हर पुरुष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है

निवेदिता
निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com 
( पाखी के सम्पादक ने सितम्बर अंक के अपने सम्पादकीय में चालीस साल की स्त्रियों के प्रेम , उनके विश्वास और विश्वासघात तथा तथाकथित तौर पर उनमें साहस के अभाव सहित अभिव्यक्ति के नये आयाम के साथ ज्यादा उन्मुक्त होती स्त्रियों को अपना विषय बनाया है . ४० साल की यह उम्र सीमा समझ से परे है . वैसे पुरुषों के लिए स्त्रियों की उम्र और उनका कौमार्य बड़ा पुराना विमर्श -विषय रहा है . १९वी शताब्दी में तिलक और रानाडे आदि विवाह के लिए ९ साल या ११ साल की बहस में फंसे थे या फिर किस विधवा की शादी हो , जैसे विषय में . यानी बहस यह थी कि पति -संसर्ग कर चुकी विधवा का पुनर्विवाह हो या नहीं . पाखी के सम्पादक भी उसी कड़ी में विमर्श कर रहे हैं ,  शर्मिला इरोम  , अरुंधति राय , शोभना भारतीय , इंदिरा नुई , सुस्मिता सेन , विद्या बालन के समय में. या उस समय में जब स्त्रियाँ अपनी कामनाओं और इच्छाओं के साथ सक्रिय हैं . निवेदिता पाखी के विवादित सम्पादकीय के परिप्रेक्ष्य से अपनी बात कह रही हैं . आप भी आमंत्रित हैं . )

प्रेम भारद्वाज को पढ़ती रही हूं । मुझे उनको पढ़ना अच्छा लगता है। अच्छा इसलिए नहीं कि वे मित्र हैं, इसलिए कि लिखना एक कला है। उंनकी अभिव्यक्ति लेखन -कला के साथ जीवंत होती है . काला  जितनी उनके बाहर है उतनी भीतर। हम यह उम्मीद करते हैं कि कला के प्रति गहरा अनुराग रखने वाला इंसान स्त्री मुद्दों पर भी उतना ही संवेदनशील होगा ,जितना मनुष्यता को लेकर। सीमोन कहती हैं, '  स्त्री जन्म नहीं लेती स्त्री गढ़ी जाती है।'  मुझे लगता है पुरुषों के बारे में भी यह कहा जाना चाहिए कि ' हर पुरुष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है.'

पाखी के संपादकीय‘ चांद पर हूं...मगर कब तक’ में प्रेम भारद्वाज ने जो कुछ लिखा उससे अंधेरा और गहरा हुआ है। एक बार फिर स्त्री लहुलूहान हुई है। मैं नहीं जानती की जिन 40 पार की स्त्रियों का जिक्र संपादकीय में किया गया है वे किस दुनिया की स्त्री हैं? जहां प्रेम भी प्रेम जैसा नहीं है। टाइम पास है। सिनेमा का मध्यांतर है। जहां मौज मस्ती के साथ पाॅपकार्न खा लेने भर का ही वक्त है।  प्रेम भारद्वाज की यह स्त्री छलना है, पर पुरुष गामिनी  है। अपने घर के दायरे को सुरक्षित रखकर प्रेम करती है, मजा लेती है। यह वह स्त्री नहीं है, जो प्रेम के लिए मर जाती है या मार दी जाती है, जिसने घरती पर पांव जमाने के लिए खुरदरी जमीन पर अपनी मेहनत से फसल उगायी है। जिसने अपने हिस्से के आसमान के लिए खून से भरे शोक  के फर्श  पर सदियां बितायी है।

ये कौन स्त्री है? किस वर्ग की? किस दुनिया की जिसे अपने गोपन कक्ष में प्रेम करने की आजादी है। जहां वह प्रेमी के साथ जीती है,पति के साथ सोती है? और यह बेचारा पुरुष कितना मासूम, प्रेम में मरने वाला, जान देने वाला है। राम सजीवन जैसा पुरुष किस दुनिया में रहता है ? काश  कि किसी स्त्री के जीवन में इतने संवेदनशील  मर्द होते!


सब्जेक्शन आॅफ विमेन में जाॅन स्टुअर्ट मिल कहते हैं-‘पुरुष अपनी स्त्रियों  को एक बाध्य गुलाम की तरह नहीं बल्कि एक इच्छुक  गुलाम की तरह रखना चाहते हैं,सिर्फ गुलाम नहीं, बल्कि पंसदीदा गुलाम। इसलिए उनके मस्तिष्कों को बंदी बनाए रखने के लिए उन्होंने सारे संभव रास्ते अपनाए हैं।’

हर नैतिकता स्त्री से यही कहती फिरती है कि स्त्री को दूसरों के लिए जीना चाहिए। सच तो यह है पराजित  नस्लों और गुलामों से भी ज्यादा सख्ती और क्रूरता  से स्त्री को दबाया गया। यह हम नहीं कह रहे हैं यह स्त्री का इतिहास बताता है। क्या कोई भी गुलाम इतने लंबे समय के लिए गुलाम रहा है जितनी की स्त्री? क्या यह स्थापित करने की कोशिश नहीं है कि अच्छे पुरुष की निरंकुश सत्ता में चारों तरफ भलाई,सुख और प्रेम के झरने बह रहे हैं। जिसकी आड़ में  वह हर स्त्री के साथ मनमाना व्यवहार कर सकता है। उसकी हत्या तक कर सकता है और थोड़ी होशियारी बरत कर वह हत्या कर के भी कानून से बचा रह सकता है। वह अपनी सारी दबी हुई कुंठा अपनी पत्नी पर निकाल सकता है। जो अपनी असहाय स्थिति के कारण न पलट कर जबाव दे सकती है, न उससे बचकर जा सकती है। अगर यकीन न हो तो हर रोज मारी जा रही स्त्रियों के आंकड़े को उठा कर देख लें।


40 के पार की औरतोें अगर प्रेम में इतनी ही पकी होतीं तो हर रोज रस्सी के फंदे से झूलती खबरें अखबारों के पन्ने पर नजर नहीं आती। सच तो यह है कि उसकी पूरी जिन्दगी अपने घर को बचाने में चली जाती है। घर उसके जीने का केन्द्र है। उसके हंसने, बोलने, रोने का। इसलिए उसने घर को अपना फैलाव माना। उसे सींचा। पर इसके पेड़ का फल पुरुषों ने ही खाया। उसे राम सजीवन जैसा न कभी प्रेमी मिलता है न एकनिष्ठ पति। फिर भी वह अनैतिक है। पुरुष को नैतिक और  स्त्री को अनैतिक बनाने की मानसिकता के पीछे यह बताना है कि पुरुष नैतिक रुप से श्रेष्ठ है। नैतिकता और अनैतिकता को लेकर हमेशा  से अतंर्विरोध रहा है। जिसका नायाब उदाहरण है टाॅलस्टाय का उपन्यास अन्ना कैरेनिना। अनैतिक अन्ना विश्व  उपन्यास की सबसे यादगार चरित्रों में से है।  टाॅलस्टाय के नैतिकता संबंधी विचारों को उसकी कला ध्वस्त कर देती है।



जिस समाज में प्रेम अपराध है उस समाज में स्त्री को इस बात की छूट कहां कि वह प्रेम से भरी दिखे। वह प्रेम के लिए जिए। वह प्रेम कविता लिखे। पता नहीं प्रेम भारद्वाज को वैसी स्त्रियाँ  कहां दिख गयीं । जिस फेसबुक को स्त्री के लिए किसी दरीचे के खुलने  जैसा मान रहे हैं  उसके खुलेपन  से इतने आहत क्यों? फेसबुक पुरुषों का भी  चारागाह है। जहां वे शिकारियों  की तरह ताक में बैठे रहते हैं कि जाने कौन किस चाल में फंसे। दरअसल ये पूरी बहस ही बेमानी है। प्रेम को किसी अलग सदंर्भ में नहीं देखा जा सकता। हमारी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक और लैंगिक बुनावट तय करती है कि कौन सा समाज किन मूल्यों के साथ जीता है। इसी समाज में ईरोम भी है और अरुणा राय भी।


सवाल उठता है कि हम स्त्री को किस तरह से देखते हैं। एक आब्जेक्ट के रुप में या मनुष्य के रुप में ? अगर हम मनुष्य की तरह देखेंगे तो हमें तीसरी कसम का हीरामन ही याद नहीं आयेगा हीराबाई के प्रति भी हमारी गहरी संवेदना होगी। देवदास शराब में डूब कर मर जाता है पारो जिन्दगी से लड़ती है, पलायन नहीं करती। अगर लैेला नहीं होती तो आज मजनूं नहीं होता। न लैला कहती , ' मेरा कब्र वहीं बनाना ,जहां मैं पहली बार उससे मिली थी। उससे कहना कि मेरी कब्र पर आयें,और सामने क्षितिज की ओर देखे.  वहां मैं उसका इंतजार कर रही हूंगी। ' और जिन आंखों में मजनूं के सिवा कोई समाया नहीं था, वे आंखें हमेशा  के लिए बंद हो गयी।



' कागा सब तन खाइयो
चुनि-चुनि खाइयो मास
दुइ अंखियां मत खाइयो
 पिया मिलन की आस।' ...

दरअसल प्रेम यही है। इससे इतर कुछ नहीं। वह 40 की पार औरतें हों या फिर 16 साल की मासूम उम्र,  जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियाबी रस्मों रीवाज छू पाते हैं।
Blogger द्वारा संचालित.