकर का लिखा मानने को तैयार नहीं है। मान लेने से वे बांटने की राजनीति कैसे करेंगे? उनके इस फरेब से बाहर आना प्रेम और मानवता को बचाये रखने के लिए जरूरी है।

‘लव जेहाद’ के सन्दर्भ में हिन्दुत्ववादी संगठनों के ‘घृणा अभियान’ की सच्चाई यह भी है कि हिन्दू-मुलिम प्रेम या विवाह के ज्यादातर मामले जांच के बाद झूठे पाये गये। अभी हमारा समाज खुद इस मामले में इतना संकीर्ण है कि ऐसे प्रेम की जमीन ही बहुत कम है। यदि वास्तव में ऐसा हो रहा है तो यह समाज के विकास की, महिलाओे की आजादी की, और नफरत के बरख्श प्रेम के विस्तार का संकेत है, इसे रोकने की बजाय इसका स्वागत होना चाहिए। इसे रोकने वाली पिछड़ी सोच और राजनीति को पीछे का रास्ता दिखाना चाहिए। धर्म, जाति, देश से परे धरती पर प्रेम था, है, और रहेगा। प्रेम जि़न्दाबाद।

जेंडर की अवधारणा और अन्या से अनन्या

भावना मासीवाल

भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं संपर्क :bhawnasakura@gmail.com;

जब महिलाओं ने अपनी सामाजिक भूमिका को लेकर सोचना-विचारना आरंभ किया , वहीं  से स्त्री आंदोलन, स्त्री विमर्श और स्त्री अस्मिता जैसे संदर्भों पर बहस शुरु हुई । स्त्री आंदोलन में जहाँ एक ओर स्त्रियों की भूमिका को सामने लाने का प्रयास हुआ और उनकी सामाजिक, राजनैतिक भागीदारी को स्वीकार किया तो वहीं स्त्री विमर्श ने स्त्री को बहस के केंद्र में लाने का प्रयास किया । जिसमें एक ओर समाज में उसकी दोयम दर्जे की स्थिति को बताया तो दूसरी ओर उससे जुड़े मुद्दों को बहस के जरिए केंद्र में रखा गया । जिसमें स्वतंत्रता, समानता और अस्मिता जैसे प्रश्नों को उठाया गया । जेंडर का प्रश्न अस्मिता के प्रश्न के भीतर से ही उभरता है ,जो स्त्री को स्त्री के नजरिए से देखने की बात करता है । स्त्री और पुरुष की सामाजिक संरचना पर सवाल खड़ा कर समाज में बहस की मांग करता है । साहित्य में वहीं स्त्री दृष्टि से स्त्री के रचना क्रम की आलोचना की बात जेंडर के तहत की जाती है । जेंडर का संबंध एक ओर पहचान से है तो दूसरी ओर सामाजिक विकास की प्रक्रिया के तहत स्त्री-पुरुष की भूमिका से । जहाँ मनुष्य और मनुष्य के बीच अंतर किया गया और एक स्त्री और दूसरे को पुरुष कहा गया । जेंडर के संबंध मंु विस्तार से बात करने से पहले कुछ बातें विमर्श के संदर्भ में हो जाएं । सरल शब्दों में कहा जाए तो यह एक इनफार्मेशन है जो ज्ञान के रास्ते से होकर गुजरता है और हमें सोचने समझने का नजरिया देता है । हिंदी में विमर्श शब्द अंग्रेजी के ‘डिस्कोर्स’ का पर्याय है और ‘डिस्कोर्स’ लेटिन शब्द ‘Discursus (डिस्कर्सस) का, जिसका अर्थ है बहस, संवाद, वार्तालाप और विचारों का आदान-प्रदान । विमर्श को थोडा ओर जानने का प्रयास किया जाए तो ‘विकिपीडिया’ के अनुसार ‘The term Discourse describes a formal way of thinking that can be expressed thought language’. विचारों को सीधे व सरल रूप में भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करना विमर्श हैं । ‘ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी’ में लिखित व मौखिक रूप में विचारों की अभिव्यक्ति को विमर्श माना तो अंग्रेजी विश्वकोश में मौखिक रूप में विचारों की अभिव्यक्ति व बातचीत को । बृहत प्रमाणिक शब्दकोश के अनुसार ‘विमर्श किसी स्थिति के सुधार या वर्ग आदि के अभ्युत्थान के लिए होने वाला वैचारिक मंथन है’। कोश से आगे देखें तो ‘फूको’ लिखते हैं विमर्श शब्दों व विचारों की प्रणाली है जो प्रकृतिस्थ (शांत) रूप से विचार, व्यवहार, विश्वास और अभ्यास के द्वारा व्यवस्थित ढंग से निर्मित होती है, जिसे बातचीत के दौरान हम इस्तेमाल करते हैं । (System of thoughts composed of ideas, attitude, courses of action, beliefs and practices that systematically construct the subject and worlds of which they speak.) फ्रांसिस हेनरी और कैरोल टाटर (Frances Henry and Carol Tator) विमर्श के संदर्भ में कहते हैं विमर्श ऐसी भाषा है जो सामाजिक आधार पर विषय के ऐतिहासिक अर्थ को खोलती है । यह सामाजिक पहचान की भाषा है । जो कभी ‘न्यूट्रल’ नहीं होती है क्योंकि यह व्यक्तिक व सामाजिक रूप से जुड़ी होती है । ‘Discourse is the way in which language is used socially to convey broad historical meaning. It is language identified by the social conditions of it use, by who is using it and under what condition. Language can never be ‘neural’ because it bridges our personal and social words.’ इस प्रकार विमर्श सामाजिक, ऐतिहासिक और आज के संदर्भों में सोचने, बहस करने व मौखिक संचार का एक तरीका है जो भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त होता है । जेंडर का प्रश्न भी विमर्श की इसी तकनीक को अपनाता है तथा जेंडर पर खुली बहस की मांग करता है ।

जेंडर शब्द का संबंध प्रारम्भ में भाषा में लिंग अर्थात स्त्रीलिंग व पुल्लिंग से रहा है । अन्य भाषाओं में जेंडर विभाजन की इस प्रक्रिया के तीन रूप स्त्रीलिंग (feminine), पुल्लिंग (masculine) और न्यूट्रल जेंडर का प्रयोग मिलता है तो हिंदी में स्त्रीलिंग व पुल्लिंग केवल दो रूपों का प्रयोग मिलता है वहीं वैदिक संस्कृत में देखते हैं तो एक तीसरा लिंग नपुंसकलिंग (उभयलिंगी) का प्रयोग भी भाषा में देखा जा सकता है । पश्चिम में तीसरे न्यूट्रल जेंडर विभाजन का आधार स्त्रीत्व व पुरुषत्व के समाज में निर्धारित गुणों से अलग स्वतंत्र पहचान का होना था तो वहीं संस्कृत में तीसरे लिंग से अभिप्राय स्त्रीत्व व पुरुषत्व के गुणों का साथ होना था । जो आज भी भाषाविज्ञान में देखा जा सकता है । स्त्रीत्व व पुरुषत्व शब्दों के प्रयोग के संदर्भ में अरस्तु ने कहा कि ‘ग्रीक विचारक ‘प्रोतागोरस’ (Protagoras) ने ही भाषा में स्त्रीत्व (feminine), पुरुषत्व (masculine) और न्यूट्रल शब्दों का प्रयोग संज्ञा के वर्गीकरण के संदर्भ में किया’। भाषा में जेंडर की यह विभाजन प्रक्रिया व्यवहार मूलक थी जैसा कि चार्ल्स होकेट (Charls Hockett) ने कहा ‘शब्दों के व्यवहार के आधार पर संज्ञा का वर्गीकृत विभाजन जेंडर (genders) है’। भाषा के संदर्भ में भले ही जेंडर का प्रयोग शब्दों के व्यवहारमूलक प्रयोग पर आधारित था लेकिन सामाजिक संदर्भों को भी भाषा से अलग करके नहीं देखा जा सकता जैसा कि ‘बारबरा जानसन का मानना था कि जेंडर (स्त्री) का सवाल भाषा का सवाल है क्योंकि भाषा भौतिक रूपों में हस्तक्षेप करती है’।

सामाजिक परिप्रेक्ष्य से पूर्व जेंडर का संबंध भाषा से था जो आज भी है । अब यदि सामाजिक संदर्भों में इसे देखने का प्रयास करें तो जेंडर का संबंध लिंग (सेक्स) से है या कहा जा सकता है कि आज भी जेंडर को लिंग ही माना जाता है । जिस तरह भाषा में शब्दों के वर्गीकरण के लिए उनके सामाजिक व्यवहार को आधार बनाया गया और उन्हें स्त्रीलिंग, पुल्लिंग व न्यूट्रल रूप में विभाजित किया गया उसी प्रकार सामाजिक संरचना में ‘सेक्स’ को सामाजिक प्रकिया के तहत स्त्री और पुरुष की निर्धारित भूमिकाओं में ढाला गया । स्त्री और पुरुष दोनों ही जैविक संरचना हैं यह सत्य है इन्हें बदला नहीं जा सकता । लेकिन इनकी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक भूमिका का निर्धारण जब किया जाता है तो इनके अपने स्वतंत्र अस्तित्व पर प्रश्न अंकित हो जाता है, जिसका जवाब जेंडर देता है । ‘जेंडर अस्मिता के पहचान का सबसे मूक घटक है जो हमें स्त्री व पुरुष की निर्धारित सीमा को परिभाषित करने और दुनिया को देखने के नजरिए की नाटकीय भूमिका को बताता है’। यह केवल लिंगों के बीच के अंतर को नहीं बताता वरन सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्तर पर सत्ता से इसके संबंध को भी परिभाषित करता है, सत्ता से लिंग व जेंडर का संबंध केवल आज के संदर्भों में ही नहीं बताता बल्कि इतिहास में स्त्री की भूमिका से उसे जोड़कर देखता है ।

सामाजिक संदर्भों में जब हम जेंडर की बात करते हैं तो इसका पहला प्रयोग लिंग (Sex) और लिंग की भूमिका (Sex Role) के अंतर को स्पष्ट करने के दौरान सामने आता है ,जहाँ स्त्री और पुरुष का जैविक आधार पर विभाजन न होकर समाज द्वारा तय मानदंडो पर विभाजन है । जिसमें स्त्री की भूमिका शोषित की रही तो पुरुष की शोषक की । जिसका जिक्र 1845 में  मारगरेट फूलर की Women in the Nineteenth Century, 1851 में  हैरिस्ट टेलर मिल की ‘इन फ्रेनचीसमेन्ट ऑफ वुमेन’( Enfranchisement of Women (, 1865 में जॉन स्टुअर्ट मिल’ की ‘A Subjection of Women’, 1884 में फ्रेडरिक ऐगल्स की ‘परिवार निजी संपति और राज्य की उत्पति’ पुस्तकों में मिलता है । लेकिन लिंग और लिंग की भूमिका पर पहले पहल बातचीत 1935 में सांस्कृतिक नृविज्ञानी (cultural anthropologist) मार्गरेट मीड (Margaret Mead) अपने शोध ‘Sex and Temperament in Three Primitive Societies’ में करती हैं.  वह  Papua New Guinea के Mundugamor (chambri), Arapesh and Tchamouli आदिवासी समाज के सेक्स और व्यवहार को लेकर लिखती हैं । उनके अध्ययन का केंद्र भले ही आदवासी समाज रहा हो मगर इसके साथ ही वह समाज में प्राकृतिक सेक्स और प्रशिक्षित सेक्स के बीच के अंतर को महसूस करती हैं ‘किस तरह एक समाज ऐसा है ,जहाँ महिलाएं गुलाम की भूमिका में हैं तो दूसरी और छाम्बरी आदिवासी समाज है ,जहाँ महिलाएं सत्ता में हैं और पुरुष गुलाम और कमजोर की भूमिका में हैं ’। मार्गरेट का यह विश्लेषण सेक्स और सेक्स की सामाजिक भूमिका की बात सामने लाता है । मार्गरेट ‘सेक्स’ और ‘सेक्स की भूमिका’ के जिस विचार को सामने लाती हैं उसमें वह लिंग अर्थात ‘सेक्स’ आधारित श्रम विभाजन को प्राकृतिक मानती हैं । जबकि 1955 में मनोवैज्ञानिक और सेक्सोलोजिस्ट जान विलियम मनी इसे ख़ारिज करते देखें जा सकते है । सेक्स और सेक्स की भूमिका (जेंडर) के संदर्भ में मनी कहते हैं कि ‘जेंडर केवल स्त्री और पुरुष की सामाजिक स्थिति भर नहीं है बल्कि व्यक्ति पहचान और उसका निर्धारण है । यह केवल जेनेटिला पर आधारित नहीं बल्कि संकेत वैज्ञानिक और व्यवहारमूलक दायरे के अंतर्गत देखा जा सकता है, जो प्राकृतिक भिन्नता से इत्तर है’ ।

1940 से 60 तक आते-आते सामाजिक विभाजन की प्रक्रिया का यह विचार वैचारिक विमर्श को जन्म देता है । सेक्स और सेक्स की भूमिका पर अब वैचारिक रूप से लेखन होने लगता है । जिसमें 1949 में सिमोन द बोउवार का ‘द सेकंड सेक्स’, 1963 में केट मिलेट की ‘द फेमिनिन मिस्टिक’, 1968 में सुलामिथ फायर स्टोन की ‘डायलेक्टिक ऑफ़ सेक्स’, 1971 में जूलियट मिशेल की ‘वुमेन स्टेट’ जैसी पुस्तकें मुख्य हैं । सेक्स और सेक्स की भूमिका जैसे शब्द अब समाज में परिभाषित होने लगे थे लेकिन जेंडर शब्द का प्रयोग अब भी सामाजिक प्रक्रिया में उस रूप में नहीं देखा जा रहा था । 1968 में मनोवैज्ञानिक रोबर्ट स्टोलर (Robert jesse stoller) ने अपने शोध परियोजना कार्य के दौरान 85 मरीजों का अध्ययन किया । इस अध्ययन का केंद्र बिंदु सेक्स और जेंडर के बीच के अंतर को जानना व जेंडर पहचान के स्वतंत्र प्रश्न पर बात करना था । स्टोलर Sex and Gender: The Development of Masculinity and Femininity पुस्तक में सेक्स और जेंडर के बीच के अंतर पर बात करते हैं । स्टोलर ने ‘जेंडर का अर्थ प्रकृति से न मानकर मनोवैज्ञानिक व सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़ कर देखा और कहा कि सेक्स का संबंध स्त्री और पुरुष से है तो जेंडर का संबंध स्त्रीत्व व पुरुषत्व से । ये दोनों ही शब्द लिंग की प्राकृतिक संरचना से स्वतंत्र अर्थ ग्रहण करते हैं’ जेंडर और कामुकता के संबंध में वह लिखते हैं ‘Those aspects of sexuality that are called gender are primarily culturally determined; that is learn postnatal’. रोबर्ट स्टोलर का यह अब तक का पहला स्वतंत्र अध्ययन था जिसमें लिंग और जेंडर को अलग-अलग रूपों में सामने लाया गया । साथ ही उन्हें परिभाषित किया गया । इसके साथ ही जेंडर और सेक्स को लेकर एक गहन चिंतन 70 के पास शुरू होता है । 1972 में ब्रिटिश समाजशास्त्री व नारीवादी लेखिका ऐना ओक्ले (Ann Oakley) की पुस्तक sex, gender and Society इसी चिंतन का आग़ाज थी । ऐना के अनुसार जेंडर सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना है, जो स्त्रीत्व और पुरुषत्व के गुणों को गढ़ने के सामाजिक नियम व कानूनों का निर्धारण करता है । 1980 में ऐना के विचारों से समाजशास्त्री विचारक Raewyn Connell सहमत नजर आती हैं । ‘कोनेल’ ने समाजिक दृष्टिकोण से लिंग और जेंडर के सामाजिक संबंध पर लिखा । उनका मानना था की जेंडर सामाजिक निर्मिति है जिसमें व्यक्ति की पहचान गौण होती है और समाज की भूमिका मुख्य ।

‘फ्रेंच इतिहासकार व विचारक मिशेल फूको (Foucalt) 1980 में अपनी पुस्तक‘The History of Sexuality’ में ज्ञान और सत्ता के चरित्र की बात करते हैं और बताते हैं कि किस तरह ज्ञान और सत्ता स्त्री को अनुकूलित करते हैं । फूको कहते हैं कि ‘It is important to examine the different ways in which women experience their bodies. Bodies are given role as a site for political struggle and shaped and trained by the networks of social and political power in which they exist. For example, men tend to be thought to take up space larger than women, while women are socialized to take up as little space as possible.’ शरीर एक ‘ऑब्जेक्ट’ है जिसे समाज, राजनीति व सत्ता अपने अनुसार बनाती व प्रशिक्षित करती है । जैसे पुरुष हमेशा से समाज में अपने लिए अधिक ‘स्पेस’ चाहता है वहीं स्त्री थोड़े से ही में खुद को संतुष्ट पाती है क्योंकि उसे ऐसी सामाजिक निर्मिती दी जाती है की वह बड़ा न सोच सके ।

अमेरीकन उग्र नारीवादी लेखिका एंड्रिया रीटा डोर्किन (Andrea Rita Dworkin) 1981 में अपनी पुस्तक Pornography: Men Possessing Women में लिखती हैं कि- हमारी संस्कृति में स्त्री शरीर का कोई भाग ऐसा नहीं है जो स्पर्श न किया गया हो बल्कि उसके लिए एक आदर्श और सुंदर शरीर की छवि निर्मित की गई है, जिसके अनुरूप उसे बनाए रखने का प्रयास समाज करता है । प्रारंभिक दौर में चीन में लड़कियों के पैरों को बांधकर रखना तो ब्रिटिशकाल में महिलाओं का अपने हाथों व शरीर के हरेक भाग का ढक कर रखना सामाजिक पहचान माना गया । जिसका उद्देश्य पुरुष समाज द्वारा आदर्श व सुंदर महिला की निर्मिति था । जिसमें सिर से पैर तक उसके शरीर को एक ऑब्जेक्ट के रूप में देखा व कला के जरिए सुधारा गया । यह प्रक्रिया आज भी दोहराई जा रही है ,जो एक स्त्री होने की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक वास्तविकता भी है’।
मानवशास्त्री और नारीवादी लेखिका ‘Lynda birke’ 1986 में अपनी पुस्तक women, feminism and Biology: The Feminist Challenges में सेक्स और जेंडर पर बहस के दौरान जीवविज्ञान को भी साथ में रखकर देखने की बात करती हैं जो कि मनुष्य के प्राकृतिक संबंधों को समझने का एक वैज्ञानिक नजरिया है । ‘सेक्स और जेंडर दोनों में से कोई भी स्थिर नहीं है । जिस प्रकार मानव शरीर अपने आसपास के सामाजिक वातावरण के अनुकूल परिवर्तित होता रहता है उसी प्रकार सेक्स और जेंडर भी’ ।

अमेरीकन विचारक और जेंडर सिद्धांतकार जूडिथ बटलर (Judith Butler ) 1988 में ‘Perfomative acts and gender constitution’ निबंध में लिखते हैं कि जेंडर का संबंध समाज द्वारा स्वीकृत क्रियात्मक उपलब्धियों व निषेध से है या कहें कि यह एक शैली है जो समाज द्वारा निर्धारित सकेतों, आंदोलनों व अधिनियमों के गठन के तरीके के रूप में देखी जा सकती है, जो एक प्रकार से स्वयं को समझने का भ्रम उत्पन्न करता है व  प्राकृतिक लिंग से अलग सामाजिक गतिविधियों व क्रियाओं के रूप में सामने आता है । बटलर के अनुसार यह सामाजिक क्रियाएं, कार्यकलाप और गतिविधियाँ स्वयं भी जेंडर की निर्मिति करते हैं ।
नारीवादी विचारक एलिसन जैग्गर सेक्स और जेंडर के संदर्भ में लिखती हैं ‘इंसान का हाथ श्रम का औजार ही नहीं, श्रम की उपज भी है ।’अर्थात मानवीय हस्तक्षेप बाहरी वातावरण को परिवर्तित करता है और साथ ही बाहरी वातावरण में होने वाले परिवर्तनों से मानव शरीर में परिवर्तन और उसका स्वरूप निर्धारित होता है । इसका संदर्भ है कि सेक्स और जेंडर दोनों ही ‘न्यूट्रल’ नहीं हैं बल्कि एलिसन और lynda के मत के अनुसार कहा जाए तो ‘परिवर्तनीय’ हैं ।
Acc to Encyclopaedia of women autobiography: – Gender is supposedly ‘inscribed’ by culture onto this already determined body, and the cultural associations that come with ones masculine or feminine gender are figured as the source of one’s sexualised subjectivity…It is therefore unnecessary to restrict gender options to only two possibilities (masculine and feminine) as gender does not need to follow the sexual binary. If we assume two sexes, there is still space for many gender identifications, opening up a space for non heterosexual gender identities.जेंडर संस्कृति द्वारा पहले से निर्धारित स्त्री–पुरुष शारीरिक संरचना के आधार पर किया गया विभाजन है । जो स्त्रीत्व व पुरुषत्व के सामाजिक विचार को गढ़ता है ।….जेंडर के संबंध में हम केवल दो संभावनाओं स्त्री-पुरुष पर ही बात करते हैं जबकि उससे इत्तर एक तीसरा जेंडर भी है जो इत्तरलिंगी है । वह भी जेंडर पहचान के प्रश्न से जूझता देखा जा सकता है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार- Gender Refers to the socially constructed roles behavior actives, and attributes’ that given society considers appropriate for men and women’
जैविक बनावट और संस्कृति के अंतरसंबंधों की समझ को अगर हम जेंडर पर लागू करें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि महिलाओं के शरीर की बनावट भी सामाजिक बंधनों और सौन्दर्य के मानकों द्वारा निर्धारित की गई है । शरीर का स्वरूप जितना ‘प्रकृति’ से निर्धारित हुआ है उतना ही ‘संस्कृति’ से भी । इस प्रकार महिलाओं की  मौजूदा अधीनता, जैविक असमानता से नहीं पैदा होती है बल्कि यह ऐसे सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों और संस्थाओं की देन है जिसका उदाहरण ज्यां जांक रूसो हैं । रूसो क्रांतिकारी राजनैतिक सिद्धांतों के सबसे जटिल बौद्धिक विचारक माने जाते हैं, स्त्रियों के संबंध में इनका कहना है ‘स्त्री का निर्माण पुरुष को खुश करने के लिए विशेष तौर पर हुआ है । ..पुरुष की विशेषता उसकी शक्ति है, वह ख़ुशी देता है क्योंकि वह शक्तिशाली है । मैं स्वीकार करता हूँ कि यह प्रेम का नियम नया नहीं है, यह प्रकृति का नियम है, जो कि खुद प्रेम से भी पुराना है.. यदि स्त्री का निर्माण पुरुष को खुश करने के लिए तथा उसके नियंत्रण में रहने के लिए हुआ है तो उसे ख़ुद को पुरुष की नजरों में अधिक आनंददाई बनाने की कोशिश करनी चाहिए, न की उसे नाराज करने की’ । इस तरह रूसो स्त्री की चारित्रिक शुद्धता और पतितत्व की समझ को मजबूत करते हैं साथ ही परिवार में ‘पावर’ अर्थात सत्ता के चरित्र को दिखाते हैं जिसका जिक्र ‘फूको’ ने भी किया है । रूसो के अनुसार बच्चों के संरक्षण के लिए ‘पत्नी के लैंगिक स्वातंत्र्य पर पूर्ण नियंत्रण की जरुरत है’।

भारतीय संदर्भ में जेंडर पर अभी बहस चल रही है । जिसमें कमला भसीन, उमा चक्रवर्ती, मैत्रयी कृष्णराज , शर्मिला रेगे और निवेदिता मेनन का नाम प्रमुख रूप से सामने आता है । कमला भसीन के अनुसार ‘जेंडर सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में स्त्री-पुरुष को दी गई परिभाषा है, जिसके माध्यम से समाज उन्हें स्त्री और पुरुष दोनों की सामाजिक भूमिका में विभाजित करता है । यह समाज की सच्चाई को मापने का एक विश्लेषणात्मक औजार है’। मैत्रयी कृष्णराज लिखती हैं समाज में जितनी भी आर्थिक और राजनैतिक समस्याएं हैं उनका संबंध जेंडर से है । ‘जेंडर लिंग आधारित श्रम का विभाजन हैं जिसे पितृसत्ता ने सामाजिक अनुशासनों के द्वारा तय किया गया । जिसकी संकल्पना को परिवार और आर्थिक आधार पर खोजना अनिवार्य है । इसके अतिरिक्त जेंडर एक विश्लेषणात्मक श्रेणी है जो सामाजिक संरचना व उसके जटिल व्यवहारमूलक संबंधों को स्त्री-पुरुष के बीच के संबंधों से जानने का प्रयास करता है’। शर्मिला रेगे जेंडर को विचार की प्रक्रिया मानती हैं साथ ही ऐसा वर्ग है जिसमें कुछ संबंधों को रखा जाए और उनसे निर्मित संबंधों को जाना जा सके । उमा चक्रवर्ती भी सामाजिक संरचना को स्त्री की निर्मिती का कारण मानती हैं–‘स्त्री का परिवेश उसकी पराधीनता की प्रकृति को तय करता रहा है’। निवेदिता मेनन भी जेंडर को सामाजिक निर्मिती का ही रूप मानती हैं साथ ही उनका मानना है की जेंडर की यह अवधारणा भारत में पहले से मौजूद रही है यह आधुनिक सभ्यता की देन नहीं है बल्कि ‘प्राक आधुनिक भारतीय संस्कृति में विभिन्न प्रकार की यौन पहचानों के लिए कहीं अधिक व्यापक स्थान उपलब्ध था मसलन उस काल में हिजड़ों के पास भी एक सामाजिक स्वीकार्यता मौजूद थी जो समकालीन समाज में नहीं है । सूफी और भक्ति परम्पराएँ उभयलैंगिकता पर आधारित थी जो अकसर द्विलिंगी मॉडल को खारिज करते थे । दो शताब्दी पहले शिवभक्त देवरा दासीमय्या ने लिखा था–यदि स्तन और लंबे बालों को देखते हैं / तो वह उसे स्त्री कहते हैं / अगर उन्हें दाढ़ी मूंछ दिखाई देते हैं/ तो वह उसे पुरुष कहते हैं / लेकिन भीतर देखो / इन दोनों के बीच जो आत्मा है/ वह न स्त्री है न पुरुष है ..’ ।  भारतीय भाषाओं में इस तरह के कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जो यह बताते हैं कि भारत में ‘लिंग’ और ‘जेंडर’ के अंतर को स्पष्ट करता विचार पहले से मौजूद रहा है । सेक्स और जेंडर के बीच के अंतर और समाज में निर्धारित उनकी भूमिका पर यदि बात करें तो इसका अध्ययन जेंडर के अंतर्गत किया जाता है ।

प्रभा खेतान

जेंडर शब्द की उत्पति व उसके प्रयोग के संदर्भ में अलग-अलग मतों को अब तक जाना व समझा गया । विभिन्न भाषा वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, इतिहासकार, मनोवैज्ञानिक, नृविज्ञानी, मानवशास्त्री, जीव वैज्ञानिक व नारीवादियों द्वारा जेंडर के संदर्भ में जो कहा गया उसे देखने और समझने का हमने प्रयास किया । जिसके आधार पर जेंडर को परिभाषित किया जा सकेगा । जेंडर की अपनी कोई मुकम्मल परिभाषा नहीं है कुछ ने इसे भाषा के संदर्भ में देखा तो कुछ ने सामाजिक संदर्भों में इसके अतिरिक्त जेंडर को इतिहास, संस्कृति, प्रकृति, सेक्स और सत्ता से जोड़कर भी देखनें व समझने का प्रयास किया गया । स्त्री के संदर्भ में हमेशा से माना गया कि वह एक ‘ऑब्जेक्ट’है फिर वह चाहे पाश्चात्य में किर्केगार्द हो ‘जिन्होंने नारी को जटिल रहस्मय सृष्टि माना’ या फिर नीत्शे ‘जिसने माना कि नारी पुरुष का सबसे पसंदीदा या कहें कि खतरनाक खेल है’, वहीं रूसो ने ‘स्त्री की निर्मिति पुरुष को खुश करना स्वीकारा’। भारतीय संदर्भों में भी स्त्री को ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ के रूप में देखा व स्वीकारा गया जहाँ उसकी उपयोगिता पुरुष को खुश करने तक ही सीमित थी । महादेवी वर्मा लिखती हैं ‘स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण प्रतिष्ठा चाहती है । कारण वह जान गई है की एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना है तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाता है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे का देखते रहना है, जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे’। सामाजिक विकास की प्रक्रिया में सक्रिय प्रागैतिहास कालीन, वैदिक कालीन, ब्राह्मण कालीन सामाजिक व्यवस्था से लेकर आज के समय तक जब भी हम स्त्री के परिप्रेक्ष्य में बात करते हैं तो उसे पराधीन व सेक्स आब्जेक्ट के रूप में व्याख्यित करते या देवत्व के बोझ तले खुद के अस्तित्व को दम तोड़ते हुए देखते हैं । इस तरह स्त्री अस्मिता का प्रश्न स्त्री होने के साथ ही कहीं गौण होता गया । अब सोचनीय विचार है की स्त्री होना क्या है ? जिसका जिक्र सिमोन भी करती हैं कि ‘स्त्री पैदा होती नहीं बल्कि बनाई जाती है’। सामाजिक नियमों व क्रियाओं के अनुरूप सामजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक आधार पर मनुष्य-मनुष्य में भेद करना और एक को स्त्री और दूसरे को पुरुष रूप में सामाजिक मान्यता देना जैसी सामाजिक प्रक्रिया के पीछे जो सामाजिक ‘कंडीशनिंग’ काम करती है और जिसका प्रभाव संकोची, कमजोर, शांत, लज्जाशील व अन्य स्त्रियोचित गुणों में ढालने की प्रक्रिया से है जो प्राकृतिक नहीं मानवीय प्रक्रिया के तहत होती है । सामाजिक आधार पर कंडीशनिंग के कारणों को जानना व उसका विश्लेषण जेंडर है ।

जेंडर एक तकनीक या कहें की विश्लेषण का ‘टूल’ है, जिससे टेक्स्ट के साथ-साथ उसके परिवेश व उसमें स्त्री की भूमिका को विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सत्ता की नीतियों के आधार पर समझा जा सकता है । जो समाज में ‘स्त्री’ होने की नाटकीय भूमिका को निर्मित करता है जिसे ‘सोशल कंडीशनिंग’ भी कहा जाता है । कंडिशनिंग की इस प्रक्रिया को जेंडर के अंतर्गत समझाने का प्रयास किया जाता है । सार्वभौमिक रूप में देखा जाए तो जेंडर के संदर्भ में स्त्री कंडीशनिंग एक समान रूप से होती है भले ही तरीके अलग-अलग हो क्योंकि स्थान, परिवेश व भाषा का भी इसमें अहम् योगदान रहता है ।    सामाजिक रूप में जहाँ जेंडर समानता का प्रश्न प्रमुख रूप से उभरा तो वहीं लेखन में भी इसको लेकर एक बहस चली । 18 वी शताब्दी में जब आत्मकथा लेखन प्रारंभ हुआ, तब माना गया कि आत्मकथा किसी विराट व्यक्ति की हो सकती है । शायद ही तब किसी ने कल्पना की हो कि साधारण व्यक्ति और उसका जीवन भी आत्मकथा का केंद्र बन सकता है । स्त्री ने जब लिखना शुरू किया तो लिखने के साथ ही पहली प्रतिक्रिया उसे जेंडर विभेद की मिलती है । जहाँ उसके लेखन को धमाके के रूप में देखा जाता है । हिंदी में आत्मकथा लेखन अन्य भाषाओं की तुलना में देरी से होता है । बांग्ला में जहाँ 1865 में रसा सुंदरी देवी अपनी आत्मकथा ‘अमार जीवन’ लिखती हैं तो हिंदी में 62 साल बाद 1927 में स्फुरना देवी ‘अबलाओं का इंसाफ’। आज़ादी से पूर्व जहाँ हिंदी में केवल दो स्त्री आत्मकथाएं आती हैं तो आज़ादी के उपरांत बढ़कर तीन होती हैं, परंतु वहीं 1990 के बाद अस्मितामूलक चिंतन का प्रभाव कहा जाए या अस्मिता के पहचान का प्रश्न जिसने हमें इन 23 सालों में 30 से भी अधिक स्त्री आत्मकथाओं से परिचित कराया । जिनमें हिंदी की अपनी अठारह आत्मकथाएं हैं, जो साहित्यिक व गैर साहित्यिक दोनों रूपों में हमारे समक्ष आती हैं । हिंदी आत्मकथा विधा में प्रभा खेतान के द्वारा लिखी गई आत्मकथा अन्या से अनन्या का महतवपूर्ण स्थान है । हिंदी में स्त्रियों के द्वारा लिखी गई आत्मकथाओं में निजी और सार्वजनिक जीवन के बीच की दरारें कम ही उजागर होती हैं अन्या से अनन्या ऐसी आत्मकथा है जिसमें ये दरारे पूर्ण रूप से उभरी हैं । यह सिर्फ आत्मकथ्य ही न होकर राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक संदर्भों का स्त्री जीवन पर भिन्न-भिन्न तरीके से पड़ने वाले प्रभावों का दस्तावेज भी है । मेरे इस शोध आलेख का केन्द्रीय बिंदु भी यह आत्मकथा है । जेंडर विमर्श के विभिन्न आयामों के परिप्रेक्ष्य में अन्या से अनन्या आत्मकथा का मूल्यांकन करना इस शोध आलेख का ध्येय है । जेंडर के सामाजिक और राजनैतिक पहलू पर सुधा सिंह लिखती हैं–‘जेंडर विमर्श राजनैतिक विमर्श है यह देशकाल वातावरण से अलग नही हो सकता है । जेंडर व्यवहार मूलक सामाजिक निर्मिती है, इसमें केवल स्त्री ही शामिल नहीं है । पुरुष और स्त्री के समलैंगिक संबंध और उसकी जटिलताएँ भी शामिल हैं’। जेंडर विमर्श का यह स्वरूप आत्मकथाओं में भी देखा जा सकता है । आत्मकथा केवल व्यक्ति विशेष की जीवन गाथा ही नहीं बल्कि दूसरों के साथ जीवन प्रसंगों का साझा है । आत्मकथा का यदि विग्रह करते हैं तो, भी पाते हैं कि ‘आत्म’ अपना है ‘कथा’ सबकी जैसा की प्रेमचंद ने माना कि आत्मकथा का संबंध यथार्थ से है जिससे लेखक स्वयं तो आहत होता ही है उसका परिवेश भी उससे अछूता नहीं रहता ‘अभी तो यह यथार्थ का बड़ा-सा पत्थर, कवि के हृदय पर । इस पत्थर से कवि कभी खुद लहूलुहान होता है, तो कभी इसे बाहर फेंककर अपने परिवेश को घायल करता है’। इस प्रकार जेंडर का अध्ययन आत्मकथाओं के जरिए अधिक सटीक रूप में किया जा सकता है ।

प्रभा खेतान की आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ का अध्ययन किया जाए तो जेंडर असमानता के इस मूल चरित्र को उसके पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक रूप में आत्मकथा दिखाती है । प्रभा खेतान स्वयं विमर्श की पैरोकार रही हैं- स्वतंत्र व्यक्तित्व व आजीवन अविवाहित रहकर विवाह संस्था को चुनौती, विवाहित पुरुष से प्रेम कर बहिष्कार को स्वीकारना, व्यवसाय में स्त्री होकर सफल रहना उनके संघर्ष को चित्रित करता है । आत्मकथा के शुरूआती पृष्ठों में वह भारतीय समाज में स्त्री अस्मिता का प्रश्न उठाती हैं । जहाँ पहचान की यह समस्या पुरुष के समक्ष नहीं आती उसकी पहचान स्थायी होती है । स्त्री की तो पहचान ही उसकी अपनी नहीं, पहले पिता, फिर पति अगर दोनों ही न हो, यह विचारणीय प्रश्न है । जेंडर के संदर्भ में समझा जाए तो स्त्री को सदा ही समाज ने कमजोर व आश्रित माना व बनाया जिसके लिए पहले पिता फिर पति के संरक्षण की व्यवस्था की गई। जेंडर विमर्श में स्त्री का स्त्री होना ही आज सबसे बड़ा प्रश्न बनकर उभरता है । उसका अपना व्यक्तित्व स्वतंत्र कहाँ  है ? जिस स्त्री की बात हमारा समाज करता है वह समाज निर्मित है जैसा की जर्मेन ग्रीयर लिखती हैं ‘खुद प्रकृति भी हमेशा ही स्पष्ट नहीं होती । कभी-कभी कन्या शिशु का भगशिशन ऐसा सुविकसित होता है कि उसे लड़का मान लिया जाता है इसी तरह, कई बालक अविकसित होते हैं, या उनके जननांग विरूप या छिपे होते हैं, और उन्हें लड़की मान लिया जाता है’। जब प्रकृति ही स्त्री-पुरुष की लैंगिक संरचना को उनके व्यक्तित्व का आधार नहीं बनाती तो समाज क्यों ? फिर यदि स्त्री पितृसत्ता द्वारा निर्मित छवि को पहचान जाती है और उससे अलग होकर जीने की चाह रखती है तो समाज उसे जीने नहीं देता । प्रभा खेतान पहचान के जिस प्रश्न को बीसवी सदी में उठाती है उनसे पहले यूरोप में इब्सन अपने नाटक ‘डॉल हाउस’ में नोरा के माध्यम से स्त्री पहचान की बात करते देखे जाते हैं ‘..मेरा अस्तित्व सिर्फ तुम्हारा जी बहलाने और तुम्हें खुश करने के लिए है और तुम भी मुझे अपनी ख़ुशी का खिलौना बनाए रखना चाहते हो … जबकि मेरा भी अस्तित्व है ‘पत्नी और माँ की इस भूमिका से भी पहले मैं एक इंसान, ठीक वैसे ही, जैसे तुम हो’। समाज में व्यक्ति पहचान का संबंध एक और कर्तव्यों से रहा तो दूसरी और सेक्स आधारित भेद से । ऐसे में व्यक्ति की अपनी पहचान का प्रश्न तो बना रहा । प्रभा खेतान समाज के नियम व  कानूनों को अस्वीकारती हैं और अपनी पहचान की मांग करती है जो समाज उन्हें नहीं दे पाता । समाज की डायरी में स्वतंत्र और आत्मनिर्भर स्त्री के लिए कोई निर्धारित मानक नहीं हैं । ऐसे में प्रभा खेतान का समाज और उसके निर्माताओं से प्रश्न करना जायज है -‘मैं प्रभा खेतान, मैं कौन हूँ, मेरी कोई पहचान नहीं  है? मैं सधवा नहीं, क्योंकि मेरी शादी नहीं हुई, मैं विधवा नहीं…क्योंकि दिवंगत पति नहीं, मैं कोठे में बैठी रंडी भी नहीं …क्योंकि मैं अपने देह का व्यापार भी नहीं करती स्वावलंबी हूँ अपना भरण-पोषण ख़ुद करती हूँ । स्वेच्छा से एक जीवन का वरण किया है ।

परिवार ‘जेंडर इजेशन’ की पहली धूरी  है । ‘घर बैठों राई जीरा चुनों, सिलाई-कढ़ाई करो ..सुई में धागा ठीक से पीरों अरे तेरा हाथ क्यों कांपता है, सीधी बैठो कूबड़ मत निकालों’, इसी तरह शिक्षा में यह भेदभाव ‘..मुझे अपनी बेटियों की कोई नौकरी नहीं करानी है ? इन्हें कोई मेंम बनाना है; घर में रहे, घर का काम सीखे’। यह तमाम उदाहरण व क्रियाएं जेंडर निर्मिति में सहायक होते हैं । जुडिथ बटलर ने इसे परर्फोर्मिटी अर्थात नाटकीयता कहा । जिसे समाज में अलग-अलग रूपों में स्त्री निभाती है । जिसका निर्देशक सत्ता व समाज है जो शारीरिक व मानसिक रूप से उन्हें अपनी आवश्यकता अनुसार निर्देशित करता है । जिनमें उन तमाम गतिविधियों को शामिल किया जा सकता है जो केवल एक स्त्री के लिए समाज द्वारा निर्धारित किए जाते हैं । यह सोच हमें प्रभा खेतान के परिवेश पर निगाह डालने पर मजबूर करती है । प्रभा खेतान मारवाड़ी परिवार से थी । उनके लेखन में मारवाड़ी संस्कृति व समाज का प्रभाव दिखाई देता है । उनका लेखन भले ही उनके परिवेश की सीमाओं को लांघता दिखाई देता है परंतु उनका अपना अस्तित्व परिवार व समाज से संकुचित होता देखा जा सकता है । फिर चाहे वह माता-पिता का उनके प्रति व्यवहार हो या समाज में अविवाहित रहकर विवाहित पुरुष से स्थापित संबंध हो । वह समाज व स्वयं का विरोध सहती हैं । स्वयं के किए पर ग्लानि का भाव आना उनकी मानसिक और सामाजिक स्थिति को दिखाता है कि स्त्री का स्वयं के प्रति लिए गए निर्णयों को समाज स्वीकार नहीं करता वह उसे मानसिक रूप से अपने किए पर शर्मिदा महसूस कराने का प्रयास करता है ।  समाज में धर्म को जीवन सत्य के रूप में स्वीकारा गया है । जहाँ महिलाएं सदा से धर्म परायण रही हैं । आत्मकथा में प्रभा खेतान प्रश्न उठाती हैं कि स्त्री ही आखिर क्यों विवाह के पहले अपना नाम और धर्म बदलने को मजबूर होती है । क्यों समाज में यह जेंडर विभेद है । आत्मकथा की एक पात्र आइलिन का कहना था ‘मेरा तलाक हुआ । उतनी बार मैंने नया धर्म अपनाया । कोई ख़ुशी-ख़ुशी थोड़े ही धर्म बदलता है । देरिदा ने जिसे ‘डीकंस्ट्रक्शन’ कहा और भाषा के बाइनरी रूप में जाकर उसके अध्ययन की बात की । आइलन का वाक्य उसकी तह तक जाने की बात करता है । आखिर समाज की निर्मिती में स्त्री के लिए ही परिवर्तित होने के नियम क्यों बनाए गए हैं ?

स्त्री और पुरुष शरीर के केवल एक गुणसूत्र के अलग होने से हम स्त्री के व्यक्तित्व को पूर्णतः पुरुष से अलग कर देते हैं जबकि ऐसा नहीं है यह शारीरिक संरचना भर है । जिसका जिक्र जर्मेन ग्रीयर करती हैं –‘शैशव से ही जिन ‘सामान्य’ लैंगिक भूमिकाओं को निभाना हम सीखते हैं वे किसी विपरीत वेषधारी के करतबों जितनी ही सामान्य हैं । सामान्य और वांछनीय माने जाने वाले आकारों और आचार-व्यवहार के अरीब-करीब पहुँचने के लिए स्त्री और पुरुष खुद को विरूप बनाते हैं और इस क्रम को न्यायसंगत ठहराते हुए दोनों लिंगों के बीच के अनुवांशिक अंतर का तर्क देते हैं लेकिन अड़तालीस गुणसूत्रों में से एक ही गुण सूत्र अलग है और इस अतंर को हम स्त्री और पुरुष के पूरे अलगाव का आधार बनाते हैं जैसे कि अड़तालीस के अड़तालीस गुणसूत्र अलग अलग हों’। आत्मकथा में देखें तो इसी शरीरिक संरचना के आधार पर पहले तो उसे स्त्री माना गया फिर समाज द्वारा स्वीकृत और निर्धारित उन सभी मानदंडों को उस पर थोपा गया जो उसके लिए बनाए गए जैसे स्त्री का स्त्री के प्रति देखने का नजरिया व स्त्री का ही स्त्री शरीर के प्रति उपेक्षा व घृणा का भाव होना जिसे आत्मकथा में देखा जा सकता है । ‘अम्मा को मेरा चेहरा, मेरे लंबे-लंबे बाल मेरा बढ़ता हुआ कद, शरीर का उभार और दसवां लगते ही पीरियडस का शुरू हो जाना, कुछ भी तो नहीं सुहाता । ठीक से चलो कूबड़ क्यों निकाल लेती हो? क्या खो-खो लगा रखी है?… और यदि मैं खासी दबाने की कोशिश करती तो क्या गाय की तरह गरगरा रही हैं ?…?’ स्त्री की शारीरिक व जैविक क्रियाएँ जो प्राकृतिक हैं समाज ने उन्हें स्त्री-पुरुष विभेद का प्रमुख कारण माना साथ ही विशेष रूप से स्त्री से जोड़कर उसे देखा गया । जबकि जेंडर की अवधारणा इसे नहीं मानती । ‘बियाह के पहिले कवनों लड़की का ई महिना शुरू हो जाए ते माँ-बाप का सर का बोझ बढ़त है’। क्या स्त्री की जैविक क्रियाएं पाप हैं । समाज ने जिन्हें पाप-पुण्य के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है । ‘पाप ? क्या हर लड़की हर महीने पाप का बोझ बढ़ाती है ?’

समाज द्वारा तय मानदंडों में से प्रमुख है विवाह । जिसका उद्देश्य वैध वारिस व संपति का स्थान्तरण है । समाज में पहले-पहल विवाह नामक न कोई संस्था थी न व्यवस्था । निजी संपति के विचार ने ही इस संस्था को बनाया जिसमें स्त्री की भूमिका नगण्य रही । जिसका जिक्र एंगल्स भी करते हैं ‘आधुनिक परिवार पत्नी की स्पष्ट या प्रच्छन्न दासता पर टिका है .. परिवार के अंदर वह पुरुष बुर्जुआ है और उसकी पत्नी सर्वहारा का प्रतिनिधितव करती हैं’ । राज्य व सत्ता ने स्त्री पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए इसका निर्माण किया साथ ही इसे अनिवार्य माना । प्रभा खेतान सत्ता और समाज के निर्मित स्त्री मानदंडों को तोड़ती नज़र आती हैं भले ही उनकी इच्छा भी विवाह करने व परिवार की थी परंतु परिस्थितियों के कारण वह ऐसा नहीं कर पाती और आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लेती हैं । उनका समाज में अविवाहित रहकर पहचान बनाना व सफल होना समाज को स्वीकार नहीं होता तभी तो वह मानसिक रूप से आहत होती आत्मकथा में देखी जाती हैं । साथ ही भारतीय समाज में अविवाहित स्त्री को किस नजर से देखा जाता है उसका अहसास भी । आज स्थिति यह है कि विवाह का आश्रय भारतीय समाज में स्त्री को सम्मानपूर्ण जीवन व संरक्षण प्रदान करना है । जो समाज का एक छद्म आवरण है जिसके पीछे का यथार्थ इस संरक्षण के मनोविज्ञान में कहीं छिप जाता है । विवाह के नाम पर जिस संरक्षण की बात समाज करता है जर्मेन ग्रीयर के शब्दों में कहा जाए तो ‘जीवन का निषेध है’ एक उदाहरण के जरिए यह बात और स्पष्ट होगी -‘वाणिज्य तंत्र में पति को उसके खांचे में कसने की पत्नी की भूमिका की पहचान की गई । सुरक्षा का वायदा करके कल्याणकारी राज्य अपने अस्तित्व को न्याय संगत ठहराता है, और उसकी उजरत में से उसके बुढ़ापे और बीमारी के लिए हिस्सा वसूलकर कामगार को खुद की ही बैचैनी और किसी भी संभावित दुर्घटना के विरुद्ध बीमा करवाने पर मजबूर करता है’। राज्य अपनी सत्ता के बल पर तो समाज अपने नियम और कायदों के बल पर व्यक्ति का शोषण करता है और यदि वह संभावित व्यक्ति स्त्री हो तो स्थिति और भी दयनीय हो जाती है । प्रभा खेतान डॉ. सर्राफ से प्रेम करने व आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेती है । उनका संकल्प उन्हें आदर्श नारी के खाँचे में नहीं लाता क्योंकि यहाँ वह संरक्षण मांगती नही बल्कि संरक्षण देती हैं डॉ सराफ और उनके परिवार को । जिस कारण समाज व डॉ. सरार्फ स्वयं उनके चरित्र पर आक्षेप करते नज़र आते हैं ‘तुम रंडी खाना खोल लो ।….मैं चीख रही थी… स्वतंत्र स्त्री का क्या यही अर्थ हुआ कि उसे वैश्या का दर्जा दे दिया जाए’ जबकि यदि पुरुष अविवाहित या अकेले रहने का निर्णय लेता है तो उसे संत व महात्मा माना जाता है । समाज का यह विभाजन एक पक्षीय क्यों है ? एक के पास सारे अधिकार दूसरा खाली हाथ । सोचनीय विषय है की आज भी  स्त्री की स्वतंत्रता से अभिप्राय उसके चरित्र की आदर्शवादिता से है । आज भी अकेली स्त्री तुरंत समाज की निगाहों में संदेह के रूप में देखी जाती है । जिसका जिक्र प्रभा खेतान भी करती हैं । स्त्री का अपनी अलग पहचान बनाने का संकल्प ही उसे समाज के कटघरे में ला खडा करता है ‘आप समझती क्यों नहीं कि आप एक अकेली औरत हैं और फ्लैट में लोग आपको शक की निगाहों से देखेंगे’ या ‘क्या बासु नाम के इस पुरुष से तुम्हारा रिश्ता पाक-साफ है ।…. तुम ऑफिस में रहा करो । और न हो तो साथ में बासंती को ले जाओ’। स्त्री के साथ पुरुष का यह व्यवहार उसे हर पल अहसास करता है कि वह कमजोर है उसे संरक्षण की आवश्यकता है । जिसकी खाद हमारा परिवार हमारे संस्कारों में डालता चला जाता है । जो स्त्री को मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर मानने को मजबूर करता है । ‘मुझमें साहस का अभाव था एक भयभीत बच्चे की तरह डैनी फैलाकर मैं उचक-उचक कर दीवारों के पार देखती तो कभी वापस अपने घोसले में सिमट जाती’। स्त्री की इस मानसिकता का निर्माण परिवार व समाज करता है । उसे पैदा होने के उपरांत से ही सुरक्षा व संरक्षण का पाठ सीखता है । स्त्री परवरिश ही उसकी भयभीत मानसिकता का मूल है फिर चाहे वह गृहणी हो या व्यापारिक महिला ।
समाज में श्रम विभाजन का आधार सेक्स है । जिसमें घर की जिम्मेदारी स्त्री की मानी गई तो बाहर पुरुष की । भले उसके पीछे के कारण उनकी शारीरिक व मानसिक स्थितियों को दिया गया । सच तो यही है की यह विभाजन जेंडर व सेक्स आधारित है । राजेन्द्र यादव के शब्दों में कहा जाए तो ‘पुरुष, श्रम के शोषण से गुलाम बना है और औरत, सेक्स शोषण से’। जिसके संदर्भ में कात्यायनी लिखती हैं कि ‘श्रम का शोषण तो समाप्त हो जाएगा, सेक्स के शोषण का क्या होगा । पूंजीवादी समाज में मौजूद श्रम का शोषण समाजवादी संक्रमण की लंबी प्रक्रिया में समाप्त हो जाएगा, पर यदि औरत के सेक्स को ही शोषण का मूल कारण मान लिया जाए, तब तो यह मानना होगा कि यह हमेशा से है और कभी भी समाप्त नही होगा’। जेंडर का प्रश्न इसी सेक्स आधारित भेद की बात करता है । वह स्त्री और पुरुष सेक्स के बीच के अंतर को विमर्श के केंद्र में लाता है । जिसने पहले तो स्त्री को ज्ञान के सभी अनुशासनों से दूर किया फिर घर में रहने के लिए गृहस्थी की ज़िम्मेदारी कर्तव्य का चोला पहना कर उसके जिम्मे कर दिया । प्रभा खेतान लिखती हैं ‘व्यापारिक बातचीत में हम लोग जब भी बैठते तब चाय बनाना मेरा काम रहता सिर्फ इसलिए कि मैं औरत थी । स्वाभविक था यह काम न मिस्टर बासु करते न नीरज और डॉक्टर साहब ?’। प्रभा खेतान समाज की ‘जीन’ में बसी इस सोच की और इशारा करती हैं कि महिला चाहे घरेलू हो या व्यापारिक घर की जिम्मेदारी उसी की है फिर चाहे हम कितने ही बड़े परिवर्तन की बात क्यों न करे परंतु श्रम का यह असमान विभाजन आज भी उसी रूप में है । जूलियट मिशेल लिखती हैं –‘पुरुष, इतिहास की वर्ग वर्चस्व युक्त संरचनाओं में समाहित होते हैं जबकि औरत (औरत के रूप में, वास्तविक उत्पादन में उसका काम चाहे कुछ भी हो), इकाई के रिश्ते नाते से ही परिभाषित होती रही । वर्ग, ऐतिहासिक काल, विशिष्ट सामाजिक स्थिति स्त्रीत्व की अभिव्यक्ति को रूपांतरित कर देते है, परंतु पिता के कानून के समक्ष महिलाओं की स्थिति सब कहीं एक जैसी है’ । समाज में इसे देखा जा सकता है जहाँ आजादी, विभाजन और परिवर्तन की तमाम नीतियों के उपरांत आज भी एक महिला की पहली जिम्मेदारी उसका परिवार है । परिवार से इत्तर कुछ नहीं ।

समाज में स्त्री को हमेशा उन्ही अपराधों के लिए सजा दी जाती है, जिसकी जिम्मेदार वह खुद नहीं होती है । उसका स्त्री होना उसका नही सत्ता, समाज और संस्कृति की परवरिश रही तो उस परवरिश से उभरे गुण उसकी सीमा रेखा। जिसने जाने-अनजाने में उसे स्वयं के प्रति ही अपराधी बना दिया । फिर वह अपराध उसका सौंदर्य, शीलभंग, अवैध गर्भधारण व गर्भ में पुत्री की माँ होना ही क्यों ना हो , जिसने समाज के समक्ष उसे उपेक्षित व हास्यास्पद बनाया । यह सत्ता और समाज ही है जिसने हमें सिखाया की काला रंग बुरा है और जो व्यक्ति काला होता है उसे समाज नही अपनाता और मानसिक रूप से हम सौंदर्य के इस तथाकथित पैमाने को अपनाने लगते है । प्रभा खेतान का व्यक्तित्व भी कहीं न कहीं इससे प्रभावित रहता है । वह लिखती हैं “मै उपेक्षिता थी आत्म-सम्मान की कमी ने मेरा जिंदगी भर पीछा किया ।….. क्योंकि मैं ठहरी काली । माँ की तरह गोरी नहीं । इसी तरह शरीर की विकास प्रक्रिया के दौरान घटित जैविक क्रियाएँ उन्हें स्वयं को अपराधी मानने पर मजबूर कर देती हैं ‘मरण जोगी ! आज ही तुझे यह सब होना था …? कल तेरे बाबू जी की वर्षोदी (वार्षिकी है)’ इसी प्रकार बचपन से छोटी बच्ची प्रभा के साथ परिवार में दुर्व्यवहार की घटना का घटना तथा दायी माँ को बताने पर उनका कहना था “ केहु से कहिए मत ! आपन होने वाली पति देवता से भी नहीं” खामोश रहकर क्रूरता का वहन करना ही क्या स्त्री की नियति है । जिसका यदि विरोध करती है तो अश्लिल व चरित्रहीन कही जाती है । अविवाहित मातृत्व को ग्रहण करती है परंतु समाज व परिवार के डर से मुक्त हो जाती है वह लिखती है-‘अविवाहित मातृत्व की कल्पना मात्र से मेरा शरीर सिहर उठा था। बस किसी तरह इससे मुक्ति मिले, नहीं तो घर वाले मुझे फाँसी के तख्ते पर लटका देंगें’। समाज ने स्त्री से अधिक उसकी देह को महत्व दिया । इसी कारण समाज स्त्री को उसकी देह के माध्यम से कमजोर करता देखा जाता है ।

जेंडर व्यवहार मूलक सामाजिक निर्मिती है, इसमें केवल स्त्री ही शामिल नहीं है बल्कि वह भी शामिल है जो मान्य लिंगों से अलग है जिनमें पुरुष और स्त्री के समलैंगिक संबंध व उसमें आई जटिलताएँ भी शामिल हैं । आत्मकथा के भीतर मार्या का प्रभा खेतान के प्रति विशेष लगाव देखने को मिलता है । यह स्त्री का स्त्री के प्रति अपनत्व का भाव ही था कि प्रभा खेतान की जीवन की सच्चाईयों से वाकिफ होने पर वह स्वयं भावुक हो जाती है । ‘उसने मेरी उल्टी हथेलियों से अपनी आँखें पोछी फिर उंगुलियों को होठों से लगाया और कहा लगता है मैं तुम्हें जन्मों से जानती हूँ प्रभा तुम हमेशा मेरी दोस्त रहोगी न । …. तुम्हें देखते ही प्रभा ! मुझे लगा की तुम्हारा मेरे जीवन में विशेष स्थान होगा… हाँ बिल्कुल । उसने अपना हाथ मेरी जांघों पर रख दिया था । वह और करीब खिसक आई थी । … मैंने इतनी बेरुखी से उसका हाथ क्यों झकझोर दिया… पुरुष का प्रेम निवेदन अच्छा लगता है स्त्री का नहीं, विचित्र है संस्कारों का ताना बाना । जिसका निर्माता वह स्वयं नहीं बल्कि समाज था । जहाँ स्त्री, स्त्री के प्रति प्रेम भाव को स्वीकार नहीं पाती ।  स्त्री का स्त्री के प्रति यह भाव आज के समय में ‘थर्ड जेंडर’ के अंतर्गत देखा व समझा जाता है  जहाँ गे, लेस्बियन, ट्रांसजेंडर के विषय पर गहन विचार विमर्श आरम्भ है ।
इस प्रकार‘अन्या से अनन्या’ आत्मकथा के माध्यम से मध्यवर्गीय परिवार में जेंडर की निर्मिती को देखा जा सकता है । जहाँ आज भी बेटी के पैदा होते ही विवाह का बोझ परिवार के कंधों पर आ बैठता है । स्त्री शिक्षा की अनिवार्यता पुरुष के हित को ध्यान में रखकर दी जाती है । ज्ञान को स्त्री से दूर रखने का प्रयास किया जाता है । विवाह इस वर्ग की चरम परिणति होती है । शिक्षित व अविवाहित स्त्री को यह समाज नहीं स्वीकारता है । यह समाज के सभी रीति-रिवाजों व बंधनों में गहराई से जुडा होता है । इनका अपना सम्मान इनका परिवार होता है यदि परिवार का कोई भी सदस्य विशेषतः स्त्री अपनी मर्यादा का उल्लंघन करती है तो दंड की अधिकारी होती है । उसका अस्तिव कठपुतली के समान चलता रहता है जिसकी डोर आज पिता के हाथ में तो कल पति के हाथ में होती है । अन्या से अनन्या आत्मकथा जेंडर विभेद के जिन मुद्दों की और हमारा ध्यान केन्द्रित करती है हिंदी की अन्य स्त्री आत्मकथाओं में भी उन मुद्दों को देखा जा सकता है । मैत्रेयी पुष्पा की ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में ‘तीन बेटियों को जन्म देने के बाद खुद मैत्रेयी के गाँव के लोग बेटा पैदा करने के लिए उनके पति का दूसरा विवाह कराने के लिए मैत्रेयी पर जोर डालने लगते हैं । मैत्रेयी की तीसरी बेटी भी एक बार मैत्रेयी से पूछ ही लेती है कि ‘उसका जन्म बेटे की इच्छा के कारण हुआ था न ?’ इसी तरह ’पिंजरे की मैंना’ में देखते हैं कि भारतीय पति, पत्नी का अपने से बड़ा हो जाना बर्दास्त नहीं कर पाता । वह हर समय उस पर छींटा-कसी करता है जिस पर चंद्रकिरण सौनरेक्सा लिखती हैं-सम्पादक को रचना मिलने पर आया पत्र ‘ऐसे ही खुला उनके कमरे में रख देती थी । एक पत्र में कहानी की तारीफ पढ़कर क्रोध और ईर्ष्या से भरकर कहा था, “तुमने भी तो कहानी भेजते समय पत्र में कुछ तो लिखा ही होगा, उसके चूतड़ों में घी मला होगा’। विभाजन की त्रासदी में स्त्री के विभाजन पर पद्मा सचदेवा लिखती हैं ‘बंटवारा ..चाहे मुल्क का, चाहे सल्तनतों का, औरत हमेशा अपमानित होती है.औरत एक इस्तेमाल की चीज हो जाती है । जैसे कुम्हार के घर बर्तन इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है, वही स्थिति है औरत की’।, ‘शिकंजे का दर्द’ आत्मकथा में सुशीला टाकभौरे लिखती हैं-‘ पिताजी माँ को बुलाने के लिए नाम ना लेकर उन्हें कमल की माँ और कल्लू की माँ कहकर बुलाते थे । …. मैं अक्सर सोचती थी वे शीला की माँ और शीला के पप्पा क्यों नहीं  कहते’। सामाजिक संरचना ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का गठन करती है । जब समाज व उसकी नितियाँ ही भेदभाव पूर्ण हो तो स्त्री समानता कहाँ तक संभव है । इस प्रकार स्त्री आत्मकथाएं जेंडर के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिदृश्य का उत्खनन करती है । जिसमें सदियों से नारी स्वतंत्रता, अस्मिता के मूल्य दबाए गए थे । ये आत्मकथाएं केवल एक लेखिका का जिंदगीनामा नहीं, बल्कि उन तमाम स्त्रियों के हर्ष-विषाद, संघर्षों, टकराहटों, बदलावों की कहानी है जिनका सम्पूर्ण जीवन नदी की धारा के समान बहता रहता है जो औरों को तो शीतलता प्रदान करती है परंतु स्वयं भीतर तपती है । जेंडर विमर्श इसी असमानता को सामने लाने का प्रयास है जिसे स्त्री आत्मकथाओं के माध्यम से समझा जा सकता है ।

संदर्भ सूची :
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    आत्मकथा की संस्कृति, पंकज चतुर्वेदी, वाणी प्रकाशन, संस्करण-2003, नई दिल्ली
    कामुकता, पोनोग्राफी और स्त्रीवाद, जगदीश्वर चतुर्वेदी और सुधा सिंह, आनंद प्रकाशन, संस्करण-2007,   कलकता
    गुड़िया भीतर गुड़िया, मैत्रेयी पुष्पा, राजकमल प्रकाशन, संस्करण-2012, नई दिल्ली
    गुड़िया घर, इब्सन, संवाद प्रकाशन, संस्करण-2002, नई दिल्ली
    जाति समाज में पितृसत्ता, उमा चक्रवर्ती (अनु.) विजय झा, ग्रंथ शिल्पी, संस्करण-2011,नई दिल्ली
    दुर्ग द्वार पर दस्तक, कात्यायनी, परिकल्पना प्रकाशन, तृतीय संस्करण-2004, लखनऊ
    नारीवादी राजनीति संघर्ष एवं मुद्दे, (सं.). साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय प्रकाशन, संस्करण- 2013, नई दिल्ली
    पिंजरे की मैना, चंद्रकिरण सौनरेक्सा, पूर्वोदय प्रकाशन, संस्करण- 2010, नई दिल्ली
    बूंद बावड़ी, पद्मा सचदेवा, वाणी प्रकाशन, संस्करण-1999, नई दिल्ली
    बृहत् प्रमाणिक शब्दकोश, बद्रीनाथ कपूर, लोकभारती प्रकाशन, इलाहबाद
    विद्रोही स्त्री, जर्मेन ग्रीयर,(अनु.) मधु बी.जोशी, राजकमल प्रकाशन, संस्करण-2001, नई दिल्ली
    समाजवादी चिंतन का इतिहास, सुब्रत मुखर्जी और सुशीला रामास्वामी, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय प्रकाशन, संस्करण-1999, नई दिल्ली
    स्त्री उपेक्षिता, सीमोन द बोउवार (अनु.)  प्रभा खेतान, हिन्दी पॉकेट बुक, संस्करण-2002, नई दिल्ली
    ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ, डॉ. सुधा सिंह, ग्रंथ शिल्पी प्रकाशन, संस्करण-2008, नई दिल्ली
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    Foucault’s Work for the Analysis of Gender Relations: Theoretical Reviews, Wijitbusaba Marome, Faculty of Architecture and Planning, Thammasat University
    Frances Henry and Carol tator, Discourses of Domination, university  of Toronto press, 2002
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    Gender Trouble: Feminisim and the Subversion of Identity Judith Butler,  Routledge   New York and London(1999)
    Pornography: Men Possessing Women, Andrea Rita Dworkin, Published A plume book by Penguin Group (1989), New york
    Sex and Temperament in Three Primitive Societies, Margaret Mead, William Morrow and company, New York
    Sex and Gender : The Development of Masculinity and Femininity, Robert J. Stoller,  Published Karnac book ltd, Reprinted 1984, London
    Understanding Gender, Kamla Bhasin , women Unlimited , reprinted 2013, delhi
    Collins English Dictionary, complete & unabridged, William Collins sons &co.ltd, 10th edition 2009

पत्रिकाएं
•    Maithreyi Krishnaraj (2006), Gender Easy to Study? Some Reflections, Economic and Political Weekly,vol.41, No-42, Oct 21-27
•    Cecillia Asberg (2010), Biology is a Feminist issue: Interview with Lynda Birke European Journal Of women’s Studies, vol.17(4)
•    Judith Butler(1988), Performative Acts and Gender Constitution: An Essay in  Phenomenology and Feminist Theory, Theatre Journal published by The Johns Hopkins University Press, Vol. 40, No. 4, Dec
•    आइरिस यंग, अप्रिय विवाह से इतर एक प्रस्ताव (लेख), संधान (कृति, संस्कृति और सिद्धांत का मंच) पत्रिका, (सं.) लाल बहादुर वर्मा और सुभाष गताड़े,  अंक-1, अप्रैल-जून (2001), दिल्ली

वेबसाइट्स
    http://en.wikipedia.org/wiki/Discourse
    http://www.oxforddictionaries.com/definition/english/discourse
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    http://en.wikipedia.org/wiki/Gender
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    http://chaspa.blogspot.in/
    http://www.shabdankan.com/2014/04/feminist-literary-criticism-in-hindiLiterature-Initial-Effort-Savita-Singh.html#.U1oQE4aQbdA

रेहाना का अंतिम पत्र

( न्याय के मर्दवादी रवैये के लिए सरहदें छोटी हो जाती हैं . ईरान में रेहाना जब्बारी को दी गई फांसी क्या पूर्णिया में रूपम पाठक की जेल यातना से अलग है ! उसने भी अपने ऊपर अत्याचार के विरोध में ह्त्या की थी रेहाना की ही तरह. रेहाना ने फांसी के पहले एक मार्मिक पत्र लिखा था. पढ़ें पत्र और खबर ) 

कोर्ट में अपना पक्ष रखती रेहाना

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम प्रयासों के बावजूद 26 वर्षीय ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को नहीं बचाया जा सका। अपने साथ जबरदस्ती सेक्स करने की कोशिश करनेवाले शख्स को जान से मार देने के आरोप में करीब 7 साल से जेल की सजा काट रही रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई।

रेहाना ने फांसी से पहले अपनी मां को एक पत्र लिखकर अपनी मौत के बाद अंगदान की इच्छा जताई। दिल दहला देनेवाला यह पत्र अप्रैल में ही लिखा गया था लेकिन इसे ईरान के शांति समर्थक कार्यकर्ताओं ने रेहाना को फांसी दिए जाने के एक दिन बाद 26 अक्टूबर को सार्वजनिक किया। रेहाना की मां ने जज के सामने पूर्व खुफिया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी की हत्या के आरोप में अपनी बेटी रेहाना की जगह खुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाई थी। रेहाना ने 2007 में अपनी रसोई के कमरे के चाकू से बलात्कार का प्रयास करने वाले खुफिया एजेंट पर वार किया था जिससे उसकी मौत हो गई थी।

कार्यकर्ताओं ने कहा कि रेहाना की मां को अपनी बेटी से अंतिम बार एक घंटे के लिए मिलने दिया गया था। तब उन्हें बताया गया था कि रेहाना को फांसी दिए जाने के कुछ घंटों पहले उन्हें इस बारे में इत्तला कर दिया जाएगा। कोर्ट के आदेश के मुताबिक साल 2007 में जब्बारी ने सरबंदी पर जिस चाकू से वार किया था, वह दो दिन पहले ही खरीदा गया था। जब्बारी को साल 2009 में सोची-समझी हत्या का दोषी पाया गया था लेकिन मामले में सजा ईरान के सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस फैसले पर मुहर लगाए जाने के बाद सुनाई गई थी। न्याय मंत्री मुस्तफा पी. मोहम्मदी ने अक्टूबर में इशारा किया था कि इस मामले का खुशनुमा अंत हो सकता था लेकिन सरबंदी के परिजनों ने जब्बारी की जान बचाने के लिए पैसे लेने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

मानवाधिकार संगठन ऐमनेस्टी इंटरनैशनल ने इस आदेश को बिल्कुल गलत ठहराया। ऐमनैस्टी ने कहा कि हालांकि जब्बारी ने सरबंदी को रेप की कोशिश करते वक्त चाकू मारे जाने की बात स्वीकार की लेकिन उसकी (सरबंदी की) हत्या कमरे में मौजूद एक अन्य व्यक्ति ने की थी।

पूरे पत्र का मजमून कुछ इस तरह का हैः

मेरी प्रिय मां,

आज मुझे पता चला कि मुझे किस्सास (ईरानी विधि व्यवस्था में प्रतिकार का कानून) का सामना करना पड़ेगा। मुझे यह जानकर बहुत बुरा लग रहा है कि आखिर तुम क्यों नहीं अपने आपको यह समझा पा रही हो कि मैं अपनी जिंदगी के आखिरी पन्ने तक पहुंच चुकी हूं। तुम जानती हो कि तुम्हारी उदासी मुझे कितना शर्मिंदा करती है? तुम क्यों नहीं मुझे तुम्हारे और पापा के हाथों को चूमने का एक मौका देती हो?

मां, इस दुनिया ने मुझे 19 साल जीने का मौका दिया। उस मनहूस रात को मेरी हत्या हो जानी चाहिए थी। मेरा शव शहर के किसी कोने में फेंक दिया गया होता और फिर पुलिस तुम्हें मेरे शव को पहचानने के लिए लाती और तुम्हें पता चलता कि हत्या से पहले मेरा रेप भी हुआ था। मेरा हत्यारा कभी भी पकड़ में नहीं आता क्योंकि हमारे पास उसके जैसी ना ही दौलत है, ना ही ताकत। उसके बाद तुम कुछ साल इसी पीड़ा और शर्मिंदगी में गुजार लेती और फिर इसी पीड़ा में तुम मर भी जाती। लेकिन, किसी श्राप की वजह से ऐसा नहीं हुआ। मेरा शव तब फेंका नहीं गया। लेकिन, इविन जेल के सिंगल वॉर्ड स्थित कब्र और अब कब्रनुमा शहरे रे जेल में यही हो रहा है। इसे ही मेरी किस्मत समझो और इसका दोष किसी पर मत मढ़ो। तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं होती।

तुमने ही कहा था कि आदमी को मरते दम तक अपने मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए। मां, जब मुझे एक हत्यारिन के रूप में कोर्ट में पेश किया गया तब भी मैंने एक आंसू नहीं बहाया। मैंने अपनी जिंदगी की भीख नहीं मांगी। मैं चिल्लाना चाहती थी लेकिन ऐसा नहीं किया क्योंकि मुझे कानून पर पूरा भरोसा था।’

मां, तुम जानती हो कि मैंने कभी एक मच्छर भी नहीं मारा। मैं कॉकरोच को मारने की जगह उसकी मूंछ पकड़कर उसे बाहर फेंक आया करती थी। लेकिन अब मुझे सोच-समझकर हत्या किए जाने का अपराधी बताया जा रहा है। वे लोग कितने आशावादी हैं जिन्होंने जजों से न्याय की उम्मीद की थी! तुम जो सुन रही हो कृपया उसके लिए मत रोओ। पहले ही दिन से मुझे पुलिस ऑफिस में एक बुजुर्ग अविवाहित एजेंट मेरे स्टाइलिश नाखून के लिए मारते-पीटते हैं। मुझे पता है कि अभी सुंदरता की कद्र नहीं है। चेहरे की सुंदरता, विचारों और आरजूओं की सुंदरता, सुंदर लिखावट, आंखों और नजरिए की सुंदरता और यहां तक कि मीठी आवाज की सुंदरता।

बिहार की पूर्णिया में रूपम पाठक भी कभी ह्त्या के लिए मजबूर हुई थी

मेरी प्रिय मां, मेरी विचारधारा बदल गई है। लेकिन, तुम इसकी जिम्मेदार नहीं हो। मेरे शब्दों का अंत नहीं और मैंने किसी को सबकुछ लिखकर दे दिया है ताकि अगर तुम्हारी जानकारी के बिना और तुम्हारी गैर-मौजूदगी में मुझे फांसी दे दी जाए, तो यह तुम्हें दे दिया जाए। मैंने अपनी विरासत के तौर पर तुम्हारे लिए कई हस्तलिखित दस्तावेज छोड़ रखे हैं।

मैं अपनी मौत से पहले तुमसे कुछ कहना चाहती हूं। मां, मैं मिट्टी के अंदर सड़ना नहीं चाहती। मैं अपनी आंखों और जवान दिल को मिट्टी बनने देना नहीं चाहती। इसलिए, प्रार्थना करती हूं कि फांसी के बाद जल्द से जल्द मेरा दिल, मेरी किडनी, मेरी आंखें, हड्डियां और वह सब कुछ जिसका ट्रांसप्लांट हो सकता है, उसे मेरे शरीर से निकाल लिया जाए और इन्हें जरूरतमंद व्यक्ति को गिफ्ट के रूप में दे दिया जाए। मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग दिए जाएं उसे मेरा नाम बताया जाए और वह मेरे लिए प्रार्थना करे।
नव भारत टाइम्स से साभार

मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था , देना होता था स्तन टैक्स

अपने स्तन काटकर स्तन ढकने के अपने अधिकार की लड़ाई और स्तन टैक्स के खिलाफ लड़ाई की मशाल  (19 वी सदी में)  जगाने वाली स्त्री नांगेली की कहानी को सीबीएसई अपने पाठ्यक्रम से हटा रही है. यह ब्राह्मणवादी मस्तिष्क से उपजा हुआ निर्णय है, जो अपनी गंदगियों को दूर करने की जगह उन्हें छिपाने में यकीन करता है. यह सरकार , ब्राह्मणवाद  और पितृसत्ता के बीच के तालमेल  की क्रूर मिसाल है.  आइये  नांगेली की कहानी  और अपने स्तन ढकने के अधिकार के लिए महिलाओं के संघर्ष की कहानी को खूब पढ़ें और पढ़ाएं, हाँ अपने बच्चों को भी पढाएं, ताकि जान सकें वे अपनी संस्कृति की सडांध की जड़ों को और महिलाओं के संघर्ष को. 

 

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ लडाई की प्रतीक हैं नांगेली
केरल के त्रावणकोर राज्य में गैरब्राह्मण महिलाओं को अपने सम्मान की लडाई लम्बे समय तक लड़ना पडा. यहाँ न सिर्फ महिलाओं को अपने स्तन ढकने से मनाही थी, वरन महिलाओं पर स्तन टैक्स लगाया जाता था- जिसका जितना बड़ा स्तन, उससे उतना ज्यादा टैक्स. केरल के चेर्थाला की एझवा जाति (दलित जाति) की महिला नांगेली से 1803 में जब त्रावणकोर के टैक्स अधिकारी उसके घर टैक्स लेने आये तो विरोध स्वरुप उसने अपने स्तन काटकर दे दिये. इसके बाद उसकी मौत हो गई उसका पति चिरुकंडन जब घर लौटकर आया तो उसने उसकी चिता में कूदकर आत्महत्या कर ली. इसके बाद इस कुप्रथा के खिलाफ तीव्र आंदोलन हुआ. 1812 में राजा को टैक्स की यह कुप्रथा बंद करने के लिए बाध्य होना पड़ा. हालांकि इसके बाद भी गैरब्राहमण महिलाओं को स्तन ढंकने के अधिकार से वंचित रखा गया. इसके लिए लड़ाई और लम्बी चली, अगले चार दशकों तक यह लड़ाई चली. नांगेली की कहानी का दूसरा वर्जन भी है कि उनके स्तन टैक्स देने से मना करने पर राजा के टैक्स अधिकारियों ने कटवा दिये थे, जिसके बाद उसकी मौत हो गई.



स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह

केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।

नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।

लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे। आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।

सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे। आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।

इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों और उनके दुकानों के सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक भी छीन कर लिया।

सोशल मीडिया अपनी भूमिका में असरकारी सिद्ध हो रहा है . ‘ यह देश हमारा है ‘ नाम से संचालित फेसबुक पेज इस देश में व्याप्त स्त्री और दलित विरोधी परम्पराओं /रुढियों की तस्वीरें सामने रख रहा है. पिछले दिनों केरल की गैर सवर्ण महिलाओं के खिलाफ १९वी शताब्दी के मध्य तक व्याप्त कुप्रथा की एक तस्वीर इस पेज पर देखने को मिली. इस प्रथा पर स्त्रीवादी काम भी हुए हैं . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए ‘यह देश हमारा है’ से साभार 

 

राजेन्द्र यादव की स्वीकरोक्ति और स्त्रीवादी प्रतिबद्धता के सवाल !

( राजेंद्र यादव की स्मृति में यह आलेख. इसे स्त्रीकाल के सम्पादक  संजीव चन्दन  ने 2012 में उनकी एक   स्वीकारोक्ति के मद्देनजर लिखा था. हमारे बीच से उनके निर्वाण  का यह पहला साल है . वे 28 अक्तूबर 2013 को हमे अलविदा कह गये थे . )

राजेन्द्र जी मन्नू जी के साथ

राजेन्द्र यादव  युवा पीढ़ी के हम जैसे लोगों को इसी लिए आकर्षित करते हैं कि वे अपनी बात बड़े बेबाकी से कहते हैं, कहे पर बने भी रहते हैं, अपनी आलोचनाएं सुनते हैं. वे  हिंदी साहित्य के उन बहुत कम व्यक्तित्वों में  से हैं जो   अपनी सरोकारी और वैचारिक प्रतिबद्धता बनाये रखते हैं, राजेंद्र जी को तो इसके लिए कई लानते -मलानते भी झेलनी पदी हैं. राजेन्द्र यादव से आपकी कई असहमतियां हो सकती हैं, असहमतियों के लिए वे स्पेस भी देते हैं, कई बार तो वे विवादों को छेड़ते हैं, असहमत होने के  अवसर पैदा करते हैं, और आप यदि उनके हंस के दफ्तर में जाकर उनसे असहमतियां दर्ज कराते हैं, उनकी आलोचना करते हैं तो वे बड़ी संजीदगी से  सुनते हैं, जरूरत पड़ने पर ठहाकों से उन असहमतियों पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करा देते हैं, आप उन ठहाकों पर चिढ सकते हैं.

बहरहाल उनसे मिलने जाने के पहले साहित्य के नवागंतुकों को दिल से मजबूत होना पड़ेगा. पहली बार मैं उनसे मिलने १९९८-१९९९ में कभी उनके दरियागंज स्थित कार्यालय गया था. यह जानकार कि मैं गया से आया हूँ, उन्होंने मुझसे पूछा कि संजय सहाय भी तो गया से ही हैं न , उनसे मिलते हैं? फिर कहा कि नीलिमा सिन्हा भी तो गया से ही है. पता नहीं क्यों फिर उन्होंने पूछा कि ‘ क्या यह सही है कि संजय सहाय की कहानियां शैवाल लिखते हैं ?’ मुझे याद नहीं कि मैंने तब क्या जवाब दिया होगा लेकिन ‘साहित्यिक अंडरवर्ल्ड’ के नव शिखुओं के लिए यह मारक सवाल था . वह भी साहित्य के घोषित डान के द्वारा. संजय जी और राजेन्द्र जी के सम्बन्ध जगजाहिर थे तब तक. खैर इस सवाल के साथ उनका ठहाका !संजय जी की कहानियां मैंने बाद में पढ़ी, और संजय जी को जाना भी, शैवाल को तब तक पढ़ चुका था. आज मैं दावे के साथ दोनों रचनाकार की रचनाओं की शैली और कथ्य के अंतर बता सकता हूँ, लेकिन कस्बे  से आने वाले २१-२२ साल के युवक से यह जानलेवा सवाल राजेंद्र जी ही कर सकते थे.  खैर चाय पीकर , कुछ बातें कर मै विदा हुआ.

राजेन्द्र जी मन्नू जी और बेटी रचना के साथ

उसके बाद पिछले १४ सालों में मैं उनसे ७-८ बार जरूर मिला हूँ, लेकिन कभी पहचान नहीं बन पाई . अभी हाल की मुलाकात हंस कार्यालय में रामजी यादव के साथ हुई , इस बार भी मुझे परिचय देना पड़ा. हालांकि २०११ के पहले २००८ में मैं राजेंद्र जी को अर्जुन सिंह के यहाँ एक डेलिगेशन में ले जाने के लिए हंस कार्यालय गया था और इन्साफ के द्वारा मुहैय्या कराइ गई अपनी गाडी में लेकर मैं अर्जुन सिंह के घर उन्हें ले गया, जहाँ रामशरण जोशी, मनेजर पांडे, और जे .एन यू के कुछ प्राध्यापक वहां पहले से पहुँच चुके थे. यह डेलिगेशन मेरे अनुरोध पर हिंदी विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में मंत्री से मुलाकात करने पहुंचा था. राजेंद्र जी जोशी जी के बुलावे पर आये थे. इन १४ सालों में मैं दो बार अपनी कहानी लेकर उनसे मिला , हर रचनाकार की तरह कहानी लिखने के बाद उसे पहले हंस में छपवाने की मेरी भी आकांक्षा थी, कभी हंस ने कहानी नहीं छपी, वे दोनों कहानियां क्रमशः कथादेश और संवेद में छपी .

एक बार मैं जब हंस कार्यालय पहुंचा तब वहां गिरिराजकिशोर बैठे थे . मैं संभवतः ‘स्त्रीकाल ‘ की प्रति लेकर गया था, उसमें राजेन्द्र जी का असीमा भट्ट के द्वारा लिया गया साक्षात्कार छपा था. गिरिराजकिशोर राजेन्द्र जी को ‘आवरण  से बाहर  आने की नसीहत दे रहे थे. राजेंद्र जी इत्मीनान से अपनी  आलोचना सुन  रहे थे.विषय था ‘ विष्णुकांत शास्त्री  का निधन और राजेंद्र जी जैसे उनके मित्रों का शासत्री जी से न मिलाने जाना- राजेन्द्र जी मृत्यु स्वाभाविक है के भाव में थे , हालांकि मुझे लगा था कि मृत्यु के प्रति राजेंद्र जी संजीदा हो रहे थे, ऐसा न भी हो सकता है,मैं ऐसा समझ रहा होऊंगा और राजेंद्र जी यथावत खिलंदर अंदाज में होंगे. हालांकि गिरिराज किशोर की  आलोचना वे बड़ी तन्मयता से सुन रहे थे, बीच -बीच में शिरकत करते हुए. इसके बाद मैं कुछ और दफा हंस कार्यालय गया और हर बार कोई आलोचक उन पर हर्वे -हथियार के साथ पिला हुआ मिलता और राजेन्द्र जी आलोचना में मग्न होते, निर्लिप्त भी..कभी अर्चना वर्मा तो कभी मदन कश्यप, कभी कोइ और  …..
समाज और हिंदी साहित्य में असहिष्णुता के परिवेश में राजेंद्र जी का यह व्यकतित्व  उन्हें अलहदा बनाता  है और अपने इस अल्हदापन को बनाये रखने के लिए वे अपनी ओर से प्रयास भी करते रहते हैं, विवाद पैदा कर, विवादों को हवा देकर . व्यक्तिव के इन्हीं द्वैधों के बीच राजेन्द्र यादव का व्यक्तित्व बनता है. जहाँ हंस के प्लेटफोर्म पर वे जिद्द की हद तक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता बनाये रखते हैं, और इसी निरंतरता के साथ हिंदी साहित्य में स्त्री और दलित विमर्श को स्थापित करते हैं. वहीँ मन्नू भंडारी के मामले में वे निपट अहमन्य पुरुष हो जाते हैं और मैत्रयी के साथ अपनी मित्रता को दांव पर लगाकर भी लेखिकाओं को गाली देने वाले शख्स को ‘ क्या उसकी रोजी रोती छिनोगी ‘ के ओछे तर्क के साथ अपनी भूमिका तय करते हैं. राजेन्द्र जी का यह द्वैध स्त्रीवादियों के लिए एक पाठ भी है- पितृसत्ता की गहरी पैठ का पाठ.

अपने हालिया साक्षात्कार में राजेंद्र जी ने कहा कि यदि उनकी ही तरह मन्नू जी ने भी संबंधों के मामले में स्वच्छंद जीवन जिया होता तो उन्होंने मन्नू को माफ़  नहीं किया होता. स्त्री-दलित  मुद्दों के प्रति प्रतिबद्धता के साथ स्त्री और दलित विमर्श को हिंदी साहित्य के केंद्र में लेन वाले राजेंद्र जी की यह स्वीकारोक्ति उनके कई प्रशंसकों को चोट पहुंचा सकती है, या उनके आलोचक उन पर हमलावार हो सकते हैं. ‘पर्सनल इज पोलिटिकल’ के आधार से स्त्रीवादी चिन्तक राजेन्द्र जी को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं.  इस सब से बेफिक्र राजेन्द्र जी ने यह बयान  किया है.राजेन्द्र जी की यही खासियत है. वे चाहते तो एक हिप्पोक्रेट की तरह यह भी कह सकते थे कि ‘उन्हें अपनी पत्नी के ऐसे रिश्तों से बहुत फर्क नहीं पड़ता क्योंकि संबंधो के मामले में पुरुष और स्त्री दोनों के आचरणों के अलग-अलग मानदंड नहीं हो सकते ,’ आखिर राजेंद्र जी अपने समग्र चिंतन में स्त्री की ‘दैहिक स्वतंत्रता’ की ही तो बात करते हैं, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें मन्नू जी के विवाहेत्तर रिश्तों से ऐतराज होता और वे उन्हें कभी माफ़ नहीं कर पाते. राजेंद्र जी का यह वक्तव्य ‘पितृसत्तात्मक समाज ‘ में अनुकूलित पुरुष का वक्तव्य है, जो स्त्रीवादी होने की प्रक्रिया में तो है लेकिन अपनी संरचना से मुक्त नहीं हो पाया है . यह एक मानसिक द्वैध की स्वीकारोक्ति है- दरअसल यह स्त्रीवाद के लिए एक पाठ भी है, खासकर उस व्यक्ति, साहित्यकार  और सम्पादक की स्वीकारोक्ति होने के परिप्रेक्ष्य   मे, जिसने सिद्दत के साथ और बड़ी इमानदारी से अपनी स्त्री और दलित प्रतिबद्धताएं, बनाये रखी है.

असीमा  भट्ट ने मुझ से कभी कहा था कि हिंदी साहित्य के जिन लोगों से वह मिली उनमें से  उसे  दो ही पुरुष ‘कुंठा रहित ‘ दिखे , राजेन्द्र यादव और उदय प्रकाश. वही व्यक्ति ( राजेन्द्र यादव ) पत्नी के साथ अपने निजी व्यवहार में ‘घोर पुरुष’ के रूप में रहा है, ऐसा हिंदी का हर पाठक मन्नू जी के आत्मकथ्यों से जानता समझता रहा है.सामजिक तौर पर राजेंद्र जी ‘मन्नू भंडारी ‘ को भाजपाई मानसिकता का घोषित करते हुए अपने सरोकारों का एक बरख्स भी खड़ा करते हैं, और मन्नू जी हर बार लगभग ख़ामोशी से ‘नीलकंठ ‘ हो जाती हैं. राजेंद्र जी के व्यक्तित्व  में यही  ‘द्वैध’ है और इसी कि स्वीकारोक्ति है कि वे ‘मन्नू’ को संबंधों में  अपने जैसे प्रयोगों के लिए माफ़ नहीं करते.

‘मर्द’ तैयार करती सोच की पहली सीख : उलटबांसियां: उलटी दुनिया की पाठशाला (1998)

एदुआर्दो गालेआनो/ अनुवाद पी. कुमार मंगलम 

पी. कुमार . मंगलम लातिनी  अमरीकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो की किताब ‘पातास आर्रिबा (उलटी दुनिया ) के उस हिस्से को प्रस्तुत कर रहे हैं , जिसमें स्त्री मुद्दों की चर्चा है . यह पश्चिमी दुनिया में पितृसत्ता की जडों का बेहतरीन विश्लेषण है. मंगलम जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय लातिनी अमरीकी साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं .

 नजरिया 1

जरा सोचिए अगर ईसाई उपदेश धर्मप्रचारिकाओं की कलम से निकले होते तो क्या होता ! ईसा युग की पहली रात का बखान कैसे होता? उनकी कलम यही बताती कि संत खोसे उस रात कुछ उखड़े-उखड़े से थे। भीड़भाड़ और होहल्ले से भरी उस जगह में घास-फूस और पंखों के पालने में झुलते नवजात ईसा के करीब होकर भी वह अनमने ही बने रहे। वर्जिन मेरी, फरीश्तों, चरवाहों, भेड़ों, बैलों, खच्चरों, पूरब से आए जादूगरों और बेलेन तक का रास्ता दिखाते सितारे के मदमस्त झुंड में वह अकेले ही, उदास खड़े थे। कुरेदे जाने पर कुछ अस्पष्ट-सी आवाज़ में उन्होंने कहा:
“मुझे तो एक बच्ची चाहिए थी”!

नजरिया 2
क्या होता अगर हव्वा ने जेनेसिस लिखा होता   ! इंसानी सफर की पहली रात तब कैसी होती ! उसने किताब की शुरुआत ही यह बताते हुए की होती कि वह न तो किसी जानवर की हड्डी से पैदा हुई थी न ही वह किसी सांप को जानती थी; उसने किसी को सेब भी नहीं दिए थे। ईश्वर ने उससे यह नहीं कह था कि बच्चा जनते समय उसे दर्द होगा और उसका पति उसपर हुकूमत करेगा। वह बताती कि यह सब तो सिर्फ़ झूठ और झूठ है जिसे आदम ने प्रेसवालों को बता ‘इतिहास’ और ‘सच’ का रूप दे दिया था। 



‘‘अरे छोड़ो भाई, ये सब औरतों की बाते हैं।’’ अक्सर हम यह कह-सुन लेते हैं। दुनिया में रंगभेद और मर्दों की हुकूमत का सिलसिला साथ ही शुरू हुआ और चलता रहा है। अपनी धमक बनाए रखने के उनके दावे-हवाले भी एक जैसे ही होते हैं। इस दोहरे लेकिन घुले-मिले खेल को उजागर करते एउखेनिओ राउल साफ्फारोनि स्पेन में 1546  में बने कानून ‘एल मार्तिल्यो दे लास ब्रुखास’ का हवाला देते हैं। ‘डायन’ करार दी गई औरतों को ‘ठीक’ करने वाला यह फरमान बाद में आधी आबादी के खिलाफ़ कई कानूनों का आधार बना। वह यह भी बताते हैं कि धर्म-ईमान के ‘पहरेदारों’ ने कैसे यह पूरा पोथा ही औरतों पर जुल्म को जायज़ ठहराने और मर्दों के मुकाबले उनकी  ‘कमजोरी’ बार-बार साबित करने के लिए लिख  डाला था !

वैसे भी, बाइबिल और यूनानी किस्सों-कहावतों के जमाने से ही औरतों को कमतर बताने-बनाए जाने की शुरुआत हो चुकी थी। तभी से यह याद दिलाया जाता रहा है कि वो हव्वा ही थी जिसकी बेवकूफी ने इंसान को स्वर्ग से धरती पर ला पटका। और, दुनिया को मुसीबतों से भर देने वाले पिटारे का ठीकरा भी एक औरत पांडोरा पर ही फोड़ा जाता है। अपने चेलों को संत पाब्लो यही सबक रटाया करते थे कि ‘‘औरत के शरीर का एक ही हिस्सा मर्दों वाला होता है, और वह है उसका दिमाग’’! वहीं, उनसे उन्नीस सौ साल बाद सामाजिक मनोविज्ञान के आरंभकर्ताओं में रहे गुस्ताव ले गोन भी इसी धूर्त खेल को बढ़ाते रहे। और तो और, वह यह भी फरमा गए कि ‘‘किसी औरत का अक्लमंद होना उतना ही अजूबा है, जितना दो सिरों वाले चिम्पांजी का पाया जाना ’’!  घटनाओं का अंदाजा लगा सकने की औरतों की खूबियां गिनाने वाले चार्ल्स डार्विन भी इसे ‘नीची’ नस्ल की खासियत ही बताते रहे।

अमरीकी महादेशों पर यूरोपीय हमलों के समय से ही वहां समलैंगिकों को मर्दानगी के ‘कुदरती ढांचों’ के खिलाफ़ ठहरा दिया गया था। अपने नाम से ही पुरूष जान पड़ते ईसाई भगवान के लिए मूलवासियों में मर्दों का औरतों की तरह होना सबसे बड़ा पाप था। ऐसे  ईश्वर के ‘सभ्य’ सेवकों के लिए मूलवासी मर्द “बिना स्तन और प्रजनन क्षमता वाली स्त्री” ही रहे। इसी वजह से कि वे व्यवस्था के लिए जरूरी मजदूर नहीं पैदा करतीं, आजकल भी समलैंगिक औरतें ‘स्त्री’ होने के ‘कायदों’ के उलट बता दी जाती हैं।

एदुआर्दो गालेआनो

गढ़ी और बार-बार दुहराई गई धारणाओं में एक औरत बच्चे पैदा करने, नशेड़ियों को आनंद देने और ‘महात्माओं’ के पापों को अपनी चुप्पी से ढंकने वाली ही रही है। यही नहीं, वह मूलवासियों और अश्वेतों की तरह ही स्वभाव से पिछड़ी भी बताई जाती रही है। आश्चर्य नहीं कि इन्हीं तबकों की तरह वह भी इतिहास के हाशिए पर फेंक दी गई है! अमरीकी  महादेशों के सरकारी इतिहास में आज़ादी के ‘महान’ जंगबाजों की मांओं और विधवा औरतों की बहुत धुंधली मौजूदगी यही साबित करती है। इस इतिहास में मर्द नए मुल्कों के झंडों की अगुवाई हासिल करते हैं और औरतों को कढ़ाई और मातम की घरेलू सीमाओं में बांध दिया गया है।

यही इतिहास यूरोपीय हमलों में आगे-आगे रही औरतों और फिर आज़ादी की लड़ाईयों की क्रियोल  महिला योद्धाओं को विरले ही कोई याद करता है। युद्ध और मार-काट का बखान करने वाले इतिहासकार इन औरतों की ‘मर्दाना’ बहादुरी का जिक्र तो कर ही सकते थे ! इतना ही नहीं, गुलामी के खिलाफ़ खड़ी हुई अनगिनत मूलवासी और अश्वेत नायिकाओं का तो यहां कोई जिक्र ही नहीं है। इतिहास से गायब कर दी गईं इनकी आवाज़ें कभी-कभार और अचानक ही किसी जादू की तरह सामने आती, बहुत कुछ कह जाती हैं। मसलन, हाल ही में सूरीनाम पर लिखी एक किताब पढ़ते हुए,  मैंने मुक्त हुए गुलामों की नेता काला को जाना। पूजे जाने वाले अपने डंडे से वह दूर-दूर से भाग कर आते गुलामों की अगुवाई किया करती थी। उसकी एक और खास बात यह लगी कि उसने अपने निहायत ही नीरस पति को छोड़ा और पीट-पीट कर मार डाला था।

अश्वेतों और मूलवासियों की तरह  ही औरत का ‘पिछड़ापन’ भी सभी तरह से साबित कर दिया गया है।  हालांकि, वह एक संभावित “खतरा” भी रही है। ‘‘भाई, एक औरत की तमाम अच्छाइयों से एक मर्द की बुराई कहीं अच्छी’’, यह सीख ईसाई गुरू एक्लेसियास्तेस की थी! वहीं, सुनी-सुनाई कहानियां यही गाती आई हैं कि यूनानी लड़ाका उलिसेस कैसे मर्दों को भरमाने वाली सुरीली आवाज़ों को बखूबी भांप लेता था। वहां सभी मानते थे कि ये आवाज़ें जलपरी का रूप धर मर्दों को गायब करने वाली औरतों की ही होती हैं। हथियारों और शब्दों पर मर्दों का कब्जा जायज़ ठहराती ऐसी ही रीतियों की दुनिया में कोई कमी नहीं है। फिर, उन्हें नीचा दिखाए जाने या एक खतरा बताए जाने की हामी भरने वाली मान्यताएं भी अनगिनत हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे मुहावरे सबक देते हैं: ‘‘औरत और झूठ इस दुनिया में एक ही दिन आए थे’’। यह और जोड़ा जाता है कि ‘‘औरत के बात की कीमत एक रत्ती भी नहीं होती’’ । ऐसे ही विश्वासों के साथ पले-बढ़े लातीनी अमरीकी किसान  मानते आए हैं कि रात में राहगीरों पर घात लगाए, बदले की प्यासी बुरी आत्माएं औरतों की ही होती हैं। बातों से होकर चौकन्नी आंखों और सपनों तक पसरे इन भ्रमजालों का आखिर मतलब क्या है! यह सब कुछ आनंद और सत्ता के मौकों पर औरतों के संभावित दावे से उपजती मर्दाना बेचैनी ही जाहिर करता है।

पी. के मंगलम

बात की बात में ‘डायन’  बतलाकर सरेआम मार दिया जाना औरतों की नियति रही है। और यह स्पेनी ‘धर्म अदालतों’ तक ही सीमित नहीं रहा है। अपनी यौनिकता और, सबसे बढ़कर, इसका अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकने की संभावनाएं औरतों को बौखलाई निगाहों, धमकियों और कड़वे बोल का ‘तोहफ़ा’ देती आई हैं। तमाम पहरों-पाबंदियों से छिटकती ऐसी ‘विस्फोटक ’ संभावनाओं को कुचलने के उपाय भी सदियों पुराने हैं। इनका हौवा खड़ा कर औरतों को शैतान का रूप बताया जाना, इसी सिलसिले की शुरुआत है। फिर, मानो यह दिखाते हुए कि आग की सजा आग ही होती है, इन ‘गंदी’ औरतों को ईश्वर की ‘मर्जी’ से जिंदा भी जलाया जाता रहा है।

 इस तरह की तमाम करतूतों में जाहिर होती बौखलाहट को यही डर हवा देता आया है कि औरत भी जिंदगी खुल कर और मजे से जी सकती है।  सालों-साल से अलग-अलग जगहों की कई संस्कृतियों में दुहराई गई एक खास मान्यता के मायने कुछ यही हैं। योनि को मुंह फाड़े किसी भयंकर मछली की तरह पेश करता इसका ‘सच’ यह सिखाता है: “औरत तो नरक का द्वार होती है” ।और आज भी जब एक सदी खत्म होकर नई शुरू हो चुकी है, करोड़ों औरतों के यौनांगों पर हमला बदस्तूर जारी है। ऐसी कोई भी औरत नहीं मिलेगी जिसपर बुरी “चाल-चलन” का ठप्पा न लगा हो। लातीनी अमरीका के लोकप्रिय नृत्यों बोलेरो और तांगो में सभी औरतें धोखेबाज और वेश्या (मां को छोड़कर) ही रही हैं। वहीं, दुनिया के दक्षिणी देशों में हर तीसरी शादीशुदा औरत रोज़ाना घरेलू हिंसा झेलती है। “सात जन्मों के बंधन” का यह ‘तोहफ़ा’ उसे उन सब कामों की सजा देता है, जो वह करती है या फिर कर सकती है।

मोंतेवीदियो  की बस्ती कासाबाये की एक मजदूरिन बताती है :“सोते में ही किसी बड़े घर का लड़का आकर हमें चूमता और हमारे साथ सोता है। जगने पर वही हमें मारता-दुत्कारता है”।वहीं, दूसरी कहती है:
“मुझे अपनी मां से डर लगता है, मेरी मां भी मेरी नानी से डरा करती थी।”समाज और परिवार में ‘संपत्ति के अधिकार’ को मनवा लिए जाने की ऐसी मिसालें और भी हैं। जैसे,  मार-पीटकर औरत  पर अपनी हुकूमत चलाते मर्द  और बच्चों पर अपनी जबर्दस्ती थोपते औरत-मर्द दोनों। और क्या बलात्कार इसी हुकूमत को मनवा लेने की सबसे हिंसक और खौफ़नाक नुमाईश नहीं है?

एक बलात्कारी को सिर्फ आनन्द नहीं चाहिए। वह तो उसे मिलता भी नहीं। उसे चाहिए औरत के शरीर पर अपना पूरा और मनमाना कब्जा। हर बार और बर्बर होता बलात्कार अपने शिकारों की देह पर संपत्ति के ऐसे ही दावों के कभी न भरने वाले घाव छोड़ जाता है। और, यह हमेशा से तीर, तलवार, बंदूक, मिसाइल और दूसरे साजो-सामान के साथ चले सत्ता के मर्दाना खेल का सबसे भयानक चेहरा है। संयुक्त राज्य अमेरिका में हर छ्ह मिनट और मेक्सिको में हर नौ मिनट में एक औरत सत्ता का यह ‘अधिकार’ झेलती है। मेक्सिको की एक महिला कहती हैं:‘‘बलात्कार का शिकार होना और किसी गाड़ी के नीचे आ जाना एक बराबर ही है, सिवाय इसके कि बलात्कार के बाद मर्द यह पूछते हैं कि जो हुआ उन्हें पसंद आया कि नहीं।’’

आंकड़ों से बलात्कार के सिर्फ़ उन मामलों का पता चलता है, जिनकी रपट लिखाई जाती है। लातीनी अमरीका में ऐसे मामले सच्चाई के आंकड़ों से हमेशा बहुत कम होते हैं। बलात्कार झेलने वाली ज्यादातर औरतें तो डर की वजह से चुप रह जाती हैं। अपने ही घर में  बलात्कार का शिकार हुई बच्चियां  ‘अवैध’ संतानों को किसी सड़क पर जन्म देती हैं। यहीं पलने वाले लड़कों की तरह, इन ‘सस्ती’ देहों का आसरा भी यह सड़कें ही रह जाती हैं। रियो दी  जानेइरो  की गलियों में “भगवान भरोसे” पली-बढ़ी चौदह साल की लेलिया बताती है:
“हाल यह है कि चारों ओर लूट है। मैं किसी को लूटती हूं, और कोई मुझे।“

 देह बेचने के एवज में लेलिया को या तो बहुत कम मिलता है या फिर मिलती है सिर्फ़ मार और दुत्कार।  और जब कभी गुजारे की गरज से वह चोरी करती है, तब पुलिस उससे वह भी  झपट लेने के अलावा उसकी इज्जत भी लूटती है। मेक्सिको सिटी  की गलियों में भटकते हुए बड़ी हुई सोलह साल की आंखेलिका बताती है:‘‘मेरे यह बताने पर कि मेरा भाई मेरा शारीरिक शोषण कर रहा है, मां ने मुझे ही घर से बाहर कर दिया। अब मैं एक लड़के के साथ रह रही हूं और पेट से हूं। वह कहता है कि अगर लड़का हुआ तो  मेरी मदद करेगा। लड़की होने की सूरत में उसने कुछ भी वायदा नहीं किया।’’

यूनिसेफ  की निदेशिका का मानना है: ‘‘आज की दुनिया में लड़की होना खतरों से खाली नहीं है”। यहां वह नारीवादी  आंदोलनों की तमाम सफल मांगों के बावजूद बचपन से ही  औरतों के खिलाफ़ चले मारपीट और भेदभाव को भी सामने लाती हैं। 1995 में बीजिंग में स्त्री-अधिकारों पर हुई अंतर्राष्ट्रीय बैठक में यह बात खुली कि एक ही काम के एवज में उन्हें मर्दों के मुकाबले तिहाई मजदूरी ही मिलती है। किन्हीं दस गरीबों में सात तो औरतें ही होती हैं, वहीं सौ में से बमुश्किल एक  के पास कोई संपत्ति होती है। यह सब ‘तरक्की’ और ‘खुशहाली’ के रास्ते पर इंसानियत की अधूरी उड़ान ही जाहिर करता है।  वहीं, संसदों की बात करें तो औसतन दस सांसदों में एक  और कहीं-कहीं तो एक भी महिला सांसद नहीं है।

जब औरतों की जगह घर, कारखानों तथा  दफ्तरों में थोड़ी-बहुत  और रसोई घर तथा बिस्तर में पूरी तरह पक्की कर दी गई है, सत्ता और युद्ध की चाभी मर्दों के हाथ ही है। ऐसे में यूनिसेफ की निदेशिका कारोल बेल्लामी जैसी मिसालें इक्का-दुक्का ही हैं। संयुक्त राष्ट्र समानता के अधिकारों की बात करता है, उसे खुद के ऊपर लागू नहीं करता। दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत में हर दस अहम पदों में आठ पर मर्द काबिज हैं।
( अध्याय 1, पृष्ठ 43-46)

संपर्क-
53, साबरमती छात्रावास,
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067. मोबाईल-9555298438

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पूरन सिंह की कवितायें

डा. पूरन सिंह

चर्चित साहित्यकार पूरन सिंह कृषि भवन में सहायक निदेशक हैं. संपर्क : drpuransingh64@gmail.com>

आई लव यू

वह
मुझे
बहुत प्यार करता
गलियों/सड़कों/चैराहों पर
चीखता-चिल्लाता
आई लव यू, कामिनी
मैं
खुश होती
अपने आप पर/अपने भाग्य पर
इतराती/झूमती पागलों की तरह
सभी से कहती-
‘देखो, वह मेरा प्यार है।’
लेकिन
जब भी वह/अकेले में मिलता
हमेशा
मेरे कपड़े उतारने की जिद करता
और कहता
आई वाॅन्ट टू लव यू कामिनी।’

अस्तित्व

क्यों
क्यों पहनती हो
चूडि़यां/बिछुआ/मंगलसूत्र
क्यों

भरती हो सिंदूर
अपनी मांग में
कभी सोचा है
तुम्हारे सभी श्रंगार पुरूष के लिए ही तो हैं
फिर चाहे वह
पति/बेटा/भाई या पिता ही क्यों न हो।
कहीं ऐसा तो नहीं
जन्म दे रही हो तुम
अपनी कमजोरी/दासता को।
तुम्हारे लिए
वह कोई श्रंगार करता है क्या
फिर तुम ही क्यों
पहचानों
अपने अस्तित्व को
और समझो
उसके यथार्थ को!
कहीं
भेड़ की खाल में कोई भेडि़या तो नहीं
तुम्हारे चारों ओर
हर पल/हर क्षण रहता है
तार-तार करने तुम्हे
और तुम्हारे अस्तित्व को।

पुरूषत्व

मैं
चाहती हूॅं
घर और बाहर
तुम्हारी शक्ति बनूं
साथ दूं तुम्हारा
जीवन के उबड खाबड रास्तों पर।
मैं चाहती हूॅं
मैं तुम्हारे ओर तुम मेरे नाम से
जाने जाओ।
मैं चाहती हूॅं
मैं और तुम से दूर हम हों
हम दोनों
लेकिन
तुम हो कि निरंतर हारते रहते हो
अकेले/बिल्कुल अकेले
तुम्हें
मेरे साथ की जरूरत है,
तुम चाहते भी हो साथ चलना मेरे
लेकिन
चाहकर भी नहीं चल पाते
क्योंकि
तुम्हारा पुरूषत्व तुम्हारे रास्ते में
खडा हो जाता है फन उठाए।
और तुम
मर मर कर जीते हो
और
जी जी कर मरते ।

गौरैया

गौरेया हूॅं मैं
धर्म/संस्कृति/सभ्यता/परम्पराओं
और रूढि़यों के पिंजरे में कैद
सदियों से।
स्वतंत्र हो उड़ना चाहती हूॅं मैं
खुले आकाश में
ऊंचे आकाश में
ऊंचे /बहुत ऊंचे
जहाॅं
न कोई बंधन हो
न कोई दीवार।
अरे यह क्या?
नींद उड़ गई तुम्हारी/रातों की
तड़प उठे तुम!
तुम्हारा यह तडपना/फड़फड़ाना
मेरी जीत की प्रथम सीढ़ी है।
मैं खुश हूॅं
और
तुम………।

लक्ष्मण रेखा

मेरी जाॅंघों और दूधों
की दुनिया से परे भी
एक युग है।
तुमने कभी उसकी खोज ही नहीं की।
ऐसा नहीं कि तुम अनभिज्ञ हो
उस युग से!
स्वयं जानते हो तुम।
लेकिन
अनभिज्ञ बने हुए हो/तुम
बंधे हुए हो पुरूष रूपी लक्ष्मण रेखा से।
तुम नहीं चाहते कि
खडी हो सकूॅं मैं
तुम्हारे सामने
तुम्हें मित्र या साथी समझूॅं
पति या जीवनसाथी नहीं।

स्पीड ब्रेकर / कहानी

डा .कौशल पंवार


कौशल पंवार दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में संस्कृत पढाती हैं. उनसे उनके मोबाइल न.  09999439709 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

  (  राष्ट्रवादी स्वच्छता अभियान के बीच कौशल पंवार की यह कहानी पढी   जानी चाहिए .)

 हम आने वाले दिनों में आजादी की ६८वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं. आज ठीक स्वतंत्रता दिवस के दो दिन पहले उसे ये अहसास एक बार फिर से हुआ कि हम शायद आज भी गुलाम हैं और ये गुलामी देश से बाहर के लोगों की नहीं है बल्कि देश में रहने वाली उन ब्राह्मणवादी ताकतों से हैं जो कभी नहीं चाहती कि इस देश में रहने वाले ये दलित आजादी के बरसों बाद भी उनसे आजादी का सुख हासिल कर पायें. क्या ये समुदाय जो इसी समाज का भी अंग है, कभी इस ब्राह्मणवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पायेगा. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जी ने इस देश का संविधान बनाकर हमे समता का हक दिया. हमें वे सभी अधिकार दिये जो मानवतावादी मूल्यों की दरकार रखते हैं. लेकिन ककीकत में तो आज भी हमारे साथ वही गुलामों जैसा व्यवहार किया जा रहा है. जिसके लिए हमें उदाहरण ढूँढने की आवश्यकता नही है. ये दिन – प्रति दिन की घटनायें हैं जिसका सामना हमें आये दिन भूगतना पड़ता है. दलितों में भी दलित, समाज का सबसे निचला पायदान, जो चौतरफा शोषण का हर दिन शिकार होता है. ऐसे ढ़ेरों सवाल नीना को कौचट रहे थे और उसके सामने राक्षस के समान मुंह बाये उसे निगलने के लिए तैयार थे. सोचते-सोचते कब उसकी गाड़ी आगे वाली गाड़ी से टकरा गयी, उसे पता नहीं चला, वो तो भला हो सीट-बैल्ट का जिसने उसे कसकर बांध रखा था वरना तो आज उसका सिर स्टेरिंग से टकराते-तकराते बचा था. आगे वाली गाड़ी का ड्राइवर चिखने-चिल्लाने लगा. वैसे भी उसकी कार मंहगी थी, जो उसकी टूटी-फूटी उड़नखटौला से तो एकदम चकाचक थी जैसे कि अभी-अभी शोरूम से निकाली गयी हो. उसने अपनी सीट बैल्ट खोली, दरवाजा खोला और गाड़ी से उतर गयी. ड्राइवर अपनी ही धुन में चिल्लाए जा रहा था. उसने उसे कई बार सॉरी बोला पर उसने नीना की तरफ कोई ध्यान ही नहीं दिया. उसकी कार का ज्यादा नुकसान भी नहीं हुआ था, बस गाड़ी के पिछले हिस्से के बोनट पर थोड़ा सा स्क्रैच पड़ गया था. हां, नीना की नजर में तो वह थोड़ा ही था पर उनके लिए तो जैसे उनकी प्रेस्टीज़ पर छींटे पड़ गये थे.

गाड़ी का मालिक पिछली सीट पर बैठा हुआ अभी तक चुपचाप से तमाशा देख रहा था, उसने बड़े रुआब से गाड़ी का शीशा नीचे किया और उसे ऊपर से नीचे तक घूरा. एक बार तो नीना उसकी काले चश्में से झांकती नशीली आंखों से सहम सी गयी पर तुरंत ही उसने अपने आपको सम्भाल लिया. उसने सोचा भइया कहकर माफी मांग लेती हूं. परन्तु तुरंत ही उसने इस ख्याल को परे धकेल दिया. आजकल के आदमी भइया कहने से चिड़ जाते हैं. सो उसने अपनी भारी सी वाणी मे मिठास घोलते हुए माफी मांगी और हकलाते हुए कहा- “वो मैं थोड़ा आगे की ओर देख रही थी, आपकी गाड़ी को एक गाड़ी ओवरटेक करते हुए गुजरी थी, इसी देखा-देखी मे मेरी गाड़ी आपकी गाड़ी से टकरा गयी.” उसने बड़ी शालीनता से कहा. मालिक ने खा जाने वाली नजरों से ड्राइवर को देखा और आंखों से गाड़ी चलाने का ईशारा किया. वह बैठा और गाड़ी को पूरी रफ़्तार से मानों सबको रौंदता हुआ आगे निकल गया. नीना को लगा जैसे ये कार मालिक नीना के पूरे अस्तित्व को कुचल कर आगे निकल गया. उसने एक लम्बी सी गहरी सांस ली और अपने उड़नखटौले में आकर कहीं अतीत के पन्ने फिर से उकरने लगी, मानों किसी अध्याय का पन्ना पलट रही हो.

वह जिस कालेज में पढ़ाती थी. दिल्ली विश्वविद्यालय का एक जाना माना कालेज था. जाना-माना इसलिए क्योंकि इसमे पढ़ाने वाले अध्यापकों का एक बड़ा ग्रुप प्रगतिशील विचारों वाला माना और जाना जाता था और कई मामलों में यह था भी. नीना के कालेज के स्टाफरूम में चाय बनाने वाला रोशन कई दिनों से छुटी पर गया था जिस कारण से अध्यापकों को चाय समय पर नहीं मिल पा रही थी. सभी परेशान थे. प्राचार्य महोदय ने इस के लिए किसी को डयूटी नहीं लगाई थी. जब वह छुटी से वापिस आया तो उसे भी प्रशासनिक दफतर मे ही रख लिया गया. चाय को कैंटीन से ही मंगाकर पीने का अध्यापकों के लिए प्रबंध कर दिया गया. जिससे चाय केवल निश्चित समय पर ही मिल पाती थी. इससे सभी अध्यापकों को बड़ी परेशानी हो रही थी. हालांकि नीना तो चाय पीती नहीं थी.

इस पूरी समस्या का समाधान था कि इस बारे में प्राचार्य जी से बात की जाये. एक दिन कुछ अध्यापक मिलकर प्राचार्य जी के पास गये. उसमे नीना भी शामिल थी. उस ग्रुप में उसके अलावा कोई और महिला अध्यापक नहीं थी. सबने प्राचार्य जी से इस बारे में बात की और नान टिचिंग स्टाफ में से चाय के लिए किसी को नियुक्त करने के लिए कहा. प्राचार्य को ये पता ही नहीं था कि स्टाफरूम में कोई चाय बनाकर देने वाला है ही नहीं जबकि इसके लिए सभी अध्यापक मिलकर पैसा देते थे. स्टाफ असोसियेशन के माध्यम से ये पैसा दिया जाता था जो हर महीने सभी अध्यापकों की तनख्वाह में से काटा जाता था. नान टिचिंग स्टाफ की डयूटी ए.ओ. सविता शर्मा ही लगाती थी. सविता शर्मा का पूरे कालेज में अच्छे रुआबदार महिला के तौर पर स्थान था. वैसे रूआब हो या न हो पर वह इस बात का हमेशा ध्यान रखती थी कि सभी उससे डरे. वही सभी नानटिंचिग स्टाफ के बारे में निर्णय करती थी कि कौन किस ब्लाक में काम करेगा. उसकी सत्ता का अपना दायरा था और अपनी ही सोच थी.

 
अध्यापकों ने प्राचार्य से इस बारे में बात की और चाय बनाने के लिए एक महिला को रखने के लिए कहा जो उसी स्टाफ में से थी. यह उनका सुझाव था या योजना थी ? नीना को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी,  लेकिन अचानक नाम लेकर बोलने से उसे अटपटा जरूर लगा पर तब उसने सोचा कि सीनियर टिचर ये बात कह रहे थे तो जरूर सोच-समझकर ही कहा होगा. वह चुप थी और सबकी बातें सुन रही थी. ग्रुप के एक सिनियर अध्यापक ने प्राचार्य से कहा कि- “ओबीसी फंड में से दो सफाईकर्मी की पोस्ट बनती है, आप उसकी नयुक्ति की प्रक्रिया जारी करें, क्योंकि यहां पर ये स्टाफ कम है.” जैसे ही ये प्रसंग आया तो उसे घबराहट सी होने लगी कि आगे बात का रुख पता नहीं किस ओर होगा? वैसे भी इस काम के लिए तो १००% आरक्षण हमारी ही जाति का होता है जिसे बांटने का काम न तो कोई दलित करता है और न ही गैर दलित. खैर गैर दलित तो क्यों करना चाहेगा ? पर कोई दलित भी इसे नहीं करना चाहता सिवाय एक समुदाय के. वह एकदम दम साधे बैठी थी. उसके लिए ये बात ही अनायास ढ़ंग से उठायी गयी थी. उसने सोचा कि वे सब तो चाय की ही बात करने आये थे. इसके अलावा और भी बातें होगी, इसकी जानकारी नीना को नहीं थी कि कुछ और बातें भी नोटिस में लायी जानी है. वैसे भी वह तो क्लास लेकर स्टाफरूम में आयी ही थी कि सब ने कहा कि आप भी चले, चाय वाले के बारे में प्राचार्य से जवाब-तलब करना है. और वह चली आयी थी. पर बात तो कुछ और भी थी जो उसके वहां पहुंचने पर ही पता चली थी. उसे समझ नहीं आया कि इसमें उसे ही क्यों बुलाया गया था. शायद जानबुझकर या अनजाने में ? या कुछ और था………………..?

प्राचार्य ने हां कर दी थी और आदेश भी दिया था उन सबके ही सामने? दूसरी बात शुरू हुई थी कि प्राचार्य जी चाय वाले को स्टाफरूम के लिए नियुक्त करें. उन सबके बीच में बहुत ही सुलझे हुए सीनियर अध्यापक प्रो. एस.एन. भारद्वाज जी थे, जो प्रगतिशील विचारधारा के हिमायती भी थे और समय समय पर सही बातों का समर्थन भी करते रहते थे. उन्होंने कहा कि “सुनेरी को चाय बनाने के लिए स्टाफरूम में  डयूटी लगा दो.” तुरंत सबने जवाब दिया कि, “वो” जो हमारे यहां सफाईकर्मी है? सबने हां में हां मिलायी. प्राचार्य ने बैल बजायी और उन्हें भी आफिस में बुलाया लिया गया. सभी उनकी आंखों में आंखे डालकर ऐसे देख रहे थे जैसे वो कोई दूसरी ही दुनियां से आया हुआ जीव हो. नीना को वहां बैठे हुए ऐसा अहसास हो रहा था कि मानों इस सभ्य कहे जाने वाले समाज (?) में आज उसकी और सुनेरी की पेशी लग रही हो, जैसे आज दोनों की अग्नि परीक्षा ली जा रही हो, सुनेरी से बात करके और नीना को खामोश करके!

सुनेरी से प्राचार्य ने पूछा कि “क्या तुम चाय बनाने का काम कर लोगी?” मै………? इस प्रश्न पर अवाक थी जैसे कि उनसे पूछा जा रहा हो कि “तुम चाय बनाकर क्या करोगी, तुम्हें तो झाड़ू ही ठीक तरह से लगाना आता होगा.” पर सुनकर उन्होंने जवाब दिया कि “मैं बना लूंगी पर दोनों काम मैं नहीं करूंगी, आप मेरी डयूटी एक ही काम के लिए लगाना.” नीना उनके जवाब से संतुष्ट थी कि उन्होंने अपनी बात ठीक तरह से रखी, प्राचार्य जी की आंखों में आंखे डालकर. उसमें नीना को स्वाभिमान की झलक दिखायी दे रही थी. नीना ने उनकी ओर देखा और उन्होंने भी उसकी आंखों ही आंखों में बहुत कुछ कह दिया था. आज न सिर्फ उसकी और सुनेरी की ही परीक्षा थी बल्कि उन सब अध्यापकों की भी परीक्षा थी जो अपने आपको समाजवादी और प्रगतिशील विचारधारा वाले समझते थे. जो ये कहते नहीं थकते थे कि हम इस गैर बराबरी का समर्थन नहीं करते और जाति-पांति और छुआछूत पर विश्वास नहीं करते.

प्राचार्य ने सुनेरी का जवाब सुनकर सबकी तरफ देखते हुए, एक लम्बी सांस लेते हुए कहा कि ठीक है आज के बाद सुनेरी स्टाफरूम में अपनी डयूटी करेगी. उन्होंने तुरंत बैल बजायी और अपने पी.ए. को समझा दिया कि सुनेरी की डयूटी कल से स्टाफरूम में चाय बनाने के लिए लगा दी जाये. इतना सुनते ही पी.ए. ने सुनेरी को उपर से नीचे काईयां नजरों से घूरते हुए प्राचार्य  से कहा कि- “दो-तीन दिन लग जायेंगे फेर-बदल करने में, उसके बाद इन्हें वहां पर भेज देंगे.” ऐसा कहते हुए नीना को उसे देखकर लग रहा था कि ये पी.ए. इस बात को पचा नहीं पा रहा था कि कोई सफाईकर्मी अध्यापकों को चाय बनाकर पिलाये. फिर भी वह इस बात से बहुत खुश थी कि चलो किसी एक को तो इस काम से छुटकारा मिला. लेकिन उसका दिमाग अब भी ये मानने के लिए तैयार नहीं था कि एक सफाईकर्मी के हाथों से सभी अध्यापक चाय पीने के लिए तैयार कैसे हो जायेंगे? जो महिलायें उस पर ही ताना मारते हुए जरा भी नहीं झिझकती थी वे सुनेरी के हाथों से चाय कैसे पी सकेगी. उनकी मानसिकता नीना अच्छी तरह से समझती थी पर वे सब उसके सामने कभी कुछ नहीं कहती थीं. परन्तु पीठ पीछे कोई कसर बाकी नहीं छोड़ती थीं. अपनी सारी दिमागी बीमारियां उगल देती थी एक दूसरे के सामने. जो किसी न किसी माध्यम से उस तक पंहुच ही जाती थी. वह भी इस बात का ऐसा करारा जवाब देती थी कि किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि कोई पीठ पीछे भी उसके बारे में कुछ कहने का साहस जुटा सके? इसलिए उसके मन में कई सवाल घूम रहे थे पर दिल कालेज की हाईयेस्ट ओथोरिटी के जवाब से कहीं न कहीं संतुष्ट था. सुनेरी ने उसकी ओर देखा और हल्के से मुस्करा दिया. जैसे वह अपने इस अहसान के लिए उसका शुक्रिया अदा कर रही हो. उसने भरपूर निगाह उनके दमकते हुए चेहरे पर डाली और अपार संतुष्टि को देखकर वह प्रसन्न हुई.

तीन-चार दिन ऐसे ही गुजर गये थे. स्टाफरूम में धीरज शर्मा नाम का व्यक्ति चाय बनाकर पिलाता रहा था जो न तो चाय ठीक ढ़ंग से पिला सकता था और नहीं ही किसी की सुनता था. चलता भी ऐसे जैसे पैरों में कील लगी हों. इतनी देर में वह चाय पूछता था कि मांगने वाला खुद-उठकर चाय बनाकर पी ले. उसके अंदर धीरज कूट-कूट कर इतना भरा था जो उससे सम्भाले नहीं सम्भलता था. पर फिर भी उसे ही रखा हुआ था जिससे कोई भी संतुष्ट नहीं था. नीना जब स्टाफरूम में आई तो उसे देखकर उसे कोफ़्त सी हुई. एक झुंझलाहट के साथ वह स्टाफरूम से उठकर बाहर निकल गयी. उसे समझ नहीं आया किससे अपनी बात का जवाब मांगे. वह लाइब्रेरी की तरफ गयी तो सुनेरी सामने ही झाड़ू हाथ में लिए दिखायी दी. उसे देखकर नीना को अपना पूरा अतीत सामने खड़ा दिखाई दिया, अपनी हालत पर उसे रोने का मन हुआ पर उसने अपनी पलकों से आंसू बाहर नहीं आने दिये. खैर, उसने अपने आपको कंट्रोल किया और एक लम्बी सांस खींचकर वह सुनेरी की ओर बढ़ गयी.

दूर से ही सुनेरी भी नम आंखों से उसे ही देख रही थी. उसने उनकी ओर देखा और सवालिया निगाह से उनकी और मुंह उठाया कि क्या हुआ ? वह भी उसके बिना बोले ही समझ गयी थी. उन दोनों का दर्द एक ही जो था. उन्होंने उसे लाइब्रेरी से बाहर की ओर आने का ईशारा किया. वह आ गयी थी. आसपास बहुत से छात्र-छात्राएं इधर-उधर बैठे थे. उसका मन किया कि उसे बाहों में भर ले और खूब रोए. इस व्यवस्था ने उन दोनों को ही सदियों का संताप दिया था जो हर रास्ते पर रोड़े अटकाता रहता था पर वे दोनों ही मजबूर थे, वे ऐसा कुछ नहीं कर सकते थे जो इस व्यवस्था को बदल सके. दोनों की अपनी ही सीमायें थी. नीना ने पूछा तो सुनेरी ने आंखों में पानी भरकर कहा कि, “आप लोगों के जाने के बाद मुझे सविता शर्मा ने सबके सामने अपने आफिस में बुलाया था. पी.ए. भी वहीं था. स्टाफ के सारे लोग वहां पहले से ही मोजूद थे. मुझे कहा कि तुम स्टाफरूम में अपनी डयूटी लगवाना चाहती हो? मेरे होते हुए तुम्हारी डयूटी वहां स्टाफरूम में जिंदगी भर नहीं लगेगी. तुम सिर्फ और सिर्फ सफाई का काम ही करोगी जो तुमारी डयूटी है और जिसके लिए तुम्हें नौकरी पर रखा गया है. झाडू के अलावा दूसरा कोई ओर काम सोचना भी नहीं. तुम्हें इस कालेज में कोई भी दूसरा काम सिवाय, झाड़ू लगाने के, नहीं दिया जा सकता. मैं तुम्हें कभी दूसरा काम नहीं करने दूंगी, समझी तुम ? चाहे तुम किसी को भी अपनी सिफारिस लगाने के लिए बुला लो. मै नहीं करने दूंगी. इतना कहकर उसने वहां से बाहर निकाल दिया.”

सुनकर नीना का सिर चकरा गया था. सुनेरी भागकर लाइब्रेरी से कुर्सी लेकर आयी और उसे उस पर बिठाया दिया. थोड़ा सा बैठने के बाद नीना ने अपनी पानी की बोतल निकाली और उससे खूब सारा पानी पी लिया मानों पानी के साथ-साथ उसने अपना सारा दर्द, पीड़ा, तकलीफ सब अपने अंदर उढ़ेल लिया था. सुनेरी ने बताना जारी रखा. उन्होंने कहा कि “मैड़म, अगले साल मेरा बेटा इस कालेज में पढ़ने के लिए आयेगा. मै उसके सामने झाड़ू लगाते हुए क्या अच्छी लगूंगी ? उसके दोस्त क्या सोचेगे कि उसकी मां कालेज में साफ-सफाई करती है. बस इसलिए मैं इस काम को नहीं करना चाहती. मैं नहीं चाहती जो हम झेल रहे हैं वो मेरे बच्चे भी झेले. जिस अपमान से मैं गुजरी उसी अपमान को मेरे बच्चे भी सहे. मैं ऐसा नही करने दे सकती. मैं नही करना चाहती साफ-सफाई का काम, मुझे कोई और काम दिलवा दो.” वह उससे अपनी बातों का और दुविधा का समाधान चाहती थी पर उसके पास उसकी बातों का कोई जवाब नहीं था. वह क्या करूं, कहां जाएं ? वह बिना उसकी बातों का जवाब दिये भारी भारी कदमों से अपने आपको घसिटते हुए अपनी कार तक लायी और कार को दौड़ा दिया सड़क पर. उसे ऐसा लगा था जैसे सविता शर्मा के एक एक शब्द उसके पीछे पड़े हों? वे शब्द मानो सविता शर्मा ने सुनेरी को नहीं कहे बल्कि पूरे दलित समाज पर अपनी दबिश का तमाचा जड़ दिया था और इस बात ने उसके पूरे अस्तित्व को झंझोड़ कर रख दिया था. आज एक बार से फिर सदियों की दी हुई इस व्यवस्था ने गुलामी की जंजीरों में उसे जकड़ दिया था.

पर आज उसे समाधान करना था, उसने निर्णय किया कि अगर उसके जैसे लोग भी अन्याय के आगे घुट्ने  टेकते रहे तो ये जंजीर और गहरी होती चली जायेगी. फिर मां सावित्री बाई फूले और रमाबाई अम्बेडकर के बलिदानों का क्या होगा ? इस व्यवस्था ने सदा ही ऐसे हथियारों का इस्तेमाल सदियों से किया है. जिसका सामना तो शिक्षा के मूल मंत्र से ही किया जा सकता है. एकाएक उसकी गाड़ी की स्पीड़ में ब्रेक लग गयी थी और इन घुमड़ते हुए सवालों पर भी. गाड़ी के सामने रोड़ पर एक सीधा तनकर खड़ा हुआ ब्रेकर आ गया था जिसने उसकी गाड़ी को रोकने और धीमा करने की पूरजोर कोशिश की थी. परन्तु नीना को लगा कि यह ब्रेकर नहीं पूरे समाज को अवरुद्ध करने वाली दीवार है. उसे लगा कि अब इसे तोड़कर ही उस जैसे लोग आगे के रास्ते पर जा सकेंगे. यह काम मुझसे ही शुरू होना चाहिए….. ताकि लोगों को आगे जाने का कोइ उपाय हो सके….

स्वप्न भी एक शुरुआत है

राजीव रंजन गिरि

युवा आलोचक राजीव रंजन गिरि इन दिनों ‘ अंतिम जन’ के सम्पादन से जुड़े हैं. संपर्क : 09868175601,rajeev.ranjan.giri@gmail.com

वह बार -बार भागती रही
बार -बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न

कवि अरुण कमल की एक कविता है – स्वप्न। इस कविता में एक औरत बार-बार ससुराल से भागती है। मार खाकर। कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर घंटों बिताती है। फिर अँधेरा होने पर उसी जगह लौट आती है। कभी किसी दूर के सम्बन्धी या परिचित के घर दो-चार दिन काटती है। कभी अपने नैहर चली जाती है। पर हफ्ता-महीना भर बाद, थक कर, उसी जगह लौटती है। बेहतर होगा यह कहना कि उसे हर बार लौटना पड़ता है। यह उसकी विवशता है। यह भी याद रखने की बात है कि वह हर बार मार खाकर ही भागती है और लौटने पर भी मार खाती है। तो क्या इस स्त्री को अपनी ट्रैजिक नियति का पता नहीं है? कविता बताती है कि उसे बखूबी पता है कि मार खाने के बाद जहाँ से भागती है, बार-बार उसे वहीं लौटना है। साथ ही लौट कर फिर मार खाना है। जानती थी वो कहीं कोई रास्ता नहीं है / कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है / जानती थी वो लौटना ही होगा इस बार भी। फिर भी भागती है। उसके यहाँ से गंगा भी ज्यादा दूर नहीं थी। रेल की पटरियाँ भी पास थीं। पर वह अपनी ट्रैजिक नियति को जानते हुए भी कि उसे फिर लौटना पड़ेगा, और मार खाना पड़ेगा, भागती है। कुछ दिन के लिए ही सही। वह मरण का वरण नहीं करती। आत्महत्या का रास्ता नहीं अख्तियार करती। लिहाजा गंगा नदी का ज्यादा दूर न होना या रेल की पटरियाँ पास होना उसके लिए कोई विकल्प नहीं रचता। मार खाने से बचने के लिए जीवन को समाप्त करना उसे गवारा नहीं है। क्योंकि वह बार-बार जीवन से मृत्यु नहीं, मृत्यु से जीवन के लिए भाग रही थी। भागती भी है तो खूँटे से बँधी बछिया-सी जहाँ तक रस्सी जाती, भागती / गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती। आखिरकार वह औरत किस खूँटे से बँधी है, जिसे उखाड़ने की बार-बार असफल कोशिश करती है। गौर करें गर्दन ऐंठने तक कोशिश करती है और उस खूँटे को उखाड़ भले न पाये पर डिगा देती है। गर्दन ऐंठने तक कोशिश करना मानीखेज है। धीरे-धीरे यह खूँटा जड़ से उखड़ भले न पाये, टूटेगा जरूर। क्योंकि वह औरत बार-बार हर रात एक ही सपना देखती है। ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा। सपना है – मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न।

इस कविता में, जहाँ से वह औरत मार खाकर भागती है, वहीं उसे बार-बार लौटना तथा मार खाना पड़ता है। जाहिर है, यह उसकी ससुराल है। इसके लिए अरुण कमल ने ‘घर’ या ‘परिवार’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। क्या यह अनायास है? जबकि शादी के बाद, इस सामाजिक संरचना में, यही उसका ‘घर’ है या ‘परिवार’ भी। इस कविता में ‘घर’ शब्द एक बार आया है। जहाँ वह दो-चार दिन काटती है। कभी किसी दूर के संबंधी या किसी परिचित के घर। जाहिर है, यहाँ भी वह अपनी जिन्दगी के दो-चार दिन ही सही, जीती नहीं, काटती है। कभी भागकर नैहर जाती है। पर यहाँ भी कितने दिन के लिए? हफ़्ता या महीना। वहाँ से भी थककर लौटती है। आशय यह कि पीहर में भी जिन्दगी के कुछ दिन ही काट पाती है। भले ही परिचित या किसी दूर के रिश्तेदार के घर की तुलना में कुछ ज्यादा दिन। थक कर लौटना दो बातों की तरफ इशारा करता है। एक, जिन्दगी जी नहीं गयी है, काटी गयी है। दो, जो संरचना मौजूद है उसमें, उसके लिए नैहर अब विकल्प नहीं रह गया है। चाहे जो हो, उसे ससुराल में ही ‘निबाहना’ है। इस सामाजिक ढाँचे में माना यह जाता है कि डोली नैहर से उठी है तो अर्थी ससुराल से उठेगी। ऐसे में, वह ससुराल जहाँ बार-बार पीटी जाती है, शब्द के सच्चे मायने में ‘घर’ या ‘परिवार’ हो सकती है? हरगिज नहीं। वह उस स्त्री के लिए ‘जगह’ भर ही है।

सावित्री बाई फुले

न तो ‘घर’ महज छत के नीचे का बसेरा है और न ही ‘परिवार’ – कुछ लोगों के साथ भर रह लेने वाली व्यवस्था। जब तक आपसी संवेदनात्मक रिश्ता और उससे पैदा होनेवाली ऊष्मा मौजूद नहीं हो, उसे ‘घर’ या ‘परिवार’ की संज्ञा नहीं दी जा सकती। आखिरकार, जब वह जगह ‘घर’ और वहाँ के लोग ‘परिवार’ नहीं हैं, तब वह वहाँ क्यों है? वह किस ‘खूँटा’ की मजबूत रस्सी से बँधी है जिसे गर्दन ऐंठने तक उखाड़ने या तोड़ने की हर बार कोशिश करती है? कहना न होगा कि यह खूँटा पितृसत्तात्मक व्यवस्था है। याद रखें पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मायने परिवार में पुरुष का सिर्फ मुखिया होना नहीं है। यह महज इतना ही होता तो इसका ‘खूँटा’ कब का उखड़ चुका होता या इसकी ‘रस्सी’ टूट गयी होती। क्या यह कहने की जरूरत है कि इस ढाँचे की रचना धूर्तता और चालाकी के साथ की गयी है और आज भी हो रही है। आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैधानिक, सांस्कृतिक व्यवस्था और मूल्यों-मर्यादाओं, संस्कारों, आदतों तथा चिंतन के विभिन्न रूपों, विचारधाराओं, निर्मितियों, गतिविधियों के जरिये बड़े महीन ढंग से रची-बुनी गयी है पितृसत्ता। इन सबके जरिये पितृसत्ता पुरुष को औरत की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का पाखंड रचती और फैलाती है। इसमें सफल भी हुई है।

इस कविता में स्त्री के पास कहीं कोई रास्ता नहीं है और कहीं कोई अंतिम आसरा भी नहीं। जाहिर है, उसे अपना रास्ता खुद बनाना है और अपना आसरा भी खुद ही बनना है। इस स्त्री को इसका बोध है। इस बोध और गहरी जिजीविषा ने इसे रेल की पटरी पर या गंगा में जाने से रोका है। लिहाजा, ससुराल से मार खाकर बार-बार भागना महज पलायन नहीं है बल्कि विकल्प रचने के लिए, रास्ता बनाने की प्रक्रिया की एक कड़ी है। इसके साथ ही पीटने की पीड़ा का अहसास होते रहने के लिए जरूरी कदम भी। इस पीड़ा का अहसास होना बेहद जरूरी है। बगैर इस अहसास के न तो मुक्ति का स्वप्न याद रहेगा और न ही जीवन को बदलने के लिए यत्न करने की अभीप्सा बचेगी। इस अभीप्सा के बगैर वह गर्दन ऐंठने तक बार-बार खूँटे को डिगाने की असफल ही सही, कोशिश नहीं कर पायेगी।

पितृसत्ता ने एक तरफ स्त्री को घर के अंदर कैद किया है और उसके घरेलू श्रम का अवमूल्यन किया है। दूसरी तरफ विभिन्न मूल्यों-मान्यताओं और संस्कारों के जरिये शोषण को सहज एवं स्वाभाविक मान्यता के रूप में मन-मस्तिष्क में बैठाने की कोशिश की है। इस कविता की स्त्री का आर्थिक तौर पर स्वावलंबी नहीं होना और विभिन्न संस्कारों का मकड़जाल, अपना आशियाना अलग बनाने से, रोकता है। इन वैचारिक जकड़बंदियों का दबाव ऐसा मजबूत है कि जहाँ तक रस्सी जाती है (यानी मंदिर की सीढ़ी, नैहर या किसी रिश्तेदार के घर तक) वहीं तक भाग पाती है। फिर ससुराल में लौटकर आना इसकी ट्रैजिक नियति है। लेकिन बार-बार, हर रात मुक्ति का जो स्वप्न देखती है, उसके जरिये रास्ता जरूर बनेगा, मुक्ति जरूर मिलेगी, जीवन जरूर बदलेगा। इस कविता पर किंचित विस्तार के साथ विचार करने की वजह यह है कि इसमें एक आम स्त्री के जीवन का यथार्थ है और साधारण स्त्री की मुक्ति-कामना के साथ, खतरा मोलकर अपनी गर्दन ऐंठने तक कोशिश कर, यूटोपिया रचने का साहस भी।

रुकैया शेखावत हुसैन

‘स्वप्न’ शीर्षक कविता की मार्फत विचार करने की एक वजह है कि यह कविता जिस स्त्री के जीवन पर हो रहे पारिवारिक अत्याचार को अपना विषय बनाती है, वह ‘स्त्रीवाद’ का सिद्धांत पढ़कर अपनी मुक्ति-कामना से लबरेज नहीं है, बल्कि जीवन-जगत के यथार्थ से उसमें यह मुक्ति-कामना पैदा हुई है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि अगर कोई स्त्री ‘स्त्रीवाद’ या स्त्री-मुक्ति से सम्बन्धित धारणाओं को पढ़-सुन या समझकर अपनी मुक्ति की कामना करती है या इसके लिए अग्रसर होती है तो यह अपराध नहीं, बल्कि अच्छी बात है। इसी में मुक्तिकारी अवधारणाओं की सफलता भी है। यह उन लोगों के लिए कहा गया है जो ‘स्त्रीवाद’ और उससे जुड़ी धरणाओं को बदनाम करने के मकसद से अनर्गल प्रलाप करते हैं और मानते हैं कि आम औरतों का इससे कोई लेना.देना नहीं है। यह कविता पढ़कर समझा जा सकता है कि इस औरत पर पितृसत्तात्मक ढाँचे का भी असर है। इस संरचना के दायरे में जन्म लेने और उसकी परवरिश होने की वजह से यह स्वाभाविक भी है। काबिलेगौर बात है – इस ढाँचे के भीतर रहते हुए उसका ‘स्वप्न’ देखना और उस स्वप्न के लिए ‘यत्न’ करना। यही स्वप्न और यत्न उसे मुक्ति भी दिलाएगा।

बहरहाल, दुनिया के प्रत्येक समुदाय, सभ्यता, धर्म और मुल्क में पितृसत्ता मौजूद है। नतीजतन स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में कमतर मानने की रवायत है – अपवादस्वरूप भले ही कुछ इससे मुक्त हों। यह दीगर बात है कि इन सबमें पितृसत्ता का एक समान या सर्वमान्य रूप नहीं है। अपने अलग-अलग गुण, धर्म के साथ इसकी मौजूदगी बरकरार है। समय-समय पर इसने विभिन्न शक्तियों से नापाक गठजोड़ करके अपना रूप भी बदला है। इसीलिए अलग-अलग देश-काल में यह एक जैसा नहीं दिखता।

कुछ लोगों को लगता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था सामंतवादी संरचना की उपज है और सिर्फ इसी सामाजिक ढाँचे में मौजूद रहती है। जाहिर है, ऐसा मानने वालों की समझ है कि पूँजीवाद के साथ यह खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएगी। ऐसा सोचने वाले लोगों में, वे भी शामिल हैं, जो पितृसत्ता को दरकते देख दुखी होते हैं और वे भी हैं जो पितृसत्ता की शोषणकारी, अमानवीय रूप से दुखी होकर इसे बदलना चाहते हैं। इसके पक्ष में दुखी होने वाले लोग पितृसत्ता को मजबूत बनाने की कामना करते हुए पुराने दिनों को याद करते हैं तथा पूँजीवाद और इसके साथ आए बदलाव को कोसते हैं। जबकि पितृसत्ता के चालाक समर्थक, नित्य हो रहे बदलाव से, किसी भी तरह गठजोड़ करके इसे बरकरार रखने का प्रयास करते हैं। पितृसत्ता की मौजूदगी से आहत उपर्युक्त श्रेणी के लोग पूँजीवाद की भूमिका से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा पालते प्रतीत होते हैं।

इतना तय है कि पितृसत्ता सिर्फ सामंतवादी व्यवस्था में ही मौजूद नहीं होती। अगर ऐसा होता तो विकसित पूँजीवादी मुल्क में पितृसत्ता को पूरी तौर पर समाप्त हो जाना चाहिए था। तथ्य तो यह बताता है कि ऐसी संरचना में भी पितृसत्ता की मौजूदगी बनी हुई है, भले ही बदले रंग-ढंग में। इसका आशय यह नहीं है कि सामंतवाद और पूँजीवाद औरतों के मामले में, पितृसत्ता की मौजूदगी को लेकर, एक समान हैं। निश्चित तौर पर पूँजीवाद की भूमिका इस लिहाज से कई कदम आगे की है। इसने पितृसत्ता को एक हद तक चोट पहुँचायी है, बदला है, औरतों को आजादी मुहैया करायी है। पर पितृसत्ता में अपना हित दिखते ही पूँजीवाद ने इसके साथ गठजोड़ कर लिया। पितृसत्ता के सहयोग से औरतों के श्रम को कम करके आँका गया। इससे पूँजीवाद का हित सधता है। इसी तरह स्त्री-देह का मसला है। पूँजीवाद और इसके कई उत्पादों ने स्त्री-देह को, एक स्तर पर, आजाद करने में भूमिका अदा की। लेकिन दूसरे स्तर पर अपने हित के लिए पितृसत्ता से गलबहियाँ कर स्त्री-देह को महज पण्य में भी बदलने की कोशिश की। स्त्री-देह की मुक्ति जरूरी है। स्त्रियों को अपनी देह पर पूरा-पूरा अधिकार होना चाहिए। लेकिन इस देह-मुक्ति का नारा देकर स्त्री-देह को अपने लिए, सबके लिए, उपलब्ध करने की चालाकी भी हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो देह की आजादी पितृसत्तात्मक बंधनों, मूल्यों, मान्यताओं से होनी चाहिए। पूँजीवाद के जरिए कई कदम आगे तक स्त्रियों को देह पर आजादी मिली है। स्त्रियों में यह चेतना भी विकसित हुई है कि अपनी देह पर खुद का हक है। पर आजाद देह को पुरुष-भोग के लिए ‘उपलब्ध देह’ बनाने की कोशिश अंततः पितृसत्ता को चोर दरवाजे से लागू करने का ही प्रयास है। यहीं एक बात और। पूँजीवाद के विभिन्न उपकरणों, मीडिया आदि ने स्त्री-देह को खूब दिखाया और भुनाया है। घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर सार्वजनिक जगहों पर जाना, अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ा हुआ कदम है। पर यह भी गौर करना होगा कि इस बाहर आने में क्या सिर्फ स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया को यथार्थ बनाया जा रहा है? अथवा पितृसत्तात्मक संरचना अपने को नए रूप में ढालकर स्त्री-देह का वस्तुकरण कर रही है? संभव है इसके पक्ष में ऊपरी तौर पर स्त्री की मर्जी भी दिखे। पर सोचने की बात है कि इस ‘मर्जी’ को कौन-सी सत्ता परिचालित कर रही है, नियंत्रित कर रही है? लिहाजा पितृसत्ता की दहलीज को कुछ लाँघने के बावजूद स्त्री-देह किसके नियंत्रण में है, कौन-सी ताकत इस दिशा में ठेल रही है। इस पहलू को नजरअंदाज करके स्त्री-मुक्ति का न तो यथार्थ समझा जा सकता है और न ही यूटोपिया की रचना हो सकती है। दरअसल, ये सारी परिस्थितियाँ इतनी जटिलताओं से युक्त हैं कि इसका एक पक्ष देखकर न तो इसे सीधे खारिज किया जा सकता है और न ही इसका पुरजोर समर्थन। लिहाजा, पूँजीवाद या इसके विभिन्न उपकरणों को उनकी प्रगतिशीलता का वाजिब श्रेय भी देना होगा। साथ ही इसके ‘मुनाफे’ के लिए बने शोषणमूलक तंत्र की जटिलता और पितृसत्ता के साथ रिश्ते को समझते हुए मुखालफत भी करनी होगा।

सरिजिनी नायडू

इन दो व्यवस्थाओं के अलावा समाजवादी / साम्यवादी मुल्कों में पितृसत्ता की क्या स्थिति रही? क्या यह बिल्कुल समाप्त हो गई? फिलहाल यहाँ इस पर बहस किए बगैर कि वे मुल्क कितने समाजवादी या साम्यवादी थे। यह सवाल इसलिए पूछा जाना जरूरी है, क्योंकि कुछ लोगों का मानना है, समाजवाद आते ही स्त्री-मुक्ति का मकसद अपने आप पूरा हो जाएगा।

असल में, ‘आधार’ और अधिरचना की यांत्रिक समझ के कारण ही कुछ लोग ऐसा समझते हैं। स्त्री-मुक्ति का सवाल ही नहीं बल्कि जाति के सवाल को भी काफी समय तक ऐसे ही देखा जाता रहा है। कुछ लोग स्त्री-मुक्ति (जेंडर के संदर्भ में) के सवाल को सिर्फ ‘अधिरचना’ से सम्बद्ध मानते हैं। ऐसे लोगों को लगता है कि ‘क्रांति’ के बाद जब ‘आधार’ ही बदल जाएगा तो अधिरचना का बदलना अवश्यम्भावी है। लिहाजा स्त्री-मुक्ति का प्रश्न ही नहीं बचेगा। पितृसत्ता बिल्कुल समाप्त हो जाएगी। ऐसे लोग ‘आधार’ के साथ पितृसत्ता के जटिल रिश्तों को नजरअंदाज करते हैं। जबकि कुछ लोगों को पितृसत्ता का भौतिक आधार ही ज्यादा दिखता है। लिहाजा, ऐसे लोग इसे सिर्फ ‘आधार’ से जुड़ा मानते हैं। इस समझ का प्रतिफलन इस रूप में विकसित होता है कि जब उत्पादन का सम्बन्ध बदल जाएगा, उत्पादन प्रक्रिया बदल जाएगी तो फिर स्त्री-मुक्ति तो अपने आप हो जाएगी। ऐसे में यह कहना जरूरी है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का भौतिक आधार और सांस्कृतिक अधिरचना दोनों के साथ चोली-दामन का रिश्ता है। एक को दूसरे पर तवज्जो देना इसके जटिल अंतर्संबन्धों को नजरअंदाज करना होगा। यह भी याद रखने की जरूरत है कि ‘आधार’ के बदलने मात्र से ‘अधिरचना’ भी पूरी तरह नहीं बदलती। आधार और अधिरचना के बीच इस तरह का सरल सम्बन्ध होता तो कई समस्याएँ खुद-ब-खुद मिट गयी होतीं। आधार और अधिरचना के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध को नजरअंदाज करके इनकी परस्परता को नहीं समझा जा सकता। बहरहाल, समाजवादी मुल्कों में गोकि पूर्णतः स्त्री-मुक्ति न हुई, पर स्त्रियों के हालात बेहतर हो गए थे। पूँजीवाद की तुलना में स्त्री-मुक्ति के लिए समाजवादी व्यवस्था ज्यादा माकूल है।

स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की रचना इसलिए भी ज्यादा जटिल है कि स्त्री की पहचान सिर्फ और सिर्फ स्त्री के तौर पर नहीं है। हो भी नहीं सकती। लिहाजा स्त्री की समस्याएँ भी कई स्तर भेदों से जुड़ी हुई हैं। स्त्री अपने आप में कोई ‘वर्ग’ नहीं है। स्त्री होने मात्र से सारी स्त्रियों की न तो सभी समस्याएँ एक हो सकती हैं और न सबका हित एक हो सकता है। हाँ, किसी-न-किसी रूप में सभी स्त्रियाँ शोषण का शिकार होती हैं। मसलन, अमीर स्त्री और गरीब स्त्री दोनों का शोषण होता है। पर एक वर्ग का न होने के कारण इनका साझा वर्गीय हित-अहित नहीं हो सकता। संभव है, अमीर स्त्री अपने परिवार, समुदाय में पितृसत्ता का शिकार हो और अपने वर्गीय हित में गरीब स्त्री का शोषण कर रही हो। दूसरे शब्दों में कहें तो जाति, धर्म, वर्ग के साथ स्त्री अपनी अलग ‘कैटेगरी’ भी बनाती है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि सेक्स और जेण्डर के हिसाब से ऊपरी तौर पर समान होने के बावजूद ये स्तर-भेद ‘सार्वभौम बहनापा’ के मार्ग में अवरोध हैं? क्या इन स्तर भेदों को बिल्कुल नकारा जा सकता है? प्रसंगवश, स्त्री-मुक्ति विमर्शकारों के यहाँ ‘सेक्स’ और ‘जेण्डर’ एक नहीं है। अब हिन्दी में इसके अनुवाद की समस्या हो सकती है। इन दोनों का अनुवाद ‘लिंग’ करने से उनके साथ का अर्थवृत्त नहीं आ सकता और अवधारणा भी स्पष्ट नहीं हो सकती। लिहाजा जब तक उस अवधारणा को स्पष्ट करने वाला शब्द नहीं मिलता, तब तक सेक्स के लिए लिंग और जेण्डर के लिए जेण्डर का उपयोग करने में क्या दिक्कत है? कुछ अन्ध हिन्दी-प्रेमी दूसरी भाषा के शब्दों को बिल्कुल लेना नहीं चाहते। नतीजतन ऐसा शब्द बना देते हैं जो उस अवधारणा को स्पष्ट करने में कहीं से कारगर नहीं होता। गौरतलब है कि लिंग (सेक्स के अर्थ में) एक बायोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट है और जेण्डर एक सोशियोलॉजिकल कस्ट्रक्ट। यानी सेक्स जैविक या प्राकृतिक होता है। जबकि जेण्डर जैविक या प्राकृतिक नहीं होता। जेण्डर की रचना विभिन्न सत्ताओं ने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों, मान्यताओं के तौर पर किया है। मतलब कि स्त्री ‘सेक्स’ के लिहाज से पुरुष से भिन्न है। ‘जेण्डर’ की यह भिन्नता पितृसत्ता ने, अपने स्वार्थ के लिए, स्त्रियों को विभिन्न ‘भूमिका’ देने के मकसद से और कमतर ठहराने के लिए किया है। इस लिहाज से देखें तो ‘सेक्स’ और ‘जेण्डर’ में बड़ा फर्क नजर आएगा। पितृसत्ता ने ‘जेण्डर’ को भी प्राकृतिक, स्वाभाविक गुण के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया है। स्त्री-मुक्ति इसी ‘जेण्डर’ से मुक्ति में है। बहरहाल, स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया रचने वालों को स्त्री के स्तर-भेदों को ध्यान में रखना होगा। स्त्रियों के भीतर मौजूद परस्पर विरोधी पहचान के कई रूप हो सकते हैं। इन पहचानों को रेखांकित करने से स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया कमजोर नहीं बल्कि ज्यादा सार्थक, विश्वसनीय और कारगर होगा। अलबत्ता यह स्तर भेद चुनौती जरूर पेश करेगा पर मुक्ति का मजबूत और चौड़ा रास्ता इसी से निकलेगा। जाति और वर्ग दोनों से निरपेक्ष जेण्डर की समझ मुक्तिकारी यूटोपिया की पुख्ता जमीन तैयार नहीं कर सकती। साथ ही इस यूटोपिया की संरचना तब तक पूर्णतया सफल नहीं हो सकती जब तक तमाम स्त्रियों के लिए इसमें जगह न हो। कहने का आशय यह है कि स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की बाबत यह नहीं कहना होगा कि फिलहाल इस श्रेणी की स्त्री मुक्त होगी और उस श्रेणी की स्त्री बाद में मुक्त होगी। आपसी परस्पर विरोधी भेदों के बावजूद सारी स्त्रियाँ पितृसत्ता का शिकार हैं और सबके लिए मुक्तिकामी यूटोपिया की दरकार है।

जब भी स्त्री-मुक्ति की चर्चा होती है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अलमबरदार इसे खतरे के तौर पर प्रचारित करते हैं। ऐसे लोग यह फैलाते हैं कि मुक्ति की आवाज उठाने वाली ये औरतें पुरुषों से नफरत करने वाली, परिवार तोड़ने वाली, परकटी समुदाय की हैं। इनकी कोई देशी जमीन नहीं है। अव्वल तो यह है कि स्त्री-मुक्ति का सपना देखने वाली या इस दिशा में चिंतन-मन्थन करने वाली औरतों की कोई एक धारा नहीं है, न ही स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी कोई एक अवधारणा। हर बड़े मकसद की तरह इसमें भी तरह-तरह की वैचारिक सरणियों में यकीन रखने वाले लोग सक्रिय हैं।

किसी भी अस्मितावादी, मुक्तिकामी समूह का, अपने ऊपर अत्याचार करने वाले लोगों के प्रति नफरत पैदा कर, अपनी अस्मिता की तरफ ध्यान खींचने और इस ‘अन्य’ के बरअक्स ‘अपने’ लोगों को एकजुट करना आसान होता है। नोट करने की बात है कि अगर यह नफरत की प्रवृत्ति बढ़ती गई तो कोई भी मुक्तिकामी परियोजना, सफल होने के बजाय एक-दूसरी, वर्चस्वकारी शक्ति में तब्दील हो जायेगी। फिर यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने के बजाय, इन मूल्यों के लिए खुद भी चुनौती बन जायेगी। इसलिए किसी भी मुक्तिकारी समूह के स्वप्न में उसके ‘अन्य’ के लिए क्या भाव-स्थान है, इसके जरिए उस यूटोपिया की जाँच बिल्कुल जरूरी होती है। यह अच्छी बात है कि स्त्री-समूहों में अपने ‘अन्य’ (पुरुष) के लिए नफरत का भाव नहीं है। इनकी स्पष्ट समझ है कि हमारा संघर्ष पितृसत्ता के विविध आयामों से है, न कि पुरुष की व्यक्ति-सत्ता से। स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया में पुरुषों के लिए भी बराबर अधिकार और जगह होगी। अलबत्ता, ये औरतें नफरत फैलाने वाली नहीं हैं, बल्कि समाज में बराबरी, प्रेम और सौहार्द को स्थापित करना चाहती हैं। हाँ, अगर परिवार का ढाँचा अपने को बदलकर लोकतांत्रिक नहीं बनाता, पितृसत्ता से चिपका रहना चाहता है, तो इसका बना रहना क्यों जरूरी है? पितृसत्ता पर आधारित मौजूदा ‘परिवार’ में लोकतांत्रिक बनने की प्रक्रिया के दौरान दरार आयेगी और एक बेहतर परिवार की रचना होगी। इस नए बने ‘परिवार’ (या इसका कुछ नया नाम पड़ जाए) में स्त्री-पुरुष समानता होगी। दोनों को बराबर हक होगा। क्या यह कहने की जरूरत है कि ऐसा होना सिर्फ स्त्री के लिए नहीं बल्कि पुरुषों के हित के लिए भी आवश्यक है?

जिस ‘ब्रा-बर्निंग’ की चर्चा बार-बार होती हैं, उसे भी समझने की जरूरत है। असल में, मुक्तिकामी स्त्रियों ने ब्रा को ‘जेण्डर’ के साथ जोड़कर देखा था। अमेरिका में सम्पन्न एक विश्व सुंदरी प्रतियोगिता के दौरान स्त्रीवादियों ने अपनी-अपनी ब्रा उतारकर एक कूड़ेदान में फेंक दी थी। इन लोगों ने स्त्रियों से यह अपील भी की कि ब्रा गुलामी का प्रतीक है; अतः इसे फेंक दें। इन स्त्रियों का मानना था कि स्तन बच्चे के दूध पीने के लिए हैं, न कि पुरुष के उपभोग की खातिर। पुरुष-सत्ता ने इसे भोग की वस्तु बनाकर खास ‘आकार’ में रखने के मकसद से ब्रा का ईजाद किया है। आशय यह कि स्त्री ‘सेक्स’ के इस अंग को ‘ब्रा’ ने ‘जेण्डर’ में तब्दील कर दिया है। लिहाजा, गुलामी की इस निशानी को फेंककर जला देना आवश्यक है। गौर करने लायक बात यह है कि आज का स्त्रीवाद इस समझ से काफी आगे बढ़ चुका है। दूसरा, ‘ब्रा-बर्निंग’ के मुद्दे पर इतनी हाय-तौबा की दरकार भी नहीं है। यह भी ऐसी ही घटना है जैसा कि गर्भपात के अधिकार के लिए हो रहे आंदोलन के दौरान सीमोन सहित फ्रांस की अनेक स्त्रीवादी महिलाओं ने अपने दस्तख्त कर सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने अपने जीवन में गर्भपात कराया है। गर्भपात कराना उनका हक है और यह अधिकार कानूनी तौर पर उन्हें मिलना चाहिए। कानूनी हक मिलने के साथ समाज में गर्भपात को लेकर मौजूद ‘टैबू’ भी इससे दूर हुआ। अतः इतिहास की इन घटनाओं को उसके संदर्भ में ही देखने से ही इन्हें ठीक से समझा जा सकता है। बहरहाल ऐसी अपेक्षा तो स्त्री-पुरुष समता में भरोसा रखने वालों से की जा सकती है, पितृसत्ता के अलमबरदारों से नहीं।

स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया के समर्थकों पर आरोप लगाया जाता है कि इनकी देशी जड़ें नहीं हैं। ऐसा कहकर इस विचार को फैलाने की पुरजोर कोशिश होती है कि ये विदेशी धरणाएँ हैं और इनका यहाँ के अतीत, सभ्यता और संस्कृति से लेना-देना नहीं है। यहाँ की आम औरतों का भी इस ‘मुक्ति’ से कोई सरोकार नहीं है। अव्वल तो यह सवाल है कि कोई भी विचारधारा, वैचारिक सरणि अपने मुल्क में नहीं जन्मी तो क्या इसे नहीं अपनाना चाहिए? क्या लोकतंत्र और आधुनिकता सरीखी धारणाओं का जन्म जिन मुल्कों में नहीं हुआ, उन्हें इन धारणाओं को त्याग देना चाहिए? ऐसी कूपमंडूकता के खरतनाक मंसूबों को हमेशा याद रखना होगा। दूसरी बात यह कि स्त्री-मुक्ति की देशी जड़ें यहाँ मौजूद रही हैं। स्त्रीवादी बुद्धिधर्मियों ने इसकी गहरी पड़ताल कर हमारी इस महत्त्वपूर्ण विरासत का विवेचन-विश्लेषण किया है। जब से पितृसत्ता का अंकुश कायम हुआ है, इसके प्रतिरोध में स्त्री-आवाजें भी आई हैं। क्या इन आवाजों में मुक्ति-कामना नहीं झलकती? अपनी पीड़ा का अहसास कराती इन आवाजों में मुक्ति की गहरी लालसा का मार्मिक राग भी लबरेज है। गार्गी, थेरी गाथा की स्त्रियाँ, आंडाल, अक्का महादेवी, मीराबाई, सहजोबाई से लेकर रमाबाई, ताराबाई शिंदे, महादेवी वर्मा सरीखी अनेक स्त्रियों की आवाज में, अपनी पीड़ा और पितृसत्ता की मुखालफत शामिल है। पितृसत्ता ने कई स्तरों पर काम किया है। इनकी आवाज को दबाने से लेकर इनके विचारों को नष्ट करने तक। पितृसत्ता की प्रत्यक्ष हिंसा तो दिखती है, पर चुप कराने वाली परोक्ष हिंसा जल्द दिख नहीं पाती। आलम यह रहा है कि निकट अतीत में ‘सीमंतनी उपदेश’ की महान रचनाकार ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ ही बनी रही। आज तक उस साहसी स्त्री का नाम पता नहीं चल पाया है। क्या यह उस परोक्ष हिंसा का एक बुरा नतीजा नहीं है? ऐसा नहीं है कि पितृसत्ता की मुखालफत करने वाली ये स्त्रियाँ सिर्फ भारत या यूरोप में हुई हैं। जिस तरह हर मुल्क में पितृसत्ता थी, उसी तरह इसकी विरोधी भी थीं। मसलन, काफी पहले न जाकर निकट अतीत, उन्नीसवीं सदी, में गौर करें तो चीन में जिउ जिन, श्रीलंका में सुगला तथा गजमन नोना, इण्डोनेशिया में कार्तिनी, ईरान में कुर्रत उल ऐन सहित अनेक महिलाएँ हर मुल्क में मिल जाएँगी। यह अलग बात है कि पितृसत्ता का विरोध करने के साथ-साथ, मौजूदा दौर के हिसाब से देखने पर, इनकी सीमाएँ भी सामने आती हैं। अपनी इस विरासत को न तो नकार कर और न ही बढ़-चढ़कर तारीफ करके, समझा जा सकता है। विरासत के सर्जनात्मक विकास के लिए, खूबियों-सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, इसके साथ जिरह जरूरी होता है और कारगर भी।

अपने देश में स्वाधीनता आंदोलन ने स्त्रियों को घर की दहलीज से बाहर निकाला। इसी दौरान बड़ी तादाद में स्त्रियों ने सामाजिक-राजनीतिक कार्य में हिस्सा लिया। राजनीतिक प्रश्न के तौर पर स्त्रियों का सवाल इसी दौर में उभरा। स्त्रियों का, घर की चारदीवारी से बाहर आकर, सामाजिक-राजनीतिक कामों में हिस्सा लेना, सभा-संगोष्ठी में जाना, अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ा हुआ कदम था। इसके लिए स्वाधीनता-आंदोलन की अगुआई करने वाले नेताओं को वाजिब श्रेय देना चाहिए। पर, यह भी याद रखना चाहिए कि दलितों, मजदूरों और किसानों के सवाल की तरह स्त्रियों का प्रश्न भी उनके लिए स्वाधीनता-आंदोलन का ही मसला था, अलग से स्त्री-मुक्ति का सवाल नहीं। आशय यह कि उस दौर के राष्ट्रवादी नेताओं ने स्त्रियों के मसले को अपने नजरिये से, स्वाधीनता आंदोलन की जरूरत के नजरिये से, उठाया। स्त्रियों को घर से बाहर लाकर आंदोलन से जोड़ना उनकी ऐतिहासिक जरूरत थी। यही वजह है कि 1917 में सरोजिनी नायडू की अगुआई में, स्त्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल को, मांटेस्क्यू से मिलकर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और काउंसिल के उन्नीस गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा उठाए गए स्वराज्य की माँग को अपना समर्थन देते हुए भी, स्त्रियों के सवाल को अलग से उठाना पड़ा। स्वाधीनता आंदोलन के अगुआ खुद ‘जेण्डर’ की धारणा से ग्रसित थे। उन्हें लगता था कि स्वाधीनता आंदोलन में जो काम पुरुष कर सकते हैं, स्त्रियाँ नहीं कर सकतीं। इसे समझने के लिए महात्मा गांधी द्वारा आहूत नमक सत्याग्रह को याद किया जा सकता है। गांधीजी स्वाधीनता आंदोलन में स्त्रियों को भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे, परंतु नमक सत्याग्रह के लिए हुए दांडी मार्च में हिस्सा लेने से रोक रहे थे। इन्हें लगता था कि इतना दूर चलने से स्त्रियाँ थक जाएँगी। गांधीजी की इस मनाही का सरोजिनी नायडू सहित कुछ स्त्रियों ने मुखर विरोध किया और दांडी मार्च में शामिल होने हेतु जिद की। इनकी जिद के सामने झुककर गांधीजी ने बाद में अपनी हामी भरी। दांडी मार्च और इसकी परिणति नमक सत्याग्रह में शामिल स्त्रियों ने, गांधीजी की पूर्व मान्यता को गलत साबित करते हुए, पुरुषों की तुलना में ज्यादा काम किया। इस तरह की कई घटनाएँ बताती हैं कि स्वाधीनता-आंदोलन के नेताओं की मानसिक बनावट में ‘जेण्डर’ की पितृसत्तात्मक मान्यताओं का कितना असर था। इसी के साथ कुछ ऐसी बातें भी हैं जिनमें भारत की स्त्रियों को, अपने हक के लिए यूरोप की महिलाओं की तुलना में काफी कम संघर्ष करना पड़ा। यूरोपीय महिलाओं को अपने राजनीतिक हक, ‘वोट देने का अधिकार’ पाने के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ी थी।

1928 ई. में हुए मुंबई (तब बम्बई) कांग्रेस में सरोजिनी नायडू ने काउंसिलों के चुनाव में स्त्रियों के मताधिकार का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का मदन मोहन मालवीय ने मुखर विरोध किया था। हालाँकि, मालवीय के विरोध के बावजूद, यह प्रस्ताव पास हो गया। आशय यह है कि स्त्रियों के पक्ष में, भले ही कुछ कदम आगे बढ़कर साथ देने के लिए, स्वाधीनता-आंदोलन में शामिल शिक्षित मध्य वर्ग सामने आता था।

भारत में स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के हिमायतियों ने सिर्फ स्त्रियों का सवाल उठाकर, उसके लिए ही जोखिम भरा संघर्ष नहीं किया है। बोधगया मुक्ति आंदोलन, चिपको आंदोलन और आंध्र प्रदेश में शराब के खिलाफ हुए आंदोलन, जिसकी वजह से सरकार गिर गई थी, स्त्रियों द्वारा किए गए आंदोलन हैं जिसमें अपनी-अपनी तरह की स्त्रीवादी महिलाएँ शामिल रही हैं। इन सारे संघषों में स्त्रियों को काफी सफलता भी मिली है। इस लिहाज से गौर फरमाएँ तो भारत के स्त्री-मुक्ति आंदोलन की यह निजी खासियत है और इसके विस्तार तथा व्याप्ति का सूचक भी।

स्त्री-मुक्ति का एक यूटोपिया, एक सदी पहले, रुकैया सखावत हुसैन ने अपनी कहानी ‘सुल्ताना का सपना’ में रचा था। इसके हिसाब से पुरुष घरों में सारा काम कर रहे हैं और औरतें बाहर के सारे काम को कर रही हैं। इस यूटोपिया को लागू करने की प्रक्रिया नफरत आधारित नहीं थी, परंतु इसमें सारा क्रम सिर्फ उलट दिया गया था। मौजूदा स्त्री-मुक्ति-विमर्श, इस समझ से, काफी आगे बढ़ चुका है। अब क्रम को सिर्फ उलटा नहीं जाता बल्कि सहभागिता, स्वतंत्रता और समता को सुनिश्चित किया जाता है।

नोट करने लायक बात यह है कि यथार्थ और यूटोपिया एक-दूसरे से बिल्कुल अलहदा नहीं होते। दोनों के बीच द्वन्द्वात्मक रिश्ता होता है। यथार्थ के घात-संघात और समझ से यूटोपिया आकार ग्रहण करता है तो यूटोपिया हमें यथार्थ को जाँचने-समझने की समझ भी देता है, जिससे यथार्थ की जटिल संरचना में निहित वर्चस्वकारी रूप को जानकर उसे दूर करने की दिशा में बढ़ते हैं। स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ के विभिन्न आयामों को समझे बगैर नहीं रचा जा सकता। व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं के साथ पितृसत्ता ने अन्योन्याश्रित सम्बन्ध बना रखा है। इसलिए इन सारे पहलुओं को ध्यान में रखकर ही स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया का खाका निर्मित हो सकता है। पितृसत्ता के इस मकड़जाल को देखते हुए ऐसा लगता है कि बगैर पूरी व्यवस्था बदले पूर्णतः स्त्री-मुक्ति संभव नहीं। एक न एक दिन स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ जरूर बनेगा। मुक्ति का स्वप्न इसे हकीकत तक जरूर पहुँचाएगा। कवि वेणु गोपाल की कविता का सहारा लेकर कहें तो –

न हो कुछ भी
सिर्फ सपना हो
तो भी हो सकती है शुरुआत
और यह एक शुरुआत ही तो है
कि वहाँ एक सपना है।

कम से कम एक दरवाज़ा

सुधा अरोडा


सुधा अरोडा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

( सुधा अरोड़ा के इस आलेख के सन्दर्भ दो -तीन साल पहले घटी घटनायें हैं , लेकिन स्त्री के अवसाद और उसकी चुनातियों की यह बेहद संवेदनशील पड़ताल है . )

( समाज में जो बदलाव हमें दिखाई दे रहे हैं, वे बहुत ऊपरी हैं. कहीं आज भी हम स्त्रियों को उनका अपेक्षित सम्मान नहीं दिला पा रहे हैं और न ही उनके लिये परिवार और समाज की ओर से वह सपोर्ट सिस्टम तैयार कर पा रहे हैं, जो उन्हें जीवन की विसंगतियों से, असुविधाओं और कठिन परिस्थितियों से जूझने के रास्ते मुहैया करवा सके. शिक्षित करके हमने उन्हें अर्थ उपार्जन का रास्ता तो दिखा दिया, आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा भी कर दिया, पर हम उन्हें जीवन जीने की कला, विपरीत परिस्थितियों से जूझने का तरीका, अपने लिये एक दरवाजा खुला रखने का ढब नहीं सिखा पाये.)

आज से करीब डेढ़ सौ साल पहले की भारतीय स्त्रियों को अपनी सामाजिक स्थिति और अपनी यातना की पहचान ही नहीं थी. अपने घर की चहार दीवारी की परेशानियों से बिला शिकायत जूझना उनकी मजबूरी थी और उन्हें यथासंभव संवार कर चलना उनका स्वभाव. घर से बाहर उनकी गति नहीं थी इसलिये जहां, जितना, जैसा मिला,सब शिरोधार्य था. सहनशीलता और त्याग उनके आभूषण थे. अगर सम्मान मिला तो अहोभाग्य, दुत्कार मिली तो नियति- क्योंकि अपने जीवन से एक स्त्री की अपेक्षाएं कुछ थीं ही नहीं.

एक मध्यवर्ग की स्त्री अगर प्रतिभावान और रचनात्मक हुई तो वह रसोई और बच्चों की देखभाल के बाद दोपहर के बचे हुए समय में, घर के फेंके जाने वाले सामान से चित्रकला या क्रोशिए से बॉर्डर या कवर बिनतीं, साड़ियां, चादरें और तकिया गिलाफ़ काढ़तीं – इस तरह अपना पूरा समय वे घर की चहारदीवारी के भीतर की स्पेस को सजाने-संवारने-निखारने में बिता देतीं.

अपने अधिकारों के प्रति अज्ञानता, अपने घरेलू श्रम को कम करके आंकना, बचपन में विवाह, विधवा हो जाने पर सामान्य जीवन जीने पर अंकुश आदि ऐसी कुरीतियां थीं, जिसके चलते उन्हें शिक्षित करना उस कालखंड की अनिवार्यता बन गई. स्त्रियां शिक्षित हुईं. शिक्षा से स्त्रियों का जागरुक होना स्वाभाविक था. लेकिन बाहरी स्पेस में उनका काम स्कूल में अध्यापन करने तक ही सीमित रहा. शिक्षा के बाद की दूसरी सीढ़ी आई, उन्हें आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया गया और शिक्षण से आगे, बैंकों में, सरकारी दफ्तरों में, कॉरपोरेट जगत में और अन्य सभी क्षेत्रों में स्त्रियों ने दखल देना शुरु किया. आर्थिक रूप से हर समय अपना भिक्षापात्र पति के आगे फैलाने वाली स्त्री ने घर को चलाने में अपना आर्थिक योगदान भी दिया. पर इससे उसके घरेलू श्रम में कोई कटौती नहीं हुई. इस दोहरी जिम्मेदारी को भी उसने बखूबी निभाया.

माना कि भारतीय समाज में वैवाहिक सम्बन्धों में बेहतरी के लिये समीकरण बदले हैं, पर वह स्त्रियों के एक बहुत छोटे से वर्ग के लिये ही है- जहां पुरुषों में कुछ सकारात्मक बदलाव आये हैं. मध्यवर्गीय स्त्री के एक बड़े वर्ग के लिये आज स्थितियां पहले से भी बहुत ज़्यादा जटिल होती जा रही हैं.

आज स्त्रियों को लेकर पूरा परिदृश्य बहुत ज़्यादा निराशाजनक है. रोज़ का अखबार स्त्री के साथ घटित नये हादसे लेकर हमारे सामने आता है पर समय जितना असंवेदनशील होता जा रहा है, ये हादसे घटित होने के पहले दिन जैसे अखबार के पहले पन्ने पर रहते हैं और अगले कुछ दिनों में तीसरे चौथे पन्नों पर स्थानांतरित होकर अखबार से गायब हो जाते हैं, वैसे ही हमारे दिमाग़ पर सिर्फ पहले दिन इनकी दस्तक हथौड़े सी पड़ती है पर धीरे धीरे ये हमारी आंखों से ओझल होते ही मन पर हल्की सी खरोंच छोड़कर हमारी सोच का हिस्सा बनने से पहले ही हमारी दहलीज़ छोड़ जाते हैं.

आत्महत्या के पूर्व निधि और उसके बच्चे

आत्महत्या के फैसले

अन्तर्राट्रीय महिला दिवस के दिन 8 मार्च 2011 से 28 सितम्बर 2011 तक- छह महीनों के अंदर मुंबई के उपनगरों में बीस से बत्तीस की उम्र की चार लड़कियों की आत्महत्याएं नये सिरे से हमारे सामने ढेर सारे सवाल खड़े करती है. ये चार तो अखबारों के पहले पन्नों पर दर्ज किये गये मामले थे, प्रताड़ना के कई मामले बदनामी के डर से घर के सदस्यों द्वारा ही दबा दिये जाते हैं. पहले हम इन चारों आत्महत्याओं की स्थितियों पर एक नज़र डालें-

8 मार्च 2011 – अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन, जब दिल्ली से राधिका तंवर की हत्या की खबर पहुंची, उसके साथ ही दिल दहला देने वाली खबर थी- निधि गुप्ता (जालान) की- जिसने मलाड के एक रिहायशी टावर के उन्नीसवें माले के रिफ्यूज एरिया में जाकर अपने छह साल के बेटे गौरव और तीन साल की बेटी मिहिका को छत से नीचे फेंकने के बाद खुद कूद कर तीन ज़िदगियों का अंत किया. निधि गुप्ता एक चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के साथ, मलाड के सराफ कॉलेज की विज़िटिंग लेक्चरार थी और एम.बी.ए. की परीक्षा में बैठने की तैयार कर रही थी.

16 अप्रैल 2011- दहिसर पूर्व के एक टावर की सातवीं मंज़िल पर रहने वाली दीप्ति चौहान (परमार) ने वॉचमैन से छत की चाबियां लीं. वहां जाकर पहले अपने छह साल के बेटे सिद्धेश की आंखों पर पट्टी बांधकर उसे छत से नीचे फेंका और उसके बाद खुद कूदकर अपनी जान दे दी. दीप्ति अब एक गृहिणी थी और उसका पति नीलेश शेयर मार्केट का ब्रोकर.

26 जुलाई 2011- शिवानी साहू- एम.बी.ए. ने, मुलुंड पूर्व के अपने निवास पर, डेढ़ साल की अपनी बच्ची को छोड़कर पंखे से झूलकर आत्महत्या कर ली.

28 सितम्बर 2011- निधि सिंह 24 वर्ष – आय.आय.टी. कानपुर की स्नातक और एम.बी.ए.- फरवरी में समदर्शी सिंह से प्रेम विवाह किया और मुंबई के उपनगर अंधेरी पूर्व में पहली मंजिल के फ्लैट में चार महीने पहले ही शिफ्ट हुई थी, शादी के सात महीने बाद, पंखे से झूलकर आत्महत्या कर ली. यह कदम उठाने से पहले उसने अपने मोबाइल पर एक मिनट का अपना बयान रिकॉर्ड किया कि उसके इस निर्णय में किसी का हाथ नहीं है. वह अपने माता पिता और पति को अपनी कुंठाओं से परेशान नहीं करना चाहती, इसलिये अपने जीवन का अंत कर रही है.

इन चारों आत्महत्याओं में कुछ आश्चर्यजनक समानताएं हैं. मध्यवर्ग से आई ये चारों लड़कियां पढ़ी लिखी थीं. शादी से पहले नौकरी करती थीं. चारों ने अपनी मर्ज़ी से अपने जीवन साथी का चुनाव कर प्रेम विवाह किया. अपनी डिग्रियों और योग्यता के बल पर वे अपना एक स्वतंत्र मुकाम बना सकती थीं, फिर इन्होंने आत्महत्या का रास्ता क्यों चुना? शिक्षा, आर्थिक आज़ादी और आत्मनिर्भरता के बावजूद ऐसे हादसों पर रोक नहीं लग पाई तो क्यों ? आखिर चूक कहां हो गई? यह सवाल किसी भी सोचने समझने वाले व्यक्ति को, समाजिक कार्यकर्ताओं को, समाज विज्ञान के अध्येताओं को विचलित करेगा. इनमें से कुछ हादसों के तह तक पहुंचने की एक कोशिश की जानी चाहिये. अखबार सिर्फ सूचना देते हैं, हादसों का विश्लेषण करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती.

दीप्ति चौहान अपने पति और बच्चे के साथ

चार्टर्ड अकाउंटेंट और मलाड के पोद्दार कॉलेज की शिक्षिका निधि गुप्ता के मित्रों, परिचितों और परिवार के सदस्यों ने बयान दिया कि निधि गुप्ता कभी अपनी घरेलू समस्याओं से परेशान दिखाई नहीं देती थी, वह बिल्कुल ‘नॉर्मल’ थी, अवसाद के कोई निशान उसके चेहरे पर नहीं थे .

निधि गुप्ता अपने दोनों बच्चों के साथ

गुप्ता परिवार के फ्लैट से कभी लड़ने झगड़ने की आवाज़ें नहीं आईं. दो बेडरूम के फ्लैट में वे दो भाई- जिसमें से एक की शादी नहीं हुई थी और एक बहन-बहनोई अपने माता पिता के साथ रहते थे. निधि गुप्ता के ससुरालवालों ने यही बयान दिया कि ‘सबकुछ ठीक था’, ‘परिवार में कोई तनाव नहीं था’ और ‘ वे निधि के अपने दो छोटे बच्चों को मारकर खुद आत्महत्या करने के ऐसे भयावह निर्णय के पीछे कोई कारण तलाश पाने में असमर्थ हैं.’

यह एक अप्रत्याशित कदम था और कोई नहीं जानता कि उसने ऐसा क्यों किया. लेकिन सतह पर सबकुछ सही और ठीक दिखते हुए भी भीतर कितनी उथलपुथल छिपाए रहता है, यह कोई समझ पाने की कोशिश भी नहीं करता. यह जानते हुए भी कि निधि गुप्ता ने अपनी शादी की सालगिरह की तारीख से एक दिन पहले अपने और अपने दोनों बच्चों के जीवन का अंत करने का निर्णय लिया, अखबारों में तीन दिन तक पहले पृष्ठ पर प्रमुखता से यही आता रहा कि उसने न अपने माता पिता से, न मित्रों से कभी अपने अवसाद की बात की.

शादी की सालगिरह से पहले यह निर्णय लेना स्पष्टता से यह तो बताता ही है कि सतह पर सामान्य दिखते रिश्तों की भीतरी गहरी दरारों को ऊपर से ढके रहना मुश्किल नहीं होता. आम तौर पर हर लड़की ऊपर से मुस्कुराहट बिखेरते हुए भी अपने भीतर का झंझावात छिपाये रखती है. जीवन साथी की अपने प्रति निर्मम उपेक्षा या भावात्मक हिंसा को अपने भीतर जज़्ब करते हुए वह अपने पड़ोसियों या कार्यस्थल के मित्रों के साथ बातें करने में, अपने को अपने करियर के लिये पढ़ाई में व्यस्त रखने में, बच्चों की देखभाल में या उनके स्कूल का होमवर्क कराने में, या घर गृहस्थी के अंतहीन कामों में अपने को खपा डालती है.

कोई भी मध्यवर्गीय स्त्री, खासतौर पर दो बच्चों की मां, अपने परिचितों और मित्रों से अपनी घरेलू निजी त्रासदियों का बखान करना पसंद नहीं करती. वह यही सोचती है कि अपनी समस्याओं का हल वह ढूंढ ही लेगी. अपने परिवेश के बढ़ते हुए दबाव को महसूस करते हुए भी वे इसे अपने भीतर ही छिपा कर रखना चाहती है.

अधिकांश महिलाओं के साथ यही होता है कि वे इसे सभी महिलाओं के जीवन की औसत त्रासदी समझती हैं और अपने मां-बाप से इस तकलीफ को बांटकर उनके दुख को और बढ़ाना नहीं चाहतीं. एक अलिखित आचार संहिता उन्हें रोकती है जिसके तहत वे सोचती हैं कि मां-बाप की ज़िम्मेदारी उन्हें पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़े होने की कूवत देने और अपनी मर्जी के लड़के से ब्याह करने की इजाज़त देने के बाद समाप्त हो जाती है और शादी के बाद की सारी समस्याओं से अब उन्हें अकेले ही निबटना है.

आज भी आम मध्यवर्ग की एक सामान्य लड़की अपना शत प्रतिशत दे देती है. शादी के बाद घर-परिवार, पति-बच्चे उसकी पहली प्राथमिकता होते हैं- आम तौर पर उसका अपना करिअर, अपनी महत्वाकांक्षाएं दूसरे नम्बर पर आती हैं पर उसकी इस प्राथमिकता और भावात्मक लगाव पर लगातार चोट की जाती है. ससुराल के अन्य सदस्य तो एक तरह से दुश्मन के खेमे में तैनात हो ही लेते हैं, अक्सर पति भी नयी ब्याही पत्नी का साथ छोड़कर अपने घर के सदस्यों का साथ देने लगता है. ऐसे में लड़की पर दोहरी चोट है. ससुराल के सदस्यों के प्रेम की वह हक़दार नहीं बनती और अपने मां-बाप के साथ अपनी इस त्रासदी को बांटकर उन्हें दुखी नहीं करना चाहती.

आपसी संबंधों में भावात्मक खाई और संवेदना का टकराव असंवेदनशीलता से होना उन्हें तोड़ता है. अगर वह अपने ही भीतर एक ऊर्जा, एक संबल पैदा करने में असमर्थ रहती है तो उसके भीतर अवसाद की जड़ें इतने गहरे तक पैठ जाती हैं कि बहुत दिनों तक भीतर एक झंझावात झेलते हुए और बाहर से एक खुशनुमा आवरण ओढ़ते हुए वह अंदर ही अंदर छीजती चली जाती है. ऐसी ही लड़कियों को एक चरम स्थिति (डेस्पेरेशन) में अपना और अपने बच्चों के जीवन का अंत करना ही एकमात्र हल दिखाई देता है.

आय.आय.टी. कानपुर की स्नातक और एम.बी.ए. निधि सिंह के पति ने बताया कि काम पर जाने से पहले निधि ने पति से मिन्नत की कि वह दस मिनट के लिये उससे बात करे और तब जाये. वह कुछ देर रुका भी पर उसे ऑफिस के लिये देर हो रही थी. ऑफिस जाने के कुछ देर बाद उसे एक एस.एम.एस. मिला- ‘‘सॉरी’’ उसने इसे गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि उसने नहीं सोचा था कि निधि अपने जीवन का अंत करने जा रही है. सिर्फ सात महीने पहले फरवरी में उनकी शादी हुई थी. निधि ने शादी के बाद अपनी नौकरी छोड़ दी थी और वे चार महीने पहले ही इस नये घर में शिफ्ट हुए थे.

‘बचाव के लिये पुकार ’ (Cry for Help)

आत्महत्या के निर्णय से पहले ‘सहारे की ललक‘ या ‘बचाव के लिये पुकार ’ ( क्राई फॉर हेल्प ) हमेशा दिखाई देती है. निधि सिंह का अपने पति को बात करने के लिये बार-बार रोकना इसी चीख के अंश है, आम तौर पर जिसे अनसुना कर दिया जाता है. निधि गुप्ता जालान और दीप्ति सावंत परमार के साथ भी यही स्थिति थी. दोनों ही अपने माता पिता को संकेत दे रही थीं कि वे एक दबाव और तनाव में जी रही हैं. घटना के बाद भी वे इन संकेतों को नकारते हैं. इन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता- यह कहकर कि यह तो सभी के साथ होता है और बीत जाता है. एडजस्टमेंट ही एक ऐसी घुट्टी है, जिसे हर मां-बाप अपनी बेटी की शादी में पोटली में बांधकर थमा देते हैं कि तालमेल बिठाकर रहना सीख लेना.

शादी के बाद बेटी की दबी दबी सी शिकायत पर ध्यान न देकर यही कहा जाता है कि आज की लड़कियों में सहनशीलता की बहुत कमी है. आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज भी अपने आत्मसम्मान को पीछे धकेलकर उसी धैर्य और सहन करने की अपेक्षा उससे की जाती है जो विकल्पहीनता की स्थिति में सदियों तक स्त्री का एकमात्र चुनाव रहा है.

निधि गुप्ता को शादी के बाद नौकरी छोड़ने के लिये कहा गया क्योंकि बच्चे छोटे थे और उनकी देखभाल करने को सास या ननद तैयार नहीं थीं. उसने नौकरी छोड़ दी. बाद में उससे कहा गया कि उसके पति के व्यवसाय में मंदी आ गई है तो उसे नौकरी फिर कर लेनी चाहिये.

उसने सर्राफ कॉलेज में पार्ट टाइम नौकरी कर ली. संयुक्त परिवार होने के कारण उसे अपने रोज़मर्रा के खर्च के लिये अपने पति या बड़ी ननद के आगे हाथ फैलाने पड़ते थे. जिस दिन उसने यह कदम उठाया, उस दिन की घटना थी कि उसके छह साल के बेटे को स्कूल की किसी पिकनिक के लिये सौ रुपये चाहिये थे. उसने हमेशा की तरह बुआ से मांगे और बुआ ने नहीं दिये. बेटा रुआंसा हो गया.

दोनों बच्चों को टिफिन और पानी की बोतल और स्कूल के बस्ते से लैस निधि अपने निवास के नौवें माले से स्कूल के लिये तैयार बच्चों को लेकर निकली और लिफ़्ट से नीचे जाने के बजाय लिफ्ट को ऊपर उन्नीसवें माले के रिफ्यूज एरिया में ले गई जहां से उसने तीन ज़िंदगियों का अंत किया.

संयुक्त परिवार के नकारात्मक पक्ष यहां एक बड़ा रोल निभाते हैं जहां एक पढ़ी लिखी लड़की का भी अपनी कमाई पर अधिकार नहीं होता. परम्परा के वर्चस्व तले एक तयशुदा रूप से ससुराल के अन्य सदस्य परिचालित करना चाहते हैं और पति इसमें या तो मूक इकाई की भूमिका निभाता है या अपने घर के सदस्यों का साथ देता है, जो अपना घर-परिवार छोड़ कर आई लड़की को और उसके पैर तले की ज़मीन को और कमज़ोर कर देता है. जो घर वह छोड़कर आई है, वह उसे विदा कर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो लेता है और जिसे वह अपना घर समझती है, वह भी उसका हो नहीं पाता. ऐसे में भावात्मक असुरक्षा उसे निपट अकेला कर देती है और घर के नाम पर उसके सामने एक शून्य होता है.

कुछ और मामले

28 जून 2010 को सभी अखबारों में निशि जेठवानी (सोनी) की आत्महत्या की खबर थी, जिसने मुंबई के एक उपनगर मुलुंड की बहुमंजिला इमारत रुनवाल प्राइड के 27 वें माले से कूदकर आत्महत्या कर ली. मध्यवर्ग से आई निशि सोनी एक प्रमुख शेअर कम्पनी में कार्यरत थी, जहां उसकी पहचान रईस परिवार के जितेन्द्र जेठवानी से हुई. शादी से पहले ही उसके सामने अनिवार्य शर्त रख दी गई थी कि वह अपनी नौकरी छोड़ देगी.

उसके प्रेम विवाह को सिर्फ तेरह महीने हुए थे. शादी के कुछ महीनों बाद ही उससे नौकरानियों जैसा व्यवहार किया जाने लगा. घर के सारे काम उस पर लाद दिये गये. उसके खाने पर भी पाबंदी थी और उसे ससुराल के सदस्यों द्वारा पीटा भी जाने लगा. इसके विरोध में वह ढ़ाई महीने अपने मायके रही, जहां उसे ‘अपने’ घर से तालमेल बिठाकर रहने का सबक देकर फिर वापस भेज दिया गया.

पति के आश्वासन पर उसे भी लगा कि स्थितियां सुधर जायेंगी लेकिन यह उसका भ्रम था. अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खोकर, और दोबारा विपरीत परिस्थितियों में झोंके जाने के बाद उसका दर्ज़ा एक नौकरानी से बेहतर नहीं था. अब 27 वें माले से कूदकर अपने जीवन की सारी यातनाओं से मुक्त होने का उसके सामने एकमात्र विकल्प था. अपने माता पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर उसने एक रईस खानदान के लड़के से प्रेम विवाह करके बगावत की थी और अपने को सज़ा देने का यही क्रूर और निर्मम तरीका उसे आसान लगा, जिससे वह अपने मां-बाप को एक ही बार सारे जंजालों से उबार सके.

ऐसा ही एक केस था आकांक्षा का, पर उसने अपनी मजबूती से स्थितियों को बदलने का हौसला दिखाया. लखनऊ की यह लड़की संस्कृत और मनोविज्ञान से एम.ए. करने के बाद एक जूनियर कॉलेज में पढ़ा रही थी. हॉस्टल में रहती थी और उसे नाटकों में अभिनय का शौक था. एक नाटक के दौरान उसकी मुलाकात अपने अभिनय के प्रशंसक एक बंगाली लड़के से हुई. घर से भाग कर उसने शादी की और आकांक्षा के घरवालों ने उससे रिश्ता तोड़ लिया और अपने घर के दरवाज़े उसके लिये बंद कर दिये.

शादी के बाद सात साल तक वह अपने पति के साथ दिल्ली, आबूधाबी और दोहा जैसी जगहों में उसकी नौकरी के साथ-साथ घूमती रही. एक बेटी भी पैदा हो गई. आखिर जब उनका ट्रांसफर मुंबई में हुआ तो उसने एक नाटक में अभिनय के लिये हामी भर दी. अब पति ने न सिर्फ नाटक करने के लिये मना किया, यह अल्टीमेटम भी थमा दिया कि नाटक में काम करने के बारे में उसने फिर सोचा भी तो वह शादी तोड़ देगा.

लड़ने का हौसला

मानसिक रूप से पूरी तरह ध्वस्त आकांक्षा हमारे पास आई- इस दृढ़ निश्चय के साथ कि वह आत्महत्या करने से पहले अपनी बेटी को पहले खत्म करेगी क्योंकि वह नहीं चाहती कि वह सौतेली मां के हाथों प्रताड़ित हो और उसके पापा में इतनी कूवत नहीं है कि वे उसे पनपने के लिये एक स्वस्थ माहौल दें. उसे हताश होकर दो दो ज़िंदगियां खत्म करने की जगह हौसला बुलंद रखने के लिये समझाया गया. अब उसकी एक और बेटी है. दोनों को साथ लेकर वह नाटक देखने जाती है. स्कूल में नौकरी भी करती है और बड़ी बेटी के स्कूल के लिये नाटक का निर्देशन कर रही है जिसमें दोनों मां बेटी हिस्सा ले रही हैं.

क्या किसी भी लड़की के विवाह को बचाने की यह शर्त होनी चाहिये कि वह अपनी सारी रचनात्मक प्रतिभा को समूल नष्ट कर दे. अगर इसी शर्त पर विवाह को बचना है तो आकांक्षा कहती है- ‘‘ मुझे भी निर्णय लेने का हक है कि मैं दोनों बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी उठाने के बाद अपनी रचनात्मकता और प्रतिभा को कैसे बचाये रखूं. आखिर पति जीवन के हर मोड़ पर अपनी ही शर्तें डिक्टेट नहीं कर सकता.’’

…और इस तरह के मामले तो असंख्य हैं जहां एक स्त्री अपनी मित्र या पड़ोसी से भी अपनी यातना को शेअर नहीं करती. मैं मुंबई के बांद्रा इलाके के अपने निवास पर अपनी पड़ोसी स्वाति खन्ना को भूल नहीं सकती, जो मुझे रोज़ सुबह की सैर के वक्त मिलती थी और जिनके साथ मैं कभी कभी ‘हेल्प‘ में काउंसिलिंग के लिये आये प्रताड़ित महिलाओं के मामलों के बारे में बात किया करती थी.

वे हमेशा यही कहतीं कि यह तो घर-घर का किस्सा है, सबके साथ होता है. पर उन्होंने कभी अपने बारे में कुछ नहीं बताया. नौ साल वहां रहने के बाद, अचानक एक रात मुझे एक दूसरी पड़ोसन ने रात के बारह बजे बुलाया. बचाओ-बचाओ की भयावह चीखें नीचे तक पहुंच रही थीं. पता चला- स्वाति लगातार 33 सालों तक अपने पति की हिंसा का शिकार हो रही थी. स्वाति उस पीढ़ी की थी, जो अपने सम्मान को अपने पति के सम्मान के साथ जोड़कर देखती हैं और सिर्फ तब अपने मुंह से चीखें बाहर आने देती है, जब उम्र के साथ कमज़ोर होती उनकी देह मारपीट झेलने के लायक नहीं रह जाती.

आज भी मध्यवर्ग की लड़कियां अगर कहती नहीं तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे सहती नहीं. होता सिर्फ यह है कि एक सीमा के बाद उनके शॉक एब्ज़ॉर्बर्स बिल्कुल फेल हो जाते हैं और अपने सामने एक डेड एंड देखने के बाद ही वे ‘बचाव के लिये चीख ‘ का इस्तेमाल करती हैं. अचानक एक दिन आत्महत्या के खयाल का दौरा पड़ने पर कोई इतना बड़ा कदम नहीं उठा लेता, इसलिये इन उठती हुई छोटी-छोटी कराहों और चीखों को पहचानना ज़रूरी है.

मीडिया, साहित्य और चिकनी…

जाहिर है, हमारे समाज में जो बदलाव हमें दिखाई दे रहे हैं, वे बहुत ऊपरी हैं. कहीं आज भी हम स्त्रियों को उनका अपेक्षित सम्मान नहीं दिला पा रहे हैं और न ही उनके लिये परिवार और समाज की ओर से वह सपोर्ट सिस्टम तैयार कर पा रहे हैं, जो उन्हें जीवन की विसंगतियों से, असुविधाओं और कठिन परिस्थितियों से जूझने के रास्ते मुहैया करवा सके. शिक्षित करके हमने उन्हें अर्थ उपार्जन का रास्ता तो दिखा दिया, आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा भी कर दिया, पर हम उन्हें जीवन जीने की कला, विपरीत परिस्थितियों से जूझने का तरीका, अपने लिये एक दरवाजा खुला रखने का ढब नहीं सिखा पाये.

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्त्रियां भी भावनात्मक रूप से अपने पति का ही मुंह जोहती रहीं. भावनात्मक आघात ही अपने जीवन का अंत करने पर उन्हें विवश करते हैं.

सबसे पहले तो हमें इस भ्रांति को तोड़ना होगा कि साहित्य से कोई सामाजिक क्रांति आ सकती है. इसके लिये दृश्य मीडिया एक ज्यादा असरकारक औजार हो सकता था पर दृश्य मीडिया को ‘चिकनी चमेली’ और ‘शीला की जवानी’ के प्रदर्शन और ‘एंटरटेनमेंट’ से ही फुर्सत नहीं है.

मीडिया और टी वी चैनलों में लगातार चलने वाले धारावाहिकों में संयुक्त परिवारों के अभिजात्य, साज सज्जा और शादियों के ताम-झाम को लगातार आकर्षक बनाकर दिखाया जाता है, जिसमें एक उच्च वर्ग की बहू की भूमिका कर्तव्यों से जकड़ी एक ‘ चुप रहकर सहने वाली स्त्री ‘ की होती है. उसके खिलाफ षडयंत्र रचने वाली एक खलनायिका स्त्री के महिमामंडन के तहत एक चरित्र गढ़ना अनिवार्य हो जाता है. जीवन की जटिलताओं को पहचानने और जीने के सकारात्मक पक्षों को उकेरने की ज़िम्मेदारी से मीडिया हमेशा बचता है. उच्चमध्य वर्ग की पढ़ी लिखी लड़कियां भी इस दोयम मानसिकता को स्वीकार करती हैं और उनके लिये अपने जीने की कीमत पर भी उसमें से बाहर निकलना आसान नहीं होता.

साहित्य की पहुंच बहुत सीमित है. इसे आज के समय में हम क्रांति का औजार नहीं मान सकते. यह जरूर है कि ऐसी स्थितियां हमारे मानस को झकझोरती हैं, तो हम अपनी कलम के जरिये एक बदलाव लाना चाहते हैं. परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज़ करना चाहते हैं. जरूरत है, समाज की मानसिकता बदलने की. सामाजिक सरोकार रखने वाला हर रचनाकार अपनी अपनी तरह से यह कोशिश जरूर करता है कि बुनियादी कुरीतियां हटे, समाज में स्त्रियों के लिये सम्मान से जीने लायक एक माहौल बने पर यह संभव हो पाता है क्या ?

ऑनर किलिंग में इतने खूबसूरत युवा जोड़ों को प्रेम में पड़ने के कारण उनके जीने के हक़ से ही बेरहमी से बेदखल कर दिया जाता है. इन खाप पंचायतों के खिलाफ़ हम एक सख्त कानून तक नहीं बना पाते. बनाते भी हैं तो उसे अमल में नहीं ला पाते. वोट की राजनीति आड़े आ जाती है. सारी स्थितियां एक से एक जुड़ी हुई हैं. ऐसे में कुरीतियों को जड़ से उखाड़ पाने और बदलाव लाने की प्रक्रिया लंबी है.

क्या यह सच नहीं कि हमने लड़कियों को पैसा कमाकर अपने पांव पर खड़ा होना तो सिखाया पर दक़ियानूसी सोच से मुठभेड़ करने के कारगर तरीके नहीं समझा पाये. ज़रूरी है कि इन कारगर तरीकों को कॉलेज और उच्च शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रम का एक ज़रूरी हिस्सा बनाया जाये ! तभी समाज में माता पिता और पति और उसके घर के लोगों की सोच में बदलाव आयेगा और इन शिक्षित लड़कियों के जीने की लड़ाई कुछ आसान हो जाएगी.

सुधार ज़रुरी है

विवाह संस्था ऑब्सोलीट हो रही है, ‘‘विवाह संस्था को खत्म करना चाहिये’’ की जगह क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि विवाह संस्था में सुधार की ज़रूरत है! सुधार कहां और कैसे ? ज़ाहिर है, जब परिस्थितियां बदल गईं हैं तो व्यक्ति को उन परिस्थितियों के अनुरूप बदलना ही होगा. जब स्त्रियां भी बाहर जा कर पति के बराबर या उससे ज़्यादा भी कमा रही हैं तो फिर बच्चों की, रसोई की पूरी ज़िम्मेदारी आज भी सिर्फ़ स्त्री के खाते में क्यों हो!

जेंडर डिवीज़न ऑफ लेबर के खांचे टूटे हैं तो उन्हें बाहर की स्पेस में ही नहीं, घर की चहारदीवारी में भी टूटना होगा. क्यों बच्चों के स्कूल में पेरेंट्स टीचर मीट में हमेशा मां ही जाये, पिता क्यों नहीं. बच्चे पिता की भी उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी है जितनी मां की. मां का बच्चे को अपनी कोख में नौ महीने रखना और प्रसव पीड़ा से गुज़रने का मतलब यह क़तई नहीं है कि बच्चे के स्कूल का होमवर्क देखने से लेकर उसके करिअर, उसकी परवरिश का पूरा जिम्मा सिर्फ़ मां का ही है, पिता का नहीं. अगर बच्चा बड़ा होकर अच्छी नौकरी में जाता है तो श्रेय पिता को मिलता है कि आखिर बेटा किसका है और अगर बुरी संगत में पड़ता है तो मां की परवरिश में दोष ढूंढा जाता है.
विवाह से पहले बेशक एक लड़की अपने होने वाले पति के साथ चार-पांच साल की कोर्टशिप कर ले पर पति का असली चेहरा विवाह के बाद ही सामने आता है, जब विवाह के पंजीकृत होते ही वह अपनी पत्नी पर मालिकाना हक़ जताने लगता है. जैसे कोई आदमी अपने लिये मकान खरीदता है और मकान के मालिकाना हक़ के कानूनी काग़ज़ातों पर दस्तख़त करने के बाद, मकान हाथ में आते ही शुरु में तो वह उसे प्यार-संभाल से रखता है, पर कुछ समय बीत जाने के बाद वह दीवारों पर जहां-तहां कील ठोकता है और सामान की इधर-उधर उठा पटक शुरु कर देता है. मकान पर उसकी मिल्कियत है तो वह दीवारों और फर्नीचर के साथ मनमाना सुलूक करता है. एक पत्नी के साथ भी यही व्यवहार किया जाता है.

उसे तो कई बार शुरुआती साज संभाल भी नहीं मिलती. अपने नाम का सिंदूर भरने के साथ साथ उसका प्रेमी पति उसके साथ ज़रख़रीद गुलाम का सा सुलूक करने लगता है. पुराने समय में विकल्पहीनता की स्थिति में हर तरह का सुलूक एक ब्याहता पत्नी के लिये शिरोधार्य होता था. आज एक मध्यवर्गीय शिक्षित आत्मनिर्भर लड़की, प्रेम विवाह के बाद, माता पिता का सपोर्ट सिस्टम न होने के कारण भावात्मक उपेक्षा से बिखर जाती है क्योंकि एक ओर वह संस्कारों से बंधी है, दूसरी ओर घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारी के बावजूद अपने सदियों पुराने दोयम दजेऱ् में कोई तब्दीली नहीं पाती.

मुंबई हाई कोर्ट के एक जज का बयान आश्चर्यजनक रूप से बेटियों के खिलाफ जाता है. उन्होंने कहा था– When a daughter gets married and leaves the house of the father to reside with her husband , She ceases to be a member of the family of father . After marriage when she goes to the house of the parents , legally she is only a guest in the house ! ( Eye –The Sunday Express Magazine – March 4 ,2012 Pg no. 20 ). ‘‘ जब एक बेटी शादी के बाद अपने पिता का घर छोड़कर पति के साथ रहने के लिये जाती है तो वह अपने पिता के परिवार का सदस्य नहीं रह जाती ! शादी के बाद जब वह अपने पिता के घर जाती है तो कानूनी तौर पर वह उस घर में एक मेहमान की हैसियत ही रखती है ! ’’

आज के समय के एक शिक्षित न्यायाधीश का यह बयान पितृसत्तात्मक समाज के ओने -कोने मजबूत करता है, पुरुषों के हाथ में बेटी की मिल्कियत थमाता है और कन्या भ्रूण हत्या के कारणों की ओर संकेत करता है जहां बेटी को आज भी ‘पराया धन’ मान कर बेटी के जन्म का स्वागत नहीं किया जाता.

रास्ता कहां है ?

अगर मध्यवर्गीय तबका अपनी बेटियों को जीवन के कई मोड़ों पर चुप्पी के संस्कारों को तोड़कर ज़बान खोलने और अपनी तकलीफ को साझा करने का रास्ता सुझायें तो ऐसी त्रासदियों को रोका जा सकता है !

• हर शिक्षित और आत्मनिर्भर लड़की को यातना के चरम पर भी यह संदेश जाना चाहिये कि हर जटिल स्थिति का विकल्प है और जीने की आशा मद्धिम नहीं हुई है. यह हर महिला की ज़िम्मेदारी है.

• इस संदेश को पहुंचाने की पहली ज़िम्मेदारी अभिभावकों की है. एक बेहद स्पष्ट और मुखर संदेश बेटियों तक संप्रेषित होना चाहिये कि शादी के साथ नये माहौल में जाते ही माता पिता से उसके संबंध बदल नहीं जाते. हो सकता है नया माहौल बहुत सहयोगी न हो इसलिये यह संदेश रेखांकित होना चाहिये कि अगर शादी के बाद तुम्हें विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़े या अपमानित होना पड़े तो तुम अकेली नहीं हो इसलिये कभी चुप रहकर अपने भीतर मत घुटना.

• दूसरी ज़िम्मेदारी शैक्षणिक संस्थाओं और मीडिया की है. शिक्षा लड़कियों को भावनात्मक संबल नहीं देती, न जीने की कला सिखाती है, यह सिर्फ पैसा कमाने का सामथ्र्य पैदा करती है. लड़कियों का भावनात्मक रूप से भी आत्मनिर्भर होना बहुत ज़रूरी है.

• सभी स्कूल और कॉलेजों में एक स्थायी प्रशिक्षित सलाहकार नियुक्त किया जाना चाहिये, जो भारतीय समाज की पुरुषवादी मानसिकता और जीवन की व्यावहारिक जटिलताओं से भी छात्र का परिचय करवाये और उन्हें अपने जीवन साथी को उसका अपेक्षित सम्मान देना सिखाये.

• हमारी धार्मिक पुस्तकें और वैवाहिक मंत्र जिस तरह एक पक्ष के हर स्थिति को स्वीकार करने और तालमेल बिठाने पर जोर देते हैं, उसे उभयपक्षी किया जाये.

• शादी तय होते ही लड़कियां सुनहरे सपने देखने लगती हैं. इन सपनों के साथ उन्हें यह भी मालूम हो कि शादी सिर्फ़ फूलों की सेज नहीं है. शादी दो अलग अलग माहौल से आये व्यक्तियों का जुड़ाव है जिसे बहुत समझदारी के साथ दोनों को ही तालमेल बनाकर चलना है. इसे निभाना ज़रूरी है पर अपनी ज़िन्दगी की कीमत पर नहीं. सामाजिक प्रतिष्ठा, परम्परा और संस्कारों के नाम पर ज़रूरी नहीं कि अकेली या तलाकशुदा होने के डर से एक शिक्षित लड़की अपनी ज़िन्दगी को ही दांव पर लगा दे. उसे अपनी शर्तों पर अपने आत्मसम्मान को बचाते हुए जीना है.

• लड़कियों को यह समझना है कि उनका जीवन बेशकीमती है और अगर शादी ठीक नहीं चलती तो दुनिया वहीं खत्म नहीं हो जाती. हादसे और आघात ही हमें मज़बूत बनाते हैं. एक दरवाज़ा बंद होने से ज़िन्दगी रुकी नहीं रह जाती. रास्ते और मंज़िलें और भी हैं.

• हम अपनी चुप्पी के संस्कारों को तोड़ें तो ज़रूर कुछ नया गढ़ पायेंगे – अपने लिये और अपने समाज के लिये ! लेकिन सबसे ज़रूरी है बेटियों के लिये एक दरवाज़े का खुला होना !

इन्हीं स्थितियों ने मुझसे ये पंक्तियां लिखवा लीं –

कम से कम एदरवाज़ा
चाहे नक्काशीदार एंटीक दरवाजा हो
या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना
उस पर ख़ूबसूरत हैंडल जड़ा हो
या लोहे का कुंडा !

वह दरवाज़ा ऐसे घर का हो
जहाँ माँ बाप की रजामंदी के बगैर
अपने प्रेमी के साथ भागी हुई बेटी से
माता पिता कह सकें  —
” जानते हैं , तुमने गलत फैसला  लिया
फिर भी हमारी यही दुआ है
खुश रहो उसके साथ
जिसे तुमने वरा है !
यह मत भूलना
कभी यह फैसला भारी पड़े
और पाँव लौटने को मुड़ें
तो यह दरवाज़ा खुला है तुम्हारे लिए ! ”

बेटियों को जब सारी दिशाएं
बंद नज़र आएं
कम से कम एक दरवाज़ा
हमेशा खुला रहे उनके लिए !
(आजकल: मार्च २०१२ से साभार )